भागसूचना
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश
मूलम् (वचनम्)
बृहदश्व उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
अपक्रान्ते नले राजन् दमयन्ती गतक्लमा।
अबुध्यत वरारोहा संत्रस्ता विजने वने ॥ १ ॥
अपश्यमाना भर्तारं शोकदुःखसमन्विता ।
प्राक्रोशदुच्चैः संत्रस्ता महाराजेति नैषधम् ॥ २ ॥
मूलम्
अपक्रान्ते नले राजन् दमयन्ती गतक्लमा।
अबुध्यत वरारोहा संत्रस्ता विजने वने ॥ १ ॥
अपश्यमाना भर्तारं शोकदुःखसमन्विता ।
प्राक्रोशदुच्चैः संत्रस्ता महाराजेति नैषधम् ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! नलके चले जानेपर जब दमयन्तीकी थकावट दूर हो गयी, तब उसकी आँख खुली। उस निर्जन वनमें अपने स्वामीको न देखकर सुन्दरी दमयन्ती भयातुर और दुःख-शोकसे व्याकुल हो गयी। उसने भयभीत होकर निषधनरेश नलको ‘महाराज! आप कहाँ हैं?’ यह कहकर बड़े जोरसे पुकारा॥१-२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन् किं जहासि माम्।
हा हतास्मि विनष्टास्मि भीतास्मि विजने वने ॥ ३ ॥
मूलम्
हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन् किं जहासि माम्।
हा हतास्मि विनष्टास्मि भीतास्मि विजने वने ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘हा नाथ! हा महाराज! हा स्वामिन्! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? हाय! मैं मारी गयी, नष्ट हो गयी, इस जनशून्य वनमें मुझे बड़ा भय लग रहा है॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ननु नाम महाराज धर्मज्ञः सत्यवागसि।
कथमुक्त्वा तथा सत्यं सुप्तामुत्सृज्य कानने ॥ ४ ॥
मूलम्
ननु नाम महाराज धर्मज्ञः सत्यवागसि।
कथमुक्त्वा तथा सत्यं सुप्तामुत्सृज्य कानने ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘महाराज! आप तो धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं; फिर वैसी सच्ची प्रतिज्ञा करके आज आप इस जंगलमें मुझे सोती छोड़कर कैसे चले गये?॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कथमुत्सृज्य गन्तासि दक्षां भार्यामनुव्रताम्।
विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥ ५ ॥
मूलम्
कथमुत्सृज्य गन्तासि दक्षां भार्यामनुव्रताम्।
विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मैं आपकी सेवामें कुशल और अनुरक्त भार्या हूँ। विशेषतः मेरे द्वारा आपका कोई अपराध भी नहीं हुआ है। यदि कोई अपराध हुआ है, तो वह दूसरेके ही द्वारा, मुझसे नहीं; तो भी आप मुझे त्यागकर क्यों चले जा रहे हैं?॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शक्यसे ता गिरः सम्यक् कर्तुं मयि नरेश्वर।
यास्तेषां लोकपालानां संनिधौ कथिताः पुरा ॥ ६ ॥
मूलम्
शक्यसे ता गिरः सम्यक् कर्तुं मयि नरेश्वर।
यास्तेषां लोकपालानां संनिधौ कथिताः पुरा ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘नरेश्वर! आपने पहले स्वयंवरसभामें उन लोकपालोंके निकट जो बातें कहीं थीं, क्या आप उन्हें आज मेरे प्रति सत्य सिद्ध कर सकेंगे?॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानां पुरुषर्षभ।
तत्र कान्ता त्वयोत्सृष्टा मुहूर्तमपि जीवति ॥ ७ ॥
मूलम्
नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानां पुरुषर्षभ।
तत्र कान्ता त्वयोत्सृष्टा मुहूर्तमपि जीवति ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘पुरुषशिरोमणे! मनुष्योंकी मृत्यु असमयमें नहीं होती, तभी तो आपकी यह प्रियतमा आपसे परित्यक्त होकर दो घड़ी भी जी रही है॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान् पुरुषर्षभ ।
भीताहमतिदुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर ॥ ८ ॥
मूलम्
पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान् पुरुषर्षभ ।
भीताहमतिदुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘पुरुषश्रेष्ठ! यहाँ इतना ही परिहास बहुत है। अत्यन्त दुर्धर्ष वीर! मैं बहुत डर गयी हूँ। प्राणेश्वर! अब मुझे अपना दर्शन दीजिये॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष दृष्टोऽसि नैषध।
आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ ९ ॥
मूलम्
दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष दृष्टोऽसि नैषध।
आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘राजन्! निषधनरेश! आप दीख रहे हैं, दीख रहे हैं, यह दिखायी दिये। लताओंद्वारा अपनेको छिपाकर आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं?॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नृशंसं बत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह।
विलपन्तीं समागम्य नाश्वासयसि पार्थिव ॥ १० ॥
मूलम्
नृशंसं बत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह।
विलपन्तीं समागम्य नाश्वासयसि पार्थिव ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘राजेन्द्र! मैं इस प्रकार भय और चिन्तामें पड़कर यहाँ विलाप कर रही हूँ और आप आकर आश्वासन भी नहीं देते! भूपाल! यह तो आपकी बड़ी निर्दयता है॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन।
कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ॥ ११ ॥
मूलम्
न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन।
कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘नरेश्वर! मैं अपने लिये शोक नहीं करती। मुझे दूसरी किसी बातका भी शोक नहीं है। मैं केवल आपके लिये शोक कर रही हूँ कि आप अकेले कैसी शोचनीय दशामें पड़ जायँगे!॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्षितः।
सायाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि ॥ १२ ॥
मूलम्
कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्षितः।
सायाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘राजन्! आप भूखे-प्यासे और परिश्रमसे थके-माँदे होकर जब सायंकाल किसी वृक्षके नीचे आकर विश्राम करेंगे, उस समय मुझे अपने पास न देखकर आपकी कैसी दशा हो जायगी?’॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः सा तीव्रशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना।
इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥ १३ ॥
मूलम्
ततः सा तीव्रशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना।
इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर प्रचण्ड शोकसे पीड़ित हो क्रोधाग्निसे दग्ध होती हुई-सी दमयन्ती अत्यन्त दुःखी हो रोने और इधर-उधर दौड़ने लगी॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुहुरुत्पतते बाला मुहुः पतति विह्वला।
मुहुरालीयते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ॥ १४ ॥
मूलम्
मुहुरुत्पतते बाला मुहुः पतति विह्वला।
मुहुरालीयते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
दमयन्ती बार-बार उठती और बार-बार विह्वल होकर गिर पड़ती थी। वह कभी भयभीत होकर छिपती और कभी जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगती थी॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अतीव शोकसंतप्ता मुहुर्निःश्वस्य विह्वला।
उवाच भैमी निःश्वस्य रुदत्यथ पतिव्रता ॥ १५ ॥
मूलम्
अतीव शोकसंतप्ता मुहुर्निःश्वस्य विह्वला।
उवाच भैमी निःश्वस्य रुदत्यथ पतिव्रता ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अत्यन्त शोकसंतप्त हो बार-बार लंबी साँसें खींचती हुई व्याकुल पतिव्रता दमयन्ती दीर्घ निःश्वास लेकर रोती हुई बोली—॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः।
तस्य भूतस्य नो दुःखाद् दुःखमप्यधिकं भवेत् ॥ १६ ॥
मूलम्
यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः।
तस्य भूतस्य नो दुःखाद् दुःखमप्यधिकं भवेत् ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘जिसके अभिशापसे निषधनरेश नल दुःखसे पीड़ित हो क्लेश-पर-क्लेश उठाते जा रहे हैं, उस प्राणीको हमलोगोंके दुःखसे भी अधिक दुःख प्राप्त हो॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान् नलम्।
तस्माद् दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ॥ १७ ॥
मूलम्
अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान् नलम्।
तस्माद् दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘जिस पापीने पुण्यात्मा राजा नलको इस दशामें पहुँचाया है, वह उनसे भी भारी दुःखमें पड़कर दुःखकी ही जिंदगी बितावे’॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः।
अन्वेषमाणा भर्तारं वने श्वापदसेविते ॥ १८ ॥
उन्मत्तवद् भीमसुता विलपन्ती इतस्ततः।
हा हा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ॥ १९ ॥
मूलम्
एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः।
अन्वेषमाणा भर्तारं वने श्वापदसेविते ॥ १८ ॥
उन्मत्तवद् भीमसुता विलपन्ती इतस्ततः।
हा हा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार विलाप करती तथा हिंस्र जन्तुओंसे भरे हुए वनमें अपने पतिको ढूँढ़ती हुई महामना राजा नलकी पत्नी भीमकुमारी दमयन्ती उन्मत्त हुई रोती-बिलखती और ‘हा राजन्! हा महाराज’ ऐसा बार-बार कहती हुई इधर-उधर दौड़ने लगी॥१८-१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तां क्रन्दमानामत्यर्थं कुररीमिव वाशतीम्।
करुणं बहु शोचन्तीं विलपन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ २० ॥
सहसाभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् ।
जग्राहाजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ॥ २१ ॥
मूलम्
तां क्रन्दमानामत्यर्थं कुररीमिव वाशतीम्।
करुणं बहु शोचन्तीं विलपन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ २० ॥
सहसाभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् ।
