०६ आचार्य वामन

काल निर्धारण

वामन का काल निर्धारण करते समय उन लोगों का ध्यान रखना पड़ता है जिनको वामन ने अपनी ‘काव्यालंकारसूत्रवृत्ति’ में उद्धृत किया है। उन परवर्ती आचार्यों को भी ध्यान में रखना पड़ता है जिन्होंने वामन का नाम लिया है अथवा उनकी चर्चा साक्षात् १. राजतरंगिणी ११/.१४४ मालतीमाधव पर भंडारकार की भूमिका पृ. जे.बी.आर.ए.एस. २३, पृ. ६२ एस बी. पंडित की गौडवहो पर भूमिका पृ. १६ डब्ल्यू.जेड.के.एम. २-३३२ चन्द्रगुप्त के एक मंत्री सुबंधु को, ३-२,२ पर वृत्ति के अन्तर्गत एक उदाहरण से संबंद्ध एक तर्क में निर्दिष्ट किया गया है। सुबंधु अथवा वसुबंधु के संरक्षक (भूपति) की अभिन्नता का विषय बहुत विवादास्पद रहा है (देखिए इंडियन एंटिक्वेरी ४, १६११ पृ.१७०, ३१२, १६१२ पृ. १.१५, इंडियन हिस्टारिकल कार्टली। पृ. २६१) बी. राघवन् (इंडियन हिस्टारिकल कार्टली २१, १६४३, पृ. ७०,७२) ने भी माना है कि वामन ने प्रसिद्ध गद्यकथाकार ‘वासवदत्ता’ के लेखक सुबंधु को निर्दिष्ट भी किया है, वामन का निर्देश तो चंद्रगुप्तमौर्य और बिंदुसार के मंत्री सुबंधु की ओर है। अभिनवगुप्त ने महाकवि सुबंधु को ‘वासवदत्ता- नाट्यधारा’ नामक नाटक का लेखककहा है। नाट्यधारा- शब्द से विदित होता है कि क्रमानुसार अंक के अन्दर अंक देकर इस नाटक की पूर्ति की गई थी। भट्रिट से वामन तक १२५ " “-

"” ' . ' ' Drepghapa असाक्षात् रूप में की है। इसकी तिथि की ऊपरी सीमा भवभूति का काल है। कारण, इन्होंने अपने ग्रन्थ में उत्तररामचरित (१-३८) तथा महावीरचित (१-५४) से उद्धरण दिए हैं। भवभूति कन्नौज के राजा यशोवर्मा के संरक्षण में स्वीं शताब्दी के प्रथम चरण में हुए हैं। उनकी तिथि की निचली सीमा राजशेखर द्वारा वामन १,२.१-३ से लिए गए उद्धरण (पृ. १४) से और वामनीयों के निर्देश से प्राप्त होती है। राजशेखर के इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि नवीं शती के अन्त तक वामन के अनुयायियों की संख्या बहुत बढ़ गई थी। अभिनवगुप्त’ के उल्लेखों (लोचन पृ. २७) से यह भी स्पष्ट होता है कि आनन्दवर्धन वामन से परिचित थे। यद्यपि आनन्दवर्धन ने परिचय की ऐसी स्पष्ट चर्चा नहीं की है- पर उनकी मान्यताओं का वृत्तिग्रंथ (३-५२) में विवरण आया है। वामन भी भामह, दंडी और उद्भट की भाँति आनन्दवर्धन के ध्वनि सिद्धान्त से अपरिचित थे। प्रतीहारेन्दुराज वामन के विचारों में पक्की आस्था रखते थे-उन्होंने अलंकार ध्वनि की चर्चा करते हुए स्पष्ट कहा कि वामन ऐसे संदर्भो में वक्रोक्ति की स्थिति मानते हैं (४.३.