१७ रस सिद्धान्त

रस महत्त्व

काव्य शास्त्र के उपलब्ध ग्रन्थों में सर्व प्राचीन ग्रन्थ भरतमुनि का नाट्य शास्त्र ही है। इसमें काव्य के तत्त्व (धर्म) बिखेर पड़े है; उन्होंने काव्य गुण, अलङ्कार, दोषों का तथा प्रधानतया रस का निरूपण किया है। उनकी मान्यता है- “न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते”। यद्यपि यह नाट्यरस है, परन्तु नाट्य भी दृश्यकाव्य (सा. दर्पण षष्ठ परिच्छेद १) ही है। साथ ही श्रव्य काव्य का प्रयोजन भी ‘सद्यः परनिर्वृतये'३ ‘करोति कीर्तिं; प्रीतिं; च” इनमें निर्वृति तथा प्रीति शब्द से रसास्वादन समुद्भूत परमानन्द विवक्षित है। काव्य के महत्त्व प्रदर्शन में “स्वादुकाव्यरसोन्मिश्रम्"५ यह उक्ति एवं महाकाव्य का स्वरूप वर्णन करते हुए “रसैश्च सकलैः पृथक्"६ का कथन भी काव्य में रस की अनिवार्यता सिद्ध करते हैं। अग्निपुराण, महिमभट्ट तथा विश्वनाथ की उक्तियाँ तो रस को ही काव्य की आत्मा सिद्ध करती हैं। इसी प्रकार ध्वनि सम्प्रदाय वक्रोक्ति सिद्धान्त, औचित्य सिद्धान्त भी रस की विशेष महत्ता स्वीकार करते हैं। अलङ्कार सम्प्रदाय, रीति सम्प्रदाय में भी रस का महत्त्व प्रतिपादित है। यहां तक कि भरत से पूर्व भी रस सम्प्रदाय प्रचलित था, यह भरत के नाट्य शास्त्र में उद्धृत आनुवंश्य श्लोकों से ज्ञात होता है। यह काव्य शास्त्रकारों की दृष्टि से निरूपण है। कवियों की दृष्टि से तो काव्य का प्राण रस ही है। कालिदास तथा भवभूति आदि रससिद्ध कवि हैं। भारवि, माघ, श्री हर्ष आदि कवि अलङ्कार तथा रस दोनों के प्रति आकृष्ट हैं। परन्तु इनका भी स्थल विशेष के विश्लेषण से रस में ही विशेष आग्रह दीखता है। रस सम्प्रदाय में मुख्यतः भट्टनायक, भट्टतौत, अभिनवगुप्त, राजशेखर, धनञ्जय, धनिक, महिमभट्ट, क्षेमेन्द्र, कुन्तक, भोज, मम्मट, विश्वनाथ, विद्यानाथ, जगन्नाथ आदि अग्रणी हैं। ध्वन्यात्मवादी आचार्य भी वस्तुध्वनि, अलङ्कार ध्वनि की विश्रान्ति रसध्वनि में ही मानते हैं। भरत भी रस को प्रधान व्यङ्ग्य ही मानते हैं। रस का सम्बन्ध अथर्ववेद से है- यह स्वयं भरत कहते हैं-रसानाथर्वणादपि। परन्तु रसनिष्पत्ति का निरूपण सर्वप्रथम spepsicANNEL cॐ ॐ १. भरतनाट्यशास्त्र अ. ६ दृश्य श्रव्यत्वभेदेन पुनः काव्यं द्विधा मतम् काव्य प्रकाश १/२ काव्यालङ्कार १/२ ५. वही ५/३ ६. वही १/२१ ७. वाग्वैदग्ध्य-प्रधानेऽपि रस एवात्र जीवितम् - अग्नि पुराण ३३८/३३ काव्यस्यात्मनि अगिनि रसादिरूपे न कस्यचिद् विमतिः। व्यक्ति विवेक। वाक्यं रसात्मक काव्यम् - साहित्य दर्पण। प्रतीयमानस्य चान्यभेददर्शनेऽपि रसभावमुखेनैवोपलक्षणं प्राधान्यात्। (ध्व.लो. प्र.उ.-पृ. ६०) . ६. नाट्य शास्त्र १/१७ रस-सिद्धान्त ‘रसनिष्पत्तिप्रकार’ ५४६ HTRA भरत ने ही किया है। बाद में आचार्यों ने रससूत्र की व्याख्या की है। रस का महत्त्व बतलाते हुए कहा गया है-सहृदय रूपी बछड़ों पर स्नेह होने के कारण वाग्धेनु स्वयं इस दिव्य रस को क्षरती है। अतः योगियों के द्वारा ईश्वर में तन्मय होकर बलात् दुहा गया आनन्द इस रस (परमानन्द) की समानता नहीं कर सकता। वाग्धेनुर्दुग्ध एतं हि रसं यद् बालतृष्णया। तेन नाऽस्य समः स स्याद् दुह्यते योगिभिर्हि यः।।’

रससूत्र की भरतकृतव्याख्या

“विभावानुभाव-व्यभिचारि-संयोगाद् रस निष्पत्तिः यह भरत मुनि प्रणीत रस सूत्र है। भरत ने स्वयं भी इसकी व्याख्या की है। इसमें रस की निष्पत्ति तथा रस स्वरूप का बीज अर्थात् रस आस्वाद्य-आस्वाद दोनों है, बताया गया है। जैसे अनेक प्रकार के व्यञ्जनों, औषधियों के संयोग से षाडव आदि रस बनते हैं, उसी प्रकार विविध भावों के संयोग से स्थायी भाव भी रसता को प्राप्त हो जाते हैं। प्रश्न है कि रस कौन सा पदार्थ है अर्थात् इसे रस क्यों कहते हैं ? उत्तर देते हैं-आस्वाद्य होने से। रस का आस्वाद कैसे किया जाता है ? जैसे नाना प्रकार के व्यञ्जनों से संस्कृत अन्न का भोजन करते हुए एकाग्रचित्त पुरुष रसों का आस्वादन करते हैं और हर्षादि का अनुभव करते हैं उसी प्रकार एकाग्रचित्त प्रेक्षक नाना भावों और अभिनय से अभिव्यक्त वाचिक-आङ्गिक-सात्त्विक अभिनयों से युक्त स्थायी भावों का आस्वादन करते हैं, और हर्षादि का अनुभव करते हैं। अतः नाट्य (अभिनय) से रस की प्रतीति होने के कारण इसे नाट्य रस कहते हैं।' इस रस सूत्र में संयोग और निष्पत्ति-इन दो शब्दों का अर्थ विवेच्य है। संयोग एक सम्बन्ध विशेष है और गुण है-ऐसा न्यायशास्त्र मानता है। संयुक्त व्यवहार का हेतु संयोग है। यह द्रव्याश्रित है। काव्य के द्वारा समर्पित विभावादि ज्ञानमय है, वृत्तिमय हैं। ज्ञान भी गुण है। गुण में गुण नहीं रहता। विभावादि में संयोग गुण नहीं रह सकता। अतः यहां संयोग का अर्थ है-सम्यक् योग अर्थात् सम्बन्ध सामान्य। यह सम्बन्ध स्थायी के साथ होता है। यहां कौन सा सम्बन्ध लिया जाय इसका निर्देश स्वयं भरत ने किया है। विभावादि का स्थायी के साथ व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव सम्बन्ध है-वे लिखते हैं-“नाना भावाभिनय-व्यञ्जितान् स्थायिभावान्” अर्थात् नाना भावों (विभाव अनुभाव, सञ्चारी भाव) तथा वाचिक, आङ्गिक, सात्त्विक अभिनयों द्वारा अभिव्यक्त (व्यञ्जित-व्यक्त) स्थायी भाव इत्यादि। दूसरा “उपेत” १. भट्टनायक मत लोचन में उद्धृत पृ. ६१ २. नाट्य-शास्त्र अ. ६ ३. वही अ. ६ तर्क संग्रह प्रत्यक्ष परिच्छेद। ५. नाट्य शास्त्र ६ अध्याय । अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र ५५० शब्द दिया है। यहां “उपेत" शब्द का संयुक्त (साथ) अर्थ है उप + इत"। अर्थात् विभावादिकों से अभिव्यक्त और विभावादिकों से संयुक्त स्थायी भाव का आस्वाद रस है। इसी बात को मम्मट भी स्पष्ट करते हैं - व्यक्तः स तैर्विभावाद्यैः स्थायी भावो रसः स्मृतः।।’ अर्थात् विभावादिभिर्व्यक्तः, विभावादिभिः सह स्थायी भावो रसः स्मृतः भरतादिभिः । १. काव्य-प्रकाश उल्लास ४ ५५१ रस-सिद्धान्त ‘भट्टलोल्लट मत’

भट्ट लोल्लट मत

परन्तु भट्ट लोल्लट अभिधावादी मीमांसक थे। इनके मत में अभिधाव्यापार दीर्घदीर्घतर है, तथा शब्द जिस अर्थ के प्रतिपादन के लिए प्रयुक्त होता है वहीं शब्द का मुख्य अर्थ होता है-“सोऽयमिषोरिव दीर्घदीर्घतरोऽमिधाव्यापारः", यत्परः शब्दः स शब्दार्थः" __ यह मीमांसक मत लोचन में निर्दिष्ट है तथा काव्य प्रकाश के पंचम उल्लास में उद्धृत भट्ट लोल्लट का ही मत है। काव्य प्रकाश के टीकाकारों ने यही निर्दिष्ट किया है। भट्ट लोल्लट व्यञ्जना को जानते नहीं थे अथवा मानते नहीं थे। अतः भरत के “नानाभावाभिनय-व्यजितान्”-का अर्थ उन्होंने-“नानाभावों विभावादिकों से व्यजित उत्पन्न स्थायी और निष्पत्ति का उत्पत्ति-यह अर्थ किया। इनके मत में रससूत्र का अर्थ है-“विभावानुभावव्यभिचारिभिः संयोगाद्= उत्पाद्योत्पादकभावादिरूपसम्बन्धात् रसस्य = रत्यादेः, निष्पत्तिः = उत्पत्तिः प्रतीतिः पुष्टिश्च । यहां प्रश्न होता है विभावादिकों के साथ संयोग किसका होगा ? तो स्वयं कहते हैं -स्थायिनः = स्थायीभाव का। इसमें विभाव को स्थायी की उत्पत्ति में कारण माना है-तत्र विभावचित्तवृत्तेः स्थाय्यात्मिकाया उत्पत्तौ कारणम् ।' यहां अनुभाव रस के कार्य रूप में विवक्षित नहीं है। क्योंकि रस का कार्य रस के पश्चात् होगा। वह अपने पूर्ववर्ती रस का कारण कैसे हो सकता है ? अतः स्थायी भावों का कार्य कटाक्ष-भुजाक्षेपादि विवक्षित है। भाव के अनु पश्चात् होने के कारण इसे अनुभाव कहा गया है। इससे स्थायी की प्रतीति होती है। व्यभिचारीभाव (हर्षादि) चित्तवृत्ति रूप है, स्थायी (रत्यादि) भी चित्तवृत्ति रूप है। एक ही काल में दो प्रकार की चित्तवृत्ति नहीं हो सकती। अतः स्थायी (रत्यादि) की चित्तवृत्ति में वासना रूप से स्थिति विवक्षित है। हर्षादि की उद्भूत रूप में स्थिति विवक्षित है। अतः स्थायी ही विभावानुभाव - व्यभिचारी से उपचित = पुष्ट होकर रस हो जाता है और जब विभावादिकों से अपुष्ट रहता है तब उसे स्थायी कहते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि विभाव से स्थायी उत्पन्न होता है, अनुभाव से प्रतीति के योग्य होता है और व्यभिचारी भाव से पुष्ट होता है। अतः विभाव के साथ उत्पाद्य उत्पादकभाव सम्बन्ध है। अनुभाव स्थायी की प्रतीति कराता है अतः उसका प्रत्याय्य-प्रत्यायक भाव सम्बन्ध है। व्यभिचारी पुष्ट करता है अतः उसका पोष्यपोषकभाव सम्बन्ध है। इन भिन्न-भिन्न सम्बन्धों से निष्पत्ति भी भिन्न-भिन्न होगी, विभाव से स्थायी की निष्पत्ति उत्पत्ति, अनुभाव से निष्पत्ति = प्रतीति तथा व्यभिचारी से निष्पत्ति = पुष्टि होगी।

१. वही ५. उ. २. नाट्यशास्त्र ६ अ. ५५२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र काव्यप्रकाश के टीकाकारों वामनाचार्य आदिकों ने इस व्याख्या का विवेचन करके त्रिविध सम्बन्ध भी माना है। निष्पत्ति का अर्थ भी त्रिविध किया है। यह रस मुख्यरूप से रामादि अनुकार्यगत है, अनुकर्ता नट में भी रामादि का रूप, वेषभूषा आदि धारण एवं अभिनय करने के कारण आरोपित है। __ यहां जो भट्ट लोल्लट ने विभाव से स्थायी की उत्पत्ति माना है, यह उत्पत्ति ऐसी नहीं है जैसी मृत्तिका से घट की उत्पत्ति होती है, यह तो अभिव्यक्ति ही है या उद्भूतता है। क्योंकि स्थायी चित्त में वासना रूप से विद्यमान था, भस्माच्छन्न वह्नि के समान था, जिसको विभाव ने अभिव्यक्त कर दिया। जैसे भस्माच्छन्न वह्नि को तृण संयोग उद्भूत कर देता है वैसे ही विभाव स्थायी को उद्भूत अर्थात् अभिव्यक्त कर देता है। परन्तु भट्ट लोल्लट इस अभिव्यक्ति को भी अभिधा से “मुख्यया वृत्या” मानते हैं। मुख्य वृत्ति से अनुकार्य गत ही स्थायी की अभिव्यक्ति होगी। जैसे-राम की उक्ति है-“रामोऽस्मि सर्व सहे"२ यहां अभिधा वृत्ति से ही राम की सीताविषयिणी रति प्रतीत हो रही है और राम के समान वेशभूषा धारण किये हुए तथा वैसे अभिनय करते हुए नट में भी रामत्वाभिमान है, नट को ही सामाजिक राम मानता है, अतः नट में भी रति की प्रतीति हो रही है, परन्तु वह आरोपित है, क्योंकि नट वस्तुतः राम नहीं है। केवल अपने को राम मान बैठा है।

लोचनकार के अनुसार भट्ट लोल्लट का मत

पूर्वावस्था में (अपुष्ट) जो स्थायी है, वही व्यभिचारी के सम्बन्ध से पुष्ट होकर रस कहलाता है। वह अनुकार्यगत ही है। इसमें आपत्ति है-स्थायी चित्तवृत्ति रूप है, व्यभिचारी भाव भी चित्तवृत्ति रूप है तो एक चित्तवृत्ति से दूसरे चित्तवृत्ति का क्या पोषण होगा ? विस्मय, शोक, क्रोध आदि का क्रमशः ह्रास देखा जाता है अर्थात् जब ये उद्भूत होते हैं तो तीव्र रहते हैं। क्रमशः क्षीण हो जाते हैं। नायक में भी रस नहीं, वह लौकिक रति है। साथ ही यह मत भरत मत के विरुद्ध भी है, भरत सामाजिक गत रस मानते हैं “आस्वादयन्ति सुमनसः प्रेक्षकाः” कहते हैं और लोल्लट इसे नायकगत मानते हैं, नट में भी आरोपित मानते हैं, यह आरोप सामाजिक करता है, क्योंकि उनकी पङ्क्ति है “तद्रूपतानुसन्धानबलात्” यह अनुसन्धान यदि नट करता है तो सामाजिक से सम्बन्ध नहीं, यदि सामाजिक करते हैं तो सामाजिक को कोई आनन्दानुभूति नहीं होगी, प्रत्युत करुणादि में दुःख की प्राप्ति होगी, इनके मत में रस सूत्र का विवेचन हुआ-विभावेन जन्य-जनक-भाव ARHI

.१. अत्र भट्टलोल्लट प्रभृतयस्तावदेवं व्याचख्युः - विभावादिभिः संयोगोऽर्थात् स्थायिनः ततो रसनिष्पत्तिः, अनुकर्तरि च नटे रामादिरूपताऽनु-सन्धान-बलादिति। अभिनवभारती - छठा अ. २. काव्य प्रकाश चतुर्थ उ. ३. पूर्वावस्थायां यः स्थायी……अनुकार्यगत एव रसः। (ध्व. लो. २/४ का. लोचन।) ५५३ रस-सिद्धान्त ‘भट्टलोल्लट मत’ सम्बन्धात्, अनुभावेन प्रत्याय्य- प्रत्यायकभावसम्बन्धात, व्यभिचारिणा पोष्य-पोषक-भाव सम्बन्धात् रसस्य रत्यादेः निष्पत्तिः = उत्पत्तिः प्रतीतिः पुष्टिश्च। इनके मत का सारांश आचार्य मम्मट ने इस प्रकार उपस्थित किया है-आलम्बन विभाव ललनादि से रत्यादि भाव उत्पन्न होते हैं, उद्दीपन विभाव उद्यानादि से वे उद्दीप्त हो जाते हैं, अनुभाव कटाक्षादि से सामाजिकों के प्रतीति के योग्य (प्रतीति के विषय) बन जाते हैं। निर्वेदादि व्यभिचारी भावों से पुष्ट हुआ मुख्यावृत्ति से रामादि अनुकार्य में, रामादि का रूप, वेश-भूषा के अनुसन्धान से नट में प्रतीयमान स्थायी रस है।’ यहां अभिनव भारती तथा मम्मट द्वारा प्रयुक्त अनुसन्धान शब्द का अर्थ विचारणीय है। पहले यह निश्चित किया जाय कि अनुसन्धान कौन करता है। यदि नट करता है तब तो वह राम का रूप और राम जैसा अभिनय करने से अपने को राम ही मानता है। अर्थात् पहले उसकी भावना बनती है “अहं रामः,” तब वह अपने में रामत्व का आरोप करता है। वह अपने को नट मानता हुआ राम भी मानता है। इसके पश्चात् वह अभिनय की धारा से अपने नटत्व भाव को भूलकर स्वयं को राम ही मानता है यही रामत्वाभिमान है। सामाजिक की दृष्टि से ‘अयं नटो रामः’ इत्याकारक नट में राम का आरोप होगा। तदनन्तर अभिनय कौशल से वेषभूषा से उसको “राम है-ऐसा मानना नट में सामाजिकों का रामत्वाभिमान है। “प्रतीयमानः” शब्द के प्रयोग से मम्मट के अनुसार सामाजिक ही अनुसन्धान करता है। पण्डित राज जगन्नाथ ने इस मत का संक्षिप्त निरूपण करते हुए कहा है मुख्य रूप से दुष्यन्तादि गत रत्यादि ही रस है। विभावादि के कमनीय अभिनय में निपुण नट में आरोपित कर उसका सामाजिक साक्षात्कार करते हैं। इस मत में रस साक्षात्कार का रूप होगा “दुष्यन्तोऽयं शकुन्तलादि-विषयकरतिमान्।” यह ज्ञान (धर्मी) नट अंश में लौकिक है, धर्म (दुष्यन्त) अंश में अलौकिक है।’ १. विभावैर्ललनोद्यानादिभिर्…. प्रतीयमानो रसः। का प्र. ४ उ. २. मुख्यतया दुष्यन्तादिगत….साक्षाक्रियते। रस-गं. प्र.आ. .–.. .- ………… ५५४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र

