नाट्य और काव्य
‘नाट्य’ के क्षेत्र में भारतीय आचार्य इस तथ्य से एकमत है कि उसका सर्वस्व ‘रस’ है। वही उसका केन्द्रीय तत्व है। नाट्यशास्त्र कहता है ‘इतिवृत्तं तु काव्यस्य शरीरं परिकीर्तितम्" इतिवृत्त नाट्य का शरीर है और शरीरी (आत्मा) है-रस। इस मान्यता के पीछे हमारा सम्पूर्ण जीवन-दर्शन भी निहित है। भारतीय चेतना मानती है कि स्वरूप साक्षात्कार ही हमारा गन्तव्य है-अपने को जानना और उसमें रमना ही हमारा लक्ष्य है। इस गन्तव्य तक पहुँचाने का एक मार्ग. ‘नाट्य’ भी है- काव्य की प्रयोगावस्था भी है। काव्य और नाट्य में यह अंतर है कि पहला ‘मृदुललितपदाढ्य'२ है-सरस शब्दार्थमय है और दूसरा उसका मंच या मण्डप पर अभिनयात्मक प्रयोग है। जगन्नाट्यरसिक शिव की ही प्रतिमूर्ति जीव का स्वरूपास्वादमाध्यम है-नाट्य । अतः नाट्य का केन्द्रीय तत्व ‘रसो वै सः’ है। इसमें कोई सन्देह नहीं। अभिवनगुप्त भी कहते हैं-‘नाट्यमेव रसः’ ‘रस एव नाट्यम्-एवकार श्रव्यकाव्य को व्यावृत्त करता है-होने को उसका लक्ष्य भी यह बन सकता है। परन्तु रस की जो ‘साक्षात्कारकल्प प्रतीति यहाँ है वह श्रव्यकाव्य में नहीं-प्रयोग-दशा में अनवतरित काव्य से नहीं।
काव्यः सुन्दर उक्ति
काव्य या श्रव्यकाव्य मुक्तक से प्रबन्ध तक व्याप्त है। यह उक्ति शब्दार्थ या भाषाबद्ध है-पर अपने में ‘विशिष्ट’ है। अन्यथा अकाव्यात्मक शब्दार्थ से उसकी व्यावृत्ति नहीं होगी। अकाव्यात्मक शब्दार्थ ‘अ-चारू’ होता है और ‘शब्दार्थात्मक काव्य चारू। __ यह ‘चारुता ही वह केन्द्रीय तत्व है जिससे अकाव्यात्मक वाङ्मय काव्यात्मक वाङ्मय से भिन्न हो जाता है। भाषा या वाणी उक्ति संप्रेषण का काम सर्वत्र करती है। पर काव्य में वह विशेष रूप से अपनी विशिष्ट पहचान के रूप में ‘चारुता’ का संप्रेषण करती سه १. भरतनाट्यशास्त्र, पृष्ठ ४६ इक्कीसवाँ अध्याय, प्रथम श्लोक, चौखम्बा संस्कृत संस्थान २. भरतनाट्यशास्त्र, पृष्ठ ३१२ अध्याय १७ श्लोक १२१ चौखम्बा संस्कृत संस्थान नाट्यशास्त्र, अभिनव भारती, पृष्ट ४२८, अध्याय६ श्लोक १५ हिन्दी विभाग,दिल्ली, प्रथम संस्करण ४. नाट्यशास्त्र, अभिनव भारती, पृष्ठ४६२ अध्याय६ श्लोक ३१ हिन्दी विभाग, दिल्ली अनुभावविभावानां वर्णना काव्यमुच्यते। तेषामेव प्रयोगस्तु नाट्यं गीतादिरंजितम् ।। उद्धृत व्यक्तिविवेक, पृष्ठ १०२ चौखम्बा संस्कृत सिरीज, १६६४ वाराणसी ५. चारूत्वप्रतीतिस्तर्हि काव्यस्यात्मा स्यात्-इति तदगीकुर्म एव’। ध्वन्यालोकलोचन। मोतीलाल बनारसीदास प्र.सं. १६६३ पृष्ट १६० अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४३३ है। यह ‘चारुता’ व्यक्तिगत और भौतिक प्रकृति की भी होती है और अ-व्यक्तिगत तथा अभौतिक या मानसिक प्रकृति की भी होती है।
काव्य का सौन्दर्य या चारूता अ-पार्थिव और अ-भौतिक है
हम लोग उन चिन्तकों से अपनी मान्यता भिन्न रखते है जो काव्यजगत और व्यवहारजगत की अनुभूति में अन्तर नहीं मानते। व्यवहारजगत और काव्यजगत की मानसिकता (अपना अन्तःकरण एक ही है) की प्रकृति में अन्तर है। व्यवहार-जगत की मानसिकता अर्जन-विसर्जन की भावना में रत रहती है- लाभ-हानि सोचती है- ग्रहण-त्याग परायण होती है। फलतः राग-द्वेष और अपने-पराएँ की भावना से मुक्त नहीं होती है। उसकी संकीर्णता होती है। विपरीत इसके काव्यजगत की मानसिकता इन सबसे ऊपर रहती है। मंचीय सामग्री पर एकतान रहती है-क्षिप्त-विक्षिप्त, भूमियों पर नहीं रहती। उसका कारण रजस् को दबाकर सत्वोद्रेक की प्रधानता होती है। मंचीय सामग्री भी लाभ-हानि-कारक नहीं होती- अतः उसकी भी सात्विकता उद्रिक्त रहती है। विक्षेपकारिता और विक्षेप-दोनों शान्त रहते हैं। वहाँ न ग्रहण-त्याग है-न लेनदेन है-न राग-द्वेष है-न अपना और परायापन है। उस मानसिकता में बाधक तत्व विगलित रहते हैं। लगता है यह अनुकरण नहीं-साक्षात्कार है। इस प्रकार द्रष्टा की व्यक्ति चेतना को संकुचित करने वाला तत्व वहाँ तिरोहित होजाता है। व्यवहारदशा में स्थिति भिन्न है। शुद्ध सात्विक अन्तःकरण वालों के लिए दृश्य-जगत् भी सात्विक हो जाता हैं जगत् वह मंच बन जाता है जहाँ सब कुछ खेल जैसा नाट्य सा लगने लगता हैं तब वह संकीर्ण व्यवहार-दशा से ऊपर रहता है। ‘पद्मपत्रमिवाम्भसा’ होता है। निष्कर्ष यह किः- व्यवहारजगत् और काव्यजगत की मानसिकता एक नहीं है वाल्मीकि के लिए व्यवहार का क्रौंचवध भी दुःखमय शोक नहीं है-वह करूण रस में निमग्न कर देता है। रसपूरित अंतस् छलककर काव्य बन जाता है। व्यवहारजगत् में रहकर भी सात्त्विक चेतना, काव्यजगत् में ही रहती है। उसके लिए सारा जगत नाट्य है। उसकी अनुभूति रसमय है-विक्षेप रहित और अनुभवजन्य है।
श्रव्यकाव्य का केन्द्रीय तत्त्व चारूता है-जो परिभाषित रस से व्यापक है
इस प्रकार व्यवहार जगत् की राजस (वासनातर्पक-अशुद्ध वासनातर्पक) चारुता से काव्यजगत् की ‘सात्त्विक चारूता’ भिन्न होती है। अभिप्राय यह कि यह चारुता व्यष्टिभोग्य नहीं, समष्टि-भोग्य है। कारण यह कि इस मानसिकता में उसका व्यक्ति संकीर्ण नहीं होता। उसकी चेतना असंकीर्ण या विस्फारमयी होती है। यह चारूतास्वाद अभौतिक भी है। भौतिक आस्वाद व्यक्तिगत ही होता है। अभौतिक या मानसिक या सात्त्विक मानसिक आस्वाद में चेतना का विस्फार होता है-संविद् का विकास होता है। निष्कर्ष यह कि जिस ‘चारूता’ का ४३४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र SASTEPAL संप्रेषण काव्यात्मक भाषा से होता है वह अपनी पहचान में अ-व्यक्तिगत और अ-भौतिक होती है। श्राव्यकाव्य में यही ‘चारूता’ केन्द्रीय तत्त्व है। इसको केन्द्र में रखकर काव्यशास्त्र चिन्तन में प्रवृत हुआ। नाट्य की भाषा अभिनयात्मक या नाटनात्मक है जो -यथाकथंचित’ नहीं, चतुष्पाद रूप से व्यक्त ‘रस’ में पर्सवसित होती है। यों चारुता का पर्यवसान ‘रस’ या ‘आनन्द’ में ही होता है- पर उसकी ‘यथाकथंचित’ स्थिति भिन्न है और ‘चतुष्पाद स्थिति’ भिन्न । श्रव्यकाव्य मुक्तक हो या प्रबन्ध-उसका ढाँचा और उसकी सामग्री की योजना ही और प्रकार की होती है।
काव्य में परिभाषित रस की मुख्यता परवर्ती घोषणा है
काव्यशास्त्र के इतिहास में निम्नलिखित उद्घोषण बहुत बाद में हुआ ‘वाच्यानां वाचकानांच यदौचित्येन योजनम्। रसादिविषयेणैतत् कर्म मुख्यं महाकवेः ११३/३२ (घ्वन्यालोकलोचन) अथवा-रसादिमयएकस्मिन् कविः स्यादवधानवान् (४) वही अर्थात् औचित्य को दृष्टिगत कर शब्द और अर्थ (वाचक और वाच्य) की संयोजना ‘रस’ को ही केन्द्र में रखकर हो, कारण यह कि महाकवि का मुख्य कर्म यही है। अथवा ‘कवि को एकमात्र सारी चेतना रसमयता को उभारने में ही समाहित कर देनी चाहिए। पहले यह बात केवल ‘नाट्य’ के लिए थी- नाट्यपरक काव्य के लिए थी। श्रव्यकाव्य में उक्ति यदि ‘सूक्ति या वक्रोक्ति’ भी हुई या हो गई तो कवित्व चरितार्थ हो गया। उक्ति को प्रभावी बनाने के लिए उसका ‘चारू’ होना आवश्यक है। ‘चारू’ उक्ति ही प्रभावी होती है-श्रोता पर असर डालती है-उसे अपनी ओर खींचती है-आकर्षक बनाती है।
चारुता से अभिप्राय
यह ‘चारूता’ क्या है ? व्यक्तिनिष्ठ है या वस्तुनिष्ठ ? इसमें समष्टि संवाद आवश्यक है या अनावश्यक ? स्मरण रहे कि प्रसंग काव्यगत ‘चारूता’ का है। व्यवहार में सब तरह की चारुता मिल सकती है। वहाँ की संकीर्ण रागप्रेरित चारूता व्यक्तिनिष्ठ है। गुलाब की चाख्ता वस्तुनिष्ठ है-यदी व्यक्ति रोगी न हो। काव्य की चारुता में समष्टि-संवाद होता है। अतः उसे वस्तुगत माना जाता है। वस्तुतः चारूता या सौन्दर्य के आस्वाद-काल में सुन्दर वस्तु ग्राहक की चेतना से एकात्म हो जाती है-उस पर छा जाती है। अतः उस तदाकार परिणति में वस्तु और चेतना का द्वैत तिरोहित हो जाता है। और तब न उसे एकान्ततः बाहरी कहा जा सकता है और न ही भीतरी। न एकान्ततः उसे वस्तुगत कहा जायेगा और न चेतनागत । वहाँ द्वैत है ही नहीं। जहाँ भोक्ता और भोग्य साम्यावस्थापन्न होकर नित्य सम्भोग रूप से विराजमान रहते हैं-वहीं पूर्ण सौन्दर्य है। अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४३५ 4
यह चारुता सहृदयता ग्राह्य है
जिस काव्योचित ‘चारुता’ की बात की जा रही है-भारतीय काव्य शास्त्रियों की धारणा है कि वह ‘सहृदयता’ ग्राह्य है, सहृदयता-हृदय-संवेद्य है। जहाँ सहृदयता नहीं है वहाँ काव्योचित ‘चारूता’ गृहीत नहीं होगी। अहृदय में अशुद्ध वासना जग जाती है और वह उत्तेजन बिन्दु पर पहुँच जाता है। काव्योचित चारुता में गति है- तात्पर्य यह कि ‘चारू’ में कहीं गत्यर्थक ‘रच’ धातु है। सुन्दर वस्तु का प्रभाव जड़ पर नहीं पड़ता-कारण वहाँ कोई स्पन्दन या गति नहीं है। पशु-स्वभाव वाला मानव ही ‘अहृदय’ या असहृदय है। वह उत्तेजित दशा को प्राप्त हो जाता है। ‘सहृदय’ की सहृदयता ‘वीर्यक्षोभात्मा" है-वहाँ वीर्य में उत्तेजन नहीं, मात्र क्षोभात्मक संचार होता है। फलतः वह आनन्दमग्न रहता है-अधोगत नहीं होता। निष्कर्ष यह कि यह चारुता ‘सहृदयता’ से ग्राह्य है। जिस ‘चारूता’ को केन्द्र में रखकर काव्यशास्त्रियों के बीच उसके स्रोत को खोजने की बेचैनी हुई-उसका स्वरूप भी पहले उतना स्फुट नहीं था-वह ‘अस्फुटस्फुरित’ था।
काव्य-विशिष्ट अभिव्यक्ति या मार्ग विशेष है
काव्य-शास्त्र का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ आचार्य भामहका ‘काव्यालंकार’ है। इस विषय पर पर्याप्त मतभेद है कि प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ ‘काव्यादर्श’ है या ‘काव्यालंकार’। दोनों अपने-अपने पक्ष में प्रचुर तर्क देते है। एक वर्ग ऐसा भी है जो इन्हें समकालीन मानता है। इस चर्चा का यहाँ प्रसंग नहीं है। पर दोनों के अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थों-काव्यलंकार और काव्यादर्श-से स्पष्ट है कि उस समय कवि-व्यक्ति-भेद से काव्यमार्ग का आनन्त्य सम्भावित होने पर भी सामान्यतः दो ही मार्ग अपनी विशिष्ट पहचान उभार रहे थे (१) वैदर्भ-मार्ग (दाक्षिणात्य) और (२) गौड़ मार्ग (पौरस्त्य)। ये दो परम्पराएँ या मान्यताएँ प्रतिष्ठित थीं। इनमें से एक-एक की पक्षधरता ये आचार्य कर रहे थे। वामन ने पांचालमार्ग और रुद्रट ने लाटमार्ग की भी बात आगे कहीं। भोज ने आवन्ती और मागध मार्गो का भी उल्लेख किया और इनकी पहचान कराने वाली विशेषताओं को रेखांकित किया। इन मार्गावादियों या रीतिवादियों-विशेषकर रीति को काव्य का आत्मतत्त्व बनाने वालों को अतत्त्वविद् कहने वाले आनन्दवर्द्धन कहते है अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद् यथोदितम्। अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं रीतयः सम्प्रवर्तिताः।। (३/४६) ध्व. इन आरम्भिक काव्यशास्त्रीयों को तत्त्व अनुभव में तो था-पर बुद्धि उसका विवेकपूर्वक व्याकरण-पृथक्करण-विश्लेषण नहीं कर पाती थी। अभिप्राय यह कि ‘चारूता’ का अनुभव . १. परात्रिंशिका, अभिनवगुप्त, कश्मीर संस्कृत ग्रंथावलि, १६१८ (त्रीशिका)-पृ. ४६४३६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र तो था। पर चारुता का स्रोत क्या है?-यह अस्फुट था-स्फुट नहीं था। प्राग्ध्वनि निद्यमान इन आचार्यों में आकर्षक तत्त्व का अनुभव नहीं था-ऐसा नहीं। पर उसके स्रोतों में विवेक-साध्य तारतम्य का निर्धारण नहीं था। एक परम्परा जिसके अनुयायी दाक्षिणात्य दण्डी थे- वैदर्भ को महत्त्व देते थे। उसमें आकर्षक स्रोतों को वह ‘गुण’ कहते थे और अलंकार को उसी में समाहित कर लेते थे। यद्यपि कुछ अलंकारों का उन्होंने पृथक् उल्लेख, और लक्षण दृष्टान्त (लक्ष्य) आदि का भी निरूपण किया है। ‘मार्ग’ की प्रमुख विशेषता गुण थे। यह बात दूसरी है कि इन मार्गों में उभयनिष्ठ अर्थात साधारण और असाधारण था। दाक्षिणात्यों के वैदर्भ मार्ग में जो दस विशेषताएँ (गण) गिनाई गई थीं। गौड या पौरस्त्य या प्राच्यदेश के कवियों द्वारा गृहीत ‘गौड मार्ग’ में भी वे विशेषताएँ उभारी जा सकती है।
भामह और मार्ग
तब गौड़ मार्ग के प्राशस्त्यधर भामह वैदर्भ की भाँति गौड़ को भी महत्व देने लगते हैं। जिस प्रकार ‘दण्डी’ ने वैदर्भ मार्गगत दस गुणों का उल्लेख किया और काव्य में मार्ग को रेखांकित किया। भामह’ ने वैसा नहीं किया। ‘भामह’ ने काव्य में तीन प्रबंध-गुणों की चर्चा की। भामह ने ज्ञातभाव से यह स्वीकार किया कि वैदर्भ मार्ग और गौड़ मार्ग दोनों ही अपने-अपने सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं। उनका अस्फुट अभिप्राय यह है कि यदि प्रसंग ओजस्विता का है तो गौड़ का पद सन्दर्भ और मधुभाव का है-तो वैदर्भ का प्राशस्तत्य होगा। वैदर्भ का प्रयोग सर्वत्र समुचित और न्याय नहीं होगा।
भामह का प्रस्थान भिन्न परम्परा का है
अलक्रिया या अलंकार-शब्द का प्रयोग दोनों करते है। दोनों काव्य के केन्द्रीय तत्त्व ‘शोभा’ ‘विभा’ या ‘चारूता’ के स्रोत रूप में इनका महत्त्व मानते है। पर दोनों के प्रस्थान की दिशा में कहीं न कहीं भेद है। भामह कहते है न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनिताननम् ।’ जिस प्रकार वनिता का आनन सहज कमनीयता (शोभा) से युक्त होकर भी भूषण-निरपेक्ष रहने पर शोभा नहीं पाता-उसी प्रकार कविता की भी स्थिति है। सहज कमनीयता भले ही हो- पर काव्योचित यानी काव्य संज्ञा से विभूषित होने के लिए जिस शोभा की आवश्यकता है-उसका स्रोत तो भूषण ही है। यहाँ कई प्रश्न खड़े होते हैं-इनको खड़ा करने से पूर्व दाक्षिणात्य परम्परा के दण्डी का भी अभिमत देख लें। वह मानते हैं कि AI १. अधिकांश संस्कृतसाहित्यशास्त्र के इतिहासकारों ने ‘भामह’ को दण्डी’ का पूर्ववर्ती माना है। ‘अष्टम खण्ड’ के सम्पादक (करूणापति त्रिपाठी) का भी यही मत है। २. काव्यालंकार-भामह, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना १९६२ प्रथम परिच्छेद श्लोक १३ ४३७ RE अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा इष्ट (सुन्दर) अर्थ से युक्त पदावली को काव्य’ कहते हैं। वह ‘शरीर’ को ‘सुन्दर’ मानते है फलतः कहते हैं स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम् शरीर सुन्दर हो तो भी यदि उस पर श्वेत कुष्ट का दाग हो तो असुन्दर लगने लगता है। फलतः शरीरगत सौन्दर्य या शोभा का यथावत् बने रहने देने के लिए व्यक्ति को चाहिए कि उस पर किसी भी ‘दोष’ की सत्ता न रहने दें। दोष सौन्दर्य का घातक है। दण्डी इस अर्थगत इष्टता (चारुता) या शोभा का स्रोत ‘अलंकार’ कहते हैं-काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते काव्य में ‘शोभा’ कर धर्मो को अलंकार कहा जाता है। ‘चारुता’ विषयक धारण में दण्डी और भामह का मतभेद-स्पष्ट है कि भामह भी ‘विभा’ या ‘शोभा’ के लिए ‘अलंकार’ की अपेक्षा मानते हैं और दण्डी भी। पर ‘शोभा’ के अर्थ के विषय में दोनों में कहीं गहरा मतभेद है। भामह में ‘गौड़’ बोलता है और दण्डी में दाक्षिणात्य परम्परा। दण्डी की ‘शोभा’ में सहज कमनीयता का व्यावर्तन नहीं है। भामह में स्पष्ट है। दण्डी की ‘शोभा’ का अर्थ व्यापक है- भामह का सीमित। यों शोभा, सौन्दर्य या चारुता का सम्बन्ध मानते दोनों हैं- ‘शरीर’ से। दण्डी की ‘शोभा’ में शरीर की सहज कमनीयता भी समाहित है, भामह में असमाहित और व्यावृत । दण्डी के यहाँ ‘सौन्दर्यमण्डित’ अर्थ की समर्थक शब्दावली ‘काव्य’ है। इस अर्थ के सुन्दरीकरण में दण्डी अलंकार के साथ-साथ गुण का भी योग मानते हैं। गुण का सहज कमनीयता में और अलंकार का उत्पादित या प्रवर्द्धित कमनीयता में योगदान है। आगे चलकर वामन ने इसे स्पष्ट किया। इस प्रकार भामह काव्योचित ‘चारूता’ के अर्थ और स्रोत के विषय में दाक्षिणात्य से भिन्न गौड़ परम्परा के आचार्य हैं। व्यवहार की दृष्टि से देखा जाय तो ‘अलंकार’ उसी को कहते हैं जो ‘चारूता’को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न करता है अथवा सहज रूप से विद्यमान चारुता का संवर्धन करता है। अतः इस गुणगत साम्यवश काव्यक्षेत्र में प्रयुक्त ‘अलंकार’ का अभिधा में यदि अर्थ माना जाय तो वह चारुता का कृत्रिम रूप से उत्पादक अथवा पहले से ही सहज विद्यमान का प्रवर्धक है। १. काव्यादर्श-शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली, प्रथम परिच्छेद श्लोक १० कलकत्ता १९८२ सं. जीवानंद विद्यासागर २. काव्यादर्श, वही १/७ प्र.प. श्लोक ७ ३. वही २/१ द्वि.प. प्रथम श्लोक अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र ४३८ व्यवहार में अलंकार सहज शोभा के प्रवर्द्धक ही हैं-इस दृष्टि से चारुता के स्रोत रूप में ‘अलंकार’ संज्ञा का मुख्यार्थ में प्रयोक्ता भामह ही है। इसीलिए परवर्ती आचार्यों का यह कथन संगत लगता है। ‘इह तावद् भामहोद्भटप्रभृतयश्चिरन्तनालंकारकाराः प्रतीयमानमर्थं वाच्योपस्कारकतयालंकारपक्षनिक्षिप्तं मन्यन्ते…….. उद्भटादिभिस्तु गुणालंकाराणां प्रायशः साम्यमेव सूचितस्’ तदेवमलंकारा एव काव्ये प्रधानमिति प्राच्यानां मतम्’ ।