८)। इस स्थिति में यदि वामन का समय नवम शती का मध्य निर्धारित किया जाय-तो कोई असंगति नहीं होगी। उक्त तथ्यों के साक्ष्य पर यह स्पष्ट होता है कि वामन आठवीं शती के मध्य और ६वीं शती के मध्य के अन्तराल में अर्थात् ८०० ई. के आसपास हुए। कल्हण १/४६७ और ‘कश्मीरी पंडितों की परम्परा’ का आदर करते हुए हमारे वामन और कश्मीरनरेश जयापीड़ (७७६-६१३) के मंत्री वामन में बुड्लर द्वारा प्रतिपादित अभिन्नता को मानना पड़ेगा। इस निष्कर्ष से उद्भट और वामन समकालीन और प्रतिस्पर्धी सिद्ध होते हैं। राजशेखर, हेमचंद्र और जयद्रथ ने जिस प्रकार वामनीय और औद्भटीय प्रतिस्पर्धी मतों का उल्लेख किया है-उससे भी इस अनुमान की पुष्टि होती है। वामन के कालनिर्धारण में पी.बी. काणे का लेख (जे.बी.बी.आर.ए.एस. वाल्यूम २३-१६०६ पृ.६१) द्रष्टव्य है। राजशेखर ने, जैसा कि उपर कहा गया है- (पृ.१४ और २०) पर वामन सम्प्रदाय का उल्लेख किया है। राजशेखर दसवीं शती के पूर्वार्ध में हुए हैं। प्रतिहारेन्दुराज प्रायः वामन को उद्धृत करते रहते हैं। यही स्थिति लोचनकार की भी हैं (पृ.८,१०,१८०)। ‘अभिनवभारती’ भी वामन को उद्धृत करती है (वाल्यूम १, पृ. २८८) इन बातों से भी स्पष्ट है कि वामन ६००ई. से पूर्व हुए। इसके साथ एक और बात। ध्वन्यालोक में एक उदाहरण है १. लोचन में वामन के उद्धरण, पृ.८, १० तथा १८० पर मिलते हैं। इनके अतिरिक्त अभिनवभारती खंड पृ.२८८ (वामन १-३, ३०-३१) पर वामन ने (११/३.१०) उभौ यदि व्योम्नि माघ = ३-८ का उद्धरण दिया है। इसके अतिरिक्त वामन ४, २.६ माघ १-२५ ‘यो भर्तृपिण्डस्य’ जिसे ४ई२-२८ में व्याकरण के भार अशुद्ध कहा गया है ‘प्रतिज्ञायौगंधरायण, ११/ .३ में मिलता है और ११/ ३-३५ में उल्लिखित पद्य ‘शरच्छशांकगौरेण’ स्वप्नवासवदत्ता।। में मिलता है। thmandu१२६ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र अनुरागवती सन्ध्या दिवसस्तत्पुस्सरः। अहो दैवगतिश्चित्रा तथापि न समागमः।। लोचनकार कहता है ‘वामनाभिप्रायेणायमाक्षेपः भामहाभिप्रायेण तु समासोक्तिरित्यमुमाशयं हृदये गृहीत्वा समासोक्तयाक्षेपयोरिदमेवोदाहरणं व्यतरद्गंथकृत्। फलतः ‘लोचन’ कार के अनुसार वामन ध्वन्यालोककार के पहले हुए। ध्वन्यालोक का निर्माणकाल नवमशतक का उत्तरार्ध है। इसलिए भी उक्त निष्कर्ष की पुष्टि होती है कि वामन ८५० ई. से पहले हुए। ध्वन्यालोक की निम्नलिखित कारिका भी संभवतः वामन की ही ओर संकेत करती है अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद्यथोदितम्। अशक्नुवद्भिव्याकर्तुं रीतयः संप्रवर्तिताः।। (३रु५२) ऊपर भवभूति की बात आई ही है कि वामन ने ‘इयंगेहे लक्ष्मीः’ (उत्तररामचरित) को रूपक के उदाहरण में और ‘यक्ष्मालीपिङ्गलाभिः’ (मालतीमाधव) को भी प्रसंगतः उद्धृत किया है (१.२.