श्री शङ्कुक मत

भट्ट लोल्लट मत में दोष

(श्री शकुक के अनुसार) विभावादि के सम्बन्ध के बिना स्थायी की प्रतीति नहीं होती। शब्द से वाच्य होने पर भी परोक्षात्मक प्रतीति होगी विभावादि सम्बन्ध के पहले भी स्थायी को उद्भूत मानने पर स्थायी विभावादि से उत्पन्न होता है - यह कहना व्यर्थ है। स्थायी में तर तम भाव रहता है तो रस में भी तारतम्य आ सकता है। यदि रस के समान तारतम्य रहित स्थायी माना जाय तो हास्य रस के जो छः भेद किये गये हैं वे नहीं होंगे। स्थायी भाव के तारतम्य से रस में भेद स्वीकार करने पर काम की दस अवस्थाओं में असंख्य रसभाव आदि मानने होंगे। स्थायी का उपचय भी नहीं होता। प्रत्युत शोक प्रथम तीव्र होता है, धीरे-धीरे कृश होता हुआ मन्द हो जाता है, अतः उपचित स्थायी ही रस है यह कहना उचित नहीं। इसी प्रकार अमर्ष के क्षीण होने पर क्रोध, स्थिरता के अभाव में उत्साह, सेवा के अभाव में रति मन्द हो जाती है। अतः स्थायी का उपचय नहीं होता, अपितु काल क्रम से अपचय ही होता है। अतएव उपचित ही स्थायी रस है-यह कहना संगत नहीं, इन आठ दोषों को उद्धृत करते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया है कि स्थायी भाव ही रस नहीं है, तथा स्थायीभाव का उपचय भी नहीं होता। परन्तु भरत से लेकर सभी आचार्यों का मत है कि स्थायीभाव ही रसता को प्राप्त होता है। व्यक्तः स तैर्विभावाद्यैः स्थायी भावो रसः स्मृतः।' रसतामेति रत्यादिः स्थायी भावः सचेतसाम्। और इनके मत में स्थायी को अनुकार्यगत माना गया है, अनुकर्ता में आरोपित माना गया है। परन्तु सामाजिक के स्थायी का उद्बोध या पुष्टि तो मानी नहीं गई, अतः सामाजिक को रसास्वाद नहीं होगा। यदि नायक गत माना जाय तो वह स्थायी भाव लौकिक होगा। अतः जैसे रति हास सुखप्रद होते हैं वहीं शोक, क्रोध, जुगुप्सा दुःखद होंगे, तब करुण आदि रस प्रधान नाटक में सामाजिक की प्रवृत्ति नहीं होगी।

रसनिष्पत्ति

श्री शङ्कुक के मत में कारण रूप विभावों से, कार्य रूप अनुभावों से सहकारी रूप व्यभिचारियों से (यद्यपि ये विभावादि कृत्रिम है तो भी नट के शिक्षा-अभ्यास आदि प्रयत्न से अर्जित) प्रकाशित या प्रदर्शित (होने के कारण कृत्रिम नहीं प्रतीत होते) अनुकर्ता में स्थित स्थायी भाव विभावादि रूप लिङ्ग बल से अनुमान द्वारा प्रतीत होता है जो मुख्य अनुकार्य = नायक राम आदि में रहने वाले स्थायी का अनुकरण रूप है। १. २. का. प्र. च. उ. सा. द. ३ प. ५५५ रस-सिद्धान्त ‘श्रीङ्कुक’ अनुकरण रूप होने के कारण ही इसे “रस” - इस नामान्तर से व्यवहार किया गया है। यहां विभाव काव्यबल अभिधा से ज्ञात होते हैं। अनुभाव को नट शिक्षा से उपस्थित (प्रदर्शित) करता है और व्यभिचारियों को अपने कृत्रिम अनुभावों के अर्जन द्वारा प्रदर्शित करता है। स्थायी भाव काव्य शक्ति अभिधा से भी ज्ञात नहीं होता, न तो नट की शिक्षा आदि से ज्ञात होता है, रति, शोक आदि शब्द रति तथा शोक को अभिधा वृत्ति से वाच्य करते हैं, परन्तु वह परोक्ष रूप से, न कि वाचिकादि अभिनयों के समान प्रत्यक्ष रूप से; इसीलिए सूत्र में स्थायी पद भिन्न विभक्ति से भी निर्दिष्ट नहीं किया गया है। अतः नट द्वारा अनुक्रियमाण रति शृङ्गार रस है। रस रति रूप या रति से उत्पन्न नहीं है। यहां यह सन्देह नहीं करना चाहिए कि अनुक्रियमाण रति वास्तविक नहीं है, मिथ्या प्रतीति है इससे रसास्वाद रूप कार्य की सिद्धि कैसे होगी ? मिथ्याज्ञान से भी अर्थक्रिया (प्रयोजन की सिद्धि) देखी जाती है। मणिप्रदीपप्रभयोर्मणिबुद्ध्याऽभिधावतोः। मिथ्याज्ञानाविशेषेऽपि विशेषोऽर्थ-क्रियां प्रति।।’ __ अर्थात् मणि की प्रभा और दीप की प्रभा में मणि बुद्धि से (दोनों को मणि मानकर) दौड़ने वाले दोनों पुरुषों के मिथ्याज्ञान में कोई भेद नहीं है, परन्तु फल प्राप्ति में भेद है। जो दीप की प्रभा को मणि मान कर दौड़ा उसे मणि प्राप्त नहीं हुई, क्योंकि यह विसंवादी ज्ञान (भ्रम) था। परन्तु रस प्रक्रिया में निश्चित रूप से भ्रान्ति नहीं है। नर्तक ही सुखी है, रति रूप सुख का आश्रय राम है-ऐसी प्रतीति नहीं होती, यही राम है ऐसी प्रतीति भी नहीं होती। यह सुखी (राम) नहीं है, यह भान भी नहीं होता। न तो, राम है या नहीं यह सन्देह ही होता है। यह राम के सदृश है- ऐसी प्रतीति भी नहीं होती, किन्तु सम्यक् (यथार्थ) मिथ्या-संशय-सादृश्य-प्रतीतियों से विलक्षण-चित्रतुरगन्याय से जो सुखी राम है, वह यह है ऐसी प्रतीति होती है प्रतिभाति न सन्देहो न तत्त्वं न विपर्ययः। धीरसावयमित्यस्ति नासावेवाऽयमित्यपि।। विरुद्ध - बुद्धि-संभेदादविवेचितसम्प्लवः। युक्त्या पर्यनुयुज्येत स्फुरन्ननुभवः कया।। __ नट को रामादि के रूप में देखकर न सन्देह की प्रतीति होती है न यथार्थता की, न ही विपर्यय (मिथ्या या प्रान्ति) की प्रतीति होती है। यह राम है यह बुद्धि होती है। यह (नट) राम नहीं है - यह बुद्धि भी होती है। इस तरह विरुद्ध बुद्धि (प्रतीतियों) के सम्मिश्रण १. प्रमाण वार्तिक, अभिनवभारती में उद्धृत २. अभिनव भारती छठा अध्याय५५६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र से विवेचन न होने के कारण स्फुरित होने वाले अनुभव का किस युक्ति से निराकरण किया जाय ?

लोचन के अनुसार श्री शङ्कुकमत

इत मत का अभिनव गुप्त ने ध्वन्यालोक की लोचन टीका में ‘अन्ये तु’ कहकर निरूपण किया है :-दूसरे आचार्य (श्री शङ्कुक) के अनुसार अनुकर्ता नट में अभिनय आदि सामग्री के द्वारा जो स्थायी का अवभास है वह भित्ति पर हरताल आदि से खींचे गये चित्र में अश्व के अवभास के समान है। लोकातीत (लोक में होने वाली प्रतीति से विलक्षण) होने के कारण आस्वाद नाम वाली दूसरी प्रतीति से रस्यमान होता हुआ रस कहलाता है। यह रस नाट्य से होता है, अतः इसे नाट्य रस कहते हैं।’

मम्मट द्वारा वर्णित श्रीशङ्कुकमत

आचार्य मम्मट’ के अनुसार सम्यक्-मिथ्या-संशय-सादृश्यादि प्रतीति से भिन्न चित्रतुरगादि न्याय से जैसे तुरगोऽयम् प्रतीति होती है वैसे ही राम के समान रूप, वेश-भूषा आदि धारण करने वाले नट में ‘रामोऽयम्’ की प्रतीति होती है। अभिप्राय यह है कि रङ्गमञ्च पर अभिनेता नट को देख कर सामाजिकों की यह राम ही है या यही राम है - ऐसी सम्यक् प्रतीति नहीं होती। न तो पहले यह राम है - इस प्रतीति के उत्तरकाल में यह राम नहीं है नट है-ऐसी प्रतीति से बाधित होने से मिथ्या प्रतीति ही होती है, यह राम है या नहीं-ऐसी संशयात्मक प्रतीति भी नहीं होती, राम के सदृश यह है - ऐसी सादृश्य प्रतीति भी नहीं होती। अतः इन चारों प्रकार की प्रतीतियों से भिन्न चित्रतुरगादि न्याय से ‘यह राम है’-ऐसी प्रतीति होती है। अनन्तर वह नट ‘सेयं ममाङ्गेषु’ अर्थात् यह वही प्राणेश्वरी है जिसके वियोग में मैं आज तक संतप्त रहा, जो केवल मन में थी, वहीं शरीरिणी हो कर नेत्र के सामने आ गई इत्यादि संयोग शृङ्गार का तथा ‘दैवादहमद्यतया’ अर्थात् दुर्भाग्यवश आज हम, जिसके समागम का सुख एक मात्र अनुभव का विषय था, उस चञ्चल तथा विशाल नेत्रों वाली से वियुक्त हो गये हैं, यह घने चञ्चल बादलों का (वर्षा) काल भी आ गया है-इस विप्रलम्भ शृङ्गार का काव्यार्थनुसन्धान के बल से शिक्षा और अभ्यास के द्वारा सम्पादित अभिनय के प्रकाशन से, नट के द्वारा ही प्रकाशित कार्य-कारण-सहकारी से, यद्यपि ये कृत्रिम है तो भी इन्हें कृत्रिम न मानते हुए, विभाव-अनुभाव-व्यभिचारी शब्दों से जो व्यवहार्य है, इनके संयोग = गम्यगमक भाव सम्बन्ध से सामाजिकों द्वारा नट में अनुमीयमान होने पर भी वस्तु (रति) के सौन्दर्य के कारण तथा रसनीय होने से अन्य अनुमीयमान पदार्थों से विलक्षण स्थायी रूप से सम्भाव्यमान रति आदि भाव उस नट में ISME १. अन्ये तु अनुकर्तरि यः स्थाय्यवभासोऽभिनयादि …. नाट्याद्रसः नाट्यरसः। ध्व. लो. लोचन २/४ कारिका टीका। २. काव्य प्रकाश चतुर्थ उ. ३. अनुमान का आकार-यह राम सीता-विषयक-रति-मान् है-सीता-विषयक कटाक्षादि-मान होने के कारण, जो रतिमान् नहीं है वह कटाक्षादिमान् नहीं जैसे विरक्त। रस-सिद्धान्त ‘श्रीङ्कुक’ ५५७ वस्तुतः अविद्यमान है तथापि सामाजिकों की वासना से चळमाण = आस्वाद्यमानहोने से रस कहलाता है-ऐसा श्री शङ्कुक कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसे कुहेशा या वाष्प से ढके हुए प्रदेश में धूम न होने पर भी वाष्प को धूम मानकर वहां अविद्यमान वह्नि का अनुमान करते हैं उसी प्रकार नट के द्वारा अभिनय निपुणता से प्रकाशित कृत्रिम विभावादि से नट में अनुमीय मान रति अपने सौन्दर्य से सामाजिकों की वासना से आस्वाद का विषय बनती है और रस कहलाती है। इसके मत में रस सूत्र का अर्थ होगा-विभावानुभाव-व्यभिचारि-संयोगात् गम्य-गमक-भावरूप सम्बन्धात् रसस्य = रत्यादेः निष्पत्तिः = अनुमितिः।।

पण्डितराज जगन्नाथ द्वारा वर्णित श्रीशङ्कुकमत

पण्डित राज ने भी ‘अपरे’ शब्द से इस मत को उपस्थित किया है। दुष्यन्त रूप से ज्ञात नट में (पक्ष में) नट के द्वारा अभिनय से प्रकाशित कृत्रिम भी अकृत्रिम (वास्तविक) रूप से ज्ञात विभावादिकों (हेतुओं) से सामाजिकों द्वारा अनुमीयमान रस है। यहां प्रत्यक्ष का विषय दुष्यन्त का रूप धारण करने वाला नट है, अनुमिति का विषय रत्यादि है। अतः भिन्न विषय होने पर अनुमिति की सामग्री बलवती होती है। अतः अनुमान होता है। इस मत में अरुचि यह है कि (१) प्रत्यक्ष ज्ञान ही चमत्कार जनक होता है अनुमित्यात्मक नहीं (२) सामाजिकों को बिना अनुमान किये हुए ही रस का आस्वाद होता है तो अनुमान क्यों करें ? (३) सामाजिकों को रस का अनुभव करता हूं-यह अनुव्यवसाय होता है न कि रस का अनुमान करता हूँ। इनका मत नैयायिक मत कहलाता है, नैयायिक व्यञ्जना को शब्द की वृत्ति नहीं मानते, अतः रस को व्यङ्ग्य न मानकर अनुमेय मानते हैं, रस की प्रतीति अनुमान से करते हैं। महिमभट्ट भी रस को और व्यङ्ग्य अर्थ को अनुमान से गतार्थ करते हैं परन्तु व्यङ्ग्य अर्थ का अनुमित अर्थ से जो प्रबल भेद है उस पर इनकी दृष्टि नहीं जाती। भेद यह है कि अनुमान में हेतु से साध्य का अनुमान होता है, उस अनुमित साध्य से पुनः दूसरे साध्य का अनुमान नहीं हो सकता। परन्तु व्यङ्ग्य अर्थ से दूसरा व्यङ्ग्य और उससे तीसरा व्यङ्ग्य भी निकलता है। द्रष्टव्य है काव्य प्रकाश के पञ्चम उल्लास का “विपरीतरते लक्ष्मी…. स्थगयति” इत्यादि पद्य । इसी प्रकार द्वितीय उल्लास का ‘पश्य निश्चलनिष्पन्दा’ इत्यादि पद्य; इनमें व्यङ्ग्य अर्थ से व्यङ्ग्य अर्थ निकलता ही जाता है। इस तत्त्व को महिम भट्ट ने समझा। अतः रसादि व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतीति में काव्यानुमान माना। यह नैयायिकों के प्रसिद्ध अनुमान से भिन्न है। १. द्रष्टव्य-व्यक्ति विवेक प्र.वि. २५ पध २. अभिनवभारती छठा अध्याय ५५८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र

