०३ आधुनिक संस्कृत कविता की समकालिकता

बीसवीं शती में लिखी जा रही संस्कृत कविता देश और सारे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तरों पर हो रहे परिवर्तनों या परिस्थितियों का साक्ष्य देती हैं। संस्कृत कवि पारम्परिक विषयों पर तो लिखते रहे हैं, उन्होंने नयी स्थितियों और नये विषयों पर कविता में सीधे-सीधे भी प्रक्रिया दी है- यह आधुनिक संस्कृत काव्य के अध्ययन से स्पष्ट है। स्वतन्त्रताप्राप्ति के समय से वातावरण को चित्रित करते हुए बहुसंख्य काव्य संस्कृत में १६४७ ई. के पश्चात् लिखे गये। चीनी आक्रमण के समय तो देशभक्ति और युद्धोत्साह के भाव से समन्वित कविताओं की संस्कृत पत्रिकाओं में बाढ़ सी आ गयी थी। बांगलादेश के मुक्तिसंग्राम को विषय बना कर भी अनेक कविताएं संस्कृत कवियों ने लिखीं। अन्तरिक्षयात्रा, अपोलोयान आदि नये युग की महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर भी कविताएँ संस्कृत में लिखी गयीं। पं. बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते ने ‘सम्भ्रमी बम्भमीति’ शीर्षक कविता में याहियाखान, नियाजी आदि की बांग्लादेश युद्ध में हुई पराजय का रोचक और प्रभावशाली चित्र उपस्थित किया है २E9 गीतिकाव्य कोपाटोपस्फुरदुरुसटामण्डलं चण्डनाद ज्वालामालाकवलितचलन्मेघनाम्भःप्रवाहम्। दृष्ट्वा सिंहं जगति जयिनं कान्दिशीको नियाजी शुष्यद्वक्त्रः शिथिलवचनः सम्भ्रमी बम्भ्रमीति।। यस्यालम्बादुदयपदवीं पाक-नीतिः प्रपन्ना पाणिः स्कन्धे जनयति बलं यस्य मिथ्या निनादे। सजातो न क्षणसहचरो निःक्षणो याहियेत्थं ध्यायं ध्यायं धृतिविगलितः सम्भ्रमी बम्भ्रमीति।। परां भूतिमिच्छन् मनुष्यौघयाजी नियाजी प्रपेदे पराभूतिमेव। निशम्येति हा हा वदन् याहियाखां मुहुः सम्भ्रमी बम्श्रमीति स्वगेहे ।। (“कविभारतीकुसुमाञ्जलि”, भाग-५ पृ-११) (कोप के आरोप से चमकते महा-मण्डल वाले, प्रचण्ड गर्जन करने वाले, ज्वालासमूह से कवलित चलायमान लगते श्याम जल-प्रवाह वाले संसार में विजयशील सिंह को देखकर भयग्रस्त नियाजी का मुख सूखने लगा, उसकी बोलती बन्द हो गयी, हड़बड़ा गया और भटकने लगा। पाकिस्तान की नीति जिसके आधार से उदित हुई, व्यर्थ चिल्लाने में जिसका बल है वह निरुत्सव याहिया क्षण भर का सहचर नहीं हुआ, इस प्रकार सोच-सोच कर धैर्यरहित हो गया तथा हड़बड़ा गया और भटकने लगा। मनुष्य-समूह का यजन अर्थात् हवन करने वाले नियाजी ने पराभूति (समधिक ऐश्वर्य) चाही और उसे प्राप्त हुई- पराभूति (पराजय), यह सुनकर याहिया खां अपने घर में बार-बार हड़बड़ा उठा और चक्कर काटने लगा।) मार्गे प्रत्यूहशैलं जवजनितमहाघातपातैः क्षिपन्ती प्रत्यर्थिक्षेत्रजातेष्वतिशयमलिनं जीवनं पड्कयन्ती। धारासारैरसारे रजसि विलुलितां क्षालयन्ती धरित्री मुढेलं प्लावयन्ती जयति विजयिनी वाहिनी भारतस्य।। (कविभारती-कुसुमाञ्जलिः, भाग-५, पृ. ११-१२ पर रतिनाथ झा की कविता से) (मार्ग में बाधाओं के पहाड़ को तीव्र वेग के महाघातों से फेंकती हुई, शत्रु के क्षेत्रों में जीवन को अतिशय मलिन तथा पंकिल बनाती हुई, असार धूल में लोटती पृथ्वी को धारा-सार द्वारा धोती हुई तथा सीमा तोड़कर आप्लावित करती हुई भारत की विजयिनी सेना विजय प्राप्त कर रही है। रेवाप्रसाद द्विवेदी, कमलेशदत्त त्रिपाठी, शिवदत्तशर्मा चतुर्वेदी आदि कवियों की २६२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास बांग्लादेशयुद्ध के अवसर पर लिखी गयी रचनायें संस्कृत काव्य में बीरगाथाकाल की पुनरावृत्ति करती सी लगती हैं। इन कविताओं में क्षणिक उन्माद का भाव भी है और साथ में काव्यात्मकता और ओजस्वी भाषा की समृद्धि भी। पिछले कुछ वर्षों में अनेक कविताएँ ऐसी प्रकाशित हुई हैं, जिनके द्वारा संस्कृत कवि ने समसामयिक घटना को गहरी संवेदनशीलता के साथ तथा अनुभव की प्रामाणिकता और यथार्थ की अनुभूति देते हुए अंकित किया है। रामकरण शर्मा की ‘तैलावलिः प्लवमाना’ खाड़ी युद्ध के समय समुद्र में फैले तैल के माध्यम से आज की बीभत्स राजनीति और संकटग्रस्त मानवता का मार्मिक बोध कराती है। (दीपिका, पृ. १५१) इसी प्रकार हर्ष देव माधव की ‘आतकवाद’ शीर्षक कविता भी निर्मम और जघन्य दानवीय प्रवृत्ति के विरुद्ध कवि का ओजस्वी प्रतिरोध-स्वर मुखरित करती है। (अलकनन्दा, प्र. ६४) संस्कृत की अनेक समकालिक कविताओं में मिथकीय या पौराणिक चरित्रों के माध्यम से आधुनिक व्यक्ति के अर्न्तद्वन्दु, संशय और जटिल मनोविज्ञान को बारीकी से चित्रित-व्यंजित किया गया है। कमलेशदत्त त्रिपाठी की ‘सुतनुके’ शीर्षक मुक्त छन्द और आधुनिक शैली की कविता में रामगढ़ के तीसरी शती ई.पू. के शिलालेख में उल्लिखित सुतनुका तथा देवदत्त इन दो प्रेमियों की विस्तृत कथा के संदर्भ में आधुनिक व्यक्ति की द्विधाग्रस्त मनःस्थिति और छटपटाहट का चित्रण किया गया है। (दूर्वाप्रवेशाङ्क, पृ. २३) दयानन्द भार्गव की कविता ‘द्विधा विभक्तं पुरुराजचित्तम्’ इस दृष्टि से अभिनव प्रयोग है, जिसमें पौराणिक दुष्यन्त की भावनाओं के चित्रण में छन्दोबद्ध काव्य तथा आधुनिक दुष्यन्त की भावनाओं के चित्रण में छन्दोबद्ध काव्य के लिये भिन्न भाषाशैली और मुक्तक छन्द का अलग-अलग प्रयोग है। अफ्रीका के स्वाधीनता सेनानी नेल्सन मंडेला के कारागार से मुक्ति के प्रसंग को लेकर रेवाप्रसाद द्विवेदी ने ‘शकटारकाव्यम्’ (वही दूर्वा-अङ्क-१६, पृ. ४५-६०) नन्दों के कुचक्र और मंत्री शकटार की कारागार से मुक्ति के संदर्भ में आधुनिक विश्व में अभी घटित घटनाक्रम की व्याख्या की है, तथा शकटार और मंडेला दोनों को मनुष्य की चिरन्तन जिजीविषा और युयुत्सा का प्रतीक निरूपित किया है। अनेक कविताओं में आधुनिक वातावरण, दृश्यमान पदार्थों या घटनाओं का सतही स्थूल विवरण मात्र दिया गया है, जो संवेदना और अनुभूति का अंग नहीं बन पाता। बस, मोटर, राशन आदि असंस्कृत शब्दों का भी अत्यधिक प्रयोग ऐसी रचनाओं में हो रहा है। (द्रष्टव्य-परमानन्द शास्त्री का वानरसन्देश, पद्य-७१, १३५ आदि) समकालिक घटनाओं को विषय बना कर लिखी गयी इन कविताओं में कवि की स्वतः स्फूर्ति और प्रातिभ आवेग कम है, अवसरोचित काव्य-निर्माण की चातुरी अधिक है। ‘मुक्तिवाहिनी’ शीर्षक से लिखी गयी रतिनाथ झा, शिवदत्त शर्मा, केदारनाथ त्रिपाठी आदि की कविताओं में काव्यात्मक ऊर्जा है, पर प्रदत्त विषय पर स्वतः सिद्ध सामग्री को ही उपस्थापित किया गया है। गीतिकाव्य २६३ पिछले कुछ वर्षों में इन्दिरागान्धी की हत्या, राजीबगान्धी की मृत्यु या इस प्रकार की अन्य घटनाओं पर सामयिक संस्कृत कविता बड़ी संख्या में प्रकाशित हुई हैं। इन कविताओं में तात्कालिक आवेग और स्फूर्ति अधिक है, घटना का विश्लेषण और तार्किक उपस्थापन कम है। हास्य तथा उत्पास (व्यंग्य) की प्रवत्ति आधुनिक संस्कृत काव्य में, विशेषतः बीसवीं शती के पिछले कुछ दशकों की कविता में, शिष्ट हास्य तथा उत्पास या व्यंग्य (सेटायर) की प्रवृत्ति अधिक प्रतिफलित हुई है। बीसवीं शती के आरम्भ में ही कुछ संस्कृत कवियों ने पहली बार पैरोडी (विडम्बनशैली) की विधा को लेकर संस्कृत काव्य-रचना का एक नया क्षितिज सामने रखा। मेघदूत के अनुकरण पर अनेक दूतकाव्यों की रचना प्राचीनकाल से आज तक संस्कृत में होती रही है, पर मेघदूत की पैरोडी करते हुए रचना की प्रवृत्ति इसी शताब्दी में उभरी। सी. आर. सहस्रबुद्धे ने ‘काकदूत’ (घारवाड, १६१७ ई.) की रचना की। ‘काकदूत’ के ही नाम से राजगोपाल आयंगार ने भी एक काव्य लिखा, जिसमें जेल से एक चोर कौए के माध्यम से सन्देश भेजता है। के. वी. कृष्णमूर्ति शास्त्री ने ‘श्वानदूत’ की रचना कर डाली, इसमें जेल में बन्द एक चोर एक कुत्ते के माध्यम से अपनी प्रिया के पास सन्देश भेजता है। मेघदूत की विडम्बना में रचे गये इन काव्यों में कालिदास की अवहेलना नहीं है, अपितु प्राचीन काव्य को आधुनिक सन्दर्भ दिया गया है। इस प्रवृत्ति का एक उत्कृष्ट परिपाक म. म. रामावतार शर्मा के ‘मुद्गरदूतम्’ में हुआ, जिसकी चर्चा अन्यत्र विस्तार से की गयी है। _ अनेक संस्कृत कवियों ने खाद्यपदार्थों पर विनोदी वृत्ति से अपनी आस्वादवृत्ति को व्यक्त किया है। प्याज, चाय, काफी आदि पर विनोदपूर्ण कविताओं की पिछले कुछ दशकों में भरमार रही है। ‘मत्कुणाष्टक’ नाम से दो काव्य श्री कृष्णमूर्ति शास्त्री तथा पुलिनबिहारी दासगुप्त द्वारा लिखे गये। कुछ कवियों ने मार्जनी (झाडू) को विनोद का विषय बनाया। कुछ रचनाओं में मात्र नर्मालाप या विनोद ही नहीं, उसके साथ-साथ अंतर्निहित रूप से बिचार भी प्रस्तुत किया गया है। अप्पाशास्त्री राशिवडेकर की ‘उदरप्रशस्तिः’ (संस्कृत चन्द्रिका, १६०६ ई.) ऐसी ही कविता है। इससे आगे बढ़ कर अनेक संस्कृत कवियों ने आधुनिक साहित्य में प्रचलित व्यंग्य या उत्पास की शैली को ग्रहण कर के समाज में व्याप्त पाखंड, छद्म या निहित स्वार्थों की राजनीति पर पैने प्रहार किये हैं। श्री शैल ताताचार्य ने ‘कपीनाम् उपवासः’ शीर्षक कविता में पवित्रता का ढोंग करने वाले लोगों पर व्यंग्य किया है। पुन्नसेरि नीलकण्ठ शर्मा ने ‘सात्विक स्वप्न’ नामक सौ पद्यों के काव्य (त्रिचूर, १६०७) में राजनीतिक नारेबाजी, आन्दोलन और सत्ता के लिये नेताओं की लोलुपता पर अच्छी छींटाकशी की है। समकालिक संस्कृत कविता में व्यंग्य की चेतना प्रखरतर होती गयी है। कतिपय कवियों ने आधुनिक जीवन की विसंगतियों, समाज में प्रचलित दोहरे मानदण्डों पर अपने काव्यों में तीखी टिप्पणियाँ की हैं, या इनकी सोत्यास व्यंजना की है। कुछ कवि जहाँ कांग्रेस और उसके नेताओं के माहात्म्य का वर्णन करने वाले काव्य संस्कृत में लिख रहे थे, तो२६४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कांग्रेस के ही अधिवेशन का विडम्बन शैली में सोत्यास चित्रण करने वाली ‘कांग्रेसगीता’ भी संस्कृत में लिखी गयी है। कमलेशदत्त त्रिपाठी, भास्कराचार्य त्रिपाठी, राधावल्लभ आदि कवियों की अनेक संस्कृत कविता निर्भीक स्वर में समाज के शोषणतन्त्र पर प्रहार करती हैं, या दुराचार पर सोत्यास प्रहार कहती हैं। इन कविताओं के पीछे पाठक को सामाजिक स्थितियों के प्रति सचेत बनाने और उसमें अन्याय से प्रतिरोध की क्षमता जगाने का उद्देश्य भी रहता है। रमाकान्त शुक्ल की ‘वदत नेतारो मनाकू’ भास्कराचार्य त्रिपाठी की ‘समस्तमन्दिरेषु राजते पृथक्-पृथक् ध्वजः’ या राधावल्लभ के ‘सन्धानम्’ काव्यसङ्ग्रह में इस स्तर की बहुसंख्य कविताएँ है। कमलेशदत्त त्रिपाठी की ‘धन्या ममेयं धरा’ की समस्यापूर्ति में उत्पासशैली की संस्कृत कविता की बदलती हुई आस्वादभूमि को पहचाना जा सकता है - यत्र ध्वाङ्क्षनिभा विरावपटवो नेतृत्वसंसाधका उत्कोचैकपरा जनस्य हरणे पारङ्गताः साहिबाः। पूंजीस्वामि-हितैकसाधनरताः कुम्भोदरा नायका राजन्ते खलु राजनीतिभुजगा धन्या ममेयं धरा।। लोको यातु रसातलं दिवि मनागुच्चस्तरां राजतां मूल्यं सा हि कथा समस्तजगतामेषा विकासक्रिया। लक्ष्यं मास्तु चलन्तु वृत्तिरहिता हिप्पीयुवानो मुधा क्रान्तिर्गच्छतु कञ्चुकं, भुवि परं धन्या ममेयं धरा।।’ (यह मेरी धरती धन्य है, जहाँ नेतृत्व के साधक लोग कौवों की भाँति शोर मचाने में पटु हैं, साहब या अधिकारी घूस मात्र में लगे रहते हैं तथा जनता का धन हड़प लेने की कला में पारङ्गत हैं, नेता लोग पूँजीपतियों के मात्र हितसाधन में निरत हैं और उनके पेट घड़े की भाँति फूल गये हैं, इस प्रकार राजनीति के क्षेत्र के सर्प विराजमान हैं। पृथ्वी पर मेरी धरती धन्य है | लोग रसातल जाएँ, मूल्य आकाश तक ऊँचा उठ जाए वह तो सारे जगत के विकास की कथा है, लक्ष्य न हो, बेरोजगार हिप्पी बने युवक व्यर्थ घूमते रहें और क्रान्ति कञ्चुक प्राप्त करे )/

प्रतीकात्मक गीतिकाव्य

बीसवीं शती के मुक्तककाव्य में एक प्रवृत्ति प्रतीकात्मक संविधान की है। यद्यपि प्रतीक नाटकों की तो परम्परा संस्कृत साहित्य में अश्वघोष तथा कृष्णमिश्र जैसे महाकवियों के द्वारा संवर्धित होती रही है, पर प्रतीकात्मक खण्डकाव्य या मुक्तककाव्य की परम्परा पुष्ट रूप में प्राचीन साहित्य में नहीं मिलती। प्रतीक शैली के आधुनिक काव्यों में ‘श्रद्धाभरणम्’ का उल्लेख किया जा सकता है। इसके रचयिता चन्द्रधर शर्मा हैं, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में प्राध्यापक थे तथा अनन्तर जबलपुर विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में आचार्य तथा १. कविभारती-कुसुमाञ्जलिः, भाग-६, पृ. ७५ । गीतिकाव्य २६५ अध्यक्ष रहे। दर्शन के विद्वान होने के कारण इन्होंने ‘श्रद्धाभरणम्’ में जीवन के विषय में चिन्तन को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है। इस काव्य में १५१ पद्य हैं, तथा मानव, श्रद्धा और इडा-ये तीन पात्र हैं। प्रसाद की कामायनी का प्रभाव इस काव्य पर स्पष्ट प्रतीत होता है। मनु या मानव द्वारा श्रद्धा के प्रति अनुराग, फिर उसका त्याग, अनन्तर इडा से उसका मिलन और अन्त में श्रद्धा से क्षमाचायना-यह भावपूर्ण कथा कवि ने जीवनदर्शन की अभिव्यंजना के साथ प्रस्तुत की है।। इसी प्रकार का एक अन्य काव्य वनमाली भारद्वाज (जन्म १८२४ ई.) का ‘मिलिन्दमित्रम्’ है, जिसमें भ्रमर को माध्यम बना कर कवि ने संसार के सुख-दुःख, मायाजाल और मोहभंग की विषयवस्तु को व्यक्त किया है।

