सुभाषितानि हिन्दीभाषार्थसहितम्

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[

सुभाषितानि

-हिन्दीभाषार्थसहितम् 201

अल्पानामपि

वस्तूनां

संहतिः

कार्यसाधिका

तॄणैर्गुणत्वमापन्नैर्

बध्यन्ते

मत्तदन्तिनः

छोटी­

छोटी

वस्तूएÐ

एकत्र

करनेसे

बडे

काम

भी

हो

सकते

हैं\।

घास

से

बनायी

हुर्इ

डोरी

से

मत्त

हाथी

बाÐ

धा

जा

सकता

है\।

सुभाषित 202

शैले

शैले

माणिक्यं

मौक्तिकं

गजे

गजे

साधवो

हि

सर्वत्र

चन्दनं

वने

वने

हितोपदेश

हर

एक

पर्वतपर

माणिक

नहीं

होते, ,

हर

एक

हाथी

में

ह्मउसके

गंडस्थलमें )

मोती

नहीं

मिलते \।

साधु

सर्वत्र

नहीं

होते ,

हर

एक

वनमें

चंदन

नहीं

होता \।

ह्म

दुनिया

में

अच्छी

चीजें

बडी

तादात

में

नहीं

मिलती \।
)

सुभाषित 203

एकवर्णं

यथा

दुग्धं

भिन्नवर्णासु

धेनुषु \।

तथैव

धर्मवैचित्र्यं

तत्त्वमेकं

परं

स्मॄतम् //

महाभारत

जिस

प्रकार

विविध

रंग

की

ग}^

एकही

रंग

का

ह्मसफेद)

दूध

देती

है,

उसी

प्रकार

विविध

धर्मपंथ

एकही

तत्त्व

की

सीख

देते

है

सर्वं

परवशं

दुः

खं

सर्वम्

आत्मवशं

सुखम् \।

एतद्

विद्यात्

समासेन

लक्षणं

सुखदुः

खयोः //

जो

चीजें

अपने

अधिकार

में

नही

है

वह

सब

दुः

है

तथा

जो

चीज

अपने

अधिकार

में

है

वह

सब

सुख

है \।

संक्षेप

में

सुख

और

दुः

के

यह

लक्षण

है \।

अलसस्य

कुतो

विद्या

अविद्यस्य

कुतो

धनम् \।

अधनस्य

कुतो

मित्रम्

अमित्रस्य

कुतो

सुखम् //

आलसी

मनुष्य

को

ज्ञान

कैसे

प्राप्त

होगा?

य्दि

ज्ञान

नही

तो

धन

नही

मिलेगा \।

यदि

धन

नही

है

तो

अपना

मित्र

कौन

बनेगा?

और

मित्र

नही

तो

सुख

का

अनुभव

कैसे

मिलेगा

आकाशात्

पतितं

तोयं

यथा

गच्छति

सागरम् \।

सर्वदेवनमस्कारः

केशवं

प्रति

गच्छति //

जिस

प्रकार

आकाश

से

गिरा

जल

विविध

नदीयों

के

माध्यम

से

अंतिमतः

सागर

से

जा

मिलता

है

उसी

प्रकार

सभी

देवताओं

को

किया

हुवा

नमन

एक

ही

परमेश्वर

को

प्राप्त

होता

है \।

नीरक्षीरविवेके

हंस

आलस्यम्

त्वम्

एव

तनुषे

चेत् \।

विश्वस्मिन्

अधुना

अन्यः

कुलव्रतं

पालयिष्यति

कः //

अरे

हंस

यदि

तुम

ही

पानी

तथा

दूध

भिन्न

करना

छोड

दोगे

तो

दूसरा

कौन

तूम्हारा

यह

कुलव्रत

का

पालन

कर

सकता

है?

यदि

बुद्धीवान

तथा

कुशल

मनुष्य

ही

अपना

कर्तव्य

करना

छोड

दे

तो

दूसरा

कौन

वह

काम

कर

सकता

है?

सुभाषित 208

पापं

प्रज्ञा

नाशयति

क्रियमाणं

पुनः

पुनः \।

नष्टप्रज्ञः

पापमेव

नित्यमारभते

नरः //

विदूरनीति

बार

बार

पाप

करनेसे

मनुष्य

की

विवेकबुद्धी

नष्ट

होती

है

और

जिसकी

विवेकबुद्धी

नष्ट

हो

चुकी

हो ,

ऐसी

व्यक्ति

हमेशा

पापही

करती

है \।

सुभाषित 209

पुण्यं

प्रज्ञा

वर्धयति

क्रियमाणं

पुनः

पुनः \।

वॄद्धप्रज्ञः

पुण्यमेव

नित्यमारभते

नरः //

विदूरनीति

बार

बार

पुण्य

करनेसे

मनुष्य

की

विवेकबुद्धी

बढती

है

और

जिसकी

विवेकबुद्धी

हो ,

ऐसी

व्यक्ति

हमेशा

पुण्यही

करती

है \।

सुभाषित 210

अनेकशास्त्रं

बहुवेदितव्यम्

अल्पश्च

कालो

बहवश्च

विघ्नाः

यत्

सारभूतं

तदुपासितव्यं

हंसो

यथा

क्षीरमिवाम्भुमध्यात्

पढने

के

लिए

बहौत

शास्त्र

हैं

और

ज्ञान

अपरिमित

है\।

अपने

पास

समय

की

कमी

है

और

बाधाए

बहौत

है\।

जैसे

हंस

पानीमेसे

दुध

निकाल

लेता

है

उसी

तरह

उन

शास्त्रौंका

सार

समझलेना

चाहिए\।

सुभाषित 211

कलहान्तनि

हम्र्याणि

कुवाक्यानां

सौ)

दम्

कुराजान्तानि

राष्ट्राणि

कुकर्मांन्तम्

यशो

नॄणाम्

झगडोंसे

परिवार

टूट

जाते

है\।

गलत

शब्दप्रयोग

करनेसे

दोस्त

टूटते

है\।

बुरे

शासकोंके

कारण

राष्ट्रका

नाश

होता

है\।

बुरे

काम

करनेसे

यश

दूर

भागता

है\।

दुर्लभं

त्रयमेवैतत्

देवानुग्रहहेतुकम् \।

मनुष्यत्वं

मुमुक्षुत्वं

महापुरूषसश्रयः //

मनुष्य

जन्म,

मुक्ती

की

इच्छा

तथा

महापुरूषोंका

सहवास

यह

तीन

चीजें

परमेश्वर

की

कॄपा

पर

निर्भर

रहते

है \।

सुखार्थी

त्यजते

विद्यां

विद्यार्थी

त्यजते

सुखम् \।

सुखार्थिनः

कुतो

विद्या

कुतो

विद्यार्थिनः

सुखम् //

जो

व्यक्ती

सुख

के

पिछे

भागता

है

उसे

ज्ञान

नही

मिलेगा \।

तथा

जिसे

ज्ञान

प्रप्त

करना

है

वह

व्यक्ती

सुख

का

त्याग

करता

है \।

सुख

के

पिछे

भागनेवाले

को

विद्या

कैसे

प्राप्त

होगी?

तथा

जिसको

विद्या

प्रप्त

करनी

है

उसे

सुख

कैसे

मिलेगा?

सुभाषित

क्र.214

दिवसेनैव

तत्

कुर्याद्

येन

रात्रौ

सुखं

वसेत् \।

यावज्जीवं

तत्कुर्याद्

येन

प्रेत्य

सुखं

वसेत् //

विदूरनीति

दिनभर

ऐसा

काम

करो

जिससे

रातमें

चैनकी

नींद

सके \।

वैसेही

जीवनभर

ऐसा

काम

करो

जिससे

मॄत्यूपश्चात

सुख

मिले

ह्मअर्थात

सद्गती

प्राप्त

हो )

सुभाषित 215

उपार्जितानां

वित्तानां

त्याग

एव

हि

रक्षणम्

तडागोदरसंस्थानां

परीवाह

इवाम्भसाम्

कमाए

हुए

धन

का

त्याग

करनेसे

ही

उसका

रक्षण

होता

है\।

जैसे

तालब

का

पानी

बहते

रहने

सेे

साफ

रहता

है\।

खलः

सर्षपमात्राणि

पराच्छिद्राणि

पश्यति \।

आत्मनो

बिल्वमात्राणि

पश्यन्नपि

पश्यति //

दुष्ट

मनुष्य

को

दुसरे

के

भीतर

के

राइ

र्इतने

भी

दोष

दिखार्इ

देते

है

परन्तू

अपने

अंदर

के

बिल्वपत्र

जैसे

बडे

दोष

नही

दिखार्इ

पडते \।

दानं

भोगो

नाशः

तिस्त्रो

गतयो

भवन्ति

वित्तस्य \।

यो

ददाति

भुङ्क्ते

तस्य

तॄतीया

गतिर्भवति //

धन

खर्च

होने

के

तीन

मार्ग

है \।

दान,

उपभोग

तथा

नाश \।

जो

व्यक्ति

दान

नही

करता

तथा

उसका

उपभोगभी

नही

लेता

उसका

धन

नाश

पाता

है \।

सुभाषित

क्र. 218

यादॄशैः

सन्निविशते

यादॄशांश्चोपसेवते \।

यादॄगिच्छेच्च

भवितुं

तादॄग्भवति

पूरूषः //

मनुष्य ,

जिस

प्रकारके

लोगोंके

साथ

रहता

है ,

जिस

प्रकारके

लोगोंकी

सेवा

करता

है ,

जिनके

जैसा

बनने

की

इच्छा

करता

है ,

वैसा

वह

होता

है \।

सुभाषित 219

गुणी

गुणं

वेत्ति

वेत्ति

निर्गुणो

बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः ।

पिको

वसन्तस्य

गुणं

वायसः

करी च सिंहस्य बलं न मूषकः //

गुणी

पुरुषही

दुसरे

के

गुण

पहचानता

है,

गुणहीन

पुरुष

नही\।

बलवान

पुरुषही

दुसरे

का

बल

जानता

है,

बलहीन

नही\।

वसन्त

ऋतु

आए

तो

उसे

कोयल

पहचानती

है,

कौआ

नही\।

शेर

के

बल

को

हाथी

पहचानता

है,

चुहा

नही\।

सुभाषित 220

गुणवान्

वा

परजनः

स्वजनो

निर्गुणोपि

वा

निर्गुणः

स्वजनः

श्रेयान्

यः

परः

पर

एव

गुणवान

शत्रु

से

भी

गुणहीन

मित्र

अच्छा\।

शत्रु

तो

आखिर

शत्रु

है\।

पदाहतं

सदुत्थाय

मूर्धानमधिरोहति \।

स्वस्थादेवाबमानेपि

देहिनस्वद्वरं

रजः //

जो

पैरोंसे

कुचलने

पर

भी

उपर

उठता

है

ऐसा

मिट्टी

का

कण

अपमान

किए

जाने

पर

भी

चुप

बैठनेवाले

व्यक्ति

से

श्रेष्ठ

है \।

सा

भार्या

या

प्रियं

बू्रते

पुत्रो

यत्र

निवॄतिः \।

तन्मित्रं

यत्र

विश्वासः

देशो

यत्र

जीव्यते //

जो

मिठी

वाणी

में

बोले

वही

अच्छी

पत्नी

है,

जिससे

सुख

तथा

समाधान

प्रााप्त

होता

है

वही

वास्तवीक

में

पुत्र

है,

जिस

पर

हम

बीना

झीझके

संपूर्ण

विश्वास

कर

सकते

है

वही

अपना

सच्चा

मित्र

है

तथा

जहा

पर

हम

काम

करके

अपना

पेट

भर

सकते

है

वही

अपना

देश

है \।

सुभाषित

क्र. 223

जरा

रूपं

हरति,

धैर्यमाशा,

मॄत्युः

प्राणान् ,

धर्मचर्यामसूया \।

क्रोधः

श्रियं ,

शीलमनार्यसेवा ,

ह्रियं

कामः ,

सर्वमेवाभिमानः //

वॄद्धत्वसे

रूपका

हरण

होता

है ,

आशासे

ह्मतॄष्णासे)