भट्टतौत मत

भट्टतौत कृत श्रीशङ्कुक मत का खण्डन

आचार्य भट्टतौत का ग्रन्थ नहीं मिलता, परन्तु अभिनव भारती में श्री शङ्कुक के मत का खण्डन उनके द्वारा किया हुआ उद्धृत है। “तदिदमत्यन्तस्तत्त्वशून्यं न विमर्दक्षममित्युपाध्यायाः।। तस्माद् भावानुकरणं रसा इत्यसत्।” उनका कथन है कि आप जो रस को अनुकरण रूप मानते हैं, क्या वह सामाजिक की प्रतीति के अभिप्राय से, या नट के अभिप्राय से, या वस्तुवृत्त के विवेचक व्याख्याता की बुद्धि का अवलम्बन लेकर अथवा भरत मुनि के वचनानुसार ? । इसमें पहला पक्ष (सामाजिक की प्रतीति के अभिप्राय से) असङ्गत है। क्योंकि कुछ भी प्रमाण से उपलब्ध हो तो अनुकरण कहा जा सकता है, जैसे किसी को सुरापान करते हुए यदि किसी ने देखा है तो वह दूध पीते हुए कह सकता है कि यह इस तरह सुरापान करता है, यहां सुरापान के अनुकरण रूप में दुग्धपान प्रत्यक्ष देखा जाता है। यहां नट में क्या उपलब्ध है जो अनुकार्य के अनुकरण रूप से प्रतीत होता है ? अतः यह कथन चिन्त्य है। नट का शर, शिर पर स्थित मुकुट आदि आभूषण, रोमाञ्च, गद्गद् वाणी, भुजाक्षेप आदि, भ्रूविक्षेप कटाक्ष आदि भी चित्तवृत्तिरूप रति का अनुकरण है-ऐसा किसी को प्रतीत नहीं होता। शरीरादि जड़ है और (चक्षुः) इन्द्रिय से ग्राह्य होते हैं। रति चित्त का विषय है। अतः रत्यादि से कटाक्षादि का अत्यन्त भेद है। इसको रत्यादि का अनुकरण कैसे कहा जा सकता है। मुख्य के देखने से उसके अनुकरण की प्रतीति होती है। रामगत रति को पहले से जानने वाले कोई है ही नहीं। अतः राम का अनुकर्ता नट है-यह प्रवाद भी खण्डित हो गया। __ यदि कहा जाय कि नट गत (रत्यादि रूप) चित्तवृत्ति ही ज्ञात हो कर रति का अनुकरण शृङ्गार कहलाती है, तो यह विचारणीय है कि वह नट की चित्तवृत्ति किस रूप में प्रतीत होती है। यदि प्रमदादि कारणों, कटाक्षादि कार्यों, धृत्यादि सहकारियों-जो लिङ्गभूत है, उनसे जो लौकिक कार्य रूप, कारण रूप और सहकारी रूप चित्तवृत्ति प्रतीत के योग्य होती है तद्रूप ही नट की चित्तवृत्ति प्रतीत होती है, तब तो वह रति रूप ही हुई, अनुकरण की बात तो दूर ही रही। यदि कहें कि ये विभावादि अनुकार्य में वास्तविक होते हैं, अनुकर्ता में कृत्रिम है -यह भेद है तो ऐसा हो। परन्तु ये विभावादि अवास्तविक कार्य-कारण-सहकारी रूप में काव्य-शिक्षा तथा अभ्यास बल से कल्पित-कृत्रिम होते हुए भी सामाजिकों द्वारा कृत्रिम रूप S रस-सिद्धान्त भट्टतौत, अन्यमत ५५६ में ग्रहण किये जाते हैं या नहीं ? यदि कृत्रिम रूप में ग्रहण किये जाते हैं तो वास्तविक रति की प्रतीति कैसे हो सकती है ? यदि कहें कि इसीलिए प्रतीत होने वाली वह रति रति के अनुकरण बुद्धि का कारण है। कारणान्तर से उत्पन्न वस्तु में सुशिक्षित द्वारा ही कारणान्तर जो अप्रसिद्ध है उससे भी यह वस्तु उत्पन्न होती है-ऐसा ज्ञान रहने पर कारणान्तर का अनुमान करना युक्त है। जो सशिक्षित नहीं है वे तो उसी प्रसिद्ध कारण का अनुमान करेंगे। जैसे वश्चिक विशेष से गोमय का अनुमान शिक्षित ही कर सकता है, अशिक्षित व्यक्ति वश्चिक विशेष में भी वृश्चिक को ही कारण मानेगा, जो मिथ्या ज्ञान है। जहां लिङ्ग ज्ञान मिथ्या है, वहा भी साध्याभास का अनुमान करना यक्त नहीं है। वाष्प धूम के सदृश भासता है, अतः उसे भी धूम मानकर अग्नि के सदश वस्त का अनुमान करना युक्त नहीं है। अर्थात् धूम के सदृश प्रतीत होने वाले नीहार से अग्नि सदृश (लाल) जपाकुसुम की अनुमिति नही देखी जाती। अतः कृत्रिम विभावादि से नट निष्ठ वास्तविक रति के अनकरणभत रति का अनमान नहीं हो सकता। सामाजिक सामान्य जन है वे वास्तविक विभावादि से ही रति का अनमान कर सकते हैं, अप्रसिद्ध कृत्रिम से नहीं, अतः नटनिष्ठ अनमित रति ही होगी, रति का अनुकरण नहीं। अतः अनुक्रियमाण रति रस है-यह कहना उचित नहीं है। यदि कहें कि अक्रुद्ध भी नट क्रुद्ध जैसा प्रतीत होता है, यह क्रोध का अनकरण है। ठीक है, सद के सदृश प्रतीत होता है। यह सादृश्य भृकुटि आदि विकारों द्वारा प्रतीत है। जैसे गौ के सामन गवय ह। यह सादृश्य मुखाद के समान होने पर बीस ही पतीति तो नहीं होता आर सामाजिकों को सादश्य की प्रतीति भी नहीं हाता। सामाजिकों की नट में भावशून्य प्रतीति नहीं होती है ता - ऐसा कहा जाता है। अतः नट में रति के अनुकरण का प्रतिभास होता है, यह कहना व्यर्थ । यदि कहें कि सामाजिकों को नट में ‘यह राम राम है-’ ऐसी प्रतीति होती है, उस प्रतीति . को: यदि पहले निश्चित हुई तो उत्तरकाल में उस पती लम उस प्रतीति का बाध हुआ हो तो उसे मिथ्या गों न माना जाय ? वस्तुतः यह रामह - इस ज्ञान में बाध न होने पर भी मिथ्या ही । अतः जो आपने कहा कि यहा पर बुद्धि का समिश्रण होने से - यह असत् है। हों में भी यह राम ह - एसी प्रतीति होती है। अत: रामत्व, सामान्य रूप सिद्ध हुआ। यह कहना कि विभाव का अनुसन्धान धान (ज्ञान) काव्य से होता है - यह भी समझ में नहीं आता, क्योंकि यह सीता मेरी है - ऐसी सा कोई सीता के प्रति आत्मीयता की प्रतीति ट को नहीं होती। यदि अनुसन्धान का अर्थ पथ आप यह मानते हैं कि विभाव आदि सामाजिकों के लिए उस प्रकार की प्रतीति के र प्य बना दिये जाते हैं तो स्थायी के विषय . अनुकरण की प्रतीति तो " क्योंकि दूसरे नटों में भी यह राम १. अभिनव भारती छठा अध्याय ५६० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र FANT में यह अनुसन्धान अधिक उपयुक्त होगा। क्योंकि उस स्थायी की ही मुख्यता से नट में यह राम है कि प्रतीति सामाजिकों को होती है। और जो आपने “वाग्वाचिकम्” इत्यादि से वाग् और वाचिक में संरम्भपूर्वक भेद कथन कर महान् अभिनयरूपता का विवेचन किया है, उसकी चर्चा आगे की जायेगी। अतः सामाजिक की प्रतीति के अनुसार स्थायी का अनुकरण रस है-यह कथन असत् है। __ नट की प्रतीति के अनुसार भी ऐसा नहीं है। नट को भी ऐसी प्रतीति नहीं होती कि मैं राम का या राम की चित्तवृत्ति का अनुकरण कर रहा हूँ। किसी के सदृश व्यवहार करना ही अनुकरण कहलाता है, मूल व्यक्ति (जिसका अनुकरण नट कर रहा है) उसको देखे बिना उसका अनुकरण कैसे किया जा सकता है। यदि अनु = पश्चात् करण को अनुकरण कहते हैं तो लोक में अतिव्याप्ति हो जायेगी। कोई भी व्यक्ति जो रत्यादि का अनुभव करता है, अनुकर्ता कहलायेगा। उसकी लौकिक भावानुभूति भी रति का अनुकरण होने के कारण रस कहलाने लगेगी। __ यदि कहें नट किसी नियत व्यक्ति का अनुकरण नहीं करता, प्रत्युत किसी भी उत्तम प्रकृति के शोक का अनुकरण करता है - तो विचारणीय है कि किसके द्वारा अनुकरण करता है। शोक के द्वारा शोक का अनुकरण करता है - कहना उचित नहीं, क्योंकि नट में वास्तविक शोक है ही नहीं। अश्रुपात आदि द्वारा भी शोक का अनुकरण सम्भव नहीं। क्योंकि अश्रुपात चक्षु से होता है, शोक मन का व्यापार है, भिन्न से भिन्न का अनुकरण कैसे ? यदि नट के अश्रुपातादि से नट निष्ठ शोक का अनुमान किया जाय तो वह शोक किसी शोक का अनुकरण कैसे कहा जायगा। हां, इतना हो सकता है कि उत्तम प्रकृति नायक का जो शोकानुभव है उसका अनुकरण कर रहा है, तो प्रश्न होता है कि किस उत्तम प्रकृति का ? यदि कहें जिस किसी का तो वह भी विशिष्टता के बिना बुद्धि में कैसे आरोपित हो सकता है ? यदि कहें कि जो इस प्रकार (नट के समान) होता है (उसका अनुकरण नट कर रहा है) तो इस बोध में नट की स्वात्मा भी अनुप्रविष्ट हो जायेगी। अतः अनुकार्यानुकर्तृभाव ही गलित हो जायगा। __क्या नट शिक्षादि अभ्यास के द्वारा स्वभाव (अपने रत्यादि भावों उनके आलम्बनादि का) स्मरण से चित्तवृत्ति के साधारणी भाव से हृदय के संवाद “अनुरूपता” से केवल अनुभावों को प्रदर्शित करता हुआ उचित काकु आदि से (भिन्न कण्ठध्वनि से) काव्य को पढ़ता हुआ चेष्टा करता है, बस इतने मात्र में अनुकरण की प्रतीति है ? तो वह रति के अनुकरण को बोधित नहीं करती। रमणीय वेष के अनुकरण के समान राम की चेष्टा का अनुकरण नहीं है। __वस्तु वृत्त के विवेचक के अनुसार भी उस स्थायी का अनुकरण नहीं हो सकता। क्योंकि अनु = पश्चात् संवेद्यमान (प्रतीत होने वाले) को वस्तुवृत्त नहीं कहा जा सकता। Re रस-सिद्धान्त भट्टतौत, अन्यमत ५६१ भरत मुनि ने ऐसा नहीं कहा है कि स्थायी का अनुकरण रस है। इस विषय में मुनि का कोई लिङ्ग (हेतु या हेतु बोधक वचन) भी नहीं मिलता। प्रत्युत विपरीत में ध्रुवा-गान तालवैचित्र्य-लास्याङ्गरूप अभिनय के उपजीवन (पोषक) का निरूपण आदि को लिङ्ग कहते हैं। ऐसा संध्यङ्ग अध्याय के अन्त में विस्तार पूर्वक विवेचन किया जाएगा। __ “सप्तद्वीपानुकरणम्’ जो मुनि ने कहा है। इसकी दूसरी व्याख्या है। यदि आप कहें कि सप्तद्वीप के सारे चरित्रों का अनुकरण नाट्य है तो स्थायी का भी अनुकरण नाट्य है; इस प्रकार स्थायी का भी अनुकरण माना जा सकता है, वही रस है तो रति का भी अनुकरण मान लें, तो भी उसका नाम रस कहां से हो जाएगा ? नाट्य नाम ही होगा। कान्ता के वेष-गति आदि के अनुकरण में नामान्तर कहां है। अतः स्थायी का अनुकरण रस नहीं है। यह कहना कि आलेख्य में हरतालादि वर्णों (रगों) के संयोग से गाय की प्रतीति होती है-यहां यदि संयुज्यमान का अभिव्यज्यमान अर्थ इष्ट है, तो असत् है। क्योंकि जैसे प्रदीप से वास्तविक घटादि की अभिव्यक्ति होती है, वैसे ही सिन्दूरादि से वास्तविक गौ की अभिव्यक्ति नहीं होती। किन्तु तत्सदृश अवयव समूह का सन्निवेश बनता है। इसीलिए सिन्दूरादि गौ के अवयव सन्निवेश के सदृश सन्निवेश (आकृति) विशेष से स्थित गोसदृश इस प्रतीति के विषय होते हैं। इस तरह विभावादि समूह रति सादृश्य की प्रतीति के विषय नहीं हैं। अतः भावानुकरण रस है-यह कथन असत् है।

मतान्तर का खण्डन

यहां एक मत और उद्धृत है, जिसका नामोल्लेख नहीं किया गया है। यह मत सांख्य दृष्टि से है - “येन त्वभ्यथायि….. तत् कियदत्रोच्यताम्” २ सुख-दुःख को उत्पन्न करने की शक्ति से युक्त विषय सामग्री (रस की सामग्री विभावादि) बाह्य वस्तु ही है। सांख्य की दृष्टि से सुख-दुःखात्मक रस है। उस सामग्री में दाल के स्थान पर विभाव है, उसका संस्कार करने वाले पदार्थ अनुभाव और व्यभिचारी भाव है। स्थायी तो इन सामग्री से जन्य आन्तर है- सुख दुःखात्मक है - ऐसा जिसने कहा है, उसने ‘स्थायीभावान् रसत्वम् उपनेष्यामः’ स्थायी भावों को रसत्व प्राप्त करायेंगे - इस भरत मुनि के वाक्य में उपचार को स्वीकार कर अपने मत में ग्रन्थ का विरोध स्वयं समझकर दूषण प्रदर्शन करने की मूर्खता से प्रामाणिक जनों को बचा लिया। इसलिए इसको क्या कहा जाय ? जो अत्यन्त प्रतीति की विषमता का प्रसङ्ग है, वह यहां कितना कहा जाय। इस मत में दोष सुस्पष्ट है - (१) इसने विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव को बाह्य माना है। जब कि लौकिक रत्यादि के कारण और कार्य बाह्य है। नाट्य या काव्य से समर्पित विभावादि आन्तर ही हैं। १. भरत नाट्य शास्त्र २. नाट्य शास्त्र अभिनव भारती छठा अध्याय। ५६२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र (२) अनुभाव और व्यभिचारी भाव को संस्कारक द्रव्य मान कर उनसे संस्कृत दाल स्थानीय विभाव को माना अर्थात् अनुभाव और व्यभिचारी भाव से स्थायीभाव का संस्कार नहीं हुआ विभाव का ही हुआ। उनसे जन्य आन्तर स्थायी को जो सुख-दुःख स्वभाव वाला है, रस है, यदि जन्य का उबुद्ध या अभिव्यक्त अर्थ भी मान लिया जाय (क्योंकि स्थायी वासना रूप से चित्त में स्थित रहते हैं) अतः ये उबुद्ध या अभिव्यक्त ही होंगे। तो शुद्ध स्थायी ही इनके मत में रस हुआ, जब कि भरत कहते हैं - “स्थायी भावों को रसता प्राप्त करायेंगे।” इस उक्ति को इन्होंने औपचारिक प्रयोग माना। अर्थात् स्थायी ही रस है उसको रसता प्राप्त कराने की बात लाक्षणिक है। अतः इसका मत ग्रन्थकार के विरुद्ध है। सांख्य दृष्टि से व्याख्या है अतः सत्कार्यवादी है। कार्य अपने कारण में सूक्ष्म रूप से रहते हैं, अतः रत्यादि की स्थिति अपने विभाव मे हुई, इत्यादि विरोध है और स्वगत परगतत्व का भी विकल्प करना ही है। .

.. - AM रस-सिद्धान्त ‘भट्टनायक मत’ ५६३

भट्टनायक मत

भट्ट नायक के अनुसार’ रस न प्रतीत होता है, न उत्पन्न होता है न अभिव्यक्त होता है। स्व (सामाजिक) गत रस की प्रतीति मानने पर करुण में दुःख होगा। दुःख की प्रतीति युक्त नहीं है। सीतादि सामाजिक का विभाव नहीं है, अतः सामाजिकों को अपनी कान्ता की स्मृति का संवेदन (अर्थात् स्मरण) न होने से, जहां देवता आदि विभाव है वहां सामाजिक का उनमें साधारणीकरण की योग्यता न होने से, (हनुमान् द्वारा किया गया) समुद्र लङ्घन आदि कार्य की असाधारणता के कारण (सामाजिक गत रस की प्रतीति संभव भी नहीं है) रतिमान् राम की स्मृति भी नहीं होती, स्मृति पहले अनुभूत वस्तु की होती है। रत्यादिमान् राम का सामाजिक ने पहले अनुभव नहीं किया है, अतः उनका संस्कार नहीं है तो अनुपलब्ध होने के कारण स्मृति नहीं होगी और शब्द या अनुमानादि से रस (रति) की प्रतीति होने पर उससे (सामाजिक को) प्रत्ययानुभूति के समान सरसता नहीं होगी, परोक्षात्मक प्रतीति होगी। (यदि प्रत्यक्ष प्रमाण से रस की प्रतीति मानें तो) नायक नायिका की रति, क्रीडा आदि के प्रत्यक्ष होने पर रस के बदले लज्जा-जुगुप्सा स्पृहा आदि (सामाजिकों की चित्तवृत्ति के अनुरूप) दूसरी-दूसरी वृत्तियां उदित होंगी जिससे व्यग्रता के कारण (यह रस) आकाश रस अर्थात् मिथ्या हो जायेगा। इसलिये रस की प्रतीति को प्रत्यक्ष प्रमाण जनित अनुभव या स्मृति रूप मानना युक्त नहीं है। उत्पत्ति पक्ष में भी ये सभी दोष है। अभिव्यक्ति पक्ष मानने में शक्ति रूप से पूर्वस्थित (रस) की पश्चात् विभावादि से अभिव्यक्ति मानने में विभावादि विषयों में तरतम होने से रस में भी तारतम्य आ जाएगा। जैसे व्यंजक दीप का प्रकाश मंद होता है तो वस्तु भी मन्द ही दीखती है स्फुट तो तीव्र प्रकाश में ही होती है वैसे ही विभावादि की अल्प में रस अल्प, वृद्धि में रस की वृद्धि होगी। इसलिये काव्य में दोष का अभाव गुण अलङ्कार की विशिष्टता से नाट्य में चतुर्विध (आङ्गिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक) अभिनय रूप से सामाजिक के अपने घने मोह (अज्ञान) का सङ्कट (निवारण) करने वाले विभावादि के साधारणीकरण स्वरूप अभिधा से भिन्न जो द्वितीय अंश भावकत्व व्यापार है उससे साधारणीकृत रस अनुभव-स्मृति आदि से विलक्षण (भिन्न) रजोगुण तथा तमोगुण के अनुबेध (मिश्रण) की विचित्रता से चित्त की दृति विस्तार-विकास स्वरूप सत्त्व गुण के उद्रेक, रजोगुण तमोगुण को अभिभूत कर प्रकट १. भट्टनायकस्तु आह - परब्रह्मास्वाद सविधेन भोगेन भुज्यते इति। अभिनवभारती अ. ६

अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र होने से प्रकाश आनन्द स्वरूप जो अपने (आत्मस्वरूप) संविद में विश्रान्ति रूप परब्रह्मास्वाद सदृश (रस) भोग (भोजकत्व) व्यापार से भोगा जाता है।

लोचन में प्रतिपादित भट्टनायक मत

रस यदि पर (नट या नायक) गत प्रतीति हो तो सहृदय से उसका सम्बन्ध नहीं होगा अतः वह अनास्वाद्य हो जायगा = उसका स्वाद प्राप्त नहीं होगा) रामादि के चरितमय काव्य से स्व (= सामाजिक) गत प्रतीति नहीं हो सकती। क्योंकि सामाजिक गत (रति की) प्रतीति मानने पर सामाजिक में रति की उत्पत्ति स्वीकार करनी पड़ेगी। उसकी चित्तवृत्ति ही प्रत्यक्षात्मक (अनुभवात्मक) होती है इसलिये इस चित्तवृत्ति की उद्भूतता आवश्यक है। विषय के बिना प्रत्यक्ष हो नहीं सकता। परन्तु सामाजिक गत रस (रत्यादि) की उत्पत्ति अयुक्त है। सीतादि सामाजिकों का विभाव नहीं है। कान्तात्व जो सीतादि सर्वनायिका का साधारण धर्म है वह सामजिक की कान्ता में भी है। वही सामाजिक गत रत्यादि वासना के विकास का हेतु जो विभाव, उसकी विभावता का प्रयोजक है। सीतादि मानुषी है अतः उनमें सामाजिकों को कान्तात्व की प्रतीति होती है उसी प्रतीति से सहृदयों की रति उबुद्ध हो जाएगी - ऐसा भी नहीं कह सकते। क्योंकि देवता के वर्णन में, अपनी माता आदि के वर्णन में पूज्यत्व बुद्धि होने से काम्यत्व रूप कान्तात्व की प्रतीति प्रतिबन्धित हो जाएगी। यदि कहें कि काव्यादि से सीता आदि का ज्ञान होने पर मध्य में सहृदयों की रति उबुद्ध हो जाती है तो यह बात नहीं। कान्ता का स्मरण भी मध्य में नहीं होता। अलोक सामान्य रामादि का जो समुद्र में सेतु बांधना आदि कार्य है। सहृदयों के उत्साह का उद्बोधक विभाव है, वे सर्वसाधारण कैसे होंगे ? समुद्र में सेतु बांधना सहृदयों में उत्साह तब पैदा करता है जब सहृदयों को उसमें अपनी कृति से साध्य करने की बुद्धि हो। (क्षमता का ज्ञान हो) या स्वहृदय संवाद हो अर्थात् वे समझ सकें कि ऐसा हो सकता है, मैं भी कर सकता हूं। परन्तु न तो उनको स्वकृतिसाध्यत्वबुद्धि ही होती है और न इसे उनका हृदय समर्थन देता है। रामादिगत उत्साहादि स्थायी का स्मरण सहृदयों को हो जाता है जिससे उनका उत्साह उबुद्ध हो जाता है यह कहना उचित नहीं। क्योंकि पूर्व में अनुभव की गई वस्तु का स्मरण होता है। रामादि का सामाजिकों को अनुभव नहीं है। __ काव्य के शब्दों से रामादि के उत्साह का ज्ञान हो जाता है-यह कहना उचित नहीं। क्योंकि शब्दों से सहृदयों को रसोद्बोध नहीं होता है। रत्यादि की उत्पत्ति पक्ष में-सहृदयों में जैसे रति के उत्पन्न होने से सुख होता है वैसे ही करुण की उत्पत्ति में दुःख होने से करुण रस प्रधान नाटकों में सहृदयों की प्रवृत्ति नहीं होगी। इसलिए रस की रत्यादि भावों की न प्रतीति होती है, न उत्पत्ति होती है और न अभिव्यक्ति। शक्ति (सूक्ष्म वासना) रूप से स्थित रति आदि की अभिव्यक्ति मानने पर रत्यादि के विषय (अभिव्यक्ति के साधन कान्तादि) के प्रतिपादन में तर तम भाव की प्रवृत्ति होगी। जैसे अन्धकार में रखे हुए घटादि की अभिव्यक्ति के लिए अभिव्यक्ति का उपाय आलोक के अधिकाधिक सम्पादन में लोगों रस-सिद्धान्त ‘भट्टनायक मत’ ५६५ की प्रवृत्ति होती है, उसी तरह वासना रूप से अन्तःकरण में स्थित रत्यादि की अधिकाधिक अभिव्यक्ति के लिए विभावादि का अधिकाधिक अनुभव करने में सामाजिकों की प्रवृत्ति होगी। क्योंकि विषय का अधिकाधिक अनुभव होने से वासना की स्फुट रूप से शीघ्र ही अभिव्यक्ति संभव है। इस पक्ष में प्रश्न है कि रस की अभिव्यक्ति सामाजिक गत होती है या पर (नट नायाकादि) गत। इसमें भी प्रतीति पक्ष के समान दोष है। नट या नायक गत मानने पर उसका सामाजिकों को स्वाद नहीं मिल सकता। सामाजिक गत हो नहीं सकता क्योंकि सीतादि सामाजिकों का विभाव नहीं है। अतः काव्य से रस न प्रतीत हो सकता है, न उत्पन्न हो सकता है और न अभिव्यक्त हो सकता है-इस शङ्का के बाद समाधान प्रस्तुत करते हैं-काव्य के शब्दों में तीन अंशों वाला सम्बन्ध (व्यापार) होता है। इसलिए यह लौकिक और शास्त्रीय आदि शब्दों से भिन्न (विलक्षण) होता है। उसमें वाच्यार्थ विषयक अभिधा अंश है। रस (रत्यादि) विभावादि विषयक भावकत्व = भावना अंश है। भोगकृत्व सहृदयविषयक है। ये तीन अंश (व्यापार) हैं। काव्य में अभिधा अंश (व्यापार) यदि शुद्ध होता (व्यापारान्तर से असम्बद्ध होता तो उसका तन्त्र से या एक शेष - जो शास्त्रन्याय है, उनसे श्लेषादि से क्या भेद होता। अर्थात् तन्त्र से या एक शेष से भी अनेक अर्थों की प्रतीति होती है। श्लेष से भी एक शब्द से अनेक अर्थ निकलते हैं तो इनमें क्या भेद होता ? उपनागरिकादि वृत्तियों का भेद मानना भी लाभप्रद नहीं। काव्य में यदि अभिधा ही है तो उपनागरिका आदि वृत्ति भेद कुछ नहीं कर सकता। श्रुतिकटु आदि दोषों का वर्जन भी व्यर्थ होता। अतः काव्य में रसभावना नामक दूसरा व्यापार है, जिससे काव्य की अभिधा विलक्षण हो जाती है। रसों के प्रति काव्य का जो भावकत्व व्यापार है, वह रस रत्यादि का और विभाव-अनुभाव-व्याभिचारी भावों का साधारणीकरण है। साधारणीकरण हो जाने पर उस रत्यादि रस का भोग होता है जो लौकिक अनुभव स्मरणादि प्रतीतियों से विलक्षण है। द्रुति-विस्तार-विकास स्वरूप रजोगुण तमोगुण की विचित्रता से मिश्रित सत्वमय जो चित्स्वभाव (स्वात्मचैतन्य रूप) निवृत्ति, उसमें विश्रान्ति (विगलित-वेद्यान्तरतया स्थिति) स्वरूप ब्रह्मास्वाद संविधवर्ती रस है। वह भोग ही प्रधानभूत अंश सिद्धरूप है। अभिनवगुप्त का कहना है कि भोगीकरण व्यापार ध्वनन (व्यञ्जना) ही है। केवल काव्य के शब्द भाव नहीं होते न केवल अर्थ ही-दोनों भावक होते हैं। अतः व्यञ्जना व्यापार रूप करण से, गुणालङ्कारौचित्यादि रूप इतिकर्तव्यता से, काव्य भावक, रस की भावना कराता है। भोगकृत्व रस की ध्वननीयता (व्यङ्ग्यता) सिद्ध होने पर दैव सिद्ध है।’ . १. ध्वन्यालोक लोचन २ उद्योत का ४५६६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र

