०६५ चेदिराजगृहे वासः

भागसूचना

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दुःखित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास

मूलम् (वचनम्)

बृहदश्व उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा तच्छ्रुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा ।
जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा ॥ १ ॥

मूलम्

सा तच्छ्रुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा ।
जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! दलके संचालककी वह बात सुनकर निर्दोष एवं सुन्दर अंगोंवाली दमयन्ती पतिदेवके दर्शनके लिये उत्सुक हो व्यापारियोंके उस दलके साथ ही यात्रा करने लगी॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे।
तडागं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकं महत् ॥ २ ॥
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् ।
बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ॥ ३ ॥

मूलम्

अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे।
तडागं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकं महत् ॥ २ ॥
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् ।
बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर बहुत समयके बाद एक भयंकर विशाल वनमें पहुँचकर उन व्यापारियोंने एक महान् सरोवर देखा, जिसका नाम था, पद्मसौगन्धिक। वह सब ओरसे कल्याणप्रद जान पड़ता था। उस रमणीय सरोवरके पास घास और ईंधनकी अधिकता थी, फूल और फल भी वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे। उस तालाबपर बहुत-से पक्षी निवास करते थे॥२-३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निर्मलस्वादुसलिलं मनोहारि सुशीतलम् ।
सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः ॥ ४ ॥

मूलम्

निर्मलस्वादुसलिलं मनोहारि सुशीतलम् ।
सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सरोवरका जल स्वच्छ और स्वादु था, वह देखनेमें बड़ा ही मनोहर और अत्यन्त शीतल था। व्यापारियोंके वाहन बहुत थक गये थे। इसलिये उन्होंने वहीं पड़ाव डालनेका निश्चय किया॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सम्मते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् ।
उवास सार्थः सुमहान् वेलामासाद्य पश्चिमाम् ॥ ५ ॥

मूलम्

सम्मते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् ।
उवास सार्थः सुमहान् वेलामासाद्य पश्चिमाम् ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

समूहके अधिपतिसे अनुमति लेकर सब लोगोंने उस उत्तम वनमें प्रवेश किया और वह महान् जनसमुदाय सरोवरके पश्चिम तटपर ठहर गया॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथार्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा ।
सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् ॥ ६ ॥
पानीयार्थं गिरिनदीं मदप्रस्रवणाविलाम् ।
अथापश्यत सार्थं तं सार्थजान् सुबहून् गजान् ॥ ७ ॥

मूलम्

अथार्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा ।
सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् ॥ ६ ॥
पानीयार्थं गिरिनदीं मदप्रस्रवणाविलाम् ।
अथापश्यत सार्थं तं सार्थजान् सुबहून् गजान् ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तत्पश्चात् आधी रातके समय जब कहींसे भी कोई शब्द सुनायी नहीं देता था और उस दलके सभी लोग थककर सो गये थे, उस समय गजराजोंके मदकी धारासे मलिन जलवाली पहाड़ी नदीमें पानी पीनेके लिये (जंगली) हाथियोंका एक झुंड आ निकला। उस झुंडने व्यापारियोंके सोये हुए दलको और उसके साथ आये हुए बहुत-से हाथियोंको भी देखा॥६-७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते तान् ग्राम्यगजान् दृष्ट्वा सर्वे वनगजास्तदा।
समाद्रवन्त वेगेन जिघांसन्तो मदोत्कटाः ॥ ८ ॥

मूलम्

ते तान् ग्राम्यगजान् दृष्ट्वा सर्वे वनगजास्तदा।
समाद्रवन्त वेगेन जिघांसन्तो मदोत्कटाः ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब वनमें रहनेवाले उन सभी मदोन्मत्त गजोंने उन ग्रामीण हाथियोंको देखकर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे उनपर वेगपूर्वक आक्रमण किया॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेषामापततां वेगः करिणां दुःसहोऽभवत्।
नगाग्रादिव शीर्णानां शृङ्गणां पततां क्षितौ ॥ ९ ॥

