०८ न्याय-वैशेषिक दर्शन

बारहवीं शताब्दी में गोश के आविर्भाव के फलस्वरूप विषयप्रतिपादन की एक नयी शैली का प्रारम्भ हुआ, जिसे-“नव्य न्याय-शैली के नाम से जाना जाता है। इसमें अवच्छेद्य-अवच्छेदक, अनुयोगी-प्रतियोगी, प्रकारता-विषयता आदि पारिभाषिक पदों के द्वारा संक्षेप एवं स्पष्टता के साथ दुरूह विचारों की प्रस्तुति हो सकती थी। इस शैली में इतनी सूक्ष्मता एवं स्पष्टता के साथ विषय को प्रस्तुत करने की क्षमता है कि विचाराभिव्यक्ति के लिए इससे अच्छी किसी शैली की कल्पना कर पाना कठिन है जैसा कि डी. सी. गुहा कहते हैं “The technigue of Navya Nyaya is so thorough and subtle that it is almost impossible to caneive a more purfect and unambiguous method of exprassion in Sanskrit, if not in any other language (Navya Nyaya System of Logic) यही कारण है कि बारहवीं शताब्दी के उपरान्त सम्पूर्ण विद्वत्समाज ने इसे विचाराभिव्यक्ति के साधन के रूप में अपना लिया। चाहे वह नव्यव्याकरण का क्षेत्र हो या नव्यवेदान्त का, नव्यस्मृति, नव्य मीमांसा एवं नव्य न्याय सभी क्षेत्रों के विद्वानों ने निर्बाध भाव से इस शैली का प्रयोग किया। प्रयोग ही नहीं बल्कि उसमें उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्राप्त करने ५५६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास की चेष्टा की। इससे मूल ग्रन्थों पर लिखी गयी टीकाएँ सरल होने के स्थान पर कठिन होती चली गयीं, क्योंकि पारिभाषिक शब्दों के बहुल प्रयोग से, जबकि उन सभी में गहन विचारों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति की क्षमता कूट-कूट कर भरी हो, यह शैली इतनी दुरूह हो गयी कि परम्परागत गुरुओं से सीखे बिना इसका रहस्योन्मीलन अशक्य हो गया। यही कारण है कि दर्शन एवं शास्त्र की किसी विधा में मर्मज्ञ होने के लिए विज्ञ गुरु से नव्यन्याय का सम्यक अनुशीलन प्राथमिक शर्त बन गयी। इसीलिए हम देखते हैं कि १६-२०वीं शती के अधिकांश विद्वान् न्यायशास्त्र में पारङ्गत हैं। कोई या इस शैली की परिष्कार-प्रियता और प्रौढ़ता ने जहाँ विद्वानों को अपनी ओर आकृष्ट किया और उन्होंने गादाधरी, जागदीशी आदि पर विविध परिष्कारों से युक्त अपने टीकाग्रन्थ एवं मौलिक ग्रन्थ (द्रष्टव्य शशिनाथ झा द्वारा प्रणीत त्रितलावच्छेदकतावाद) लिखे वहाँ सामान्य विद्यार्थिवर्ग अथवा जिज्ञासुओं के लिए ये ग्रन्थ अनुपयुक्त पाये गये। न्याय-वैशेषिक दर्शन में सामान्य रूप से अवगाहन के लिए विश्वनाथ न्यायपञ्चानन की “सिद्धान्तमुक्तावली” सर्वथा उपयुक्त पायी गयी। इसी का इस युग में बहुशः अध्ययन-अध्यापन हुआ और इसी पर सर्वाधिक टीकाग्रन्थ लिखे गये। दूसरा लोकप्रिय ग्रन्थ अन्नभट्ट का “तर्कसंग्रह” रहा। उस पर भी अनेक टीकाएँ, टिप्पणियाँ, व्याख्याएँ आदि लिखी गयीं।

  • इस युग में न्याय-वैशेषिक, व्याकरण एवं अद्वैतवेदान्त ही अध्ययन-अध्यापन के सर्वाधिक प्रचलित विषय थे। अतः इन्हीं शास्त्रों पर सर्वाधिक ग्रन्थों एवं टीकाओं का प्रणयन मिलता है। मूल गन्थों एवं क्रोडपत्रों का बहुशः प्रकाशन होने से भी न्यायशास्त्र के रहस्य लोगों को उजागर हुए और लोगों ने अपनी टीकाओं में उनपर विचार व्यक्त किये।

गिरिधर उपाध्याय

बिहार (१७५०-१८५० ई. लगभग) पं. गिरिधर उपाध्याय का जन्म मिथिला के मैंगरौली ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम वागीश शर्मा था। ये ‘पदवाक्यरत्नाकर’ के प्रणेता गोकुलनाथ उपाध्याय के शिष्य थे। विभक्त्यर्थनिर्णय - चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला १२ में मुद्रित। इस महत्त्वपूर्ण विशद ग्रन्थ में न्यायमतानुसार परमतखण्डन एवं स्वमतस्थापनपूर्वक प्रथमादि सातों विभक्तियों के अर्थ पर विचार किया गया है। इसमें स्थान-स्थान पर ‘पदवाक्य-रत्नाकर’ तथा अपने गुरु गोकुलनाथ उपाध्याय का निर्देश किया गया है।

पट्टाभिराम शास्त्री

ये दाक्षिणात्य आलूर नृसिंह शास्त्री के पुत्र तथा न्यायशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान थे। त्रिंशच्छ्लोकी-अण्णामलै विश्वविद्यालय से १६३७ ई. में प्रकाशित । इस ग्रन्थ में “न च-वाच्यम्’ ‘ननु-इति चेन्न” “यदि-तदा” “वक्तुं युक्तम्” इत्यादि शास्त्रार्थ में प्रयुक्त होने वाले शब्दों के अर्थ, लक्षण और परिष्कार का प्रतिपादन है। ग्रन्थकार ने इस पर स्वोपज्ञ व्याख्या भी लिखी है जिसमें इन वाक्यांशों के अर्थ पर उदाहरणपूर्वक विचार किया गया है।

शतकोटि राम शास्त्री

(१६ वीं शती) ये मैसूर राजसभा के मान्य विद्वान् तथा दाक्षिणात्य नैयायिकों के परमगुरु थे। देश में अनुगमसम्प्रदाय के प्रचार का मूल इन्हीं से है। ५५७ दर्शन और शास्त्र सप्ततिविभाजकलक्षणों पर “शतकोटि” नामक क्रोडपन्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं और अनुगमसम्प्रदाय के प्रसरण का हेतुभूत होने से मूल ग्रन्थ के समान ही आदरणीय हैं। रचनाकाल-१८५० ई.।

राखालदास न्यायरत्न

बंगाल (१८२६-१E१४ ई.) इनका जन्म बंगाल के चौबीस परगना जिले के अन्तर्गत भाटपाड़ा ग्राम में हुआ था। इन्होंने पं. जयराम सार्वभौम से व्याकरणशास्त्र तथा काव्यशास्त्र एवं यदुनाथ सार्वभौम से न्यायशास्त्र का अध्ययन किया था। छात्रावस्था में ही इन्होंने नवद्वीप के गोकुलनाथ न्यायरत्न के साथ “पक्षता” के विषय में विचार करके प्रचुर ख्याति अर्जित की थी। ये अपने समय में न्यायशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान् माने जाते थे। काशी और बंगाल, दोनों शिक्षा केन्द्रों पर इनकी पूर्ण प्रतिष्ठा थी। पञ्चानन तर्करत्न इनके शिष्य थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र पर “शक्तिभाष्य” तथा सांख्यदर्शन पर ‘पूर्णिमा” टीका आदि ग्रन्थ लिखे। १- तत्त्वसारः २- अद्वैतवादखण्डनम् ३- दीधितिकृतन्यूनतावादः ४- गदाधरन्यूनवादः। इन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर दीथितिकार रघुनाथ तथा गदाधर की न्यूनताओं को प्रदर्शित किया है। ५- शक्तिवादरहस्यम् ६- मायावादनिरासः।

शशिनाथ झा

बिहार (१६६३ ई. में देहावसान) - इन्होंने गुजरात और बिहार में भारतीय दर्शन की विविध शाखाओं का ६० वर्षों से अधिक समय तक अध्यापन किया। त्रितलाबच्छेदकतावाद - यह ग्रन्थ अकेला ही झा जी के पाण्डित्य का डिण्डिम नाद करने को पर्याप्त है। नव्य न्याय के प्रौढ तर्क से संवलित इस ग्रन्थ में तीन कोटियों तक प्रयुक्त अवच्छेदकत्व के विषय में विचार किया गया है। यह ग्रन्थ दरभंगा से १६५५ ई. में प्रकाशित है। इन्होंने “खण्डनसारः” नामक एक अन्य ग्रन्थ भी लिखा है। इसके अतिरिक्त कई टीकाएँ लिखीं।

लोकनाथ झा

ये म. म. बालकृष्ण मिश्र के गुरु तथा धर्मदत्त (बच्चा) झा के समकालीन थे। दरभंगा में घर पर ही विद्यादान करते रहे। १- उभयाभावादिवारकपरिष्कारः - नव्यन्याय की शैली में रचित यह प्रौढ़ ग्रन्थ वाराणसी से १E१८ ई. में प्रकाशित है। २- जातिबाधकपरिष्कारः।

वेपत्तूरु सुब्रह्मण्य शास्त्री

ये न्यायशास्त्र के परिनिष्ठित विद्वान तथा अण्णामले विश्वविद्यालय में न्यायवेदान्त के अध्यापक थे। अपनी विद्वत्ता के लिए इन्हें राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किया गया। १६८४ ई. के लगभग इनका निधन हुआ। शाब्दतरङ्गिणी- यह इनका मौलिक ग्रन्थ है। यह ६ तरङ्गों में विभाजित है जिसमें वाक्यार्थबोध सम्बन्धी विविध विषयों का अनुशीलन किया गया है। इसका प्रकाशन मद्रास विद्यासमिति द्वारा हुआ है। इस ग्रन्थ के अतिरिक्त इन्होंने व्युत्पत्तिवाद लकारार्थ पर “विवरण” नाम्नी टीका भी लिखी है।

अभेदानन्द भट्टाचार्य

बंगाल भगवानदास संस्कृत महाविद्यालय, हरिद्वार में प्राचार्य पद पर कार्यरत । न्यायप्रमाणसमीक्षा- १८८७ ई. में परिमल प्रकाशन, शक्तिनगर, दिल्ली से प्रथम बार प्रकाशित। इसमें न्यायशास्त्रीय ग्रन्थों में प्रतिपादित प्रमाणसम्बन्धी सिद्धान्तों की सरल भाषा में समीक्षा की गयी है। ५५८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास की

एन. एस. रामानुज ताताचार्य

ये प्रसिद्ध नैयायिक श्री कृष्ण ताताचार्य के पुत्र, और स्वयं न्याय, वेदान्त, व्याकरणादि शास्त्रों के तलस्पर्शी विद्वान् तथा राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित हैं। इन्होंने तिरुपति केन्द्रीय विद्यापीठ के कुलपति पद से अवकाश ग्रहण किया। सम्प्रति पाण्डिचेरी के प्राच्य विद्याविभाग से सम्बद्ध हैं। प्रत्यक्षतत्त्वचिन्तामणिविमर्श:-यह ताताचार्य जी का मौलिक ग्रन्थ है जो तिरुपति विद्यापीठ से प्रकाशित है। १६६४ ई. में इन्हें राम कृष्ण डालमियाँ श्री वाणी न्यास से भी सम्मानित किया गया। इस ग्रन्थ के अतिरिक्त इन्होंने तर्कसंग्रहशाब्दबोधः, तर्कसंग्रहदीपिकाप्रकाशिका व्याख्या ‘बालप्रिया” तथा गादाधरी के विभिन्न अंशों पर व्याख्याओं की भी रचना की है।

बदरीनाथ शुक्ल, उ. प्र.

ये न्यायशास्त्र के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् थे। इन्होंने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पद से अवकाश ग्रहण किया। आरम्भवादः शारदा प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित । यह नव्यन्याय की शैली में उपनिबद्ध महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें असत्कार्यवाद की स्थापना की गयी है। इसमें सांख्य के सत्कार्यवाद की गम्भीर आलोचना कर परमाणुकारणतावाद का युक्तिपूर्वक प्रतिपादन किया गया है। इस सन्दर्भ में शङ्कराचार्य, मधुसूदन सरस्वती तथा आधुनिक विद्वान् पं. बच्चा झा के विचारों एवं तर्को का प्रतिवाद किया गया है। अन्त में प्रकृति एवं अविद्या की विश्वोपादानकारणता का निराकरण किया गया है। शुक्ल जी ने गङ्गेश की “तत्त्वचिन्तामणि” के मंगलवाद पर मथुरानाथ तर्कवागीश की प्रौढ़ व्याख्या का सम्पादन भी किया है जिसमें स्थान-स्थान पर मूल और व्याख्या के महत्त्वपूर्ण स्थलों पर पाण्डित्यपूर्ण टिप्पणियाँ लिखी हैं। इसका प्रकाशन सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय (वाराणसी) से हुआ है।

(क) न्यायविषयक ग्रन्थों पर टीकाएँ

गौतम के “न्यायसूत्र” पर टीका-ग्रन्थ

पञ्चानन भट्टाचार्य तर्करत्न (जन्म १८६६ ई.) न्यायसूत्र के अनुमान खण्ड पर “अनुर्मितिविवृतिः” नाम्नी टीका। हरिप्रसाद स्वामी- वैदिकवृत्तिः बम्बई से १६१६ ई. में मुद्रित। सुदर्शनाचार्य-प्रसन्नपदा नाम्नी न्यायसूक्तवृत्ति, बम्बई से १६२२ ई. में प्रकाशित। श्री सुदर्शनाचार्य न्यायदर्शन के साथ-साथ पूर्व मीमांसा तथा वेदान्त के भी प्रकाण्ड पण्डित थे। इन्होंने अद्वैतवेदान्तविषयक “अद्वैतचन्द्रिका” नामक ग्रन्थ की रचना की है। कैलाशचन्द्र शिरोमणि- इन्होंने वाराणसी क्वीन्स कालेज में १८८० ई. से लेकर १९०७ ई. तक अध्यापन किया। १८६६ ई. में इन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि प्राप्त हुई। न्यायसूत्र पर “भाषाच्छाया” नाम्नी टीका। दर्शन और शास्त्र ५५६ गङ्गानाथ झा (१८७१-१६४१ ई.) खद्योत नाम्नी वृत्ति-चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला ५५ में मुद्रित। बालकृष्ण मिश्र (१८८८-१९४३ ई.) पं. शशिनाथ झा एवं बच्चा झा के शिष्य। तात्पर्यविवृतिः (न्यायसूत्रवृत्ति) - वाराणसी से १६१६ ई. में मुद्रित। यदुनाथ मिश्र, बिहार (१९-२० वीं शती) न्यायसूत्रप्रदीप - १८८५ ई.। आशुतोष तर्कभूषण, बंगाल- न्यायसूत्रटीका-कलकत्ता से प्रकाशित, १८६४ ई.। राधामोहन विद्यावाचस्पति, बंगाल न्यायसूत्रविवरणम्-वाराणसी से पण्डित नूतन ग्रन्थमाला - २३ में मुद्रित, १६०१ ई.। यह ग्रन्थ आधुनिक समालोचनात्मक दृष्टिकोण से लिखा गया है। इसमें सूत्रों के पाठभेद का भी निर्देश किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि ‘तत्त्वं तु बादरायणात्" न्यायदर्शन के चतुर्थ अध्याय का अन्तिम सूत्र है। “लघुचन्द्रिकाव्याख्यान तथा विट्ठलेशी” से यह तथ्य प्रमाणित होता है। हरिदत्तशर्मा त्रिवेदी (१६ वीं २० वीं शती) ग्रन्थ तत्त्वसुधालहरी नाम्नी न्यायसूत्रवृत्ति, लाहौर से १६१३ में प्रकाशित।। अम्बाप्रसाद शास्त्री (१६-२० वीं शती) न्यायसूत्रटिप्पणी, चौखम्बा सां.ग्र. मा. से अप्रैल १६२० में मुद्रित।

“तत्त्वचिन्तामणि” (गङ्गेशकृत) की टीकाएँ

मधुसूदन भट्टाचार्य, (बंगाल)-तत्त्वचिन्तामणि पर “सुषमा” टीका, कलकत्ता से आवर हेरिटेज-४ में प्रथम बार प्रकाशित, १६५६ ई.। गुरुप्रसाद शास्त्री तत्त्वचिन्तामणि के “सिद्धान्तलक्षण” पर दीपिका टीका वाराणसी से १६३३, १६३७ ई. में प्रकाशित। श्यामसुन्दर झा ये हिन्दू गुरुकुल संस्कृत महाविद्यालय, सूरत में प्राचार्य थे। चन्द्रिका व्याख्या - चिन्तामणि के व्याप्तिपञ्चक तथा सिंहव्याघलक्षण पर “माधुरी’ एवं “जागदीशी” टीकाओं के तात्पर्य को स्पष्ट करने वाली व्याख्या। ग्रन्थकार द्वारा ही १६५७ ई. में प्रथम बार वाराणसी से प्रकाशित। स्वामी दिव्यानन्द (दत्तात्रेय शास्त्री) “लक्ष्मी” व्याख्या तथा उस पर “दिव्या” नाम्नी स्वोपज्ञ टिप्पणी। यह व्याख्या मूल चिन्तामणि ग्रन्थ तथा उस पर “दीधिति” तथा “जागदीशी” के तात्पर्य का प्रकाशन भली-भाँति करती है। इसके व्याख्यापेक्ष शास्त्रार्थपूर्ण स्थलों को स्पष्ट करने के लिए स्वामी जी ने स्वयं उस पर “दिव्या” नामक टिप्पणी लिखी है। यह नव्य न्याय की परिष्कार शैली का प्रौढ़ ग्रन्थ है। स्वामी जी द्वारा स्वयं वाराणसी से. १६७० ई. में प्रकाशित। ।। भन"गादाधरी” तत्त्वचिन्तामणि की व्याख्या से सम्बद्ध टीकाग्रन्थ क्रोडपत्र इत्यादि कालीशङ्कर भट्ट- गादाधरी पर क्रोडपत्र । माधुरी, जागदीशी और न्यायकुसुमाञ्जलि पर ५६० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इनके क्रोडपत्रों के साथ वी. पी. द्विवेदी, ढुण्डिराज शास्त्री और वामाचरण भट्टाचार्य (द्वितीय) के द्वारा सम्पादित तथा चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला-२५ में वाराणसी से १६१६ एवं १६२४ ई. में २ भागों में प्रकाशित। रघुनाथ सूरि ‘पर्वते’ महाराष्ट्र (१८२० ई. में देहावसान) १- न्यायरत्नम्-गादाधरी के पञ्च वादों एवं हेत्वाभाससामान्यनिरुक्ति पर व्याख्यान, पूना से १८५३ ई. में प्रकाशित। २- गादाधरी चतुर्दशलक्षणी व्याख्या-अङ्यार लाइब्रेरी ई. से प्रकाशित। कृष्णम्भटूट अर्डे, महाराष्ट्र (१७५०-१८२५ ई.) - गादाधरी पर “काशिका” वृत्ति। तिरुप्पुकुलि श्रीकृष्णताताचार्य, काञ्ची- अवच्छेदकतासरः- गादाधरीपञ्चलक्षणी, चतुर्दशलक्षणी आदि पर क्रोडपत्र, अण्णामलै विश्वविद्यालय से प्रकाशित। कृष्णभटूट-गादाधरी पञ्चलक्षणी, चतुर्दशलक्षणी, सिद्धान्तलक्षण, अवयव, पक्षता आदि पर व्याख्यान-गादाधरी पर संभावित आक्षेपों को उठाकर उनका समाधान इसमें प्रस्तुत किया गया है। आन्ध्रलिपि में मैसूर से प्रकाशित। देवनागरी लिपि में पञ्चलक्षणी व्याख्या निर्णयसागर प्रेस से तथा चतुर्दशलक्षणी व्याख्या अड्यार लाइब्रेरी से मुदित हुई है। पट्टाभिराम शास्त्री-गादाधरी पर क्रोडपत्र-अड्यार से १६४२ ई. में प्रकाशित। शतकोटि राम शास्त्री (१८५० ई.) गादाधरी सत्प्रतिपक्षविभाजक क्रोडपत्र, शतकोटि काञ्ची से १६११ ई. में मुद्रित। धर्मदत्त बच्चा झा, बिहार (१८६०-१६२१ ई.) १ - विवृति- गादाधरी सामान्यनिरुक्ति की व्याख्या, वाराणसी से काशी संस्कृत ग्रन्थमाला- ११२ में प्रकाशित १६३५ ई.। मा वामाचरण भट्टाचार्य (१८८८-१६६१) मनोरमा- गादाधरी सव्यभिचार भाग की व्याख्या, वाराणसी से १६४० ई. में प्रकाशित। ये वामाचरण भट्टाचार्य म. म. गोपीनाथ कविराज तथा पं. शिवदत्त मिश्र के गुरु आधुनिक वामाचरण भट्टाचार्य हैं, जिन्होंने जागदीशी व्याप्तिपञ्चक, सिद्धान्तलक्षण तथा व्युत्पत्तिवाद की व्याख्याएँ लिखी हैं। हरिनामदास स्वामी (१८८१-१६५० ई.) १- चन्द्रकला (गादाधरी सामान्यनिरूक्ति की व्याख्या)- वाराणसी से प्रकाशित इस व्याख्या में मूल ग्रन्थ की प्रतिपद व्याख्यापूर्वक गादाधारी के तात्पर्य को सरल शैली में समझाया गया है। २- कलाविलासः (गादाधरी पर क्रोडपत्र) वाराणसी से प्रकाशित। नारायणचन्द्र गोस्वामी- गादाधरी पर विवृति - वाराणसी से १६४० ई. में प्रकाशित। श्रीकृष्ण ताताचार्य (२० वीं शती) गादाधरी सिद्धान्तलक्षण पर विशद व्याख्या, तिरुपति विद्यापीठ से मुद्रित। एन. एस. रामानुज ताताचार्य १-बालबोधिनी-गादाधारी पञ्चलक्षणी, सिंहव्याघ्रलक्षण की व्याख्या, तिरुपति विद्यापीठ से प्रकाशित। यह व्याख्या सरल शैली में उपनिबद्ध और अध्येताओं के लिए अतीव उपयोगी है। २- बालबोधिनी-पक्षता गादाधरी व्याख्या, तिरुपति दर्शन और शास्त्र ५६१ विद्यापीठ से प्रकाशित तथा उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा शंकर पुरस्कार से सम्मानित। ३-भावदीपिका-अवयव गादाधरी व्याख्या, तिरूपति विद्यापीठ से प्रकाशित। ४ विवरण-चतुर्दशलक्षणी गादाधरी की व्याख्या। डॉ. वीलिनाथन द्वारा प्रकाश्यमान। ज्वालाप्रसाद गौड़ -ये वाराणसी के संन्यासी संस्कृत कालेज में न्याय के अध्यापक थे। गादाधरी सत्प्रतिपक्ष, सव्यभिचार और अवयव प्रकरण की टीका संन्यासी संस्कृत कालेज से ही प्रकाशित।

‘माधुरी" से सम्बद्ध टीकाएँ, क्रोडपत्र आदि

कालीशङ्कर भट्ट, बंगाल - माथुरी पर क्रोडपत्र-चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला- २५ में वाराणसी से प्रकाशित। जीवानन्द विद्यासागर, बंगाल फक्किका (माधुरी पञ्चलक्षणी की व्याख्या) कलकत्ता से प्रकाशित, १८६६ ई.। उमानाथ व्याप्तिचन्द्रिका-माधुरी पञ्चलक्षणी की व्याख्या, वाराणसी से प्रकाशित। हरिराम शुक्ल सिंहव्याघ्रलक्षणव्याख्या-वाराणसी से प्रकाशित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला-७८ में १६३० ई. में प्रकाशित। वामाचरण भट्टाचार्य बंगाल (१८८८-१६६१ ई.) विवृतिः (माथुरी व्याख्या) कई भागों में वाराणसी से प्रकाशित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १४०, १६४४ ई.। शिवदत्त मिश्र, उ. प्र. (२० वीं शती) वामाचरण भट्टाचार्य द्वितीय के शिष्य । गङ्गानिर्झरिणी- माधुरी व्याप्तिपञ्चक, सिंहव्याघ्रलक्षण की टीका, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला-६४ में वाराणसी से मुद्रित।

“जागदीशी” से सम्बन्धित टीकाएँ, क्रोडपत्र इत्यादि

कालीशङ्कर भट, बंगाल जागदीशी पर क्रोडपत्र-चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला-२५ भाग-१ में ‘क्रोडपत्रसंग्रह" के अन्तर्गत प्रकाशित। सङ्गमेश्वर शास्त्री, आन्ध्र प्रदेश - जागदीशी पञ्चलक्षणी आदि पर क्रोडपत्र आन्ध्र यूनिवर्सिटी सीरीज-७ में १६३३ ई. में मुद्रित। धर्मदत्त (बच्चा) झा, बिहार (१८६०-१६२१ ई.) विवृति-जागदीशी अवच्छेदकतानिरुक्तिव्याप्तिपञ्चक-सिद्धान्तलक्षण-व्याख्या, वाराणसी से १६२३ ई. में मुद्रित। जीवानन्द विघासागर, बंगाल -वादार्थ- जागदीशी व्याख्या, कलकत्ता से प्रकाशित। वामाचरण भट्टाचार्य (द्वितीय), बंगाल (१८८८-१६६१ ई.) १-मनोरमा (जागदीशी व्याप्तिपञ्चक-सिंहव्याघ्रलक्षण-सिद्धान्तलक्षण की व्याख्या) वाराणसी से १६३५ ई. में प्रकाशित। २- विवृति (जागदीशी पर) वाराणसी से १६३२ ई. में प्रकाशित शिवदत्त मित्र, उ. प्र.-गङ्गा (जागदीशी व्याख्या) इसके व्याप्तिपञ्चक और सिंहव्याघ्रलक्षण भाग काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ७० में, व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावप्रकरण की व्याख्या, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला- ८६ में, अवच्छकेदकतानिरुक्ति की व्याख्या का. सं. न. आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास -६४ में तथा सिद्धान्तलक्षण की का. सं. ग्र.-१०१ में मुद्रित है। केशव द्विवेदी, उ. प्र.- नारायणी (जागदीशी सामान्यलयक्षणी की व्याख्या) वाराणसी से १६४६ ई. में मुद्रित। मधुसूदन भट्टाचार्य, बंगाल-सुषमा (जागदीशी पक्षता की व्याख्या) कलकत्ता से प्रकाशित। काशिकानन्द स्वामी-जागदीशी सामान्यलक्षण की व्याख्या, दक्षिणामूर्ति मठ, बनारस से १६५२ ई. में प्रकाशित। सरल तथा विशदार्थक व्याख्या। कृष्णामाधव झा (१८६९-१९८५) ग्राम बिट्ठो, सरिसब पाही, मधुबनी, विहार के निवासी थे। उन्होंने मिथिला और काशी के अनेक गुरुओं से न्याय आदि शास्त्रों का अध्ययन किया। बहुत समय तक वल्लभ-सम्प्रदाय के गोस्वामियों के आश्रम में, मुम्बई में रहकर अध्यापन किया। उन्होंने सिद्धान्त लक्षण के गूढार्थ तत्त्वालोक की व्याख्या “सिद्धान्तलक्षण बोधिनी” लिखी, जो १६८२ ई. में गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद से प्रकाशित हुई।

तर्कभाषा (केशव प्रणीत) की टीका

रुद्रधर झा-तर्कभाषा पर तत्त्वालोक व्याख्या हरिदास संस्कृत ग्रन्थमाला-२२६ में काशी से १६५२ ई. में प्रकाशित।

(ख) वैशेषिक दर्शन के ग्रन्थों पर टीकाएँ

जयनारायण तर्कपञ्चानन बंगाल (१८६७ ई.)- विवृति-वैशेषिक दर्शन की शङ्कर मिश्र प्रणीत वृत्ति “उपस्कार” की व्याख्या, इनके जीवनकाल में ही बिब्लियोथिका इण्डिका ग्रन्थमाला-३४ में प्रकाशित। पञ्चानन भट्टाचार्य तर्करत्न, बंगाल (१८६६ ई. में जन्म) वैशेषिक दर्शन की “परिष्कार टीका”-१६०६ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित। चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार (१६ वीं शती) तत्त्वावली-वैशेषिक सूत्रों की व्याख्या, कलकत्ता से १८६६ ई. में तथा चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला ४८ में मुद्रित।

प्यारेलाल आत्मज- वैशेषिकसूत्र पर “भाष्यानुवादः- बम्बई से १८८६ ई. में प्रकाशित। देवदत्त शर्मा-वैशेषिकसूत्र पर भाष्यानुवाद बम्बई से १८८६ ई. में प्रकाशित । टी. उत्तमूर वीरराघवाचार्य- ये न्याय, मीमांसा और विशिष्टाद्वैत वेदान्त के मर्मज्ञ विद्वान और राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित थे। वैशेषिकरसायनम् - वैशेषिक सूत्रों पर वृत्ति, मद्रास से १६५८ ई. में मुद्रित। यह वृत्ति वैशेषिक सूत्रों के रहस्य को उद्घाटित करने हेतु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। दर्शन और शास्त्र देशिक तिरुमलै ताताचार्य तमिलनाडु (१८६४-१६७४ ई.)- डी. टी. ताताचार्य का जन्म तमिलनाडु के “तिरुवरङ्म” नामक स्थान में हुआ था। उन्होंने पं. श्री निवासाचार्य एवं पं. कुप्पूस्वामी शास्त्री (कुम्भकोणम्) से शास्त्रों का अध्ययन किया था। ये अपने समय के न्याय, मीमांसा एवं विशिष्टाद्वैत वेदान्त के मुर्धन्य विद्वानों में से एक थे। ‘दर्शनकोश” के निर्माण में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। वैशेषिकसूत्रों पर “सुगमा” नामक वृत्ति प्रथम बार गङ्गानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद की शोधपत्रिका सं. ३२ एवं ३३ में प्रकाशित। १EGE ई. में इसका इसी विद्यापीठ से पृथक् ग्रन्थ के रूप में प्रकाशन हुआ। यह सरल, सारपूर्ण और विषय को स्पष्ट करने वाली वृत्ति है।

उदयनकृत लक्षणावली की टीका एवं व्याख्या

विश्वनाथ झा, बिहार - लक्षणावली की टीका-वाराणसी से १६०० ई. में प्रकाशित। शशिनाथ झा, बिहार (१९६३ ई. में देहावसान) - लक्षणावली की व्याख्या मिथिला संस्कृत विद्यापीठ से १६६३ ई. में प्रकाशित। लक्षणावली पहले शिवादित्य की रचना मानी जाती थी। यह मद्रास के ओरियण्टल मैन्युस्क्रिप्ट लाइब्रेरी की शोधपत्रिका में इसी ग्रन्थकार के नाम से छपी भी थी, किन्तु शशिनाथ झा ने अपनी इस व्याख्या की भूमिका में विभिन्न प्रमाण देकर प्रतिपादित किया कि यह उदयनाचार्य की रचना है। बंगाल के न्यायशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान् श्री सत्करी मुखर्जी भी इनके विचार से सहमत थे।

उदयनकृत “न्यायमुक्तावली” की टीका

विश्वनाथ शर्मा-न्यायमुक्तावली पर “प्रकाश” नाम्नी व्याख्या, नव्यन्याय की परिष्कारप्रधान शैली में उपनिबद्ध यह टीका वाराणसी से मुद्रित है।

न्याय-वैशेषिक दोनों दर्शनों से सम्बद्ध ग्रन्थों पर टीकाएँ

जगदीश भट्टाचार्यकृत “तर्कामृत” की टीका

मुकुन्द भट्ट तरङ्गिणी बम्बई से प्रकाशित। रत्ननाथ शुक्ल-प्रभा-वाराणसी से १६५८ ई. में प्रकाशित।

उदयनकृत “न्यायकुसुमाञ्जलि” की टीकाएँ

अगाधर कविराज “कविरत्न" बंगाल (१७६६-१८८५ ई.) बंगाल के प्रसिद्ध वैद्य। काव्य, व्याकरण, काव्यशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र के चतुरस्त्र पाण्डित्य से समन्वित लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् । शोधना नाम्नी न्यायकुसुमाञ्जलि की व्याख्या गङ्गाधरमनीषा ग्रन्थमाला में कलकत्ता से १८७२ में प्रकाशित। इन्होंने वैशेषिक सूत्र, योगसूत्र, ब्रह्मसूत्र आदि पर भी व्याख्याग्रन्थ लिखे। कालीशङ्कर भट्टाचार्य-इन्होंने न्याय वैशेषिक दर्शन से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों पर५६४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास क्रोडपत्र लिखे, अतः ये “क्रोडपत्रकार” के रूप में प्रसिद्ध हैं। ये १८ वीं शती के महानैयायिक चन्द्रनारायण भट्टाचार्य के शिष्य थे। कुसुमाञ्जलि पर क्रोडपत्र-चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला - २५ में वाराणसी से प्रकाशित।।। चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार- कुसुमाञ्जलि टीका-कलकत्ता से १८४५ ई. में प्रकाशित। महेशचन्द्र न्यायरत्न-कुसुमाञ्जलि पर व्याख्या धर्मदत्त बच्चा झा, बिहार (१८६८-१६२१) न्यायकुसुमाञ्जलि-टिप्पणी काशी संस्कृत ग्रन्थमाला-३० में प्रकाशित, १E५६ ई.।। लक्ष्मीनाथ झा, बिहार धर्मदत्त बच्चा झा के शिष्य तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के अध्यापक । न्यायकुसुमाञ्जलि-टिप्पणी-कालीसंस्कृत ग्रन्थमाला-३० में मुद्रित। हरिहरकृपालु द्विवेदी, उ. प्र. (१६४६ ई. में देहावसान)-न्यायकुसुमाञ्जलि टीका अपूर्ण प्रकाशित। __कोल्लूर सोमशेखर शास्त्री, आन्ध्रप्रदेश आमोदः (कुसुमाञ्जलि व्याख्या) तिरुपति कुसुमाञ्जलि समिति द्वारा शास्त्रकल्पवल्ली ग्रन्थमाला में मुद्रित। उत्तमूर वीरराघवाचार्य, काञ्ची विस्तरा (कुसुमाञ्जलिव्याख्या) तिरुपति विद्यापीठ से १६४१ ई. में प्रकाशित। नावल्पाकं अय्या देवनाथाचार्य-न्यायवासना कुसुमाञ्जलि व्याख्या प्रकाशित।

हरिदासी कुसुमाञ्जलि के व्याख्याकार

उदयनाचार्य प्रणीत न्यायकुसुमाञ्जलि ग्रन्थ गद्यपद्यात्मक है। मूल ग्रन्थ कारिकाओं में उपनिबद्ध है, जिसपर उदयन की स्वोपन वृत्ति है। इसके मूल भाग की व्याख्या १८ वीं शती में वासुदेव सार्वभौम के शिष्य बंगालवासी हरिदास न्यायालङ्कार ने की। 0१६वीं शती में हुए चन्द्रकान्त तर्कालकार, शिवचन्द्र सार्वभौम, कामाख्यानाथ तर्कवागीश, रामकृष्ण तर्कतीर्थ ने इस हरिदासी कुसुमाञ्जलि पर व्याख्याएँ लिखी हैं। बिहार नारायण मिश्र ने १E६६ ई. में इस पर एक व्याख्या लिखी है जो भारती विद्या प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित है।

विश्वनाथ तर्कपञ्चाननकृत कारिकावली (भाषापरिच्छद) की टीकाएँ

देवी सहाय मिश्र (१६ वीं शती) “कण्ठाभरण” नाम्नी कारिकावली-व्याख्या निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित। मुकुन्द शर्मा (१६११ ई.) “अन्वितार्थप्रदीपिका” व्याख्या-बम्बई से प्रकाशित । न्यायसिद्धान्तमुक्तावली (विश्वनाथ पञ्चाननकृत) पर टीका-ग्रन्थ आलूर नृसिंह शास्त्री, काञ्ची-प्रभा नाम्नी सिद्धान्तमुक्तावली की व्याख्या, बाल दर्शन और शास्त्र ५६५ मनोरमा प्रेस से १E२३ ई. में प्रकाशित । इस प्रौढ़ व्याख्या में प्रत्येक विषय की अवतरणिका देते हुए मूल ग्रन्थ के भाव को स्पष्ट किया गया है। स्थान-स्थान पर उक्त विषय के प्रमाणरूप में सूत्र, ‘भाष्य, गादाधरी आदि ग्रन्थों से उद्धरण दिये गये हैं तथा मूलग्रन्थ की पंक्तियों का परिष्कार किया गया है। कहीं-कहीं दिनकरी का खण्डन भी किया गया है। पट्टाभिराम शास्त्री, (१८५० ई.) पूर्वोक्त नृसिंह शास्त्री के शिष्य। मन्जूषा-यह मुक्तावली की विशद व्याख्या है। बालमनोरमा प्रेस, मद्रास से १E१२ ई. में मुद्रित। कोच्चि रामवर्म परीक्षित महाराज (शासनकाल-१८६६-१६१५ ई.) सुबोधिनी (कारिकावली-मुक्तावली-दिनकरी-रामरुद्री की व्याख्या, तिरुपुनितुरा से प्रकाशित। इस व्याख्या में मूल ग्रन्थ के रहस्य को दिनकरी, रामरुद्री टीकाओं के तत्त्वार्थ विशदीकरण के द्वारा स्पष्ट किया गया है। यत्र तत्र न्यायशास्त्रीय सिद्धान्तों को साररूप में प्रस्तत किया गया है। श्री रामवर्म परीक्षित न्यायवेदान्तादि दर्शनों के तलस्पर्शी विद्वान तथा साहित्य के भी मर्मज्ञ थे। अतएव इन्हें “दर्शनकलानिधि” का विरुद प्राप्त था। आनन्द चन्द्र सार्वभौम- ‘आनन्दमयी” व्याख्या-कलकत्ता से १८६६ ई. में मुद्रित । दुर्गादत्त शास्त्री (१६०२ ई.)“प्रज्ञामनोरमा” व्याख्या-लाहौर से १६०२ ई. में प्रकाशित । पुनःसंस्करण- १६१३ ई.। जे. लल्लूराम शर्मा (१८१२ ई.) - “विषमस्थला” व्याख्या बम्बई से १८१२ ई. में प्रकाशित । मुकुन्द शर्मा - (१६१४ ई.) “प्रभा-व्याख्या-प्रत्यक्षखण्डपर्यन्त, बम्बई से प्रकाशित। अम्बिका प्रसाद शर्मा- (१६२१ ई.) “समन्वय-नाम्नी व्याख्या वाराणसी से १६२१-२२ एवं १६२८ ई. में प्रकाशित । नृसिंह देव (१६२३ ई.) -“प्रभा” टीका बाल मनोरमा संस्कत सीरीज में १E२३ ई. में प्रकाशित। “मञ्जूषा” व्याख्या-बाल मनोरमा ग्रन्थमाला ६ में १६२३ ई. में प्रकाशित । हरिदत्तशर्मा - (१६२८ ई.) “कामदुधा” व्याख्या-लाहौर से १६२८ ई. में प्रकाशित। शुक्ल शर्मा (१६३१ ई.) “मयूख” व्याख्या हरिदास संस्कृत ग्रन्थमाला १५ में वाराणसी से प्रकाशित। रत्ननाथ शुक्ल (१६३१ ई.) “प्रभा” व्याख्या - हरिदास संस्कृत ग्रन्थमाला १५ में वाराणसी से प्रकाशित, १६३१ ई.। नृसिंह त्रिपाठी उ. प्र. (१६३२ ई.) मुक्तावली-प्रकाशः-मुक्तावली शब्दखण्ड की व्याख्या, गाजीपुर से १६३२ ई. में प्रकाशित । इसमें मुक्तावली का व्याख्यान प्रश्नोत्तरी शैली में सुगम ढंग से किया गया है। कुञ्जबिहारी शर्मा तर्कसिद्धान्त (२० वीं शती पूर्वार्ध)- मुक्तावली-व्याख्या-कलकत्ता से १६३६ ई. में प्रकाशित । चन्द्रधर सिंह, बिहार (१६३६ ई.) “चन्द्रिका-व्याख्या-दरभंगा(बिहार) से प्रकाशित। कष्णवल्लभाचार्य-किरणावली व्याख्या वाराणसी से प्रकाशित । ज्वालाप्रसाद गौड़- मुक्तावली की टीका संन्यासी संस्कृत कालेज, वाराणसी से प्रकाशित। पञ्चानन भट्टाचार्य “तरत्न (१९६१ ई.)-“मुक्तावलीसंग्रह नाम्नी व्याख्या-आगमानुसन्धान समिति द्वारा कलकत्ता से प्रकाशित । सूर्यनारायण शुक्ल- ‘मयूख” व्याख्या-चौखम्बा से मुदित, अष्टम संस्करण- १६७७ ई.। रामशरण त्रिपाठी उ.प्र. (१६०८-१६७७ ई.) मुक्तावली पर “बालबोधिनी” व्याख्या गङ्गानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद से १६६३ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ई. में प्रकाशित। यह केवल मुक्तावली का प्रत्यक्षखण्ड है। सरल विशदार्थक व्याख्या।

अन्नंभट्टप्रणीत “तर्कसंग्रह” की व्याख्याएँ

मुकुन्द शर्मा- “चन्द्रिका”- निर्णयसागर प्रेस से मुद्रित । नीलकण्ठ भट्ट, आन्ध्रप्रदेश - दीपिकाप्रकाशिका तर्क-संग्रहकार की स्वोपज्ञ टीका “दीपिका” की व्याख्या। यह व्याख्या मूल ग्रन्थ के आशय को स्पष्ट करने में अतीव सफल है। स्थान-स्थान पर “अत्रेदं बोध्यम्’ “अयमाशयः” इत्यादि कहकर व्याख्यापेक्ष स्थलों को सरल ढंग से समझाया गया है। लक्ष्मीनृसिंह शास्त्री (नृसिंह यतीन्द्र)-(१८-१६ वीं शती)- भास्करोदया व्याख्या यह नीलकण्ठ भट्ट के उपयुक्त ग्रन्थ “दीपिकाप्रकाशिका” की व्याख्या है। मूल ग्रन्थ के साथ यह व्याख्या १६०३ एवं १६३३ ई. में निर्णय सागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित है। ये श्री नीलकण्ठ भट्ट के पुत्र थे। संन्यास लेने के उपरान्त काशी में आकर रहने लगे थे। एम. पी. चन्द्रजा सिंह (१६वीं शती)-(पदकृत्यम् तर्कसंग्रहव्याख्या) इसमें तर्कसंग्रह के लक्षणगत पदों की सार्थकता पर विचार किया गया है। द्वितीय संस्करण वाराणसी से १८८६ ई. में प्रकाशित। आलूर नृसिंह-शास्त्री, आन्ध्रप्रदेश-नृसिंहप्रकाशिका-तर्कसंग्रहदीपिका की विस्तृत और उत्कृष्ट व्याख्या, बालमनोरमा प्रेस (मद्रास) से १६१६ और १६२० ई. में मुद्रित। पट्टाभिराम शास्त्री - पूर्वोक्त नृसिंह-शास्त्री के शिष्य।। १- पट्टाभिरामप्रकाशिका-तर्कसंग्रहदीपिका की व्याख्या २-तर्कसंग्रह-टिप्पणी-ये दोनों ग्रन्थ बालमचोरमा प्रेस, मद्रास से १६१६ एवं १E२० ई. में प्रकाशित हैं। पट्टाभिरामीया व्याख्या अनुगमप्रधाना है। ३- वाक्यार्थबोधिनी - तर्कसंग्रह की शाब्दबोधात्मिका व्याख्या - वाविल्ला रामस्वामी पुस्तकालय से प्रकाशित। कुरुगंटि श्री राम शास्त्री, आन्ध्रप्रदेश-१- तर्कसंग्रहसर्वस्वम्-तर्कसंग्रह व्याख्या, विजयवाड़ा से प्रकाशित। २- दीपिकासर्वस्वम्-तर्कसंग्रहदीपिका-व्याख्या, मद्रास से प्रकाशित। ये दोनों व्याख्याएँ मूल ग्रन्थ के अर्थ को स्पष्ट करने के साथ-साथ न्याय के अन्यान्य ग्रन्थों में प्रतिपादित सिद्धान्तों का यत्र-तत्र संग्रह और उल्लेख करने के कारण अतीव व्युत्पत्त्याधायक हैं। रामशास्त्री श्री सूर्यनारायण शास्त्री के पुत्र तथा रामब्रह्म सुधीन्द्र के शिष्य थे। इन्होंने पञ्चलक्षणीसर्वस्व, मुक्तावलीसर्वस्व, सामान्यनिरुक्तिसर्वस्व आदि ग्रन्थों की भी रचना की। मलासुब्रह्मण्य शास्त्री, आन्ध्रप्रदेश (१८५०-१६५८ ई.)-दीपिकाप्रकाश तर्कसंग्रहदीपिका की व्याख्या, मैसूर से प्रकाशित । ये न्याय एवं अद्वैतवेदान्त के तलस्पर्शी विद्वान् थे। इन्होंने अद्वैतवेदान्त सम्बन्धी “भामतीविवरण” आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। वामाचरण भट्टाचार्य (द्वितीय), बंगाल (१८८८-१६६१ ई.)-किरणावली तर्कसंग्रह की महत्त्वपूर्ण प्रौढ़ व्याख्या, वाराणसी से प्रकाशित। टी. उत्तमूर वीरराघवाचार्य (२०वीं शती- उत्तरार्ध)-न्याय, मीमांसा और विशिष्टाद्वैत वेदान्त के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् । सुखप्रवेशिनी दर्शन और शास्त्र - तर्कसंग्रहव्याख्या, ग्रन्थकार द्वारा ही तंजौर से १६३४ ई. में प्रकाशित। एन्. एस्. रामानुज ताताचार्य, आन्ध्रप्रदेश - बालप्रिया-तर्कसंग्रह दीपिका-प्रकाशिका की व्याख्या, डॉ. वीलिनाथन महोदय के द्वारा प्रकाशित, ४०० पृष्ठों की विशद और व्युत्पादिका व्याख्या। २ तर्कसंग्रहशाब्दबोध - तर्कसंग्रह स्थित वाक्यों के प्रकृति-प्रत्ययों के अर्थनिर्देशपूर्वक शाब्दबोध कराने वाला ग्रन्थ । शिवनारायण शास्त्री “विरला” व्याख्या ग्रन्थकार द्वारा ही १E६० ई. में प्रकाशित। शिवदत्त मिश्र, उ. प्र. गङ्गा-तर्कसंग्रहव्याख्या, वाराणसी से प्रकाशित । आनन्द झा (२० वीं शती)- सीता- तर्कसंग्रहव्याख्या, वाराणसी से प्रकाशित। गुरुप्रसाद शास्त्री (२० वीं शती) - “परिमल” नाम्नी तर्कसंग्रहव्याख्या-वाराणसी से १६३४, १६३८, १६४० ई. में प्रकाशित । राम शर्मा-शक्तिसञ्जीवनी (तर्कसंग्रहव्याख्या) यह व्याख्या सरल तथा न्याय-वैशेषिक दर्शन के प्रारम्भिक प्रवेश हेतु अतीव उपयोगी है। कवर से नवनीत ग्रन्थमाला-३३ में प्रकाशित। श्री राम शर्मा श्री सुब्रह्मण्यशास्त्री (भामतीविवरण तथा तर्कसंग्रहदीपिकाप्रकाश के रचयिता) के पुत्र थे। शकरनारायण शर्मा उपर्युक्त पं. रामशर्मा कृत “शक्तिसञ्जीवनी” पर टिप्पणी-प्रकाशित। राजा गिर्याचार्य-तर्कसंग्रहव्याख्या-यह तर्कसंग्रह के प्रत्येक वाक्य की राजा गिर्याचार्य परमहंस सुजयीन्द्र तीर्थ के पूर्वाश्रम के पुत्र थे। ढुण्ढिराज शास्त्री-हेत्वाभाससोद्धरणम् तर्कसंग्रहव्याख्या, वाराणसी से १६६० ई. में मुद्रित। “प्रमाणप्रमोद (चित्रधर मिश्र) की व्याख्या दुःखमोचन झा “बबुआ” (बिहार) कृत मिथिलापुस्तकालय से प्रकाशित ।

(ग) शाब्दबोधप्रक्रिया विषयक ग्रन्थों पर टीकाएँ

गदाधर भट्टाचार्यकृत “व्युत्पत्तिवाद” पर टीकाएँ इत्यादि

कालीशङ्कर भट्ट (१८-१६ वीं शती) - व्युत्पत्तिवाद पर क्रोडपत्र-चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला-२५ में वाराणसी से मुद्रित। अनन्ताल्वार (अनन्ताचार्य) - व्युत्पत्तिवाद पर क्रोडपत्र-ये मैसूर के निवासी थे तथा आप ‘गदाधर भट्टचार्य’ के नाम से प्रसिद्ध थे। कृष्णम्भट्ट -व्युत्पत्तिवादव्याख्या - मैसूर से प्रकाशित। जयदेव मिश्र, बिहार (१८४४-१९२५) = व्युत्पत्तिवाद पर ‘जया’ व्याख्या-इलाहाबाद से १६४० ई. में प्रकाशित। मूल ग्रन्थ के दुरूह स्थलों को सरल कर बोधगम्य बनाने में यह व्याख्या अतीव सफल है। वेणीमाधव शुक्ल, उ.प्र..(१८५०-१६५३ ई.) शास्त्रार्थकला-व्युत्पत्तिवाद पर शास्त्रार्थपरक ग्रन्थ, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला-११५ में मुद्रित। खुद्दीराम शर्मा, बिहार (१६१० ई.)- नौका (व्युत्पत्तिवाद व्याख्या) मधुबनी, प्रेस, दरभंगा से १E१० ई. में मुद्रित। धर्मदत्त बच्चा झा, बिहार (१८६०-१६१८) - व्युत्पत्तिवादव्याख्या ५६८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास “गूढार्थ-तत्त्वालोक” चौखम्बा तथा निर्णयसागर प्रेस से मुद्रित (१६११ ई.), स्वतन्त्र विचारपूर्ण, प्रौढ़ तथा पाण्डित्यपूर्ण व्याख्या। धर्मदत्त (बच्चा) झा अर्वाचीन युग के बिहार के दिग्गज नैयायिक थे। ये पं. दुर्गादत्त झा के पुत्र तथा बालशास्त्री रानाडे, विश्वनाथ झा आदि के शिष्य थे। इनका कार्यक्षेत्र प्रायः वाराणसी रहा। इन्होंने न्यायदर्शन सम्बन्धी अनेक ग्रन्थों पर टीकाएँ लिखीं। भगवद्गीता पर भी इन्होंने टीका लिखी जो नव्यन्याय की शैली में उपनिबद्ध पाण्डित्यपूर्ण टीका है। शिवदत्त मिश्र, उ. प्र. (१६००-१६७१ ई.)-दीपिका (व्युत्पत्तिवाद व्याख्या) भारती विद्याभवन प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित। सुदर्शनाचार्य शास्त्री (१६-२० वीं शती)-आदर्श (व्युत्पत्तिवादव्याख्या) वेङ्कटेश्वर प्रेस, बम्बई से १६१३ ई. में मुद्रित। शशिनाथ झा - अर्थदीपिका (व्युत्पत्तिवादव्याख्या) - वाराणसी से मुद्रित। वेप्पत्तूरु सुब्रह्मण्य शास्त्री - विवरणम्-व्युत्पत्तिवाद लकारार्थ व्याख्या अण्णामले विश्वविद्यालय से १६४८ ई. में प्रकाशित। ये न्यायशास्त्र के परिनिष्ठित विद्वान् तथा राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित थे। गोदवर्मराज, केरल (१९११ ई.)- सिद्धान्तमाला (व्युत्पत्तिवाद पर संग्रहग्रन्थ) व्युत्पत्तिवाद के सिद्धान्तों का संग्रह किया गया है। लक्ष्मीकान्त झा, बिहार - व्युत्पत्तिवाद की प्रकाश व्याख्या-वाराणसी से प्रकाशित। ये पं. बच्चा झा के जीवन के उत्तरार्ध के शिष्य थे। संस्कृतमहाविद्यालय, वाराणसी में दर्शन विभाग के अध्यक्ष रहे।

गदाधर कृत “शक्तिवाद’ पर व्याख्या-ग्रन्थ

हरिनाथ तर्कवागीश (१६-२० वीं शती) - शक्तिवादव्याख्या-कलकत्ता से १८६४ ई. में मुद्रित । सुदर्शनाचार्य शास्त्री (१६-२० वीं शती) - आदर्शः (शक्तिवादव्याख्या) बम्बई से १६१३ ई. में मुद्रित । ये पं. गङ्गाधर शास्त्री के शिष्य थे। दामोदर शास्त्री, उ. प्र. (१६२७ ई.) “विनोदिनी” (शक्तिवादव्याख्या) काशी संस्कृत ग्रन्थमाला-५७ (१६२७ ई.) एवं ७७ में प्रकाशित।

शब्दशक्तिप्रकाशिका (जगदीश तर्कालङ्कारकृत) की टीकाएँ

कृष्णकान्त विद्यावागीश (१८-१E वीं शती) शक्तिसन्दीपनी व्याख्या-काशी संस्कृत ग्रन्थमाला-१०६ में मुद्रित। कालीशङ्कर भट्टाचार्य, बंगाल (१८-१६ वीं शती) शब्दशक्तिप्रकाशिका पर क्रोडपत्र चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला-२५ में मुद्रित। जयचन्द्र भट्टाचार्य “सिद्धान्तभूषण” (१९३४ ई.)- शब्दशक्तिप्रकाशिका-टिप्पणी काशी संस्कृत ग्रन्थमाला- १०६ में प्रकाशित, १६३४ ई. । ढुण्डिराज शास्त्री- शब्दशक्तिप्रकाशिकाटिप्पणी वाराणसी से प्रकाशित।

गोकुलनाथ उपाध्याय प्रणीत “पदवाक्यरत्नाकर” की व्याख्या

यदुनाथ मिश्र, बिहार (१८८५ ई०) गूढार्थदीपिका (पदवाक्यरत्नाकर व्याख्या) सरस्वतीभवन ग्रन्थमाला-८८ में मुद्रित। मूलग्रन्थ के रहस्य को उद्घाटित करने वाली दर्शन और शास्त्र ५६६ महत्त्वपूर्ण व्याख्या । यदुनाथ मिश्र पं. जयनाथ मिश्र के पुत्र तथा जुडान झा एवं लोकनाथ झा के शिष्य थे। इन्होंने न्यायसूत्रप्रदीप आदि अन्य न्याय-शास्त्रपरक ग्रन्थों की भी रचना की। भवानन्द तर्कवागीशकृत ‘षट्कारकविवेचन” की व्याख्या माधव तर्कालङ्कार माधवी व्याख्या हरिदास संस्कृत ग्रन्थमाला, १५४ में मुद्रित।

न्याय-वैशेषिक दर्शन से सम्बद्ध अन्य ग्रन्थ

जयनारायण तर्कपञ्चानन (१६ वीं शती) पदार्थतत्त्वसार न्याय-वैशेषिक ग्रन्थ, १८६७ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित। तारानाथ तर्कवाचस्पति (१८४०-१६00 ई.)-हरिराम तर्कवाचस्पति के ग्रन्थ “अनुमितेर्मानसत्वविचाररहस्यम्” पर “सरला’ टीका न्याय-वैशेषिक ग्रन्थ, १८५६ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित । २- तर्करत्नाकर न्याय-वैशेषिक ग्रन्थ, १८६८ ई. में बनारस से प्रकाशित । गङ्गाधर कविराज कविरत्न -भारद्वाजवृत्तिभाष्यम्-कलकत्ता से १८६६ ई. में प्रकाशित। हरिनाथ तर्कवाचस्पति-न्यायतत्त्वप्रबोधिनी-न्याय-वैशेषिक ग्रन्थ, कलकत्ता से १८६७ ई. में प्रकाशित। श्रीनिवासाचार्य-विशिष्टाद्वैतवादी अनन्ताचार्य के पुत्र । १- न्यायसिद्धान्त-तत्त्वामृतम् न्याय-वैशेषिक दर्शन । मद्रास गवर्नमेण्ट ओरियण्टल सीरीज-१६ में १६५० ई. में मुद्रित। कोटिलिङ्गपुर गोदवर्मराज (१६-२० वीं शती) - सिद्धान्तमाला ए. कृष्ण पिषारोटि द्वारा सम्पादित और केरल से १६११ ई. में मुद्रित । न्यायवैशेषिक दर्शन का ग्रन्थ। एस. पी. रङ्गनाथ स्वामी-कणादनयभूषणम् विजयनगरम् से १E१३ ई. में प्रकाशित। -विन्ध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदी उद्योतकर के न्यायवार्तिक पर “भूमिका” वाराणसी से १६१६ ई. में प्रकाशित। बी. ओट्टशङ्गडकर-सार्वभौमपरिष्कारः बम्बई से १६१६ ई. में प्रकाशित । यदुनाथ मिश्र (१६२८ ई. में स्वर्गवास) - ये नैयायिक लोकनाथ झा के शिष्य थे। पदवाक्यरत्नाकरव्याख्या - सम्पूर्णानन्दसंस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित। MO| वामाचरण भट्टाचार्य (द्वितीय) (१८८८-१९६१ ई.) - प्रामाण्यवादीपिका वाराणसी से १६४४ ई. में प्रकाशित । कालीपद तर्काचार्य (१८८८-१९६२ ई.) ये कणाद तर्कवागीश (१७ वीं शती) के वंशज थे। 9- कणाद तर्कवागीश के ग्रन्थ “भाषारत्न” पर टीका-संस्कृत साहित्य परिषद ग्रन्थमाला ६ में कलकत्ता में प्रकाशित, १६३६ ई. २- गदाधर के “मुक्तिवाद” की टीका सं.सा.प. ग्रन्थमाला-४ में प्रकाशित-१६२४ ई.। ३- हरिराम तर्कवागीश के मुक्तिवाद विचार पर “लक्ष्मी” टीका-कलकत्ता से १६५६ ई. में प्रकाशित। इसके अतिरिक्त इन्होंने जातिबाधविचारः, न्यायपरिभाषा और ईश्वरसमीक्षा नामक मौलिक ग्रन्थ भी लिखे। आनन्द झा-पदार्थशास्त्रम्- न्याय-वैशेषिक ग्रन्थ, वाराणसी से १६५० ई. में प्रकाशित। रामभट्ट न्यायाम्बुधिसोपानम् मद्रास से १६५० ई. में प्रकाशित। विश्वनाथ शास्त्री होशियारपुरवासी। पदार्थानुशासनम्-अहमदाबाद से १६५३ ई. में प्रकाशित । ए. के. ५७० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास भट्टाचार्य ज्ञानलक्षणाविचाररहस्यम् (हरिरामतर्कवागीशकृत) पर “विमर्शिनी” टीका कलकत्ता से १६५८ ई. में प्रकाशित।

वेदान्तदर्शन

अर्वाचीन काल में शङ्कराचार्य का अद्वैत वेदान्त अखिल भारतीय स्तर पर सर्वाधिक व्यापक और लोकप्रिय दर्शन रहा। किन्तु, विशिष्टाद्वैत एवं द्वैत वेदान्तों से इसका १२ वीं शती से ही प्रबल विरोध रहा। रामानुज ने स्वयं शङ्कराचार्य की अविद्या की अवधारणा में सप्तविध अनुपपत्तियाँ उद्भावित की। मध्वाचार्य ने भेद” को सर्वविध प्राणपण से सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया, जो शाङ्कर अभेदवादी सिद्धान्त का गहरा विरोधी था। यह परम्परा उनके अनुयायियों में आकर और प्रबल हुई। द्वैतवादी व्यासतीर्थ ने अपने ‘न्यायामृत” में “चित्सुखी” आदि अद्वैतग्रन्थों का नाना प्रकार से खण्डन किया, तो मधुसूदन सरस्वती ने अपनी “अद्वैतसिद्धि" लिखकर व्यासतीर्थ के प्रत्येक तर्क का प्रबल उत्तर देकर उन्हें निरुत्तर कर दिया। इस बीच “जगत्सत्यत्ववादी” नैयायिकों से भी छिटपुट विरोध होते रहे। १४ वीं शताब्दी में शङ्करमित्र ने “भेदरल" लिखकर अद्वैतवादी श्रीहर्ष के “खण्डनखण्डखाद्य” का उत्तर दिया और “अद्वैतवादी स्तयों" (चोरों) से भेदरत्न की रक्षा की तो मधुसूदन सरस्वती ने “भेदरत्न” का खण्डन करते हुए “अद्वैतरत्नरक्षण” नामक ग्रन्थ लिखा, जिसमें उन्होंने शङ्कर मिश्र की ही भाषा में उनका उत्तर दिया। मधुसूदन सरस्वती के उपरान्त भी यह धारा सतत प्रवहमान रही। अद्वैतसिद्धि का खण्डन मध्वानुयायी रामतीर्थ ने अपनी तरङ्गिणी में किया और पुनः उनके तर्कों को गौड़ ब्रह्मानन्द सरस्वती ने अद्वैतसिद्धि पर अपनी टीका “लघुचन्द्रिका” लिखकर प्रत्युत्तरित किया। “लघुचन्द्रिका” का प्रत्याख्यान बनमाली मिश्र ने अपनी टीका में किया और उसका उत्तर पुनः अद्वैतवाद की ओर से “अद्वैतसिद्धान्तवैजयन्ती” लिखकर दिया गया। किन्तु इस खण्डनमण्डन का चरमोत्कर्ष अर्वाचीन काल में म. म. अनन्तकृष्ण शास्त्री तथा विशिष्टाद्वैत के प्रसिद्ध विद्वान् उत्तमूर वीरराघवाचार्य के ग्रन्थों में दिखायी देता है। अनन्तकृष्ण शास्त्री ने विशिष्टाद्वैत के मूर्धन्य विद्वान् वेड्कटनाथ वेदान्तदेशिक की “शतदूषणी” के खण्डन में “शतभूषणी” नामक ग्रन्थ लिखा, जिसका खण्डन पुनः उत्तमूर राघवाचार्य की ओर से “परमार्थभूषण” नामक प्रौढ़ ग्रन्थ लिखकर किया गया। अनन्तकृष्णशास्त्री ने “वेदान्तरक्षामणिः” में रामानुज के श्रीभाष्य की आलोचना की थी, उसका खण्डन वीरराघवाचार्य ने “सिद्धान्तकौस्तुभ” नामक ग्रन्थ लिखकर किया। उन्होंने ‘परमार्थप्रकाशिका” लिखकर म. म. वासुदेव शास्त्री अभ्यकर के अद्वैतामोदः का भी खण्डन किया, जिसमें उन्होंने श्रीभाष्य का खण्डन किया था। पुनः अनन्तकृष्ण शास्त्री की ओर से “अद्वैततत्त्वशुद्धिः” लिखकर इन दोनों खण्डनों का उत्तर दिया गया और अद्वैतमत की स्थापना की गयी। अनन्तकृष्ण शास्त्री ने अपने अद्वैतमार्तण्डः नामक ग्रन्थ में देशिकाचार्य कृत “व्याससिद्धान्तमर्दनम्” का तीव्र खण्डन किया तथा “अद्वैतदीपिका" में माध्ववेदान्ती दर्शन और शास्त्र ទ្រ។ वैकटरमणाचार्य कृत “चन्द्रिकाप्रकाशप्रसरः” तथा सत्यध्यान तीर्थ के “चन्द्रिकामण्डनम्” का निरसन किया। ये दोनों ग्रन्थ राम सुब्रह्मण्य शास्त्री द्वारा प्रणीत “चन्द्रिकाखण्डनम्” (व्यासरायकृत मध्वचन्द्रिका का खण्डन) के उन्मूलन हेतु माध्ववेदान्तियों की ओर से लिखे गये थे। र राम सुब्रह्मण्य शास्त्री ने विशिष्टाद्वैतवादी अनन्ताचार्य के “न्यायभास्कर” का खण्डन “न्यायभास्करखण्डनम्” लिखकर किया तथा रुद्रभट्ट शर्मा ने देशिक वरदाचार्य के “विरोधपरिहार” का “परिहारखण्डनम्” लिखकर उत्तर दिया। नटेशार्य ने अपनी अद्वैततरणिः में उपर्युल्लिखित वेङ्कटरमणाचार्य कृत “चन्द्रिकाप्रकाशप्रसारः” का खण्डन किया। इधर अद्वैतवादी पोलकं राम शास्त्री के “द्रविडात्रेयदर्शनम्’ का खण्डन विशिष्टाद्वैतवादी डी. टी. ताताचार्य ने “विशिष्टाद्वैतसिद्धिः में किया। उन्होंने इस ग्रन्थ में अद्वैतवादी जगदीश्वर शास्त्री के भी कई ग्रन्थों का प्रत्युत्तर दिया। इस प्रकार के अनेक ग्रन्थ वेदान्त के इन तीनों प्रमुख सम्प्रदायों के भीतर खण्डनमण्डनरूप से प्रणीत होते रहे, जिन्होंने इन दर्शनों की सैद्धान्तिक उद्भावनाओं को परिष्कृत और विशद कर उन्हें उत्कर्ष पर पहुंचाया।