भामह का महत्त्व
इस उद्धरण में अलंकार-सर्वस्वकार रूय्यक ने बताया है कि जिन प्राच्यों के मत में अलंकार ही (चारूता हेतुभूत होने के कारण) काव्य में प्रधान हैं- उनमें भामह तथा उद्भट आदि ही उल्लेख्य हैं न कि दण्डी प्रभृति। प्राचीन दण्डी भी हैं-पर ‘अलंकार’ को काव्य में महत्व देने वाले भामह आदि ही हैं। यहाँ स्पष्टतः दण्डी को छोड़कर उद्भट आदि का आख्यान किया गया है। इस उद्धरण में ‘प्राचाम्-की जगह ‘प्राच्यानाम् का प्रयोग भी ध्यान देने लायक है। प्राच्य यानी प्राची दिशा में रहने वाले या उस दिग्भाग में प्रचलित मान्यता में भाग लेने वाले-आस्था रखने वाले आचार्य। इस क्रमागत धारणा से स्पष्ट है कि ‘अलंकार’ को काव्य में चारूता का प्रमुख स्रोत मानने वाले भामहादि हैं। अतः इनकी धारणा से ही ‘अलंकार मत’ की मान्यता की विशिष्ट धारणाएँ रखी जानी चाहिए। निष्कर्ष यह कि भामह ‘अलंकार-मत’ के उपलब्ध प्राचीन या प्राच्य आचार्यों में प्रथम उल्लेख्य है।
काव्य की आत्मा
काव्य की आत्मा के प्रश्न का विवाद-दृश्यकाव्य, नाट्य में नहीं, श्रव्य काव्य में उठाया गया-यह बात पहले कही जा चुकी है। आत्मा का अर्थ है-सारवान्तत्त्व, केन्द्रीयतत्त्व। श्राव्यकाव्य के क्षेत्र में यह प्रश्न खड़ा हुआ कि काव्य में वह सारतत्त्व कौन सा है जिसके होने से उक्ति में कवित्व का पूर्ण उन्मेष होता है और जिसके न रहने से कवित्व निःशेष हो जाता है या आता नहीं है। वह तत्व ‘चारूता’ है-यह निर्विवाद है और यह चारूता काव्य में अपार्थिव और अ-व्यक्तिगत हैं यह सब बातें पहले कही जा चुकी है।
विशिष्ट उक्तिस्वरूप काव्य में वैशिष्ट्य या आत्मा की खोज
विवाद इस पर केन्द्रित होता है कि उस ‘चारूता’ का स्रोत क्या है ? मनुष्य कितना भी निर्णय को वस्तुनिष्ठ बनाने में सतर्क और तटस्थ बनने का प्रयत्न करे-पर वह यंत्र १. अलंकारसर्वस्व (रूय्यक) पृ. ६ निर्णयसागर १६३६ २. आज भी कहावत प्रसिद्ध है-साज-बाज और वेश यही बंगला देश। इससे प्राच्यों की अलंकारप्रियता झलकती है। ३. उक्ति-विशेष ही काव्य है (कर्पूरमंजरी) अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४३६ नहीं है। संस्काररञ्जित चेतनावाला प्राणी है। अतः उसके प्रत्येक बौद्धिक प्रयास और निर्णय में कहीं न कहीं उसका संस्कार रहता है। सौन्दर्य का स्रोत क्या है-इस प्रश्न पर अलंकारप्रिय रूचि का व्यक्ति क्या कहेगा ? अथवा क्या कहने से पता चलेगा कि कहने वाले की रूचि में अलंकारप्रियता के संस्कार है ? निसर्गजात कमनीयता जिसे आकृष्ट न करे-और अलंकार से पैदा हुई या प्रवर्द्धित कमनीयता ही जिसे आकृष्ट करे उसे अलंकारवादिता का ही पक्षधर कहना पड़ेगा। इसीलिए भामह कहते हैं- न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनिताननम्। सहज कमनीयता से युक्त वनिता के आनन की तरह सहज कमनीयता से मण्डित कविता का अंग भी अलंकार-निरपेक्ष रहकर शोभावह नहीं होता। यह अलंकारवादी की घोषणा है।
अलंकारवादी की पहचान उनकी मान्यताएँ और परम्परा
शोभा या चारूता दो प्रकार की है- सहज और कृत्रिम या प्रवर्द्धित । काव्य होने के लिए दूसरे प्रकार की चारुता अपेक्षित है। अलंकारवादियों के मत में यही दूसरे प्रकार की चारूता काव्योचित चारूता है। इसी के संस्पर्श से उक्त में कवित्व का उन्मेष होता है और उस उक्ति को काव्य कहा जाता है। इसी घोषणा-पत्र के कारण भामह को अलंकारवाद का पुरोधा कहा जाता है। अथवा उस परम्परा का प्रवर्तक माना जाता है जो काव्यगत वैशिष्ट्य का सर्वस्व अलंकार को मानते थे। व्युत्पत्ति की दृष्टि से ‘अलंकार’ शब्द के दो प्रमुख अर्थ हैं- सौन्दर्य और सौन्दर्यसाधन। भाव-व्युत्पत्ति है- अलंकरणमलंकार:- अलंकार एक भाव है- सुन्दर का भाव सौन्दर्य। इसे ‘अलंकृतिः’ भी कहा गया है। ‘अलंक्रियतेऽनेन’- यह करण व्युत्पत्ति है-करणकारकपरक व्युत्पत्ति है। इस व्युत्पत्ति से अलंकार वह करण या असाधारण साधन है जिससे ‘सौन्दर्य’ का आधान होता है। ‘कुंभकार’ की तरह ‘अलंकार’ को उपपद समास मानकर भी अर्थ किया जाता है- जैसे ‘कुम्भ’ का ‘कार’ वैसे ही ‘अलं’ का ‘कार’। अलम् का अर्थ है पर्याप्त- बस, न अधिक न कम। जितना चाहिए बस। यह ‘बस’- भोक्ता की ओर से तृप्त होने पर कहा जाता है। इस स्थिति तक पहुँचा देने वाले ‘करण’ या ‘असाधारण कारण’ ‘अलंकार’ है। अलंकार शब्द का यौगिक अर्थ है। इस अर्थ में उन सभी तत्त्वों या उपकरणों का समावेश है जो सौन्दर्य-स्रोत हैं। अलंकार शब्द का यह व्यापक अर्थ है। सन्दर्भ भेद से सौन्दर्यस्रोत अलग-अलग होगें। यहाँ काव्य का सन्दर्भ है। काव्य में जब सौन्दर्यस्रोतों में उच्चावचता का स्पष्ट तारतम्य निर्धारण नहीं था-तब सौन्दर्य के जितने 2 १. काव्यालंकार (भामह-काव्यालंकारः) प्रथम परिच्छेद-१३, संस्करण २०३८ वि. प्रकाशक-चौखम्बा । संस्कृत संस्थान ४४० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र स्रोत हो सकते है- सामान्यतः सभी सौन्दर्यस्रोतों को अलंकार कहा जाता था। दोनों परस्पर पर्याय थै- जो अलंकार था-वह सौन्दर्यस्रोत था और जो सौन्दर्यस्रोत था-वह अलंकार था। जो सौन्दर्यस्रोत नहीं था-वह अलंकार नही था। जो अलंकार नहीं था-वह सौन्दर्यस्रोत नहीं था। अलंकारवादियों की यह धारणा थी। अलंकारशास्त्र में क्रमशः उच्चावच भाव से तारतम्य निर्धारण करते हुए सौन्दर्य के स्वरूप, आश्रय और स्रोत-पर विभिन्न मत उपस्थापित किए गए। फलतः किसी ने गुण को अधिक महत्व दिया। किसी ने प्रतीयमान अर्थ या व्यंजकता को किसी ने रस को तो किसी ने आवर्ण प्रबन्ध-व्यापी ‘वक्रता’ (कविव्यापार) को। यों तो ‘औचित्य’ और ‘चमत्कृति’ को भी सौन्दर्यनिर्णय का आधार बनाया गया। उद्भट के नाम पर कहा जाता है कि वह गुण और अलंकार में प्रायः साम्य’ या एकरूपता ही मानते थे। अलंकारवादी रीतिवादियों के सौन्दर्यस्रोत ‘गुण’ को अलंकार संज्ञा देना ही पसन्द करते थे। रीतिवादी समझते थे कि गुण, काव्य शरीर के सहज धर्म हैं, नित्य धर्म हैं, अपृथक् सिद्ध विशेषता हैं। वे चढ़ाये-उतारे (जोड़े-हटाएँ) नही जाते जबकि ‘अलंकार’ अनित्य, पृथक् और उतारे-चढ़ाये जाने वाले धर्म है। इन लोगों ने समझाया कि व्यवहारगत गुण और अलंकार में यह अन्तर हो सकता है। पर काव्य के शरीर के साथ गुण और अलंकार आते और जाते है। दोनों ही काव्य शरीर के सहजात धर्म हैं-अतः गड्डरिका प्रवाहवश यह अन्तर चल पड़ा है- तत्त्वतः देखा जाय तो दोनों में कोई अन्तर नहीं है। ‘कनह-कनक ते सौ गुनो…..’ में यमक से रहित काव्य शरीर की कल्पना की जा सकती है? कदापि नहीं। निष्कर्ष यह कि जब अलंकार और गुण-दोनों काव्यशरीर के धर्म हैं और दोनों काव्य में शोभा के स्रोत है ऐसी स्थिति में दोनों को पृथक् क्यों माना जाय? व्युत्पत्ति और प्रयोग के साक्ष्य पर सौन्दर्यस्रोत होने के कारण-दोनों को ‘अलंकार’ ही कहना ठीक है। रहा ‘ध्वनि’ ‘व्यजंकता’ या ‘प्रतीयमान’ अर्थ को सौन्दर्यस्रोत कहने की बात। वह तो एक तो ऐसा कोई अर्थ अभिधावादी (ध्वन्यभाववादी) अलंकारवादियों के विवेक में है ही नहीं- समासोक्ति, अन्योक्ति-आदि में यथाकथंचित उसका सद्भाव सिद्ध भी किया जाय तो वे सब रूढ़ अलंकार ही हैं। प्रयोग में उनकी मान्यता अलंकार की ही है। निष्कर्ष यह कि इसका या तो अभाव है और सद्भाव है तो अन्तर्भाव या अपृथक्भाव है। रस की प्रतीति अवश्य है। इससे शब्दार्थ का सुन्दरीकरण होता है- उसमें चारुता आती है- अतः चारुता स्रोत होने से इसे रसवदलंकार-यानी अलंकार का ही एक भेद माना १. उद्भटादिभिस्तु गुणालंकाराणां प्रायशः साम्यमेवसूचितम्-अलंकारसर्वस्व, पृष्ठ ६ (निर्णयसागर संस्कारण १६३६) २. हेमचन्द्र ने कहा है- तस्माद् गड्डरिका प्रवाहेण गुणालंकारभेद-इति भामहविवरणे भट्टोद्भटोऽभ्यधात्-काव्यानुशासन, पृष्ट १७ निर्णयसागर संस्करण १६०१ टीका में उद्धत है अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४४१ जाना चाहिए। यह भी सौन्दर्यस्रोत होने से व्यापक अर्थ में अलंकार के ही अन्तर्गत आता है। अलंकारवादियों ने इसी ‘रसवदलंकार’ के अन्तर्गत रसों का समावेश किया है। कुन्तक की ‘वक्रता’ या ‘वक्रोक्ति’ को तो कुन्तक अपोद्धार बुद्धि से स्वयम् ‘अलंकार’ कहते हैं। वह कहते हैं
। ‘काव्यस्यायमलंकारः कोऽप्यपूर्वो निरूप्यते’।’ यह भी एक अलंकार ही है। यह बात भिन्न हैं कि अब तक इसकी और किसी का ध्यान नहीं गया। उक्ति अलंकार्य है और वक्रोक्ति अलंकार। __अलंकार को अलंकार होने के लिए-सौन्दर्यसाधन होने के लिए औचित्य का निर्वाह अनिवार्य है। वह इसका सहज संधाती है। पृथक् से उसे महत्त्व देने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार निष्कर्ष यह कि सौन्दर्य स्रोत जितने भी हैं-सभी को ‘अलंकार’ की पताका के नीचे आना पड़ेगा। जो सौन्दर्यस्रोत नहीं है-वह काव्य में अलंकार नहीं है-शोभाकारक नहीं है। तत्त्वार्थ यह कि अलंकारवादियों की प्रथम मान्यता यह है कि १ अलंकार-निष्पादित सौन्दर्य ही काव्य में ग्राह्य है काव्योचित-काव्य-व्यवहारोचित सौन्दर्य को अलंकार से ही सम्पन्न होना आवश्यक है। २. उनकी दूसरी मान्यता यह है कि सौन्दर्यस्रोतमात्र अलंकार है और अलंकार ही सौन्दर्यस्रोत है। सौन्दर्यस्रोत के नाम से जो और तत्त्व काव्यशास्त्र में कहे-सुने जाते हैं वे सभी ‘अलंकार’ है। अलंकारवादियों की तीसरी मान्यता यह है कि काव्य या विशिष्ट उक्ति (अभिव्यक्ति) में जो चारूता आती है उसका स्रोत अलंकार है और अलंकार का स्रोत-वक्रोक्ति वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलंकृतिः १/३६ काव्यालंकार सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयाऽर्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलंकारोंऽनया विना (२/८५ काव्यालंकार) उक्ति या अभिव्यक्ति की अलंकृति है-वक्र वाचक की उक्ति। अभिधावादी अलंकारवादी भामह ‘वाचामलंकृतिः’-वाणी के सौन्दर्य या चारूता का स्रोत बताते हैं-वक्र अर्थ और वक्र शब्द की उक्ति। यहाँ उपचारतः सौन्दर्याधार को सौन्दर्य (अलंकृति) ही कह दिया गया है। कहा जा रहा है कि जो अलंकार अभिव्यक्तिगत चारुता का स्रोत है वह वक्रता-सापेक्ष है। वक्रता के बिना कोई अलंकार हो ही नहीं सकता। इसलिए काव्य में अलंकारिक उक्ति में १. वक्रोक्तिजीवित-१ द्वितीय श्लोक-प्रथम उन्मेष २. ‘वक्रोक्ति’ की चर्चा करते हुए उसे महत्व देने वाले प्रथम आचार्य ‘भामह’ है-‘सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलंकारोऽनया विना ११, २/८५ काव्यालंकार ४४२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र वक्रता सर्वत्र व्याप्त है। वह काव्य की आत्मा (चारूता) के स्रोत (अलंकार) का भी स्रोत है अलंकारवादियों की यह तीसरी मान्यता है। इसे ‘वक्रता’ कहें या ‘अतिशय’- दोनों पर्याय है। कुछ विद्वान मानते हैं कि ‘भामह’ की ‘वक्रता’ का आशय वक्तव्य को घुमाफिराकर कहना है और ‘अतिशय’ का आशय बढ़ा-चढ़ाकर। पर ऐसा है नहीं। दोनों आशय दोनों के हैं। इसीलिए दोनों पर्याय के रूप में कहे गए या माने गये हैं। ‘भामह’ स्वयम् अपना आशय स्पष्ट करते हुए कहते है- ‘निमित्ततोक्तौ यत्तु लोकातिक्रान्तगोचरम् । लोकातिक्रान्तगोचर वाणी भी वक्र या अतिशययुक्त है। ऐसा काव्यव्यवहारोचित चारूता की निष्पत्ति के लिए किया जाता है। अपेक्षित चारुता की निष्पत्ति ही निमित्त है। जैसा सामान्यतः लोक की बातचीत में (वार्ता) में कहा जाता है उसमें कोई वक्रता या अतिशय नहीं होता। ‘सांयकाल में पक्षी घोसले की ओर निवास के लिए जा रहे हैं’- इस उक्ति में अतिशय या वक्रता कहाँ है? लोचनकार ने भी इस ‘वक्रता’ का आशय स्पष्ट करते हुए कहा है- ‘शब्दस्य हि वक्रता अभिधेयस्य च वक्रता लोकोत्तीर्णेन रूपेणावस्थानम्- इत्यसावलंकास्यालंकार भावः लोकोत्तरतैव चातिशयः तेनचातिशयोक्तिः सर्वालंकारसामान्यम् अर्थात वाचक और वाच्य या शब्द और अर्थ की वक्रता उनका लोकोत्तर रूप से अवस्थान है- लोक और शास्त्र में जिस पद्धति से कहा जाता है- उससे भिन्न रूप की कथन भंगिमा वक्रता या अतिशय है। इनकी चौथी मान्यता यह है कि चारूता या सौन्दर्य का आश्रय शरीर ही है-शब्द एवं अर्थ ही है। वे ही अलंकार्य है-अलंकरणीय हैं स्यादवपुः सुन्दरमपि। (भामह-काव्यालंकार) जब भामह ‘वाचामलंकृतिः’ कहते हैं- तब वह शब्दार्थ या उक्तिगत सौन्दर्य की ही बात करते है। यद्यपि यह मान्यता रीतिवादी और वक्रोक्तिवादियों की भी है, तथापि उनमें भी प्रचलित होने के कारण इनसे जोड़ दी गई है। SSES ARE मा Arriday १. दण्डी भी कहते हैं- ‘काव्यशोभाकरान् धर्मानलकसारान् प्रचक्षते- काव्यशोभाकर धर्म अलंकार है तब भोजराज उनका आशय स्पष्ट करते हुए कहते हैं- ‘तत्र काव्य- शोभाकरान्-इत्यनेन गुणरसभावतदा भासप्रशमादीनामपि अनुगृह्णाति। मार्गविभागकृदगुणानामलकियोपदेशेन (काश्चिद मार्गविभागार्थमुक्ताः प्रागप्यलक्रियाः) श्लेषादीनां गुणत्वमिवालंकारत्वमपि ज्ञापयति’ अर्थात् दण्डी भी कहते हैं कि गुण भी अलंकार ही हैं और भोज उनका आशय स्पष्ट करते हुए अन्य तत्वों को भी अलंकार ही कहते है। २/८१ काव्यलंकार ययातिशयोक्तिर्लक्षिता सैव सर्वा वक्रोक्तिरलंकारप्रकारः सर्वः- लोचन, पृष्ठ४६७ चौखबा संस्करण-संवत् १९६७ ४. ध्वन्यालोकलोचन, चौखम्बा सं. १६६७, पृष्ठ ५६७, तृतीय उद्योत अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४४३ भामह ने एक बात और कही ‘इष्टं द्वयन्तु नः"-उन्हें दोनों-शब्द और अर्थ- की अलंकारता मान्य है। परम्परा में आलंकारिकों के बीच इस बात पर मतभेद प्रचलित था कि अलंकार शब्दालंकार को कहना चाहिए या अर्थालंकार को ? अपने-अपने पक्ष में दोनों के तर्क थे। एक पक्ष कहता था कि अलंकार तो रूपक आदि अर्थालंकार ही हैं- उसी के भेद ‘प्रभेद लोगों ने अनेक प्रकार से कहे हैं। अर्थालंकार ही अलंकार इसलिए हैं कि बिना इसके जैसे कान्त वनितानन आकर्षक नहीं होता। वैसे ही कविता भी आकृष्ट नहीं करती-चाहे वह कितनी भी कमनीय क्यों न हो? ‘न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम् यहाँ एक अवान्तर प्रश्न या जिज्ञासा यह है- ‘विभाति वनिताननम्’- में ‘विभाति’ का अर्थ क्या किया जाय? ‘शोभते. विभावता माप्नोति’ यह अवान्तर प्रश्न मुख्य सन्दर्भ से जुड़ा हुआ है। इसलिए इस पर विचार आवश्यक हैं। प्रायः ‘विभाति’ का अर्थ लोचनकार से लेकर वामनी टीका में उद्धृत समस्त टीकाकार ‘विभावतामाप्नोति’ ही करते हैं- जिसका तात्पर्य यह कि अलंकार से सुन्दरीकृत अर्थ विभावन क्रिया में समर्थ होता है। ‘विभावन’ क्रिया रस-निष्पति के सन्दर्भ में जुड़ी है। यदि यह मतवाद अलंकारवादी आचार्यों से सम्बद्ध है तो उन्हें ‘रस’ की उतनी चिन्ता नहीं है। यह सूक्ति-परम्परा है- श्रव्यकाव्य की परम्परा है। इसमें ‘शोभन’ लगना चाहिए- ‘रसमय’ हो या न हो- इस पर बल नहीं है। यह वह धारा हैं जहाँ रसमयता भी ‘शोभन’ का स्रोत है- तभी रसवदलंकार की भी संगति लगेगी। वस्तुतः यह बड़ा ही उलझाने वाला प्रश्न है। एक तरफ ‘नाट्यरस’ का रस है और दूसरी तरफ श्राव्यकाव्य का ‘रस’। नाट्य का ‘रस’ विभावादि पुष्कल सामग्री से निष्पाद्य है जबकि आनन्दवर्धन के शब्दों में ‘चित्तवृत्ति मात्र रस है। उनका कहना है कि काव्य में कवि ऐसी किसी वस्तु का वर्णन क्यों करेगा जिससे कोई चित्त पर प्रभाव ही न पड़े और यह प्रभाव या चित्त की तदाकार परिणति ही तो रस है। दशरूपककार का तो यह कहना कि वस्तु
१. रूपकादिरलंकारस्तस्यान्यैव धोदितः। न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनिताननम् ।। (३) रूपकादिरलंकारं बाह्यमाचक्षते परे।। सुपां तिङा च व्युत्पत्तिं वाचां वांछन्त्यलंकृतिम् ।। (४) तदेतदाहुः सौशब्धं नार्थव्युत्पत्तिरीदृशी शब्दाभिधेयालंकारभेदादिष्टं द्वयं तुनः (५) काव्यालंकार प्रथम परिच्छेद और भी- तदेभिरङ्गैर्भूष्यन्ते भूषणोपवसनाः वाचां वक्रार्थशब्दोक्तिरलंकाराय कल्पते (भामह काव्यालंकार) २. चित्तवृति विशेषा हि रसादयः-ध्वन्यालोक, तृतीय उद्योत, पृष्ठ ४६५ (चौ.सं.) यदवाप्यवस्तु कविभावकभाव्यामानं तन्नास्ति यन्न रसभावमुपैति लोके। ७६ श्लोक दशरूपक-चतुर्थ प्रकाश, निर्णयसागर पृष्ठ १६१ . ..77 " ..