मूलम्

तेषामापततां वेगः करिणां दुःसहोऽभवत्।
नगाग्रादिव शीर्णानां शृङ्गणां पततां क्षितौ ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पर्वतकी चोटीसे टूटकर पृथ्वीपर गिरनेवाले बड़े-बड़े शिखरोंके समान उन आक्रमणकारी जंगली हाथियोंका वेग (उस यात्रीदलके लिये) अत्यन्त दुःसह था॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्पन्दतामपि नागानां मार्गा नष्टा वनोद्भवाः।
मार्गं संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् ॥ १० ॥

मूलम्

स्पन्दतामपि नागानां मार्गा नष्टा वनोद्भवाः।
मार्गं संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् ॥ १० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ग्रामीण हाथियोंपर आक्रमण करनेकी चेष्टावाले उन वनवासी गजराजोंके वन्य मार्ग अवरुद्ध हो गये थे। सरोवरके तटपर व्यापारियोंका महान् समुदाय उनका मार्ग रोककर सो रहा था॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते तं ममर्दुः सहसा चेष्टमानं महीतले।
हाहाकारं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः ॥ ११ ॥
वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा बहवोऽभवन्।
केचिद्‌ दत्तैः करैः केचित्‌ केचित्‌ पद्भ्यां हता गजैः॥१२॥

मूलम्

ते तं ममर्दुः सहसा चेष्टमानं महीतले।
हाहाकारं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः ॥ ११ ॥
वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा बहवोऽभवन्।
केचिद्‌ दत्तैः करैः केचित्‌ केचित्‌ पद्भ्यां हता गजैः॥१२॥

अनुवाद (हिन्दी)

उन हाथियोंने सहसा पहुँचकर समूचे दलको कुचल दिया। कितने ही मनुष्य धरतीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे। उस दलके कितने ही पुरुष हाहाकार करते हुए बचावकी जगह खोजते हुए जंगलके पौधोंके समूहमें भाग गये। बहुत-से मनुष्य तो नींदके मारे अन्धे हो रहे थे। हाथियोंने किन्हींको दाँतोंसे, किन्हींको सूड़ोंसे और कितनोंको पैरोंसे घायल कर दिया॥११-१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निहतोष्ट्राश्वबहुलाः पदातिजनसंकुलाः ।
भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा ॥ १३ ॥
घोरान् नादान् विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले।
वृक्षेष्वारुह्य संरब्धाः पतिता विषमेषु च ॥ १४ ॥

मूलम्

निहतोष्ट्राश्वबहुलाः पदातिजनसंकुलाः ।
भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा ॥ १३ ॥
घोरान् नादान् विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले।
वृक्षेष्वारुह्य संरब्धाः पतिता विषमेषु च ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनके बहुत-से ऊँट और घोड़े मारे गये और उस समुदायमें बहुत-से पैदल लोग भी थे। वे सब लोग उस समय भयसे चारों ओर भागते हुए एक-दूसरेसे टकराकर चोट खा जाते थे। घोर आर्तनाद करते हुए सभी लोग धरतीपर गिरने लगे। कुछ लोग बड़े वेगसे वृक्षोंपर चढ़ते हुए नीचेकी विषम भूमियोंपर गिर पड़ते थे॥१३-१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं प्रकारैर्बहुभिर्दैवेनाक्रम्य हस्तिभिः ।
राजन् विनिहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥ १५ ॥

मूलम्

एवं प्रकारैर्बहुभिर्दैवेनाक्रम्य हस्तिभिः ।
राजन् विनिहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! इस प्रकार दैववश बहुतेरे जंगली हाथियोंने आक्रमण करके (प्रायः) उस सम्पूर्ण समृद्धिशाली व्यापारियोंके समुदायको नष्ट कर दिया॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आरावः सुमहांश्चासीत् त्रैलोक्यभयकारकः ।
एषोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायध्वं धावताधुना ॥ १६ ॥
रत्नराशिर्विशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं किं प्रधावत।

मूलम्

आरावः सुमहांश्चासीत् त्रैलोक्यभयकारकः ।
एषोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायध्वं धावताधुना ॥ १६ ॥
रत्नराशिर्विशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं किं प्रधावत।

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय वहाँ तीनों लोकोंको भयमें डालनेवाला महान् आर्तनाद एवं चीत्कार हो रहा था। कोई कहता—‘अरे! इधर बड़े जोरकी आग प्रज्वलित हो उठी है। यह भारी संकट आ गया (अब) दौड़ो और बचाओ।’ दूसरा कहता—‘अरे! ये ढेर-के-ढेर रत्न बिखरे पड़े हैं, इन्हें सँभालकर रखो। इधर-उधर भागते क्यों हो?’॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्यावचनं मम ॥ १७ ॥

