भागसूचना
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट
मूलम् (वचनम्)
बृहदश्व उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा।
वनं प्रतिभयं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ॥ १ ॥
मूलम्
सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा।
वनं प्रतिभयं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! व्याधका विनाश करके वह कमलनयनी राजकुमारी झिल्लियोंकी झंकारसे गूँजते हुए निर्जन एवं भयंकर वनमें आगे बढ़ी॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिंहद्वीपिरुरुव्याघ्रमहिषर्क्षगणैर्युतम् ।
नानापक्षिगणाकीर्णं म्लेच्छतस्करसेवितम् ॥ २ ॥
मूलम्
सिंहद्वीपिरुरुव्याघ्रमहिषर्क्षगणैर्युतम् ।
नानापक्षिगणाकीर्णं म्लेच्छतस्करसेवितम् ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह वन सिंह, चीतों, रुरुमृग, व्याघ्र, भैंसों तथा रीछ आदि पशुओंसे युक्त एवं भाँति-भाँतिके पक्षि-समुदायसे व्याप्त था। वहाँ म्लेच्छ और तस्करोंका निवास था॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकेङ्गुदकिंशुकैः ।
अर्जुनारिष्टसंछन्नं स्यन्दनैश्च सशाल्मलैः ॥ ३ ॥
जम्ब्वाम्रलोध्रखदिरसालवेत्रसमाकुलम् ।
पद्मकामलकप्लक्षकदम्बोदुम्बरावृतम् ॥ ४ ॥
बदरीबिल्वसंछन्नं न्यग्रोधैश्च समाकुलम् ।
प्रियालतालखर्जूरहरीतकबिभीतकैः ॥ ५ ॥
मूलम्
शालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकेङ्गुदकिंशुकैः ।
अर्जुनारिष्टसंछन्नं स्यन्दनैश्च सशाल्मलैः ॥ ३ ॥
जम्ब्वाम्रलोध्रखदिरसालवेत्रसमाकुलम् ।
पद्मकामलकप्लक्षकदम्बोदुम्बरावृतम् ॥ ४ ॥
बदरीबिल्वसंछन्नं न्यग्रोधैश्च समाकुलम् ।
प्रियालतालखर्जूरहरीतकबिभीतकैः ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शाल, वेणु, धव, पीपल, तिन्दुक, इंगुद, पलाश, अर्जुन, अरिष्ट, स्यन्दन (तिनिश), सेमल, जामुन, आम, लोध, खैर, साखू, बेंत, पद्मक, आँवला, पाकर, कदम्ब, गूलर, बेर, बेल, बरगद, प्रियाल, ताल, खजूर, हर्रे तथा बहेड़े आदि वृक्षोंसे वह विशाल वन परिपूर्ण हो रहा था॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानाधातुशतैर्नद्धान् विविधानपि चाचलान् ।
निकुञ्जान् परिसंघुष्टान् दरीश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ६ ॥
मूलम्
नानाधातुशतैर्नद्धान् विविधानपि चाचलान् ।
निकुञ्जान् परिसंघुष्टान् दरीश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
दमयन्तीने वहाँ सैकड़ों धातुओंसे संयुक्त नाना प्रकारके पर्वत, पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान कितने ही निकुंज और अद्भुत कन्दराएँ देखीं॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्च मृगद्विजान्।
सा बहून् भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ७ ॥
पल्वलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः।
सरितो निर्झराश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् ॥ ८ ॥
मूलम्
नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्च मृगद्विजान्।
सा बहून् भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ७ ॥
पल्वलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः।
सरितो निर्झराश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कितनी ही नदियों, सरोवरों, बावलियों तथा नाना प्रकारके मृगों और पक्षियोंको देखा। उसने बहुत-से भयानक रूपवाले पिशाच, नाग तथा राक्षस देखे। कितने ही गड्ढों, पोखरों और पर्वतशिखरोंका अवलोकन किया। सरिताओं और अद्भुत झरनोंको देखा॥७-८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी।
महिषांश्च वराहांश्च ऋक्षांश्च वनपन्नगान् ॥ ९ ॥
तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता।
वैदर्भी विचरत्येका नलमन्वेषती तदा ॥ १० ॥
मूलम्
यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी।
महिषांश्च वराहांश्च ऋक्षांश्च वनपन्नगान् ॥ ९ ॥
तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता।
वैदर्भी विचरत्येका नलमन्वेषती तदा ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विदर्भराजनन्दिनीने उस वनमें झुंड-के-झुंड भैंसे, सूअर, रीछ और जंगली साँप देखे। तेज, यश, शोभा और परम धैर्यसे युक्त विदर्भकुमारी उस समय अकेली विचरती और नलको ढूँढ़ती थी॥९-१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नाबिभ्यत् सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित्।
दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनपीडिता ॥ ११ ॥
मूलम्
नाबिभ्यत् सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित्।
दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनपीडिता ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह पतिके विरहरूपी संकटसे संतप्त थी। अतः राजकुमारी दमयन्ती उस भयंकर वनमें प्रवेश करके भी किसी जीव-जन्तुसे भयभीत नहीं हुई॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विदर्भतनया राजन् विललाप सुदुःखिता।
भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलमथाश्रिता ॥ १२ ॥
मूलम्
विदर्भतनया राजन् विललाप सुदुःखिता।
भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलमथाश्रिता ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! विदर्भकुमारी दमयन्तीके अंग-अंगमें पतिके वियोगका शोक व्याप्त हो गया था, इसलिये वह अत्यन्त दुःखित हो एक शिलाके नीचे भागमें बैठकर बहुत विलाप करने लगी—॥१२॥
मूलम् (वचनम्)
दमयन्त्युवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
व्यूढोरस्क महाबाहो नैषधानां जनाधिप।
क्व नु राजन् गतोऽस्यद्य विसृज्य विजने वने ॥ १३ ॥
अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥ १४ ॥
मूलम्
व्यूढोरस्क महाबाहो नैषधानां जनाधिप।
क्व नु राजन् गतोऽस्यद्य विसृज्य विजने वने ॥ १३ ॥
अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
दमयन्ती बोली— चौड़ी छातीवाले महाबाहु निषधनरेश महाराज! आज इस निर्जन वनमें (मुझ अकेलीको) छोड़कर आप कहाँ चले गये? नरश्रेष्ठ! वीरशिरोमणे! प्रचुर दक्षिणावाले अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी आप मेरे साथ मिथ्या बर्ताव क्यों कर रहे हैं?॥१३-१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यत् त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ तत् समक्षं महाद्युते।
स्मर्तुमर्हसि कल्याण वचनं पार्थिवर्षभ ॥ १५ ॥
मूलम्
यत् त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ तत् समक्षं महाद्युते।
स्मर्तुमर्हसि कल्याण वचनं पार्थिवर्षभ ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महातेजस्वी कल्याणमय राजाओंमें उत्तम नरश्रेष्ठ! आपने मेरे सामने जो बात कही थी, अपनी उस बातका स्मरण करना उचित है॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यच्चोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप।
मत्समक्षं यदुक्तं च तदवेक्षितुमर्हसि ॥ १६ ॥
मूलम्
यच्चोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप।
मत्समक्षं यदुक्तं च तदवेक्षितुमर्हसि ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भूमिपाल! आकाशचारी हंसोंने आपके समीप तथा मेरे सामने जो बातें कही थीं, उनपर विचार कीजिये॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः।
स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥ १७ ॥
मूलम्
चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः।
स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरसिंह! एक ओर अंग और उपांगोंसहित विस्तारपूर्वक चारों वेदोंका स्वाध्याय हो और दूसरी ओर केवल सत्यभाषण हो तो वह निश्चय ही उससे बढ़कर है॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर।
उक्तवानसि यद् वीर मत्सकाशे पुरा वचः ॥ १८ ॥
मूलम्
तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर।
उक्तवानसि यद् वीर मत्सकाशे पुरा वचः ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अतः शत्रुहन्ता नरेश्वर! वीर! आपने पहले मेरे समीप जो बातें कही हैं, उन्हें सत्य करना चाहिये॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हा वीर नल नामाहं नष्टा किल तवानघ।
