१८४ स्वधर्मपरायणविप्रमाहात्म्यम्

भागसूचना

चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य

मूलम् (वचनम्)

वैशम्पायन उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

मार्कण्डेयं महात्मानमूचुः पाण्डुसुतास्तदा ।
माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम् ॥ १ ॥

मूलम्

मार्कण्डेयं महात्मानमूचुः पाण्डुसुतास्तदा ।
माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम् ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस समय पाण्डुपुत्रोंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे कहा—‘मुने! हम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका माहात्म्य सुनना चाहते हैं, आप उसका वर्णन कीजिये’॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्तः स भगवान् मार्कण्डेयो महातपाः।
उवाच सुमहातेजाः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ २ ॥

मूलम्

एवमुक्तः स भगवान् मार्कण्डेयो महातपाः।
उवाच सुमहातेजाः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनके ऐसा कहनेपर महातपस्वी, महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके निपुण विद्वान् भगवान् मार्कण्डेयने इस प्रकार कहा॥२॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

हैहयानां कुलकरो राजा परपुरंजयः।
कुमारो रूपसम्पन्नो मृगयां व्यचरद् बली ॥ ३ ॥

मूलम्

हैहयानां कुलकरो राजा परपुरंजयः।
कुमारो रूपसम्पन्नो मृगयां व्यचरद् बली ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी बोले— हैहयवंशी क्षत्रियोंकी वंशपरम्पराको बढ़ानेवाला राजा परपुरंजय, जो अभी कुमारावस्थामें था, बड़ा ही सुन्दर और बलवान् था, एक दिन वनमें हिंसक पशुओंको मारनेके लिये गया॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

चरमाणस्तु सोऽरण्ये तृणवीरुत्समावृते ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं ददर्श मुनिमन्तिके ॥ ४ ॥

मूलम्

चरमाणस्तु सोऽरण्ये तृणवीरुत्समावृते ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं ददर्श मुनिमन्तिके ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तृण और लताओंसे भरे हुए उस वनमें घूमते-घूमते उस राजकुमारने एक मुनिको देखा, जो काले हिंसक पशुके चर्मकी ओढ़नी ओढ़े थोड़ी ही दूरपर बैठे थे॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तेन निहतोऽरण्ये मन्यमानेन वै मृगम्।
व्यथितः कर्म तत् कृत्वा शोकोपहतचेतनः ॥ ५ ॥

मूलम्

स तेन निहतोऽरण्ये मन्यमानेन वै मृगम्।
व्यथितः कर्म तत् कृत्वा शोकोपहतचेतनः ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजकुमारने उन्हें हिंसक पशु ही समझा और उस वनमें अपने बाणोंसे उन्हें मार डाला। अज्ञानवश यह पापकर्म करके वह राजकुमार व्यथित हो शोकसे मूर्च्छित हो गया॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जगाम हैहयानां वै सकाशं प्रथितात्मनाम्।
राज्ञां राजीवनेत्रोऽसौ कुमारः पृथिवीपतिः।
तेषां च तद् यथावृत्तं कथयामास वै तदा ॥ ६ ॥

मूलम्

जगाम हैहयानां वै सकाशं प्रथितात्मनाम्।
राज्ञां राजीवनेत्रोऽसौ कुमारः पृथिवीपतिः।
तेषां च तद् यथावृत्तं कथयामास वै तदा ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तत्पश्चात् होशमें आकर वह सुविख्यात हैहयवंशी राजाओंके पास गया। वहाँ पृथ्वीका पालन करनेवाले उस कमलनयन राजकुमारने उन सबके सामने इस दुर्घटनाका यथावत् समाचार कहा॥६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तं चापि हिंसितं तात मुनिं मूलफलाशिनम्।
श्रुत्वा दृष्ट्वा च ते तत्र बभूवुर्दीनमानसाः ॥ ७ ॥

मूलम्

तं चापि हिंसितं तात मुनिं मूलफलाशिनम्।
श्रुत्वा दृष्ट्वा च ते तत्र बभूवुर्दीनमानसाः ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तात! फल-मूलका आहार करनेवाले एक मुनिकी हिंसा हो गयी, यह सुनकर और देखकर वे सभी क्षत्रिय मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कस्यायमिति ते सर्वे मार्गमाणास्ततस्ततः।
जग्मुश्चारिष्टनेम्नोऽथ तार्क्ष्यस्याश्रममञ्जसा ॥ ८ ॥

मूलम्

कस्यायमिति ते सर्वे मार्गमाणास्ततस्ततः।
जग्मुश्चारिष्टनेम्नोऽथ तार्क्ष्यस्याश्रममञ्जसा ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

फिर वे सब-के-सब जहाँ-तहाँ यह पता लगाते हुए कि ये मुनि किसके पुत्र हैं, शीघ्र ही कश्यप-नन्दन अरिष्टनेमिके आश्रमपर गये॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेऽभिवाद्य महात्मानं तं मुनिं नियतव्रतम्।
तस्थुः सर्वे स तु मुनिस्तेषां पूजामथाहरत् ॥ ९ ॥