मूलम्

सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्यावचनं मम ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तीसरा कहता था—‘भाई! इस धनपर सबका समान अधिकार है, मेरी यह बात झूठी नहीं है’॥१७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमेवाभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात् तदा।
पुनरेवाभिधास्यामि चिन्तयध्वं सुकातराः ॥ १८ ॥

मूलम्

एवमेवाभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात् तदा।
पुनरेवाभिधास्यामि चिन्तयध्वं सुकातराः ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कोई कहता—‘ऐ कायरो! मैं फिर तुमसे बात करूँगा, अभी अपनी रक्षाकी चिन्ता करो।’ इस तरहकी बातें करते हुए सब लोग भयसे भाग रहे थे॥१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे जनसंक्षये।
दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा ॥ १९ ॥

मूलम्

तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे जनसंक्षये।
दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार जब वहाँ भयानक नरसंहार हो रहा था, उसी समय दमयन्ती भी जाग उठी। उसका हृदय भयसे संत्रस्त हो उठा॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपश्यद् वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम्।
अदृष्टपूर्वं तद् दृष्ट्वा बाला पद्मनिभेक्षणा ॥ २० ॥
संसक्तवदनाश्वासा उत्तस्थौ भयविह्वला ।
ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सार्थात् केचिदविक्षताः ॥ २१ ॥
तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम्।
नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः ॥ २२ ॥
तथा यक्षाधिपः श्रीमान् न वै वैश्रवणः प्रभुः।
न पूजा विघ्नकर्तॄणामथवा प्रथमं कृता ॥ २३ ॥
शकुनानां फलं वाथ विपरीतमिदं ध्रुवम्।
ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ॥ २४ ॥

मूलम्

अपश्यद् वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम्।
अदृष्टपूर्वं तद् दृष्ट्वा बाला पद्मनिभेक्षणा ॥ २० ॥
संसक्तवदनाश्वासा उत्तस्थौ भयविह्वला ।
ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सार्थात् केचिदविक्षताः ॥ २१ ॥
तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम्।
नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः ॥ २२ ॥
तथा यक्षाधिपः श्रीमान् न वै वैश्रवणः प्रभुः।
न पूजा विघ्नकर्तॄणामथवा प्रथमं कृता ॥ २३ ॥
शकुनानां फलं वाथ विपरीतमिदं ध्रुवम्।
ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वहाँ उसने वह महासंहार अपनी आँखों देखा, जो सब लोगोंके लिये भयंकर था। उसने ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं देखी थी। यह सब देखकर वह कमलनयनी बाला भयसे व्याकुल हो उठी। उसको कहींसे कोई सान्त्वना नहीं मिल रही थी। वह इस प्रकार स्तब्ध हो रही थी, मानो धरतीसे सट गयी हो। तदनन्तर वह किसी प्रकार उठकर खड़ी हुई। दलके जो लोग उस संकटसे मुक्त हो आघातसे बचे हुए थे, वे सब एकत्र हो कहने लगे कि ‘यह हमारे किस कर्मका फल है? निश्चय ही हमने महायशस्वी मणिभद्रका पूजन नहीं किया है। इसी प्रकार हमने श्रीमान् यक्षराज कुबेरकी भी पूजा नहीं की है अथवा विघ्नकर्ता विनायकोंकी भी पहले पूजा नहीं कर ली थी। अथवा हमने पहले जो-जो शकुन देखे थे, उसका यह विपरीत फल है। यदि हमारे ग्रह विपरीत न होते तो और किस हेतुसे यह संकट हमारे ऊपर कैसे आ सकता था?’॥२०—२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपरे त्वब्रुवन् दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः।
यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ॥ २५ ॥
प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम्।
तयेयं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा ॥ २६ ॥

मूलम्

अपरे त्वब्रुवन् दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः।
यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ॥ २५ ॥
प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम्।
तयेयं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