अस्यामटव्यां घोरायां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ १९ ॥
मूलम्
हा वीर नल नामाहं नष्टा किल तवानघ।
अस्यामटव्यां घोरायां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
हा निष्पाप वीर नल! आपकी मैं दमयन्ती इस भयंकर वनमें नष्ट हो रही हूँ, आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते?॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कर्षयत्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः।
अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥ २० ॥
मूलम्
कर्षयत्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः।
अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यह भयानक आकृतिवाला क्रूर सिंह भूखसे पीड़ित हो मुँह बाये खड़ा है और मुझपर आक्रमण करना चाहता है, क्या आप मेरी रक्षा नहीं कर सकते?॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न मे त्वदन्या काचिद्धि प्रियास्तीत्यब्रवीः सदा।
तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ॥ २१ ॥
मूलम्
न मे त्वदन्या काचिद्धि प्रियास्तीत्यब्रवीः सदा।
तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कल्याणमय नरेश! आप पहले जो सदा यह कहते थे कि तुम्हारे सिवा दूसरी कोई भी स्त्री मुझे प्रिय नहीं है, अपनी उस बातको सत्य कीजिये॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप।
ईप्सितामीप्सितोऽसि त्वं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २२ ॥
मूलम्
उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप।
ईप्सितामीप्सितोऽसि त्वं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज! मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ और आप मेरे प्रियतम पति हैं, ऐसी दशामें भी मैं यहाँ उन्मत्त विलाप कर रही हूँ तो भी आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते?॥२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप।
वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥ २३ ॥
यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन।
न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥ २४ ॥
मूलम्
कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप।
वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥ २३ ॥
यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन।
न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पृथ्वीनाथ! मैं दीन, दुर्बल, कान्तिहीन और मलिन होकर आधे वस्त्रसे अपने अंगोंको ढककर अकेली अनाथ-सी विलाप कर रही हूँ। विशाल नेत्रोंवाले शत्रुसूदन आर्य! मेरी दशा अपने झुंडसे बिछुड़ी हुई हरिणीकी-सी हो रही है। मैं यहाँ अकेली रो रही हूँ। परंतु आप मेरा मान नहीं रखते हैं॥२३-२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
महाराज महारण्ये अहमेकाकिनी सती।
दमयन्त्यभिभाषे त्वां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २५ ॥
मूलम्
महाराज महारण्ये अहमेकाकिनी सती।
दमयन्त्यभिभाषे त्वां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज! इस महान् वनमें मैं सती दमयन्ती अकेली आपको पुकार रही हूँ, आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुलशीलोपसम्पन्न चारुसर्वाङ्गशोभन ।
नाद्य त्वां प्रतिपश्यामि गिरावस्मिन् नरोत्तम ॥ २६ ॥
मूलम्
कुलशीलोपसम्पन्न चारुसर्वाङ्गशोभन ।
नाद्य त्वां प्रतिपश्यामि गिरावस्मिन् नरोत्तम ॥ २६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ! आप उत्तम कुल और श्रेष्ठ शीलस्वभावसे सम्पन्न हैं। आप अपने सम्पूर्ण मनोहर अंगोंसे सुशोभित होते हैं। आज इस पर्वतशिखरपर मैं आपको नहीं देख पाती हूँ॥२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वने चास्मिन् महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते।
शयानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप ॥ २७ ॥
मूलम्
वने चास्मिन् महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते।
शयानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
निषधनरेश! इस महाभयंकर वनमें, जहाँ सिंह-व्याघ्र रहते हैं, आप कहीं सोये हैं, बैठे हैं अथवा खड़े हैं?॥२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन।
कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता ॥ २८ ॥
मूलम्
प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन।
कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता ॥ २८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मेरे शोकको बढ़ानेवाले नरश्रेष्ठ! आप यहीं हैं या कहीं अन्यत्र चल दिये, यह मैं किससे पूछूँ? आपके लिये शोकसे दुर्बल होकर मैं अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही हूँ॥२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कच्चिद् दृष्टस्त्वयारण्ये संगत्येह नलो नृपः।
को नु मे वाथ प्रष्टव्यो वनेऽस्मिन् प्रस्थितं नलम्॥२९॥
मूलम्
कच्चिद् दृष्टस्त्वयारण्ये संगत्येह नलो नृपः।
को नु मे वाथ प्रष्टव्यो वनेऽस्मिन् प्रस्थितं नलम्॥२९॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘क्या तुमने इस वनमें राजा नलसे मिलकर उन्हें देखा है?’ ऐसा प्रश्न अब मैं इस वनमें प्रस्थान करनेवाले नलके विषयमें किससे करूँ?॥२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम् ।
यमन्वेषसि राजानं नलं पद्मनिभेक्षणम् ॥ ३० ॥
अयं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम्।
मूलम्
अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम् ।
यमन्वेषसि राजानं नलं पद्मनिभेक्षणम् ॥ ३० ॥
अयं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम्।
अनुवाद (हिन्दी)
‘शत्रुओंके व्यूहका नाश करनेवाले जिन परम सुन्दर कमलनयन महात्मा राजा नलको तू खोज रही है, वे यही तो हैं, ऐसी मधुर वाणी आज मैं किसके मुखसे सुनूँगी?’॥३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अरण्यराडयं श्रीमांश्चतुर्दंष्ट्रो महाहनुः ॥ ३१ ॥
शार्दूलोऽभिमुखोऽभ्येति व्रजाम्येनमशङ्किता ।
भवान् मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन् कानने प्रभुः ॥ ३२ ॥
मूलम्
अरण्यराडयं श्रीमांश्चतुर्दंष्ट्रो महाहनुः ॥ ३१ ॥
शार्दूलोऽभिमुखोऽभ्येति व्रजाम्येनमशङ्किता ।
भवान् मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन् कानने प्रभुः ॥ ३२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह वनका राजा कान्तिमान् सिंह मेरे सामने चला आ रहा है, इसके चार दाढ़ें और विशाल ठोड़ी है। मैं निःशंक होकर इसके सामने जा रही हूँ और कहती हूँ, ‘आप मृगोंके राजा और इस वनके स्वामी हैं॥३१-३२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम्।
निषधाधिपतेर्भार्यां नलस्यामित्रघातिनः ॥ ३३ ॥
मूलम्
विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम्।
निषधाधिपतेर्भार्यां नलस्यामित्रघातिनः ॥ ३३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मैं विदर्भराजकुमारी दमयन्ती हूँ। मुझे शत्रुघाती निषधनरेश नलकी पत्नी समझिये॥३३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्षिताम् ।
आश्वासय मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वया नलः ॥ ३४ ॥
मूलम्
पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्षिताम् ।
आश्वासय मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वया नलः ॥ ३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मृगेन्द्र! मैं इस वनमें अकेली पतिकी खोजमें भटक रही हूँ तथा शोकसे पीड़ित एवं दीन हो रही हूँ। यदि आपने नलको यहाँ कहीं देखा हो तो उनका कुशल-समाचार बताकर मुझे आश्वासन दीजिये॥३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि।
मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद् विमोचय ॥ ३५ ॥
मूलम्
अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि।
मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद् विमोचय ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अथवा वनराज मृगश्रेष्ठ! यदि आप नलके विषयमें कुछ नहीं बताते हैं तो मुझे खा जायँ और इस दुःखसे छुटकारा दे दें’॥३५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