धैर्यका ,

मॄत्युसे

प्राणका

हरण

होता

है\।

मत्सरसे

धर्माचरण

का ,

क्रोधसे

सम्पत्तीका

तथा

दुष्टोंकी

सेवा

करनेसे

शील

का

नाश

होता

है\।

कामवासनासे

लज्जा

का

तथा

अभिमानसे

सभी

अच्छी

चीजोंका

अन्त

होता

है \।

विरला

जानन्ति

गुणान्

विरलाः

कुर्वन्ति

निर्धने

स्नेहम् \।

विरलाः

परकार्यरताः

परदुः

खेनापि

दुः

खिता

विरलाः //

दुसरोंके

गुण

पहचाननेवाले

थोडे

ही

है \।

निर्धन

से

नाता

रखनेवाले

भी

थोडे

है \।

दुसरों

के

काम

मे

मग्न

हानेवाले

थोडे

है

तथा

दुसरों

का

दुः

देखकर

दुः

खी

होने

वाले

भी

थोडे

है \।

आरोग्यं

विद्वत्ता

सज्जनमैत्री

महाकुले

जन्म \।

स्वाधीनता

पुंसां

महदैश्वर्यं

विनाप्यर्थेः //

आरोग्य,

विद्वत्ता,

सज्जनोंसे

मैत्री,

श्रेष्ठ

कुल

में

जन्म,

दुसरों

के

उपर

निर्भर

होना

यह

सब

धन

नही

होते

हुए

भी

पुरूषों

का

एैश्वर्य

है \।

सुभाषित 226

कालो

वा

कारणं

राज्ञो

राजा

वा

कालकारणम्

इति

ते

संशयो

मा

भूत्

राजा

कालस्य

कारणं

काल

राजा

का

कारण

है

कि

राजा

काल

काÆ

इसमे

थोडीभी

दुविधा

नही

कि

राजाही

काल

का

कारण

है

सुभाषित 227

आयुषः

क्षण

एकोपि

सर्वरत्नैर्न

लभ्यते \।

नीयते

तद्

वॄथा

येन

प्रामादः

सुमहानहो //

सब

रत्न

देने

पर

भी

जीवन

का

एक

क्षण

भी

वापास

नही

मिलता \।

ऐसे

जीवन

के

क्षण

जो

निर्थक

ही

खर्च

कर

रहे

है

वे

कितनी

बडी

गलती

कर

रहे

है

सुभाषित 228

योजनानां

सहस्रं

तु

शनैर्गच्छेत्

पिपीलिका \।

आगच्छन्

वैनतेयोपि

पदमेकं

गच्छति //

यदि

चिटी

चल

पडी

तो

धीरे

धीरे

वह

एक

हजार

योजनाएं

भी

चल

सकती

है \।

परन्तु

यदि

गरूड

जगह

से

नही

हीला

तो

वह

एक

पग

भी

आगे

नही

बढ

सकता \।

सुभाषित 229

कन्या

वरयते

रुपं

माता

वित्तं

पिता

श्रुतम्

बान्धवाः

कुलमिच्छन्ति

मिष्टान्नमितरेजनाः

विवाह

के

समय

कन्या

सुन्दर

पती

चाहती

है\।

उसकी

माताजी

सधन

जमाइ

चाहती

है\।

उसके

पिताजी

ज्ञानी

जमाइ

चाहते

है\।

तथा

उसके

बन्धु

अच्छे

परिवार

से

नाता

जोडना

चाहते

है\।

परन्तु

बाकी

सभी

लोग

केवल

अच्छा

खाना

चाहते

है\।

सुभाषित 230

अर्था

भवन्ति

गच्छन्ति

लभ्यते

पुनः

पुनः

पुनः

कदापि

नायाति

गतं

तु

नवयौवनम्

घन

मिलता

है,

नष्ट

होता

है\। (

नष्ट

होने

के

बाद)

फिरसे

मिलता

है\।

परन्तु

जवानी

एक

बार

निकल

जाए

तो

कभी

वापस

नही

आती\।

आशा

नाम

मनुष्याणां

काचिदाश्चर्यशॄङखला \।

यया

बद्धाः

प्राधावन्ति

मुक्तास्तिष्ठन्ति

पङ्गुवत् //

आशा

नामक

एक

विचित्र

और

आश्चर्यकारक

शॄंखला

है \।

इससे

जो

बंधे

हुए

है

वो

इधर

उधर

भागते

रहते

है

तथा

इससे

जो

मुक्त

है

वो

पंगु

की

तरह

शांत

चित्त

से

एक

ही

जगह

पर

खडे

रहते

है \।

शास्त्राण्यधीत्यापि

भवन्ति

मूर्खा

यस्तु

क्रियावान्

पुरूषः

विद्वान् \।

सुचिन्तितं

चौषधमातुराणां

नाममात्रेण

करोत्यरोगम् //

शास्त्रों

का

अध्ययन

करने

के

बाद

भी

लोग

मूर्ख

रहते

है \।

परन्तु

जो

कॄतीशील

है

वही

सही

अर्थ

से

विद्वान

है \।

किसी

रोगी

के

प्राती

केवल

अच्छी

भावनासे

निश्चित

किया

गया

औषध

रोगी

को

ठिक

नही

कर

सकता \।

वह

औषध

नियमानुसार

लेनेपर

ही

वह

रोगी

ठिक

हो

सकता

है \।

सुभाषित 233

वॄत्तं

यत्नेन

संरक्ष्येद्

वित्तमेति

याति

च \।

अक्षीणो

वित्ततः

क्षीणो

वॄत्ततस्तु

हतो

हतः //

विदूरनीति

सदाचार

की

मनुष्यने

प्रयन्तपूर्व

रक्षा

करनी

चाहिए ,

वित्त

तो

आता

जाता

रहता

है \।

धनसे

क्षीण

मनुष्य

वस्तुतः

क्षीण

नही ,

बल्कि

सद्वर्तनहीन

मनुष्य

हीन

है \।

सुभाषित 234

परस्य

पीडया

लब्धं

धर्मस्योल्लंघनेन

आत्मावमानसंप्राप्तं

धनं

तत्

सुखाय

वै

महाभारत

दुसरोंको

दुः

देकर ,

धर्मका

उल्लंघन

करकर

या

खुद

का

अपमान

सहकर

मिले

हुए

धन

से

सुख

नही

प्राप्त

होता

जानामि

धर्मं

मे

प्रावॄत्तिः \।

जानाम्यधर्मं

मे

निवॄत्तिः //

दुर्योधन

कहते

है "

ऐसा

नही

की

धर्म

तथा

अधर्म

क्या

है

यह

मैं

नही

जानता

था \।

परन्तू

ऐसा

होने

पर

भी

धर्म

के

मार्ग

पर

चलना

यह

मेरी

प्रावॄत्ती

नही

बन

पायी

और

अधर्म

के

मार्ग

से

मैं

निवॄत्त

भी

नही

हो

सका \।
"

अकॄत्वा

परसन्तापं

अगत्वा

खलसंसदं

अनुत्सॄज्य

सतांवर्तमा

यदल्पमपि

तद्बहु

दूसरोंको

दुः

दिये

बिना;

विकॄती

के

साथ

अपाना

संबंध

बनाए

बिना;

अच्छों

के

साथ

अपने

सम्बंध

तोडे

बिना;

जो

भी

थोडा

कुछ

हम

धर्म

के

मार्ग

पर

चलेंगे

उतना

पर्याप्त

है \।

सुभाषित 237

परोपदेशे

पांडित्यं

सर्वेषां

सुकरं

नॄणाम्

धर्मे

स्वीयमनुष्ठानं

कस्यचित्

सुमहात्मनः

दूसरोंको

उपदेश

देकर

अपना

पांडित्य

दिखाना

बहौत

सरल

है\।

परन्तु

केवल

महान

व्यक्तिही

उसतरह

से (

धर्मानुसार)

अपना

बर्ताव

रख

सकता

है\।

सुभषित 238

अमित्रो

विमोक्तव्यः

कॄपणं

व*

णपि

ब्राुवन्

कॄपा

तस्मिन्

कर्तव्या

हन्यादेवापकारिणाम्

शत्रु

अगर

क्षमायाचना

करे,

तो

भी

उसे

क्षमा

नही

करनी

चाहिये\।

वह

अपने

जीवित

को

हानि

पहुचा

सकता

है

यह

सोचके

उसको

समाप्त

करना

चाहिये\।

सुभषित 239

नेह

चात्यन्तसंवासः

कर्हिचित्

केनचित्

सह \।

राजन्

स्वेनापि

देहेन

किमु

जायात्मजादिभिः //

श्रीमद्भागवत

हे राजा ह्मधॄतराष्ट)्र इस जगत में कभीभी , किसीका किसीसे चिरंतन संबंध नहीं होता ।

अपना

खुदके

देहसे

तक

नहीं ,

तो

पत्नी

और

पुत्र

की

बात

तो

दूर //

इंद्रियाणि

पराण्याहुः

इंद्रियेभ्यः

परं

मनः \।

मनसस्तु

परा

बुद्धिः

यो

बुद्धेः

परतस्तु

सः //

गीता 3\।42

इंद्रियों

के

परे

मन

है

मन

के

परे

बुद्धि

है

और

बुद्धि

के

भी

परे

आत्मा

है \।

सुभाषित 241

वहेदमित्रं

स्कन्धेन

यावत्कालविपर्ययः

अथैवमागते

काले

भिन्द्याद्

घटमिवाश्मनि

जब

काल

विपरीत

हो,

तब

शत्रुको

भी

कन्धोंपे

उठाना

चाहिये\।

अनुकूल

काल

आनेपर

उसे

जैसे

घट

पथर

पे

फोड

जाता

है,

वैसे

नष्ट

करना

चाहिये\।

सुभाषित 242

उष्ट्राणां

विवाहेषु

गीतं

गायन्ति

गर्दभाः

परस्परं

प्रशंसन्ति

अहो

रुपमहो

ध्वनिः

उंटोके

विवाहमे

गधे

गाना

गा

रहे

हैं\।

दोनो

एक

दूसरेकी

प्रशंसा

कर

रहे

हैं

वाह

क्या

रुप

है (

उंट

का),

वाह

क्या

आवाज

है (

गधेकी)\।

वास्तव

मे

देखा

जाए

तो

उंटों

मे

सौंदर्य

के

कोई

लक्षण

नही

होते,

की

गधोंमे

अच्छी

आवाजके\।

परन्तु

कुछ

लोगोंने

कभी

उत्तम

क्या

है

यही

देखा

नही

होता\।

ऐसे

लोग

इस

तरह

से

जो

प्रशंसा

करने

योग्य

नही

है,

उसकी

प्रशंसा

करते

हैं

आपूर्यमाणमचलप्रातिष्ठं

समुद्रमापः

प्राविशन्ति

यद्वत् \।

तद्वत्

कामा

यं

प्राविशन्ति

सर्वे

शान्तिमाप्नोति

कामकामी //

गीता 2\।70

जो

व्यक्ती

समय

समय

पर

मन

में

उत्पन्न

हुइ

आशाओं

से

अविचलित

रहता

हैर्

जैसे

अनेक

नदीयां

सागर

में

मिलने

पर

भी

सागर

का

जल

नही

बढता,

वह

शांत

ही

रहता

हैर्

ऐसे

ही

व्यक्ती

सुखी

हो

सकते

है \।

मैत्री

करूणा

मुदितोपेक्षाणां\।

सुख

दुः

पुण्यापुण्य

विषयाणां\।

भावनातश्चित्तप्रासादनम्\।

पातञ्जल

योग 1\।33

आनंदमयता,

दूसरे

का

दुः

देखकर

मन

में

करूणा,

दूसरे

का

पुण्य

तथा

अच्छे

कर्म

समाज

सेवा

आदि

देखकर

आनंद

का

भाव,

तथा

किसी

ने

पाप

कर्म

किया

तो

मन

में

उपेक्षा

का

भाव '

किया

होगा

छोडो'

आदि

प्रातिक्रियाएँ

उत्पन्न

होनी

चाहिए\।

सुभाषित

क्र. 245

प्रहॄष्यति

सन्माने

नापमाने

कुप्यति \।

क्रुद्धः

परूषं

ब्रूयात्

वै

साधूत्तमः

स्मॄतः //

मनुस्मॄति

जो

सम्मान

से

गर्वित

नहीं

होते ,

अपमान

से

क्रोधित

नहीं

होते

क्रोधित

होकर

भी

जो

कठोर

नहीं

बोलते,

वे

ही

श्रेष्ठ

साधु

है \।

हर्षस्थान

सहस्राणि

भयस्थान

शतानि

च \।

दिवसे

दिवसे

मूढं

आविशन्ति

पंडितम् //

मूर्ख

मनुष्य

के

लिए

प्राति

दिन

हर्ष

के

सौ

कारण

होते

है

तथा

दुः

के

लिए

सहस्र

कारण\।

परन्तु

पंडितों

के

मन

का

संतुलन

ऐसे

छोटे

कारणों

से

नही

बिगडता\।

एका

केवलमर्थसाधनविधौ

सेना

शतेभ्योधिका

नन्दोन्मूलन

दॄष्टवीर्यमहिमा

बुद्धिस्तु

मा

गान्मम //

Background: Chanakya has uttered the above sentences. After Chanakya and Chandragupta established the ‘Maurya’ dynasty kingdom (defeating the Nand dynasty king), there were some difference of opinions between Chanakya and other ministers of the Kingdom.

जिन्हे

छोडकर

जाना

था

वे

चले

गए\।

जो

छोड

कर

जाना

चाहते

है

वे

भी

चले

जाए

कोइ

चिंता

की

बात

नही\।

परन्तू

इप्सित

प्रााप्त

करने

में

जो

सैंकडो

सेनाओं

से

भी

अधिक

बलवान

है

और

नन्द

साम्राज्य

के

निर्मूलन

के

कार्य

में

जिसके

प्राताप

को

दुनीया

ने

देखा

है

वह

केवल

मेरी

बुद्धि

मुझे

छोडकर

जाए\।

सुभाषित

क्र. 248

दीर्घा

वै

जाग्रतो

रात्रिः

दीर्घं

श्रान्तस्य

योजनम् \।

दीर्घो

बालानां

संसारः

सद्धर्मम्

अविजानताम् //

रातभर

जागनेवाले

को

रात

बहुत

लंबी

मालूम

होती

है \।

जो

चलकर

थका

है, ,

उसे

एक

योजन

ह्मचार

मील )

अंतर

भी

दूर

लगता

है \।

सद्धर्म

का

जिन्हे

ज्ञान

नही

है

उन्हे

जिन्दगी

दीर्घ

लगती

है \।

सुभाषित

क्र. 249

देहीति

वचनद्वारा

देहस्था

पञ्च

देवताः \।

तत्क्षणादेव

लीयन्ते

र्धीह्र्रीश्र्रीकान्र्तिकीर्तयः //

दे’

इस

शब्द

के

साथ ,

याचना

करने

से

देहमें

स्थित

पांच

देवता

बुद्धी, , लज्जा , लक्ष्मी , कान्ति , और कीर्ति उसी क्षण देह छोडकर जाती है ।

सुभषित 250

यद्यत्

परवशं

कर्मं

तत्

तद्

यत्नेन

वर्जयेत्

यद्यदात्मवशं

तु

स्यात्

तत्

तत्

सेवेत

यत्नतः

जिस

काम

मै

दुसरोंका

सहाय्य

लेना

पडे,

ऐसे

काम

को

टालो\। (

परन्तु)

जिसमे

दुसरोंका

सहाय्य

लेना

पडे,

ऐसे

काम

शीघ्रातासे

पुरे

करो\।

सुभाषित 251

सर्वं

परवशं

दुः

खं

सर्वमात्मवशं

सुखम्

एतद्विद्यात्

समासेन

लक्षणं

सुखदुः

खयोः

दुसरोंपे

निर्भर

रहना

सर्वथा

दुखका

कारण

होता

है\।

आत्मनिर्भर

होना

सर्वथा

सुखका

कारण

होता

है\।

सारांश,

सुख–

दुः

के

ये

कारण

ध्यान

मे

रखें\।

यस्य

भार्या

गॄहे

नास्ति

साध्वी

प्रिायवादिनी \।

अरण्यं

तेन

गन्तव्यं

यथाऽरण्यं

तथा

गॄहम् //

जिस

घर

में

गॄहिणी

साध्वी

प्रावॄत्ती

की

हो

तथा

मॄदु

भाषी

हो

ऐसे

घर

के

गॄहस्त

ने

घर

छोड

कर

वन

में

जाना

चाहिए

क्यों

की

उसके

घर

में

तथा

वन

में

कोइ

अंतर

नही

है!