दूसरे लोग जो अपने कुटुम्बीजनों और धनके विनाशसे दीन हो रहे थे, वे इस प्रकार कहने लगे—‘आज हमारे विशाल जनसमूहके साथ वह जो उन्मत्त-जैसी दिखायी देनेवाली नारी आ गयी थी, वह विकराल आकारवाली राक्षसी थी तो भी अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे दलमें घुस गयी थी। उसीने पहलेसे ही यह अत्यन्त भयंकर माया फैला रखी थी॥२५-२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी।
तस्याः सर्वमिदं पापं नात्र कार्या विचारणा ॥ २७ ॥
पश्यामो यदि तां पापां सार्थघ्नीं नैकदुःखदाम्।
लोष्टभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्ठैश्च मुष्टिभिः ॥ २८ ॥
अवश्यमेव हन्यामः सार्थस्य किल कृत्यकाम्।

मूलम्

राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी।
तस्याः सर्वमिदं पापं नात्र कार्या विचारणा ॥ २७ ॥
पश्यामो यदि तां पापां सार्थघ्नीं नैकदुःखदाम्।
लोष्टभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्ठैश्च मुष्टिभिः ॥ २८ ॥
अवश्यमेव हन्यामः सार्थस्य किल कृत्यकाम्।

अनुवाद (हिन्दी)

‘निश्चय ही वह राक्षसी, यक्षी अथवा भयंकर पिशाची थी—इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि यह सारा पापपूर्ण कृत्य उसीका किया हुआ है। उसने हमें अनेक प्रकारका दुःख दिया और प्रायः सारे दलका विनाश कर डाला। वह पापिनी समूचे सार्थके लिये अवश्य ही कृत्या बनकर आयी थी। यदि हम उसे देख लेंगे तो ढेलोंसे, धूल और तिनकोंसे, लकड़ियों और मुक्कोंसे भी अवश्य मार डालेंगे॥२७-२८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम् ॥ २९ ॥
ह्रीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद् यत्र काननम्।
आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ॥ ३० ॥

मूलम्

दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम् ॥ २९ ॥
ह्रीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद् यत्र काननम्।
आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उनका वह अत्यन्त भयंकर वचन सुनकर दमयन्ती लज्जासे गड़ गयी और भयसे व्याकुल हो उठी। उनके पापपूर्ण संकल्पके संघटित होनेकी आशंका करके वह उसी ओर भाग गयी, जहाँ घना जंगल था। वहाँ जाकर अपनी इस परिस्थितिपर विचार करके वह विलाप करने लगी—॥२९-३०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान्।
नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३१ ॥

मूलम्

अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान्।
नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अहो! मुझपर विधाताका अत्यन्त भयानक और महान् कोप है, जिससे मुझे कहीं भी कुशल-क्षेमकी प्राप्ति नहीं होती। न जाने, यह हमारे किस कर्मका फल है?॥३१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न स्मराम्यशुभं किंचित् कृतं कस्यचिदण्वपि।
कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३२ ॥

मूलम्

न स्मराम्यशुभं किंचित् कृतं कस्यचिदण्वपि।
कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसीका थोड़ा-सा भी अमंगल किया हो, इसकी याद नहीं आती, फिर यह मेरे किस कर्मका फल मिल रहा है?॥३२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत्।
अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् ॥ ३३ ॥

मूलम्

नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत्।
अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् ॥ ३३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘निश्चय ही यह मेरे दूसरे जन्मोंके किये हुए पापका महान् फल प्राप्त हुआ है, जिससे मैं इस अनन्त कष्टमें पड़ गयी हूँ॥३३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भर्तृराज्यापहरणं स्वजनाच्च पराजयः ।
भर्त्रा सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः ॥ ३४ ॥

मूलम्

भर्तृराज्यापहरणं स्वजनाच्च पराजयः ।
भर्त्रा सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः ॥ ३४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मेरे स्वामीके राज्यका अपहरण हुआ, उन्हें आत्मीयजनसे ही पराजित होना पड़ा, मेरा अपने पतिदेवसे वियोग हुआ और अपनी संतानोंके दर्शनसे भी वंचित हो गयी हूँ॥३४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निर्नाथता वने वासो बहुव्यालनिषेविते।

मूलम्

निर्नाथता वने वासो बहुव्यालनिषेविते।

अनुवाद (हिन्दी)