  • इस खण्डन-मण्डनात्मक प्रवृत्ति से अलग कुछ ऐसे भी मनीषी थे जो इन तीनों प्रमुख मतों में समन्वय ढूँढ़ रहे थे। कृष्णावधूत पण्डित (१८३४-१६०० ई.) ने इन तीनों मतों पर अपने ग्रन्थ लिखे और समन्वयात्मक प्रवृत्ति को अग्रसर किया। वासुदेव शास्त्री अभ्यङ्कर, सुदर्शनाचार्य पञ्जाबी भी इसी श्रेणी के विद्वान् थे। अद्वैतवेदान्त के अपने भीतर भी तत्त्वालोचन की दृष्टि से कुछ ग्रन्थों पर मतभेद हुआ। उदाहरणस्वरूप राजुशास्त्री के न्यायेन्दुशेखर में राम सुब्रह्मण्य शास्त्री ने दोष दर्शाये। उन्होंने अप्पयदीक्षित द्वारा भी विरचित “न्यायरक्षामणिभाष्य” से मतभेद प्रकट किया। इनके द्वारा ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य पर “सूसत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णयः’’ नामक जो ग्रन्थ लिखा गया उसका खण्डन इन्हीं के समकालीन गौरीनाथ शास्त्री ने “सूत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णयखण्डनम्” लिखकर किया, जिसका पुनः खण्डन राम सुब्रह्मण्य शास्त्री के शिष्य वेकटराघव शास्त्री ने “सूत्रभाष्य गाम्भीर्यार्थनिर्णयमण्डनम्” लिखकर किया तथा अपने गुरु की कृति को निर्दोष प्रमाणित किया।
  • इस काल में पठन-पाठन एवं शास्त्रार्थ के अखिल भारतीय स्तर पर बहप्रचलित होने के कारण अद्वैत वेदान्त, न्यायशास्त्र एवं व्याकरण इन तीनों शास्त्रीय विधाओं पर विपुल टीका-सम्पत्ति की रचना हुई, जिनसे इनके सिद्धान्तों का खण्डन-मण्डन और पूर्वपक्ष उत्तरपक्ष के निकष पर घर्षित हो पूर्ण परिष्कार हुआ। अतः ये ग्रन्थ मौलिक ग्रन्थों के समान ही आदरणीय हैं। एक टीका से दूसरी टीका तक पहुँचते-पहुँचते तत्त्व के स्वरूप में कितना परिवर्तन हो जाता है यह गङ्गा के उस प्रवाह से समझा जा सकता है जो गंगोत्री में पतली धार के रूप में निकलती है और अनेक स्रोतों के जल से परिपूर्ण होकर समुद्र से मिलते समय सहस्र धाराओं में परिपूर्ण दिखायी देती है। ५७२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

(१) शङ्कराचार्य का अद्वैत वेदान्त

रामचन्द्रेन्द्र सरस्वती (१७६५-१८५० ई.)-ये वासुदेवेन्द्र के शिष्य, उपनिषद् ब्रह्मेन्द्र के सतीर्थ्य और काञ्ची के मठाधीश थे। महावाक्यरत्नावलिः (स्वीपज्ञ ‘प्रभाव्याख्या सहित)- यह ग्रन्थ वाराणसी से मुद्रित है। इस ग्रन्थ में २० प्रकरण हैं जिनमें १०८ उपनिषदों से १०८ सहस्र महावाक्यों का प्रतिपादन किया गया है। इनके सतीर्थ्य उपनिषद् ब्रह्म ने इसपर “भासकलोचना” नाम्नी व्याख्या लिखी है। पं. गौरीनाथ शास्त्री ने उपनिषदब्रह्म की टीका के साथ इसका सम्पादन किया है तथा विषम स्थलों पर अपनी टिप्पणी भी लिखी है। . इस ग्रन्थ के अतिरिक्त भी इन्होंने कर्माकर्मविवेकः, तत्त्वंपदार्थलक्ष्यैकशतकम्, ब्रह्मतारषोडशसमाधिः, ब्रह्मप्रणवदीपिका, भेदतमोमार्तण्डशतकम् विदेहमुक्तिप्रकरणम् आदि ग्रन्थों की रचना की। TV नीलकण्ठ तीर्थ, केरल (१७७५-१९७५) -१ - अद्वैतपारिजातम् तथा इस पर शिवामृत (शिवपञ्चरल) नाम्नी स्वोपज्ञ टीका - निर्णय सागर प्रेस बम्बई से १६०१ ई. में प्रकाशित। यह एक पद्यबद्ध प्रकरण ग्रन्थ है जिसमें जीवन्मुक्त के लक्षणों का प्रतिपादन किया गया है। २-चित्सुधार्या (स्वाराज्यसर्वस्व) - इस ग्रन्थ में सांख्य, वैशेषिक, बौद्धादि मतों का खण्डन करने के उपरान्त अद्वैत मत की स्थापना की गयी है। पालघाट से प्रकाशित। ३-आत्मपञ्चकम्- पालघाट प्रेस से मुद्रित। वेदान्तकतकः, आत्मादर्शः, अष्टाक्षरस्तोत्रम्, सनत्सुजातीयव्याख्या आदि अन्य कई ग्रन्थों की भी रचना इनके द्वारा हुई है। अच्युतराय मोडक, नासिक (१७७८-१८२३)- ये नासिक (महाराष्ट्र) के निकट पञ्चवटी में रहते थे। इनके पिता का नाम नारायण साठे तथा माता का नाम अन्नपूर्णा था। इनके पितामह ने संन्यास ग्रहण कर लिया था और वे अद्वैतसच्चिदानन्देन्द्र सरस्वती के नाम से जाने जाते थे। इन्हीं अद्वैतसच्चिदानन्द के शिष्य श्रीषष्टिनारायण अच्युतराय के अद्वैत दर्शन के गुरु थे। इन्होंने अपने पिता से भी अध्ययन किया। अच्युतराय अद्वैत वेदान्त के साथ-साथ काव्यशास्त्र एवं धर्मशास्त्र के भी पारदृश्वा विद्वान् थे। इन्होंने कुल मिलाकर लगभग ३० ग्रन्थों की रचना की है जो अद्वैत वेदान्त, काव्यशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं काव्य से सम्बद्ध हैं। विद्वान् होने के साथ-साथ ये एक प्रसिद्ध कवि भी थे। इनके अद्वैतपरक प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं _१- अद्वैतविद्याविनोदः - गायकवाड़ ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट बड़ौदा-३१७ में प्रकाशित । २- महावाक्यार्थमञ्जरी - मद्रास विश्वविद्यालय से प्रकाशित । ३-अद्वैतजलजातम् ४- अद्वैतराज्यलक्ष्मीः ५- अवैदिकमततिरस्कारः ६- अद्वैतामृतमञ्जरी ७- बोथैक्यसिद्धिः (आत्मबोध व्याख्या) :- जीवन्मुक्तिविवेकव्याख्या पूर्णानन्देन्दुकौमुदी :- पञ्चदशीव्याख्या। अन्तिम दोनों आनन्दाश्रम संस्कृत सीरीज २० में पूना से प्रकाशित हैं। ५७३ दर्शन और शास्त्र गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती (१७८०-१८८० ई.)- ये सर्वज्ञ सरस्वती के प्रशिष्य एवं रामचन्द्र सरस्वती (उपनिषद्ब्रह्म के नाम से प्रसिद्ध) के शिष्य दाक्षिणात्य विद्वान थे। स्वाराज्यसिद्धिः यह इनका मौलिक ग्रन्थ है। रचनाकाल -१८५६ ई., आर्यमतसंवर्धिनी प्रेस, मद्रास से मुद्रित। यह ग्रन्थ पद्यबद्ध तथा तीन प्रकरणों में विभक्त है। इस पर लेखक ने स्वयं ‘कैवल्यगुम” नाम्नी व्याख्या लिखी है। मूल ग्रन्थ एवं ‘कैवल्यद्रुम” व्याख्या दोनों पर कृष्ण शास्त्री ने “परिमल” नाम्नी व्याख्या तथा भास्करानन्द सरस्वती ने भी व्याख्या लिखी कृष्ण गिरि (१६ वीं शती) - मोक्षसिद्धिः रचनाकाल-१८५८ ई.। मुन्नालाल प्रेस, वाराणसी से मुद्रित । इस प्रकरण ग्रन्थ में कर्म, उपासना और ज्ञान के क्रमिक अनुष्ठान से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति बतायी गयी है। कृष्णानन्द सरस्वती (१८२५-१६०० ई.) ये वाराणसी के निवासी थे। सच्चिदानन्दाश्रम तथा वासुदेवेन्द्र इनके गुरु तथा हरिकृष्ण शर्मा इनके शिष्य थे। अद्वैतविषयक इनके मौलिक ग्रन्थ हैं १- शास्त्राकृतप्रकाशः - इस ग्रन्थ में ३ आह्निक हैं जिनमें द्वैतवाद के खण्डनपूर्वक अद्वैतवाद की स्थापना की गयी है। जगदीश्वर प्रेस, बम्बई से मुद्रित। २-तिमिरोद्घाटनम् - इस ग्रन्थ में अद्वय आत्मतत्व का स्वरूप वर्णित है। राजकोट से मुद्रित। -कृष्णानन्द सरस्वती (१६ वीं शती) - ये भी वाराणसी के विद्वान् थे परन्तु उपर्युक्त कृष्णानन्द सरस्वती से भिन्न थे। ये श्री कैवल्यानन्द एवं श्री कृष्णानन्द के शिष्य थे। इन्होंने अद्वैतसाम्राज्यम्, अज्ञानतिमिरदीपकः, स्वानुभूतिप्रकाशः, गीतासारोद्वारः, ब्रह्मगीता एवं ‘अध्यात्म रामायण’ की व्याख्या “चित्प्रकाशिनी” आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। इनका प्रमुख प्रकाशित ग्रन्थ है- कैवल्यगाथा- कालपथी प्रेस, बम्बई से १६०३ ई. में प्रकाशित। / चन्द्रिकाचार्य भिक्षु (१६वीं शती)-ये दाक्षिणात्य श्री कृष्णानन्द एवं रामब्रह्मेन्द्र सरस्वती के शिष्य थे। त्यागराज शास्त्री (राजुशास्त्री के समकालीन ।)

  • अद्वैतसिद्धान्त-गुरुचन्द्रिका इसकी रचना ग्रन्थकार ने श्री त्यागराज शास्त्री की प्रेरणा पर की। इसमें प्राचीन विलुप्तप्राय अद्वैत सिद्धान्तों की श्रुति और युक्तिपूर्वक गवेषणा की गयी है। ग्रन्थकार ने स्वयं इस पर “रसझरी” नामक व्याख्या भी लिखी है। ओरियण्टल प्रेस, मद्रास से प्रकाशित। 1 त्र्यम्बक शास्त्री (१६वीं शती)-एस. सुब्रह्मण्य शास्त्री के पूर्वज । १-अद्वैतसिद्धान्तवैजयन्ती-वाणीविलास संस्कृत ग्रन्थमाला में १८१६ ई. में प्रकाशित। मध्वानुयायी वनमालीमिश्र का इसमें खण्डन किया गया है जिन्होंने गौड ब्रह्मानन्द की “लघुचन्द्रिका” का खण्डन किया था। २- श्रुतिमतानुमानोपपत्तिः कामाक्षी द्वारा सम्पादित और कुम्भकोणम् से १६१० ई. में प्रकाशित । ३-श्रुतिमतोद्योतः वाणीविलास प्रेस से १६१६५७४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास में प्रकाशित। ४- उपाधिमण्डनम्-एस. सुब्रह्मण्य शास्त्री द्वारा सम्पादित और “एनल्स ऑफ ओरियण्टल रिसर्च’ मद्रास में १६६२ ई. में प्रकाशित। त्यागराज शास्त्री (राजु शास्त्री) (१८१५-१६०४) - ये मन्नाटुडि के मूल निवासी, अप्पादीक्षित के पुत्र तथा यज्ञस्वामी दीक्षित के पिता थे। ये काव्यशास्त्र, मीमांसा, न्याय एवं अद्वैतवेदान्त के अधिकृत विद्वान थे। इन्होंने अपने पितामह से काव्यशास्त्र, श्री नारायण सरस्वती से वेदान्त, रघुनाथ शास्त्री से मीमांसा एवं श्री गोपाल शास्त्री से व्याकरण का अध्ययन किया था। -सद्विद्याविलासः छान्दोग्य-उपनिषद् के छठे अध्याय पर आधारित यह मौलिक पद्यबद्ध रचना है, जिसपर रसानुभूतिः” नाम्नी शाकरभाष्यानुसारिणी व्याख्या भी ग्रन्थकार ने स्वयं लिखी है। २-न्यायेन्दुशेखरः (चन्द्रिकाप्रसादनम्) इसमें विशिष्टाद्वैत विद्वान् श्री अनन्ताचार्य के “न्यायभास्कर” नामक ग्रन्थ का खण्डन किया गया है। न्यायभास्कर में अद्वैतसिद्धि की लघुचन्द्रिका टीका आदि ग्रन्थों का खण्डन किया गया था। राजु शास्त्री ने न्यायेन्दुशेखर लिखकर “चन्द्रिका” में प्रतिपादित अद्वैत सिद्धान्तों का पुनः मण्डन किया। यह ग्रन्थ हरिहर शास्त्री द्वारा सम्पादित और शारदा विलास प्रेस, कुम्भकोणम् में मुद्रित है, १६१५ ई.। ३. ब्रह्मविद्यातरङ्गिणीव्याख्या-यह श्रीमन्नारायण योगीन्द्र द्वारा प्रणीत अद्वैतपरक प्रकरण ग्रन्थ “ब्रह्मविद्यातरङ्गिणी” की व्याख्या है। ४. वेदान्तवादसंग्रहः - इस ग्रन्थ में अद्वैतसिद्धान्त के अवान्तर मतभेदों के पूर्वोत्तर पक्षों का विवेचन है। ५. आत्मलाभः - (अद्वैतसारः) पद्यबद्ध प्रकरण ग्रन्थ, १६५३ ई. में नवसालपुर कोआपरेटिव प्रेस से मुद्रित। इन्होंने इनके अतिरिक्त भी लगभग २० छोटे बड़े ग्रन्थों की रचना की, जिनमें स्तोत्र काव्य, वेदान्तपरक तथा धर्मशास्त्रसम्बन्धी रचनाएँ तथा कुछ अन्य हैं।
  • कृष्णावधूत पण्डित (१८३४-१६०६ ई.) ये गुहपुर के निवासी थे। इन्होंने अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एवं द्वैत तीनों मतों पर ग्रन्थ रचना की। १- अद्वैतनवनीतम् के. टी. पाण्डुरङ्गी द्वारा सम्पादित और धारवाड़ से १६५७ ई. में मुद्रित। २-सूत्रार्थामृतलहरी आर. नागराज शर्मा द्वारा सम्पादित और मद्रास गवर्नमेण्ट ओरियण्टल सीरीज ७७ में १६५१ ई. में प्रकाशित । ग्रन्थकार ने इस पर स्वोपज्ञ व्याख्या भी लिखी है। ३ सूत्रार्थपद्धतिः। हरिहर शास्त्री (१६ वीं शती) ये चिदम्बर नगर के निवासी, राजुशास्त्री के शिष्य तथा रमा शास्त्री के गुरु थे। न्यायेन्दुशेखरः (उत्तरभागः) इन्होंने अपने गुरु राजु शास्त्री द्वारा रचित “न्यायेन्दुशेखर” के उत्तरभाग को लिखकर उसे पूर्ण किया। कुम्भकोणम् से ब्रह्मविद्या पत्रिका में प्रकाशित। केशवशास्त्री मराठे (१८४५-१६२० ई.) - इनके पूर्वज महाराष्ट्रीय थे, परन्तु इनका जन्म काशी में हुआ था। इनके पिता पं. बालम्भट्ट वेदवेदाङ्ग के ज्ञाता प्रतिभाशाली विद्वान् थे। इन्होंने पं. राजाराम शास्त्री तथा पं. बाल शास्त्री से वेदान्त दर्शन तथा व्याकरणादि शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन किया था। न्याय तथा वेदान्त की दुरूह दार्शनिक समस्याओं दर्शन और शास्त्र ५७५ को सुलझाने में इनकी विशेष रुचि थी। १- आत्मसोपानम्- यह ४७६ अनुष्टुप् छन्दों में प्रणीत शास्त्री जी का अद्वैतवेदान्तविषयक मौलिक ग्रन्थ है जिसमें आत्मा की उपलब्धि के साधनों का वर्णन किया गया है। यह श्री केशव शास्त्री के अध्यात्मविषयक चिन्तन की महती देन है। पण्डित ग्रन्थमाला-४ में मुद्रित।र-स्नेहपूर्तिपरीक्षा- यह म. म. पं. राममिश्न शास्त्री के विशिष्टाद्वैतपरक ग्रन्थ “स्नेहपूर्तिः” के खण्डन हेतु लिखा गया है। राममिश्र शास्त्री ने अपने ग्रन्थ में विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन अभिनव युक्तियों द्वारा किया था। उसकी प्रौढ़ आलोचना श्री केशव शास्त्री ने अपने इस ग्रन्थ में की है और अद्वैतमत का प्रतिपादन किया है। मोहनलाल वेदान्ताचार्य, पञ्जाब (१८५०-१६१० ई.) - ये वाराणसी के निवासी पं. राममिश्र शास्त्री के शिष्य और गुरु नानक की तेरहवीं पीढ़ी के वंशज थे। वेदान्तसिद्धान्तादर्श:-वाराणसी से १८८७ ई. में मुद्रित । इस ग्रन्थ में ४ परिच्छेद हैं जिनमें अद्वैतवेदान्त के सिद्धान्त सरल शैली में वर्णित हैं। इसमें अम्बिकादत्त व्यास की रचना “दुःखद्रुमकुठारः” का निर्देश मिलता है। सुदर्शनाचार्य पञ्जाबी (१६-२० वीं शती)- अद्वैतचन्द्रिका- वाराणसी से १६०१ ई. में प्रकाशित। वासुदेवशास्त्री अभ्यङ्कर, महाराष्ट्र (१८५०-१६२० ई.)- ये पूना के निवासी तथा नागेश भट्ट के प्रशिष्य भास्कराचार्य के पौत्र थे। इन्होंने श्री भास्कराचार्य एवं श्री राम शास्त्री से शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। ये मीमांसा एवं विशिष्टाद्वैत दर्शनों के मर्मज्ञ तथा अद्वैतवेदान्त के मूर्धन्य नैष्ठिक विद्वान् थे। १-अद्वैतामोदः - १६१८ ई. में आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला-८४ में प्रकाशित। इस ग्रन्थ का प्रयोजन रामानुज के श्रीभाष्य में प्रतिपादित विशिष्टाद्वैतपरक सिद्धान्तों का खण्डन कर अद्वैतमत की स्थापना करना है। इसमें बड़े तत्त्वान्वेषी ढंग से युक्तिपूर्वक अद्वैतवेदान्त के सिद्धान्तों को उपस्थापित किया गया है। २. दर्शनाङ्कुरः - १६२४ ई. में प्रकाशित, “सर्वदर्शनसंग्रह” की व्याख्या। ३. सिद्धान्तबिन्दुव्याख्या “बिन्दुप्रपातः” भण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना से १E२८ ई. में प्रकाशित । ४. भगवद्गीता पर टीका - १६३५ ई. में आनन्दाश्रम संस्कृत सीरीज-१०६ में प्रकाशित। इन अद्वैतपरक ग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने आपदेव के “मीमांसाच्यायप्रकाश’ एवं रामानुजीय श्रीभाष्य पर भी टीकाएँ लिखीं तथा “धर्मतत्वनिर्णय” नामक ग्रन्थ लिखा जो आनन्दाश्रम संस्कृत सीरीज-६८ में पूना से १E२६ ई. में प्रकाशित है। राम सुब्रह्मण्य शास्त्री (१८५०-१E२० ई.)- श्री राम सुब्रह्ममण्य शास्त्री म. म. अश्वत्थ नारायण शास्त्री के प्रपौत्र, रामशङ्कर शास्त्री के पुत्र एवं शिवराम शास्त्री के शिष्य थे। ये चोल देश के शाहज ग्राम के निवासी थे। इनका अद्वैतवेदान्त में चिन्तन और वैदुष्य विलक्षण था। इन्होंने अद्वैतसम्बन्धी कई ग्रन्थों का प्रणयन किया- जिनमें प्रमुख निम्न हैं १-सूत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णयः-आनन्दश्रम प्रेस से प्रकाशित। इसका एक अन्य नाम ५७६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास “अणुभाष्यगाम्भीर्यम्” भी है। इस ग्रन्थ में ब्रह्मसूत्र शाकरभाष्य पर लगाये गये दोषों का खण्डन किया गया है तथा भागवतपुराणादि से अद्वैतमत की श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के लिए अनेक युक्तियाँ दी गयी हैं। इनके इस ग्रन्थ के खण्डन हेतु इनके समसामयिक पं. गौरीनाथ शास्त्री ने ‘सूत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णयखण्डनम्” नामक ग्रन्थ लिखा, जिसका खण्डन पुनः राम सुब्रह्मण्य शास्त्री के शिष्य वेङ्कट राघव शास्त्री ने “सूत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णयमण्डनम्” लिखकर किया। २. न्यायभास्करखण्डनम्-चौखम्बा प्रेस, वाराणसी से १८१६ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ का प्रणयन अनन्ताचार्य विरचित ग्रन्थ “न्यायभास्कर” का निरसन करने हेतु हुआ है, जिसमें उन्होंने अद्वैतसिद्धि की टीका “लघुचन्द्रिका” का खण्डन किया था। ३. न्यायरक्षामणिभाष्योक्तिविरोधः-“न्यायरक्षामणि” अप्पय-दीक्षित द्वारा विरचित ब्रह्मसूत्रवृत्तिरूप ग्रन्थ है जो प्रथम अध्याय पर्यन्त ही उपलब्ध होता है। राम सुब्रह्मण्य शास्त्री द्वारा रचित न्यायरक्षामणिविरोधः नामक उपर्युक्त ग्रन्थ में दर्शाया गया है कि “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” इस सूत्र का अप्पय दीक्षित द्वारा किया गया अर्थ तथा अन्यत्र भी प्रकटित मन्तव्य, शाङ्कर भाष्य के विपरीत हैं। ४. न्यायेन्दुशेखर दोषयोगघटनग्रन्थः- इस ग्रन्थ में राजु शास्त्री के न्यायेन्दुशेखर में दोष दर्शाये गये हैं। विनायक प्रेस, चिदम्बरम् से मुद्रित। ५. मध्वचन्द्रिकाखण्डनम्- चौखम्बा, वाराणसी से १E१E ई. में मुद्रित । इसमें व्यासतीर्थ प्रणीत द्वैतदर्शन के ग्रन्थ ‘मध्वचन्द्रिका’’ का खण्डन किया गया है। यह ग्रन्थ ‘न्यायभास्करखण्डनम्" नामक उपर्युक्त ग्रन्थ के साथ प्रकाशित है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त भी शास्त्री जी ने अद्वैतविषयक ५० से अधिक ग्रन्थों की रचना की, जो अभी अप्रकाशित हैं। शङ्कर चैतन्य भारती (१८५०-१६४०)-ये वाराणसी के संन्यासी संस्कृत कालेज से सम्बन्द्र रहे। १. ख्यातिवादः इसमें पञ्च ख्यातियों का वर्णन करके अनिर्वचनीय ख्यातिवाद की स्थापना की गयी है। वाराणसी संस्कृत ग्रन्थमाला-५८ में प्रकाशित। २. दर्शनसर्वस्वम्-यह खण्डनखण्डखाद्य की “शारदा" नाम्नी इनकी टीका की प्रमेय बहुल विस्तृत भूमिका है जो एक स्वतन्त्र ग्रन्थ का अस्तित्व रखती है। इसमें विज्ञानवाद, शून्यवाद, स्वातन्त्र्यवाद आदिमतों की दार्शनिक कमियों को युक्तियों द्वारा प्रदर्शित कर अनिर्वचनीयता के सिद्धान्त को स्थापित किया गाया है। वाराणसी के संन्यासी संस्कृत कालेज द्वारा प्रकाशित । कामाक्षी- १८५१-१६२० ई.-ये कावेरी के समीप चोलदेश की निवासिनी परम विदुषी महिला थीं। इनके पिता का नाम रामस्वामी था । मात्र १६ वर्ष की अवस्था में ही इनके पति की मृत्यु हो गयी। वैधव्य के उपरान्त पितृगृह में रहकर इन्होंने न्यायशास्त्र और अद्वैतग्रन्थों का अध्ययन किया और प्रकाण्ड वैदुष्य अर्जित किया। इनके द्वारा रचित अद्वैतविषयक प्रमुख प्रकाशित ग्रन्थ हैं १. अद्वैतदीपिका- इसमें अद्वैतसिद्धि में प्रतिपादित मिथ्यात्व तथा अद्वयतत्त्व के परिष्कारों का संग्रह है। नटेश शास्त्री द्वारा सम्पादित और मयवेरम् से १६१० ई. में दर्शन और शास्त्र ५७७ प्रकाशित। २-श्रुतिमतप्रकाश-टिपप्णी- यह त्र्यम्यबक शास्त्री द्वारा विरचित ग्रन्थ पर टिप्पणी है। कुम्भकोणम् से १६१० ई. में प्रकाशित। ३. श्रुतिमतोद्योत-टिप्पणी- यह भी त्र्यम्बक शास्त्री द्वारा रचित मूल ग्रन्थ की टिप्पणी है, जो कुम्भकोणम् से ही मुद्रित है। राम शास्त्री, काञ्ची (१८७५-१६३० ई.)- ये दाक्षिणात्य तिरुनेल नगर के निवासी, पं. हरिहर शास्त्री के शिष्य तथा न्याय एंव वेदान्त के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान थे। कप्यासकौमुदी-अनन्तशयन के भास्कर प्रेस से मुद्रित। इस ग्रन्थ में छान्दोग्य उपनिषद् के अन्तर्गत आये “कप्यास" शब्द विशिष्टाद्वैतियों द्वारा निरूपित अर्थ का खण्डन करके व्याकरण की उपपत्ति द्वारा शाङ्करभाष्यसम्मत अर्थ को स्थापित किया गया है। एन० एस० अनन्तकृष्टण शास्त्री, केरल (१८८६ ई.) म. म. अनन्तकृष्ण शास्त्री का जन्म पालक्क के अन्तर्गत “मूरणि" ग्राम में हुआ था। इन्होंने पं. हरिहर शास्त्री से व्याकरण एवं मद्रास संस्कृत कालेज में पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा का अध्ययन किया। इसके पश्चात् इन्होंने तिरुपति संस्कृत कालेज, कलकत्ता संस्कृत कालेज तथा बम्बई के भारतीय विद्याभवन के गीता विद्यालय में अध्यापन कार्य किया। अनन्तकृष्णशास्त्री का नाम आधुनिक अद्वैतवादी दार्शनिकों में सर्वोपरि है। इनके और विशिष्टाद्वैतवादी विद्वान उत्तमूर वीरराघवाचार्य के जो इनके केवल समसामयिक ही नहीं अभिन्न मित्र भी थे, बीच चला खण्डन-मण्डनात्मक विवाद वेदान्त की दोनो शाखाओं की उज्ज्वल गौरवगाथा है। इनकी अद्वैततत्त्वशुद्धि और शतभूषणी स्वस्थ शास्त्रीय प्रतिस्पर्धा की स्पृहणीय परम्परा का मेरुदण्ड है। शास्त्री जी द्वारा प्रणीत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है-१. वेदान्तरक्षामणिः- म. म. अनन्तकृष्ण शास्त्री ने इस ग्रन्थ की रचना२ भागों में की है। प्रथम भाग में रामानुज के श्रीभाष्य की परीक्षा तथा समालोचना की गयी है। यह भाग १६१७ ई. में प्रकाशित हुआ। द्वितीय भाग में ब्रह्मसूत्र के आनन्दमयाधिकरण का विवेचन है। इस भाग का प्रकाशन १६२८ ई० में हुआ। विश्वमित्र प्रेस, कलकत्ता से मुद्रित। २-अद्वैततत्त्वशुद्धिः इस ग्रन्थ में अनन्तकृष्ण शास्त्री ने यू. वीरराघवाचार्य की “परमार्थप्रकाशिका” में प्रतिपादित विशिष्टाद्वैतपरक सिद्धान्तों की आलोचना एवं खण्डनपूर्वक अद्वैतमत की स्थापना की है। १६५८ ई. में मद्रास से प्रकाशित। ३-शतभूषणी- यह इनका सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसमें विशिष्टाद्वैत के आचार्य वेदान्तदेशिक की “शतदूषणी” का परीक्षापूर्वक खण्डन किया गया है। वेदान्तदेशिक ने अद्वैतमत में सौ दूषणों की उद्भावना की थी। उनका खण्डन कर अनन्तकृष्ण शास्त्री ने अद्वैतवेदान्त में सौ भूषण बताये हैं। यह ग्रन्थ मद्रास के पी. जी. पाल प्रेस से १६५६ ई. में मुद्रित है। ४-अद्वैततत्त्वसुधा-२ भागों में प्रस्तुत यह ग्रन्थ उत्तमूर वीरराघवाचार्य के “परमार्थभूषणम्” का खण्डन है। वीरराघवाचार्य ने शास्त्री जी की “शतभूषणी’ की आलोचना “परमार्थभूषणम्" लिखकर की थी। उसका खण्डन अद्वैततत्त्वसुधा के दूसरे भाग में शास्त्री जी ने की। इसके प्रथम भाग में विशिष्टाद्वैत तथा अद्वैत दर्शन के सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है। प्रथम भाग का प्रकाशन १६६० ई. में तथा द्वितीय भाग का १९६२ ई. में वाराणसी से हुआ। ५-वेदान्तपरिभाषा-प्रकाशिका-यह “वेदान्तपरिभाषा” की व्याख्या ५७८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास है जो कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रकाशित है। ६-अद्वैतमार्तण्ड:-इस ग्रन्थ में *व्याससिद्धान्तमर्दनम्" (देशिकाचार्यकृत) आदि विशिष्टाद्वैत-द्वैतपरक ग्रन्थों का खण्डन कर अद्वैत सिद्धान्त की स्थापना की गयी है। वणिक् प्रेस, कलकत्ता से मुद्रित। ७-शारीरकभाष्यटिप्पणीप्रदीपः कलकत्ता संस्कृतग्रन्थमाला-9 में मुद्रित, १६३३ ई.। ८-अद्वैतदीपिका-द्वैतवेदान्ती श्री वेडकटरमणाचार्य द्वारा विरचित “चन्द्रिकाप्रकाशप्रसरः” तथा सत्यध्यानतीर्थकृत “चन्द्रिकामण्डनम्” के खण्डन हेतु प्रणीत ग्रन्थ । वेङ्कटरमणाचार्य ने “(तात्पर्य) चन्द्रिकाप्रकाशप्रसरः” ग्रन्थ राम सुब्रह्मण्य शास्त्री द्वारा प्रणीत ग्रन्थ “चन्द्रिकाखण्डनम्" (व्यासराय कृत मध्वचन्द्रिका का खण्डन) के निरसन हेतु लिखा था। अद्वैतदीपिका में सत्यध्यान तीर्थकृत “चन्द्रिकामण्डनम्” का भी खण्डन किया गया है तथा अद्वैतमत की स्थापना की गयी है। ६. चतुर्ग्रन्थिसंग्रह कलकत्ता संस्कृत सीरीज में प्रकाशित । १०. भगवद्गीता भरतीयदर्शनानि च - इस ग्रन्थ में भगवद्गीता का अद्वैतवेदान्त में ही तात्पर्य विनिश्चित किया गया है। भारतीय विद्याभवन ग्रन्थमाला-४ में मुम्बई से मुद्रित । ११. शारीरिकन्याससंग्रहदीपिका- कलकत्ता संस्कृत ग्रन्थमाला-१ में प्रकाशित १६४१ ई.। प्रकाशात्मा के “शारीरकन्याससंग्रह” की टीका। वाई. सुब्रह्मण्य शर्मा (१८९०-१६३० ई.)- ये बंगलौर के समीप यलम्बसि ग्राम के निवासी थे। मूलविद्यानिरासः (श्रीशङ्करहृदयम्) - यह एक महत्त्वपूर्ण रचना है, जिसमें अद्वैतमतानुसार अविद्या के स्वरूप, उसके आश्रय तथा विषय, उसके कार्य का वर्णन करते हुए अविद्या उन्मूलन के उपाय को प्रदर्शित किया गया है। अध्यात्म प्रेस बंगलौर से प्रकाशित। सूर्यनारायण शुक्ल, उ०प्र० (१८६५-१६४४ ई.) - ये फैजाबाद के निवासी पं. रामेश्वरदत्त शुक्ल के पुत्र, पं. वामाचरण भट्टाचार्य के शिष्य तथा पं. चिन्नस्वामी शास्त्री के समकलीन और मित्र थे। इन्होंने वाराणसी के संस्कृत कालेज में वर्षों दर्शन विषय का अध्यापन कार्य किया। ये न्याय, व्याकरण एवं अद्वैतवेदान्त के प्रतिभासम्पन्न मनीषी और लेखक थे। इनके अद्वैतविषयक ग्रन्थ हैं-१. माध्वमुखभगः- यह “अद्वैतरसनाकर्तरी” नामक ग्रन्थ के खण्डन हेतु प्रणीत है। इसमें वेद, उपनिषद् आदि से प्रमाण देकर द्वैत का खण्डन तथा अद्वैतवाद की स्थापना की गयी है। यह ग्रन्थ वाराणसी के हितचिन्तक प्रेस से मुद्रित है। २. माध्वभ्रान्तिनिरासः- इस ग्रन्थ में अद्वैतभान्तिप्रकाशः नामक द्वैतपरक ग्रन्थ का खण्डन किया गया है। वाराणसी से प्रकाशित । १-और २-दोनों ग्रन्थों में सत्यध्यान तीर्थ द्वारा प्रदर्शित अद्वैत विषयक भ्रान्तियों का निराकरण तथा माध्वमत के भेदवाद के अवैदिकत्व का प्रदर्शन है। ३. खण्डनरत्नमालिका-खण्डनखण्डखाद्य का सारसंग्रहभूतग्रन्थ । ४. निर्विकल्पताबाद:- शुक्ल जी ने “वादरत्नम्” नामक व्याकरणविषयक शास्त्रार्थ ग्रन्थ तथा मुक्तावलीमयूख, तर्कसंग्रहदीपिकामयूख आदि अनेक न्यायविषयक टीका ग्रन्थों की भी रचना की। पोलकं राम शास्त्री-(१६००-१६६८ ई.) इनका जन्म चोल देश के नन्निल ग्राम के दर्शन और शास्त्र समीप ‘पोल" नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने हरिहर शास्त्री, दण्डपाणि स्वामी तथा वेङ्कट राम शास्त्री से शास्त्रों का अध्ययन किया था। ये शिवाद्वैत तथा शाङ्कराद्वैत दोंनो के पारदृश्वा विद्वान थे। १. द्रविडात्रेयदर्शनम्- इस ग्रन्थ में शङ्कराचार्य से पूर्ववर्ती ब्रहमनन्दी तथा द्रविड़ाचार्य के सिद्धान्तों को दर्शाया गया है। बी.जी.पाल प्रेस से मुद्रित । इस ग्रन्थ तथा आगामी ग्रन्थ ‘चतुर्मतसामरस्यम्" का खण्डन देवनाथ ताताचार्य ने अपनी “विशिष्टाद्वैतसिद्धिः” में किया है। २. चतुर्मतसामरस्यम्- कामकोटि से मुद्रित। ३. आभोगटिप्पणी- मद्रास राजकीयपाण्डुलिपि पुस्तकालय से मुद्रित । यह ग्रन्थ लक्ष्मीनृसिंह (१७-१८वीं शती) कृत “आभोग” (कल्पतरुव्याख्या) की टिप्पणी है। इसमें “आभोग” में वर्णित विषयों को संक्षेप में सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जगदीश्वर शास्त्री (२० वीं शती) ये यज्ञराम दीक्षित के पुत्र तथा कृष्णयज्ञ स्वामी एवं वेड्कट राम शास्त्री के शिष्य थे। इनका जन्म कुम्भकोणम् के समीप इञ्जिक्कोल्लै गाम में हुआ था। १. निर्गुणतत्त्वनिर्णयः २. चिदचिच्छारीरकब्रमसिद्धिः ३. सप्तविधानुपपत्तिप्रकाशः ये सभी ग्रन्थ अद्वैतमहासभा में मुद्रित हैं। इनके ग्रन्थों का खण्डन देवनाथ ताताचार्य ने अपनी “विशिष्टाद्वैतसिद्धिः" में किया हैं।

अद्वैतविषयक अन्य रचनाएँ

भवानीशङ्करानन्द (१७५०-१८५० ई.)-रघुनाथ यतीन्द्र के शिष्य । अद्वैतसिद्धान्तदीपिका-श्रीमहत्पुर के नक्षत्रशोधन प्रेस से मुद्रित। ६ परिच्छेदों में सम्पूर्ण इस ग्रन्थ के प्रथम पाँच परिच्छेदों में न्याय, वैशेषिक, सांख्य, मीमांसा, विशिष्टाद्वैत और द्वैत मतों का खण्डन है और छठवें परिच्छेद में अद्वैतवाद की स्थापना और उसका विवेचन किया गया है। /माधवाश्रम (१७५०-१८५०) - ये वाराणसी के निवासी और श्री नारायणाश्रम के शिष्य थे। स्वानुभवादर्श:- कलकत्ता संस्कृत सीरीज-१७१ और २५६ में मुद्रित । यह २१५ पद्यों में उपनिबद्ध एक प्रकरण ग्रन्थ है जिसपर “अर्थप्रकाशिका" स्वोपज्ञ व्याख्या ग्रन्धकार द्वारा रचित है। स्वामी निश्चलदास (१८-१८वीं शती)-युक्तिप्रकाश-बम्बई से १६१३ ई. में प्रकाशित। शान्तिनाथ साधु (१८-१६वीं शती)-अद्वैततत्त्वप्रबोधिनी-२ भागों में विरचित । भारतीय दर्शन संस्थान, अमलनेर से मुद्रित। वेदान्त के सैकड़ों अमुद्रित ग्रन्थों में बिखरी पड़ी अनेक अद्वैतसाधक युक्तियों का इसमें सङ्कलन किया गया है। कृष्णचन्द्र (१६ वीं शती)-ज्ञानप्रदीपः - कलकत्ता से १८७३ ई. में प्रकाशित। ब्रह्मानन्द तीर्थ (१६ वीं शती) - तार्किकमोहप्रकाशः-इलाहाबाद से १८६२ ई. में प्रकाशित। गोविन्दानन्द सरस्वती-(१८८५ ई.)-वाराणसीवासी विद्वान्, माधवानन्द सरस्वती के ५८० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास शिष्य-ब्रह्मसुधाकारिका - निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित। र जगन्नाथ सरस्वती ‘यतीन्द्र" (१६ वीं शती)- ये हरिहर सरस्वती के शिष्य थे। अद्वैतामृतम्-पं. मोहनलाल शर्माकृत “अमृततरङ्गिणी टीका के साथ १८६४ ई. में जगदीश्वर प्रेस, बम्बई से मुद्रित। - भास्करानन्द सरस्वती, उ. प्र. (१८३३-१८६६)-अनुभूतिविवरणम् (स्वोपज्ञ व्याख्या सहित) भारतीयजीवन प्रेस, काशी से १८६६ में प्रकाशित। गां कोच्चि रङ्गप्पाचार्य (१८२०-१८६१) - चन्द्रिकाभूषणम्- कुम्भकोणम् से १६०५ ई. में प्रकाशित (जिज्ञासाधिकरणपर्यन्त)। इस ग्रन्थ में रघुनाथ शास्त्री का खण्डन किया गया है। हेमचन्द्र (१८-२० वीं शती) अद्वैतसिद्धान्त-लाहौर से १६०१ ई. में प्रकाशित। वीरराघव यज्वा (१९-२० वीं शती) - अद्वैतब्रह्मतत्त्वप्रकाशिका-नेल्लोर से १६०७ ई. में मुद्रित। वाणीकण्ठ शर्मा (9E-२० वीं शती)-अद्वैतखण्डनमण्डनम्-कलकत्ता से १६१२ ई. में प्रकाशित। रुद्रभट्ट शर्मा (१E-२० ई. शती)-परिहारखण्डनम्-वाराणसी से १६१६ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में देशिक वरदाचार्य के अन्य “विरोधपरिहार” का खण्डन किया गया है जिसे वरदाचार्य ने काशी के विश्वेश्वर शास्त्री के विरोध नामक पत्र के उत्तर में लिखा था। हरिहरकृपालु द्विवेदी, उ. प्र. (१८७०-१६४८ ई.)-वेदान्तप्रबन्ध-१६१६ ई. में रचित। सुन्दर राम शास्त्री (१८५०-१६२०)-ये रामलिङ्गार्य (ब्रह्मानन्द) के पुत्र थे। सर्ववेदान्ततात्पर्यसारसंग्रहः -विक्टोरिया प्रेस से मुद्रित। हरिराम शर्मा (१६-२० वीं शती) रामानुजीयमतविमर्दनम् - अहमदाबाद से १६१८-१६ ई. में प्रकाशित। अद्वैतेन्द्र सरस्वती (१६-२० वीं शती) - स्वानुभवतरङ्गाः- पूना से १६२० ई. में प्रकाशित। राघवेन्द्र रायपाल (१६-२० वीं शती) - अद्वैतदीपिकाविमर्शः मैसूर से १६२२ ई. में प्रकाशित। नटेशार्य (१८५०-१E१०) - अद्वैततरणिः - वेङ्कट सुब्रह्मण्य शास्त्री द्वारा सम्पादित और बालमनोरमा प्रेस, मद्रास से १६२६ ई. में प्रकाशित । इस ग्रन्थ में वेकटरमणाचार्य द्वारा विरचित “चन्द्रिकाप्रकाशप्रसरः” नामक ग्रन्थ का खण्डन किया गया है। मल्लडि रामकृष्ण (२० वीं शती) भ्रममञ्जरी-विजयवाड़ा से प्रकाशित। ब्रह्मलीन मुनि (२०वीं शती) - वेदान्तसुधा-सूरत से १६५६ ई. में प्रकाशित । दर्शन और शास्त्र ५८१ हरिहरानन्द सरस्वती (स्वामी करपात्री)- अद्वैतबोधदीपिका-अण्णामले से १६६० ई. में प्रकाशित। कालीकुमार मिश्र - वेदान्तानुभूतिकारिका-वर्दवान से प्रकाशित। द्विजेन्द्रलाल पुरकायस्थ- जयपुर के निवासी तथा पट्टाभिराम शास्त्री के शिष्य। अद्वैतामृतसार:- जयपुर से प्रकाशित। पद्यबद्ध लघु प्रकरण ग्रन्थ।

अद्वैतविषयक टीका व्याख्या ग्रन्थ, उपनिषदों पर टीकाएँ, व्याख्या, विवरण इत्यादि

वेङ्कटाचार्य गजेन्द्रगडकर, महाराष्ट्र (१७६२-१८५२) - सतारा के राज्याश्रित विद्वान्। श्वेताश्वतरोपनिषद्-व्याख्या। उपनिषद् ब्रह्मेन्द्र (१७५०-१८५०)- ईशाधष्टोत्तरशतोपनिषद्विवरणम्-अड्यार लाइब्रेरी सीरीज से प्रकाशित। अमरदास - (१५-१६ वीं शती) - श्रीचन्द्र इनके दीक्षागुरु तथा ब्रह्मविज्ञान इनके विद्यागुरु थे। ईश-केन-कठ-ऐतरेय-तैत्तिरीय-प्रश्न-माण्ड्क्य -मुण्डकोपनिषद् की “मणिप्रभा” व्याख्या- चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित। भास्करानन्द सरस्वती (१८३३-१८EE) इनका जन्म कानपुर मण्डल के “मिथिलाल” गाँव में हुआ था, परन्तु ये काशी में निवास करने लगे थे। दशोपनिषद् टीका “प्रकाशः”। यह उपनिषदों के रहस्य का उद्घाटन करने वाली सुबोध टीका है। रचनाकाल- १८६५ ई। भारती जीवन प्रेस, वाराणसी से १८६६ ई. में प्रकाशित। बलभद्र शर्मा-(१६-२० वीं शती) - ईशोपनिषद् पर बालभाष्यम्-नादियाड से प्रकाशित। श्रीधर शास्त्री पाठक (स्वामी शङ्करानन्द भारती), महाराष्ट्र (१८७८-१६६० ई.) त्र्यम्बक शास्त्री के पुत्र, डेकन कालेज पूना से सम्बद्ध । ईश-केन कठ और मुण्डक उपनिषदों की टीका “बालबोधिनी” पूना से १६२१ ई. में प्रकाशित। - सीताराम तर्कभूषण (१९-२० वीं शती)-शङ्कराचार्य के ऐतरेयोपनिषद्भाष्य पर “शङ्करकृपा’ नाम्नी टीका-१६२१ ई. में प्रकाशित (तृतीय संस्करण)। लक्ष्मण सूरि (१८२०-१६२० ई.)-ये दाक्षिणात्य, तिरुनेलवेली के निकट “हरिकेशनल्लर” के निवासी थे। उपनिषत्संक्षेपवार्तिकम्-इस ग्रन्थ में अनुष्टुप् छन्द में निर्मित वार्तिकों के द्वारा समस्त उपनिषदों के तात्पर्य का साररूप प्रस्तुत किया गया है। लाई सच्चिदानन्देन्द्र सरस्वती (२० वीं शती) शङ्कर के केनोपनिषद्भाष्य पर टीका होलेनरसीपुर से १६५६ ई. में प्रकाशित। ब्रह्मसूत्र तथा उसपर शाङ्करभाष्य से सम्बन्धित टीकाएँ इत्यादि भौरव शर्मा “तिलक” (१७५०-१८५० ई.)- ब्रह्मसूत्रतात्पर्यविवरणम्- पण्डित नूतन ग्रन्थमाला में वाराणसी से प्रकाशित। रचनाकाल - १८२४ ई.। ५८२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास उपनिषद् ब्रह्मेन्द्र (१७६०-१८५०) १- सूत्रभाष्यसिद्धान्तसंग्रहः (ब्रह्मसूत्रसिद्धान्तसंग्रह) अड्यार लाइब्रेरी से प्रकाशित । इस ग्रन्थ में शाङ्कर भाष्य के प्रत्येक अधिकरण का सार प्रस्तुत किया गया है। २- ब्रह्मसूत्रायद्विशतिका-अयार लाइब्रेरी और निर्णय सागर प्रेस से प्रकाशित २०० आर्या छन्दों में ब्रह्मसूत्र के विषयों का उपन्यास करने वाला ग्रन्थ।

  • के. ए. गोविन्दविष्णु (१६ वीं शती) - शङ्कराचार्य के ब्रह्मसूत्रभाष्य पर टिप्पणी, बम्बई से १८६७ ई. में प्रकाशित।
  • वनमाली मिश्र (१६ वीं शती) ब्रह्मसूत्रसिद्धान्तमुक्तावली-यह ग्रन्थ ब्रह्मसूत्रों की वृत्ति के रूप में प्रणीत है। चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित। कृष्णानन्द सरस्वती - १८२५-१६०० ई. - सच्चिदानन्दा श्रम और वासुदेवेन्द्र योगी के शिष्य, वाराणसी के निवासी विद्वान् । ब्रह्मसूत्रकुतुहलम-राजराजेश्वरी प्रेस, वाराणसी से मुद्रित । इस ग्रन्थ में “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” से लेकर “ज्योतिश्चरणाभिधानात्” पर्यन्त २४ सूत्रों की वृत्ति लिखी गयी है। ग्रन्थ की अवतरणिका में अद्वैतसिद्धान्तों को स्पष्ट किया गया है। अनन्तानन्द गिरि (१६-२० वीं शती) - शङ्कराचार्य के ब्रह्मसूत्रभाष्य पर “सारसंग्रह" वाराणसी से १६०० ई. में प्रकाशित। गिरीन्द्रनाथ वेदान्तरल, बंगाल (१६-२० वीं शती) - ब्रह्मसूत्रों पर “तत्त्वप्रबोधिनी” तत्वमीमांसादर्शन, १६२२ ई. में प्रकाशित। कालिकेश वन्द्योपाध्याय, बंगाल (१६-२० वीं शती) - ब्रह्मसूत्र-व्याख्या-कलकत्ता से १ERE ई. में प्रकाशित। आर. एस. शर्मा, उ. प्र. (१०-२० वीं शती)-ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य की टीका (चतुस्सूत्रीपर्यन्त) मुरादाबाद से १६३१ ई. में प्रकाशित। नरकण्ठीरव शास्त्री (१८५०-१६५०)-ये वेङ्कटेश्वर संस्कृत पाठशाला में अध्यापक थे। व्यासतात्पर्यदीपिका-प्रकाशित। राम सुब्रह्मण्य शास्त्री (राम सुब्बा शास्त्री) (१८५०-१६२० ई.)-सूत्रभाष्यगाम्भीर्य निर्णयः-आनन्दाश्रम प्रेस, मद्रास से प्रकाशित। इस ग्रन्थ में ब्रह्मसूत्र और उस पर शाकरभाष्य पर सार प्रस्तुत किया गया है तथा शाङ्करभाष्य पर प्रतिपक्षियों द्वारा लगाये दोषों का निराकरण किया गया है। गुरुस्वामी शास्त्री (१८५०-१६१० ई.)-कुम्भकोणम् के समीप “वरहू” ग्राम में जन्म। मद्रास संस्कृत कालेज मे बाल सुब्रह्मण्य शास्त्री, वैद्यनाथ शास्त्री आदि से शास्त्रों का अध्ययन किया । १-तात्पर्यविमर्शिनी-अद्वैतानन्द तीर्थकृत “ब्रह्मसूत्रतात्पर्यदीपिका” की व्याख्या। २-शारीकव्याख्याप्रस्थानानि-इस ग्रन्थ में शाङ्कर भाष्य के आधार पर लिखे गये पद्मपाद, मण्डनमिश्र, सुरेश्वर, विमुक्तात्मा, प्रकटार्थकार, नृसिंहाश्रम आदि की व्याख्याओं का विवेचन किया गया है। बाल मनोरमा प्रेस से मुद्रित। दर्शन और शास्त्र ५८३ नीलमेघ शास्त्री (१८५०-१६१०) - चोलदेशीय तिरुविशन्नलूर ग्राम के निवासी, राम सुब्रह्मण्य शास्त्री के शिष्य। वेदान्तनवमालिका (लघुवृत्ति)-ओरियण्टल पब्लिशिंग हाउस, मद्रास से मुद्रित। रघुनाथ सूरि “पर्वत” महाराष्ट्र (१६-२० वीं शती) ये श्री रामचन्द्र सूरि के पुत्र और राम शास्त्री के पिता थे। जीवन के उत्तरार्ध में नाना साहब के समाश्रित रहे। शङ्करपादभूषणम् (अद्वैतरक्षाकरण्डकः) - आनन्दाश्रमसंस्कृत ग्रन्थमाला -१०१ में प्रकाशित १६३२ ई.। इस ग्रन्थ में ब्रह्मसूत्र के प्रथम और द्वितीय अध्याय व्याख्यात हैं। प्रत्येक सूत्र में शङ्कराचार्य के मत का प्रतिपादन और द्वैतवादी आनन्दतीर्थ आदि द्वारा अद्वैत दर्शन में उद्भावित दूषणों का तीव्र खण्डन किया गया है। यह नव्य न्याय शैली में उपनिबद्ध प्रौढ़ ग्रन्थ है। गौरीनाथ शास्त्री (१८५०-१६२०) - सूत्रभाष्यगाम्भीयार्थनिर्णयखण्डनम्-वाणी विलास प्रेस से मुदित। अद्वैतपरक इस ग्रन्थ में राम सुब्रह्मण्य शास्त्री कृत उपयुक्त ग्रन्थ (सूत्रभाष्यगाम्भीर्यनिर्णयः) का खण्डन किया गया है तथा उसमें स्वीकृत पद्धति का अनौचित्य दर्शाया गया है। इसके लेखक गौरीनाथ शास्त्री श्री स्वामीनाथ शास्त्री के पौत्र, नृसिंह शास्त्री के पुत्र तथा सच्चिदानन्द सरस्वती के शिष्य थे। वेङ्कटराघव शास्त्री - (१८५०-१६२०) - सूत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णयमण्डनम् ब्रह्मवादिनी प्रेस, मद्रास से मुद्रित। इस ग्रन्थ में गौरीनाथ शास्त्री के उपर्युक्त ग्रन्थ “सूत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णयखण्डनम्” का खण्डन करके राम सुब्रह्मण्य शास्त्री के मूल ग्रन्थ “सत्रभाष्यगाम्भीर्यार्थनिर्णय” का मण्डन किया गया है। ग्रन्थकार वेडकटराघव शास्त्री श्री राम सुब्रह्मण्य शास्त्री के शिष्य तथा कृष्ण शास्त्री एवं नारायण शास्त्री के सतीर्थ्य थे। कृष्णशास्त्री (१९७०-१६३७) - म. म. कृष्णशास्त्री तिरुनेलवेली के निवासी और श्री श्रीहरिहरशास्त्री के शिष्य थे। इन्होंने मद्रास संस्कृत कालेज में प्राचार्य पद पर कार्य किया। वृद्धावस्था में इन्होंने संन्यास ले लिया था। अधिकरणचतुष्टयी-मद्रास के बाल मनोरमा प्रेस से प्रकाशित । इस ग्रन्थ में ब्रह्मसूत्र के आनन्दमयाधिकरण, यथाश्रयभावाधिकरण, ऐहिकाधिकरण और लिङ्गभूयस्त्वाधिकरण- इन चार अधिकरणों के विषयों पर विचार किया गया है। २- ब्रह्मसूत्रानुगुण्यसिद्धिः गोपालविलास प्रेस, कुम्भकोणम् से प्रकाशित। गेल्लङ्मोण्ड रामराय, आन्ध्रप्रदेश (१६-२० शती) राम शास्त्री और सुब्रह्मण्य शास्त्री के शिष्य। १-शारीरकचतुस्सूत्रीविचारः-नाराशरा पेट, गुण्टूर से मुद्रित। २-शङ्कराशाङ्करभाष्यविमर्शः -तेलगु लिपि में मुद्रित। सुब्रह्मण्य शास्त्री (१८७E-१६४७) ये श्री राम शास्त्री के पुत्र, मालावार में पालघाट की सीमा के अन्तर्गत काविशेरी ग्राम के निवासी, वेड्कट शास्त्री के शिष्य तथा न्याय, ‘वेदान्त, व्याकरण और गणित शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान् थे। ब्रह्मसूत्ररत्नावली - आनन्दाश्रम संस्कृत सीरीज ७५ में प्रकाशित। यह ग्रन्थ पद्यबद्ध और शाकर भाष्य का सारसंग्रहभूत५८४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास चिद्घनानन्द (१८८५-१६४५) ये वाराणसी के निवासी तथा लक्ष्मणशास्त्री के शिष्य थे। श्री अच्युतानन्द इनके दीक्षागुरु थे। ब्रह्मसूत्रभाष्यनिर्णयः- इसमें ब्रह्मसूत्र पर शङ्कर, रामानुज, भास्कर, मध्व, निम्बार्क आदि के भाष्यों की सम्यक् आलोचनापूर्वक शाङ्करभाष्य ही व्यासम्मत भाष्य है, यह प्रतिपादित किया गया है। राम कृष्ण सेवाश्रम प्रेस, वाराणसी से प्रकाशित।

भगवद्गीता पर टीकाएँ

धनपति सूरि, पंजाब (१८-१E वीं शती) - १८११ ई. में वाराणसी संस्कृत कालेज में वेदान्त का अध्यापन कार्य कर रहे थे। भगवद्गीता पर भाष्योत्कर्षदीपिका-टीका रत्नागिरि से १८८० ई. में प्रकाशित । इनका जन्म पंजाब के रावलपिण्डी नगर में हुआ था, परन्तु ये वाराणसी में रहने लगे थे। ‘प्रत्यक्तत्त्वचिन्तामणि’ के रचयिता, सदानन्द व्यास के जामाता और बाल गोपाल तीर्थ के शिष्य थे। जी. एस. पाठक (१८-१९ वीं शती) - “बालबोधिनी” टीका- के. एम. पाठक द्वारा सम्पादित तथा बम्बई से १८६३ ई. में प्रकाशित। नीलकण्ठ तीर्थ (१८-१६ वीं शती) उ. प्र.-गीतार्थप्रकाशकः - निर्णयसागर प्रेस से मुद्रित। ये केरल के निवासी, गोविन्द सूरि के पुत्र तथा बालतीर्थ के शिष्य थे। कृष्णानन्द सरस्वती (१८२५-१६००) - भगवद्गीतैकदेशपरामर्शः - गवर्नमेण्ट प्रेस, गोण्डारप्रेस से मुद्रित। इस ग्रन्थ में “गीता” का भेदवाद में नहीं, अपितु अद्वैतब्रह्म के प्रतिपादन में तात्पर्य है इस बात का प्रतिपादन किया गया है। इसके रचयिता कृष्णानन्द सरस्वती वाराणसी के निवासी थे। ये सच्चिदानन्दाश्रम और वासुदेवेन्द्र योगी के शिष्य थे। कृष्णानन्द सरस्वती (१६ वीं शती) गीतासारोद्वारः - ये कृष्णानन्द सरस्वती स्वामी कैवल्यानन्द और कृष्णानन्द के शिष्य थे। इन्होंने “अद्वैतसाम्राज्यम्” नामक ग्रन्थ की भी रचना की। धर्मदत्त (बच्चा) झा, बिहार (१८५०-१६२०)-गूढार्थतत्त्वालोकः भगवद्गीता की व्याख्या- यह व्याख्या नव्य न्याय की शैली में उपनिबद्ध है। निर्णय सागर प्रेस से प्रकाशित, १६१२ एवं १६२६ ई. । इस ग्रन्थ के प्रणेता धर्मदत्त (बच्चा) झा मिथिला के प्रसिद्ध नैयायिक थे। उन्होंने न्यायशास्त्र विषयक अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है। वासुदेव शास्त्री अभ्यङ्कर, पूना (१८५०-१६२०) अद्वैताङ्कुरः-यह ग्रन्थ भगवद्गीता के प्रथम, द्वितीय अध्याय की व्याख्या है। आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला-१०६ में मुद्रित।

शङ्कराचार्यकृत “दशश्लोकी” की टीका, विवरण आदि

तारानार भट्टाचार्य “तर्कवाचस्पति" बंगाल (१८२५-१६००)-ये कालिदास भट्टाचार्य वर्शन और शास्त्र सार्वभौम के पुत्र तथा वाराणसी के निवासी थे। शङ्कराचार्यकृत ‘दशश्लोकी" पर “सार” टीका कलकत्ता से १८६५ ई. में प्रकाशित। विष्णु वामन वापट (१६-२० वीं शती) शङ्कराचार्य की “दशश्लोकी” पर “विवरण” पूना से १६२१ ई. में प्रकाशित।

शङ्कराचार्यकृत “विवेकचूडामणि” पर व्याख्या

हरिदत्त मिश्र (१८वीं-२० वीं शती) - शंकराचार्य की “विवेकचूडामणि” पर “सुबोधिनी’ वाराणसी से १६०१ ई. में प्रकाशित । दुर्गाचरण शास्त्री - शङ्कराचार्य कृत “आत्मबोध” की टीका कलकत्ता के “ऑवर हेरिटेज-७ में” १६५६ ई. में प्रकाशित। सुरेश्वराचार्य कृत “तैत्तिरीयभाष्यवार्तिक” पर व्याख्या लिङ्गन सोमयाजी, आन्ध्र प्रदेश (२० वीं शती) - तैत्तिरीयवार्तिक पर “कल्याणविवरणम्” नाम्नी व्याख्या शारदा प्रेस, भटनवल्ली से मुद्रित।

भामती (वाचस्पति मिश्र प्रणीत ब्रह्मसूत्रभाष्य व्याख्या) से सम्बन्धित टीका-ग्रन्थ

बालशास्त्री रानाडे ‘बालसरस्वती" महाराष्ट्र (१८३६-१८८२) ये मूलतः महाराष्ट्रीय परन्तु काशी के निवासी मूर्धन्य विद्वान् थे। भामती पर टिप्पणी-इन्होंने भामती से संवलित शारीरक भाष्य का बिमर्शात्मक संस्करण भी तैयार किया था जो एशियाटिक सोसायटी, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित है। सुब्रह्मण्य शास्त्री (१८७९-१६४७ ई.)-श्री राम शास्त्री के पुत्र, पालकाड के समीपवर्ती काविशेरी ग्राम के निवासी। इन्होंने अगाडिपुर निवासी सुब्रह्मण्य शास्त्री से न्यायशास्त्र का अध्ययन किया था। ये अद्वैतवेदान्त के साथ-साथ व्याकरण ओर छन्दःशास्त्र के भी पारगामी विद्वान् थे। भामतीविवरणम्- वाणी विलास प्रेस से मुद्रित। लक्ष्मीनाथ झा (२० वीं शती)-मूलतः बिहार प्रदेशीय परन्तु वाराणसी के निवासी विद्वान्। ये मूर्धन्य नैयायिक पं. धर्मदत्त बच्चा झा के जीवन के उत्तरार्ध के शिष्य थे। संस्कृत कालेज वाराणसी में दर्शनाचार्य रहे। १- भामती टीका “प्रकाशः” २- भामती टीका “विकासः” -चौखम्बा, वाराणसी से दोनों ग्रन्थ प्रकाशित हैं। “प्रकाश” व्याख्या में भामती में प्रतिपादित विषयों को सरल ढंग से समझाया गया है। ये वेदान्त में नये प्रविविक्षुओं के लिए उपयोगी है। जबकि, “विकास”-नाम्नी व्याख्या में नव्य न्याय की तर्कपूर्ण परिष्कार-शैली में भामतीगत अर्थों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। यह प्रौढ़ विद्वज्जनों के लिए उपयोगी पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थ है।

विद्यारण्यकृत “पञ्चदशी” की टीकाएँ

-अच्युतराय मोडक (१८१४-१८३१) - पंचदशी पर “व्याख्या”-डी.आर. गन्धलेकर द्वारा सम्पादित और मद्रास से १८५ ई. में प्रकाशित। ५८६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास स्वामी निश्चलदास-पंचदशी पर “वृत्तिप्रभाकर’ व्याख्या-मद्रास से १६०१ ई. में प्रकाशित। लिङ्गन सोमयाजी (२०वीं शती) ये आन्ध्रप्रदेश के अन्तर्गत गुण्टूर जिले के निवासी तथा पञ्चदशी पर कल्याणपीयूष नाम्नी व्याख्या गुण्टूर से प्रकाशित। लक्ष्मीश्वर प्रेस, तेनालिनगर से मुद्रित यह व्याख्या मधुर काव्य शैली में उपनिबद्ध है। काशीनाथ शास्त्री, उ.प्र. (१८८३-१६३८) वाक्यपदीय पर “अम्बाकी” व्याख्या के रचयिता पं. रघुनाथ शर्मा के पिता, वाराणसी के प्रख्यात विद्वान् । पञ्चदशीव्याख्या।

विद्यारण्यकृत “जीवन्मुक्तिविवेक” पर टीका

अच्युतराय मोडक (१८१४-१८३१) - “जीवन्मुक्तिविवेक” पर “व्याख्या”- बी. एस. पणशीकर द्वारा सम्पादित और आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला-४६ में १८१५ ई. में पूना से प्रकाशित।

विद्यारण्यकृत “अनुभूतिप्रकाश” की टीका

काशीनाथ शास्त्री, उ. प्र. (१८८३-१६३८) वाराणसी के मूर्धन्य विद्वान् । अनुभूतिप्रकाश - व्याख्या। वाराणसी से प्रकाशित।

श्री हर्ष कृत “खण्डनखण्डखाद्य” की टीकाएँ

तारानाथ भट्टाचार्य “तर्कवाचस्पति” बंगाल (१८२५-१६०० ई.)- खण्डनखण्डखाद्य पर टिप्पणी-चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित। मोहनलाल वेदान्ताचार्य, पञ्जाब (१८५०-१६१० ई.) खण्डनगर्तप्रदेशिनी खण्डनखण्डखाद्य की नूतन, मौलिक, आलोचनात्मक टीका। शङ्कर चैतन्य भारती (१८५०-१६४०) ये काशी के संन्यासी संस्कृत कालेज से सम्बद्ध थे। १- खण्डनखण्डखाद्य की “शारदा” नाम्नी टीका, व्याख्या एवं टिप्पणी २ भागों में संन्यासी संस्कृत कालेज द्वारा क्रमशः १८३८ एवं १६४० ई. में प्रकाशित । इस टीका की एक प्रमेयबहुत भूमिका भी ग्रन्थकार ने लिखी है जो “दर्शनसर्वस्वम्” के नाम से पृथक छपी है। सूर्यनारायण शुक्ल, उ. प्र: (१८८५-१६४४ ई.) - खण्डनरत्नमालिका- वाराणसी संस्कृत ग्रन्थमाला ८२ में १६३६ ई. में प्रकाशित। इसमें खण्डनखण्डखाद्य में उपनिबद्ध विषय को संक्षिप्त साररूप में सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

प्रकाशानन्द कृत “वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली” की व्याख्या

जीवानन्द विद्यासागर भट्टाचार्य (१९-२० वीं शती)-मुक्तावलीव्याख्या- यह मुक्तावली ५७ दर्शन और शास्त्र के विषयों को स्पष्ट करने वाली व्याख्या है। यह किसी प्राचीन व्याख्या (१) का आधार लेकर लिखी गयी है। कलकत्ता से १६३५ ई. में प्रकाशित।

मधुसूदन सरस्वतीकृत “अद्वैतसिद्धि” की टीका

योगेन्द्रनाथ बागची, बंगाल (१६ वीं शती) - “बालबोधिनी”-व्याख्या- यह ग्रन्थ अपूर्ण है। ग्रन्थकार ने ७३ वर्ष की अवस्था में इसका आरम्भ किया और इसको पूरा करने से पहले ही उनका देहावसान हो गया। इस टीका में मूल अद्वैतसिद्धि के गूढातिगूढ़ रहस्यों का उद्घाटन, प्राचीन एवं नवीन मतों का अनुसन्धान करते हुए बड़ी विलक्षण प्रतिभा द्वारा किया गया है। अद्वैतसिद्धिकार के उपजीव्य ग्रन्थों के सिद्धान्तों को मन्थनपूर्वक निकालकर उनके मौलिक चिन्तन को स्पष्ट निर्धारित किया गया है। यह व्याख्या योगेन्द्रनाथ बागची के पुत्र शीताशुं शेखर बागची द्वारा सम्पादित और तारा पब्लिकेशन्स वाराणसी से १९७१ ई. में प्रकाशित है। योगेन्द्र नाथ बागची ने म. म. चण्डीदास भट्टाचार्य एवं गोपालदास भट्टाचार्य से नव्य न्याय का तथा म. म. लक्ष्मण शास्त्री से वेदान्त का अध्ययन किया था।

