भागसूचना
(मार्कण्डेयसमास्यापर्व)
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुनः द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
निदाघान्तकरः कालः सर्वभूतसुखावहः ।
तत्रैव वसतां तेषां प्रावृट् समभिपद्यत ॥ १ ॥
मूलम्
निदाघान्तकरः कालः सर्वभूतसुखावहः ।
तत्रैव वसतां तेषां प्रावृट् समभिपद्यत ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर ग्रीष्म-ऋतुकी समाप्ति सूचित करनेवाला वर्षाकाल आया, जो समस्त प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाला था। पाण्डव अभी द्वैतवनमें ही थे, उसी समय वर्षा-ऋतु आ गयी॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
छादयन्तो महाघोषाः खं दिशश्च बलाहकाः।
प्रववर्षुर्दिवारात्रमसिताः सततं तदा ॥ २ ॥
मूलम्
छादयन्तो महाघोषाः खं दिशश्च बलाहकाः।
प्रववर्षुर्दिवारात्रमसिताः सततं तदा ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब काले-काले मेघ जोर-जोरसे गर्जना करते हुए आकाश और दिशाओंमें छा गये और दिन-रात निरन्तर जलकी वर्षा करने लगे॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तपात्ययनिकेताश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
अपेतार्कप्रभाजालाः सविद्युद्विमलप्रभाः ॥ ३ ॥
मूलम्
तपात्ययनिकेताश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
अपेतार्कप्रभाजालाः सविद्युद्विमलप्रभाः ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वे वर्षामें तम्बूके समान जान पड़ते थे। उनकी संख्या सैकड़ों और हजारोंतक पहुँच गयी थी। उन्होंने सूर्यके प्रभापुञ्जको तो ढँक दिया था और विद्युत्की निर्मल प्रभा धारण कर ली थी॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विरूढशष्पा धरणी मत्तदंशसरीसृपा ।
बभूव पयसा सिक्ता शान्ता सर्वमनोरमा ॥ ४ ॥
मूलम्
विरूढशष्पा धरणी मत्तदंशसरीसृपा ।
बभूव पयसा सिक्ता शान्ता सर्वमनोरमा ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धरतीपर घास जम गयी। मतवाले डाँस और सर्प आदि विचरने लगे। पृथ्वी जलसे अभिषिक्त होकर शान्त और सबके लिये मनोरम हो गयी॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न स्म प्रज्ञायते किंचिदम्भसा समवस्तृते।
समं वा विषमं वापि नद्यो वा स्थावराणि च॥५॥
मूलम्
न स्म प्रज्ञायते किंचिदम्भसा समवस्तृते।
समं वा विषमं वापि नद्यो वा स्थावराणि च॥५॥
अनुवाद (हिन्दी)
सब ओर इतना पानी भर गया कि ऊँचा-नीचा, समतल, नदी अथवा पेड़-पौधे आदिका पता नहीं चलता था॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षुब्धतोया महावेगाः श्वसमाना इवाशुगाः।
सिन्धवः शोभयांचक्रुः काननानि तपात्यये ॥ ६ ॥
मूलम्
क्षुब्धतोया महावेगाः श्वसमाना इवाशुगाः।
सिन्धवः शोभयांचक्रुः काननानि तपात्यये ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वर्षा-ऋतुकी नदियाँ बड़े वेगसे छूटनेवाले शीघ्र-गामी बाणोंकी भाँति सनसनाती हुई चलती थीं। उनके जलमें हिलोरें उठती रहती थीं और वे कितने ही काननोंकी शोभा बढ़ाती थीं॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नदतां काननान्तेषु श्रूयन्ते विविधाः स्वनाः।
वृष्टिभिश्च्छाद्यमानानां वराहमृगपक्षिणाम् ॥ ७ ॥
मूलम्
नदतां काननान्तेषु श्रूयन्ते विविधाः स्वनाः।
वृष्टिभिश्च्छाद्यमानानां वराहमृगपक्षिणाम् ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वनके भीतर वर्षाकी बौछारोंसे भीगते और बोलते हुए वराह, मृग और पक्षियोंकी भाँति-भाँतिकी बोलियाँ सुनायी देती थीं॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्तोककाः शिखिनश्चैव पुंस्कोकिलगणैः सह।
मत्ताः परिपतन्ति स्म दर्दुराश्चैव दर्पिताः ॥ ८ ॥
मूलम्
स्तोककाः शिखिनश्चैव पुंस्कोकिलगणैः सह।
मत्ताः परिपतन्ति स्म दर्दुराश्चैव दर्पिताः ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पपीहा और मोर नर-कोकिलोंके साथ आनन्दोन्मत्त होकर इधर-उधर उड़ने लगे और मेढक भी घमण्डमें आकर इधर-उधर कूदते और टर्र-टर्र करते थे॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तथा बहुविधाकारा प्रावृण्मेघानुनादिता ।
अभ्यतीता शिवा तेषां चरतां मरुधन्वसु ॥ ९ ॥
मूलम्
तथा बहुविधाकारा प्रावृण्मेघानुनादिता ।
अभ्यतीता शिवा तेषां चरतां मरुधन्वसु ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पाण्डव अभी मरुप्रदेशमें ही विचरते थे, तभी मेघोंकी गर्जनासे गूँजती तथा अनेक प्रकारके रूप-रंग लिये प्रकट हुई मंगलमयी वर्षा-ऋतु भी बीत गयी॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्रौञ्चहंससमाकीर्णा शरत् प्रमुदिताभवत् ।
रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा ॥ १० ॥