श्रुत्वारण्ये विलपितं न मामाश्वासयत्ययम्।
यात्येतां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम् ॥ ३६ ॥
मूलम्
श्रुत्वारण्ये विलपितं न मामाश्वासयत्ययम्।
यात्येतां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम् ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अहो! इस घोर वनमें मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सान्त्वना नहीं देता। यह तो स्वादिष्ट जलसे भरी हुई इस समुद्रगामिनी नदीकी ओर जा रहा है॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इमं शिलोच्चयं पुण्यं शृङ्गैर्बहुभिरुच्छ्रितैः।
विराजद्भिरिवानेकैर्नैकवर्णैर्मनोरमैः ॥ ३७ ॥
मूलम्
इमं शिलोच्चयं पुण्यं शृङ्गैर्बहुभिरुच्छ्रितैः।
विराजद्भिरिवानेकैर्नैकवर्णैर्मनोरमैः ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अच्छा, इस पवित्र पर्वतसे ही पूछती हूँ। यह बहुत-से ऊँचे-ऊँचे शोभाशाली बहुरंगे एवं मनोरम शिखरोंद्वारा सुशोभित है॥३७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानाधातुसमाकीर्णं विविधोपलभूषितम् ।
अस्यारण्यस्य महतः केतुभूतमिवोत्थितम् ॥ ३८ ॥
मूलम्
नानाधातुसमाकीर्णं विविधोपलभूषितम् ।
अस्यारण्यस्य महतः केतुभूतमिवोत्थितम् ॥ ३८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अनेक प्रकारके धातुओंसे व्याप्त और भाँति-भाँतिके शिला-खण्डोंसे विभूषित है। यह पर्वत इस महान् वनकी ऊपर उठी हुई पताकाके समान जान पड़ता है॥३८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगायुतम् ।
पतत्त्रिभिर्बहुविधैः समन्तादनुनादितम् ॥ ३९ ॥
मूलम्
सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगायुतम् ।
पतत्त्रिभिर्बहुविधैः समन्तादनुनादितम् ॥ ३९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यह सिंह, व्याघ्र, हाथी, सूअर, रीछ और मृगोंसे परिपूर्ण है। इसके चारों ओर अनेक प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं॥३९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
किंशुकाशोकबकुलपुन्नागैरुपशोभितम् ।
कर्णिकारधवप्लक्षैः सुपुष्पैरुपशोभितम् ॥ ४० ॥
मूलम्
किंशुकाशोकबकुलपुन्नागैरुपशोभितम् ।
कर्णिकारधवप्लक्षैः सुपुष्पैरुपशोभितम् ॥ ४० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पलाश, अशोक, बकुल, पुन्नाग, कनेर, धव तथा प्लक्ष आदि सुन्दर फूलोंवाले वृक्षोंसे वह पर्वत सुशोभित हो रहा है॥४०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्च समाकुलम्।
गिरिराजमिमं तावत् पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥ ४१ ॥
मूलम्
सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्च समाकुलम्।
गिरिराजमिमं तावत् पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥ ४१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यह पर्वत अनेक सरिताओं, सुन्दर पक्षियों और शिखरोंसे परिपूर्ण है। अब मैं इसी गिरिराजसे महाराज नलका समाचार पूछती हूँ॥४१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत ।
शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥ ४२ ॥
मूलम्
भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत ।
शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥ ४२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! अचलप्रवर! दिव्य दृष्टिवाले! विख्यात! सबको शरण देनेवाले परम कल्याणमय महीधर! आपको नमस्कार है॥४२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रणमाम्यभिगम्याहं राजपुत्रीं निबोध माम्।
राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥ ४३ ॥
मूलम्
प्रणमाम्यभिगम्याहं राजपुत्रीं निबोध माम्।
राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥ ४३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मैं निकट आकर आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। आप मेरा परिचय इस प्रकार जानें, मैं राजाकी पुत्री, राजाकी पुत्रवधू तथा राजाकी ही पत्नी हूँ। मेरी ‘दमयन्ती’ नामसे प्रसिद्धि है॥४३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः।
भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥ ४४ ॥
मूलम्
राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः।
भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥ ४४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘विदर्भदेशके स्वामी महारथी भीम नामक राजा मेरे पिता हैं। वे पृथ्वीके पालक तथा चारों वर्णोंके रक्षक हैं॥४४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
राजसूयाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् ।
आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ४५ ॥
मूलम्
राजसूयाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् ।
आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ४५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘उन्होंने (प्रचुर) दक्षिणावाले राजसूय तथा अश्वमेध नामक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। वे भूमिपालोंमें श्रेष्ठ हैं। उनके नेत्र बड़े, चंचल और सुन्दर हैं॥४५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः ।
शीलवान् वीर्यसम्पन्नः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ॥ ४६ ॥
मूलम्
ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः ।
शीलवान् वीर्यसम्पन्नः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ॥ ४६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘वे ब्राह्मणभक्त, सदाचारी, सत्यवादी, किसीके दोषको न देखनेवाले, शीलवान्, पराक्रमी, प्रचुर सम्पत्तिके स्वामी, धर्मज्ञ तथा पवित्र हैं॥४६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सम्यग् गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः।
तस्य मां विद्धि तनयां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ॥ ४७ ॥
मूलम्
सम्यग् गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः।
तस्य मां विद्धि तनयां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ॥ ४७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘वे विदर्भदेशकी जनताका अच्छी तरह पालन करनेवाले हैं। उन्होंने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, वे बड़े शक्तिशाली हैं। भगवन्! मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। मैं आपकी सेवामें (एक जिज्ञासा लेकर) उपस्थित हुई हूँ॥४७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निषधेषु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः।
गृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह ॥ ४८ ॥
मूलम्
निषधेषु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः।
गृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह ॥ ४८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘निषधदेशके महाराज मेरे श्वशुर थे, वे प्रातः-स्मरणीय नरश्रेष्ठ वीरसेनके नामसे विख्यात थे॥४८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान् सत्यपराक्रमः।
क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह ॥ ४९ ॥
मूलम्
तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान् सत्यपराक्रमः।
क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह ॥ ४९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘उन्हीं महाराज वीरसेनके एक वीर पुत्र हैं, जो बड़े ही सुन्दर और सत्यपराक्रमी हैं। वे वंशपरम्परासे प्राप्त अपने पिताके राज्यका पालन करते हैं॥४९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नलो नामारिहा श्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः।
ब्रह्मण्यो वेदविद् वाग्मी पुण्यकृत् सोमपोऽग्निमान् ॥ ५० ॥
मूलम्
नलो नामारिहा श्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः।
ब्रह्मण्यो वेदविद् वाग्मी पुण्यकृत् सोमपोऽग्निमान् ॥ ५० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘उनका नाम नल है। शत्रुदमन, श्यामसुन्दर राजा नल पुण्यश्लोक कहे जाते हैं। वे बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, वक्ता, पुण्यात्मा, सोमपान करनेवाले और अग्निहोत्री हैं॥५०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक् चैव प्रशासिता।