मधुसूदन सरस्वती कृत “सिद्धान्तबिन्दु” पर टीका

तारानाथ भट्टाचार्य “तर्कवाचस्पति” (१८२५-१६००) - सिद्धान्तबिन्दुसारः - सरस्वती प्रेस, कलकत्ता से प्रकाशित । यह सिद्धान्तबिन्दु का साररूप ग्रन्थ है।। वासुदेव शास्त्री अभ्यङ्कर, महाराष्ट्र (१८५०-१६२० ई.) । सिद्धान्तबिन्दु पर बिन्दुप्रपातः नाम्नी व्याख्या भण्डारकर-ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टीटयूट पूना से १६२८ ई. में प्रकाशित। यह टीका शास्त्री जी के दार्शनिक पाण्डित्य से परिपूर्ण मौलिक टीका है। इसकी शैली सरल है जो मूल ग्रन्थ के विषयों को भलीभाँति स्पष्ट करने में समर्थ है। टीका में अन्य दर्शनों की ओर से पूर्वपक्ष को उठाकर अथवा यदि वह मूल ग्रन्थ में उत्थापित है तो इसके विशेष व्याख्यापूर्वक उसका निराकरण कर समाधान पक्ष को प्रस्तुत किया गया है जिससे अद्वैतसिद्धान्त सुव्यक्त हो उठता है। अद्वैतवेदान्त के आभ्यन्तर, विभिन्न मत मतान्तरों पर भी इसमें सम्यक् प्रकाश डाला गया है। और विषम गुत्थियों को सुलझाया गया है। ग्रन्थ के प्रारम्भ में ग्रन्थकार के सुयोग्य पुत्र काशीनाथ अभ्यङ्कर द्वारा २८ पृष्ठों का महत्त्वपूर्ण उपोद्घात भी दिया गया है।

सदानन्दकृत “वेदान्तसार” की टीका

रामशरण त्रिपाठी, उ.प्र. (१९०५-१६७७ ई.)- वेदान्तसार की “मावबोधिनी” टीका चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी से १६५४ ई. में प्रकाशित। धर्मराजध्वरीन्द्रकृत “वेदान्तपरिभाषा” की टीका आदि -कृष्णनाथ भट्टाचार्य, “न्यायपञ्चानन, बंगाल (१८६२ ई.) वेदान्तपरिभाषा की “आशुबोधिनी” व्याख्या कलकत्ता से १८६२ ई. में प्रकाशित। ५८८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास 1 अमरदास (१८-१६ वीं शती) - वेदान्तपरिभाषाशिखामणि (रामकृष्ण दीक्षित कृत) की व्याख्या “मणिप्रभा” वेङ्कटेश्वर प्रेस से मुद्रित। धनपति सूरि (१७५०-१८५० ई.)- अर्थदीपिका-वेदान्तपरिभाषा-व्याख्या, प्रकाशित। शिवदत्त मिश्र (१५-१६ वीं शती) - वेदान्तपरिभाषा पर “अर्थदीपिका” टीका-ग्रन्थ का रचनाकाल-१८११ ई. । वेङ्कटेश्वर प्रेस (बम्बई) से १६१० ई. में प्रकाशित। शान्त्यानन्द (१८५०-१६२० ई.) वेदान्तपरिभाषा-व्याख्या-निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित। महाराज राम वर्मा, केरल (शासनकाल-१८६६-१६१५ ई.) “वेदान्तपरिभाषासंग्रहः” कोचीन प्राच्य ग्रन्थमाला-१ में मुद्रित।

विविध टीका-ग्रन्थ

दिवाकर (१७५-१८५० ई.) - ये दाक्षिणात्य विद्वान् तथा “बोधसार” नामक ग्रन्य के रचयिता श्री नरहरि शास्त्री के शिष्य थे। बोधसारव्याख्या-चौखम्बा प्रेस, वाराणसी से मुद्रित। गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती (१७८०-१८८० ई.)- ये दाक्षिणात्य विद्वान्, सर्वज्ञ सरस्वती के प्रशिष्य एवं उपनिषद्ब्रह्म के शिष्य थे। इन्होंने “स्वाराज्यसिद्धिः” नामक मौलिक ग्रन्थ लिखा, जिसपर भास्करानन्द सरस्वती तथा कृष्णशास्त्री की टीकाएँ हैं। इनके वेदान्तविषयक अन्य ग्रन्थ हैं १- वेदान्तसूक्तिमञ्जरी- यह अप्पयदीक्षित के सिद्धान्तलेशसंग्रह का सारभूत ग्रन्थ है, जिसपर लेखक भी ‘प्रकाश’ नाम्नी स्वोपन व्याख्या भी है। कलकत्ता से प्रकाशित । २- सिद्धान्तचन्द्रिकाव्याख्या “उद्गारः” रामब्रह्मेन्द्र अथवा रामभद्रानन्द द्वारा विरचित सिद्धान्तचन्द्रिका की यह व्याख्या गोपाल नारायण प्रेस, बम्बई से प्रकाशित है। कैवल्यकल्पद्रुम-गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती कृत “स्वाराज्यसिद्धि” पर टीका वाराणसी से १८८८ ई. में प्रकाशित।

  • स्वामी महादेवाश्रम (रामनिरञ्जन स्वामी), (१७८५-१८७० ई.) इन्होंने १८२४-२५ ई. के लगभग संन्यास लिया, उस समय ये अपने उम्र की प्रौढावस्था (४०-४२ वर्ष) में थे। पञ्चाक्षरीभाष्यप्रकाशिका-अमर प्रेस, काशी से १८८७ ई. में प्रकाशित। यह पद्मपादाचार्य द्वारा बिरचित “पञ्चाक्षरी भाष्य” का विशदार्थप्रतिपादक व्याख्या ग्रन्थ है। मूल ग्रन्थ में २३ अनुष्टुप छन्द हैं। इसकी व्याख्या में स्वामी जी ने अद्वैत का खण्डन करने वाले प्रतिपक्षियों के मतों का निराकरण बड़ी सबल युक्तियों द्वारा किया है। सरल शैली में रचित प्रौढ़, प्रामाणिक रचना।
  • काकाराम (रामकृष्ण), १६ वीं शती - शङ्करानन्द कृत आत्मपुराण पर ‘सत्यसवा" नाम्नी टीका- बम्बई से १८७३ ई. में प्रकाशित। गरि माधव तीर्थ (१८२५-१६००)- ये दाक्षिणात्य विद्वान एवं श्री राम सुब्रह्मण्य शास्त्री के समकालीन थे। “चन्द्रिकासारबोधः” ओरियण्टलप्रेस, मद्रास से मुद्रित। यह इनके गुरु ५८६ दर्शन और शास्त्र चन्द्रिकाचार्य द्वारा प्रणीत “अद्वैतसिद्धान्तगुरुचन्द्रिका" का सारभूत पद्यबद्ध ग्रंथ है। शिवानन्देन्द्र (१E वीं शती) ये दाक्षिणात्य विद्वान् श्री चन्द्रिकाचार्य के शिष्य, माधव सरस्वती के सतीर्थ्य एवं राम सुब्रह्मण्य शास्त्री के समकालीन थे। स्वात्मादर्शः (माधवतीर्थ कृत “चन्द्रिकासार” की व्याख्या) - ओरियण्टल प्रेस, मद्रास से मुद्रित। माधवतीर्थ ने “चन्द्रिकासार” ग्रन्थ अपने गुरु चन्द्रिकाचार्य के ग्रन्थ “अद्वैतसिद्धान्तगुरुचन्द्रिका” के साररूप में लिखा था। राम सिंह (१६ वीं शती)-महादेव सरस्वती कृत “तत्त्वानुसन्धान” पर “अनुभवसागर” अजमेर से १८६५ में प्रकाशित। भास्करानन्द सरस्वती, उ. प्र. (१८३३-१८६६ ई.) - स्वाराज्यसिद्धि-व्याख्या, रचनाकाल १८६१ ई. भारती जीवन प्रेस, वाराणसी से १८६६ ई. में प्रकाशित। इसमें दर्शाया गया है कि विशुद्ध ज्ञान से ही मोक्षप्राप्ति सम्भव है। बलभद्र शर्मा (१६-२० वीं शती) - १- विट्ठल दीक्षित के ग्रन्थ “विद्वन्मण्डनम्" पर उपोद्घात-नादियाड से प्रकाशित। २-रामचन्द्रेन्द्र सरस्वती के ग्रन्थ ‘‘महावाक्यरत्नावली" पर “सुबोधिनी” व्याख्या-वाराणसी से १६२२ ई. में प्रकाशित। देवकीनन्दन शास्त्री (१६-२० वीं शती) - महावाक्यरत्नावली पर टीका-वाराणसी से १६२२ ई. में प्रकाशित। गणपति शास्त्री (१८५०-१E२० ई.) ‘वेदान्तकेसरी" म. म. गणपति शास्त्री मन्नार्गुडि के समीपवर्ती पाङ्गानाडु नामक ग्राम के निवासी थे। इन्होंने राजु शास्त्री से न्याय, वेदान्त और व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया था। ये बचपन से ही आशुकवि भी थे। ये श्री विद्याप्रेस, कुम्भकोणम् में अद्वैतमञ्जरी ग्रन्थमाला में अद्वैतग्रन्थों के प्रकाशन हेतु नियुक्त विद्वानों में से प्रमुख थे। इन्होंने वेदान्तविषयक अनेक ग्रन्थों की रचना की तथा मीमांसा एवं काव्यविषयक ग्रन्थ भी लिखे। वैदिकाभरणव्याख्या-मुकुर:-अण्णामलै विश्वविद्यालय से प्रकाशित। इसके अतिरिक्त इनके वेदान्तविषयक अथशब्दविचारः, ईशावास्यविवृतिः, केनोपनिषद्विवृतिः, नैर्गुण्यसिद्धिः, शारीरकमीमांसारहस्यम्, श्रवणविधिवाक्यार्थः आदि ग्रन्थ हैं जिनमें से कुछ अप्रकाशित तथा कुछ स्वर्णमहोत्सव पत्रिका में प्रकाशित हैं। _ वासुदेव ब्रह्मेन्द्र (१८५०-१६०५ ई.) ये उपनिषदब्रह्म योगी के प्रशिष्य और कृष्णानन्द सरस्वती के शिष्य थे। ‘शास्त्रसिद्धान्तलेशतात्पर्यसंग्रहः"- अप्पयदीक्षित कृत सिद्धान्तलेशसंग्रह का सारभूत ग्रन्थ, निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित। शान्त्यानन्द (१८५०-१६२० ई.)-१-पञ्चीकरणव्याख्या २-अद्वैतागम हृदयसंग्राहकश्लोकाः-ये दोनों ग्रन्थ निर्णय सागर प्रेस से प्रकाशित हैं। कृष्ण शास्त्री (१८७०-१६३६ ई.) ये करुगुल ग्राम के निवासी, हरिहर शास्त्री के शिष्य तथा ब्रह्मसूत्र पर “अधिकरणचतुष्टयी” के प्रणेता थे। गङ्गाधरेन्द्रसरस्वती के ग्रन्थ “स्वाराज्यसिद्धि” पर “परिमल” नाम्नी व्याख्या-आर्यमतसंवर्धिनी ग्रन्थमाला में मुद्रित। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सत्यनारायण शर्मा (१९-२० वीं शती) - महावाक्यरत्नावली पर “उपदेशपञ्चदशी” टीका-वाराणसी से प्रकाशित। हि योगानन्द सरस्वती (१६-२० वीं शती) - कृष्णानन्द सरस्वती के ग्रन्थ “अज्ञानतिमिरदीपक” की टीका-बड़ौच से १६२६ ई. में प्रकाशित। जी. वी. कृष्णदास (9E-२० वीं शती) - अनन्तभट्टकृत “अद्वैतरत्नाकर” की टीका कल्याण (बम्बई) से १E२८ ई. में प्रकाशित। । काशीनाथ शास्त्री उ. प्र. (१८८३-१६३८ ई.) वाराणसीवासी प्रकाण्ड विद्वान्, वाक्यपदीय की “अम्बाकर्ची” व्याख्या के रचयिता पं. रघुनाथ शर्मा के पिता। महावाक्यरत्नावली की व्याख्या- वाराणसी से प्रकाशित। वाई. सुब्रह्मण्य शर्मा (१८६०-१६३० ई.) नृसिंह सरस्वती के ग्रन्थ “वेदान्तडिण्डिमः” की टीका-बंगलौर से १६३४ ई. में प्रकाशित । ए. चिन्नस्वामी शास्त्री (१६-२० वीं शती) अप्पयदीक्षित कृत “मध्वतन्त्रमुखमर्दनम्” पर टिप्पणी वाराणसी से १६४१ ई. में प्रकाशित।

(२) रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत वेदान्त

अनन्तार्य या अनन्तालवान, मैसूर (१८२२-१९६२) ये मैसूर प्रदेश के यादवगिरि अथवा मेलकोट के निवासी एवं कृष्णराव बोदेयार तृतीय (१८२२-६२ ई.) के राज्याश्रित कवि थे। इनका जन्म शेषाचार्य वंश में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रृङ्गाराचार्य था। ये एक मूर्धन्य विशिष्टाद्वैती विद्वान् एवं समर्थ कवि थे। इन्होंने विशिष्टाद्वैतविषयक कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों के अतिरिक्त “कविसमयकल्लोलः” नामक काव्यशास्त्र विषयक ग्रन्थ भी लिखा । विशिष्टाद्वैतविषयक ग्रन्थों में प्रकाशित प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं- १- अभिन्ननिमित्तम् २-आकाशाधिकरणम् ३- अपहतपाप्मत्वविचारः ४- भेदवादः - पी. बी. अनन्ताचार्य द्वारा सम्पादित और शास्त्रमुक्तावली ग्रन्थमाला-२E में काजीवरम् से प्रकाशित, १६०७ ई.। ५- ब्रह्मलक्ष्मनिरूपणम् ६-ब्रह्मपदशक्तिवादः ७-दृश्यत्वानुमाननिरासः-पी.बी. अनन्ताचार्य द्वारा सम्पादित और शास्त्रमुक्तावली ग्रन्थमाला-३८ में प्रकाशित, १६०६ ई.।

  • ईक्षत्यधिकरणविचारः, -ज्ञानयाथार्थ्यवादः १०-मोक्षकरणतावाद:-पी. बी. अनन्ताचार्य द्वारा सम्पादित और शा.मु. ग्रन्थमाला-३१ में प्रकाशित, १६०६ ई. । ११. निर्विशेषप्रामाण्यव्युदासवादः १२-प्रतिज्ञावादार्थः, १३-सामानाधिकरण्यवादः, १४- संविदेकत्वानुमाननिरासवादार्थः, १५- शरीरवादः, १६-शास्त्रैक्यवादः, १७- शास्त्रार्थसमर्थनम्, १८-सिद्धान्तसिद्धाज्ञानम्, १६-रामानुज के श्री भाष्य पर “भावनाकुरः,२०-सुदर्शनसुटुमः, २१-तत्क्रतुन्यायविचार:-पी. बी. अनन्ताचार्य द्वारा सम्पादित और शास्त्र मुक्तावली ग्रन्थमाला-३०में प्रकाशित, १०७ ई.॥ २२- विधिसुधाकरः,२३- विषयतावादः। उपर्युक्त ग्रन्थों में (४), (७) और २१ को छोड़कर शेष सभी पी. टी. नरसिंह सरि दर्शन और शास्त्र अय्यङ्गर द्वारा सम्पादित और वेदान्तवादावली ग्रन्थमाला १-२ में बंगलौर से प्रकाशित हैं, १८६८ एवं १८६E ई. । २४- न्यायभास्करः - मद्रास से १९७१ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में अद्वैतसिद्धि की टीका लघुचन्द्रिका का खण्डन है। २५- वेदान्तवादावली- कल्याण से प्रकाशित। २६- परतत्त्वनिर्णयः - कल्याण से १८६६ ई. में प्रकाशित। २७-बाडवानलः काजीवरम् और बम्बई से १६१५ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में शुद्धाद्वैतपरक ग्रन्थ, ‘सिद्धान्तसिद्धापगाखण्डनम्’ का खण्डन किया गया है। राम मिश्र शास्त्री राजस्थान (१८५१-१६११ ई.)-कर्मभूमि-काशी। ये विशिष्टाद्वैत दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान् तथा धर्मशास्त्र के पारदृश्वा थे। डा. बाबू भगवानदास, म. म. हरिहरकृपालु द्विवेदी तथा पं. रामशास्त्री भागवताचार्य इनके शिष्यों में थे। इन्होंने विशिष्टाद्वैत के उच्चकोटि के ग्रन्थों का पहली बार सुसंस्कृत संस्करण तैयार कर उन्हें मुद्रित कराया तथा अपनी टिप्पणियों से उन्हें सुबोध बनाने का प्रयास किया। इनके मौलिक ग्रन्थ हैं १-स्नेहपूर्तिः-यह शास्त्री जी का मौलिक प्रौढ़ दार्शनिक ग्रन्थ है, जिसका प्रणयन मधुसूदन सरस्वती कृत “अद्वैतसिद्धि” और अद्वैतवेदान्तसिद्धान्त के खण्डन हेतु हुआ है। २ ब्रह्मसूत्रवृत्तिः-यह ब्रह्मसूत्र पर विशिष्टाद्वैतमतानुसारिणी वृत्ति है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त शास्त्री जी ने धर्मशास्त्रविषयक प्रौढ़ ग्रन्थ “शुद्धिसर्वस्व” और “तुरीयमीमांसा” की भी रचना की। देवनाथ ताताचार्य, आन्ध्र प्रदेश (१८८६-१९८८)-श्री देवनाथ ताताचार्य श्री नरसिंह ताताचार्य के आत्मज थे। इन्होंने २० वर्ष की अवस्था में ही साङ्ग वेद, न्याय, मीमांसा, वेदान्त, धर्मशास्त्र आदि का पूर्ण अध्ययन कर लिया और ये काञ्ची मण्डल के अन्तर्गत नावल्पाक्क अग्रहार में भगवदाराधन एवं शिष्यों को ज्ञान दान करते हुए रहने लगे। विश्वविद्यालय में न रहकर भी इन्होंने संस्कृत वाङ्मय की जो अपूर्व सेवा की, आत्मत्यागपूर्वक शिष्यों को पढ़ाया वह सराहनीय है। ये अनन्तकृष्ण शास्त्री के समसामयिक थे। इनकी कृतियां हैं-१-वेदान्तवैजयन्ती, २-न्यायकु सुमाञ्जलिव्याख्या “न्यायवासना’’, ३-“तत्त्वमुक्ताकलाप” की “अक्षरार्थ” व्याख्या। श्री वेङ्कटनाथ महादेशिक प्रणीत “तत्त्वमुक्ताकलाप” पर यद्यपि मूलग्रन्थकार की स्वोपज्ञ सर्वार्थसिद्धि व्याख्या है, पर उसमें स्थल-स्थल पर मतान्तरों पर जो विचार किया गया है, वह इतना विस्तृत और गहन हो गया है कि मूल अर्थ छिप जाता है। ताताचार्य कृत ‘अक्षरार्थ’ व्याख्या सरल शैली में मूल विषयों का बोध कराने हेतु अतीव उपयोगी है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से १६६० ई. में प्रकाशित। ४- सूत्रानुगुण्यसिद्धिविमर्शः, ५-विशिष्टाद्वैतसिद्धिः -१६६५ ई. में ग्रन्थकार द्वारा ही प्रकाशित। इस ग्रन्थ में मधुसूदन सरस्वती की अद्वैतसिद्धि में प्रयुक्त युक्तियों की विशिष्टाद्वैत की दृष्टि से समालोचना की गयी है। इसके अतिरिक्त पोलकं राम -शास्त्री के ग्रन्थ “द्रविडात्रेयदर्शनम्, चतुर्मतसामरस्य तथा इज्जिकोल्लै जगदीश्वर शास्त्री की “चिदचिच्छरीरकब्रह्मसिद्धि” तथा “सप्तविधानुपपत्तिपरीक्षा” की परीक्षा भी की गयी है। उत्तमूर ति. वीरराघवाचार्य (१६-२० वीं शती) - ये उत्तमूर के निवासी और न्याय, ५६२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, विशिष्टाद्वैत के उद्भट विद्वान थे। इन्होंने भेदसाम्राज्य के प्रणेता श्री रङ्ग रामानुज महादेशिक के चरणों में बैठकर विशिष्टाद्वैत वेदान्त की मर्मज्ञता प्राप्त की थी। अद्वैतवेदान्त के ‘शतभूषणी’ नामक लब्धप्रतिष्ठ ग्रन्थ के प्रणेता म. म. अनन्तकृष्णशास्त्री इनके समकालीन थे। उनके प्रति वीरराघवाचार्य की भावना परमार्थभूषण नामक ग्रन्थ की भूमिका से सुष्ठु प्रकट होती है “शतभूषणी) प्रबन्धो ऽयमाबाल्यात् अद्वैतग्रन्थालोडने नैव क्षिप्तकालस्य, वैयक्तिकविद्वेषवैदेशिकस्य, तत्तन्मतमातिष्ठमानैः स्वस्वमतस्थापनार्थं निबन्धनं न्याय्यमिति सध्यवसायस्य, नानाग्रन्थमुद्रणनिर्माणभूमिकालेखनव्याख्यानादिना विख्यातस्य, महामहोपाध्यायस्य सर्वसुहृदो ऽस्मत्सुहत्तमस्यास्मदभ्युदयैककाििक्षणो महामनसोऽखिल बुधक्षेमकामस्य अनन्तकृष्णशास्त्रिमहोदयस्येति अद्वैतिनामिवास्माकमपि तत्राभिमानः।” तथापि परस्पर ऐसी सुहृद् भावना रखने पर भी इन दोनों विशिष्टाद्वैत और शाकर अद्वैत के पक्षधर विद्वानों का दशकों तक जो परस्पर खण्डन-मण्डन चलता रहा, वह उन्नीसवीं शताब्दी के वेदान्त की दोनों धाराओं के वाङमय में विद्वेषविमक्त शास्त्रालोडन की उज्ज्वल गौरवगाथा है। श्री उत्तमूर वीरराघवाचार्य द्वारा विशिष्टाद्वैत विषयक निम्न ग्रन्थों का प्रणयन किया गया १- परमार्थभूषणम्-१०८० पृष्टों का विस्तृत प्रौढ़ ग्रन्थ, श्रीवत्स प्रेस, मद्रास से १६५६ ई. में प्रकाशित। विशिष्टाद्वैत दर्शन के १३ वीं शती में हुए उद्भट विद्वान् श्री वेड्कटनाथ वेदान्तदेशिक ने शाङ्कर अद्वैतदर्शन में 900 दोषों की उद्भावना करते हुए, शतदूषणी नामक ग्रन्थ की रचना की थी। १६ वीं शती में म. म. अनन्तकृष्णशास्त्री ने “शतभूषणी” ग्रन्थ लिखकर अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से उसका आमूलचूल खण्डन किया। तब वीरराघवाचार्य ने विशिष्टाद्वैत की ओर से “परमार्थभूषणम्” नामक उपर्युक्त ग्रन्थ लिखकर “शतभूषणी” का खण्डन किया और शतदूषणी में प्रतिपादित वादों की स्थापना की। इस ग्रन्थ में द्रविड़ात्रेयदर्शनम्, चिदचिदशरीरकब्रह्मसिद्धिः, सप्तविधानुपपत्तिपरीक्षा तथा अद्वैततत्त्वशुद्धि आदि ग्रन्थों का भी अवान्तर रूप से खण्डन किया गया है। अनन्तकृष्ण शास्त्री द्वारा ही विरचित, श्रीभाष्य की समालोचनारूप “वेदान्तरक्षामणि” और “अद्वैततत्त्वशुद्धि” नामक ग्रन्थ भी यत्र-तत्र स्पृष्ट किये गये है। २-नयधुमणिः - मूलतः मेघानन्दप्रणीत और वीरराघवाचार्य द्वारा सम्पादित ग्रन्थ। इसकी भूमिका में श्री राघवाचार्य ने अनन्तकृष्णशास्त्री के “वेदान्तरक्षामणि” और “सिद्धान्तकौस्तुभ’ में प्रस्तुत विचारों का खण्डन किया है। मद्रास गवर्नमेण्ट ओरियण्टल सीरीज-१४१ में १E५६ ई. में प्रकाशित ।३- सिद्धान्तकौस्तुभ - अनन्तकृष्ण शास्त्री के ‘वेदान्तरक्षामणि” के विरोध में प्रणीत ग्रन्थ । इस ग्रन्थ की रचना शेष दोनों ग्रन्थों से पूर्व हुई। ४-वेदान्तदेशिक के ईशोपनिषद् भाष्य की व्याख्या, तजौर से १६३३ ई. में प्रकाशित। ५-परमार्थप्रकाशिका-रचनाकाल-१६४० ई.। इस ग्रन्थ में राघवाचार्य ने पूना के म. म. वासुदेवशास्त्री अभ्यङ्कर की रचना अद्वैतामोदः” का आलोचनात्मक विवेचन और खण्डन किया है तथा विशिष्टाद्वैत मत की स्थापना की है। ६-यामुनाचार्य के दर्शन और शास्त्र ५६३ “सिद्धित्रय” पर “गूढप्रकाश” टिप्पणी-मद्रास से १६६२ ई. में प्रकाशित ।
  • सुदर्शनाचार्य, पञ्जाब (१E वीं शती) -ये पञ्जाब के मूल निवासी थे, परन्तु काशी में आकर रहने लगे थे। ये “अलिविलासिसंलापः” काव्य के रचयिता पं. गङ्गाधर शास्त्री के शिष्य और संगीत, साहित्य तथा दर्शनशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। ये रामानुजीय वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी थे। १-विशिष्टाद्वैताधिकरणमाला- इस प्रमेयबहुल ग्रन्थ में विशिष्टाद्वैतमतानुसारी रामानुजीय श्रीभाष्य के अनुसार ब्रह्मसूत्र के समस्त अधिकरणों के सिद्धान्तों का सरल भाषा में निरूपण किया गया है। यह ग्रन्थ हरिदास गुप्त द्वारा चौखम्बा संस्कृत मुद्रणालय, काशी से १६०२ ई. में प्रकाशित है। २-श्रीभाष्य पर “श्रुतप्रकाशिका”-व्याख्या-ग्रन्थलिपि में काजीवरम् से १८८८ ई.में प्रकाशित।
  • वासुदेव शास्त्री अभ्यकर (१६-२० वीं शती) - “अद्वैतामोद”, “सिद्धान्तबिन्दु-टीका” आदि अद्वैत ग्रन्थों के प्रणेता। इन्होंने आपदेव के “मीमांसान्यायप्रकाश” पर भी टीका लिखी और विशिष्टाद्वैत विषयक इन ग्रन्थों की रचना की-१- श्रीभाष्य चतुःसूत्री पर टिप्पणी-पूना से १६०४ ई. में प्रकाशित। २- यतीन्द्रमतदीपिका (श्रीनिवास दास कृत) पर “प्रकाश” नाम्नी व्याख्या-आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली-५० में पुणे से प्रकाशित, १६७७ ई.। __रामवदन शुक्ल (१६११-१६६३) -रामवदन शुक्ल का जन्म उत्तरप्रदेश के गोरखपुर मण्डलान्तर्गत कोड़रा ग्राम में हुआ था। इन्होंने वाराणसी से नव्यन्याय में आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की। नव्य एवं प्राचीन, मीमांसा, धर्मशास्त्र, साहित्य रामानुज वेदान्त के ये पारङ्गत विद्वान् थे। इन्होंने १६४४-४५ से १९७७ तक प्रयाग के रामदेशिक, संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापक एवं प्राचार्य के रूप में कार्य किया। १९८१ से १EE२ तक एक वर्ष ये वाराणसी में शास्त्र प्रौढ़ि कक्षा में प्रोफेसर रहे। १६E३ ई. में इन्हें भगवत्सायुज्य प्राप्त हुआ। १-वेदार्थसंग्रह की “चन्द्रिकातिलक” नाम्नी टीका-सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १६E9 ई. में प्रकाशित । यह श्री रामानुज यतीन्द्र कृत “वेदार्थसंग्रह” की टीका है। वेदार्थसंग्रह में विशिष्टाद्वैत के सिद्धान्तों का श्रुतिमूलत्व युक्तिपूर्वक प्रतिपादित किया गया है। इस ग्रन्थ पर शुक्ल जी की उपर्युक्त टीका वास्तव में विषयों को स्पष्ट करने में चन्द्रिका की भाँति सहायक है। इन्होंने ‘शक्तिनिरूपण", “आत्मतत्त्वविवेक”, “शब्दप्रमाणनिरूपण” आदि शास्त्रीय निबन्ध भी लिखे जो “सारस्वती सुषमा" नामक सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका में प्रकाशित हैं। अन्य ग्रन्थ बुच्चि वेड्कटाचार्य (१७७५-१९२५)-ये आन्ध्रप्रदेश में गुट्टि के समीपवर्ती वुक्कपट्टनम् के श्रीशैल परिवार के श्री अण्णयार्य के तृतीय पुत्र थे। वेदान्तकारिकावली-अड्यार लाइब्रेरी से १६५० ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में १० परिच्छेद हैं जिनमें विशिष्टाद्वैत दर्शन के तत्त्वों की प्रस्तुति है।५६४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास टी. ई. एस. कुप्पन अय्यार (१E वीं शती) - अनन्ताचार्य के १- ब्रह्मलक्ष्मनिरूपणम् २-शरीरवाद ३-शास्त्रैक्यवाद और ४-शास्त्रारम्भसमर्थनम् पर तात्पर्यदीपिका" टीकाएँ-वेदान्तवादावली ग्रन्थमाला १-२ में बंगलौर से १८६८-१८६६ ई. में प्रकाशित। टी. ए. पी.- श्रीरङ्गाचार्य (१६ वीं शती का मध्य)- कार्याधिकरणवादः, शास्त्रमुक्तावली ग्रन्थमाला में काशीवरम् से प्रकाशित, १६०१ ई. । एन. आर. शर्मा-श्रीनिवासकृत “यतीन्द्रमतदीपिका” पर टीका, मूल ग्रन्थ का सम्पादन, बम्बई से १६०६ ई. में प्रकाशित। टी. नीलमेघ शास्त्री - वेदान्तनवमालिका (ब्रह्मसूत्र पर टीका) - मद्रास से १६०६ ई. प्रकाशित। देशिक वरदाचार्य-(१६ वीं शती)-दुर्वादविधूननम्- हितचिन्तक प्रेस काशी से मुद्रित, १६१६ ई.। यह रुद्रभट्ट द्वारा प्रकाशित “विरोधपरिहारखण्डन” का खण्डन है। रामानुजीय श्री अनन्ताचार्य की आज्ञा से देशिक वरदाचार्य ने इसे १६१६ ई. में प्रकाशित कराया। रामानुजाचार्य (१८-२० वीं शती)-उशहपक के निवासी। १- विद्वन्मनोहरः, कुम्भकोणम् से १E२२ ई. में प्रकाशित। आर. हलस्यानाथ शास्त्री- अर्थचन्द्रिका (ब्रह्मसूत्रों पर टीका)-बम्बई और कुम्भकोणम् से क्रमशः १६०८ एवं १६१८ ई. में प्रकाशित। श्रीधराचार्य - वेदान्तदेशिक के ग्रन्थ की व्याख्या- वर्दवान से १८१८ ई.में प्रकाशित। श्रीकृष्ण ब्रह्मतन्त्र महादेशिक (१६-२० वीं शती) - वेदान्तदेशिक के ग्रन्थ “रहस्यत्रयसार” की व्याख्या-मद्रास से १६१४ ई. में प्रकाशित। श्रीनिवास सूरि (१६-२० वीं शती) १-वेदान्तदेशिक के “रहस्यत्रयसार” की प्रकाशिका (सारदीपिका) नाम्नी टीका कुम्भकोणम से १६०७ ई. में ग्रन्थलिपि में प्रकाशित, बंगलौर से देवनागरी लिपि में प्रकाशित। २-अद्वैतमतखण्डनोपन्यासः-तेलुगु लिपि में राजमुन्द्री से १६१६ ई. में प्रकाशित।
  • एस. वरदाचार्य-१- वेदान्तदेशिक के “रहस्यत्रयसार” पर “कारिकादर्पण”- ग्रन्थलिपि में कुम्भकोणम् से १६१८ ई. में प्रकाशित। २-तत्त्वसुधा- मैसूर से १६५E में प्रकाशित। यह ग्रन्थ अनन्तकृष्ण शास्त्री की “शतभूषणी” के खण्डन हेतु प्रणीत है। रामचन्द्र पनशीकर (१६-२० वीं शती)-लोकाचार्य पिल्लइ के विशिष्टाद्वैतपरक ग्रन्थ “तत्त्वत्रय” पर टीका चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला में वाराणसी से प्रकाशित, १६३८ ई.।

(३) मध्वाचार्य का द्वैत वेदान्त

/ सत्यधर्म तीर्य (१७६८-१८३०) ये पेशवा वाजीराव द्वितीय (१७E५-१८१८) के समकालीन थे। इनका देहावसान १८३० ई. में मैसूर में हुआ। द्वैत वेदान्त साहित्य की प्राचीन प्रणाली के ये अन्तिम ग्रन्थकार हैं। इन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग १० ग्रन्थों दर्शन और शास्त्र की रचना की। १- “तत्त्वसंख्यान” पर टीका, बम्बई से प्रकाशित। २-यादुपत्यविवृति-शेषपूरणी (भागवत की टीका) धारवाड़ से मुद्रित । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह यदुपति द्वारा की गयी व्याख्या के विशिष्ट अंशों की पूरक है। - काशी तिम्मण्णाचार्य (लगभग १८००-१८५०)-ये मैसूर के निवासी थे। इन्होंने वाराणसी में आकर शास्त्रों का अध्ययन किया था। ये अपने समय के नव्यन्याय एवं त वेदान्त के मूर्धन्य विद्वान् तथा त्र्यम्बक शास्त्री एवं सत्यधर्म तीर्थ के समकालीन थे। १- “तत्त्वसंख्यान” पर टीका, २-“तत्त्वोद्योत पर टीका, ३- “भेदोज्जीवन” पर टीका, ४- कृष्णामृतमहार्णव पर टीका, -प्रमाणपद्धति पर टीका एवं ६-“न्यायसुधा” के प्रथम अधिकरण पर टीका, ७-गुहाधिकरणविचार अद्वैत सभा, कुम्भकोणम् के हीरक-जयन्ती स्मृति ग्रन्थ में १६६० ई. में प्रकाशित। ७-कुमतखण्डनम् मैसूर से १६२३ ई. में प्रकाशित।

  • मध्व के विष्णुतत्त्वनिर्णय पर “तत्त्वदीपिका” टीका-तंजौर से प्रकाशित। - सातारा राघवेन्द्राचार्य (१८५३ में मृत्यु) - ये एक प्रसिद्ध वैयाकरण थे। परिभाषेन्दुशेखर पर इनकी टीका “त्रिपथगा” वाराणसी से छपी है। इन्होंने शब्देन्दुशेखर पर शब्दरत्न (प्रभा टीका) विष्णुसहस्रनाम, गीता तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् की व्याख्या भी लिखी है। नारायणाचार्य-ये श्री राघवेन्द्राचार्य (१८५३ ई. में मृत्यु) के पुत्र थे। १- मायीमहावाक्यार्थखण्डनम् २-श्वेताश्वतर उपनिषद पर द्वैतदृष्टिकोण से व्याख्या। कोच्चि रङ्गप्पाचार्य (१८२०-६१) - ये कोयम्बटूर के श्रीनिवासाचार्य के कनिष्ठ पुत्र थे। इनके पितामह वृद्धाचार्य जगन्नाथ तीर्थ के समकालीन थे। इन्होंने मैसूर के शतकोटि राम शास्त्री से न्यायशास्त्र का अध्ययन किया था। तिरुप्पुनित्तुरा के राज्याश्रित विद्वान होने पर इन्होंने सोद मठ के विश्वप्रिय तीर्थ से द्वैत वेदान्त का अध्ययन किया। ग्रन्थ १- चन्द्रिकाभूषणम्- इन्होंने अपने समकालीन श्री रघुनाथ शास्त्री “पर्वत” (१८२१-१८) के “शकरपादभूषणम्” के खण्डनहेतु यह ग्रन्थ लिखा। इसका एक भाग “जिज्ञासाधिकरण” कुम्भकोणम् से १६०५ ई. में प्रकाशित है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र के अधिकरणों पर स्रग्धरा छन्द में “नयमालिका” नामक ग्रन्थ तथा “ऋजुत्वचन्द्रोदय” (वादिराज के ऋजुत्व के सम्बन्ध में) नामक ग्रन्थ भी लिखे, जो अप्रकाशित हैं। गौड़गिरि वेङ्कटरमणाचार्य (१६-२० वीं शती)-ये मैसूर के निवासी थे। १-तात्पर्यचन्द्रिकाप्रकाशप्रसरः बंगलौर से १६२२ ई. में प्रकाशित । यह ग्रन्थ तिरुविशनल्लूर रामसुब्बा शास्त्री के ग्रन्थ “चन्द्रिकाखण्डनम्” के खण्डन हेतु लिखा गया है जो तंजौर के एक मान्य अद्वैतवेदान्ती विद्वान थे। २- अद्वैतदीपिकावातागमः बंगलौर से १६२४ ई. में प्रकाशित। सत्यध्यान तीर्थ (१८१३-४२) - ये उत्तरादि मठ के अधिष्ठाता और अपने समय के प्रकाण्ड विद्वान् थे। चन्द्रिकामण्डनम् “चन्द्रिकाखण्डनम्” (राम सुब्बा शास्त्री द्वारा प्रणीत) के खण्डन हेतु प्रणीत ग्रन्थ । तिरुपति से १६१६ ई. में प्रकाशित। ५६६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास अन्य ग्रन्थ साहुलुगी श्रीपत्याचार्य (१७६८-१८३०) - जयतीर्थ की “तत्त्वोद्योतटीका” पर “द्वैतामणि” नाम्नी टीका, बेलगाँव से १६४३ ई. में प्रकाशित। वासुदेवाचार्य- द्वैतप्रदीपः - मैसूर से १६४६ ई. में प्रकाशित। सेतु मध्वाचार्य (१८७१-१९५५) तत्त्वकौस्तुभकुलिशः - तिरुपति से १६५७ ई. में प्रकाशित । इसमें भट्टोजिदीक्षित का खण्डन किया गया है। जालिहल श्रीनिवासाचार्य १- न्यायामृतार्णवः - गग (बेलगाम ?) से १६४२ ई. में प्रकाशित। यह ग्रन्थ अनन्तकृष्ण शास्त्री के खण्डन हेतु प्रणीत है। २- न्यायसुधाकण्टकोद्वारः - मद्रास से १६६१ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में भी अनन्तकृष्ण शास्त्री का खण्डन किया गया है। सत्यप्रमोद तीर्थ- न्यायसुधामण्डनम्-पूना से १६६१ ई. में प्रकाशित। यह ग्रन्थ भी अनन्तकृष्णशास्त्री के खण्डन हेतु लिखा गया है। विद्यामान्य तीर्थ - अद्वैततत्त्वसुधासमीक्षा- बंगलौर से १६६१ ई. में प्रकाशित। यह ग्रन्थ भी अनन्तकृष्ण शास्त्री के खण्डन हेतु प्रणीत है। के. एन. कट्टी, कर्नाटक-न्यायासुधामण्डनप्रकाशः, १६६३ ई. पी. सीताराम हेबर, कर्नाटक-शालिग्राम (उडुपी तालुका) निवासी। द्वादशदर्शनसमीक्षा-१६८० ई.। वादिराजार्य अग्निहोत्री, कर्नाटक-प्रमाणसंग्रहः, १६८० ई. में द्वितीय संस्करण प्रकाशित।

(४) वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत वेदान्त

(योगी) गोपेश्वर (महाराज), बंगाल (१७८१ ई. में जन्म) १-पुरुषोत्तम कृत “अणुभाष्य-प्रकाश” पर “रश्मि टीका बम्बई से १६२६-१ERE ई. में २ भागों में प्रकाशित। २- भक्तिमार्तण्ड:- नादियाड से प्रकाशित। ३- वल्लभाचार्यकृत “सुबोधिनी” के १० वें अध्याय की टीका “बुभुत्सुबोधिका”-नादियाड से प्रकाशित। इन्होंने वल्लभाचार्य के अन्य ग्रन्थों निरोधलक्षण, संन्यासनिर्णय, सेवाफल आदि तथा पुरुषोत्तम कृत “वेदान्ताधिकरणमाला” पर भी टीकाएँ लिखीं।

  • गिरिधर गोस्वामी (१८४५ ई. में जन्म)-१-वल्लभचार्य के “अणुभाष्य” पर “विवरण” नादियाड से सम्पादित और प्रकाशित। प्रथम, द्वितीय अध्याय मात्र । २- शुद्धाद्वैतमार्तण्ड: (शुद्धाद्वैतनिचारः) रामकृष्ण भट्ट की ‘प्रकाश” और बालकृष्ण भट्ट की “प्रमेयरत्नार्णव” टीकाओं के साथ चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला-२८ में १६०६ ई. में प्रकाशित। ३-विट्ठल दीक्षित के ग्रन्थ ‘विद्वन्मण्डल’ पर ‘हरितोषिणी’ टीका बम्बई से १६२६ ई. में प्रकाशित। दर्शन और शास्त्र ५६७ ब्रजरत्न लाल, सूरत (१८६५ ई. में जन्म)-वल्लभाचार्य कृत “विवेकधैर्याश्रय” पर “विवृति” गुजराजी प्रिंटिंग प्रेस, बम्बई से प्रकाशित। रमानाथ शर्मा, (१६-२० वीं शती) गोवर्धन शर्मा प्रणीत “वेदान्तचिन्तामणि” पर “टिप्पणी”-१E१८ ई. में बालकृष्ण विद्यालय, बम्बई से प्रकाशित।
  • श्रीधर पाठक, महाराष्ट्र (१६-२० वीं शती)-वल्लभाचार्य के अणुभाष्य पर “बालबोधिनी” टीका-पूना से १६२१ ई. में २ भागों में प्रकाशित। वल्लभकाका (१६-२०वीं शती)- वचनामृतम्-अहमदाबाद से १६२४ ई. में प्रकाशित। श्यामसुन्दर झा (२० वीं शती)-शुद्धाद्वैत (पदार्थ) मणिमाला-१०६ श्लोकों में उपनिबद्ध ग्रन्थ। यह ग्रन्थ सरला प्रेस, वाराणसी से प्रथम बार १६५७ ई. में मुद्रित हुआ। बीसवीं शताब्दी के कुछ अन्य शुद्धादैती (ब्रह्मपरिणामवादी) ग्रन्थकार __बलभद्रशर्मा- काश्यप गोत्रीय मथुरावासी देवकीनन्दन के पुत्र बलभद्रशर्मा शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य जी के द्वितीय पत्र गोस्वामी विटठलनाथ जी की पत्री शोभा देवी के वशंज थे। इन्होंने नाथद्वारा के नन्दकिशोर शास्त्री तथा कर्णाटक के सुप्रसिद्ध माध्व वेदान्त के विद्वान वामनाचार्य क्षीरसागर के निर्देशन में अध्ययन सम्पन्न किया था। इन्हें कवि काव्यरत्नाकर आदि कई उपाधियां प्राप्त थीं। इनके चार ग्रन्थ प्रकाश में आये हैं। १-सिद्धान्तसिद्धापगा (१६१३, बम्बई) २-व्याख्यानरत्नावली (१६१६ बम्बई), ३-विद्वन्मडनोपोद्घातः (१६२१ मथुरा) और ४-ईशोपनिषत् का बालभाष्य (१६४६ बम्बई)। प्रथम पचहत्तर पृष्ठों का ग्रन्थ रामानुज सम्प्रदाय के प्रतिवादिभयङ्कर श्री अनन्ताचार्य द्वारा लिखित तथा “मजुभाषिणी” (एक साप्ताहिक सं.२४) में प्रकाशित लेख “शुद्धाद्वैतमतं वल्लभमतं वा” के उत्तर में लिखा गया था। दूसरा लघु ग्रन्थ शुद्धाद्वैत के आरम्भिक जिज्ञासुओं के लिए सरल संस्कृत में लिखित है। तीसरा ग्रन्थ जैसा कि उसके नाम से स्पष्ट है, “विद्वन्मण्डन” ग्रन्थ की भूमिका स्वरूप है तथा इसमें तीन आचार्यों, श्री वल्लभाचार्य, श्री विठ्ठलनाथ और श्री गोकुलनाथ के बीच एकवाक्यता (विचारों की एकता) स्थापित की गयी है। चौथे भाष्यरूप ग्रन्थ में पुष्टिमार्ग को वेदानुकूल सिद्ध करने का प्रयास है, “विद्वन्मण्डनोपोद्घात” (पृ.८५) में लेखक की इन पंक्तियों में कवित्व और सम्प्रदायनिष्ठा दोनों व्यजित होते हैं- “हन्ताहो श्रीमदाचार्यचरणवचनामृतैकजीविताः साम्प्रदायिका विद्वांसो धारयत धारयत सम्प्रदायप्रमोषेण रत्ननिचितकलधौतसौधशिखरात् काकगर्तेष्वधोमुखं निपतन्तमात्मानुगतं जनम् । प्रणिधत्त च विपदो ऽस्या अजसैव निस्तरणाय श्रीमदाचार्यचरणपादारविन्दावधानसुधाम् । संस्मरत संस्मरत न कदाचित् प्रमादतोऽपि विस्मरत “विद्वद्विभः सर्वथा श्राव्यं ते हि सम्मार्गरक्षकाः’ इति सकलपाषण्डतुण्डनिर्मोहिनी श्रीमदाचार्य चरणाज्ञाम् । संरक्षत संरक्षत च सन्मार्गमित्यभिप्रार्थयामहे”। गोस्वामी श्री दीक्षित (१८१४-१६७५)-ये मोटा मन्दिर, बम्बई के आचार्य थे तथा ५६८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इनके पिता श्री गोकुलनाथ और माता कुसुमप्रभा थीं। इन्होंने अनेक शास्त्रों का अध्ययन श्री बलभद्र और श्री रामनाथ से किया, उत्तरादिमठाधीश स्वामी श्री सत्यध्यानतीर्थ स्वामी से माध्वसम्प्रदाय का अध्ययन किया और श्री अनन्त कृष्ण शास्त्री ने इन्हें अद्वैत और पूर्व मीमांसा पढ़ायी तथा विभिन्न आचार्यों से श्रीरामानुज वेदान्त का अध्ययन किया। इन्होंने गुजराती में लिखित गोपालदास के छठे आख्यान पर कुसुमप्रभा व्याख्या लिखी जो १६४E में बम्बई से प्रकाशित हुई। उन्होंने भगवदनुभव में संयोगानुभूति मात्र को-“परमफल” माना है, न कि वियोगानुभूति को, जैसा कि श्री हरिराय आदि ने माना है। इनके अन्य ग्रन्थ हैं लघुव्याख्यानसमुच्चयः (१६६० बम्बई), ज्ञानभक्तितारतम्यविमर्शः (१६६५ बम्बई)। अनिरुद्धाचार्य (१८६०) ने श्रीमद्गोपालपूर्वतापिनीयोपनिषद् की टीका ब्रह्मामृत पर “पीयूषलहरी” (१६२८ बम्बई) और श्रीमदाथर्वणनारायणोपनिषद् पर ‘वेदान्तविद्यालङ्कार” नाम की व्याख्या लिखी (१६४३ बम्बई से किरणावली व्याख्या के साथ प्रकाशित)। हरिशकरशास्त्री ओंकार शुक्ल ने टिप्पणी लिखी जो अणुभाष्य और गिरिधर के विवरण के साथ प्रकाशित (१६४२) है, इन्होंने उपर्युक्त किरणावली व्याख्या लिखी, वामनाचार्य के शिष्य पण्डित जगन्नाथ ने “विद्वन्मण्डन” पर “मर्मानुवाद” पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष के रूप में लिखा, कोटा के गोकुलदास शास्त्री ने केनोपनिषद् पर व्याख्या लिखी (१६४६ कोटा) रामनाथभट्ट ने ‘दर्शनादर्शः” (१८१४ बम्बई) लिखा, इनकी छान्दोग्योपनिषद के प्रथम अध्याय पर व्याख्या १E२८ में बम्बई से प्रकाशित हुई। तैलंग भट्ट गिरिधर लाल ने सरस्वती-सन्देशः (१९१८ झालरा) की रचना की। वीरपुर के बालमुकुन्द वैकुण्ठराय शास्त्री ने श्रीदण्डाकारदिवाकरः (१६४६) लिखा।

(५) निम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैत वेदान्त

गोस्वामी प्रियादास (१६ वीं शती का पूर्वार्ध)-इनके गुरु का नाम चन्द्रलाल था। १-सुसिद्धान्तोत्तमः-१६०० ई. में प्रयाग के सिटी एलवियन प्रेस से मुद्रित । मूल ग्रन्थ पर टीका और टिप्पणी भी ग्रन्थकार ने स्वयं लिखी है। २-वेदान्तसार टीका-१८०७ ई. में रचित। ३-श्रुतितात्पर्यामृतटीका-१८१३ ई. में रचित। अमोलक राम शास्त्री (१९-२० वीं शती)-इनका जन्म कुरुक्षेत्र के अन्तर्गत पुण्डरीक नामक गाँव में हुआ था। ये गौड़ श्री शालग्राम उपाध्याय के पुत्र सुदर्शनाचार्य शास्त्री के शिष्य और न्याय, पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा के मर्मज्ञ विद्वान् थे। बाद में वृन्दावन में रहने लगे थे। 9-माध्वमुकुन्द के परपक्षगिरिवज पर टीका वृन्दावन से १६३६ ई. में प्रकाशित। २-आत्मपरमात्मतत्त्वादर्शः - वृन्दावन के हरिहर प्रेस से १६२४ ई. में मुद्रित। इसमें चार्वाक, बौद्ध, जैन, सांख्य, शाङ्कर अद्वैत, ‘माट्ट भास्कर, द्वैत आदि मतों का निराकरण करके द्वैताद्वैत अथवा भेदाभेद सिद्धान्त की स्थापना की गयी है। ब्रह्मसूत्रों का इसी दृष्टि से परिशीलन भी किया गया है। वर्शन और शास्त्र ५६६ शान्तदास वयविदेही (२० वीं शती)-१- निम्बार्ककृत “वेदान्तपारिजातसौरभ” पर “सुबोधिनी” टीका-इलाहाबाद से १६३० ई. में एवं दौलतपुर से १६३२ ई. में प्रकाशित। २- भेदाभेदाद्वैताद्वैतसिद्धान्तः-वाराणसी से १६३५ ई. में प्रकाशित। श्री राधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य (जन्म १९२६ ई., किशनगढ़ राजस्थान) निम्बार्कतीर्थ (सलेमाबाद) के पीठाधीश्वर श्री जी महाराज नाम से सुविदित इन्होंने श्री निम्बार्ककृत प्रातः स्तवराजस्तोत्र पर ‘युग्मतत्त्वप्रकाशिका’ टीका, पञ्चम, श्री युगलस्तवस्तवीतिः, श्रीयुगल गीतिशतकम् तथा दशश्लोकी पर व्याख्या ‘नवीनसुधा’ लिखी है।

(६) चैतन्य का अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त

भवानीचरण तर्कभूषण (१८-१६ वीं शती)- ज्ञानरसतरङ्गिणी-कलकत्ता से १८२८ ई. में मुद्रित। भक्तिविनोद ठाकुर (१६-२० वीं शती)-बलदेव विद्याभूषण के ग्रन्थ ‘भगवद्गीताभाष्य’ पर “विद्वद्रजनी” टीका-कलकत्ता से १६२४ ई. में प्रकाशित। अक्षयकुमार शास्त्री (१६-२० वीं शती)-बलदेव विद्याभूषण कृत ‘प्रमेयरत्नावली’ पर ‘प्रभा’ टीका-कलकत्ता से १६२७ ई. में प्रकाशित।

रामानन्दचार्य का दर्शन (अद्वैत)

दामोदर शास्त्री सहस्रबुद्धे (१६-२० वीं शती)-ये गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज, वाराणसी में अध्यापक थे। १- विवरणोपन्यासः -रामानन्द सरस्वतीकृत “विवरणतात्पर्य" की व्याख्या। तारा प्रिंटिंग वर्क्स, बनारस से मुद्रित। १६०१ ई.। २- शङ्कराचार्यकृत “वाक्यसुधा” की टीका- उपर्युक्त ग्रन्थ के साथ ही प्रकाशित। रघुवरदास वेदान्ती (१६-२० वीं शती) १- ब्रह्मसूत्र पर रामानन्दकृत “ब्रह्मामृतवर्षिणी” टीका तथा आनन्दभाष्य की टीका अहमदाबाद से १६२६ ई. में प्रकाशित।

काश्मीर शैवदर्शन

मनसाराम राजानक, कश्मीर (१८-१६ वीं शती)-मनसाराम राजानक का जन्म अठारहवीं शती के उत्तरभाग में हुआ और ये उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध तक जीवित रहे। १८०० ई. के लगभग पठानों के अत्याचारों से दुःखी होकर ये कश्मीर छोड़कर पंजाब (अब पाकिस्तान स्थित) के गुजराल जिले में जाकर “किलादार" नामक ग्राम में रहने लगे। यहीं रहकर इन्होंने काश्मीर शैवदर्शन पर ‘स्वातन्त्र्यदीपिका" नामक ग्रन्थ का निर्माण किया। “स्वातन्त्र्य-दीपिका” एक सूत्रशैली में उपनिबद्ध ग्रन्थ है, जिसपर “वृत्ति” भी ग्रन्थकार ने स्वयं लिखी है। यह काश्मीर शैवदर्शन पर अभिनव दृष्टिकोण से लिखा गया महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। पाण्डुलिपि श्री रणवीर केन्द्रीय विद्यापीठ में (जम्मू) विद्यमान है। पं. नीलकण्ठ गुरटू द्वारा सम्पादित और शीघ्र प्रकाश्य। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास हरभट्ट शास्त्री, कश्मीर-शास्त्री जी का जन्म उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में हुआ। इन्होंने काश्मीर शैवदर्शन एवं तन्त्र के कई प्रमुख ग्रन्थों श्री-विद्यार्णवतन्त्र इत्यादि का सम्पादन किया। शास्त्री जी की मौलिक रचनाएं ये हैं-१-अजडप्रमातृसिद्धिवृत्तिः। शास्त्री जी ने आचार्य उत्पलदेव कृत “अजडप्रमातृसिद्धिः” पर संक्षिप्त वृत्ति लिखी है, जो काश्मीर राज्य के शोध विभाग द्वारा काश्मीर ग्रन्थावली के अर्न्तगत “सिद्धित्रयी" के एक भाग के रूप में प्रकाशित है। २. “पञ्चस्तवी” पर संस्कृत टीका। केरल के श्रीधर्माचार्य द्वारा विरचित ‘पञ्चस्तवी" पर यह बड़ी सारगर्भित टीका है, जिसका प्रकाशन काश्मीर रिसर्च विभाग से हुआ है। ३. शिवस्तोत्रम्-शास्त्री जी ने अपने जीवन में मिली उपेक्षाओं से मर्माहत होकर यह मनोहर स्तोत्र लिखा था, जो अप्रकाशित और सम्प्रति अप्राप्त है।

  • कान्तिचन्द्र पाण्डेय, उत्तर प्रदेश- ये लखनऊ विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे । काश्मीर शैवदर्शन पर मौलिक शोधकार्य करने वालों में इनका नाम अग्रगण्य है। लखनऊ में इन्होंने “अभिनवगुप्त इन्स्टीट्यूट’ की स्थापना करायी। काश्मीर शैवदर्शन पर अंग्रेजी में इन्होंने कई शोधपरक लेख एवं ग्रन्थ लिखे, जो प्रकाशित हैं। संस्कृत में विरचित इनका “शैवदर्शनबिन्दुः” नामक मौलिक ग्रन्थ है, जो १६६४ ई. में वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित है। आचार्य अमृतवाग्भव, उत्तर प्रदेश (१६०३-१९८६)-इनका जन्म वाराणसी में वैदर्भ ब्राह्मणों के प्रसिद्ध वरकले वंश में हुआ था। इनका प्रारम्भिक नाम वैद्यनाथ वरकले था। इन्होंने संस्कृत महाविद्यालय, (सम्प्रति सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय) में म.म. श्री गोपीनाथ कविराज एवं श्री नित्यानन्द पन्त से शिक्षा प्राप्त की। १२८ ई. ये परिव्राजक हो गये और तबसे इनका नाम आचार्य अमतवाग्भव के रूप में विख्यात हआ। इन्होंने जम्म में “श्रीपीठ”, शैव दर्शन शोध संस्थान की स्थापना की। इन्होंने शैवदर्शन पर कई ग्रन्थ लिखे, जिनका परिचय इस प्रकार है- १. परमशिवस्तोत्रम्- यह कालक्रमानुसार आचार्य की प्रथम रचना है, जिसमें ३६ तत्त्वों के रूप में अभिव्यक्त परमेश्वर की स्तुति की गयी है। इसका प्रकाशन कुछ ही वर्ष पूर्व जम्मू से हुआ है। २. आत्मविलासः- इस ग्रन्थ में शाङ्कर अद्वैतवाद के अनुसार प्रतिपादित मायोपाधि, विवर्तवाद एवं जगन्मिथ्यात्व का खण्डन करके अद्वैत शैवदर्शन के अनुसार माया को ब्रह्म की स्वातन्त्र्यमयी शक्ति और जगत् की लीला का विलास बतलया गया है और कहा गया है कि यही वास्तविक औपनिषदिक सिद्धान्त है। पूर्वपक्ष के खण्डन एवं विषय के प्रतिपादन में तों एवं अनुभूति का आश्रय लिया गया है। यह शैवदर्शन का अर्वाचीन युग का अत्युत्तम ग्रन्थ है। द्वितीय संस्करण जम्मू से प्रकाशित। ३. मन्दाक्रान्तास्तोत्रम्- कश्मीर के बारामुला नामक पत्तन में देवी शैलपुत्री के पावन तीर्थ पर इस स्तोत्रग्रन्थ का मन्दाक्रान्ता छन्द में निर्माण हुआ। इसमें काव्य एवं शास्त्र-तत्त्व दोनों का मञ्जुल समन्वय है। इसका प्रकाशन “वरकल राधाकृष्ण शोधसंस्थान”, दिल्ली तथा “श्री अमृतवाग्भव शोधसंस्थान, जयपुर” से हुआ है। ४. महामन्त्रमयी परमशिवप्रार्थना यह एकश्लोकमयी रचना है, जिसे महामन्त्र के रूप में माना गया है। इसका प्रकाशन दिल्ली दर्शन और शास्त्र और जम्मू से कई बार हुआ है। ५. श्रीविंशतिकाशास्त्रम्- यह एक संक्षिप्त आगम दर्शन का ग्रन्थ है, जिस पर दो संस्कृत टीकाएँ भी लिखी गयी हैं। स्वाध्याय सदन, भरतपुर से प्रकाशित। ६. महानुभवशक्तिस्तोत्रम्- यह संक्षिप्त दार्शनिक स्तोत्र है, जिसमें परमेश्वर की पञ्च शक्तियों के रहस्य को उद्घाटित किया गया है। प्रथम बार श्री स्वाध्याय सदन, भरतपुर से तथा दूसरी बार जम्मू से प्रकाशित। ७. त्रिगुणवरस्तोत्रम्- इसमें भगवान् शिव की स्तुति है। दिल्ली से प्रकाशित। ६. सिद्धमहारहस्यम्- इस ग्रन्थ में आचार्य ने अपनी यौगिक साधनाओं, अनुभूतियों एवं शैवदर्शन के सिद्धान्तों का वर्णन किया है। १६६७ ई. में प्रथम बार म.म. गोपनीनाथ कविराज जी के अंग्रेजी प्राक्कथन के साथ वाराणसी से तथा दूसरी बार हिन्दी टीका के साथ जम्मू से प्रकाशित। रामजू सौदागर, श्रीनगर-ये संस्कृत के विशेष विद्वान् नहीं थे, परन्तु किसी सिद्ध पुरुष से सम्पर्क होने पर साधुओं जैसी संस्कृत में शैवदर्शन पर इन्होंने “अभिनवसूत्रवार्तिक" का निर्माण किया। प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण है अतः श्री रणवीर विद्यापीठ जम्मू में उसका शोधन परिमार्जन किया गया। श्री नीलकण्ठ गुरटू द्वारा सम्पादित, प्रकाशन हेतु प्रस्तुत। बलजिन्नाथ पण्डित, श्रीनगर (१६१६ ई.)- इनका जन्म कुलगाम में १६१६ में हुआ। १. स्वातन्त्र्यदर्पणः (सटीकः) यह कारिकाओं में उपनिबद्ध शैवदर्शन का महत्त्वपूर्णग्रन्थ है। लेखक द्वारा स्वयं प्रकाशित। बाद में लेखक ने मूल ग्रन्थ पर अतीव सारपूर्ण संस्कृत टीका भी लिखी, जिसमें शैवदर्शन की अन्य दर्शनों से तुलना करते हुए अद्वैत शैवदर्शन के सिद्धान्तों तथा त्रिक प्रक्रिया के साधनों का वर्णन किया गया है। टीका सहित इसका प्रकाशन श्रीरणवीर विद्यापीठ, जम्मू से हुआ। २.ललितास्तवरत्नटीका-महामुनि विरचित ललिता देवी के सुमनोहर स्तोत्र ग्रन्थ पर संस्कृत टीका। मूल ग्रन्थ में श्रीचक्र की उपासना का काव्यात्मक शैली में वर्णन है। ३.विंशतिकाशास्त्रविमर्शिनी-आचार्य अमृतवाग्भव के “विंशतिकाशास्त्रम्” की संस्कृत टीका। टीका बड़ी वैदुष्यपूर्ण तथा सारगर्भित है। श्री स्वाध्याय सदन, भरतपुर से प्रकाशित । ४. आत्मविलासविमर्शिनी- आचार्य अमृतवाग्भव के “आत्मविलास” नामक शैवदर्शनपरक ग्रन्थ पर लिखी गयी विस्तृत व्याख्या। श्रीपीठ शैव दर्शन शोध संस्थान, जम्मू से प्रकाशित। ५.महानुभवशक्तिस्तोत्रटीका- यह भी अमृतवाग्भव जी के स्तोत्रग्रन्थ पर टीका है। श्रीस्वाध्याय सदन, जयपुर से प्रकाशित। ६.सिद्धमहारहस्यविमर्शिनी - आचार्य अमृतवाग्भव के ग्रन्थ पर विस्तृत संस्कृत टीका। प्रकाशन विचाराधीन । ७. काश्मीरशैवदर्शनस्य बृहत्कोश:-“शब्दकल्पद्रुम” की शैलीपर रचित शैवदर्शनविषयक अति महत्त्वपूर्ण और उपादेश कोशग्रन्थ। श्रीरणवीर विद्यापीठ जम्मू द्वारा इसका प्रकाशन कराया जा रहा है। श्रीनाथ टिक्कू, श्रीनगर-भर्गशिखास्तोत्रम्-इस ग्रन्थ में साहित्यमयी शैली में शैवदर्शन के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। ६०२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास श्रीरघुनाथचन्द्र-विंशतिकाशास्त्रप्रकाशिनी-आचार्य अमृतवाग्भव के ग्रन्थ पर विशद संस्कृत टीका। बारिकानाथ शास्त्री, जम्मू - ये जम्मू के आयुर्वेदिक कालेज में अध्यापक थे। बाद में डॉ. बलिजन्नाथ पण्डित के साथ “काश्मीरशैवदर्शनस्य बृहत्कोशः” के निर्माण में इन्होंने कार्य किया। इन्होंने स्वतन्त्र रूप से आचार्य अभिनवगुप्त के “परमार्थसार” पर एक संस्कृत टीका लिखी, जो अभिनव शैली में विरचित उत्तम टीका है। श्री रणवीर विद्यापीठ, जम्मू द्वारा प्रकाशित। रामेश्वर झा-आचार्य रामेश्वर झा का जन्म मिथिलाञ्चल के समस्तीपुर जिले के “पटसा” ग्राम में वैशाखशुक्ल प्रतिपदा वि. सं. १६६२ (१६०५ ई.) में हुआ। उनके पिता का नाम श्री अयोध्यानाथ झा और माता का नाम रमा देवी था। आचार्य रामेश्वर झा ने पं. रामदत्त मिश्र, श्री राधाकान्त झा, श्री सदानन्द झा, पं. उग्रानन्द झा और पं. बालकृष्ण मिश्र के सान्निध्य में व्याकरण एवं न्यायशास्त्र का विधिवत् अध्ययन कर उभय शास्त्र में प्रगाढ़ पाण्डित्य अर्जित किया। इन्होंने खुर्जा स्थित श्रीराधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय में न्यायविभागाध्यक्ष के रूप में तथा काशी के नित्यानन्द संस्कृत वेद महाविद्यालय में प्राचार्य के रूप में सफल अध्यापन कार्य किया। पं. रामेश्वर झा के अप्रतिम वैदुष्य के फलस्वरूप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से १६८० ई. में उन्हें महामहोपाध्याय की मानद उपाधि प्राप्त हुई और १६८१ ई. में भारत सरकार की ओर से राष्ट्रपति सम्मान भी मिला। महान दार्शनिक एवं तन्त्रशास्त्र के मर्मज्ञ मनीषी महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज जी की प्रेरणा से पं. रामेश्वर झा ने शैवदर्शन विषयक “पूर्णताप्रत्यभिज्ञा” नामक मौलिक ग्रन्थ की रचना की। दो भागों में विभक्त पूर्णताप्रत्यभिज्ञा के प्रथम भाग में पूर्णता का तथा द्वितीय भाग में शैवदर्शन के ३६ तत्त्वों का वर्णन है। आर्ष शैली में लिखित यह ग्रन्थ शैवागमदर्शन के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त करता है। पूर्णताप्रत्यभिज्ञा’ हिन्दी टीका के साथ तारा प्रिंटिंग वर्क्स वाराणसी से १६८४ ई. में प्रकाशित हुई है। “शिवतत्त्वविमर्शः” पं. रामेश्वर झा की दूसरी रचना है। इसके अतिरिक्त आचार्य रामेश्वर झा की दैनन्दिनियों में सहस्राधिक हस्तलिखित श्लोक सुरक्षित हैं। पं. रामेश्वर झा १२ दिसम्बर १६८१ को इहलीला समाप्त कर शिवसायुज्य को प्राप्त हुए। रामचन्द्र द्विवेदी-इनके द्वारा लिखित “त्रिकदर्शनम्’ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से १६६२ में प्रकाशित हुआ।