‘इतना ही नहीं, असंख्य सर्प आदि जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें मुझे अनाथकी-सी दशामें रहना पड़ता है’॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथापरेद्युः सम्प्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा ॥ ३५ ॥
देशात् तस्माद् विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम्।
भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप ॥ ३६ ॥

मूलम्

अथापरेद्युः सम्प्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा ॥ ३५ ॥
देशात् तस्माद् विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम्।
भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप ॥ ३६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर दूसरा दिन प्रारम्भ होनेपर मरनेसे बचे हुए लोग उस स्थानसे निकलकर उस विकट संहारके लिये शोक करने लगे। राजन्! कोई भाईके लिये दुःखी था, कोई पिताके लिये; किसीको पुत्रका शोक था और किसीको मित्रका॥३५-३६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अशोचत् तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम्।
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥ ३७ ॥
स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत्।
प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्यापि वै मया ॥ ३८ ॥

मूलम्

अशोचत् तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम्।
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥ ३७ ॥
स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत्।
प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्यापि वै मया ॥ ३८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

विदर्भराजकुमारी दमयन्ती भी इसके लिये शोक करने लगी कि ‘मैंने कौन-सा पाप किया है, जिससे इस निर्जन वनमें मुझे जो यह समुद्रके समान जनसमुदाय प्राप्त हो गया था, वह भी मेरे ही दुर्भाग्यसे हाथियोंके झुंडद्वारा मारा गया। निश्चय ही मुझे अभी दीर्घकालतक दुःख-ही-दुःख भोगना है॥३७-३८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम्।
या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥ ३९ ॥

मूलम्

नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम्।
या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥ ३९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता। वृद्ध पुरुषोंका यह जो उपदेश मैंने सुन रखा है, यह ठीक ही जान पड़ता है, तभी तो आज मैं दुःखित होनेपर भी हाथियोंके झुंडसे कुचलकर मर न सकी॥३९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते।
न च मे बालभावेऽपि किंचित् पापकृतं कृतम् ॥ ४० ॥
कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम्।

मूलम्

न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते।
न च मे बालभावेऽपि किंचित् पापकृतं कृतम् ॥ ४० ॥
कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम्।

अनुवाद (हिन्दी)

‘मनुष्योंको इस जगत्‌में कोई भी सुख या दुःख ऐसा नहीं मिलता, जो विधाताका दिया हुआ न हो। मैंने बचपनमें भी मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा ऐसा पाप नहीं किया है, जिससे मुझे यह दुःख प्राप्त होता॥४०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः ॥ ४१ ॥
प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः।
नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥ ४२ ॥
एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गना।
प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥ ४३ ॥

मूलम्

मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः ॥ ४१ ॥
प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः।
नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥ ४२ ॥
एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गना।
प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥ ४३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैं समझती हूँ, स्वयंवरके लिये जो लोकपाल देवगण पधारे थे, नलके कारण मैंने उनका तिरस्कार कर दिया था। अवश्य उन्हीं देवताओंके प्रभावसे आज मुझे वियोगका कष्ट प्राप्त हुआ है।’ इस प्रकार दुःखसे आतुर हुई सुन्दरी पतिव्रता दमयन्तीने उस समय अनेक प्रकारसे विलाप एवं प्रलाप किये॥४१—४३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

हतशेषैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
अगच्छद् राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ४४ ॥
गच्छन्ती साचिराद् बाला पुरमासादयन्महत्।
सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ॥ ४५ ॥

मूलम्

हतशेषैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
अगच्छद् राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ४४ ॥
गच्छन्ती साचिराद् बाला पुरमासादयन्महत्।
सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ॥ ४५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मरनेसे बचे हुए वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ यात्रा करती हुई शरत्कालके चन्द्रमाकी कलाके समान वह सुन्दरी युवती थोड़े ही समयमें संध्या होते-होते सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुकी राजधानीमें जा पहुँची॥४४-४५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ वस्त्रार्धसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम्।
तं विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् ॥ ४६ ॥

मूलम्

अथ वस्त्रार्धसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम्।
तं विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् ॥ ४६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शरीरमें आधी साड़ीको लपेटे हुए ही उसने उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया। वह विह्वल, दीन और दुर्बल हो रही थी। उसके सिरके बाल खुले हुए थे। उसने स्नान नहीं किया था॥४६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशः पुरवासिनः।
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा ॥ ४७ ॥
अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात्।
सा तैः परिवृतागच्छत् समीपं राजवेश्मनः ॥ ४८ ॥

