बालराम उदासीन- पतञ्जलि के योगसूत्र पर टीका - बड्कीपुर से १८६७ और १८६७ ई. में प्रकाशित। वेङ्कटराव रामचन्द्र- पतञ्जलि के योगसूत्र पर टीका पूना से १८८७ और १६०६ ई. में प्रकाशित। गदाधर वागदीय - योगरहस्यम्- कलकत्ता से १६३२ ई. में प्रकाशित । ताराचरण तर्करत्न- व्यासकृत योगभाष्य की व्याख्या बनारस से १६५३ ई. में प्रकाशित। कुलयशस्वी शास्त्री (श्री शङ्करब्रह्मण्य-देव तीर्थस्वामी) योगमकरन्दः (योगमञ्जरी नाम्नी स्वोपज्ञ व्याख्यासहित) सरस्वती प्रेस, कलकत्ता से १६५२ ई.में मुद्रित। ग्रन्थ का प्रकाशन ग्रन्थकार के पर्यवेक्षण में हुआ है। यह ग्रन्थ योगसूत्र के समान चार पादों में विभक्त है। ग्रन्थ में विषय का प्रतिपादन कारिकाओं में है, जिसपर व्याख्या भी ग्रन्थकार ने स्वयं लिखी है। इसमें योगसूत्र में प्रतिपादित विषयों की ही प्रस्तुति है, परन्तु कहीं-कहीं लेखक के मौलिक चिन्तन का भी निदर्शन मिलता है, जैसे-अहिंसा निरूपण के प्रकरण में उसने हिंसा के ७० भेद करके अपने सूक्ष्म विवेचन का परिचय दिया है। ठक्कन झा शर्मा (१८८४-१६४८) ग्रन्थ योगरत्नावली, योगदर्शन की एक मौलिकरचना।