अकॄत्यं

नैव

कर्तव्य

प्रााणत्यागेऽपि

संस्थिते \।

कॄत्यं

परित्याज्यम्

एष

धर्मः

सनातनः //

जो

कार्य

करने

योग्य

नही

है

इअच्छा

होने

के

कारणउ

वह

प्रााण

देकर

भी

नही

करना

चाहिए \।

तथा

जो

काम

करना

है

इअपना

कर्तव्य

होने

के

कारणउ

वह

काम

प्रााण

देना

पडे

तो

भी

करना

नही

छोडना

चाहिए \।

सुभाषित 254

ध्यायतो

विषयान्

पुंसः

संगस्तेषूपजायते \।

संगात्

संजायते

कामः

कामात्

क्रोधोऽभिजायते //

भगवद्गीता 2\।62

विषयों

का

ध्यान

करने

से

उनके

प्रति

आसक्ति

हो

जाती

है

यह

आसक्ति

ही

कामना

को

जम््म देती

है

और

कामना

ही

क्रोध

को

जम््म देती

है \।

सुभाषित 254

नात्यन्त

गुणवत्

किंचित्

चाप्यत्यन्तनिर्गुणम्

उभयं

सर्वकार्येषु

दॄष्यते

साध्वसाधु

वा

ऐसा

कोई

भी

कार्य

नही

है

जो

सर्वथा

अच्छा

है\।

ऐसा

कोई

भी

कार्य

नही

जो

सर्वथा

बुरा

है\।

अच्छे

और

बुरे

गुण

हर

एक

कार्य

मै

होते

ही

है\।

एकतः

क्रतवः

सर्वे

सहस्त्रवरदक्षिणा \।

अन्यतो

रोगभीतानां

प्रााणिनां

प्रााणरक्षणम् //

महाभारत

एक

ओर

विधीपूर्वक

सब

को

अच्छी

दक्षिणा

दे

कर

किया

गया

यज्ञ

कर्म

तथा

दूसरी

ओर

दुः

खी

और

रोग

से

पिडीत

मनुष्य

की

सेवा

करना

यह

दोनों

भी

कर्म

उतने

ही

पुण्यप्राद

है \।

मातॄवत्परदारेषु

परद्रव्येषु

लोष्टवत् \।

आत्मवत्सर्वभूतेषु

यः

पश्यति

पश्यति //

जो

व्यक्ति

धार्मिक

प्रावॄत्ती

का

है

वो

परस्त्री

को

माते

समान

परद्रव्य

को

माटी

समान

तथा

अन्य

सभी

प्रााणिमात्रोंको

स्वयं

के

समान

मानता

है \।

यही

धर्म

के

सही

लक्षण

है \।

सुभाषित 257

यः

स्वभावो

हि

यस्यास्ति

नित्यं

दुरतिक्रमः

श्वा

यदि

क्रियते

राजा

तत्

किं

नाश्नात्युपानहम्

जिसक

जो

स्वभाव

होता

है,

वह

हमेशा

वैसाही

रहता

है\।

कुत्तेको

अगर

राजा

भी

बनाया

जाए,

तो

वह

अपनी

जूतें

चबानेकी

आदत

नही

भूलता\।

सुभाषित 258

नात्युच्चशिखरो

मेरुर्नातिनीचं

रसातलम्

व्यवसायद्वितीयानां

नात्यपारो

महोदधिः

जो

मनुष्य

उद्योग

का

सहाय्य

लेता

है (

अपने

स्वयं

के

प्रयत्नोंपे

निर्भर

होता

है),

उसको

पर्बत

की

चोटी

उंची

नही,

पॄथ्वी

का

तल

नीचा

नही,

और

महासागर

अनुल्लंघ्य

नही

सुभाषित 259

दूर्जनः

परिहर्तव्यो

विद्ययाऽलङ्कॄतोऽपि

सन् \।

मणिना

भूषितः

सर्पः

किमसौ

भयङ्करः //

दूर्जन ,

चाहे

वह

विद्यासे

विभूषित

क्यू

हो ,

उसे

दूर

रखना

चाहिए \।

मणि

से

आभूषित

संाँप,

क्या

भयानक

नहीं

होता

सुभाषित 260

सुखमापतितं

सेव्यं

दुः

खमापतितं

तथा \।

चक्रवत्

परिवर्तन्ते

दुः

खानि

सुखानि

च //

र् महाभारत

जीवन

में

आनेवाले

सुख

का

आनंद

ले, ,

तथा

दुः

का

भी

स्वीकार

करें \।

सुख

और

दुः

तो

एक

के

बाद

एक

चक्रवत

आते

रहते

है //

अज्ञेभ्यो

ग्रन्थिनः

श्रेष्ठाः

ग्रन्थिभ्यो

धारिणो

वराः \।

धारिभ्यो

ज्ञानिनः

श्रेष्ठाः

ज्ञानिभ्यो

व्यसायिनः //

निरक्षर

लोगोंसे

ग्रंथ

पढनेवाले

श्रेष्ठ \।

उनसे

भी

अधिक

ग्रंथ

समझनेवाले

श्रेष्ठ \।

ग्रंथ

समझनेवालोंसे

भी

अधिक

आत्मज्ञानी

श्रेष्ठ

तथा

उनसे

भी

अधिक

ग्रंथ

से

प्रााप्त

ज्ञान

को

उपयोग

में

लानेवाले

श्रेष्ठ \।

उभाभ्यामेव

पक्षाभ्यां

शथा

खे

पक्षिणां

गतिः \।

तथैव

ज्ञानकर्मभ्यां

जायते

परमं

पदम् //

योगवा\। 1\।1\।7

जिस

तरह

दो

पंखो

के

आधार

से

पक्षी

आकाश

में

उंचा

उड

सकता

है

उसी

तरह

ज्ञान

तथा

कर्म

से

मनुष्य

परब्रह्म

को

प्रााप्त

कर

सकता

है \।

सुभाषित 263

मनसा

चिन्तितंकर्मं

वचसा

प्रकाशयेत् \।

अन्यलक्षितकार्यस्य

यतः

सिद्धिर्न

जायते //

मनमे

की

हुई

कार्य

की

योजना

दुसरों

को

बताये \।

दूसरें

को

उसकी

जानकारी

होने

से

कार्य

सफल

नही

होता \।

गतेर्भंगः

स्वरो

हीनो

गात्रे

स्वेदो

महद्भयम् \।

मरणे

यानि

चि*

नानि

तानि

चि*

नानि

याचके //

चलते

समय

संतुलन

खोना,

बोलते

समय

आवाज

निकलना,

पसीना

छूटना

और

बहुत

भयभीत

होना

यह

मरनेवाले

आदमी

के

लक्षण

याचक

के

पास

भी

दिखते

है \।

शुश्रूषा

श्रवणं

चैव

ग्रहणं

धारणं

तथा \।

उहापोहोर्थ

विज्ञानं

तत्वज्ञानं

धीगुणाः //

श्रवण

करने

की

इच्छा,

प्रात्यक्ष

में

श्रवण

करना,

ग्रहण

करना,

स्मरण

में

रखना,

तर्र्र्कवितर्क,

सिद्धान्त

निश्चय,

अर्थज्ञान

तथा

तत्वज्ञान

ये

बुद्धी

के

आठ

अंग

है \।

द्वयक्षरस्

तु

भवेत्

मॄत्युर् ,

त्रयक्षरमं

ब्रा*

शाश्वतम् \।
'

मम’

इति

भवेत्

मॄत्युर, '

नमम'

इति

शाश्वतम् //

महाभारत

शांतिपर्व

मॄत्यु

यह

दो

अक्षरों

का

शब्द

है

तथा

ब्रा*

जो

शाश्वत

है

वह

तीन

अक्षरोंका

है \।
'

मम'

यह

भी

मॄत्यु

के

समानही

दो

अक्षरोंका

शब्द

है

तथा '

नमम'

यह

शाश्वत

ब्रा*

की

तरह

तीन

अक्षरोंका

शब्द

है \।

सुभाषित 267

रविरपि

दहति

तादॄग्

यादॄक्

संदहति

वालुकानिकरः

अन्यस्माल्लब्धपदो

नीचः

प्रायेण

दुः

सहो

भवति

सुर्यप्रकाश

से

भी

तपे

हुए

रेत

का

दाह

अधिक

होता

है\। (

उसी

तरह)

दुसरों

के

सहाय्य

से

बडा

हुआ

नीच

मनुष्य

जादा

उपद्रव

देता

है\।

सुभाषित 268

क्वचिद्भूमौ

शय्या

क्वचिदपि

पर्यङ्कशयनं

क्वचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः

क्वचित्कन्थाधारी

क्वचिदपि

दिव्याम्बरधरो

मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्

कभी

धरतीपे

सोना

कभी

पलंगपे\।

कभी

सब्जी

खाना

कभी

रोटी–

चावल\।

कभी

फटे

हुए

कपडे

पहनना

कभी

बहौत

कीमती

कपडे

पहनना\।

जो

व्यक्ति

अपने

कार्यमे

सर्वथा

मग्न

हो,

उन्हे

ऐसी

बाहरी

सुखदुः

खोसे

कोई

मतलब

नही

होता\।

सुभाषित 269

रामो

राजमणिः

सदा

विजयते

रामं

रमेशं

भजे

रामेणाभिहता

निशाचरचमू

रामाय

तस्मै

नमः

रामान्नास्ति

परायणं

परतरं

रामस्य

दासोस्म्यहम्

रामे

चित्तलयः

सदा

भवतु

मे

भो

राम

मामुद्धर //

रामरक्षा स्तोत्र

राजशिरोमणि,,,,,,,, ,

सदा

विजयी

होनेवाले

रमापति

राम

की

मै

प्रार्थना

करता

हूँ \।

राक्षसों का निःपात करनेवाले राम को नमस्कार ।

राम के अलावा कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण नही , मै राम का दास हूँ ।

मेरा चित्त राममें लीन है , हे राम , मेरा उद्धार करो //

बुधकौशिक ऋषी विरचित रामरक्षास्तोत्र मे यह श्लोक है ।

इस

श्लोक

की

विशेषता

ये

है

कि ,

राम

शब्द

की

सभी

आठ

विभक्तियों

का

इसमें

प्रयोग

किया

है \।

सुभाषित 270

मनोजवं

मारूततुल्यवेगं

जितेन्द्रियं

बुद्धिमतां

वरिष्ठम् \।

वातात्मजं

वानरयूथमुख्यं

श्रीरामदूतं

शरणं

प्रपद्ये //

रामरक्षा स्तोत्र

रामरक्षामें

से

और

एक

श्लोक\।

मन

और

वायु

के

समान

गतिमान ,

इन्द्र्र्र्रियों

को

जितने

वाले

जितेन्द्र्रिय ,

बुद्धिमानांे

में

वरिष्ठ ,

वानरों

के

मुख्य

तथा

श्रीराम

के

दूत

अर्थात् ,

हनुमान

को

मै

शरण

जाता

ह^

ूंं \।

आचाराल्लभते

ह्मयुः

आचारादीप्सिताः

प्राजाः \।

आचाराद्धनमक्षय्यम्

आचारो

हन्त्यलक्षणम् //

मनु\।4\।156

अच्छे

व्यवहार

से

दीर्घ

आयु,

श्रेष्ठ

सन्तती,

चिर

समॄद्धी

प्रााप्त

होती

है

तथा

अपने

दोषोंका

भी

नाष

होता

है \।

शोचन्ति

जामयो

यत्र

विनश्यत्याशु

तत्कुलम् \।

यत्रैतास्तु

शोचन्ति

ह्मप्रासीदन्ति)

वर्धते

तद्धि

सर्वदा //

मनु\। 3\।57

जिस

परिवार

में

स्त्री

ह्ममाता,

पत्नी,

बहन,

पुत्री)