मम्मट द्वारा प्रतिपादित भट्टनायक मत

भट्टनायक के मत का प्रतिपादन करते हुए आचार्य मम्मट कहते है-न तटस्थ (अनुकार्य या अनुकर्ता) गत न आत्म (सामाजिक) गत रस की प्रतीति उत्पत्ति या अभिव्यक्ति होती है। अपितु काव्य और नाट्य में अभिधा से द्वितीय विभावादि के साधारणीकरण स्वरूप भावकत्व व्यापार से भाव्यमान (साधारणीकृत) स्थायी सत्त्वगुण के उद्रेक से प्रकाशित आनन्दमय संविद् में विश्रान्ति के सदृश भोग (भोजकत्व व्यापार) से आस्वादित किया जाता है।’

पण्डितराज के अनुसार भट्टनायक मत

पण्डितराज जगन्नाथ के अनुसार तटस्थ भाव से (नायकगत या नट गत) रस की प्रतीति होने पर रस अनास्वाद्य (उसमें आस्वाद नहीं) होगा। आत्म (सामाजिक गत रस की प्रतीति दुर्घट है अर्थात् हो ही नहीं सकती, शकुन्तला आदि सामाजिकों का विभाव नहीं है। बिना विभाव के आलम्बन रहित रत्यादि की प्रतीति नहीं हो सकती। यदि कहें कि कान्तात्व जो आलम्बन विभाव का साधारण (सामान्य) धर्म है वह शकुन्तलादि (उनका रूप धारण करने वाली नटी) में भी है जो उसी को आलम्बन कर रस की प्रतीति हो जाएगी-ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि अप्रामाणिक निश्चय से अनालिगित (अस्पृष्ट-शून्य) विशेष्यता सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकअगम्यात्वप्रकारकज्ञान के अभाव से विशिष्ट कान्तात्व विभावता का प्रयोजक होगा। अर्थात् “इयम् अगम्या”-इस ज्ञान में अगम्यात्वविशेषण (प्रकार) है। इयम् पद का अर्थ नायिका विशेष्य है, ज्ञान तो अन्तःकरण में या आत्मा में होता है। वह विशेष्यता सम्बन्ध से नायिका में रहेगा। जो ज्ञान जिस सम्बन्ध से ज्ञात होता है उसका अभाव भी उसी सम्बन्ध से ज्ञात होता है। इस सिद्धान्त से अगम्यात्वप्रकारकज्ञान का अभाव भी कान्ता में विशेष्यता सम्बन्ध से ज्ञात होगा। अतः अगम्यात्वप्रकारकज्ञान का अभाव विशेष्यता-सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक अभाव होगा। अर्थात् अप्रामाणिक निश्चय से रहित अगम्यात्वप्रकारकज्ञान का अभाव जिस कान्ता में रहेगा वही कान्ता विभाव हो सकती है। अन्यथा बहन आदि जो अगम्या है, उनमें भी कान्तात्व है, वे भी शृङ्गार का आलम्बन विभाव होने लग जायेगी। इसी तरह करुणादि रसों में अशोच्यत्व, कापुरुषत्व आदि ज्ञान विरह विशिष्ट ही आलम्बन होगा। अगम्यात्वप्रकारकज्ञान का अभाव किसी दूसरे प्रतिबंधक ज्ञान के निरूपण बिना असम्भव है। यदि आप कहें सामाजिक की दुष्यन्तादि से अभेद बुद्धि ही अगम्यात्व प्रकारक ज्ञान का अभाव कर देगी-जो यह कहना उचित नहीं, क्योंकि नायक में धराधुरीणता तथा धीरता का ज्ञान और अपने में का-पुरुषता और आधुनिकता आदि विरुद्ध धर्मों की स्फुट प्रतीति हो रही है तो अभेद बोध कैसे होगा ? यदि आहार्याभेद करे तो साधर्म्य की अपेक्षा होगी। १. न ताटस्थ्येन नात्मगतत्वेन .., भोगेन भुज्यते, काव्य प्रकाश चतुर्थ उल्लास २. भट्टनायकास्तु…. साधारणात्मा स्थायी रसः। रस गङ्गाधर-प्रथम आनन tiger रस-सिद्धान्त ‘भट्टनायक मत’ ५६७ प्रश्न यह है कि रस रूप से अभिमत यह प्रतीति क्या है ? यदि कहें कि काव्य शब्द से जन्य होने क कारण यहां प्रत्यक्षादि प्रमाण न होने से शाब्दी प्रतीति है, तो लौकिक व्यवहार में प्रयुक्त शब्दों से जन्य नायक-नायिका की रति क्रीडा वृत्तान्त का ज्ञान जैसे चमत्कारी नहीं होता वैसे यह भी चमत्कारी नहीं होगी। यह प्रतीति मानसी भी नहीं है, चिन्तन के द्वारा उपनीत उन्हीं पदार्थों की मानसी प्रतीति में विलक्षणता का अनुभव होता है अर्थात् मानसी की अपेक्षा रस-प्रतीति में चमत्कार का अनुभव होता है। इस रस प्रतीति को स्मृति भी नहीं कह सकते, उसके पहले कभी अनुभव नहीं हुआ है, पूर्वानुभूत पदार्थों का ही स्मरण होता है। .. __ इसलिए काव्य में अभिधा से नाट्य में चतुर्विध अभिनय से विभावादि पदार्थों का ज्ञान होता है। तत्पश्चात् भावकत्व व्यापार (जो व्यापार अंश है) विभावादि में जो अगम्यात्व प्रकारक रस विरोधी ज्ञान है उनका प्रतिबन्ध कर देता है और उनको कान्तात्व आदि रस के अनुकूल धर्म से पुरस्कृत कर उपस्थित करता है। इस तरह वह भावकत्व - व्यापार दुष्यन्त-शकुन्तला-देश काल-वय-दशा आदि सबको साधारण बनाकर (अर्थात् उनके रस विरोधी धर्मों को हटाकर) समाप्त हो जाता है। तब तृतीय भोगकृत्व व्यापार की महिमा से रजोगुण-तमोगुण का निगरण कर सत्त्व का उद्रेक कर दिया जाता है। जिससे सामाजिक अपने (आत्मा के) चित्स्वरूप आनन्द में विश्रान्ति (वेद्यान्तर सम्पर्क शून्य हो कर स्थिर होना) रूप साक्षात्कार (अपरोक्ष ज्ञान) करता है उस साक्षात्कार के द्वारा विषय बनाया गया भवना के द्वारा उपनीत साधारणीकृत रत्यादि स्थायीभाव रस है। यहाँ साक्षात्कार ही भोग है उसका विषय रत्यादि स्थायी भाव ही रस है। इस मत में भोग का विषय रत्यादि या रत्यादि का भोग-दोनों रस है। यह भोग विभावादि विषय से सम्पृक्त रहने के कारण ब्रह्मास्वाद सविधवर्ती है, न कि ब्रह्मस्वाद ही है। इस प्रकार काव्य के तीन अंश है:-अभिधा, भावना-भोगकृत्व (= भोजकत्व)। भट्टनायक कृत रस सूत्र की व्याख्या सांख्य दर्शन के अनुसार है। सांख्य दर्शन में सत्त्वादिगुणों का तथा उनके अन्योन्याभिभव का गुणों के उद्रेक का, तथा भोग का प्रतिपादन है।

अभिनव कृत भट्टनायकमत समीक्षा

भट्टनायक मत की समीक्षा करते हुए आचार्य अभिनव कहते हैं-प्रतीति आदि से अतिरिक्त संसार में भोग क्या है ? यह समझ में नहीं आता। यदि यह भोग रसना है, तो वह भी प्रतीति ही हैं केवल उपाय की विलक्षणता से नामान्तर हो गया है, जैसे प्रत्यक्ष अनुमिति, उपमिति, शाब्द प्रतिभा आदि। रस की निष्पत्ति (उत्पत्ति) या अभिव्यक्ति दोनों अस्वीकार कर देने से रस या तो नित्य हो जायेगा या असत् हो जायेगा। तीसरी कोई गति नहीं है। अप्रतीत वस्तु व्यवहार के योग्य नहीं होती। यदि कहें कि भोग ही रस की प्रतीति ५६८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र है और वह द्रुत्यादि रूप है, तो भी उतना ही नहीं है जितने रस है उतने ही प्रकार के रसनात्मक भोग की प्रतीति होगी। सत्त्वादि गुणों के अगाड्गिभाव भेद से चित्त की अनन्त अवस्था हो सकती है द्रुति विस्तार-विकास यह तीन ही क्यों ? __ यह कहना कि “काव्य द्वारा रस भावित होते हैं” इसका तात्पर्य है कि विभावादि जनित चर्वणात्मक आस्वाद रूप प्रतीति का विषय बनाना ही भावना है, तो ठीक ही है; जैसा कि कहा है “संवेदनारव्यया व्यङ्ग्यः परसंवित्तिगोचरः। आस्वादनात्मानुभवो रसः काव्यार्थ उच्यते”।।’ इति। __ यहां व्यज्यमान (व्यञ्जना से बोध्य) व्यङ्ग्य को संवेदन पद लक्षित करता है, और अनुभव पद रस को अनुभव का विषय सिद्ध करता है। . १. अभिनव भारती .

५६६ रस-सिद्धान्त ‘अभिनवगुप्त’

अभिनवगुप्तपादाचार्य मत

अभिनवगुप्त के अनुसार’ काव्यार्थ रस है। काव्यात्मक शब्द से भी अधिकारी को ही अधिक रस की प्रतीति होती है। अधिकारी यहां विमल प्रतिभाशाली सहृदय है। उसको ‘ग्रीवाभङ्गाभिरामम्’ ‘उमाऽपि नीलालक” ‘हरस्तु किञ्चित्" इत्यादि वाक्यों से वाक्यार्थ प्रतीति के अनन्तर मानसी साक्षात्कारात्मक (उन-उन वाक्यों में वर्णित कालादि विभाग को दूर करने वाली) प्रतीति होती है। उस प्रतीति में जो मृग-शावक आदि विषय भासते हैं वे साधारणीकृत होते हैं अतः उसका विशेष रूप न होने से ‘भीत है’-यह ज्ञान, भय देने वाले दुष्यन्त के वास्तविक नहीं होने से केवल भय ही देश काल आदि से असम्बद्ध भासता है। उसी से ‘मैं भीत हूं, यह भीत है या शत्रु, मित्र, मध्यस्थ भीत है’- इत्यादि प्रतीति से सुख-दुःख आदि को देने वाले बुद्धयन्तर (=दूसरे ज्ञान वेद्यान्तर) के नियमन (नियन्त्रण) होने से विघ्न बहुल ज्ञानों से विलक्षण निर्विघ्न प्रतीति से ग्रहण करने योग्य (भय ही) साक्षात् हृदय में प्रविष्ट होता हुआ सा, आंखों के सामने घूमता हुआ सा भयानक रस है। इस प्रकार के भय में आत्मा अत्यन्त तिरस्कृत नहीं होता, न विशेषतः उल्लिखित ही होता है। इसी प्रकार अन्य रस भी होते हैं। इसीलिए (विभावादि का) साधारणीकरण परमित ही (अर्थात् उसी देश काल में ही) नहीं होता, अपितु विस्तृत रूप से होता है। जैसे धूम और अग्नि का व्याप्तिग्रह, अथवा भय और कम्प का व्याप्तिग्रह, विस्तृतरूप से होता है और इसमें साक्षात्कार के समान होने वाली प्रतीति की पोषिका नटादि सामग्री है। जिसमें वस्तुतः विद्यमान काव्य द्वारा समर्पित देश-काल-प्रमाता आदि के नियम हेतुओं के परस्पर प्रतिबन्ध को बलाद् अत्यन्त दूर कर दिये जाने पर वही साधारणीकरण सुतरां पुष्ट होता है। इसीलिये सभी सामाजिकों को एक घन रूप (समान रूप) से प्रतीति होती है। जो रस का परिपोषक होती है। अनादि वासना से वासित चित्त वाले सभी सामाजिकों की वासना एक समान होती है। अतः सभी को एक समान रस प्रतीति भी होती है। वह विघ्नरहित संवित् (प्रतीति) चमत्कार है। सर्वथा वीतविघ्न रसनात्मक प्रतीति से ग्राह्य (प्रतीति का विषय) भाव ही रस है। उसमें विघ्नों को दूर करने वाले विभाव आदि हैं। लोक में सकल विघ्नों से विनिर्मुक्त प्रतीति ही चमत्कार, निर्वेश, रसन, आस्वादन, भोग, समापत्ति, लय, विश्रान्ति आदि शब्दों से कही जाती है। १. नन्वेवं कथं रसतत्वम् आस्तां, किं कुर्मः… तत्काव्यार्थो रसः। अभिनवभारती अं. ६. २. अभिज्ञान शाकु. १/६ ३. कुमार संभव ३/६२ ४. वही ३/६७ ५७० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र लोचन में आचार्य अभिनवगुप्त ने कहा “रसो न प्रतीयते’ इत्यादि भट्टनायक की उक्ति पूर्वपक्ष का उत्थान न होने से ही उपहत हो गया। रामादि का चरित सबके हृदय का संवादी नहीं होता-यह कहना महान् साहस हैं क्योंकि चित्त विचित्रवासनाओं से युक्त होता है। जैसा कि योगसूत्र-कार ने कहा है-“तासामनादित्वम् आशिषो नित्यत्वात्। जाति-देश-काल व्यवहिताना-मप्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्” इति वे वासनाएं अनादि हैं क्योंकि आशंसा अर्थात् अपने कल्याण की इच्छा नित्य है। इसलिये जाति (जन्म) देश, कालकृत व्यवधान होने पर भी वासनाओं का व्यवधान नहीं होता क्योंकि स्मृति और संस्कार एकरूप होते हैं। इससे रस की प्रतीति तो सिद्ध हो गई। वह प्रतीति रसनारूप (आस्वादमयी) होती है। इसके विषय में वाच्य-वाचक का अभिधा से पृथक् व्यञ्जना रूप ध्वनन व्यापार ही है। भोगीकरण व्यापार भी काव्य का रस विषयक ध्वननरूप ही है दूसरा कुछ नहीं, भावकत्व भी समुचित गुणालङ्कार का परिग्रह (उन-उन रसों के अनुरूप गुण और अलङ्कारों से युक्त होना) ही है यह हमारे ही द्वारा विस्तृत रूप से कहा जायगा। काव्य रसों का भावक होता है-यह जो भट्ट नायक कहते हैं, उस कथन से स्वयं ही भावन (= काव्य द्वारा रसोत्पादन को स्वीकार करने) के कारण उत्पत्ति पक्ष को ही प्रत्युज्जीवित कर दिये किन्तु केवल काव्य के शब्द ही भावक नहीं होते, अर्थ का ज्ञान न होने से काव्य शब्दों में भावकता नहीं रहती केवल अर्थों की भी भावकता नहीं है। लौकिक वाक्यों से उन्हीं अर्थों के प्रतिपादन में रसभावकता नहीं रहती। शब्द अर्थ दोनों की भावकता तो हमने भी कही है यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थ व्यङ्क्तः। जहां शब्द और अर्थ उस (प्रतीयमान) अर्थ को व्यक्त करते हैं इत्यादि। अतः व्यञ्जकत्व नामक व्यापार से गुणालङ्कार का औचित्यादि रूप इतिकर्तव्यता से भावक काव्य रस को भावित करता है। इस प्रकार तीन अंशों वाली भावना में करण अंश में ध्वनन (व्यञ्जना) ही आती है भोग भी काव्य के शब्द से नहीं किया जाता। (यहां नहीं पर काकु है अर्थात् किया जाता है।) अपितु घने मोहरूप अन्धकार (अज्ञान) से जो सङ्कटता (आनन्दांश का आवृत हो जाना) उसकी निवृत्ति (निवारण) के द्वारा ‘आस्वाद’ का दूसरे नाम वाले अलौकिक द्रुति विस्तार विकासात्मक भोग करने में अलौकिक ध्वनन व्यापार ही मूर्धाभिषिक्त है। वह भोगकृत्व रस के ध्वननीय सिद्ध होने पर दैवसिद्ध हो जाता है। क्योंकि RRESTINAMESeptailer १. लोचन-ध्वन्यालोक २ उ. ४ की टीका २. योगसूत्र ४/१० ३. वही ४/६ ४. ध्वन्यालोक १/१३ रस-सिद्धान्त ‘अभिनवगुप्त’ ५७१ रस्यमानता से उदित चमत्कार से अतिरिक्त भोग नहीं है। सत्त्वादि गुणों के (न्यूनता अधिकता के कारण) अङ्गाङ्गीभाव की विचित्रता की अनन्तता के कारण द्रुति, विस्तार, विकासरूप से आस्वाद की गणना उचित नहीं है। इस रसास्वाद का सादृश्य परब्रह्मास्वाद से है, और काव्य का व्युत्पादन (व्युत्पत्ति) शास्त्र के शासन, इतिहास के प्रतिपादन से विलक्षण होता है। जैसे राम आचरण करते हैं वैसे मुझे भी करना चाहिये-इस उपमान से अतिरिक्त रसास्वाद का उपायभूत अपनी (सहृदय की) प्रतिभा का विकास रूप व्युत्पत्ति भी काव्य कराता है, अतः किसको उपालम्भ दें। इससे यह निश्चित हुआ कि रस अभिव्यक्त होते हैं और प्रतीति के द्वारा ही आस्वादित होते हैं अतः प्रतीतिरूपा ही रसना है। इसकी अभिव्यक्ति प्रधान रूप से हो या गौण रूप से। प्रधान रूप से होने पर ध्वनि कहलायेगा और गौण रूप से होने पर रसवदादि अलङ्कार कहलायेगा। इनके अनुसार रससूत्र में आये संयोग शब्द का अर्थ व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव सम्बन्ध है। निष्पत्ति का अर्थ अभिव्यक्ति है। इनके मत में भावकत्व नामक व्यापार को स्वीकार करने में गौरव है। इसके बिना भी कार्य सिद्ध हो सकता है।