तस्य मामबलां श्रेष्ठां विद्धि भार्यामिहागताम् ॥ ५१ ॥
त्यक्तश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् ।
अन्वेषमाणां भर्तारं त्वं मां पर्वतसत्तम ॥ ५२ ॥
मूलम्
यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक् चैव प्रशासिता।
तस्य मामबलां श्रेष्ठां विद्धि भार्यामिहागताम् ॥ ५१ ॥
त्यक्तश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् ।
अन्वेषमाणां भर्तारं त्वं मां पर्वतसत्तम ॥ ५२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘वे एक अच्छे यज्ञकर्ता, उत्तम दाता, शूरवीर योद्धा और श्रेष्ठ शासक हैं, आप मुझे उन्हींकी श्रेष्ठ पत्नी समझ लीजिये। मैं अबला नारी आपके निकट यहाँ उन्हींकी कुशल पूछनेके लिये आयी हूँ। गिरिराज! (मेरे स्वामी मुझे छोड़कर कहीं चले गये हैं।) मैं धन-सम्पत्तिसे वंचित, पतिदेवसे रहित, अनाथ और संकटोंकी मारी हुई हूँ। इस वनमें अपने पतिकी ही खोज कर रही हूँ॥५१-५२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
समुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः ।
कच्चिद् दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन् दारुणे नलः ॥ ५३ ॥
मूलम्
समुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः ।
कच्चिद् दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन् दारुणे नलः ॥ ५३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘पर्वतश्रेष्ठ! क्या आपने इन सैकड़ों गगनचुम्बी शिखरोंद्वारा इस भयानक वनमें कहीं राजा नलको देखा है?॥५३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गजेन्द्रविक्रमो धीमान् दीर्घबाहुरमर्षणः ।
विक्रान्तः सत्त्ववान् वीरो भर्ता मम महायशाः ॥ ५४ ॥
निषधानामधिपतिः कच्चिद् दृष्टस्त्वया नलः।
विलपतीं किमेकां मां पर्वतश्रेष्ठ विह्वलाम् ॥ ५५ ॥
गिरा नाश्वासयस्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम्।
मूलम्
गजेन्द्रविक्रमो धीमान् दीर्घबाहुरमर्षणः ।
विक्रान्तः सत्त्ववान् वीरो भर्ता मम महायशाः ॥ ५४ ॥
निषधानामधिपतिः कच्चिद् दृष्टस्त्वया नलः।
विलपतीं किमेकां मां पर्वतश्रेष्ठ विह्वलाम् ॥ ५५ ॥
गिरा नाश्वासयस्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम्।
अनुवाद (हिन्दी)
‘मेरे महायशस्वी स्वामी निषधराज नल गजराजकी-सी चालसे चलते हैं। वे बड़े बुद्धिमान्, महाबाहु, अमर्षशील (दुःखको न सह सकनेवाले), पराक्रमी, धैर्यवान् तथा वीर हैं। क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? गिरिश्रेष्ठ! मैं आपकी पुत्रीके समान हूँ और (पतिके वियोगसे बहुत ही) दुःखी हूँ। क्या आप व्याकुल होकर अकेली विलाप करती हुई मुझ अबलाको आज अपनी वाणीद्वारा आश्वासन न देंगे?’॥५४-५५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसंध महीपते ॥ ५६ ॥
यद्यस्यस्मिन् वने राजन् दर्शयात्मानमात्मना।
मूलम्
वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसंध महीपते ॥ ५६ ॥
यद्यस्यस्मिन् वने राजन् दर्शयात्मानमात्मना।
अनुवाद (हिन्दी)
वीर! धर्मज्ञ! सत्यप्रतिज्ञ और पराक्रमी महीपाल! यदि आप इसी वनमें हैं तो राजन्! अपने-आपको प्रकट करके मुझे दर्शन दीजिये॥५६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् ॥ ५७ ॥
श्रोष्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम्।
वैदर्भीत्येव विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः ॥ ५८ ॥
आम्नायसारिणीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् ।
मूलम्
कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् ॥ ५७ ॥
श्रोष्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम्।
वैदर्भीत्येव विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः ॥ ५८ ॥
आम्नायसारिणीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् ।
अनुवाद (हिन्दी)
मैं कब निषधराज नलकी मेघ-गर्जनाके समान स्निग्ध, गम्भीर, अमृतोपम वह मधुर वाणी सुनूँगी। उन महामना राजाके मुखसे ‘वैदर्भि!’ इस सम्बोधनसे युक्त शुभ, स्पष्ट, वेदके अनुकूल, सुन्दर पद और अर्थसे युक्त तथा मेरे शोकका विनाश करनेवाली वाणी मुझे कब सुनायी देगी॥५७-५८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भीतामाश्वासयत मां नृपते धर्मवत्सल ॥ ५९ ॥
मूलम्
भीतामाश्वासयत मां नृपते धर्मवत्सल ॥ ५९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मवत्सल नरेश्वर! मुझ भयभीत अबलाको आश्वासन दीजिये ॥ ५९ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी।
दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ ६० ॥
मूलम्
इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी।
दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ ६० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार उस श्रेष्ठ पर्वतसे कहकर वह राजकुमारी दमयन्ती फिर वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर चल दी॥६०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा गत्वा त्रीनहोरात्रान् ददर्श परमाङ्गना।
तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् ॥ ६१ ॥
मूलम्
सा गत्वा त्रीनहोरात्रान् ददर्श परमाङ्गना।
तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् ॥ ६१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
लगातार तीन दिन और तीन रात चलनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नारीने तपस्वियोंसे युक्त एक वन देखा, जो अनुपम तथा दिव्य वनसे सुशोभित था॥६१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् ।
नियतैः संयताहारैर्दमशैचसमन्वितैः ॥ ६२ ॥
मूलम्
वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् ।
नियतैः संयताहारैर्दमशैचसमन्वितैः ॥ ६२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तथा वसिष्ठ, भृगु और अत्रिके समान नियम-परायण, मिताहारी तथा (शम,) दम, शौच आदिसे सम्पन्न तपस्वियोंसे वह शोभायमान हो रहा था॥६२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च ।
जितेन्द्रियैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ॥ ६३ ॥
मूलम्
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च ।
जितेन्द्रियैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ॥ ६३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वहाँ कुछ तपस्वीलोग केवल जल पीकर रहते थे और कुछ लोग वायु पीकर। कितने ही केवल पत्ते चबाकर रहते थे। वे जितेन्द्रिय महाभाग स्वर्गलोकके मार्गका दर्शन करना चाहते थे॥६३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संयतेन्द्रियैः ।
तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ॥ ६४ ॥
मूलम्
वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संयतेन्द्रियैः ।
तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ॥ ६४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वल्कल और मृगचर्म धारण करनेवाले उन जितेन्द्रिय मुनियोंसे सेवित एक रमणीय आश्रममण्डल दिखायी दिया, जिसमें प्रायः तपस्वीलोग ही निवास करते थे॥६४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम् ।
तापसैः समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वसत् ॥ ६५ ॥
मूलम्
नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम् ।
तापसैः समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वसत् ॥ ६५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस आश्रममें नाना प्रकारके मृगों और वानरोंके समुदाय भी विचरते रहते थे। तपस्वी महात्माओंसे भरे हुए उस आश्रमको देखते ही दमयन्तीको बड़ी सान्त्वना मिली॥६५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना।
वर्चस्विनी सुप्रतिष्ठा स्वसितायतलोचना ॥ ६६ ॥
मूलम्
सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना।
वर्चस्विनी सुप्रतिष्ठा स्वसितायतलोचना ॥ ६६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उसकी भौंहें बड़ी सुन्दर थीं। केश मनोहर जान पड़ते थे। नितम्बभाग, स्तन, दन्तपंक्ति और मुख सभी सुन्दर थे। उसके मनोहर कजरारे नेत्र विशाल थे। वह तेजस्विनी और प्रतिष्ठित थी॥६६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिया ।