१८)। ऊपर कहा गया है कि भवभूति का समय ७०० से ७४० के बीच. है। इसलिए वामन का काल ७५०ई. के बाद ही होगा। राजतरंगिणीकार का साक्ष्य दिया ही जा चुका है कि वह वामन को जयापीड का मंत्री कहता है मनोरथः शङ्खदत्तश्चटकः सन्धिमांस्तथा। बभूवुः कवयस्तस्य वामनाद्याश्च मंत्रिणः ।। (१/४६७) कश्मीरी पंडितों में यह प्रचलित भी है कि जयापीड़ का मंत्री ही ‘काव्यालंकारसूत्रवृत्तिकार’ था। यदि यह परम्परा मान ली जाती है तो यह भी मानना पड़ेगा कि वह ८०० ई. के आसपास हुआ होगा। यह उद्भट का समसामयिक और प्रतिस्पर्धी भी रहा होगा। यह ध्यान देने की बात है कि ये दोनों एक दूसरे का उल्लेख नहीं करते। उक्त कालनिर्धाण को और तरह से भी पुष्ट किया जा सकता हैं वामन ने माघ के ‘शिशुपालवध’ से कुछ उद्धरण दिए है ‘उभौ यदि (माघ ३.८/११/३ पर) ‘सितं सितिम्ना (माघ १-२५ १/२.६ पर) और ‘न पादादौ खल्वादयः (१.१.५) सूत्र में खलूक्त्वा खलु वाचिकम् (माघ २-७०) का संदर्भ दिया है। माघ ने ‘अनुत्सूत्रपदन्यासा सवृत्तिः सन्निबन्धना (२-११२) इस श्लोक में न्यास, वृत्ति और महाभाष्य का उल्लेख किया है। ‘न्यास’ का समय ७००ई. से पहले का नहीं है- इस साक्ष्य पर इतिहासविदों ने पर्याप्त विचार किया है। माघ का काल ७२५-७७५ के लगभग माना जा सकता है। ६६०ई. में लिखित ‘काशिका’ के प्रणेता बामन से इस वामन को एक नहीं किया जा सकता। यह बात भी ध्यान रखने की है कि वामन की भी वही दृष्टि है जो काशिकाकार ने कतिपय व्याकरणिक बिन्दुओं पर रखी है। उदाहरण के लिए ‘ब्रह्मादिषु हन्तेर्नियमादरिहाद्यसिद्धिः’ (काव्य सू. ५:२-३५) सूत्र पर वामन कहता है भट्टि से वामन तक १२७ ‘ब्रह्मादिष्वेव हन्तेरेव, क्विबेव, भूतकाल एवेति चतुविर्धश्चात्र नियमः। इसी प्रकार ठीक वहीं बात ‘काशिका’- ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु (पा.३.२.२७) पर कही है जबकि महाभाष्यकार द्विविध नियम की ही बात करता है। वामन अपने ‘सुदत्यादयः प्रतिविधेयाः (काव्या. सू.वृ. ५.२. ६७) सूत्र के ‘सुदती’ शब्द की द्विधा व्याख्या करते हैं। इसमें से दूसरी व्याख्या ‘काशिका’ का मत जान पड़ती है। इसके संदर्भ में ‘स्त्रियाँ संज्ञायाम्’ (पा. १/४.१४३) को देखा जा सकता है। श्री एम. कृष्णाचारी का पक्ष है कि वामन पहले कश्मीर में जयापीड़ का राजकवि था, पर बाद में गोविन्द तृतीय नाम से प्रख्यात राष्ट्रकूट राजा जगत्तुंग के यहाँ चला गया। इसका समय है- ७६४ से ८१३ ई.। लिंगानुशासन की नवीं कारिका में आए हुए ‘राजार्थ’ शब्द पर टिप्पणी करते हुए वामन ने जगत्तुंग सभा का उल्लेख किया है। इतना ही नहीं वामन ने श्रीभावन नाम के एक ग्राम का भी उल्लेख किया है। इसका ई. ११, १६२ में उल्लेख है (देखिए वाणी डिण्डोरी तथा