मूलम्

उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशः पुरवासिनः।
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा ॥ ४७ ॥
अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात्।
सा तैः परिवृतागच्छत् समीपं राजवेश्मनः ॥ ४८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पुरवासियोंने उसे उन्मत्ताकी भाँति जाते देखा। चेदिनरेशकी राजधानीमें उसे प्रवेश करते देख उस समय बहुत-से ग्रामीण बालक कौतूहलवश उसके साथ हो लिये थे। उनसे घिरी हुई दमयन्ती राजमहलके समीप गयी॥४७-४८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तां प्रासादगतापश्यद् राजमाता जनैर्वृताम्।
धात्रीमुवाच गच्छैनामानयेह ममान्तिकम् ॥ ४९ ॥

मूलम्

तां प्रासादगतापश्यद् राजमाता जनैर्वृताम्।
धात्रीमुवाच गच्छैनामानयेह ममान्तिकम् ॥ ४९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय राजमाताने उसे महलपरसे देखा। वह जनसाधारणसे घिरी हुई थी। राजमाताने धायसे कहा—‘जाओ, इस युवतीको मेरे पास ले आओ॥४९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जनेन क्लिश्यते बाला दुःखिता शरणार्थिनी।
तादृग् रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् ॥ ५० ॥

मूलम्

जनेन क्लिश्यते बाला दुःखिता शरणार्थिनी।
तादृग् रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् ॥ ५० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इसे लोग तंग कर रहे हैं। यह दुःखिनी युवती कोई आश्रय चाहती है। मुझे इसका रूप ऐसा दिखायी देता है, जो मेरे घरको प्रकाशित कर देगा॥५०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना ।
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
आरोप्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत।
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः ॥ ५२ ॥

मूलम्

उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना ।
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
आरोप्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत।
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः ॥ ५२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इसका वेष तो उन्मत्तके समान है, परंतु यह विशाल नेत्रोंवाली युवती कल्याणमयी लक्ष्मीके समान जान पड़ती है।’ धाय उन सब लोगोंको हटाकर उसे उत्तम राजमहलकी अट्टालिकापर चढ़ा ले आयी। राजन्! तत्पश्चात् विस्मित होकर राजमाताने दमयन्तीसे पूछा—‘अहो! तुम इस प्रकार दुःखसे दबी होनेपर भी इतना सुन्दर रूप कैसे धारण करती हो?॥५१-५२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा।
न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् ॥ ५३ ॥
असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे ।

मूलम्

भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा।
न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् ॥ ५३ ॥
असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘मेघमालामें प्रकाशित होनेवाली बिजलीकी भाँति तुम इस दुःखमें भी कैसी तेजस्विनी दिखायी देती हो। मुझसे बताओ, तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो? यद्यपि तुम्हारे शरीरपर कोई आभूषण नहीं है तो भी तुम्हारा यह रूप मानव-जगत्‌का नहीं जान पड़ता। देवताकी-सी दिव्य कान्ति धारण करनेवाली वत्से! तुम असहाय-अवस्थामें होकर भी लोगोंसे डरती क्यों नहीं हो?’॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमब्रवीत् ॥ ५४ ॥

मूलम्

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमब्रवीत् ॥ ५४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उसकी वह बात सुनकर भीमकुमारीने कहा— ॥ ५४ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम्।
सैरन्ध्रीजातिसम्पन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् ॥ ५५ ॥

मूलम्

मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम्।
सैरन्ध्रीजातिसम्पन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् ॥ ५५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘माताजी! आप मुझे मानव-कन्या ही समझिये। मैं अपने पतिके चरणोंमें अनुराग रखनेवाली एक नारी हूँ। मेरी अन्तःपुरमें काम करनेवाली सैरन्ध्री जाति है। मैं सेविका हूँ और जहाँ इच्छा होती है, वहीं रहती हूँ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् ।
असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रतः ॥ ५६ ॥