वीरशैव धर्म-दर्शन

भारतीय धर्म-दर्शन में वीरशैव धर्म-दर्शन की भी एक भूमिका है। यह धर्म-दर्शन आगमों पर आधारित है। ६०३ FADपर्शन और शास्त्र सिद्धान्ताख्ये महातन्त्रे कामिकाये शिवोदिते। निर्दिष्टमुत्तरे भागे वीरशैवमतं परम्।। (सि.शि. ५.१४) सिद्धान्तशिखामणि की इस उक्ति से यह बात सिद्ध होती है। भगवान शिव के द्वारा प्रतिपादित कामिक आदि वातुलान्त अट्ठाईस शैवागम सिद्धान्त आगम के नाम से प्रसिद्ध हैं। “आप्तौक्तिरत्र सिद्धान्तः शिव एवाप्तिमान् यतः” श्रीकण्ठ सूरि की इस उक्ति से यह पुष्ट हो सकता है। इन अट्ठाइस आगमों में दस आगम भगवान शिव से और अट्ठारह आगम भगवान रुद्र से उपदिष्ट माने जाते हैं। इस दस और अट्ठारह आगमों को दक्षिण के अघोर शिव जैसे शिवाचार्य सिद्धान्तागम नाम देते हैं और उनकी द्वैतपरक व्याख्या करते हैं। रत्नत्रयपरीक्षा में वे कहते हैं-“सिद्धान्तशब्दः पकजादिशब्दवद् योगरूढ्या शिवप्रणीतेषु कामिकादिषु दशाष्टादशसु तन्त्रेषु प्रसिद्धः” (पृ. १४६)। इसके विपरीत काश्मीरी विद्वान् अभिनवगुप्त अपने महनीय ग्रन्थ ‘तन्त्रालोक’ में और जयरथ इस विशाल ग्रन्थ की अपनी अतिविशिष्ट ‘विवेक’ नामक टीका में १० शिवागमों को द्वैतवादी, १८ रुद्रागों को द्वैताद्वैतवादी और E४ भैरवागमों को अद्धयवादी बताते हैं। वे अपने इसी ग्रन्थ में कहते हैं कि अद्वैत द्वैत और द्वैताद्वैत शिवागमों के व्याख्याता त्र्यम्बक, आमर्दक श्रीनाथ नामक आचार्य हुए हैं और इन सिद्धान्तों के प्रचार के लिए इन्होंने अपनी-अपनी स्वतन्त्र मठिकाएँ स्थापित की हैं। शैवागमों के आधुनिक विद्वान् डॉ. कान्तिचन्द्र पाण्डेय जी ने भी १० शिवागमों को द्वैतवादी और १८ रुद्रागमों को द्वैताद्वैतवादी माना है। इन पूरे अट्ठाइस आगमों को मानने वाले वीर शैव आचार्य इनसे द्वैताद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं। पूर्वोक्त अट्ठाइस शैवागमों के उत्तर भाग में वीरशैव सिद्धान्त प्रतिपादित है। अतः वीरशैव धर्म-दर्शन का मूल अट्ठाइस आगों को ही माना जाता है। इसलिए पारमेश्वर आगम के वीरशैवं वैष्णवं च शाक्तं सौरं विनायकम्। कापालमिति विज्ञेयं दर्शनानि षडेव हि।। इस वचन में आगम-संमत षड्दर्शनों की गणना में वीरशैव की गणना की गई है। ‘वीरशैव’ शब्द का निर्वचन ‘वीरशैव’ शब्द का दार्शनिक और धार्मिक दृष्ट्या दो प्रकार से निर्वचन किया जाता है। शैव शब्द का अर्थ होता है शिवभक्त । उसमें जो वीर विशेषण लगाया गया है उसका दार्शनिक विवेचन करते हुए आचार्यों ने कहा है कि वीशब्दैनौच्यते विद्या शिवजीवैक्यबोधिका । तस्यां रमन्ते ये शैवा वीरशैवास्तु ते मताः। (सि.शि. ५.१६)आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास यहाँ पर ‘वी’ शब्द का अर्थ विद्या होता है, जो कि शिव और जीव का अभेद बोधन करने वाली होती है। और “र” शब्द का अर्थ रमण माना गया है। अर्थात् उस विद्या में रमण करने वाला। इस प्रकार शिव और जीव का अभेद बोधन करने वाली विद्या में रमण करने वाले शिव भक्त ही ‘वीरशैव’ कहलाते हैं। इस शब्द का धार्मिक निर्वचन इस प्रकार किया जाता है कि वीरव्रत परिपालन करने वाले शिवभक्त को वीरशैव कहते हैं। यहाँ पर दीक्षा में प्राप्त इष्ट लिंग को सदा शरीर पर धारण करते हुए उसकी निष्ठा से पूजा करना ही वीरव्रत कहलाता है। इतना ही नहीं, शरीर पर धारण किया हुआ इष्टलिंग यदि अनवधान के कारण शरीर से अलग हो जाता है तो उस समय प्राण त्याग करने का यह शिवभक्त संकल्प रखता है। इसीलिए भी इसको वीरव्रत कहा जाता है। इस वीरव्रत के परिपालन करने के कारण इस शिवभक्त को वीरशैव कहा जाता है। चन्द्रज्ञान आगम में - इष्टलिंगवियोगे वा व्रतानां वा परिच्युतौ। तृणवत् प्राणसंत्याग, इति वीरव्रतं मतम्।। भक्त्युत्साहविशेषोऽपि वीरत्वमिति कथ्यते। वीरव्रतसमायोगाद् वीरशैवं प्रकीर्तितम् ।। (चन्द्र क्रिया. १०.३३-३४) - इस प्रकार उसका स्पष्टीकरण मिलता है। इस तरह गुरुदीक्षा में इष्टलिंग को शरीर पर सदा धारण करता हुआ शिव और जीव के अभेद बोधन करने वाली विद्या में रममाण शिवभक्त को ही ‘वीरशैव’ कहते हैं। वीरशैवों को ही लिंगायत भी कहते हैं। यह तो शास्त्रीय शब्द न होकर लोक प्रचलन में आया हुआ है। शरीर पर इष्ट लिंग धारण करने के कारण इन्हें व्यवहार में लिंगायत कहा जाता है, किन्तु धर्म और दर्शन की दृष्टि से ‘वीरशैव’ शब्द ही अधिक महत्त्व रखता है अतः प्राचीन वीरशैव संस्कृत साहित्य में ‘वीरशैव’ शब्द का ही प्रयोग मिलता है न कि लिंगायत शब्द का। वीरशैव धर्म-दर्शन के संस्थापक आचार्यबान पर वीरशैव धर्म एक सनातन धर्म है। इसकी परम्परा युग-युगों से आयी हुयी है। इस धर्म के युग प्रवर्तक पाँच आचार्य हुए हैं जिन्हें पंचाचार्य शब्द से सम्बोधित किया जाता है। कलियुग के उन आचार्यों के नाम - श्री रेवणाराध्य, श्री मरुलाराध्य, श्री एकोरामाराध्य, श्री पंडिताराध्य और श्री विश्वाराध्य के नाम से जाने जाते हैं। कलियुग के इन पांचों आचार्यों ने क्रमशः कोलनुपाक (आन्ध्र प्रदेश) के सोमेश्वर लिंग, वटक्षेत्र (मध्यप्रदेश, उज्जैन) के श्री सिद्धेश्वर लिंग, द्राक्षाराम क्षेत्र (आंध्रप्रदेश) के भीमनाथ लिंग, श्रीशैल (आन्न प्रदेश) के श्रीमल्लिकार्जुन लिंग और श्रीकाशीक्षेत्र (उत्तर प्रदेश) के विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग से अवतरित होकर वीरशैव धर्म-दर्शन की स्थापना की है। पनि दर्शन और शास्त्र ६०५ - इन पाँचों आचार्यों ने सम्पूर्ण भारत देश में इस धर्म-दर्शन के प्रचार-प्रसार करने के लिए पाँच पीठों की स्थापना अन्यान्य प्रदेशों में की है। इनमें जगद्गुरु रेवणाराध्य का वीरपीठ कर्नाटक के चिक्कमंगलूर जिले के रमापुरी ग्राम में स्थित है। इसी प्रकार श्री जगद्गुरु मरुलाराध्य जी का सद्धर्म पीठ कर्नाटक के बेल्लारी जिले के उज्जयिनी ग्राम में स्थित है। श्री जगद्गुरु एकौरामाराध्य जी का वैराग्य पीठ हिमवत् केदार क्षेत्र के उखीमठ (चमोली जिला) में स्थित है। श्री जगद्गुरु पंडिताराध्य जी का सूर्यपीठ श्रीशैल (आन्ध्र प्रदेश) क्षेत्र में स्थित है और श्री जगद्गुरु विश्वाराध्य जी का ज्ञानपीठ सुप्रसिद्ध काशीक्षेत्र में विराजमान है। ये पांचों पीठ अत्यन्त प्राचीन हैं। समय-समय पर इस देश के राजा-महाराजाओं ने भूदान, गोदान और सुवर्ण आदि दान देकर इन पीठों की गरिमा बढ़ायी है। इन पाँचों पीठों की आचार्य परम्परा अभी तक अक्षुण्ण गति से चली आ रही है। इन पाँचों पीठों के मूल परमाचार्य ही वीरशैव धर्म-दर्शन के संस्थापनाचार्य माने जाते हैं। इन आचार्यों के अतिरिक्त वीरशैव धर्म के अनुयायी और प्रसारक-प्रचारक संत भी हो गये हैं। उनमें महात्मा बसवेश्वर, देवरदासिमार्य, अक्कमहादेवी, मन्मथस्वामी, आदि प्रमुख हैं। धार्मिक संस्कार में स्त्री-पुरुषों को समान अधिकार वीरशैव धर्म में प्रत्येक व्यक्ति को साधना में प्रवृक्त होने से पहले अपने कुलगुरु के द्वारा दीक्षा संस्कार लेना पड़ता है। इस धर्म में साधना करने के लिए स्त्री-पुरुष इन दोनों को समान अधिकार दिया गया है। अतः जैसे पुरुषों का दीक्षा संस्कार किया जाता है उसी प्रकार स्त्रियों का भी किया जाता है। इस दीक्षा संस्कार में पट्टाभिषिक्त कुलगुरु अर्थात् शिवाचार्य अपने शिष्यों को इष्टलिंग प्रदान कर पंचाक्षरी महामंत्र का उपदेश करते हैं। यह दीक्षा वर्ष के आठवें वर्ष भी की जाती है। इस दीक्षा में प्राप्त इष्टलिंग स्त्री और पुरुष दोनों अपने शरीर मस्तक, पसली, वक्षस्थल, कंठ और हथेली इन स्थानों में से किसी एक स्थान पर अपनी इच्छानुसार धारण करते हैं किन्तु नाभि के नीचे इसको धारण करना निषिद्ध है। उस इष्टलिंग को सुवर्ण, चांदी, पीतल, तान आदि धातुओं से निर्मित सज्जिका में जो कि शिवलिंग नंदीश्वर, आनफल, विल्वफल तथा मोदक आकार का एक छोटा सा मंदिर होता है उस सज्जिका को डोरा से संलग्न करके शरीर पर धारण करते हैं। और प्रतिदिन एक या दो बार उस इष्टलिंग की पूजा की जाती है। इस प्रकार वीरशैव धर्म में दीक्षा इष्टलिंग धारण और उसकी पूजा आदि धार्मिक विधियों के स्त्री-पुरुषों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। यह इस धर्म की विशेषता है। वीरशैव दर्शन वीरशैव दर्शन को शिवाद्वैत, शक्तिविशिष्टाद्वैत और विशेषाद्वैत आदि नामों से व्यवहृत आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास किया जाता है। इस दर्शन में परमतत्त्व को स्थल अथवा लिंग शब्द से अभिहित किया जाता है। सृष्टि से पूर्व यह सारा विश्व उस लिंग तत्त्व में विलीन रहता है और सृष्टि के समय में में उसी से व्यक्त हो जाता है। शिव अपनी शक्ति के संकोच से निर्गुण और शक्ति के विकास से सगुण हो जाता है। शिव और शक्ति में अविनाभाव संबंध माना गया है। इसी पर शिव के अंश को ही जीवात्मा माना जाता है। यह जीवात्मा इस सिद्धान्त मैं बताये गये अष्टावरणों से युक्त होकर पंचविध आचारों का पालनकर्ता हुआ षट्स्थल मार्ग के द्वारा उसी पर शिव के साथ समरस हो जाता है। इस स्थिति को सामरस्य स्थिति कहते हैं। यही जीवात्मा की मुक्तावस्था है। आधुनिक वीरशैव संस्कृत साहित्य __ वीरशैव संस्कृत साहित्य अत्यन्त प्राचीन है। अट्ठाइस शैवागम इसके मूल स्रोत हैं। वेदों में तथा उपनिषदों में भी जहां तहां इस दर्शन के प्रमुख सिद्धान्त प्रतिपादित पाये जाते हैं। इसके अलावा इस धर्म के प्राचीन आचार्यों के द्वारा लिखित वीरशैव संस्कृत साहित्य विपुल मात्रा में उपलब्ध है। प्रस्तुत प्रकरण में उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में विरचित वीरशैव संस्कृत साहित्य और साहित्यकारों के बारे में संक्षेप में विषय प्रस्तुत किया जा रहा है। (9) शिवकुमार शास्त्री महामहोपाध्याय पं. श्री शिवकुमार शास्त्री जी काशी के मूर्धन्य विद्वानों में से एक थे। काशी के विद्वान और जनता के मन में आपके प्रति अत्यन्त गौरव की भावना आज भी है। विद्वत्ता के साथ आप परम शिवभक्त भी थे। काशी जंगमबाड़ी महामट के तत्कालीन सचे पीठाचार्य श्री १००८ जगद्गुरु राजेश्वर शिवाचार्य महास्वामी जी के प्रति शास्त्रीजी की नितान्त श्रद्धा थी। उन्हीं के निर्देशन पर पं. शिवकुमार शास्त्री जी ने ईसवी सन १६०३ में “लिंगधारणचंद्रिका” नामक प्राचीन वीरशैव धर्म के ग्रन्थ के ऊपर शरद् नामक संस्कृत व्याख्या लिखी। मूल ग्रन्थकार श्री नंदिकेश्वर शिवाचार्य ने वीरशैव धर्म में प्रतिपादित इष्टलिंगधारण को वैदिक सिद्ध किया है। स्थान स्थान पर वेद, आगम, उपनिषदों का उदाहरण देकर उसको पुष्ट किया है। यह वीरशैव धर्म का एक सिद्धान्त ग्रन्थ है। पं. शिवकुमार शास्त्रीजी ने इस ग्रन्थ की अपनी शरद् टीका में पूर्व और उत्तर मीमांसा के न्यायों को उदाहरणों के द्वारा बड़ी सरल भाषा में मूल विषय को पुष्ट और स्पष्ट किया है। इस शरद् टीका के साथ लिंगधारणचंद्रिका ई. सन् १६०५ में पं. काशीनाथ शास्त्री के द्वारा सम्पादित होकर जंगमबाड़ी मठ से प्रकाशित हुई थी। सन् १९८८ में पं. ब्रजबल्लभ द्विवेदी के सम्पादकत्व में स्वामी शिवानन्द के द्वारा विरचित हिन्दी भाषानुवाद के साथ जंगमवाड़ीमठ के शैवभारती भवन के द्वारा प्रकाशित हुई है। ६०७ दर्शन और शास्त्र (२) उमचिगिशंकर शास्त्री पं. उमचिगी शंकर शास्त्री संस्कृत साहित्य और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान थे। वीरशैव धर्म-दर्शन के मर्मज्ञ पंडितों में इनका अग्रस्थान है। प्रस्थान त्रयी में प्रसिद्ध उपनिषदों के ऊपर प्राचीन वीरशैव आचार्यों के भाष्य लुप्तप्राय हो जाने के कारण इस क्षति की पूर्ति के लिए आपने प्रयास किया। लगभग ई. सन् १६२० में आप बेल्लारी जिला में स्थित उज्जयिनी पीठ के आस्थान विद्वान के रूप में रहे। उसी समय में आपने ईशावास्य, केन, मुण्डक और सिद्धान्त शिखोपनिषदों पर वीरशैव भाष्य लिखा है। ये चारों उपनिषद् उस समय कनड़ लिपि में प्रकाशित हुई थीं। मैसूर आस्थान विद्वान स्वर्गीय यम.जी. नंजुंडाराध्य ने १९७४ में देवनागरी लिपि में कन्नड़ भाषानुवाद के साथ इन्हें प्रकाशित किया। इस समय काशी जंगमवाड़ी मठ शैव भारती शोध प्रतिष्ठान के द्वारा ई. सन् १६६६ में इन सभी का संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ है। साथ ही पं. जगन्नाथ शास्त्री तैलंगजी का हिन्दी अनुवाद भी इसके साथ प्रकाशित हुआ है। के स्वर्गीय पं. शंकर शास्त्री ने इन उपनिषदों के मन्त्रों के आधार पर अपना वीरशैव भाष्य लिखकर उपनिषदों में प्रतिपादित वीरशैव सिद्धान्त को स्पष्ट किया है। इन उपनिषदों के भाष्य के अलावा पं. शंकर शास्त्री जी ने ब्रह्मसूत्र के ऊपर वृत्ति भी लिखी है। वह शांकरी वृत्ति के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भी बादरायण सूत्रों के आधार पर वीरशैव सिद्धान्त को स्पष्ट किया गया है। ई. सन १६७४ में मैसूर के यम.जी. नंजुंडाराध्य ने इसका सम्पादन करके प्रकाशित किया था। इस समय काशी जंगमवाड़ी मठ के शैवभारती शोध प्रतिष्ठान के द्वारा १९६८ में संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व सांख्यविभागाध्यक्ष डॉ. केदारनाथ त्रिपाठी ने इसका सम्पादन किया है। (३) काशीनाथ शास्त्री पं. काशीनाथ शास्त्री जी वीरशैव धर्म-दर्शन के तथा संस्कृत साहित्य के मूर्धन्य विद्वान थे। ई. सन् १६०५ में आप काशी में रहकर काव्यतीर्थ उपाधि प्राप्त की थी। आपके द्वारा लिखित “दुर्वाददूरीकरणम्” नामक संस्कृत ग्रन्थ काशी जंगमवाड़ी मठ से उस समय प्रकाशित हुआ था। इस ग्रन्थ में वीरशैव धर्म के कुछ आचार-विचारों के ऊपर किए गये आक्षेपों का शास्त्रीय ढंग से निराकरण किया गया है। यह ग्रन्थ काशी की विद्वन्मण्डली में मान्य रहा है। इसके अतिरिक्त वीरशैव धर्म दर्शन के संस्थापक श्री जगद्गुरु पंचाचार्यों के महिमा प्रतिपादक अनेक पद्य और भजनों को संस्कृत में लिखा है। इनके द्वारा लिखित संस्कृत के भक्ति साहित्य को जन सामान्य भी अत्यन्त आदर से पठन करते हैं। आपने मैसूर में काशीनाथ ग्रन्थ माला स्थापित करके अनेक संस्कृत ग्रन्थों का प्रकाशन किया है। वीरशैव विद्वत्समाज में आपका बड़ा आदर और सम्मान था। ६०६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (४) पंडित नीलकंठ शिवाचार्य

  • कर्नाटक के बेलगांव जिला के हूली ग्राम के बृहन्मठ के अधिपति स्व. नीलकंठ शिवाचार्य साहित्य, तर्क शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान थे। आप भी काशी के जंगमवाड़ी मठ में रहकर लगभग सन् १८३० में तर्क तीर्थपरीक्षा पास की। आपने “शिवाद्वैतपरिभाषा” नामक एक वीरशैव नामक प्रक्रिया ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ में वीरशैव दर्शन सम्मत पदार्थ और प्रमाणों के बारे में विस्तृत विवेचन किया गया है। जैसे “अद्वैतवेदान्त” में “वेदान्त परिभाषा” को प्रारंभिक अध्ययन करने वालों के लिए उपयुक्त माना जाता है उसी प्रकार नीलकंठ शिवाचार्य जी की यह शिवाद्वैत परिभाषा भी वीरशैव सिद्धान्त के प्रारम्भिक अध्ययन के लिए अत्यन्त उपयुक्त मानी जाती है। यह ग्रन्थ मैसूर से पहले कनड़ लिपि में प्रकाशित हुआ था। ई. सन् १६८३ में डॉ. चन्द्रशेखर शिवाचार्य जी ने देवनागरी लिपि में परिवर्तित करके सम्पादित किया। यह ग्रन्थ जंगमवाड़ी मठ से १८८३ में प्रकाशित हुआ है। ग्रन्थकार स्व. नीलकंठ शिवाचार्य जी का जन्म सन् १६०० में हुआ और इनका स्वर्गवास सन् १९७१ में हुआ। इन्होंने “शिवानुभवदीपिका”, “वीरशैवसिद्धान्तचूडामणि” नामक दो संस्कृत दार्शनिक ग्रन्थ ‘विजयध्वजविलासः" नामक काव्य तथा “सुरभारती विलास” नामक नाटक की भी रचना की है। (५) श्री जगद्गुरु वीरभद्र शिवाचार्य जी महाराज श्री जगदगुरु वीरभद्र शिवाचार्य जी काशी जंगमवाड़ी महामठ के पीठाधिपति हो गये हैं। आप साहित्य वेद और वेदान्त के प्रकाण्ड विद्वान थे। संस्कृत के अलावा और कई भाषाओं के विशेषवेत्ता थे। आपका जन्म ई. सन् १६०६ में आन्ध्र प्रदेश के नलगोंडा जिले के चर्लपल्ली ग्राम में हुआ। आपके पिता पं. नागभूषण शास्त्री जी शास्त्रवेत्ता थे। आप सन् १E२५ में काशी आकर यहाँ के जंगमवाड़ी मठ में निवास कर वेदतीर्थ और काव्यतीर्थ की उपाधि प्राप्त की। काशी में आपने १० वर्षों तक संस्कृत भाषा और शास्त्रों का अध्ययन किया साथ ही स्मृतितीर्थ और सर्वदर्शनतीर्थ उपाधि प्राप्त की। आप अपने अध्ययन काल में पं. वीरभद्र शर्मा के नाम से प्रख्यात रहे। आपने श्रीकरभाष्य चतुःसूत्री का सम्पादन किया है। उसमें लिखित सम्पादकीय संस्कृत भूमिका संशोधकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है। आपके द्वारा लिखित “शिवपञ्चविंशतिलीलाशी.शतकम्” संस्कृत पद्य ग्रन्थ भगवान शिव के २५ लीलाओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। इसके अलावा श्री जगद्गुरुविश्वाराध्याष्टकम्, श्री विश्वाराध्यभजनम्, आनन्दभजनम् आदि कई संस्कृत के स्तोत्र और भजन उनके द्वारा लिखे गये हैं। आप बालकवि थे। विभिन्न छन्दों में अनेक प्रसंगों में लिखित आपके संस्कृत पद्य बहुत ही मननीय हैं। सन् १६४४ में आपने जंगमबाड़ी मठ के ज्ञानपीठ के जगद्गुरु के पद को प्राप्त किया। आपके द्वारा स्थापित ज्ञान मन्दिर ग्रन्थालय इस पीठ के लिए अनमोल देन है। १६४८ में आप शिव सायुज्य को प्राप्त हुए। दर्शन और शास्त्र ६० (६) पंडित सदाशिव शास्त्री जी पंडित सदाशिव शास्त्रीजी का कर्नाटक प्रान्त के बेल्लारी जिला के हिरिहाल ग्राम में ई. सन् १६०० में जन्म हुआ। आपने भी काशी में आकर जंगमवाड़ी मठ में आकर निवास करते हुए साहित्य, व्याकरण और वेदान्त का अध्ययन किया। आपने १६२० में वीरशैवेंदुशेखरः नामक संस्कृत ग्रन्थ की रचना की। उसी सन् में वह ग्रन्थ जंगमवाड़ी मठ से प्रकाशित हुआ है। इस ग्रन्थ में वीरशैव धर्म के तत्त्वसिद्धान्त को अनेक युक्ति और प्रमाणों के द्वारा सिद्ध किया गया है। यह एक अनूठा ग्रन्थ है। काशी छोड़ने के बाद आपने रमापुरी महापीठ का जगद्गुरुत्व प्राप्त किया। उस समय आपका नाम श्री १००८ जगद्गुरु शिवानंद शिवाचार्य रखा गया। (७) पंडित सदाशिव शिवाचार्य जी पंडित सदाशिव शिवाचार्य जी कर्नाटक के हासन जिला के सखरायपट्टण के हालूस्वामी मठ के पदाध्यक्ष रहे। कर्नाटक में ही आपने उच्च शिक्षा प्राप्त की। १६४८ में आपने कैवल्य उपनिषद् के ऊपर वीरशैव सिद्धान्त परक भाष्य लिखा जो सादाशिवभाष्यम् नाम से प्रसिद्ध है। मैसूर के आस्थान विद्वान् एम.जी. नंजुंडाराध्यजी ने इस भाष्य का सम्पादन करके १८५१ में बेगलूर की प्रबोध पुस्तकमाला में प्रकाशित किया है। यह भाष्य भी इस उपनिषद् में छिपे वीरशैव सिद्धान्त को उजागर करता है। यह भाष्य हिन्दी अनुवाद के साथ शैव भारती शोध प्रतिष्ठान के द्वारा शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। (८) पंडित टी.जी. सिद्धप्पाराध्य जी र स्व. विद्वान डॉ. टी.जी. सिद्धप्पाराध्य जी बहुत बड़े संस्कृत भाषा और शास्त्र के विद्धान रहे। आप मैसूर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्राध्यापक रहे। सन् १९६० से १९६५ तक की कालावधि में आपने श्रीमद्भगवद्गीता और श्वेताश्वतरोपनिषद् के ऊपर वीरशैव भाष्य लिखा। ये दोनों ग्रन्थ १६६५ में चित्रदुर्ग (कर्नाटक) के बृहन्मठ के द्वारा प्रकाशित हुए हैं। विद्वान टी.जी. सिद्धप्पाराध्य जी ने अपने विद्वत्तापूर्ण भाष्य में उपनिषद् और गीता में प्रतिपादित वीरशैव सिद्धान्त को उजागर करने का सफल प्रयास किया है। इसके अतिरिक्त अथर्वशिखोपनिषद् के ऊपर आपने वीरशैव भाष्य लिखा है लेकिन अभी इसका प्रकाशन नहीं हुआ है। इसी तरह महात्मा बसवेश्वर और अक्कमहादेवी के कन्नड़ वचनों को इन्होंने बसवगीता एवं अक्कमहादेवीगीता के नाम से संस्कृत भाषा में छन्दोबद्ध किया है। इन दोनों का भी अभी तक प्रकाशन नहीं हुआ है। १६६६ में इनके द्वारा विरचित शरणगीता नामक संस्कृत पद्य ग्रन्थ चित्रदुर्ग बृहन्मठ से प्रकाशित हुआ है। इस शरण गीता में कर्नाटक के अनेक सन्तों की वाणी को संस्कृत पद्य रूप देकर उनके उपदेश को विश्व भर में प्रचारित होने का अवकाश प्रदान किया। संस्कृत समाज में इसका ६१० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास अच्छा प्रभाव पड़ रहा है। इन संस्कृत पद्यों का अंग्रेजी अनुवाद भी आपने लिखा है। (E) चंद्रशेखर शिवाचार्य जी महाराज श्री १००८ जगद्गुरु डॉ. चन्द्रशेखर शिवाचार्य महाराज जी का जन्म कर्नाटक के धारवाड़ जिला के नागनूरु ग्राम में १६४७ में हुआ। आपके पितामह संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। आपके पिताजी थोड़ा बहुत संस्कृत जानते हैं। आपने अपने दीक्षागुरु अमरेश्वर स्वामी जी की प्रेरणा से संस्कृत का अध्ययन प्रारम्भ किया। सन् १EEE में आपने काव्यतीर्थ उपाधि प्राप्त की। काशी के जंगमबाड़ी महामठ में १६७० में आपका प्रवेश हुआ और यहाँ के सं.सं. वि.वि. से सन् १६७३ में वेदान्ताचार्य की उपाधि प्राप्त की, साथ ही सन् १९८० में विद्या-वारिधि तत्पश्चात् १EEE में विद्या-वाचस्पति उपाधि प्राप्त की। सिद्धान्तशिखामणिसमीक्षा" आपका विद्यावारिधि का शोधप्रबन्ध है। यह ग्रन्थ १८८६ में जंगमबाड़ी मठ के शैवभारती भवन के द्वारा प्रकाशित हुआ है। श्रीसिद्धान्तशिखामणि वीरशैव धर्म दर्शन का एक सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ है। श्री स्वामीजी ने इस ग्रन्थ में शिव, जीव, जगत् और बन्ध और मोक्ष के बारे में प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धान्तों को न्याय वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और अद्वैत वेदान्त में प्रतिपादित उपरोक्त दार्शनिक तत्त्वों के साथ तुलना की है। इसके अतिरिक्त सिद्धान्तशिखामणि में प्रतिपादित कुछ विशिष्ट सिद्धान्तों की भी समीक्षा की गई है। स्वामीजी द्वारा अपनी वाचस्पति उपाधि के लिए प्रस्तुत किया गया प्रबन्ध ही शक्तिविशिष्टाद्वैततत्त्वत्रयविमर्शः है। यह ग्रन्थ १EE६ में जंगमबाड़ी मठ के शैव भारती शोध प्रतिष्ठान से प्रकाशित हुआ है। इस ग्रन्थ के लिए उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के द्वारा १६६७ में शांकर पुरस्कार प्रदान किया गया है। इस ग्रन्थ में वीरशैव सिद्धान्त के अष्टावरण, पंचाचार और षटस्थल नामक त्रिविध तत्त्वों के बारे में सुदीर्घ विवेचन किया गया है। यह अपने आप में एक अनोखा ग्रन्थ है। इन तीन तत्त्वों के बारे में विचार करते हुए वेदकाल से लेकर आधुनिक काल तक के सभी ग्रन्थों का प्रमाण उपस्थित किया गया है। स्वामी जी अपने विद्यार्थी अवस्था में डॉ. चन्द्रशेखर शर्मा हिरेमठ के नाम से जाने जाते रहे। वर्तमान समय में काशी जंगमबाड़ी मट के पीठाचार्य के रूप में विद्यमान हैं।

शाक्त दर्शन

पञ्चानन भट्टाचार्य तकरत्न, बंगाल (१८६६ ई. १३४६ बंगाब्द)-इनका जन्म कलकत्ता के समीप भाटपाड़ा नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता पं. नन्दलाल विद्यारल बहुत बड़े विद्वान् तथा कवि थे। इनका कर्मक्षेत्र बंगाल ही रहा। पचास वर्ष की अवस्था में काशीवास के निमित्त ये वाराणसी आये और सहस्त्रों छात्रों को न्याय और वेदान्तशास्त्र का अध्यापन किया। इन्होंने दस वर्षों तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अवैतनिक रूप से अध्यापन कार्य किया। १. ब्रह्मसूत्र पर देवीभाष्यम् अथवा शक्तिभाष्य-श्री जीव न्यायतीर्थ दर्शन और शास्त्र भट्टाचार्य द्वारा कालीघाट समिति की ओर से प्रकाशित, इण्डियन प्रेस, बनारस से १६३७ ई. में मुद्रित । यह ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र के ऊपर शाक्त दृष्टि से किया गया भाष्य है, जिससे तर्करन जी के वेद एवं तन्त्रविषयक पाण्डित्य तथा शाक्त दृष्टि का परिचय मिलता है। ब्रह्मसूत्रों का शक्ति-परक अर्थ लेकर किया गया यह मौलिक भाष्य है, जिसमें अर्थ की पुष्टिरूप में वेद-शास्त्रों से समुचित प्रमाण भी दिया गया है। ब्रह्मसूत्र के द्वितीय सूत्र “जन्माद्यस्य यतः” का पदच्छेद इन्होंने “जन्म आधस्य यतः करके “आद्य” अर्थात् सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी का जन्म जिससे हुआ, वही “ब्रह्म” है, यह अर्थ किया है। तथा वाक्सूक्त से “यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं” इत्यादि का प्रमाण उद्धृत किया है। इनका यह भी कथन है कि “ब्रह्म” ही शक्ति है। तर्करत्न जी का यह भाष्य नाना तों तथा युक्तियों से संवलित, वैदिक तथा तांत्रिक प्रमाणों से परिपुष्ट महनीय भाष्य है। २-सप्तशती पर देवी-भाष्य-बंगाक्षरों में कलकत्ता के बंगवासी प्रेस से मुद्रित। ३- भगवद्गीता का शक्तिभाष्य- इन ग्रन्थों के अतिरिक्त भी तर्करत्न जी ने कई धर्मशास्त्र संबंधी, दार्शनिक तथा काव्य-ग्रन्थ लिखे। सांख्यदर्शन पर “पूर्णिमा” टीका, वैशेषिक दर्शन पर “परिष्कार” टीका तथा न्यायदर्शन अनुमानवाद पर अनुमितिविवृति" टीका इनके चतुरन पाण्डित्य की परिचायक है। हम -चक्रेश्वर भट्टाचार्य, आसाम (२०वीं शती) - ये उग्रतारा मन्दिर (दोलोई) के मुख्य पुजारी थे। १. शाक्तदर्शनम् - गौहाटी से १६७० ई. में प्रकाशित। रचनाकाल-१E६८ ई. यह ग्रन्थ १० परिच्छेदों में विभक्त है जिनमें शाक्तदर्शन के मूल तत्वों का प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर शास्त्रीय विवेचन किया गया है। २. तारार्चनतन्त्रम् ३. शतचण्डीयागप्रयोगतन्त्रम्।

तंत्र

सरयूप्रसाद द्विवेदी, उ.प्र. (१८३५) - द्विवेदी जी उत्तरभारत के मूर्धन्य आगमाचार्य थे। इनका जन्म अयोध्या से कोस दूर सरयू नदी के किनारे “सनाह” ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. राधाकृष्ण शर्मा था। इनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर जयपुर नरेश सवाई रामसिंह (शासनकाल १८३५-१८८० ई०) ने इन्हें अपना राजपण्डित बनाया था, जहां से आजीवन सरकारी कोष से उन्हें वृत्ति मिलती रही। भास्करराय के पश्चात् लगभग दो शतकों बाद आगम के क्षेत्र में द्विवेदी जी जैसी विद्वद्विभूति का आविर्भाव हुआ, जिसने इस शास्त्र को एक नयी चेतना दी। द्विवेदी जी तन्त्र के साथ-साथ ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र के भी मर्मज्ञ विद्वान् थे। “संग्रहशिरोमणि’ उनका ज्योतिषविषयक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है तथा “सदाचारप्रकाशः” धर्मशास्त्र का। द्विवेदी जी के आगमविषयक प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं- १. आगमरहस्यम्-द्विवेदी जी के प्रपौत्र श्री गंगाधर द्विवेदी द्वारा सम्पादित और राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला ८८ में जोधपुर (राजस्थान) से १६६७ ई. में प्रकाशित, प्रकाशक-राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान । ग्रन्थ २ भागों में उपनिबद्ध और प्रकाशित है। “आगमरहस्य” की प्रसिद्धि इसके रचनाकाल के बाद ही प्रायः ६१२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सम्पूर्ण उत्तरभारत में हो चुकी थी। कारण यह था कि ग्रन्थकार ने स्वयं अपने आगमशास्त्र के ग्रन्थों में यत्र-तत्र इसका उल्लेख किया था। इसके पूर्व “सप्तशती-सर्वस्व” तथा “वर्णबीजप्रकाश” भारतीय तंत्र साहित्य के क्षेत्र में व्यापक रूप से लोकप्रिय हो चुके थे और ग्रन्थकार का नाम श्रेष्ठ आगमाचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था। ग्रन्थ के पूर्वार्ध भाग में २८ पटल और ५०३१ कारिकाएं हैं। इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें शैव, वैष्णव एवं शाक्त सम्प्रदायों के प्रमुख ग्रन्थों के आधार पर न केवल सृष्टि, प्रलय आदि शुद्ध दार्शनिक तत्त्वों का समावेश है, अपितु इसमें षट्कर्मसाधन तथा ध्यानयोगचतुष्टयप्रभृति व्यावहारिक विषयों का भी स्पष्ट निरूपण किया गया है। २-वर्णबीजप्रकाशः मुम्बई के प्रसिद्ध वेंकटेश्वर प्रेस से १६११ ई. में मुद्रित एवं प्रकाशित । संपादक-म.म. पं. दुर्गाप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थकार द्विवेदीजी के पुत्र थे। यह मंत्रशास्त्र का कोष ग्रन्थ है। क्रमशः आगम में माया, तार पवन, मेरु, अनुग्रह आदि शब्दों के पारिभाषिक अर्थ होते हैं-उनके द्वारा ही मन्त्रों में प्रयुक्त विभिन्न वर्गों का सकेत किया जाता है। इस संकेत को समझे बिना मन्त्रों के वर्णात्मक स्वरूप की योजना नहीं ज्ञात हो सकती। मन्त्रों के एवंविध स्वरूप के जानने के लिए इस कोष की अत्यन्त उपादेयता है। ३. सप्तशतीसर्वस्वम्-नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ से सन् १८६२ ई. में मुद्रित और प्रकाशित । लगभग सम्पूर्ण भारतवर्ष में सप्तशती या दुर्गापाठ का व्यापक प्रचार है, अतः उसके पाठ एवं विधि-विधान के विषय में व्यापक त्रुटियाँ और विसंगतियां भी हैं। द्विवेदी जी ने कात्यायनीतन्त्र, मेरुतन्त्र, मरीचिकल्प, चिदम्बासंहिता आदि आगम के मूल ग्रन्थों का भलीभांति पर्यालोचन करके ग्रन्थों से एतत्सम्बन्धी सारभूत और प्रामाणिक तत्त्व को लेकर इस ग्रन्थ की रचना की है। २४ विश्रामों में यह ग्रन्थ समाप्त हुआ है। इसमें दुर्गापाठ से सम्बन्धित सभी प्रकार के वैदिक एवं तांत्रिक काम्य प्रयोग, पुरश्चरण आदि का सन्निवेश है। ४. मातृकास्तुतिः टीका-इण्डियन प्रेस, प्रयाग से १६०७ ई. में मुद्रित । हरितायन-संहिता के अन्तर्गत ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं के द्वारा की गयी, मातृकावर्णरूपिणी भगवती त्रिपुरसुन्दरी की यह स्तुति है। इसमें मातृका विज्ञान के गूढ़ तत्त्वों के व्यापक अर्थ निहित हैं। द्विवेदी जी ने इस मूल ग्रन्थ की टीका में आगमशास्त्र के अनेक गंभीर विषयों-परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी का स्वरूप और आविर्भाव का प्रकार-तथा षट्चक्रों की अन्तर्भावना आदि का प्राञ्जल विवेचन किया है। ५. पादुकापञ्चकम्-टिप्पणी-वाराणसी के सत्यनाम प्रेस से सन् १९३२ ई. में मुद्रित । यह आदिनाथ कृत “गुरुपादुकास्तोत्र है, जिसमें शिवशक्ति के रूप में गुरु के शुक्लरक्त चरणों की स्तुति की गयी है। प्रातःकृत्य के अन्तर्गत तान्त्रिकों द्वारा इसके पाठ का विधान है। इसमें कुल ६ श्लोक हैं, जो बड़े गंभीर और अर्थपूर्ण हैं। द्विवेदी जी ने इस पर टिप्पणी लिखी है और इसमें इसके आगमिक अर्थों को स्पष्ट किया है। ६.सर्वार्थकल्पद्रुमः यह अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा में प्रतिपादित कृत्यासूक्त का विवरण है। भद्रकाली इसकी मुख्य देवता हैं। इसमें विभिन्न कामनाओं की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के यन्त्र-मन्त्रों की साधना का उल्लेख किया गया है। वेद और तंत्र दोनों की सम्मिलित दर्शन और शास्त्र अनुष्ठान-प्रक्रिया इसमें निहित है। ७. परशुरामसूत्रवृत्तिः (टिप्पणी)-यह श्रीविद्या का प्रतिपादक आर्ष ग्रन्थ हैं। द्विवेदी जी ने इस पर टिप्पणी लिखी है। मूल ग्रन्थ पर रामेश्वरसूरि का एक “सौभाग्यसुधोदय” टीका भी है जो गायकवाड़ ओरियण्टल सीरीज, बड़ौदा से प्रकाशित हो चुकी है। ८. साधकसर्वस्वम्-यह शक्तिदर्शन का प्रधान ग्रन्थ है। इसमें शक्ति की उपासना से सम्बन्धित सैद्धान्तिक और प्रायोगिक दोनों धाराओं का निरूपण और विवेचन प्रामाणिक आगम ग्रन्थों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। इसमें २२ प्रकाश हैं, जिनमें इस दर्शन के विविध विषयों का प्रतिपादन है।६. दीक्षापद्धतिः-दीक्षा आगमानुयायियों का एक प्रमुख संस्कार है। इस ग्रन्थ में अनेक मूल ग्रन्थों का परीक्षण करके विभिन्न पद्धतियों में प्रचलित आन्तरिक विसंवाद को दूर करके मूल तंत्र की अनुगत प्रक्रिया के अनुसार दीक्षा-पद्धति का निरूपण किया गया है। १०. ललितासहस्रनामवृत्तिः- ललितासहस्रनाम श्रीविद्या का सुप्रसिद्ध सहस्रनाम है। इस पर सुप्रसिद्ध आचार्य भास्करराय ने “सौभाग्यभास्कर” नामक भाष्य लिखा है। परन्तु, उक्त भाष्य इतना विस्तृत और गंभीर है कि इसका अवगाहन चतुरन पण्डित्य द्वारा ही सम्भव है। द्विवेदी जी ने अगस्त्य मुनि प्रणीत मूलसूत्रों के आधार पर इस वृत्ति का निर्माण किया है, जो मूल ग्रन्थ के अभिप्रेत विषयों को सरलता से समझने में सहायक है। स्वामी प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती, बंगाल (१८७७-१६७५ ई.)- इनका संन्यास-पूर्व नाम श्री प्रमथनाथ मुखोपाध्याय था। इनका जन्म बंगाल के मालदह जिले में सन् १८७७ ई. में हुआ था। १६०५ ई. में बंगभंग आन्दोलन में इन्होंने सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में भाग लिया। ५० वर्ष की आयु में स्वामी जी ने संन्यास लिया। स्वामी जी ने ‘जपसूत्रम्’ नामक ग्रन्थ लिखा, जो छः खण्डों में सूत्राकार में रचित है। इसपर इन्होंने कारिका रूप में वृत्ति ग्रन्थ का निर्माण किया तथा बंगला में स्वयं विस्तृत व्याख्या भी की है। ब्रह्मसूत्र की भाँति यह ग्रन्थ चार अध्यायों में विभक्त है। प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं। इस ग्रन्थ की सूत्रसंख्या ५२२ तथा कारिकाएँ २०५६ हैं। यह ग्रन्थ प्राचीन पद्धति के अनुसार जपविद्या का समीक्षण प्रस्तुत करता है। इसे अध्यात्मविद्या और उपनिषद् का विश्वकोष माना जा सकता है। भारतीय विद्या प्रकाशन, वाराणसी द्वारा इसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। बदरीनाथ (१६ वीं शती) मिथिला के ‘उजान’ (उद्यान) ग्राम के निवासी, श्री भोलानाथ के पुत्र थे। चक्रकौमुदी-गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद से १६७६ ई. में प्रकाशित। यह एक स्वतन्त्र रूप से लिखित महत्त्वपूर्ण तान्त्रिक ग्रन्थ है। जिसमें योग की क्रियाओं के माध्यम से सत, चित् और आनन्द रूप अभीष्ट पुरुषार्थ की प्राप्ति बतायी गयी है। ग्रन्थ का विभाजन सात परिच्छेदों में किया गया है, जिनमें क्रमशः मूलाधारचक्र, स्वाधिष्ठानचक्र, मणिपूरचक्र, अनाहतचक्र, विशुद्धचक्र, आज्ञाचक्र तथा सहस्त्रारचक्र का वर्णन है। ग्रन्थ में चक्रों की स्थिति को चित्रों द्वारा भी समझाया गया है। ग्रन्थ में विषयआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास को प्रस्तुत करने की शैली सरल किन्तु पाण्डित्यपूर्ण है। नारायण शास्त्री खिस्ते (१८८३-१६६१)-मूलतः महाराष्ट्रीय परन्तु काशीवासी विद्वान। ये पं. गङ्गाधर शास्त्री के शिष्य थे। कर्पूरस्तवः (महाकालप्रणीतः श्रीमद्दक्षिणकालिकायाः) पर ‘परिमल’ टीका- पण्डितराज रङ्गनाथ विरचित “दीपिका” तथा साहित्याचार्य पं. नारायण शास्त्री खिस्ते कृत ‘परिमल’ टीका के साथ हरिदास संस्कृत सीरीज-E में विद्याविलास प्रेस, वाराणसी द्वारा मुद्रित (१६२८ ई.)। इससे पूर्व यह काशी के ही प्रभाकरी मुद्रणालय से भी मुद्रित हुआ था। ये दोनों व्याख्याएँ अतीव सरल तथा उपयोगी हैं।

  • स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती “करपात्री” जी (उत्तर प्रदेश) (१८०७-१८८२) श्रीविद्यारत्नाकर भक्तिसुधा साहित्य परिषद् कलकत्ता से २०२६ वि. तदनुसार १६७२ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में तन्त्रशास्त्र के प्राचीन ग्रन्थों कुलार्णव, कल्पसूत्र, श्रीविद्यार्णव, त्रिपुरारहस्य आदि के आधार पर तान्त्रिक विषयों का समग्र विवरण प्रस्तुत किया गया है। आरम्भ में दीक्षाक्रम तदनन्तर महागणपतिक्रम, श्रीक्रम, श्यामाक्रम, दण्डिनीक्रम, वाराहीक्रम और परापद्धति का प्रतिपादन है। ग्रन्थ के परिशिष्ट में श्रीविद्यामन्त्रभाष्य, पूर्णाभिषेक का विशद वर्णन है। अन्त में आदि शंकराचार्य द्वारा प्रणीत सौन्दर्यलहरी, त्रिपुरसुन्दरी आदि स्तोत्र तथा महायागक्रम में प्रयोगविधि समेत भावनोपनिषद् दी गयी है। इस प्रकार यह ग्रन्थ तान्त्रिक विषयों के विवरण तथा विवेचन सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
  • महन्त बटुकनाथ, उ. प्र. (१E वीं शती)-कालीपूजापद्धति - यह ग्रन्थ तन्त्र के कौल मार्ग से सम्बन्धित है। इसकी रचना विन्ध्याचल के भैरवकुण्ड पीठ के महन्त बटुकनाथ जी ने १६ वीं शताब्दी में की थी। प्रकाशित संस्करण में इस ग्रन्थ के सभी पारिभाषिक शब्दों की विस्तृत व्याख्या एवं कालीपूजा की ऐतिहासिक परम्परा पर एक महत्त्वपूर्ण भूमिका दी गयी है, जो विशेष उल्लेखनीय है। गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ इलाहाबाद से १६६५ ई. में प्रकाशित।

“स्वामिनारायण” दर्शन

श्री कृष्णवल्लभाचार्य “स्वामिनारायण” गुजरात (२० वीं शती) - जूनागढ़ (गुजरात) के स्वामिनारायण मन्दिर के अधीश्वर । ये नव्य न्याय, सांख्य-योग, मीमांसा और वेदान्त के मर्मज्ञ विद्वान् थे। इन्होंने श्री वामाचरण भट्टाचार्य तथा श्री दामोदर लाल गोस्वामी से न्याय वेदान्तादि दर्शनों का अध्ययन किया था। इन्होंने स्वामिनारायण सम्प्रदाय के अन्तर्गत निम्न महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है -१-तत्त्वप्रभावली (श्वैतायनीय विशिष्ट न्यायशास्त्र) चौखम्बा प्राच्य विद्या ग्रन्थमाला-५ में वाराणसी से प्रकाशित, प्रथम संस्करण-१६७६ ई.। यह ग्रन्थकार द्वारा विरचित एक मौलिक ग्रन्थ है, जिसमें स्वामिनारायण सम्प्रदाय के विभिन्न ग्रन्थों में उपनिबद्ध विषयों को संगृहीत और संग्रथित कर उन्हें नव्यन्याय की शैली में उपन्यस्त किया गया है। ग्रन्थकार के शब्दों में यह ‘तत्त्वचिन्तामण्यनजा भगिनीरूपा’ है। इसमें कुल ४ खण्ड हैं, जिनमें १४ परिच्छेदों के अन्तर्गत २२ संगतियों, ८ पदार्थों, ६१५ दर्शन और शास्त्र १० द्रव्यों, ३५ गुणों, १६ कर्मों, मूलतः ३ किन्तु कार्यतः विविध शक्तियों, ५ अधिसंसर्गों जाति, उपाधि धर्म, विशेष, ५ प्रकार के आभावों आदि से सम्बन्धित विचारों की प्रस्तुति तथा उद्देश, लक्षण परीक्षा द्वारा तार्किक रीति से शुद्ध करके उनकी स्थापना की गयी है। इस ग्रन्थ में ३० प्रकार की ज्यातियों का विप्रतिपत्तियों सहित निरूपण-विवेचन खण्डन करने के अनन्तर स्वामिनारायण सम्मत ‘सत्समुच्चय” ख्याति के सिद्धान्त को प्रमाणित किया गया है। ग्रन्थ में ७२० कारिकाएँ हैं, जिनमें ५४५ तक (तृतीय परिच्छेद पर्यन्त) ग्रन्थकार का स्वोपन भाष्य भी है। २-‘साक्षात्कारसूत्र" तथा उसपर कल्याणी वृत्ति। ब्रह्मसूत्र की शैली पर उपनिबद्ध इस ग्रन्थ में कुल ४७ सूत्र हैं, जिनपर ग्रन्थकार का स्वोपज्ञ भाष्य भी है। यह ग्रन्थ उपर्युक्त ग्रन्थ के साथ ही चौखम्बा वाराणसी से प्रकाशित है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कृष्णवल्लभाचार्य ने न्यायसिद्धान्तमुक्तावली तथा “तत्त्वमुक्ताकलाप" पर “किरणावली” नाम्नी टीकाएँ भी लिखी हैं।

पुराण दर्शन

अन्नदाचरण तर्कचूडामणि, बंगाल (जन्म १८६१ ई.) ये पुराण, धर्मशास्त्र, न्याय एवं साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान् थे। पुराणरहस्यम्- काशी के भारत धर्ममहामण्डल द्वारा १६३३ ई. में प्रकाशित । इस ग्रन्थ में पुराणों की रचनाशैली का विवेचन तथा उनमें वर्णित विषयों की संगति का निदर्शन किया गया है। ग्रन्थ की शैली सरल है। यह पुराणों के प्रति सामान्य लोगों में फैली अज्ञता और अनास्था का निवारण करने में समर्थ उत्कृष्ट ग्रन्थ है।।

  • गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, जयपुर (१८८१-१६६७) - ये मधुसूदन ओझा जी के शिष्य थे। उनके वैदिक विज्ञान सम्बन्धी ग्रन्थों पर इन्होंने टीका लिखी है। ये पुराणों के प्रकाण्ड विद्वान थे। इन्हें जीवन में अनेक पुरस्कार तथा राष्ट्रपति द्वारा विशिष्ट सम्मानपत्र प्राप्त हुआ। १-पुराणपारिजातः-केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ दिल्ली से प्रकाशित १६५८ ई.। इस ग्रन्थ में पुराणों में वर्णित धर्म और दर्शन की विस्तृत विवेचना की गयी है। लेखक का दृष्टिकोण वैज्ञानिक और समन्वयवादी है। यह उसके १५ वर्षों के गम्भीर पुराणानुशीलन का परिणाम है। स्वामी करपात्री जी ने इसकी भूमिका लिखी है। २- प्रमेयपारिजातः- विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, दिल्ली से प्रकाशित। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त चतुर्वेदिसंस्कृतनिबन्धावली, नामक इनका पाण्डित्यपूर्ण निबन्ध-ग्रन्थ भी प्रकाशित है।

भक्तिदर्शन

स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती करपात्री उत्तर प्रदेश (१८०७-१६८२)-भक्तिरसार्णवः । यह ग्रन्थ मधुसूदन सरस्वती प्रणीत “भक्तिरसायन" की शैली में भक्तिरस के स्वरूप ’ का विवेचन करता है। उदाहरणों की प्रचुरता के कारण शास्त्रीय शैली में उपनिबद्ध होने पर भी ग्रन्थ जनसामान्य के लिए सरल तथा सुबोध है। इस ग्रन्थ मे वेद से सम्बद्ध भी अनेक लेखों तथा निबन्धों का संग्रह है। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास m गोविन्दचन्द्र पाण्डेय (जन्म १६२३ ई. अल्मोड़ा, उत्तर प्रदेश)- इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति पद से सेवा-निवृत्त। इतिहास एवं संस्कृति के प्रतिष्ठित विद्वान् । सम्प्रति प्रयागवासी। शकर पुरस्कार से सम्मानित। १- भक्तिदर्शनविमर्श:- यह भक्तिदर्शन परक निबन्धों का संग्रह है। इस ग्रन्थ में ऐतिहासिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से “भक्ति” के स्वरूप और महत्त्व पर विचार किया गया है। इसमें शास्त्रचिन्तन की गम्भीरता और विचारों की मौलिकता दृष्टिगोचर होती है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १६६१ ई. में आचार्य बदरीनाथ शुक्ल स्मृति ग्रन्थमाला-प्रथम पुष्प के रूप में प्रकाशित।

विज्ञान दर्शन

मधुसूदन ओझा बिहार (१८६६-१६३६) - ये “ब्रह्मसिद्धान्त” आदि वैदिक विज्ञान सम्बन्धी ग्रन्थों के प्रणेता थे। इन्होंने दर्शनपरक ग्रन्थों का भी वैज्ञानिक दृष्टि से अनुसन्धान किया। एवंविध प्रणीत प्रकाशित ग्रन्थों में प्रमुख हैं १-गीताविज्ञानम्-इसमें भाष्य से पूर्व रहस्यकाण्ड में श्रीकृष्ण तथा अर्जुन के नामों का रहस्य, शास्त्ररहस्य तथा विषयरहस्य का वैज्ञानिक विवेचन किया गया है। २-शारीरकविमर्शः -इस सचित्र ग्रन्थ में वैज्ञानिक रूप से शारीरक दर्शन का प्रतिपादन है। ३-ब्रह्मचतुष्पदी- इस ग्रन्थ में प्रजापति, विराट्, आत्मा तथा आत्मशक्ति इन चारों का वैज्ञानिक विवेचन है। ४-ब्रह्मसमन्वयः- इसमें निर्विशेष, परात्पर, अव्यय, अक्षर तथा क्षर आदि आत्मतत्त्वों तथा उनसे सृष्टि का वैज्ञानिक वर्णन है। या सुधुम्न आचार्य, मध्य प्रदेश (जन्म-१६४६ ई.) - जन्मस्थान-कोलगेंवा, सतना (म. प्र.) सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। सम्प्रति मु.म. टाउन पोस्ट, ग्रेजुएट कालेज, बलिया (उ.प्र.) में कार्यरत। आचार्य ने अर्वाचीन विज्ञान के प्रकाश में प्राचीन दर्शन, शब्द-शास्त्र एवं भाषाशास्त्र के सिद्धान्तों को देखने-परखने का प्रयास किया है। उनका विचार है कि प्राचीन सिद्धान्तों का नवीन विज्ञान के अन्वेषणों से प्राप्त ज्ञान के अनुकूल संशोधन किया जाना चाहिए, तभी संस्कृत में निहित ज्ञान अद्यतन होकर प्रसाङ्गिक और ग्राह्य हो सकेगा। इस दिशा में उन्होंने अपने ग्रन्थों के माध्यम से विशेष प्रयास किया है -१-अथिविज्ञानं दर्शनशास्त्रम्-इस ग्रन्थ में उन्होंने भारतीय दर्शनों विशेषतः न्यायदर्शन के अनुसार पञ्च ज्ञानेन्द्रियों से उपलब्ध प्रत्यक्ष ज्ञान एवं पञ्च महाभतों के स्वरूप को आधनिक भौतिकशास्त्र तथा रसायनशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया है। स्थान-स्थान पर अर्वाचीन वैज्ञानिकों, उनके सिद्धान्तों एवं अद्यतन यन्त्रों की चर्चा आयी है। चित्रों द्वारा विषय को स्पष्ट करके समझाने का प्रयास किया गया है। ग्रन्थ की भाषा सरल और प्राञ्जल है। शैली सरल और स्वाभाविक है। एक प्रकार से यह ग्रन्थ प्रत्यक्ष एवं पञ्चमहाभूत संबंधी दार्शनिक सिद्धान्तों एवं वैज्ञानिको तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन है। पृ. सं. १४४ प्रकाशक-वेद वाणी वितानम्, प्राच्य विद्या शोध संस्थानम्, कोलगवॉ, सतना (म.प्र.) प्रकाशन-वर्ष १EE४ ई.। २- राजन्तां दर्शनांशवः दर्शन और शास्त्र वेदवाणीवितानम्, प्राच्यविद्या शोध संस्थान, सतना (म. प्र.) से १६६२ ई. में प्रकाशित। व्याकरण, न्याय, बौद्धादि दर्शनों के द्वारा प्रतिपादित तत्त्वों को आधुनिक विज्ञान के सन्दर्भ में देखने-परखने और आलोचित करने का प्रयास किया गया है।

परमार्थ दर्शन

रामावतार शर्मा, बिहार (१८७७-१६२६)-“वाङ्मयार्णवकोश” तथा अनेक साहित्यिक शास्त्रीय निबन्धों के लेखक। परमार्थदर्शनम्- महामण्डल शास्त्र प्रकाशक समिति, काशी द्वारा सन् १८१३ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में शर्मा जी ने अपने मौलिक, क्रान्तिकारी दार्शनिक विचारों को उपन्यस्त किया है, जिसे षड्दर्शनों से भिन्न सप्तम दर्शन की संज्ञा दी जा सकती है। यह ग्रन्थ प्राचीन ग्रन्थों की भाँति सूत्रशैली में लिखा गया है जिसपर शर्मा जी ने ‘वार्तिक" और अधिकरण भी स्वयं लिखे हैं। यही नहीं, उन्होंने अपने दार्शनिक सिद्धान्त को सरल करके समझाने के लिए इस पर विस्तृत भाष्य की भी रचना की है। शर्मा जी का दर्शन वह दर्शन है, जिसमें तर्क की कसौटी पर खरे उतरने वाले आचार-विचारों एवं धर्मसम्बन्धी मान्यताओं को ही ग्रहण किया गया है। जिससे कभी-कभी इनके नास्तिक होने का भ्रम होता है परन्तु यह यथार्थ नहीं है, क्योंकि इन्होंने ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने वाले चार्वाकों की तीव्र निन्दा की है। इस ग्रन्थ में ४४६ सूत्र तथा ८२६ पद्यबद्ध वार्तिक हैं। यह ग्रन्थ म. म. शर्माजी द्वारा लिखित स्वोपज्ञ भाष्य के साथ प्रकाशक मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली द्वारा १६६४ में भी प्रकाशित हुआ है।

अन्य दर्शन

हरिहरनाथ त्रिपाठी (9E-२० वीं शती) - भारतीयविचारदर्शनम् - भारतीय विचारों और आचारों का ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन २ भागों में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित। हाराणचन्द्र भट्टाचार्य, बंगाल (१८८६-१६४४) - इन्होंने काशी आकर पं. शिवकुमार शास्त्री से व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया था। ये पं. जयदेव मिश्र के सतीर्थ्य थे। इन्होंने गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज, वाराणसी तथा कलकत्ता में अध्यापन कार्य किया। कालसिद्धान्तदर्शिनी- कलकत्ता से १६४१ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में अथर्वसंहिता, आगममत, उपनिषत, ऋक्संहिता, कामशास्त्र, कालकारणिक मत, गौड़ीय वैष्णव मत, चरकसंहिता, जैन ज्योतिःशास्त्र जल्हण, द्वैतशाक्त, नकुलीश, पाशुपत, निम्बार्क, निरीश्वर साख्य, नैयायिक, पाञ्चरात्र, पाशुपत, पौराणिक प्रत्यभिज्ञादर्शन, प्रपञ्चसार, वाक्यपदीय, प्राभाकर मीमांसक, बौद्ध, भागवत, भाट्ट मीमांसक, मनुस्मृति, महाभारत, विष्णपुराण, वीरशैव, रामानुजीय दर्शन, लोकायत, वेदाङ्ग ज्योतिष, वेदान्त, वैशेषिक, वैष्णवागम, शाक्त, शैव, शैवविशिष्टाद्वैत, सूतसंहितादि मतों के अनुसार काल-तत्त्व का निरूपण तथा उसका विवेचन है। प्राचीनकाल में “कालवाद" नाम का एक मत प्रचलित था। यह उसी ६१८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास परम्परा को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है। इस ग्रन्थ में अनन्ताचार्यकृत वेदान्तवादावली और श्रीधरकृत यतीन्द्रमतदीपिका आदि अर्वाचीन मतों के भी उल्लेख हैं। ग्रन्थ की भूमिका म. म. गोपीनाथ कविराज ने लिखी है। मोहनलाल वेदान्ताचार्य (उदासीन साधु) पंजाब (१६-२० वीं शती) - ये रामशास्त्री भागवताचार्य (समस्यासमज्या तथा अन्योक्तिमुक्तावली नामक काव्यों के प्रणेता) के सतीर्थ्य थे। इनका जन्म उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पंजाब के गुरदासपुर जिले में हुआ था। ये गुरु नानक की तेरहवीं पीढ़ी के वंशज थे। इन्होंने काशी में दर्शनशास्त्र के तत्कालीन मूर्धन्य पण्डित राममिश्र शास्त्री से वेदान्त के प्रौढ ग्रन्थों का अध्ययन किया था। महामोहविद्रावणम्-१८८३ ई. में काशी से प्रकाशित। यह लेखक का मौलिक प्रौढ़ ग्रन्थ है, जिसमें वैदिक धर्म तथा दर्शन पर किये गये आक्षेपों का युक्तिपूर्वक खण्डन किया गया है। इसके प्रथम ‘प्रबोध’ में स्वामी दयानन्द सरस्वती के इस मत कि “ब्राह्मणग्रन्थ श्रुति के अन्तर्गत नही हैं, क्योंकि वे संहिताओं के समान अपौरुषेय नहीं वरन् पौरुषेय है” का प्रमाणपुरस्सर खण्डन किया गया है तथा व्याकरण के त्रिमुनियों एवं षड्दर्शनों के प्रवर्तकों कपिल, कणाद, गौतमादि के ग्रन्थों से इस मत के खण्डन हेतु प्रमाणरूप में उद्धरण दिये गये हैं। इस ग्रन्थ से लेखक के वेद तथा दर्शनविषयक पाण्डित्य का पूर्ण परिचय मिलता है। इन्होंने श्रीहर्ष के अद्वैत वेदान्तविषयक ग्रन्थ “खण्डनखण्डखाद्य" पर “खण्डनगर्तप्रदेशिनी” नामक टीका भी लिखी है, जो कि मूल ग्रन्थ पर आलोचनात्मक टीका है। गोपाल शास्त्री, बिहार (१८६२) -गीताकर्मयोगशास्त्रम्-इस ग्रन्थ में ‘गीता का तात्पर्य कर्मयोग के प्रतिपादन में है" इसका विस्तृत गंभीर विवेचन बड़े युक्तिपूर्ण ढंग से किया गया है। यह दार्शनिक पाण्डित्य से परिपूर्ण ग्रन्थ है। केदारनाथ त्रिपाठी- इन्होंने श्री सूर्यनारायण शुक्ल से न्यायवैशेषिक और श्री हरिहर कृपालु द्विवेदी से वेदान्तशास्त्र का अध्ययन किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दर्शन विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए। जन्मान्तरवाद:- वाराणसी से १८८५ ई. में प्रकाशित। इसमें पुनर्जन्म के सम्बन्ध में प्राचीन भारतीय दर्शनों, आधुनिक संतों और मनीषियों और मुस्लिम धर्मग्रन्थ एवं पाश्चात्त्य दार्शनिकों के विचार प्रस्तुत किये गये हैं। पनः अन्त में मनोविज्ञान और प्रत्यक्ष घटनाओं के सन्दर्भ में उनका परिशीलन कर पुनर्जन्म की संभाव्यता और उपयोगिता पर विचार किया गया है।

सर्वदर्शन

श्रीपादशास्त्री हसूरकर महाराष्ट्र (१६-२० वीं शती)-द्वादशदर्शनसोपानावलिः-१६३८ ई. में इन्दौर सहकारी मुद्रणालय से मुद्रित। “सर्वदर्शनसंग्रह” के पश्चात् सभी भारतीय दर्शनों का परिचय देने वाला यह अत्यन्त उत्कृष्ट ग्रन्थ हैं। इसकी विषय-प्रतिपादन-शैली नवीन, सारपरक व अतीव सुबोध है। इसमें ६ वैदिक दर्शनों के अतिरिक्त ६ अवैदिक ६१६ से दर्शन और शास्त्र दर्शनों - चार्वाक, जैन, वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार तथा माध्यमिक का भी विवेचन किया गया है।

  • शिवजी उपाध्याय, उ. प्र. (जन्म-१६४७ ई. के लगभग) - सम्प्रति सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में साहित्य विभाग के अन्तर्गत प्राध्यापक पद पर कार्यरत। “व्यक्तिविमर्शः” नामक मौलिक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ के प्रणेता। इन्होंने “सर्वदर्शनविमर्शः” (१६६०) नामक दर्शन विषयक ग्रन्थ की भी रचना की। वाराणसी से प्रकाशित । यह माधवाचार्य के ‘‘सर्वदर्शनसंग्रहः" के आधार पर विरचित है। इस ग्रन्थ की विशेषता है सभी दर्शनों में लक्ष्यैकप्रतिपादकत्व का अनुसन्धान, जो दर्शनों के इतिहास में एक नयी समन्वयवादी प्रवृत्ति का प्रतिफलन करती है। अवैदिकदर्शनसंग्रहः- श्रीरङ्गम् (तमिलनाडु) के श्री गङ्गाधर वाजपेय याजी ने १६११ ई. में इस लघुकाय दार्शनिक ग्रन्थ का प्रकाशन किया। इसमें बौद्ध तथा जैन दर्शन के सिद्धान्तों का निरूपण किया गया है। दर्शनोदयः- मैसूर (कर्नाटक) राजा के धर्माधिकारी म. म. पण्डितरत्न श्री लक्ष्मीपुरम् श्रीनिवासाचार्य ने “दर्शनोदय” नामक इस ऐतिहासिक ग्रन्थ का प्रकाशन सन् १६३३ ई. में किया। श्रीनिवासाचार्य एक प्रतिभासम्पन्न प्रतिष्ठित विद्वान थे और इनका सभी शास्त्रों पर असाधारण एकाधिकार था। डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन् ने “दर्शनोदय” की पुरोवाक् में इस ग्रन्थ के महत्त्व का वर्णन किया है। इस ग्रन्थ के प्रथम भाग में शून्यतादर्शन, सत्यतादर्शन, मिथ्यात्वदर्शन, सेश्वरमीमांसा, विशिष्टाद्वैतदर्शन तथा शैवदर्शन का वर्णन किया गया है। दूसरे भाग में श्रीभाष्यभूषण नाम से विशिष्टाद्वैतदर्शन तथा शैवदर्शन का वर्णन किया गया है। यह भाग अपेक्षाकृत लघु है। तृतीय तथा अन्तिम भाग में शैव, पाञ्चरात्र तथा वैखानसागम के विषयों का प्रतिपादन किया गया है। श्रीरामकृष्णगीता- यह त्र्यम्बक आत्माराम भण्डारकर की रचना है। इसका प्रकाशन सन् १६७३ ई. में श्री सत्करी मुखोपाध्याय के सम्पादकत्व में वाराणसी से हुआ था। यह दर्शनिक ग्रन्थ काव्यात्मक शैली में अठारह अध्यायों में लिखा गया है। इसमें वैराग्य तथा विश्वप्रेम आदि उच्च भावनाओं का बड़ा उत्तम प्रतिपादन है।