मम्मट द्वारा प्रतिपादित अभिनव मत

मम्मट ने आचार्य अभिनव गुप्त के मत का प्रतिपादन इस प्रकार किया है-१ (लोके प्रमदादिभिः…. शृङ्गारादिको रसः। काव्यप्रकाश चतुर्थ उल्लास) लोक में प्रमदा आदि (कटाक्ष, निर्वेदादि) से (रत्यादि) स्थायी के अनुमान करने के अभ्यास में पटुता शाली (पटु) सामाजिकों का काव्य (श्रव्य) और नाट्य (दृश्य) में उन्हीं प्रमदादिकों से, जो लोक में कार्य, कारण, सहकारी है वे कारणत्व, कार्यत्व, सहकारित्व को त्याग कर विभावन ( वासनारूप से = सूक्ष्म रूप से स्थित रत्यादि को आस्वाद के योग्य बनाना) अनुभावन (उन रत्यादिकों को अनुभव का विषय बनाना) व्यभिचारण (= वि. अभि. चारण) विशेषेण आभिमुख्येन संचारणम् अर्थात् शरीर में विशेष रूप से रस के अनुकूलतया सञ्चारण) रूप व्यापारवान होने के कारण अलौकिक विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी शब्दों से व्यवहार के योग्य हो जाते हैं। विभावन आदि व्यापारों की अलौकिकता यह है कि लोक में उन्हीं कारणों से रत्यादि का उद्बोध नहीं होता, काव्य में होता है और हर्ष और शोक के कारणों से हर्ष और शोक ही होते हैं परन्तु काव्य और नाट्य में दुःख के कारणों से भी सुख ही होता है। ये विभावादि, मेरे ही हैं, शत्रु के ही हैं, उदासीन के ही हैं, मेरे नहीं है, शत्रु के नहीं हैं, तटस्थ के नहीं हैं - इस सम्बन्ध विशेष का स्वीकार और परिहार नियमों का निश्चयात्मक ज्ञान न होने से विशेष धर्म जैसे शकुन्तला में रहने वाले शकुन्तलात्व, दुष्यन्तपत्नीत्व आदि को त्यागकर कामिनी रूप साधारणतया प्रतीत होते हैं। उनसे सामाजिकों के चित्त में वासनारूप से स्थित रत्यादि स्थायी व्यक्त हो जाता है; वह नियत प्रमाता में स्थित होने पर भी साधारणोपाय के बल से (सामान्य रूप से प्रतीत होने वाले साधारणीकृत विभावादि के बल से) तत्काल (रसानुभव काल में) सामाजिकों की परिमित प्रमातृभाव (मैं और मेरा) विगलित हो जाने से Tr ५७२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र उद्भूत हुए वेद्यान्तर सम्पर्क शून्य (अन्य ज्ञेय पदार्थो के सम्बन्ध से रहित) अपरिमित भाव से प्रमाता (रसास्वादयिता) सामाजिक के द्वारा सकल सहृदयों के संवादशाली साधारण रूप से चर्वणात्मक संवेदन का विषय बनाया गया (यद्यपि चर्वणा अर्थात् आस्वाद ही रस है वह आस्वाद से भिन्न नहीं है, तो आस्वाद का विषय कैसे होगा ? इसका समाधान करते हैं-स्वाकार के समान अर्थात् जैसे योगाचार के मत में ज्ञान का आकार विशेष ही बाह्य विषय है, ज्ञान से भिन्न नहीं, तो ज्ञान रूप विषय को ज्ञान का विषय ज्ञेय मानता है। जैसे आत्मसाक्षात्कार में आत्मा ही विषय और विषयी दोनों हैं, उसी तरह चर्वणा = आस्वाद से अभिन्न भी रस, चर्वणा = अस्वाद का विषय बनता है) आस्वाद ही एक मात्र प्राण है जिसका, विभावादि ही जीवन का अवधि है, जिस का, पानक रस न्याय से (जैसे इलायची, मरीच, शक्कर, कपूर, अम्ल (नीबू रस) आदि विभिन्न वस्तुओं से बने हुए पानक रस में अनेक वस्तु के स्वाद से विलक्षण सबके सम्मिलित आस्वाद का अनुभव होता है, वैसे ही विभावादिकों से सम्मिलित स्थायी भाव का भी विलक्षण आस्वाद होता है।) आस्वाद्यमान सामने स्फुरित होने के समान हृदय में प्रविष्ट होते हुए के समान, सर्वाङ्गीण आलिङ्गन के समान, अन्य सभी को तिरोहित करता हुआ, ब्रह्मास्वाद का अनुभव कराते हुए के समान अलौकिक चमत्कारकारी श्रृङ्गारादि रस हैं।

१. अग्निपुराण के अनुसार रसनिष्पत्ति

वेदान्त में कहा गया है कि परब्रह्म अक्षर (अविनाशी) सनातन अज (अजन्मा) विभु एक चैतन्य ज्योतिः स्वरूप ईश्वर है। उसका सहज (स्वाभाविक) आनन्द कभी-कभी व्यक्त होता है। उसके आनन्द की वह व्यक्ति चैतन्य चमत्कार रस नाम से उक्त है। उसका प्रथम विकार अहंकार है जिससे अभिमान होता है। उसी में तीनों लोक समाप्त है अर्थात् तीनों लोक में अभिमान व्याप्त हैं, उस अभिमान से रति होती है। वह व्यभिचारी आदि सामान्य से पुष्ट हो कर शृङ्गार कहलाती है। उस शृङ्गार के हास्य आदि अनेक भेद हैं। वे अपने अवस्थादि विशेष से उत्पन्न तथा पुष्ट हो कर स्वलक्षण हैं। परमात्मा के सत्त्वादि गुणों के सन्तान (उद्भव-विकास) से वे उद्भूत होते हैं। राग से शृङ्गार होता है, तीक्ष्णता से रौद्र होता है, स्तम्भन से वीर होता है, सङ्कोच से वीभत्स होता है, शृङ्गार से हास उद्भूत होता है, रौद्र से करुण रस होता है। वीर से अद्भुत की निष्पत्ति होती है, वीभत्स से भयानक की। इस प्रकार शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र -भयानक-बीभत्स-अद्भुत- शान्त-ये नव रस हो जाते हैं। पूर्वोक्त चार रस, अन्य चार रसों को स्वभाव से उद्भूत करते हैं। जैसे दान के बिना धन की शोभा नहीं होती, वैसे ही रस के बिना वाणी की शोभा नहीं होती । इस अपार संसार में कवि ही प्रजापित हैं, १. अक्षरं ब्रह्म परमं सनातनमजं विभुम् …. भाव्यन्ते च रसा इति। अग्निपुराण ३३६ अ./१-१२ श्लोक memAL —–Hara y an Mumn-minimummemon रस-सिद्धान्त दण्डी धनञ्जय ५७३ जैसे विश्व चमत्कारी हो जाय वैसा परिवर्तन करता है। शृङ्गारी कवि है तो जगत रसमय हो जाता है, कवि यदि वीतराग है तो यह जगत को नीरस व्यक्त करता है। भावहीन रस नहीं होता, भाव रस से हीन नहीं होता। ये रस की भावना (उद्भावना) करते हैं, अथवा इनके द्वारा रस भावित होते हैं। अतः ये भाव कहलाते हैं।

२. दण्डी का रसविषयक निर्देश

दण्डी अति संक्षिप्त रस निष्पत्ति प्रक्रिया का रसवदलङ्कार निरूपण करते हुए निर्देश किये हैं : प्राक् प्रीति-दशिता सेयं रतिः शृङ्गारतां गता। रूप-बाहुल्य-योगेन तदिदं रसवद् वचः।। अर्थात् प्रेयोऽलड्कार के उदाहरण (अद्य या मम गोविन्द ….. इत्यादि) में जो प्रीति (विभावादि से अपुष्ट) दिखलाई गई है वह रति है। वही रति विभावादि से पुष्ट हो कर शृङ्गारता को प्राप्त हो गई है ( = शृङ्गार रस हो गयी है) इसलिये “मृतेति प्रेत्य सङ्गन्तुं यया मे मरणं मतम् । सैवावन्ती मया लब्धा कथमत्रैव जन्मनिर” यह वाक्य रसवद् हो गया। इन वचनों के विवेचन से सिद्ध है कि रति, क्रोध आदि विभावादिकों से पुष्ट हो कर शृङ्गारादि रस बन जाते हैं, उनके प्रतिपादक वाक्य रसवद्- अलङ्कार है। वे नायक निष्ठ हैं। दृश्य में अभिनय नट करता है तो उसमें प्रतीत होने वाला आरोपित है। यही भट्ट लोल्लट का भी मत है। इसीलिए अभिनव कहते हैं- “चिरन्तनानां चाय-मेव पक्षः। तथा हि दण्डिना स्वा-लङ्कार लक्षणेऽभ्यधायि-रतिः शृङ्गारतां गता ….. इति” ।

रसविषयक धनञ्जय मत

धनञ्जय कहते हैं - ‘विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। आनीयमानः स्वाद्यत्वं स्थायीभावो रसः स्मृतः। अर्थात विभाव- अनुभाव-सात्त्विक तथा व्यभिचारी भावों से स्वाद्यता को प्राप्त कराया गया (आस्वाद का विषय बनाया गया) स्थायी भाव रस कहलाता है। ये भाव स्वाद्यता को प्राप्त कहाँ होते हैं। नायक में या नट में अथवा सहृदय में ? इस का समाधान वृत्ति में है। ‘श्रोतृप्रेक्षकाणमन्तः-५ श्रव्य काव्य में श्रोता एवं दृश्य काव्य में प्रेक्षक के अन्तःकरण में। स्वाद- गोचरता का अर्थ है = निर्भरानन्द संविदात्मता (=परमानन्द-सन्तति-स्वरूपता)

१. काव्यादर्श २/२८१ २. काव्यादर्श २/२८० ३. अभिनव-भारती अ. ६ दशरूपक ४/१ ५. दशरूपक वृत्ति ४/१ ५७४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र काव्य तो उक्त आनन्द चेतना के उन्मीलन का कारण होने से रसवत् कहलाता है। जैसे ‘आयुर्घतम्’ कहलाता है। इसमें ‘विभावः भावपोषकृत्’ ।’ ‘अनुभावो विकारस्तु भावसंसू चनात्मकर:-अर्थात् विभाव को भाव का पोषक, अनुभाव को भाव का सूचक माना गया है। सात्त्विक तथा व्यभिचारी को भाव इसलिये कहा जाता है कि नायक के भाव से सामाजिक के भाव को भावित करते हैं-‘भावस्तद्भाव-भावनम् ३ तीसरी कारिका में कार्य कारण भाव सम्बन्ध विभाव अनुभाव का लौकिक रस (रति) के प्रति माना गया है। अर्थात् लौकिक रति के उद्बोधक कारण को (काव्य) में विभाव कहा गया है और रति के कार्य को जो रति का अनुभव कराते हैं, उसे काव्य में अनुभाव कहते हैं।

धनिक का प्रश्न

अनन्तर अवलोककार धनिक प्रश्न उठाये हैं- ‘कः पुनरेतेषां काव्येनाऽपि सम्बन्धः? इन स्थायी भावों तथा रसों का काव्य के साथ कौन सम्बन्ध है? वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध हो नहीं सकता, क्योंकि रस या भाव की प्रतीति वाचक शब्दों से नहीं होती। शृङ्गार रस के काव्यों में न तो शृङ्गार शब्द होते हैं न तो रस या रति शब्द होते है; तो रस या भाव वाच्य कैसे होंगे? यदि किसी काव्य में शृङ्गारादि या रसादि या रति आदि शब्द प्रयुक्त भी हो तो भी रस की प्रतीति विभावादिकों से ही होती है न कि शृङ्गारादि शब्दों से। यहाँ लक्ष्य-लक्षक भाव संबन्ध भी नहीं है। सामान्य वाचक शब्द का विशेष अर्थ में प्रयोग करने पर लक्षणा की प्रवृति होती है, यहाँ सामान्य (अर्थ) के वाचक शब्दों का प्रयोग रहता है। लक्षक पद का प्रयोग नहीं है। लक्षित लक्षणा से भी रस की प्रतीति नहीं हो सकती। जैसे ‘गङ्गायां घोषः’ में गङ्गा पद का स्वार्थ प्रवाह है, उसमें घोष की स्थिति असम्भव है। अतः स्वार्थ बोधन में क्षीण सामर्थ्य गङ्गा शब्द स्वार्थ से सम्बद्ध तट को लक्षित करता है। यहाँ तो नायक आदि शब्द दुष्यन्त-शकुन्तलादि शब्दों के स्वार्थ बोधन में क्षीण सामर्थ्य है नहीं तो कैसे अर्थान्तर की प्रतीति करायेंगे। अथवा कौन व्यक्ति निमित्त (रूढ़ि) या प्रयोजन के बिना मुख्य शब्द के रहते गौण शब्द का प्रयोग करना चाहेगा। अतः- ‘सिंहो माणवकः’ के समान यहाँ गौणी वृत्ति से भी रस की प्रतीति नहीं हो सकती। यदि अभिधा वृत्ति से रस प्रतीति होती तो केवल वाच्य-वाचक-भाव मात्र में व्युत्पन्न अरसिकों को भी रसास्वाद होता। रस काल्पनिक भी नहीं है सभी सहृदयों को रसास्वाद होता है। इसलिये कोई (आनन्द वर्धन प्रभृति) अभिधा लक्षणा, गौणी से जो वाच्य अर्थ या वाच्यान्तर (वाच्य से भिन्न लक्ष्य या तात्पर्य अर्थ) के लिये कल्पित है उन शक्तियों से अतिरिक्त व्यञ्जना नामक शब्द का व्यापार रस, अलङ्कार और वस्तुरूप व्यङ्ग्य अर्थ के लिये मानते है। इन रसादि त्रिविध व्यङ्ग्य की प्रतीति अर्थापत्ति जन्य नहीं है। क्योंकि रसादि किसी अनुपपन्न अर्थ की अपेक्षा १. दशरूपक वृत्ति ४/२ २. दशरूपक वृत्ति ४/३ ३. दशरूपक वृत्ति ४/४ रस-सिद्धान्त ‘धनञ्जय, थनिक’ ५७५ नहीं करते। रसादि वाक्यार्थ भी नहीं है तृतीय कक्षा के विषय हैं। प्रथम कक्षा में अभिधा से पदार्थ की प्रतीति होती है, द्वितीय कक्षा में तात्पर्य से वाक्यार्थ की प्रतीति होती है, तृतीय कक्षा में व्यङ्ग्य अर्थ व्यञ्जना से प्रतीत होता है। जहाँ (लक्षणा स्थल में) वाक्यार्थ द्वितीय कक्षा में विश्रान्त नहीं होता तृतीय कक्षा में ही वाक्यार्थ निष्पन्न होता है, वहाँ व्यङ्ग्यार्थ चतुर्थ कक्षा में प्रतीत होता है। इस प्रकार रसादि व्यङ्ग्य ही होते है। वस्तु और अलङ्कार रूप अर्थ कहीं वाच्य होते है, कहीं व्यङ्ग्य होते है। जहाँ व्यङ्ग्यार्थ का प्राधान्य रहता है वहीं ध्वनि होती है, जहाँ व्यङ्ग्यार्थ गौण होता है, वहाँ गुणीभूत व्यङ्ग्य होता है। ध्वनिकार ने कहा है- ‘यत्रार्थः शब्दो वा …’ इति । जहाँ वाक्यार्थ प्रधान होता है, रसादि अङ्ग हो जाते है, उस काव्य में रसवदलङ्कार होता है प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गं तु रसादयः। काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः।।’ यह ध्वनि अविवक्षित वाच्य और विवक्षितान्यपर वाच्य भेद से दो प्रकार का है। अविवक्षित वाच्य भी अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य, अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्य होने से दो प्रकार का है। विवक्षितान्यपरवाच्य भी दो प्रकार का है, असंलक्ष्यक्रम, संलक्ष्यक्रम उनमें रसादि असंलक्ष्यक्रम है। रसादि की यदि प्राधान्येन प्रतीति हो तो ध्वनि अङ्गरूप से प्रतीति होने पर रसवदादि अलङ्कार कहलाते हैं।

धनञ्जय का समाधान

इन पक्षों को स्थापित कर धनञ्जय खण्डन करते हैं : वाच्या प्रकरणादिभ्यो बुद्धिस्था वा यथा क्रिया। वाक्यार्थः कारकैर्युक्ता स्थायी भावस्तथेतरैः।। जैसे क्रिया वाच्य (वाक्य में प्रयुक्त) हो या प्रकरणादि से बुद्धिस्थ हो, कारकों से युक्त वाक्यार्थ कहलाती है वैसे ही रत्यादि स्थायी वाच्य हो या प्रकरणादि या विभावादि के सम्बन्ध से साक्षात् भावक के चित्त में स्फुरित होते हुए अपने-अपने विभाव-अनुभाव-सञ्चारीभाव, जो अपने शब्दों से बोधित होते है, उनके द्वारा संस्कार परम्परा से पर प्रौढि को प्राप्त होते हुए वाक्यार्थ कहलाते हैं। जैसे “गामभ्याज” इस लौकिक वाक्य में अभ्याज (ले जावों) यह क्रियापद सुनाई देता है और “द्वारं-द्वारं” इसमें क्रियापद प्रयुक्त नहीं है तो भी प्रकरण के अनुकूल बन्द करो या खोलो क्रिया बुद्धिस्थ हो जाती है। यह क्रिया ही कारकों से पुष्ट हो कर वाक्यार्थ ..

…. १. १ ध्वन्यालोक २ उदद्योत ५ कारिका २. दशरूपक ४M A HATET .— .

.-.’ ५७६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र ' ' ST

कहलाती है। वैसे ही काव्यों में भी कहीं स्थायीभाव का साक्षात् प्रयोग है जैसे ‘प्रीत्यै नवोढा प्रिया’-यहाँ ‘प्रीत्यै’ शब्द से रति साक्षात् प्रयुक्त है और कही शब्द प्रयुक्त नही है तो भी प्रकरणादि वश या निश्चित प्रयुक्त विभावादि के सम्बन्ध से सहृदय में स्फुरित होता है। वह रत्यादि स्थायीभाव ही अपने-अपने विभाव अनुभाव सञ्चारी भावों (जो काव्य में शब्दतः प्रयुक्त है) के द्वारा संस्कार परम्परा से परम प्रौढि को प्राप्त हो कर वाक्यार्थ कहलाता है। यहाँ संस्कार-परम्परा का तात्पर्य है कि विभाव से रत्यादि स्थायी उद्बुद्ध होते है, अनुभाव से प्रतीति के योग्य होते है, व्यभिचारी से पुष्ट होते है इस तरह प्रौढि को प्राप्त रत्यादि स्थायी भाव ही रसरूप वाक्यार्थ है। यद्यपि रत्यादि स्थायीभाव काव्य में प्रयुक्त किसी पद के अर्थ नहीं है, (अपदार्थ है) तो भी वे तात्पर्य-शक्ति से संवेद्य है क्योंकि वाक्य की तात्पर्य शक्ति का पर्यवसान कार्य तक होता है बिना कार्य का प्रतिपादन किये क्षीण नहीं होती। क्योंकि सभी पौरुषेय या अपौरुषेय (लौकिक या वैदिक) वाक्य कार्य-परक (विधि) होते हैं। यदि वे किसी कार्य का प्रतिपादन न करें तो उन्मत्त प्रलाप के सदृश अग्राह्य हो जायेंगे। काव्य शब्दों का निरतिशय सुखास्वाद से अतिरिक्त और कोई कवि और सहृदयों का प्रयोजन उपलब्ध नहीं होता। अतः अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा आनन्दानुभूति रूप रस ही कार्य माना जायगा। उस आनन्दानुभूति रूप रसके निमित्त विभावादि से संसृष्ट स्थायी ही है। अतः वाक्य की अभिधान शक्ति उस रस से आकृष्ट होती हुई उन-उन स्वार्थ रसों के लिये अपेक्षित विभावादि, जो अवान्तर अर्थ है, उनका प्रतिपादन करती हुई रस प्रतीति पर्यन्त लायी जाती है। उसमें विभावादि, पदार्थ स्थानीय है, उनसे संसृष्ट रत्यादि स्थायी भाव वाक्यार्थ है। यहाँ पर जैसे गीत श्रवण करने से सुख की प्राप्ति होती है, परन्तु गीत के शब्द तथा उस सुख में वाच्य-वाचक भाव सम्बन्ध का उपयोग नहीं है, वैसे ही काव्य के शब्द तथा तज्जन्य आनन्दानुभूति भी विभावादि विशिष्ट सामग्री जानने वालों तथा रत्यादि भावना वालों को ही होती है। सभी को नहीं होती। इससे अतिप्रसङ्ग भी नहीं होगा। इस प्रकार रस को वाक्यार्थ मान लेने पर अभिधा शक्ति से भी उसकी प्रतीति हो जायगी, व्यञ्जना शक्ति की कल्पना व्यर्थ है। अतः धनिक का कहना है कि यह व्यङ्ग्य अर्थ तात्पयार्थ से अतिरिक्त नहीं है, इसे ध्वनि नहीं कहा जा सकता। अतः रसादि का काव्य के साथ व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव सम्बन्ध नहीं है, अपितु भाव्यभावक सम्बन्ध है। काव्य भावक है रसादि भाव्य है। रसादि सहृदयों के हृदय में स्वतः उत्पन्न होते हैं उनकी भावना विशिष्ट विभावादि के प्रतिपादक काव्य कराते है। यह भाव्य-भावक-सम्बन्ध शास्त्रान्तर तथा दूसरे शब्दों में नहीं पाया जाता, अतः काव्य में भी इसे नहीं मानना चाहिये, यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि भावना वाक्यार्थवादी मीमांसकों द्वारा भाव्यभावक सम्बन्ध माना गया है। यदि इस भावना को लिडर्थ मानते हैं … - .nnn. ….- . . .. ..