मूलम्

फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् ।
असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रतः ॥ ५६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैं अकेली हूँ, फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करती हूँ और जहाँ साँझ होती है, वहीं टिक जाती हूँ। मेरे स्वामीमें असंख्य गुण हैं, उनका मेरे प्रति सदा अत्यन्त अनुराग है॥५६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भक्ताहमपि तं वीरं छायेवानुगता पथि।
तस्य दैवात् प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने ॥ ५७ ॥

मूलम्

भक्ताहमपि तं वीरं छायेवानुगता पथि।
तस्य दैवात् प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने ॥ ५७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे छाया राह चलनेवाले पथिकके पीछे-पीछे चलती है, उसी प्रकार मैं भी अपने वीर पतिदेवमें भक्तिभाव रखकर सदा उन्हींका अनुसरण करती हूँ। दुर्भाग्यवश एक दिन मेरे पतिदेव जूआ खेलनेमें अत्यन्त आसक्त हो गये॥५७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान्।
तमेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम् ॥ ५८ ॥
आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम् ।
स कदाचिद् वने वीरः कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ॥ ५९ ॥

मूलम्

द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान्।
तमेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम् ॥ ५८ ॥
आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम् ।
स कदाचिद् वने वीरः कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ॥ ५९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘और उसीमें अपना सब कुछ हारकर वे अकेले ही वनकी ओर चल दिये। एक वस्त्र धारण किये उन्मत्त और विह्वल हुए अपने वीर स्वामीको सान्त्वना देती हुई मैं भी उनके साथ वनमें चली आयी। एक दिनकी बात है, मेरे वीर स्वामी किसी कारणवश वनमें गये॥५८-५९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्षुत्परीतस्तु विमनास्तदप्येकं व्यसर्जयत् ।
तमेकवसना नग्नमुन्मत्तवदचेतसम् ॥ ६० ॥
अनुव्रजन्ती बहुला न स्वपामि निशास्तदा।
ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् ॥ ६१ ॥
वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान् मामनागसम्।
तं मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिवानिशम् ॥ ६२ ॥

मूलम्

क्षुत्परीतस्तु विमनास्तदप्येकं व्यसर्जयत् ।
तमेकवसना नग्नमुन्मत्तवदचेतसम् ॥ ६० ॥
अनुव्रजन्ती बहुला न स्वपामि निशास्तदा।
ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् ॥ ६१ ॥
वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान् मामनागसम्।
तं मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिवानिशम् ॥ ६२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उस समय वे भूखसे पीड़ित और अनमने हो रहे थे। अतः उन्होंने अपने उस एक वस्त्रको भी कहीं वनमें ही छोड़ दिया। मेरे शरीरपर भी एक ही वस्त्र था। वे नग्न, उन्मत्त-जैसे और अचेत हो रहे थे। उसी दशामें सदा उनका अनुसरण करती हुई अनेक रात्रियोंतक कभी सो न सकी। तदनन्तर बहुत समयके पश्चात् एक दिन जब मैं सो गयी थी, उन्होंने मेरी आधी साड़ी फाड़ ली और मुझ निरपराधिनी पत्नीको वहीं छोड़कर वे कहीं चल दिये। मैं दिन-रात वियोगाग्निमें जलती हुई निरन्तर उन्हीं पतिदेवको ढूँढ़ती फिरती हूँ॥६०—६२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

साहं कमलगर्भाभमपश्यन्ती हृदि प्रियम्।
न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम् ॥ ६३ ॥

मूलम्

साहं कमलगर्भाभमपश्यन्ती हृदि प्रियम्।
न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम् ॥ ६३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मेरे प्रियतमकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान है। वे देवताओंके समान तेजस्वी, मेरे प्राणोंके स्वामी और शक्तिशाली हैं। बहुत खोजनेपर भी मैं अपने प्रियको न तो देख सकी हूँ और न उनका पता ही पा रही हूँ’॥६३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु।
राजमाताब्रवीदार्ता भैमीमार्तस्वरां स्वयम् ॥ ६४ ॥
वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिर्मे परमा त्वयि।
मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ॥ ६५ ॥