अरविन्द का पूर्णाद्वैत दर्शन

" श्री अरविन्द (१५ अगस्त १८७२-५ दिसम्बर १६५०) द्वारा प्रवर्तित “पूर्णाद्वैत” वेदान्त अर्वाचीन युग की, दर्शन के क्षेत्र में मौलिक उपलब्धि कहीं जा सकती है। अरविन्द का दर्शन उपनिषदों पर आधारित और उसका परिपोषक है। इन्होंने वेद और दर्शनविषयक लगभग २१ ग्रन्थ लिखे, जो अंग्रेजी में हैं। इनका दर्शन आज विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है। पाण्डिचेरी में स्थापित “अरविन्द आश्रम” इस विचारधारा के प्रचार-प्रसार से सम्बन्धित विभिन्न गतिविधियों का केन्द्र है। र अरविन्द-दर्शन का मूल प्रतिपाद्य इस प्रकार है- सृष्टि का परमतत्त्व एक है जो ६२० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सच्चिदानन्दस्वरूप “ईश्वर” है। वह सर्वातिशायी, सर्वव्यापी है। उसकी शक्ति ‘चित्शक्ति’ है जो एक तरफ तो सर्वातिशायिनी और ब्रह्म से अभिन्न है, जब उसका स्वरूप अनभिव्यक्त रहता है, और दूसरी तरफ सर्वकारयित्री है, तब यह सृष्टिव्यापारोन्मुखी होकर “प्रकृति” कहलाती है। इस प्रकार प्रकृति चित्शक्ति का क्रियात्मक स्वरूप है। प्रकृति पुनः अवस्थाभेद से दो प्रकार की है-परा और अपरा। “सच्चिदानन्द” की प्रथम सिसृक्षा ही परा प्रकृति है जो क्रियाशील होकर “अतिमानस” तत्त्व को अभिव्यक्त करती है। अतिमानस विशुद्ध ज्ञानात्मक है। अपरा प्रकृति अज्ञानमिश्रित है। वह मन, जीवन, प्राणीरूप शेष संसार को जन्म देती है। जैसे परा प्रकृति की मध्यस्थता से सच्चिदानन्द तत्त्व इस व्यष्टि-समष्ट्यात्मक जगत् के रूप में परिणत होता है, वैसे ही उसी के द्वारा यह अज्ञानमय जगत् से उठकर अपने ज्ञानमय स्वरूप को प्राप्त करता है। जगत् अवरोह-आरोह प्रक्रिया के अनुसार गतिमान् है। चैतन्य से अवरोह-प्रक्रिया के अनुसार जगत् की अभिव्यक्ति हुई है, जिसकी पराकाष्ठा उस छोर पर है जहाँ सृष्टि बिलकुल निरानन्द, अचिन्मयी और असद्रप प्रतीत होती है। इस अवरोह से फिर आरोह आरम्भ होता है और आत्मलीन (प्रसुप्त) सच्चिदानन्द तत्त्व उन्मुख होता है। इसके उन्मुख होने में “अतिमानस” नेतृरूप से कार्य करता है और चित्शक्तिवाहक रूप से अन्तर्हित, अतिमानस स्वरूपोपलब्धि के लिए सुषुप्तप्राय सच्चिदानन्द तत्त्व को उद्बोधित करता है और चित्शक्ति उसे भावी विकास के मार्ग पर ले चलती है। अरविन्द सृष्टिक्रम में कर्मवाद के विपरीत “चैतन्यविकासवाद” को स्वीकार करते हैं। व्यष्टि पुनर्जन्मद्वारा चैतन्यविकास की ओर उन्मुख है। इसी प्रकार समष्टि भी विकासोन्मुखी है। करोड़ों वर्ष पूर्व पृथ्वी जीवजन्तुओं से रहित थी, फिर उसमें वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी आदि आविर्भूत हुए और अन्त में मानव अस्तित्व में आया। यह विकासक्रम जैसे भौतिक स्तर पर है वैसे चैतन्य स्तर पर भी है। अरविन्द ‘मायावाद" के सिद्धान्त के विरोधी हैं। वे उसे सांसारिक जीवन के प्रति निराशा से उद्गत मानते हैं। योगज ज्ञान की स्थिति में आध्यात्मिक चैतन्य में अनुप्रविष्ट प्राणी को संसार ‘असत्" लग सकता है, क्योंकि वह सान्द्र चैतन्यानुभूति की स्थिति है, पर इससे यह वस्तुतः असत्य नहीं हो जाता। समस्त ज्ञानेन्द्रियों से जिसका प्रतिक्षण अनुभव हो रहा है, वह जगत् असत्य कैसे हो सकता है ? पूर्णज्ञान के द्वारा व्यष्टि और समष्टि दोनों के लिए इस पृथ्वी पर ही “दिव्यजीवन” की प्राप्ति संभव है, जिसका साधन पूर्णयोग है। सत्यप्रकाश सिंह - (२० वीं शती) - अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, उ. प्र. में संस्कृत विभाग में प्राध्यापक। श्री अरविन्ददर्शनम्-अलीगढ़ से १६७५ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में १४ अध्यायों के अन्तर्गत श्री अरविन्द के पूर्णाद्वैत वेदान्त दर्शन का प्रतिपादन किया गया ६२१ in दर्शन और शास्त्र है। अध्यायों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं- सच्चिदानन्दः, चित्शक्तिः, अतिमानसम्, अवरोहप्रक्रिया, आरोहप्रक्रिया, अतिमानसज्ञानी, दिव्यजीवनम्, दुःखपापादिकारणनिरूपणम्, कर्मवादप्रतियोगिचैतन्यविकासवादः, मायावादनिरासः, अज्ञानम्, पूर्णज्ञानम्, पूर्णयोगः, तथा वैदान्तपरम्परायां श्रीअरविन्दस्य योगदानम्। इस ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर अन्य दर्शनों के साथ पूर्णाद्वैत दर्शन का तुलनात्मक विवेचन भी किया गया है।

आधुनिक तान्त्रिक सन्दर्भ में श्रीतन्त्रालोक

। वाराणसी ही नहीं विश्व की प्रमुख शिक्षा संस्था सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग द्वारा समस्त तन्त्रशास्त्रीय ग्रन्थों का विशेषकर काश्मीर शैव दर्शन के उपजीव्य ग्रन्थ ‘श्रीतन्त्रालोक’ का हिन्दी भाष्य सहित प्रकाशन सम्पन्न हो रहा है। इसके हिन्दी भाष्यकार काश्मीर शैवागमों के साधक विद्वान् परमहंस मिश्र हैं। अपनी कृति का नामकरण इन्होंने नीर-क्षीर विवेकभाष्य किया है। इस प्रकाशन के पूर्व ‘तन्त्रालोक’ का संस्करण मूल एवं जयरथ कृत ‘तन्त्रालोकविवेक’ टीका सहित काश्मीर संस्कृत टैक्ट्स सिरीज श्रीनगर से बारह भागों में (सन् १८१८-१९३८ ई.) प्रकाशित हुआ था, जिसके प्रथम भाग तक के सम्पादक श्री एम.आर शास्त्री तथा द्वितीय भाग से अन्तिम बारहवें भाग तक के सम्पादक श्री एम. एस. कौल थे। तदनन्तर वाराणसी में आचार्य श्री कृष्णानन्द सागर ने श्रीशिवोऽहं सागर-ग्रन्थमाला के अन्तर्गत तीन जिल्दों में इस ग्रन्थ का संस्करण प्रकाशित कराया। पुनश्च इस ग्रन्थ का एक अन्य संस्करण देश की प्रसिद्ध प्रकाशन संस्था मोतीलाल बनारसी दास द्वारा स्व. रामचन्द्र द्विवेदी तथा नवजीवन रस्तोगी के संयुक्त सम्पादकत्व में आठ जिल्दों में प्रकाशित हुआ। इस संस्करण में दो से सात एवं आठवें जिल्द में कश्मीर ग्रन्थ माला के बारह भागों में प्रकाशित श्रीनगर संस्करण की फोटो स्टेट छापी गयी है। इस संस्करण की प्रमुख विशेषता इसके पहले भाग में श्री नवजीवन रस्तोगी की विस्तृत एवं भावी गवेषकों के लिए उपयोगी भूमिका है, जो पूरी तरह से मन्थन कर अत्यधिक श्रम करके तैयार की गयी है। इसके अतिरिक्त उसमें कुछ परिशिष्ट भी दिये गये हैं। अन्तिम आठवें भाग में जयरथकृत विवेक में उद्धृत प्रमाण वाक्यानुक्रमणी तथा तन्त्रालोक की श्लोकानुक्रमणी भी दी गयी है। अब यह ग्रन्थ हिन्दी भाष्य के साथ पाठकों के समक्ष आ रहा है। अब तक इस संस्करण के पांच खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं। प्राप्त सूचना के अनुसार कुल आठ अथवा नव खण्डों में इसके पूर्ण होने की संभावना है। अन्तिम खण्ड में अभिनवगुप्त के लघुस्तोत्रों के हिन्दी भाष्य को भी प्रकाशित करने की सूचना भाष्यकार से प्राप्त हुई है। श्री परमहंस मित्र संस्कृत के विद्वान और कवि हैं। साथ ही वह शैव दर्शन की काश्मीर शाखा के साधक भी हैं। नारीशक्ति के उज्ज्वल चारित्रिक पक्ष पर आधारित ‘सात एकांकी’ श्रीतन्त्रालोक का सारभूत ग्रन्थ ‘तन्त्रसार का हिन्दी-भाष्य प्रकाशित हो चुके हैं। ६२२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सम्पादन के क्रम में इन्होंने ‘अवधूतोल्लास’ का सम्पादन एवं पद्यानुवाद मन्त्रयोगसंहिता का एवं श्री भारत धर्ममहामण्डल, वाराणसी के सूर्योदयपत्रिका का सम्पादन सन् १९७५ से १६८० तक सम्पन्न किया है। श्री तन्त्रालोक अशेषआगमोपनिषद् के रूप में प्रसिद्ध आकर ग्रन्थ है और काश्मीर शैव दर्शन का एक विशाल पद्धति ग्रन्थ है। इसके लेखक भारतीय वाङ्मय के सुप्रसिद्ध चिन्तक, महान तन्त्रविद् महामाहेश्वर अभिनव गुप्त हैं। इनका काल दसवी-ग्यारहवीं शती बताया जाता है। इस ग्रन्थ में दसवीं शती से पूर्व के समस्त तान्त्रिक सम्प्रदाय, सम्पूर्ण आगम तथा अन्य भारतीय वाङ्मय का निष्कर्ष काश्मीर दर्शन की क्रमशाला के रूप में निखपित है।

धर्मशास्त्र

१६वीं शती में भारतीय सामाजिक पटल पर राजा राममोहन राय एवं महर्षि दयानन्द सरस्वती के अवतरण ने धर्मशास्त्र की प्रवृत्ति को पर्याप्तरूपेण प्रभावित किया। राजा राममोहन राय ने बंगाल में विधवा स्त्रियों का दु:खमय वह जीवन देखा, जहाँ E-90 वर्ष की अवस्था में बिना पति का मुंह देखे वैधव्य को प्राप्त स्त्री आजीवन एकादशी व्रत करने, उत्तम भोजन बस्त्र से विरत रहने और तपोमय जीवन गुजारने पर विवश थी, उधर राजस्थान आदि कुछ प्रदेशों में उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध पति के साथ जबर्दस्ती जला दिया जाता था। इन कारणों से उन्होंने सतीप्रथा का तीव्र विरोध किया और विधवाओं के पुनर्विवाह का समर्थन किया। स्पष्ट था कि परम्परावादी समाज पर इसकी तीव्र प्रतिक्रिया होनी थी। विद्वानों में इसके पक्ष-विपक्ष पर दो दल बन गये और वर्षों यह विवाद प्रबल बनकर छाया रहा। विधवाविवाह पर समस्त शकाओं का निर्मूलन करने के लिए राजाराम शास्त्री कार्लेकर ने ‘विधवोदवाहशङकासमाधिः" नामक शास्त्रीयप्रमाणपरिपष्ट ग्रन्थ लिखा, जिसका खण्डन अज्ञातनामा किसी दक्षिणी विद्वान् की ओर से विधवोद्वाहविवेकः लिखकर किया गया। पुनः बालशास्त्री रानाडे ने ‘दोषाभासनिरासः’ लिखकर इसका खण्डन किया तथा विधवा-विवाह को निर्दोष और शास्त्र-सम्मत बताया। इस काल में दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित मतों पर भी क्रिया, प्रतिक्रिया हुई। उनके वेदों एवं कर्मकाण्डों, संस्कारों आदि के सम्बन्ध में युक्तिपरक विवेचनात्मक दृष्टिकोण से प्रभावित होकर जहाँ संस्कारों के स्वरूप और उनकी पद्धतियों का विवेचन करने वाले और उनके मनोवैज्ञानिक प्रभाव का अनुसन्धान करने वाले ग्रन्थ लिखे गये, वहाँ आर्यसमाज की सनातन हिन्दू धर्म के स्वरूप पर तीव्र कुठाराघात करने वाली प्रवृत्ति एवं बौद्धिक सूक्ष्मता से विक्षुब्ध होकर ‘सनातनधर्मोद्धारः’ जैसे मूर्धन्य ग्रन्थों का प्रणयन हुआ, जिनमें पारम्परिक हिन्दू धर्म के सदाशय, भावप्रवण, लोकोपकारी और सहिष्णु स्वरूप को प्रस्तुत किया गया। परन्तु इस प्रहार से एक शाश्वत लाभ यह हुआ कि हिन्दू धर्मशास्त्र ने अपने कट्टर कर्मकाण्डों से बोझिल, रूढ़िवादी स्वरूप पर पुनर्विचार किया तथा अपने अवांछित दर्शन और शास्त्र तत्त्वों से शीघ्र मुक्त होकर शाश्वत मूल्यों से समन्वित धर्म के विमल स्वरूप के अनुशीलन में दत्तचित्त हो गया। धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ 1 राजाराम शास्त्री कार्लेकर (१९७५ ई. में स्वर्गवास) - ये मूलतः दाक्षिणात्य किन्तु काशीवासी चितपावनजातीय वैदिक विद्वान् गोविन्द शर्मा के पुत्र थे। इन्होंने उस युग के महनीय विद्वान् पं. दामोदर शास्त्री से न्यायशास्त्र का तथा पं. काशीनाथ शास्त्री अष्टपुत्रे से व्याकरण के प्रौढ़ ग्रन्थों का तलस्पर्शी अध्ययन किया था। राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, काशी में ये बहुत दिनों तक धर्मशास्त्र विभाग के प्रधानाचार्य रहे। विधवोद्वाहशङ्कासमाधिः राजाराम शास्त्री जी की केवल यही एक रचना प्रकाशित है। रचनाकाल-१८५५ ई.। यह एक लघुकाय धर्मशास्त्रीय निबन्ध है, परन्तु यह रचना इतनी प्रौढ़, प्रामाणिक एवं विद्वत्समादृत है कि एकमात्र इस रचना के आधार पर ही शास्त्री जी का यश अक्षुण्ण है। विधवा विवाह को राजाराम मोहन राय द्वारा मान्यता दिये जाने और उसका प्रचार किये जाने के फलस्वरूप बंगाल और काशी के पण्डितों के एक वर्ग में उसके प्रति बड़ा आक्रोश था। इसी परिस्थिति में विधवा विवाह को शास्त्रीय मान्यता प्राप्त है, यह दर्शाने तथा उसकी शास्त्रीय व्यवस्था देने हेतु शास्त्री जी ने धर्मशास्त्र तथा मीमांसा ग्रन्थों का गाढ़ अनुशीलन कर इस ग्रन्थ की प्रमाणपुरस्सर रचना की है। शंका के सारे संभावित पक्षों को उठाकर पक्ष-विपक्ष के रूप में प्रबल युक्तियों द्वारा उनका समाधान प्रस्तुत किया है। पण्डित जी के शिष्य बालशास्त्री द्वारा रचित ‘तिलक’ व्याख्या के साथ यह ग्रन्थ काशी के मेडिकल हाल प्रेस से सन् १६६६ ई. में मुद्रित है। बालशास्त्री रानाडे, महाराष्ट्र (१८३६-१८८२) - बालशास्त्री रानाडे मूलतः महाराष्ट्रीय थे किन्तु इनके पिता गोविन्द भट्ट इनके जन्म से बहुत पूर्व ही अपने मूल निवास स्थान कोंकण प्रदेश से काशी आकर बस गये थे। बालशास्त्री ने ग्वालियर के पं. बाबा शास्त्री बापट से सिद्धान्तकौमुदी का, ग्वालियर महाराजा के न्यायाधीश षट्शास्त्रपारगत विद्वान् श्री कुप्पा शास्त्री एवं काशी के श्री राजारामशास्त्री से पूर्व मीमांसा एवं धर्मशास्त्र का, पुणे के विद्वान् (उस समय ग्वालियर पधारे) श्री मोर शास्त्री से न्यायशास्त्र का तथा तत्कालीन अपरपाणिनि के रूप में प्रसिद्ध काशीनाथ शास्त्री अष्टपुत्रे से व्याकरण का गम्भीर अध्ययन किया। यागेश्वर शास्त्री ओझा इनके सतीर्थ्य थे। अपने उत्कृष्ट पाण्डित्य के कारण बालशास्त्री को विद्वानों के बीच बालसरस्वती’ की उपाधि मिली हुई थी। दोषाभासनिरासः-यह बालशास्त्री द्वारा प्रणीत धर्मशास्त्र विषयक ग्रन्थ है। यह वास्तव में इनके गुरु राजाराम शास्त्री द्वारा प्रणीत ग्रन्थ ‘विधवोद्वाहशङ्कासमाधिः" की “तिलक” नाम्नी व्याख्या है, जिसका प्रणयन पं. बालशास्त्री ने अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान द्वारा “विधवोद्वाहशकासमाधिः" के खण्डन रूप में लिखे गये ग्रन्थ “विधवोद्वाहविवेकः” का निरास करने के लिए किया। यह वैदुष्यपूर्ण व्याख्या पं. राजाराम शास्त्री के मूल ग्रन्थ के६२४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास साथ काशी के मेडिकल हाल प्रेस से १६६६ ई. में प्रकाशित है। बालशास्त्री ने व्याकरण में महाभाष्य-टिप्पणी एवं परिभाषेन्दुशेखर पर “सारासारविवेकः” नाम्नी टीका तथा वेदविषयक ‘‘बहुत ज्योतिष्टोमपद्धतिः" नामक पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थों का भी प्रणयन किया। हरिनाथ द्विवेदी (स्वामी मनीष्यानन्द)-ये बालशास्त्री रानाडे के शिष्य तथा शिवकुमार शास्त्री (लिङ्गधारणचन्द्रिका-व्याख्या के रचयिता) के समकालीन और उनके प्रतिपक्षी थे। संन्यास लेने के उपरान्त ये स्वामी मनीष्यानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए। अशौचनिर्णय त्रिंशतश्लोकी-१६१४ ई. में काशी के सिद्धविनायक प्रेस से मुद्रित। यह मिताक्षरा और निर्णयसिन्धु आदि ग्रन्थों के आधार पर लिखा गया एक विस्तृत भाष्य है, जो अत्यन्त उपादेय और संग्रहणीय है। सरयूप्रसाद द्विवेदी, उ. प्र. (१८३५ में जन्म) - सदाचारप्रकाश:- नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ से सन् १८८२ ई. में मुद्रित और प्रकाशित। इस ग्रन्थ में वर्णाश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत धर्मशास्त्रसम्मत लोकचर्या का विस्तृत निरूपण है। मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियों को लेकर धर्मशास्त्र के अन्य मूल निबन्धों के आधार पर आचार-विचार और भारतीय जीवन की मान्यताओं का उल्लेख किया गया है। गाल हरिकृष्ण शास्त्री (१६-२० वीं शती) - माध्यन्दिनीय गौतमगोत्रीय गुर्जर ब्राह्मण श्री वेकटराम शास्त्री के पुत्र । इनका जन्म दक्षिण के औरगाबाद नगर में हुआ था। शास्त्री जी की ज्योतिष में अव्याहत गति थी। इन्होंने “बृहत्ज्योतिषार्णव” नामक ज्योतिष के विस्तृत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की। इनका धर्मशास्त्र विषयक ग्रन्थ है- ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड: वेड्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई से सन् १८५४ ई. में प्रकाशित । ग्रन्थकार ने श्रीमालपुराण (कल्याणखण्ड) ब्रह्माण्डपुराण (धर्मारण्यमाहात्म्य), मेवाड़पुराण (एकलिङ्गक्षेत्रमाहात्म्य), कण्डोलपुराण, कण्वाश्रममहात्म्य हिंगोलपुराण (हिंगुलाद्रिखण्ड), नागपुराण, कोटचर्कमहात्म्य, बालखिल्य खण्ड, सह्याद्रिखण्ड, प्रभासखण्ड, वापीखण्ड, वायुपुराण, कायस्थप्रकाश आदि ग्रन्थों की पर्यालोचना करके बड़े परिश्रमपूर्वक इस ग्रन्थ की रचना की है। ग्रन्थ में कुल १६ अध्याय ४६४१ श्लोक तथा ६१६ पृष्ठ हैं। यह वास्तव में ग्रन्थकार द्वारा रचित “बृहज्ज्योतिषार्णव” नामक ग्रन्थ का ही षष्ठ मिश्च स्कन्ध है, जिसे विषय के महत्त्व की दृष्टि से पृथक् ग्रन्थ का स्वरूप दे दिया गया है। नया रमागोविन्द त्रिपाठी (२० वीं शती) - जन्मस्थान-सतना (मध्यप्रदेश) मायानन्द गिरि संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी में पुराणेतिहासविभाग के अध्यक्ष रहे। संस्कारतत्त्वसमीक्षा विश्ववाणी प्रकाशन, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी से १९८१ ई. में प्रकाशित। पं. रघुनाथ शर्मा ने इस पर भूमिका लिखी है। इस ग्रन्थ में प्रमुख १६ संस्कारों के काल, विधि आदि के विषय में प्राच्य धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर प्रामाणिक विवेचन किया गया है। राममिश्र शास्त्री, राजस्थान (१८५१-१६११) - मूलतः राजस्थानी होते हुए भी इनकी कर्मभूमि काशी रही। ये विशिष्टाद्वैत और धर्मशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् तथा बाबू भगवानदास, हरिहरकृपालु द्विवेदी सदृश शिष्यों के गुरु थे। ये विशिष्टाद्वैत मतानुयायी थे। १- शुद्धिसर्वस्वम् दर्शन और शास्त्र ६२५ अमर प्रेस, काशी से सन् १८८४ ई. में मुद्रित। यह ‘आशौच व्यवस्था के विषय में राममिश्र जी का प्रमेयबहुल प्रमाणपरिपुष्ट विद्वत्तापूर्ण धर्मशास्त्रीय निबन्ध है। २-तुरीयमीमांसा -मेडिकल हाल प्रेस, काशी से १६०१ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में तुरीय (चतुर्थ) आश्रम संन्यासाश्रम का विवेचन है। इस सन्दर्भ में शङ्कराचार्य, मध्व आदि के मतों की समीक्षा की गयी है और मोक्ष संन्यासियों को ही होता है अन्य को नहीं, इसका निराकरण कर प्रतिपादन किया गया है कि ‘ज्ञानी को मोक्ष होता है, संन्यासी को नहीं" । संन्यास में केवल ब्राह्मण का नहीं अपितु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों का अधिकार माना गया है। इस ग्रन्थ में शंकराचार्य के संन्यासविषयक मत का खण्डन किया गया है। ३- व्रात्यसंस्कारमीमांसा काशी से प्रकाशित-इसके अतिरिक्त उन्होंने उद्वाहसमयमीमांसा, मन्त्रमीमांसा एवं दत्तकविजय वैजयन्ती आदि धर्मशास्त्रविषयक अनेक अन्य उपादेय ग्रन्थों का भी निर्माण किया तथा विशिष्टाद्वैतसम्बन्धी “स्नेहपूर्तिः, “ब्रह्मसूत्रवृत्तिः” नामक ग्रन्थ लिखे। बाबू भगवानदास-डॉ. बाबू भगवानदास का भारतीय दर्शनों तथा पुराणों का अध्ययन बड़ा गम्भीर था। ये उपर्युल्लिखित राम मिश्र शास्त्री के मेधावी और मनीषी शिष्य तथा “कर्मणा जातिः” सिद्धान्त के प्रचारक थे। मानवधर्मसार:-संस्कृत में पद्यबद्ध इस ग्रन्थ में ग्रन्थकार ने प्राचीन भारतीय मूल्यों की परिवर्तित जीवन युग में उपयोगिता का विशेष वर्णन किया है। उमापति द्विवेदी (नकछेदराम दूबे, उत्तर प्रदेश १८५३-१६११) - उमापति द्विवेदी का जन्म उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले (ग्राम-सहआपार) में हुआ था। इनके पिता पं. हरिदत्त द्विवेदी उस युग में व्याकरण, न्याय एवं वेदान्त के मूर्धन्य विद्वान् माने जाते थे। अपने पिता से ही उमापति द्विवेदी ने सकल शास्त्रों का अध्ययन कर तलस्पर्शी वैदुष्य प्राप्त किया। ये भगवान राम के प्रति यजमान-पुराहित के भाव की भक्ति रखते थे। भगवान् राम को अपना यजमान और अपने को उनके पुरोहित मुनि वशिष्ट के स्थान पर मानते थे, जिन्होंने महाराज दशरथ का पौरोहित्य कर पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था जिससे राम जैसा पुत्र उत्पन्न हुआ। वस्तुतः व्याकरण, नव्यन्याय तथा धर्मशास्त्र तीनों क्षेत्रों में इनका वैदुष्य अप्रतिम था। सनातनधर्मोद्वार:-रचनाकाल-१६०६-१६१२ ई. । प्रथम खण्ड १६१२ ई. में प्रकाशित, द्वितीय खण्ड-तृतीय एवं चतुर्थ खण्ड १६४२ ई. में हिन्दू विश्वविद्यालय प्रेस से मुद्रित। धर्मशास्त्रपरक ग्रन्थ पं. उमापति द्विवेदी की अक्षय्य कीर्ति का मेरुदण्ड है। ग्रन्थ चार खण्डों में विभक्त है। पूर्वार्ध में दो खण्ड हैं तथा उत्तरार्ध में दो खण्ड । पूर्वार्ध के दोनों खण्डों में धर्म के मूल पर विचार किया गया है तथा उत्तरार्ध में सामान्य धर्म के स्वरूप तथा बातों का विवेचन है। ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में धर्म का स्वरूप तथा लक्षण, धर्म की महिमा, धर्म के प्रमाणस्वरूप वेद के स्वरूप एवं माहात्म्य, विधिवाक्य एवं अर्थवाद की धर्म में उपयोगिता, मन्त्र तथा ब्राह्मणों के स्वरूप का विवेचन किया गया है। द्वितीय खण्ड में वेद के स्वतः प्रामाण्य का विरोध करने वाले विद्वानों के मत की समालोचना है। जर्मनी के वैदिक विद्वान् बेबर तथा मैक्समूलर के वेदविषयक सिद्धान्तों की गम्भीर मीमांसा के अनन्तर द्विवेदी जी ६२६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ने स्वामी दयानन्द सरस्वती के ‘ब्राह्मणभाग वेद नहीं’ है इस मत का खण्डन बड़े विस्तार के साथ किया है। श्रुति प्रामाण्य के अनन्तर स्मृति सदाचार एवं आत्मतुष्टि की प्रमाणता दिखाकर “श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्” इस श्लोक में प्रोक्त धर्म के चतुर्विध लक्षणों की मीमांसा पूर्ण की गयी है। ग्रन्थ के उत्तरार्ध में दो खण्ड हैं, जिनमें तृतीय खण्ड में सामान्य धर्म-सत्य धृति, क्षमा, दम, ब्रह्मचर्य, अस्तेय आदि का निरूपण किया गया है। इस सन्दर्भ में “देवपूजन” नामक सामान्य धर्म का लगभग २०० पृष्ठों में विस्तारपूर्वक विवेचन है। संहिता, शतपथब्राह्मण तथा कात्यायन श्रौतसूत्र से प्रचुर प्रमाण देकर द्विवेदी जी ने अपने कथन की पुष्टि की है। स्वामी दयानन्द सरस्वती के प्रतिमा विषयक मत का यहाँ बड़ा ही तर्कपूर्ण खण्डन किया गया है। यजुर्वेद के विश्रुत मंत्र-अंश ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद् यशः’ में आये “प्रतिमा” शब्द का ‘सत्यार्थप्रकाश” में “मूर्ति” मानकर वेद में मूर्तिपूजा का निषेध है, ऐसा प्रतिपादित किया गया है, जबकि द्विवेदी जी ने उसका अर्थ समता (तुल्यता) बतलाया है जो सर्वथा युक्तिसंगत है। इस विषय में स्वामी जी पर द्विवेदी जी की मधुर व्यंग्योक्ति है पाणिनीयां नदीं श्रुत्वा श्रुत्वा न प्रतिमेति च। मरुस्थली श्रुतिं चैनां फलैक्यमभिधावतोः।। अर्थात् पाणिनीय व्याकरण में नदीसंज्ञक शब्दों में आने वाले “मरुस्थली” शब्द को यदि कोई वास्तविक नदी समझकर उसकी ओर दौड पड़े तो उसे जो फल मिलेगा वही श्रुति में प्रयुक्त “न प्रतिमा’ मन्त्रांश में पठित “प्रतिमा” शब्द का “मूर्ति” अर्थ लगाने वाले को मिलेगा। अर्थात, दोनों के प्रयत्न निष्फल रहेंगे। ग्रन्थ का चतुर्थ खण्ड सामान्य धर्म के निरूपण का उत्तरार्ध है। इसमें विशेष धर्म का निरूपण किया गया है। ब्राह्मणपूजन, श्राद्ध, तीर्थ एवं भगवद्भक्ति इन चारों का इसमें विस्तार से वर्णन और विवेचन है। तीर्थों के निरूपण-प्रसंग में काश्यां मरणान्मुक्तिः इस चिन्तन का मर्म उद्घाटित किया गया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में लेखक की गद्यशैली बड़ी कसाव-युक्त प्रौढ़ उदात्त तथा विषयानुसारिणी है। युक्तियों या शैली में कहीं शैथिल्य नहीं दृष्टिगोचर होता। इस ग्रन्थ में कुल १५३० पृष्ठ हैं। इसकी भूमिका महामना मदनमोहन मालवीय ने लिखी है। __ नित्यानन्द पन्त “पर्वतीय” (१८६७-१८३१)-नित्यानन्द पन्त “पर्वतीय” पं. गंगाराम त्रिपाठी के दौहित्र पुत्र थे, जिन्होंने काशी में नागेश भट्ट कृत शेखरद्वयी के अध्ययन अध्यापन की परिष्कार शैली का सृजन कर नव्य व्याकरण की नयी परम्परा चलायी। पर्वतीय जी काशी में उत्पन्न हुए थे। इनके पिता का नाम नामदेव पन्त था। इन्होंने अपने पिता से ही अपनी वाजसनेयी शाखा की संहिता का तथा कर्मकाण्ड एवं धर्मशास्त्र का अE ययन किया था तथा म. म. गङ्गाधर शास्त्री से व्याकरणादि शास्त्रों की शिक्षा पायी थी। ये स्थापना से लेकर १६०६ ई. तक सेन्ट्रल हिन्दू कालेज में प्राध्यापक रहे। इन्होंने मीमांसा वर्शन और शास्त्र ६२७ एवं वेद सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों जैमिनि सूत्रवृत्ति, मीमांसापरिभाषा एवं कात्यायन श्रौतसूत्र (कर्कभाष्य सहित) का सम्पादन किया और उनके विषमस्थलों पर टिप्पणी लिखी। हिन्दू जाति के प्रमुख १६ संस्कारों में दस संस्कारों का विशेष महत्त्व है। इसीलिए “दशकर्मपद्धति” का प्राचीन मनीषियों ने संकलन किया जिनमें संस्कारों की विधि वर्णित है। परन्तु इन पद्धतियों में शास्त्रीय विवेचन का अभाव है। इस कमी की प्रतिपूर्ति हेतु “पर्वतीय” जी ने कर्मकाण्डपरक ग्रन्थ लिखे, जिनमें प्रारम्भिक भाग में शास्त्रीय विवेचन किया गया है तथा उत्तरभाग में विधि बतलायी गयी है। विधान में प्रयुक्त वैदिक मन्त्रों की व्याख्या करते हुए उस प्रसङ्ग में प्रयुक्त ऋचा की उपयोगिता भी बतायी गयी है। पर्वतीय जी के द्वारा प्रणीत कर्मकाण्डपरक ग्रन्थ निम्नवत् हैं १- संस्कारदीपक - १६१७ ई., दो भाग। इसमें पारस्करगृह्यसूत्रानुसार दस संस्कारों का शास्त्रीय विवेचन तथा उनका विधान प्रायोगिक रूप में वर्णित है। २- परिशिष्ट दीपक- १६२२ ई.। यह “संस्कारदीपक” का ही एक प्रकार से तृतीय भाग अथवा परिशिष्ट है जिसमें दान एवं शान्तिविधान वर्णित है। -३- अन्त्यकर्मदीपक - १६२८ ई.। इसमें अन्त्यकर्म तथा “शौचनिर्णय” निरूपित है। ४- वर्षकृत्यदीपक - १६३१ ई.। इसमें वर्षभर के व्रतों अनुष्ठानों का काल, स्वरूपनिर्णय पूजन एवं उद्यापन की विधि दी गयी है। सापिण्ड्यदीपक- १६१३ ई. । इसमें विवाह में सापिण्ड्य पर आधारित प्रतिबन्धों का निर्णय करते हुए “वर्ण्य” कन्याओं का विस्तृत विवरण दिया गया है। पर्वतीय जी ने व्याकरणसम्बन्धी भी दो ग्रन्थ लिखे- लघुशब्देन्दुशेखर की टीका “दीपक” (परिष्कारपरक) तथा परमलघुमञ्जूषा टिप्पणी, जो विद्वानों द्वारा मान्य और समादृत हैं। अन्य __कामाक्षी, आन्ध्रप्रदेश (१६ वीं शती) - स्मृतिरत्नप्रकाशिका, नीलकण्ठीयविषयमाला, अद्वैतदीपिका। सभी ग्रन्थ कुम्भकोणम् से प्रकाशित। गोविन्ददेवशर्मा (१८०१-१८७३) व्यवस्थासारसञ्चयः। पाच्चु मूत्तत (१८१४-१८८३) सुखबोथकः । शिवशङ्कर - रणवीररत्नाकरः (१८६० ई.) पाडूर पटुतोल विद्वान् नम्बूदरीपाद (१८२४-१८६७) -व्यवहारचन्द्रिका । जे. आर. वेलण्टाइन - खुष्टधर्मकौमुदी (१८५६ ई.) तथा अष्टधर्मकौमुदीसमालोचना १८६४ तारानाथ तर्कवाचस्पति - तुलादानपद्धतिः (१८६६ ई.) हरिनाथ शास्त्री (१८४७-१६२३) ६२८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास आशौच निर्णयः मंदिकल राम शास्त्री-आर्यधर्मप्रकाशिका। चन्द्रकान्त तर्कालंकार - स्मृतिचन्द्रिका (१६०३)। नानूराम शास्त्री - धर्मप्रमाणविचारः (१६०३ ई.) अप्पाशास्त्री राशिवडेकर - याजुषहौत्रविचारः (१८१३ ई.) नीलकण्ठ थाटे, महाराष्ट्र - कायस्थप्रभुधर्मादर्शः (१८२७ ई.) बापूभटूट केलकर, महाराष्ट्र-ये रत्नागिरि जिले में ‘फनसी" नामक स्थान के निवासी थे। १- श्राद्धमञ्जरी-१८१० ई. २- प्रायश्चित्तमञ्जरी-१८१४ ई. एवं ३ कृत्यमञ्जरी-१८१८ ई.। त्यम्बकराम ओका, महाराष्ट्र - आचारभूषणम्-१८१६ ई.। त्यम्बक नारायण माटे, महाराष्ट्र - आचारेन्दुः - १८३८ ई.। एन. एस. अनन्तकृष्ण शास्त्री, केरल (१६ वीं शती) सनातनधर्मप्रदीपः। जयदेव मिश्र, बिहार (१८५४-१६२५) १- महाविनायकस्थापनपद्धतिः २- वास्तुपद्धतिः ३- शतचण्डीपद्धतिः ४- कुलदेवतास्थापनपद्धतिः ५- नीलवृषोत्सर्गपद्धतिः ६-तुलादानपद्धतिः । वे सभी कर्मकाण्ड के ग्रन्थ हैं। पञ्चानन तर्करत्न, कलकत्ता (१८६६-१६३६)-नन्दलाल विद्यारत्न के पुत्र । १-विशुद्धनित्यकर्मव्यवस्था २- प्रायश्चित्तविधिः ३-ग्रहणकृत्यव्यवस्था। अन्नाशास्त्री वारे, नासिक (१८६९-१९३६)-१-गोत्रप्रवरनिर्णयप्रदीपः २- आषाढोद्वाहनिर्णयः ३- दत्तकनिर्णयामृतम् ४-कुण्डार्क पर टीका ५- सूर्योपस्थानटीका ६-गायत्रीकोटिहोमपद्धति पर टीका। सभापति उपाध्याय, उत्तर प्रदेश (१८८२-१६६४) - वैदिकधर्मरहस्यम् । इस ग्रन्थ में सनातन धर्म के विरुद्ध किये गये आक्षेपों का निराकरण किया गया है। कृष्णशास्त्री धुले (नागपुर) - सापिण्ड्यभास्करः १६४१ ई. में रचित। कृष्णमाधव झा, बिहार (१८८८-१६८६) मलमासविचारः। हर्षनाथ झा बिहार २० वीं शती, ग्रन्थ - संस्कारदीपकः। कुशेश्वर (कुमार) शर्मा - १८६०-१६४३ बिहार-इन्होंने धर्मशास्त्र के सार संग्रह रूप “पर्वनिर्णयः” नामक ग्रन्थ को विभिन्न विद्वानों तथा निबन्धकारों से सम्पर्क करके पर्वो, व्रतों तथा धार्मिक उत्सवों की तिथि आदि का निर्णय प्रस्तुत किया है जो वाराणसी के ज्योतिष प्रकाश प्रेस से १६८५ में प्रकाश में आया है। इस ग्रन्थ का एक और महत्त्व इस कारण है कि लेखक ने लगभग अनेक महत्त्वपूर्ण समकालिक मैथिल विद्वानों का उल्लेख करते हुए उनके द्वारा उन-उन पर्यों के सम्बन्ध में निर्णय करवाया है, साथ ही उन निर्णयों दर्शन और शास्त्र ६२ को प्रामाणिक रूप देने के लिए पण्डितों की सभा आमन्त्रित करके विचार-विमर्श करके भी सम्पुष्टि प्राप्त की है।

व्याकरण

व्याकरण की सभी धाराओं में पाणिनीय व्याकरण को लगभग सम्पूर्ण भारत में व्याप्त होने का गौरव प्राप्त हुआ। इसका कारण एक ओर जहाँ पाणिनीय अष्टाध्यायी का अतिशय नियमबद्ध और वैज्ञानिक होना था, वहां अपने इस बौद्धिक आकर्षण के कारण इसने जिस मनीषी-वर्ग को अपनी ओर अध्ययन-मनन हेतु आकृष्ट किया, उनके बुद्धिप्रकर्ष जन्य परिष्कारों का भी इसमें अत्यधिक योगदान रहा। इनकी उद्भावनाओं से समन्वित होकर पाणिनीय व्याकरण-परम्परा असंख्य नद-नदियों के प्रवाहों से परिपुष्ट भागीरथी की भाँति इतने सुदूर काल तक आकर भी आज सतत प्रवाहित है। प्रवाहित ही नहीं, आज भी इसमें बहुविध चिन्तन निरन्तर चल रहे हैं, नित्य नयी गवेषणाएँ प्रकाशित हो रही हैं। और जबसे कम्प्यूटर का क्रान्ति-युग आरम्भ हुआ है आधुनिक भाषाविज्ञान कम्प्यूटर पर जाने के लिए बारम्बार इस व्याकरण की ओर आग्रहपूर्ण दृष्टि से देख रहा है। का पाणिनीय व्याकरण सम्प्रदाय में कैयट, भट्टोजिदीक्षित और नागेश भट्ट जैसे प्रतिभाशाली विद्वान् हुए, जिन्होंने व्याकरण शास्त्र में पदार्थ-विचार की विशिष्ट धारा प्रवाहित की और अब यह शास्त्र पदविद्या मात्र न होकर पदार्थ-विद्या बन गया। इसमें अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना, धात्वर्थ, कारकार्थ आदि पर विचार होने लगा। उधर मीमांसा, न्यायशास्त्र आदि में भी शाब्दबोध पर व्यापक विचार किया गया है। व्याकरणशास्त्र का इन मतों से वाद-विवाद स्वाभाविक था। इसके परिणामस्वरूप व्याकरणशास्त्र के अन्तर्गत पदार्थ विवेचन में अधिक परिष्कार और दार्शनिकता का समावेश हुआ। भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में शब्दविमर्श की जिस दार्शनिक परम्परा का बीजवपन किया था वह शताब्दियों तक लगभग प्रसुप्त रहने के बाद मानों फिर पल्लवित पुष्पित होने लगा। व्याकरण शास्त्र के इतिहास में जैसे चौदहवीं शती में रामचन्द्राचार्य और तदनन्तर भट्टोजिदीक्षित (१५६०-१६१०) के आविर्भाव ने जैसे सिद्धान्तकौमुदी का प्रणयन द्वारा इस शास्त्र के विकास को एक नया मोड़ दिया और आगे लगभग सम्पूर्ण भारत में प्रक्रिया-पद्धति से संस्कृत व्याकरण का अध्ययन-अध्यापन होने लगा, उसी प्रकार अठारहवीं शती में नागेश भट्ट के अवतरण से फिर एक बार व्याकरण की दिशा बदली और अर्वाचीन काल “शेखरयुग” रूप में उभरा, अर्थात् नागेशभट्ट के “शब्देन्दुशेखर” एवं “परिभाषेन्दुशेखर” से प्रभावित रहा। नागेश ने ‘सिद्धान्तमञ्जूषा’, ‘शब्देन्दुशेखर’ और ‘परिभाषेन्दुशेखर’ इन तीन महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया। सिद्धान्तमञ्जूषा में व्याकरण के दार्शनिक तत्वों का न्यायवैशेषिक, मीमांसा आदि दर्शनों से तुलनात्मक अनुशीलन और विवेचन है। “शब्देन्दुशेखर" भट्टोजिदीक्षित कृत प्रौढ़ मनोरमा की व्याख्या है जो पतञ्जलि के महाभाष्य पर आधारित ६३० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास है। “परिभाषेन्दुशेखर” में पाणिनीय तन्त्र में स्वीकृत परिभाषाओं के स्वरूप एवं क्षेत्र का विशेष अनुशीलन है। इन ग्रन्थों की दार्शनिकता, विषय-परिष्कार-शैली आदि ने अग्रिम युग के विद्वानों को अत्यधिक आकृष्ट किया और दोनों “शेखर” ग्रन्थों पर ही सर्वाधिक टीकाएँ लिखी गयीं, इन्हीं को केन्द्र बनाकर शास्त्रार्थ और अध्ययन-अध्यापन की विधा प्रवर्तित हुई। अतः इस युग को “शेखरयुग” कहना तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। दूसरी ओर इस शास्त्र के विकास में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व और जुड़ा। नव्यन्याय की शैली ने सभी दर्शनों एवं अन्य विधाओं की भाँति व्याकरण में भी प्रवेश किया, क्योंकि यह शैली अधिक वैज्ञानिक थी। इस में विषय को सूक्ष्मतम स्तर पर प्रतिपादित करने की क्षमता थी। इस शैली की दो विशेषताएँ थीं-सम्बन्ध-निर्णय एवं विषय-परिष्कार। इनसे प्रभावित होकर व्याकरण शास्त्र में “न्यास’ एवं “परिष्कार” पद्धति का प्रवर्तन हुआ। अब वैयाकरण लक्ष्य को भूलकर “लक्षणैकचक्षुष्क” बन गये। किसी सूत्र को लेकर उसमें लाघव हेतु परिवर्तन का प्रयास और उससे उत्पन्न कठिनाइयों को दूर करना ‘न्यास’ शैली है। इस प्रणाली पर काशी आदि शिक्षा केन्द्रों में शास्त्रार्थ आयोजित होते थे। दिग्गज पण्डित अपने द्वारा उद्भावित नवीन युक्तियाँ रहस्य के रूप में क्रोडपत्रों में सुरक्षित रखते थे। और वे शास्त्रार्थ में प्रयोग की जाती थीं। शिष्य गुरुओं से अपनी श्रद्धा के बल पर इसे प्राप्त करते थे। अब ये क्रोडपत्र प्रकाशित हैं और सर्वजनसुलभ हैं। परन्तु, व्याकरण की सर्वाधिक अर्वाचीन प्रणाली परिष्कार प्रणाली है, जिसमें नव्यन्याय की अवच्छेदकावच्छिन्न शैली में सूत्रार्थ की व्याख्या की जाती है या अन्य किसी लक्षण को अपन्यस्त किया जाता है। १६-२० वीं शताब्दी के विद्वानों और टीकाकारों में इसी शैली का ‘वर्चस्व” छाया रहा। रामाज्ञा पाण्डेय, उ. प्र. (१६-२० वीं शती) - पं. रामाज्ञा पाण्डेय का जन्म बलिया जिले के रतसड़ नामक ग्राम में हुआ था। इन्होंने काशी में पं. देवनारायण तिवारी, पं. गङ्गाधर शास्त्री, पं. दामोदर शास्त्री तथा पं. शिवकुमार शास्त्री से व्याकरण के प्रौढ़ ग्रन्थों का अध्ययन किया। बाद में “साधोलाल स्कालर” के रूप में अनेक वर्षों तक डॉ. वेनिस के सान्थ्यि में रहकर भी इन्होंने नवीन विषयों का श्रवण तथा मनन किया, जिससे इनमें व्याकरण शास्त्र में दार्शनिक तत्त्वों के अन्वेषण करने की प्रवृत्ति का उदय हुआ। इन्होंने प्रारम्भ में कुछ काल तक काशी में अध्यापन किया। १६२१-२२ ई. के लगभग इनकी नियुक्ति जगन्नाथ पुरी (उड़ीसा) के संस्कृत कालेज के अध्यापक पद पर हुई। इन्होंने कुछ दिनों बिहार के मुजफ्फरपुर नगर में स्थित धर्मसमाज राजकीय संस्कृतकालेज में भी अध्यापन कार्य किया और अन्त में बाबू सम्पूर्णानन्द के आग्रह पर काशी के संस्कृत कालेज में आ गये। व्याकरणदर्शनम् - यह ग्रन्थ तीन खण्डों में विभक्त है - १- भूमिका २- पीठिका ३- प्रतिभा। ये भाग सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय वाराणसी से क्रमशः १६५४, १६६५ एवं १६७८ ई. में प्रकाशित हैं। यह व्याकरणदर्शनविषयक अत्यन्त प्रौढ़ ग्रन्थ है। प्रातिशाख्य, दर्शन और शास्त्र निरुक्त, महाभाष्य, वाक्यपदीय तथा नागेशभट्ट की सिद्धान्तमञ्जूषा आदि में प्रतिपादित व्याकरण के दार्शनिक स्वरूप, उसके वर्ण्य सिद्धान्तों, पदार्थ-चिन्तन आदि का बड़ा गम्भीर ऊहापोहपूर्ण विवेचन पाण्डेय जी ने इस ग्रन्थ में किया है। रामप्रसाद त्रिपाठी, उ. प्र. (२० वीं शती) - त्रिपाठी जी का जन्म उत्तरप्रदेश के जौनपुर मण्डल में हुआ था। इन्होंने काशी में रहकर पं. देवनारायण तिवारी (१८८६-१६४१ ई.) से व्याकरणशास्त्र का अध्ययन किया। कुछ वर्षों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तथा उसके बाद वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। १-पाणिनीयव्याकरणे प्रमाणसमीक्षा- वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से १६७२ ई. में प्रकाशित। यह एक अत्यन्त उच्च कोटि का ग्रन्थ है। महाभाष्यकार पतञ्जलि से लेकर भट्टोजिदीक्षित तक के व्याकरणाचार्यों द्वारा लिखे गये ग्रन्थों का सम्यक् अनुशीलन कर त्रिपाठी जी ने उक्त प्रामाणिक ग्रन्थ का प्रणयन किया है। २-सिद्धान्तचिन्तामणि:- सम्पूर्णानन्द ग्रन्थमाला-१५ में संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से १६८७ ई. में प्रकाशित । इसमें नव्यन्याय की शैली में नियमापवाद सूत्रों की पर्यालोचना कर उनके सूक्ष्मतम परिष्कृत रूप को प्रस्तुत किया गया है। चारुदेव शास्त्री, लाहौर (२० वीं शती) - उपसर्गार्थचन्द्रिका - पाँच खण्डों में रचित यह संस्कृत उपसर्गों का कोश है। विभिन्न उपसर्गों के धातुओं से जुड़ने पर उनके अर्थ-वैभिन्न्य को प्रयोगों द्वारा दर्शाया गया है। बीच-बीच में ग्रन्थनामोल्लेखपूर्वक उद्धरण भी दिये गये हैं। भी खुद्धी झा, बिहार-कोइलक ग्रामवासी। नागेशोक्तिप्रकाशः- नागेशभट्ट के अभिप्राय को विशदतया स्पष्ट करने वाला यह ग्रन्थ दरभंगा से प्रकाशित है। शास्त्रार्थविषयक ग्रन्थ जयदेव मिश्र, बिहार (१८४४-१९२५ ई.) म. म. पं. जयदेव मिश्र का जन्म बिहार प्रदेश के मधुबनी जिले में हुआ था। इन्होंने मिथिला के प्रसिद्ध वैयाकरण पं. हल्ली झा, म. म. पं. रज्जो मिश्र तथा काशी के “वाग्देवतातार” पं. शिवकुमार शास्त्री से व्याकरणादि शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन किया था। अल्प वय में ही इनकी गणना काशी के गणमान्य पण्डितों में होने लगी थी। ये व्याकरण की परिष्कार-पद्धति के विश्रुत और पारगामी विद्वान् थे। इनकी ‘शास्त्रार्थरत्नावली" में पाणिनीय सूत्रों के ऊपर बनने वाली शास्त्रार्थ की संभावित सभी कोटियों की चर्चा की गयी है। शास्त्रार्थ में मिश्र जी की विद्वत्ता सुप्रथित थी। उनका यह ग्रन्थ शास्त्रार्थ पद्धति के परिज्ञान हेतु अतीव उपयोगी है। वेणीमाधव शुक्ल, उ. प्र. (१८५०-१६५३)-पिता का नाम श्री देवदत्त शुक्ल। वैयाकरण केसरी वेणीमाधव शास्त्री का जन्म जौनपुर मण्डल के अन्तर्गत बदलापुर के उदयपुर गेल्हवा ग्राम में हुआ था। इन्होंने श्री दुर्गादत्त शास्त्री तथा काशी के म. म. जयदेव ६३२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास मिश्च से व्याकरण, न्याय, वेदान्त आदि शास्त्रों का अध्ययन किया था। १- पाणिनीयसूत्र न्यासशास्त्रार्थकला - ग्रन्थकार के पुत्र श्री राजनारायण शास्त्री द्वारा सम्पादित और मास्टर खेलाडीलाल एण्ड सन्स, बनारस द्वारा १६६४ वि.(१६३७ ई.) में प्रकाशित । न्यास शैली में शास्त्रार्थकला का उत्तम ग्रन्थ । २- परिभाषेन्दुशेखर- बृहच्छास्त्रार्थकला ३- परिष्कारदर्पण: राजनारायण शास्त्री ने इसपर टिप्पणी लिखी है। इसके अतिरिक्त इन्होंने वैयाकरणभूषणसार टीका कौमुदीकल्पलतिका, शक्तिवाद और व्युत्पत्तिवाद पर टीका, हिंसाखण्डनकौमुदी आदि अनेक अन्य ग्रन्थों की भी रचना की। मा सूर्यनारायण शुक्ल - उ. प्र. (१८६५-१६४४) म. म. पं. वामाचरण भट्टाचार्य के शिष्य, व्याकरण, न्याय एवं अद्वैतवेदान्त के मनीषी विद्वान् । पाणिनीयव्याकरण-वादरत्नम् २ भाग, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला-८० में १६३२ ई. में प्रकाशित। यह शास्त्रार्थ विषयक ग्रन्थ है जिसमें न्यासरत्नावली, न्यासकौमुदी, पाणिनितन्त्रक्रोडपत्रम्, शिशुतोषिणी भावकुतूहलम्, शास्त्रार्थरत्नावली आदि शास्त्रार्थ ग्रन्थों के विषयों का समावेश है। अष्टाध्यायी पर बृत्ति एवं टीकाग्रन्थ इत्यादि। गोकुलचन्द्र (१८४० ई.) इनके पिता का नाम बुधसिंह एवं गुरु का नाम जगन्नाथ था। अष्टाध्यायी पर संक्षिप्त वृत्ति। । है औरम्म भट्ट, महाराष्ट्र (१८४३ ई.) ये मूलतः महाराष्ट्र के थे, परन्तु बाद में काशी के ही निवासी हो गये थे। ये बालशास्त्री के गुरु पं. काशीनाथ शास्त्री के समकालीन थे। “व्याकरणदीपिका” नाम्नी वृत्ति- इस वृत्ति में उदाहरण के रूप में सिद्धान्त-कौमुदी की वृत्तियों और पंक्तियों का उपयोग किया गया है। जिसका महर्षि दयानन्द सरस्वती (१८२४-१८८३ ई.) आर्यसमाज के संस्थापक । अष्टाध्यायीभाष्यम्-यह अष्टाध्यायी सूत्रों की विस्तृत व्याख्या है। देवदत्त शास्त्री, उ.प्र. (१९वीं शती) - हरिद्वार के निवासी। अष्टाध्यायी पर वृत्ति-लखनऊ के कान्यकुब्ज प्रेस से १८८६ ई. में प्रकाशित। भाउशास्त्री धुले, नागपुर (१८२८-१६२५) गजसूत्रवृत्तिः पाणिनीयसूत्र १/३/६७ पर टीका। भीमसेन शर्मा, उ.प्र. (१८५४-१६१७ ई.)-जन्मस्थान-एटा, उत्तर प्रदेश स्वामी दयानन्द सरस्वती के समकालीन । पाणिनीय अष्टाध्यायी की वृत्ति। इसमें प्रत्येक सूत्र की पदच्छेदपूर्वक वृत्ति और उदाहरण दिये गये हैं। द्वितीय संस्करण १६०४ ई. में प्रकाशित। जीवराम शर्मा, उ.प्र. (१६-२०वीं शती)-ये मुरादाबाद की बलदेव आर्य पाठशाला में अध्यापन कार्य करते थे। अष्टाध्यायी पर वृत्ति-१६०५ ई. में प्रकाशित। गङ्गादत्त शर्मा, उ.प्र. (१८६६-१६३३ ई.)- ये गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार में अध्यापक थे। अष्टाध्यायी पर तत्त्वप्रकाशिका नाम्नी वृत्ति। यह एक महत्त्वपूर्ण विशदार्थिका वृत्ति है। दर्शन और शास्त्र जानकीलाल माथुर, राजस्थान (२०वीं शती) अष्टाध्यायी पर वृत्ति-इसमें उदाहरणों तथा उपयोगी वार्तिकों का भी समावेश है। वैदिक और स्वरप्रकरण के सूत्रों के उदाहरण भी स्वरांकन सहित दिये गये हैं। जिन ए. राजराजबर्म कोइतम्बुरान (१८६३-१E१८) लघुपाणिनीयम्-यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें अष्टाध्यायी के १७६५ सूत्रों की व्याख्या सरल शैली में की गयी है। भाषा विषयक भारतीय और पाश्चात्त्य दोनों मतों का इसमें समन्वय है। गोपाल शास्त्री नेने दर्शनकेशरी (२०वीं शती)-बृहदृजुपाणिनीयम्- करुणापति त्रिपाठी द्वारा सम्पादित तथा उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी लखनऊ से १६८३ ई. में प्रकाशित । इनका ‘ऋजुपाणिनीयम्" भी प्रकाशित है। महाभाष्य पर टीका-व्याख्या ग्रन्थ बाल शास्त्री रानाडे, महाराष्ट्र (१८.३६-१८८२ ई.) अपने अपार वैदुष्य के कारण ये काशी में ‘बालसरस्वती" के रूप में प्रसिद्ध थे। यद्यपि ४३ वर्ष की अल्पायु में ही ये दिवङ्गत हो गये, तथापि इतनी कम आयु में इन्होंने विलक्षण कीर्ति अर्जित की। व्याकरणमहाभाष्य-टिप्पण-यह ग्रन्थ कैयट की टीका के साथ राजराजेश्वरी प्रेस दुर्गाघाट, काशी, से १८६५ ई. में प्रकाशित हुआ है। माधवशास्त्री भण्डारी, राजस्थान (१६-२०वीं शती) भण्डारी जी का मूल निवास स्थान पश्चिम खानदेश के अन्तर्गत “नेर” ग्राम था। इन्होंने वाराणसी में व्याकरण , मीमांसा एवं धर्मशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित पं. नित्यानन्द “पर्वतीय” (१८६८-१६३१ ई.) से शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। इन्होंने कुछ समय वाराणसी में, तदनन्तर लाहौर के प्राच्य महाविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। महाभाष्य पर “स्फोटविमर्शिनी” व्याख्या। यह व्याख्या महाभाष्य के केवल २ आहिनकों पर लिखी गयी है, जिसमें व्याकरण सिद्धान्त के अनुसार ‘स्फोट" की आवश्यकता, उसके स्वरूप, अपभ्रंशों में शक्तिविचार, माहेश्वर सूत्रों में अद्वैतब्रह्मप्रतिपादकता आदि विषयों पर विशद विचार किया गया है। 5 महेश झा, बिहार (१८०३-१६८७ ई.) महाभाष्य पर “विमला” व्याख्या, सुल्तानगंज, बिहार से १६४४-४५ ई. में प्रकाशित। वाक्यपदीय पर टीका-व्याख्या ग्रन्थ नृसिंह त्रिपाठी, उ.प्र. (१८-२०वीं शती)- ये गाजीपुर के “खढिया” गाँव के निवासी थे। इन्होंने काशी के पं. देवनारायण तिवारी (१८६६-१E४१ ई.) के सान्निध्य में रहकर व्याकरण-ग्रन्थों का अध्ययन किया था। पं. रामाज्ञा पाण्डेय इनके सतीर्य थे। त्रिपाठी जी व्याकरण के साथ-साथ न्यायशास्त्र के भी मर्मज्ञ विद्वान थे तथा साहित्य में भी इनकी अच्छी गति थी। वाक्यपदीप ब्रह्मकाण्ड की ‘प्रकाश’ टीका । यह वाक्यपदीय के प्रथम काण्ड केआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ऊपर बड़ी ही प्रामाणिक और महत्त्वपूर्ण टीका है। काशी के श्रीचन्द्र कालेज से १६६४ वि. (१६३७ ई.) में प्रकाशित। त्रिपाठी जी ने न्यायमुक्तवली के शब्दखण्ड पर भी “प्रकाश” नाम्नी टीका लिखी है। रघुनाथ शर्मा, उ.प्र. (१६-२०वीं शती)- पं. रघुनाथ शर्मा उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के अन्तर्गत “छाता” नामक ग्राम के मूल निवासी थे। इनके पिता पं. काशीनाथ शास्त्री (१८५३-१६३८ ई.) अपने समय में काशी के मूर्धन्य विद्वानों में से थे। इन्होंने काशी में ही रहकर व्याकरणाशास्त्र का अध्ययन किया तथा बाद में गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज वाराणसी में अध्यापन कार्य करते हुए वहीं से सेवानिवृत्त हुए। १. वाक्यपदीय पर “अम्बाकी” व्याख्या। यह व्याख्या वाक्यपदीय की अन्य व्याख्याओं की अपेक्षा विस्तृत तथा अपने में पूर्ण है। शर्मा जी ने वाक्यपदीय के पाठभेदों की आलोचना करते हुए ग्रन्थ के शुद्ध संस्करण तथा इस व्याख्या की रचना कर वास्तव में महनीय कार्य किया है। यह टीका विद्वानों में अतीव प्रसिद्ध है (इस व्याख्या के ब्रह्मकाण्ड का प्रकाशन सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से १६६३ ई. में, द्वितीय काण्ड का १६६८ ई. में तथा तृतीय काण्ड का १६६१ ई. में हुआ। २. वाक्यपदीयपाठभेदनिर्णयः-२ भागों में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से १६६१ ई. में प्रकाशित। प्रक्रियाकौमुदी की टीका “प्रक्रियाकौमुदी’ १४वीं शती में रामचन्द्राचार्य द्वारा प्रणीत प्रक्रियापद्धति का प्रथम ग्रन्थ है। इसी को आधार बनाकर आगे भट्टोजिदीक्षित ने सिद्धान्तकौमुदी की रचना की। इस पर शेषकृष्ण ने “प्रकाश” नाम्नी व्याख्या लिखी। अर्वाचीन काल में मुरलीधर मिश्र ने इस व्याख्या पर “रश्मि” नामक टिप्पणी लिखी है। “सिद्धान्तकौमुदी” की टीकाएँ, टिप्पणी इत्यादि सिद्धान्तकौमुदी भट्टोजिदीक्षित (१६-१७वीं शती) द्वारा प्रणीत प्रक्रियापद्धति का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ है। आगे यही व्याकरण के पठन-पाठन का मुख्य आधार बना। अष्टाध्यायी-पद्धति से अध्ययन क्वचित् ही कहीं-कहीं होता रहा। इसपर प्रणीत टीकाओं में निम्न उल्लेखनीय हैं। सभापति उपाध्याय, उ.प्र. (१८८२-१६६४ ई.)- वाराणसी के निवासी। सिद्धान्तकौमुदी पर “लक्ष्मी” व्याख्या-चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित। सिद्धान्तकौमुदी के प्रारम्भिक कुछ ही अंशो पर यह टीका लिखी गयी है, पर महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है। गोपाल शास्त्री नेने “दर्शनकेसरी" महाराष्ट्र (१८६२-१६६७ ई.) सिद्धान्तकौमुदी-टिप्पणी यह टिप्पणी खण्डशः मुद्रित हुई। कनकलाल शर्मा, बिहार (१६-२०वीं शती)- ये मुंगेर जिले के अन्तर्गत महमदा ग्राम के निवासी श्री एकनाथ ठाकुर के पुत्र थे। फक्किकारत्नमञ्जूषा (सिद्धान्तकौमुदी)। दर्शन और शास्त्र पंक्तिव्याख्यानरूपा) हरिकृष्णनिबन्धन भवन, वाराणसी से १८३६ ई. में प्रकाशित। वेल्लङ्गोण्ड रामराय, आन्ध्रप्रदेश (२०वीं शती)- शरद्रात्रिः-सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्या। (सिद्धान्तकौमुदी के टीकाकारों में पं. गोपालदत्त पाण्डेय का नाम उल्लेखनीय है। इनकी हिन्दी टीका चौखम्बा विद्याभवन से दो खण्डों में प्रकाशित है।) “प्रौढमनोरमा” पर टीका-टिप्पणी इत्यादि प्रौढमनोरमा भट्टोजिदीक्षित द्वारा अपनी “सिद्धान्तकौमुदी” पर रचित व्याख्या है। इस ग्रन्थ में खण्डन-मण्डन का प्राचुर्य है। इन्होंने इसमें न्याय, पदमंजरी, काशिका तथा अपने गुरु शेषकृष्ण द्वारा प्रणीत “प्रक्रियाप्रकाश” का स्थान-स्थान पर खण्डन किया है। महाभाष्य को आधार बनाकर इन्होंने बड़ी प्रतिभा एवं युक्तिपूर्वक वैयाकरणों के द्वारा पूर्व स्थापित मतों को निरस्त कर स्वमत स्थापन किया है। इस पर अर्वाचीन काल में प्रणीत मुख्य टीकाएँ इस प्रकार है नक सभापति उपाध्याय (१८८२-१E६४ ई.) शब्दरत्नसहित “प्रौढमनौरमा” की “रत्नप्रभा” टिप्पणी-व्याकरणशास्त्र के इस दार्शनिक ग्रन्थ के ऊपर लिखी गयी यह सुबोध टिप्पणी है जो मूल ग्रन्थ के दुरूह तथा विषम स्थलों को उद्भाषित करने में सर्वथा उपयोगी है। भैरव मिश्र की “शब्दरत्नप्रकाशिका” व्याख्या के साथ वाणी विलास प्रेस, वाराणसी से १६४० ई. में मुद्रित (द्वितीय संस्करण)। माधवशास्त्री भण्डारी (१६-२० वीं शती) - प्रौढमनोरमा (अव्ययीभावान्त) के विषम स्थलों पर “प्रभा” नाम्नी टिप्पणी । प्रस्तुत टिप्पणी केवल परिष्कारों की दृष्टि से ही उपयोगी नहीं है, अपितु इसमें प्राचीन वैयाकरण कैयट तथा नागेश भट्ट के परस्पर मतभेद होने पर वस्तुस्थिति की समीक्षा भी की गयी है। इन टीकाओं के अतिरिक्त चन्द्रशेखर शास्त्री ने बालमनोरमा (१६०० ई.) तथा भावप्रकाशिका (१६०५ ई.) नामक ग्रन्थ लिखे। “वैयाकरणभूषणसार” की टीकाएँ, व्याख्या आदि ‘वैयाकरणभूषणसार’ कौण्डभट्ट द्वारा प्रणीत ग्रन्थ है जो भट्टोजिदीक्षित के भतीजे थे। यह पाणिनीय व्याकरण के दार्शनिक तत्त्वों को प्रस्तुत करने वाला ग्रन्थ है। इस पर आधुनिक काल में प्रणीत टीकाओं में से कुछ प्रमुख ये हैं राघवेन्द्राचार्य गजेन्द्रगडकर, सतारा (१७६२-१८५२ ई.)- वैयाकरणभूषणसार पर “प्रभा” टीका। - शककरशास्त्री मारुलकर, पूना (१८७४-१६५८ ई.)- ये वासुदेवशास्त्री अभ्यङ्कर के शिष्य थे। वैयाकरणभूषणसार की “शाङ्करी” टीका पूना से १६५७ ई. में प्रकाशित । __गोपालशास्त्री नेने, महाराष्ट्र (१८८२-१९६७ ई.) इनके पिता का नाम बाबूभट्ट नेने था। ये वाराणसी के प्रसिद्ध विद्वान् नित्यानन्द पर्वतीय के शिष्य थे। वैयाकरणभूषणसार की “सरला” व्याख्या। इसमें शाब्दबोधप्रक्रिया को सरल ढंग से समझाया गया है। नैयायिकों ६३६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास और वैयाकरणों के अनुसार शाब्दबोध के स्वरूप और अन्तर को नेने जी ने बड़ी सूक्ष्मतापूर्वक विवेचित किया है। 10 ब्रह्मदत्त द्विवेदी, उ. प्र. (१६८७ में दिवंगत)-ये पं. हरिहरकृपालु द्विवेदी के पुत्र थे। इन्होंने सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। व्याकरण के कई ग्रन्थों पर इनकी टीकाएँ चौखम्बा से प्रकाशित हैं। वैयाकरणभूषणसार पर टीका चौखम्बा वाराणसी से प्रकाशित।