संस्कृत काव्यानुवाद

वर्तमान काल में अनुवादों के माध्यम से विभिन्न भाषाओं के साहित्य में पारस्परिकता तथा संपर्क में वृद्धि हुई है, और इसके द्वारा विश्वसाहित्य का परिदृश्य बदला है। बीसवीं शताब्दी में रचनारत संस्कृत कवियों की कविताओं के अनुवाद जहां हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती आदि भाषाओं में हुए हैं, वहीं अन्य भाषाओं की श्रेष्ठ कविता भी संस्कृत में काव्यानुवादों के माध्यम से संस्कृत पाठकों के सामने आयी हैं, इससे समकालिक संस्कृत काव्य-रचना में इतर भाषाओं के लेखन से संपर्क और तज्जन्य नवीनता का संचार अनुभव किया जा सकता है। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अंग्रेजी कविताओं के संस्कृत पद्यानुवाद बड़ी मात्रा में प्रकाशित हुए। रामानन्दाचार्य की ‘लघुकाव्यमाला’ (मद्रास, १६१४ ई.) में शेक्सपीयर, ब्राउनिंग आदि कवियों के अनेक काव्यांश संस्कृत में अनूदित कर के प्रस्तुत किये गये हैं। श्री महालिंग शास्त्री की ‘किङ्किणीमाला’ में शेक्सपीयर के अतिरिक्त वर्ड्सवर्थ, शैली, जानसन आदि की कविताओं के अनुवाद हैं। सुब्रह्मण्य अय्यर की ‘पद्यपुष्पाञ्जलि’ जिसका उल्लेख आगे किया जा रहा है, में भी कई अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद हैं।’ के अंग्रेजी कविताओं के संस्कृत अनुवादों का एक महत्त्वपूर्ण संकलन आङ्ग्लरोमाञ्चम् श्री एल. ओ. जोशी तथा हरिहर त्रिवेदी ने तैयार कर के प्रकाशित किया, इसमें अंग्रेजी के सभी महत्त्वपूर्ण रोमांटिक कवियों की चुनी हुई कविताओं के सरस पद्यानुवाद हैं। संस्कृत की अनेक पत्रिकाओं ने इतर भाषाओं के साहित्य को अनुवादों के द्वारा संस्कृत पाठकों तक पहुंचाने का प्रशस्त कार्य किया है। दूर्वापत्रिका में मैथिलीशरणगुप्त, निराला आदि हिन्दी कवियों की कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए, इस पत्रिका का एक पूरा अंक ‘विश्वकविताक’ विश्व के समकालिक विभिन्न भाषाओं के कवियों की रचनाओं १. यहां, आचार्य श्री गोविन्दचन्द्र पाण्डेय द्वारा रचित, कुछ आंग्ल कवियों की कविताओं के संस्कृत पद्यानुवाद का संग्रह ‘अस्ताचलीयम् (१६६१, सं. स. वि. वि. वाराणसी) तथा मैथिली के कवि विद्यापति के गीतों का श्री काशीनाथ शर्मा द्वारा विरचित संस्कृत पद्यानुवाद ‘विद्यापतिशतकम्’ (१९६२, जानकी प्रकाशन, अशोक राजपथ, चौहट्टा, पटना-४) उल्लेख्य है,) (सं.) २६६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास के संस्कृत काव्यानुवाद का एक अभूतपूर्व संग्रह है। जयशंकर प्रसाद की कामायनी के जिस प्रकार संस्कृत में दो अनुवाद प्रकाशित हुए हैं, उसी प्रकार ‘बिहारीसतसई’ का भी संपूर्ण अनुवाद दो कवियों ने संस्कृत में प्रस्तुत किया है।’ मैथिलीशरण गुप्त के सम्पूर्ण पञ्चवटी खण्डकाव्य का भी संस्कृत में अनुवाद प्रकाशित हुआ है। दक्षिण भारतीय भाषाओं के काव्यों का संस्कृत में अनुवाद इस शताब्दी में बड़ी मात्रा में हुआ। भरतियार शीर्षक के कन्नड के सुब्रह्मण्यम् कवि का, ‘केरलप्रतिभा’ शीर्षक से मलयालम के कतिपय कवियों के काव्यों का संस्कृत में अनुवाद सामने आया है। सावरकर के अग्निजा काव्य का अनुवाद गजानन पलसुले ने किया है।

चित्रकाव्य की परंपरा

यद्यपि काव्य में शब्दचित्र तथा चित्रालंकारों का समायोजन आज के युग के अनुरूप नहीं कहा जा सकता, पर अनेक संस्कृत कवियों ने भाषा पर अपने असाधारण अधिकार के साथ चित्रकाव्य की दुर्लभ परम्परा को इस शती में भी जीवित रखा है। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने अपने जयपुरवैभवम् नामक काव्य-प्रबन्ध के अन्तर्गत विविध चत्वरों में एक चित्रचत्वर भी समाविष्ट किया। मैसूर के पण्डित सी. एन. राय शास्त्री ने १६०५ ई. में ‘सीतारावणसंवादझरी’ नामक काव्य प्रस्तुत किया, जिसमें रावण जो छन्द कहता है, उसी में एक अक्षर कम कर देने से सीता का उत्तर भी बन जाता है। इस प्रकार के काव्य बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशक में तंजौर के श्रीनिवासाचार्य तथा मद्रास के श्रीनिवासदेशिकाचार्य ने भी लिखे। पं. रामरूप पाठक ने अपने “चित्रकाव्यकौतुकम्’ तथा इन्दौर के पं. गजानन करमरकर शास्त्री ने अपनी बहुसंख्य काव्यरचनाओं के द्वारा चित्रकाव्य की परम्परा में अपना योग दिया। श्रीजीवन्यायतीर्थ का सारस्वतशतक स्वस्तिकबन्ध, खड्गबन्ध, मुरजबन्ध, मयूरबन्ध आदि चित्रकाव्यश्लोकों का संकलन है।

नयी शैली, नये प्रयोग

पारम्परिक भावबौध तथा पुरातन शैली की रचनाओं के साथ नये भावबोध और नयी शैली की रचनाएँ भी इस अवधि में संस्कृत में प्रचुर मात्रा में सामने आयीं। नवगीतिविधा का विकास हुआ, जिसमें कवि की वैयक्तिक भावना, रूमानियत और स्वच्छन्द मनःस्थितियों के चित्रण की प्रवृत्ति फलवती हुई। राष्ट्रवादी धारा से जुड़कर गीति-विधा में नया प्राण फूंकने वाले दो कवि उल्लेखनीय हैं-हरिदत्त पालीवाल निर्भय तथा रामनाथ पाठक प्रणयी। श्री निर्भय क्रान्तिकारियों के साथ रहे तथा जेल यात्राएं भी की। इनके उस काल के गीतों में अग्निच्चाला सा कबिव्यक्तित्व और ओजस्विता की दुर्निवार अभिव्यक्ति है। गीतविधा में बिम्बविधान और शिल्प की नवीनता का समवाय मायाप्रसाद त्रिपाठी ने किया। वैयक्तिक राग और कवि की आत्म-अभिव्यक्ति की दृष्टि से प्रभात शास्त्री के गीत प्रभावपूर्ण हैं। १. परमानन्द तथा प्रेमनारायण द्विवेदी (सौन्दर्यक्षप्तशती)। गीतिकाव्य २५७ पश्चिम के प्रभाव से पिछले दशक की संस्कृत कविता अस्तित्ववादी चिन्तन और अतियथार्थवाद (सुर्रियलिज्म) की साहित्यिक धारा से भी जुड़ी है। इस दृष्टि से केशवचन्द्र दाश तथा हर्षदेव माधव-इन दो युवा संस्कृत कवियों की रचना गम्भीरतापूर्वक पठनीय हैं। इन कवियों ने ‘पुराणमित्येव न साधु सर्वम्’ की उक्ति को अपने सफल प्रयोगशील लेखन से चरितार्थ किया है। पनि छन्दोविधान के क्षेत्र में बीसवीं शताब्दी के संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक नये प्रयोग किये गये। भट मथुरानाथ शास्त्री ने ब्रजभाषा के छन्दों में दोहा, सोरठा, कवित्त, सवैया, घनाक्षरी आदि के साथ उर्दू के काव्य से गजलों में प्रयुक्त छन्द ले कर सफल काव्यरचनाएँ प्रस्तुत करते हुए नये छन्दोविधान की आधुनिक संस्कृत कविता में अवतारणा की। उसके पश्चात् गजल का प्रयोग सफलता के साथ करते हुए जगन्नाथ पाठक, राजेन्द्र मिश्र, बच्चूलाल अवस्थी, इच्छाराम द्विवेदी आदि कवियों ने संस्कृत कविता को नया घरातल दिया। अनेक कवियों ने लोकगीतों के संस्कारों से अनुप्राणित हो कर संस्कत काव्यरचना में अभिनव प्रयोग किये। श्रीभाष्यम् विजयसारथि ने तेलुगु भाषा के लोकप्रचलित छन्दों में संस्कृत कविताएं लिखीं। राजेन्द्र मिश्र की लोकगीतपरक संस्कृत रचनाएं बहुत सराही गयी हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण आगे है। उन्नीसवीं शती में शोकगीति की जो विधा संस्कृत कविता में चल पड़ी, उसका नाना दिशाओं में विकास इस शती में आ कर हुआ। दीपक घोष ने तो बड़ी संख्या में विलापकाव्यों की रचना कर डाली। मधुकर गोविन्द माईणकर ने ‘स्मृतितरङ्गम्’ में इस विधा को मेघदूत की भावना, विरहानुभव तथा करुणरस की धारा में स्नपित कर सर्वथा अछूता भावसौन्दर्य प्रदान किया। श्री स्वामीनाथन की ‘ध्वस्तं कुसुमम्’ भी प्रणयकथा की दारुण परिणति का कारुणिक चित्रण करने वाला काव्य है। गान्धी, नेहरू, इन्दिरा गान्धी आदि राष्ट्रीय विभूतियों के अवसान के अवसरों पर संस्कृत कवियों के द्वारा अनुभूतिप्रवणता के साथ रचे गये शोक-काव्यों का उल्लेख इस अध्याय में अन्यत्र किया गया है। संस्कृत में बहुसंख्य नूतन नाट्यकृतियों की रचना करने वाले श्री वीरेन्द्रकुमार भट्टाचार्य (१९१७-१९८२ ई.) ने संस्कृत कविता को एक और नयी विधा दी- सानेट । इनके सानेटों का एक उत्तम संग्रह ‘कलापिका’ (कलकत्ता, १६६६ ई.) प्रकाशित हो चुका है। सानेट अंग्रेजी कविता में प्रसिद्ध छन्द है, एक छन्द में एक कविता भी पूर्ण हो जाती है। एक सानेट में चौदह पंक्तियाँ होती हैं। श्री भट्टाचार्य ने ‘सानेट’ को संस्कृतष्ठन्दोविधान से समंजस करने का प्रयास किया। जयदेव के गीतगोविन्द की परंपरा में उन्नीसवीं शती के ही समान इस शताब्दी में भी रागकाव्यों की रचना संस्कृत में होती रही। पर विषयवस्तु की दृष्टि से इन रागकाव्यों में नयापन है तथा इनका स्वरूप भी परिवर्तित हुआ है। ओगेट्टि परीक्षित् शर्मा (जन्म १. अर्वाचीनसंस्कृतम्, अड्क- २१३, १५-७-१६८०, पृ. ७-८२ २६८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास १६३० ई.) ने ‘ललितगीतालहरी’ का प्रणयन किया। श्री शर्मा ने संस्कृत में मॉझियों के गीत, डिस्को गीत तक लिख डाले हैं। विषय और स्वरूप की दृष्टि से इस प्रकार की रचनाएं संस्कृत भाषा और उसकी साहित्यिक परंपरा के साथ बेमेल हैं, मेल नहीं खाती हैं। वे प्रयोग के नाम पर अश्लील प्रदर्शनमात्र हैं। रागकाव्य से मिलती-जुलती एक विधा संगीतिका की है, जिसमें अनेक रचनाएं इस काल में संस्कृत में सामने आयीं। रागकाव्य की ही भाँति संगीतिका भी वस्तुतः अभिनेय काव्य है, पर गेयता की प्रधानता के कारण श्रव्य काव्य के रूप में भी इसका व्यवहार होता है। पश्चिमी साहित्य में इसे ‘आपेरा’ कहा जाता है। इसमें विभिन्न पात्रों के सवाद गीतों में ही आधन्त चलते हैं। शिवराज्योदयमहाकाव्य के प्रणेता श्री श्रीधरभास्कर वर्णेकर (जन्म १६१६ ई.) ने दो सङ्गीतिकाओं की रचना की है, जिनके नाम हैं -श्रीरामसङ्गीतिका, श्रीकृष्णसङ्गीतिका। श्रीमती वनमाला भवालकर ने पार्वतीपरमेश्वरीयम् तथा रामवनगमनम्-इन दो सङ्गीतिकाओं का प्रणयन किया है। रागकाव्य की ही भाँति लहरीकाव्यों की रचना भी दोनों रूपों में संस्कृत में, वर्तमान में हो रही है - परंपरा से जुड़ कर लहरी के स्तोत्ररूप को बनाये रखते हुए भी तथा उसमें नये विषयों के समावेश के साथ उसके कलेवर में परिवर्तन करते हुए भी। वर्णेकर ने ही ‘मातृलहरी’ (१६७२ ई.) का प्रणयन किया है। राधावल्लभ ने कुछ लहरियाँ प्रकतिवर्णनपरक लिखी हैं, जिनमें प्रासंगिक रूप से सामाजिक यथार्थ के चित्र भी हैं, जैसे निदाघलहरी, प्रावृड्लहरी आदि, तो कुछ लहरी काव्यों में सर्वथा नवीन विषयों को उठाया है, जैसे-जनतालहरी या रोटिकालहरी। फारसी या उर्दू काव्य-परम्परा के छन्दों का संस्कृत कविता में अवतरण बीसवीं शताब्दी के संस्कृत काव्य की एक विशेषता है। इस दृष्टि से प्रवर्तक कार्य भट्ट मथुरानाथशास्त्री ने किया। इन्होंने १E२७ ई. में प्रकाशित अपनी ‘गीतिवाणी’ नामक पुस्तक में ‘उर्दूभाषाचत्वर’ नामक खण्ड समाविष्ट किया। इस खण्ड में शास्त्री जी की ५८ ग़ज़ल गीतियाँ संकलित थीं। शास्त्री जी के अनन्तर पं. जानकीवल्लभ शास्त्री ने भी संस्कृत में गज़ल लिखी, जो अब प्राप्त नहीं होती। श्री श्रीधरभास्करवर्णेकर ने अपने संस्कृतवाङ्मयकोश में इस काल में लिखे राधाकृष्ण नामक कवि के ‘गजलसंग्रह’ का उल्लेख किया है। यह संग्रह भी प्राप्य नहीं है। अस्तु, संस्कृत में गजल लेखन की परंपरा पिछले साठ-सत्तर वर्षों से अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है- इसमें कोई सन्देह नहीं। इस समय लोकप्रिय ग़ज़ल लिखने वाले कवियों में श्री राजेन्द्र मिश्र तथा जगन्नाथ पाठक उल्लेखनीय हैं। जगन्नाथ पाठक की गजलों में मनोवेदना और सूक्ष्म भावाभिव्यंजना है, राजेन्द्र मिश्र की गज़ल- गीतियों में रदीफ और काफिये का संयोजन बड़ा आकर्षक होता है। पर ग़ज़ल के शिल्प की समझ और उसकी विधा में गहरी भावभिव्यक्ति की दृष्टि से पं. बच्चूलाल अवस्थी की गीतियां सर्वोत्कृष्ट कही जा सकती हैं। वस्तुतः अच्छी गज़ल कहने के लिये फ़ारसी कविता की जो समझ चाहिये, वह जगन्नाथ पाठक तथा बच्चूलाल अवस्थी गीतिकाव्य इन दो कवियों में विशेष रूप से है। अवस्थी जी ने गजल में संस्कृत भाषा की प्रौढि उसके अपने संस्कार और अभिव्यंजनाशैली को उतारते हुए नये सौन्दर्यबोध से साक्षात्कार कराया है। उनकी एक गज़ल का नमूना देखिये - पिका मौनं भजेरन् मासि वासन्ते कथङ्कारम्। शरः शाकुन्तलः सिद्ध्यैन्न दुष्यन्ते कथङ्कारम् ? ।। ध्रुवोर्भङ्गभ्रमाद् भूम्ना निषेधाः सम्प्रतीयेरन् । कपोलप्रान्तसङ्केता निगूहूयन्ते कथङ्कारम्..? ।। सहेला हावभावा विभ्रमा- इन्द्रायुधीयन्ते। निराकाराश्चमत्कारा न सयन्ते कथकारम्।। (वसन्त मास में कोकिल कैसे मौन धारण कर लें । शकुन्तला का बाण दुष्यन्त पर कैसे न सफल हो? भृकुटिभड्ग के भ्रम से निषेध अधिक मात्रा में भले ही प्रतीत हो जाए, किन्तु कपोल के प्रान्तभाग के संकेत कैसे छिपेंगे ? हेला सहित हाव-भाव तथा विलास इन्द्रायुध जैसा आचरण करते हैं, निराकार चमत्कार कैसे नहीं सहन होते हैं ?) यहाँ कथकारम् रदीफ़ है तथा वासन्ते दुष्यन्ते आदि काफिये हैं। मुक्त छन्द के प्रयोग तथा नवीन विषयों की उपस्थापना की दृष्टि से दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक श्री कृष्ण लाल के दो काव्यसंग्रहों का भी उल्लेख किया जा सकता है- शिजारवः (दिल्ली, १६५४ ई.) तथा उर्वीस्वनः (दिल्ली, १E७५ ई.) प्रथम में ६१ तथा दूसरे में ४६ कविता संकलित हैं। मुक्त छन्द का प्रवाह और लय आकर्षक हैं, पर अभिव्यक्ति में काव्यात्मकता न्यून है। राजेन्द्रमिश्र, श्रीमती नलिनी शुक्ला, श्रीमती पुष्पा दीक्षित आदि कवियों ने हिन्दी कविता में प्रचलित नवगीति विधा का सफल प्रयोग संस्कृत काव्य रचना में किया। भट्ट । मथुरानाथ शास्त्री के दाय का उपबृंहण करते हुए अनेक कवियों ने ब्रज-भाषा तथा उर्दू के छन्दों को अपनाकर उत्तम कविताएं संस्कृत में लिखीं। गजल तथा रुबाई के प्रयोग की दृष्टि से कवि जगन्नाथ पाठक और व्रजभाषा के छन्दों के प्रयोग की दृष्टि से नवोदित कवि विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र के नाम गिनाये जा सकते हैं। सकवि राजेन्द्र मिश्र ने बड़ी संख्या में गज़लों की रचना तो की है ही, जो अत्यन्त लोकप्रिय भी हुई, साथ ही इन्होंने लोकगीत की विधा को भी संस्कृत काव्य-रचना में प्रतिष्ठित कर दिया। इन्होंने स्कन्धहारीयम् (कहरवा) चैत्रकम् (चैती) आदि की धुन तथा छन्द लेकर संस्कृत में मधुर गीतियाँ लिखीं। भोजपुरी तथा अवधी के लोकगीतों की विषयवस्तु तथा छन्दःसंस्कार का गहरा प्रभाव कुछ नये संस्कृत कवियों पर देखा जा सकता है। भास्कराचार्य त्रिपाठी की अनेक गीतरचनाएं, सोहर गायन शैली को भावित कर के लिखी गयी हैं। सानेट के अतिरिक्त अन्य विदेशी छन्दों को भी कुछ नये कवियों ने अपनाया। हर्षदेव ३०० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास माधव ने तीन हजार के लगभग “हाइकू” छन्द संस्कृत में लिखे हैं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए हैं, जिनमें से कुछ हाइकू की ही भाँति तांका छन्द्र भी जापानी काव्य में प्रचलित हैं। माधव तथा अन्य कुछ कवि तांका छन्द में भी लिख रहे हैं। हर्षदेव माधव ने कोरियाई कविता से ‘शिजो’ नामक छन्द भी ले कर उसमें भी संस्कृत कविताएं लिखी हैं।

विषयों की नवीनता

हमारी शताब्दी विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की आश्चर्यजनक उपलब्धियों की शताब्दी है। इस शती में जीवन की पद्धतियों में द्रुत गति से परिवर्तन हुए, मनुष्य का परिवेश विपरिवर्तित हुआ या नये रूप में सामने आया। ऐसी स्थिति में संस्कृत कवियों ने नये वातावरण के अनुरूप नये-नये विषय उठाये। इस प्रवृत्ति का सूत्रपात मथुरानाथ शास्त्री ने विशेष रूप से किया। उनके ‘साहित्यवैभवम्’ के अन्तर्गत विभिन्न वीथियों के बीच नवयुगवीथी भी है, जिसमें ट्राम, मोटरकार, रेल, जहाज, बिजली, छायाचित्र, सिनेमा, विज्ञान की उपलब्धियाँ आदि पर पद्य हैं। कुछ कवियों ने योरोपयात्राओं का काव्यात्मक वर्णन प्रस्तुत किया, जिससे संस्कृत कविता में नया पर्यावरण चित्रित होने लगा। विमानयात्रा का रोमांचक वर्णन भी अनेक संस्कृत काव्यों में हुआ है। वेड्कट राघवन की कविता ‘अभ्रमभ्रमनविलायम्’ या प्रभाकरनारायण कवठेकर की ‘विमानवातायनातू’ तथा राजेन्द्र मिश्न का ‘विमानयात्राशतकम्” (अर्वाचीनसंस्कृत, जुलाई १९८७ में प्रकाशित) आदि काव्य विमानयात्रा का रोचक वर्णन प्रस्तुत करते हैं। राधावल्लभ की धरित्रीदर्शनलहरी’ में विमान से देखी जाती पृथ्वी का वर्णन वैदिक काव्य में विश्वबोध के साथ-साथ गहरी सौन्दर्यानुभूति भी देता है। विदेश भ्रमण कर चुके संस्कृत कवियों की कतिपय रचनाओं में ‘यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्’ का अनुभव नये रूप में होता है। श्री कवठेकर ने पेरिस के संग्रहालय में विश्वविख्यात कलाकृति ‘मोनालिसा’ को देख कर भावपूर्ण कविता लिखी है। (दूर्वा, अंक-२३, पृ. २६ मोनालिसां तां मनसा स्मरामि)। सत्यव्रत शास्त्री का ‘थाईदशविलासम्’ भी उल्लेखनीय काव्य है। इसी प्रकार राजेन्द्र मिश्र ने अपनी अनेक संस्कृत कविताओं में थाइलेण्ड के जीवन, सौन्दर्य तथा तद्विषयक स्मृतियों को अभिव्यक्त किया है। उपर्युक्त पृष्ठभूमि में बीसवीं शती के प्रमुख संस्कृत मुक्तककारों, गीतिकाव्यों का परिचय प्रस्तुत है। इनमें से कई कवि उन्नीसवीं शती के जन्मे हैं, पर उनका कृतित्व इस शती का है।