योषिद्रत्नं महाभागा दमयन्ती तपस्विनी ॥ ६७ ॥
मूलम्
सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिया ।
योषिद्रत्नं महाभागा दमयन्ती तपस्विनी ॥ ६७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज वीरसेनकी पुत्रवधू रमणीशिरोमणि महाभागा तपस्विनी उस दमयन्तीने आश्रमके भीतर प्रवेश किया॥६७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
साभिवाद्य तपोवृद्धान् विनयावनता स्थिता।
स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसोत्तमैः ॥ ६८ ॥
मूलम्
साभिवाद्य तपोवृद्धान् विनयावनता स्थिता।
स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसोत्तमैः ॥ ६८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वहाँ तपोवृद्ध महात्माओंको प्रणाम करके वह उनके समीप विनीतभावसे खड़ी हो गयी। तब वहाँके सभी श्रेष्ठ तपस्वीजनोंने उससे कहा—‘देवि! तुम्हारा स्वागत है’॥६८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूजां चास्या यथान्यायं कृत्वा तत्र तपोधनाः।
आस्यतामित्यथोचुस्ते ब्रूहि किं करवामहे ॥ ६९ ॥
मूलम्
पूजां चास्या यथान्यायं कृत्वा तत्र तपोधनाः।
आस्यतामित्यथोचुस्ते ब्रूहि किं करवामहे ॥ ६९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर वहाँ दमयन्तीका यथोचित आदर-सत्कार करके उन तपोधनोंने कहा—‘शुभे! बैठो, बताओ, हम तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करें’॥६९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तानुवाच वरारोहा कच्चिद् भगवतामिह।
तपःस्वग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः ॥ ७० ॥
कुशलं वो महाभागाः स्वधर्माचरणेषु च।
तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनि ॥ ७१ ॥
मूलम्
तानुवाच वरारोहा कच्चिद् भगवतामिह।
तपःस्वग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः ॥ ७० ॥
कुशलं वो महाभागाः स्वधर्माचरणेषु च।
तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनि ॥ ७१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समय सुन्दर अंगोंवाली दमयन्तीने उनसे कहा—‘भगवन्! निष्पाप महाभागगण! यहाँ तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग और पक्षियोंके पालन तथा अपने धर्मके आचरण आदि विषयोंमें आपलोग सकुशल हैं न?’ तब उन महात्माओंने कहा—‘भद्रे! यशस्विनि! सर्वत्र कुशल है॥७०-७१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि।
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह ॥ ७२ ॥
विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः।
अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः ॥ ७३ ॥
मूलम्
ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि।
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह ॥ ७२ ॥
विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः।
अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः ॥ ७३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘सर्वांगसुन्दरी! बताओ, तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? तुम्हारे उत्तम रूप और परम सुन्दर कान्तिको यहाँ देखकर हमें बड़ा विस्मय हो रहा है। धैर्य धारण करो, शोक न करो। तुम इस वनकी देवी हो या इस पर्वतकी अधिदेवता॥७२-७३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते।
साब्रवीत् तानृषीन् नाहमरण्यस्यास्य देवता ॥ ७४ ॥
न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता।
मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः ॥ ७५ ॥
मूलम्
अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते।
साब्रवीत् तानृषीन् नाहमरण्यस्यास्य देवता ॥ ७४ ॥
न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता।
मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः ॥ ७५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अनिन्दिते! कल्याणि! अथवा तुम इस नदीकी अधिष्ठात्री देवी हो, सच-सच बताओ।’ दमयन्तीने उन ऋषियोंसे कहा—‘तपस्याके धनी ब्राह्मणो! न तो मैं इस वनकी देवी हूँ, न पर्वतकी अधिदेवता और न इस नदीकी ही देवी हूँ। आप सब लोग मुझे मानवी समझें॥७४-७५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः।
विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः ॥ ७६ ॥
मूलम्
विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः।
विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः ॥ ७६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मैं विस्तारपूर्वक अपना परिचय दे रही हूँ, आपलोग सुनें। विदर्भदेशमें भीम नामसे प्रसिद्ध एक भूमिपाल हैं॥७६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः।
निषधाधिपतिर्धीमान् नलो नाम महायशाः ॥ ७७ ॥
वीरः संग्रामजिद् विद्वान् मम भर्ता विशाम्पतिः।
देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः ॥ ७८ ॥
मूलम्
तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः।
निषधाधिपतिर्धीमान् नलो नाम महायशाः ॥ ७७ ॥
वीरः संग्रामजिद् विद्वान् मम भर्ता विशाम्पतिः।
देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः ॥ ७८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘द्विजवरो! आप सब महात्मा जान लें, मैं उन्हीं महाराजकी पुत्री हूँ। निषधदेशके स्वामी, संग्रामविजयी, वीर, विद्वान्, बुद्धिमान्, प्रजापालक महायशस्वी राजा नल मेरे पति हैं। वे देवताओंके पूजनमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है॥७७-७८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गोप्ता निषधवंशस्य महातेजा महाबलः।
सत्यवान् धर्मवित् प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः ॥ ७९ ॥
ब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान् परपुरंजयः।
नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः ॥ ८० ॥
मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा।
आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ८१ ॥
मूलम्
गोप्ता निषधवंशस्य महातेजा महाबलः।
सत्यवान् धर्मवित् प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः ॥ ७९ ॥
ब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान् परपुरंजयः।
नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः ॥ ८० ॥
मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा।
आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ८१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘वे निषधकुलके रक्षक, महातेजस्वी, महाबली, सत्यवादी, धर्मज्ञ, विद्वान्, सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुमर्दन, ब्राह्मणभक्त, देवोपासक, शोभा और सम्पत्तिसे युक्त तथा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले हैं। मेरे स्वामी नृपश्रेष्ठ नल देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। उनके नेत्र विशाल हैं, उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर है, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले, बड़े-बड़े यज्ञोंके आयोजक और वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं॥७९—८१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः।
स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥ ८२ ॥
आहूय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः ।
देवने कुशलैर्जिह्मैर्हृतं राज्यं वसूनि च ॥ ८३ ॥
मूलम्
सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः।
स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥ ८२ ॥
आहूय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः ।
देवने कुशलैर्जिह्मैर्हृतं राज्यं वसूनि च ॥ ८३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘युद्धमें उन्होंने कितने ही शत्रुओंका संहार किया है। वे सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी और कान्तिमान् हैं। एक दिन कुछ कपटकुशल, अजितेन्द्रिय, अनार्य, कुटिल तथा द्यूतनिपुण जुआरिओंने उन सत्य-धर्मपरायण महाराज नलको जूएके लिये आवाहन करके उनके सारे राज्य और धनका अपहरण कर लिया॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वै।