दुः

खी

रहती

है

उस

परिवार

का

नाश

होता

है

तथा

जिस

परिवार

में

वो

सुखी

रहती

है

वह

परिवार

समॄद्ध

रहता

है \।

सुभाषित 273

अप्रकटीकॄतशक्तिः

शक्तोपि

जनस्तिरस्क्रियां

लभते

निवसन्नन्तर्दारुणि

लङ्घ्यो

व*

िनर्न

तु

ज्वलितः

बलवान

पुरुष

का

बल

जब

तक

वह

नही

दिखाता

है,

उसके

बलकी

उपेक्षा

होती

है\।

लकडी

से

कोई

नही

डरता,

मगर

वही

लकडी

जब

जलने

लगती

है,

तब

लोग

उससे

डरते

है\।

सुभाषित 274

विक्लवो

वीर्यहीनो

यः

दैवमनुवर्तते

वीराः

संभावितात्मानो

दैवं

पर्युपासते

जिसे

अपने

आप

पे

भरोसा

नही

है

ऐसा

बलहीन

पुरुष

नसीब

के

भरोसे

रहता

है\।

बलशाली

और

स्वाभिमानी

पुरुष

नसीब

का

खयाल

नहीं

करता\।

यथा

वायुं

समाश्रित्य

वर्तन्ते

सर्वजन्तवः \।

तथा

गॄहस्थमाश्रित्य

वर्तन्ते

सर्व

आश्रमाः //

मनु\। 3\।77

जिस

प्राकार

इस

जगत

में

सभी

का

जीवन

वायू

पर

निर्भर

है

उसी

प्राकार

मनुष्य

जीवन

के

सभी

आश्रम

गॄहस्ताश्रम

पर

निर्भर

है \।

नारीकेलसमाकारा _

श्यन्तेपि

हि

सज्ज्नाः \।

अन्ये

बदरिकाकाश

बहिरेव

मनोहरः //

सज्ज्न

लोग

नारियल

के

समान

होते

हैर्

परन्तू

दुर्जन

लोग

बेर

के

समान

होते

हैर्

केवल

बाहर

से

मनोहर

दिखते

है

पर

अन्दर

से

तो

यातनात्मक

कठोर

होते

है \।

सुभाषित 277

वॄत्तं

यत्नेन

संरक्षेद्

वित्तमायाति

याति

अक्षीणो

वित्ततः

क्षीणो

वॄत्ततस्तु

हतो

हतः

मनुष्य

ने

अपने

शीलका

संरक्षण

प्रयत्नपुर्वक

करना

चाहिये (

उसके

धनका

नही)\।

धन

कमाया

जा

सकता

है

और

गमाया

भी

जा

सकता

है\।

धनवान

परन्तु

शीलहीन

मनुष्य

मॄत

के

समान

है\।

सुभाषित 278

तर्काे

प्रतिष्ठः

श्रुतयो

विभिन्ना

नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्

धर्मस्य

तत्त्वं

निहितं

गुहायां

महाजनो येन गतः स पन्थाः

तर्क

बहौत

चंचल

होता

है\।

हर

श्रुति

अलग

आज्ञा

देती

है\।

हर

ऋषी

का

मत

भिन्न

होता

है,

और

कोइ

भी

एक

ऋषी

दुसरेसे

जादा

योग्य

नही

कह

सकते\। (

ऐसेमे)

महान

व्यक्ती

जिस

पन्थ

पे

चलते

है,

वही

सही

रास्ता

है\।

सुभाषित 279

सुखं

शेते

सत्यवक्ता

सुखं

शेते

मितव्ययी \।

हितभुक्

मितभुक्

चैव

तथैव

विजितेन्द्रियः //

चरक

सत्य

बोलनेवाला ,

मर्यादित

खर्चा

करनेवाला ,

हितकारक

पदार्थ

जरूरी

प्रमाण

मे

खानेवाला ,

तथा

जिसने

इन्द्रियोंपर

विजय

पाया

है ,

वह

चैन

की

नींद

सोता

है \।

परित्यजेदर्थकामौ

यौ

स्यातां

धर्मवर्जितौ \।

धर्मं

चाप्यसुखोदर्कं

लोकनिकॄष्टमेव

च //

मनु

जो

संपत्ती

तथा

मन

की

अभिलाषा

धर्म

के

विपरित

है

उसका

त्याग

करना

चाहिए \।

इतना

ही

नही

तो

उस

धर्म

का

भी

त्याग

करना

अनुचित

नही

होगा

जो

धर्म

भविष्य

में

संकट

उत्पन्न

कर

सकता

है

तथा

जो

किसी

समाज

के

प्राति

प्रातिकुल

सिद्ध

हो

सकता

है \।

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता

नान्यकार्येषु

लालसाः \।

वाग्यताः

शुचयश्चैव

श्रोतारः

पुण्यशालिनः //

योग्य

श्रोता

वही

है

जिन

के

पास

श्रद्धा

तथा

भक्ति

है,

जिनका

हेतू

केवल

ज्ञान

प्रााप्त

करना

है

और

कुछ

भी

नही,

तथा

जिनका

अपने

वाणी

पर

नियंत्रण

है

और

जो

मन

से

शुद्ध

है \।

सुभाषित 282

भेदे

गणाः

विनश्येयुः

भिन्नास्तु

सुजयाः

परैः

तस्मात्

संघातयोगेन

प्रयतेरन्

गणाः

सदा

गणराज्यमे

अगर

एकता

हो

तो

वह

नष्ट

हो

जाता

है,

क्योंकी

एकता

होने

पर

शत्रु

को

उसे

नष्ट

करने

मे

आसानी

होती

है\।

इसिलिए

गणराज्य

हमेशा

एक

रहना

चाहिये\।

सुभषित 283

परवाच्येषु

निपुणः

सर्वो

भवति

सर्वदा

आत्मवाच्यं

जानीते

जानन्नपि

मुह्मति

हर

एक

मनुष्य

दुसरेके

दोष

दिखानेमे

प्रविण

होता

है\।

अपने

खुदके

दोष

या

तो

उसे

नजर

नही

आते,

या

फिर

वह

उस

दोषोंको

अनदेखी

करता

है\।

सुभषित 284

गौरवं

प्राप्यते

दानात्

तु

वित्तस्य

संचयात् \।

स्थितिः

उच्चैः

पयोदानां

पयोधीनां

अधः

स्थितिः //

दानसे

गौरव

प्राप्त

होता

है ,

वित्तके

संचयसे

नहीं \।

जल

देनेवाले

बादलोंका

स्थान

उच्च

है ,

बल्कि

जलका

समुच्चय

करनेवाले

सागर

का

स्थान

नीचे

है \।

सुभषित 285

भूतपूर्व

कदापि

वार्ता

हेम्नः

कुरङ्गः

कदापि

दॄष्टः \।

तथापि

तॄष्णा

रघुनन्दनस्य

विनाशकाले

विपरीतबुद्धिः //

पहले

कभी

सुवर्णमॄग

के

बारे

में

सुना ,

कभी

देखा

फिरभी

रघुनन्दन

राम

को

लोभ

हुआ \।

सचमुच ,

विनाशकाले

विपरीतबुदधी \।

नारून्तुदः

स्यादार्तोपि

परद्रोहकर्मधीः \।

ययास्योद्विजते

वाचा

नालोक्यां

तामुदीरयेत् //

विदूरनीति

दूसरोंसे

दुः

मिलने

पर

भी

वह

शांत

रहे ,

विचार

से

या

कॄती

से

भी

वह

दूसरों

को

दुः

दे ,

उस

के

मुख

से

ऐसी

वाणी

निकले

जिससे

दूसरे

दुः

खी

हो ,

सारांश

में

वह

ऐसा

कोइ

काम

करे

जिससे

की

वो

स्वर्ग

से

वंचित

हो \।

कर्पूरधूलिरचितालवालः

कस्तूरिकापंकनिमग्ननालः,

गंगाजलैः

सिक्तसमूलवालः

स्वीयं

गुणं

मुञ्चति

किं

पलाण्डुः

प्याज

के

पौधेके

लिए

आप

कपूरकी

क्यारी

बनाओे,

कस्तूरिका

उपयोग

मि+

की

जगह

करो,

अथवा

उसके

जडपे

गंगाजल

डालो

वह

अपनी

दुर्गंध

नही

छोडेगा \।

मनुष्य

का

स्वभाव

बदलना

बहुत

कठिन

है \।

सुभाषित 287

जलबिन्दुनिपातेन

क्रमशः

पूर्यते

घटः

हेतुः

सर्वविद्यानां

धर्मस्य

धनस्य

जिस

तरह

बुन्द

बुन्द

पानीसे

घडा

भर

जातहै,

उसी

तरह

विद्या,

धर्म,

और

धन

का

संचय

होत

है\।

सारांश,

छोटे

मात्रा

मे

होने

पर

भी

इन

तिनोंपे

दुर्लक्ष

नही

करना

चाहिये\।

सुभाषित 288

सेवकः

स्वामिनं

द्वेष्टि

कॄपणं

परुषाक्षरम्

आत्मानं

किं

द्वेष्टि

सेव्यासेव्यं

वेत्ति

यः

अगर

मालिक

कंजुस

हो,

और

कठोर

बोलने

वाला

हो,

तो

सेवक

उसका

द्वेश

करता

है\।

किसकी

सेवा

करनी

चाहिये

किसकी

नही

ये

जिसे

नही

समझता,

वह

अपने

आप

का

द्वेश

क्यों

नही

करताÆ

खुदको

जो

कष्ट

होते

है

उसके

लिए

बाह्म

कारण

ढुंडना

यह

मनुष्य

स्वभाव

है\।

अपने

उपर

आने

वाले

आपत्ति

का

कारण

जादातर

अपने

आपमेही

ढुंढा

जा

सकता

है\।

सुभाषित 289

ऐक्यं

बलं

समाजस्य

तदभावे

दुर्बलः

तस्मात

ऐक्यं

प्रशंसन्ति

दॄढं

राष्ट्र

हितैषिणः

एकता

समाजका

बल

है ,

एकताहीन

समाज

दुर्बल

है\।

इसलिए ,

राष्ट्रहित

सोचनेवाले

एकता

को

बढावा

देते

है \।

सुभाषित 290

का

त्वं

बाले

कान्चनमाला

कस्याः

पुत्री

कनकलतायाः //

हस्ते

किं

ते

तालीपत्रं

का

वा

रेखा

घ //

बाला ,

तुम

कौन

हो

कान्चनमाला

किनकी

पुत्री?

कनकलताकी

हाथ

में

क्या

है?

तालीपत्र

क्या

लिखा

है?

अप्यब्धिपानान्महतः

सुमेरून्मूलनादपि \।

अपि

वहन्यशनात्

साधो

विषमश्चित्तनिग्रहः //

अपने

स्वयं

के

मन

का

स्वामी

होना

यह

संपूर्ण

सागर

के

जल

को

पिना,

मेरू

पर्वत

को

उखाडना

या

फिर

अग्नी

को

खाना

ऐसे

असंभव

बातों

से

भी

कठिन

है \।

अधीत्य

चतुरो

वेदान्

सर्वशास्त्राण्यनेकशः \।

ब्रम्ह्मतत्वं

जानाति

दर्वी

सूपरसं

यथा //

सिर्फ

वेद

तथा

शास्त्रों

का

बार

बार

अध्ययन

करनेसे

किसी

को

ब्राह्मतत्व

का

अर्थ

नही

होता \।

जैसे

जिस

चमच

से

खाद्य

पदार्थ

परोसा

जाता

है

उसे

उस

खाद्य

पदार्थ

का

गुण

तथा

सुगंध

प्रााप्त

नही

होता \।

यस्य

चित्तं

निर्विषयं )

दयं

यस्य

शीतलम् \।

तस्य

मित्रं

जगत्सर्वं

तस्य

मुक्तिः

करस्थिता \।

जिस

का

मन

इंद्रियोंके

वश

में

नही

ह,

जिस

का )

दय

शांत

है,

संपूर्ण

विश्व

जिस

का

मित्र

है

ऐसे

मनुष्य

को

मुक्ति

सहजता

से

प्रााप्त

होती

है \।

सुभाषित 294

अज्ञान

तिमिरांधस्य

ज्ञानांजन

शलाकया

चक्षुरुन्मिलितं

येन

तस्मै

श्री

गुरवे

नमः

अज्ञान

के

अंधः

कारसे

अन्धे

हुए

मनुष्यकी

आंखे

ज्ञानरुप

अंजनसे

खोलनेवाले

गुरुको

मेरा

प्रणाम\।

सुभाषित 295

क्षमा

शस्त्रं

करे

यस्य

दुर्जनः

किं

करिष्यति \।

अतॄणे

पतितो

वन्हिः

स्वयमेवोपशाम्यति //

क्षमारूपी

शस्त्र

जिसके

हाथ

में

हो ,

उसे

दुर्जन

क्या

कर

सकता

है?