राधापुर प्लेट्स)। यह ग्राम उसे वर्षाऋतु के दिन सेना के साथ बिताने के लिए दिया गया था। वामन जगत्तुंग की राजसभा का सदस्य था। मंगल श्लोकों से लगता है कि वह बौद्ध और जैन धर्म का पक्षधर था। मंगलश्लोक इस प्रकार हैं-कैलेपर की मान्यता कुछ भिन्न है। उसकी थीसिस है वामनाज सेलीगेन-उसके पृ. ३ तथा उसी संस्करण की भूमिका पृ. ७ पर उसने यह मान्यता दी है कि वामन का समय १०००ई. के पश्चात् निर्धारित होना चाहिए परन्तु उक्त तर्को के आधार पर मान्यता कथमपि ग्राह्य नहीं है। पिशेल के भी अनुसार कविराज के उल्लेख मात्र से वामन को १००० ई. में निर्धारित करना ठीक नहीं।।

काव्यालङ्कार सूत्र वृत्ति

वामन ने सूत्र भी लिखे हैं और स्वोपज्ञवृत्ति भी। यह सोदाहरण वृत्तिकविप्रिया-वामन की स्वयं की लिखी हुई है। इसमें प्रमाण परवर्ती लेखक हैं- विशेषकर वे जो दोनों को वामन की ही कृति मानते हैं। हाँ, उदाहरण उनके अपने भी हैं और दूसरों के भी- जैसाकि उन्होंने १/१३-३३ में स्पष्ट कहा है। सूत्रपद्धति के अनुसार रचित इस ग्रंथ में कुल पाँच अधिकरण और उनमें कई-कई अध्याय हैं। पहले और चौथे अधिकरण में तीन अध्याय और शेष अधिकरणों में दो-दो अध्याय हैं। कुल मिलाकर बारह अध्याय हैं। अधिकरणों के नाम से पता लगता है कि उनकी विवेच्य सामग्री क्या है-१. शारीर, २. दोषदर्शन, ३. गुणविवेचन, ४. आलंकारिक और ५. प्रायोगिक । अन्तिम अध्याय में शब्दशुद्धि अथवा प्रायोगिक के एक अंग व्याकरणशुद्धि का विवेचन है। सोदाहरण छत्तीस अलंकारों की परिभाषाएँ विद्यमान हैं। __ इस ग्रंथ के अनेक विध संस्करण हैं और कई बार हुए हैं। इनमें सर्वोत्तम संस्करण ‘वाणीविलास’ (१६०६) प्रेस का हैं। डॉ. कैलेपर ने जनवरी १६७५ में जर्मन भूमिका के साथ प्रकाशित किया। यह कार्य त्रिधा विभाजित है- १. सूत्र २. स्वोपज्ञवृत्ति ३. उदाहरण। वामन ने स्वयं कहा है PRASTAmandarmanarthurmumkinnaemium १२८ अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र प्रणम्य परमं ज्योतिमिनेन कविप्रिया। काव्यालंकारसूत्राणां स्वेषां वृत्तिर्विधीयते।।। दूसरे प्रतीहारेन्दुराज, जो वामन से नितान्तसन्निहित है-वामन के नाम से न केवल सूत्रों को उद्धृत करते हैं अपितु वृत्तिग्रंथ को भी उन्हीं के नाम से उद्धृत करते हैं। उदाहरणार्थ, ‘युवतेरिव रूपमङ्गकाव्यं’ तथा ‘यदि भवति’ ये दो श्लोक वामन ने ३-१-२ में उद्धृत किए हैं- इन्हें वामन से ही संबद्ध किया गया है। इसी प्रकार ‘लक्षणायां हि झगित्यर्थप्रतिपत्तिक्षमत्वं रहस्यमाचक्षते’- यह शब्द भी वृत्ति में ही हैं (१/३.