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४४४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र SHARE FROTRAL तो वस्तु अवस्तु भी कवि और भावक की भावना का विषय बनकर रस देने लगता है। निश्चय ही काव्य या श्रव्य काव्यगत रसविषयक धारणा नाट्यगत रस विषयक धारणा से कहीं न कहीं भिन्न है। अभिनवभारती में अभिनवगुप्त ने भी यह स्वीकार किया है। अस्तु। काव्यात्मक अभिव्यक्ति मात्र में ‘रस’ की काव्याप्ति देखकर ही पण्डितराज ने ‘रमणीयता’ की शर्त रखी सहृदय-सहृदय का साक्ष्य देकर ‘चमत्कार’ का पर्याय कहा। नदी का कलकल और पक्षियों का कलरव भी वर्णित होता है और परम्परा काव्य कहती है। यहाँ ‘चमत्कार’ या ‘शोभनता’ तो है- पर रसमयता कैसी? आनन्दवर्धन की व्यापकता रसमयता से अलंकारवादियों को कुछ लेना-देना नहीं है। क्षणभर के लिए यह मान भी लिया जाय कि काव्य में रस का असद्भाव सम्भव ही नहीं है तथा पि अलंकारवादी को वह अभिप्रेत नहीं होता- वह तो शब्द और अर्थ (वाच्य) की विशिष्ट संरचना से- लोकातिक्रान्त भंगिमा से एक रसातिरिक्त ‘चमत्कार’ या ‘शोभनता’ उत्पन्न करना चाहता है- उसकी प्रतिभा का संरम्भ ‘रस’ हो भी तो उसपर नहीं होता। इसलिए अलंकारवादियों के सन्दर्भ में ‘न कान्तमपि निर्भूषं विभाति’ में ‘विभाति’ का अर्थ ‘शोभते’ ही करना पड़ेगा- न कि ‘विभावता माप्नोति’।
अलंकारवादियों की चारूता
इस प्रकार यह स्थिर हो जाने पर काव्य में अलंकारवादियों के लिए वही’चारूता या ‘शोभनता’ प्रतिपाद्य है तो अर्थ या शब्द की लोकातिक्रान्त भंगिमा या स्थिति से सम्पन्न हो। उनके लिए वही सब कुछ है। इस ‘चारुता’ में रूपक आदि अलंकार योग देते हैं- अतः इन्हें ही अलंकार कहना चाहिए। । दूसरे विद्वान विपक्ष में कहते हैं कि शब्दात्मक काव्य-श्रवण-समकाल चमत्कार ही चमत्कार है- पाठक उसी से अभिभूत होता है- उसी के कारण शब्दयोजना को वह काव्य कहता है। व्यपदेश-लाभ के बाद बोध में आनेवाला अर्थ और अर्थ को शोभन बनाने वाला अलंकार बाय या परवर्ती है। काव्य व्यवहार में उसका कोई उपयोग ही नहीं है। फलतः (सुबन्त और तिङन्त) कारक और क्रिया पदों की जो आकर्षक संरचना है- व्युत्पत्ति है सौशब्ध है- वही अलंकार यानी शब्दालंकार अलंकार हैं परन्तु भामह का पक्ष है कि वांछित शोभा या ‘चाख्ता’ में चूँकि दोनों का योगदान है- अतः दोनों को अलंकार कहा जाना चाहिए। काव्यव्यपदेशोचित ‘चारूता’ में दोनों का योगदान समकक्ष है। भामह के द्वारा स्थापित अलंकारवादियों की इन मान्यताओं को परवर्ती जिन आलंकारिकों ने विशेष माना-उनमें से उद्भट, रुद्रट, चन्द्रालोककार जयदेव तथा’ ‘कविप्रियाकार’ On १. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के (हिन्दी साहित्य में आज रसेकपोषक रसवादी ने) परंपरागत रसों के अतिरिक्त अन्य रसों को भी मान्यता दी है। उसी में ‘प्रकृतिरस’ या ‘प्रकृतिप्रेम’ भी एक रस माना है। ४४५ 3 0
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अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा केशवदास प्रभृति का नाम लिया जाता है। दण्डी पूर्ववर्ती हों भामह के या परवर्ती-इतना निश्चय है कि उनकी धारा भिन्न है। वहाँ गुण-विशिष्ट काव्य-मार्ग या अभिव्यक्तिमार्ग का उल्लेख किया जाता है। वामन इसी धारा की परवर्ती परिणति हैं। अतः भामह की अलंकारवादी मान्यताओं की परम्परा इनमें प्रवहमान नहीं हैं। उद्भट ने भामह पर ‘भामह-विवरण’ अथवा ‘भामह विवृति’ नामक न केवल टीका लिखा अपितु ‘काव्यालंकार सारसंग्रह’ नाम की अपनी रचना में इनके ग्रन्थ का उपयोग भी किया। उद्भट ने अपने विवेचन के लिये भामह के अलंकार मार्ग को ही चुना और भामह की ही भाँति विभिन्न वर्गो में ‘अलंकारसंग्रह’ किया। उनकी अनेक परिभाषाओं के अक्षरशः उद्धरण भी उन्होंने दिए। इतना ही नहीं, रूययक ने ‘भामह-विवरण’ का संन्दर्भ देते हुए यह भी कहा कि अलंकारवादियों की इस मान्यता का कि गुण अलंकार से भिन्न नहीं-उद्भट ने तर्कपूर्वक पोषण किया है। हेमचन्द्र ने भी इसका समर्थन किया है। एक बात अवश्य है कि जिन उद्भट और रूद्रट को अलंकारवादी कहा गया है उन दोनों ने अभिव्यक्ति के अंतस्तत्त्व (आत्मस्थानीय तत्त्व) ‘वक्रोक्ति’ की चर्चा नहीं की। उद्भट ने नाम नहीं लिया और रुद्रट ने उसे शब्दालंकार का मात्र एक भेद मान लिया। इसका विकास किया कुन्तक ने। उद्भट ने इस मार्ग का पल्लवन और विकास किया। अनेक भिन्न अलंकार दिए-संख्या तो बढ़ाई ही साथ ही कई ऐसे विवाद प्रस्तुत किए जिसका परवर्ती आचार्यों ने ग्रहण किया। अवश्य ही उद्भट का कुछ ऐसा अवदान है कि इनके अनेक अनुयायी हुए। लोचनकार ‘भामहीयाः’ नहीं कहते- पर ‘इति औदभटाः’ कहकर उनकी परम्परा का संकेत करते है। इनके अनेक प्रदेय हैं-(१) शब्द-विलास पर आश्रित अनुप्रासाश्रित वृत्तिभेद, (२) व्याकरणाधृत उपमा के भेद, (३) शब्द तथा अर्थ पर आश्रित श्लेष का विवाद, (४) रस की परिभाषा और पारिभाषिक-भाव, अनुभाव- शब्दों का प्रयोग, (५) अनेक नूतन अलंकार और उनके प्रभेद। इस सबके बावजूद उद्भट किसी नये प्रस्थान के प्रस्थापक नहीं हैं-अलंकार प्रस्थान के ही संवर्धक हैं, पोषक व्याख्याकार है। रूद्धट ने भी अपने ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालंकार’ ही रखा। उद्भट रस के महत्त्व से अपेक्षाकृत अधिक परिचित थे। यह बात भिन्न है कि उन्होंने उसे कुछ विशिष्ट अलंकारों के सहायक गौण अलंकार के रूप में ही स्वीकार किया। इसी प्रकार रुद्रट भी रससिद्धान्त से प्रभावित थे, तथापि समर्थक थे अलंकार-सिद्धान्त के ही। दो अध्यायों में रस पर और दस अध्यायों में अलंकार पर सविस्तार विचार किया। यह सही है कि दण्डी के दो मार्ग और वामन की तीन रीतियों की जगह रुद्रट ने (लाटी के सहित) चार रीतियों का उल्लेख . किया- परन्तु रीतिवादियों की तरह काव्य-मार्ग के अन्तस्तत्त्व के रूप में मान्यता नहीं दी। immiकामा … . ' 11 . .. म
HF ' ' ' पहार m. a 04-14RCurtainen Antrnanza…..४४६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र इसके विपरीत उस सामासिक-असामासिक पद-संघटना से जोड़कर बाह्य ही बताया। यही स्थिति इस की भी रखी है। अलंकार को सर्वाधिक महत्त्व देकर, भामह और उद्भट की अपेक्षा इसकी संख्या बढ़ाकर अलंकार प्रस्थान को ही समृद्ध किया है। __यह बात अवश्य है कि रुद्रट कई बातों में भामह और उद्भट से भिन्न और विशिष्ट भी हैं। रूद्रट के प्रदेय में कई उल्लेख्य बिन्दु हैं (१) पहला यह कि अलंकार वर्गीकरण का काम आरम्भ किया और प्रत्येक अलंकार को किसी न किसी जाति या वर्ग में रखा। ये वर्ग हैं- वास्तव, औपम्य, अतिशय तथा श्लेष। शब्दालंकारों के पाँच मुख्य भेद बताए। दूसरा प्रदेय है (२) चित्रालंकारों का। भामह और उद्भट तो मौन हैं- पर दण्डी ने इस दिशा में कुछ संकेत किया है। रूद्रट ने इसे आगे और बढ़ाया। श्लेष के विषय में परम्परा से हटकर अपना पक्ष रखा है। (३) इसी प्रकार रुद्रट का अनुप्रास संबंधी जातिभेद भी उद्भट से कुछ भिन्न है। . जिस प्रकार उद्भट ने श्लेष को शब्दश्लेष और अर्थश्लेष में विभाजित कर एक विचारबिन्दु का आरम्भ किया- उसी प्रकार अनुप्रास के संबंध में भी’ तीन भेद माने हैं। रुद्रट का मत अलग है। वह श्लेष को केवल शब्दालंकार कहते हैं और अनुप्रास की पाँच वृत्तियाँ कहते हैं-मधुरा, परूषा, प्रौढ़ा, ललिता तथा मुद्रा। परम्परा उद्भट की ही आगे चली। विशिष्ट अलंकारों और उनके अवान्तर भेदों की प्रकृति और क्षेत्र के विषय में पूर्ववर्ती आचार्यो से इनका पर्याप्त मतभेद है। इस प्रकार रुद्रट निश्चित ही अलंकार मत के महत्वपूर्ण व्याख्याता है। इसके बाद यह मत हासोन्मुख होकर काव्याशास्त्र में रीति मत और रस मत की भाँति ध्वनि मत में विलीन हो गया। इसके हास का एक कारण तो यह था कि उत्तरोत्तर यह माना जाने लगा कि गुण की महिमा काव्य में अलंकार से अधिक है। यह स्थापना रीतिवादियों की थी। गुणों के अभाव में जब सहज कमनीयता नहीं होती तब अलंकारों का होना न होना बराबर है। ध्वनि-प्रस्थान ने दोनों को महत्त्वहीन बना दिया। उसने अलंकार को अंग का धर्म और गुण को अंगी (रस) का धर्म बताया। काव्यशास्त्र के लम्बे इतिहास में पीयूष वर्ष चन्द्रालोलकार जयदेव हुए जिन्होंने कहा अंगीकरोतियः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती। असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती।। अर्थात् जो आचार्य यह मानता है कि काव्योचित शब्दार्थ अलंकार-निरपेक्ष होते हैं १. परूषा, उपनागरिका तथा ग्राम्या ४४७ अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा वह यह भी मान सकता है कि आग उष्णता-रहित होती है। निष्कर्ष यह कि चन्द्रालोककार ने काव्य के लिए अलंकार की वही अनिवार्यता स्वीकार की है जो आग होने के लिए उष्णता की है। इस वक्तव्य के आधार पर इन्हें भी अलंकारवादी कहा जा सकता है। {खण्ड-ख)
(ख) काव्यगत चारूता के समशील स्रोत, अलंकार और उसके स्वरूप का विकास
काव्यगत चारुता के सन्दर्भ में चार धर्मो-दोषाभाव, गुण, लक्षण तथा अलंकार- की चर्चा किसी न किसी प्रकार होती रही है। इनका सम्बन्ध शब्दार्थ से भी जोड़ा जाता था। कम से कम ध्वनि प्रस्थान के उद्भव से पूर्व-अलंकारवादी परम्परा में ये धर्म बहुचर्चित थे। ध्वनिप्रस्थानवादी मम्मट तक ने सप्रमेद काव्यात्मक धर्मी के विवेचन के बाद धर्म के नाम पर प्रायः इन्ही समशील तत्त्वों का नाम लिया है। प्रायः इसलिए कहा कि मम्मट ने ‘लक्षण’ की चर्चा नहीं की। तब भी उसके बाद आने वाला ‘चन्द्रालोककार पीयूष वर्ष’ जयदेव काव्यलक्षण का सोदाहरण उल्लेख करता है- यद्यपि उनके पहले ही एक लम्बे समय से इसकी पृथक सत्ता निःशेष मान ली गई थी। अस्तु। इन चारों समशील धर्मो से अलंकार के स्वरूप का पृथक्करण और पृथक्कृत अलंकारस्वरूप के विकास का इतिहास इस खण्ड का विषय है। जिस प्रकार ‘नाट्य’- धारा वाले ‘रस’ को केन्द्र में रखकर सब कुछ सोचते हैं और जिस प्रकार आनन्दवर्धन और तदनुयायी ‘रस’ को केन्द्र में रखकर सोचते हैं- प्राग्ध्वनि काल में श्रव्यकाव्य शास्त्री वैसा नहीं करते थे। यद्यपि जैसा ऊपर कहा जा चुका है- उन्हें रस का पता था। इसके बावजूद वे केन्द्र में ‘चारूता’ ‘राजता’ ‘शोभा’ या ‘सौन्दर्य’ को केन्द्र में रखते थे। शब्दार्थमय उक्ति में ‘सौन्दर्य’ कैसे उन्मीलित हो- इस पर विचार करते हुए इन लोगों की धारणा थी कि सौन्दर्योन्मेषकारी कवि का सबसे पहला काम है- काव्य-शरीर को दोषहीन बनाना। कारण, यदि शरीर सुन्दर भी हो कोढ़ का एक दाग जो दोष है- उसे असुन्दर बना सकता है। अतः काव्यशरीर को सबसे पहले दोषहीन बनाना चाहिए। शब्द और अर्थगत सभी प्रकार के दोषों का यथाशक्ति निवारण होना चाहिए। दोष से ‘चारूता’ का अपकर्ष या विधात होता है। भामह पहले कहते है सर्वथा पदमप्येकं न निगाद्यमवद्यवत्। विलक्ष्मणा हि काव्येन दुःसुतेनेव निन्द्यते।।’ कवि को एक शब्द भी ऐसा नहीं कहना चाहिए जो सदोष हो। स्वरूप-च्युत काव्य कुपुत्र की भाँति निन्द्य होता है। ‘शोभा’ और ‘सौन्दर्य’ उनकी दृष्टि में बराबर हैं। वह कहते ww
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AMAR P . A TI -THEASSTUThakur १. काव्यालंकार- भामह, पृष्ठ ४ (चौखम्बा संस्करण) ४४८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र हैं कि सन्निवेश-विशेष से दुरूक्त’ भी शोभाकारी हो जाता है और आश्रय के सौन्दर्य से असाधु पदार्थ भी शोभाकार हो जाते हैं। दण्डी को भी आरम्भ से ही इसकी चिन्ता है। वह कहते हैं कि यदि वाणी का प्रयोग ठीक किया तो वह कामधेनु हो जाती है, अन्यथा गलत प्रयोग करने वाले को बैल कह दिया जाता है। इससे उनका निष्कर्ष है कि काव्य में अल्पमात्र भी दोष नहीं रहना चाहिए- अन्यथा वह सुन्दर शरीर में कोढ़ की दाग की तरह उसे असुन्दर बना देता है। उनकी दृष्टि में गुण उपादेय हैं और दोष हेय हैं। इन्हें शास्त्ररूपी नेत्र से ही जाना जा सकता है। अतः काव्याशास्त्र के अनुशीलन से उसका बोध करना चाहिए। वामन ने ‘शोभा’ साधन के रूप में ही दोषाभाव का उल्लेख किया है। तुलना कीजिए काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते। (वामन-काव्यालंकारसूत्रवृत्ति-1) __ साथ ही यह भी कहा है कि दोष गुणविपर्यय का ही दूसरा नाम है। उद्भट मौन हैं और रुद्रट ‘चारुता’ को दृष्टिगत कर चतुरायामी पक्ष सोचते हैं। वह भी कहते हैं- ‘कर्तव्यं काव्यममलम्"-दोषरहित काव्य होना चाहिए। वाणी का इसीलिए संस्कार किया जाना चाहिए- कारण संस्कृत वाणी ही ‘सुचारूकाव्यफला'६ होती है। निष्कर्ष यह कि प्राग्ध्वनि अलंकारवादी आचार्य चारूता-केन्द्रित काव्य के सन्दर्भ में सबसे पहले ‘दोष’ ७-निवारण पर बल देते हैं। कहते हैं ‘अपदोषतैव विगुणस्य गुणः’ जहाँ कोई गुण नहीं है वहाँ अपदोषता ही काव्य का गुण है। आशय यह कि किसी भी प्रकार का दोष न रहना भी एक गुण है। अलंकार एक भावात्मक स्रोत है जो अभावात्मक ‘दोषाभाव’ से काव्य की चारूता का विशिष्ट स्रोत है।
लक्षण (नाट्य शास्त्रोक्त ३६ लक्षणों का अध्ययन)
आचार्यों ने सौन्दर्य स्रोत के रूप में दोष (अभाव) गुण और अलंकार के साथ लक्षण का भी उल्लेख किया है। इसका उल्लेख ‘काव्यलक्षण’ के रूप में पहले नाट्यशास्त्र में मिलता है। वहाँ काव्यशास्त्र के चारों विषय वाचिक अभिनय के प्रसंग में आए हैं- विशेषकर लक्षण अलंकार और गुण। दोष गुण के विपर्यय हैं। अतः गुणकथन से ही वे स्पष्ट हैं। १. वहीं सन्निवेशविशेषातु दुरूक्तमपि शोभते २/५४ २. वही किंचिदाश्रयसौन्दर्याद्धत्ते शोभामसाध्वपि-२/५७ ३. स्याद् वपुः सुन्दरमपि शिवत्रैणैकेन दुर्भगम्-काव्यादर्श १/७, पृष्ठ ६ सौन्दर्यमलंकारः। स च दोषगुणाहानादानाभ्याम्- काव्यालंकारसूत्रवृति १, १, ३ हिन्दी अनुसंधानपरिषद दिल्ली विश्वविद्यालय १६५४ ५. काव्यालंकार- रुद्रट, पृष्ट ८ १/१२ ६. काव्यालंकार- रुद्रट- पृष्ट ८ प्रथम अध्याय १३वॉ श्लोक (२) काव्यालंकार सूत्रवृत्ति १.१.३ ७. नाट्य शास्त्र १५/२२७, पृष्ठ २१२ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट ‘दोषान् नद्यात’ बड़ौदा १६३४ +- mm——
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अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४४६ अभिवन ने इनकी व्याख्या करते हुए कहा कि पुरुष में ‘राजता’ (शोभा) के तीन भावनात्मक स्रोत हैं-(१) सामुद्रिक शास्त्रोक्त लक्षण, (२) बाड्य अलंकार और (३) आन्तरिक गुण। वस्तुतः रूपक से कभी-कभी परेशानी खड़ी होती है। बात प्रस्तुत और अप्रस्तुत में समानता दिखाकर स्पष्ट किया जाता है। __ अलंकार दोषाभाव नहीं है- यद्यपि सौन्दर्यस्रोत है। इसी प्रकार अलंकार ‘लक्षण’ नहीं है- यद्यपि दोनों सौन्दर्यस्रोत है। दोषाभाव अभावात्मक होने से भावात्मक सौन्दर्यस्रोत अलंकार से भिन्न हैं। पर लक्षण तो भावात्मक सौन्दर्यस्रोत है अतः उससे अलंकार का भेद क्या है। इस तथ्य को स्पष्ट रूप से जानना चाहिए। ‘लक्षण’ का उल्लेख सबसे पहले नाट्यशास्त्र में मिलता है- पर उसका लक्षण क्या है- यह नहीं दिया गया है। वहाँ बस इतना ही कहा गया है काव्यबन्धास्तु कर्तव्याः षट्त्रिंशल्लक्षणान्क्तिाः। काव्य में बन्ध में ३६ लक्षणों का उपयोग होना चाहिए। आगे चलकर भोजराज, शारदातनय और विश्वनाथ ने अनुषंगतः नाट्य के सन्दर्भ में और चन्द्रालोककार जयदेव ने काव्य चर्चा के प्रसंग में केवल दस-लक्षणों का उल्लेख किया है। दशरूपककार ने बहुत ही चलते ढंग से कह दिया कि छत्तीस लक्षणों का अलंकारों में अन्तर्भाव हो गया। अतः उनकी चर्चा निरर्थक है। __ अभिनव ने दो सूचियाँ दी हैं- एक उपजाति में और दूसरी अनुष्टुप् में। पहली सूची गुरू तौत से प्राप्त होने के कारण सम्मानित हुई है। सर्वेश्वर, कीर्तिधर और शिंगभूपाल ने भी लक्षणों की चर्चा की है। इससे लगता है कि लक्षणों की आचार्यों में व्यापक चर्चा थी। फिर भी अभिनवगुप्त कहते हैं कि जिस प्रकार गुण, अलंकार, रीति, वृत्ति आदि काव्य में प्रसिद्ध हैं- उस तरह लक्षण प्रसिद्ध नहीं है। जो हो, भरत के समय में इनका महत्त्व था। अभिनवगुप्त से पूर्व परम्परा में इस लक्षण के स्वरूप के सम्बन्ध में अनेकमत प्रचलित थे। उनका उल्लेख ‘अभिनवभारती’ में है। प्राग्ध्वनि-काल अलंकारवादियों का काल है-यदि जयदेव को अपवाद मान लें। इसमें भामह, उद्भट और रूद्रट ही नहीं दण्डी और वामन ने भी ‘चारूता’-हेतुओं या सौन्दर्यस्रोतों में ‘लक्षण’ का नाम कहीं नहीं लिया है। इनके ठीक बाद आनेवाला नाट्यशास्त्र के सम्भवतः प्रथम लक्षणग्रन्थ ‘दशरूपक’ में भी ‘लक्षण’ की चर्चा अनावश्यक’ घोषित कर दी- क्योंकि उनका अन्तर्भाव पूर्ववर्ती आलंकारिकों ने अलंकार और भाव में कर लिया था। इसीलिए अभिनवगुप्त भी कह रहे हैं कि सौन्दर्यस्रोत के रूप और गुण, अलंकार, रीति तथा
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am e er ka Raintim’. HITYA ANKAnmouse-SIMPLETTE १. नाट्यशास्त्र- अभिनवभारती, पृष्ठ १२५२, भाग-२ बड़ौदा सं. २. दशरूपक ४/८३, ८४ निर्णयसागर