अग्नि ,

जब

किसी

जगह

पर

गिरता

है

जहाँ

घास

हो ,

अपने

आप

बुझ

जाता

है \।

सुभाषित 296

ग्रन्थानभ्यस्य

मेघावी

ज्ञान

विज्ञानतत्परः \।

पलालमिव

धान्यार्थी

त्यजेत्

सर्वमशेषतः //

बुद्धीमान

मनुष्य

जिसे

ज्ञान

प्रााप्त

करने

की

तीव्र

इच्छा

है

वह

ग्रन्थो

में

जो

महत्वपूर्ण

विषय

है

उसे

पढकर

उस

ग्रन्थका

सार

जान

लेता

है

तथा

उस

ग्रन्थ

के

अनावष्यक

बातों

को

छोड

देता

है

उसी

तरह

जैसे

किसान

केवल

धान्य

उठाता

है \।

सुभाषित 297

असूयैकपदं

मॄत्युः

अतिवादः

श्रियो

वधः \।

अशुश्रूषा

त्वरा

श्लाघा

विद्यायाः

शत्रवस्त्रयः //

विद्यार्थी

के

संबंध

में

द्वेश

यह

मॄत्यु

के

समान

है \।

अनावश्यक

बाते

करने

से

धन

का

नाश

होता

है \।

सेवा

करने

की

मनोवॄत्ती

का

आभाव,

जल्दबाजी

तथा

स्वयं

की

प्राशंसा

स्वयं

करना

यह

तीन

बाते

विद्या

ग्रहण

करने

के

शत्रू

है \।

सुभाषित 298

नालसाः

प्राप्नुवन्त्यर्थान

शठा

मायिनः

लोकरवाद्भीता

शश्वत्प्रतीक्षिणः

आलसी

मनुष्य

कभीभी

धन

नही

कमा

सकता (

वह

अपने

जीवनमे

सफल

नही

हो

सकता)\।

दुसरों

की

बुराई

चाहने

वाला

तथा

उनकी

वंचना

करने

वाला,

लोग

क्या

कहेंगे

यह

भय

रखनेवाला,

और

अच्छे

मौके

के

अपेक्षामे

कॄतीहीन

रहनेवाला

भी

धन

नही

कमा

सकता\।

सुभाषित 299

दातव्यं

भोक्तव्यं

धनविषये

संचयो

कर्तव्यः

पश्येह

मधुकरीणां

संचितार्थ

हरन्त्यन्ये

दान

कीजिए

या

उपभोग

लीजिए ,

धन

का

संचय

करें

देखिए ,

मधुमक्खी

का

संचय

कोर्इ

और

ले

जाता

है //

सुभाषित 300

या

कुन्देन्दुतुषारहारधवला

या

शुभ्रवस्त्रावॄता ,

या

वीणावरदण्डमण्डितकरा

या

श्वेतपद्मासना \।

या

ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभॄतिभिर्देवैः

सदा

वन्दिता ,

सा

मां

पातु

सरस्वती

भगवती

निः

शेषजाड्यापहा //

जो

कुन्दपुष्प ,,,

चंद्रमा

या ,,

जलबिन्दुओं

के

हार

के

समान

धवल

है ,

जिसने

शुभ्रवस्त्र

परिधान

किए

है ,

जिसके

हाथ

वीणा

के

दण्डसे

सुशोभित

है

और

श्वेतपद्म

जिसका

आसन

है,

जिसे

ब्रह्मा ,

विष्णु ,

महेश

आदि

सदा

वन्दन

करते

है ,

बुद्धी

की

जडता

पूर्णतः

नष्ट

करनेवाली

ऐसी

भगवती

सरस्वती

मेरा

रक्षण

करें \।

सुभाषित 301

कस्यचित्

किमपि

नो

हरणीयं

मर्मवाक्यमपि

नोच्चरणीयम्

श्रीपतेः

पदयुगं

स्मरणीयं

लीलया

भवजलं

तरणीयम्

दुसरोंकी

कोई

वस्तु

कभी

चुरानी

नही

चाहिए\।

दुसरेके

मर्मस्थानपे

आघात

हो

ऐसा

कभी

बोलना

नही

चाहिए\।

श्री

विष्णु

के

चरणका

स्मरण

करना

चाहिए\।

ऐसा

करनेसे

भवसागर

पार

करना

सरल

हो

जाता

है\।

सुभाषित 302

बुधाग्रे

गुणान्

ब्राूयात्

साधु

वेत्ति

यतः

स्वयम्

मूर्खाग्रेपि

ब्राूयाद्धुधप्रोक्तं

वेत्ति

सः

अपने

गुण

बुद्धीमान

मनुष्य

को

बताए\।

वह

उन्हे

अपने

आप

जान

लेगा\।

अपने

गुण

बु_

मनुष्य

को

भी

बताए\।

वह

उन्हे

समझ

नही

सकेगा\।

सुभाषित 303

के

शवं

पतितं

दॄष्ट्वा

पाण्डवा

हर्षनिर्भराः

रूदन्ति

कौरवाः

सर्वे

हा

हा

के

शव

के

शव

रूकिये ,

यदि

आपने

इस

श्लोक

का

अर्थ

समझने

का

प्रयास

किया

है!

संस्कॄतमे

शब्दों

का

सही

अर्थ

समझना

अत्यंत

आवश्यक

है!!

यहाँ ,

के

और

शव

अलग

अलग

शब्द

है \।
˜

का

अर्थ

है

पानी

ह्म

कर्इ

अर्थाे

में

से

एक )

इसलिए '

के'

मतलब ˜

पानी

में\।

पाण्डव

का

एक

अर्थ ˜

मछली

और

कौरव

का

एक

अर्थ ˜

कौआ

भी

होता

है\।

इसलिए ,

इस

श्लोक

का

अर्थ

है ,

पानी में गिरा शव देखकर मछलीयाँं हर्षनिर्भर हुर्इ ह्मबल्कि) सब कौए ह्मदुखसे) चिल्लाने लगे ˜अरेरे पानी में शव’।

सुभाषित 304

गुरोरप्यवलिप्तस्य

कार्याकार्यमजानतः \।

उत्पथं

प्रातिपन्नस्य

न्याय्यं

भवति

शासनम् //

महाभारत

आदरणीय

तथा

श्रेष्ठ

व्यक्ति

यदी

व्यक्तीगत

अभिमान

के

कारण

धर्म

और

अधर्म

में

भेद

करना

भूल

गए

या

फिर

गलत

मार्ग

पर

चले

तो

ऐसे

व्यक्ति

को

शासन

करना

न्याय

ही

है \।

शुभाषित 305

यद्यद्

राघव

संयाति

महाजनसपर्यया \।

दिनं

तदेव

सालोकं

श,,,,,,,

ेषास्त्वन्धदिनालयाः //

हे!

रघु

वंशके

वंशज ,

श्रेष्ठ

तथा

सज्जनों

की

सेवा

में

व्यतीत

हुवा

दिन

ही

प्रकाशमान

होता

है \।

अन्य

सभी

दिन

सूर्य

प्राकाश

रहते

हुए

भी

अंधकार

के

समान

प्रातीत

होते

है \।

सुभाषित 306

यमो

वैवस्वतो

राजा

यस्तवैष )

दि

स्थितः \।

तेन

चेदविवादस्ते

मा

गंगा

मा

कुरून्

व्राज //

यदि

विवस्वत

के

पुत्र

भगवान

यम

आपाके

मन

म्ंो

बसते

है

तथा

उनसे

आपका

मत

भेद

नही

है

तो

आपको

अपने

पाप

धोने

परम

पवित्र

गंगा

नदी

के

तट

पर

या

कुरूओंके

भूमी

को

जाने

की

कोइ

आवश्यकता

नही

है \।

सुभाषित 307

किम्

कुलेन

विशालेन

विद्याहीनस्य

देहिनः

अकुलीनोऽपि

विद्यावान्

देवैरपि

सुपूज्यते

अच्छे

कुलमे

जन्मी

हुई

व्यक्ति

अगर

ज्ञानी

हो,

तो (

उसके

अच्छे

कुल

का)

क्या

फायदा\।

ज्ञानी

व्यक्ति

अगर

कुलीन

हो,

तो

भी,

इश्वर

भी

उसकी

पूजा

करते

है\।

सुभाषित 308

पत्रं

नैव

यदा

करीरविटपे

दोषो

वसन्तस्य

किम् \।

नोलूकोऽप्यवलोकते

यदि

दिवा

सूर्यस्य

किं

दूषणम् \।

धारा

नैव

पतन्ति

चातकमुखे

मेघस्य

किं

दूषणम् \।

यत्

पूर्वं

विधिना

ललाटलिखितं

तन्मार्जितुं

कः

क्षमः \।
\।

करीरवॄक्ष

ह्म

मरूभूमीमे

आनेवाला

पर्णहीन

वॄक्ष )

को

ह्मवसंतऋतू

मे

भी )

पन्ने

नहीं

आते

है

इसमें

वसन्त

का

क्या

दोष \।

उल्लू

को

दिन

में

नही

दिखार्इ

देता

इसमें

सूर्य

का

क्या

दोष \।

ह्मजल )

धाराए

चातक

के

चोंच

में

नहीं

गिरी

तो

वह

बादल

का

दोष

कैसे \।

अर्थात् ,

विधी

ने

जो

माथे

पर

लिखा

है ,

उसे

कौन

बदल

सकता

है \।

सुभाषित 309

यथा

हि

पथिकः

कश्चित्

छायामाश्रित्य

तिष्ठति \।

विश्रम्य

पुनर्गच्छेत्

तद्वद्

भूतसमागमः //

महाभारत

जिस

प्राकार

यात्रा

करनेवाला

पथिक

थोडे

समय

वॄक्ष

के

नीचे

विश्राम

करने

के

बाद

आगे

निकल

जाता

है

उसी

समान

अपने

जीवन

में

अन्य

मनुष्य

थोडे

समय

के

लिए

उस

वॄक्ष

की

तरह

छांव

देते

है

और

फिर

उनका

साथ

छूट

जाता

है \।

सुभाषित 310

व्याधिर्न

विषं

नापत्

तथा

नाधिश्च

भूतले

खेदाय

स्वशरीरस्थं

मौख्र्यमेकम्

यथा

नॄणाम्

इस

जगतमे

स्वयंकी

मूर्खताही

सब

दुः

खोंकी

जड

होति

है\।

कोई

व्याधि,

विष,

कोई

आपत्ति

तथा

मानसिक

व्याधि

से

उतना

दुः

नही

होता\।

सुभाषित 311

वध्यन्ते

ह्मविश्वस्ता

बलिभिर्दुर्बला

अपि

विश्वस्तास्त्वेव

वध्यन्ते

बलिनो

दुर्बलैरपि

दुर्बल

मनुष्य

विश्वसनीय

होने

पर

भी

बलवान

मनुष्य

उसे

मारता

नही

है\।

बलवान

पुरुष

विश्वसनीय

होने

पर

भी

दुर्बल

मनुष्य

उसे

मारता

ही

है\।

शुभाषित 312

वने

रणे

शत्रुजलाग्निमध्ये \।

रक्षन्ति

पुण्यानि

पुराकॄतानि //

जब

हम

जंगल

के

मध्य

में

या

फिर

रणक्षेत्र

के

मध्य

में

या

फिर

जल

में

या

फिर

अग्नी

में

फस

जाते

है

तब

अपने

भूतकाल

के

अच्छे

कर्म

ही

हम

को

बचाते

है \।

सुभाषित 313

यदीच्छसि

वशीकर्तुंं

जगदेकेन

कर्मणा \।

परापवादससेभ्यो

गां

चरन्तीं

निवारय //

चाणक्य

यदी

किसी

एक

काम

से

आपको

जग

को

वश

करना

है

तो

परनिन्दारूपी

धान

के

खेत

में

चरनेवाली

जिव्हारूपी

गाय

को

वहाँं

से

हकाल

दो

अर्थात

दुसरे

की

निन्दा

कभी

करो\।

संस्कॄत

मे

गौः

शब्द

के

अनेक

अर्थ

है\।;

सुभाषितकार

ने

गौः

के

दो

अर्थ

ह्मइन्द्रिय

जिव्हेन्द्रिय

तथा

गाय)

लेकर

शब्द

का

सुन्दर

उपयोग

किया

है\।

सुभाषित 314

गुरूशुश्रूषया

विद्या

पुष्कलेन

धनेन

वा \।

अथवा

विद्यया

विद्या

चतुर्थो

उपलभ्यते //

गुरूकी

सेवा

करने

से

या

भरपूर

धन

देने

से

विद्या

प्राप्त

कर

सकते

है

अथवा

एक

विद्या

का

दुसरी

विद्या

के

साथ

विनिमय

कर

सकते

है ,

ह्मविद्या

प्राप्त

करने

का)

चौथा

कोर्इ

रास्ता

उपलब्ध

नहीं

है \।

सुभाषित 315

यथा

खनन्

खनित्रेण

नरो

वार्यधिगच्छति

तथा

गुरुगतं

विद्यां

शुश्रूषुरधिगच्छति

भूमिमे

पहार

से

गड्डा

करनेवाले

को

जिस

तरह

पानी

मिलता

है,

उसी

तरह

गुरु

की

सेवा

करनेवालेको

विद्या

प्राप्त

होती

है\।

; सुभाषित 316

यदि

सन्ति

गुणाः

पुंसां

विकसन्त्येव

ते

स्वयम्

हि

कस्तूरिकामोदः

शपथेन

विभाव्यते

मनुष्यके

गुण

अपने

आप

फैलते

है,

बताने

नही

पडते\। (

जिसतरह),

कस्तूरी

का

गंध

सिद्ध

नही

करना

पडता\।

शुभाषित 317

यथा

काष्ठं

काष्ठं

समेयातां

महोदधौ \।

समेत्य

व्यपेयातां

तद्वद्

भूतसमागमः //

महाभारत

जैसे

लकडी

के

दो

टुकडे

विशाल

सागर

में

मिलते

है

तथा

एक

ही

लहर

से

अलग

हो

जाते

है

उसी

तरह

दो

व्य्क्ति

कुछ

क्षणों

के

लिए

सहवास

में

आते

है

फिर

कालचक्र

की

गती

से

अलग

हो

जाते

है \।

सुभाषित 318

यस्यास्ति

वित्तं

नरः

कुलीनः ,

पण्डितः

श्रुतवान्

गुणज्ञः \।

एव

वक्ता

दर्शनीयः ,

सर्वे

गुणाः

काञ्चनमाश्रयन्ते //

र् नीतिशतक

जिसके पास धन है वही कुलीन ह्मकहलाता है )