लक्ष्मणशास्त्री तैलंग

महामहोपाध्याय मानवल्ली पं. लक्ष्मणशास्त्री तैलंग का जन्म १८८० ई. में काशी में हुआ। म. म. गंगाधरशास्त्री तथा श्री रामशास्त्री इनके अग्रज थे (काशी की पाण्डित्य परम्परा, पृ. ४१७ पर इन दोनों पंडितों को लक्ष्मणशास्त्री का अनुज कहा गया है, जो सम्भवतः मुद्रण की अशुद्धि है।) इन दोनों सुकवियों का परिचय पिछले अध्याय में दिया जा चुका है। लक्ष्मणशास्त्री तैलंग ने पितृपरम्परा तथा अग्रजों से प्राप्त विद्या की धरोहर का दाय ग्रहण ही नहीं किया उसे पाश्चात्त्य विद्याओं तथा अंग्रेजी साहित्य के ३०१ गीतिकाव्य अपने अध्ययन से सयुंक्त कर संस्कृत पंडितों की तेजस्विता और प्रगतिशीलता का उदाहरण भी प्रस्तुत किया। उन्होंने पुरातत्त्व, इतिहास और शिलालेख आदि विषयों का अध्ययन डा. वेनिस से किया था। आधुनिक संस्कृत काव्य के इतिहास में म. म.लक्ष्मणशास्त्री का अविस्मणीय स्थान उनकी ‘उपशल्यशंसनम्’ (यह कवितावल्लरी मासिक पत्रिका के प्रथम गुच्छक में वि. सं. १EE२ अर्थात् १६३५ ई. में प्रकाशित हुई है।) नामक कविता के कारण है। यह कविता बीसवीं शताब्दी की संस्कृत कविता की अग्रदूती है। प्राकृतिक दृश्यों का सूक्ष्म निरीक्षण, ग्राम-जीवन का यथार्थ और दरिद्र लोगों के प्रति कवि की संवेदना के साथ-साथ अन्याय और शोषण के विरुद्ध प्रतिक्रिया का सचेत स्वर इस कविता में हम सुनते हैं। निर्धन कृषकों के विषय में कवि लिखता है कि ग्रीष्म में वे कड़ी धूप में तपते हैं; वर्षा में नंगे बदन भीगते हैं और जाड़े में शीत से ठिठुरते रहते हैं। किसानों के बालकों का यह चित्र वात्सल्य का उद्रेक भी करता है और यथार्थ की अनुभूति भी देता है इमे कृषकदारकाः परिगृहीतपाथेयकाः करात्तलगुडा मुहुर्मधुरगीतगाने रताः। अजाविपरिचारणे प्रतिदिनं समायोजिताः । कमप्यतिशयं मुदामनुभवन्त्यचिन्तालवम् ।। धान की रोपणी करती स्त्रियों के पाँव लगातार जल में खड़े रहने से गल से जाते हैं, वे बीच-बीच में अपने दुधमुहे बच्चों को स्तनपान कराती हैं, फिर काम में लग जाती हैं अमूः कृषकयोषितः कलमरोपणानारत प्रसङ्गसलिलान्तरस्थितिविकारिपादद्वयाः। स्तनन्धयशिशून क्वचित् परिनिपातनेमस्तनान् विधाय निजकर्मणि प्रसितविग्रहा लोकय ।। लक्ष्मणशास्त्री की दूसरी कविता ‘मत्र्येषु भेदः कियान्’ में समाज में व्याप्त विषमता पर खेद व्यक्त किया गया है। शास्त्री जी का आधुनिक संस्कृत साहित्य को दूसरा योगदान शेक्सपीयर के नाटकों के पद्यबद्ध कथासार के रूप हैं। उन्होंने मर्चेण्ट आफ वेनिस तथा हैमलेट के काव्यात्मक सारांश ‘वेतस्वतीसार्थवाहः" तथा हेमन्तकुमारः के नाम से किये हैं। प्रस्तुत इन संक्षिप्त काव्यरूपान्तरों के निर्माण में अभिनन्द के प्रख्यात महाकाव्य ‘कादम्बरीकथासार’ को उन्होंने अपना आदर्श माना है। दोनों ही रूपान्तर मौलिक खण्डकाव्यों के समान आस्वाद देते हैं। कथाप्रवाह और रोचकता के निर्वाह के साथ-साथ भाषा की विच्छित्ति और शब्द-सौष्ठव की ३०२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास दृष्टि से भी ये दोनों काव्य अनुत्तम हैं, आचार्य बलदेव उपाध्याय द्वारा उद्धृत निम्नलिखित अंश द्रष्टव्य हैं अगलबिन्दुमात्रास्त्रगर्धशाटकमात्रकम् । अन्यूनानतिरिक्तं भोस्त्वया मांस विकर्त्यताम्।। प्रमाणपत्र एतस्मिन्नुपन्यस्तं न लोहितम् । मांसस्य केवलमतोऽधिकारस्तेऽवकर्तने ।। (१३५-३६) । यह यहूदी साइलाक के प्रति संबोधन है, जिसमें कहा गया है कि ऋण न चुकाने पर शर्तनामे के अनुसार केवल मांस ही वह ले सकता है, उसके साथ खून पर उसका अधिकार नहीं है। हेमन्तकुमारः में दिवगंत आत्मा हैमलेट को रहस्य बताते हुए कहता है मबन्धुरेव पापात्मा मा राज्येन प्रियासुभिः। भार्यया प्रीतिपात्रेण त्वया चासौ व्ययोजयत्।। अयि हेमन्त सत्यं त्वमात्मजोऽसि ममाश्रवः। वैरनिर्यातनविधौ मा स्म भूः शिथिलोधमः ।। (पापात्मा मेरा बन्धु ही है जिसने मुझे राज्य से, प्रिय प्राणों से, भार्या से और प्रीतिपात्र तुझसे मुझे वियुक्त कर दिया। हे हेमन्त, सही माने में तू मेरी बात मानने वाला पुत्र है, वैर का बदला लेने के लिए अपने उद्योग में शिथिल मत हो।)

गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’

नवरत्न जी का जन्म सन् १८८१ ई. में झालरापाटन (राजस्थान) में हुआ था। इनके पूर्वज गुजरात से राजस्थान आये तथा अपने पाण्डित्य के कारण सवाई राजा जयसिंह आदि के द्वारा सम्मानित हुए। गिरिधरजी की शिक्षा जयपुर तथा काशी में हुई। इनका देहावसान १० वर्ष की आयु में ३०.६.१६६१ ई. के दिन हुआ। ये हिन्दी, संस्कृत, राजस्थानी, बंगला, उर्दू, मराठी, गुजराती, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाओं पर अधिकार रखते थे तथा हिन्दी के अनन्य सेवकों में इनका नाम सादर परिगणित होता है। इनकी साहित्यसेवा के सम्मानस्वरूप काशी की पण्डितमण्डली ने इन्हें ‘नवरत्न’ की, सनातन धर्म सभा, कलकत्ता ने ‘काव्यालंकार’ की, वैष्णव महासभा पटना ने ‘व्याख्यानभास्कर की और कलकत्ता विश्वविद्यालय की संस्कृत सभा ने ‘प्राच्यविद्यामहार्णव’ की उपाधियों से विभूषित किया। संस्कृत में अमरसूक्तिसुधा, जापानविजयः, ईश्वरप्रार्थना, नवरत्ननीतिः, प्रेमपयोधिः, गिरिधरसप्तशती, राजस्थानवन्दना, श्रमचतुर्विंशतिः आदि काव्य प्रकाशित हैं। हिन्दी तथा संस्कृत में इनकी अनेक रचनाएँ अभी अप्रकाशित हैं। ‘उमरसूक्तिसुधाकरः’ इनका उमरखैयाम की रुबाइयों का संस्कृतकाव्यानुवाद है। ‘प्रेमपयोधिः’ नन्ददास के भ्रमरगीतों का समच्छन्दोनुवाद है। ‘योगी’ शीर्षक से इन्होंने गोल्डस्मिथ की अंग्रेजी कविता हर्मिट का सुन्दर संस्कृत अनुवाद किया है। गीतिकाव्य नीतिपरक पद्यों या सुभाषितों की रचना में ‘नवरत्न’ का अवदान विशेष स्तुत्य है। अपने पद्यों में उन्होंने गागर में सागर भर दिया है। आधुनिक कवियों की शैली के अनुसार नीतिपरक पद्यों में उन्होंने अनेक स्थलों पर नवरत्ल के नाम अपने आप को सम्बोधित करते हुए पते की बातें की हैं। शैली हृदय में सीधे उतर जाने वाली है। उदाहरण देखिये कर्मप्रियो रे नवरत्न भूया श्चर्मप्रियत्वं भ्रमतोऽपि मा भूः। कर्मप्रियं पृच्छति लोकलोक श्चर्मप्रियं क्वापि न कोऽपि किञ्चित् ।। “नवरत्ननीतिरचनावलिः -१ (अरे नवरत्न, तू कर्म का प्रेमी बने, भ्रम से भी तेरी चर्मप्रियता न हो। लोग कर्म के प्रेमी को पूछते हैं, चर्म-प्रिय को कहीं कोई भी नहीं पूछता या आदर करता है।)

श्रीधर पाठक

श्रीधर पाठक का जन्म फरवरी १८६० ई. में हुआ था। हिन्दी के प्रख्यात कवि श्री पाठक ने संस्कृत में अनेक ललित काव्यों की रचना की है। इनमें ‘गोखलेप्रशस्तिः, आराध्यशोकाजलिः (१६०५ ई.) भारतसुषमा, मातृपादवन्दनम् (१६२६ ई.) मनोविनोदः, भारतसुषमा अदि उल्लेखनीय हैं। गोखलेप्रशस्तिः’ की रचना श्री गोपाल कृष्ण गोखले के निधन पर सं. १६७१ में की गयी और इसी वर्ष इसे कवि ने सं. १८७२ में पद्मकोट ग्रंथमाला के अन्तर्गत स्वयं प्रकाशित किया। इसमें भावविह्वल हो कर श्री गोखले के सद्गुणों का स्मरण किया गया है सौम्यवृत्तिसाधुतासमुत्थभावसुन्दरम् देशकालकोविदं स्वदेशमानमन्दिरम् । सूनृतोक्तिमौक्तिकाभिरामकण्ठभूषितम् संस्मरामि लोकवन्यगोखलेबुधेश्वरम् ।। (सौम्य व्यवहार तथा साधुता से उत्पन्न भाव से सुन्दर, देश-काल को जानने वाले, स्वदेश के मान के मन्दिर रूप, सुभाषित की मुक्ताओं से सूभूषित कण्ठ वाले, लोकवन्द्य, बुधेश्वर गोखले महाशय को स्मरण करता हूँ।) ‘आराध्यशोकाञ्जलिः’ की रचना कवि ने अपने पिताजी के निधन पर सं. १६६३ में की थी, जिसका भी प्रकाशन सं. १६७२ में ही हुआ। इसमें पितृवात्सल्य और पुत्र की श्रद्धा तथा शोक के भावों को मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है। उदाहरणार्थ क्व बतास्ति किलास्य चेतना क्व च सा वाक्पटुता क्व भा क्व थीः ? क्व नु सा बतचारुता गता भुवि शेतेऽद्य विनिष्क्रिय वपुः।। (इसकी चेतना कहाँ गयी, वह इसकी वाक्पटुता कहाँ और बुद्धि कहाँ तथा इसकी चारुता कहां गयी ? आज क्रियाहीन शरीर पृथ्वी पर पड़ा है।)३०४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

भट्ट मथुरानाथ शास्त्री

भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने साहित्यकारों और शास्त्रज्ञों की समुज्ज्वल वंश-परम्परा में जन्म लिया था। इनके पूर्वज मुगल काल में आन्ध्रप्रदेश से उत्तर की ओर आये। ‘देवर्षि’ की उपाधि से विभूषित ये पण्डित काशी, प्रयाग, रीवा, अनूपशहर आदि स्थानों पर रह कर बूंदी आये। देवर्षि श्रीकृष्ण भट्ट गढपहरा (सागर) में कुछ काल रह कर बूंदी में और फिर जयपुर की राजसभा में १६७५ ई. से १७६१ ई. तक रहे। इन्हीं के गोत्र में मण्डनभट्ट हुए तथा इनकी ही वंशपरम्परा में भट्ट मथुरानाथ का जन्म १८६६ ई. में हुआ। इनके पिता द्वारकानाथ भट्ट थे और माता जानकी देवी। छात्रावस्था से ही भट्ट मथुरानाथ अत्यन्त मेधावी थे और शिक्षा समाप्त करके वे जयपुर के महाराजा संस्कृत महाविद्यालय में प्राध्यापक हुए। १६६४ ई. में पचहत्तर वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हुई। ही संस्कृत के अतिरिक्त शास्त्री जी ने हिन्दी तथा व्रज भाषाओं में भी काव्यरचना की। संगीतशास्त्र का इनको अच्छा ज्ञान था। उर्दू, बंगाली तथा गुजराती भाषाओं के साहित्य का इन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। इन्होंने संस्कृत में छः रेडियो रूपक, आधुनिक दृष्टि से कहानी, यात्रावृत्त, ललित निबन्ध, एकांकी आदि नवीन विधाओं में रचनाएँ प्रस्तुत की। संस्कृत गीतिकाव्य को इनकी देन अविस्मरणीय है। और इनके संस्कृत काव्यों के तीन संकलन सुप्रसिद्ध हैं- साहित्यवैभवम् (१६३० ई.) जयपुरवैभवम् (१६४७ ई.) तथा गोविन्दवैभवम् (१६५७ ई.)। इन्होंने संस्कृत में घनाक्षरी, कवित्त, सवैया आदि व्रजभाषाकाव्य के छन्दों में रचना करने का अभिनव उपक्रम किया, गज़ल और रुबाइयों की रचना का भी आधुनिक संस्कृत कविता में इन्होंने सूत्रपात किया। संस्कृतरत्नाकर, भारती जैसी संस्कृत की साहित्यिक पत्रिकाओं और काव्यमालासीरीज के संपादन में इनका सहयोग रहा। रसगङ्गाधर, गाथासप्तशती आदि प्राचीन ग्रन्थों की इनकी टीकाएं भी बहुमूल्य हैं। संस्कृत कविता में नवीन छन्दःसंस्कार और अभिनव भावबोच को संचालित करने की दृष्टि से शास्त्री जी का योगदान अमूल्य है। आधुनिक परिवेश तथा समाज का इन्होंने कहीं चुटकी लेते हुए, कहीं व्यंग्य के पैनी मार के साथ तो कहीं हास्य और विंडबना का अनुभव देते हुए चित्रण किया है। अब तक अप्रयुक्त छन्दों में लिखते हुए भी शास्त्री जी ने कहीं आयास का अनुभव नहीं होने दिया है। आयास के कवियों पर उन्होंने कितनी सहजता से चुटकी ली है शब्दा न स्फुरन्ति रचनासु नापि भाषा वशे न पुनरशेषवृत्तबन्धे प्रभविष्यामः, दासा इव नायान्ति वाचमनुप्रासा अपि भावमनायासादभिव्यक्तुं नोल्लसिष्यामः, ‘मञ्जुनाथ मानसिकमोदोद्गारमेतं मजु कवितानिकेतं कृच्छ्रभावैर्भरयिष्यामः, प्रस्थयवयोग एव विकलं व्ययतु वयो निर्विरोधवाचो वयं कवयो भविष्यामः।। गीतिकाव्य ३०५ (रचनाओं में शब्द न स्फुटित होते हैं, और न भाषा पर अधिकार है, फिर हम सभी प्रकार के छन्दों के बन्ध में समर्थ न होंगे, दासों की भाँति अनुप्रास भी वाणी का अनुगमन नहीं कर रहे हैं, भाव को अनायास प्रकट करने में भी उत्साहित नहीं होंगे, ‘मञ्जुनाथ’ कहते हैं, मानसिक मोद के उद्गार वाले इस कविता के निकेतन को भावों से हम भरेंगे, मले ही, प्रस्थपरिमाण के जी अन्न को जुटाने(?) में ही व्याकुल उम्र बीत जाए, निर्विरोध वाणी वाले हम कवि होकर रहेंगे।) शास्त्री जी के काव्य में वैयक्तिक अनुभूतियों, करुणा और भक्तिभाव का भी इसी सहजता से उन्मीलन हुआ है। अभिव्यक्ति की अनाविलता उनमें सर्वत्र बनी रही है, चाहे वह आधुनिक नागरिक जीवन का चित्रण कर रहे हों, या गज़ल जैसी नयी विधा में लिख रहे हों, या आत्मव्यथा को प्रकट कर रहे हों। लय और अन्त्यानुप्रास का निर्वाह उनमें आधुनिक भारतीय भाषाओं की कविता के समान मिलता है। अपने आप को संबोधित करते/ हुए वे कहते हैं - अयि चित्त चिरेण विचिन्तयतोऽपि च चञ्चलता न गता, न गता। अपि नाम निरन्तरयत्नशतैस्तव निष्ठुरता न गता, न गता।। (हे चित्त, चिरकाल तक तू चिन्तनपरायण है, लेकिन तेरी चञ्चलता नहीं गई, नहीं गई और सैकड़ों उपाय किये पर तेरी निष्ठुरता नहीं गई, नहीं गई।)