… . . .– .-.. रस-सिद्धान्त ‘धनञ्जय, धनिक’ ५७७ तो अन्यत्र भाव्य-भावक-सम्बन्ध भले न हो, काव्य में तो अन्वय-व्यतिरेक से भाव्य भावक सम्बन्ध माना जाता है। अभिधा से रस तथा स्थायीभाव की प्रतीति मानना ठीक नहीं, अभिधा तो संकेतित अर्थ का बोध कराती है, रस तथा स्थायी भाव तो सङ्केतित नहीं हैं, उनका वाचक शब्द भी काव्य में प्रयुक्त नहीं है, तो अभिधा से रस की प्रतीति कैसे होगी? इसका समाधान है कि लोक में उस प्रकार की चेष्टा से युक्त स्त्री पुरुषों में रत्यादि अवश्य देखी जाती है तो यहाँ भी उन रत्यादिकों से सम्बन्ध चेष्टादिकों का वर्णन होने से तत्सम्बद्ध रति की प्रतीति लक्षण से हो जायेगी। इसके बाद इन्होंने रस को सहृदय निष्ट ही माना है, अनुकार्य गत नहीं, गरसः स एव स्वाद्यत्वात् रसिकस्यैव वर्तनात्।। नानुकार्यस्य वृत्तत्वात् काव्यस्यातत्परत्वतः।।” वह स्थायी भाव ही स्वाद्य होने के कारण रस है, वह रसिक में ही होता है, अनुकार्य में नहीं, क्योंकि वे भूतकाल के हैं। __ यद्यपि नायकादि शब्दोपहित रूप से विद्यमान से प्रतीत होते है, तो भी वह सामाजिकों को ही प्रतीत होते है, आस्वाद की दृष्टि से तो वे अविद्यमान ही है, विभावरूप से रामादि की वर्तमान के समान प्रतीति ही होती है और भी कवि रामादि नायकों में रसोद्बोध कराने के लिए काव्य नहीं बनाता, वह तो सहृदयों को आनन्दित करने के लिये काव्य बनाता है, इसीलिये रस सहृदय संवेद्य है। __ यदि अनुकार्य नायक गत शृ ङ्गार होगा तो नाटकादि में उसको देखने से जैसे लौकिक शृङ्गारी नायक को अपनी कान्ता से संयुक्त दिखाई देने पर देखने वाले को ये शृङ्गार वाले हैं-ऐसी प्रतीति मात्र होती है। शृङ्गार रस का स्वाद नहीं होता, वैसे ही स्वाद नहीं होगा। सज्जनों को लज्जा, दूसरों को ईर्ष्या, अनुराग, द्वेष आदि होंगे। ऐसी स्थिति में रत्यादि की व्यङ्ग्यता निरस्त हो गई। पहले से रखी गई वस्तु दूसरे वस्तु से भी व्यक्त होती है। जैसे दीपक से पूर्वसिद्ध घटादि व्यक्त होते हैं, न कि उसी समय अभिव्यञ्जक द्वारा निर्माण कर प्रकाशित किया जाता है। अतः विभावादि भावक है उनके द्वारा प्रेक्षकों में रस की भावना की जाती है। प्रश्न है कि सामाजिक गत रस का विभाव कौन है, सीता आदि देवियों को शृङ्गार का विभाव मानने में विरोध क्यों नहीं, उत्तर है कि धीरोदात्तादि अवस्था के प्रतिपादक रामादि है, वे सामाजिकों में रत्यादि का विभावज करते है, सामाजिक उनका स्वाद लेते है। कवि योगियों के समान ध्यान चक्षु से देख कर वैयक्तिक रामादि की अवस्था को इतिहास, पुराण के समान (यथार्थ रूप में) वर्णन नहीं करते, वे तो सर्वलोक साधारण वर्णन १. दशरूपक चतुर्थ प्र. ३८ ५७८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र करते हैं। (जो अपनी उत्प्रेक्षा से धीरोदात्तादि अवस्थाओं को कहीं आश्रय मात्र देने वाली है-ऐसा वर्णन करते है) वे ही अपनी विशेषता को त्याग कर अर्थात् सीतादि शब्द, जनकपुत्रीत्व आदि विशेषता को छोड़ कर स्त्री सामान्य का वाचक बन कर रस के हेतु होते है। जब ये सामान्य हो जाते है तो इनका काव्य में उपादान क्यों किया जाता है? इस शङ्का समाधान है जैसे मिट्टी के हाथी आदि से क्रीडा करने वाले बालकों को अपना उत्साह आनन्दित करता है (अर्थात् उन्हें अपने उत्साह का स्वाद आता है) उसी तरह काव्यश्रोताओं को (नाट्य प्रेक्षकों को) अर्जुन आदि पात्रों के उत्साह को देखकर तथा सुनकर अपने उत्साह का स्वाद आता है। तात्पर्य यह है कि लौकिक शृङ्गारादि के समान स्त्री आदि विभावों का काव्य में उपयोग नहीं होता। यह नाट्य रस लौकिक रस से विलक्षण है, इसीलिए नाट्यरस आठ ही माने गये हैं। नर्तक भी लौकिक रस का स्वाद नहीं करता, क्योंकि नाट्य में अभिनय करने वाली महिला को भोग्या के रूप में अपनी महिला नहीं मानता, किन्तु काव्यार्थ की भावना से जैसे हम सामाजिकों को रसास्वाद होता है उसी तरह काव्य रसास्वाद सहृदय दशा में उसकों भी हो सकता है। यह स्वाद काव्यार्थ की भावना से आत्मानन्द का उद्भव है। काव्यार्थ है विभावादि से सम्बद्ध स्थायी, उसका सम्भेद है सहृदय के चित्त में परस्पर मिलना, उससे स्वपर विभाग रहित प्रबलतर आत्मानन्द की अनभति स्वाद कहलाता है। वह स्वाद सामान्य है तो भी भिन्न-भिन्न प्रकार के विभावादि के सम्मिश्रण से चार प्रकार की चित्त की अवस्थायें होती है। अतः यह चार प्रकार का होता है। विकास, विस्तार, क्षोभ, विक्षेप- ये चार प्रकार की चित्तवृत्तियाँ काव्यार्थ की भावना से उत्पन्न होती है। मन की ये वृत्तियाँ क्रमशः शृंगार, वीर, वीभत्स और रौद्र रस में होती है। पुनः इन चार रसों से क्रमशः हास्य, अदभुत, भय और करुण रस उत्पन्न होते है।, अतः आठ ही रस है। इसीलिये इनमें जो हेतु-हेतुमद्भाव माना गया है, वह सम्भेद की अपेक्षा से है कार्य-कारण भाव से नहीं है। शृङ्गार से हास्य, रौद्र से करुण, वीर से अद्भुत, वीभत्स से भयानक रस उत्पन्न होते है।

करूणादि में सुखानुभूति कैसे?

यहाँ प्रश्न है कि शृङ्गार, वीर, हास्य आदि तो प्रमोदात्मक हैं, इनमें काव्यार्थ की भावना से आनन्दानुभूति हो सकती है, करुणादि तो दुःखात्मक है कैसे उनमें आनन्द की अनुभूति हो सकती है। क्योंकि करुण रस के काव्य श्रवण से या नाट्य प्रेक्षण से रसिकों को भी दुःख होता है। अश्रुपातादि होते हैं। यदि करुणादि भी आनन्दात्मक होते तो ऐसा नहीं होता। आपका प्रश्न ठीक है-परन्तु करुणादि में यह सुख-दुःखात्मक आनन्द ठीक उसी

रस-सिद्धान्त ‘धनञ्जय, थनिक’ ५७६ प्रकार है जैसे सम्भोग में स्त्रियों द्वारा की गई दन्तक्षति, नखक्षति से होता है। अतः लौकिक करुण से काव्य का करुण भिन्न है। इसमें रसिकों की भी अधिकाधिक प्रवृत्ति होती है। यदि लौकिक के समान यह दुःखात्मक ही होता तो इसमे किसी सहृदय की प्रवृत्ति नहीं होती और करुण रस प्रधान रामायणादि महाकाव्यों का उच्छेद ही तो हो जाता। अश्रुपातादि भी लौकिक दुःखी व्यक्ति को देख कर संवेदना में जैसे सज्जनों को होता है वैसे ही इतिवृत्त के वर्णन श्रवण से सहृदयों को होता है। यह युक्त ही है, अतः करुण भी आनन्दात्मक ही है।

शान्तरस

यद्यपि शान्त रस का अभिनय नहीं हो सकता इसलिए नाट्य में शान्त रस नहीं माना जाता तो भी सूक्ष्म तथा अतीत आदि सभी वस्तु शब्द से प्रतिपाद्य होते हैं, अतः काव्य में शान्त रस का निषेध नहीं किया जा सकता। शम का प्रकर्ष शान्त रस है, वह अनिर्वाच्य है (वर्णन नहीं किया जा सकता) मुदिता, मैत्री, करुणा, उपेक्षा, से वह प्रतीत होता है। जहाँ सुख-दुःख, चिन्ता, द्वेष, राग और कोई इच्छा नहीं है, वह शान्त रस है-ऐसा भरत मुनि ने कहा है। सब भावों में शम प्रधान है-यह शान्त का लक्षण है। यह आत्मस्वरूप साक्षात्कार रूप मोक्षावस्था में ही उद्भूत हो सकता है, वह स्वरूपतः अनिर्वचनीय है-ऐसा श्रुति भी कहती है, उसका निरूपण वह “नेति-नेति” अन्यापोह रूप से करती है। अतः उसका स्वाद सहृदयों को नहीं हो सकता तो भी जो उसका उपायभूत मुदिता, मैत्री करुणा उपेक्षा आदि है, वे विकास, विस्तार, क्षोभ विक्षेप रूप ही हैं। उन्हीं के वर्णन से शान्त का आस्वाद हो सकता है, निष्कर्ष यह है कि चन्द्र, निर्वेद, रोमाञ्च आदि पदार्थ जो काव्य में वर्णित होने से विभाव सञ्चारी, अनुभाव संज्ञा को-प्राप्त हो जाते है, इनसे भावित स्थायी भाव का स्वाद ही रस कहलाता है।

निष्कर्षः

अभिप्राय यह है कि इनके मत में व्यञ्जना वृत्ति की अपेक्षा नहीं है, विभावादि का स्थायी के साथ भाव्य-भावक-भाव सम्बन्ध है। रस वाक्यार्थ है। तात्पर्य वृत्तिवेद्य है। रस आठ ही हैं नवां शान्त रस भी श्रव्य काव्य में हो सकता है। नाट्य में नहीं। रस सहृदय निष्ठ है, अनुकार्य निष्ठ नहीं, नट भी सहृदयता की दशा में काव्य रस का अनुभव कर सकता है, लौकिक का नहीं। परन्तु सहृदयता की दशा में (प्रेक्षक रूप से) तो अनुकार्य भी रसास्वाद कर ही सकता है, परन्तु इन्होंने केवल नट को आस्वादयिता माना है। अनुकार्य के विषय में सहृदयावस्था की बात नहीं की है। (सम्भवतः इनका तात्पर्य है कि प्रायः नायक अतीत के विषय हो जाते हैं। प्राचीन रूपकों के नायक अतीत के विषय हैं ही) । १. दशरूपक चतुर्थ प्रकाश ३६-४६

५८० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र

समीक्षा

इन्होंने तात्पर्यवृत्ति से रस की प्रतीति मानी है, परन्तु इसका निराकरण विश्वनाथ ने इस प्रकार किया है। आपकी यह तात्पर्य वृत्ति अभिहितान्वयवादियों द्वारा वाक्यार्थ बोध के लिये स्वीकृत जो तात्पर्यवृत्ति है वहीं है या उससे भिन्न है ? यदि वही है तो वह वाक्यार्थ बोध करा कर क्षीण हो जाती है, पुनः रसप्रतीति नहीं करा सकती। यदि उसी से रस प्रतीति मानेगे तो “शब्द-बुद्धि -कर्मणां विरम्य व्यापाराभाव”-इस सिद्धान्त का विरोध होगा। यदि भिन्न मानते है तो नाम मात्र का विवाद है। आपके मत में भी चतुर्थ वृत्ति सिद्ध हो गई। १. साहित्य दर्पण पञ्चम परि.

५८१ रस-सिद्धान्त ‘भोजराज’

भोजराज

भोजराज के अनुसार रस निष्पत्ति

भोजराज ने वाङ्मय के तीन भेद किये है-वक्रोक्ति, रसोक्ति, स्वभावोक्ति। इन तीनों उक्तियों की अनुग्राहिणी रसोक्ति को स्वीकार किये है। इन्होंने चौबीस रसान्वय विभूतियों की गणना कर कहा है- जो इनके स्वरूप को जानता है, वह काव्य निर्माण कर सकता है। इन्होंने भाव, जन्म, अनुबन्ध, निष्पत्ति, पुष्टि आदि को रसान्वय विभूति माना है। इन्होंने रस को ही भाव माना है। अपने-अपने आलम्बन विभावों से रत्यादि रूप से उन्मिषित होता हुआ रस भाव कहलाता है आलम्बनविभावेभ्यः स्वेभ्यः स्वेभ्यः समुन्मिषन् । रसो रत्यादिरूपेण भाव इत्यभिधीयते।। विभाव-अनुभाव-सात्विक और व्यभिचारी के संयोग होने पर रस की निष्पत्तिमात्र को निष्पत्ति कहते है : विभावस्यानुभावस्य सात्विक-व्यभिचारिणोः। संयोगे तस्य निष्पत्ति-मात्रं निष्पत्तिरुच्यते।। इन्होंने संयोग शब्द लिखा है, कौन सा संयोग है और निष्पत्ति क्या है? और किस वृत्ति से रस-निष्पत्ति होगी? इन विवेचनों के बिना ही रसनिष्पत्ति दिखलाई है। इससे सिद्ध हुआ कि ये अपने पूर्ववर्ती भरत, आनन्दवर्धन, अभिनवादि को प्रमाण मान कर रस निष्पत्ति की प्रक्रिया उनके द्वारा जो वर्णित थी, उसी को स्वीकार करते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा है। “रतिरूपेणैव रसनिष्पत्तिर्यथा - तंवीक्ष्य वेपथुमती …." यहाँ जन्मान्तर के अनुभव जन्य संस्कार से शिव के प्रतिकूल होने पर भी शैलात्मजा की शिव में अविच्छिन्न रति चिर वियुक्त शिव की दुश्चर तप से सगम की कामना करने वाली पार्वती की शिव के आकस्मिक दर्शन से उद्दीप्त हो गई। तत्काल उत्पन्न हुए स्वेद, स्तम्भ, कम्पन आदि सात्त्विक भाव-इनसे उपलक्षित हर्ष-स्मृति-आवेग, साध्वस आदि व्यभिचारी भावों से पद निक्षेप रूप शरीर के अनुभाव से संसृष्ट होता है। वहीं विभावानुभाव १. वक्रोक्तिश्च रसोक्तिश्च स्वभावोक्तिश्च वाङ्मयम्- सरस्वती काष्ठाभरण ५८ २. वही ५/१३ ३. सरस्वती- कण्ठा भारण ५/२६ ५८२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र व्यभिचारी के संयोग होने पर रति रूप से रस निष्पन्न होता है। इन्होंने बारह रस माने है इनमें नव रस तो प्रसिद्ध ही है प्रेयान्, उदात्त और उद्धत तीन रस अधिक माने है। “शृङ्गार-वीर-करुण रौद्राद्भुतभयानकाः। बीभत्स-हास्य-प्रेयान्सः शान्तोदात्तोद्धता ’ रसाः"२ इन्होंने शृङ्गार प्रकाश में भी रस का निरूपण किया है जिसे आगे दिखाया जा रहा है।

शृङ्गार प्रकाश के अनुसार

भोज का कथन है कि विद्वानों ने दस रसों का वर्णन किया है। किन्तु वे (भोज) शृंगार को ही रस मानते हैं। उनके अनुसार वीर, अद्भुद आदि को रस कहना वट यक्ष के समान है, परन्तु गतानुगतिकतया लोक इसको स्वीकार करते हैं अतएव इसी की निवृत्ति हेतु ग्रन्थ निर्माण अपेक्षित है। शृङ्गार-वीर-करूणाद्भुतरौद्रहास्यबिभत्सवत्सलभयानकशान्तनाम्नः। आम्नासिषुर्दशरसान् सुधियो वयन्तु श्रृङ्गारमेव रसानाद्रसमामनामः।। वीराद्भुतादिषु च येह रसप्रसिद्धिः सिद्धाकुतोऽपि वटयक्षवदाविभाति। लोके गतानुगतिकत्व-वशादुपेतामेतां निवर्तयितुमेष परिश्रमो नः। रत्यादि यदि प्रकर्ष को प्राप्त कर रस होते हैं तो हर्षादिकों ने क्या अपराध किया है कि वे रस नहीं होते। यदि कहें कि हर्षादि स्थायी भाव नहीं है तो भय-हास-शोक-क्रोध आदि कितनी देर तक स्थिर रहते हैं, कि उन्हें स्थायी कहते हैं। अतः रत्यादि स्थायी रस नहीं होते, अपितु श्रृङ्गार से उत्पन्न होने वाले रत्यादि उञ्चास भाव हैं। — शृङ्गार ही रस है, इसका प्रतिपादन करते हुए भोज कहते हैं कि रतिप्रिय, रणप्रिय, अमर्षप्रिय, परिहासप्रिय, व्यवहार से रति-उत्साह-अमर्ष परिहास के प्रकर्ष का प्रेम में ही पर्यवसान होता है। अतः प्रेम ही रस है। “रत्यादि का बाहुल्य रस नहीं है।” आत्मा का गुणविशेष अहङ्कार शृङ्गार रस है। यह विशिष्ट इष्ट में देखी गयी चेष्टाओं का अभिव्यञ्जक आत्मगुण सम्पत्तियों का उत्कर्षक, बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-संस्कारादि के अतिशय का हेतु है, वही सहृदयों द्वारा आस्वादित किया जाता हुआ रस कहलाता है। शृङ्गार के अस्तित्व में लोग रसिक कहलाते है अन्यथा नीरस कहलाते है। उस रस के आविर्भाव के हेतु है शृङ्गार से उत्पन्न होने वाले उञ्चास भाव। शृङ्गारी को ही रति होती है, अतः रत्यादिभाव शृङ्गार से ही उत्पन्न होते है। भावना से ही भाव्यमान होने के कारण रत्यादि भाव हैं रस नहीं। रस तो भावना पथ से अतीत है। मनोनुकूल दुःखादि में भी TRENERUSHCE १. वही परि. ५/पृ. ५७२ २. सर. क.म. ५/१६४ ३. श्रृङ्गार प्रकाश प्र. १/६-७