वही

पण्डित ,

बहुश्रुत ,

गुणोंकी

पहचान

रखनेवाला ,

वक्ता

तथा

दर्शनीय

समझा

जाता

है\।

अर्थात ,

सभी

गुण

धन

का

आश्रय

लेते

है\।

सुभाषित 319

यद्धात्रा

निजभालपट्टलिखितं

स्तोकं

महद्

वा

धनम्

तत्

प्राप्नोति

मरूस्थलेऽपि

नितरां

मेरौ

ततो

नाधिकम्

तद्धीरो

भव ,

वित्तवत्सु

कॄपणां

वॄत्तिं

वॄथा

मा

कॄथाः

कूपे

पश्य

पयोनिधावपि

घटो

गॄह्णाति

तुल्यं

पयः

नीतिशतक

विधाताने

ललाटपर

जो

थोडा

या

अधिक

धन

लिखा

है ,

वो

मरूभूमी

मे

भी

मिलेगा\।

मेरू

पर्वत

पर

जाकर

भी

उससे

ज्यादा

नहीं

मिलेगा\।

धीरज

रखो ,

अमीरोंके

सामने

दैन्य

ना

दिखाओ ,

देखो

यह

गागर

कुआँ

या

सागर

में

से

उतनाही

पानी

ले

सकती

है

सुभाषित 320

नाम्भोधिरर्थितामेति

सदाम्भोभिश्च

पूर्यते \।

आत्मा

तु

पात्रतां

नेयः

पात्रमायान्ति

संपदः //

विदुरनीति

सागर

कभी

जल

के

लिए

भिक्षा

नही

मांगता

फिर

भी

वह

सदैव

जल

से

भरा

रहता

है \।

यदि

हम

अपने

आप

को

योग्य

बना

दे

तो

सब

साधन

स्वयंही

अपने

पास

चली

आएंगी \।

सुभाषित 321

बहीव्मपि

संहितां

भाषमाणः

तत्करोति

भवति

नरः

प्रामत्तः \।

गोप

इव

गा

गणयन्

परेषां

भाग्यवान्

श्रामण्यस्य

भवति //

धम्मपद 2\।19

यदि

मनुष्य

बहूत

से

धार्मिक

श्लोक

स्मरण

में

भी

रखे

पर

उस

प्राकार

आचरण

करे

तो

उस

का

कोइ

लाभ

नही

है \।

जैसे

गाय

चरानेवाला

गौवोंकी

संख्या

तो

जानता

है

पर

वह

उस

का

मालिक

नही

रहता \।

सुभाषित 322

वने

रणे X

ात्रुजलाग्निमध्ये

महार्णवे

पर्वतमस्तके

वा \।

सुप्तं

प्रमत्तं

विषमस्थितं

वा

रक्षन्ति

पुण्यानि

पुरा

कॄतानि //

नीतिशतक

अरण्यमे

रणभूमी

में ,

शत्रुसमुदाय

में ,

जल ,

अग्नि ,

महासागर

या

पर्वतशिखरपर

तथा

सोते

हुए ,

उन्मत्त

स्थिती

में

या

प्रतिकूल

परिस्थिती

में

मनुष्यके

पूर्वपुण्य

उसकी

रक्षा

करतें

हैं \।

सुभाषित 323

कालो

दण्डमुद्यम्य

शिरः

कॄन्तति

कस्यचित् \।

कालस्य

बलमेतावत्

विपरीतार्थदर्शनम् //

महाभारत 2\।81\।11

काल

किसी

का

शस्त्र

से

शिरच्छेद

नही

करता

पर

वह

बुद्धीभेद

करता

है

जिससे

मनुष्य

को

गलत

रास्ता

ही

सही

लगता

है

और

वह

अपने

विनाश

की

ओर

बढता

है \।

बुद्धीभेद

ही

काल

का

बल

है \।

सुभाषित 324

संगच्छध्वं

संवदध्वं

सं

वो

मनांसि

जानताम् \।

देवा

भागं

यथा

पूर्वे

सञ्जानाना

उपासते //

हम

सब

एक

साथ

चले;

एक

साथ

बोले;

हमारे

मन

एक

हो \।

प्रााचीन

समय

में

देवताओं

का

ऐसा

आचरण

रहा

इसी

कारण

वे

वंदनीय

है \।

सुभाषित 325

मध्विव

मन्यते

बालो

यावत्

पापं

पच्यते \।

यदा

पच्यते

पापं

दुः

खं

चाथ

निगच्छति

धम्मपद 5\।6

जब

तक

पाप

संपूर्ण

रूप

से

फलित

नही

होता

तब

तक

वह

पाप

कर्म

मधुर

लगता

है \।

परन्तु

पूर्णतः

फलित

होने

के

पश्च्यात

मनुष्य

को

उसके

कटु

परिणाम

सहन

करने

ही

पडते

है \।

सुभाषित 326

तावज्जितेन्द्रियो

स्याद्

विजितान्येन्द्रियः

पुमान् \।

जयेद्

रसनं

यावद्

जितं

सर्वं

जिते

रसे //

श्रीमद्भागवत 11\।8\।21

जब

तक

मनुष्य

अपने

विविध

आहार

के

उपर

स्वनियंत्रण

नही

रखता

तब

तक

उसने

सब

इन्द्रियों

के

उपर

विजय

पायी

है

ऐसा

नही

बोल

सकते \।

आहार

के

उपर

स्वनियंत्रण

यही

सब

से

आवश्यक

बात

है \।

सुभाषित 327

द्वावेव

चिन्तया

मुक्तौ

परमानन्द

आप्लुतौ \।

यो

विमुग्धो

जडो

बालो

यो

गुणेभ्यः

परं

गतः //

भागवत 11\।9\।4

इस

जगत

में

केवल

दो

प्राकार

के

लोग

परमआनन्द

का

अनुभव

कर

सकते

है \।

एक

है

नन्हासा

बालक

तथा

दुसरा

है

परम

योगी \।

सुभाषित 328

तथा

तप्यते

विद्धः

पुमान्

बाणैः

सुमर्मगैः \।

यथा

तुदन्ति

मर्मस्था

ह्मसतां

पुरूषेषवः //

भागवत 11\।23\।3

मनुष्य

के

शरीर

में

लगे

बाण

उतनी

वेदना

नही

देते

जितनी

वेदना

कठोर

शब्द

देते

है \।

सुभाषित 329

कश्चिदपि

जानाति

किं

कस्य

श्वो

भविष्यति

अतः

श्वः

करणीयानि

कुर्यादद्यैव

बुद्धिमान //

कल

किसका

क्या

होगा

कोर्इ

नहीं

जानता ,

इसलिए

बुद्धिमान

लोग

कल

का

काम

आजही

करते

है \।

सुभाषित 330

वयमिह

परितुष्टा

वल्कलैस्त्वं

दुकूलैः

सम

इह

परितोषो

निर्विशेषो

विशेषः \।

तु

भवति

दरिद्रो

यस्य

तॄष्णा

विशाला

मनसि

परितुष्टे

कोऽर्थवान

को

दरिद्रः //

एक

योगी

राजा

से

कहता

है , œ

हम

यहाँ

है

ह्म

आश्रममे )

वल्कलवस्त्रसे

भी

सन्तुष्ट ,

जब

कि

तुमने

अपने

रेशीमवस्त्र

पहने

है \।

हम

उतने

ही

सन्तुष्ट

है ,

कोर्इ

भेद

नही

है \।

जिसकी

पिपासा

अधिक ,

वही

दरिद्री

है \।

जब

की

मन

में

सन्तुष्टता

है ,

दरिद्री

कौन

और

धनवान

कौन?

सुभाषित 331

ह्मम्मयानि

तीर्थानि

देवा

मॄच्छिलामयाः \।

ते

पुनन्त्युरूकालेन

दर्शनादेव

साधवः //

भागवत 10\।48\।31

नदीयों

का

पवित्र

जल

या

भगवान

की

मूर्ती

के

दर्शन

मात्र

से

भक्त

का

मन

शुद्ध

नही

होता

अपितु

लंबे

समय

ध्यान

लगाने

के

बाद

ही

अंतः

करण

शुद्ध

होता

है \।

परन्तू

संतों

के

केवल

दर्शन

मात्र

से

ही

हम

पवित्र

हो

जाते

है \।

सुभाषित 332

ब्राम्हणः

सम_

क्

शान्तो

दीनानां

समुपेक्षकः \।

स्त्रवते

ब्रम्ह

तस्यापि

भिन्नभाण्डात्

पयो

यथा //

भागवत 4\।14\।41

समदॄष्टी

के

अभाव

के

कारण

यदि

ब्राम्हण

किसी

पिडीत

व्यक्ति

की

सहायता

नही

करता

तो

उसका

ब्रम्हत्व

समाप्त

हो

गया

ऐसा

समझना

चाहिए \।

सुभाषित 333

दैवमेवेह

चेत्

कतर्ॄ

पुंसः

किमिव

चेष्टया \।

स्नानदानासनोच्चारान्

दैवमेव

करिष्यति //

अगर

नसीबही

आपका

कार्य

करनेवाला

है

तो

आपको

कुछ

करनेकी

क्या

आवष्यकता

है?

स्नान

दानधर्म

बैठना

बोलना

यह

सभी

आपका

नसीबही

करेगा!

सुभाषित 334

कार्यमण्वपि

काले

तु

कॄतमेत्युपकारताम् \।

महदप्युपकारोऽपि

रिक्ततामेत्यकालतः //

किसीका

छोटासाभी

काम

अगर

सही

समयपे

करे

तो

वह

उपकारक

होता

है \।

परंतु

अगर

गलत

समयपे

करे

तो

बहुत

बडा

काम

भी

किसी

काम

का

नही

होता

है \।

सुभाषित 335

यो

यमर्थं

प्रार्थयते

यदर्थं

घटतेऽपि

च \।

अवश्यं

तदवाप्नोति

चेच्छ्रान्तो

निवर्तते //

कोर्इ

मनुष्य

अगर

कुछ

चाहता

है

और

उसकेलिए

अथक

प्रयत्न

करता

है

तो

वह

उसे

प्राप्त

करकेही

रहता

है \।

सुभाषित 336

यदजर््िातं

प्राणहरैः

परिश्रमैः

मॄतस्य

तद्

वै

विभजन्ति

रिक्थिनः \।

कॄतं

यद्

दुष्कॄतमर्थलिप्सया

तदेव

दोषापहतस्य

कौतुकम् //

र् गरूडपुराण

प्राणान्तिक

परिश्रमों

से

प्राप्त

किया

हुआ

मॄत

आदमी

का

जो

धन

होता

है ,

उसके

वारिस

वह

आपसमें

बाँंट

लेते

है \।

उस

धन

के

लोभ

से

उसने

जो

पाप

बटोरा

है

वह

पापी

मनुष्य

के

साथही

जाता

है

ह्मउसेही

पापके

परिणाम

भुगतने

पडते

है ,

पाप

का

कोर्इ

विभाजन

नहीं

होता) \।

सुभाषित 337

त्यजेत्

क्षुधार्ता

जननी

स्वपुत्रं ,

खादेत्

क्षुधार्ता

भुजगी

स्वमण्डम् \।

बुभुक्षितः

किं

करोति

पापं ,

क्षीणा

जना

निष्करूणा

भवन्ति //

चाणक्य

भूख

से

व्याकूल

माता

अपने

पुत्रका

त्याग

करेगी

भूख

से

व्याकूल

साँप

अपने

अण्डे

खा

लेगा

भूखा

क्या

पाप

नहीं

कर

सकता?

भूख

से

क्षीण

लोग

निर्दय

बन

जाते

हैं \।

सुभाषित 338

अणुभ्यश्च

महद्भ्यश्च

शास्त्रेभ्यः

कुशलो

नरः \।

सर्वतः

सारमादद्यात्

पुष्पेभ्य

इव

षट्पदः //

भवरा

जैसे

छोटे

बडे

सभी

फूलोमेसे

केवल

मधु

इक{

करता

है

उसी

तरह

चतुर

मनुष्यने

शास्त्रोमेसे

केवल

उनका

सार

लेना

चाहिए \।

सुभाषित 339

अन्नोदकसमं

दानं

तिथिद्र्वादशीसमा \।

गायत्रयाः

परो

मन्त्रो

मातुः

परदैवतम् //

अन्नदान

जैसे

दान

नही

है \।

द्वादशी

जैसे

पवित्र

तिथी

नही

है \।

गायत्री

मन्त्र

सर्वश्रेष्ठ

मन्त्र

है

तथा

माता

सब

देवताओंसेभी

श्रेष्ठ

है \।

सुभाषित 340

यत्र

नार्यः

तु

पूज्यन्ते

रमन्ते

तत्र

देवताः \।

यत्र

एताः

तु

पूज्यन्ते

सर्वास्तत्र

अफलाः

क्रियाः //

मनुस्मॄति

जहां

स्त्रीयोंको

मान

दिया

जाता

है

तथा

उनकी

पूजा

होती

है

वहां

देवताओंका

निवास

रहता

है \।

परन्तू

जहां

स्त्रीयोंकी

निंदा

होती

है

तथा

उनका

सम्मान

नही

किया

जाता

वहां

कोइ

भी

कार्य

सफल

नही

होता \।

सुभाषित 341

वनेऽपि

सिंहा

मॄगमांसभक्षिणो

बुभुक्षिता

नैव

तॄणं

चरन्ति \।

एवं

कुलीना

व्यसनाभिभूता

नीचकर्माणि

समाचरन्ति //

जंगल

मे

मांस

खानेवाले

शेर

भूक

लगने

पर

भी

जिस

तरह

घास

नही

खाते,

उस

तरह

उच्च

कुल

मे

जन्मे

हुए

व्यक्ति (

सुसंस्कारित

व्यक्ति)