मूलम्

तेऽभिवाद्य महात्मानं तं मुनिं नियतव्रतम्।
तस्थुः सर्वे स तु मुनिस्तेषां पूजामथाहरत् ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वहाँ नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके वे सब खड़े हो गये। तब मुनिने उनके लिये अर्घ्य आदि पूजन-सामग्री अर्पित की॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते तमूचुर्महात्मानं न वयं सत्क्रियां मुने।
त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण ब्राह्मणो हिंसितो हि नः ॥ १० ॥

मूलम्

ते तमूचुर्महात्मानं न वयं सत्क्रियां मुने।
त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण ब्राह्मणो हिंसितो हि नः ॥ १० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

यह देखकर उन्होंने उन महात्मासे कहा—‘मुने! हम अपने दूषित कर्मके कारण आपसे सत्कार पानेयोग्य नहीं रह गये हैं। हमसे एक ब्राह्मणकी हत्या हो गयी है’॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तानब्रवीत् स विप्रर्षिः कथं वो ब्राह्मणो हतः।
क्व चासौ ब्रूत सहिताः पश्यध्वं मे तपोबलम् ॥ ११ ॥

मूलम्

तानब्रवीत् स विप्रर्षिः कथं वो ब्राह्मणो हतः।
क्व चासौ ब्रूत सहिताः पश्यध्वं मे तपोबलम् ॥ ११ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

यह सुनकर उन ब्रह्मर्षिने कहा—‘आपलोगोंसे ब्राह्मणकी हत्या कैसे हुई? और वह मरा हुआ ब्राह्मण कहाँ है? बताइये। फिर सब लोग एक साथ मेरी तपस्याका बल देखियेगा’॥११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते तु तत् सर्वमखिलमाख्यायास्मै यथातथम्।
नापश्यंस्तमृषिं तत्र गतासुं ते समागताः ॥ १२ ॥

मूलम्

ते तु तत् सर्वमखिलमाख्यायास्मै यथातथम्।
नापश्यंस्तमृषिं तत्र गतासुं ते समागताः ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनके इस प्रकार पूछनेपर क्षत्रियोंने मुनिके वधका सारा समाचार उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया और उन्हें साथ लेकर सभी उस स्थानपर आये जहाँ मुनिकी हत्या हुई थी। किंतु उन्होंने वहाँ मरे हुए मुनिकी लाश नहीं देखी॥१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अन्वेषमाणाः सव्रीडाः स्वप्नवद्गतचेतनाः ।
तानब्रवीत् तत्र मुनिस्तार्क्ष्यः परपुरंजय ॥ १३ ॥
स्यादयं ब्राह्मणः सोऽथ युष्माभिर्यो विनाशितः।
पुत्रो ह्ययं मम नृपास्तपोबलसमन्वितः ॥ १४ ॥

मूलम्

अन्वेषमाणाः सव्रीडाः स्वप्नवद्गतचेतनाः ।
तानब्रवीत् तत्र मुनिस्तार्क्ष्यः परपुरंजय ॥ १३ ॥
स्यादयं ब्राह्मणः सोऽथ युष्माभिर्यो विनाशितः।
पुत्रो ह्ययं मम नृपास्तपोबलसमन्वितः ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

फिर तो वे लज्जित होकर इधर-उधर उसकी खोज करने लगे। स्वप्नकी भाँति उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। तब मुनिवर अरिष्टनेमिने उनसे कहा—‘परपुरंजय! तुम लोगोंने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण तो नहीं है? राजाओ! यह मेरा तपोबलसम्पन्न पुत्र है’॥१३-१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते च दृष्ट्वैव तमृषिं विस्मयं परमं गताः।
महदाश्चर्यमिति वै ते ब्रुवाणा महीपते ॥ १५ ॥

मूलम्

ते च दृष्ट्वैव तमृषिं विस्मयं परमं गताः।
महदाश्चर्यमिति वै ते ब्रुवाणा महीपते ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! उन महर्षिको जीवित हुआ देख वे सभी क्षत्रिय बड़े विस्मित हुए और कहने लगे ‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मृतो ह्ययमुपानीतः कथं जीवितमाप्तवान्।
किमेतत् तपसो वीर्यं येनायं जीवितः पुनः ॥ १६ ॥

मूलम्

मृतो ह्ययमुपानीतः कथं जीवितमाप्तवान्।
किमेतत् तपसो वीर्यं येनायं जीवितः पुनः ॥ १६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘ये मरे हुए मुनि यहाँ कैसे लाये गये और किस प्रकार इन्हें जीवन मिला? क्या यह तपस्याकी ही शक्ति है, जिससे फिर ये जीवित हो गये?॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

श्रोतुमिच्छामहे विप्र यदि श्रोतव्यमित्युत।
स तानुवाच नास्माकं मृत्युः प्रभवते नृपाः ॥ १७ ॥