८) जिन्हें वामन से संबद्ध किया गया है। इसी प्रकार ‘लोचनकार’ ने भी (पृ. ३७) वामन के ‘आक्षेप’ को उद्धृत करते हुए वृत्ति में दिए गए दोनों उदाहरणों को भी उन्हीं से संबद्ध कर दिया है। वामन ने इतने ग्रंथकारों के उद्धरण दिए हैं कि अनेक लेखकों का समय निर्धारण संभव है। इतना ही नहीं उनका ऐतिहासिक क्रम भी स्पष्ट हो सकता है। कारण, वामन एक पुरातन आलंकारिक है। वामन ने सूत्र पद्धति अपनाई है और इन्हे पाँच अधिकारणों में रखने के लिए जो पारिभाषिक शब्दावली अपनाई है- वह अन्य सूत्रकारों से उधार ली है। यह तो पहले कहा जा चुका है कि प्रत्येक अधिकरण दो या तीन अध्यायों में विभाजित है। इसमें ३१६ सूत्र हैं। यह ध्यान रखने की बात है कि वामन ने अध्याय और अधिकरण के संबंधों में उलटफेर की है, परन्तु कौटिल्य के अर्थशास्त्र और वात्स्यायन के कामसूत्र का अनुधावन किया है। प्राचीन सूत्रकार अपनी कृति को अध्यायों में विभाजित करते थे और प्रत्येक अध्याय में अनेक अधिकरण हुआ करते थे। शारीर अधिकरण में काव्यप्रयोजन पर विचार करते हुए रीति को काव्य का आत्मा बताया गया है। इस रीति के तीन भेद किए गए और प्रत्येक में भेदक गुणों की स्थिति बताई गई। वैदर्भी में बीसों गुण होते हैं। द्वितीय अधिकरण में दोष-दर्शन निरूपित हुआ है। ये दोष पदगत, वाक्यगत और वाक्यार्थगत हैं। तृतीय अध्याय में गुणविवेचन है जहाँ अलंकार से गुण का अन्तर बताया गया है। गुण दस शब्दगत और दस अर्थगत हैं- सबको परिभाषित किया गया है। चतुर्थ अधिकरण अलंकार विवेचन पर केन्द्रित है। यमक, अनुप्रास और उपमा पर विचार करते हुए अधिकांश अलंकारों को उपमा पर समाधृत किया गया है। पंचम अधिकरण को प्रायोगिक कहा गया है- इसमें कतिपय ऐसी रूढ़ परम्पराओं का उल्लेख है जिन्हें कवियों द्वारा कवि-कर्म के संदर्भ में स्मरणीय बताया गया है। अन्तिम अध्याय भामह के अनुकरण पर रखा गया है। यहाँ शब्दशुद्धि पर विचार है। जहाँ एक ओर भामह से साम्य है वहीं दूसरी ओर विषमता भी है। भामह शब्दनिर्माण और प्रयोग पर अष्टाध्यायी के क्रम का अनुसरण करते हैं-जबकि वामन में कोई प्रतिबद्धता नजर नहीं आती। अलंकारशास्त्र के इतिहास में वामन की महत्ता रीतिमत की स्थापना में है। १२६ .. . भट्टि से वामन तक

काव्यालङ्कार सूत्रवृत्ति में अन्य कृतियों और कृतिकारों का निर्देश

काव्यालंकारसूत्रवृत्ति में जिन कृतियों और कृतिकारों का नामतः निर्देश किया गया है- वे हैं-कविराज (४-१-१०), कामन्दकी नीति (४.१-२) कामशास्त्र, छंदोविचिति, नाममाला (१-३.५) विशाखि (कलाशास्त्र का लेखक (१-३.७) शूद्रक (३.२.४) हरिप्रबोध (४.१.२) ३.२.२ में वामन कहता है साभिप्रायत्वं यथा सोऽयं सम्प्रति चन्द्रगुप्ततनयश्चन्द्रप्रकाशोयुवा, जातो भूपतिराश्रयः कृतथियां दिष्ट्या कृतार्थश्रमः। आश्रयः कृतधियामित्यस्य (च वसुबंधु ५.