मूलम्

तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु।
राजमाताब्रवीदार्ता भैमीमार्तस्वरां स्वयम् ॥ ६४ ॥
वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिर्मे परमा त्वयि।
मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ॥ ६५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भीमकुमारी दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे एवं वह आर्तस्वरसे बहुत विलाप कर रही थी। राजमाता स्वयं भी उसके दुःखसे दुःखी हो बोली—‘कल्याणि! तुम मेरे पास रहो। तुमपर मेरा बहुत प्रेम है। भद्रे! मेरे सेवक तुम्हारे पतिकी खोज करेंगे॥६४-६५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्ततः।
इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ॥ ६६ ॥

मूलम्

अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्ततः।
इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ॥ ६६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अथवा यह भी सम्भव है, वे इधर-उधर भटकते हुए स्वयं ही इधर आ निकलें। भद्रे! तुम यहीं रहकर अपने पतिको प्राप्त कर लोगी’॥६६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत्।
समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ॥ ६७ ॥

मूलम्

राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत्।
समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ॥ ६७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजमाताकी यह बात सुनकर दमयन्तीने कहा—‘वीरमातः! मैं एक नियमके साथ आपके यहाँ रह सकती हूँ॥६७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम्।
न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन ॥ ६८ ॥

मूलम्

उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम्।
न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन ॥ ६८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैं किसीका जूठा नहीं खाऊँगी, किसीके पैर नहीं धोऊँगी और किसी भी दूसरे पुरुषसे किसी तरह भी वार्तालाप नहीं करूँगी॥६८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत्।
वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ॥ ६९ ॥

मूलम्

प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत्।
वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ॥ ६९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यदि कोई पुरुष मुझे प्राप्त करना चाहे तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो और बार-बार ऐसे अपराध करनेवाले मूढ़को आप प्राणदण्ड भी दें, यही मेरा निश्चित व्रत है॥६९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम्।
यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः ॥ ७० ॥

मूलम्

भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम्।
यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः ॥ ७० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैं अपने पतिकी खोजके लिये केवल ब्राह्मणोंसे मिल सकती हूँ। यदि यहाँ ऐसी व्यवस्था हो सके तो निश्चय ही आपके निकट निवास करूँगी। इसमें संशय नहीं है॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये क्वचित्।
तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् ॥ ७१ ॥

मूलम्

अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये क्वचित्।
तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् ॥ ७१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यदि इसके विपरीत कोई बात हो तो कहीं भी रहनेका मेरे मनमें संकल्प नहीं हो सकता।’ यह सुनकर राजमाता प्रसन्नचित्त होकर उससे बोली—॥७१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सर्वमेतत् करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम्।
एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशाम्पते ॥ ७२ ॥
उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत।
सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् ॥ ७३ ॥

मूलम्

सर्वमेतत् करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम्।
एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशाम्पते ॥ ७२ ॥
उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत।
सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् ॥ ७३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘बेटी! मैं यह सब करूँगी। सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा व्रत ऐसा उत्तम है।’ राजा युधिष्ठिर! दमयन्तीसे ऐसा कहकर राजमाता अपनी पुत्री सुनन्दासे बोली—‘सुनन्दे! इस सैरन्ध्रीको तुम देवीस्वरूपा समझो॥७२-७३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम्।
एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥ ७४ ॥

मूलम्

वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम्।
एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥ ७४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यह अवस्थामें तुम्हारे समान है, अतः तुम्हारी सखी होकर रहे। तुम इसके साथ सदा प्रसन्नचित्त एवं आनन्दमग्न रहो’॥७४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत्।
दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥ ७५ ॥

मूलम्

ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत्।
दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥ ७५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब सखियोंसे घिरी हुई सुनन्दा अत्यन्त हर्षोल्लासमें भरकर दमयन्तीको साथ ले अपने भवनमें आयी॥७५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तत्र पूज्यमाना वै दमयन्ती व्यनन्दत।
सर्वकामैः सुविहितैर्निरुद्वेगावसत् तदा ॥ ७६ ॥

मूलम्

स तत्र पूज्यमाना वै दमयन्ती व्यनन्दत।
सर्वकामैः सुविहितैर्निरुद्वेगावसत् तदा ॥ ७६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सुनन्दा दमयन्तीके इच्छानुसार सब प्रकारकी व्यवस्था करके उसे बड़े आदर-सत्कारके साथ रखने लगी। इससे दमयन्तीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह वहाँ उद्वेगरहित हो रहने लगी॥७६॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीचेदिराजगृहवासे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें निवासविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥६५॥