संकट

काल

मे

भी

नीच

काम

नही

करते \।

सुभाषित 342

खद्योतो

द्योतते

तावद्

यवन्नोदयते

शशी \।

उदिते

तु

सहस्रांशौ

खद्योतो

चन्द्रमाः //

जब

तक

चन्द्रमा

उगता

नही,

जुगनु (

भी)

चमकता

है \।

परन्तु

जब

सुरज

उगता

है

तब

जुगनु

भी

नही

होता

तथा

चन्द्रमा

भी

नही (

दोनो

सुरज

के

सामने

फीके

पडते

है)

सुभाषित 343

स्वभावं

जहात्येव

साधुरापद्गतोऽपि

सन् \।

कर्पूरः

पावकस्पॄष्टः

सौरभं

लभतेतराम् //

अच्छी

व्यक्ति

आपत्काल

में

भी

अपना

स्वभाव

नहीं

छोडती

है ,

कर्पूर

अग्निके

स्पर्श

से

अधिक

खुशबू

निर्माण

करता

है

सुभाषित 344

चित्त्स्य

शुद्धये

कर्म

तु

वस्तूपलब्धये \।

वस्तुसिद्धिर्विचारेण

किंचित्कर्मेकोटिभिः //

विवेकचूडामणी

अंतः

करण

के

शुद्धी

के

लिए

कर्म

ह,

पारमार्थिक

ज्ञान

प्रााप्त

करने

के

लिए

नही \।

पारमार्थिक

ज्ञान

तो

चिंतन

तथा

विचार

करने

से

ही

प्रााप्त

होता

ह,

कोटि

कर्म

करने

से

नही \।

शुभाषित 345

श्रमेण

दुः

खं

यत्किन्चिकार्यकालेनुभूयते \।

कालेन

स्मर्यमाणं

तत्

प्रामोद //

काम

करते

समय

होनेवाले

कष्ट

के

कारण

थोडा

दुः

तो

होता

है \।

परन्तु

भविष्य

में

उस

काम

का

स्मरण

हुवा

तो

निश्चित

ही

आनंद

होता

है \।

सुभाषित 346

आस्ते

भग

आसीनस्य }

ध्र्वम्

तिष्ठति

तिष्ठतः \।

शेते

निषद्यमानस्य

चरति

चरतो

भगः //

जो

मनुश्य (

कुछ

काम

किए

बिना)

बैठता

है,

उसका

भाग्य

भी

बैठता

है \।

जो

खडा

रहता

है,

उसका

भाग्य

भी

खडा

रहता

है \।

जो

सोता

है

उसका

भाग्य

भी

सोता

है

और

जो

चलने

लगता

है,

उसका

भाग्य

भी

चलने

लगता

है \।

अर्थात

कर्मसेही

भाग्य

बदलता

है \।

सुभाषित 347

विपदी

धैर्यमथाभ्युदये

क्षमा

सदसि

वाक्पटुता

युधि

विक्रमः \।

यशसि

चाभिरूचिव्र्यसनं

श्रुतौ

प्रकॄतिसिद्धमिदं

हि

महात्मनाम् //

आपात्काल

मे

धेेैर्य ,

अभ्युदय

मे

क्षमा ,

सदन

मे

वाक्पटुता ,

युद्ध

के

समय

बहादुरी ,

यशमे

अभिरूचि ,

ज्ञान

का

व्यसन

ये

सब

चीजे

महापुरूषोंमे

नैसर्गिक

रूपसे

पायी

जाती

हैं \।

सुभाषित 348

यावत्

भ्रियेत

जठरं

तावत्

सत्वं

हि

देहीनाम् \।

अधिकं

योभिमन्येत

स्तेनो

दण्डमर्हति //

मनुस्मॄती,

महाभारत

अपने

स्वयम

के

पोषण

के

लिए

जितना

धन

आवश्यक

है

उतने

पर

ही

अपना

अधिकार

है \।

यदि

इससे

अधिक

पर

हमने

अपना

अधिकार

जमाया

तो

यह

सामाजिक

अपराध

है

तथा

हम

दण्ड

के

पात्र

है \।

सुभाषित 349

अहं

त्वं

राजेन्द्र

लोकनाथौ

उभावपि \।

बहुव्रीहिरहं

राजन्

षष्ठीतत्पुरूषो

भवान //

एक

भिखारी

राजा

से

कहता

है, “

हे

राजन्, ,

मै

और

आप

दोनों

लोकनाथ

है \।

ह्मबस

फर्क

इतना

है

कि)

मै

बहुव्रीही

समास

हंूँ

तो

आप

षष्ठी

तत्पुरूष

हो!”

सुभाषित 350

यदा

कुरूते

भावं

सर्वभूतेष्वमंगलम् \।

समदॄष्टेस्तदा

पुंसः

सर्वाः

सुखमया

दिशः //

श्रीमदभागवत 9\।15\।15

जो

मनुष्य

किसी

भी

जीव

के

प्राती

अमंगल

भावना

नही

रखता,,

जो

मनुष्य

सभी

की

ओर

सम्यक्

दॄष्टीसे

देखता

है,

ऐसे

मनुष्य

को

सब

ओर

सुख

ही

सुख

है \।

सुभाषित 351

शरदि

वर्षति

गर्जति

वर्षति

वर्षासु

निः

स्वनो

मेघः

नीचो

वदति

कुरुते

वदति

सुजनः

करोत्येव

शरद

ऋतुमे

बादल

केवल

गरजते

है,

बरसते

नही\।

वर्षा

ऋतुमै

बरसते

है,

गरजते

नही\।

नीच

मनुश्य

केवल

बोलता

है,

कुछ

करता

नही\।

परन्तु

सज्जन

करता

है,

बोलता

नही\।

सुभाषित 352

सर्वार्थसंभवो

देहो

जनितः

पोषितो

यतः \।

तयोर्याति

निर्वेशं

पित्रोर्मत्र्यः

शतायुषा //

श्रीमदभागवत 10\।45\।5

एक

सौ

वर्ष

की

आयु

प्रााप्त

हुआ

मनुष्य

देह

भी

अपने

माता

पिता

के

ऋणोंसे

मुक्त

नही

होता \।

जो

देह

चार

पुरूषार्थोंकी

प्रााप्ती

का

प्रामुख

साधन

ह,

उसका

निर्माण

तथा

पोषण

जिन

के

कारण

हुआ

है,

उनके

ऋण

से

मुक्त

होना

असंभव

है \।

सुभाषित 353

अमॄतं

चैव

मॄत्युश्च

द्वयं

देहप्रातिष्ठितम् \।

मोहादापद्यते

मॄत्युः

सत्येनापद्यतेऽमॄतम् //

श्री

शंकराचार्य

मॄत्यु

तथा

अमरत्व

दोनों

एक

ही

देह

में

निवास

करती

है \।

मोह

के

पिछे

भागनेसे

मॄत्यु

आती

है

तथा

सत्य

के

पिछे

चलनेसे

अमरत्व

प्रााप्त

होता

है \।

सुभाषित 354

परिवर्तिनि

संसारे

मॄतः

को

वा

जायते \।

जातो

येन

जातेन

याति

वंशः

समुन्न्तिम् //

नितीशतक 32

इस

जीवन

मॄत्यु

के

अखंडीत

चक्र

में

जिस

की

मॄत्यु

होती

ह,

क्या

उसका

पुनः

जम््म नही

होता?

परन्तु

उसीका

जन्म,

जम््म होता

है

जिससे

उसके

कुल

का

गौरव

बढता

है \।

सुभाषित 355

को

याति

वशं

लोके

मुखे

पिण्डेन

पूरितः

मॄदंगो

मुखलेपेन

करोति

मधुरध्वनिम्

मुख

खाद्य

से

भरकर

किसको

अंकीत

नहि

किया

जा

सकता\।

आटा

लगानेसे

मॄदुंग

भी

मधुर

ध्वनि

निकालता

है\।

सुभाषित 356

सर्वनाशे

समुत्पन्ने

ह्मर्धं

त्यजति

पण्डितः

अर्धेन

कुरुते

कार्यं

सर्वनाशो

हि

दुः

सहः

जब

सर्वनाश

निकट

आता

है,

तब

बुद्धिमान

मनुष्य

अपने

पास

जो

कुछ

है

उसका

आधा

गवानेकी

तैयारी

रखता

है\।

आधेसे

भी

काम

चलाया

जा

सकता

है,

परंतु

सबकुछ

गवाना

बहुत

दुः

खदायक

होता

है\।

सुभाषित 357

गुणेषु

क्रियतां

यत्नः

किमाटोपैः

प्रयोजनम्

विक्रीयन्ते

घण्टाभिः

गावः

क्षीरविवर्जिताः

स्वयं

मे

अच्छे

गुणों

की

वॄद्धी

करनी

चहिए\।

दिखावा

करके

लाभ

नही

होता\।

दुध

देनेवाली

गाय

उसके

गलेमे

लटकी

हुअी

घंटी

बजानेसे

बेची

नही

जा

सकती\।

शुभाषित 358

साहित्यसंगीतकलाविहीनः

साक्षात्

पशुः

पुच्छविषाणहीनः \।

तॄणं

खादन्नपि

जीवमानः

तद्भागधेयं

परमं

पशूनाम् //

नीतिशतक

जिस

व्यक्ती

को

कला

संगीत

में

रूची

नही

है

वह

तो

केवल

पूंछ

तथा

सिंग

रहीत

पशू

है \।

यह

तो

पशूओंका

सौभाग्य

है

की

वह

घास

नही

खाता!

शुभाषित 359

प्रा)

ष्यति

सम्माने

नापमाने

कुप्यति \।

क्रुद्धः

परूषं

ब्रूयात्

वै

साधूत्तमः

स्मॄतः //

संत

तो

वही

है

जो

मान

देने

पर

हर्षित

नही

होता

अपमान

होने

पर

क्रोधीत

नही

होता

तथा

स्वयं

क्रोधीत

होने

पर

कठोर

शब्द

नही

बोलता \।

सुभाषित 360

असभ्दिः

शपथेनोक्तं

जले

लिखितमक्षरम् \।

सभ्दिस्तु

लीलया

प्राोक्तं

शिलालिखितमक्षरम् //

शुभाषित 361

दुर्जनोने

ली

हुइ

शपथ

भी

पानी

के

उपर

लिखे

हुए

अक्षरों

जैसे

क्षणभंगूर

ही

होती

है \।

परन्तू

संतो

जैसे

व्यक्तिने

सहज

रूप

से

बोला

हुआ

वाक्य

भी

शिला

के

उपर

लिखा

हुआ

जैसे

रहता

है \।

सुभाषित 361

आरोप्यते

शिला

शैले

यत्नेन

महता

यथा \।

पात्यते

तु

क्षणेनाधस्तथात्मा

गुणदोषयोः //

शिला

को

पर्वत

के

उपर

ले

जाना

कठिन

कार्य

है

परन्तू

पर्वत

के

उपर

से

नीचे

ढकेलना

तो

बहुत

ही

सुलभ

है \।

ऐसे

ही

मनुष्य

को

सद्गुणोसे

युक्त

करना

कठिन

है

पर

उसे

दुर्गुणों

से

भरना

तो

सुलभही

है \।

सुभाषित 362

लुब्धमर्थेन

गॄ*

णीयात्

क्रुद्धमञ्जलिकर्मणा

मूर्खं

छन्दानुवॄत्त्या

तत्वार्थेन

पण्डितम्

लालचि

मनुष्यको

धन (

का

लालच)