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..: . .. . ४५० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र वृति आदि तो परिभाषित और प्रसिद्ध हैं परन्तु ‘लक्षण’ प्रसिद्ध नहीं हैं। जो उपकरण पहले ही स्वतन्त्र रूप से सौन्दर्यस्रोत के रूप में नकार दिए गए हैं- उनका उल्लेख परवर्ती आचार्य क्यों कर रहे हैं? इसका कारण ठीक-ठीक समझ में नहीं आता। सूक्तियों में नाम भी अलग-अलग हैं और काफी लम्बे भू-भाग में फैले आचार्य नाम गिनाते हैं- तब इस पुनरुज्जीवन की सार्थकता क्या हैं? जिन परवर्ती आचार्यों ने इनका पुनरूज्जीवन करते हुए परिगणना कराई है- उसमें से किसी ने सम्भवतः!परिभाषित भी नहीं किया है। परम्परा में जो परिभाषाएँ दी गई हैं- अभिनव ने उनका उल्लेख अवश्य किया- पर स्वयं जो परिभाषा स्वीकृत की है- वह नाट्यशास्त्र की कारिका के ‘……..भावार्थगतानि……… यथारसन्तु” इस अंश को आधार बनाकर। उनकी दृष्टि में व्यक्तिशः लक्षणों का लक्षण और उदाहरणपूर्वक निरूपण करने से पहले लक्षण का एक अनुगत लक्षण या परिभाषा दी जानी चाहिए। ESSIONaus HERBARMAN TEACTREADER 2374 SA लक्षण में “चारुता” को नहीं वरन् “रस” को केन्द्र में रखा गया है। यह बात पहले कही जा चुकी है कि अलंकारवादियों की “चारूता” रसमयता को व्याप्त करती हुई पण्डितराज की “रमणीयता” की तरह व्यापक है अथवा उससे अतिरिक्त है। ऐसा नहीं कि अलंकारवादी रस को नहीं जानते-जानते हैं केवल साध्य-साधन और साधन-गत तारतम्य का अविवेकवश व्याकरण नहीं कर पाते। इसलिए देहात्मवादी दार्शनिकों की भांति देह (शब्दार्थ) को ही “चारू” मानते हैं और देह में ही उसके स्रोतों का विचार करते हैं। अभिनवगुप्त-लोचन में स्वयम् प्राग्ध्वनि अभाववादी आचार्यों का अभिमत स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि उनकी दृष्टि में चारूता दो प्रकार की ही है-(१) स्वरूपनिष्ट और (२) संघटनानिष्ठ। स्वरूपनिष्ठ चारुता शरीर स्थानीय शब्द और अर्थ की स्वरूपगत चारूता है-उनके स्रोत अलंकार हैं। शब्द-संघटना और अर्थ-संघटना भी अंगों के सन्निवेश या जोड़ ही हैं। मतलब शरीर ही है। पर उनके सौष्ठव के स्रोत गुण हैं। ये सभी शब्दगत और अर्थगत हैं - शरीरगत हैं। फिर अलंकारवादियों की समझ सौन्दर्य के प्रत्येक उपकरण की व्याख्या केन्द्र में शरीर यानी शब्दार्थगत “चारूता” को ही केन्द्र में रखकर करेगी। रस को केन्द्र में नहीं रखेगी। अभिनवगुप्त “लक्षण” की परिभाषा नाट्यशास्त्र की निम्नलिखित कारिका को दृष्टिगत कर करते हैं - षट्त्रिंशदेतानि हि लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसंमितानि। काव्येषु भावार्थगतानि तज्जैः सम्यक् प्रयोज्यानि यथारसन्तु।। (४) मा.शा. १. नाट्यशास्त्र १६/४ बड़ौदा सं. अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४५१ भूषण की भांति वे छत्तीस लक्षण माने गए हैं। अतः कवि को चाहिए कि वह रसोचित विभावादि-विन्यास का जो प्रयोजन है-रसीकरण-वह जैसे सम्पन्न हो वैसा व्यापार करें। इसी में शब्दार्थ का कवित्व निहित है। अलंकार और गुण तो पश्चाद्वर्ती बातें हैं। पहले भूमि तो तैयार हो जाये। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए अभिनव भामह और भट्टनायक को उद्धृत करते हैं। शब्द और अर्थ तो लोक प्रसिद्ध हैं-यह कवि का अभिधान व्यापार है-योजन का तरीका है-जो वे ही शब्द और अर्थ (व्यवहार और शास्त्र के शब्द और अर्थ की अपेक्षा) “कुछ और” यानी लोकोत्तर चारूता प्रदान करने लगते हैं। यह कवि के व्यापार की महिमा है। अभिधान व्यापार का है। अभिनव कहते हैं कि इसीलिए भामह ने कहा सैषा सर्वत्र (सर्वैव) वक्रोक्तिरनयाऽर्थो विभाव्यते - यह “वक्रता” है कवि का व्यापार है जिससे अर्थ में विभावन की क्षमता आ जाती है। इसी आशय को भट्टनायक भी व्यक्त कर रहे हैं शब्दप्राधान्यमाश्रित्य तत्र शास्त्रं पृथविदः। अर्थे तत्त्वेन युक्ते तु वदन्त्यारव्यानमेतयोः।। द्वयोगुणत्वे व्यापारप्राधान्ये काव्यगीर्मवेत्।। ’ इति जहाँ शब्द और अर्थ में शब्द की प्रधानता होती है वहाँ “शास्त्र” होता है और जहां “अर्थ” की प्रधानता होती है वहां पुराण-आख्यान होता है। पर जहां ये दोनों गौण होते हैं और कवि का व्यापार (साध्य-चारूता = रस) में अभिनिविष्ट) प्रधान होता है-वहां काव्य की भाषा आ जाती है। अतः परमार्थतः व्यापार ही लक्षण है। इसीलिए अभ्यासी सहृदय भाषा में विद्यमान कवित्वोचित व्यापार को तत्काल पकड़ लेता है। कुशल और शिक्षित का व्यापार तत्काल काव्यवेत्ता की चेतना में प्रकाशित हो उठता है। यद्यपि रसोचित या चारूत्वोचित अभिधान व्यापार-वाग-विकल्प का कोई अन्त नहीं है-तथापि वे सब इन छत्तीस लक्षणों से व्याप्त हैं। फलतः कवि को चाहिए कि वह इन लक्षणों के विषय में सावधान रहे। अभिनव की इस व्याख्या में मुझे एक ही बात कहनी है और वह यह कि या तो ये अलंकारवादी “लक्षण” की बारीकी को समझ नहीं पाए और यहाँ-वहाँ उसका अन्तर्भाव कर दिया। भामह के “विभाति" का अर्थ “विभावतामाप्नोति" (रस की दृष्टि से) कैसे होगा ? अतः भामह को व्यापारप्राधान्यवादी बताना ही है तो उन्हें “रस-केन्द्रित" व्याख्या के प्रसंग में बिठाना ठीक नहीं होगा। उन्हें तो “चारूत्वोचित” या “चारूत्वकेन्द्रित” व्याख्या १. अभिनवभारती (नाट्यशास्त्र भाग-२) में उद्धृत पृष्ठ १२५६ (बड़ौदा संस्करण-द्वितीय संस्करण) ४५२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र के सन्दर्भ में भी बिठाना चाहिए। कुन्तक ने ठीक कहा - यत् किंचनापि सौन्दर्य तत्सर्वं प्रतिमोद्भवम्" । प्रतिभा व्यापार ही है। कुन्तक जिस “वक्रता" की बात “अपूर्व” उद्भावना के रूप में करता है। वह भी कवि व्यापार ही है। “वक्रत्वं कविव्यापारः। “विचित्रैवाभिधा वक्रोक्तिः"’ पहली यह कि नाट्यशास्त्र में चर्चित “लक्षण” का उपजीव्य क्या है ? नाट्यशास्त्रकार को या जिसने भी काव्यलक्षण (काव्य में लक्षण का) उद्भावन किया - उसे इस प्रकाशन की प्रेरणा कहां से मिली ? दूसरी जिज्ञासा यह कि प्राग्ध्वनि या अभिनवगुप्त से पूर्व के अलंकारशास्त्री इस पर मौन क्यों हैं ? धनिक और धनंजय ने यद्यपि इसका संकेत मात्र किया है- पर अभिनव “लक्षण" का नाट्यशास्त्रसम्मत व्याख्यान द्वारा उसका पुनरुज्जीवन क्यों कर रहे हैं ? परवर्ती आलंकारिक एक लम्बे भू-भाग (उत्तर से उत्कल तक और पश्चिमोत्तर से धार आदि दक्षिणांचल तक) में पुनः क्यों नामोल्लेख करने लगे? नामोल्लेख तक ही क्यों रह गये ? एक समय के बाद फिर वही तिरोधान ? ये सब विचारणीय बिन्दु हैं। इन उपर्युक्त विन्दुओं पर विचार करने से पहले “लक्षण" के स्वरूप पर परम्परा प्राप्त लक्षणों या परिभाषाओं का-जिनका उल्लेख “अभिनवभारती’ में हुआ है-विचार पहले कर लेना चाहिए। (१) जिस प्रकार पुरुषगत शोभा के स्रोत तीन हैं-सामुद्रिकशास्त्र में कथित शरीर पर विराजमान अपृथक् सिद्ध लक्षणात्मक धर्म, शरीर पर ही उसको सुन्दर बनाने वाले पृथक् सिद्ध अलंकार और आन्तरिक धर्म गुण उसी प्रकार काव्य में भी कल्पना-प्रवण आचार्यों ने तीन प्रकार के सौन्दर्यस्रोत “विशेषों” का उलेख किया है। यद्यपि दण्डी ने इस दृष्टान्त को अनुपयुक्त मानकर काव्यशोभाधायक धर्मों को अलंकार मात्र कहा है - तथापि और लोगों ने इनसे भिन्न मार्ग अपनाया है और उक्त प्रकार के भेदों की बात की है। इसलिए एक वर्ग कहता है, (१) शरीरगत सिद्ध (स्थितिशील) और साध्य (गत्यात्मक या क्रियात्मक) धर्म ही “लक्षण" कहे जा सकते हैं। जैसे, “श्यामा” तथा मत्तमातंगगामिनी" नारी में “श्यामात्व” एक स्थिर धर्म है और मत्तमातंग की भांति गतिशीलता या गति अस्थिर क्रियारूप। उसी प्रकार ऐसे विशेषणों से जब सौन्दर्य को व्यक्त किया जाता है तब वे “लक्षण” कहे जाते हैं। (२) दूसरे लोग कहते हैं कि इतिवृत्त के खण्ड ही लक्षण हैं। इन्हें संध्यंग वृत्यङ्ग कहा जाता है। नाट्यशास्त्र में इनकी संख्या ६४ गिनाई गई है। मुखसन्धि के “बीज” नामक अंग से उपक्षिप्त अर्थ का निर्वहण सन्धि में फलात्मक पर्यवसान होता है। अतः अन्ववर्ती सभी अंग संध्यंग कहे जाते हैं। अथवा ये खण्ड नाट्यवस्तु से १. वक्रोक्तिजीवित, (प्रथम उन्मेष, पृ. २२ कलकत्ता ओरियण्टल सिरीज सं. ८ १६२३) अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४५३ व्यज्यमान होने वाले रस के अनुरूप जो भारती, सात्वती आदि वृत्तियाँ हैं - उनके अंग होते हैं। इसीलिए इन कथा-खण्डों को वृतयंग कहा जाता है। ये ही काव्य शरीर में लक्षण कहे जाते हैं ठीक वैसे जैसे पुरुष के शरीर में सामुद्रिक शास्त्रोक्त लक्षण। ये इतिवृत्तखण्ड काव्यगत ख्याति या प्रशस्ति में नायक के लिए उपयोगी होते हैं। निष्कर्ष यह कि धीरोदात आदि गुणों का आधान अथवा वस्तु-वर्णना की भंगिमा ही लक्षण है जो इतिवृत के खण्डों से होता है। (३) तीसरा दल कविगत व्यापार भेद से गुण, अलंकार और लक्षण का भेद करता है। वह मानता है कि कविगत प्रतिभात्मक प्रथम परिस्पन्द में गुण उपनीत होते हैं। द्वितीय व्यापार से अलंकार सम्पादन होता है ओर तृतीय व्यापार से लक्षण। प्रतिभावान् कवि में ही रस की अभिव्यक्ति का सामर्थ्य होता है। और रसों में ही माधुंय आदि गुणों के उपनिबन्धन का सामर्थ्य। अतः प्रथम व्यापार में रसमय अनुभूति की माधुर्यादि गुण सम्पन्न रूप में स्थिति होती है और द्वितीय व्यापार में वर्णना का उदय होता है। वर्णना का आशय है - “इस शब्द से इस वस्तु के वर्णन का संकल्पपूर्वक व्यापार। इस स्तर पर अलंकार उभरते हैं - सुन्दर शब्द और सुन्दर अर्थ उभरते हैं। तीसरे स्तर पर जो व्यापार होता है - उसमें भरभराकर उभरने वाले शब्दों और अर्थों के बीच चयन या चुनाव की प्रक्रिया होती है। वहाँ कवि उपयुक्त शब्द का उपयुक्त अर्थ से सम्बन्ध स्थापन करता है। इस तृतीय स्तर पर “लक्षण” उभरता है। इस तरह व्यापार भेद से शोभाधायक ये तीनों स्रोत अपनी-अपनी सत्ता प्राप्त करते हैं। चौथा वर्ग मानता है कि रूपक अभिनेय वर्ग का एक प्रबन्ध है। कवि उसके निर्माण में अपेक्षित सामर्थ्य की प्राप्ति के लिए अभ्यास करता है। यही अभ्यास लक्षण है। यह अभ्यास आरम्भ में अपर्याप्त होता है। उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्राप्त करता है। इस उत्कृष्ट अभ्यास से काव्य बनता है। उसमें गुण-अलंकार की राशि प्रचुर मात्रा में होती है। इसके फलस्वरूप वर्णन लोकोत्तर और रंमणीय हो जाता है। “मेघदूत” ऐसा ही खंडकाव्य है जो गुणालंकार की प्रचुरता से हृद्य हो उठा है। (५) कुछ लोग कहते हैं - लक्षण प्रबन्ध की विशेषता है। (६) दूसरे लोग मानते हैं कि कवि का अभिप्राय-विशेष ही लक्षण है। (७) एक दल कहता है - गुण और अलंकार का यथास्थान नियोजन ही लक्षण है। (८) अन्य वर्ग कहता है कि अलंकार आदि के न रहने पर भी काव्य में जो आकर्षण दिखाई पड़ता है - उसी का स्रोत लक्षण है। यह अभिनेय-विशेष अलंकार संसर्ग से कृत्रिम नहीं प्रत्युत निसर्ग सुन्दर होता है। ‘अमरूकशतक’ के श्लोकों में यह दिखाई पड़ता है। इस नैसर्गिक सौन्दर्य का हेतुभूत शरीर विशेष ही लक्षण है। ४५४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र (६) शब्द और अर्थ से उद्भूत आकर्षण ही लक्षण है। (१०) एक वर्ग यह कहता है कि मीमांसा दर्शन में जिस प्रकार एक वाक्य दूसरे वाक्य की पृथक् पहचान को बताने के लिए भिन्न-भिन्न अभिप्रायबोधक लक्षण बताये गये हैं-तंत्र, प्रसंग, बाध, अतिदेश-आदि-उसी प्रकार कवि के काव्य-वाक्य भी अभिप्राय विशेष के बोधक होने से भिन्न-भिन्न लक्षण वाले हो सकते हैं। उन्हें ही भूषण आदि लक्षण कहा जाता हैं यह पक्ष उक्त (छठे) पक्ष से पृथक नहीं वरन तदाशयपरक प्रतीत होता है। अभिनवगुप्त का कहना है कि इनमें से कोई लक्षण “लक्षण” पर चस्पा नहीं होता, ठीक नहीं बैठता। __ अभिनव रसवादी आचार्य हैं। “नाट्यशास्त्र” की व्याख्या तो कर ही रहे हैं और आनन्दवर्धन की भी व्याख्या कर चुके हैं। नाट्यशास्त्र की ही भांति आनन्दवर्धन भी कह चुके हैं कि इतिवृत काव्य का शरीर है और रस मुख्य-प्रतिपाद्य। अतः अभिनव निर्विवाद रूप से यह मानकर चल रहे हैं कि काव्यार्थ तो रस ही है। उन्होंने यह भी कहा है कि काव्य की तीन व्युत्पत्तियाँ हैं-वर्णनीय, शब्दनीय और कविकर्म । इनमें से प्रथम का अभिधेय (अर्थ) से दूसरे का अभिधान (शब्द) से और तीसरे का अभिधानात्मक व्यापार से सम्बन्ध है। इन्हें हम वक्ता कवि के, प्रतिपाद्य अर्थ के और प्रतिपादक शब्द के व्यापार से भी सम्बद्ध कर सकते हैं। इनमें शब्द के दो व्यापार हैं-एक तो वह अर्थ का प्रतिपादन करता है और दूसरे श्रोता के कान तक, अन्तःकरण तक अपनी बोध्यता के साथ संक्रान्त होता है। प्रथम के द्वारा वांछित रस की अनुभूति कराने की क्षमता का उत्पादन सामर्थ्य ही गुण है और दूसरे में वर्ण या पद की आवृत्ति से उत्पन्न शोभा अलंकार के कारण है। इसी प्रकार अर्थ में भी रस की अभिव्यक्ति की हेतुता है। फलतः वह अर्थगुण है और उसमें एक से दूसरे की समानता प्रदर्शन की जो विशेषता है वह अलंकार है। तीसरा अभिधा-व्यापार ही “लक्षण” है। निष्कर्ष यह कि कवि अपने जिस व्यापार से इस प्रकार के गुणालंकार-गर्भ शब्द और अर्थ की योजना करता है वह व्यापार ही “लक्षण” है। नाट्यशास्त्रीय कारिका में “भावार्थगतानि” यह पद “लक्षणानि” का विशेषण है। अतः इस विशेषण की ठीक-ठीक संगति इसी व्याख्या में बैठती है। लक्षण वही है-जो “भाव” के “अर्थ” में तत्पर हो। भाव है-विभावादि सामग्री और उसका अर्थ या प्रयोजन है - उनका रसीकरण। कवि का अभिधा व्यापार इसी रसीकरण में निविष्ट होता है। इस प्रकार “लक्षण” वह आधारभूमि है जिस पर गुणालंकारादि उभरते हैं। अभिनव ने इसी सन्दर्भ में भामह और भट्टनायक को उद्धृत कर अपने पक्ष का समर्थन किया है। अभिनव का तर्क है कि “लक्षण” के विषय में जो ऊपर दस पक्ष दिए गये हैं - उनमें किसी से अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४५५ इस विशेषण (भावार्थगतानि लक्षणानि) की ठीक-ठीक संगति नहीं बैठती। दूसरा तर्क अभिनव का यह भी है कि नाट्यशास्त्रकार पहले ही घोषित करता है - काव्यबन्धास्तु कर्तव्याः षट्त्रिंशल्लक्षणान्विताः। (बड़ौदा सं.)’ काव्यबन्ध के सन्दर्भ में प्राथमिकता और प्रधानता छत्तीस लक्षणों कीही दी गई है गुण और अलंकार की बात बाद में की गई है। एक उदाहरण लें-स्तन का लक्षण है- उसकी मांसलता। यह कटि का लक्षण नहीं है-पीवरता या मांसलता कटि-प्रदेश की कुलक्षणता है। यह स्तन का सामान्य लक्षण है-गुण और अलंकार की बात इससे भिन्न है और वह बाद में आती है। इसलिए लक्षण वह व्यापार है जो किसी वस्तु को रसोचित विभावादि के क्रम में रखकर लक्षित कर दें। जो इस क्रम को लक्षित नहीं करता तो वह कुलक्षण है। अलंकारों की भांति लक्षणों की भी सीमा नहीं है-केवल कतिपय प्रमुख लक्षणों (३६) का उल्लेख यहां कर दिया गया है। __ “लक्षण” के लक्षण पर प्राचीनों ने ही नहीं, डा. राघवन् तथा डा. गणेश त्र्यंवक देशपाण्डे-आदि ने भी अपने-अपने पक्ष रखे हैं। डा. राघवन् ने अपने एक लेख में कहा है कि जो लोग सामुद्रिक शास्त्रोक्त “लक्षण" के रूपक से इसे समझाना चाहते हैं वे मानते हैं -(१) लक्षण काव्य के शरीर (शब्दार्थ) से सम्बद्ध एक ऐसा शोभाकार धर्म है जो अलंकार की तरह काव्यशरीर से पृथक् नहीं, बल्कि अपृथक् तत्त्व है। साथ ही वह अलंकार की तरह निसर्ग सौन्दर्य का संवर्धक नहीं, अपितु निसर्ग सौन्दर्य का मूल स्रोत है। __ अभिनव द्वारा उपस्थापित दशपक्षीय का विश्लेषण करते हुए उन्होंने आगे बताया कि इन परिभाषाकारों में से कुछ ऐसे हैं जो मीमांसा एवं निरुक्त में कहे हुए वेदवाक्यों के व्यावर्तक वैशिष्ट्य के रूपक से या दृष्टान्त से इसे स्पष्ट करना चाहते हैं। भट्टतौत के पक्ष को उन्होंने वस्तुनिष्ठ कहा है और कहा है कि उन्होंने अलंकारों के प्रभेद में लक्षणों का योग देखा है-इस आधार पर अपना मत रखा है। इस मत पर आगे विचार रखा जायगा। इसी क्रम में डा. राघवन् ने कहा कि उन्हें संख्याक्रम चौथे और पांचवें का सम्बन्ध भस्तोक्त लक्षणों से कहीं नहीं जमता। वे काल्पनिक अथवा अन्य किसी आधार पर कह दिए गए हैं। प्रो. देशपाण्डे को राघवन् के इस विश्लेषण ने तनिक प्रभावित नहीं किया। इसके विपरीत लक्षणों के उपजीव्य स्रोत के सकेत रूप में “अभिप्रायविशेष” वाले दशपक्षीय मत १. एतानि वा काव्यविभूषणानि षट्त्रिशदुद्देश्यनिर्दशनानि। काव्येषु सोदाहरणानि तज्ज्ञैः सम्यक् प्रयोज्यानि बलानुरूपम्।। चौखम्बा १६३६ इ.सं. पृष्ठ १०३) इसी के पश्चात इसी के तुरन्त बाद (४३वें श्लो. पृ. २०६ में ) कहा गया है उपमा रूपकं चैव दीपकं यमकं तथा। अलंकारास्तु विज्ञेयाज्ञचत्वार नाटकाअयाः।४५६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र को अपनाया और उसका विश्वसनीय उपबृहंग किया। एक अन्य विद्वान् ने “अभिनवभारती" का ही साक्ष्य देते हुए दस की जगह बारह मत रखे हैं और बताया है कि लक्षण काव्य-भाषा की वह स्थिति है जिसमें अभिव्यक्ति गुणों से आगे और अलंकारों से कुछ पीछे मध्यवर्ती स्थिति में रहती है।’ वह गुणों का भित्ति-स्थानीय भित्ति पर किये गये सुधालेप को लक्षण-स्थानीय और उस पर उरेहे गये आकर्षण-चित्र को अलंकार कहते हैं। अस्तु। ऊपर अनेक प्रश्न उठाये गये हैं। उनमें से एक यह है कि काव्यशास्त्रियों को “लक्षण” की प्रकल्पना का आधार क्या था ? इस दिशा में सोचने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली ? प्रस्तुत संदर्भ से इस प्रश्न को जोड़कर देखा जाय तो डा. देशपाण्डेय का अपना पक्ष भी “लक्षण” और उसके मूल स्रोत पर प्रस्तुत हो जाएगा। उनका पक्ष विस्तारपूर्वक उनके ग्रन्थ में देखा जा सकता है-संक्षेप में यह है कि जिस प्रकर उपमा के सूत्र (निरूक्त-पाणिनि की अध्टाध्यायी) तथा रूपक (वेदान्तसूत्र) के बीज विकसित होते-होते भरत तक आ पहुंचे और उन्होंने अर्थालंकार के अन्तर्गत “दीपक" और जोड़ दिया उसी प्रकार नाट्यशास्त्र में अंकित लक्षणों की परम्परा भी निरुक्त तथा पूर्वमीमांसा में है। निरुक्त में यास्क ने कहा है कि ऋग्वेद के सभी मंत्र एक प्रकार के नहीं हैं। उनकी मंत्र दृष्टि अनेकानेक अभिप्रायों से युक्त है। नानाविध अभिप्रायों को व्यक्त करने के ऋषियों के ऋग्वेद में पाये जाने वाले कतिपय प्रकार ‘यास्क’ उद्धृत हुए हैं-इनमें से कई प्रकार नाट्यशास्त्र के लक्षणों से मिलते जुलते हैं। यदि पद्यबद्ध ऋचाएँ भी काव्य कही जायें (लोगों ने कहा भी है) तो उन अभिप्रायों को काव्यगत अभिप्राय भी कहा जा सकता है। नाट्यशास्त्र के आक्रन्द, आख्यान, आशीः, प्रशंसा तथा परिदेवता-जैसे प्रकार सजातीय ही हैं। यहाँ तक कि निरूक्त यह नाम भी नाट्यशास्त्र में एक लक्षण बन चुका है। इसी भांति जौमिनि के द्वादशलक्षणी के दूसरे अध्याय के प्रथम पाद में ऐसे सूत्र हैं जिनमें जैमिनि ने मंत्रों तथा ब्राह्मणों का स्वरूप कथन किया है। उन पर लिखे हुए भाष्य में शबरस्वामी ने पूर्वाचार्यों की कतिपय लक्षण कारिकाएँ दी हैं। मंत्रों में कहीं आशीः, कहीं स्तुति, कहीं संख्या, कहीं प्रलपित, कहीं परिवेदन, ओर कहीं-कहीं अन्वेषण, पृष्ट, आख्यान, अनुषंग, प्रयोग, अभिधान (सामर्थ्य) आदि पाए जाते हैं। उसी प्रकार हेतु, निर्वचन, निन्दा, प्रशंसा, संशय, विधि, परकृति, पुराकल्प, व्यवधारणकल्पना तथा उपमान · ये ब्राह्मण ग्रन्थों के दस लक्षण हैं। यह बात उन कारिकाओं में कही गई है। १. भारतीय काव्य समीक्षा में अलंकार सिद्धान्त, पृष्ट ३५ प्रथम सं., मैकमिलन शीर्षक अंश २. भारतीय साहित्यशास्त्र-“नाट्यशास्त्र में काव्यचर्चा” awan भ.. J wm ARASHKDenmaratENASHANTERA अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४५७ मीमांसकों द्वारा मंत्र-ब्राह्मणात्मक वेदों के इन लक्षणों की नाट्यशास्त्र के लक्षणों से तुलना करने पर उनमें बहुत कुछ साम्य दिखाई पड़ता है। प्रो. देशपाण्डे का अनुमान है कि जिस प्रकार ऋषियों के मंत्रों में निहित अभिप्राय प्रकारों और उनके स्वरूप-शैली आदि का विश्लेषण किया गया-उसी वासना से वासित मनीषियों ने सम्भव है कवियों के अभिप्रायों, काव्य के स्वरूप और शैली आदि का विश्लेषण किया हो और पूर्वाविष्कृत शब्दावली गृहीत कर ली हो। निष्कर्ष यह कि नाट्यशास्त्र में जिन सौन्दर्यस्रोतों की चर्चा है उनमें से लक्षण और अलंकारों के प्रकल्पन का बीज विद्यमान है। प्रो. देशपाण्डे की यह स्थापना महत्त्वपूर्ण है। डा. राघवन् द्वारा उपेक्षित महत्त्वपूर्ण मुद्दे का समाधान उनके इस प्रयास से सामने आया है। वैदिक वाक्यों में निहित अभिप्रायों के आधार पर उनका वर्गीकरण तथा उनके स्वरूप और शैली पर किए गए ऊहापोहों के आधार पर वाक्यों के विश्लेषणक्रम से प्रसूत लक्षण, अलंकार आदि अभिव्यक्तिगत विशेषताओं का तालमेल बिठाकर एक क्षीणकाय परन्तु विश्वसनीय और प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत किया गया। अभिनवगुप्त द्वारा “लक्षण” सम्बन्धी ऊहापोह का दशपक्षीय उपस्थापन परम्परा में कब से कब तक का समय लेता है - इसके स्पष्टीकरण का अपने पास कोई आधार नहीं है। इतना स्पष्ट है कि जब परम्परा में यह सब जीवित हैं तब प्रागभिनवगुप्त काव्यशास्त्री इतना उपेक्षाशील कैसे ? आधुनिक चिन्तकों ने इस ओर भी विचार किया। उपलब्ध काव्यशास्त्रीय सामग्री से स्पष्ट है कि लक्षणों की अलंकार (और भाव) में अन्तर्भाव की प्रक्रिया चल रही थी। एक ओर काव्यशास्त्री दण्डी कह रहा है - यच्च संध्यंगवृत्यङ्गलक्षणान्यागमान्तरे। व्यावर्णितमिदं चेष्टमलंकारतयैव नः।। अर्थात् संध्यंग, वृत्यंग और लक्षण-जिनका दूसरी जगह सविस्तार विवेचन है - उनका अलंकार के रूप में समावेशपूर्वक वर्णन उन्हें अभीष्ट है। इतना ही नहीं “काव्यशोभाकार” समस्त धर्मों को अलंकार कहने वाला दण्डी गुण का भी पार्थक्य तिरोहित करने के पक्ष में है। अभिनवगुप्त ने इसे लक्षित किया है। उद्भटने तो गुण और अलंकार के अन्तर में गड्डरिका प्रवाह देखा है। निष्कर्ष यह कि अलंकारवादी का यह प्रस्थान जो काव्य के केन्द्र में नाट्यसम्मत व्यवस्थित रस की अपेक्षा व्यापक “चारूता” या “सौन्दर्य” को केन्द्र में रखकर देखता है-लक्षण तथा गुण सभी से इसकी भेदक रेखाओं को मिटा रहा है। अलंकार
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१. काव्यादर्श २/३६७, पृ. २१६ सं.१कलकत्ता armi– –
A H • ’ ."" ४५८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र को व्यापक अर्थ दे रहा है। काव्यशास्त्रीय आचार्य दण्डी ही नहीं, नाट्यशास्त्रीय धारा के धनिक-धनंजय भी कह रहे हैं। अन्तर्भावान्न कीर्तिताः षत्रिंशद्भूषणादीनि सामादीन्येकविंशतिः। लक्ष्य संध्यन्तरांगानि सालंकारेषु तेषु च ।। ४/८४ इसका आशय स्पष्ट करते हुए धनिक ने कहा है कि विभूषण, अक्षर-संहति, शोभा, अभिमान तथा गुणकीर्तन-आदि छत्तीस लक्षण तथा साम, भेद और प्रदान आदि इक्कीस संध्यंतर का क्रमशः उपमादि अलंकारों की तरह हर्ष, उत्साह आदि भावों में अन्तर्भाव हो जाने के कारण अलग से नही कहे गए। बावजूद इसके लक्षणों की संख्या ३६-५४/५५-८५-२०६२ बढ़ती भी जा रही है। अभिनवगुप्त लक्षण, अलंकार और गुण की भेदक रेखा के तिरोधान पर चिन्तित है और उसे बरकरार रखने के लिए कृत संकल्प हैं। उनका मन्तव्य इस सन्दर्भ में रखा जाना महत्त्वपूर्ण है। उनका मन्तव्य यह है कि कवि की उक्ति अखण्ड होती है। स्वयम् कवि की सर्जनात्मक और ग्राहक की सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति कोई भेद नहीं जानती-अखण्ड होती है। दृष्टान्त में पुरुष में सामुद्रिक शास्त्रोक्त लक्षण, शरीर पर धारण किये हुए अलंकार और आन्तरिक गुण-इनमें अन्तर स्पष्ट है। पर शरीर चैतन्ययुक्त पुरुष और अप्राण काव्य में अन्तर है। वहाँ लक्षण, अलंकार तथा गुण में अन्तर है-पर यहाँ तत्वतः सम्भव नहीं। इस प्रकार पूर्वपक्ष करके उन्होंने कहा है कि परिणतप्रज्ञ कवि जिस समय काव्य रचना या नाट्यरचना करता है, उस समय उसके व्यापार में कोई विशिष्ट क्रम होता ही हो-ऐसा नहीं। परन्तु जब हम उसकी कृति का अपोद्धार (विश्लेषण) करते हैं तो उस समय हमें किसी न किसी क्रम की कल्पना तो करनी पड़ती है। इसलिए उन्होंने भरतोक्त सूत्र के साक्ष्य पर ही लक्षण की परिभाषा प्रस्तुत की। आधार बनाया “लक्षणानि” के विशेषण “भावार्थगतानि” ३ को। उनकी दृष्टि नाट्यरसपरक व्याख्यान की है और प्रसंग भी उसी का है। अतः “लक्षण" उसकी दृष्टि में “भावार्थगत” कवि-व्यापार ही है। यह कवि-व्यापार है जो लोक से उठाई हुई सामग्री में विभावन की क्षमता का आधान कर देता है। अभिनवगुप्त जहाँ “विभावन” शब्द का प्रयोग करते हैं- भामह, दण्डी, उद्भट, रुद्रट और १. दशरूपक ४/७८ पृष्ठ ११६ सं. १८६१ कलकत्ता २. विस्तार देखिए-भारतीय काव्यशास्त्र में अलंकार सिद्धान्त “लक्षण और अलंकार” पृष्ट ३१-४२ मैकमिलन, दिल्ली, प्र.सं ३. नाट्यशास्त्र, अध्याय १६ श्लोक ४ गा.ओ.सि. बड़ौदा, पृ. २६५ . .- –
… … . … ४५६ अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा कुन्तक-जैसे देहात्मवादी आचार्य “शोभन” या “सुन्दरीकरण” शब्द का प्रयोग करते हैं। कुन्तक कविव्यापार, जिसे वह वक्रता या विचित्राभिधान नाम देते हैं और उसका कार्य “सौन्दर्याभिधान” बताते हैं। कहा है - “यत् किञ्चनापि वैचित्र्यं तत्सर्वं प्रतिभोदभवम्" । यह सही है कि अखण्ड काव्य का अखण्ड सौन्दर्य है, तथापि समझने-समझाने के स्तर पर तरतमभाव से सौन्दर्य के स्रोतों पर विचार करना पड़ता है। इसलिए विश्लेषण करते हुए यह माना जाता है कि गुण तथा अलंकार शब्दार्थ से सम्बद्ध है, किन्तु लक्षण पूर्णतः कवि व्यापार से सम्बद्ध है। कवि के प्रयत्न से काव्य में शब्दार्थों के द्वारा वैचित्र्य आता है। जिस प्रयत्न से यह होता है वह समूचा प्रयत्न ही लक्षण है। इसीलिए काव्य को कविकर्म कहा जाता है। अभिनव ने अपने पक्ष को एक उदाहरण से पुष्ट किया है। पीवरत्व एक विशेषता है जो स्तनों में तो सुलक्षण माना जाता है और मध्यभाग में हो तो कुलक्षण। इसी तरह किसी एक प्रकार से कही जाने वाली वस्तु उसी पदार्थ क्रम से (रसोचित विभाव या) काव्योचित फलतः शोभन या लोकातिक्रान्त रूप में प्रकट हुई हो तो वह लक्षण होता है अथवा कुलक्षण। इसी आधार पर गुण एवं अलंकार लक्षण से सर्वथा भिन्न है। इस दृष्टि से लक्षण औचित्य के निकट आ जाता है। अभिनव ने भी कहा है-“परमौचित्यख्यापने प्रयोजनम्"। वस्तुतः काव्यलक्षण का निर्धारित कवि के काव्य में जो शब्द, अर्थ, गुण और अलंकार है। उन सबकी संघटना होती है। निष्कर्ष यह कि लक्षण अलंकार का अनुग्राहक है। लौकिक वस्तु का लोकोत्तर रूप में-काव्योचित रूप में प्रकट होना ही लक्षण है। “यह लक्षण ही शब्दार्थमय काव्यशरीर है-इस शरीर में जिनसे सौन्दर्य वृद्धि होती है - वह अलंकार है। अभिनव गुप्त ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि कवि-व्यापार के बल से लौकिक वस्तु भी अलौकिक हो उठती है और उसका इसी रूप में प्रकट होना लक्षण है। जिस प्रकार पृथग्भूत हार से रमणी विभूषित होती है- ठीक इसी प्रकार पृथक् -सिद्ध चन्द्र आदि उपमानों से वनिता-वदन आदि का सौन्दर्य बढ़कर प्रतीत होता है। किन्तु वर्णनीय वनिता वदन आदि में इस प्रकार सौन्दर्य में वृद्धि होने का काव्य में एकामात्र कारण कवि की प्रतिभा ही है। रमणी का मुख और चन्द्र-दोनों लौकिक वस्तुयें हैं तथा वे पृथक्-सिद्ध हैं। ये लौकिक सृष्टि हैं। कवि की प्रतिभा उनमें सादृश्य देखती है। इससे वे दोनों वस्तुएँ परिवर्तित होती हैं और प्रतिभा के द्वारा प्रकाशित होने के कारण एक विलक्षण उपमानोपमेयभाव से संबद्ध होकर उपस्थित होते हैं। और कुछ और ही हो उठते हैं। यही कवि की अलौकिक सृष्टि है। NA. VARMA १. वक्रोक्तिजीवित-प्रथम उन्मेष । श्लोक, श्लोक २८ का पूर्वार्ध ४६० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र __ अभिनवगुप्त की दृष्टि में उनके उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बिना लक्षणों का आश्रय लिए हुए अलंकारों का काव्य में स्थान नहीं है। लक्षण का अर्थ है कविव्यापार तथा कविव्यापार है - कवि प्रतिभा का शब्दार्थमय आविर्भाव । अलंकारों की ओर सामान्य दृष्टि से देखने पर यही लगता है कि वहाँ सादृश्य, अभेद, अध्यवसाय, विरोध आदि लौकिक व्यवहार के ही सम्बन्ध दिखाई देते हैं। परन्तु यह अलंकारों का केवल बाह्यकवच या ढांचा है। यह ढांचा अलंकार नहीं है। अन्यथा “गौ गवय के समान है-में उपमा और “स्थाणु है या पुरुष”-इसमें सन्देह हो जाता। ये काव्यालंकार नहीं है। यह सब तो केवल लौकिक सम्बन्ध है और जब इन लौकिक सम्बन्धों के रूप में अधिष्ठानभूत कवि व्यापार या लक्षण प्रतीत होता है तभी उसे अलंकारता प्राप्त होती है लोकातिक्रांतता तभी आती है। इसीलिए अभिनवगुप्त स्पष्ट कहते हैं - “काव्यबन्धेषु काव्यलक्षणेषु सत्सु”- यह तथ्य प्रत्येक अलंकार में मूलतः गृहीत है। परवर्ती आलंकारियों ने वैचित्र्य की नियमतः स्थिति मानी है। इस प्रकार प्रो. देशपाण्डे ने अभिनवगुप्त’ के आशय को बड़ी स्पष्टता के साथ रखा है।
नाट्यशास्त्र के काव्यगत तत्त्व
नाट्यशास्त्र के अन्तर्गत जिन काव्यीय तत्त्वों का उल्लेख हुआ है - उनमें मुनि द्वारा निर्दिष्ट तत्त्वों लक्षण, गुण, अलंकार तथा दोष का अपलाप नहीं किया जा सकता है। परम्परा जिन्हें अलंकारवादी कहती है उनकी परिधि में ये सभी काव्यव्यापार और उसमें परिस्फुरित शब्द तथा अर्थ (काव्यशरीर) से संबद्ध हैं और उनकी काव्यविश्लेषण के संदर्भ में अपेक्षा है। भरत नाट्यशास्त्र में लक्षणों की संख्या अधिक थी और अलंकारों की कम - उपमा, रूपक और दीपक अर्थालंकार तथा यमक शब्दालंकार। भट्टतौत (उपाध्यायमतन्तु-लक्षणबलात् अलंकाराणां वैचित्र्यमागच्छति अभिनवभारती (पृ. ३२) १६३४ षोडश अध्याय, ओ.इ. बड़ौदा) ने कहा है-लक्षणों के संयोग से अलंकारों में वैचित्र्य आता है। उदाहरणार्थ गुणानुवाद नाम के लक्षण के योग से उपमा का भेद प्रशंसोपमा हो जाती है। इसी प्रकार और भी उदाहरण दिए हैं। दण्डी के अलंकार-चक्रों से यह भी स्पष्ट होता है कि आचार्यों ने अलंकारों के विकल्प अथवा वैचित्र्य लाने में लक्षणों का किस तरह उपयोग किया है। इस बात के संकेत नाट्यशास्त्र में ही उपलब्ध होने लगते हैं कि अलंकारों के विस्तार में लक्षणों का योगदान है। भामह और दण्डी के अलंकार-विवेचन भी इसके साक्षी हैं। दण्डी स्वीकार करते हैं १. देखिए-भारतीय साहित्यशास्त्र, पृ. ५२ से ५८ तथा अभिनवभारती (प्रो. ग. देशपांडे) २. काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते। ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान कास्येन वक्ष्यति - काव्यादर्श (द्वि. अध्याय प्रथम श्लोक, कलकत्ता १८८२) अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा कि जिन काव्य शोभाकारी धर्मों को अलंकार कहा जाता है उनका विकल्पन चल ही रहा है और उनकी इयत्ता नहीं है।’ उनका पूर्णरूप से आख्यान असम्भव है। यही बात लक्षणों के विषय में भी अभिनवभारतीकार ने कही है-“लक्षणानामापि च आनन्त्यं केन गणयितुं शक्यम्"२। अन्तर तो वहां गुण और अलंकार में भी बहुत सूक्ष्म है। अर्थात् उतना स्पष्ट नहीं है। आनन्दवर्द्धन भी मानते हैं कि यह सब वाग्-विकल्प है और इनका अन्त नहीं है। निष्कर्ष यह कि चाहे लक्षण, अलंकार और गुणों की भेदक-रेखा जितनी सूक्ष्म हो ओर उनके उदाहरण संकीर्ण-पर उनकी अपनी मूल सत्ता अक्षुण्ण है।
गुण और अलंकार
“लक्षण” से “अलंकार” का अन्तर स्पष्ट हो जाने के पश्चात (अर्थात् यह मान लेने के बाद कि “लक्षण” का सम्बन्ध कवि-व्यापार से है और अलंकार का काव्योचित शब्दार्थगत सौन्दर्यगत-संवर्धन से) सम्प्रति यह देखना आवश्यक है कि इनकी “गुण" सम्बन्धी धारणा क्या है और “अलंकार" से उनका वैशिष्ट्य क्या है ? भरत ने कहा है कि “दोषविपर्यय ही गण है।३। उनके लक्षण अभावात्मक हैं-पर प्रभेद भावात्मक है। उनकी संख्या दस है। वे शब्द और अर्थ से सम्बद्ध हैं। शब्द से पद और वाक्य-दोनों का आशय है। वस्तुतः गुण और अलंकार का स्वरूप-विवेचन ध्वनि-मत से पूर्व भी है और पश्चात भी। ध्वनिमत से पूर्व गुण की स्थिति शब्दार्थगत ही रही, आगे नहीं बढ़ी। संख्या के विषय में १०, ३, १०, २० जैसे मतभेद चलते रहे। पर उनके शब्दार्थ-आश्रित होने में कोई मतभेद नहीं था। दोनों शोभाकार और दोनों शब्दार्थ के आश्रित। शोभा भी शरीरगत ही थी। लक्ष्य भी शब्दार्थगत स्रोत या साधन भी शब्दार्थगत। भामह, दण्डी, उद्भटतथा वामन में से वामन को छोड़कर शेष तीन गुण और अलंकार का अन्तर नहीं करते। दण्डी यदि दोनों में प्रायः समानता देखते थे तो भामह और उद्भट निषेध ही कर देते थे। वामन ने अन्तर किया उन्होंने यौवन का दृष्टान्त देकर बताया कि जिस तरह युवती के शरीर में निसर्गजात या सहज सौन्दर्य पैदा करता है Ram
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१. अभिनवभारती, पू. ३१७ गा.ओ.सि. १६३४ बड़ौदा २. नाट्यशास्त्र, गुणा विपर्ययादेषाम् १६/६५ द्वि. भाग पृ. १३१८ बड़ौदा वही। काव्यादर्श - ३/१८६ में संकेत निर्णयसागर १६३६ उद्भटादिभिस्तु गुणालंकाराणां प्रायशः साम्यमेव सूचितम् अलंकार-सर्वस्व पृ. ६ . इह तूभयेषां समवायेन स्थितिरिति अभिधाय” तस्मादगड्डरिका प्रवाहेण गुणालंकारभेदः - ‘काव्यप्रकाश’ अष्टम उल्लास में संकेत है (पृ. ३४५) ६. काव्य शोभायाः कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्त्वलंकाराः वामन (पृ. ११३) तृतीयाधिकरण, प्र. अध्याय, हिन्दी-काव्यालंकारसूत्रवृत्ति-आत्माराम एंड संस - दिल्ली १६५४ ई. ४ ना.शा. अभिनव भारती, १५वां अध्याय, द्वि. भा. पृष्ठ १२४५ बड़ौदा गा.ओ.सि. SHREERSNEPAL ४६२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र उसी तरह गुण काव्य-शरीर में सहज शोभा का आधान करते हैं और अलंकार उसे बढ़ाते हैं। अलंकारवादी कहे जाने वाले आचार्यों ने अलंकार में ही सबका अन्तर्भाव कर दिया चाहे वे लक्षण हों या गुण। रीतिवादी “लक्षण" के विषय में तो मौन है-पर गुण के विषय में मुखर। अभिनवगुप्त ने जैसे “लक्षण” को अनुग्राहक माना है उसी प्रकार वामन ने भी गुणों को अलंकार का अनुग्राहक ही माना है। प्रतीतहारेन्दुराज और भोज ने इनका अनुगमन किया। लक्षण का नक्षत्र यहाँ अस्त है। अभिनवगुप्त कभी वामन और कभी आनन्दवर्धन से प्रेरणा लेकर “गुण” पर अपना अभिमत प्रकट करते हैं। उन्होंने बताया कि काव्य प्रासाद के निर्माण में लक्षण भित्तिस्थानीय है और गुणालंकार चित्रकर्म’। यहाँ इस वक्तव्य में वह दोनों से भिन्न है। प्रतीहारेन्दुराज’ वामन की भांति इतना मानते हैं कि जिस सहज सौन्दर्य से मण्डित होकर शब्दार्थ काव्य बनते हैं-उसका स्रोत गुण ही है। गुण के रहने पर ही अलंकार अलंकार है अन्यथा वे अपने स्वरूप की भी हानि कर लेते हैं। प्रतीहारेन्दुराज गुणों की संख्या के विषय में वामन से असहमत और आनन्दवर्धन से सहमत हैं। वह गुणों की संख्या तीन ही मानते हैं। परन्तु उन्हें रसधर्म न मानकर आनन्दवर्धन से अपनी कहीं असहमति भी बताते हैं। वह गुण को काव्य का असाधारण स्वरूपाधायक धर्म मानते हैं। भोज ठीक-ठीक वामन का अनुसरण नहीं करते। वह शोभा हेतु (गुण) और शोभातिशय हेतु (अलंकार) जैसे शब्दों का प्रयोग न कर मुख्य (गुण) और अमुख्य (अलंकार) शब्दों का प्रयोग कर अन्तर निरूपित करते हैं। रत्नेश्वर भोज की अपव्याख्या तब करते हैं जब उन्हें वामन से एकरूप करते हैं। अग्निपुराणकार भी भोजराज और वामन से प्रभावित होकर गुण की सत्ता काव्य के लिए अनिवार्य मानते हैं। यह परम्परा स्पष्टतः गुण और अलंकार को शब्दार्थ-धर्म मानती हुई भी काव्योचित सौन्दर्य के लिए “गुण” को अनिवार्यता प्रदान करती है और अलंकार का अनुग्राहक मानती है।
काश्मीर साहित्यशास्त्रियों की विचारधारा