  • रामप्रसाद त्रिपाठी, उ. प्र. (२० वीं शती)-पं. देवनारायण तिवारी के शिष्य “सिद्धान्तचिन्तामणि” के रचयिता। वैयाकरणभूषणसारटिप्पणी- वाराणसी से प्रकाशित। “लघुमञ्जूषा’ पर टीका-ग्रन्थ इत्यादि । लघुमञ्जूषा अथवा सिद्धान्तमञ्जूषा नागेश भट्ट (१६७५-१७४५ ई.) द्वारा प्रणीत ग्रन्थ है। नागेश भट्ट को नव्य व्याकरण युग के प्रवर्तक होने का गौरव प्राप्त है। इन्होंने इसके अतिरिक्त शब्देन्दुशेखर, परिभाषेन्दुशेखर और महाभाष्य-प्रदीप पर उद्योत इन तीन ग्रन्थों की और रचना की। आधुनिक काल में नागेशभट्ट के ग्रन्थों पर ही सर्वाधिक टीका एवं व्याख्याएँ लिखी गयीं, इसी से नागेशभट्ट की लोकप्रियता एवं उनके वैदुष्य का पता चलता है। __सिद्धान्तमञ्जूषा वाक्यपदीय के समान व्याकरण दर्शन का प्रतिष्ठापक ग्रन्थ है। इस पर आधुनिक काल में प्रणीत टीका-व्याख्यादि ग्रन्थ इन प्रकार हैं– नित्यानन्द पन्त “पर्वतीय” (१८६७-१८३१)-इन्होंने नागेशभट्ट की शेखरद्वयी शब्देन्दुशेखर एवं परिभाषेन्दुशेखर के अध्ययन-अध्यापन की परिष्कार शैली का प्रवर्तन कर व्याकरण शास्त्र की एक नयी परम्परा चलायी, जो आज तक अबाध गति से प्रवर्तित है। पर्वतीय जी ने म. म. पं. गगाधर शास्त्री जी से व्याकरण आदि शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। ये व्याकरण, न्याय, मीमांसा, वेदान्त तथा धर्मशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान थे। __ परमलघुमञ्जूषा पर “टिप्पणी’ सन् १८१८ ई.। इस ग्रन्थ में शास्त्रीय विषयों पर न्याय और मीमांसा के साथ व्याकरण सिद्धान्तों के वैभिन्च्य को पदार्थों के स्वरूप, लक्षण समन्वय आदि पर टिप्पणी देकर स्पष्ट कर दिया गया है। जहाँ नागेश ने अपने मत की पुष्टि महाभाष्य से केवल संकेत मात्र देकर की है, वहाँ पन्त जी ने भाष्यादि ग्रन्थों से उद्धरण देकर ग्रन्थकार के आशय को स्पष्ट किया है। नागेश द्वारा प्रयुक्त दीर्घ एवं अस्पष्ट शब्दों का स्पष्टीकरण सरल शब्दों में दिया गया है। सभापति उपाध्याय, उत्तर प्रदेश (१८८२-१९६४) - लघुमञ्जूषा की ‘रत्नप्रभा’ टीका। श्री सभापति उपाध्याय का जन्म बलिया जिले में हुआ था। इन्होंने काशी में पं. देवनारायण तिवारी, पं. दामोदर शास्त्री तथा शिवकुमार शास्त्री से व्याकरण तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया था। ये बिड़ला संस्कृत कालेज, वाराणसी के प्राचार्य तथा विधान परिषद् उ. प्र. के सदस्य रहे। उपाध्याय जी व्याकरण शास्त्र के उच्चतम परिष्कारों के दर्शन और शास्त्र ६३७ साथ-साथ न्याय के गम्भीर पाण्डित्य से भी मण्डित थे अतः इन्होंने प्रमुख व्याकरण ग्रन्थों पर जो व्याख्या लिखी, वह दुरूह स्थलों को स्पष्ट करने में भी अतीव सफल है। नागेशभट्टकृत लघुमञ्जूषा की ‘रत्नप्रभा’ टीका मूल ग्रन्थ की ग्रन्थियों को दूर करने का श्लाघनीय प्रयास है। यद्यपि यह व्याख्या सम्पूर्ण मूल ग्रन्थ पर नहीं है, पर आवश्यक महत्त्वपूर्ण अंशों पर उपनिबद्ध होने से नितान्त उपयोगी है। मामा किशोरी शर्मा (१९-२० वीं शती)- सर्वतन्त्रस्वतन्त्र श्री लालजी शर्मा के अनुज । परमलधुमञ्जूषा पर “अर्थप्रकाश’ नाम्नी टीका- १६२५ ई. में काशी के ज्ञानमण्डल प्रेस से मुद्रित। का कृष्णमाधव झा, बिहार (१८६८-१६८६) परमलघुमञ्जूषा की “तत्त्वप्रकाशिका” टीका। शशिनाथ झा, बिहार (२० वीं शती) ये नैयायिक शशिनाथ झा से भिन्न हैं। इनके गुरु म. म. कृष्णसिंह ठाकुर महाराज दरभंगा के वंशधर रहे हैं। परमलघुमञ्जूषा की टीका दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित।
  • पेरि सूर्यनारायण शास्त्री (२० वीं शती) -नागेशभावप्रकाशः- १६८८ ई. में प्रकाशित। यह ग्रन्थ नागेशकृत लघुमञ्जूषा के सुबर्थवाद की व्याख्या है। शैली अत्यन्त सरल और विषयोद्भासिका है। शास्त्रीय गुत्थियों को सुलझाने वाला यह अति उपयोगी ग्रन्थ है। वर “शब्देन्दुशेखर” की टीकाएं, व्याख्या-ग्रन्थ इत्यादि । अर्वाचीन युग को शेखरयुग की संज्ञा दी जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। नागेश के दोनों शेखर ग्रन्थ, शब्देन्दुशेखर एवं परिभाषेन्दुशेखर आज के व्याकरण अनुशीलन पर छाये हुए हैं। इन दोनों ग्रन्थों पर रचित विपुल टीका-सम्पत्ति इसका उज्ज्वल प्रमाण है। शब्देन्दुशेखर पर निम्न टीकाएँ उल्लेखनीय हैं - सदाशिवभट्ट धुले, पूना (१७५०-१८५२ ई.) - शब्देन्दुशेखर पर विवृति। राघवेन्द्राचार्य गजेन्द्रगडकर, सतारा (१७६२-१८५२ ई.)- शब्देन्दुशेखर पर विषमी टीका। भाऊशास्त्री धुले, नागपुर (१८२८-१६२५ ई.) शब्देन्दुशेखर पर ‘शेखरविवृतिसंग्रहः’ नाम्नी टीका। तात्या शास्त्री, महाराष्ट्र (१८४५-१६१६ ई.)- शब्देन्दुशेखर पर टीका। इन्होंने परिभाषेन्दुशेखर पर ‘भूति” नाम्नी प्रसिद्ध टीका भी लिखी है। उमापति द्विवेदी (नकछेदराम दूबे) १८५३-१६११ ई. - शब्देन्दुशेखर पर “जटा” टीका। इन्होंने भी परिभाषेन्दुशेखर पर महत्त्वपूर्ण टीका लिखी है। ताता सुब्बराय शास्त्री (२०वीं शती) - शब्देन्दुशेखर पर “गुरुप्रसादः” नामक व्याख्या ग्रन्थ। पेरि वेङ्कटेश्वर शास्त्री (२०वीं शती) - ये सुब्बराय शास्त्री के शिष्य थे। ६३८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास गुरुप्रसादशेषः नाम्नी व्याख्या - इन्होंने अपने गुरु की अवशिष्ट व्याख्या को इस नाम से पूर्ण किया। वासुदेव शास्त्री अभ्यङ्कर, पूना (१८६३-१६४२ ई.) शब्देन्दुशेखर पर ‘‘गूढप्रकाशः" टीका। इन्होंने वेदान्तविषयक ग्रन्थों सिद्धान्तबिन्दु टीका इत्यादि की भी रचना की है। ये चतुरस्रा पाण्डित्य से मण्डित विश्रुत विद्वान थे। ब्रह्मदत्त द्विवेदी, उ. प्र. (१६०६-१६८७ ई.) ये श्री हरिहरकृपालु द्विवेदी के पुत्र थे। इनका जन्म प्रयाग में हुआ था। १६३२ ई. में ये पटना के मुरारका संस्कृत कालेज में अध्यापक हुए । इनका कार्यक्षेत्र पटना और वाराणसी रहा। शब्देन्दुशेखर हलन्तनपुंसकलिङ्ग भाग तक की “राधिका" टीका-वाराणसी से १६८८ ई. में प्रकाशित। द्विवेदी जी की यह “राधिका” टीका सरल शैली में लिखी गयी सुबोध टीका है। आचार्य रामप्रसाद त्रिपाठी के शब्दों में- “यह शेखर की ग्रन्धि का भेदक ग्रन्थ” है। हर्षनाथ मिश्र (२० वीं शती) - शब्देन्दुशेखर पर टीका (अपूर्ण)। नित्यानन्द पन्त पर्वतीय (१८६७-१६२६ ई.)- ये व्याकरण, मीमांसा, धर्मशास्त्र तीनों के तलस्पर्शी विद्वान् थे। लघुशब्देन्दुशेखर पर दीपक टीका आरम्भ से अव्ययीभाव पर्यन्त - १६१८ ई.। यह टीका अर्थ और परिष्कार दोनों दृष्टियों से विशिष्ट है। इसके प्रकाशन से पं. गङ्गाराम त्रिपाठी द्वारा काशी में प्रवर्तित परिष्कार शैली का स्वरूप, जो अभी तक क्रोडपत्रों के रूप में अन्तर्निहित था, प्रथम बार विद्वानों के सामने आया। नागेश ने अधिकतर कैयट के मत का खण्डन किया है। इस टीका में उस खण्डन की युक्तियुक्तता की बड़ी सूक्ष्मतापूर्वक परीक्षा की गयी है। पर्वतीय जी के समय तक इस विषय पर पल्लवित परिष्कार शैली की कोटि-प्रकोटियां तथा पारम्परिक विचार-पद्धति का स्वरूप इस टीका से उद्घाटित होता है। “परिभाषेन्दुशेखर” पर टीका ग्रन्थ सदाशिवभट धुले महाराष्ट्र (१७५०-१८३४)-परिभाषेन्दुशेखर पर “भाट्टी" टीका। राघवेन्द्राचार्य गजेन्द्रगडकर, सतारा (१६६२-१८५२)-परिभाषेन्दुशेखर पर “त्रिपथगा” टीका। गोपालाचार्य कहाडकर महाराष्ट्र (१८-१E वीं शती) - ये नीलकण्ठ शास्त्री थाटे (१७५०-१८३४) के शिष्य थे। दूषकरदो दिनी- इस ग्रन्थ में इन्होंने विष्णुशास्त्री के उपर्युक्त ग्रन्थ “चिच्चन्द्रिका” की बहुशः आलोचना की है।
  • विष्णुशास्त्री भट्ट, पूना (१६ वीं शती) - परिभाषेन्दुशेखर पर “चिच्चन्द्रिका-टीका” इसके प्रकाशन से पूर्व ही गोपालाचार्य ने इसमें अनेक दूषणों की उद्भावना की, जिनका प्रत्युत्तर इस ग्रन्थ के द्वितीय संशोधित संस्करण में दिया गया। यागेश्वर शास्त्री, उत्तर प्रदेश (१८२८-१८६६) -परिभाषेन्दुशेखर पर “हैमवती” टीका सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से १६७५ ई. में प्रकाशित। श्री यागेश्वर शास्त्री दर्शन और शास्त्र (आस्पद-ओझा, उपाधि-वैयाकरणकेसरी) का जन्म बलिया में हुआ था। इन्होंने काशी में उस समय के मूर्धन्य वैयाकरण श्री काशीनाथ कालेकर से व्याकरण का गहन अध्ययन किया था। श्री राजाराम शास्त्री से भी इन्होंने कुछ समय अध्ययन किया। श्री बालशास्त्री इनके सतीर्थ्य थे। हैमवती" व्याकरण की प्रक्रिया-शैली में उपनिबद्ध प्रौढ़ व्याख्या है। यह सरल सुबोध शैली में नागेश के कथन का प्रत्यक्षर व्याख्यान कर उसके भीतर निहित तात्पर्य की भी विशद व्याख्या करती है। मुख्यतः प्रक्रिया-शैली का अवलम्बन करने पर भी यत्र-तत्र जहां इसमें ‘परिष्कार’ पद्धति का आश्रय लिया गया है, वहां नव्य परिष्कार-पद्धति की सूक्ष्मता दर्शनीय है। (द्रष्टव्य-“अन्तरङ्गादप्यपवादो बलीयान्” की व्याख्या)। म. म. तात्याशास्त्री ने अपनी व्याख्या “भूति’ में “हैमवती” का बहुत कुछ आश्रय लिया है, परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि “भूति” में परिष्कार-शैली का प्राधान्य है जबकि हैमवती में प्रक्रिया-शैली का। “हैमवती” में यागेशवर शास्त्री द्वारा स्वीकृत “परिभाषेन्दुशेखर” का पाठ, इसी ग्रन्थ के ऊपर “गदा” नाम्नी टीका के रचयिता वैद्यनाथ से नितान्त भिन्न है। शास्त्री जी ने अनेक स्थलों पर नागेश के कथन को अपनी प्रतिभा द्वारा “चिन्त्य” बतलाकर उसमें अरुचि दर्शायी है (द्रष्टव्य “व्यपदेशिवदेकस्मिन्” की व्याख्या) और अपने प्रकाण्ड पाण्डित्य का परिचय दिया है। हैमवती” में ग्रन्थकार ने उल्लेख किया है कि इसकी रचना ‘टिप्पणी’ द्वारा प्रसारित मोहान्धकार का तर्कों द्वारा निराकरण करने हेतु हुई, परन्तु इस “टिप्पणी” का रचयिता कौन है, यह आज भी गवेषणा का विषय है। वैद्यनाथ झा बिहार (१E वीं शती)-परिभाषेन्दुशेखर पर “गदा" टीका। इसमें अनेक परिभाषाओं में पाठ का निर्देश किया गया है। बालशास्त्री रानाडे, महाराष्ट्र (१८३६-१८८२ ई.)-परिभाषेन्दुशेखर पर “सारासारविवेकः” नाम्नी टिप्पणी। बालशास्त्री रानाडे का जन्म महाराष्ट्र प्रदेश के कोंकण जिले में चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम गोविन्द भट्ट था। श्री बालशास्त्री का मूल नाम “विश्वनाथ” था, पर बाल्यकाल में सर्वप्रिय होने के कारण ये “बाल” आख्या के द्वारा प्रसिद्ध हए। इन्होंने ग्वालियर आकर श्री बाबा शास्त्री बापट महोदय से व्याकरण, श्री कुप्पा स्वामी से मीमांसा तथा उदभट नैयायिक श्री मोर शास्त्री से न्याय शास्त्र का अध्ययन किया। इसके अनन्तर काशी जाकर तत्कालीन मुर्धन्य वैयाकरण “अपर पाणिनि” के विरुद से प्रसिद्ध पं. काशीनाथ शास्त्री तथा विद्वद्वर अपर पतञ्जलि पं. राजाराम शास्त्री से व्याकरणादि शास्त्रों का विशिष्ट अध्ययन किया। जयदेव मिश्र, बिहार (१८४४-१६२५. ई.)-परिभाषेन्दुशेखर की विजया टीका-यह व्याकरण की परिष्कार शैली का ग्रन्थ है। परिष्कार पद्धति का ज्ञान कराने हेतु यह टीका ६४० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सरल, सुबोध तथा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस टीका में तात्या शास्त्री की ‘भूति" टीका का कई स्थानों पर नामोल्लेख पूर्वक खण्डन किया गया है। भूति टीका की अपेक्षा इसकी लोकप्रियता विद्वानों में अधिक है। इन्होंने व्युत्पत्तिवाद पर “जया” टीका भी लिखी है।
  • तात्या शास्त्री, महाराष्ट्र (१८४५-१६१६ ई.)- इनका मूल नाम रामकृष्ण शास्त्री था, परन्तु ये तात्या शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध थे। इनके पूर्वजों का मूल स्थान कोंकण प्रदेश था। इनका जन्म मध्यप्रदेश के नागपुर जिले में हुआ था। इनके पिता श्री महादेव शास्त्री थे। इन्होंने वाराणसी में रहकर “बालसरस्वती” पं. बालशास्त्री रानाडे से परिष्कार सहित व्याकरण, वेदान्त तथा धर्मशास्त्र का गम्भीर अध्ययन किया था। परिभाषेन्दुशेखर पर “भूति’’ टीका-यह शास्त्री जी की वैदुष्यपूर्ण रचना है। इसमें मूल ग्रन्थ के भावों का बड़ी मार्मिक रीति से सरल शब्दों में व्याख्यान किया गया है, जिससे परिष्कार-पद्धति का भी पूर्ण निदर्शन मिलता है। गणपति शास्त्री, महाराष्ट्र (१६-२० वीं शती) - तात्याशास्त्री की उपर्युक्त “भूति” टीका की टीका। उमापति द्विवेदी (नकछेदराम दूबे), उत्तर प्रदेश (१८५३-१६११) - परिभाषेन्दुशेखर पर “जटा” नाम्नी टीका। ये बालशास्त्री युग के विद्वान थे। इनके पिता पं. हरिदत्त द्विवेदी व्याकरण, न्याय एवं वेदान्त के मूर्धन्य पण्डित थे। पं. उमापति द्विवेदी का पण्डित्य चतुरस्त्र था, पर व्याकरण तथा धर्मशास्त्र में इनका विशेष प्रवेश था। रघुनाथ शर्मा उ. प्र. (१६-२० वीं शती) पं. काशीनाथ शास्त्री के पुत्र, वाराणसीवासी विद्वान्। लघुजूटिका (परिभाषेन्दुशेखर पर परिष्कार ग्रन्थ) काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १६ में विद्याविलास प्रेस से १E२४ में प्रकाशित। गोविन्द शास्त्री (१६-२० वीं शती)-म. म. गोविन्द शास्त्री गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज कलकत्ता में प्रोफेसर थे। परिभाषेन्दुशेखर पर “लघुजटाजूट” (क्रोडपत्र) मास्टर खेलाड़ी लाला एण्ड सन्स, बनारस द्वारा सन् १६४० ई. में प्रकाशित। रामाचार्य, मध्यप्रदेश (१६-२०वीं शती) - “परिभाषेन्दुशेखर व्याख्या” १८७० ई. वेणीमाधव शुक्ल, उ. प्र. (१८५०-१६५३) - म. म. जयदेव मिश्र के शिष्य। परिभाषेन्दुशेखर पर टीका। वासुदेव शास्त्री अभ्यकर, पूना (१८६३-१६४२ ई.) परिभाषेन्दुशेखर पर “तत्त्वादर्शः नामक टीका। हर्षनाथ मिश्र (२० वीं शती) - परिभाषेन्दुशेखर पर “दुर्गा” टीका प्रथम संस्करण लाल बहादुर शास्त्री विद्यापीठ, दिल्ली से १६७८ ई. में तथा द्वितीय सं. राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, दिल्ली से १६८७ ई. में प्रकाशित। दर्शन और शास्त्र “काशिका’ से सम्बन्धित टीका-ग्रन्थ चन्द्रभान त्रिपाठी, उ. प्र. (जन्म १९२५) आप सम्प्रति प्रयाग में निवास कर रहे हैं। बलभद्रत्रिपाठी विरचित काशिकावृत्तिसार पर “सुधा” टीका-गङ्गानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ प्रयाग से १६६२ ई. में प्रकाशित २ भाग। टीकाकार डॉ. चन्द्रभानु त्रिपाठी का जन्म प्रयाग के समीपवर्ती फतेहपुर जनपद के “एकडला” ग्राम में हुआ। ये मूल ग्रन्थ ‘काशिकावृत्तिसार” के प्रणेता बलभद्र त्रिपाठी के सीधे वंशज हैं। उनके कुल में पिछली कई पीढियों से पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन अध्यापन की परम्परा रही है। अतः चन्द्रभानु त्रिपाठी द्वारा वंश परम्परा से प्राप्त पाणिनीय व्याकरण और काशिका के संस्कारों के कारण यह “सुधा” टीका अतीव स्पष्ट उपयोगी बन पड़ी है। टीकाकार द्वारा ही मूल ग्रन्थ को प्रथम बार सम्पादित भी किया गया है। “सुधा” टीका में मूल ग्रन्थ के दुर्बोध पदों और वाक्यों के अर्थ को स्पष्ट करने के साथ-साथ वृत्ति में अनुल्लिखित उदाहरणों को पूरित किया गया है, वृत्ति में जो वार्तिक नहीं लिए गये हैं, किन्तु प्रयोग में प्रचलित शब्दों के साधक हैं उन्हें लाया गया है तथा वैदिक उदाहरणों में स्वराङ्कन करके सूत्र और वृत्ति की सार्थकता दर्शायी गयी है। लघुसिद्धान्त कौमुदी - प्रसिद्ध वैयाकरण श्री भट्टोजिदीक्षित के शिष्य वरदराज ने अष्टाध्यायी के एक हजार सूत्रों को लेकर पाणिनीय व्याकरण के बोध के लिए प्रथम सोपान के रूप में लघुसिद्धान्त कौमुदी नामक एक अत्यन्त उपयोगी ग्रन्थ की रचना की। यह लघुकाय ग्रन्थ पाणिनीय व्याकरण शास्त्र में प्रवेश के लिए अत्यन्त उपादेय है। इस ग्रन्थ की अनेक टीकाएं संस्कृत तथा हिन्दी में उपलब्ध हैं। टीकाओं का विवरण निम्न है १. सदाशिव शास्त्रीकृत सुधा संस्कृत टीका। यह चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी से १९७७ में प्रकाशित है। २. धरानन्द शास्त्री कृतप्राज्ञतोषिणी’ हिन्दी टीका। यह मोतीलाल बनारसी दास, वाराणसी से १६७७ तथा १६८२ में प्रकाशित है। ३. महेश सिंह कुशवाहा कृत ‘माहेश्वरी’ हिन्दी टीका । यह दो भागों में है। प्रथम भाग में सूत्र व्याख्या और द्वितीय भाग में रूप सिद्धि है। यह चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी से १६८८ में प्रकाशित है। कातन्त्र व्याकरण इस व्याकरण का बंगाल में अधिक प्रचलन रहा। अन्नदाचरण तर्कचूडामणि, बंगाल (जन्म १८६२ ई.)- इनका जन्म नोआखाली जिले में हुआ था। ये बंगाल के मूर्धन्य विद्वान थे। ‘कातन्त्रपरिशिष्ट” के कठिन अंशों पर “कौमुदी” टीका-यह टीका इनके जीवनकाल में ही प्रकाशित और लोकप्रिय हुई। काशमीरी भाषा का व्याकरण ईश्वर कौल (१६ वीं शती) - ईश्वर कौल का जन्म संस्कृत विद्वानों की लम्बी परम्परा वाले काश्मीरी परिवार में हुआ था। १८६१ ई. में महाराजा ने इन्हें अरबी ग्रन्थों का संस्कृत तथा हिन्दी भाषा में अनुवाद करने के लिए नियुक्त किया था। १० वर्ष पश्चात् ६४२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ये संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य हुए। कश्मीरशब्दामृतम्-नाग प्रकाशन, दिल्ली से १६८५ ई. में प्रकाशित। ग्रन्थ का रचनाकाल -१६१३ वि. (१८५६ ई.) यह संस्कृत की सूत्र और वृत्ति शैली में रचित कश्मीरी भाषा का व्याकरण है। इसमें कुल ६२ सूत्र और ३३७ पृष्ठ हैं। विविध ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, बंगाल (१६ वीं शती)-गुग्धबोधव्याकरणसारः (१८५१ ई.) २- व्याकरणोपक्रमणिका (१८५१ ई.)। दीनबन्धु झा, बिहार (१६ वीं शती) - आशुतोषव्याकरणम्। अन्नदाचरण तर्कचूडामणि, बंगाल (जन्म-१८६२ ई.)-म. म. अनन्दाचरण तर्कचूडामणि व्याकरण के अतिरिक्त पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र के भी विलक्षण विद्वान् थे। इन्होंने “पुराणरहस्यम्” नामक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा तथा “धर्मशास्त्रकोष" का सम्पादन किया। इन्होंने अध्ययन तो बंगाल में किया था, परन्तु अध्यापन काशी में रहकर किया। १-धातुप्रत्ययविवेकः २-सुबरहस्यम् ३-शब्दशक्तितत्त्वम् ४-परिशिष्टधातु सूत्रम् ५-परिशिष्टकारकम् ६-परिशिष्टनाम्नां सूत्रम् ७-धातुसंग्रहः -धातुसूत्रम् :-षट्कारकविवेकः १०-नमस्कारविवेकः ११- सर्वनामसूत्रम् १२-कृबत्तिः १३-कलापपरिशिष्टम् १४- नामप्रत्ययविवेकः। द्वारकानाथ शर्मा (१६-२० वीं शती)-१-समासवाक्यावली (१६०४ ई.) २-कारक-वाक्यावली (१६०४ ई.) ३-गणकारिका (१६०३ ई.) ४- लघुसंक्षिप्तव्याकरणम् (१६०२ ई.)। वेकटरगनाथाचार्य (१९-२० वीं शती)- सारमञ्जरी (१८६७ ई.) २-लघुशब्दसर्वस्वम् ३- धातुपाठप्रकरणम् (१६०५ ई.) नारायणभट्ट पर्वणीकर (१६-२०वीं शती)- श्लोकबद्धसिद्धान्तकौमुदी। मधुसूदन तर्कालङ्कार (१६-२०वीं शती) - इंग्लैण्डीयव्याकरणसारः (१६३५ ई.) रामदास निराकारी (२०वीं शती)-ये पञ्जाब विश्वविद्यालय में दर्शनविभाग के अध्यक्ष थे। शब्ददर्शनम्-१६८६ ई. में पटियाला (पंजाब) से प्रकाशित। इस ग्रन्थ में ४५०० श्लोकों में शब्दसम्बन्धी विविध विचारों का निरूपण किया गया है।

ज्योतिष

पाश्चात्त्य सभ्यता के सम्पर्क से इस काल में अंग्रेजी भाषा में उपनिबद्ध आधुनिक खगोल और गणितविषयक ग्रन्थों के पठन-पाठन की प्रवृत्ति विकसित हुई। अंग्रेजी और संस्कृत दोनों भाषाओं पर अधिकार रखने वाले विद्वानों, बापूदेव शास्त्री, सुधाकर द्विवेदी तथा महाराष्ट्र के बापूजी केतकर ने अद्यतन खगोलीय तथा गणितीय सिद्धान्तों का भारतीय गणित सिद्धान्तों से समन्वय कर महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की। रेखागणित, बीजगणित दर्शन और शास्त्र तथा त्रिकोणमिति सम्बन्धी ग्रन्थ लिखे गये तथा दीर्घवृत्त, परिवलय आदि के गणित का विकास तेज़ी से हुआ। इधर श्री महावीरप्रसाद श्रीवास्तव ने “सूर्यसिद्धान्त” का आधुनिक सिद्धान्तों के आधार पर “विज्ञानभाष्य” लिखा है, जिसमें ग्रह-नक्षत्रादि सम्बन्धी अद्यतन अन्वेषणों से संस्कृत-जगत् समृद्ध हुआ है। दुर्गाप्रसाद त्रिपाठी, (उ.प्र. जन्म १७६८ ई.-मृत्यु १८७८ ई. लगभग) जन्मस्थान-फतेहपुर जिले के अन्तर्गत, इलाहाबाद की सीमा से सटा “एकडला’ गाँव। ये अचार्य चन्द्रभानु त्रिपाठी के पूर्वज थे। इनके पिता का नाम गोदीराम था। जातकशेखरः ग्रन्थ का रचनाकाल १८६५ वि.तदनुसार १८३८ ई.। आचार्य चन्द्रभानु त्रिपाठी की “सुरभि” नाम्नी संस्कृत टीका के साथ शक्तिप्रकाशन, इलाहाबाद से १६८३ ई. में प्रथम बार प्रकाशित यह फलित ज्योतिष का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें आयुर्दायाध्याय विशेष महत्त्वपूर्ण है। बापूदेव शास्त्री, महाराष्ट्र (१८२१ ई.-१८६० ई.) ज्योतिष शास्त्र के इतिहास में भास्कराचार्य के पश्चात् प्रगति अवरुद्ध सी हो गयी। ‘ग्रहलाघव” तथा “मकरन्द” जैसे एक-दो ग्रन्थों को छोड़कर किसी विशिष्ट ग्रन्थ का प्रणयन नहीं हुआ। अरबी तथा फारसी के प्रभाव ने भारतीय ज्योतिषशास्त्र में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं किया। किन्तु १६वीं-२०वीं शती में पाश्चात्त्य विज्ञान के सम्पर्क में आने से भारतीय ज्योतिर्विज्ञान आन्दोलित हो उठा। नवीन विज्ञान के प्रकाश में भारतीय ज्योतिष के सिद्धान्तों का पुनरध्ययन-समीक्षण प्रारम्भ हुआ, जिसमें प्रथम पदन्यास का श्रेय म.म. बापूदेव शास्त्री को जाता है। बापूदेव शास्त्री का जन्म १ नवम्बर १८२१ ई में पूना के समीप वेलणेश्वर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. सीताराम था। शास्त्री जी का प्रारम्भिक नाम पं. नृसिंह शास्त्री था, जिन्हें सब “बापू’ नाम से ही पुकारते और जानते थे। इन्होंने एल. बिल्किन्स महोदय से पाश्चात्त्य रेखागणित, पदार्थ-विज्ञान आदि पढ़ा। संस्कृत सम्बन्धी इनकी शिक्षा-दीक्षा पहले पूना में श्री पाण्डुरंग तात्या देवेकर की पाठशाला में, तदनन्तर नागपुर में पं. दुण्डिराज महोदय द्वारा हुई। भारतीय और पाश्चात्त्य ज्योतिष की दोनों धाराओं पर शास्त्री जी का गहन अधिकार हो गया, जिससे आगे चलकर संस्कृत-जगत् बड़ा उपकृत हआ। अपने जीवन-काल में कई बार यूरोपीय विद्वानों से आपका विभिन्न विषयों पर शास्त्रार्थ हुआ, जिनमें सर्वदा ये अपने विषय की सही स्थापना में सफल रहे। इनके पाडित्य से प्रभावित होकर लन्दन के विद्वानों ने सन् १८६४ ई. में इन्हें “रायल एशियाटिक सोसायटी” का मान्य सदस्य बनाया। १९८७ ई. में भारत सरकार ने सी.आई.ई. की उपाधि से तथा १८८६ में महामहोपाध्याय की उपाधि से विभूषित किया। बापूदेव शास्त्री ने सन् १८७३ ई. में चन्द्र और सूर्यग्रहण के समय का अत्यन्त शुद्ध निश्चय किया था, जिसके कारण ये काश्मीरनरेश द्वारा सम्मानित किये गये। १E३३ ई. में इन्होंने दृसिद्ध पञ्चाङ्ग का निर्माण किया जो आपके सुपुत्र पं. गणपतिदेव शास्त्री के संपादकत्व में अब तकआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास प्रकाशित हो रहा है। १६वी-२०वीं शताब्दी में नवीन गणित की जागृति के मूल कारण शास्त्री जी हैं। गणित विषयक यूरोप के उच्च सिद्धान्तों का भारतीय सिद्धान्तों के साथ इन्होंने बहुत कुछ सामञ्जस्य किया। शास्त्री जी के संस्कृत में ग्रन्थ इस प्रकार हैं १.रेखागणितम् २. त्रिकोणमितिः ३. सायनवादः४ प्राचीनज्योतिषाचार्या शयवर्णनम् ५. अष्टादशविचित्रप्रश्नसंग्रहः ५. तत्त्वविवेकपरीक्षा ६. मानमन्दिरस्थयन्त्रवर्णनम् ७. अङ्कगणितम्। इनमें इनका “त्रिकोणमितिः’ ग्रन्थ सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारतीय तथा वैदेशिक गणितज्ञों के मतों के विश्लेषण तथा नूतन विषयों के उल्लेखपूर्वक मन्थन के कारण इस ग्रन्थ का महत्त्व किसी भी गवेषणाग्रन्थ से अधिक है। शास्त्री जी के निर्देशन में ही श्रीनीलाम्बर झा ने पाश्चात्त्य पद्धति का अनुसरण करते हुए ‘गोलप्रकाशः” नामक ग्रन्थ रचा। नीलाम्बर झा, बिहार-१८३३ ई. में एक प्रतिष्ठित और विद्वान् मैथिल ब्राह्मणकुल में इनका जन्म हुआ था। ये अलवर के राजा शिवदाससिंह के आश्रित थे। पं. नीलाम्बर झा भारतीय और पाश्चात्त्य ज्योतिष दोनों के विद्वान् थे। इन्होंने ‘गोलप्रकाशः” नामक ग्रन्थ रचना की। यह ग्रन्थ पाश्चात्त्य पद्धति का अनुसरण कर लिखा गया है, जिसमें प्राचीन सिद्धान्तों की उपपत्ति तथा बहुत से प्रश्नों के उत्तर बड़ी उत्तमता तथा नवीन रीति से समझाये गये हैं। सामन्त चन्द्रशेखर, उड़ीसा इनका जन्म उड़ीसा के अन्तर्गत कटक से २५ कोस दूर खण्डद्वारा राज्य में सन् १८३५ ई. में हुआ था। ये व्याकरण, स्मृतिशास्त्र, पुराण, न्याय, काव्य और ज्योतिष के मर्मज्ञ विद्वान् थे। वेध द्वारा ग्रहों को निश्चित कर इन्होंने “सिद्धान्तदर्पण” नामक ज्योतिष का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा। वेङ्कटेश रामकृष्ण (बापूजी) केतकर (जन्म-१८५४ ई.)- ये महाराष्ट्र के “केतकी” नामक स्थान के निवासी और आधुनिक काल के मूर्धन्य ज्योतिर्विद् थे। इन्होंने कई वर्षों के गहन चिन्तन और शोध के परिणामस्वरूप ज्योतिषविषयक कई ग्रन्थों का प्रणयन किया, जिनमें निम्न प्रमुख हैं १-ज्योतिर्गणितम्-यह बापूजी के २० वषों के अगाध तपोमय चिन्तन की देन है इससे ३००० वर्ष पहले और बाद की ज्योतिष सम्बन्धी गणना बिलकुल सूक्ष्मता पूर्वक सटीक की जा सकती है। रचनाकाल - १८६८ ई. आर्यभूषण प्रेस, पूना से १६३७ ई. में मुद्रित। २. केतकीग्रहगणितम्- रचनाकाल- १८६६ ई. । ३. वैजयन्तीपञ्चाङ्गगणितम् १६०० ई. (रचनाकाल)४. केतकीपरिशिष्टम् - १६१६ ई. में रचित । ५, भारतभूमडण्ल-सूर्यग्रहणम् १६२१ ई, में रचित। ६, सौरायब्राह्मतिथिगणितम्-१६२७ ई. में रचित। ७. सोपपत्तिग्रहगणितम्-१६१४ ई. रचित। ८. नक्षत्रविज्ञानम्- १६१६ ई. में रचित। ६. गोलद्वयप्रश्नविमर्शः - १E१८ ई. में रचित। १०. पञ्चाङ्गसंशोधनम् नं. ३- १६२३ ई. दर्शन और शास्त्र रचित। ११, गोलत्रयप्रश्नविमर्शः - १६२४ ई. में रचित। मा इन ग्रन्थों को न केवल भारतवर्ष अपितु इंग्लैण्ड, हालैण्ड, फ्रांस, अमेरिका आदि पाश्चात्य देशों में भी बड़ी प्रंशसा मिली है। डी.वी. केतकर (बापूजी केतकर के सुपुत्र)- १. परिमलवासनाभाष्यम्- डी.वी. केतकर ने बापूजी के ‘केतकीग्रहगणितम्" तथा “केतकीपरिशिष्टम्” पर सम्मिलित रूप से यह भाष्य लिखा है। जो आधुनिक उच्च गणितीय सिद्धान्तों पर आधारित है। २. शास्त्रशुद्धायनांशनिर्णयः- यह ग्रन्थ भी बड़ा प्रामाणिक और महत्त्वपूर्ण है। सुधाकर द्विवेदी, उत्तर प्रदेश, (१८६० ई.-१६१० ई.)- म.म. पं. सुधाकर द्विवेदी का जन्म काशी से एक कोस दूर स्थित खजुरी ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. कृष्णदत्त द्विवेदी था। इन्होंने संस्कृत कालेज, वाराणसी में पं. देवकृष्ण मिश्र से ज्योतिष शास्त्र की शिक्षा पायी थी। अध्ययन के पश्चात् १८८६ ई. से जीवन पर्यन्त इन्होंने संस्कृत कालेज के ज्योतिष के प्रधान आचार्य पद को सुशोभित किया। प्रारम्भ से ही द्विवेदी जी अनुपम वैदुष्य के धनी थे। अध्ययन काल में ही इन्होंने म.म. बापूदेव शास्त्री के ग्रन्थ में की गई अशुद्धि का संशोधन करने का महान कार्य किया था। १८८७ ई. में सरकार ने इन्हें म.म. की उपाधि से विभूषित किया। पं. सुधाकर द्विवेदी ने भारतीय ज्योतिष और पाश्चात्य ज्योतिष के सम्मिलन का जो कार्य पं. बापूदेव शास्त्री द्वारा आरम्भ किया गया था, उसे आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। अर्वाचीन युग के ज्योतिषशास्त्रविदों में उनका स्थान अप्रतिम है। यद्यपि पं. नीलाम्बर झा तथा पं. बापूदेव शास्त्री के ग्रन्थों में भी भारतीय, पाश्चात्य ज्योतिष के सम्मिलन का प्रयास दृष्टिगोचर होता है पर इनके ग्रन्थों में वैसी समन्वयात्मिका तथा गवेषणात्मिका प्रवृत्ति नहीं मिलती जो सुधाकर जी के ग्रन्थों में प्राप्त होती है। चन्द्रशृङ्गोन्नतिसाधन के विषय में लन-भास्कर-गणेश-दैवज्ञ ज्ञानराज-कमलाकर आदि प्रसिद्ध दैवज्ञों तथा पं. बापूदेव शास्त्री जी के मत का निराकरण करते हुए युरोपीय ज्योतिः शास्त्र की विधि से जो उन्होने चन्द्रश्रृङ्गोन्नतिसाधन की युक्तियुक्तता प्रदर्शित की है, वह दर्शनीय है। उस पर प्रशंसनीय तथ्य यह है कि यह ग्रन्थ उन्होंने केवल बीस वर्ष की अवस्था में प्रणीत किया। १८ वर्ष की अल्पायु में ही इन्होंने दीर्घवृत्त नामक ग्रन्थ की रचना की थी, जिसपर इन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि प्राप्त हुई। आपने ज्योतिष सम्बन्धी विपुल साहित्य के प्रणयन तथा सम्पादन का कार्य किया, जिसमें से कुछ प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-१. दीर्घवृत्तलक्षणम् प्रथम संस्करण ब्रजभूषणदास एण्ड कम्पनी बनारस द्वारा सन् १८८१ में प्रकाशित, द्वितीय संस्करण पं, बलदेव मिश्र की टिप्पणी के साथ मास्टर खिलाड़ी एण्ड सन्स, वाराणसी द्वारा सन् १E४३ ई. में तथा तृतीय संस्करण संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा १६८१ ई. में प्रकाशित २. वास्तवचन्द्रश्रृङ्गौन्नतिधनम् ३. भूभमरेखानिरूपणम् ४. ग्रहणे छादकनिर्णयः ५. यन्त्रराजः ६. प्रतिमाबोधकः ७. धराभमे प्राचीननवीनयोर्विचारः ८. पिण्डप्रभाकरः ६. गणकतरङ्गिणी आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास - यह कालकम से लिखा गया ज्योतिष शास्त्र का इतिहास है। जिसमें ५०० ई. से १५०० ई. तक के ज्योतिषियों तथा उनकी रचनाओं का प्रामाणिक विवरण है। १०. धुचरचारः ११. समीकरणमीमांसा १२. दिङ्मीमांसा। सम्पादित ग्रन्ध्र- १, पञ्चसिद्धान्तिका २. सिद्धान्ततत्त्वविवेकः ३. शिष्यधीवृद्धितन्त्रम् ४. करणकुतूहलवासना ५. लीलावती ६. बृहत्संहिता ७. ब्रह्मस्पुटसिद्धान्त-८. ग्रहलाघवः ६. त्रिंशिका १०. करणप्रकाशः ११. बीजगणितम् १२. सिद्धान्तशिरोमणिः १३. सूर्यसिद्धान्तः १४. चलनकलन १५. चलराशिकलन १६. अंकगणित का इतिहास १७. वेदाङ्ग ज्योतिष पर भाष्य। मुरलीधर झा, बिहार (१८६६ ई.- १६२E ई.)- इनका जन्म बिहार प्रदेश के दरभंगा जिला के अन्तर्गत “श्यामसिद्धव” ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री चानन झा था। इन्होंने भी काशी में ज्योतिष के मूर्धन्य विद्वान पं. सुधाकर द्विवेदी के शिष्यत्व में रहकर ज्योतिष का गहन अध्ययन किया था। ज्योतिषशास्त्र की इनकी अगाध विद्वत्ता से प्रभावित होकर १६०६ ई. में गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज के प्राचार्य श्री थीवो ने इन्हें ज्योतिषविभाग में प्रधानाचार्य नियुक्त किया था। तब से लगातार १६२७ ई. तक, २१ वर्षों तक अध्यापन-कार्य करने के पश्चात् इन्होंने अवकाश ग्रहण किया। सन् १६२२ ई. में इन्हें महामहोपाध्याय उपाधि द्वारा विभूषित किया गया। इनकी ये रचनाएँ उल्लेखनीय हैं- १. वेदाज्योतिष के ऊपर “सुधाकर भाष्य” पर “लघुविवरण” नाम की टीका। २. “सिद्धान्ततत्त्वविवेक” का समालोचनात्मक संस्करण। ३. लीलावती" तथा “बीजगणित" की उपपत्ति तथा टिप्पणी। त्रिकोणमिति - म.म. बापूदेव शास्त्री की इस कृति का विशिष्ट टिप्पणी के साथ सम्पादन। 21 इसके अतिरिक्त “सिद्धान्तशिरोमणि के गणिताध्याय और गौलाध्याय के अशुद्ध पाठों का भी इन्होंने संशोधन किया। मुरलीधर झा जी ने सिद्धान्तज्योतिष के कठिन-ग्रन्थों पर स्थान-स्थान पर जो टीका-टिप्पणी लिखी है, उससे उनकी तलस्पर्शिनी विद्वत्ता का परिचय मिलता है। वराहमिहिर रचित ‘बृहत्संहिता” की कीटभक्षितजीर्ण-शीर्ण पाण्डुलिपि से झा जी ने अपनी प्रतिभा के बल पर सुसम्पादित संशोधित संस्करण निकाला जो उनके प्रकाण्ड वैदुष्य का प्रमाण है।

  • बलदेव मिश्र-बिहार (१८६६ ई.) पं. बलदेव मिश्र का जन्म सन् १८६६ ई. में बिहार प्रान्त के सहरसा जिले के बनगाँव नामक सुप्रसिद्ध ग्राम में हुआ था। ये भी पं. सुधाकर द्विवेदी की शिष्य-मण्डली में से एक थे। इन्होंने १६२२ ई. से लेकर १६३० ई. तक काशी विद्यापीठ में गणित का अध्यापन किया। कुछ समय गया जिले में संस्कृत महाविद्यालय के अधीक्षक पद का कार्य करने के उपरान्त सन् १९४० ई. से १६५१ ई. तक सरस्वती-भवन पुस्तकालय में सूची-निर्माणकर्ता (कैटेलागर) का कार्य तथा तदुपरान्त अवकाश ग्रहण करने तक पटना के काशी प्रसाद जायसवाल रिसर्च इन्स्टीट्यूट में दुर्बोध दर्शन और शास्त्र ६४७ हस्तलिपियों के वाचन का कार्य किया। इनका लिखा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ “आर्यभटीय की संस्कृत टीका है, जिसका प्रकाशन बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना द्वारा सन् १९६६ ई. में किया गया है। “आर्यभटीय” जैसे स्वतन्त्र नवीन विचारों से संचलित ग्रन्थ की टीका करना अत्यधिक बुद्धिसाध्य कार्य है, पर बलदेव मिश्रजी इस कठिन कार्य में सर्वदा सफल हुए हैं। इसके अतिरिक्त इनके अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इस प्रकार हैं-१. त्रिकोणमिति", २. भास्करीय बीजगणित पर टिप्पणी। इन्होंने अपने गुरु पं. सुधाकर द्विवेदी के अनेक ग्रन्थों-दीर्घवृत्त, चलन-कलन, चलन-राशि-कलन आदि का सम्पादन कार्य भी किया। रामयल ओझा, बिहार - (१६३८ ई. में मृत्यु)-पं. रामयत्न ओझा का जन्म बिहार प्रदेश के छपरा मण्डलान्तर्गत मांझी ग्राम में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में हुआ था। इन्होंने काशी में पं. अयोध्यानाथ शर्मा से फलित ज्योतिष तथा म.म. सुधाकर द्विवेदी से सिद्धान्त का विधिवत् अध्ययन किया । ज्योतिष शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान श्री ओझा को महामना मालवीय जी ने हिन्दूविश्वविद्यालय के संस्कृत महाविद्यालय में ज्योतिष विभाग का अध्यक्ष बनाया। ओझा जी का “फलितविकासः” नामक मौलिक ज्योतिष के सम्बन्ध में उपयोगी गवेषणापूर्ण ग्रन्थ है। बलदेवदत्त पाठक, उत्तर प्रदेश (जन्म १८७३ ) इनका जन्म गोरखपुर जनपद के देवापरा गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम रामदीहल पाठक था। इन्होंने काशी में पं. सुधाकर द्विवेदी से ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन कर विशेषज्ञता प्राप्त की थी। पाठक जी ने “मण्डपकुण्डसिद्धिः” नामक ग्रन्थ की रचना की। यह पुस्तक प्रकाशित है। इन्होंने “नाडीवलययन्त्र” का निर्माण किया था। आज भी यह यंत्र काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ज्योतिषशास्त्र की जानकारी के लिए प्रयुक्त होता है। सीताराम झा, बिहार (१८६० ई.-१६७५ ई.) पं. सीताराम झा का जन्म मिथिला के दरभंगा जिले के चौगमा" ग्राम में सन् १८६० ई. में हुआ था। इन्होंने कलकत्ते से ज्योतिषतीर्थ तथा राजकीय संस्कृत कालेज से ज्योतिषाचार्य की पदवी प्राप्त की। १६२१ ई. में ये काशी की “संन्यासी पाठशाला” में ज्योतिष के अध्यापक नियुक्त हुए तथा ४१ वर्षों तक अध्यापन के पश्चात् १९६२ ई. में विद्यालय के अध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण किया। पं. सीताराम झा ज्योतिष के तीनों स्कन्धों-गणित, फलित तथा रमल के मर्मज्ञ विद्वान् थे। इन्होंने प्राचीन ग्रन्थों की व्याख्या तथा उपपत्ति लिखने के अतिरिक्त मौलिक ग्रन्थों का भी निर्माण किया। इनके प्रमुख संस्कृत ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं-पाराशर-होराशास्त्र, जो ग्रन्थ का बड़े परिश्रम से सम्पादित विमर्शात्मक संस्करण है। मौलिक रूप से लिखे गये ग्रन्थों में कतिपय ग्रन्थों के नाम ये हैं-गणितसोपान, गणितचन्द्रिका, गोलपरिभाषा, गोलबोथ, जन्मपत्रविधान, ज्योतिषशास्त्र प्रयोजन आदि। दयानाथ झा (१६६५ ई. में मृत्यु)-विमण्डलवक्रविचार:- मिथिलाशोधसंस्थान, दरभंगा से प्रकाशित। ६४८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास चन्द्रभानु पाण्डेय, उ.प्र. (9E-२०वीं शती)-ये सरस्वती भवन अनुसन्धान केन्द्र (वाराणसी) से जुड़े रहे और उसी रूप में उन्होंने ग्रन्थ का सम्पादन किया। बीजगणितावतंसः पर टिप्पणी-लधुग्रन्थरत्नप्रभावली-५ में ‘सारस्वती सुषमा" में १६५६ ई. में प्रकाशित। मूल ग्रन्थ सन् १३५० ई. में श्रीनारायण पण्डित द्वारा विरचित है। इसका पहली बार सम्पादन और प्रकाशन चन्द्रभानु पाण्डेय जी द्वारा हुआ है। पाण्डेय जी ने प्रचलित अर्वाचीन बीजगणित पद्धति के अनुसार इसपर विशद किन्तु सरल टिप्पणी लिखी है। उपपत्तियाँ तथा साधन आदि सब यथास्थान दिये गये हैं, जिससे यह टिप्पणी विषय को स्पष्ट करने में सर्वथा समर्थ और उपयोगी हो गयी है। कन्हैयालाल शर्मा “दीक्षित, उ.प्र. (१E-२०वीं शती) हथुआ राज्य के महाराज के आश्रित। रत्नाभरणम्-काशी के हितचिन्तक प्रेस से १६३४ ई. में मुद्रित। श्री दुर्गादत्त त्रिपाठी द्वारा सम्पादित और प्रकाशित । ग्रन्थ का रचनाकाल १६८५ वि. तदनुसार १६२८ ई.। यह फलित ज्योतिष का अत्यन्त उपयोगी ग्रन्थ है। केवल कुण्डली के आधार पर भूत, भविष्य, वर्तमान का आशु उत्तर देने तथा बालकों को सुलभ तथा स्पष्ट फल कहने में योग्य बनाने हेतु इस ग्रन्थ की रचना की गयी है। दुर्गादत्त त्रिपाठी, उ.प्र. (१६-२०वीं शती)-ये कन्हैयालाल शर्मा के समकालीन थे। इनके पिता का नाम श्री रणवीर दत्त त्रिपाठी और गुरु का नाम श्रीमाधव शास्त्री था। ये काशी में रामघाट पर रहते थे। “रत्नाभरणम्” पर “श्रीनाथ” नाम्नी टीका-मूल ग्रन्थ के साथ हितचिन्तक प्रेस, काशी से १६३४ ई. में मुद्रित। दुर्गाप्रसाद द्विवेदी (१६-२०वीं शती)-उपाधि-महामहोपाध्याय। ये जयपुर महाराज के समाश्रित रहे। उपपत्तीन्दुशेखरः- भास्कराचार्यकृत सिद्धान्तशिरोमणिकी परिष्कारमयी टीका, अहमदाबाद से १३६ ई. में प्रकाशित । इसमें मूल ग्रन्थ के गणित की सभी उपपत्त्यिां दी गयी हैं। बापूदेव शास्त्री द्वारा किये गये विशेष परिष्कारों का भी इसमें समावेश है। यह ज्योतिषीय गणित का प्रौढ और उपयोगी ग्रन्थ है। महिला सीताराम शास्त्री शेंडे (२०वीं शती) - ये दक्षिण भारत के ब्रिटिश राज्यकालीन और मोर (राज्य) के निवासी थे। इन्होंने नित्यानन्द पर्वतीय जी (१८६७-१६३३) से व्याकरण, वेद, मीमांसा और धर्मशास्त्र का गम्भीर अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त ये “खगोल-विज्ञान”” के भी बहुत अच्छे ज्ञाता थे। इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में वर्षों तक अध्यापन कार्य किया और प्रवाचक के पद से सेवा-निवृत्त हुए। पं. सीताराम शास्त्री जी को आकाशीय तारों एवं नक्षत्रों का बहुत अच्छा ज्ञान था, इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ “वेदार्थविचार” है। इसमें खगोल की दृष्टि से ऋग्वेदीय ऋचाओं की व्याख्या की गयी है। “वसन्त-सम्पात” के सिद्धान्त को अभिलक्षित कर तदुपयोगी मन्त्रों की व्याख्या द्वारा निर्वचन करने की मौलिकता (नक्षत्रविद्या) इस ग्रन्थ की विशेषता है। निर्वचन करने की शैली यास्क के निरुक्त का अनुगमन करती है। यह एक महत्त्वपूर्ण प्रौढ रचना है। दर्शन और शास्त्र ६४६ महावीरप्रसाद श्रीवास्तव (२०वीं शती)-सूर्यसिद्धान्त पर “विज्ञानभाष्य” अद्यतन खगोलीय एवं गणितीय गवेषणाओं से परिपूर्ण ग्रन्थ। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त गोदवर्मराज कृत “गोलाध्यायः”, योगध्यान मिश्रकृत “क्षेत्रतत्त्वदीपिका” (१८३६ ई.) हट्टन के “ए फोर्स इन मैथमेटिक्स” का अनुवाद । कुट्टमत्तु कुंजुन्नि कुरुप्प (१८१३-८५) कृत “श्री चक्रगणितम्”, इलत्तूर रामस्वामी (१८२४-१६०७) कृत “क्षेत्रतत्त्वदीपिका” (१८२३-२८) (ज्यामिति पर ग्रन्थ,) रघुनाथ कृत “दृग्गणितम्” (१८७७ ई.) जयदेव मिश्र (१८५४-१६२५) कृत ‘वास्तुपद्धतिः", पटइटत्त शंकरन मूषत (१८६६-१६५५) कृत “अंकविद्या” यज्ञेश्वर दीक्षित कृत ‘गोलानंदानुक्रमणिका" (१८४२ ई.) लाला पंडितकृत प्रश्नरत्नावली (१८६५) ए. आर. राजराजवर्म कोइतम्बुरान कृत “करणपरिष्करण” तथा पञ्चाङ्गशुद्विपद्धतिः" (१६२० ई.) दीनानाथ व्यासकृत “सर्वसंग्रहः, रामदयालु पण्डितकृत प्रश्नशिरोमणिः (१८७४ ई.) सुन्दरवीरराघव कृत ख्यादिचक्रम, ख्यादिस्फुटम, ख्यादिगतिभेदम्, गोविन्द आप्टेकृत सर्वानन्दलाघवम्’ तथा सर्वानन्दकरणम्, महादेव पाठक कृत “जातकतत्त्वम्” आदि गणित तथा ज्योतिष के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं।

आयुर्वेद

१६ वी-२० शताब्दी का युग भारतीय आयुर्वेद पर पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान के प्रभाव का युग है। १८२४ ई. में कलकत्ता में संस्कृत कालेज की स्थापना हुई जिसका मुख्य उद्देश्य प्राच्यविद्या के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का भी प्रचार करना था। १८२७ ई.से वहाँ भारतीय और यूरोपीय चिकित्सा की कक्षाएँ प्रारम्भ हुईं। वहाँ अस्थियों के अध्ययन के साथ-साथ पशुओं का छेदन भी कराया जाता था। १८३५ ई. में कलकत्ता मेडिकल कालेज की स्थापना हुई। इसके परिणामस्वरूप एलोपैथी के ज्ञान का जो प्रचार-प्रसार हुआ, उससे भारतीय आयुर्वेद अछूता न रह सका। १E वीं शती के अन्त में कविराज विनोदलाल सेनगुप्त ने “आयुर्वेद-विज्ञानम्” का प्रणयन किया, जिसका द्वितीय खण्ड कलकत्ता से १८८७ ई. में प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ में प्राचीन-नव्य विचारधाराओं का संगमन बड़े स्पष्ट तथा प्रभावी रूप में देखने को मिलता है। इस ग्रन्थ की शैली प्राचीन गुरु-शिष्य संवाद-पद्धति पर आधारित है, परन्तु इसमें नवीन तथ्यों को आयुर्वेदीय रूप देकर उन्हें आत्मसात् किया गया है। अनेक रोगों के आधुनिक नामों को संस्कृत में अनूदित कर उनका विवेचन किया गया है। रोगों के निदान में आधुनिक विधियों का सहारा लेने को कहा गया है, परन्तु चिकित्सा की पद्धति तथा औषधि आयुर्वेदीय ही है। यह ग्रन्थ आगे चलकर बीसवीं शती के गणनाथ सेन आदि आयुर्विदों के लिए पथ-प्रदर्शक बना। गणनाथ सेन इस समन्वयवादी विचारधारा के अग्रणी नेता बने। इनके “प्रत्यक्षशारीरम” के प्रकाशन (१९१३ ई.) से आधुनिक काल में आयुर्वेद के शरीरशास्त्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। इनकी मान्यता थी कि जहाँ प्रत्यक्षविरोध हो वहाँ, तथा सूत्रशैली में निर्दिष्ट शास्त्रीय विषयों का विशदीकरण आधुनिक शारीरशास्त्र के तथ्यों के अनुसार करना चाहिये। किन्तु इन नवीन ६५० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास विचारों की परिपोषक विचारधारा का विरोध भी हुआ। बंगाल में इनकी विचारधारा का विरोध कविराज ज्योतिषचन्द्र सरस्वती ने, काशी में डॉ. भास्कर गोविन्द घाणेकर ने किया। घाणेकर का कथन था कि आधुनिक विज्ञान के प्रभाव में आकर प्राचीन आर्ष ग्रन्थों पर आक्षेप करना उचित नहीं, बल्कि उनका गहन विचारपूर्वक समाधान किया जाना चाहिए। उन्होंने इसी शैली पर सुश्रुतसंहिता के शारीरस्थान पर व्याख्या लिखी, जो विद्वानों द्वारा समादृत हुई। कारण यह था कि एक ओर जहाँ द्रुत गति से मेडिकल कालेजों की स्थापना हो रही थी, वहाँ दूसरी ओर गुरु-परम्परा से आयुर्वेद की शिक्षा भी चल रही थी। मुर्शिदाबाद इस प्रकार की आयुर्वेदीय शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र था। र १९५० के आस-पास सारे भारत के आयुर्वेदिक कालेजों में प्राचीन एवं आधुनिक दोनों के मिश्रित और विषयप्रधान पाठ्यक्रम पढ़ाये जाते थे। संहितापद्धति का क्रम नहीं रहा। किन्तु, ज्योतिषचन्द्र सरस्वती जैसे वैद्यों का एक वर्ग जो प्राचीन पद्धति का समर्थक था ओर मिश्र पद्धति को हानिकर मानता था उसके आग्रह से विद्यापीठों में शुद्ध आयुर्वेद का पाठ्यक्रम एवं उसमें परीक्षाव्यवस्था चलती रही। इन परस्पर विरोधी दो विचारधाराओं से लाभ यह हुआ कि एक ओर पाश्चात्य ज्ञान समन्वित मिश्र-पद्धति से आयुर्वेद का भण्डार समृद्ध हुआ तथा इसे अनुसन्धानात्मक दृष्टि मिली, तो दूसरी ओर शुद्ध आयुर्वेद ने विश्व का ध्यान आयुर्वेद के महत्त्व की ओर आकर्षित किया। १९६० के बाद नव्य विज्ञान की अनुसन्धानात्मक दृष्टि से देशी चिकित्सापद्धतियों को अग्रसर करने की दिशा में प्रयास हुए। १६६६ में इस हेतु केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्रीय परिषद् की तथा १६७१ में भारतीय चिकित्सा-परिषद् की स्थापना हुई। स्वास्थ्य सेवाओं में देशी चिकित्सा को एलोपैथी के समान महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। इससे आयुर्वेद का शिक्षण-अनुसन्धान प्रगत हुआ और विदेशियों का ध्यान भी इस ओर आकृष्ट होने लगा। आधुनिक काल में आयुर्वेदीय वाङ्मय में निम्न नयी प्रवृत्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं १. आधुनिक रोगों, औषधियों, शरीर के अगों के नामों को संस्कृत में रूपायित कर उनका ग्रहण किया गया। २.रोग-निदान के लिए आधुनिक परीक्षण-पद्धतियों स्टेथोस्कोप से शब्दश्रवण आदि को मान्यता दी गयी। शारीरज्ञान के लिए शवच्छेद तथा शस्त्रादिकर्म के लिए प्रत्यक्षाभ्यास को स्वीकारा गया। ३. पहले ग्रन्थों में सब विषय मिलेजुले रहते थे, इस काल में विषय-वस्तु को विभाजित कर उसे सुसम्बद्ध क्रम से प्रस्तुत किया गया। राजेश्वर शास्त्री का “स्वस्थवृत्तसमुच्चय” इसका उदाहरण है। ४. शास्त्रीय योगों में युगानुरूप संशोधन-परिवर्धन किये गये। ५.जो लेखक स्वयं वैद्य थे, उन्होंने अपने अनुभवों को भी ग्रन्थों में संयोजित किया। इस प्रकार व्यावहारिक प्रामाणिकता से आयुर्वेद परिपुष्ट हुआ। दर्शन और शास्त्र ६५१ इस युग में जो वाङ्मय सृजित हुआ, उसके प्रमुख प्रणेताओं और उनकी रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं गुरुपद हालदार शर्मा, कलकत्ता (१८७६ ई. में जन्म)-ये मूलतः दार्शनिक थे। इन्होंने वेद और दर्शन से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों की रचना की, जिनमें शतरुद्री की सरल टीका, सप्तशती की वृत्ति (दर्शनमूलक) सनत्सुजातीय की बंगला टीका आदि उल्लेखनीय हैं। बृद्धत्रयी- यह इनका सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें चरक, सुश्रुत और वाग्भट आयुर्वेद की इस वृद्धित्रयी के कृतित्व पर महत्त्वपूर्ण और प्रामाणिक विचार किया गया है। प्रथम बार न्यू महामाया प्रेस कलकत्ता से १६५५ ई. में मुद्रित। गङ्गाधर राय (१७६६-१८५५) - इनका कार्यक्षेत्र मुर्शिदाबाद (बंगाल) रहा। इन्होंने आयुर्वेद के अतिरिक्त तन्त्र, व्याकरण, साहित्य, दर्शन, उपनिषद, धर्मशास्त्र, ज्योतिष आदि विषयों पर भी ग्रन्थ लिखे। इनकी रचनाओं की कुल संख्या ७६ बतायी जाती है, जिनमें आयुर्वेद से सम्बन्धित निम्नवत् हैं १. “चरकसंहिता” की “जल्पकल्पतरु” व्याख्या- यह अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण व्याख्या है, विशेषतः दार्शनिक विषयों का इसमें गंभीर विवेचन किया गया है। चक्रपाणि टीका के साथ एक संस्करण कलकत्ता से १६२७ ई. में प्रकाशित । २. परिभाषा ३. भैषज्यरामायणम् ४. आग्नेयायुर्वेदव्याख्या ५. नाडीपरीक्षा ६. राजवल्लभीय द्रव्यगुणविवृतिः ७, भास्करोदयम् . मृत्युञ्जयसंहिता ६. आरोग्यस्तोत्रम् १०- आयुर्वेदसंग्रहः ११. प्रयोगचन्द्रोयम्। परमेश्वर पण्डित (१६ वीं शती) - हृदयप्रियः-त्रिवेन्द्रम् के गवर्नमेण्ट प्रेस से १६३१ ई. में मुद्रित । अनन्तशयन संस्कृत ग्रन्थावली-१११ । ग्रन्थ का रचनाकाल १८६४ ई.। यह वाग्भटाचार्य के “अष्टाङ्गहृदय"पर आधारित आयुर्वेद का ग्रन्थ है जिसमें प्राच्य एवं नवीन लेखकों के चिकित्साशास्त्र सम्बन्धी विचारों को अद्यतन व्यावहारिक-विज्ञान की दृष्टि से परीक्षित किया गया है और उन्हें सरल कारिकाओं में उपनिबद्ध किया गया है। इसमें ५ खण्ड हैं। प्रत्येक खण्ड कई अध्यायों में विभक्त है। “सुखसाधक” इनका वैद्यक विषयक अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। कृष्णराम भट्ट (१८४८-१८६७) - ये जीवराम भट्ट के ज्येष्ठपुत्र थे। इन्होंने अपने पिता से ही वैद्यक का अध्ययन किया था। ये आयुर्वेद के उद्भट विद्वान् तथा यशस्वी चिकित्सक थे और जयपुर के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय में आयुर्वेद के प्राध्यापक रहे। आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ “भैषज्यमणिमाला” (सिद्धभेषजमणिमाला) है। इसमें शास्त्रीय तथा अनुभूत (विशेषतः जयपुर परम्परा में प्रचलित) योगों का संकलन है। यह आमुख, द्रव्य, चित्र, उपाय (चिकित्सा) और रसायन (बाजीकरण) इन पाँच गुच्छों में विभक्त है। यह ग्रन्थ “मणिच्छटा” नामक व्याख्या सहित जयपुर से १६६८ ई. में प्रकाशित है। इसके अतिरिक्त भट्ट जी ने आयुर्वेद विषयक ग्रन्थ “विद्ववैद्यतरङ्गिणी” की भी रचना की। कविराज विनोदलाल सेनगुप्त, बंगाल (१६ वीं शती) - इन्होंने १६ वीं शती के अन्त ६५२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास में “आयुर्वेदविज्ञानम्” नामक संहितात्मक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ का द्वितीय खण्ड १८८७ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। इसके पहले बंगला अनुवाद के साथ इसका प्रकाशन हो चुका था। यह ग्रन्थ “भाव-प्रकाश” तथा अन्य प्राचीन-नवीन ग्रन्थों का आधार लेकर लिखा गया है। १६ वीं शती तक एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति इस देश में व्यापक प्रचार-प्रसार पा चुकी थी (१८३५ ई. में कलकत्ता मेडिकल कालेज की स्थापना हो चुकी थी) अतः इस ग्रन्थ में उस पद्धति के तत्कालीन आधुनिकतम ज्ञान का भी सन्निवेश है। उस ज्ञान को आयुर्वेद के भीतर आत्मसात् करने का प्रयत्न किया गया है। इसके लिए कई रोगों के आधुनिक नामों को संस्कृत रूप देकर उनका वर्णन किया गया है परन्तु चिकित्सा आयुर्वेदीय ही है। कई अन्य तन्त्रोक्त उपयोगी औषधियों का भी इसमें समावेश कर लिया गया है। इस ग्रन्थ की विषय-वस्तु चार स्थानों में विभाजित है १. सूत्रस्थान २. शरीरस्थान ३. द्रव्यस्थान ४. निदान-चिकित्सितस्थान । प्रथम स्थान में कुल ७८ अध्याय, द्वितीय में १५ तृतीय में ४१ तथा चतुर्थ में ८२ इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ में कुल २१६ अध्याय हैं। बीसवीं शती के लिए यह ग्रन्थ पथ-प्रदर्शक बना, जिसके आधार पर गणनाथ सेन आदि आयुर्विदों ने अपने ग्रन्थ लिखे। पी. एस. वारियर, केरल (१८६६ ई.) वैद्यरत्न डॉ. पी. एस. वारियर आर्य वैद्यशाला, कोट्टिकल के संस्थापक थे। इन्होंने दक्षिण भारत में शारीरविज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। १. अष्टाङ्गशारीरम्-१६२५ ई., इसमें ८ अध्याय हैं। २. बृहच्छारीरम्- १६४२ ई.। यह पश्चात्य चिकित्साशास्त्र पर आधारित ग्रन्थ है। इनमें कुल १२ अध्याय हैं। ३. अनुग्रहमीमांसा-पी. एस. वारियर तथा व्ही. एन. नायर द्वारा संयुक्त रूप से विरचित ग्रन्थ। यह जन्तुरोगों की चिकित्सा से संबद्ध है। १६३८ ई. में कलकत्ता से मुद्रित।