१) च सुबंधु साचित्यो पक्षे पपरत्वात् साभिप्रायत्वम् । इस श्लोक को लेकर वामन के तिथि निर्माण में विवाद खड़ा कर दिया गया है- जो परम्परा में मान्य नहीं हुआ। इस श्लोक में प्रयुक्त ‘चन्द्रगुप्त’ कौन है ? साथ ही ठीक पाठ क्या है-‘वसुबंधु साचिव्यो’ अथवा ‘च सुबन्धुसाचिव्यो/प्रो. पाठक (जे.ए.वाल्यूम ४० -१६११ पृ. १७७) पृ. २६४ प्रो० हार्नले तथा प्रो. डी.आर. भण्डारकर वसुबन्धु पाठ के पक्ष में है। (आई.जे. १९११ ३१२) प्रो. नरसिंहाचार (आई.एच.क्यू. वाल्यूम पृ. २६१, आई.ए. १६१२, पृ. १५) म.म. हरप्रसाद शास्त्री ‘च सुबंधुसचिव्यो’ के पक्ष में हैं। पाठ स्वीकार से यह निष्कर्ष आएगा कि उस व्यक्ति की ऐतिहासिक अस्मिता क्या है? यदि ‘वसुबंधुसचिव्यो’ पाठ स्वीकार किया जाय तब इसका संबंध चन्द्रगुप्त या समुद्रगुप्त और बसुबंधु से स्थापित किया जाय, परन्तु यदि ‘च सुबन्धसाचिव्यो’- पढ़ा जाय तब चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार तथा सुबंधु से माना जायगा। सुबन्धु इनका मंत्री था। इस प्रसंग में प्रो० दशरथ शर्मा (आई.एच.क्यू.वाल्यूम १० पृ. ७६१) को भी देखा जाना चाहिए। इन्होंने वामन द्वारा निर्दिष्ट आलोच्य पंक्तियों से मेहरौली स्तम्भ लेख से सादृश्य बताया है। (गुप्त अभिलेख पृ.१३६ तथा पृ.१४१) अभिनव भारती ‘वासवदत्ता नाट्याधार’ नामक एक नाटक की सूचना देती है

काव्यालङ्कार सूत्रवृत्ति पर टीकाएँ

जो महाकवि सुबंधु की कृति है। वामन द्वारा उक्त संदर्भ में उल्लिखित वसुबंधु का संबंध या बाण द्वारा निर्दिष्ट वासवदत्ता का संबंध गद्यकाव्य वासवदत्ता के प्रेणता से हो- यह आवश्यक नहीं। अभिनवभारती की प्रतिलिपि (बी.ओ. आर.आई. पृ.३४८) में लिखा है ‘तत्रास्य बहुतरव्यापिनो बहुगर्भस्वप्नायिततुल्यस्य नाट्यायितस्यो दाहरणं महाकविसुबन्धुनिबद्धो वासवदत्तानाट्यधाराख्यः समस्त एवं प्रयोगः । तत्र हि बिन्दुसारः प्रयोज्यवस्तुत उदयनचरिते सामाजिकीकृतोऽपि। प्रो. पाठक का कहना है (….जे.बी.बी. आर.ए.एस.वाल्यूम २३ पृ.१८५-१८७) कि वामन ने चन्द्रगुप्त द्वितीय पुत्र कुमारगुप्त का संदर्भ दिया है (४१३-४५५ई.)। परमार्थ (४६६-५६६ई.) का पक्ष है कि वसुबंधु अस्सी वर्ष की अवस्था में बालादित्य के राज्य में मर गया। फलतः वसुबंधु का काल ४२०-५००ई. माना जाना चाहिए (जे.आर.ए.एस. १६०५ई. पृ.३३-५३) वसुबन्धु का अभिधर्मकोश बाण के हर्षचरित (८) में निर्दिष्ट है। इस विषय में और अधिक आई.एच.क्यू.वाल्यूम १८ .. अष्टम खण्ड-काव्य शास्त्र १३० पृ.