क्षमा राव

पण्डिता क्षमा राव का जन्म ४ जुलाई १८६० के दिन पुणे में हुआ। इनके पिता शंकर पाण्डुरंग पण्डित संस्कृत के ख्यातिप्राप्त विद्वान थे। दुर्योग से तीन वर्ष की अल्पायु में ही क्षमा को पिता की छत्रच्छाया से वंचित होना पड़ा और इनकी बाल्यावस्था कष्ट में बीती। ये अपने चाचा पं. सीताराम के पास रहीं, जो राजकोट में बैरिस्टर थे। यद्यपि अपने बड़े भाई शंकर के अनुग्रह और अनुकम्पाओं के कारण सीताराम क्षमा के प्रति स्नेह का भाव रखते थे, पर क्षमा की चाची उसके साथ बहुत निर्दयता का व्यवहार करती थीं। क्षमा और उसकी छोटी बहन तारा दोनों ही असाधारण प्रतिभा से संपन्न थीं, वे अपने चचेरे भाइयों का पाठ सुन-सुन कर ही याद कर लेती थीं, उन्हें पाठशाला नहीं भेजा गया। तारा का भी बारह वर्ष की कच्ची आयु में ही दुःखद देहावसान हो गया। क्षमा ने सौराष्ट्र से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और अंग्रेजी के लिये ‘चारफील्ड’ पारितोषिक प्राप्त किया। इसके पश्चात इन्होंने मुम्बई के विल्सन महाविद्यालय में प्रवेश लिया, जहाँ म.म.पी.व्ही. काणे भी उनके शिक्षक रहे। श्री काणे ने आगे चल कर क्षमादेवी को छात्रा के रूप में स्मरण करते हुए उनकी प्रशंसा की थी। बीस वर्ष की आयु में, अध्ययन पूर्ण होने के पूर्व ही क्षमा का विवाह मुम्बई के प्रख्यात चिकित्सक डा. राव से हो गया। उनकी भौतिक निर्धनता सर्वथा दूर हो गयी और वे ऐश्वर्यमय जीवन व्यतीत करने लगी, पर संस्कृत साहित्य के अध्ययन की उनके मन में ललक बनी रही, जिसने उन्हें संस्कृत में रचनाकर्म के लिये प्रेरित किया। उन्होंने पति के साथ योरोप का भ्रमण भी किया था, फ्रैंच, जर्मन तथा अंग्रेजी ३०६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास भाषाओं का अभ्यास किया था। भारत, फ्रांस तथा जर्मनी में उन्होंने कई बार अपनी पुत्री लीला के साथ महिला युगल चैपियनशिप जीती थी। नवंबर १६५३ ई. में उन्हें जीवन का एक और दारुण आघात लगा, जब उनके पति की मृत्यु हो गयी। क्षमा देवी ने स्वदेशी और असहयोग के आंदोलन में भी भाग लेना चाहा और इसके लिये वे गान्धी जी से मिलीं थीं। पर गार्हस्थ्य के कारण उन्हें इसका अवसर नहीं दिया गया। आजादी की लड़ाई तथा गाँधीजी के सत्याग्रह के प्रति आस्था के भाव ने उन्हें संस्कृत में इन विषयों पर लिखने के लिये प्रेरणा दी, और स्वतन्त्रता-संग्राम पर उन्होंने महाकाव्यत्रयी का प्रणयन किया। २२ अप्रैल १६५४ के दिन श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करने के अनन्तर उन्होंने प्राण त्याग दिये। क्षमादेवी की रचनाओं में उनके महाकाव्य तो प्रसिद्ध हैं ही उनकी मुक्तक रचनाओं में मीरा-लहरी उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त ‘शकरजीवनाख्यानम् में उन्होंने अपने पिता का चरित्र पद्यबद्ध किया है, ग्रामज्योतिः में अनुष्टुप छन्द में आधुनिक सामाजिक जीवन पर आधारित उनकी कहानियाँ हैं, तथा ‘विचित्रपरिषद्यात्रा’ में अनन्तशयनम् में आयोजित प्राच्यविद्यासम्मेलन के लिये की गयी यात्रा का अनुष्टुप् छन्द में वर्णन है। क्षमादेवी की भाषा शैली में सरलता, प्रसाद और प्रांजलता के साथ उत्कृष्ट काव्यसौदर्य का समावेश है। विषयों की नवीनता और अनुभूतियों की गहराई के कारण उनकी कविता में एक दुर्लभ प्रत्यग्रता है। उनके दृष्टिकोण की आधुनिकता तथा व्यक्तित्व की गरिमा उनकी सभी रचनाओं में प्रतिबिम्बित हैं। ‘मीरालहरी’ में कुरीतियों और रूढ़ियों के प्रति विद्रोह तथा भक्तिभाव में तन्मयता की मार्मिक अभिव्यक्ति है धावल्यं सितनीरज त्यजति किं पड्केऽपि नित्यस्थितं सौभाग्यं विजहाति किं हिमगिरिश्छन्नस्तुषारैरपि। कान्तिं मुञ्चति किन्नु हीरकमणिर्लोष्टैश्च सन्दूषितः किं चित्रं यदि धर्मतो न चलिता मीरापि तत्तद्धनैः।। (कीचड़ में रह कर भी कमल क्या अपनी धवलता छोड़ता है? तुषार से आच्छादित हो कर भी हिमालय क्या अपना सौभाग्य तजता है ? ढेलों के बीच हीरा क्या अपनी कान्ति छोड़ देता है ? तो फिर मीरा अपनी सास-ननद आदि के द्वारा धमकाई जा कर भी यदि धर्म से न डिगी तो क्या आश्चर्य ?) :

दत्त दीनेशचन्द्र

दत्त दीनेशचन्द्र का जन्म सन् १८६१ ई. में बंगाल में हुआ। इनके पिता दुर्गापुर में प्राथमिक शाला में प्रधानाध्यापक थे। इनकी शिक्षा हाबीगंज, राजशाही तथा कलकत्ता में हुई। १६१३ ई. में इन्होंने संस्कृत तथा दर्शन विषयों के साथ बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण की तथा १६१६ ई. और १६२१ ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय से आधुनिक अंग्रेजी साहित्य तथा प्राचीन अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया। बाल्यकाल से ही ये संस्कृतसाहित्य गीतिकाव्य ३०७ का भी अध्ययन करते रहे तथा १६१६-२१ ई. की अवधि में इन्होंने लैटिन, ग्रीक, फ्रैंच, जर्मन, हीब्रू, अरबी तथा फारसी भाषाओं का भी अच्छा अभ्यास किया। १६२७ ई. से ये जयपुर महाराजा महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक नियुक्त हुए और १६५१ ई. में वहीं से सेवानिवृत्त हो कर आजीवन जयपुर में निवास करते रहे। अंग्रेजी में इनके अनेक पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थ तथा चण्डीदास, विद्यापति, मेघदूत, उमरखैयाम आदि के पद्यात्मक अनुवाद प्रकाशित हैं। १६४३ ई. में इन्होंने संस्कृत में ‘भारतगाथा’ काव्य की रचना की थी, जिसकी भट्ट मधुरानाथ शास्त्री आदि पण्डितों ने बहुत सराहना की। उससे प्रोत्साहित हो कर इन्होंने सुभाषगौरवम्, रवीन्द्रप्रतिभा, छन्दःसन्दोहः तथा वनविभावरी ये चार काव्य भी प्रकाशित किये। भारतगाथा में सौ मन्दाक्रान्ता छन्दों के द्वारा राष्ट्र के अतीत गौरव तथा वर्तमान दुरवस्था का मार्मिक चित्रण है। आरंभ में सरस्वती, कृष्ण, राम तथा परशुराम की वंदना करके कवि ने शंकर, चैतन्य आदि महापुरुषों के राष्ट्रोन्नायक कार्यों का हृदयग्राही वर्णन किया है। वर्तमान से असन्तुष्ट हो कर कवि ने अतीत की रमणीयता का चित्र खींचा है कृष्णप्राणाः स्वपतिविमुखाः क्वाधुना गोपिकास्ताः कुत्र श्यामो मदनदमनो राधिकाप्रेमलक्ष्यः । वंशीधारी रतिपतिजयी साम्प्रतं क्वास्ति दृश्यः कालिन्दी च क्व पुनरघुना सोर्ध्ववारिप्रवाहा।। (अपने पतियों से विमुख तथा कृष्ण को प्राण मानने वाली वे गोपियाँ अब कहाँ हैं? __ कामदेव को दमित करने वाले, राधा के प्रेम के लक्ष्य, वंशीधारी, रतिपति पर विजय प्राप्त करने वाले श्याम कहा हैं ? वे कहां दृष्टिगोचर होंगे? फिर ऊर्ध्व जल-प्रवाह वाली यमुना अब कहां हैं ?) सारा काव्य राष्ट्रीय भाव से ओत-प्रोत है। जिस धरती ने सिंह जैसे वीर पूतों को जन्म दिया था, वह सियारों की माता कैसे हो गयी इस बात से खिन्न कवि फिर से राष्ट्र गौरव की प्रतिष्ठा चाहता है श्यामच्छाया दलितमहिषा मुण्डमालां दधाना मत्स्याजीवैः कथमनुकृतानपुष्पैरिहाा। सूत्वा सिंहान् किमिह जननी फेरवाणामसि त्वं धीरः संख्ये स्थिरनिजमहा मङ्क्षु हन्यादरातिम्।। (५६) (श्याम कान्ति वाली, महिषासुर को मारने वाली, मुण्डमाला को धारण करती हुई उस जननी को मत्स्यों से जीविका निर्वाह करने वाले म्लान फूलों से पूजेंगे ? सिंहों को पैदा करके अब तुम क्या सियारों की जननी हो गयी हो ! युद्ध में स्थिर निजतेज वाला धीर शीघ्र शत्रु को मार सकेगा?) ३०८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सुभाषगौरवम् में १७४ पद्यों में सुभाषचन्द्र बोस का ओजस्वी चरित निबद्ध है। इसमें विभिन्न छन्दों का प्रयोग किया गया है। चीररस तथा गौडी रीति का बन्ध यहां चमत्कारमय है। इसके साथ ही कवि की कल्पना और अलंकारयोजना भी प्रौढ है। राष्ट्रनायक का चित्र कवि ने अनुभूतिप्रवणता के साथ ऊर्जस्वी और प्रेरणाप्रद रूप में अंकित किया है नवनीतसुधासमचित्तविनोदनरीतिगुणाढ्यतयावसित त्यमनन्तसहायकशक्तिविनायकशूरषडाननवद् रिपुहा। त्वमु तारकजिद् भुवि शक्तिधरोपमशौर्यगणाधिपतुल्यबलो नवभारतनाविक रक्षतु ते रणनीतिरनाविकनावमिमाम्।। (हे नये भारत के नाविक, नवनीत और अमृत के समान चित्त के विनोदन की रीति में गुणाढ्य के रूप में विद्यमान तुम अनन्त सहायक शक्तियों वाले विनायक तथा शूर कार्तिकेय के समान हो, तुम्हारी रणनीति नाविक रहित इस नौका की रक्षा करे।) ‘रवीन्द्रप्रतिभा’ काव्य में भी १७४ पद्य हैं, पर इसमें छन्दों की विविधता अनुपम है। कुल १४६ प्रकार के छन्दों का कवि ने यहाँ प्रयोग किया है। कवीन्द्र रवीन्द्र के कृतित्व और व्यक्तित्व का चित्रण प्रभावोत्पादक है। रवीन्द्रनाथ के काव्य और सुभाषित वाक्यों की भावना भी कवि ने आत्मसात् करके प्रकट की है कविजीवनं सततमाहुतिदानं क्षणिकं सुखे तनुभृतां परमिष्टम्। सुखमिच्छतां सततदुःखमवश्यं । स्मरणीयमेतदपरं रविवाक्यम्।। (६१) (कवि का जीवन निरन्तर आहुतिदान रूप है, यद्यपि शरीरधारियों को क्षणिक सुख परम अभीष्ट होता है और सुख चाहने वालों को अवश्य सदा दुःख होता है, ‘रवि’ (रवीन्द्र) का यह वचन स्मरणीय है।) _ बंगविभावरी में २२० पद्य तथा २१२ छन्द प्रयुक्त हैं। नृत्यमती तथा सौदामनी - ये दो नये छन्द कवि ने अपनी ओर से परिकल्पित कर के यहाँ रचे हैं। ‘भारतगाथा’ के ही समान यहाँ बंगदेश के अतीत का गौरवगान तथा वर्तमान कुरीतियों का चित्रण है। कवि दीनेशचन्द्र को छन्दों का असाधारण ज्ञान था, जो उनके छन्दःसन्दोह: में प्रतिफलित हुआ है। इसमें उन्होंने छन्दों के लक्षण तथा स्वरचित उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। भाषा के उत्तम शिल्प और लालित्य के साथ उदात्त विषयवस्तु के विन्यास के कारण दत्त दीनेशचन्द्र आधुनिक संस्कृत कवियों में उल्लेखाई हैं। (a)

महादेव शास्त्री

सर्वतन्त्रस्वतन्त्र, कवितार्किकचक्रवर्ती महादेव शास्त्री के पिता पं. अम्बिकाप्रसाद पाण्डेय थे। इनका जन्मस्थान बिहार के कैमूर (भभुआ) जिले में ऐलायग्राम है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में काशी के श्रेष्ठ पण्डितों से विद्या प्राप्त कर ये गीतिकाव्य ३०६ अध्यापन करते रहे, तथा अनन्तर काशी सुमेरुपीठ शङ्कराचार्य के पीठ पर भी अधिष्ठित हुए। _रसगङ्गाधरटीका, ख्यातिवादः आदि दार्शनिक ग्रन्थों के अतिरिक्त इनका ‘भारतशतकम् ‘पूर्णास्तवः’ (गङ्गाष्टकम्’ आदि संस्कृत काव्यों के द्वारा सरसकाव्यरचनाभिनिवेश प्रकट है। ‘भारतशतकम् में मातृभूमि के गौरव, राष्ट्रप्रेम, देश की वर्तमान दुर्दशा तथा उसके पुनरुत्थान के लिये कवि ने अपने भावों को पूरी हार्दिकता के साथ व्यक्त किया है। भाषा की प्रांजलता, शब्दसाधना, पदशय्या और कल्पनाओं की रमणीयता का यह काव्य उत्कृष्ट उदाहरण है। यह एक सुन्दर राष्ट्रगीत भी कहा जा सकता है, जो देशप्रेम का भाव पाठकों के मन में संचारित करता है बगैः सङ्गीतिकीर्तिः कलितकलकलश्चोत्कलैरान्धबन्धु मद्ररुन्निदुमुद्रो जवजनितजयोद्गुर्जरः सिन्धुबिन्दुः। पञ्चापरञ्चितश्रीमथुमधुरधुरो मध्ययुक्तैर्विहारै रार्यावर्तामिधानो जयति जनपदो मानिनां जन्मभूमिः।। (मानशाली जनों की जन्मस्थली आर्यावर्त नाम का राष्ट्र विजयशील हो, जिसकी कीर्ति का गान बंग करते हैं, उत्कलों से जो कल-कल से भरा है, जो आन्धों का बन्धु है, मद्रों के कारण जिसकी मुद्रा जागृत है, गुर्जरों के कारण जिसकी विजय है, सिन्धु जिसका बिन्दु स्थानीय है, पंजाब के कारण जिसकी शोभा बढ़ी है तथा जो मध्य प्रान्त, युक्त प्रान्त तथा बिहार प्रान्त के कारण मधु के समान मधुर बना है।) ‘पूर्णास्तवः’ आगमिक दृष्टि से जगदम्बा की स्तुति है। कवि ने समग्र सृष्टि की विश्रान्ति तथा विमर्श और स्पन्द के द्वारा उत्पत्ति जगदम्बा में देखी है - चिदानन्दाम्मोधेः परशिवपरातीतवपुषो विभागोऽभूदाद्यः स च खलु विमर्शः प्रथिमगात्। अपि स्यात् स्पन्दो वा ननु भवतु सेच्छा नगसुते त्वमेवैका सर्वं त्वयि सकलसृष्टिः प्रणिहिता।। (चिदानन्दमय परशिव का स्वातन्त्र्यवश प्रथम विभाग ही विमर्श के नाम से प्रथित हुआ, व ‘स्पन्द’ हुआ और वही ‘इच्छा’ शब्द से कहा गया, हे हिमालयपुत्री, नाम चाहे कुछ भी हो पर अर्थतः सब कुछ तुम ही हो और सब तुम में है।) अलङ्कारों के विन्यास की दृष्टि से गङ्गाष्टकम् रचना बड़ी सम्पन्न है। कवि की गङ्गाभक्ति का भाव अत्यन्त कमनीय रूप इसमें प्रस्तुत हुआ है। सन्देह अलङ्कार गङ्गा की लावण्यपूरपरिपूरित लहरी प्रवाह के वर्णन में उपयोग करता हुआ कवि कहता है किं वाऽयं रसनिझरोऽमृतझरो ब्राह्मः प्रकाशः स्फुटः किं वाऽसौ ललिता त्रिलोककलिता पुण्योज्ज्वलश्रीः शुभा। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास आहोस्वित् पयसां निधिः किमपरो लावण्यपूरोल्लसन् सोल्लासं विलसन्ति नस्त्वयि शिवेनाल्पा विकल्पालयः।। (हे शिवे, यह आपका प्रवाह-क्या रसपरिपूर्ण सतत अमृतवर्षी विशद परब्रह्म प्रकाश है ? अथवा, त्रैलोक्य की पुजीभूत, सुन्दर, मङ्गलमयी धर्म की निर्मल श्री है, या पवित्र शृङ्गारलक्ष्मी है ? अथवा, लावण्य से लक्षित यह दूसरा क्षीरसमुद्र है? इस प्रकार आप के विषय में हमारी अनेक संशय-कोटियाँ सोल्लास विलसित होती हैं।)

मेधाव्रत

स्वनामधन्य मुनि मेधाव्रत के पूर्वज गुजरात के खेड़ा जिले में पिंडरियों के उपद्रवों से उद्विग्न हो कर महाराष्ट्र के नासिक जिले में यवलवाड़ी ग्राम में आकर बस गये थे। मेघाव्रत के पिता जगजीवनदास आरम्भ में सनातनी थे, बाद में आर्यसमाज में दीक्षित हुए। इन्होंने अपनी कनिष्ठ तनया जानकी का अन्तर्जातीय विवाह किया तथा कनिष्ठ पुत्र से उत्पन्न अपने पौत्र सुबोधचन्द्र का मुख देख कर १६ मई १६२३ ई. में संन्यास ग्रहण कर लिया। मेघावत का जन्म ७-१-१८६३ ई. के दिन हुआ। इनका वास्तविक नाम मोतीचन्द्र था। सिकन्दराबाद गुरुकुल में इनकी मेधा को देख कर गुरुजनों ने मेघाव्रत नाम दिया। १६१० ई. से इनकी शिक्षा वृन्दावन गुरुकुल में हुई। १६१८ ई. में ये कोल्हापुर नरेश छत्रपति महाराज के निमंत्रण पर आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा स्थापित वैदिक विद्यालय में अध्यक्ष के पद पर कार्य करने हेतु कोल्हापुर गये। १E२० ई. में सूरत के राष्ट्रीय महाविद्यालय में हिन्दी तथा संस्कृत के प्राध्यापक नियुक्त किये गये। १६२५ ई. के इटोला गुरुकुल में आचार्य और १६२६ ई. से इसी संस्था में बड़ौदा में रहे। बाद में इसी संस्था को आर्य कन्यामहाविद्यालय बनाया गया, १६ वर्षों तक मेघाव्रत इसमें सेवारत रहे। २२-११-१९६४ ई. के दिन इनका देहावसान हुआ। मेघावत ने दयानन्ददिग्विजय, ब्रह्मर्षिविरजानन्दचरितम्, नारायणस्वामिचरितम्, यतीन्द्रनित्यानन्दशतकम्, विश्वकर्माद्भुतशतकम् (उपकुलपतिमाईलाल-कर्मकौशलशतकम्) ज्ञानेन्द्रचरितम् ये चरितकाव्य, दयानन्दलहरी, दिव्यानन्दलहरी, सुखानन्दलहरी-ये लहरीकाव्य, अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त पर आधारित वैदिकराष्ट्रकाव्य, श्रीकृष्णस्तुति नामक स्तोत्र, मातृविलापः, मातः प्रसीद, मातः का ते दशा-ये तीन विलापकाव्य या राष्ट्रभक्तिपरक काव्य, वाङ्मन्दाकिनी, श्रीरामचरितामृतम्, सत्यार्थप्रकाशमहिमा, गुरुकुलचित्तौडगढम् इत्यादि माहात्म्यनिरूपणात्मक काव्य, ब्रह्मचर्यशतकम्, गुरुकुलशतकम् इत्यादि शतककाव्यों के अतिरिक्त सहस्रों स्फुट पद्यों या लघुकाव्यों की रचना की। उदयपुर से दिल्ली तक की अतिरिक्त यात्रा का वर्णन इन्होंने विमानयात्रा’ काव्य में चालीस पद्यों में किया है। इसके अतिरिक्त इनके अगणित प्रासंगिक काव्य भी हैं। गद्य (दो उपन्यास कथाएँ) तथा नाटक चम्पू आदि विधाओं में भी इनका साहित्य है। शैली की प्रासादिकता, अनुप्रास और लयात्मकता तथा छन्दोवैविध्य की दृष्टि से मेघाव्रत सफल कवि हैं। गीतिकाव्य