जग्राहाजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह कुररी पक्षीकी भाँति जोर-जोरसे करुण क्रन्दन कर रही थी और अत्यन्त शोक करती हुई बार-बार विलाप कर रही थी। वहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विशालकाय भूखा अजगर बैठा था। उसने बार-बार चक्कर लगाती सहसा निकट आयी हुई भीमकुमारी दमयन्तीको (पैरोंकी ओरसे) निगलना आरम्भ कर दिया॥२०-२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा ग्रस्यमाना ग्राहेण शोकेन च परिप्लुता।
नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ॥ २२ ॥
मूलम्
सा ग्रस्यमाना ग्राहेण शोकेन च परिप्लुता।
नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शोकमें डूबी हुई वैदर्भीको अजगर निगल रहा था, तो भी वह अपने लिये उतना शोक नहीं कर रही थी, जितना शोक उसे निषधनरेश नलके लिये था॥२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत्।
ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि ॥ २३ ॥
मूलम्
हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत्।
ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि ॥ २३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
(वह विलाप करती हुई कहने लगी—) ‘हा नाथ! इस निर्जन वनमें यह अजगर सर्प मुझे अनाथकी भाँति निगल रहा है। आप मेरी रक्षाके लिये दौड़कर आते क्यों नहीं हैं?॥२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध।
कथं भवाञ्जगामाद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो ॥ २४ ॥
मूलम्
कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध।
कथं भवाञ्जगामाद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘निषधनरेश! यदि मैं मर गयी, तो मुझे बार-बार याद करके आपकी कैसी दशा हो जायगी? प्रभो! आज मुझे वनमें छोड़कर आप क्यों चले गये?॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा बुद्धिं चेतो धनानि च।
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैषध।
कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ॥ २५ ॥
मूलम्
पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा बुद्धिं चेतो धनानि च।
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैषध।
कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ॥ २५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘निष्पाप निषधनरेश! इस संकटसे मुक्त होनेपर जब आपको पुनः शुद्ध बुद्धि, चेतना और धन आदिकी प्राप्ति होगी, उस समय मेरे बिना आपकी क्या दशा होगी? नृपप्रवर! जब आप भूखसे पीड़ित हो थके-माँदे एवं अत्यन्त खिन्न होंगे, उस समय आपकी उस थकावटको कौन दूर करेगा?’॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः कश्चिन्मृगव्याधो विचरन् गहने वने।
आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाभिससार ह ॥ २६ ॥
मूलम्
ततः कश्चिन्मृगव्याधो विचरन् गहने वने।
आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाभिससार ह ॥ २६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इसी समय कोई व्याध उस गहन वनमें विचर रहा था। वह दमयन्तीका करुण क्रन्दन सुनकर बड़े वेगसे उधर आया॥२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणायतेक्षणाम्।
त्वरमाणो मृगव्याधः समभिक्रम्य वेगतः ॥ २७ ॥
मुखतः पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च।
निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ॥ २८ ॥
मोक्षयित्वा स तां व्याधः प्रक्षाल्य सलिलेन ह।
समाश्वास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ॥ २९ ॥
मूलम्
तां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणायतेक्षणाम्।
त्वरमाणो मृगव्याधः समभिक्रम्य वेगतः ॥ २७ ॥
मुखतः पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च।
निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ॥ २८ ॥
मोक्षयित्वा स तां व्याधः प्रक्षाल्य सलिलेन ह।
समाश्वास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ॥ २९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस विशाल नयनोंवाली युवतीको अजगरके द्वारा उस प्रकार निगली जाती हुई देख व्याधने बड़ी उतावलीके साथ वेगसे दौड़कर तीखे शस्त्रसे शीघ्र ही उस अजगरका मुख फाड़ दिया। वह अजगर छटपटाकर चेष्टारहित हो गया। मृगोंको मारकर जीविका चलानेवाले उस व्याधने सर्पके टुकड़े-टुकड़े करके दमयन्तीको छुड़ाया। फिर जलसे उसके सर्पग्रस्त शरीरको धोकर उसे आश्वासन दे उसके लिये भोजनकी व्यवस्था कर दी। भारत! जब वह भोजन कर चुकी, तब व्याधने उससे पूछा—॥२७—२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कस्य त्वं मृगशावाक्षि कथं चाभ्यागता वनम्।
कथं चेदं महत् कृच्छ्रं प्राप्तवत्यसि भाविनि ॥ ३० ॥
मूलम्
कस्य त्वं मृगशावाक्षि कथं चाभ्यागता वनम्।
कथं चेदं महत् कृच्छ्रं प्राप्तवत्यसि भाविनि ॥ ३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मृगलोचने! तुम किसकी स्त्री हो और कैसे वनमें चली आयी हो? भामिनि! किस प्रकार तुम्हें यह महान् कष्ट प्राप्त हुआ है?’॥३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दमयन्ती तथा तेन पृच्छ्यमाना विशाम्पते।