कश्मीरियों की एक दूसरी धारा आनन्दवर्धन से आरब्ध होती है। यहाँ अलंकारवादियों की मान्यतायें अपहस्तित हो जाती हैं। आनन्दवर्धन पूर्ववर्ती देहात्मवादी या सौन्दर्यवादी आचार्यों से हटकर मुनि भरत का अनुवाद करते हैं-“रसादयो हि द्वयोरपि तयो र्जीवितभूताः। इतिवृत्तादि तु शरीरभूतमेव”-अर्थात् जैसे नाट्यशास्त्र कहता है “इतिवृत्तं तु काव्यस्य शरीरं परिकीर्तितम्"-ठीक वही भाषा आनन्दवर्धन भी बोल रहे हैं। नाट्यशास्त्र की धारा “रसकेन्द्रित” थी-वहाँ प्रत्येक तत्व के स्वरूप पर रसकेन्द्रित विचार होता था। भामह से वामन तक का प्रस्थान “चारुता” केन्द्रित है। १. चित्रकर्मप्रतिममलंकारगुणनिवेशनम् २. गुणाहितशोभे काव्ये अलंकाराणां शोभातिशयविधायित्वात-पृष्ट ७६ काव्यालंकारसार-संग्रह लधुवृत्ति १६१५ निर्णयसागर अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४६३ “चारुता” को आनन्दवर्धन भी महत्त्व देते हैं। पर पूर्ववर्ती आचार्यों की भांति “चारूता” के स्रोत गुण या अलंकार में रस को रखकर गजनिमीलिका नहीं करते। यदि वामन उसे कांतिगुण में डालकर उससे गर्भित गौड़ी रीति को अनात्मभूत कह देते हैं तो और लोग रसवदलंकार में ढाल देते हैं। आनन्दवर्धन को क्रमागत सौन्दर्य प्रस्थान का ही मानना संगत नहीं लगता। सौन्दर्य या चारूता शब्द उभयत्र है। पर उसके अर्थ में आकाश-पाताल का अन्तर है। आनन्दवर्धन चारूता को काव्यात्मभूत “रस” से ही जोड़ते हैं। यदि वह है तो सर्वत्र चारुता उदभासित है और वह नहीं है तो परिणतप्रश्न सहृदयों के लिए उपेक्षणीय चारुता ही है, अथवा वह प्रतिभसित चारुता है-प्रतिष्ठत चारूता नहीं। इस प्रकार आनन्दवर्धन सौन्दर्यवादी पूर्व प्रस्थान से यह कहकर अपने को अलग कर लेते हैं कि वे लोग चारुता का आशय शरीर को मानते हैं और स्वयम् आनन्दवर्धन काव्य की आत्मा “रस" (ध्वनि) को मानते हैं। वह कहते हैं कि दृश्य की भाँति श्रव्यकाव्य का भी जीवितभूत रस ही है। इतिवृत्त आदि तो शरीर हैं। इस आचार्य ने गुण को रस-गत विशेषता के रूप में स्वीकार किया और उसकी संख्या तीन ही निर्धारित की-माधुर्य, आज और प्रसाद। उन्होंने कहा कि माधुर्य, ओज और प्रसाद शब्दार्थ में भी रह सकते है-यदि वे आत्मभूत रस में विद्यमान हों।। __आनन्दवर्धन ने गुण और अलंकार के अन्तर को स्पष्ट रूप से और गंभीर रूप से विवेचित करते हुए कहा कि गुण आत्मगत या अंगी (रस) का धर्म है। स्वाभाविक विशेषता है और अलंकार-अंगभूत शब्दार्थ के। अलंकार शब्दार्थ रूप शरीर का सुन्दरीकरण करते हुए रसाभिव्यक्ति में परम्परया कारण हैं और गुण रस में रहकर साक्षात् कारण हैं। गुण और अलंकार का यह अन्तर अलंकारवादियों की सीमा में स्पष्ट नहीं था। गुण और अलंकार को एक मानना तो सम्भव ही नहीं है-कारण, दोनों के आश्रय भिन्न हैं। यह कोई आवश्यक नहीं कि एक के रहने पर दूसरे का होना आवश्यक ही हो। हो सकता है गुण हो और अलंकार न हो अथवा अलंकार हो गुण न हो। तीसरा अन्तर यह भी है कि गुण और रस का नित्य-सम्बन्ध है अलंकार और रस का सम्बन्ध नहीं है। यह भी सम्भव है कि अलंकार सदा रस का उपकारक न हो, वह तटस्थ ही नहीं आकर्षक भी हो सकता है। पर गुण और रस का न केवल नियत-सम्बन्ध है अपितु वह रस का नियमतः उपकार भी करता है। निष्कर्ष यह कि ध्वनि सम्प्रदाय में आकर गुण और अलंकार का अन्तर स्पष्ट हुआ। ये सब बातें अलंकारवाद के घेरे में नहीं आती-तथापि अलंकार का सन्दर्भ होने से कहा जा रहा है।’
१. ध्वन्यालोक- तमर्थमवलम्बन्ते ये ऽगिनं ते गुणाः स्मृताः अङ्गश्रितास्त्वलंकारा मन्तव्याः कटकादिवत्।। (२/६) २. उपकुर्वन्ति तं सन्तमाद्वारेण जातुचित्।। हारादिवदलंकारस्तेऽनुप्रासोपमादयः- काव्यप्रकाश, अष्टम उल्लास ८/६६ श्लोक ४६४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र REES ShizdilendareA आनन्दवर्धन का कहना है कि यदि इन्हें शब्दाश्रित माना भी जाय तब भी ये शब्दाश्रित अनुप्रास आदि अलंकार के समकक्ष नहीं होगें। कारण यह है कि अनुप्रास को अर्थ से सम्बद्ध होने की अपेक्षा नहीं है-वह अर्थ-निरपेक्ष है। परन्तु गुण शब्दगत तभी होगें जब रसात्मक व्यंग्य-विशेष के प्रतिपादक वाच्य के उपस्थापक होगें। जैसा ऊपर कहा गया है। उसका आशय यह है कि यदि रस की या रसगत गुण की स्थिति है तभी वह शब्दगत होगा। एक अर्थ-निरपेक्ष है और दूसरा रस-व्यंजक अर्थसापेक्ष । रस है तो गुण होगा ही। जिज्ञासा एक प्रश्न तब अवश्य खड़ा होगा कि यदि गुण शब्दाश्रित है-शरीराश्रित हैं तो रीति या संघटना से, जैसा कि वामन मानते हैं या उद्भट आदि अलंकारवादी मानते हैं-उनका क्या सम्बन्ध है ? गुण संघटना एक है या भिन्न ? और भिन्न भी हो तो गुणाश्रित संघटना है या संघटनाश्रित गुण ? गुण और संघटना एक नहीं हो सकती। कारण यह कि गुण और रस का सम्बन्ध नियत है जबकि संघटना का अनियत। ओजस्वी रसों में गुण ओज ही होगा-संघटना अनियत भी हो सकती है। अतः अनियत संबंधी संघटना से नियत सम्बन्धी गुण की एकरूपता कैसे सम्भव है ? यही बात संघटनाश्रित गुण के मानने पर भी है। संघटना में यदि रीतिवादियों की भाँति गुण मान लिया जाय तो स्थिति संघटना की होगी वही तदाश्रित गुण की भी होगी। पर यह होता नहीं है। फलतः तीसरा पक्ष ही शेष रहता है। अर्थात् गुण में संघटना मानना होगा। संघटना को गुण के अनुरोध से ओजस्वी, मधुर या प्रसन्न होना होगा। औचित्य का यही तकाजा है। यह नियत सम्बन्ध नैमित्तिक या औपाधिक है स्वाभाविक नहीं। यदि औचित्य के निर्वाह न होने पर भी चारूता की प्रतीति अक्षत रहती है तो यह कवि की प्रतिभा-भक्ति का चमत्कार है। अव्युत्पत्ति तो है ही। मतलब यह कि संघटना को औचित्य का अनुरोध मानकर चलना चाहिए। सामान्यतः यद्यपि संघटना को गुण का ही अनुरोध मानकर चलना चाहिए तथापि इसके कुछ अपवाद भी हैं। वर्ण्य की अपेक्षा यदि वक्ता ओजस्वी है तो उसके अनुरोध से संघटना को वैसा होना पड़ेगा। इसी प्रकार कभी-कभी वाच्य, विषय, आश्रय और काव्य रूप का भी अनुरोध मानकर संघटना का विधान करना पड़ता है। संघटना का नियम भंग नहीं होता। उसमें स्वैराचार जैसी कोई बात नहीं आती। इसी प्रकार ध्वनिवादी, अलंकारवादी और रीतिवादियों के पक्षों का खण्डन करता हुआ गुण से रीति या शरीर का क्या सम्बन्ध होना चाहिए और कैसे होना चाहिए-यह स्पष्ट किया गया। इस प्रकार जैसे अलंकार से लक्षण की पृथक् सत्ता है उसी प्रकार गुण की भी। रीति से पार्थक्य है ही। अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४६५
अलंकारः-सैद्धान्तिक-स्वरूप
सम्प्रति, अलंकार का सिद्धान्ततः स्वरूप क्या होना चाहिए-यह देखना है। ध्वनि-प्रस्थापक आनन्दवर्धनाचार्य ने क्रमागत “सौन्दर्य" की स्वरूप विषयक धारणा में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया। “चारुता" या “सौन्दर्य” को काव्य का अन्तस्तत्त्व वे भी मानते थे और दृश्य के समान “श्रव्य” काव्य का भी प्रतिपाद्य “रस” को कहते थे। एक प्रकार से आनन्दवर्धन में इन दोनों प्रस्थानों का तलस्पर्शी समन्वय हुआ। ध्वनि-प्रस्थान ने उस व्यापार की प्रतिष्ठापना की जिससे “रस” का आवरण ही नहीं, सौन्दर्य का आवरण भी छंटता है। अलंकारवादी देह को ही, काव्य के शरीर को अलंकार्य मानते हैं और वहीं उसके स्रोत की भी खोज करते हैं। ध्वनिवादी सौन्दर्य का सम्बन्ध आत्मा से मानते हैं-रस से अलंकारवादी दार्शनिक चार्वाक की तरह देह को ही काव्य-शरीर को ही-शब्दार्थ (वाचक, लक्षक, वाच्य तथा लक्ष्य) को ही आत्मा समझते हैं। उसे ही अलंकार्य मानते हैं। ध्वनिवादी कार्य कारण-भाव का निर्णय अन्वय-व्यतिरेक की पद्धति से करते हैं। वे कहते हैं कि देह जीवित की भी होती है और मृत की भी। पर क्या कारण है कि सौन्दर्य की प्रतीति जीवित प्राणी की देह से ही होती है ? मृत प्राणी के शरीर में नहीं ? वस्तुतः यह देह के भीतर निहित चैतन्य है जिसके सम्पर्क से (अपार्थिव) सौन्दर्य पार्थिव आकार के सहारे आत्मप्रकाश करता है। शव की देह से उसका सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है। निष्कर्ष यह कि जहाँ चैतन्य है- उससे सम्बद्ध देह है तो वहाँ सौन्दर्य है और सम्बन्ध टूट जाता है- वहाँ नहीं है। इस प्रकार तत्त्वतः सौन्दर्य चैतन्य तत्त्व है- परन्तु अभिव्यक्ति के लिए वह गोचर अवयवों का सहारा लेता है। लावण्य-अंग पर लक्षित होता है। पर अंगाश्रित नहीं होता। एक ही मुख है-कभी “मलिन” और कभी “कान्त” हो जाता है। यदि कान्ति या लावण्य का देह से अव्यभिचरित सम्बन्ध होता तो यह आकस्मिकता या आगन्तुकता कैसे होती ? इस प्रकार सौन्दर्य की धारणा में अलंकारवादियों की अपेक्षा एक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ और उसका प्रभाव सब ओर लक्षित हुआ। यह प्रभाव अलंकार के स्वरूप पर भी पड़ा। यद्यपि यह सब चर्चा अलंकारवाद की परिधि में नहीं आती तथापि आनुषंगिक रूप से आवश्यक प्रतीत होती है। आनुषंगिक या प्रासंगिक का अर्थ ही यही है कि जो मुख्य तो न हो पर प्रसंगवश आकर अनुपेक्षणीय बन गया हो। इस प्रस्थान ने “अलंकार" को अपना मूल स्वरूप बता दिया। अलंकारवाद के दौर में अलंकार का सूर्यसर्वग्रासी बन रहा था। बात इतनी ही थी कि इन अलंकारवादियों ने सौन्दर्य का आश्रय देह यानी काव्य शरीर (शब्दार्थ) को मान लिया। तब विवेकाभाववश सभी सौन्दर्यस्रोतों को शरीराश्रित ही स्वीकार कर लिया। ध्वनिप्रस्थान में उक्त मान्यता का खण्डन हुआ और रस को केन्द्रीय तत्त्व होने का महत्त्व मिला। फिर उसी को केन्द्र में रखकर उसके पोषक उपकरणों पर ummertimemore … …………. . .
:-.-.. . . .४६६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र विचार आरम्भ हुआ। अलंकारवादी जिस गुण की या तो देहगत सत्ता मानते थे अथवा उसे अलंकार से अतिरिक्त मानते ही नहीं थे, उस गुण को इस प्रस्थान में रस-धर्म मान लिया गया। __ माना गया कि मुनि-सम्मत रसों में असंकीर्ण रूप से दो ही वर्ग हैं-मधुर ओर ओजस्वी। कारण, उनके अनुभव काल में या तो अन्तस में द्रुति होती है या दीप्ति । द्रुति रसगत जिस विशेषता के कारण होती है वह “माधुर्य’ है। और “दीप्ति" जिस विशेषता के कारण होती है वह “ओज” है। “प्रसाद” सर्वमान्य गुण है। अलंकार-संज्ञा व्यवहारगत जिस अलंकार-सादृश्य-वश काव्य में प्रयुक्त हुआ है वह अंगाश्रित ही होता है। अतः इस प्रस्थान में भी अंग, यानी शरीर, अर्थात् शब्दार्थगत ही माना गया। यह अवश्य माना गया कि वह शब्दार्थ का सुन्दरीकरण करता हुआ परम्परा या रसरूप अंगी की ही श्री की समृद्धि करता है- उसकी निष्पत्ति में उत्कर्ष का आधान करता है। __आनन्दवर्धन ने काव्य रचना में अपेक्षित प्रतिभा-व्यापार को दृष्टिगत कर सिद्धान्ततः विचार किया। प्रतिभा-व्यापार नैसर्गिक भी होता है और अर्जित भी। नैसर्गिक प्रातिभ-व्यापार-सम्पन्न रचनाकार की रचना में अलंकार सहज ही आ जाते हैं। वह उसका स्वरूप निर्देश करते हुए कहते हैं - रसाक्षिप्ततया यस्य बन्धः शक्यक्रियो भवेत्। अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनेर्मतः।। (२/१६ द्वि. उद्योत १६वीं कारिका) परिणत-प्रज्ञ प्रतिभान् कवि की प्रतिभा सहज ही रसाविष्ट हो जाती है। उस रसावेश में उसकी अभिव्यक्ति जिस सामग्री से होती है- वह सुन्दरीकृत होकर ही स्फुरित होती है। उसको सुन्दर बनाने के लिए रसाभिव्यक्ति से हटकर पृथक् प्रयत्न नहीं करना पड़ता। इसीलिए ध्वनिवादी (और रसवादी भी) अलंकार को “अपृग्यत्ननिर्वयं" कहते हैं। रसाविष्ट प्रातिभ व्यापार स्वयं व्यापार या प्रयत्न है- उससे जो अभिव्यक्ति होती है-वह सुन्दरीकृत रूप से ही होती है। वहाँ अपेक्षित सामग्री का अलग से यत्नपूर्वक अलंकारों द्वारा सुन्दरीकरण नहीं होता है। कुन्तक ने भी यही बात कही है। उन्होंने भी कहा है “अलंकृतस्यैव काव्यत्वम् न तु काव्यस्यालंकारः”- काव्य निसर्गजात प्रातिभ व्यापार में - सुकुमार काव्यमार्ग में - अलंकृत ही अभिव्यक्त होता है। काव्य का अभिव्यक्त हो जाने के बाद अलंकरण नहीं होता। उसका स्वरूप “अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यता" ही है। यह महाकवि की बात है। (सूच्यः-कुन्तक ने कहा है (१/१३) शरीरंचेदलङ्कारः किमत्रकुरुतेरसः। आत्मैव नात्मनः स्कन्धंक्वचिदप्यवरोहति ?) क-“किमलं कुरुतेऽपरम्” इति पाठः। १. कुन्तककृत वक्रोक्तिजीवित (प्रथम उन्मेष, पृ. ७ कलकत्ता, १६२८) TREATMFREPREPEATRE Pakti ४६७ अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा यदि प्रातिभ व्यापार अभ्यास और व्युत्पत्ति से हुआ है तो ऐसे व्यापार से सम्पन्न कवि आभ्यासिक कवि है। वह सहज प्रतिभावान् नहीं है। उसे नियमों का अध्ययन करना पड़ता है। यह व्युत्पन्न कवि अलंकार को अलंकार होने के लिए निम्नलिखित नियमों का अनुधावन करें-समीक्षापूर्वक उनका नियोजन करें। समीक्षारे में इन नियमों का ध्यान रखे (१) अलंकार का अंगरूप में नियोजन हो न कि अंगीरूप में। (२) अवसर देखकर उसका ग्रहण हो। (३) अवसर देखकर गृहीत का त्याग (उचित हो तो वह भी) करे। (४) किसी भी अलंकार के आद्यन्त निर्वाह में अतिरिक्त अभिनिवेश न हो। उक्त प्रकार से समीक्षा हो भी-तब भी एक बार ग्राहक की हैसियत से प्रत्यवेक्षण करे-अर्थात् देखे कि जिस उद्देश्य से आनन्दवर्धन ने सहज प्रतिभा सम्पन्न महाकवियों को भी आगाह किया है-चेतावनी दी है कि अनुप्रास और विशेषकर यमक के सम्बन्ध में सावधान रहें-उसका निर्वाह तो हो रहा है। निसर्ग-शक्ति सम्पन्न होने पर भी जहां रस अंगी है-वहाँ कवि आद्यन्त अनुप्रास के निर्वाह का अभिनिवेश न रखे। ऐसा होने पर अपकर्षकारी होकर स्वरूप च्युत हो सकता है। और जहाँ तक यमक जैसे दुरूह अलंकार का सम्बन्ध है-उस विषय में आनन्दवर्धन का कहना है कि शक्ति (निसर्गशक्ति) सम्पन्न रहने पर भी उसका नियोजन प्रमाद है। रस-निष्पादन के असिधा-व्रत में यमकादि दुष्कर अलंकारों का नियोजन प्रमाद ही है। ध्वनिप्रस्थान में सैद्धान्तिक स्तर पर ही नहीं, व्यावहारिक प्रयोगों को अर्थात् रचनाओं को देखकर अलंकार की स्वरूप-स्थिति का उपस्थापन किया गया है। मम्मट ने यही किया है। इसका उल्लेख किया भी जा चुका है। उन्होंने अलंकार का स्वरूप इस तरह निरूपित किया कि “गुण" से उसका अन्तर भी स्पष्ट हो जाय। १. ध्वन्यालोक, द्वितीय उद्याते कारिका १६ विवक्षातत्परत्वेन नाङ्गित्वेन कदाचन। काले च ग्रहणत्यागौ नातिनिर्वहणोचिता (१८) नियूंढावपि चाङ्गत्वे यत्नेन प्रत्यवेक्षणम् (१६) वही (द्वि. उद्योत पृ. २३७) क. सूच्यः-कुन्तक ने कहा है (१/१३) ४६९ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र गुण’ १. गुण और रस का नियत सम्बन्ध है। २. रस का गुण नियमतः उपकारक है। अलंकार १. अलंकार और रस का नियत सम्बन्ध नहीं है। २. अलंकार रस का नियमतः उपकारक नहीं है। वह उपकारक भी हो सकता है, अनुपकारक भी हो सकता है और तटस्थ भी हो सकता है। गुण अंग गत है न कि अंगी गत-अतः वह उपकार करता भी है तो परम्परया अर्थात् अंग (शब्दार्थ) के सुन्दरीकरण द्वारा अंगी का सुन्दरीकरण। ३. रस में रहकर गुण रस का साक्षात उपकारक है। इस प्रकार अलंकारवादियों की अलंकार-सम्बन्धी मान्यता का परवर्ती आचार्यों ने साधार ओर सोपपत्ति खण्डन भी किया है। इससे उनका अविवेक और उनकी सीमा स्पष्ट होती है। प्रभाव की दृष्टि से काव्यसामग्री में अलंभावकारी समस्त स्रोतों की तारतमिकता को दृष्टि से परे नहीं रखा जा सकता। एक ही कोटि में रख देना क्या असमीक्ष्यकारिता नहीं है ? इस प्रकार इस (ख) खण्ड में “अलंकार” का समशील सौन्दर्यस्रोतों से (दोषाभाव, लक्षण तथा गुण) से अन्तर स्पष्ट किया गया है। एक बिन्दु यह रह जाता है कि सौन्दर्यस्रोत “रीति” भी कही गई है-“वृत्ति’ भी कही गई है-पर ये इसलिए नगण्य है कि “रीति” की चर्चा “गुणविशिष्ट पद-रचना” और केवल “संघटना” दो रूपों में मिलती है। जहाँ तक गुण-गर्भ रीति का सम्बन्ध है-उसका परवर्ती ध्वनिवादी आचार्यों ने निराकरण कर दिया है। इन बीस गुणों का अनुगत लक्षण ही नहीं बनता। उसमें भिन्न-भिन्न स्तर से सौन्दर्य-असौन्दर्य-स्रोत समाविष्ट हैं। मम्मट’ ने काव्यप्रकाश में इसका भलीभांति निराकरण १. “काव्यप्रकाश” में भी-“ये रसस्यागिनो धर्मा शौर्यादय उदाहृताः। क- इवात्मनः, इति पाठः उत्कर्षहेतवस्ते स्युरचलस्थितयो गुणाः।। (अष्टम उल्लास-सू. १७) २. क. (काव्यप्रकाश, अष्टम उल्लास, (सू. ८७ की वृत्ति देखिए) ख. काव्यप्रकाश कारिका नवम उल्लास में लिखा है-सू. (१०५) “वृत्तिर्नियतवर्णगतो रसविषयो व्यापारः और भी-उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्। हारादिवदलंकारास्तेऽनुप्रासोपमादयः (वही सूं. ८८) अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४६६ कर दिया है। संघटना मात्र के रूप में इसे शाब्दी वृत्ति ही माना गया है जिसका अन्तर्भाव अनुप्रास में कर दिया गया है। इस प्रकार नाट्यशास्त्र के सोलहवें अध्याय में निरूपित काव्यचर्चा जिन चार तत्त्वों - दोष, गुण, लक्षण तथा अलंकार-की बात प्रस्तुत करती है-उनका परस्पर अन्तर स्पष्ट किया गया। साथ ही अलंकारवादियों की अलंकार सम्बन्धी मान्यता और परवर्ती आलंकारिकों द्वारा उसकी समीक्षा भी प्रस्तुत की गई।
अलंकारों का उद्भव और विकास
अलंकारवाद, उनकी मान्यताएँ, अलंकारस्वरूप-विषयक विवेक और समशील सौन्दर्यस्रोतों से अन्तर निरूपित करने के बाद सम्प्रति निसर्ग-प्राप्त अलंकारों का संख्यागत विकास तथा उन विकसित अलंकारों का साधार वर्गीकरण क्रम-प्राप्त है। उन्हीं बिन्दुओं पर यहां विचार किया जायेगा। परम्परा में अलंकार शब्द का प्रयोग “सौन्दर्य” और “सौन्दर्य-साधन” दो अर्थों में हुआ है। “सौन्दर्य-साधन” के रूप में भी अलंकार शब्द का व्यापक और सीमित उभयविधि अर्थों में प्रयोग हुआ है। वामन ने व्यापक अर्थ में दोषाभाव, गुण और अलंकार, इन तीनों के लिए अलंकार शब्द का प्रयोग किया है। यहां जिस अर्थ में “अलंकार” को लेकर उसके संख्यागत विकास और वर्गीकरण की बात की जायगी-वह सीमित अर्थ वाला सौन्दर्य साधनपरक अर्थ है। रूद्रदामन के द्वितीय शती के अभिलेख में कहा गया है कि गद्य’ और पद्य को अलंकृत’ होना चाहिए। नाट्यशास्त्र दृश्यकाव्य और अभिनय पर विचार करता है। फलतः वाचिक अभिनय के प्रसंग में उसने तीन अर्थालंकार और एक शब्दालंकार कुल चार अलंकारों-उपमा, रूपक, दीपक और यमक-की चर्चा की है। इन अर्थालंकारों में भी उपमा की चर्चा यास्क के निरुक्त और पाणिनि के अष्टाध्यायी सूत्रों में मिलती है। निरूक्त में “रूपक” का उल्लेख नहीं है। कदाचित वह लुप्तोपमा को ही रूपक समझते थे। वादरायण के वेदान्त सूत्र में स्पष्टतया उपमा और रूपक के नाम मिलते हैं। इसके बाद तीसरा अर्थालंकार अतिरिक्त रूप में नाट्यशास्त्र में मिलता है और वह है-दीपक। or * * १. स्फुटलघुमधुर-चित्रकान्तशब्दसमयोदारालङ्कृतगद्यपद्य-रुद्रदामन, शिलालेख नाट्यशास्त्र १६/४० ३. अथातः उपमा-निरुक्त ३/१३ अथातः उपमा-निरुक्त ३/१३ ५. लुप्तोपमानि अर्थोपमानि-इत्याचक्षते- निरूक्त ३/१८ ६. आनुमानिकमप्येकेषां शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः दर्शयति च-5. सू. १/४/१ ४७० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र नाट्यशास्त्र में वाचिक अभिनय-निरूपण के प्रसंग में जो काव्यचर्चा मिलती है उसमें चार सौन्दर्यस्रोतों या सामग्री को रसमय बनाने वाले उपकरणों का उल्लेख मिलता है और वे हैं-दोष (अभाव), गुण, लक्षण और अलंकार। आगे के उपलब्ध काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के साक्ष्य पर यह कहा जाता है कि अलंकारों के विकास में लक्षणों का बड़ा योगदान है। अभिनवभारती में अभिनवगुप्त ने कहा है कि उनके उपाध्याय भट्टतौत ने कहा है लक्षणबलादलङ्काराणां वैचित्र्यमागच्छति’-अर्थात् लक्षण के बल से अलंकारों में वैचित्र्य आता है। उदाहरण के लिए गुणानुवाद-नामक लक्षण के योग से उपमा का भेद “प्रशंसोपमा” हो गया है। अतिशय से अतिशयोक्ति, मनोरथ से अप्रस्तुत प्रशंसा, मिथ्याध्यवसाय से अपह्नुति, सिद्धि से तुल्ययोगिता-इसी प्रकार और भी समझना चाहिए। दण्डी तो स्पष्ट कहते हैं कि जो आगमान्तर (नाट्यशास्त्र) में संध्यंग, वृत्त्यंग और लक्षण आदि कहे गए हैं-वे सब उन्हें अलंकार (काव्यशोभाकर) रूप से ही इष्ट’ हैं। लक्षणों में अलंकारों के बीज हैं-इसलिए परवर्ती आलंकारिक उनका अलंकार में विलयन करते हैं। दण्डी के समय तक यह विलयन-विकल्पन का क्रम चल रहा था भामह भी इसी दौर के आचार्य हैं। अनेक लक्षणों में से जिन्हें दण्डी ने अलंकार रूप से स्वीकार किया है उन्हें पूर्ववर्ती भामह अस्वीकार करते हैं। इस तरह विकल्पन चल रहा था। भामह कहते हैं कि वह हेतु, सूक्ष्म और लेश को अलंकार नहीं मानते और दण्डी’ कहते हैं कि हेतु, सूक्ष्म और लेश वाणी के उत्तम भूषण हैं। जिन लक्षणों से ये अलंकार बन रहे हैं-उनका आविष्कार निरुक्त मीमांसा आदि वैदिक वाक्यों के विश्लेषण के संस्कार से सम्पन्न साहित्यशास्त्रियों ने किया होगा। इसकी चर्चा पीछे की जा चुकी है। नाट्यशास्त्र और भामह दण्डी के मध्य अलंकार विकल्पन की श्रृंखला को स्पष्ट करने में ‘भट्टि’ जैसे कवि और मेधावी जैसे आचार्य का नाम भी लिया जाता है। भामह के काव्यालंकार से ज्ञात होता है कि इनके पूर्व के आलंकारिकों ने भिन्न-भिन्न अलंकार-समूह बनाये थे। भामह ने उनके लक्षण बनाए। दण्डी भी कहते हैं कि वाणी के अनेक अलंकारों के विषय उन्होंने स्वयं अपनी बुद्धि से सोचा है और विस्तार से उनका आख्यान किया है। संक्षेप में कहने का अभिप्राय है कि अलंकारों के उद्भव और विकास की थोड़े में यही कहानी है-फिर तो आगे उसका पल्लवन और उपबृंहण होता ही रहा है। m १. नाट्यशास्त्र-अभिनवभारती, द्वि. भाग, पृष्ठ १२६८ वि. वि. प्रकाशन २. काव्यादर्श-२/३६७ पृ.२८० मेहरचन्द लछमनदास, दिल्ली ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान कात्स्नेन वक्ष्यति-काव्यादर्श २/१ ४. हेतुः सूक्ष्मोऽथ लेशश्च नालंकारतया मतः -भामह, काव्यालंकार २/८६ ५. हेतुः सूक्ष्मोऽथलेशश्च वाचामुत्तमभूषणम्-काव्यादर्श २/२३५ ६. स्वयकृतैरेव निदर्शनैरियं मया प्रक्लृप्ता खलु वागलंकृतिः - काव्यालंकार २/६६ अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४७१ २. २