महालिङ्ग शास्त्री

महालिङ्ग शास्त्री का जन्म ३१-७-१८६७ ई. के दिन मद्रास प्रान्त के तंजौर जिले में तिरुवालंगाड ग्राम में हुआ। इनके पिता महामहोपाध्याय यज्ञ स्वामी थे। ये सोलहवीं शती के महान दार्शनिक काव्यशास्त्री और मीमांसक श्री अप्ययदीक्षित के वशंज थे। यज्ञस्वामी इस वंश में उत्पन्न श्री राजुशास्त्री (त्यागराज) के पौत्र थे। महालिग का विद्यारम्भ इनके प्रपितामह श्री राजुशास्त्री द्वारा ही १६०२ ई. में कराया गया। काव्य-प्रतिभा इनकी छात्रावस्था से ही अंकुरित होने लगी थी। १८१५ ई. में प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम इंटरमीडिएट, १६१६ ई. में बी. एल. तथा १६३२ ई. में इन्होंने संस्कृत से एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। १E१६ ई. से ही ये श्री टी. आर. रामचन्द्र अय्यर के अधीन वकालत करने लगे। विषम परिस्थितियों में दस रुपये मासिक पर लिपिक कार्य भी किया। १६२८ ई.से इन्होंने हाईकोर्ट के वकील के रूप में अपना पंजीकरण कराया। १६३५ ई. से वकालत को त्याग कर मदुराई के महाविद्यालय में शिक्षण का कार्य किया। १७-४-१६७ ई. के दिन इनका स्वर्गवास हुआ। यद्यपि महालिग शास्त्री ने अनेक उत्कृष्ट नाटकों, प्रहसनों आदि की भी संस्कृत में रचना की है, पर उनका विशेष क्षेत्र गीतिकाव्य ही कहा जा सकता है। तमिल भाषा में तथा अंग्रेजी में भी इन्होंने काफी साहित्य रचा है। सात संस्कृत रूपकों के अतिरिक्त इनकी संस्कत काव्य रचनाएँ हैं-अमरसन्देश, भारतीविषाद, वनलता, द्रविडार्यासप्तशती, व्याजोक्ति रत्नावली, तथा किङ्किणीमाला (अनेक अनूदित तथा मौलिक लघुकाव्यों का संकलन)। इन गीतिकाव्यों के अतिरिक्त शास्त्री जी की स्तोत्ररचनाओं की संख्या भी बहुत बड़ी है। देशिकेन्द्रस्तुतिः के अतिरिक्त इनके बारह स्तुतिकाव्य ‘स्तुतिपुष्पोपहारः में संकलित हैं। महालिङ्ग शास्त्री प्राचीनता तथा आधुनिकता के सन्धिस्थल पर अवस्थित हैं। एक और तो वे प्रचीन महाकवियों की समर्थ पदावली में भक्तिभाव या उदात्त भावनाओं को अभिव्यक्त कर सकते हैं, जैसे विघ्नेश्वरवृत्तमालास्तवः का यह एक पद्य देखिये यदालानं चेतश्शुचिसुमनसां भक्तिरचला सणिर्यस्य स्वैरग्रहणविधिरोकारमननम्। गजेन्द्रः कोऽप्येष श्रुतिविपिनसंञ्चाररसिक श्चिरं वप्रकीडां श्रयतु मम विघ्नाद्रिकटके।। (चित्त से पवित्र सुमनस्जनों की अचल भक्ति जिसका बन्धन है, ओंकार का मनन स्वतन्त्र जिसके ग्रहण का उपाय रूप अंकुश है, जो वेदों के जंगलों में सञ्चार का रसिक है, ऐसा यह कोई विलक्षण गजेन्द्र (भगवान् श्री गणेश) मेरे विघ्न रूपी पर्वत के मध्यभाग में चिरकाल तक ‘वप्रक्रीडा’ करें।) गजेन्द्र (गणेश के लिये आलान (बन्धनस्तम्भ) सृणि (अंकुश) विपिन, विघ्नाद्रिसैन्य कटक तथा वप्रक्रीडा (दूसा मारना) आदि से यहाँ एक आकर्षक रूपक बन्ध बनाया गया है। महालिङ्ग शास्त्री की अनेक रचनाएं सामाजिक तथा समसामयिक प्रसंगों पर हैं, कुछ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कविताओं में पैना उत्पास और वक्रोक्ति की विच्छित्ति है। उनके भ्रमरसन्देशः तथा वनलता (खण्डकाव्य) मेघदूत से प्रभावित हैं। वनलता में यक्ष-यक्षिणी के प्रेम को जन्म-जन्मान्तर की। कथा के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। भारतीविषादः इनकी छात्रावस्था की रचना है। कवि संस्कृत को माता के रूप में देखता है। अपने कुपुत्रों के दुश्चरित्र से उसका हृदय बिधा हुआ है। पर उसका कोई पुत्र इस दुश्चरित पर अनुताप करता हुआ उसके निकट फिर से आये, तो उसका हृदय अवश्य ही द्रवीभूत हो उठेगा दुर्वृत्तपुत्रकुपितं जननीमनः ख ल्वन्तः सशल्यमपि मन्तुभिरुग्रकल्पैः। दृष्टे सुते परिचितानुशयोपतापे सद्यो व्यनक्ति करकोपलवद् द्रवत्वम् ।। व्याजोक्ति या अन्योक्ति की रचना में कवि महालिग ने विशेष दक्षता प्रकट की है। उन्होंने पारम्परिक विषयों पर भी अन्योक्तियों का प्रणयन किया है तथा कतिपय नवीन विषयों का भी अन्योक्त्ति के माध्यम से स्पर्श किया है। उनकी अन्योक्तियाँ समकालिक जीवन की विसंगति, छद्म और प्रपंच को मार्मिक अभिव्यक्ति देती हैं। मकड़ी उसके जाले और गृहस्थ द्वारा झाडू से उसे साफ कर डालने के प्रसंग को ले कर कवि ने कहा है प्रायोऽसंस्कृतजीर्णकोणवितते स्वोच्चारसारं हि य ल्लूता कर्म तनोति तन्तुजटिलं क्षुद्र गृहाशंसया। स्तोकालोकसशोभमर्कमहसा तदुर्भगं गेहिनो नेष्यन्ति क्वचिदीर्घ्यिता यदि मनाक् सम्मार्जनी भ्राम्यते।। (अन्योक्तिरत्नावली, १२०) (प्रायः, मकड़ी गृह में असंस्कृत कोने में घर बनाने के लिए जो जाल फैलाने का क्षुद्र कर्म करती है, उसे लेकर घर वाले लोग ईर्ष्या नहीं करते और यदि ईर्ष्या करें तो झाडू घुमा दी जाती है। महालिङ्ग शास्त्री संगीत के मर्मज्ञ थे। किकिणीमाला में संकलित कतिपय गीतियों के लिये उन्होंने उपादेय रागों का भी परिशिष्ट में निर्देश किया है। अंग्रेजी साहित्य पर उनका अच्छा अधिकार था। शेक्सपीयर आदि, कवियों के कतिपय उत्तम काव्यांशों का उत्कृष्ट संस्कृत पद्यानुवाद उन्होंने इसी संकलन में प्रस्तुत किया है।

सूर्यनारायण शास्त्री

श्री सूर्यनारायण शास्त्री का जन्म १०.२.१८६७ ई. के दिन आन्ध्रप्रदेश में हुआ। इन्होंने संस्कृत भाषा के साथ-साथ तेलुगु और अंग्रेजी का भी सम्यक् अध्ययन किया था। शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् ये सिकन्दराबाद के हाईस्कूल में शिक्षक नियुक्त हुए। अनन्तर इन्होंने राजा बहादुर बैंकटराम रेड्डी वूमन्स महाविद्यालय में कार्य गीतिकाव्य ३१३ किया। इन्होंने पूर्णपात्रम् नामक गीतिकाव्य तथा खण्डकाव्यों की रचना की है-भर्तृदानम्, संयुक्तास्वयंवरम् विवेकानन्दम्, कचदेवयानीयम्, नन्दचरितम्, रामदासचरितम् तथा कीरसन्देशम् । भर्तृदानम् श्रीमद्भागवत के पारिजातहरण के कथानक पर आधारित है। संयुक्तास्वयंवरम् की विषयवस्तु ऐतिहासिक है। कीरसन्देशम् में रुक्मिणी श्रीकृष्ण को सन्देश भेजती है। ‘विवेकानन्दम्’ में स्वामी विवेकानन्द के जीवन की प्रमुख घटना चित्रित हैं। कचदेवयानीयम् एक भावपूर्ण मार्मिक कथा का उपस्थापन है। नन्दचरितम् में एक अस्पृश्य शिवभक्त की कथा वर्णित है। रामदासचरितम् में स्वामी रामदास का जीवन चित्रित है।

नागार्जुन

नागार्जुन (वास्तविक नाम वैजनाथ, जन्म १६११ ई.) हिन्दी के समकालिक कवियों में मूर्धन्य हैं। इनकी शिक्षा काशी में हुई। बाल्यकाल से ही संस्कृत में कविता लिखते थे, कालान्तर में हिन्दी के उपन्यासकार, कथाकार तथा सुकवि के रूप में विश्रुत हुए तथापि संस्कृत काव्यरचना का इनका क्रम आज भी जारी है। इनकी संस्कृत कविताओं की समकालिक संस्कृत साहित्य में अपनी एक अलग बानगी है। बौद्ध भिक्षु के रूप में हिमालय के अंचल का भ्रमण करते हुए देश की जिस नैसर्गिक सुषमा का इन्होंने साक्षात्कार किया, उसकी कुछ छवियाँ अत्यन्त मौलिक परिकल्पना के साथ इन्होंने अपने अनेक संस्कृत मुक्तकों में संजोयी हैं। कश्मीर और वितस्ता के इनके वर्णन निराले ही हैं। अपने रचनाकाल के आरम्भिक दौर में इन्होंने रूस के क्रान्तिकारी महान् नेता लेनिन की मृत्यु पर ‘लेनिनशतकम्’ काव्य लिखा था, जो कवि की समाजचेतना वर्तमान विश्व की व्यवस्था की समझ की दृष्टि से प्रभविष्णु रचना है। इनकी ‘भारतभवनम्’ कविता भी भारतीय जनता के शोषण तथा शोषणतन्त्र का बेबाक चित्र उपस्थित करने वाली कविता है। इन्होंने अपनी देवस्तुतिपरक रचनाओं में भी प्रतीकात्मक या व्यंजनापूर्णरीति में आज के जीवन की स्थितियों को साकार कर दिया है। ‘हैमी पार्वती’ शीर्षक कविता में पार्वती का एक सुखी गृहिणी के रूप में चित्र अंकित किया गया है, उनका एक बेटा तो बड़ा होने के पहले ही देवसेनापति बन गया, दूसरा भी इतना बुद्धिमान है कि दुनिया में उसकी प्रज्ञा का डंका बजता है। फिर पति का सुखद साथ और पिता हिमालय की विशाल अधित्यका। पार्वती को किस बात की चिन्ता ? वे तो वर्फानी चादर ओढ़े आराम से सो रही हैं तारुण्यात् पूर्वमेव प्रथितविजयिनामग्रणीः कार्तिकेयः तीक्ष्णप्रज्ञश्च विश्वे वितरति प्रतिभा बालको वारणास्यः। तातस्याधित्यकासु प्रमुदितवदना कान्तसान्निध्यतुष्टा निद्रात्येषा मृडानी तुहिनविततिभिः प्रावृतेवासमन्तात् ।। कवि ने पार्वती के प्रति भक्तिभाव भी बनाये रखा और पार्वती की छवि को आज की पारिवारिक संवेदना से जोड़ दिया है। इसी प्रकार गणेश और कार्तिकेय का चित्र बर्फ की गेंदों से खेलते बच्चों के रूप में बड़ा मनोहारी है३१४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास नमामि हरपार्वतीप्रणयपद्मकिजल्कर्ज शिशुं शरवणोद्भवं गजमुखं च सिद्धिप्रदम् । यदीयहिमकन्दुकैः शिखरकोटिसंस्पर्शिभिः शतगुरपि धावनेषु शिथिलादरा दृश्यते।। (शिव और पार्वती के प्रणय रूप कमल के पराग से उत्पन्न, शरवण में जनित शिशु कार्तिकेय और सिद्धिदाता गजानन को नमन करता हूँ, जिनके शिखर के अग्रभाग को छूने वाले हिममय कन्दुकों के कारण इस दृश्य को देखने में मग्न शतद् या सतलज नदी भी अपनी दौड़ शिथिल कर देती है।) लेनिनविषयक काव्य में आपने महान् नेता के अवसान पर उसके सन्देश को भूल जाने की प्रवृत्ति पर मार्मिक कटाक्ष करते हुए कहा है अपि कौशेयनिचिताः स्वर्णवर्णाङ्किता अपि। सूक्तयस्तव सीदन्ति दुर्व्याख्याविषमूर्छिताः।। (सिल्क के वस्त्र पर खचित सोने जैसे वर्णो से अंकित भी तुम्हारी सूक्तियाँ दुर्व्याख्या के विष से मूर्च्छित होकर कष्ट सह रही हैं!) कश्मीरविषयक कविताओं में नागार्जुन ने प्रकृति में स्पन्दन तथा चैतन्य खोला है। वर्फ से आवृत वन्यपरिसर में वितस्ता नदी का चित्र है जाड्यार्तानां सहस्रं दिशि दिशि प्रसृतं देवदारुद्रुमाणां पाण्डुत्वग्वेष्टनान्तःशिथिलितवदना दैन्यमाप्ता वनाली। क्षुत्वामे शुष्ककण्ठे विषमतलगृहे निर्झराणां कलेऽस्मिन् शैत्याधिक्यप्रभावाद् विजडितगतिका स्विद्यतीयं वितस्ता।। (सर्दी से पीड़ित देवदारु के हज़ारों वृक्ष दिशा में फैले हैं, पीले छालों से ढंकी भीतर शिथिल शरीर वाली वनपंक्ति दैन्य भाव से ग्रस्त है, भूख से दुर्बल तथा सूखे कण्ठ वाले तथा निर्झरों के शब्द वाले इस विषम तल-गृह में शैत्य के आधिक्य के प्रभाव से जड़ीभूत गति वाली वितस्ता नदी परेशान हो रही है।

अमीरचन्द्र शास्त्री

अमीरचन्द्र शास्त्री का जन्म १८१८ ई. में पंजाब (अब पाकिस्तान) के जिला झंग के अहमदपुरस्याल नाम के एक गाँव में हुआ। कवि शास्त्री ने हरिद्वार के ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम में पं. घूटर झा जैसे प्रतिष्ठित विद्वान् के सान्निध्य में अध्ययन किया, आरम्भ से ही इनमें काव्य निर्माण की प्रवृत्ति रही, दिल्ली के श्रीलालबहादुर शास्त्री केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ में १६६३ से अध्यापन किया और वहीं से सेवानिवृत्त हुए।

  • इनकी सुप्रसिद्ध रचना ‘गीतिकादम्बरी’ उक्त विद्यापीठ से १६६८ में प्रकाशित हुई, यह संस्कृत के गीतपद्यात्मक बारह ग्रन्थों का संकलन रूप है। कवि शास्त्री जी ने इसमें गीतिकाव्य संकलित कुछ रचनाओं को छोड़ कर इसे कई कारणों से गीतिकाव्य-विधा की रचना माना है। इसमें संकलित ३० सर्गों का काव्य सङ्गीतवृन्दावनकाव्य एक विलक्षण गीतकाव्य है, जिसके समकक्ष आधुनिक काल में रचित किसी गीतकाव्य को स्थापित करने में किसी भी आलोचक के लिए संकोच हो सकता है। - कविवर शास्त्रीजी का समग्न व्यक्तित्व ही श्रीराधा और श्रीकृष्ण के प्रति सहज अनुराग से उल्लसित है और उनके भक्तिभाव से आप्लावित हृदय की तन्मयता इस रचना के पद-पद में अभिव्यक्ति पाती है। कवि ने सामयिक घटनाओं के प्रभाव से भी अनेक रचनाओं को इस विशाल गीति काव्य में निबद्ध किया है। ‘श्रीगान्धिगरिमा’ (पृ. ४५३) लिखते हुए महात्मा गाँधी की हत्या से व्यथित होकर-“हा हा महात्मा हतः” समस्यापूर्ति शैली में प्रभावशाली ढंग से मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। कवि ने महात्मा जी को कपिल, गौतम, पतञ्जलि, कणाद, जैमिनि, व्यास, पाणिनि, वाल्मीकि के रूप में अपनी समर्थ शब्द-योजना द्वारा प्रस्तुत किया है। स्तुतिकादम्बरी का यह अश्वधाटीयुग्मक (पृ. ३७१) आकलनीय है जल्पेम किं कथमजल्पेन ना पदमनल्पेहितं विवृणुताम्, कल्पेत कल्पतरुकल्पेऽपि किं क्वचन तल्पे स्थितस्य कुशले। मन्दारतां श्रयति मन्दार इत्यहह वन्दारवे प्रियतमा, नन्दात्मजाय सुखकन्दायते जगति मन्दायतेऽन्यदखिलम। छायाऽपि यस्य किल मायाऽभिधा जगति जाया सती विहरति, कायाधवावितुरनायासमस्य किल साथासमुन्निमिषतः। आधार एक इह मा धावतातू परमगाधा रसामृतझरी, राधा हरेत मम बाधानशेषभवसाधारणाननुदिनम्।। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ कवि की शब्द-योजना के समक्ष अर्थ का स्वारस्य नगण्य हो गया लगता है।

स्वामीनाथ पाण्डेय

स्वामीनाथ पाण्डेय हिन्दी के कवि के रूप में जाने जाते हैं और आधुनिक भावबोध से समन्वित कतिपय मुक्तक रचना इन्होंने संस्कृत में की हैं। इनका जन्म बलिया जिले के कुरेम गाँव में सन् १९३७ ई. में हुआ था। सन् १९७१ से ये फैजाबाद के साकेत महाविद्यालय में संस्कृत प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। इनके संस्कृत गीतों में उत्पास, वेदना तथा सामाजिक स्थितियों का सजग चित्रण है। ‘देहि वरं मे’ शीर्षक गीत में आज की पाखण्ड की और छद्म की प्रवृत्ति पर व्यंग्यप्रहार करते हुए वे कहते हैं देहि वरं मे सुभगं धृत्वा बक इव धवलसुवेशम् विविधसुगन्धसुगन्धितकेशम् जप्त्वा मङ्गलधाममहेशम् लुण्ठाम्यहमिममखिलं देशम् देहि बलं मे बलदे विपुलम् । ३१६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास -(मुझे वरदान दे, जिससे कि मैं बगुलों की भाँति अच्छा उज्ज्वल वेश तथा विविध प्रकार की सुगन्ध से सुगन्धित केश को धारण करके माल के धाम भगवान् शिव का नाम : जप कर अपने सम्पूर्ण देश को लूटू, हे बल देने वाली माता, तू मुझे विपुल बल प्रदान करें।) श्री पाण्डेय ने तुलसीदास के हनुमानबाहुक का संस्कृत पद्यानुवाद भी किया है, जो मौलिक रचना के समान आनन्द देता है।