दमयन्तीति विख्यातां भर्तुर्दर्शनलालसाम् ॥ ८४ ॥
मूलम्
तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वै।
दमयन्तीति विख्यातां भर्तुर्दर्शनलालसाम् ॥ ८४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘आप दमयन्ती नामसे विख्यात मुझे उन्हीं नृपश्रेष्ठ नलकी पत्नी जानें। मैं अपने स्वामीके दर्शनके लिये उत्सुक हो रही हूँ॥८४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा।
पल्वलानि च सर्वाणि तथारण्यानि सर्वशः ॥ ८५ ॥
अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम्।
महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥ ८६ ॥
मूलम्
सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा।
पल्वलानि च सर्वाणि तथारण्यानि सर्वशः ॥ ८५ ॥
अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम्।
महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥ ८६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मेरे पति महामना नल युद्धकलामें कुशल और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् हैं। मैं उन्हींकी खोज करती हुई वन, पर्वत, सरोवर, नदी, गड्ढे और सभी जंगलोंमें दुःखी होकर घूमती हूँ॥८५-८६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कच्चिद् भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः।
भवेत् प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ॥ ८७ ॥
यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन् प्रपन्ना भृशदारुणम्।
वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ॥ ८८ ॥
मूलम्
कच्चिद् भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः।
भवेत् प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ॥ ८७ ॥
यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन् प्रपन्ना भृशदारुणम्।
वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ॥ ८८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! क्या आपके इस रमणीय तपोवनमें निषधनरेश नल आये थे? ब्रह्मन्! जिनके लिये मैं व्याघ्र, सिंह आदि पशुओंसे सेवित अत्यन्त दारुण, भयंकर, घोर वनमें आयी हूँ॥८७-८८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम्।
आत्मानं श्रेयसा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ॥ ८९ ॥
मूलम्
यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम्।
आत्मानं श्रेयसा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ॥ ८९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यदि कुछ ही दिन-रातमें मैं राजा नलको नहीं देखूँगी तो इस शरीरका परित्याग करके आत्माका कल्याण करूँगी॥८९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम्।
कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥ ९० ॥
मूलम्
को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम्।
कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥ ९० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘उन पुरुषरत्न नलके बिना जीवन धारण करनेसे मेरा क्या प्रयोजन है? अब मैं पतिशोकसे पीड़ित होकर न जाने कैसी हो जाऊँगी?’॥९०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् ।
दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यदर्शिनः ॥ ९१ ॥
मूलम्
तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् ।
दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यदर्शिनः ॥ ९१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार वनमें अकेली विलाप करती हुई भीमनन्दिनी दमयन्तीसे सत्यका दर्शन करनेवाले उन तपस्वियोंने कहा—॥९१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे।
वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥ ९२ ॥
मूलम्
उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे।
वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥ ९२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘कल्याणि! शुभे! हम अपने तपोबलसे देख रहे हैं, तुम्हारा भविष्य परम कल्याणमय होगा। तुम शीघ्र ही निषधनरेश नलका दर्शन प्राप्त करोगी॥९२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिपातिनम् ।
भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥ ९३ ॥
मूलम्
निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिपातिनम् ।
भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥ ९३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भीमकुमारी! तुम शत्रुओंका संहार करनेवाले निषधदेशके अधिपति और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा नलको सब प्रकारकी चिन्ताओंसे रहित देखोगी॥९३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् ।
तदेव नगरं श्रेष्ठं प्रशासतमरिंदमम् ॥ ९४ ॥
द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम्।
पति द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥ ९५ ॥
मूलम्
विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् ।
तदेव नगरं श्रेष्ठं प्रशासतमरिंदमम् ॥ ९४ ॥
द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम्।
पति द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥ ९५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तुम्हारे पति सब प्रकारके पापजनित दुखोंसे मुक्त और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न होंगे। शत्रुदमन राजा नल फिर उसी श्रेष्ठ नगरका शासन करेंगे। वे शत्रुओंके लिये भयदायक और सुहृदोंके लिये शोकका नाश करनेवाले होंगे। कल्याणि! इस प्रकार सत्कुलमें उत्पन्न अपने पतिको तुम (नरेशके पदपर प्रतिष्ठित) देखोगी’॥९४-९५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम्।
अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥ ९६ ॥
मूलम्
एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम्।
अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥ ९६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नलकी प्रियतमा महारानी राजकुमारी दमयन्तीसे ऐसा कहकर वे सभी तपस्वी अग्निहोत्र और आश्रमसहित अदृश्य हो गये॥९६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता ह्यभवत् तदा।
दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ॥ ९७ ॥
मूलम्
सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता ह्यभवत् तदा।
दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ॥ ९७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समय राजा वीरसेनकी पुत्रवधू सर्वांगसुन्दरी दमयन्ती वह महान् आश्चर्यकी बात देखकर बड़े विस्मयमें पड़ गयी॥९७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाभवत्।
क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ॥ ९८ ॥
मूलम्
किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाभवत्।
क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ॥ ९८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
(उसने सोचा—) ‘क्या मैंने कोई स्वप्न देखा है? यहाँ यह कैसी अद्भुत घटना हो गयी? वे सब तपस्वी कहाँ चले गये और वह आश्रममण्डल कहाँ है?’॥९८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्व सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता।
क्व नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥ ९९ ॥
मूलम्
क्व सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता।
क्व नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥ ९९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘वह पुण्यसलिला रमणीय नदी, जिसपर पक्षी निवास कर रहे थे, कहाँ चली गयी? फल और फूलोंसे सुशोभित वे मनोरम वृक्ष कहाँ विलीन हो गये!’॥९९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता।
भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ॥ १०० ॥
मूलम्
ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता।
भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ॥ १०० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पवित्र मुसकानवाली भीमपुत्री दमयन्ती बहुत देरतक इन सब बातोंपर विचार करती रही। तत्पश्चात् वह पतिशोकपरायण और दीन हो गयी तथा उसके मुखपर उदासी छा गयी॥१००॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा गत्वाथापरां भूमिं बाष्पसंदिग्धया गिरा।
विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाशोकतरुं ततः ॥ १०१ ॥
उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने।
पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ॥ १०२ ॥
मूलम्
सा गत्वाथापरां भूमिं बाष्पसंदिग्धया गिरा।
विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाशोकतरुं ततः ॥ १०१ ॥
उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने।
पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ॥ १०२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर वह दूसरे स्थानपर जाकर अश्रुगद्गद वाणीसे विलाप करने लगी। उसने आँसू भरे नेत्रोंसे देखा, वहाँसे कुछ ही दूरपर एक अशोकका वृक्ष था। दमयन्ती उसके पास गयी। वह तरुवर अशोक-फूलोंसे भरा था। उस वनमें पल्लवोंसे लदा हुआ और पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान वह वृक्ष बड़ा ही मनोरम जान पड़ता था॥१०१-१०२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अहो बतायमगमः श्रीमानस्मिन् वनान्तरे।
आपीडैर्बहुभिर्भाति श्रीमान् पर्वतराडिव ॥ १०३ ॥
मूलम्
अहो बतायमगमः श्रीमानस्मिन् वनान्तरे।
आपीडैर्बहुभिर्भाति श्रीमान् पर्वतराडिव ॥ १०३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
(उसे देखकर वह मन-ही-मन कहने लगी—) ‘अहो! इस वनके भीतर यह अशोक बड़ा ही सुन्दर है। यह अनेक प्रकारके फल, फूल आदि अलंकारोंसे अलंकृत सुन्दर गिरिराजकी भाँति सुशोभित हो रहा है’॥१०३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन।
वीतशोकभयाबाधं कच्चित् त्वं दृष्टवान् नृपम् ॥ १०४ ॥
नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम्।
निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥ १०५ ॥
मूलम्
विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन।
वीतशोकभयाबाधं कच्चित् त्वं दृष्टवान् नृपम् ॥ १०४ ॥
नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम्।
निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥ १०५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
(अब उसने अशोकसे कहा—) ‘प्रियदर्शन अशोक! तुम शीघ्र ही मेरा शोक दूर कर दो। क्या तुमने शोक, भय और बाधासे रहित शत्रुदमन राजा नलको देखा है? क्या मेरे प्रियतम, दमयन्तीके प्राणवल्लभ, निषधनरेश नलपर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है?॥१०४-१०५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् ।
व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥ १०६ ॥
मूलम्
एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् ।
व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥ १०६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘उन्होंने एक साड़ीके आधे टुकड़ेसे अपने शरीरको ढँक रखा है, उनके अंगोंकी त्वचा बड़ी सुकुमार है। वे वीरवर नल भारी संकटसे पीड़ित होकर इस वनमें आये हैं॥१०६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यथा विशोका गच्छेयमशोकनग तत् कुरु।
सत्यनामा भवाशोक अशोकः शोकनाशनः ॥ १०७ ॥
मूलम्
यथा विशोका गच्छेयमशोकनग तत् कुरु।
सत्यनामा भवाशोक अशोकः शोकनाशनः ॥ १०७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अशोकवृक्ष! तुम ऐसा करो, जिससे मैं यहाँसे शोकरहित होकर जाऊँ। अशोक उसे कहते हैं, जो शोकका नाश करनेवाला हो, अतः अशोक! तुम अपने नामको सत्य एवं सार्थक करो’॥१०७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं साशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह।
जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥ १०८ ॥
मूलम्
एवं साशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह।
जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥ १०८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार शोकार्त हुई सुन्दरी दमयन्ती उस अशोकवृक्षकी परिक्रमा करके वहाँसे अत्यन्त भयंकर स्थानकी ओर गयी॥१०८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा ददर्श नगान् नैकान् नैकाश्च सरितस्तथा।
नैकांश्च पर्वतान् रम्यान् नैकांश्च मृगपक्षिणः ॥ १०९ ॥
कन्दरांश्च नितम्बांश्च नदीश्चाद्भुतदर्शनाः ।
ददर्श तान् भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ॥ ११० ॥
गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता।
ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ १११ ॥
उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम्।
सुशीततोयां विस्तीर्णां ह्रदिनीं वेतसैर्वृताम् ॥ ११२ ॥
मूलम्
सा ददर्श नगान् नैकान् नैकाश्च सरितस्तथा।
नैकांश्च पर्वतान् रम्यान् नैकांश्च मृगपक्षिणः ॥ १०९ ॥
कन्दरांश्च नितम्बांश्च नदीश्चाद्भुतदर्शनाः ।
ददर्श तान् भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ॥ ११० ॥
गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता।
ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ १११ ॥
उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम्।
सुशीततोयां विस्तीर्णां ह्रदिनीं वेतसैर्वृताम् ॥ ११२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उसने अनेक प्रकारके वृक्ष, अनेकानेक सरिताओं, बहुसंख्यक रमणीय पर्वतों, अनेक मृग-पक्षियों, पर्वतकी कन्दराओं तथा उनके मध्यभागों और अद्भुत नदियोंको देखा। पतिका अन्वेषण करनेवाली दमयन्तीने उस समय पूर्वोक्त सभी वस्तुओंको देखा। इस तरह बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीने एक बहुत बड़े सार्थ (व्यापारियोंके दल)-को देखा, जो हाथी, घोड़े तथा रथसे व्याप्त था। वह व्यापारियोंका समूह स्वच्छ जलसे सुशोभित एक सुन्दर रमणीय नदीको पार कर रहा था। नदीका जल बहुत ठंडा था। उसका पाट चौड़ा था। उसमें कई कुण्ड थे और वह किनारेपर उगे हुए बेंतके वृक्षोंसे आच्छादित हो रही थी॥१०९—११२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रोद्घुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् ।
कूर्मग्राहझषाकीर्णां विपुलद्वीपशोभिताम् ॥ ११३ ॥
मूलम्
प्रोद्घुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् ।
कूर्मग्राहझषाकीर्णां विपुलद्वीपशोभिताम् ॥ ११३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उसके तटपर क्रौंच, कुरर और चक्रवाक आदि पक्षी कूज रहे थे। कछुए, मगर और मछलियोंसे भरी हुई वह नदी विस्तृत टापूसे सुशोभित हो रही थी॥११३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी।
उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥ ११४ ॥
मूलम्
सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी।
उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥ ११४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस बहुत बड़े समूहको देखते ही यशस्विनी नलपत्नी सुन्दरी दमयन्ती उसके पास पहुँच कर लोगोंकी भीड़में घुस गयी॥११४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता।
कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥ ११५ ॥
मूलम्
उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता।
कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥ ११५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उसका रूप उन्मत्त स्त्रीका-सा जान पड़ता था, वह शोकसे पीड़ित, दुर्बल, उदास और मलिन हो रही थी। उसने आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढक रखा था और उसके केशोंपर धूल जम गयी थी॥११५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः।
केचिच्चिन्तापरा जग्मुः केचित् तत्र विचुक्रुशुः ॥ ११६ ॥
मूलम्
तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः।
केचिच्चिन्तापरा जग्मुः केचित् तत्र विचुक्रुशुः ॥ ११६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वहाँ दमयन्तीको सहसा देखकर कितने ही मनुष्य भयसे भाग खड़े हुए। कोई-कोई भारी चिन्तामें पड़ गये और कुछ लोग तो चीखने-चिल्लाने लगे॥११६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे।