२७३-३७५ वाल्यूम १६ पृ. ६६-७२, वाल्यूम २० पृ. ८५ तथा ३६६ में देखा जा सकता है। ‘अवन्तिसुन्दरीकथा’ में सुबन्धु को वाल्मीकि, व्यास तथा एक और (संभवतः पाणिनि या पजञ्जलि) के बाद रखा गया है तथा बृहद्कथा, शुद्रक, भास, कालिदास और बाण से पहले। कमोवेश इन्हें एक ऐतिहासिक अनुक्रम में रखा गया है। इसलिए अबन्तिसुन्दरीकथा में सुबन्धु काफी पुराने हो सकते हैं। अ.सु. कथा के प्रास्ताविक श्लोकों के ये शब्द सुबन्धुः किल निष्क्रान्तो बिन्दुसारस्य बन्धनात् तस्यैव हृदयं बद्ध्वा वत्सराजो. शब्दशः प्रामाणिक रूप में नहीं ग्रहण किए जाने चाहिए। जैसाकि कुछ लोग मानते हैं, सुबन्धु बिन्दुसार की कैद से भागा था- ठीक नहीं है। जो कुछ इस श्लोक की असलियत है वह यह कि वत्सराज की कथा ने सुबन्धु के हृदय को बाँध लिया और वह बिन्दुसार के अधीन नहीं हो सका। उसने अपना मतलब हल कर लिया और बिन्दुसार मात्र मौन दर्शक बना रहा। अभिनवभारती में वासवदत्तानाट्याधार और नाट्यायित का यही प्रसंग है (पृ. ३४५-४६ बी.ओ.आई.आर. प्रतिलिपि)। म.म. काणे का पक्ष है कि वामन का पाठ अधिक संभव है- ‘वसुबंधुसाचिव्यो’ ही सही है ‘च सुबन्धु- यह पाठ ‘च’ पर बल देता हुआ लक्षित नहीं होता। ‘च’ की सार्थकता क्या है? ज्यों-ज्यों समय बीतता गया बौद्ध दार्शनिक वसुबन्धु विस्मृत होता गया और सुबन्धु अधिक प्रख्यात हो गया। प्रतिलिपिकारों की दृष्टि में कभी यह ‘वसुबन्धु’ हुआ और कभी प्रख्यात लेखक ‘सुबन्धु’ । म.म. हरप्रसाद शस्त्री का यह मानना कि अधिक पांडुलिपियों में ‘चसुबंधु’ ही मिलता है-अतः यही मानना चाहिये-पर्याप्त वजनदार नहीं है। इन पांडुलिपि में ‘वसुबन्धु’ न मिलता- तो बात दूसरी होती। जिन कतियों से उद्धरण लिए गए हैं- वे हैं-अमरुशतक, उत्तररामचरित, कादम्बरी, किरातार्जुनीय. कुमारसम्भव, मालतीमाधव, मृच्छकटिक, मेघदूत, रघुवंश, विक्रमोर्वशीय, वेणीसंहार, शाकुन्तल, शिशुपालवध, हर्षचरित। इस प्रकार इस ग्रंथ में अनेक उद्धरण मिलते हैं जिनसे कालनिर्धारण में सहायता मिलती है। वामन के ‘काव्यालंकारसूत्रवृत्ति’ पर अधिकतर टीकाएँ अर्वाचीन है। वे आलोचनात्मक और ऐतिहासिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हैं। दक्षिणभारतीय विद्वान् गोपेन्द्रतिप्पभूपाल विजयनगरवंशीय देवराय २(१४२३-४६ई.) के अधीन राज्यपाल थे। उनकी लिखी एक टीका है ‘कामधेनु’ यह पाठ की विशद व्याख्या करती है। एक दूसरी टीका है महेश्वर रचित ‘साहित्यसर्वस्व’ (आई.ओ.सी.५६६, ए.बी.ओ.डी. २०७ बी.) तीसरी टीका है- सहदेव रचित। गायकवाड़ संस्करण, बड़ौदा से प्रकाशित काव्यमीमांसा (पृ.५) की टिप्पणी में इसका उल्लेख है। काव्यालंकारसूत्रवृत्ति के अनेक संस्करण और अनुवाद प्रकाशित हैं। इसका विशेष विवरण डॉ. डे.के. हिस्ट्री आफ संस्कृत पोयटिक में देखा जा सकता है। READ

१३१ आनन्दबर्थन से भट्टनायक और कुन्तक तक