मूलम्

श्रोतुमिच्छामहे विप्र यदि श्रोतव्यमित्युत।
स तानुवाच नास्माकं मृत्युः प्रभवते नृपाः ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘ब्रह्मन्! हम यह सब रहस्य सुनना चाहते हैं। यदि सुननेयोग्य हो तो कहिये’। तब महर्षिने उन क्षत्रियोंसे कहा—‘राजाओ! हम लोगोंपर मृत्युका वश नहीं चलता’॥१७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कारणं वः प्रवक्ष्यामि हेतुयोगसमासतः।
(मृत्युः प्रभवने येन नास्माकं नृपसत्तमाः।
शुद्धाचारा अनलसाः संध्योपासनतत्पराः ॥
शुद्धान्नाः शुद्धसुधना ब्रह्मचर्यव्रतान्विताः ।)
सत्यमेवाभिजानीमो नानृते कुर्महे मनः।
स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ १८ ॥

मूलम्

कारणं वः प्रवक्ष्यामि हेतुयोगसमासतः।
(मृत्युः प्रभवने येन नास्माकं नृपसत्तमाः।
शुद्धाचारा अनलसाः संध्योपासनतत्पराः ॥
शुद्धान्नाः शुद्धसुधना ब्रह्मचर्यव्रतान्विताः ।)
सत्यमेवाभिजानीमो नानृते कुर्महे मनः।
स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इसका क्या कारण है? यह मैं तर्क और युक्तिके साथ संक्षेपसे बता रहा हूँ। श्रेष्ठ नृपतिगण! हमलोगोंपर मृत्युका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता—यह बताते हैं, सुनिये—हम शुद्ध आचार-विचारसे रहते हैं, आलस्यसे रहित हैं, प्रतिदिन संध्योपासनके परायण रहते हैं, शुद्ध अन्न खाते हैं और शुद्ध रीतिसे न्यायपूर्वक धनोपार्जन करते हैं; यही नहीं हमलोग सदा ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें लगे रहते हैं। हमलोग केवल सत्यको ही जानते हैं। कभी झूठमें मन नहीं लगाते और सदा अपने धर्मका पालन करते रहते हैं। इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है॥१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथयामहे।
नैषां दुश्चरितं ब्रूमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ १९ ॥
अतिथीनन्नपानेन भृत्यानत्यशनेन च ।
सम्भोज्य शेषमश्नीमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ २० ॥

मूलम्

यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथयामहे।
नैषां दुश्चरितं ब्रूमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ १९ ॥
अतिथीनन्नपानेन भृत्यानत्यशनेन च ।
सम्भोज्य शेषमश्नीमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ २० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘ब्राह्मणोंके जो शुभ कर्म हैं, उन्हींकी हम चर्चा करते हैं। उनके दोषोंका बखान नहीं करते हैं। इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है। हम अतिथियोंको अन्न और जलसे तृप्त करते हैं। हमारे ऊपर जिनके भरण-पोषणका भार है, उन्हें हम पूरा भोजन देते हैं और उन्हें भोजन करानेसे बचा हुआ अन्न हम स्वयं भोजन करते हैं, अतः हमें मृत्युसे भय नहीं है॥१९-२०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शान्ता दान्ताः क्षमाशीलास्तीर्थदानपरायणाः ।
पुण्यदेशनिवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः।
तेजस्विदेशवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ २१ ॥

मूलम्

शान्ता दान्ताः क्षमाशीलास्तीर्थदानपरायणाः ।
पुण्यदेशनिवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः।
तेजस्विदेशवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘हम सदा शम, दम, क्षमा, तीर्थ-सेवन और दानमें तत्पर रहनेवाले हैं तथा पवित्र देशमें निवास करते हैं। इसलिये भी हमें मृत्युसे भय नहीं है। इतना ही नहीं हमलोग तेजस्वी पुरुषोंके देशमें निवास करते हैं अर्थात् सत्पुरुषोंके समीप रहा करते हैं। इस कारणसे भी हमें मृत्युसे भय नहीं होता है॥२१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एतद् वै लेशमात्रं वः समाख्यातं विमत्सराः।
गच्छध्वं सहिताः सर्वे न पापाद् भयमस्ति वः ॥ २२ ॥

मूलम्

एतद् वै लेशमात्रं वः समाख्यातं विमत्सराः।
गच्छध्वं सहिताः सर्वे न पापाद् भयमस्ति वः ॥ २२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘ईर्ष्यारहित राजाओ! ये सब बातें मैंने तुम्हें संक्षेपसे सुनायी हैं। अब तुम सब लोग एक साथ यहाँसे जाओ, तुम्हें ब्रह्महत्याके पापसे भय नहीं रहा’॥२२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमस्त्विति ते सर्वे प्रतिपूज्य महामुनिम्।
स्वदेशमगमन् हृष्टा राजानो भरतर्षभ ॥ २३ ॥

मूलम्

एवमस्त्विति ते सर्वे प्रतिपूज्य महामुनिम्।
स्वदेशमगमन् हृष्टा राजानो भरतर्षभ ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंने ‘एवमस्तु’ कहकर महामुनि अरिष्टनेमिका सम्मान एवं पूजन किया और प्रसन्न होकर अपने स्थानको चले गये॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्यकथने चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यवर्णनविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१८४॥

सूचना (हिन्दी)

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)