अकुर्वत दयां केचित् पप्रच्छुश्चापि भारत ॥ ११७ ॥
मूलम्
प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे।
अकुर्वत दयां केचित् पप्रच्छुश्चापि भारत ॥ ११७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कुछ लोग उसकी हँसी उड़ाते थे और कुछ उसमें दोष देख रहे थे। भारत! उन्हींमें कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें उसपर दया आ गयी और उन्होंने उसका समाचार पूछा—॥११७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने।
त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित् त्वमसि मानुषी ॥ ११८ ॥
मूलम्
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने।
त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित् त्वमसि मानुषी ॥ ११८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो और इस वनमें क्या खोज रही हो? तुम्हें देखकर हम बहुत दुःखी हैं। क्या तुम मानवी हो?॥११८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिशः।
देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः॥११९॥
मूलम्
वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिशः।
देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः॥११९॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘कल्याणि! सच बताओ, तुम इस वन, पर्वत अथवा दिशाकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? हम सब लोग तुम्हारी शरणमें आये हैं॥११९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना।
सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष वास्माननिन्दिते ॥ १२० ॥
यथायं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत्।
तथा विधत्स्व कल्याणि यथा श्रेयो हि नो भवेत्॥१२१॥
मूलम्
यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना।
सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष वास्माननिन्दिते ॥ १२० ॥
यथायं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत्।
तथा विधत्स्व कल्याणि यथा श्रेयो हि नो भवेत्॥१२१॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तुम यक्षी हो या राक्षसी अथवा कोई श्रेष्ठ देवांगना हो? अनिन्दिते! सर्वथा हमारा कल्याण एवं संरक्षण करो। कल्याणि! यह हमारा समूह शीघ्र कुशलपूर्वक यहाँसे चला जाय और हमलोगोंका सब प्रकारसे भला हो, ऐसी कृपा करो’॥१२०-१२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा।
प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥ १२२ ॥
मूलम्
तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा।
प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥ १२२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस यात्रीदलके द्वारा जब ऐसी बात कही गयी, तब पतिके वियोगजनित दुःखसे पीड़ित साध्वी राजकुमारी दमयन्तीने उन सबको इस प्रकार उत्तर दिया—॥१२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन।
युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥ १२३ ॥
मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम्।
नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥ १२४ ॥
मूलम्
सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन।
युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥ १२३ ॥
मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम्।
नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥ १२४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘इस जनसमुदायके जो सरदार हों, उनसे, इस जनसमूहसे तथा इसके (भीतर रहनेवाले और) आगे चलनेवाले जो बाल-वृद्ध और युवक मनुष्य हों, उन सबसे मेरा यह कहना है कि आप सब लोग मुझे मानवी समझें। मैं एक नरेशपुत्री, महाराजकी पुत्रवधू तथा राजपत्नी हूँ। अपने स्वामीके दर्शनकी इच्छासे इस वनमें भटक रही हूँ॥१२३-१२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः।
नलो नाम महाभागस्तं मृग्याम्यपराजितम् ॥ १२५ ॥
मूलम्
विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः।
नलो नाम महाभागस्तं मृग्याम्यपराजितम् ॥ १२५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘विदर्भराज भीम मेरे पिता हैं, निषधनरेश महाभाग राजा नल मेरे पति हैं। मैं उन्हीं अपराजित वीर नलकी खोज कर रही हूँ॥१२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम्।
नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥ १२६ ॥
मूलम्
यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम्।
नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥ १२६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यदि आपलोग शत्रुसमूहका संहार करनेवाले मेरे प्रियतम पुरुषसिंह महाराज नलके विषयमें कुछ जानते हों तो शीघ्र बतावें’॥१२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः।
सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥ १२७ ॥
मूलम्
तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः।
सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥ १२७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस महान् समूहका मालिक और समस्त यात्रीदलका संचालक (वणिक्) शुचिनामसे प्रसिद्ध था। उसने उस सुन्दरीसे कहा—‘कल्याणि! मेरी बात सुनो’—॥१२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते।
मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥ १२८ ॥
मूलम्
अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते।
मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥ १२८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘शुचिस्मिते! मैं इस दलका नेता और संचालक हूँ। यशस्विनि! मैंने नल नामधारी किसी मनुष्यको इस वनमें नहीं देखा है॥१२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुञ्जरद्वीपिमहिषशार्दूलर्क्षमृगानपि ।
पश्याम्यस्मिन् वने कृत्स्ने ह्यमनुष्यनिषेविते ॥ १२९ ॥
मूलम्
कुञ्जरद्वीपिमहिषशार्दूलर्क्षमृगानपि ।
पश्याम्यस्मिन् वने कृत्स्ने ह्यमनुष्यनिषेविते ॥ १२९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यह सम्पूर्ण वन मनुष्येतर प्राणियोंसे भरा है। इसके भीतर हाथियों, चीतों, भैंसों, सिंहों, रीछों और मृगोंको ही मैं देखता आ रहा हूँ॥१२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऋते त्वां मानुषीं मर्त्यं न पश्यामि महावने।
तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ॥ १३० ॥
मूलम्
ऋते त्वां मानुषीं मर्त्यं न पश्यामि महावने।
तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ॥ १३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तुम-जैसी मानव-कन्याके सिवा और किसी मनुष्यको मैं इस विशाल वनमें नहीं देख रहा हूँ। इसलिये यक्षराज मणिभद्र आज हमपर प्रसन्न हों’॥१३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
साब्रवीद् वणिजः सर्वान् सार्थवाहं च तं ततः।
क्व नु यास्यति सार्थोऽयमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १३१ ॥
मूलम्
साब्रवीद् वणिजः सर्वान् सार्थवाहं च तं ततः।
क्व नु यास्यति सार्थोऽयमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब दमयन्तीने उन सब व्यापारियों तथा दलके संचालकसे कहा—‘आपका यह दल कहाँ जायगा? यह मुझे बताइये’॥१३१॥
मूलम् (वचनम्)
सार्थवाह उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
सार्थोऽयं चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः।
क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय मनुजात्मजे ॥ १३२ ॥
मूलम्
सार्थोऽयं चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः।
क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय मनुजात्मजे ॥ १३२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सार्थवाहने कहा— राजकुमारी! हमारा यह दल शीघ्र ही सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुके जनपद (नगर)-में विशेष लाभके उद्देश्यसे जायगा॥१३२॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसार्थवाहसंगमे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीकी सार्थवाहसे भेंटविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥६४॥