जानकीवल्लभ शास्त्री

कविवर शास्त्री का जन्म बिहार के गया जिले में मैगरा नामक ग्राम में १६१५ ई. में हुआ। इनके पिता पं. रामानुग्रह शर्मा संस्कृत के अच्छे विद्वान् थे। अपने पिता से पारंपरिक पद्धति से अध्ययन करते हुए जानकीवल्लभ ने शास्त्री तक परीक्षा उत्तीर्ण की और अठारह वर्ष की आयु में साहित्याचार्य हो गये। इसके पश्चात् काशी हिन्दू. विश्वविद्यालय में इन्होंने अध्ययन किया। छात्रावस्था में ही इनकी संस्कृत काव्यरचना की प्रवृत्ति ने काशी के पंडितसमाज को प्रभावित किया था। उन्नीस वर्ष की अल्पायु में इन्होंने अपनी संस्कृत मुक्तक रचनाओं का संकलन ‘काकली’ (मैगरा, १६३५ ई.) प्रकाशित किया। अनंतर ये हिन्दी के कवि के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए और छायावादी युग के उल्लेखनीय कवियों में इनकी गणना होती है। पर किशोरावस्था से लेकर अभी तक संस्कृत गीतरचनाओं का इनका क्रम बना हुआ है। काकली के अतिरिक्त बन्दीजीवनम् इनका स्वतन्त्रतासंग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित खण्डकाव्य है, जो अप्रकाशित है। वस्तुतः इनकी अनेक संस्कृत प्रणीत-रचना अप्रकाशित हैं या लुप्त हो गयी हैं। _कवि जानकीवल्लभ ने आधुनिक संस्कृत काव्य में नये युग का सूत्रपात किया। उन्होंने प्राचीन काव्यधारा को आज के साहित्य की नयी भावचेतना से जोड़ा। उनके गीतों में अनुप्रास का निर्वाह, पदावली की कोमलता तथा सप्राणता और रागात्मकता और वैयक्तिक करुणा कूट-कूट कर भरी है। वे संस्कृत कविता में रोमांटिक प्रवृत्ति के पुरोधा कहे जा सकते हैं। आज की संस्कृत कविता को उन्होंने अपनी प्रयोगशीलता के द्वारा नये आयाम दिये। गज़ल जैसी नयी विधाओं में भी उन्होंने रचना की। गीतगोविन्द जैसी मधुर कोमलकान्तपदावली में आज की संवेदनाओं को उन्होंने स्पन्दित किया है। भारतीवसन्तगीतिः’ में अपनी कविता का नवावतार घोषित करते हुए वे कहते हैं निनादय नवीनामय वाणि वीणाम् मृदुं गाय गीति ललित-नीति-लीनाम्।। ‘अमरगानम्’ शीर्षक गीत उपालम्भ और प्रतीकविधान का अच्छा उदाहरण है सरसि निविश्य मुखं सुखं चुचुम्बिध नवरसं चषन् सन्, सन्मुखमसाम्प्रतं साम्प्रतमपि कृतवानन्वरविन्दम् गीतिकाव्य विन्दन्नानन्दं परात् परं कमपि नवीनममन्दम् । इन्दिन्दिर, निन्दसि मकरन्दम् ? र भंवरे, तू ने सरोवर में प्रवेश करके मुख का सुखपूर्वक चुम्बन लिया, नव रस को चूसा, उपयुक्त भी अरविन्द को तू ने अनुपयुक्त बना डाला, कुछ नवीन समधिक आनन्द लेता हुआ तू उसके मधु की निन्दा कर रहा है ?) की उस समय काशी की पण्डितमण्डली में अग्रणी श्रीमन्महादेवशास्त्री ने सन् १९३५ ई. में ही कवि जानकीवल्लभ के काव्यवैशिष्ट्य को सराहते हुए यह पद्य लिखा था गोविन्दो गोनविन्दः कविरकविरसौ नीलकण्ठोऽपकण्ठः क्षेमो न क्षेमपक्षो गलितमदभरः फल्गुबन्धः सुबन्धुः । सत्काव्योल्लासलीलाकलितकलकले काकलीकोकिलेऽस्मिन् द्राक्षामाधुर्यदीक्षाक्षममपि गणये पण्डितम्षण्डमेव।। (सत्काव्य के उल्लास की लीला से कलरव करने वाले ‘काकली’ के इस कोकिल के प्रस्तुत हो जाने के कारण गोविन्द (गीतगोविन्द के कर्ता जयदेव?) वाणी से रहित (मूक हो गये, कवि (2) भी अकवि बन गये, नीलकण्ठ (दीक्षित) भी नीरस कण्ठ वाले हो गये, क्षेम (क्षेमेन्द्र) का भी कल्याण न रहा, और मद-भार उनका उतर गया, और सुबन्धु भी हल्के पड़ गये, यहाँ तक कि द्राक्षा के माधुर्य की दीक्षा में समर्थ पण्डित (पण्डितराज़?) को भी पंड (नपुंसक) ही मानता हूँ।) कवि जानकीवल्लभ शास्त्री ने राधा को ले कर हिन्दी और संस्कृत दोनों भाषाओं में विपुल काव्य सर्जना की है, जिसमें माधुर्य का अपूर्व परिपाक है। आधुनिक भावबोध के साथ-साथ प्राचीन परंपरा के समावेश की दृष्टि से इनकी उपलब्धियाँ संस्कृत काव्य रचना में सर्वथा स्पृहणीय हैं।

बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते

पं. बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते का जन्म ३०-११-१८१८ को हुआ। इनके पिता श्री नारायणशास्त्री खिस्ते काशी के संस्कृत पण्डितों और रचनाकारों में विख्यात रहे हैं। खिस्ते जी ने म. म. दामोदरलाल गोस्वामी आदि अपने समय के श्रेष्ठ गुरुजनों से विद्याध्ययन किया और संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में अध्यापन कार्य करते रहे। सूर्योदय, कविभारतीकुसुमाञ्जलिः, दुर्वा आदि पत्र-पत्रिकाओं में इनकी पद्यरचनाएँ तथा समस्यापूर्तियाँ प्रकाशित होती रही हैं। हाल ही में इनका काव्यसंग्रह ‘कल्लोलिनी’ भी प्रकाशित हुआ है। खिस्ते जी की पद्य रचना में अनुप्रास का चमत्कार अत्यंत आकर्षक रहता है। इन्होंने अपने स्फुटकाव्यों में विभिन्न विषय लिखे हैं, अनेक कविताओं में राष्ट्रीय भावना तथा राष्ट्रनेताओं के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। प्रकृतिचित्रण या ऋतुवर्णन विषयक इनके काव्य बड़े रमणीय हैं, और उनमें कहीं-कहीं समसामयिक स्थितियों का भी मार्मिक संकेत २१८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास है। ‘जयत्यसौ वसुन्धरा’ शीर्षक कविता में धरती की वन्दना में वे कहते हैं तुषारशैलशेखरप्रभालसद्दिगन्तरा स्रवत्तरङ्गिणीसमप्रसारहारभासुरा। ललाटकुङ्कुमायितोदयानुरक्तभास्करा पवित्रसामसस्वरा जयत्यसौ वसुन्धरा।। (यह धरती सबसे श्रेष्ठ है, जहाँ हिमालय पर्वत के शिखरों की प्रभा से दिगन्तर शोभायमान हैं, जो बहती हुई नदियों से बराबर फैलाव के हार से चमकदार है, जिसके ललाट के कुंकुम के समान उदयकाल के सूर्य लगते हैं तथा जो पवित्र साम गान से सस्वर कहीं-कहीं अनुप्रास और यमक के सायास निर्वाह में खिस्ते जी के काव्य में रस-भाव की दृष्टि से क्षीणता आ गयी है। प्राचीन परिपाटी का अनुकरण इनमें अधिक है। उदाहरण के लिए ‘कृष्णमेघः’ शीर्षक काव्य का यह पद्य शम्पा यस्मिन्नकम्पा निवसति जगतां पालने सानुकम्पा यस्य श्लाघां निलिम्पाः श्रुतिमधुरपदैः साधु सम्पादयन्ति। पुण्यैः कैश्चिद् विवेकी सरसकवितया जायते यस्य केकी तृष्णां व्याधूय पुष्णात्वयममृतझरैर्वृष्णिभूः कृष्णमेघः ।। (जिसमें विद्युत् निश्चल होकर तथा जगत् के पालन कर्म में कृपाशील होकर निवास करती है, भौरे कर्ण प्रिय गुंजार से जिसकी प्रशस्ति करते हैं, किन्हीं पुण्यकर्मों के कारण मयूर सरस कविता से विवेकशाली हो जाता है, वह वृष्णिकुल में उत्पन्न कृष्ण रूप मेघ अमृत-रस से तृष्णा को समाप्त कर स्वजनों को सम्पुष्ट करता है।)

रतिनाथ झा

पं. रतिनाथ झा का जन्म पन्द्रह अगस्त १६२२ ई. के दिन बस्ती जनपद के तलपुरवा ग्राम में हुआ। काशी में अध्ययन समाप्त करके ये वहीं हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन करते रहे और अब सेवानिवृत्त होकर अपने जन्मधाम में रहते हैं। काशीपण्डितपरिषद् द्वारा इन्हें ‘पण्डितराज’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। अरविन्दशतकम्, मालवीयप्रशस्तिः, गान्धीशतकम्, आदि खण्डकाव्यों, महावीराभ्युदयमहा काव्य तथा असंख्य स्फुट रचनाओं और समस्यापूर्तियों के द्वारा काशी के कविसमाज में इनकी बड़ी ख्याति रही है। पदावली की सुकुमारता, भावों की मसृणता और कल्पनाओं की अभिरामता के कारण इनकी पद्य रचनाएँ प्रशस्य हैं। इनकी प्रकृतिवर्णनपरक कबिताएँ बड़ी सरस हैं। प्राचीन शैली और आलंकारिक भाषा में इन्होंने नवीन विषयवस्तु उठायी है। उदाहरण के लिये मालवीयप्रशस्तिः का एक पद्य गीतिकाव्य किं धर्मो धृतविग्रहः, किमुदितो निर्लाञ्छनश्चन्द्रमाः सामोदो मलयानिलः सुमनसां किं वा गृहीताकृतिः। भारत्या यशसां चयः किममलः किं वाग्मितायाः स्मित स्पन्दः किं कविरेव नीतिविषये श्रीमालवीयोऽभवत् ?।। (श्री मदन मोहन मालवीय के रूप में क्या धर्म ने ही शरीर धारण कर लिया है ? क्या लाञ्छनरहित चन्द्र उदित हुआ है ? क्या मलयानिल सुगन्धयुक्त हो गया ? सुमनों की आकृति बन गयी? क्या भारती का यशःसमूह निर्मल रूप में प्रकट हो गया? क्या वाग्मिता का स्मित स्पन्दित है ? या नीति के क्षेत्र के कवि शुक्राचार्य प्रकट हैं ?) इनकी अनेक समस्यापूर्तियों में समकालीन विडम्बनात्मक स्थितियों पर तीखा कटाक्ष है। उदाहरण के लिये अपि प्राज्यं राज्यं तृणमिव परित्यज्य सहसा स्वधर्मानुष्ठानर्जननमनयन्नर्चिततरम्। इदानीं तत्रैवाभ्युदयमधिगन्तुं नयविदा चरित्रैरस्माकं न हसितमहो नापि रुदितम् ।। (जहाँ राज्य को भी तृण की भाँति सहसा त्याग कर स्वधर्म के अनुष्ठान द्वारा नीतिज्ञ जनों ने अपने जीवन को अर्चिततर बनाया वहीं अब अभ्युदय प्राप्त करने के लिए राजनीतिज्ञों के कार्यकलाप से हमें न हँसना आता है और न ही रोना !) देश में व्याप्त अव्यवस्था, अनाचार, महंगाई और जनसामान्य के त्रास का उल्लेख करते हुए एक अन्य समस्यापूर्ति में कविवर झा कहते हैं जनाक्रोशे व्याप्ते विलयमुपयातेऽथ नियमे प्रवृद्धे सङ्घर्षे स्वपति जनहर्षे प्रतिदिशम् । महार्घत्वे घोरे जनमनसि काम कलुषिते नयज्ञानां घोषो विफलमिह वाणीविलसितम् ।। (यहाँ चारों और जनाक्रोश व्याप्त है, कोई नियम नहीं रह गया है, संघर्ष बढ़ गया है, प्रत्येक दिशा में जनता के हर्ष को नींद आ गयी है, घोर महगाई है और जन-मन कलुषित है, ऐसी स्थिति में नीतिज्ञजनों की आवाज विफल वाग्विलास हो गयी है।)

रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’

आरा (बिहार) के निवासी संस्कृत के गीतकार स्व. कवि प्रणयी’ की कीर्ति का आश्रय उनकी प्रसिद्ध रचना ‘राष्ट्रवाणी’ है। इसमें सोलह तथा चौदह मात्राओं में निबद्ध गीत हैं तथा उन पर कवि की शैली तथा व्यक्तित्व का प्रभाव परिलक्षित होता है। इस संग्रह में कवि ने राष्ट्र, समाज तथा व्यक्ति की समस्याओं के संकेत के साथ उनका समाधान भी सुझाया है। कवि युवाजन से कहता है, हे तरुण, तुम रण-भेरी को आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास बजाओ, युद्ध वीर के अभिमान को याद करो, गरल-पान को भी पीयूषपान समझो तरुण, रणभेरी निनादय, स्मर समरमनुजाभिमानम् गरलमपि पीयूषपानम् किमति मतिमायावितानम् ? धिड्नु नात्मानं प्रवादय। ‘जयतु भारतवर्षदेशः’ शीर्षक कवि ‘प्रणयी’ का गीत समग्न भारत राष्ट्र की गरिमा को व्यंजित करने वाला एक राष्ट्रगीत है। स्वोदरपूर्तिपरायण विलासिता से ग्रस्त मनुष्य को धिक्कारते हुए कवि कहता है घिग्जीवनं जीवति नरः भुक्त्वैव कृतकृत्यः परम् शेते सुखेन निरन्तरम्, भारं वहन्नप्यात्मना यतते न हन्त ! यथा रवरः। वह पीडित भारत माता को सम्बोधित करते हुए कहता है मातः किन्न गता ते पीडा, कथय कथं रोदिषि नतभाला, त्यक्तमुकुटमणिमञ्जुलमाला, विध वाग्बाणैर्हृदयं वा व्यथयति काऽपि कुलीना व्रीडा।

मधुकर गोविन्द माईणकर

मधुकर गोविन्द माईणकर का जन्म १५-३-१६१६ ई. को हुआ । इन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से एम. ए. (संस्कृत-अर्धमागधी, मराठी-पालि) तथा पी. एच्. डी. (१६४३ ई.) और डी. लिट् १६६२ ई. की उपाधियाँ प्राप्त की तथा विशिष्ट योग्यता के कारण अनेक पुरस्कार भी इन्हें अध्ययनकाल में मिले। सांगली के विलिंग्टन महाविद्यालय (१E४०-५६ ई.) पूना के फर्ग्युसन महाविद्यालय (१८५१-६७ ई.) दिल्ली विश्वविद्यालय तथा बम्बई विश्वविद्यालय (१९६७-७८ ई.) में ये प्राध्यापक रहे और बीच में फर्ग्युसन महाविद्यालय के प्राचार्य तथा फर्ग्युसन सोसायटी के सचिव का कार्य इन्होंने किया। १६७८ ई. से मृत्युपर्यन्त ये भण्डारकर शोधसंस्थान, पूना के निदेशक का कार्य करते रहे। १७ सितम्बर, १६८१ ई. को इनका देहावसान हुआ। विभिन्न पाण्डित्यपूर्ण उत्कृष्ट ग्रन्थों के अतिरिक्त श्री माईणकर ने संस्कृत में दो मुक्तक काव्यों की रचना की-स्मृतितरङ्गम् तथा गायिकाशिल्पकारम् । दोनों काव्य उनके द्वारा स्वयं पूना से क्रमशः १६७६ ई. तथा १६८० ई. में प्रकाशित किये गये। ‘स्मृतितरङ्गम्’ मन्दाक्रान्ता छन्द्र में निबद्ध एक शोकगीतिकाव्य है। इसमें करुण रस गीतिकाव्य ३२१ अंगी है। पत्नी के निधन के अनन्तर किसी व्यक्ति का शोक कवि ने यहाँ अनुभूति की इतनी अन्तरंगता और मार्मिकता के साथ व्यक्त किया है कि इसमें कवि की पूर्ण आत्माभिव्यक्ति प्रतीत होती है। मेघदूत का गहरा प्रभाव इस रचना पर है, परन्तु कवि ने आधुनिक मध्यवर्गीय सम्भ्रान्त परिवार के वातावरण का चित्रण अनुभव की प्रमाणिकता के साथ किया है। प्राचीन छन्द और पुरातन पदावली में यहां आधुनिक मन और आज के व्यक्ति का वह भावबोध है, जो समकालिक होते हुए भी चिरन्तन है। दाम्पत्य और सौहार्द की अनन्यनिष्ठा, विरह की तीव्रता और भावसान्द्रता में यह छोटा सा काव्य अद्वितीय है। स्त्री के हृदय की सुकुमारता और गार्हस्थ्यजीवन की करुण-मधुर स्मृतियों का चित्रण हृदयद्रावक है। विधुर नायक अपनी दिवंगत पत्नी की एक-एक बात याद करता है। पुष्पकेलि (बेडमिंटन) के खेल के प्रसंग में विवाह के पूर्व नायिका से नायक का परिचय, विवाह के अनन्तर घर बसाने के निमित्त से दोनों के बीच हुई छोटी-छोटी बातें, पत्नी की दिनचर्या इस सबका चित्रण सक्ष्मता के साथ किया गया है, और स्मति व्यभिचारी करुण रस के स्थायी भाव के साथ अंग के रूप में गहरी अनुभूतिप्रवणता के साथ इस काव्य में आया है। दिवंगता प्रेयसी के एक-एक आभूषण को देखता है, जिसे वह छोड़ कर गयी है, और उससे जुड़ी हुई एक-एक घटना उसकी आँखों के आगे नाच जाती है। नीलम से जुड़ी सगाई के समय पत्नी की पहनाई गयी अँगूठी अब उसकी ही तरह दौर्भाग्योपहत हो कर पड़ी हुई है एषा रम्या मरकतचिता मुद्रिका वाग्विवाहे प्रेम्णा न्यस्ता मदनलतिके कोमले ते कराने। स्थानाद् भ्रष्टा मलिनमलिना राजते नापि दीना मन्ये तस्मादहमिव सखि क्षीणपुण्या सखी ते।। (४/४) करुणरस के अंग के रूप में स्मर्यमाण सम्भोग श्रृंगार का उदेक काव्य में समुचित हुआ है। आधुनिक मध्यवर्गीय परिवार का वातावरण पृष्ठभूमि में रसास्वाद को पुष्ट करता है। स्मृतियों के माध्यम से भारतीय गृहिणी और आधुनिक होते हुए भी शीलसम्पन्न संवेदनशील महिला की छवि रसभूमि को और भी दृढ़ करती है। पत्नी के द्वारा पाला गया पामेरियन कुत्ता, टंकी में तिरती बतखें, घर में घोसला बनाने वाली चिड़ियाँ ये सभी विरहविधुर पति को प्रेयसी की स्मृति से व्यधित दिखते हैं। पत्नी का बतखों को खिलाना, बतख के बच्चे का पहली बार माँ की चोंच से दाना चुंग लेने पर उसका हर्ष-इस प्रकार की छोटी-छोटी अनेक घटनाओं की स्मृतियों के द्वारा इस छोटे से काव्य में रस का महासागर कवि ने उडेल दिया है। दृष्ट्वा भूमौ पतनविकलं वर्तिकायाः शिशुं तं वात्सल्यात् तं परमकृपयाऽपोषयः पाककले। ३२२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास मार्जाराद्धि प्रचुरमवनं सारमेयात् कृतं च याते तस्मिन् वियति चटुले त्वाश्रुनेत्रां स्मरामि।। (५/७) ‘गायिकाशिल्पकारम्’ भी इसी प्रकार की भावोच्छ्वासमयी करुणगाथा है। कथात्मक होने से इसे खण्डकाव्य भी कहा जा सकता है। यह विप्रलम्भ का काव्य है। गायिका और शिल्पकार एक दूसरे से प्रेम करते हैं, पर तनिक सी गलतफहमी के कारण गायिका अपने प्रेमी को त्याग देती है। अन्त में दोनों का मिलन होता है। अनुताप, विरहाकुलता और भावुकता से सारा काव्य सराबोर है। 5 माईणकर कालिदास जैसे रससिद्ध महाकवियों से भी प्रभावित हैं और अंग्रेजी या योरोपीय साहित्य के आधुनिक कवियों से भी। संस्कृत की कालजयी अभिव्यक्ति में उन्होंने रोमांटिक कविता की नयी प्रवृत्ति का संचार किया है।

परमेश्वर अय्यर

परमेश्वर अय्यर का जन्म केरल में कालीकट के एक तमिलभाषी ब्राह्मण परिवार में १६ जुलाई १६१६ ई. को हुआ। इनके पूर्वज तमिलनाडु में तंजौर में निवास करते थे तथा उनमें से कुछ को राजकीय सम्मान और राजकवि का सत्कार भी मिला था। विद्यालय में संस्कृत तथा गणित में उत्तम अंक प्राप्त करने के लिये परमेश्वर को छात्रवृत्ति मिली। इसी समय से महात्मा गाँधी के त्याग और आन्दोलन से प्रभावित हो कर उसमें सम्मिलित हो गये और जेलयात्रा भी इन्होंने की। १६३३ से १E३६ ई. के बीच इन्होंने त्रिपुणित्थुरा के प्रसिद्ध संस्कृत महाविद्यालय में अध्ययन किया तथा न्यायदर्शन और वेदान्त में विशेषज्ञता प्राप्त की। इसी काल में इन्होने मलयालम, हिन्दी, संस्कृत तथा तमिल भाषाओं में साहित्य-रचना भी आरंभ की। १६३६ ई.से १६७४ ई. की अवधि में ये स्विटरजरलैण्ड में महर्षियूरोपियन रिसर्च विश्वविद्यालय में संस्कृतसाहित्य के प्राध्यापक रहे। अय्यर जी की गीतिकाव्य रचनाओं में ‘देवीनवरत्नमाला’ (स्तोत्र) ‘भारतगौरवम्’ तथा ‘आभाणकमञ्जरी’ (देववाणी परिषद, दिल्ली, १६८१) उल्लेखनीय हैं। इनकी अनेक काव्यरचनाएँ साहित्यकौतुकम् में संकलित हैं। इस कृति में शार्दूलविक्रीडित छन्द में २०० पद्य पच्चीस अष्टकों में संगृहीत किये गये हैं। इन अष्टकों के विषय विविध हैं यथा- कालिदास, योषा, द्रविण, विद्वान, राष्ट्रनेता, चलचित्र, भिक्षुक, निद्रा आदि। ग्रामाष्टक में ग्राम जीवन का चित्रण करते हुए कवि अय्यर ने लिखा है ग्रीष्मे तिग्मकरे तपत्यनुदिनं वर्षे सुवृष्ट्यन्विते हेमाहेषु च शीतकम्पिततनुः पुण्यार्जनायोद्यतः। शश्वत् त्वं खलु लोकसंग्रहरतस्तस्मादकस्मादपि ग्राम त्वां यदि विस्मरेयमधुना पापार्जनं मे भवेत्। (हे ग्राम, प्रतिदिन ग्रीष्मकाल में जब सूर्य तपता है, जब बरसात होती है, जाड़े के दिनों में शीत के कारण काँपते हुए, पुण्यार्जन के लिए तत्पर तुम लोक-संग्रह में जुटे रहते गीतिकाव्य ३२३ हो-यदि एक बार भी अकस्मात् मैं तुम्हें याद न करूं तो पाप का भागी होऊंगा।) आभाणकमञ्जरी में इन्होंने अंग्रेजी की कहावतों का सरल पद्यात्मक अनुवाद किया है।