  • योगीन्द्रनाथ सेन (१८७१-१E१८)-ये कविराज गंगाधर राय के शिष्य म. म. कविराज द्वारकानाथ सेन के पुत्र थे। चरकसंहिता पर इन्होंने “चरकोपस्कार” नामक व्याख्या लिखी, जो १६२० ई. में अपूर्ण प्रकाशित हुई थी। स्वामी लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर से इसका पुनः प्रकाशन हुआ है। इसमें सुबोध और व्यावहारिक ढंग से आयुर्वेदपरक विषयों का प्रतिपादन किया गया है। । हाराणचन्द्र चक्रवर्ती-(देहावसान १६३५ ई.) ये कविराज गङ्गाधर के शिष्य थे। इन्होंने “सुश्रुतसंहिता” पर “सुश्रुतार्थसंदीपन” नामक भाष्य लिखा। १६०८ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित। यह टीका सरल तथा बोधगम्य है। शारदाचरण सेन-“शारदा” व्याख्या। यह “माधवनिदान” की व्याख्या है। प्रकाशक -कविराज पी. के. सेन, बनारस, १६३२ ई.। कविराज गणनाथसेन (१८७७ ई.-१६४५ ई.)- म. म. कविराज गणनाथ सेन का दर्शन और शास्त्र ६५३ जन्म काशी में १८७७ ई. को हुआ था। इनके पिता कविराज विश्वनाथ सेन आयुर्वेद के चिकित्सक एवं आचार्य थे। गणनाथ सेन प्राचीन एवं नव्य आयुर्वेदीय विचारधारा के समन्वयकारक थे। कविराज विनोदलाल सेन की ‘आयुर्वेदविज्ञानम्” में स्थापित पद्धति को इन्होंने और आगे बढ़ाया। १- सिद्धान्तनिदानम् - रोगनिदानविषयक शास्त्र । प्रथम संस्करण १६२६ ई. में कल्पतरुप्रसाद भवन, कलकत्ता से प्रकाशित । इसमें न्यूमोनिया, टायफायड, कालाजार आदि कुछ अन्य आधुनिक रोंगों को भी समाविष्ट कर लिया गया है। आचार्य प्रियव्रत शर्मा ने इस पर “तत्त्वदर्शिनी” व्याख्या लिखी है। २. प्रत्यक्षशारीरम-यह भी गणनाथसेन की प्रसिद्ध रचना है। यह शरीरव्यवच्छेदशास्त्र विषयक ग्रन्थ है। ११ ई. में कलकत्ता से मुद्रित । इस ग्रन्थ के प्रकाशन से आधुनिक काल में शारीरशास्त्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। इस ग्रन्थ में आधुनिक शारीरविज्ञान के तथ्यों को भी संस्कृत में रूपान्तरित कर ग्रहण किया गया है। ३. शरीरविच्छेदः- शल्यक्रियाविषयक। १ERE ई. में मुद्रित । ४. संज्ञापञ्चकविमर्शः - कलकत्ता से १६३१ ई. में प्रकाशित। ५, शारीरपरिभाषा- कलकत्ता से १६३६ ई. में प्रकाशित । कविराज गणनाथ सेन आयुर्वेद में प्राचीन विचारधारा के साथ अर्वाचीन वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण विचारधारा के समन्वयकारक मूर्धन्य एवं अग्रणी नेता थे। अतः प्राचीन परम्परा के परिपोषक कुछ लोग जिनमें बंगाल के पं. ज्योतिषचन्द्र सरस्वती तथा काशी के डॉ. भास्कर गोविन्द घाणेकर प्रमुख थे, इनसे सहमत नहीं थे। ज्योतिषचन्द्र सरस्वती (१E वी-२० वीं शती) - ये भी बर्गवासी थे। ये गणनाथ सेन के विचारों के विरोधी थे। इन्होंने “चरकप्रदीपिका” नामक टीका लिखी थी जो केवल सूत्रस्थान तक प्रकाशित हुई थी। यह व्याख्या विद्वत्तापूर्ण तथा जटिल स्थलों को स्पष्ट करने में अतीव उपयोगी है। इन्होंने “शारीरविनिश्चयः” नामक ग्रन्थ भी लिखा था, जो अप्रकाशित है। शिवदास सेन (१६-२० वीं शती)-“चक्रदत्तः” नामक चिकित्सासग्रंह ग्रन्थ पर “तत्त्वचन्द्रिका” टीका। “चक्रदत्त” म. म. चरक चतुरानन चक्रपाणिदत्त द्वारा प्रणीत चिकित्सा-ग्रन्थ है, उस पर शिवदास सेन ने बड़ी उपयोगी टीका लिखी है। मूल ग्रन्थ सहित टीका वाचस्पत्य प्रेस कलकत्ता से १६३३ ई. में मुद्रित है। । यादव जी त्रिक्रमजी (१८८१-१९५६) - इनका जन्म गुजरात के पोरबन्दर में हुआ था। इनके पिता वैद्य त्रिक्रम जी मोरधन जी थे। इन्होंने अपने पिता से आयुर्वेद का, राजस्थान के पं. गौरीशंकर शास्त्री से आर्ष ग्रन्थों का तथा हकीम रामनारायण जी से यूनानी चिकित्सा का अध्ययन किया। मि
  • इन्होंने प्राचीन ग्रन्थों के पुनरुद्धार का अपूर्व कार्य किया, जो इनके वैदुष्य का परिचायक है। इन्होंने “मधुकोष” व्याख्या सहित “माधवनिदान” का संपादन किया, जो १६०१ ई. में निर्णयसागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित हुआ। चरकसंहिता और सुश्रुतसंहिता६५४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास का इनके द्वारा संपादित संस्करण (निर्णयसागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित) अद्यावधि सर्वोत्तम संस्करण है। इसके अतिरिक्त इन्होंने बहुत से अन्य ग्रन्थों तथा उनके अनुवादों को प्रकाशित कराया। श्री रणजितराय आयुर्वेदालंकार इनके योग्य शिष्य थे। त्रिक्रम जी के स्वतन्त्र ग्रन्थ निम्नांकित हैं १- आयुर्वेदीय व्याधिविज्ञानम्- दो भागों में । पूर्वार्ध वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन से १६५४ ई. में तथा उत्तरार्ध १६५६ ई. में प्रकाशित। २- रसामृतम्- मोतीलाल बनारसीदास द्वारा १६५१ ई. में प्रकाशित। ग्रन्थ में ६ अध्याय, साथ में ६ परिशिष्ट हैं। इसमें भस्म, विष्टि, रसयोग आदि वर्णित हैं। ३- द्रव्यगुणविज्ञानम्- पूर्वार्ध भाग का तृतीय संस्करण आयुर्वेदभवन से १६५३ ई. में प्रकाशित तथा उत्तरार्ध भाग का प्रथम खण्ड (द्वितीय संस्करण) निर्णय सागर प्रेस से १६४७ ई. में एवं द्वितीय खण्ड १६५० ई. में प्रकाशित। - ४- सिद्धयोगसंग्रह:- अनुभूत तथा शास्त्रीय योगों का संकलन । यह ग्रन्थ ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसमें युगानुरूप शास्त्रीय योगों में भी कुछ संशोधन किये गये हैं। श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन से द्वितीया आवृत्ति सन् १६४६ ई. में प्रकाशित। 10 यादव जी ने अर्वाचीन युग में द्रव्यगुण को वैज्ञानिक धरातल पर प्रतिष्ठित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। इन्होंने संभाषापरिषदों के माध्यम से आयुर्वेद की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि को वैज्ञानिक दृष्टि से समन्वित कर उसे बोधगम्य और आकर्षक बनाने का स्तुत्य कार्य किया। हरिदास श्रीधर कस्तूरे - आयुर्वेदीयपञ्चकर्मविज्ञानम् (श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन से १६७० ई. में प्रकाशित) आधुनिक काल में आर्ष पञ्चकर्म प्रणाली को पुनरुज्जीवित करने तथा शास्त्रीय एवं व्यावहारिक दोनों पक्षों को समन्वित रूप से प्रस्तुत करने का यह श्लाघ्य प्रयास है। । अज्ञातकर्तृक - केरलीयपञ्चकर्मचिकित्साविज्ञानम् । चौखम्बा, वाराणसी से १६७२ ई. में प्रकाशित। सत्यदेव वाशिष्ठ (२०वीं शती)- भिषक् केशरी वैद्याचार्य श्री सत्यदेव वाशिष्ठ, सनातन धर्म आयुर्वेद महाविद्यालय, भिवानी (पञ्जाब) से जुड़े। नाडीतत्त्वदर्शनम्-१६५२ ई. में सुप्रभात प्रेस, वाराणसी से प्रकाशित। इस ग्रन्थ में नाड़ीविषयक गहन अनुसन्धान प्रस्तुत किया गया है। “दूतधारा” विज्ञान का निरूपण इस ग्रन्थ की महती विशेषता है जिसमें दूर देशस्थित रोगी के रोग का निदान उसके दूत की नाड़ी द्वारा करने की सफल प्रक्रिया प्रदर्शित की गयी है। लेखक ने इसके शताधिक प्रयोग किये हैं और अनेक छात्रों को सिखाया है। नाड़ी विषयक अनुसन्धान करने के अनन्तर रावणकृत “नाडीविवृति” की युक्तियुक्त व्याख्या करते हुए कणाद नाडी, वसवराजीय नाडी तथा नाडी सम्बन्धी अन्य श्लोकों की यथावसर युक्तिपूर्ण व्याख्या की गयी है। ग्रन्थ में कुल ८ अध्याय हैं। दर्शन और शास्त्र ६५५ गुलराज शर्मा मिश्र एवं गोविन्द प्रसाद उपाध्याय (२० वीं शती) - दोनों ने संयुक्त रूप से “विशिखानुप्रवेशविज्ञानम्” नामक ग्रन्थ की रचना की है (चौखम्बा से १६८६ ई. में प्रकाशित)। यह धन्वन्तरि द्वारा मूलरूप से प्रतिपादित विशिखानुप्रवेशविधि या चिकित्साकर्मप्रवेशविज्ञान का ग्रन्थ है। “विशिखानुप्रवेश” व्यवहारशास्त्र के साथ ही निदानचिकित्सा में समुत्पन्न समस्याओं का समाधान है। लक्ष्मीनारायण शर्मा (१९-२० वीं शती)-मत्स्यदेश में जयपुर के अन्तर्गत बाणगङ्गा के तटवर्ती “धौला" ग्राम के निवासी। रसेन्द्रभास्करः - बम्बई के वेड्कटेश्वर स्टीम प्रेस से १६१० ई. में मुद्रित और प्रकाशित। यह ग्रन्थ रसरत्नाकर, रसेन्द्रचिन्तामणि, रसप्रदीप, रसरत्नसमुच्चय, रसमङ्गल, रसदीपक, रसहृदय, काकचण्डीश्वर, रसेन्द्रसारसंग्रह, रसेन्द्रकोष, गौरीकांचलिकातंत्रशाङ्गधर, भावप्रकाश, टोडरानंद आदि ग्रन्थों के अनुशीलन के पश्चात् प्रणीत है। इसमें उन विविध ग्रन्थों के अभिप्राय तो सुगम रीति से वर्णित हैं ही, साथ ही साथ उनमें अप्राप्य विशेष विधियों को भी श्रेष्ट वैद्यों से साक्षात् जानकर इसमें सन्निविष्ट किया गया है। ग्रन्थ श्लोकों में निर्मित और द्वादश मयूखों में विभक्त है। प्रथम मयूख का नाम “उपोद्घातमयूख” द्वितीय का “रसप्रकरणमयूख” तृतीय का “उपरसमयूख” चतुर्थ का “भानुप्रकरणमयूख” पञ्चम का “उपधातुप्रकरण" नवम का “उपविषप्रकरण” दशम का “यन्त्रप्रकरण” एकादश का “मृत्युञ्जय रस प्रकरण” और द्वादश का नाम “परिशिष्ट प्रकरण" है। प्रियव्रत शर्मा, बिहार (१६२०) - आचार्य प्रियव्रत शर्मा आयुर्वेद के क्षेत्र में अपने अमूल्य योगदान के कारण सुविदित हैं। ये वाराणसी के निवासी तथा पं. रामावतार शर्मा के सुपुत्र हैं। इनका जन्म १६२० ई. में पटना (बिहार) के समीपवर्ती एक ग्राम में हुआ था। इनका परिवार पारम्परिक रूप से वैद्यों का परिवार था। अतः आयुर्वेद का ज्ञान इन्हें परम्परा से विरासत में मिला। श्री शर्मा बिहार में बहुत वर्षों तक राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य तथा स्वास्थ्य सेवाओं के उपनिदेशक रहे। बाद में द्रव्यगुणविज्ञान में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, तत्पश्चात् भारतीय औषधविज्ञान के परास्नातक संस्थान के निदेशक एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भारतीय औषधविज्ञान संकाय के निदेशक एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भारतीय औषधविज्ञान संकाय के डीन रहे। १६८० ई. में वे वहां से सेवानिवृत्त हुए। शर्मा जी ने पिछले पचास वर्षों में आयुर्वेद वाङ्मय के साहित्यिक, वैज्ञानिक, वैचारिक एवं ऐतिहासिक पक्षों पर ४० से अधिक ग्रन्थ तथा लगभग ४५० शोधपत्र लिखे हैं। उनके ग्रन्थों में से प्रमुख का परिचय निम्नवत् है १- अभिनवशरीरक्रियाविज्ञानम्-चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी से १६५४ ई. में प्रथम संस्करण प्रकाशित। १६६२ ई. में द्वितीय संस्करण। २-द्रव्यगुणविज्ञानम्-४ भागों में प्रकाशित । प्रथम भाग चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी से १६५५ ई. में (प्रथम संस्करण) तथा ६५६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास द्वितीय-तृतीय भाग १६५६ ई. में (प्रथम संस्करण) प्रकाशित हुआ। ३-रोगिपरीक्षाविधिः - १६५७ ई. में चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी से प्रकाशित । ४-दोषकारणत्वमीमांसा-विद्याभवन आयुर्वेद ग्रन्थमाला-४ में चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी से प्रकाशित (१E५५ ई.)। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस लघुकाय ग्रन्थ में दोषों के कारणत्व पर विचार किया गया है। ६-षोडशाङ्गहृदयम् - पद्मा प्रकाशन, वाराणसी से १६८७ ई. में प्रकाशित। यह आर्यावृत्त में निबद्ध आयुर्वेद का विवरणात्मक ग्रन्थ है। इसमें १६ अध्याय हैं-माणा १- मौलिकसिद्धान्ताः (१-२१)२- शारीरम् (२२-२६) ३- द्रव्यगुणम् (२७-५४) ४ भेषजकल्पना (५५-१०६) ५- रसशास्त्रम् (११०-१६६) ६- स्वस्थवृत्तम् (१६७-१८१) ७ रसायनम् (१८२-१८३) - बाजीकरणम् (१८४-१८५) - रोगविज्ञानम् (१८६-२२०) १०- कायचिकित्सा (२२१-२४६) ११- मानसरोगः (२४७-२४६) १२- प्रसूतितन्त्रम् (२५०-२५८) १३- कौमारभृत्यम् (२५६-२६२) १४- अगदतन्त्रम् (२६३-२६४) १५ शल्यतन्त्रम् (२६५-२६७) १६- शालाक्यतन्त्रम् (२६८-२७२)मापार ६- आयुर्वेददर्शनम् - चौखम्बा विश्वभारती, वाराणसी से हरिदास आयुर्वेद सीरीज-१ में प्रकाशित (१६६४ ई.)। यह ग्रन्थ सूत्ररूप में लिखित है। इसमें ४ पाद है-१- प्रमेयपादः -प्रमाणपाद: ३-प्रकृतिपादः तथा ४- विकृतिपादः। प्रथम पाद में ३२, द्वितीय में ८, तृतीय में ११ तथा चतुर्थ पाद में १३ सूत्र हैं। सूत्रों पर शर्मा जी द्वारा विरचित स्वोपज्ञभाष्य भी है। साथ ही साथ हिन्दी एवं अंग्रेजी में भाष्य का अनुवाद भी दिया गया है। ७- प्रियनिघण्टुः “रसयोग” विषयक ग्रन्थ कविराज सदानन्द शर्मा घिल्डियाल- इनके पिता जीवानन्द शर्मा तथा माता सरस्वती थीं। इनका रसशास्त्र संबंधी मुख्य ग्रन्थ “रसतरङ्गिणी” है जो उनके गुरु नरेन्द्र नाथ मित्र द्वारा लाहौर से प्रकाशित है। द्वितीय संस्करण-१६३५ ई.। इस ग्रन्थ के अतिरिक्त शर्मा जी ने रसकौमुदी की व्याख्या लिखी तथा पारदयोगशास्त्र आदि रससंबधी ग्रन्थों का संपादन किया। श्यामसुन्दराचार्य वैश्य (१८७१-१६१८) ये काशी के पं. राममिश्र शास्त्री तथा पं. अर्जुन मिश्र के शिष्य थे। इनका प्रमुख ग्रन्थ “रसायनसार”" है, जिसमें रसशास्त्र संबंधी इनके द्वारा अनुभूत योगों का वर्णन है। श्यामसुन्दररसायनशाला, काशी द्वारा प्रकाशित तृतीय संस्करण, १६३५ ई.। । वासुदेव मूलशंकर द्विवेदी-ये जामनगर आयुर्वेद शिक्षण केन्द्र में रसशास्त्र एवं भैषज्यकल्पना के विभागाध्यक्ष थे। इनका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ‘पारदविज्ञानीयम्" है जो द्विवेदी जी के प्रत्यक्ष प्रयोगों पर आधारित है। शर्मा आयुर्वेद मन्दिर, दतिया से १६६६ ई. में प्रकाशित। हरप्रपन्न शर्मा (बम्बई) - रसयोगसागरः (१६२७ ई.) इस ग्रन्थ की विद्वत्तापूर्ण विस्तृत भूमिका महत्त्वपूर्ण है। दर्शन और शास्त्र भूदेव मुखोपाध्याय - रसजलनिधिः, अंग्रेजी अनुवादसहित पाँच खण्डों में, १६२६ से १६३८ ई. तक की अवधि में प्रकाशित। जीवराम कालीदास शास्त्री (आचार्य चरणतीर्थ महाराज) - “रसरत्नसमुच्चय" की टीका “रसोद्धारतन्त्रम्” नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ। शास्त्री जी गोंडल की प्रसिद्ध रसशाला के संस्थापक थे वि. दत्तराम चौबे-१- रसराजसुन्दरम्-ज्ञानसागर प्रेस बम्बई द्वारा १८६४ ई. में प्रकाशित चतुर्थ संस्करण- १६२४ ई.।२- बृहनिघण्टुरत्नाकरः ६ भागों में बम्बई से प्रकाशित । कविराज प्रताप सिंह (जन्म १८६२ ई.) आयुर्वेदीयखनिजविज्ञानम्, प्रकाश आयुर्वेदीय औषधालय द्वारा १६३१ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ की भूमिका गणनाथ सेन ने लिखी है। कविराज जी का जन्म उदयपुर में १८६२ ई. में हुआ था। इन्होंने मद्रास में पं. गोपालाचार्नु तथा कलकत्ता में कविराज गणनाथ सेन के साथ आयुर्वेद का अध्ययन किया। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आयुर्वेदिक फार्मेसी के अधीक्षक, राजस्थान सरकार में निदेशक तथा १६५४ ई. में केन्द्रीय सरकार में देशी चिकित्सा के सलाहाकार रहे। आप रसशास्त्र के मान्य विद्वान् थे। उपर्युक्त ग्रन्थ के अतिरिक्त कविराज जी के अन्य ग्रन्थ हैं- प्रसूतिपरिचर्या, विषविज्ञानम्, आरोग्यसूत्रावली, प्रतापकण्ठाभरणम् इत्यादि। पण स्वामी हरिशरणानन्द -१- भस्मविज्ञानम् - दो खण्डों में (१६५४ में प्रकाशित) कूपीपक्चरसनिर्माणविज्ञानम् (१६४१ ई.)। स्वामी जी पंजाब आयुर्वेदिक फार्मेसी, अमृतसर के संचालक थे। २- त्रिदोषमीमांसा, अमृतसर, १६३४ ई.। को हजारीलाल शुक्ल- रसेन्द्रसम्प्रदायः (स्वयं लेखक द्वारा १६५५ ई. में प्रकाशित) “रसरत्नसमुच्चय” पर टीका शुक्ल जी ने राजकीय आयुर्वेदिक कालेज, पटना में कई वर्षों तक अध्यापन एवं प्रत्यक्ष कर्माभ्यास किया। पारसराम शास्त्री - रसायनसुधानिधिः - लेखक द्वारा कामठी से १E२६ ई. में प्रकाशित। पारसराम शास्त्री जी दाधीचवंशीय बलदेव मिश्र के सुपुत्र थे। ज्ञानचन्द्र शर्मा- रसकौमुदी। इसमें ३ ‘अधिकार’ हैं। विद्योतिनी हिन्दी टीका के साथ चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी से १६७७ ई. में प्रकाशित। निदान और चिकित्साविषयक ग्रन्थ कविराज उपेन्द्रनाथ दास (१८६१-१६६५) कविराज उपेन्द्रनाथ दास का जन्म १८६१ ई. में फरीदपुर जिला (बंगलादेश) के गच्चापाड़ा ग्राम में हुआ था। ये दिल्ली के आयुर्वेदीय कालेज एवं तिब्बती (तिब्बिया) कालेज में प्राध्यापक रहे। इन्होंने काशी के उमाचरण कविराज से आयुर्वेद का अध्ययन किया था। 9- पञ्चभूतविज्ञानम्-चौखम्बा, वाराणसी से इसका द्वितीय संस्करण १६६२ ई. में प्रकाशित हुआ। २- त्रिदोषविज्ञानम्-चतुर्थ संस्करण, चौखम्बा, वाराणसी से १६६६ ई. में प्रकाशित। ६५८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास भानुशंकर शर्मा - त्रिदोषवादः, भावनगर से १६३५ में प्रकाशित। विश्वनाथ द्विवेदी - त्रिदोषालोकः, पीलीभीत से १६४१ ई. में प्रकाशित। राजेश्वरदत्त शास्त्री (१९०१-१९६६) - शास्त्री जी उत्तर प्रदेश में गोण्डा जिले के मूल निवासी थे। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आयुर्वेदिक कालेज में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रहे तथा आयुर्वेद विभाग के प्रमुख चिकित्सक थे। इनमें शास्त्रज्ञान एवं अनुभव दोनों का प्राचुर्य था अतः इनकी रचनाओं में शास्त्र एवं व्यवहार, प्राचीन तथा नवीन दोनों का मंजुल सामंजस्य पाया जाता है। इनके लिखे दो ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं- १- चिकित्सादर्शः - सम्पूर्ण ग्रन्थ तीन खण्डों में है। १६५७, १९६१ तथा १६६४ ई. में लेखक द्वारा प्रकाशित। २- स्वस्थवृत्तसमुच्चयः । भास्कर विश्वनाथ गोखले (२० वीं शती)-श्री विश्वनाथ गोखले आयुर्वेद महाविद्यालय, पूना में कई वर्षों तक प्राध्यापक तथा जामनगर स्नातकोत्तर शिक्षण केन्द्र के प्राचार्य रहे। आपका वैदुष्य बड़ा मौलिक और अनुभव गम्भीर था। इन्होंने “चिकित्साप्रदीपः - नामक ग्रन्थ की रचना की जो लेखक द्वारा ही प्रकाशित (द्वितीय आवृत्ति, १९६१ ई.) है। राजेश्वरशास्त्रीकृत चिकित्सादर्श जिस प्रकार आयुर्वेद की काशी-परम्परा का, उसी प्रकार यह पूना परम्परा का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। रामरक्षापाठक- पाठक जी का जन्म १६०६ ई. में नयाटोला, छपरा (बिहार) में हुआ था। -त्रिदोषतत्त्वविमर्शः, वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन से १६० ई. में द्वितीय संस्करण प्रकाशित । २- पदार्थविज्ञानम्-वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन से १६४८ ई. में प्रकाशित। यह ग्रन्थ अतीव लोकप्रिय हुआ। ३- आहारविज्ञानम् ४- मर्मविज्ञानम् । पाठक-जी राजकीय आयुर्वेदिक स्कूल, पटना के स्नातक थे। ये गुरुकुल कांगड़ी आयुर्वेद महाविद्यालय तथा बेगूसराय आयुर्वेदिक कालेज में प्राचार्य रहे। १६५३ ई. में ये जामनगर आयुर्वेदिक अनुसन्धान केन्द्र में निदेशक तथा १E६४ ई. के बाद ५ वर्षों तक लंका में भण्डारनायके आयुर्वेद कालेज में रहे। शंकरदाजी शास्त्री पदे - ग्रन्थ - वनौषधिगुणादर्शः (सात भागों में) तृतीय संस्करण १६०६-१६१३ ई. में प्रकाशित। इन्होंने केशवकृत सिद्धमन्त्र का भी संपादन कर उसे प्रकाशित कराया (१८६८ ई.)। जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल- निघण्टुशिरोमणिः, प्रयाग से १६१४ ई. में प्रकाशित। रूपलाल वैश्य-‘रूपनिघण्टु’। नागरी प्रचारिणी सभा काशी से १६४० ई. में प्रकाशित । रूपनिघण्टुकोशः भी इन्हीं की रचना है। शंकरदत्त गौड़ - शंकरनिघण्टुः । वनौषधिभडार, जबलपुर से १६३५ ई. में प्रकाशित। इसमें यूनानी द्रव्यों का भी वर्णन है। बलदेव प्रसाद मिश्र-आयुर्वेदचिन्तामणिः। श्रीकृष्णदास, बम्बई से १६३७ ई. में प्रकाशित। यह एक निघण्टुग्रन्थ है और भावप्रकाश पर आधारित है। दर्शन और शास्त्र ६५६ भागीरथ स्वामी (जन्म- १६०६ ई.) स्वामी जी आयुर्वेदमहामहोपाध्याय कहे जाते थे। इनका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ “सन्दिग्धनिर्णय” है जो वनौषधशास्त्र है। इसमें द्रव्यों का विवेचन कर प्रमाणपूर्वक उसकी सन्दिग्धता का निवारण किया गया है। ग्रन्थ में चित्र भी दिए गये हैं। इस प्रकार का यह प्रथम और ऐतिहासिक कार्य है। १६३६ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित। “आत्मसर्वस्व” स्वामी जी की दूसरी रचना है, कलकत्ता से प्रकाशित । “आत्मसर्वस्व” स्वामी जी की दूसरी रचना है जो कलकत्ता से १६२६ ई. में प्रकाशित है। “लघु आयुर्वेदविज्ञान” तथा “सिद्धौषधमणिमाला” भी आपकी रचनाएं हैं। विष्णु वासुदेव गोडबोले - निघुण्टुरत्नाकरः १६६७ ई. में निर्णयसागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित। रविदत्त वैद्यकृत हिन्दी अनुवाद के साथ इसका द्वितीय संस्करण १८६२ ई. में नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ से छपा था। पं. कृष्णशास्त्री नवरे द्वारा सम्पादित यह ग्रन्थ १९३६ ई. में दो खण्डों में निर्णयसागर बम्बई से प्रकाशित हुआ। अज्ञातकर्तृक - अमृतसागरः नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ से १८६६ ई. में प्रकाशित। अज्ञातकर्तृक - नूतनामृतसागरः बम्बई से प्रकाशित । यह ४४ तरंगों में विभक्त है मुख्यतः “भावप्रकाश” पर आधारित । ग्रन्थ रचना सं. १६४७ (१८६० ई.) में पूर्ण हुई। रघुवीरप्रसाद त्रिवेदी-१ कौमारभृत्यम् - १६४८ ई. में चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित । २- अभिनवविकृतिविज्ञानम् १६५७ ई. में चौखम्बा से ही प्रकाशित। कविराज यामिनीभूषण राय-कुमारतन्त्रम् कलकत्ता से १६२० ई. में प्रकाशित। वामदेव मिश्र - शल्यतन्त्रसमुच्चयम् १६२६ ई. में लेखक द्वारा स्वयं प्रकाशित। इस ग्रन्थ में ५० अध्याय हैं जिनमें विषय मुख्यतया सुश्रुतसंहिता पर आधारित हैं। यन्त्रों-शस्त्रों के चित्र भी दिये गये हैं। मिश्र जी राजकीय आयुर्वेद विद्यालय में अध्यापक थे। अनन्तराम शर्मा - शल्यसमन्वयम् । उमेशचन्द्र गुप्त - वैद्यकशब्दसिन्धुः (१६१४ ई.) यह आयुर्वेदिक शब्द-कोष है। विश्वेश्वरदयालु वैद्यराज - वैद्यकशब्दकोषः (१६२५ ई.) यह वनौषधिविषयक है। बालकृष्ण जी अमर पाठक - “मानसरोगविज्ञान” श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन से १६४६ ई. में प्रकाशित। यह ग्रन्थ प्रौढ़ और विद्वत्तापूर्ण है। पाठक जी आयुर्वेदिक कालेज, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचार्य रहे थे। जयदेव शास्त्री - सिद्धभैषज्यमञ्जूषा। बालकृष्ण शिवराम मुंजे - ये नेत्ररोगों के विशेषज्ञ तथा संस्कृत भाषा के विशेष अभिमानी एवं अभिज्ञ थे। इनका “नेत्ररोगचिकित्सा” नामक ग्रन्थ नेत्ररोगों से संबन्धित एक मात्र संस्कृत ग्रन्थ है। म्हसकर एवं वाटवे (बम्बई)- स्वास्थ्यवृत्तम् - इस ग्रन्थ में स्वास्थ्य की रक्षा एवं दीर्घायु के कारणों तथा उपायों की चर्चा की गयी है। १९५४ ई. में बम्बई से मुद्रित।। पुरुषोत्तम सखाराम हिर्लेकर (महाराष्ट्र) - अमरावती निवासी श्री सखाराम हिर्लेकर ६६० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास उत्कृष्ट वैद्य तथा आयुर्विद्याविशारद थे। इन्होंने भारतीय आयुर्विद्या शिक्षण समिति के कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर बहुत दिनों तक कार्य किया। १६४२ ई. में इन्होंने “शरीरं तत्त्वदर्शनम्” नामक ग्रन्थ लिखा जो आयुर्वेद के मूलभूत त्रिदोषसिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाला उत्तम शास्त्रीय ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ का पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध प्रत्येक भाग १२ प्रकरणों में विभक्त है। संपूर्ण ग्रन्थ अनुष्टुप् छन्द में उपनिबद्ध है। इस ग्रन्थ पर स्वयं हिर्लेकर जी ने “शास्त्रीय समीक्षा” लिखी है तथा अमरावती के ही वैद्य हरिहर वामन देशपांडे ने हिन्दी अनुवाद के साथ इसे छापा है। सरस्वती मुद्रणालय, अमरावती से मुद्रित। “आयुर्वेदीय औषधिविज्ञानम्” आपकी दूसरी महत्त्वपूर्ण रचना है। दामोदर शर्मा गौड़ - १- अभिनवं शारीरम् - वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन नागपुर द्वारा १६७४ ई. में प्रकाशित । २- अभिनवप्रसूतितन्त्रम्-स्वामी लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर से १६५० ई. में प्रकाशित। श्री गौड़ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में शारीरविज्ञान के प्राध्यापक थे। इनकी अध्यक्षता में, आचार्य यादव जी त्रिक्रम जी की प्रेरणा पर दिल्ली में वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन द्वारा शारीरशास्त्र पर तृतीय शास्त्रचर्चापरिषद् आयोजित हुई, जिसमें शारीर संज्ञाओं के अर्थ निश्चित कर “पारिषद्यं शब्दार्थशारीरम्" नामक ग्रन्थ में उपनिबद्ध किये गये। अन्य ग्रन्थ १- विषहरतन्त्रम् (१८७०) - गणेश । २-पूर्वकालीनाः कथं दीर्घायुषः (१८६३)-जयचन्द्र सिद्धान्तभूषण भट्टाचार्य । ३-आयुर्वेदसंग्रहः-काव्यकण्ठं गणपति मुनि ४- चिकित्सानुशासनम् - काव्यकण्ठं गणपति मुनि ५- आयुर्वेदतत्त्वरत्नाकर-व्रजविहारी चतुर्वेदी (१८६६-१६४५) ६-रोगिमृत्युदर्पणम्-मथुराप्रसाद दीक्षित ७-देहधात्वग्निविज्ञानम् हरिदत्त शास्त्री
  • चनदत्तरत्नप्रभा-निश्चल कर।

काव्यशास्त्र

पण्डितराज जगन्नाथ के पश्चात् संस्कृत के काव्यशास्त्र में किसी मौलिक सिद्धान्त की स्थापना का प्रयत्न नहीं पाया जाता। केवल डॉ. ब्रह्मानन्द शर्मा काव्य में एक अभिनव तत्त्व का प्रतिपादन करते हैं, वह है-सत्य। उनका कथन है कि सत्यानुभूति ही काव्य की आत्मा है सत्यमर्थगतं काव्ये, अर्थे शब्दस्य संस्थितिः। शब्दार्थयोर्हि सद्भावात् अस्य साहित्यरूपता।। (काव्य-सत्यालोक) डॉ. शर्मा कहते हैं कि सत्य सभी का अभीष्ट होता है और काव्य में भी सत्य की स्थिति होती है। इस सत्य में सूक्ष्मता का आधान होने से तीव्र प्रभावकारिता आती है। यह प्रभावकारिता ही काव्य में चमत्कार कहलाती है। शब्दार्थ में सत्य के रमणीय प्रतिपादन को दर्शन और शास्त्र ६६१ काव्य कहते हैं। यह काव्य-सत्य एक व्यापक सिद्धान्त है जिसमें शब्द, अर्थ, अलङ्कार, व्यञ्जना, रस, गुण अदि समस्त तत्त्वों का अन्तर्भाव हो जाता है। डॉ. शर्मा का यह काव्यलक्षण पाश्चात्य आलोचना शास्त्र से प्रभावित प्रतीत होता है। अरस्तू ने भी काव्य में वास्तविकता के समावेश पर बल दिया है। परन्तु कोई विशेष मौलिक योगदान न करने पर भी १६ वीं-२० वीं शती के आचार्या ने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के लक्षणों एवं सिद्धान्तों को व्याख्यापित कर उसे विविध दृष्टिकोणों से देख-परखकर विशद एवं सरलतर रूप में प्रस्तुत करने का यत्न तो किया ही है। यों तो, क्वचित् ही कोई लेखक पूर्णतः अपनी मौलिक उद्भावना रखता है। प्रायः सभी अपने पूर्व आचार्यों के मत में कुछ परिष्कार कर उसे प्रस्तुत करते हैं और इस परिष्कार में ही उनकी नवीनता होती है। पण्डितराज जगन्नाथ तक आते-आते काव्यशास्त्र पूर्णतः मथित हो परिपक्व हो चुका था। उसमें कुछ अधिक करने को शेष न था। पुनश्च, संस्कृत काव्य-रचना में भी पण्डितराजोत्तरवर्ती युग में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। किसी कालजयी कति का निर्माण हम नहीं पाते. अत: उसका अनवर्ती काव्यशास्त्र मौलिक तत्व कहाँ से ढूँढे ? शायद यह भी एक कारण रहा है कि इस युग में काव्यशास्त्र में मौलिकता अत्यल्प मात्रा में विद्यमान है। इस युग के आचार्यों की कुछ सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार परिलक्षित होती हैं- १- प्रायः सभी आचार्यों की रचना “बालबोधाय” है, अतः प्रस्तुति की शैली सरल और विशद है, खण्डन-मण्डन नगण्यप्राय है। २- लेखकों में पण्डितराज जगन्नाथ की “निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपम्” की प्रवृत्ति अधिक दिखायी देती है, वे स्वरचित लक्षण के साथ स्वरचित लक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं, इस प्रकार रचना उनकी मौलिक हो जाती है। कई कवियों ने उदाहरणों में अपने आश्रयदाता का गुणगान किया है और नाम भी अपने आश्रयदाताओं के नाम पर रखे हैं, जैसे-गोदवर्मयशोभूषण। कई ने एक ही पात्र की जीवन से सारे उदाहरण दिये हैं। यह नवीन तथ्य है जिसका ऐतिहासिक महत्त्व भी है। ३- आचार्यों को चन्द्रालोक एवं कुवलयानन्द की एक ही कारिका के पूर्वार्ध में लक्षण एवं उत्तरार्ध में लक्ष्य देने की पद्धति अधिक रुची है। ४- प्राय५ आचार्य अपना अभीष्ट मत प्रस्तुत करने के अनन्तर पूर्वाचायों के मतों का भी उल्लेख कर देते हैं जिससे उस विषय का तुलनात्मक अध्ययन हो जाता है। मागंगाधर कविराज (१७६८-१८८५) - ये मुर्शिदाबाद (बंगाल) के निवासी थे। ये मूलतः आयुर्वेद के विशेषज्ञ एवं व्यवसाय से वैद्य थे, परन्तु आयुर्वेद के ग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने काव्य, व्याकरण और काव्यशास्त्र विषयक अनेक (२४) ग्रन्थों की रचना की। “प्राच्यप्रभा” इनका काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है, जो अग्निपुराण पर आधारित है। श्रीनिवास दीक्षित (१६ वीं शती)-ये सम्भवतः राजचूडामणि दीक्षित के पिता थे। इनके पिता का नाम भावस्वामी, माता का नाम लक्ष्मी तथा गुरु का नाम केशव परिव्राजकाचार्य था। इनके चार ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है - अलंकारकौस्तुभ, २- काव्यदर्पण ३-काव्यसारसंग्रह और ४- साहित्यसूक्ष्मसरणि। ६६२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सदाजी-इनके पिता का नाम बल्लाल था तथा ये “रत्नगिरि” जिले के निवासी थे। साहित्यमञ्जूषा (रचनाकाल-१८२५ ई.) बाजीपन्त के पुत्र ने इसपर “कुंचिका” नाम्नी टीका लिखी। दामोदर शास्त्री - वाणीभूषणम् (१८३३ ई.)। बलभद्र सिंह - वृत्तिबोधनम् (१८३३ ई.)। अच्युतरायशर्मन् “मोडक"-महाराष्ट्र (१E वीं शती) पण्डितराज जगन्नाथ के उत्तरकालीन आचार्यों में अच्युतराय ‘मोडक" का विशिष्ट स्थान है। इन्होंने अपने ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर प्राचीन मतों की समीक्षा तथा नवीन मतों की स्थापना की है। इनके पिता का नाम नारायण तथा माता का नाम अन्नपूर्णा था। ये नासिक के समीप स्थित पञ्चवटी के निवासी थे। इन्होंने अपने ग्रन्थ साहित्यसार की पुष्पिका में उसका रचनाकाल शक १७५३ (१८३१ ई.) लिखा है, अतः अच्युतराय का समय १६ वीं शती निश्चित है। ग्रन्थ की पुष्पिका से ही पता चलता है कि इनके गुरु श्री नारायण स्वामी ‘षष्टि" थे। अच्युतराय का “साहित्यसार” काव्यशास्त्र विषयक प्रतिष्ठित ग्रन्थ है। इसमें १२ प्रकरण तथा कुल १३१३ कारिकाएँ हैं। ग्रन्थकार ने स्वयं इसपर “सरसामोदः” नामक टीका भी लिखी है। इस टीका के साथ यह ग्रन्थ निर्णयसागर प्रेस बम्बई से प्रकाशित है। “सरसामोदः” टीका के आधार पर लेखक द्वारा विरचित “भागीरथीचम्पू” (१८१४ ई.) कृष्णलीलामृत, निरञ्जनमञ्जरी, अद्वैतामृतमञ्जरी, नीतिशतपत्र नामक रचनाओं का ज्ञान होता है। इसके अतिरिक्त इन्होंने पंडितराज जगन्नाथ के “भामिनीविलासः" पर “प्रणयप्रकाशः” टीका, विद्यारण्य भारतीतीर्थ की ‘पञ्चदशी" पर टीका तथा अद्वैतराज्यलक्ष्मी, अद्वैतविद्याविनोदः, अवैदिकमततिरस्कारः, ईशदेशिकविवेचनमञ्जरी, गीतासीतापति, गोदालहरी, जीवन्मुक्तिविवेकव्याख्या, प्रारब्धवानध्यानस्मृतिबौध्यायिकसिद्धिः, महावाक्यार्थमञ्जरी, रामगीताचन्द्रिका,विष्णुपदलक्षणम्, श्रीकण्ठस्तवः, वेदान्तामृतचिद्रत्नम, सौद्धयाज्ञकल्पद्रुमः हेरम्बचरणामृतलहरी आदि ग्रन्थों की रचना की। ति। “साहित्यसार” ग्रन्थ चन्द्रालोक आदि ग्रन्थों की भाँति कारिका के पूर्वार्ध में लक्षण एवं उत्तरार्ध में स्वरचित लक्ष्य की शैली में उपनिबद्ध है। लक्ष्यभूत उदाहरण प्रायः अद्वैतपरक ही दिए गये हैं। इस ग्रन्थ की भाषा सरल है। इसकी “सरसामोद” टीका में आचार्य ने काव्यप्रकाश, ध्वन्यलोक, सरस्वतीकण्ठाभरण साहित्यदर्पण, कुवलयानन्द, रसगंगाधर आदि प्राचीन एवं अर्वाचीन काव्यशास्त्र का परिशीलन कर उनका सार प्रस्तुत किया है। 15 स्वाति तिरुनाल महाराजा (१८१३-१८४७ ई.) इनके पिता का नाम राजराजवर्म कोइतम्बुरान एवं माता का नाम लक्ष्मी था। ये केरल के निवासी थे। इन्हें हिन्दी, तेलगु, कन्नड़, पर्शियन, अंग्रेजी, संस्कृत आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान था एवं साहित्य तथा संगीत से विशेष अनुराग था। इन्होंने १८२६ से लेकर १९४७ ई. तक, १८ वर्ष तक राज्य किया। इनके काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ का नाम “प्रासव्यवस्था” है। इसमें गीतों के लिए प्रासों की दर्शन और शास्त्र ६६३ व्यवस्था का वर्णन है। इसके अतिरिक्त इन्होंने भक्तमंजरी, स्यानन्दूरपुरवर्णनचम्यू, श्रीपद्मनाभशतकम्, अन्यापदेशशतकम्, कुचेलोपाख्यानम्, अजामिलमोक्ष, गीत (१६७,) कीर्तन (१५०) रागमाला तथा उत्सवप्रबन्ध (गीतिकाव्य) नामक ग्रन्थों की रचना की। मारा कान्तिचन्द्र मुखोपाध्याय (१E वीं शताब्दी) - काव्यदीपिका, कलकत्ता से प्रकाशित। यह ग्रन्थ आठ शिखाओं में विभक्त है, जिनमें समस्त काव्यशास्त्रीय तत्त्वों का विवेचन है। आचार्य ने काव्यप्रकाश, साहित्यदर्पण आदि ग्रन्थों से लक्षण लेकर उनपर स्वरचित वृत्ति लिखी है। उदाहरण अभिज्ञानशकुन्तल, किरातार्जुनीय आदि काव्यों से दिये गये हैं। नक भास्कराचार्य, पेरुम्बुदूर (१६ वीं शती)-साहित्यकल्लोलिनी-इस ग्रन्थ में काव्यशास्त्रीय एवं नृत्यशास्त्र के तत्त्व व्याख्यात हैं। चण्ड मारुताचार्य (१८५०-१८६६ ई.) १-चित्रमीमांसोद्धारः (१८६० ई.) २-लघुरसकुसुमाञ्जलिः-ये दोनों काव्यशास्त्रविषयक ग्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने “विधुरविलापः” नामक व्याख्यान, “अलिनराजकथा" तथा “सुभाषितम्” नामक निबन्ध संग्रह भी लिखा। चावलि राम शास्त्री -(१६ वीं शती का उत्तरार्ध) १- कुवलयामोदः २- अलंकारमुक्तावली। मुरारिदान चरण, जोधपुर (जन्म १८३७ ई.) यशवन्तयशोभूषणम् (काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ भाषाभूषण का संस्कृत रूपान्तर) कृष्ण सुधी- इनके पिता श्री शिवराम एवं पितामह नारायण पण्डित थे। ये कांची के समीप स्थित उत्तमेरूर के निवासी थे। काव्यकलानिधिः (रचनाकाल-१८४५ ई.)। इसमें दस “कुसुम” हैं। प्रायः सारे काव्यशास्त्रीय तत्त्वों का इसमें विवेचन किया गया है। सीमारामभट्ट पर्वणीकर-ये सवाई जयसिंह तृतीय (१८१८-१८३४ ई.) के समकालीन थे। १-लक्षणचन्द्रिका २-काव्यप्रकाशसारः, ३-नायिकावर्णनम् ४-साहित्यसारः, ५- साहित्यसुधा ६- साहित्यतत्त्वम् ७- साहित्यार्णवः -साहित्यतरङ्गिणी E-शृङ्गारलहरी १०- काव्यत्तवप्रकाशः ११- साहित्यचिन्तामणिः। कोल्लूरि राजशेखर, आन्ध्रप्रदेश (१६ वीं शती) - ये आन्ध्र प्रदेश में सोमनाथपुरी के निवासी तथा पेशवा माधवराव (१७६०-१७७२) के कृपापात्र थे। “साहित्यकल्पद्रुमः" (८१ स्तबकों में) तथा “अलंकारमकरन्दः” इनकी साहित्यशास्त्रविषयक रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने “शिवशतकम्” “श्रीशचम्पू” अथवा “भागवतचम्पू’ नामक ग्रन्थों की भी रचना की। मुडुम्बी वेंकटराम नरसिंहाचार्य - विजयानगरम् के विजयराम गणपति आनन्दगणपति के आश्रम में रहकर इन्होंने संस्कृत साहित्य की बड़ी सेवा की। इनके साहित्यशास्त्र विषयक ग्रन्थों के नाम हैं- काव्योपोद्घातः, काव्यप्रयोगविधिः, काव्यसूत्रवृत्तिः एवं अलंकारमाला। इसके अतिरिक्त इन्होंने “विक्टोरियाप्रशस्तिः” देवोपालम्भः, नरसिंहादृहासः, जयसिंहाश्वमेधीयम्, युद्धप्रोत्साहनम् नामक काव्यों तथा अनेक स्तोत्रकाव्यों की रचना की।६६४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कि श्रीकृष्ण कवि (१८३५-१६०E)-इन्हें कृष्णशर्मन् अधा कृष्णावधूत भी कहा जाता है। इनके ग्रन्थ “मन्दारमरन्दचम्पू” में दिये गये आत्म-परिचय के अनुसार इनका निवास स्थान गुहपुर था तथा इनके गुरु वासुदेव योगीश्वर थे। इसके अतिरिक्त इनके कुल एवं समय के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता। परन्तु इनके ग्रन्थ के अलंकार प्रकरण पर “कुवलयानन्द” का व्यापक प्रभाव देखते हुए तथा कुछ अन्य तथ्यों की मीमांसा विद्वानों ने कर इनका समय १८३५ ई. से १६०६ ई. निर्धारित किया है। श्रीकृष्ण कवि ने काव्यशास्त्रविषयक चार ग्रन्थों की रचना की १-मन्दारमरन्दचम्पू २- काव्यलक्षणम् ३-रसप्रकाशः (काव्यप्रकाशटीका) और ४- सारस्वतालंकारसूत्र एवं भाष्य। “मन्दारमरन्दचम्पू” में लक्षण गद्य और पद्य दोनों में अर्थात् चम्पू शैली में उपनिबद्ध हैं। इसमें छन्दःशास्त्र, नाट्यशास्त्र, काव्यशास्त्र एवं कविशिक्षा विषयक सामग्री का निरूपण किया गया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ ११ बिन्दुओं में विभक्त है। इस ग्रन्थ तथा राजचूडामणि दीक्षितकृत काव्यदर्पण में कई स्थलों पर शब्दशः समानता है। यह ग्रन्थ काव्यमाला गुच्छक ५२ में केदारनाथ एवं वासुदेव लक्ष्मणशास्त्री पणशीकर के सम्पादकत्व में प्रकाशित है। अनन्तराय (अनन्ताचार्य) (१६ वीं शती ई.) इनका जन्म मैसूर प्रदेश के यादवगिरि (मेलकोट) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रृङ्गाराचार्य था। ये कृष्णराव वोदेयार तृतीय (१८२२-६२ ई.) के राज्याश्रित कवि और बिचारों से विशिष्टाद्वैतवादी थे। १-कविसमयकल्लोलः (काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ) २-कृष्णराजयशोडिण्डिमः। इन्होंने अनेक वादों की रचना की जो “वेदान्तवादावली” में प्रकाशित है। इलत्तूर रामस्वामी, केरल (१८२४-१६०७ ई.) इनके पिता का नाम शंकर नारायण शास्त्री था। १-रामोदयम् (अलंकारशास्त्रप्रधान महाकाव्य)। इसके अतिरिक्त इनके विभिन्न काव्य, स्तोत्र, नाटक, व्याख्यान ग्रन्थ तथा “क्षेत्रतत्त्वदीपिका” नामक एक ज्यामितीय ग्रन्थ भी है। कुल ३३ रचनाएँ। रत्नभूषण, पूर्वी बंगाल (सम्प्रति बांगलादेश)-काव्यकौमुदी (१८५६-रचनाकाल) इसमें दस परिच्छेद हैं, जिसमें प्रथम तीन व्याकरणात्मक हैं। इनमें नाम, लिङ्ग, धातु-प्रत्ययों का विवेचन किया गया है। शेष परिच्छेदों में काव्यलक्षण, ध्वनि, गुणीभूतव्यंग्य, गुण, अलंकार, दोषों का विवेचन है। नृसिंह शास्त्री (१८३०-१८७० ई.) इनका जन्म मैसूर के निकट यरालतिया गाँव में हुआ था। ग्रन्थ-काव्यसंशोधनम्। मा चन्द्रकान्त तालंकार, (१८३०-१६०६ ई.)-म. म. चन्द्रकान्त तर्कालंकार का जन्म कलकत्ता में हुआ था। इन्होंने गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज कलकत्ता में १८२६ ई. से १८३० ई. तक अध्यापन किया। १-अलंकारसूत्राणि (काव्यशास्त्रविषयक ग्रन्थ) २-सतीपरिणयम् (महाकाव्य) ३-चन्द्रवंश (महाकाव्य) ४-कौमुदीसुधाकरम् (प्रकरण) ५-स्मृतिचन्द्रिका ६-कातन्त्रछन्दःप्रक्रिया ७-मीमांसासिद्धान्तसंग्रहः। इन्होंने गोभिल गृह्यसूत्र का प्रकाशन भी किया (१८७१-८० ई.)। दर्शन और शास्त्र गदाधरनारायण भञ्ज (१८३१-१८६१ ई.) रसमुक्तावली । अणुरत्नमण्डन (१६ वीं शती)-ये तपगच्छा के जैन रत्नशेखर सूरि के शिष्य थे १- जल्पकल्पलता-कविशिक्षाविषयक २-मुग्धमेधाकरः अलंकार-विवेचन। सा रामाचार्य (मध्य प्रदेश)-ये कान्ताचार्य (१८५६-१८६२) के मातामह एवं गुरु थे। रदो दिनी-काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ। कच्छपेश्वर दीक्षित -१-रामचंद्रयशोभूषणम्- इस ग्रन्थ में तीन परिच्छेद हैं जिनमें प्रथम में श्रृंगाररस, द्वितीय में अन्य आठों रस एवं तृतीय में भावों का विवेचन किया गया है। श्रीकृष्ण ब्रह्मतन्त्र परकाल संयमीन्द्र (१८३६-१६१६) इनका संन्यास-पूर्व नाम कृष्णमाचार्य वकील था। इन्होंने अपने ग्रन्थ “अलंकारमणिहार” के उपोद्घात एवं उपसंहार में आत्मपरिचय दिया है। इनके पिता का नाम ताताचार्य और माता का नाम कृष्णाम्बा था। ये अमिडेला ग्राम के निवासी थे। इनका जन्म १८३६ ई. तथा देहावसान १६१६ ई. में हुआ। इन्होंने कुछ ६७ ग्रन्थ लिखे, जिनमें “अलंकारमणिहार” इनका काव्यशास्त्रविषयक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसका प्रकाशन गवर्नमेण्ट लाइब्रेरी सीरीज, मैसूर से चार भागों में हुआ है। ग्रन्थ स्वरचित कारिकाओं में लिखा गया है और कारिकाओं को स्पष्ट करने के लिए वृत्ति लिखी गयी है। इसमें समीक्षा शैली का आश्रय लेते हुए प्राचीन एवं अर्वाचीन आलंकारिकों के मतों के साधुत्व-असाधुत्व का विवेचन किया गया है। इन्चूर केशव नम्बूदरी (१८५५-१६३२) जन्मस्थान-इन्चूर। 9- कुलशेखरीयम् इसमें अलंकारों का निरूपण है। २-विधुवंशचम्पू। रंगनाथाचार्य, तिरुपति (१८५६-१६१६) “अलंकारसंग्रहः” इनका काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त इन्होंने २-सुभाषितशतकम् ३-श्रृङ्गारनायिकातिलकम् ४- गोदावचूर्णिका ५-हंससन्देशम् आदि काव्य भी लिखे। अम्बिकादत्त व्यास (१८५६-१६०० ई.)-साहित्यनलिनी। छविलाल सूरि (जन्म १८६० ई.)- वृत्तालंकारः-इन ग्रन्थ में प्रत्येक पद्य में छन्द और अलंकार का लक्षण है। २- विरक्तितरङ्गिणीशतकम्। नारायण शास्त्री, तंजौर (१८६०-१६११)-१-विमर्शः (६ भाग)। काव्यमीमांसा (२ अध्याय) इन दोनों काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने अनेक महाकाव्य, चम्पू, आख्यायिका, नाटकों (६१) महाप्रबन्धों (२१) की रचना की। अन्नदाचरण तर्कचूडामणि, बंगाल (जन्म १८६२ ई.)-ग. म. अन्नदाचरण तर्कचूडामणि हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक थे। १-रामाभ्युदयम् (महाकाव्य) २-ऋतुचित्रम् ३-काव्यचन्द्रिका (सरला टीका सहित) तथा २७ अन्य ग्रन्थ । राम सुब्रह्मण्य (राम सुब्बा) (मृत्यु १६२२ ई.) ये रामशंकर के पुत्र तथा शिवराम के आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास शिष्य थे। १- अलङ्कारशास्त्रसंग्रह अथवा अलङ्कारशास्त्रविलासः। इस ग्रन्थ में आचार्य ने विद्यानाथ की काव्यपरिभाषा की आलोचना की है। इन्होंने अनेक शास्त्रीय ग्रन्थों की भी रचना की। वेंकट “बालकालिदास’ (१E वीं शती का उत्तरार्ध) - नारायण के पुत्र, वेंकटशास्त्री के प्रपौत्र । १- चित्रचमत्कारमजरी (काव्यशास्त्रविषयक) २- सूर्यस्तवः । सुब्रह्मण्य शास्त्री (१६ वीं शती का उत्तरार्थ) - यशवन्तयशोभूषणम् । हरिदास सिद्धान्तवागीश (१८७६ ई. में जन्म) इनका जन्म पूर्व बंगाल के फरीदाबाद जिले में हुआ था। पिता गंगाधर विद्यालंकार तथा गुरु जीवानन्द विद्यासागर थे। काव्यकौमुदी रचनाकाल १८४२ ई. १३६३ बंगाब्द में कलकत्ता से प्रकाशित । इस ग्रन्थ में लक्षण सूत्रों में निबद्ध हैं। ग्रन्थ १५ कलाओं में विभक्त है, जिसमें सभी काव्यशास्त्रीय तत्त्वों का निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने २० अन्य काव्य और टीका ग्रन्थों की रचना की। मथुरानाथ शास्त्री (जन्म-१६०६ ई.) - जयपुर (राजस्थान) में जन्म, पिता द्वारकानाथ शास्त्री। ग्रन्थ १- काव्यकलारहस्य २- रसगंगाधर पर टिप्पणी। इसके अतिरिक्त भी इन्होंने कई काव्यग्रन्थों की रचना की। शिवदत्त शर्मा काव्यरसायनम् - (१६०३ ई. में रचित) जगन्नाथप्रसाद वर्मा - भावनिदर्शिका (१६०४ ई. में रचित) इस ग्रन्थ में अलंकारों का निरूपण है। नरसिंह आचार्य - पाश्चात्त्यशास्त्रसारः (१६०८ ई. में रचित) मणिशंकर गोविन्द - अलङ्कारमणिमाला (१६०६ ई. में रचित) रामावतार शर्मा (१८७४-१६२६) - साहित्यरत्नावली। पानी कालीपद तर्काचार्य (१८८८-१९७२) - जन्मस्थान-फरीदपुर जिला । मधुसूदन सरस्वती तथा हरिदास सिद्धान्तवागीश के वंशज। इनके पिता का नाम श्री सर्वभूषण हरिदास शर्मा था। १-काव्यचिन्ता २-काव्यपरिणतिः ३-काव्यलक्षणविमर्शः इन काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने दर्शनशास्त्र, नाटक, महाकाव्य कुल मिलाकर लगभग २४ ग्रन्थ लिखे। यदुनाथ झा (१८८५-१६२८) व्यञ्जनावादः इसमें व्यञ्जना की स्थापना नवीन ढंग से की गयी है। १६३५ ई. में वैशाली प्रेस, मुजफ्फरपुर से प्रकाशित।