देकर

वश

किया

जा

सकता

है\।

क्रोधित

व्यक्तिके

साथ

नम्र

भाव

रखकर

उसे

वश

किया

जा

सकता

है\।

मूर्ख

मनुष्य

को

उसके

इछानुरुप

बर्ताव

कर

वश

कर

सकते

है\।

तथ

ज्ञानि

व्यक्ति

को

मुलभूत

तत्व

बताकर

वश

कर

सकते

है\।

अधर्मेणैथते

पूर्व

ततो

भद्राणि

पश्यति \।

ततः

सपत्नान्

जयति

समूलस्तु

विनश्यति //

कुटिलता

अधर्म

से

मानव

क्षणिक

समॄद्वि

संपन्नता

पाता

है \।

अच्छा

दैवका

अनुभव

भी

करता

है \।

शत्रु

को

भी

जीत

लेता

है \।

परन्तू

अन्त

मे

उसका

विनाश

निश्चित

है \।

वह

जड

समेत

नष्ट

होता

है \।

विद्या

मित्रं

प्रावासेषु

भार्या

मित्रं

गॄहेषु

च \।

व्याधितस्योषधं

मित्रं

धर्मो

मित्रं

मॄतस्य

च //

विद्या

प्रावास

के

समय

मित्र

है \।

पत्नी

अपने

घर

मे

मित्र

है \।

व्याधी

ग्रस्त

शरीर

को

औषधी

मित्र

है

तथा

मॄत्यु

के

पश्च्यात

धर्म

अपना

मित्र

है \।

सुभाषित 365

रूपयौवनसंपन्नाः

विशालकुलसंभवाः \।

विद्याहीनाः

शोभन्ते

निर्गन्धाः

किंशुकाः

इव //

सुभाषित 367

नरपतिहितकर्ता

द्वेष्यतां

याति

लोके

जनपदहितकर्ता

त्यज्यते

पार्थिवेन

इति

महति

विरोधे

विद्यमाने

समाने

नॄपतिजनपदानां

दुर्लभः

कार्यकर्ता

राजाका

कल्याण

करनेवालेका

लोग

द्वेश

करते

है\।

लोगोंका

कल्याण

करनेवालेको

राजा

त्याग

देता

है\।

इस

तरह

दोनो

ओर

से

बडा

विरोध

होते

हुए

भी

राजा

और

प्रजा

दोनोका

कल्याण

करनेवाला

मनुष्य

दुर्लभ

होता

है\।

सुभाषित 368

दीपो

नाशयते

ध्वांतं

धनारोग्ये

प्रयच्छति

कल्याणाय

भवति

एव

दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते

दीया

अंधः

कार

का

नाश

करता

है

और

आरोग्य

तथा

धन

देता

है\।

सबके

कल्याण

करने

वाले

दीयेको

मेरा

प्रणाम

सुभाषित 369

तत्

कर्म

यत्

बन्धाय

सा

विद्या

या

विमुक्तये \।

आयासाय

अपरं

कर्म

विद्या

अन्या

शिल्पनैपुणम् //

विष्णुपुराण 2\।3

जिस

कर्म

से

मनुष्य

बन्धन

में

नही

बन्ध

जाता

वही

सच्चा

कर्म

है \।

जो

मुक्ति

का

कारण

बनती

है

वही

सच्ची

विद्या

है \।

शेष

कर्म

तो

कष्ट

का

ही

कारण

होती

है

तथा

अन्य

प्राकार

की

विद्या

तो

केवल

नैपुण्ययुक्त

कारागिरी

है \।

अक्षरद्वयम्

अभ्यस्तं

नास्ति

नास्ति

इति

यत्

पुरा \।

तद्

इदं

देहि

देहि

इति

विपरीतम्

उपस्थितम्

संपत्ती

के

परमोच्च

शिखर

पर

यदि

मनुष्य

ने

याचक

को

नही

नही

कहा

तो

निश्चितही

भविष्य

में

ऐसे

मनुष्य

को

दिजीए

दिजीए

ऐसे

कहनेकी

परिस्थिती

नियती

ले

आएगी \।

अन्यक्षेत्रे

कॄतं

पापं

पुण्यक्षेत्रे

विनश्यति \।

पुण्यक्षेत्रे

कॄतं

पापं

वज्रलेपो

भविष्यति //

अन्यक्षेत्र

में

किए

पाप

पुण्य

क्षेत्र

में

धुल

जाते

है \।

पर

पुण्य

क्षेत्र

में

किए

पाप

तो

वज्रलेप

की

तरह

होते

है

र्

अक्षमस्व \।

असारे

खलु

संसारे

सारं

श्वशुरमन्दिरम् \।

हरो

हिमालये

शेते

हरिः

शेते

महोदधौ //

इस

सारहीन

जगत

में

केवल

श्वशुर

का

घर

रहने

योग्य

है \।

इसी

कारण

शंकर

भगवान

हिमालय

में

रहते

है

तथा

विष्णू

भगवान

समुद्र

में

रहते

है \।

एकेन

अपि

सुपुत्रेण

सिंही

स्वपिति

निर्भयम् \।

सह

एव

दशभिः

पुत्रैः

भारं

वहति

गर्दभी //

सिंहीन

को

यदि

एक

छावा

भी

है

तो

भी

वह

आराम

करती

है

क्योंकी

उसका

छावा

उसे

भक्ष्य

लाकर

देता

है \।

परन्तु

गधी

को

दस

बच्चे

होने

परभी

स्वयं

भार

का

वहन

करना

पडता

है \।

सुभाषित 374

आचारः

प्रथमो

धर्मः

अित्येतद्

विदुषां

वचः

तस्माद्

रक्षेत्

सदाचारं

प्राणेभ्योऽपि

विशेषतः

अच्छा

बर्ताव

रखना

यह

सबसे

जादा

महात्त्वपूर्ण

है

ऐसा

पंडीतोने

कहा

इसलिए

अपने

प्राणोका

मोल

देके

भी

अच्छाा

बर्ताव

रखना

चाहिए\।

तथा

शीतलसलिलं

चन्दनरसो

शीतला

छाया \।

प्र*

लादयति

पुरूषं

यथा

मधुरभाषिणी

वाणी //

शीतल

जल

चंदन

अथवा

छाया

किसी

में

भी

इतनी

शीतलता

नही

होती

जितनी

के

मधुर

वणी

में

होती

है \।

सुभाषित 376

मर्षयन्ति

चात्मानं

संभावयितुमात्मना \।

अदर्शयित्वा

शूरास्तू

कर्म

कुर्वन्ति

दुष्करम् //

शूर

जनों

को

अपने

मुख

से

अपनी

प्राशंसा

करना

सहन

नहीं

होता \।

वे

वाणी

के

द्वारा

प्रादर्शन

करके

दुष्कर

कर्म

ही

करते

है \।

चलन्तु

गिरयः

कामं

युगान्तपवनाहताः \।

कॄच्छे्रपि

चलत्येव

धीराणां

निश्चलं

मनः //

युगान्तकालीन

वायु

के

झोंकों

से

पर्वत

भले

ही

चलने

लगें

परन्तु

धैर्यवान्

पुरूषों

के

निश्चल )

दय

किसी

भी

संकट

में

नहीं

डगमगाते \।

सुभाषित 378

मनस्येकं

वचस्येकं

कर्मण्येकं

महात्मनाम् \।

मनस्यन्यत्

वचस्यन्यत्

कर्मण्यन्यत्

दुरात्मनाम्

महान

व्यक्तियों

के

मनमे

जो

विचार

होता

है

वही

वे

बोलते

है

और

वही

कॄतिमेभी

लाते

है\।

उसके

विपारित

नीच

लोगोंके

मनमे

एक

होता

है

वै

बोलते

दुसरा

है

और

करते

तिसरा

है\।

सुभाषित 379

जीवने

यावदादानं

स्यात्,,,

प्रदानं

ततोऽधिकम् \।

इतयेषा

प्रार्थनाऽस्माकं

भगवन्परिपूर्यताम्

हमारे

जीवन

में

हमारी

याचनाओं

से

अधीक

हमारा

दान

हो

यह

एक

प्रार्थना

हे

भगवन्

तुम

पूरी

करदो\।

सुभाषित 380

सत्यं

माता

पिता

ज्ञानं

धर्मो

भ्राता

दया

सखा \।

शान्तिः

पत्नी

क्षमा

पुत्रः

षडेते

मम

बान्धवाः //

सत्य

मेरी

माता,

ज्ञान

मेरे

पिता,

धर्म

मेरा

बन्धु,

दया

मेरा

सखा,

शान्ति

मेरी

पत्नी

तथा

क्षमा

मेरा

पुत्र

है \।

यह

सब

मेरे

रिश्तेदार

है \।

सुभाषित 381

अहं

जानामि

केयुरे,

नाहं

जानामि

कुण्डले \।

नूपुरे

तु

अभिजानामि

नित्यं

पादाभिवन्दनात् //

रामायण 4, 6\।22

रावण

जब

बलपुर्वक

सीता

माता

को

ले

जा

रहा

था

तभी

सीता

माता

ने

अपने

कुछ

आभरण

इस

आशासे

गिराए

थे

की

श्रीराम

उन्हे

देखकर

उन

तक

पहुंच

सके \।

यही

आभरण

लक्ष्मण

को

श्रीराम

ने

पहचाननेके

लिए

कहा \।

तब

लक्ष्मण

ने

कहार् “

मैं

इन

कुण्डलों

तथा

बाजूबंद

को

तो

नही

पहचान

सकता \।

परन्तु

नित्य

उनके

चरण

स्पर्श

करते

रहने

कारण

यह

नुपूर

उनकेही

है

यह

मैं

निश्चयसे

कह

सकता

हूं \।

सुभाषित 382

तद्

ब्रूहि

वचनं

देवि ,

राज्ञः

यद्

अभिकांक्षितम् \।

करिष्ये

प्रतिजाने

च ,

रामो

द्विर्

अभिभाषते //

रामायण

अयोध्या

सर्ग 18\।30

भरत

का

राज्याभिषेक

श्रीराम

को

वनवास

यह

वर

राजा

दशरथ

से

पाकर ,

कैकेयी

श्रीराम

को

कहती

है

की

राजा

दशरथ

अप्रीय

वार्ता

सुनाने

के

इच्छुक

नही

हैं \।

इसलिये

यदि

श्रीराम

राजा

कि

इच्छानुसार

करेंगे

तो

ही

माता

कैकयी

उन्हे

वह

वर्ता

सुनायेंगी \।

यह

सुनके

श्रीराम

कहते

है , “

राजा

के

आज्ञा

पर

मै

अग्नी

प्रव्ेाशभी

कर

सकताहु \।

मै

प्रतिज्ञा

करता

हुं,

जो

राजा

कहेंगे

मै

वही

करूंगा” \।

श्रीराम

दोबार

वचन

नही

देते

थे \।

श्रीराम

एक

एकवचनी

थे \।

सुभाषित 383

तिष्ठेत्

लोको

विना

सूर्यं

सस्यमं

वा

सलिलं

विना \।

हि

रामं

विना

देहे

तिष्ठेत्

तु

मम

जीवितम् //

रामायण

कैकेयी

जब

राजा

दशरथ

से

श्रीराम

को

वनवास

भेजनेका

वर

मांगती

है

तब

राजा

दशरथ

कहते

है

की

हो

सकता

है

के

सूर्य

के

बिना

सॄष्टी

टीकी

रहे

या

पानी

के

बिना

धान्य

विकसीत

हो \।

पर

श्रीराम

के

बिना

इस

देह

में

प्रााण

रहना

असंभव

है \।

भविष्य

में

राजा

दशरथ

की

यह

बात

सिद्ध

हुइ \।

सुभाषित 384

दूरस्थाः

पर्वताः

रम्याः

वेश्याः

मुखमण्डने \।

युध्यस्य

तु

कथा

रम्या

त्रीणि

रम्याणि

दूरतः //

पहाड

दूर

से

बहुत

अच्छे

दिखते

है \।

मुख

विभुषित

करने

के

बाद

वैश्या

भी

अच्छी

दिखती

है \।

युद्ध

की

कहानिया

सुनने

को

बहौत

अच्छी

लगती

है \।

ये

तिनो

चिजे

पर्याप्त

अंतर

रखने

से

ही

अच्छी

लगती

है \।

सुभाषित 385

उपाध्यात्

दश

आचार्यः

आचार्याणां

शतं

पिता \।

सहस्रं

तु

पितॄन्

माता

गौरवेण

अतिरिच्यते //

मनुस्मॄति

आचार्य

उपाध्यायसे

दस

गुना

श्रेष्ठ

होते

है \।

पिता

सौ

आचार्याें

के

समान

होते

है \।

माता

पितासे

हजार

गुना

श्रेष्ठ

होती

है \।

सुभाषित 386

आर्ता

देवान्

नमस्यन्ति,

तपः

कुर्वन्ति

रोगिणः \।

निर्धनाः

दानम्

इच्छन्ति,

वॄद्धा

नारी

पतिव्रता //

संकट

में

लोग

भगवान

की

प्राार्थना

करते

है,

रोगी

व्यक्ति

तप

करने

की

चेष्टा

करता

है \।

निर्धन

को

दान

करने

की

इच्छा

होती

है

तथा

वॄद्ध

स्त्री

पतिव्रता

होती

है \।

लोग

केवल

परिस्थिती

के

कारण

अच्छे

गुण

धारण

करने

का

नाटक

करते

है \।

सुभाषित 387

शोको

नाशयते

धैर्य,

शोको

नाशयते

श्रॄतम् \।

शोको

नाशयते

सर्वं,

नास्ति

शोकसमो

रिपुः //

शोक

धैर्य

को

नष्ट

करता

है,

शोक

ज्ञान

को

नष्ट

करता

है,

शोक

सर्वस्व

का

नाश

करता

है \।

इस

लिए

शोक

जैसा

कोइ

शत्रू

नही

है \।

सुभाषित 388

भीष्मद्रोणतटा

जयद्रथजला

गान्धारनीलोत्पला \।

शल्यग्राहवती

कॄपेण

महता

कर्णेन

वेलाकुला //

अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा

दुर्योधनावर्तिनी \।

सोत्तीर्णा

खलु

पाण्डवैः

रणनदी

कैवर्तकः

केशवः //

भीष्म

और

द्रोण

जिसके

दो

तट

है

जयद्रथ

जिसका

जल

है

शकुनि

ही

जिसमें

नीलकमल

है

शल्य

जलचर

ग्राह

है

कर्ण

तथा

कॄपाचार्य

ने

जिसकी

मर्यादा

को

आकुल

कर

डाला

है

अश्वत्थामा

और

विकर्ण

जिस

के

घोर

मगर

है

ऐसी

भयंकर

और

दुर्योधन

रूपी

भंवर

से

युक्त

रणनदी

को

केवल

श्रीकॄष्ण

रूपी

नाविक

की

सहायता

से

पाण्डव

पार

कर

गये \।

सुभाषित 389

श्रियः

प्रसूते

विपदः

रुणद्धि,

यशांसि

दुग्धे

मलिनं

प्रमार्ष्टि

संस्कार

सौधेन

परं

पुनीते,

शुद्धा

हि

बुद्धिः

किलकामधेनुः

शुद्ध

बुद्धि

निश्चय

ही

कामधेनु

जैसी

है

क्योंकि

वह

धन-

धान्य

पैदा

करती

है;

आने

वाली

आफतों

से

बचाती

है;

यश

और

कीर्ति

रूपी

दूध

से

मलिनता

को

धो

डालती

है;

और

दूसरों

को

अपने

पवित्र

संस्कारों

से

पवित्र

करती

है।

इस

तरह

विद्या

सभी

गुणों

से

परिपूर्ण

है।

————————————————————-

]