सर्वमेतद् यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ॥ ३१ ॥
मूलम्
दमयन्ती तथा तेन पृच्छ्यमाना विशाम्पते।
सर्वमेतद् यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ॥ ३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! व्याधके पूछनेपर दमयन्तीने उसे सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे कह सुनाया॥३१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम् ।
सुकुमारानवद्याङ्गीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ३२ ॥
अरालपक्ष्मनयनां तथा मधुरभाषिणीम् ।
लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥ ३३ ॥
मूलम्
तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम् ।
सुकुमारानवद्याङ्गीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ३२ ॥
अरालपक्ष्मनयनां तथा मधुरभाषिणीम् ।
लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥ ३३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
स्थूल नितम्ब और स्तनोंवाली विदर्भकुमारीने आधे वस्त्रसे ही अपने अंगोंको ढँक रखा था। पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली दमयन्तीका एक-एक अंग सुकुमार एवं निर्दोष था। उसकी आँखें तिरछी बरौनियोंसे सुशोभित थीं और वह बड़े मधुर स्वरमें बोल रही थी। इन सब बातोंकी ओर लक्ष्य करके वह व्याध कामके अधीन हो गया॥३२-३३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तामेवं श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया।
सान्त्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भाविनी ॥ ३४ ॥
मूलम्
तामेवं श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया।
सान्त्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भाविनी ॥ ३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह मधुर एवं कोमल वाणीसे उसे अपने अनुकूल बनानेके लिये भाँति-भाँतिके आश्वासन देने लगा। वह व्याध उस समय कामवेदनासे पीड़ित हो रहा था। सती दमयन्तीने उसके दूषित मनोभावको समझ लिया॥३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता।
तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ॥ ३५ ॥
मूलम्
दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता।
तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पतिव्रता दमयन्ती भी उसकी दुष्टताको समझकर तीव्र क्रोधके वशीभूत हो मानो रोषाग्निसे प्रज्वलित हो उठी॥३५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स तु पापमतिः क्षुद्रः प्रधर्षयितुमातुरः।
दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥ ३६ ॥
मूलम्
स तु पापमतिः क्षुद्रः प्रधर्षयितुमातुरः।
दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यद्यपि वह नीच पापात्मा व्याध उसपर बलात्कार करनेके लिये व्याकुल हो गया था, परंतु दमयन्ती अग्निशिखाकी भाँति उद्दीप्त हो रही थी; अतः उसका स्पर्श करना उसको अत्यन्त दुष्कर प्रतीत हुआ॥३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दमयन्ती तु दुःखार्ता पतिराज्यविनाकृता।
अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषान्विता ॥ ३७ ॥
मूलम्
दमयन्ती तु दुःखार्ता पतिराज्यविनाकृता।
अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषान्विता ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पति तथा राज्य दोनोंसे वंचित होनेके कारण दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही थी। इधर व्याधकी कुचेष्टा वाणीद्वारा रोकनेपर रुक सके, ऐसी प्रतीत नहीं होती थी। तब (उस व्याधपर अत्यन्त रुष्ट हो) उसने उसे शाप दे दिया—॥३७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यद्यहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तये।
तथायं पततां क्षुद्रो परासुर्मृगजीवनः ॥ ३८ ॥
मूलम्
यद्यहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तये।
तथायं पततां क्षुद्रो परासुर्मृगजीवनः ॥ ३८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यदि मैं निषधराज नलके सिवा दूसरे किसी पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती होऊँ, तो इसके प्रभावसे यह तुच्छ व्याध प्राणशून्य होकर गिर पड़े’॥३८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः।
व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥ ३९ ॥
मूलम्
उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः।
व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥ ३९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
दमयन्तीके इतना कहते ही वह व्याध आगसे जले हुए वृक्षकी भाँति प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥३९॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचने त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचनविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥६३॥