  • सीताराम शास्त्री - साहित्योद्देशः, १६२३ ई. में प्रकाशित। इसके ऊपर भारद्वाज यज्ञेश्वर शर्मा मिश्र ने टिप्पणी लिखी है। लेखनाथ (१८८६-१६६५ ई.) - ये दरभंगा के महाराजाधिराज कामेश्वरसिंह के आश्रित थे। ग्रन्थ - रसचन्द्रिका, इस ग्रन्थ में नायक-नायिका भेद पर विचार है। इसके ឱ ឳ ! वर्शन और शास्त्र अतिरिक्त २ काव्यों की रचना तथा २ ग्रन्थों का सम्पादन भी किया। हरिशास्त्री दाधीच (जन्म-१८६३ ई.) अलकारकौतुकम्, अलङ्कारलीला आदि लगभग १६ ग्रन्थ। गगन गिरिधरलाल व्यास शास्त्री (जन्म १८८४ ई.) ग्रन्थ-अलंकारदर्पणम्- अभिनवकाव्यप्रकाशः (प्रथम, द्वितीय भाग) तथा काव्यसुधारक (चन्द्रालोक की वृत्ति) के अतिरिक्त ४ अन्य ग्रन्थ । श्वेतारण्यनारायण यज्वन् (२०वीं शती) १- वृत्तालकाररत्नावली सटीक, छन्द-अलंकारों के उदाहरण में राम की स्तुति। २- शिवार्थालङ्कारस्तवः - अलंकारों में शिव की स्तुति। छज्जू राम शास्त्री विद्यासागर, कुरुक्षेत्र -जन्म (१८६५ ई.) आधुनिक काव्यशास्त्रियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। “साहित्यबिन्दुः” “रसगंगाधरखण्डनम् तथा ‘परीक्षा” नाम्नी काव्यप्रकाश की टीका इनके महत्त्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ हैं। साहित्यबिन्दु मेहरचन्द लक्ष्मनदान, देहली से १६६१ ई. में प्रकाशित हुआ है। यह अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने न्याय, वेदान्त, व्याकरण, ज्योतिष, धर्मशास्त्र, नाटक आदि विषयक लगभग १४ ग्रन्थों की रचना की। कृष्णमाधव झा, बिहार-अलङ्कारविद्योतनम् (अलङ्कारशास्त्र का ग्रन्थ)। कौत्स अप्पल्ल सोमेश्वर शर्मा - ये श्री वेंकटेश्वर प्राच्य महाविद्यालय, तिरुपति में प्राध्यापक थे। ये व्याकरण तथा साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य थे। 9- साहित्यविमर्शः (१६४५-४६ में रचित), श्री वेंकटेश्वर ओरिएण्टल इंस्टीट्यूट से १६५१ में प्रकाशित। इसमें पौरस्त्य एवं पाश्चात्त्य दोनों की समन्वित नवीन पद्धति से काव्यशास्त्र का निरूपण किया गया है। ब्रह्मानन्द शर्मा (१E२३ ई. में जन्म)-१-वस्त्वलङ्कारदर्शनम्-इसमें अलङ्कारों का वैज्ञानिक रीति से विवेचन है। २- काव्यसत्यालोकः इसे आधुनिक काव्य शास्त्र में नयी सरणि प्रस्तुत करने वाला कहा गया है। ३-तत्त्वशतकम् ४- रसालोचनम्। गीत (शर्मा जी ने महात्मा जाझोजी (१४१५) के जीवन-दर्शन (सबदवाणी) पर आधारित जझेश्वर दर्शन की रचना भी की है।) टीका ग्रन्थ जीवानन्द विद्यासागर (१६ वीं शती) - इन्होंने “साहित्यदर्पण” पर “विमला” टीका लिखी। दुर्गाप्रसाद त्रिपाठी (१६ वीं शती)- इन्होंने ‘रसमजरी" पर टीका लिखी। इस काव्यशास्त्र परक टीका के अतिरिक्त इन्होंने ज्योतिष, कर्मकाण्ड तथा व्याकरण पर भी मूल ग्रन्थ तथा टीकाएं लिखीं। ला- महेशचन्द्र न्यायरल (१८३८-१६०५) काव्यप्रकाश पर टीका । “मृच्छकटिकप्रणेतृनिर्णयः” इनका आलोचनात्मक ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त इन्होंने मीमांसा, वेद विषयक ४ अन्य ग्रन्थों ६६८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास की भी रचना की। जग्गू वेंकटाचार्य-ये कर्णाटक (मैसूर) में वेदान्तबोधिनीसंस्कृत पाठशाला में प्राध्यापक थे। ग्रन्थ-कुवलयानन्दचन्द्रिकाचकोर:-यह वैद्यनाथ पायगुण्ड की टीका (कुवलयानन्द पर) “चन्द्रिका” की व्याख्या है। २-श्रीरसगंगाधरमर्मप्रकाशमर्मोद्घाटनम् नागेशभट्टकृत रसगंगाधर की टीका मर्मप्रकाश की व्याख्या इसमें नागेशभट्टकी आलोचना की गयी है। दोनों ग्रन्थ बंगलौर से प्रकाशित हैं। दशरथ द्विवेदी, उत्तर प्रदेश (१६ वीं शती का उत्तरार्ध) १- काव्यालङ्कारसूत्रभाष्य। २-पिगलछन्दःसूत्रभाष्य। इसके अतिरिक्त भी द्विवेदी जी ने आयुर्वेद, व्याकरण धर्मशास्त्र, भक्ति आदि संबंधी लगभग ८ ग्रन्थ लिखे हैं। मानवल्लि गङ्गाधरशास्त्री (१८५३-१६१३)-पिता-नृसिंह शास्त्री मानवल्लि, पितामह-सुब्रह्मण्य शास्त्री। गुरु-राजाराम शास्त्री, बालशास्त्री। “रसगंगाधर" पर टीका। इसके अतिरिक्त “अलिविलासिसंलाप” (खण्डकाव्य) तथा व्याकरण, न्याय, काव्यविषयक १३ अन्य ग्रन्थ लिखे। रायम्पेटा वेंकटेश्वर कृष्णमाचारियर (१८७४-१६४४) पिता-वेंकटेश्वर। ग्रन्थ-चित्रमीमांसा पर टीका। २४ अन्य ग्रन्थ। वामनभट्ट झलकीकर, महाराष्ट्र (१६ वीं शताब्दी का उत्तराध) - काव्यप्रकाश पर “बालबोधिनी” टीका। रामनाथ चतुर्वेदी, उत्तर प्रदेश (१८६६-१६३४) - रसमञ्जरी पर टीका। अन्य ग्रन्थ। राम षारक (२० वीं शती) १- कुवलयानन्द चन्द्रिका की व्याख्या २- ध्वन्यालोकलोचन की “बालप्रिया” व्याख्या। ३- चित्रमीमांसा की व्याख्या। १६ अन्य ग्रन्थ । खुद्दी झा-(२० वीं शती)-काव्यप्रकाश की व्याख्या। म. म. सु. नीलकण्ठशास्त्री (जन्म-१६०४ ई.) शास्त्री जी गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज, त्रिवेन्द्रम में न्याय विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रहे। १९५६ ई. में सेवानिवृत्त। ध्वन्यालोकोज्जीवनी, केरलविश्वविद्यालय विरुवनन्तपुरम् से १६८१ ई. में प्रकाशित। जैसा कि नाम से ही विदित है, यह ध्वन्यालोक की व्याख्या है। शास्त्री जी ने “सावित्री" (लघु नाटक) श्रीरामचरितम् (कम्बरामायणम् का संस्कृतानुवाद) तथा कात्यायनीव्रतम् आदि अन्य कृतियों की भी रचना की। कुप्पूस्वामी शास्त्री-ध्वन्यालोक पर व्याख्या- चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित। चण्डिकाप्रसाद शुक्ल, उत्तर प्रदेश (१६२१) शुक्ल जी ने प्रयाग विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण किया। ध्वन्यालोक की टीका “दीपशिखा” विश्वविद्यालयप्रकाशन- वाराणसी से प्रकाशित, १६८३ ई.। इसमें लेखक की ६६६ दर्शन और शास्त्र मान्यता है कि अभिनवगुप्त अनेक स्थलों पर आनन्दवर्धन के अभिप्राय-प्रकाशन में असफल रहे हैं। बदरीनाथ झा (२० वीं शती) - उपाधि-कविशेखर। १- रसमजरी पर “सुरभि” व्याख्या २- रसगंगाधर पर “चन्द्रिका” व्याख्या ३-ध्वन्यालोक पर ‘दीधिति" व्याख्या-ये तीनों व्याख्याएं चौखम्बा वाराणसी से प्रकाशित हैं। । वैद्यनाथ झा (१E३२ ई. में जन्म) - झा जी का जन्म बिहार प्रान्त के मधुबनी जिले में हुआ था। ये बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से १६६२ ई. में सेवानिवृत्त हुए। ध्वन्यालोकलोचनविमर्शः - मिथिला संस्कृत शोधसंस्थान, दरभंगा से प्रकाशित। केदारनाथ ओझा - इनके द्वारा लिखित रसगङ्गधर की व्याख्या सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित है। रेवाप्रसाद द्विवेदी (१E३५, मध्य प्रदेश) इनकी “काव्यालङ्कारकारिका” काव्यशास्त्र विषयक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें काव्यशास्त्रीय तत्त्वों पर नवीन ढंग से विचार किया गया है। द्विवेदी जी का काव्यदर्शन “प्रत्ययवादी” है। इसमें काव्यशास्त्र के “दर्शन” का सम्यक् विवेचन हुआ है। आचार्य द्विवेदी अलङ्कारवादी हैं। उनके अनुसार काव्य की आत्मा “अलङ्कार है और अलङ्कार का लक्षण “पर्याप्ति” है। इस सन्दर्भ में उन्होंने काव्य के छः प्रस्थानों रस, रीति, अलङ्कार, ध्वनि, वक्रोक्ति ओर औचित्य-की अलङ्कारवादी समीक्षा की है। द्विवेदी जी के अनुसार “ध्वनि” का अर्तभाव भी अलङ्कार में हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि सौम को निगल जाती है उसी प्रकार अलङ्कार ध्वनि को अस्मन्मते त्वलङ्कारः काव्यस्याङ्गस्य वीक्षणे। ध्वनि सोमं यथा वह्निः कवलीकृत्य राजते। इस ग्रन्थ में १८४ मूल कारिकाएँ हैं, जिनपर द्विवेदी जी ने संस्कृत एवं अग्रेजी में टीका लिखी है। इसके अतिरिक्त संग्रह एवं उपस्कार कारिकायें भी हैं। इसका प्रकाशन चौखम्बा सुरभारती, वाराणसी से १६७७ ई. में हुआ है। शिवजी उपाध्याय, उ. प्र. (जन्म-१६४७ ई. के लगभग) - उपाध्याय जी का जन्म उ. प्र. के मिर्जापुर जनपद में हुआ है। इस समय आप सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में साहित्य विभाग में प्राध्यापक पद पर कार्यरत हैं। इन्होंने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ “व्यक्तिविमर्शः” और दर्शनपरक ग्रन्थ “सर्वदर्शनविमर्शः” की रचना की। दोनों ग्रन्थ मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण हैं। व्यक्तिविमर्शः-यह एक नवीन सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाला मौलिक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में व्यञ्जना (व्यक्ति) को ही प्रधान शक्ति माना गया है। अभिधा और लक्षणा का अन्तर्भाव व्यञ्जना में ही हो जाता है। सम्पूर्ण ग्रन्थ कारिकाओं में उपनिबद्ध है, जिसपर ग्रन्थकार द्वारा स्वोपज्ञ वृत्ति भी रचित है। इनका एक अन्य दार्शनिक ग्रन्थ है - आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सर्वदर्शनविमर्शः -जो सायणाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह के आधार पर विरचित है। इस ग्रन्थ की विशेषता है- सभी दर्शनों में लक्ष्यैकप्रतिपादनत्व का सन्धान । ग्रन्थ १६६० ई. में वाराणसी से प्रकाशित है। जगन्नाथ पाठक (जन्म १६३४)-कविताशतकम् ‘विच्छित्तिवातायनी’ के अन्तर्गत प्रकाशित। ‘संस्कृत में काव्यसर्जना’ के पीछे कवि की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति की प्रक्रिया पर विचार नगण्यप्राय है। काव्य किसे कहते हैं, इस प्रश्न का जहाँ विशद विवेचन हुआ, वहीं काव्यसृष्टि की प्रक्रिया या कवि की भावभूमि के विषय में कुछ कहने की आवश्यकता आचार्यों ने नहीं समझी। इस दृष्टि से पाठक जी की यह रचना एक प्रशंसनीय देन है। स्वरूप की दृष्टि से यह काव्यविवेचन न होकर काव्य-प्रशंसा है, किन्तु बीच-बीच में काव्य-सर्जना की प्रक्रिया और कवि के भावनात्मक धरातल को निरूपित किया गया है।
  • रेवाप्रसाद द्विवेदी-शतपत्रम्-कालिदास संस्थान, वाराणसी सं. १६८७ ई. में प्रकाशित। यह कविता की प्रशंसा में रचित काव्य है किन्तु वस्तुतः इसमें काव्य का दर्शन उसका लक्षण, उत्पत्ति-प्रक्रिया सब कुछ व्याख्यात है। कवि की भाषा-शैली अत्यन्त सबल, परिष्कृत, प्रसादगुणोपेत और उच्छल-प्रवाहमयी है। उदाहरणार्थ कुछ पद्य द्रष्टव्य हैं कविता हृदयस्य संविधानं तरलस्य प्रणयेन मुक्तबन्थम् । वृणुते परतन्त्रता स्वतन्त्राः सुहृदो यत्र विना पराभियोगम् ।। कविता प्रणय-तरल हृदय का (न कि संसद् का) एक ऐसा मुक्तबन्ध (न कि बन्धनकारी) संविधान है, जिसमें स्वतन्त्र सुहृज्जन परतन्त्रता का वरण किया करते हैं, वह भी पराभियोग के बिना। कविता हृदयस्य कापि भाषा मुखरा मौनमयी वधू-वेव। न हि शक्तिरथो न तत्र भक्तिः प्रतिपत्तिस्तु समर्पणाय मार्गः। कविता हृदय की एक ऐसी भाषा है जो मुखर भी रहती है और मौन भी, नववधू की भाँति। यहाँ सम्पूर्ण अर्पण का एक मात्र उपाय है प्रतिपत्ति, न शक्ति और न ही भक्ति। विहितं सहकारमञ्जरीभिर् मृदु तल्पं चितिचञ्चरीकपत्न्यै। कवितेति निरुच्यते प्रपन्नैर् वचसां नृत्यविधी स्वतः प्रवृत्ते।। चितिभ्रमरी के लिए सहकारमंजरी जो मृदुतल्य बना दिया करती है। वही है कविता। वाणी जब स्वतः नर्तन करने लगती है तो उसी को सहृदय कविता कह दिया करते हैं।

समीक्षाशास्त्र

जयमन्त मिश्र (२०वीं शती)-कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व दर्शन और शास्त्र ६७१ कुलपति मिश्र जी कई वर्षों आल इण्डिया ओरिएण्टल कान्फ्रेंस के वेद, धर्मदर्शन और साहित्य के विभागीय अध्यक्ष रहे। आप १६६६ में होने वाली कान्फ्रेंस के संमान्य अध्यक्ष निर्वाचित किये गये। काव्यात्ममीमांसा-चौखम्बा-वाराणसी से प्रकाशित। म भागवतप्रसाद त्रिपाठी पुरी-(२०वीं शती)-रसनिष्पत्तितत्त्वालोक-सदाशिव केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ से १६८३ ई. में प्रकाशित। - रामजी उपाध्याय, उत्तर प्रदेश (२० वीं शती)-नाट्यशास्त्रीयानुसन्धानम् १६८५ ई. में भारतीय संस्कृति संस्थान, वाराणसी से प्रकाशित । इस ग्रन्थ में दस प्रकार के रूपकों के स्वरूप, तत्त्व, अगों एवं परिभाषिक शब्दों को विवेचनात्मक शैली में समीक्षित किया गया है। आवश्यकतानुसार अनेकानेक नाट्य-ग्रन्थों से अंश उदधृत किये गये हैं और उनकी समीक्षा प्रस्तुत की गयी है। यह नवीन ढंग का एक श्लाघ्य प्रयास है। एन.एन. चौधरी (२०वीं शती)-संस्कृत विभागाध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय। काव्यतत्त्वसमीक्षा- मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली द्वारा १६५६ ई. में प्रकाशित । ग्रन्थ६ उल्लासों में रचित है जिनमें प्रथम उल्लास में काव्य की आत्मा के सम्बन्ध में विविध मतों, द्वितीय में शब्दार्थ के स्वरूप एवं शब्दशक्तियों, तृतीय में शब्दों की अर्थव्यञ्जकता, चतुर्थ में रस, पञ्चम में ध्वनि, षष्ठ में गुण-दोष-अलंकारों के विषय में विचार किया गया है। यह आधुनिक समीक्षाशास्त्र की विवेचनात्मक शैली में प्रणीत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष और मूर्धन्य विद्वान् श्री सत्करी मुखर्जी ने इस ग्रन्थ का “प्राक्कथन” लिखा है।

छन्दःशास्त्र

दुःखभजन कवीन्द्र, उत्तर प्रदेश-ये सहित्य, संगीत, ज्योतिष तथा दर्शनशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् थे। वाग्वल्लभः- काशी संस्कृत सीरीज से १६३३ ई. में प्रकाशित । इस पर इनके पुत्र पं. देवी प्रसाद कविचक्रवर्ती ने “वरवर्णिनी’ टीका भी लिखी है। ग्रन्थ की भूमिका देवी प्रसाद जी के गुरु पं. दामोदरलाल गोस्वामी द्वारा लिखी गई है। यह ग्रन्थ छन्दःशास्त्र का प्रतिपादन करने वाला बड़ा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। अयोध्याप्रसाद शास्त्री, उ. प्र. (२० वीं शती) - एटा मण्डल के अन्तर्गत ‘सोरो” के समीप होडलपुर ग्राम में इनका जन्म हुआ था। पं. वशिष्ठ सनाढ्य इनके गुरु थे। बाद में ये रायबरेली में रहने लगे थे। छन्दोवैभवम्- आचार्य कुटीर, सत्यनगर, रायबरेली से १६६३ ई. में प्रकाशित (द्वितीय सोपान) इसके प्रथम सोपान में एकाक्षरपाद वृत्त से लेकर अष्टाक्षर पाद वृत्तों तक सभी संभावित वृत्तिभेद, उनके प्रस्तार प्रक्रिया और स्वरूपानिदर्शन पूर्वक उदाहरणों के साथ निरूपित हैं। द्वितीय सोपान में बृहती नामक नवाक्षरपाद वृत्त के भेदोपभेद स्वरूपनिरूपण पुरस्सर वर्णित हैं। ६७२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

सौन्दर्यशास्त्र

सौन्दर्यशास्त्र एक अद्यतन शास्त्र है। यह शब्द पहले हमारे यहाँ, व्यवहृत नहीं हुआ। एक प्रकार से यह पश्चिम की देन है। पश्चिम में भी सौन्दर्यशास्त्र का विकास सौन्दर्यशास्त्र के रूप में कोई अधिक प्राचीन नहीं है। इस शास्त्र का जिससे आरम्भ माना जाता है उस अरस्तू की कृति का नाम “एस्थेटिक्स” नहीं “पोयटिक्स” है। हमारे यहाँ भी प्राचीन काल में सौन्दर्यशास्त्र अलंकारशास्त्र किंवा काव्यशास्त्र का ही अन्तर्वर्ती विषय था। वामन ने अलंकार की परिभाषा लिखी-सौन्दर्यमलङ्कारः, और काव्य के बाह्य शैलीगत सौन्दर्य एवं आभ्यन्तर इस सौन्दर्य की चर्चा तथा नायिका के माधुर्य दीप्त्यादि रूपसौन्दर्य की चर्चा वहीं की गयी। साहित्य पाँच कलाओं में से मूर्धन्य कला है। जैसे इसमें सौन्दर्य को अविनाभाव से जोड़ा गया वैसे अन्य संगीत, चित्रकला, मूर्ति एवं स्थापत्य कलाओं के सन्दर्भ में इसकी यत्र-तत्र चर्चा होती रही। समीक्षकों की धारणा है कि भारतीय परम्परा में सौन्दर्यशास्त्र का पश्चिमी मूल्यों जैसा अध्ययन नहीं हुआ, परन्तु भारतीय काव्यशास्त्र के रससिद्धान्त को उसके समकक्ष रखा जा सकता है और इसीलिए रससिद्धान्त एवं सौन्दर्यशास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन करने की परम्परा लगभग प्रतिष्ठित हो चुकी है। रस और सौन्दर्य दोनों “आनन्द” प्रदान करते हैं, सहृदय को विगलितवेद्यान्तर बना देते हैं और दोनों “ध्वनित” या अभिव्यक्त होते हैं। सौन्दर्य का विवेचन वस्तुवादी एवं प्रमातृवादी (सहृदयवादी) दोनों दृष्टियों के आधार पर किया जा सकता है। वस्तु का बाह्य आकार, उसका सौष्ठव क्रमव्यवस्था, विचित्रता, स्पष्टता आदि प्रेक्षक के हृदय में सौन्दर्यानुभूति के उद्भावक बनते हैं, पर मूलतः वह बड़ी आँखों, नुकीली नाक या शंख जैसी ग्रीवा में नहीं रहता। वह तो अङ्गना के अगों में से छनकर आने वाला कोई मुग्ध कर देने वाला भाव है, जो बरबस मन को आकर्षित कर उसे आनन्द में डुबो देता है। जैसा कि शकुन्तला को देखकर दुष्यन्त के मुख से निकला था “अये, लब्धं नेत्रनिर्वाणम्”। सौन्दर्य “व्यञ्जना” है, सौन्दर्य “ध्वनि” है। यह अतिव्यापक है, इसीलिए सौन्दर्य दर्शन के लिए विशेष प्रकार की संवेदनशीलता, विशेष दृष्टिसौन्दर्य का हृदयसौन्दर्य होना आवश्यक है। इसीलिए भारत में इस विवेचन से पहले जहाँ वस्तुगत और प्रमातृगत दोनों रहा है, वहाँ उत्तरोत्तर प्रमातृगत होता गया है। प्लेटो, रस्किन प्रभृति कई पाश्चात्त्य सौन्दर्यशास्त्री भी सौन्दर्यदर्शन को वस्तु के आकार-प्रकार तक सीमित न रखकर उसे प्रमाता के साथ जोड़ना चाहते हैं। प्लेटों का तो कथन है कि जो भी सौन्दर्य के तत्त्व की यथोचित खोज करने में दत्तचित्त होगा, उसे विभिन्न सुन्दर रूपों को देखने से पता लगेगा कि एक रूप की सुन्दरता दूसरे रूप की सुन्दरता से भिन्न नहीं है। सौन्दर्य के प्रति वस्तुगत और प्रमातृगत दृष्टियों के अलावा सौन्दर्यदर्शन को पदार्थवादी और आध्यात्मिक धरातल पर भी परखा गया है। सौन्दर्य केवल शरीर का ही गुण नहीं है, शरीर-सौन्दर्य के ऊपर मन का सौन्दर्य, उसके ऊपर प्रज्ञात्मक सौन्दर्य और दर्शन और शास्त्र सर्वोपरि नैतिकता अथवा चेतना का सौन्दर्य स्वीकार किया गया है। यद्यपि पश्चिम के सौन्दर्य चेताओं में सौन्दर्यानुभूति एवं नैतिकता के सम्बन्ध को लेकर तीव्र मतभेद रहा है। कुछ आचार्य सौन्दर्यानुभूति और नैतिकता को परस्पर निरपेक्ष रूप में स्वीकार करते हैं, कुछ उन्हें परस्पर संबद्ध मानते हैं, परन्तु भारतीय आचार्यों की दृष्टि इस विषय में निर्द्वन्द्व रही है। कालिदास ने कुमारसम्भव में कहा है ‘यदुच्यते पार्वति पापवृत्तये न रूपमित्यव्यभिचारि तद्वचः’, अर्थात् रूप कभी पाप को जन्म नहीं दे सकता। नैतिकता एवं रसानुभूति में सहज अन्तरङ्ग सम्बन्ध है। रसानुभूति सत्त्वोद्रेक से होती है और सत्त्वगुण से उत्पन्न मनःस्थिति कभी अनैतिक नहीं हो सकती। “रस” संवित् या चिति के उदात्तस्तर से सम्बद्ध होने के कारण अनैतिक नहीं हो सकता। “औचित्य” की भी सौन्दर्यदर्शन में अहम् भूमिका है। जिस देश, काल, समाज और परिस्थिति में जो उचित है वही “सुन्दर” लगता है। यहाँ औचित्य को व्यापक अर्थों में लिया जाना चाहिये। क्षेमेन्द्र ने अपने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ ‘औचित्यविचारचर्चा" में इसका विस्तृत निरूपण किया है। इस प्रकार, पहले भारतवर्ष में सौन्दर्यविवेचन मुख्यतः काव्यशास्त्र का विषय था और उसी के अन्तर्गत इसपर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किये गये थे। परन्तु इधर स्वतन्त्र रूप से सौन्दर्यशास्त्र पर कुछ रचनाएं प्रकाश में आयी हैं, जिनपर आगे चर्चा की जायगी। जगन्नाथ पाठक, बिहार (जन्म १६३४)-सौन्दर्यकारिका-सौन्दर्यशास्त्रपरक ये १०२ कारिकाएँ पाठक जी की रचना “विच्छित्तिवातायनी” (मुक्तक काव्य-संग्रह) में संकलित और प्रकाशित हैं। यह ग्रन्थ १६६१ ई. में इलाहाबाद में ही मुद्रित हुआ। रचयिता की इन कारिकाओं पर स्वोपज्ञ संस्कृत टीका भी है, जिससे उसके सौन्दर्य दर्शन पर अधिक स्पष्ट दृष्टि पड़ती है। यह रचना संस्कृत में एक अभिनव प्रयोग है, अतः इसके विषय में कुछ वक्तव्य है। इस रचना में संभवतः प्रथम बार “सौन्दर्यशास्त्र” को एक स्वतन्त्र दृष्टिकोण से देखा गया है। वह “काव्यशास्त्र” का अङ्गभूत अलङ्कार और रसविवेचन मात्र नहीं, विश्व की प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक कलाकृति, प्रत्येक कण-कण में व्याप्त सौन्दर्य है। सौन्दर्य के प्रति रचनाकार की दृष्टि एक मुग्ध, विनीत अर्चक आराधक की सी है। वह सौन्दर्य को आकार और पदार्थ की बाह्य प्रतीति तक सीमित न रखकर उसे अमूर्त स्पर्शवर्जित अनुभूति तक ले जाता है जो दीपक की प्रभा अथवा मुक्ता की तरलता की भाँति पदार्थ के आकार के पीछे कहीं अन्तर से छनकर जाती हुई अभिव्यक्त होती है। सौन्दर्यानुभूति बाह्य सामग्री निरपेक्ष है। जिनकी सौन्दर्यदृष्टि सूक्ष्मग्राहिका है वे पक्षियों के कलरव से व्याप्त, शफरीनर्तित, स्वच्छ जल से परिपूर्ण सरोवर में जितना रमते हैं उतना ही ग्रीष्मकाल में सूखे हुए सर में भी६७४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास स्वच्छाम्भःपरिपूर्ण सुन्दरमस्त्येव निश्चयेन सरः। शुष्कमपि प्रतिभाते सुन्दरमित्याहुरतिनिपुणाः।। जो चित्त को तत्क्षण समुत्सुक बना दे, मन को सुकुमार ढंग से झटिति हरण कर ले, चेतना को इतना डुबो दे कि भान ही भूल जाय, वहीं तो सौन्दर्य है! यहाँ आकर सौन्दर्यानुभूति वस्तु को प्रमाता (भावुक) से जोड़ती है। सौन्दर्य का संवेदन करने वाली दृष्टि के आलोक में पड़कर वस्तु का सौन्दर्य कई गुना होकर स्फुरित होने लगता है। भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि से उत्प्रेरित ग्रन्थकार सौन्दर्य को सत्यम् शिवम् सुन्दरम्, ब्रह्म से अभिन्न मानता है। विश्व में जो कुछ सत्य है, वह मङ्गलकारी है और जो सत्य और मङ्गलकारी है, वही सुन्दर भी है। जीवन जितना सुन्दर है, उतनी ही मृत्यु भी जीवनमपि सौन्दर्य सौन्दर्य मृत्युमपि समं चाहुः । व्याकीर्णा धीर्येषां त एव भेदं प्रकुर्वन्ति।। २८ ।। सौन्दर्यानुभूति कभी अनैतिक नहीं हो सकती, क्योंकि यह सत्त्वोद्रेक से युक्त चित्तवृत्ति में प्रकट होती है और ऐसी दशा में काम क्रोधादि रह नहीं सकते। यह विश्व की परम पवित्र और सुकुमार भावना है जो तनिक सा विरूप भाव आते ही तत्काल नष्ट हो जाती है। इस प्रकार, पाठक जी की यह रचना विद्वानों द्वारा मननीय है। गोविन्द चन्द्र पाण्डेय (१६२३, अल्मोड़ा, उत्तर प्रदेश) “भक्तिदर्शनविमर्शः” (१६६१) के पश्चात् गोविन्द चन्द्र पाण्डेय का “सौन्दर्यदर्शनविमर्शः" नाम का ग्रन्थ, जिसमें पाण्डेय जी के सम्बद्ध विषय पर तीन व्याख्यान संगृहीत हैं, सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय, वाराणसी से १६६५ में सद्यः प्रकाश में आ चुके हैं। पाण्डेय जी पं. विद्यानिवास मिश्न के शब्दों में “भारतीयमनीषाया भूमैकनिष्ठाया नाल्पसन्तुष्टाया अखण्डतानुसन्धायिन्याः प्रतिमानभूताः। हैं- संस्कृति, इतिहास तथा बौद्धदर्शन के अभिनिविष्ट विद्वान् पाण्डेय जी ने सौन्दर्यशास्त्र को विज्ञान न मानकर दर्शन का ही विभागविशेष माना है। ग्रन्थ के तीनों व्याख्यानों के शीर्षक हैं-१. सौन्दर्यशास्त्रस्वरूपालोचनम्, २- रूपतत्त्वविमर्शः, और ३-रसतत्त्वविमर्शः। प्रथम अध्याय में, जैसा कि स्वयं पाण्डेय जी लिखते हैं सौन्दर्यशास्त्र की इतिहासपरतन्त्रता की आलोचना की है। सौन्दर्य की बुद्धि लक्ष्य की अपेक्षा से उत्पन्न होती है और सौन्दर्य की मीमांसा पुरूषार्थ की दृष्टि और आन्वीक्षिकी की अपेक्षा करती है। इस प्रकार देश और काल के भेद से लक्ष्यों के भिन्न होने पर तथा दृष्टियों के विपरिवर्तमान होने की स्थिति में सौन्दर्य-मीमांसा का अवधारण भी भिन्न हो ही जाता है। पाण्डेय जी के अनुसार सौन्दर्य-बुद्धि के दो पक्ष हैं-एक तो प्रातिभकल्पना द्वारा सृष्ट रूप का प्रतिभास और दूसरा सहृदय के विवेक द्वारा संगत रसास्वाद। दूसरे अध्याय में नाना युगों में विवर्तित काल, शिल्प, सङ्गीत के व्यापक रूप की कल्पना के भेद बताते हुए तथा उनसे सम्बद्ध आशंकाओं पर विचार करते हुए व्यञ्जकत्व को ही पर रूप धर्म स्वीकार किया है। तृतीय ६७५ दर्शन और शास्त्र अध्याय में भरत मुनि के रस सूत्र के व्याख्यानों को प्रस्तुत करके उनकी आलोचना की है। सामान्यतः आचार्य अभिनवगुप्त के रस सूत्र के व्याख्यान का समर्थन करते हुए, आचार्य अभिनवगुप्त के भाव-निरूपण तथा रससंख्यानिर्धारण पर पुनर्विचार करने के लिए (विद्वानों से निवेदन किया है। समग्र ग्रन्थ सौन्दर्यशास्त्र पर भारतीय तथा पाश्चात्य चिन्तन के आधार पर प्रस्तुत एक विचारोत्तेजक निर्माण है। विश्वास है, इससे भविष्य में अनेक विचारक प्रेरित होंगे और सौन्दर्यशास्त्रीय चिन्तन को और विकसित करेंगे।

सङ्गीतशास्त्र

राम पाणिवाद (१६ वीं शती)-तालप्रस्तरः-इसमें तालों का प्रतिपादन है। कृष्णानन्द व्यास (१६ वीं शती)-रागकल्पद्रुमः (१८२५ ई.) कलकत्ता से प्रकाशित। व्यास जी को मेवाड़ की महारानी ने “रागसागर” की उपाधि प्रदान की थी। कृष्ण बनर्जी (१६ वीं शती) गीतसूत्रसारः (१८५६ ई.)- यह संगीतशास्त्र विषयक एक उत्तम ग्रन्थ है। स्वाति तिरुनाल (१८१३-१८४७)-संगीतसारसंग्रहः (१८७५ ई.) विष्णुनारायण भारतखण्डे, महाराष्ट्र (१८६०-१६३६ ई.)-संगीतशास्त्र के महान पण्डित एवं कलाकार श्री विष्णुनारायण भातखण्डे का नाम आधुनिक काल के संगीतशास्त्रज्ञों में सर्वोपरि है। इनका जन्म १० अगस्त, १८६० ई. को बम्बई में हुआ था। इनका मराठी, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, गुजराती, संस्कृत इन सभी भाषाओं पर विलक्षण अधिकार था। इन्होंने अन्य भाषाओं के अतिरिक्त संस्कृत में संगीतशास्त्र सम्बन्धी निम्न महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की-१-श्रीमल्लक्ष्यसङ्गीतम्- यह इनका संस्कृत में उपनिबद्ध अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें श्री भातखण्डे ने आधुनिक काल में प्रचलित सङ्गीत जिसे वे “लक्ष्य” कहते हैं, को विवेचित किया है। उन्होंने विभिन्न संगीतज्ञों के अनुसार प्रस्तुत रागों के स्वरूप में समानता और भिन्नता का विवेचन कर ‘राग’ के मूल स्वरूप को निर्धारित करने का प्रयास किया है। इस ग्रन्थ के प्रणयन में लेखक का सङ्गीतसम्बन्धी पाण्डित्य, आनुभविक ज्ञान और ऐतिहासिक दृष्टि सराहणीय है। २-अभिनवरागमञ्जरी-इसमें रागों का विवेचन है। ३- अभिनवतालमञ्जरी-इस ग्रन्थ में तालों का निरूपण किया गया है। इनका स्वर्गवास १६ अगस्त, १६३६ ई. को हुआ। जगदीशचन्द्र आचार्य, जोधपुर - सङ्गीतलहरी ।

कामशास्त्र

गङ्गाधरशास्त्री मंगरूलकर - रतिकुतूहलम् । कुट्टमत्तु कुंजुन्नि कुरुप्प (१८१३-१८८५) -रतिप्रदीपिका। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास शिवराम - भूपालविलासः। सहिवम - पञ्चसायकम् (१८७५ ई.) नारायणभट्ट पर्वणीकर - अनङ्गरङ्गोदयस्थलम् व्रजरत्न भट्टाचार्य - रसिकरहस्यम् (१८६६ ई.)-समय मथुराप्रसाद दक्षित - केलिकुतूहलम्

मनोविज्ञान

विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि, उत्तर प्रदेश (२० वीं शती)- मनोविज्ञानमीमांसा-आत्माराम एण्ड सन्स दिल्ली से १६५६ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में क्रीड़ा, शिक्षण, अवधान, प्रकृति (आदतों) इच्छित क्रियाओं, चरित्र, संवेदन, प्रत्यक्ष, स्मृति, कल्पना, विचार, संवेग, बुद्धिपरीक्षा आदि मनोवैज्ञानिक विषयों का विवेचन किया गया है। नयी मनोवैज्ञानिक विचारधाराओं का भी परिचय दिया गया है। ग्रन्थ में कुल २५ परिच्छेद हैं। रामस्वरूप शास्त्री उ. प्र. (२० वीं शती) - स्वप्नविज्ञानम् - अलीगढ़ विश्वविद्यालय से १६६० ई. में प्रकाशित। यह मौलिक तत्त्वविवेचन से युक्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। व्रजबिहारी चतुर्वेदी (१८६६-१६४५) मनोविज्ञानम्। मामराजदत्त कापिल, उ.प्र.(२० वीं शती)-अर्वाचीनं मनोविज्ञानम्- सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय वाराणसी से १६६५ ई. में प्रकाशित । रचनाकाल १६५७ ई.। यह ग्रन्थ षोडश अध्यायों में रचित है। प्रथम अध्याय में मनोविज्ञान की परिभाषा, उसके अध्ययन की प्रणाली, उसकी विविध शाखाएँ एवं सम्प्रदाय तथा उसका अन्य विज्ञानों के साथ सम्बन्ध वर्णित है। द्वितीय अध्याय में मन सम्बन्धी शरीरसंरचना एवं षट्चक्रों का वर्णन है। तृतीय अध्याय में व्यक्ति पर वंशानुक्रम और वातावरण सम्बन्धी प्रभाव के विषय में विभिन्न मतों और तत्त्वों का विवेचन है। चतुर्थ में सहज, क्रियाओं, मूल प्रवृत्तियों आदि का, पाँचवें में चेतना के स्वरूप का, छठे में एकाग्रता, सातवें में प्रत्यक्ष ज्ञान, आठवें में सविकल्पक प्रत्यक्ष, नवें में अभ्यास, शिक्षण आदि का दसवें में विचार का ग्यारहवें में कल्पना, बारहवें में स्मृति, तेरहवें में संवेदनभावादि, चौदहवें में असामान्य मनोविज्ञान सम्बन्धी बातों का विस्तृत विवेचन है। प्राच्य शास्त्रीय ज्ञान को अर्वाचीन गवेषणाओं से जोड़ते हुए वैज्ञानिक शैली में प्रणीत यह प्रौढ़ रचना है। प्रभुदयाल अग्निहोत्री, उ. प्र.-अभिनवमनोविज्ञानम् (चित्रसहित)-सम्पूर्णानन्द ग्रन्थमाला ६ में वाराणसी में प्रकाशित, १६६५ ई.। व्ही. एस. वेङ्कटराघवाचार्य, आन्ध्र प्रदेश-शिक्षामनोविज्ञानम्-केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ तिरुपति द्वारा सन् १६७१ ई. में प्रकाशित। दीनेशचन्द्र शास्त्री-प्राचीनभारतीयमनोविद्या-सामान्य तथा विशेष नामक दो अध्यायों दर्शन और शास्त्र ១២ में प्रणीत। १९७२ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित।

भाषा विज्ञान

ए. आर. राजराजवर्म कोइतम्बुरान् (१८६३-१६१६)-भाषोत्पत्तिः-इस ग्रन्थ में ग्रन्थकार ने भाषाविषयक भारतीय व पाश्चात्य मती की समीक्षा की है। आर. एस. वेङ्कटराम शास्त्री (२० वीं शती)-ये मद्रास संस्कृत कालेज में प्रोफेसर थे। भाषाशास्त्रप्रवेशिनी- बाल मनोरमा सीरीज-२८ में प्रकाशित, १६३८ ई.। यह अर्वाचीन भाषाविज्ञान की भाषा एवं शैली में रचित विवेचनात्मक लघु ग्रन्थ है। SEE

गणित और विज्ञान

पी. सुब्बाराय, आन्ध्र प्रदेश-शैक्षिकी सांख्यिकी, केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरुपति द्वारा सन् १६८२ ई. में प्रकाशित । रेवाप्रसाद द्विवेदी, उत्तर प्रदेश - कार्णायसस्य प्रभवः - (भिलाई स्टील प्लांट) हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित। रामनिहाल शर्मा, मध्य प्रदेश - जन्तुविज्ञानम् (विषय-वस्त्रविज्ञान) जापान धुनीराम त्रिपाठी - प्राच्यभारतीयं ऋतुविज्ञानम्- यद्यपि यह एक शोधप्रबन्ध है, परन्तु विषय-प्रतिपादन की नवीन और वैज्ञानिक दृष्टि के कारण एक मौलिक ग्रन्थ सा महत्त्व रखता है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से १६७२ ई. में प्रकाशित। सामान

वास्तुशास्त्र

द्विजेन्द्रनाथ शुक्ल, उ. प्र. (२० वीं शती)-गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में कार्यरत थे। वास्तुशास्त्रम्-शिल्पशास्त्र एवं चित्रकला विषयक शास्त्र का ग्रन्थ । इस ग्रन्थ की भूमिका में उल्लेख है कि टी. गोपीनाथ राव ने ४० वर्ष पहले वास्तुशास्त्र विषयक ४ ग्रन्थों को रचकर प्रकाशित किया।

भूगोल

ए. आर. राजराजवर्म कोइतम्बुरान (१८६३-१६१६) भूगोलविवृतिः-पाश्चात्य भूगोल शस्त्र के आधार पर प्रणीत ग्रन्थ है। ए. कुप्पूस्वपमी शास्त्री-भूगोलशासनम् ।

इतिहास

आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास भूदेव मुखोपाध्याय (१८२५-१६२१) -स्वप्नलब्धभारतस्येतिहासः। ताराचरण भट्टाचार्य-भारतगीतिका-इस ग्रन्थ में भारतवर्ष का राजनैतिक इतिहास गीतों में लिखा गया है। रमेशचन्द्र शुक्ल-भारतस्वातन्त्र्यसमामेतिहासः-देववाणी परिषद्, दिल्ली द्वारा प्रकाशित। “रसदर्शनम्” इनकी साहित्यशास्त्रविषयक सुप्रसिद्ध रचना है। दिनेशचन्द्र पाण्डेय (२० वीं शती) सिमडेगा कालेज, रांची (बिहार) के प्राचार्य रहे। भारतीयकांग्रेसस्येतिहासः-१९६४ ई. में सारन से प्रकाशित । इस ग्रन्थ में १८५७ ई. से लेकर १६४७ ई. तक भारत का स्वातन्त्र्यान्दोलन वर्णित है। इस आन्दोलन में कांग्रेस का जन्म और उसकी भूमिका क्रमवार प्रस्तुत की गयी है। न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से भाषा और राष्ट्रीयता की दृष्टि से भी ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण है। रामावतार मिश्र, (१८८६-१९८४)-ये बिहार राज्य के गया मण्डल के अन्तर्गत बेनीपुर ग्राम के निवासी थे। भारतवर्षेतिहासः - २३२ पद्यों में रचित भारतवर्ष का संक्षिप्त इतिहास। रांची से १६८६ ई. में प्रकाशित। गिरिधरलाल व्यास, उदयपुर-मेदपाटेतिहासः-मेवाड़ का पद्यात्मक इतिहास। अज्ञातकर्तृक- कश्मीरेतिहासः। लाल बहादुर शास्त्री केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, दिल्ली से प्रकाशित। काशीनाथ मिश्र, बिहार (१६३० ई. में जन्म-लगभग) ये चयनपुर (सहरसा) के निवासी हैं। ये पटना यूनिवर्सिटी में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहे। कर्णाटराजतरङ्गिणी-१६६४ ई. में पटना से प्रकाशित। इस ग्रन्थ में मिथिला में कर्णाटवंशीय राजाओं, हरिसिंहदेव आदि के शासनकाल का वर्णन है। इसमें मिथिला की संस्कृति का सजीव चित्रण मिलता है।

राजनीतिशास्त्र

कौटिलीय अर्थशास्त्र पर टीकाएँ म. म. टी. गणपतिशास्त्री, (१६-२० वीं शती) कौटिलीयमर्थशास्त्रम् पर “श्रीमूला” व्याख्या। इसे प्रथम बार शास्त्री जी ने १६२४ ई. में अनन्तशयन राजकीय मुद्रणालय से प्रकाशित कराया था, १६६१ ई. में इसका पुनः प्रकाशन सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से हुआ है। राजेश्वर शास्त्री द्रविड़ (उत्तर प्रदेश) १६७६ ई. में देहावसान - ये वाराणसीवासी थे। ग्रन्थ-कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम् पर “वैदिकसिद्धान्तरक्षिणी” टीका । यह टीका कामन्दकीय नीतिसार तथा अर्थशास्त्र की जयमंगला टीका को आधार मानकर लिखी गयी है। इस दर्शन और शास्त्र ६७E मौलिक टीका में विभिन्न शास्त्रीय विषयों की अवतारणा की गयी है तथा विरोधों का परिहार भी किया गया है। इन्होंने अर्थशास्त्र के १५ अधिकरणों में से प्रथम अधिकरण के सम्पूर्ण १७ अध्यायों पर अपनी टीका लिखी है, परन्तु केवल पहले और दूसरे अध्याय की टीका ही प्रकाशित है। हनुमान मन्दिर न्यास, कलकत्ता तथा गीर्वाण वाग्वर्धिनी सभा, रामघाट, वाराणसी द्वारा वि. सं. २०३१ (१६७५ ई.) में प्रकाशित। नि अशोक चैटर्जी शास्त्री-कलकत्ता विश्वविद्यालय में संस्कृत प्राध्यापक श्री शास्त्री ने “कौटिलीयार्थ शास्त्रचर्चा” नामक अर्थशास्त्र पर विचार पूर्ण ग्रन्थ लिखा जो १६८२ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ।

कृषि

शालग्राम शास्त्री (१८८५-१६४०) - भारतीयकृषकः ।

पाककला

पी. एस. अनन्तनारायण शास्त्री (१८८५-१९४७) - पाकतत्त्वम्।

आखेट

विश्वनाथ सिंह (१७८१-१८५४) १- धनुर्विद्या २- राजुरञ्जनम्।

मनोरञ्जन

कृष्णचन्द्रदेव - मोदमञ्जूषा (१८६७ ई.) गौरीशङ्कर भट्ट-मनोरञ्जनसंग्रह : (१८६६ ई.)

कोशग्रन्थ

आर्वाचीन युग में यूरोपीय सभ्यता एवं उसमें निहित वैज्ञानिक विवेचनात्मक अन्तर्दृष्टि के सम्पर्क में आने के परिणामस्वरूप संस्कृत कोषों का प्रणयन अकारादिक्रम से होने लगा। शब्दों के प्रकृति-प्रत्ययों का विभाजन कर उनके अर्थविवेचन में सूक्ष्मता लाने का प्रयास किया गया तथा शब्दों के अर्थों को स्पष्ट करने हेतु विषयों के निर्देश, उद्धरण आदि दिये जाने लगे। म.म.पं. रामावतार शर्मा का “वाङमयार्णवकोष” अमरसिंह की नामलिङ्गानुशासन परम्परा पर आधृत अन्तिम कोष है, परन्तु उसमें भी वैज्ञानिक वर्णक्रम से शब्दचयन किया गया है और उस पर आधुनिकता का पूर्ण प्रभाव है। “शब्दकल्पद्रुम” और “वाचस्पत्यम्” तो पूरी तरह अर्वाचीन परम्परा के हैं, जिनमें शब्दों के आगे प्रकृति-प्रत्ययों का विभाजन आदि दिया गया है। ताल अर्वाचीन युग में देश में विश्वविद्यालयों एवं अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थानों में बहुलता से शोधकार्यों के प्रवर्तित होने के कारण विभिन्न शास्त्रों से सम्बन्धित कोशों की आवश्यकता पड़ने लगी और आवश्यकता आविष्कार की जननी है, अतः लगभग प्रत्येक शास्त्रविषयक ६८० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कोश भी इस युग में रचे गये जो “विश्वकोश” एवं “पारिभाषिक कोश” की उभयविध प्रकृति के हैं। कुछ ऐसे ग्रन्थ भी प्रणीत हुए हैं जो इतिहास तथा कोशग्रन्थ दोनों के लक्षणों से समुपेत हैं। जग इस काल में प्रणीत प्रमुख कोशों का परिचय इस प्रकार है तारानाथ भट्टाचार्य “तर्कवाचस्पति” कलकत्ता (१८१२-१८८५)- ये कलकत्ता संस्कृत कालेज के दर्शन और व्याकरण के प्रोफेसर और अर्वाचीन काल के मूर्धन्य विद्वानों में अग्रगण्य थे। इन्होंने वाराणसी के तत्कालीन विश्रुत विद्वान् पं. काशीनाथ शास्त्री से व्याकरण शास्त्र का गहन अध्ययन किया था। ये न्याय, व्याकरण एवं धर्मशास्त्र के विशेष मर्मज्ञ थे वैसे इनका पाण्डित्य तो चतरस था। ये संस्कत वाङमय में आधनिक काल के महान कोशकार हैं। तारानाथ भट्टाचार्य ने निम्न २ कोश ग्रन्थों का प्रणयन किया -१-शब्दस्तोममहानिधिः-चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला-१०१ में वाराणसी से प्रकाशित १६६७ ई.। ५खण्डों में सम्पूर्ण। रचनाकाल - १८६२ से लेकर १८८७ ई. तक। इस ग्रन्थ में यद्यपि संस्कृत के सभी शास्त्रों से शब्दों को ग्रहण कर उनकी व्युत्पत्ति, उनके विशेष अर्थ और उनसे सम्बन्धित सभी आवश्यक बातों की जानकारी दी गयी है, परन्तु न्यायशास्त्र और स्मृतिशास्त्र में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ, तात्पर्य आदि का विशेष विवेचन किया गया है। वस्तुतः यह कोश ग्रन्थकार द्वारा प्रकाशित बृहत् वाचस्पत्यम् नामक कोश के प्रणयन से पूर्व जिज्ञासु जनों, विद्यार्थियों के सौकर्य हेतु रचित एक (अपेक्षाकृत) संक्षिप्त कोश है। पृ. सं.५१५। २-वाचस्पत्यम-यह २० भागों में प्रकाशित अर्वाचीन युग का विशाल शब्दकोश है। इसका प्रकाशन कलकत्ता से १८७३ ई. से लेकर १८८४ ई. तक हुआ। चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला E४ में वाराणसी से १६६२ ई. में (प्रथम भाग) प्रकाशित। यह वास्तव में संस्कृत शब्दों का विश्वकोश है, जिसमें वेदों, वेदाङ्गों, पुराणों, उपपुराणों, दर्शन, तन्त्र, राजनीति, संगीतशास्त्र, सैन्यविज्ञान, पाकशास्त्र, शिक्षा, कल्प, अश्वविद्या, हठयोग आदि प्रायः संस्कृत वाङ्मय की समस्त विधाओं के शब्दों की व्युत्पत्ति और उनकी व्याख्या दी गयी है। इसके अतिरिक्त समस्त भारतीय आस्तिक-नास्तिक दर्शनों के पारिभाषिक शब्दों एवं सिद्धान्तों को भी व्याख्यायित करने का श्लाघ्य प्रयास किया गया है। ये दोनों कोश अकारादि वर्ण-क्रम से उपनिबद्ध हैं। राजा राधाकान्त देव इनका ‘शब्दकल्पद्रुम’ भारतीय कोश के इतिहास में एक विलक्षण उल्लेख योगदान है। रामावतार शर्मा, बिहार (१८७७-१६२६ ई.)- म. म. रामावतार शर्मा का जन्म छपरा में १८७७ ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री देवनारायण शर्मा था। इन्होंने काशी के तत्कालीन विश्रुतविद्वान् म. म. पं. गङ्गाधर शास्त्री से साहित्यशास्त्र एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया था। १६०२ ई. से आगे कुछ वर्षों तक इन्होंने काशी के सेन्ट्रल का दर्शन और शास्त्र हिन्दू कालेज में तदनन्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय में “वसुगोपाल मल्लिक व्याख्याता” के रूप में पुनः १६१६ ई. तक पटना विश्वविद्यालय में संस्कृत का अध्यापन किया। मालवीय जी के आमन्त्रण पर १E१E ई. में ये पुनः काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आ गये और १ERE ई. तक वहां अध्यापन तथा प्रशासन का कार्य संभाला। १ERE ई. में केवल ५२ वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया। प्रतिक वाङ्मयार्णवकोष:-यह शर्मा जी की समस्त कृतियों में सबसे प्रसिद्ध है जो उनके यश को शताब्दियों तक चिरस्थायी रखने का पर्याप्त है। यह अमरकोश की भाँति पद्यबद्ध है और प्राचीन परम्परानुसार लिखा गया संस्कृत का आधुनिकतम महाकोश है। प्राचीन ग्रन्थों में इसमें कई भिन्नताएं भी हैं जो इसे अधिक उपयोगी बनाती हैं। इसमें नवीन कोशों की भाँति शब्दों को अकारादि क्रम से रखा गया है, साथ ही साथ विभिन्न शब्दों के अर्थों में जो सूक्ष्म भिन्नता है उसे स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार यह अधिक वैज्ञानिक है। इसमें लौकिक ही नहीं, वैदिक शब्दों का भी समावेश किया गया है। इस ग्रन्थ की भूमिका में शर्मा जी ने कोशविद्या का एक विवेचनात्मक इतिहास भी लिखा है, जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह ग्रन्थ ज्ञानमण्डल प्रकाशन संस्थान, वाराणसी से १६६६ ई. में प्रकाशित है। इस कोशग्रन्थ की रचना के अतिरिक्त शर्मा जी ने केशव द्वारा रचित प्राचीन कोशग्रन्थ “नानार्णवसंक्षेपः” का सम्पादन कर पहली बार उसे प्रकाशित कराया।

शास्त्रीय कोश

श्रोतकोशः - सी. जी. काशीकर (२० वीं शती) के मुख्य सम्पादकत्व में इस कोश का प्रणयन हुआ। वैदिक संशोधन मण्डल, पूना से १E५८ ई. में प्रकाशित। यह वैदिक यज्ञादि क्रियाओं सम्बन्धी ज्ञान का विश्वकोश है। मान वेदार्थकोशः- यह ग्रन्थ पं. चमूपति, (२० वीं शती) गुरुकुलकांगडी हरिद्वार की अध्यक्षता में ३ भागों में रचा गया। यह राजवीर शास्त्री के “वैदिककोष’ का आधारभूत ग्रन्थ है। 25 (दयानन्द) वैदिककोष:- विमर्श टीका सहित, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा १६०५ ई. में प्रकाशित। पं. राजवीर शास्त्री (२०वीं शती) इसके निर्माता हैं। यह महर्षि दयानन्द के वेदभाष्य तथा अन्य ग्रन्थों में भी उपलब्ध वैदिक पदार्थों का संग्रहभूत ग्रन्थ है। ब्राह्मण, निरुक्त, व्याकरण और उपनिषदों के अनुसार शब्दों का प्रकृति-प्रत्यय-विभाग देकर अर्थ स्पष्ट किया गया है। प्रकरण भेद से मन्त्रों में पठित पदों के विभिन्न अर्थों का एक सन्दर्भ में पूर्ण चित्र उपस्थित करने में यह कोश पूर्णतया सहायक है। मीमांसाकोशः - केवलानन्द सरस्वती (नारायण शास्त्री मराठे) महाराष्ट्र (१८७७-१६५७ ई.) कृत। ये लक्ष्मणशास्त्री जोशी ‘तर्कतीर्थ” (“धर्मकोश” के सम्पादक तथा १६५२ ई. में प्राज्ञ पाठशाला के उपाध्यक्ष) के गुरु थे। इन्होंने अत्यन्त उपादेय, वैदुष्यपूर्ण इस “मीमांसाकोश" ६८२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास का निर्माण किया, जो प्राज्ञ पाठशाला मण्डल ग्रन्थ माला में सतारा से १E५२ ई. से लेकर १६६६ ई. तक प्रकाशित है। यह कोश ६ भागों में विभक्त है जिसमें अकारादिवर्णक्रम से सभी अधिकरणों, शास्त्रीय लौकिक न्यायों तथा सिद्धान्तों इन तीनों का संग्रह है। धर्मशास्त्रकोशः-सम्पादक-अन्नदाचरण तर्कचूडामणि (१E वीं शती, बंगाल) धर्मकोशः-लक्ष्मणशास्त्री जोशी “तर्कतीर्थ” के सम्पादकत्व में निर्मित। प्राज्ञ पाठशाला, वाई (सतारा) से कई भागों में प्रकाशित। १६३७ ई. से प्रकाशन आरम्भ चतुर्थ भाग १६७६ ई. में प्रकाशित। यह धर्मशास्त्र एवं राजनीति सम्बन्धी ज्ञान का विश्वकोश है।

  • धर्मशास्त्रकोशः-कुलमणि मिश्र (१६१०-१९८७ ई.) रचित। मिश्र जी सदाशिव केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ पुरी में धर्मशास्त्र के अध्यापक थे। अपनी सारस्वत सेवा के लिए इन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इनके द्वारा रचित यह धर्मशास्त्रकोश २ खण्डों में है। इसमें धर्मशास्त्र सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दों का संग्रह तथा उसकी व्याख्या की गयी है। यह कोश भुवनेश्वर राजकीय संग्रहालय द्वारा प्रकाशित है। राज्यव्यवहारकोश:-ढुण्ढि व्यास रचित (१६ वीं शती का पूर्वार्ध) ये तंजौर मराठा राज्य के शासक सरफोजी (द्वितीय) (१८००-१८३२) के आश्रित विद्वान् थे। इनके द्वारा विरचित यह कोश राजनैतिक प्रशासन सम्बन्धी शब्दों का विश्वकोश है। न्यायकोषः-भीमाचार्य झलकीकर (महाराष्ट्र) द्वारा विरचित। रचनाकाल-१८१४ शक तदनुसार १८६२ ई.। यह न्यायशास्त्र का एक प्रकार से पारिभाषिक विश्वकोष है। न्याय के विभिन्न शब्दों के लक्षण मानक ग्रन्थों से उदधृत किये गये हैं ताकि शब्द के अर्थ को व्यापक परिधि में समझा जा सके। यह न्यायदर्शन सम्बन्धी जानकारी के लिए अत्यन्त उपादेय कोश है। भरतकोशः-मानवल्लि रामकृष्ण कवि (२० वीं शती) द्वारा रचित संगीतशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों का कोश। यह १E५१ ई. में श्री वेड्केटेश्वर प्राच्य विद्या शोध संस्थान तिरुपति में रीडर थे। इनके द्वारा रचित इस कोश-ग्रन्थ में संगीत शास्त्र के चारों अगों (नाट्य, गीत, नृत्त और वाद्य) के पारिभाषिक शब्दों को अकारादि क्रम से लेकर उन्हें व्याख्यायित किया गया है। मानक संगीत ग्रन्थों से ही परिभाषा विषयक उदाहरण लिये गये हैं। यात अव्ययकोशः-लेखक-वा. श्रीवत्साकाचार्य (२० वीं शती) ये श्रीराम के निवासी तथा मद्रास संस्कृत कालेज में अध्यापक थे। इनका “अव्ययकोश” अव्ययों के प्रामाणिक विवेचन से परिपूर्ण मान्य प्राचीन ग्रन्थों के उद्धरणों से प्रमाणित, प्रौढ़ पाण्डित्य से परिपूर्ण उपयोगी कोश है, जिसमें प्रत्येक अव्यय का प्रकार, उसका अर्थ (प्रामाणिक ग्रन्थों के उद्धरणपूर्वक) और अनेक उदाहरणों से उसके अर्थों का स्पष्टीकरण (उदधृत ग्रन्थाशों के सम्पूर्ण विवरण जैसे ग्रन्थ अध्याय, पंक्ति अथवा श्लोक की संख्यादि के उल्लेख के साथ) दिया गया है। दर्शन और शास्त्र ६८३ इन कोशों के अतिरिक्त व्याकरणकोशः, परिभाषासंग्रहः (के. वी. अभ्यङ्कर रचित व्याकरणपरिभाषा कोष) भारतीय शास्त्रकोशः (ने. राज वंश सहायहीरा) दर्शनकोशः तथा काश्मीरशैवदर्शनबृहत्कोशः जम्मू विद्यापीठ से निर्माणाधीन आदि अनेक कोश-ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं और हो रहे हैं जिन्होंने शास्त्रीय ज्ञान सम्बन्धी क्षितिज का पर्याप्त विस्तार किया है।

इतिहास-कोश

अद्वैतवेदान्तसाहित्येतिहासकोशः-आर, तंगास्वामी शर्मा । (१६२४ ई. में जन्म) मद्रास द्वारा विरचित और १६८० ई. में मद्रास विश्वविद्यालय से प्रकाशित । इसमें अद्वैतवेदान्त के प्राचीन आचार्यों से लेकर अद्यतन लेखकों तक का संक्षिप्त जीवन-वृत्त एवं उनकी रचनाओं का विवरण है। दर्शनिक विचारक्रम का इतिहास भी दर्शाया गया है। इस प्रकार ये अपने नाम के अनुरूप एक इतिहास ग्रन्थ भी है और कोश भी। दर्शनमञ्जरी-४ भागों में प्रस्तावित। इसका प्रथम भाग मद्रास विश्वविद्यालय से १६८५ ई. में प्रकाशित है। इस भाग में न्याय-वैशेषिक दर्शन का इतिहास ग्रन्थों एवं ग्रन्थकारों के विषय में आवश्यक संक्षिप्त उल्लेखपूर्वक वर्णित है। इसके लेखक भी आर. तंगास्वामी शर्मा है। प्रशासन

शास्त्रीय निबन्ध

या उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में निबन्ध शैली विचारों के प्रतिपादन, अनुसंधान एवं समीक्षण के लिए सर्वाधिक सशक्त विधा के रूप में उभरी। राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिक तथा साहित्यिक विषयों पर इस युग में लक्षाधिक निबन्ध लिखे गये, जिनकी प्रवृत्ति रचनात्मक, विवेचनात्मक, सभीक्षात्मक तथा शोधात्मक है। उपलब्ध ज्ञान सामग्री के आधार पर १८५० ई. में जन्मे श्री हृषीकेश भट्टाचार्य के निबन्ध इस परम्परा में प्रथम माने जाते हैं। इनके आगे तो हमें संस्कृत निबन्धो की एक विकसित परम्परा देखने को मिलती है जिसमें हर प्रकार के विषयों पर विविध शैलियों में रचित निबन्ध हैं। कुछ प्रमुख निबन्ध कृतियों का परिचय इस प्रकार है हृषीकेश भट्टाचार्य, बंगाल (१८५० ई. में जन्म) - प्रबन्धमञ्जरी-विचारप्रधान निबन्धों का संग्रह। १८७२ ई. से छपने वाले “विद्योदय" संस्कृत पत्र में प्रकाशित भट्टाचार्य जी के निबन्धों को “प्रबन्धमञ्जरी” में संकलित कर प्रकाशित किया गया है। २- प्रबन्धकलालतिका-यह भी एक निबन्धसंग्रह है। प्रबन्धमञ्जरी में जहां विचारप्रधान निबन्धों का संग्रह है वहाँ यह ग्रन्थ शास्त्रीय विषयों की समालोचना से परिपूर्ण अतः समीक्षात्मक है। रामावतार शर्मा, बिहार (१८७७-१६२६ ई.)-वाङ्मयार्णवकोश नामक प्रसिद्ध शब्दकोशआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास तथा परमार्थदर्शनम् नामक मौलिक स्वतन्त्र दर्शन कृति के रचयिता। १-प्रकीर्णप्रबन्धाः- मिथिला विद्यापीठ संस्कृत शोधसंस्थान दरभंगा से १६५६ ई. में प्रकाशित। यह शर्मा जी के साहित्य एवं काव्यशास्त्र सम्बन्धी निबन्धों का संग्रह है। २- कलाकौमुदी-मिथिला विद्यापीठ से ही प्रकाशित । इसमें ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी निबन्धों का संग्रह है। __भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी “वागीश शास्त्री” मध्य प्रदेश (१६३४ ई. में जन्म) - त्रिपाठी जी का जन्म मध्य प्रदेश के सागर मण्डल के अन्तर्गत बिलइया ग्राम के १८३४ ई. में हुआ था। आपने वृन्दावन में संस्कृत साहित्य, वेदान्त तथा संगीत का एवं काशी में आकर पाणिनीय व्याकरण, भाषाशास्त्र, वेद, न्याय, पुराणेतिहास, योगदर्शन, तन्त्र, आयुर्वेद तथा पुरातत्त्व का अध्ययन किया। आप का वैदुष्य चतुरस्र है। आप इस समय वाराणसी में रह रहे हैं। १९७० ई. से सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के अनुसन्धान संस्थान के निदेशक रहे। संस्कृतवाङ्मयमन्थनम्-यह वागीश शास्त्री का प्रौढ़ निबन्धसंग्रह है। वाग्योगचेतना ग्रन्थमाला-६ में संस्कृतभारती विद्यायोग चेतना प्रकाशन, वाराणसी द्वारा १६६० ई. में प्रकाशित। यह ग्रन्थ सात कल्लोलों में विभक्त है। १-वैदिककल्लोलः २-शब्दशास्त्रकल्लोलः ३-साहित्यशास्त्रकल्लोलः ४- दर्शनशास्त्रकल्लोलः ५- पुराणेतिहाससंस्कृतिकल्लोलः। इन कल्लोलों के अन्तर्गत कुछ ६२ निबन्ध संकलित हैं जो अनुसन्धानप्रकृति के हैं। उनमें या तो किसी समस्या को उठाकर उसका समाधान प्रस्तुत किया गया है या प्राचीन आचार्यों के सिद्धान्तों की समालेचना की गयी है। शब्दशास्त्र से सम्बन्धित निबन्ध व्युत्पत्तिप्रधान, निर्वचनप्रधान या सभीक्षाप्नधान हैं। साहित्यशास्त्र से संबन्धित निबन्ध प्रायः समालोचनात्मक हैं। दर्शन से सम्बन्धित निबन्धों में कुछ समीक्षाप्रधान हैं तो कुछ में नवीन तत्त्वों के उद्घाटन का भी प्रयास किया गया है। कुछ निबन्ध परिवेश की समस्याओं यथा पर्यावरण प्रदूषण की समस्या आदि का शास्त्रीय समाधान प्रस्तुत करते हैं। कुछ में पाण्डुलिपियों के सम्पादन, अनुवाद के सिद्धान्त, प्राचीन भारत में वैज्ञानिक विकास जैसे शोधात्मक, विवेचनात्मक, विषयों का प्रतिपादन है। इस प्रकार यह गवेषणात्मक शैली में लिखा गया महत्त्वपूर्ण निबन्ध ग्रन्थ है। प राम नारायण मिश्र उ. प्र. (१६४० ई. में जन्म )-श्री राम नारायण मिश्र का जन्म सन् १९४० ई. में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री बुधिराम मिश्र था। आपने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से साहित्य तथा नव्य न्याय में आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की तथा बम्बई विश्वविद्यालय से “अलंकारशास्त्रे व्याकरणसिद्धान्तविमर्शः” विषय पर शोधकार्य पर पी. एच. डी. उपाधि प्राप्त की। इस समय आप गङ्गानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद में प्रवाचक (रीडर) के पर पर कार्यरत हैं। दर्शन और शास्त्र मिश्रनिबन्धावली-यह शास्त्रीय शोधपूर्ण निबन्धों का संग्रह है। यह ग्रन्थ २ भागों में है जिसका अभी केवल एक ही भाग प्रकाशित है (प्रकाशक-रंगेश प्रकाशन, देवरिया उ. प्र.) प्रकाशन वर्ष-१६६३ ई.। ग्रन्थ के इस प्रथम भाग में कुछ ३७ निबन्ध (५४३ प्र.) हैं, जिनमें अधिकांश व्याकरणविषयक तथा कुछ अद्वैतदर्शन, साहित्यशास्त्र, भक्ति, न्याय तथा सामान्यवस्तुविषयक हैं। शैली शास्त्रचर्चा हेतु अतीव उपयुक्त प्राञ्जल, गम्भीर और कसावयुक्त है। केदारनाथ ओझा (२० वीं शती)-विद्यावैजयन्ती-निबन्धमाला-१६७८ ई. में प्रकाशित, शास्त्रीय समालोचना प्रधान निबन्धों का संग्रह। जयमन्त मिश्र (२० वीं शती) -निबन्धकुसुमालिः प्रमुखतः - साहित्य और व्याकरण विषयक शास्त्रीय अनुसन्धान परक निबन्धों का संग्रह, चौखम्बा (वाराणसी) से प्रकाशित आद्याप्रसाद मिश्र, उ. प्र. (१६२१ ई में जन्म)- जौनपुर जनपद के अन्तर्गत द्रोणीपुर ग्राम में जन्मे आद्या प्रसाद मिश्न सांख्य, अद्वैतवेदान्त, न्याय एवं व्याकरणादि शास्त्रों के तलस्पर्शी विद्वान् और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हैं। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति पद से अवकाश ग्रहण किया। निबन्धमन्दाकिनी-अक्षयवट प्रकाशन, इलाहाबाद से १६६४ ई. में प्रकाशित। इस ग्रन्थ में ५० निबन्ध संगृहीत हैं, जिनमें २० शास्त्रीय चिन्तनपरक तथा अन्य साहित्यिक एवं सामाजिक समस्याओं से जुड़े विषयों पर हैं। संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति विषयक निबन्ध हैं। प्रत्येक निबन्ध के प्रणयन में लेखक का मौलिक दृष्टिकोण, विषय के अन्तरतल तक प्रविष्ट होने की क्षमता, प्रतिपादन की प्रमाणपुष्टता एवं शैली का प्राञ्जल-प्रसन्न-गम्भीरत्व दर्शनीय है। इनके अतिरिक्त म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी की “चतुर्वेदिसंस्कृतरचनावली” (१६६६ ई. में प्रकाशित), रघुनाथ शर्मा प्रणीत “चित्रनिबन्धावलिः” (शास्त्रीय निबन्धों का संग्रह, १६६४ ई. में प्रकाशित), पं. बलदेव उपाध्याय की “विमर्शचिन्तामणिः (१६८५ ई. में प्रकाशित) मङ्गलदेव शास्त्री का “प्रबन्धप्रकाशः”, कालूर हनूमन्त राव की “साहित्यजगती” विन्ध्येश्वरी प्रसाद शास्त्री (२० वीं शती द्वितीय चरण) की “विज्ञानमञ्जरी” आदि इस युग के उल्लेखनीय निबन्ध संकलन हैं। विश्वनाथ मिश्र (२० वीं शती)-बीकानेर (राजस्थान) में राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य। प्रौढ़निबन्धसौरभम्- १६८८ ई. में बीकानेर से प्रकाशित। इस ग्रन्थ में काव्यशास्त्रविषयक समीक्षापरक व्याकरण के विभिन्न तत्त्वों-सिद्धान्तों के अनुशीलन से सम्बद्ध तथा दर्शनविषयक ३५ प्रौढ़ निबन्धों का संग्रह है। लेखक की शैली सरल, शास्त्रार्थ के अनुसन्धान में समर्थ, स्पष्ट एवं व्यवस्थित है। ६८६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

दर्शनपरक काव्य-ग्रन्थ

दुःखद्गुमकुठारः-खड्गविलास प्रेस, पटना द्वारा सन् १८८७ ई. में प्रकाशित। इस गद्यशैली में रचित काव्यात्मक ग्रन्थ में संसार के नानाविध दुःखों के निवारण के लिए उनके आत्यन्तिक उच्छेद के साधनरूप में ज्ञान एवं भक्ति का निरूपण किया गया है। इसका विषय गम्भीर है परन्तु गद्यशैली की मधुरता के कारण इसमें शुष्कता नहीं है, अपितु यह नितान्त सरस और हृदयावर्जक दार्शनिक काव्य है। पञ्चानन तर्करत्न, बंगाल (जन्म १८६६ ई.) १-प्राणदूतम् २-इन्द्रियानुशासनम्-ये दोनों खण्डकाव्य की विधा में प्रणीत दार्शनिक काव्य हैं। टी. वी. कपालि शास्त्री-शास्त्री जी तन्त्र एवं अरविन्द दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान थे। उन्होंने वेदों पर अरविन्द भाष्य लिखा ‘महामनुस्तवः" इनका तंत्रविषयक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जो प्रकाशित है। महामनुस्तवः-दीप्ति प्रकाशन, अरविन्द आश्रम (पाण्डिचेरी) से १६६६ ई. में प्रकाशित। इसमें श्रीविद्या का माहात्म्य वर्णित है। ग्रन्थ में कुल ३२ पद्य हैं जिनमें श्री देवी के स्वरूप एवं श्रीविद्या के अन्य तत्त्वों का वर्णन है। पदशय्या सहज और शैली प्रवाहपूर्ण है। (म.म. गङ्गाधर शास्त्री द्वारा विरचित महान् दार्शनिक काव्य “अलिविलासिसंलापः” की चर्चा पहले हो चुकी है।) मासमा सप्तम अध्याय