श्री. भि. वेलणकर

श्री वेलणकर का जन्म सारन्दग्राम (जि. रत्नागिरि, महाराष्ट्र) में १६१५ ई. में हुआ। इनकी शिक्षा बम्बई के विल्सन कालेज में हुई। १६३७ ई. में एम. ए. में सर्वप्रथम स्थान तथा स्वर्णपदक आपने प्राप्त किया। ये म. प्र. में डाकतार विभाग में उच्च पद पर कार्यरत रहे तथा सेवानिवृत्ति के पश्चात् बम्बई में निवास करते हैं और ‘गीर्वाणसुधा’ संस्कृत मासिक का संपादन करते हैं। _आप पिछले पचास वर्षों से संस्कृत में निरन्तर साहित्य रचना करते आ रहे हैं, तथा नीति या रागकाव्य, मुक्तक, खण्डकाव्य, लहरी, नाट्य या गीतिनाट्य, गद्य आदि विविध विधाओं में विपुल मात्रा में आपने रचनाएँ की हैं। अपने नाटकों का अभिनय भी आप कई बार करवा चुके हैं। गीतिकाव्य के क्षेत्र में आपकी मुख्य रचनाएँ हैं-जीवनसागरः, जयमङ्गला, जवाहरचिन्तनम्, बालगीतम्, विरहलहरी, प्रीतिपथे स्वैरविहारः, स्वच्छन्दम्, जवाहरजीवनम्, नैमित्तिकम्, निसर्गगीतम्, तथा संस्कृतनाट्यगीतम् । संगीत का अच्छा ज्ञान होने के कारण अपनी गीतियों की स्वरलिपि इन्होंने स्वयं तैयार की है तथा उनका गायन भी करवाते रहे हैं। विरहलहरी में इस प्रकार के पच्चीस से अधिक गीत हैं। ये गीत पं. जवाहर लाल नेहरू के अवसान के अनन्तर १६६४ ई. में लिखे गये। इन सभी में नेहरू जी के चिन्तन को गीतों में ढाल कर प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार का लेखन सूचनाप्रधान या अनुवादात्मक अधिक है और उसमें चर्वित चर्वण इतना रहता है कि रसास्वाद नहीं हो पाता। वस्तुतः वेलणकर जी का अधिकांश लेखन इस प्रकार का है। गेयकाव्य या रागकाव्य के द्वारा संस्कृत भाषा को लोकप्रिय बनाया जा सकता है-इस दृष्टि से अनेक संगीतज्ञ संस्कृतविद् सरल गीतों की रचना कर रहे हैं, जो काव्यतत्त्व और औदात्त्य से शून्य होती हैं। नये प्रयोग की दृष्टि से वेलणकर जी की “संसारयात्रा’ आकर्षित करती है, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों या जनजीवन को गीतों का विषय बनाया गया है।

बच्चूलाल अवस्थी

पं. बच्चूलाल अवस्थी का जन्म ६.८.१८१८ ई. को उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर खीरी में हुआ। व्याकरणशास्त्री, दर्शनशास्त्री, साहित्याचार्य, व्याकरणाचार्य, एम. ए. आदि परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की तथा अध्यापन कार्य संस्कृत पाठशाला, लखीमपुर खीरी के महाविद्यालय तथा सागर विश्वविद्यालय में किया। सम्प्रति ये कालिदास अकादमी, उज्जैन में आचार्यकुल के अधिष्ठाता के पद पर कार्यरत हैं। हिन्दी में अनेक पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थों के अतिरिक्त इनके अब तक अप्रकाशित ग्रन्थों में ५००-५०० पृष्ठों के चालीस खण्डों में ‘भारतीय दर्शनशास्त्र बृहत्कोश’ लगभग बीस हजार पृष्ठों का अद्वितीय बृहत्कोश है तथा पाण्डित्य और अध्ययन की व्यापकता और३२४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास मौलिकता का इस शताब्दी का एक महान् निदर्शन है। अवस्थी जी का पाण्डित्य जितना व्यापक और तलावगाही है, उनका काव्य उतना ही भावपूर्ण, रागात्मक संवेदनों तथा कोमल कल्पनाओं से समवेत है। इनकी शताधिक मुक्तक, लघुकाव्य या गजल रचनाएँ अप्रकाशित हैं, कुछ का प्रकाशन दूर्वा, अर्वाचीन संस्कृतम् आदि पत्रिकाओं में हुआ है। नेता अपने मार्ग के कण्टक साफ करता फिरता है, दूसरों के रास्ते में तो वह काँटे ही बिछाता है, जिनकी चुभन से जनता अभी इस समय खून बहा रही है, और नेता है कि मगरमच्छ के आँसू बहा रहा है नेता कण्टकशोधनाय यतते स्वस्यैव मार्गस्य यत् तस्मात् कण्टकजालमेव विकिरत्यालोकतन्त्राध्वनः। लोकोऽयं क्षतजप्लुताङ्घिरघुना कार्पण्यभृद् दूयते नेता रोदिति नक्रबाष्पविकलं तत्पीडया पीडितः।। (अंका- १३/१, १६८१) अवस्थी जी की अन्योक्तिपरक या प्रतीकात्मक रचनाएँ अपनी ढंग की बेजोड़ कृतियाँ हैं। इनमें कथासंविधान की उनकी मौलिकता, कल्पना, व्यंग्य का पैनापन और आज के समाज की स्थितियों पर गहरी चुटकी देखते ही बनती है। प्रख्या-१ में प्रकाशित ‘एकदन्तवृत्तम्’, दूर्वा में प्रकाशित ‘दस्युशुनकीयम्’ तथा अर्वाचीनसंस्कृत में प्रकाशित ‘हदयपरिवर्तनम आदि ऐसी कविताओं के कछ उदाहरण हैं। इनकी कविता में शैली के वैविध्य की परिधि भी सुविस्तीर्ण है। ग़ज़लगीतियों में जहाँ बड़ी छोटी-मोटी पक्तियों में सरल भाषा में ये गहरी बात कह जाते हैं, अपनें स्तोत्रकाव्यों में चिन्तन और भावगाम्भीर्य के अनुरूप गौडरीति, जटिल प्रौढ पदावली का सटीक उपयोग करते हैं। वस्तुतः अवस्थी जी आधुनिक संस्कृत साहित्य के उन विरले रचनाकारों में हैं, जिनकी काव्यात्मक उपलब्धि यों का गहराई से आकलन होना चाहिए।

हरिदत्त पालीवाल ‘निर्भय’

कवि निर्भय का जन्म कायमगंज (जिला-फर्रूखाबाद) के निवासी महामहोपाध्याय व्याकरणाचार्य पं. मथुराप्रसाद शर्मा के घर १६२७ ई. में हुआ। बाल्यकाल से ही काव्यरचना के साथ सामाजिक क्रान्ति और आन्दोलन में इनकी प्रवृत्ति थी। किशोरावस्था में ही ये सुभाषचन्द्र बोस की सेना में भर्ती हो गये। सशस्त्र क्रान्ति से जुड़ी अनेक गीतिविधियों में इनकी अग्रणी भूमिका थी-फर्सखाबाद बैंक षड़यन्त्र, अलीगढ़ बम विस्फोट आदि कई योजनाओं का इन्होंने नेतृत्व किया। इसके साथ ही अंग्रेजों के अत्याचार और भारतीय जनता की दीनदशा का अनुभव करते हुए उस काल में आग उगलने वाले संस्कृतगीतों की रचना भी ये करते रहे। अकालपीडित देश की भयावह दशा का चित्र खींचते हुए इन दिनों इन्होंने लिखा एकं तन्मृतनग्नाङ्गं निष्प्रच्छदमातपशीतम् योरपगृध्राणामेकं कवलमहहा रक्तच्युतिदिग्धम् ३२५ गीतिकाव्य एक प्रेतवनं तद्, यत्र न कश्चिच्छोकालापी एको भ्राम्यन्नात्मा, यस्य न गेहः कोऽपि क्वापि। (शङ्खनादः, प्र. १८०) (एक वह मरे हुए कफन रहित, आतप तथा शीत में पड़ा नंगा शरीर और योरपीय गीधों का खून से सना एक ग्रास ! एक वह प्रेतवन (श्मशान) जहाँ कोई रोने वाला नहीं, और एक भटकती हुई आत्मा, जिसका कहीं कोई घर नहीं।) क्रान्ति के सैनिकों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा - अटलक्रान्तेर्गायत गीतं प्रलयताण्डवं मण्डयत। शान्तं गगनं विशोभयत द्विषतां हृदयं कम्पयत । स्वतन्त्रतासम्मदमत्ता बलिवेदीवाध्वन्या रे। कथं न बिभियान योऽरिजनः शिरसा धृतमृतिशीर्षण्या रे। अब निराशयामाशायाः पुनरपि निसृतं सञ्चारम् । बन्दिनो भक्त कारागारम्।। (स्वतन्त्रता के मतवालों ! हे बलि-वेदी के मार्ग के पथिकों ! तुम अविचल क्रान्ति का गीत गाओ, प्रलय का ताण्डव मचाओं, शान्त आकाश को विक्षुब्ध कर दो, शत्रुओं के हृदय को कंपा दो, तुम्हारा शत्रु तुम से क्यों न डरे ! जो कि तुम सिर पर कफन बाँध चुके हो! आज निराशा में आशा का पुनः सञ्चार हो चला है, हे बन्दियो, कारागार को तोड़ डालो।) क्रान्तिकारी आन्दोलन में कार्यरत रहते हुए इन्हें वर्षों तक जेलयात्रायें करनी पड़ी। फर्रुखाबाद के केन्द्रीय कारागार में इनको मैथिलीशरणगुप्त, आचार्य नरेन्द्रदेव, सम्पूर्णानन्द, स्वामी सत्यदेव आदि विभूतियों का सान्निध्य मिला। गान्धी जी की अहिंसक नीति से ये सहमत न थे, और स्वातन्त्र्यप्राप्ति तक निरन्तर क्रान्तिकारियों का साथ देते रहे। क्रान्ति की भावना की अभिव्यक्ति तथा ‘करो या मरो’ के भाव का शङ्खघोष इनकी कविता में तेजस्वी रूप में गुंजित है यद्यस्ति जीवितव्यं काम्याम देहली तत् यद्यस्ति वर्तितव्यं क्राम्याम देहली तत्। यद्यस्ति कर्म कार्य क्राम्याम देहली तत् यद्यस्ति लभ्यमन्नं काम्याम देहली तत्।। (१६४७ ई. में प्रकाशित देवभाषा संकलन से) स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् निर्भय जी का रचनाकार अपनी इसी आग और ऊर्जा के साथ सक्रिय रहा। उन्होंने सन् १६४७ की स्वतन्त्रता को वास्तविक स्वतन्त्रता नहीं माना, ३२६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इस काल में हुए साम्प्रदायिक दंगों और देश में व्याप्त अव्यवस्था के मार्मिक चित्र अपनी गीतियों में अंकित किये स्वमातृमूर्धखण्डनं स्वतन्त्रतात्मकः शिशु विधाय हाऽवतीर्णवान् समुत्सवं वितीर्णवान् । अनाप्य हा तटं तरी तु कर्णधार ईयिवान् अनेकया प्रवातघातबाधनं समेयिवान् ।। XX XX XX पपात पातकायुतेर्युतोऽमरेन्द्रसमनि सुपुण्यवांश्च रौरवे किमेवमस्ति लक्ष्यताम् स्वराज्यमागतं सुराजता परन्तु नागता।। (१६४६ ई. प्रकाशित कविः संकलन से) (स्वातन्त्र्य के शिशु ने अपनी माता के मस्तक को काट करके अवतार लिया है और जन्मोत्सव मनाया है, कर्णधार बिना तट को पाये पेड़ पर पहुंच गया है और अनेक बार झंझावात के घात की बाधा को प्राप्त कर चुका है। पातकों से युक्त पुण्यवान् वह स्वर्ग में पहुँचा है अथवा रौरव नरक में यह देखें। स्वराज्य प्राप्त हुआ, किन्तु सु-राजता नहीं मिली) __निर्भय जी को स्वतन्त्रता आन्दोलन में कार्यरत रहने के कारण १८४० ई. में छ: मास, १६४२ ई. से साढ़े तीन वर्ष तथा १६४६ ई. से पुनः फारवर्ड ब्लाक के आन्दोलन में सहभागिता के कारण जेल में रखा गया। जेल तथा जेल के बाहर आ कर ये वर्षों तक रुग्ण और शय्याधीन ही रहे। पर इस स्थिति में भी संस्कृत में इनका लेखन कार्य अविरल चलता रहा। हिन्दी में भी इनका विपुल लेखन है, तथा संस्कृत में क्रान्तिकारियों के संस्मरण या उनके जीवन पर खण्डकाव्य लिखकर इन्होंने आधुनिक संस्कृत काव्य को अप्रतिम योगदान दिया है। संस्कृत में इनकी मुख्य काव्य रचनाएँ हैं- परिवर्तनम्, क्रान्तिः, जनघोषः, शङ्खनादः, राष्ट्रध्वनिः, वन्दी, अग्रगामिनं प्रति, हृदयाग्निः, कृषकाः, श्रमिकाः, सुभाषबोसचरितम्, भगतसिंह-चरितम्, रामप्रसादविस्मिलस्मृतिः, रावणायनम्, अर्चना, प्रियतमा आदि। रूसी और जमनी कविताओं के संस्कृत अनुवाद भी इन्होंने किये हैं तथा संस्कृत और हिन्दी में क्रान्ति और क्रान्तिवादी साहित्य के विषय में गद्य में भी प्रचुर लेखन किया है। इनका बहुत सा काव्य कारागार में निवास के समय लिखा गया। इनके परवर्ती काव्य में स्वाभिमान और मनस्विता यथावत् है, पर आजीवन भोगे कष्टों के कारण कहीं-कहीं पीडा का स्वर भी मुखरित है निजधर्म चेद् व्यऋष्यमहं, हाणि तदाध्यकरिष्यमहम्। त्वं स्वार्थसिद्धये जनतायां कुरु कपटपाटवैर्दलबन्धम् ।। (तरङ्गिणी, पृ. ५१) गीतिकाव्य ३२७ (यदि मैंने अपना धर्म बेच दिया होता तो बड़े महल बनवा लेता और तुम स्वार्थ की सिद्धि के लिए जनता में दल-बंदी करो !)

मञ्जुनाथ भट्ट

श्री मञ्जुनाथ भट्ट दक्षिण में मैंगलोर के सेंट अलोसियस महाविद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक थे। इन्होंने भर्तृहरि के वैराग्यशतक के समकक्ष ‘विरक्तिवीथिका’ का प्रणयन किया (अखिल कर्णाटक संस्कृत परिषद, मैंगलोर १६८४) है। ‘विरक्तिवीथिका’ में सौ पद्य हैं, जिनमें ६७ मन्दाक्रान्ता में तथा अन्तिम तीन पद्यों में एक वसन्ततिलक तथा दो इन्द्रवजा छन्द में है। भक्ति और वैराग्य के भावों को कवि ने इसमें समर्थ अभिव्यक्ति दी है। शिव और कृष्ण में कवि की सुदृढ आस्था है। भाषाशैली और वस्तु दोनों में सटीक निर्वाह के कारण रचना प्रभावशाली बन पड़ी है कार्पण्यं भोः किमपरमतो मानुषं प्राप्य देह गेहं सर्वाभ्यधिकसुभगं सर्वसन्मङ्गलानाम् । तन्नैवाप्तं निगमशिरसां सम्मतं स्वात्मनीनं यत्सान्निध्ये तनुतरतृणप्रख्यमल्पं हि विश्वम् ।। (२३) (इससे बढ़कर कायरता क्या हो सकती है कि मनुष्य का शरीर जो सबसे बढ़कर सुन्दर तथा सभी सन्मगलों का गेह है, पाकर वेद द्वारा सम्मत तथा आत्महित का उपयोगी, हो नहीं पाया, जिसके निकट विश्व अत्यन्त क्षुद्र तृण की भांति अल्प है।) इस निर्वेद और वेदान्त के अनुभव के साथ-साथ राधा-माधव के माधुर्य के भक्ति-भाव को भी कवि ने इसी प्रकार स्वानुभूत भाषा में अभिव्यक्त किया है। पदावली की मसृणता मनोहर है वृन्दं वृन्दावनभुवि गवां चारयंश्चारुचेलो बालो वः स्याद् यदि स विदितो येन धन्यः कुचेलः। तस्मिन्नस्तान्यविषयवलदल्लवीचाटुलोले लोकालोकद्वयहितधियाऽऽधीयतां धीरभीरे।। (३१) (हे लोगो, वृन्दावन की भूमि पर, यदि गौओं के झुंड को चराता हुआ सुन्दर वसन वाला बालक (कृष्ण) जो आप लोगों का ज्ञान-विषय हो जाता है तो उसके कारण कुचेल या दूषित वस्त्र वाला दरिद्र रहना भी धन्य है। अन्य विषय जहाँ शान्त हो गये हैं ऐसे गोपीजनों के विषय में चाटु करने में लोल तथा अभीर (ग्वाल) के विषय में दोनों लोकों के हित साधन की भावना से बुद्धि को प्रवृत्त करें।) _ इस काव्य के साथ कवि की २१ अन्योक्तियों को भी प्रकाशित किया गया है। कुछ अन्योक्तियां चकोर, चातक, भ्रमर आदि पारम्परिक विषयों पर हैं, कुछ नवीन विषयों पर भी अन्योक्तियां कवि ने लिखी है। दुर्दुर (मेढक) के द्वारा व्यर्थ प्रलाप करने वाले व्यक्ति पर अच्छा उत्नास है आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास रैरे दर्दुर दूरतः सरतु ते व्यर्थप्रलापोऽधुना मिथ्यागर्वित गर्हितात् तव भिया नायं प्रदत्ते पयः। आकीटान्निखिलार्तिनोदनपटुर्विश्वाभिजीवप्रदः प्रावृड्वारिधरः स्वयं विजयते धाराशतैः सर्वतः।। रि झूठा गर्वशील मेढक अब तू व्यर्थ-प्रलाप न करे, ‘गर्हित होने के भय से यह वर्षा का मेघ नहीं बरस रहा है, कीट-पर्यन्त सबकी आर्ति शान्त करने में समर्थ, सबका जीवनदाता यह (वर्षाकालीन मेघ) सब ओर स्वयं धारासार बरस रहा है!) जुगुप्सित आचरण न छोड़ने वाले व्यक्ति पर सूकर के द्वारा अन्योक्ति है वारिणो गिरिसरिदविगाहनाद् थौतधूलिविमलो विनिर्गतः। सूकरस्त्वमरवाहिनीतटेप्यापङ्कपटले निमज्जति।। (पर्वतीय नदी में अवगाहन से धूल हट जाने के कारण निर्मल, जल से निकला सूअर गगा के तट पर भी आर्द्र पंक-पटल में गोते लगा रहा है)। शब्दगुम्फ और अर्थसौष्ठव दोनों का सफल निर्वाह श्री भट्ट ने किया है।