• – रस-सिद्धान्त ‘भोजराज’ ५८३ सुखानुभव का अभिमान रस है। परम्परया सुख का कारण रत्यादि का बाहुल्य है, अतः उसे भी उपचार से रस कहते हैं। अतः रत्यादि भाव ही है रस नहीं। जो लोग कहते है कि रत्यादि का प्रकर्ष रस है उनसे मैं पूछता हूँ ग्लानि आदि भी श्रम आदि से प्रकर्ष को प्राप्त करते है वे रस क्यों नहीं? यदि कहें कि ग्लानि आदि स्थायी नहीं है तो इनकी स्थायिता तीव्र संस्कार की उत्पत्ति से होती है। संस्कारोत्पत्ति विषयाधिक्य (अतिशय) से और नायक की प्रकृति से होती है। नायक की प्रकृति तीन प्रकार की होती है-सात्विकी, राजसी और तामसी। इनके सम्बन्ध से संस्कारोत्पत्ति होती है, तब वे रत्यादि स्थायी कहलाते हैं। ये आठ स्थायी भाव है, आठ सात्विक भाव है, तैंतीस व्यभिचारी भाव है-यह कथन युक्त नहीं है। ये अवस्था विशेष से सभी स्थायी है, सभी व्यभिचारी हैं सभी सात्विक है। अनुपहत ही मन सत्व कहलाता है, सभी मन से उत्पन्न हैं, अतः सभी सात्विक __यह जो कहा गया कि विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभाव के संयोग से स्थायी रसता को प्राप्त होते है, यह ठीक नहीं है, विभावादि का संयोग हर्षादि भावों से भी है। कें भी रस कहलाने लग जायेंगे। अतः रत्यादि उञ्चास सभी भाव ही है, शृगार ही एक रस है, उन अपने विभावानुभावों से प्रकाशमान शृङ्गार का विशेष स्वाद होता है। कुछ लोग कहते है कि भोज द्वारा वर्णित शृङ्गार रस नहीं है, प्रत्युत आलम्बन विभाव से उत्पन्न रत्यादि भाव, उद्दीपन विभाव से उद्दीप्त, अनुभाव से प्रतीति के योग्य हो कर व्यभिचारी से अत्यन्त प्रकर्ष को प्राप्त हो कर रस होता हुआ शृङ्गारादि संज्ञा को प्राप्त करते हैं, उनसे भोज का पूछना यह है कि ये रत्यादि भाव अपने-अपने आलम्बन से सब में उत्पन्न होते है कि किसी-किसी में ? यदि सभी में उत्पन्न होते हैं तो सारा जगत् रसिक हो जायगा, अतः किसी में ही होते हैं, तो इसका कारण क्या है ? वह कारण दृष्ट है या अदृष्ट ? दृष्ट तो है नहीं अतः अदृष्ट मानना पड़ेगा। अदृष्ट भी साधारण है या असाधारण ? साधारण मानने पर वहीं दोष आ जायगा (अर्थात् सब जगत् रसिक हो जायेगा) असाधारण मानेंगे तो वह प्रत्यगात्मा में अनादि वासना से आता हुआ धर्म कार्य माना जायेगा। वही तो आत्मा का गुण विशेष अहंकार है। वही शृङ्गार है, अभिमान है, रस है। उसका स्वाद शृङ्गारियों को ही होता है।’ १. शृङ्गार प्रकाश - ११ प्र. ५८४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र

महिमभट्ट

महिमभट्ट के अनुसार-“उन्हीं कारण आदि से जो कृत्रिम है, विभावादि शब्द से कहे जाते है, अविद्यमान ही रत्यादि (काव्य में वर्णित या नट द्वारा अभिनीत रत्यादि) प्रतिबिम्ब कल्प, स्थायीभाव कहलाने वाले कवियों से प्रतिपत्ता की प्रतीति का विषय बनाये गये हृदय के संवाद से आस्वाद्य होकर रस कहलाते है।" ये गम्यगमक भाव सम्बन्ध मानते है। विभावादि गमक है रत्यादि भाव गम्य है, निष्पत्ति = अनुमिति है। परन्तु इनका अनुमान न्याय प्रसिद्ध अनुमान नहीं हैं, काव्यानुमान है। वे स्वयं कहते है कि विभावादि कृत्रिम है, उनका विषय काव्य है। हेतु अकृत्रिम है उनका विषय लोक है, अतः दोनों का स्वरूप तथा विषय भिन्न-भिन्न है। “काव्यानुमितिरित्युक्ता”।

मम्मटभट्ट मत

“कारणान्यथ कार्याणि सहकारीणि यानि च" …..। रत्यादेः स्थायिनो लोके तानि चेन्नाट्यकाव्ययोः।। विभावा अनुभावास्तत् कथ्यन्ते व्यभिचारिणः। व्यक्तः स तै विभावाद्यैः स्थायी भावो रसः स्मृतः।२ लोक में रत्यादि स्थायी भाव के जो कारण, कार्य और सहकारी हैं, वे काव्य में निबद्ध किये जाते हैं या नाट्य में अभिनीत किये जाते हैं तो वे विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव कहे जाते हैं, उन विभावादिको से व्यक्त हुआ स्थायी भाव, उन (विभावादि) के साथ रस कहलाता है। यह रस समूहालम्बनात्मक है। इनके मत में नाट्य में आठ ही रस हैं। काव्य में शान्त रस भी है। इन्होंने भी विभावादि का स्थायी के साथ व्यङ्ग्य व्यञ्जक भाव सम्बन्ध माना है, निष्पत्ति का अर्थ अभिव्यक्ति मानी है। विभाव, अनुभाव, सञ्चारी ये तीनों मिलकर ही स्थायी.की अभिव्यक्ति करते हैं, एक एक नहीं। कारण कि एक ही विभावादि अनेक रसों में हो सकते है, जैसे “व्याघ्र" वीर, रौद्र, भयानक तथा अद्भुत का विभाव हो सकता है। अश्रुपात आदि अनुभाव शृङ्गार करुण भयानक आदि में हो सकते हैं। चिन्तादि व्यभिचारी शृङ्गार वीर, करुण, भयानक में भी हो सकते हैं, अतः एकएक के वर्णन से रस का निश्चय नहीं हो सकता, इसीलिए रस सूत्र में ये तीनों सम्मिलित रूप से निर्दिष्ट हैं। १. “सतस्तैरव … रसा इत्युच्यन्ते” .. व्यक्ति विवेक प्रथम। पृ. ८३। । अ व्यक्ति विवेक प्रथम पृ. ७४ ।।।। २. का. प्र. ४/४३। ३. का.प्र. ४/४४ तथा ४७॥ रस-सिद्धान्त ‘मम्मट, विद्याधर, शारदातनय’ ५८५ यदि ये असाधारण हों अर्थात् एक ही रस के हों तो एक-एक के वर्णन से भी रस निष्पत्ति हो सकती है, वहाँ रसानुरूप अन्य का आक्षेप कर लिया जायगा।

विद्याधरमत

विद्याधर कहते हैं - विभाव ललनादि आलम्बन कारणों से अङ्कुरित, चन्द्रिका, कोकिलालाप, मलयानिल, केलिकानन आदि उद्दीपन कारणों से कन्दलित, अनुभाव-कटाक्षपात-स्मित-भुजाक्षेप आदि से प्रतीति का विषय बनाया गया, व्यभिचारी चिन्तादिको से पल्लवित, जो कभी भी अभिधा से अनुभूत नहीं हुआ, तात्पर्य से सुना नहीं गया, लक्षणा से लक्षित नहीं हुआ, जो प्रत्यक्ष का विषय नहीं हुआ, जो अनुमान की सीमा में नहीं बँधा, स्मृति जिसके मार्ग का परिशीलन नहीं कर सकी, जो कार्यत्व से आक्रान्त नहीं हुआ, न तो ज्ञाप्य ही हुआ, विगलि वेद्यान्तर रूप से परिमिति को न जानने वाला ध्वनन नामक नये व्यापार के आलिङ्गन पर निर्भर होने के कारण अनुकार्य या अनुकृर्तगत होने का परिहार कर सामाजिकों में वासना रूप से स्थित रत्यादि स्थायी भाव ही विभावादि जीवितावधि पानक रस न्याय से चळमाण, आस्वाद मात्र एक प्राणवाला, उल्लसित होता हुआ ब्रहमास्वादसदृश लोकोत्तर- चमत्कार-कारी शृंगारादि रस कहलाता है।

शारदातनयमत

शारदातनय ने रस को सभी पदार्थों से भिन्न माना है और उसे पदार्थान्तर भी नहीं माना है। उनकी उक्ति है “न द्रव्यं न च सामान्यं न विशेषो गुणो नच। न कर्म समवायो न न पदार्थान्तरं च सः।।२ रस न द्रव्य है, न सामान्य है, न विशेष है, न गुण है, न कर्म है, न समवाय है, न तो पदार्थान्तर है अर्थात् रस ब्रह्म सदृश वाणी का विषय नहीं है (= वचनातीत है।) बाह्य विषयों का आलम्बन कर जो मानस विकार उद्भूत होता है वही विभावादि से उत्कर्ष प्राप्त कर रस कहलाता है। विकारो मानसो यस्तु बाह्यार्थालम्बनात्मकः। विभावाद्याहितोत्कर्षो रस इत्युच्यते बुधैः।। यहाँ इनका उत्कर्ष से तात्पर्य है कि मानस विकार आलम्बन विभाव से उद्भूत होता १. विभावैर्ललनादिभिः .. श्रृङ्गारादिको रसोऽभिधीयते - एकावली पृ. १७-१८ २. भाव-प्रकाशनम्-द्वितीय अधिकरण ३. भाव-प्रकाशनम् - द्वितीय अधिकरण५९६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र है, उद्दीपन विभाव से उद्दीप्त होता है, अनुभाव से प्रतीति योग्य होता है, सञ्चारी से पुष्ट होता है इस प्रकार उत्कर्ष को प्राप्त कर रस कहलाता है। अन्यत्र कहा है : विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। आनीयमानः स्वादुत्वं स्थायी-भावो रसः स्मृतः।।’ इन्होंने रस की आस्वादात्मक स्थिति को स्पष्ट करते हुए आपानक रस का सादृश्य प्रस्तुत किया है। वृद्ध भरत का उल्लेख करते हुये गद्यांश “नाना प्रकारैः ….. तैः रस्यन्ते”-२ को उद्धृत किया है। __ इस प्रकार इन्होंने भरत की रीति से ही रस निरूपण किया है। कहा भी है - “कथ्यन्ते भरतोक्तेन वर्मना नान्यथा क्वचित् । इन्होंने तृतीय अधिकरण में कहा है कि-विभाव-अनुभाव तथा सात्विक भाव व्यभिचारी भावों से वर्धित (वृद्धि को प्राप्त) नायकादि निष्ठ स्थायी भाव नाट्य में अनुकरण रूप से अभिनीत नटादि में रसता को प्राप्त होते है इसलिये रस कहा जाता है।’ __अन्यत्र इसी प्रकरण में इन्होंने कहा है “जैसे वेमा तुरी जुलाहे आदि की क्रिया से अन्वित (सम्बद्ध) तन्तु पट रूप में परिणत हो कर पट पद वाच्य होते हैं, जैसे मिट्टी दण्ड चक्र कुलालादि की क्रिया के सम्बन्ध से घट रूप में परिणत हो कर घट पद वाच्य होते हैं वैसे ही स्थायी भाव विभावानुभाव सञ्चारी भाव से सम्बद्ध हो कर रस रूप में परिणत हो कर रस पदवाच्य हो जाते है।” यथा हि तन्तवो वैमातुर्यादिक्रिययान्विताः। पटात्मना परिणताः पटवाच्या भवन्ति ते। यथा मृदो-दण्ड-चक्र-कुलालादिभिरन्विताः। घटात्मना परिणता घटवाच्या भवन्ति च। तथैव स्थायिनो भावा विभावादिभिरन्विताः। रसात्मना परिणता रसवाच्या भवन्ति ते॥ इस तरह इन्होंने पूर्वाचार्यों द्वारा वर्णित ही रस का रूप निश्चित किया है। १. भाव-प्रकाशनम्-द्वितीय अधिकरण २. भाव-प्रकाशनम् - द्वितीय अधिकरण भाव-प्रकाशनम् - द्वितीय अधिकरण ४. भाव प्रकाशनम् तृतीय अधिकरण ५. भाव प्रकाशनम् तृतीय अधिकरण रस-सिद्धान्त विश्वनाथ ५५७

विश्वनाथ मत

_रस अखण्ड है, स्वप्रकाश, आनन्दमय, चिन्मय है। वेद्यान्तर (किसी दूसरे ज्ञेय पदार्थ) के स्पर्श से शून्य है, ब्रह्मास्वाद सहोदर है। अलौकिक चमत्कार ही इसका प्राण है, कोई पुण्यात्मा प्रमाता ही सत्त्वगुण के उद्रेक से स्वात्मानन्द से अभिन्न रूप में इस रस का आस्वाद लेते हैं।’ रजोगुण तमोगुण से अस्पृष्ट मन सत्त्व कहलाता है, यह बाह्य ज्ञेय वस्तु से विमुख करने वाला आन्तर धर्म है। रजोगुण तमोगुण को दबाकर सत्त्व का आविर्भाव ही सत्त्वोद्रेक कहलाता है। यह काव्यार्थ परिशीलन से होता है। यह रस समूहालम्बनात्मक सुख स्वरूप और चमत्कार स्वरूप है। यह चमत्कार चित्त का विस्तार रूप है, जिसे विस्मय भी कहते हैं। वही रस का प्राण है। जैसा कि कवि पण्डित नारायण ने कहा, और उसे धर्मदत्त ने उद्धृत किया है “रसे सारश्चमत्कारः सर्वत्राऽप्यनुभूयते। तच्चमत्कारसारत्वे सर्वत्राऽप्यद्भुतो रसः।। तस्मादद्भुतमेवाह कृती नारायणो रसम् ।। इन्होंने करुणादि रस में भी परमसुख ही माना है, साधारणीकरण को विभावादि का व्यापार माना है। इन्होंने रस को सामाजिक निष्ठ ही माना है, अनुकार्य या अनुकर्तृगत नहीं। परन्तु यदि नट भी काव्यार्थ की भावना करे तो उसे सभ्य कहा जा सकता है। यह रस न ज्ञाप्य है, न कार्य है, न नित्य है, न भविष्यत् है, न वर्तमान है। न निर्विकल्पक ज्ञान संवेद्य है न सविकल्पक संवेद्य है। न परोक्ष है न अपरोक्ष है, यह अलौकिक है, सत्य है इसे सहृदय ही जान सकते हैं। यह वाच्यार्थ लक्ष्यार्थ तात्पर्यार्थ भी नहीं है। स्वाद ही रस है “रस का स्वाद” यह व्यवहार “ओदनं पचति” के समान है। इस रस में प्रमाण है सहृदयों का आस्वाद। रस प्रतीति के लिए “रसना” व्यापार है। इन्होंने विप्रलम्भ भेद में करुण विप्रलम्भ भी माना है। तथा वात्सल्य रस भी माना है। इनकी रस निष्पत्ति प्रक्रिया पूर्वाचार्य भट्टनायक, अभिनवगुप्त, मम्मट से प्रभावित है। कोई नवीनता नहीं है। १. २. ३. ४. ५. सा.द. ३/२,३॥ सा.द. ३ प. में उद्धृत। सा.द. ३/४,६। सा.द. ३/१६ स.द. ३/२०-२६ ५८८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र

रूपगोस्वामी

इन्होंने भक्ति को ही प्रधान रस माना है। उत्तमा भक्ति का लक्षण “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा।।’ अन्य विषय के अभिलाष से शून्य, ज्ञानकर्मादि से अनावृत, अनुकूलतया श्रीकृष्ण का अनुशीलन उत्तमा भक्ति है। यह भक्ति तीन प्रकार की है, साधनभक्ति, भावभक्ति, प्रेमाभक्ति। यह साधन भक्ति साधनाभिनिवेश से जो होती है, वह भगवान् में रुचि उत्पन्न कर आसक्ति उत्पन्न कर रति उत्पन्न कर देती है। यहाँ भगवान कृष्ण विषयक रति विभावादि सामग्री से पुष्ट होकर परम रस रूप हो जाती है। “अथास्याः केशवरते लक्षिताया निगद्यते। सामग्री परिपोषेण परमा रस रूपता।। विभावैरनुभावैश्च सात्विकैर्व्यभिचारिभिः। स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः। एषा कृष्णरतिः स्थायीभावो भक्तिरसो भवेत्।।४ इसमें श्रीकृष्ण, कृष्ण के भक्त आलम्बन कारण है, मुरलीवादन आदि उद्दीपन कारण है। स्मित आदि तथा आठ स्तब्धादि कार्य है, निर्वेदादि सहकारी है, वहीं रस साधन में विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव है। यह रति मुख्या गौणी दो प्रकार की है, इसमें प्रथम का प्रीति, सरूप, वात्सल्य आदि भेद है। गौणी के हास-विस्मय-उत्साह-शोक- क्रोध-भय-जुगुप्सा से सात भाव माने हैं। शान्त भक्ति रस का निरूपण करते हुवे इन्होंने शान्त का स्थायी शान्तिरति माना है।" इन्होंने रस निष्पत्ति के विषय में पूर्वाचार्योंका ही अनुसरण किया है। परन्तु पण्डितराज ने मम्मट के अनुसार भक्तिको भाव ही माना है। इसको रस मानने १. हरि भक्ति रसामृत सिन्धु। पूर्वभाग १/११ २. हरि भक्ति रसामृत सिन्धु। पूर्वभाग २/१ ३. हरि भक्ति रसामृत सिन्धु । पूर्वभाग १/४-६ ह.भ.र.सि.दक्षिणभाग १/४-६ ५. ह.भ.र.सि.दक्षिणभाग १/१३-१४ ६. दक्षिण भाग ५/३१ ७. पश्मि भाग १/४ रस-सिद्धान्त ‘पं.रा. जगन्नाथ’ ५९६ से वात्सल्य क्यों रस नहीं होगा। फिर तो भरत मुनि के द्वारा निर्दिष्ट रस नव है यह गणना भंग हो जायगी।’ इस लिए यथाशास्त्र ही ठीक है।

पं.रा. जगन्नाथ

पं.रा. जगन्नाथ के अनुसार रस निष्पत्ति

(अभिनवगुप्त तथा मम्मट के सिद्धान्त का सार) जो शकुन्तला लोक में आलम्बन कारण है, तथा चन्द्रिकादि उद्दीपन कारण हैं, वे काव्य में अलौकिक विभाव कहे जाते हैं। जो अश्रुपातादि कार्य होते है, वे अनुभाव कहे जाते है। जो चिन्तादि सहकारी कारण हैं वे व्यभिचारी भाव कहे जाते हैं। वे जब समुचित-ललित-सन्निवेश से सुन्दर काव्य के द्वारा वर्णित होते हैं, तो सीधे सहृदय के हृदय में प्रविष्ट हो जाते है। उनकी सहृदयता की सहायता से, भावना विशेष की महिमा से विभावादि के विशेष धर्म दुष्यन्तरमणीत्व आदि विगलित हो जाते है। वे विभावादि मिल कर अलौकिक व्यञ्जना व्यापार को उत्पन्न करते है। उस व्यापार से आत्मा के आनन्दांश को आवृत करने वाला अज्ञान का आवरण भङ्ग हो जाता है, जिससे प्रमाता का परिमित भाव मिट जाता है। वह अपरिमित भाव से स्वप्रकाश वास्तविक अपने आत्मस्वरूप आनन्द के साथ उस आनन्द का विषय बनाया गया, वासना रूप से स्थित रत्यादि भाव का साक्षात्कार (अनुभव) करता है, वही रस है, जैसे मिट्टी के पात्र (सिकोरा) से ढका हुआ दीप उस ढकने वाले पात्र को हटा देने से दीप समीपवर्ती पदार्थो को प्रकाशित करता है, स्वयं भी प्रकाशित होता है वैसे ही आत्मचैतन्य आवरण भङ्ग होने से स्वयं प्रकाशित होता है विभावादि के साथ रत्यादि को भी प्रकाशित करता है। पण्डितराज ने पक्षान्तर भी उपस्थित किया है “यद्वा” - जैसे समाधि में योगी की स्वस्वरूपानन्द = आत्मानन्दाकार चित्तवृत्ति बन जाती है वैसे ही विभावादि की चर्वणा की महिमा से सहृदयों की अपनी सहृदयता वश अभिव्यक्त हो जाते हैं तत् तत् (रत्यादि) स्थायी, उनसे उपहित आत्मानन्दाकार चित्तवृत्ति बन जाती है वही रस है, सहृदय उसी में तन्मय हो जाते है। यह सुख अलौकिक है, क्योंकि लौकिक सुख अन्तःकरण की वृत्ति रूप होते है यह अन्तः करण की वृत्ति रूप नहीं है। साक्षीभास्य है। इस तरह अभिनवगुप्त और मम्मट भट्ट के मत में “भग्नावरणाचिद्विशिष्ट स्थायी" रस है। वस्तुतः “रसो वै सः” इस श्रुति के अनुसार रत्यादिविशिष्टभग्नावरणा चित् ही रस १. र.ग. घर १ आनन। ५६० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र है। इन्होंने मम्मट के द्वारा प्रयुक्त “व्यक्तः स तै” इत्यादि में व्यक्तः का अर्थ ‘व्यक्तिविषयीकृतः’ किया है और व्यक्ति का अर्थ ‘भग्नावरणाचित्’ किया है।’ __ पण्डितराज ने ‘नव्यास्तु’ ‘परेतु’ शीर्षक से दो अन्य मतों की कल्पना की है। इसका मूल अभिनव भारती में श्रीशकु मत में वर्णित रत्यादि की अनुकरण रूपता है। वहाँ प्रश्न है कि अनुकरण रूप रत्यादि जो मिथ्याभूत हैं उनसे रस की निष्पत्ति कैसे होगी? इस शंका के समाधान में ‘प्रयुक्त’ अर्थक्रिया’कारिताऽपिमिथ्याज्ञानदृष्टा’- ‘मणिप्रदीपप्रभयोः’ … इत्यादि। इस का मूल है। __इस मिथ्या (भ्रम) को वेदान्त दर्शन में अनिर्वचनीय कहा गया है, अतः इसे अनिर्वचनीयख्याति मानकर इन्होंने ‘नव्यास्तु’ मत लिखा और न्याय दर्शन में भ्रम माना गया है, तदनुसार ‘परे तु’ मत लिखा।