विमलाकाशनक्षत्रा शरत् तेषां शिवाभवत्।
मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ११ ॥
मूलम्
क्रौञ्चहंससमाकीर्णा शरत् प्रमुदिताभवत् ।
रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा ॥ १० ॥
विमलाकाशनक्षत्रा शरत् तेषां शिवाभवत्।
मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तत्पश्चात् आनन्दमयी शरद्-ऋतुका शुभागमन हुआ। क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी चारों ओर विचरने लगे। वनोंमें और पर्वतीय शिखरोंपर कास, कुश आदि बहुत बढ़ गये थे। नदियोंका जल स्वच्छ हो गया। आकाश निर्मल होनेसे नक्षत्रोंका आलोक और उज्ज्वल हो उठा। सब ओर मृग और पक्षी किलोल करने लगे। महात्मा पाण्डवोंके लिये यह शरद्-ऋतु अत्यन्त सुखदायिनी थी॥१०-११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दृश्यन्ते शान्तरजसः क्षपा जलदशीतलाः।
ग्रहनक्षत्रसङ्घैश्च सोमेन च विराजिताः ॥ १२ ॥
मूलम्
दृश्यन्ते शान्तरजसः क्षपा जलदशीतलाः।
ग्रहनक्षत्रसङ्घैश्च सोमेन च विराजिताः ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समयकी रातें धूलरहित एवं निर्मल दिखायी देती थीं। बादलोंके समान उनमें शीतलता थी। ग्रहों और नक्षत्रोंके समुदाय तथा चन्द्रमा उनकी शोभा बढ़ाते थे॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुमुदैः पुण्डरीकैश्च शीतवारिधराः शिवाः।
नदीः पुष्करिणीश्चैव ददृशुः समलंकृताः ॥ १३ ॥
मूलम्
कुमुदैः पुण्डरीकैश्च शीतवारिधराः शिवाः।
नदीः पुष्करिणीश्चैव ददृशुः समलंकृताः ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पाण्डवोंने देखा, नदियाँ और पोखरियाँ कुमुदों तथा कमल-पुष्पोंसे अलंकृत हैं। उनमें शीतल जल भरा हुआ है और वे सबके लिये सुखदायिनी प्रतीत होती हैं॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आकाशनीकाशतटां तीरवानीरसंकुलाम् ।
बभूव चरतां हर्षः पुण्यतीर्थां सरस्वतीम् ॥ १४ ॥
मूलम्
आकाशनीकाशतटां तीरवानीरसंकुलाम् ।
बभूव चरतां हर्षः पुण्यतीर्थां सरस्वतीम् ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पावन तीर्थोंसे विभूषित सरस्वती नदीका तट आकाशके समान निर्मल दिखायी देता था। उसके दोनों किनारे बेंतकी लहलहाती हुई लताओंसे आच्छादित थे। वहाँ विचरते हुए पाण्डवोंको बड़ा आनन्द मिलता था॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ते वै मुमुदिरे वीराः प्रसन्नसलिलां शिवाम्।
पश्यन्तो दृढधन्वानः परिपूर्णां सरस्वतीम् ॥ १५ ॥
मूलम्
ते वै मुमुदिरे वीराः प्रसन्नसलिलां शिवाम्।
पश्यन्तो दृढधन्वानः परिपूर्णां सरस्वतीम् ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वीर पाण्डव सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले थे। उन्होंने स्वच्छ जलसे भरी हुई कल्याणमयी सरस्वतीका दर्शन करके बड़े आनन्दका अनुभव किया॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेषां पुण्यतमा रात्रिः पर्वसंधौ स्म शारदी।
तत्रैव वसतामासीत् कार्तिकी जनमेजय ॥ १६ ॥
मूलम्
तेषां पुण्यतमा रात्रिः पर्वसंधौ स्म शारदी।
तत्रैव वसतामासीत् कार्तिकी जनमेजय ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जनमेजय! उनके वहीं रहते समय पर्वकी संधि-वेलामें कार्तिककी शरत्पूर्णिमाकी परम पुण्यमयी रात्रि आयी॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुण्यकृद्भिर्महासत्त्वैस्तापसैः सह पाण्डवाः ।
तत् सर्वे भरतश्रेष्ठाः समूहुर्योगमुत्तमम् ॥ १७ ॥
मूलम्
पुण्यकृद्भिर्महासत्त्वैस्तापसैः सह पाण्डवाः ।
तत् सर्वे भरतश्रेष्ठाः समूहुर्योगमुत्तमम् ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समय भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंने महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न, पुण्यात्मा, तपस्वी मुनियोंके साथ स्नान-दानादिके द्वारा उस उत्तम योगको पूर्णतः सफल बनाया॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तमिस्राभ्युदये तस्मिन् धौम्येन सह पाण्डवाः।
सूतैः पौरोगवैश्चैव काम्यकं प्रययुर्वनम् ॥ १८ ॥
मूलम्
तमिस्राभ्युदये तस्मिन् धौम्येन सह पाण्डवाः।
सूतैः पौरोगवैश्चैव काम्यकं प्रययुर्वनम् ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
फिर कृष्ण-पक्षका उदय होनेपर पाण्डवलोग धौम्य मुनि, सारथिगण तथा पाकशालाध्यक्षके साथ काम्यक-वनकी ओर चल दिये॥१८॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि काम्यकवनप्रवेशे द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें काम्यकवनगमनविषयक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१८२॥