अलंकार और उनका विकास
१. भरत - (ई.पू. दूसरी शती से द्वितीय शताब्दी के बीच) इन्होंने सप्रभेद उपमा, रूपक, दीपक तथा यमक - इन चार अलंकारों की प्रस्तुति की। ३ भामह और दण्डी के काल के विषय में आलोचकों में ऐकमत्य नहीं है। “कविराज मार्ग” की भूमिका में डा. पाठक का निष्कर्ष है कि भामह पूर्ववर्ती हैं। मि.टी. नरसिंह अयंगर का विचार इनके ठीक विपरीत है। मि. के.पी. त्रिवेदी ने “प्रतापरुद्रीय” की भूमिका में अपना विचार-पक्ष विपक्ष पूर्वक डा. पाठक के साथ सहमति में व्यक्त किया है। मि. पी. व्ही. काणे ने इन सबके मतों की समीक्षा की है। उन्होंने दोनों को ५०० से ६३० के बीच माना है। प्रो. डे ने दण्डी का समय सातवीं का अन्त और आठवीं शती का आरम्भ माना है और सम्भावना की है कि दण्डी को भामह का परिचय था। डा. याकोबी, प्रो. रंगाचार्य, श्री गणपति शास्त्री - इन सबने भामह को पूर्ववर्ती माना है। प्रो. पाठक ने बाद में अपना मत बदल दिया और दण्डी की पूर्ववर्तिता प्रतिपादित की। दण्डी पर काम करने वाले डा. जयशंकर त्रिपाठी ने काव्यादर्श का काल ३४० से ३५० ई. के बीच माना है। इस प्रकार दोनों के कार्यकाल के विषय में अनेक मत हैं। निष्कर्ष रूप में इतना ही कह सकता हूँ कि ये दोनों प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ वाले आचार्य हैं जो दो परम्पराओं के अनुवर्ती हैं। दण्डी के “काव्यादर्श” में भरत के चार अलंकारों के साथ स्वकल्पित तैंतीस अर्थात् कुल सैंतीस अलंकार हैं। इनके अतिरिक्त कतिपय चित्रालंकारों की भी चर्चा की है। भामह ने भरत द्वारा स्वीकृत ४, दण्डी द्वारा उपस्थापित ३३ में से अवृत्ति, चित्र, लेश, सूक्ष्म तथा हेतु- पांच को छोड़कर २८ और नए ६ अर्थात कुल १८ अलंकार माने हैं। उदभट (७५० ई. से ८००) न भामह और दण्डी द्वारा उद्भावित कतिपय अलंकारों (२. ७ = ६) को छोड़ दिया है - शेष को स्वीकार किया है। पांच अलंकार स्वोभावित हैं। इस प्रकार इन्होंने कुल ३६ अलंकार को मान्यता दी। इस समय तक स्वीकृत-अस्वीकृत अलंकारों की संख्या ४८ तक पहुंच गई है। ४. वामन (ई. ७५० से ५००) - ने क्रमागत १५ अलंकारों की चर्चा नहीं की है - क्रमागत २६ और स्वोदभावित २ कुल इकतीस अलंकारों का परिचय दिया है। इस भाँति आठवीं शती तक ४८ अलंकार अस्तित्व में आ चुके थे। ५. आनन्दवर्धन (८००-८५०) - जो ध्वनि प्रस्थान के प्रस्थापक आचार्य हैं, उन्होंने प्रसंगतः ३० अलंकारों की चर्चा की है जिनमें २० क्रमागत हैं और दो स्वकल्पित। परम्परागत ऐसे २० अलंकार हैं जिनकी चर्चा का कोई प्रसंग नहीं आया है। ६. रुद्रट (ई. ८०० से ८५०) - ने दण्डी के १३ भामह के चार और उद्भट के तीन ४७२
अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र वामन के दो तथा आनन्दवर्धन के दो को अमान्य घोषित किया है। क्रमागत अलंकारों में मान्यता २४ को दी है और उद्भावन ३१ का किया है। इस प्रकार उन्होंने कुल ५६ अलंकारों का उल्लेख किया है। अतः अब तक कुल ८३ अलंकार अस्तित्व में आ गए। भोजराज (१००० से १०५०) - ने अपने ‘सरस्वती कण्ठाभरण’ में पूर्ववर्ती छहों आचार्यों द्वारा निरूपित अलंकारों में से ३६ को अस्वीकार कर दिया है और स्वोद्भावित २६ अलंकारों के साथ क्रमागत ४४ अलंकार स्वीकार किए हैं। इस प्रकार ७३ अलंकारों का विवेचन इसमें प्राप्त है। यदि इनके द्वारा अस्वीकृत ३६ को परिगणित किया जाय तो अब तक अलंकारों की संख्या १११ तक पहुंच जाती है। मम्मट (१०५० - ११००) -ने क्रमागत ४७ अलंकार छोड़ दिए और ६४ स्वीकृत किए। तीन स्वोद्भावित - कुल सरसठ अलंकार यहां हैं। यदि अस्वीकृतों को लिया जाय तो संख्या ११४ तक पहुंच जाती है। ६. रूय्यक (११०० से ११५०) क्रमागत ४२ अमान्य, ७० मान्य और आठ स्वोद्भावित ८ - कुल संख्या १२० तक। १०. शोभाकार मिश्र (१२५० - १२८०) - क्रमागत ५४ अमान्य, ६४ मान्य, स्वोदभावित ३६, कुल संख्या अब तक १५७। ११. जयदेव (चन्द्रालोक लेखक) - क्रमागत अस्वीकृत ६१, स्वीकृत ६६, कल्पित १८ - अब तक कुल १७८। १२. विश्वनाथ महापात्र (साहित्यदर्पणकार) (ई. १३६०) - ६८ अमान्य, ८० मान्य कल्पित २ - कुल संख्या अब तक १८०। १३. अप्पयदीक्षित (१५८३-१६१३) अस्वीकृत ८२, स्वीकृत ६८ उद्भावित २१ - अब तक कुल संख्या २०११ १४. पण्डितराज जगन्नाथ (१६८०) इनके यहां (रसगङ्गाधर में) अचर्चित अलंकार हैं ६१, चर्चित ६६ तथा उदभावित कुल ७० अलंकारों की चर्चा की है। यहां तक आते-आते संख्या २०२ हो गई है। संस्कृत काव्यशास्त्र के ये प्रमुख आलंकारिक हैं। वैसे आगे भी विश्वेश्वर पण्डित, अच्युतराय तथा देवशंकर आदि आलंकारिक हुए हैं। यह परम्परा मध्यकालीन रीति कवियों में भी प्रवाहमान है। कतिपय नवीन भेद-प्रभेद वहाँ भी है - पर संस्कृत आचार्यों की विश्लेषण क्षमता और उद्भावनशक्ति क्षीण पड़ गई है।
क्रमागत अलंकार और उनका वर्गीकरण
वर्ग-वर्ग के रूप में विभाजन तो भामह से ही होता आ रहा है - पर उस प्रकार के वर्गीकरण से हमारा तात्पर्य यहां नहीं है। हमें तो अनेक विशेष अलंकारों के मूल में निहित कितने सामान्य रूप मिलते हैं - उन्हें खोज निकालना है। अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४७३ THIS
अलंकारों का वर्गीकरण और आधार
सबसे पहले अलंकारों का वर्गीकरण शब्दालंकार, अर्थालंकार तथा उभायालंकार के रूप में किया गया है। इस प्रसंग में भामह ने कुछ कारिकाएं लिखी हैं और मम्मट ने भी उद्धृत की हैं-जिनमें यह कहा गया है कि एक दल तो ऐसा है जो केवल शब्दालंकार को ही अलंकार मानता है औरदूसरा केवल अर्थालंकार को ही। केवल शब्दालंकार को ही अलंकार मानने वालों का तर्क यह है कि काव्य जब श्रुतिगोचर हाता है तब ये शब्दालंकार -श्रवणमधुर ही हैं, जो आकर्षण पैदा करते हैं। अर्थबोध बाद में होता है। उससे भावानुभूति हो जाती है। अर्थालंकारों का पता तो लक्षण का अनुसन्धान करने पर बाद में होता है - अतः वें बहिरंग हैं और बहिरंग होने के कारण उपेक्ष्य हैं या गौण हैं। केवल अर्थालंकार मानने वालों का पक्ष यह है कि काव्य में सर्वस्व है - रसानुभूति जिसके उपकरण हैं विभावादि रूप अर्थ या काव्यसामग्री। ये अर्थ रसानुभूतिगत उत्कर्ष लाने में अपने को जिन अलंकारों से सुन्दर बनाते हैं-वे हैं-अर्थालंकार। अतः रस में सीधा उपयोग अर्थालंकारों का ही होता है। फलतः उन्हें ही अलंकार कहा जाना चाहिए। इन दोनों के विपक्ष में भामह-मम्मट आदि दोनों को अलंकार मानने के पक्ष में हैं। रसानुभूति में परम्परया दोनों का ही योगदान है। त्रिविध अलंकारों के आधार __ सम्प्रति, यह देखना है कि अलंकारों का यह जो त्रिविध वर्गीकरण है-शब्दगत, अर्थगत और उभयगत - इसका मूल आधार क्या है ? इस आधार के सम्बन्ध में प्रायः दो प्रकार की सरणियाँ अपनाई गई हैं, (१) आश्रयाश्रयिभाव और (२) अन्वय-व्यतिरेकभाव। पहले के पक्षधर रूय्यक है। और दूसरे के मम्मट । पण्डितराज ने भी प्रसंग-विशेष में आश्रयाश्रयिभाव की पक्षधरता की है। मम्मट ने आश्रयायिभाव का खण्डन किया है। खण्डन करते हुए कहा है कि इन लोगों का आशय ठीक नहीं है। ये लोग मानते हैं कि शब्दाश्रित अलंकार शब्दगत और अर्थाश्रित अलंकार अर्थगत होते हैं। खण्डन करते हुए तर्क यह दिया गया है कि शब्द और अर्थ का ऐसा अभेद है कि वे काव्य में अकेले रह ही नहीं सकते। काव्यगत शब्द न तो अर्थ शून्य हो सकता है और न ही अर्थ शब्द-प्रमाण से भिन्न प्रमाण द्वारा प्राप्त होता है। निष्कर्ष यह कि काव्य में एक से निरपेक्ष दूसरा रहता ही नहीं। इस स्थिति में केवल शब्दगत अलंकार शब्दालंकार तथा केवल अर्थगत अलंकार अर्थालंकार होते हैं - यह सम्भव ही नहीं है। अतः मानना यह चाहिए कि दोनों (शब्द एवं अर्थ) के रहने पर भी उभयविध आश्रय की समान अपेक्षा रहने पर भी अलंकारोचित चमत्कार का सम्बन्ध जिससे हो - उसी के साथ उसका सम्बन्ध हो। जिस चमत्कार में उसी शब्द की अनिवार्यता हो - वह शब्दगत और जिस चमत्कार में उसी शब्द की न होकर .. .–
४७४ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र किसी भी पर्यायवाची शब्द से प्राप्त उसी अर्थ की ही अपेक्षा हो - वह अर्थालंकार कहा जाता है। एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जायगी। उदाहरण है - रावण सिर सरोज वनचारी। चलि दससीस सिली मुखधारी।। मानस यहाँ “शिलीमुख” में श्लेष अलंकार है - श्लेष अलंकार में चमत्कार पैदा करने की क्षमता है, पर यदि “शिलीमुख" का कोई पर्यायवाची शब्द रख दिया जाय - अर्थात मूल शब्द को हटा दिया जाय और उसी अर्थ का बोधक पर्यायवाची कोई दूसरा शब्द रख दिया जाय तो मूल चमत्कार नहीं रह जाता। निष्कर्ष यह कि अर्थ तो वह का वही भ्रमर या बाण शब्द रख देने पर बना रहेगा, पर वह सारा मूल चमत्कार बिगड़ जायेगा। इससे फल यह निकला कि इस अलंकार का सम्बन्ध उसी विशेष शब्द से है - न कि उसके ही पर्यायवाची अन्य रूपों से। इस प्रकार जब वही शब्द रहता है तब वही अलंकार निष्पन्न हो पाता है और जब वही शब्द नहीं रहता - तब न वैसा चमत्कार अनुभव में आता है और न ही उस अलंकार का स्वरूप बन पाता है। इस प्रकार जिसके होने (अन्वय) से जिसका न होना सम्भव हो - उसी से उसका सम्बन्ध मानना चाहिए। तात्पर्य यह कि जहाँ पर्याय रख देने पर भी मूल चमत्कार अर्थ-सापेक्ष होने के कारण बना रहे - वहाँ अर्थालंकार और जहां पर्याय रख देने पर (उसी खास शब्द से सम्बन्ध रखने के कारण) वह चमत्कार न कर सके - वहां शब्दालंकार। इस प्रकार शब्दालंकार और अर्थालंकार के निर्णय का आधार अन्वय-व्यतिरेक-भाव ही है न कि आश्रयाश्रयिभाव। (यत्र शब्दाः परिवृतिं न सहन्ते ते शब्दालंकाराः। यत्र च परिवृतिं सहन्ते ते अर्थालंकाराः) उभयालंकार - अलंकार का एक और वर्ग है - उभयालंकार। मान लें कि एक ऐसा प्रयोग है जहां दो अलंकारों का या अनेक अलंकारों का समकोटिक चमत्कार है तो व्यवहार, जो चमत्कार-सापेक्ष है- दोनों का होगा - उभय या उससे अधिक का होगा। “उभय” शब्द इस सन्दर्भ में दो से कम न होने का बोधक है। अधिक का हो तो कोई हानि नहीं। अनेक अलंकारों की सत्ता विद्यमान रहने पर भी यदि उनमें गौण-प्रधान भाव चमत्कार को लेकर है - तो व्यवहार एक ही का होगा - ऐसा आलंकारियों का सम्प्रदाय है। ऐसे स्थलों में अनेक अलंकारों की सत्ता के बावजूद जिस एक अलंकार का चमत्कार प्रधान होगा - उसी एक अलंकार का वहां व्यवहार होगा - न कि अनेक (उभय) का। अतः वहां उभयालंकार न होगा। परन्तु जहां समकोटिक या अनिर्णीत कोटिक चमत्कार हो रहा है - वहाँ उभयालंकार की स्थिति मानी जायगी। अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४७५ आलंकारिक लोग ऐसे चमत्कारी अनेक अलंकारों का समवस्थान दो दृष्टान्तों (न्यायों) से दिखाते हैं-(१) नीर-क्षीर-न्याय तथा तिल-तण्डुल-न्याय। यदि वे समकोटिक चमत्कार पैदा करने वाले अलंकार परस्पर सापेक्ष स्थिति वाले हों तो ‘नीर-क्षीर-न्याय’ का विषय समझा जाय। परस्पर मिला हुआ माना जाय और यदि वे एकाधिक (उभय) अलंकार अपनी सत्ता या स्थिति परस्पर-निरपेक्ष मानते हों तो ‘तिलतण्डुल-न्याय’ का सहारा समझा जाय।
अलंकार-सांकर्य और अलंकार-संसृष्टि
पहले स्थल को “संकर” नाम दिया गया है और दूसरे स्थल को संसृष्टि नामक अलंकार कहा जाता है। सांकर्य में अनेक अलंकार परस्पर सापेक्ष होते हैं-यह अपेक्षा तीन प्रकार की है। (१) पहला यह कि एकाधिक अलंकार एक ही आश्रय (शब्द) में रह सकते हैं-तब वे आश्रय-सापेक्ष हैं। (२) दूसरा यह कि यदि दो अलंकारों की सम्भावना बनती है पर किसी के पक्ष में निर्णायक आधार नहीं मिलता तब दोनों की सत्ता माननी पड़ती है। यह सन्देह-संकर है। (३) यदि दो अलंकार ऐसे हों जो परस्पर चमत्कार जनन में एक दूसरे की अपेक्षा करते हों और परस्पर निरपेक्ष न रह पाते हों-तब चूंकि दोनों- दोनों की सहायता मांगकर अपनी चामत्कारिक स्थिति बता रहे हैं- अतः उन्हें अंगागिभाव संकर कहा जा सकेगा। (२) संसृष्टि नामक उभयालंकार में समकोटिक चमत्कार उत्पन्न करने वाले अलंकार परस्पर निरपेक्ष अपनी स्थिति रखते हैं। इस प्रकार उभयालंकार के चार भेद होते हैं। सारणी यों हुई - अलंकार AARONARY शब्दालंकार अर्थालंकार उभयालंकार संकर संसृष्टि impioimme संदेह अंगांगिभावापन्न एक व्यंजकानुप्रवेश (एकाश्रयी) शब्दालंकार पृथुकार्तस्वरपात्रं भूषितनिःशेषपरिजनं देव। विलसत्करेणुगहनं संप्रति सममावयोः सदनम् ।।अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र ४७६ . यह श्लोक पद-श्लेष जैसे शब्दालंकार का उदाहरण है। राजा को सम्बोधित करता हुआ कवि कह रहा है कि उन दोनों के सदन की समान स्थिति है। उसका आन्तरिक आशय यह है कि राजा से धन लाभ के बाद भी कोई अन्तर नहीं आया। श्लोक में प्रयुक्त “संप्रति” पद से वह इसी तथ्य को रेखांकित करना चाहता है। दोनों के सदन “पृथकार्तस्वरपात्र” “भूषितनिःशेषपरिजन” तथा “विलसत्करेणुगहन” है। प्रत्येक विशेषण अनेकार्थक हैं जिससे श्लेष का चमत्कार समुद्भूत होता है। राजपक्षीय अर्थः-राजा के सदन में विपुल स्वर्ण पात्र हैं, सम्पूर्ण परिजन (तक) अलंकार मण्डित हैं और वह सदन मदमत्त उत्तम करिणियों से भरा हुआ है। कविपक्षीय अर्थः-भूखप्यास से बिलखते हुए बच्चों के आर्तस्वर से उसका घर भरा है। उसके घर के सभी सदस्य जमीन पर ही सोते हैं, साथ ही बिल बनाकर रहने वाले चूहों ने चारों तरफ धूल-माटी कर रखी है। __इस पद्य में प्रयुक्त सामासिक पदों का पर्याय (परिवर्तन) सम्भव नहीं है-अतः यह शब्दालंकार है। अर्थालंकार स्वप्नेऽपि समरेषुत्वां विजयश्रीनमुञ्चति। प्रभावप्रभवं कान्तं स्वाधीनपतिका यथा।। जिस प्रकार स्वाधीनपतिका नायिका प्रगाढ़ अनुरागी पति को कभी नहीं छोड़ती, उसी प्रकार समरस्थल में विजय-लक्ष्मी भी आपका परित्याग नहीं करती। यहाँ उपमा-नामक अर्थालंकार है। यहाँ मूल अर्थ की सुरक्षा अपेक्षित है-पर्याय रख भी दिए जायँ तो साम्यबोध से उत्पन्न होने वाले चमत्कार में कोई अंतर नहीं आएगा। संसृष्टि-नामक उभयालंकार - लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नमः। असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्विफलतां गता।। यहाँ प्रगाढ़ अन्धकार का वर्णन किया जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे प्रगाढ़ अन्धकार अंग-अंग पर गहरे लेप की तरह चढ़ गया है, लगता है जैसे आकाश से अंजन की वर्षा हो रही है। इस परिवेश में दृष्टि वैसे ही असमर्थ हो रही है जैसे असज्जन पुरुष की सेवा-पानी में चली जाती है। __ यहाँ स्पष्ट ही अनेक अलंकार हैं जो अपनी स्वतन्त्र चमत्कारकारी सत्ता रखते हैं। पूर्वार्ध में क्रियागत स्वरूपोत्प्रेक्षा है और उत्तरार्थ में उपमा अलंकार है। उपमानात्मक लेपन पद की साध्यवसाना लक्षणा से उपमेयात्मक व्यापन रूप अर्थ प्रतीत होता है। इसी प्रकार ४७७ अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा वर्षण से अद्यः-प्रसरण जैसे अर्थ की प्रतीति हो रही है। यहाँ समकोटिक चमत्कार पैदा करने वाले परस्पर निरपेक्ष दो अर्थालंकार संसृष्ट हैं। दोनों समग्र वक्तव्य को प्रभावी बना रहे हैं। ये एकाधिकार उभयालंकार कई रूपों में सम्भव हैं-(१) शब्द-शब्दगत, (२) शब्द-अर्थगत (३) अर्थ-अर्थगत। एकाधिक अलंकारों का यह संसर्ग एक वाक्य या एक छन्द में समवेत रूप से सम्भव है। संकर-(१) अङ्गाङ्भिाव संकर अनेक अलंकार यदि अनुग्राह्य-अनुग्राहक रूप से परस्पर सापेक्ष हों तो वहाँ यह भेद होता है। ऐसे स्थलों में एक अलंकार बिना दूसरे की सहायता के स्वतन्त्र सत्ता लाभ नहीं करता। एक उदाहरण लें आत्ते सीमान्तरले मरकतिनि हृते हेमताटङ्कपत्रे, लुप्तायां मेखलायां झटिति मणितुलाकोटियुग्मे गृहीते। शोणं बिम्बोष्ठकान्त्या त्वदरिमृगदृशामित्वरीणामरण्ये राजन गुञ्जाफलानां स्रजइति शबरा