नव्यमत

काव्य में कवि के द्वारा, नाट्य में नट के द्वारा विभावादि का ज्ञान सहृदयों को होता है। पश्चात् ‘व्यञ्जना’ वृत्ति से दुष्यन्तादि में शकुन्तला विषयक रति का ज्ञान होता है। तब सहृदय अपनी सहृदयता से दुष्यन्तादि के विषय में धारावाहिक चिन्तन करने लगता है, इस चिन्तन को पुनः पुनः अनुसन्धान रूप ‘भावना’ कहते हैं। इस भावना रूप दोष के कारण सहृदय की आत्मा कल्पित दुष्यन्तत्व से आच्छादित हो जाती है। अर्थात् वह अपने को कल्पित दुष्यन्त मानने लगता है। अतः उसकी कल्पित शकुन्तला में रति उबुद्ध हो जाती है। उसे साक्षी प्रकाशित करता है वही रस है। यह अनिर्वचनीय है। जैसे अज्ञान के कारण सीप के टुकड़े को चमाचम चमकता हुआ देखकर हम उसे रजत खण्ड मान बैठते हैं, ‘रजतमिदम्’ यह रजत है, इस ज्ञान को साक्षात् आत्मा प्रकाशित करता है, अतः साक्षिभास्य है। यह ज्ञान अनिर्वचनीय है। क्योंकि न सत् है, न असत् है, न सदसत् है। यदि सत् होता तो उत्तरकाल में बाध नहीं होता। यदि असत् होता तो प्रतीति नहीं होती। सत् असत् परस्पर विरोधी है एक ही को सत् भी असत् भी नहीं कह सकते। अतः सदसत् भी नहीं है। और जिसे सत् या असत् कुछ नहीं कह सकें वह अनिर्वचनीय है। इसी प्रकार अपने को दुष्यन्त और शकुन्तला विषयक रतिमान् मानना सत् असत् से विलक्षण है, अनिर्वचनीय है। यह रस भावना रूप दोष का कार्य है, भावना के नष्ट होने पर नष्ट भी हो जाता है। भावना वश इस कल्पित रति का वास्तविक रति से भेद का ज्ञान नहीं रह जाता, अतः वास्तविक रति के समान सुखमय प्रतीत होती है।

शंका

रति सुख स्वरूप है, अतःकल्पित भी सुखमय हो सकती है परन्तु करुण का स्थायी ‘शोक’ दुःखमय है तो शोक में दुःख की प्रतीति जैसे नायक को होती है, वैसे SHRA Archive १. समुचितललितसन्निवेशचारुणा शब्देन ..(रसगाधर प्र.आ.रस प्रकरण) २. अभिनव भारती, नाटयशास्त्र छठा अध्याय। alk H

रस-सिद्धान्त विश्वनाथ ५६१ ही सहृदय को भी होगी। समाधान है- यदि करुणादि रस में सहृदयों को केवल सुख की प्रतीति होती हो तो इसे काव्य के अलौकिक व्यापार की महिमा माननी पडेगी, जो दुःख का प्रतिबन्ध कर देती है और सुखमय बना देती है। यदि दुःख की भी प्रतीति होती है, तो इस प्रतिबन्धक की कल्पना नहीं करनी पड़ेगी। अपने-अपने कारणों से दोनो होंगे।

पर मत

परे तु :- दूसरे लोग कहते हैं, कि-भावना रूप दोष की महिमा से सहृदयों की आत्मा में ‘शकुन्तला विषयक रतिमान् दुष्यन्त में हूँ’ यह मानस बोध काव्यार्थ की भावना से उत्पन्न होता है। इस बोध का विषय रति है जो विलक्षण है। सुखमय है यह प्रमात्मक बोध ही रस है। __ यह बोध विशेषण विशेष्य के भेद से तीन प्रकार का हो सकता है। १. मैं दुष्यन्त शकुन्तला विषयक रतिमान् हूँ। २. शकुन्तला विषयक रतिमान् दुष्यन्त मैं हूँ। ३. मैं दुष्यन्त और शकुन्तला विषयक रतिमान् भी हूँ। ये तीनों प्रकार का बोध रस है। इस पक्ष में व्यञ्जना नहीं मानी गयी है। अतः दुष्यन्त की शकुन्तला विषयक रति ज्ञान के लिये अनुमान का शरण लेना पड़ेगा।’

साहित्यसुधासिन्धुकार

आचार्य विश्वनाथ देव ने जो रस स्वरूप का, उसकी अभिव्यक्ति का वर्णन किया है, वह पूर्वाचायों से प्रभावित है। परन्तु इनके प्रतिपादन की शैली में कुछ नवीनता है अतः उसका भी निरूपण किया जाता है व्यज्यते यदि चेत् कार्यैः कारणैः सहचारिभिः। कार्योपात्तैर्यदा स्थायी स रसः परिर्कीर्तितः।। परस्परानुराग में कारण राम सीतादिकों से, कटाक्ष आदि कार्यों से, लज्जा-हास्यादि सहचारियों से जो काव्य में वर्णित होने के कारण विभावानुभाव-व्यभिचारी संज्ञा को प्राप्त हैं, उनसे अभिव्यक्त सामाजिकों की रति आदि स्थायी भाव रस कहलाते हैं। इनमें विभावनादि व्यापार होते हैं अतः विभावादि संज्ञा इनकी हो जाती है। विभावन से रति आदि स्थायी का ईषत्प्रकाश होता है, अनुभावन से स्फुटतर, व्यभिचारण व्यापार से स्फुटतम प्रकाश होता है। प्रश्न है कि अन्तः करण की वृत्तिरूप रत्यादि की अभिव्यक्ति से परमानन्द स्वरूप की प्रतीति कैसे होती है। इसका समाधान है कि स्थायी की अभिव्यक्ति में चैतन्यानन्द स्वरूप आत्मा भी भासता है। वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार सभी ज्ञानों में आत्मभान निश्चित होता है। क्योंकि आत्मभान की सामग्री है आत्ममनोयोग। यह सभी ज्ञानों में रहता

… १. रसगंगाधर प्रथम आनन, रस प्रकरण। २. साहित्य सुधा सिन्धु ३/२४ ५६२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र है। अतः काव्य श्रवण या दर्शन की महिमा से जो स्थायी की अभिव्यक्ति होती है उससे आत्मा के आनन्दांशविषयक जो अज्ञान का आवरण है, वह भङ्ग हो जाता है। अतः रत्यादि से अवच्छिन्न चैतन्य (आनन्दांश पर अज्ञान के आवरण का भङ्ग हो जाने से) आनन्द रूप में परिणत हो कर आनन्दमय रस कहलाता है। श्रुति भी कहती है- ‘यह आत्मा रस है, रस को ही प्राप्त कर यह जीव आनन्दित होता है’ विभावादि से अन्य विषयक ज्ञान से आवरणभङ्ग नहीं होता, अतः आनन्द भी नहीं होता। इसीलिये रस विभावादि जीवितावधि है, इसका पानकरस न्याय से आस्वाद होता है, इन विभावादिकों का साधारणीकरण होता है। इस रस की अभिव्यक्ति में व्यञ्जना ही वृत्ति है। यह रस कार्य नहीं है, क्योंकि चित् स्वरूप है। घटादि के समान ज्ञाप्य भी नहीं है, क्योंकि यह फल व्याप्य नहीं है, चर्वणा की निष्पत्ति होने से रस की निष्पत्ति भी उपचार से मानी जा सकती है। और वृत्तिव्याप्य होने से रस को ज्ञाप्य भी कह सकते है। शास्त्रकारों ने इस (आत्म चैतन्य) का फलव्याप्यत्व का निराकरण किया है, ब्रहम विषयक अज्ञान के नाश के लिए वृत्त्तिव्याप्यता मानी है: फलव्याप्यत्वमेवाऽऽस्य शास्त्रकृभिर्निवारितम् । ब्रहमण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्यत्वमिष्यते।।’ काव्य में वह वृत्ति व्यञ्जना मूल है। जैसे ‘तत्त्वमसि’- इस वाक्य से ब्रह्म का साक्षात्कार होता है वैसे ही काव्य में शब्द और अर्थ से साक्षात्काररूपा वृत्ति होती है। अप्रातिकूलिकतया मनसा मुदादेर्यस्संविदोऽनुभवहेतुरिहाभिमानः। ज्ञेयो रसःस रसनीयतयात्मशक्तेः रत्यादिभूमनि पुनर्वितथा रसोक्तिः।।

समीक्षा

आचार्यों ने रत्यादि को स्रक्सूत्रन्याय से स्थायी माना है, व्यभिचारी की स्थिति जल बुदबुद्वत् होती है और जो सभी भावों को अपने में समाहित कर ले, जो दूसरे भावों से तिरस्कृत न हो सके, उसे स्थायी कहा गया है। वे सभी विभावादि से पुष्ट हो कर रस होते हैं। भोज का यह कथन कि सभी जगत् रसिक हो जायगा, उचित नहीं, जिसमें रत्यादि वासना है उन्हीं को रस का आस्वाद होता है, अन्य को नहीं। जिन्हें इन्होंने श्रृङ्गार कहा है वे ही वासना रूप रत्यादि भाव हैं, विरूद्धैरविरूद्धैर्वा भावैर्विच्छिद्यते न यः। आत्मभावं नयत्याशु स स्थायी लवणाकरः।। १. पञ्चदशी- ध्वन्यालोक में उद्धृत २. रस गङ्गाधर - आ.। ……….. … … …………-.-.-.–.—. . . . . . . . . . . ५६३ रस-सिद्धान्त विश्वनाथ अपुष्ट रत्यादि भी व्यभिचारी होते हैं। यह (कान्ताविषयक रति) पुष्ट हो कर व्यक्त हुई शृङ्गार रस होती है। अपुष्ट तथा देवादि विषयक व्यभिचारी कहलाती है। वही व्यक्त हो कर भाव कहलाता है। इस रस के विषय में रसगङ्गाधर में ग्यारह मत निरूपित हैं। इसका मूल लोचन में भी है। इनमें ६ मतों का निरूपण हो चुका है। सातवाँ मत- विभावादि तीनों समुदित रस है। आठवाँ-तीनों में जो चमत्कारी है वह रस है। अन्यथा तीनों भी नहीं। नवाँ-भाव्यमान विभाव ही रस है। दसवाँ-भाव्यमान अनुभाव ही रस है। ग्यारहवाँ भाव्यमान व्यभिचारी ही रस रूप से परिणत होता है परन्तु अन्तिम तीन मतों में भरत-सूत्र का विरोध है क्योंकि वे एक-एक को रस मानते हैं। जब कि सूत्र में विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव- इन तीनों का ग्रहण है। और विभावादि से पुष्ट स्थायी को रस कहा गया है। ये केवल विभाव, केवल अनुभाव, केवल व्यभिचारी को रस कहते है। अतः सूत्रविरुद्ध स harmenPRArna __ इन सभी मतों में केवल अभिनवगुप्तपादाचार्य का ही मत भारतीय रस सिद्धान्त रूप में मान्य है। भरत मत के अनुरूप है। परवर्ती आचार्यों ने इन्हीं का अनुसरण किया है। जो लोग व्यञ्जना नहीं मानते वे भूल जाते है कि भरत ने स्वयं व्यञ्जना का निर्देश ‘व्यजितान्-स्थायिभावान्’ कह कर दिया है। यह रस शृङ्गार-हास्य-करुण-वीर-रौद्र-भयानक-बीभत्स-अद्भुत भेद से नाटक में आठ है। काव्य में शान्त भी है। अतः नौ रस हैं। कुछ लोगों ने शान्त को नाट्य में भी माना है। विश्वनाथ ने वात्सल्य रस स्वीकार किया है। रुद्रट ने प्रेयान् रस माना है। भोज ने बारह रस माना है। भानुदत्त ने माया रस माना है। भक्तिरसामृत- सिन्धु, तथा भक्ति रसार्णव में भक्ति को भी रस माना गया है, परन्तु वह अप्राकृत रस है। शास्त्रकारों ने प्राकृत रस का निरूपण किया है, उनके मत में भक्ति ‘भाव’ है। रस नहीं। शृंगारप्रकाश में शृंगार ही एक रस है। भवभूति के अनुसार करुण ही एक रस है। और रस उसीके विवर्त हैं। धर्मदत्त ने पण्डितकवि नारायण के अनुसार अद्भुत को ही रस माना है। १. लोचन २ उ.लो ४ का लोचन २. रस गंगाधर प्रथम आनन। ३. साहित्य दर्पण वृ.पृ.। २५१। काव्यालकार १२/३। सास्वती कष्ठाभण ५/१६५ रसमज्जरी, रस तरगिणी। काव्य प्रकाश ४/४८ सू.। ८. श्रृंगार प्रकाश १/६/ तथा उत्तर रामचरितम्। ६. साहित्य तृ.प. में उदधृत। * ; ५६४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र

रस भेद

शृंगार दो प्रकार का है संयोग, विप्रलम्भ। संयोग शृंगार के अनन्त भेद है। उनकी गणना नहीं हो सकती अतः सबमें असंलक्ष्यक्रमत्व रूप एक धर्म होने से एक ही प्रकार का माना गया है। विप्रलम्भ अपने कारणों के भेद से पाँच प्रकार का माना गया है। वे कारण हैं, अभिलाष-विरह-ईर्ष्या-प्रवास-शाप । परन्तु पण्डितराज ने इन कारणों के भेद से विप्रलम्भ में कोई भेद न होने से इन भेदों को नहीं माना है।’ विश्वनाथ ने करुणविप्रलम्भ भी माना है। __ वीररस दानवीर-दयावीर-धर्म वीर-युद्धवीर भेद से चार प्रकार का होता है। परन्तु पण्डितराज कहते हैं कि वस्तुतः सम्भोग शृगार के समान वीर रस के भी बहुत भेद हो सकते है जैसे सत्यवीर-पाण्डित्यवीर-श्रमवीर-बलवीर आदि। हास्य रस के दो भेद, आत्मस्थ, परस्थ। यह उत्तम-मध्यम-अधम व्यक्ति में भी होता है अतः इसकी आश्रय भेद से तीन अवस्था होती है। इन के दूसरे भी छ: भेद है। उत्तम में स्मित, हसित,। मध्यम में विहसित, उपहसित, और नीच में अपहसित, अतिहसित। ऐसा विद्वानों ने कहा है। परन्तु भरत ने नौ ही रस माना है। इनके स्थायीभाव भी नौ हैं। वे रति-हास-शोक-क्रोध उत्साह- भय-जुगुप्सा-विस्मय तथा निर्वेद हैं। कुछ लोग शान्त का स्थायी भाव शम को मानते हैं परन्तु शम और शान्त एक ही हैं। ये रस असँल्लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ही होते हैं, परन्तु जगन्नाथ ने संल्लक्ष्य क्रम भी माना है। ये अनौचित्य प्रवर्तित होते है तो रसाभास कहलाते है जिसमें लोक को अनौचित्य बुद्धि हो वही अनुचित है। विश्वनाथ ने तिर्यक्गत रसाभास माना है भोज ने भी इसका निर्देश किया है।

भाव

व्यभिचारी अपने अपने विभावादि से अभिव्यक्त होते हैं तो भाव कहलाते हैं प्रधान रूप से व्यङ्ग्य हो तो भाव ध्वनि कहलाते हैं, अनुचित रूप से प्रवर्तित हो तो भावाभास कहलाते हैं। ये व्यभिचारी तैतीस हैं - निर्वेद, ग्लानि-शंका-असूया-मद- श्रम-आलस्य-दैन्य चिन्ता-मोह- स्मृति- धृति-व्रीडा-चपलता-हर्ष-आवेग- जडता-गर्व-विषाद- औत्सुक्य-निद्रा MPCACANCINEmalexabay १. रसगस्थर प्र.आ. रस प्रकरण। २. साहित्य दर्पण स.प. २०६। ३. साहित्य दर्पण आदि। ४. रसगाधर रस प्रकरण। ५. रसगाधर रस प्रकरण। ६. रसगइधर रस प्रकरण। रस-सिद्धान्त ‘समीक्षा रसभेद’ ५६५ अपस्मार-सुप्त-प्रबोध-अमर्ष-अवहित्थ-उग्रता-मति-व्याधि-उन्माद-मरण-त्रास-वितर्क। ये तैतीस हैं, तथा कान्ता विषयक अपुष्टरति भी भाव ही है।

सात्त्विक भाव

सात्त्विक भाव भी आठ हैं, वे स्तम्भ-स्वेद-रोमाञ्च-स्वरभंग-वेपथु-वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय हैं। इन स्थायी-व्याभिचारी-सात्विक भावों का लक्षण आकर ग्रन्थों से जानना चाहिये। ये सात्त्विक भाव भी परवर्ती आचार्यों द्वारा व्यभिचारी में अन्तर्भूत कर लिए गये हैं।

रस विरोध तथा परिहार

यहाँ रस शब्द से स्थायी भाव विवक्षित है। क्यों कि रस अखण्ड है, एक है उसमें विरोध नहीं हो सकता। इनका परस्पर में अविरोध और विरोध दोनों है। वीर-शृंगार का शृंगार-हास्य का, वीर-अद्भुत का, वीर-रौद्र का, शृगार-अद्भुत का विरोध नहीं है। परन्तु शृंगार-बीभत्स का, शृंगार-करुण का, वीर-भयानक का शान्त-रौद्र का, शान्त-शृंगार का विरोध है। कवि जिस रस को पुष्ट करना चाहता है उसके विरोधी रस के अंगों का समावेश उस काव्य में न करें। नहीं तो विरोधी रस प्रकृत रस को बाँध लेगा, या सुन्दोपसुन्दन्याय से दोनों नष्ट हो जाएगें। यदि विरोधी रस का समावेश करना ही कवि को इष्ट हो तो विरोध का परिहार करके करे।

परिहार

विरोध दो प्रकार का होता है १. स्थिति विरोध (एकाधिकरण्य विरोध) २. ज्ञान विरोध (नैरन्तर्यविरोध) ऐकाधिकरण्य विरोधी को भिन्न-भिन्न आश्रय में कर दे तो विरोध निवृत्त हो जाता है। जैसे नायक में वीररस और प्रतिनायक में भयानक रस निवेश करने से विरोध नहीं होता। इसी प्रकार नैरन्तर्य विरोधी रसों के बीच में अविरोधी रस का निवेशकर के व्यवहित कर देना चाहिए। जैसे शृंगार और बीभत्स वर्णन करना हो तो मध्य में वीर रस का निवेश कर देना चाहिये। शास्त्रों में रस दोष भी वर्णित है उन का परिहार भी करना चाहिए। नीरस काव्य सहृदयों को उद्विग्न कर देता है। ‘विपाककम्रमप्याम्रमुढेजयति नीरसम्’। अग्निपुराणकार कहते हैं-लक्ष्मीरिव विनात्यागान्न वाणी भाति नीरसा।’ लक्ष्मी की धन की शोभा वितरण से होती है। जैसे बिना दान किये (वितरण किये) धन की शोभा नहीं होती वैसे ही रस के बिना वाणी सुशोभित नहीं होती। X १. का.प्र. ४/४६ सू.। २. नाट्य शास्त्र भा.आ.। ३. काव्य प्रकाश सप्तम उ./रस गंगाधर प्रथम आनन। ४. अग्निपुराण ३३६/६५६६

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