नैव हारं हरन्ति। “हे राजन् ! तुम्हारे भय से दुश्मनों की स्त्रियाँ जंगल में इधर-उधर घूमती हैं। इस संदर्भ में शबरगण शिरोभूषण छीन लेते हैं। मरकतमणि का बना हुआ कर्णाभरण लूट लेते हैं। मेखला भी ले लेते हैं। इतना ही नहीं मणिमय नूपुर-युगल भी निकाल लेते हैं। केवल एक आभूषण बच रहता है और वह है मुक्तामाला। उसका कारण यह है कि उन स्त्रिया की अधरोष्ठकान्ति से रंजित मुक्तामाला में गुंजाफल का भ्रम हो जाता है”। यहाँ विंबोष्ठ-कान्ति का गुण मुक्तामाला में संक्रान्त हुआ-फलतः तद्गुण अलंकार है। उस रक्ताभ मुक्तामाला मे गुंजाफल का भ्रम होता है-अतः भमन्तिमान। इस तरह तदगुण-नामक अलंकार की अपेक्षा से भान्तिमान अलंकार बन पाता है और तदगुण भी चमत्कारकारी भ्रान्तिमान् की अपेक्षा से बनता है। फलतः दोनों परस्पर सापेक्ष होकर ही आत्मलाभ तथा चमत्कारोत्पादन करते हैं। इसीलिए यहाँ दो अलंकारों का अंगागिभाव संकर है। (२) संदेह-संकर नयनानन्ददायीन्दोर्बिम्बमेतत्प्रसीदति। अधुनापि निरुद्धाशमविशीर्णमिदं तमः।। “नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाला यह चन्द्रबिंब प्रकट हो रहा है। फिर भी अभी दिशाएँ निरुद्ध हैं और अंधकार क्षीण नहीं हुआ है"। इस उक्ति में अनेक अलंकारों की स्थिति संदेहास्पद है। सम्भव है भङ्ग्यन्तर से वक्ता यह कहना चाहता हो कि यह काल ४७८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र कामोद्दीपक है। इसलिए पर्याय अलंकार का संदेह होता है। अथवा यह इंदुबिंब प्रकट हो रहा है-में “यह" शब्द सामने विद्यमान मुखबण्डल का परामर्शक हो और उसे ‘चन्द्रमण्डल’ कहा जा रहा हो। इस तरह संदेह रूपक का भी हो रहा है। यहाँ ‘दीपक’ अलंकार का भी संदेश हो सकता है, कारण कि ‘प्रसीदति’- इस क्रिया का अन्वय, प्रकृत (मुखमण्डल) तथा अप्रकृत (चंद्रमण्डल)- दोनों से ही रहा है। इसी प्रकार दोनों को प्रकृत या अप्रकृत-मान लें तो तुल्ययोगिता भी संभव है। विद्वानों ने अप्रस्तुतप्रशंसा तथा समासोक्ति का भी संदेह किया है। निष्कर्ष यह कि यहाँ निर्णायक प्रमाण के अभाव में यह निश्चित नहीं हो पा रहा है कि यहाँ उक्त अलंकारों में से किसकी निःसंदिग्ध स्थिति मानी जाय? (३) एकव्यंजकानुप्रवेश-संकर : __ एक ही वाक्य (पद) में यदि एकाधिक अलंकारों की स्थिति हो तो वहाँ यह भेद होता है स्पष्टोल्लसकिरणकेसरसूर्यबिंब विस्तीर्णकर्णिकमथो दिवसारविन्दम्। श्लिष्टाष्टदिग्दलकलाप मुखावतारं बद्धान्धकारमधुपावलि संचुकोच।। ‘तदनन्तर दिवसरूप अरबिंद संकुचित या निमीलित हो उठा। इस कमल में केसर है किरणें कर्णिका है-सूर्यबिंब। दिवसकमल में दल हैं- आठों दिशाएँ जो अंधकार के कारण अविभक्त और संश्लिष्ट प्रतीत होती हैं। यह अंधकार ही दिवस-कमल के अग्रभाग पर उतरती हुई भ्रमरावलि है। __इस उदाहरण में चार पद हैं जिनमें से तीन पदों में रूपक और अनुप्रास आत्मलाभ कर रहे हैं। प्रत्येक पाद एक आश्रय है और उसी में शब्दालंकार और अर्थालंकार- दोनों हैं। इस प्रकार ये दोनों एक दूसरे के सापेक्ष हैं। ऐसा नहीं है कि एक आश्रय में शब्दालंकार और अर्थालंकार ही रहते हैं- केवल एकाधिक शब्दालंकार भी रह सकते हैं। इस प्रकार संकर-नामक उभयालंकार के भेद तीन होते है। शब्दालंकारों और अर्थालंकारों के वर्गीकरण के आधार अलंकारों के शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार नामक भेद स्थिर करने के बाद आचार्यों ने शब्दालंकार और अर्थालंकार के भी विभिन्न आधारों का वर्गीकरण किए हैं। वर्ग-वर्ग के रूप में विभाजन तो भामह से ही होता आ रहा है, पर उस प्रकार के वर्गीकरण से हमारा तात्पर्य यहाँ नहीं है। हमें तो अनेक विशेष अलंकारों के मूल में निहित कितने सामान्य रूप मिलते है- उसे खोज निकालना है। SEENETar TENCE अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा ४७६ सबसे पहले तो अलंकारों का वर्गीकरण शब्दालंकार, अर्थालंकार एवं उभयालंकार के रूप में किया गया है। इस प्रसंग में भामह ने कुछ कारिकाएँ लिखी हैं और सम्मट ने उन्हें उद्धृत भी किया है। इनमें यह कहा गया है कि एक दल तो ऐसा है, जो केवल शब्दालंकार ही को अलंकार मानता है और दूसरा केवल अर्थालंकार को। केवल शब्दालंकार ही का अलंकार मानने वालों का तर्क यह है कि काव्य जब श्रुतिगोचर होता है, तब ये शब्दालंकार ही हैं, जो आकर्षण पैदा करते हैं। फिर अर्थबोध होता है और भावानुभूति हो जाती है। अर्थालंकारों का पता तो लक्ष्य का अनसंधान करने पर बाद को होता है, अतः वे बाहरग ह आर बहिरग होने के कारण उपेक्ष्य हैं। केवल अर्थालंकार मानने वालों का यह पक्ष है कि रस के उपकरण हैं। विभावादि रूप अर्थ और वे अर्थ रसानुभूतिगत उत्कर्ष लाने में अपने को जिन अलंकारों से सुन्दर बनाते हैं, वे हैं- अर्थालंकार । अतः रस में सीधा उपयोग अर्थालंकारों का ही है, फलतः उन्हें ही अलंकार कहना चाहिए, पर मम्मट आदि आचाया ने दोनों को परम्परया रसानुभूति में योग देने से अलंकार मानना चाहा है। __ अब यह देखना आवश्यक है कि शब्दगत, अर्थगत एवं उभयगत अलंकारों के वर्गीकरण का मूल आधार क्या है? इस विषय पर प्रायः दो आधार उपस्थित किय जात ह आश्रयायिभावं एवं अन्वयव्यतिरेक। मम्मट ने आश्रयाश्रयिभाव को मूल आधार मानन वालों का खण्डन किया है अर्थात उन लोगों का खण्डन किया है, जो लोग यह मानते है कि शब्दाश्रित अलंकार शब्द गत एवं अर्थाश्रित अलंकार अर्थगत है। खण्डन म तक ५९ दिया हैं कि शब्द एवं अर्थ का ऐसा अभेद है कि वे काव्य में अकेले रह ही नहीं सकत। काव्यगत शब्द न तो अर्थ-शून्य हो सकता है और न वहाँ बिना शब्द के अर्थोपलब्धि हो सकती है। इस स्थिति में केवल शब्दगत अलंकार शब्दालंकार एवं केवल अर्थगत अलंकार अर्थालंकार यह कहने की कोई सार्थकता नहीं है। अतः मानना यही चाहिए कि दाना (शब्द एवं अर्थ) के रहने पर भी जिसके साथ किसी विशेष अलंकारजनित चमत्कार का नियत संबंध हो, उसी के साथ उस अलंकार का सम्बन्ध बनाना चाहिए। अलंकारों के मूलाधार का निर्देश तो भामह ने ही कर दिया था और कहा था कि ‘वक्रोक्ति’ सभी अलंकारों का मूल है’। दण्डी ने वक्रोक्ति की जगह अतिशयोक्ति का प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने सभी प्रकार की वक्रोक्तियों में प्रायः श्लेष का सम्पर्क भी स्वीकार किया है। वामन के अधिकतर सादृश्य मुलक अलंकारों की ही चर्चा की, अतः उनका आधार यदि उपमा कहा, तो ठीक ही है।
रूद्रट कृत वर्गीकरण
सबसे पहले अधिकाधिक अलंकारों के एकाधिक सामान्य (विभाजक) आधारों की चर्चा रुद्रट ने की। उन्होंने समस्त अलंकारों को चार भागों में विभक्त किया १. वास्तवमूलक, २. औपम्यमूलक, ३. श्लेषमूलक एवं ४. अतिशयमूलक। A mhrt-..- .– कामा १. ‘सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयाऽर्थो विभाव्यते।। यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलकारोऽनया विना। (भामह काव्यालंकार पद्य ८५) " "" का " . .
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..- . . ४८० अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र १. वास्तवमूलक-वस्तु-स्वरूप कथन ही वास्तव है। पर वह कथन पुष्टार्थक हो’ विपरीत न हो, निरुपम हो, अतिशय एवं श्लेष से शून्य हो। इन संकोचक विशेषताओं में से प्रथम दो का ही महत्व अधिक है। उपमा, अतिशय एवं श्लेष को वास्तव से भिन्न कहा ही गया है। उनको फिर से यहाँ कहने का कोई अर्थ नहीं। इस वर्ग में सहोक्ति, परिवृत्ति, परिसंख्या, हेतु, कारणमाला, व्यतिरेक, अन्योन्य, उत्तर, सार, लेश अवसर, मीलित एवं एकावली-ये २३ भेद हैं। २. औपम्यमूलक-जहाँ वक्ता प्रस्तुत के स्वरूप का सम्यक् प्रतिपादन करने के लिए उसी के समान अप्रस्तुत का कथन करे, वहाँ औपम्य होता है। इस वर्ग में उपमा, उत्प्रेक्षा आदि २१ अलंकार आते है। ३. अतिशयमूलक-जहाँ अर्थ एवं धर्म का नियत स्वरूप लोक सामान्य स्वभाव का अतिक्रमण करता हुआ प्रसिद्ध के विरूद्ध विपरीत हो जाय, वहाँ अतिशय होता है। इस वर्ग में पूर्व, विशेष अतिशयोक्ति आदि १२ अलंकार होते हैं। ४. श्लेषमूलक-जहाँ एक ही वाक्य से अनेक अर्थ का निश्चय हो, वहाँ अर्थश्लेष होता है। इस वर्ग में अविशेष एवं विरोध आदि १० भेद होते हैं। __ प्रस्तुत वर्गीकरण बहुत प्रशस्त और विचारित तथा ग्राहय नहीं है। पहला कारण इसमें यह है कि एक वर्ग में जो अलंकार (उत्प्रेक्षा, विरोध आदि) आता है, वही दूसरे में भी आ जाता है। उदाहरण के लिए उत्प्रेक्षा एवं विरोध को ही ले लें, वह ‘औपम्य-मूलक’ में तो है ही, ‘अतिशय मूलक’ में आता है। यद्यपि यह कहा जा सकता है कि दोनों के लक्षणों में शब्दावली का भेद है और उदाहरण भी भिन्न है, तथापि केवल शब्दावली ही भिन्न जान पड़ती है, वस्तुतः दोनों उदाहरणों के चमत्कार में भेद लक्षित नहीं होता। विच्छित्ति अथवा चमत्कार में भेद न होने पर अलंकार में भेद मानना असंगत है। दूसरा कारण यह भी है कि वास्तव तथा अतिशय इतने व्यापक आधार है कि उनके प्रसार में औपम्य एवं श्लेष बाधा डालते हुए दिखाई पड़ते हैं। __ रूद्रट ने अनंतर रूय्यक ने पुनः अपने ढंग से अलंकारों का वर्गीकरण करना चाहा है और उनका वर्गीकरण इस प्रकार है १. औपम्यमूलक, २. विरोधमूलक, ३. श्रृंखलामूलक, ४. तर्कन्यायमूलक, ५. लोकन्यायमूलक, ६. वाक्यन्यायमूलक, ७. गूढार्थप्रतीतिमूलक और ८. सांकर्यमूलक। रूय्यक के इन आठ भेदों पर ध्यान न देकर डॉ. नगेन्द्र ने रीति काव्य की ‘भूमिका’ में लोकन्याय, वाक्य-न्याय तथा तर्क-न्याय के स्थान पर केवल ‘न्याय’ का उल्लेख किया है और इस विभाजन को विद्याधर एवं विश्वनाथ की देन माना है। १. काव्यालंकार, सप्तम अध्याय नवम श्लोक पृ० १६६ वासुदेव प्रकाशन, दिल्ली १६६५ ई. २. विद्याधर ने ‘एकावल’ के अष्टम उन्मेष में अर्थालंकारों के सात वर्ग किए हैं-सादृश्य, विरोध, श्रृंखला, तर्कन्याय, वाक्यन्याय, लोकन्याय तथा गूढार्थ प्रतीति से गर्मित. LIKE RER HTRA ४८१ अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा विद्याधर ने इन भेदों का उल्लेख अवश्य किया है और विश्वनाथ ने भी, पर रूय्यक ने नहीं किया है, सो बात नहीं। इसी प्रकार डॉ. जगदीश नारायण त्रिपाठी ने भी ‘आधुनिक हिन्दी कविता में अलंकार विधान’ शीर्षक प्रबंध में रूय्यक के विभाजित रूपों के अवान्तर वर्गीकरण को छोड़कर केवल ‘न्याय’ का ही उल्लेख किया है- ‘संकर’ का वह भी नहीं। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने अपने ‘वाङ्मय विमर्श’ में वाक्यन्याय, लोकन्याय तथा तर्कन्याय का उल्लेख रूय्यक के ही नाम पर किया है। ‘संकर’ को अवश्य अनुल्लेखनीय समझकर छोड़ दिया है। किन्तु इस विवेचन में उनकी यह बहुत बड़ी देन है कि रूय्यक के वर्गीकरण की व्याख्या बड़ी ही स्पष्टता से विभिन्न अलंकारों में घटाते हुए की है। व्याख्या ही नहीं, उन स्थलों पर तो उन्होंने नवीन चमत्कार भी प्रस्तुत किया है अर्थात् सादृश्यमूलक अलंकारों में यह दिखाया है कि किस प्रकार कभी-कभी उपमान की प्रधानता बढ़ते-बढ़ते उपमेय को ‘अतिशयोक्ति’ में निगीर्ण कर जाती है और दूसरी ओर उपमेय की प्रधानता बढ़ते-बढ़ते ‘अनन्वय’ की स्थिति में उपमेय ही उपमान हो जाता है। आचार्य मिश्र ने अन्य वर्गों के भी स्वरूप को स्पष्ट करते हुए प्रायः प्रत्येक वर्गीय अलंकार की स्थिति स्पष्ट की है। ऐसा निरूपण वही प्रस्तुत कर सकता है जिसने अलंकारों के स्वरूप को पर्याप्त हृदयङ्गम कर लिया हो। इतना तो स्पष्ट ही है कि अन्य आचायो द्वारा विवेचित वर्गीकरण की अपेक्षा रूय्यक के इस वर्गीकरण को अधिक मान्यता दी गयी और उसका विवेचन और उल्लेख भी ज्यादा हुआ। रूय्यक के अनन्तर प्रतापरूद्रीयकार विद्यानाथ ने अलंकारों के मूल आधारों की चर्चा करते हुए यह कहा कि केचित्प्रतीयमानवस्तवः केचित्प्रतीयमानौपम्याः। केचित्प्रतीयमानरसभावादयः केचित्स्फुटप्रतीयमानाः।।’ अर्थात १. कुछ प्रतीयमान वस्तुमूलक, २. कुछ प्रतीयमान औपम्यमूलक, ३. कुछ प्रतीयमान रसभावादिमूलक तथा ४. कुछ स्फुट प्रतीयमानमूलक हैं। पहले वर्ग में समासाक्ति तथा आक्षेप आदि, दूसरे वर्ग में रूपक एवं उत्प्रेक्षा आदि तीसरे में रसवत् प्रेय, ऊर्जस्वी आदि और चौथे में उपमा, अर्थान्तर-न्यास आदि अलंकारों का समावेश किया जाता है। इनके वर्गीकरण में यह बात मान ली गई है कि प्रत्येक अलंकार के मूल में व्यंग्य या प्रतीयमान अर्थ रहता ही है और वह चार प्रकार का हो सकता है-१. वस्तुरूप, २. औपम्यरूप, ३. स्फुट रस भाव आदि तथा ४. अस्फुट प्रतीयमान। इसे यों भी कहा जा सकता है कि अलंकार के मूल में रहने वाला प्रतीयमान अर्थ दो प्रकार का होता है-१. स्फुट
१. प्रतापख्द्रीय-पृ० २४५ शब्दालंकार प्रकरण बाल मनोरमा सिरीज १६१४ Madi
४८२ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र तथा अस्फुट। और स्फुट के भी तीन भेद हैं-१. वस्तु, २. औपम्य एवं ३. रस-भाव। ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धन ने भी वह स्थापना दी है कि अलंकार मात्र के मूल में एक अर्थ प्रतीयमान रहता है। पण्डितराज जगन्नाथ का भी यह कहना है कि प्रतीयमान से असंस्पृष्ट रहकर कोई भी अर्थ चमत्कारी नहीं हो सकता। यहाँ तक कि समस्त ध्वनिवादी इस तत्त्व को स्वीकार करते हैं। यद्यपि काव्य-प्रकाशकार मम्मट ने यह कह दिया था कि अवर काव्य या चित्र-काव्य (शब्दार्थालंकारपरक काव्य) अव्यंग्य या व्यंग्यहीन होता है। पर बाद में उस अव्यंग्यता के अर्थ को व्यंग्य के अभाव से संबद्ध नहीं किया है, वरन् व्यंग्य का अभाव नहीं- प्रतीयमान का अभाव नहीं, प्रत्युत उसकी नगण्यता ही है। … ध्वन्यालोककार ने ‘अतिशय’ को सर्वत्र व्यंग्य माना है, उसी प्रसंग में यह भी बताया है कि कहीं औपम्य, प्रतीयमान होता-कहीं स्वतन्त्र वस्तु प्रतीयमान रहती है। कहीं-कहीं नियमतः कोई अलंकार ही व्यङ्गय रहता है जैसे-व्याजस्तुति में प्रेयोलंकार। उपमा एवं दीपक परस्पर एक-दूसरे के गर्भ में रहते हैं। विद्यानाथ के वर्गीकरण पर ध्वनिवाद की इस दृष्टि का प्रभाव अधिक लक्षित होता है। आगे चलकर विद्यानाथ ने अर्थालंकारों को नव भागों में विभक्त किया है १. साधर्म्यमूल, २. अध्यवसायमूल, ३. विरोधमूल, ४. वाक्यन्यायमूल, ५. लोकन्यवहारमूल, ६. तर्कन्यायमूल, ७. श्रृंखलावैचित्र्यमूल, ८. अपनवमूल तथा ६. विशेषणमूल । इस प्रकार विद्यानाथ के इन द्विविध विभाजनों में से यदि प्रथम पर ध्यन्यालोककार का प्रभाव है तो दूसरे पर कुछ नवीनता के साथ ‘अलंकारसर्वस्वकार’ का प्रभाव स्पष्ट है।
विद्यानाथ (एकावलीकार) की विशेषता
‘एकावली’ प्रणेता विद्याधर ने कुछ ऐसे संकेत अवश्य दिये हैं, जिनसे पता चलता है कि वर्गीकरण के लिये अपेक्षित विभिन्न आधारों की चर्चा उन्होंने भी कुछ की है। उनके अधारों की संख्या अब तक के आविष्कृत आधारों की संख्या से कहीं ज्यादा है। वे क्रमशः यों हैं-१. भेदाभेद-प्रधान, २. भेद-प्रधान, ३. अभेद-प्रधान, ४. अवयवसायाश्रय, ५. गम्योपगम्याश्रय, ६. वाक्यार्थगत, ७. विशेषणविच्छित्त्याश्रय, ८. उभय विच्छित्याश्रय, ६. विशेष्य विच्छतयाश्रय, १०. सामान्य विशेषभाव, ११. प्रतीयमान-प्रस्ताव, १२. गम्यत्वविच्छि, १३. विशेषगम्यत्व, १४. विरोधगर्भ, १५. श्रृंखलाकार, १६. तर्कन्यायमूल, १७. न्यायमूल, १८. एकानेक-वाक्यन्याय, १६. लोकन्यायाश्रय, २०. गूढार्थप्रतीति, २१. अन्योन्याश्लेष इत्यादि। इनमें से कितने आधार तो इस प्रकार के हैं कि उनके एक-एक आधार है। बाद के आलंकारिकों तक भी इन आधारों का उल्लेख होता रहा पर स्वर मंद पड़ता गया। यों तो पण्डितराज जगन्नाथ ने भी यत्र-तत्र साश्यगर्भ अलंकारों के भेद-प्रधान, अभेद-प्रधान, भेदाभेद-प्रधान भेदों का निर्देश किया है। शृंखलामूलक एवं विरोधमूलक
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L ATES ४८३ अलंकार-मत, उसकी मान्यताएँ तथा अलंकारवादी-आचार्य-परम्परा अलंकारों की भी चर्चा की है, पर वह मुखरता परवर्ती संस्कृत के आलंकारिकों में लक्षित नहीं होती। संस्कृत के परवर्ती आचार्यों ने इस पक्ष (वर्गीकरण) पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। सादृश्य, विरोध, श्रृंखला आदि कतिपय आधारों की चर्चा स्वयं पण्डित राज जगन्नाथ ने की है, पर ज्यादा दूर तक नहीं बढ़े। वस्तुतः यदि वर्गीकरण करना ही है, तो कुछ परिगणित अलंकारों को ध्यान में रखकर वर्गीकरण करने की अपेक्षा कुछ मूलभूत सिद्धान्तों के आधार पर वह किया जाय, तो वह कुछ दूर तक सम्भव और उपयुक्त हो सकता है। उदाहरणार्थ ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धन का प्रयास ले लें और आचार्य शुक्ल को ले लें। कुछ अलंकार रस या भाव का उत्कर्ष करने के लिये जाते हैं। कुछ (नीरस-स्थल में) वक्तव्य वस्तु का (सौन्दर्यानुरूप) स्वरूप बोध करने के लिये आते हैं और कुछ अलंकार चमत्कार मात्र पैदा करने के लिये प्रयुक्त होते हैं। अर्थालंकारों का स्वरूपबोध तथा भावोत्कर्ष से अधिक संबंध है- जैसा कि शुक्लजी ने भी कहा है। शब्दालंकारों में कुछ दूर तक अनुप्रास को छोड़कर शेष सभी एक बौद्धिक चमत्कार मात्र क्षणभर के लिए पैदा करते हैं। ध्वन्यालोककार के व्यापक सिद्धान्त की भी चर्चा की जा चुकी है। इससे ज्यादा इस विषय में यहाँ कहना नहीं चाहता। मेरा विचार तो इस वर्गीकरण के संबंध में यह है कि जग आचार्यों ने वाग्विकल्प का आनंत्य माना है अर्थात् अलंकारों की काई सीमा नहीं मानी और इस तरह जब तक जिनका वर्गीकरण करना है- वे ही पूरी तरह से मस्तिष्क में नहीं आते- तो उनके वर्गीकरण की एक सनिश्चित रूप-रेखा किस प्रकार तैयार की जा सकती है? कदाचित इसालिय कतिपय साहित्य के धुरंधर आचार्यों ने भी इस ओर दृष्टिपात नहीं किया। इस प्रकार अलंकार प्रस्थान से सम्मत प्रायः प्रत्येक पक्ष पर विचार किया जा चुका। यों समान आधार पर वर्गीकृत अलंकारों का पारस्परिक अन्तर भी स्पष्ट किया ना सकता है किन्तु विस्तार भय से विराम ही उचित प्रतीत होता है। (वर्गीकरण के संदर्भ में डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी की ‘अलंकारमीमांसा’ (तृतीस अध्याय) भी देखी जा सकती है. मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली १६६५)