रामकरण शर्मा

रामकरण शर्मा का जन्म २०.३.१E२७ ई. को हुआ। ये महान् । राष्ट्र-सेवक कामेश्वरप्रसाद शर्मा के पुत्र हैं। पारम्परिक तथा आधुनिक दोनों दृष्टियों से संस्कृतविद्या का गहन अध्ययन इन्होंने किया है। वेदान्त और नव्यव्याकरण में शास्त्री, साहित्याचार्य, एम.ए., पी.एच.डी. आदि उपाधियों के साथ फुलब्राइट योजना में इन्होंने केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में रह कर प्रख्यात भारोपीयभाषावित श्री एमेनिउ के निर्देशन में भी कार्य किया है। बाल्यकाल से ही इन्होंने संस्कृतकाव्यरचना आरम्भ कर दी थी। उस काल की इनकी अनेक कविताएं नष्ट हो गयी हैं। इनकी संस्कृत में प्रथम प्रकाशित रचना ‘तुलसीस्तवः’ थी, जो वैशाली में १E४३ ई. में छपी। ‘मदालसा’ काव्य का प्रथमसर्ग ही प्रकाशित हुआ (१६५५ ई.)। इसके अनन्तर इनकी अनेक कविताएं ‘संस्कृतप्रतिभा’ तथा अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। ‘सीमा’ गद्यकाव्य के अतिरिक्त इनके निम्नलिखित संस्कृतकाव्यसंग्रह विगत आठ वर्षों में ही प्रकाशित हुए हैं-शिवशुकीयम्, सन्ध्या, पाथेयशतकम् तथा दीपिका । ‘सन्ध्या’ पर इन्हें साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली का पुरस्कार भी मिला है। शर्मा जी ने आर्या छन्द का प्रयोग सर्वाधिक किया है। छोटे से छन्द में प्रचुर भावसम्पदा का समावेश इनके काव्य की विशेषता है। इनकी अनेक कविताएं दो-दो चार-चार छन्दों की हैं, कुछ लम्बी कविताएं भी इनके उक्त संग्रहों में समाविष्ट हैं। ‘शिवशुकीयम्’ में २६०, ‘सन्ध्या’ में ४०० तथा ‘वीणा’ में २६३ और दीपिका’ में १०६ कविताएं संकलित हैं।

  • शर्मा जी ने अपने काव्य में अदिव्य में दिव्य की अवतारणा की है। वे युग के वैषम्य गीतिकाव्य ३२६ का चित्र अंकित करते हैं, उसकी परिणति कविदृष्टि से साम्य में उन्मीलित करते हैं। वे हमारे समय के भीषण संक्रान्तिकाल में एक द्रष्टा कवि के रूप में अवस्थित हैं। भारतीय जीवनमूल्यों और परम्परा में उनकी दृढ आस्था है, जिसके सम्बल से उन्होंने युग की विभीषिका का साक्षात्कार किया है। विष और अमृत, कार्कश्य और माधुर्य, प्रकाश और अन्धकार-इनका सांकर्य श्री शर्मा के काव्य में अनुभूत होता है। ये आज के मनुष्य को कामना से परिचालित देखते हैं, और कामना के विकृत रूप धारण करने पर होने वाले ध्वंस को समझते हैं। उनका अभिमत है कि इस कामना को चंचल नवोढा की भाँति मनुष्य अपने वश में कर के चले। अपि कामनाउपराध्यति जनयन्ती विविदिषाः पिपासाश्च। अपि जननकाल एव वन्ध्या सा कृष्णसीव ? ।। नेदं कथमपि युक्तं नियतेः परमा हि कामना शक्तिः। सा हि नवोढेव चला संस्कार्या सुप्रणयनीत्या।। (वीणा, पृ.०१) पण शर्मा जी के काव्य में विविध भावतरंगों का उच्छलन है, पर वे अपने ही भावसागर को ताटस्थ्य और निर्वेद के भाव से देखते हुए लगते हैं। राग से संपृक्त होते हुए भी वे परिणति में वीतराग कवि के रूप में उभरते हैं। उनकी अनेक रचनाएं भक्तिभाव से आप्लुत हैं। ‘वीणा’ में संकलित शिखरिणी छन्द में रची “भवानि त्वां वन्दे” या दीपिका में संगृहीत ‘अम्बिके त्राहि माम्’ “शिव त्वां वन्दे’ आदि रचना प्राचीन स्तोत्रकाव्यों के श्रेष्ठ अंश में तुलनीय हैं। दीपिका में संकलित ‘न किञ्चिन् मम’ ‘तुभ्यं तावकमेव’ या ‘वन्दे व्यक्ताव्यक्तम्’ जैसी कविताओं में कवि ने अपने जीवन-दर्शन को अनाविल भाव से प्रकट किया है। यह दर्शन ताटस्थ्य तथा निर्वेद की सुदृढ भूमि पर अवस्थित होकर महारस की सृष्टि करने वाले कवि का हो सकता है। शर्मा जी के स्तोत्रकाव्यों में भक्ति और समर्पण तो है ही, पर चिरंतन और वर्तमान जीवन पर भी प्रसंगानुसार दृष्टिपात है। ‘अम्बिके त्राहि माम्’ में वे कहते हैं - सद्म कुत्रास्ति मे ज्ञातमेतन्न में कल्पितेष्वेव नित्यं रमे सद्मसु। किन्तु गृह्णन्ति समानि मामग्रतः क्षौमसूत्रैरमीभिर्मुहुर्यन्त्रितम् ।। क्षौमसूत्र (रेशम के धागे) के द्वारा वर्तमान क्षणभंगुर संबंधों की व्यंजना है, सम शब्द उत्तरार्ध में संसार की आपाधापी को घोतित कर रहा है, तो पूर्वार्ध में मनुष्य के स्थायी पद या परम धाम को। ३३० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास । कवि अपने बाहर के जगत् में संघर्ष और संत्रास देखता है और अपने भीतर के जगत् में भी वह युद्ध देखता है नीरसे कानने नन्दनं भुज्यते श्वेडघर्षर्मुदा चन्दनं लिप्यते। किं कृतेयं व्यवस्था ममान्तर्बहिः सर्वदा युद्धमेवात्र निर्विश्यते।। शर्मा जी ने अहंसंकुचित राग के विसर्जन से उदात्त भाव में अवस्थित होकर इस युद्ध की विश्रान्ति देखी है। यह उदात्त भाव उनकी अनेक कविताओं में उज्ज्वल रूप में प्रकट हुआ है, जैसे-कर्पूरो भूयासम्! (दीपिका, पृ. ५२) या चन्दनतरुः सम्राट् (वही, पृ. ५३)। वे यह मानते हैं कि द्वन्द्व और संग्राम के बिना संसार नहीं चल सकता, और संघर्ष से गुजर कर ही सामरस्य की भूमि पर हम पहुँच सकते हैं। इस तथ्य को उन्होंने ‘सङ्ग्रामः शाश्वतिकः’ शीर्षक कविता में विशद रूप में प्रकट किया है (दीपिका, पृ. ११८) । वर्तमान की विभीषिका तथा निरन्तर प्रक्रान्त सारी आपा-धापी, औद्योगिक प्रगति और उससे उत्पन्न समस्याओं, यान्त्रिकता का अतिरेक, इन सबका अनुभव करते हुए शर्मा जी अपनी कविता में चिरन्तन मूल्यों और शाश्वत शान्ति की स्थापना का स्वप्न देखते है, जिसे उन्होंने ‘नवसर्ग आगन्ता’ शीर्षक कविता में अंकित किया है (वही, पृ. १४२)। शर्मा जी ने जीवनदर्शन और चिन्तन को स्वानुभूत रूप में सहज और बोधगम्य काव्यात्मक अभिव्यक्ति देते हुए आधुनिक संस्कृत कवियों के बीच अपनी पृथक् और विशिष्ट पहचान बनायी है। इसके साथ ही उनकी कविता में सामाजिक स्थितियों पर उत्पास, प्रतीकात्मकता, उत्कृष्ट विम्बविधान का भी प्रयोग है। आधुनिक जीवन की विडम्बना को उन्होंने ‘न गवाक्षमपावृणु’ शीर्षक छोटी सी कविता में सांकेतिक रूप से प्रकट किया है। विमान में सैर करते हुए यात्री विमान के भीतर ही सब कुछ कर सकते हैं, बस खिड़की नहीं खोल सकते हैं - पिबत खादत मोदत यात्रिणः पठत जागृत माद्यत सीदत। लिखत पश्यत धूमयतापि च न तु गवाक्षमवावृणुत स्वयम्।। (वीणा, पृ. ७७) (‘यात्री’ यात्रिन् शब्द की शुद्धि चिन्त्य है।) ‘अपुच्छो द्विचरणः वीणा (पृष्ठ ८५) या ‘यूकिलिप्टस्’ (दीपिका) आदि कविताओं में शर्मा जी ने आधुनिक जीवन के छद्म, दोहरे मानदण्डों और खोखलेपन पर अच्छा व्यंग्य (उत्यास) किया है। शर्माजी ने संस्कृत कविता अपनी एक विशिष्ट शैली में भी बनायी है, वे कहीं भी अपने काव्य को दुरूह होने नहीं देते, जटिल से जटिल भाव या विचार को भी वे नपे तुले शब्दों में बहुत स्पष्टता से कह देते हैं। भाषा के निस्सार चमत्कार के प्रलोभन से अपनी रचनायात्रा को वे सदैव बचाये रहे हैं। युग की साहित्यिक प्रवृत्ति के अनुरूप शर्मा जी का अधिकांश काव्य विचारों की कविता है, पर अन्तरंग रागात्मक अनुभूतियों को भी उन्होंने अभिव्यक्त किया है। गीतिकाव्या

श्रीनिवास रथ

श्री श्रीनिवास रथ का जन्म १ नवम्बर १६३३ ई. में पुरी (उड़ीसा) में हुआ। आपने अपने पिता से पारम्परिक पद्धति से भी शिक्षा ग्रहण की तथा मुरेना, ग्वालियर, सहारनपुर तथा वाराणसी में आधुनिक पद्धति से भी अध्ययन किया। १८५५ ई. से १६५७ ई. तक सागर विश्वविद्यालय तथा उसके पश्चात् विक्रम विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में ये प्राध्यापक रहे है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पद्मभूषण पण्डित बलदेव उपाध्याय इनके गुरु रहे, जिनके पाण्डित्य और सद्गुणों से प्रभावित होकर उन्होंने ‘बलदेवचरितम्’ महाकाव्य की रचना की, जो अद्यावधि अपूर्ण है। श्री रथ ने अपने संस्कृत गीतों के कारण विशेष ख्याति प्राप्त की। इनके गीतों में नया भावबोध, अभिनव परिकल्पनाएं भाषा की सुघड़ता और मसृणता तथा लालित्य आकर्षक रूप में विन्यस्त हैं। समकालीन जीवन की विसंगतियों का इन्होंने अपने अनेक गीतों में मार्मिक रूप से अंकित किया है, तथा इनके संस्कृत गीत हिन्दी की नवगीतविधा के निकट प्रतीत होते हुए भी संस्कृत भाषा के कालजयी गौरवमय रूप की भी बानगी देते चलते हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है– विज्ञाननौका समानीयते, ज्ञानगङ्गा विलुप्तेति नो ज्ञायते। संस्कृतोद्यानदूर्वा दरिद्रीकृता निष्कुटेषु स्वयं कण्टकिन्याहिता।। (विज्ञान की नौका तो लायी गयी, किन्तु ज्ञान की गङ्गा विलुप्त हो गयी इसका ज्ञान नहीं है, संस्कृत के उद्यान की दूर्वा तो समाप्त कर दी गयी और कंटीला पौधा घर के उपवन में लगाया जा रहा है। विपत्रितेयं जीवनलतिका केवलकुटिलकण्टकाकुलिता की सील दूरे कुसुमकथा सूर्ये तपति तमिस्रा प्रभवति भवति नयनमयथा ।। (जीवन की लतिका पत्रहीन हो गयी, वह केवल कुटिल कंटकों से आकुलित है, फूल की बात दूर है, सूर्य तप रहा है, किन्तु अंधेरा बढ़ रहा है, दृष्टि काम नहीं कर रही है।) इनके ‘पुरुषार्थसंहिता’ नामक गीत में आधुनिक भारत की त्रासकारक राजनीति और आतंकमय वातावरण की, पौराणिक प्रतीकों के द्वारा बड़ी सटीक अभिव्यक्ति दी गयी है। ई वस्तुतः श्री रथ उन विरले कवियों में से हैं, जिनके अनेक अप्रकाशित गीत भी सहृदय समाज में वर्षों से अत्यन्त लोकप्रिय रहे हैं। ३३२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास जो

शंकरदेव अवतरे

श्री शंकरदेव अवतरे मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय, दिल्ली में प्राचार्य हैं। इनकी अब तक बीस कृतियाँ प्रकाशित हुई, जिनमें हिन्दी काव्यकृतियों तथा बोधपरक रचनाओं के अतिरिक्त दो संस्कृत मुक्तककाव्यसंकलन हैं-नारीगीतम्’ तथा जीवनमुक्तकम्। श्री अवतरे की अभिव्यक्ति और भाषाशैली एक ओर उन्हें भर्तृहरि के नीतिशतक या अन्य सुभाषितकारों की परम्परा से जोड़ती है, वहीं युगबोध और विचारों की आधुनिकता उन्हें मुक्तककाव्य की समकालिक धारा में भी स्थापित करती है। कवि ने ‘जीवनमुक्तकम्’ में अपने भावबोध और रचना दृष्टि को स्पष्ट करते हुए स्वयं कहा है न याचे स्वर्लोक निगमयति यः सावधि सुखं न मुक्तावातिष्ठे कथमपि निजैकान्तिकगती। ममास्था मानुष्ये भवतु भवसङ्घर्षसुखिनो मदीयं कारुण्यं परिचयतु सृष्टेः प्रतिकणम् ।। (३६६) जो एक अवधि तक सुख देता है ऐसे स्वर्ग-लोक की मैं याचना नहीं करता। अपनी एक मात्र जिसमें गति होती है ऐसी मुक्ति के प्रति मैं नहीं प्रवृत्त होता हूं। संसार के संघर्ष में सुख अनुभव करने वाले मेरी मानव-जाति के प्रति आस्था हो, मेरा कारुण्य सृष्टि के प्रत्येक कण का परिचय प्राप्त करे। “नारीगीतम्” काव्य में स्त्री की शक्ति और नारीतत्त्व के स्वरूप का प्रतिपादन है। भारतीय समाज में स्त्री के प्रति इस समय हो रहे अनाचार को दूर करने के लिये कवि कहता है नास्तिरस्कृतिरहेतुकयन्त्रणा वा यस्मिन् कुले भवति तत् कुलमेव नष्टम्। रामाभिशप्तिरखिलं विकृतं समाज चाणक्यनीतिरपि नन्दकुलं क्षिणोति।। (जिस कुल में नारी को अहेतुक यन्त्रणा दी जाती हो, वह कुल नष्ट हो जाता है। स्त्री का अभिशाप विकृत समाज को उसी तरह समाप्त कर देता है, जैसे चाणक्य की नीति ने नन्द कुल को समाप्त किया।) _ ‘जीवनमुक्तकम्’ में विभिन्न छन्दों में गुम्फित ३७५ पद्य हैं। इनमें कवि ने युगानुरूप चिन्तन, नीति और अपने जीवनदर्शन को अभिव्यक्त किया है। अर्थालङ्कारों का यथावसर सटीक प्रयोग किया है, और अप्रस्तुतविधान में ताजगी है। किसी जुगुप्सित व्यक्ति के लिए मेढक के बहाने अन्योक्ति करते हुए अवतरे जी कहते हैं १. साहित्यसहकार, दिल्ली से प्रकाशित। २. प्र:-वही, HERE ३. वित्र धातु (चुरादि गण की) से णिच् के बिना परिचयतु रूप बनाया गया है। गीतिकाव्य र मण्डूकः स्नापितः सन् सुरभितसलिलैः स्थापितो हेमपीठे द्रष्टुः प्रावार्य दृष्टिं पुनरपि सहसा कूदते कच्चरेषु। एवं नीचः प्रकृत्या शतशतगुरुभिर्दीक्षितोऽनेकवारं आत्मानं येनकेनाप्यनुचितविधिना पातयत्येव पापे।। (२६) (सुगन्धित जल से नहलाया हुआ तथा स्वर्ण-पीठ पर बैठाया हुआ मेढक देखने वाले की दृष्टि बचाकर मलिन स्थान में कूद पड़ता है उसी प्रकार स्वभावतः नीच व्यक्ति अनेक बार शताधिक गुरुओं से दीक्षित होकर भी जिस किसी अनुचित उपाय से अपने को पापकर्म में डाल देता है।)

जगन्नाथ पाठक

जगन्नाथ पाठक का जन्म ४ अक्टूबर १६३४ ई. को बिहार के सहसराम में हुआ। आपने काशी में शिक्षा प्राप्त की। छात्रावास में ही उमरखैयाम की रुबाइयों से प्रेरित होकर आप संस्कृत में काव्यरचना करने लग गये थे और काशी के सहृदय समाज में लोकप्रिय भी बन गये थे। सम्प्रति आप केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ जम्मू एवं गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, प्रयाग में प्राचार्य पद को सुशोभित करके सेवा निवृत्त हो चुके हैं। पाठक जी ने संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी में भी रचनात्मक साहित्य प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही आपकी ध्वन्यालोक, हर्षचरित आदि प्राचीन ग्रन्थों की हिन्दी टीकाएं बड़ी उपादेय हैं। संस्कृत में आपके तीन काव्यसंग्रह प्रकाशित हैं-कापिशायनी (१६८० ई.) मृद्वीका (१६८३ ई.) तथा पिपासा (१६८६ ई.)। कापिशायनी पर आपको देश का प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है।

  • पाठक जी को उर्दू और फारसी काव्य की भी गहरी परख है, और इन्होंने संस्कृत गज़ल और रुबाइयों की रचना में उसका सफलतापूर्वक विनियोग किया है। सौन्दर्यबोध और रागात्मकता के साथ-साथ बिम्बविधान की नवीनता और भारतीय जीवन-दृष्टि की अभिव्यक्ति इनके काव्य में मिलती है। सामाजिक यथार्थ को भी इन्होंने कहीं-कहीं चित्रित किया है। आर्या तथा वियोगिनी छन्दों में इन्होंने सर्वाधिक रचनाएँ की है। ‘कापिशायनी’ में कवि ने मधुशाला के प्रतीक के द्वारा वैयक्तिक प्रेम की विश्वजनीन अनुभूति तथा चैतन्य और उसके सायुज्य को अभिव्यक्ति दी है। एक उदाहरण देखें चषका इह जीवने मया परिपीता अपि चूर्णिता अपि। मदमेष बिभर्मि केवलं क्षणपीतस्य मुधस्मितस्य ते।। (जीवन में मैंने कई चषक पिये भी, कई तोड़े भी। पर एक क्षण में पी ली गयी तुम्हारी मधुर मुस्कान का मद ही बस मैं लिये फिरता हूँ।) । कवि पाठक के काव्य में भीड़ और लोकप्रियता से दूर रह कर साधना और चिन्तन के विकास का सौरभ अनुभूत होता है। वे समाज के सम्मर्द को तटस्थ होकर द्रष्टा की भाँति देखते हैंआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास यस्मिन् द्वारि जनानां सम्मर्दः सम्प्रतीक्षमाणानाम्। प्रेक्षे तस्माद् दूरे स्थितोऽन्वहं प्रेक्षणीयमहम्।। (जिस द्वार पर प्रतीक्षा परायण लोगों की भीड़ खड़ी है उससे दूर खड़ा मैं प्रतिदिन दृश्य देखता रहता हूँ। इस साक्षीभाव में डूब कर लिखी गयी उनकी कुछ उक्तियाँ सूफी संत कवियों की अभिव्यक्ति के निकट आ जाती हैं।

शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी

म.म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी के आत्मज शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी का जन्म १६.४.१६३४ को जयपुर में हुआ। बाल्यकाल से ही काव्यरचना में इनकी प्रवृत्ति थी। सम्प्रति ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृतविद्या संकाय में साहित्यविभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष हैं। अभी तक इन्होंने पैंतीस के लगभग ग्रंथों तथा शताधिक लेखों की रचना की है। संस्कृत में इनकी प्रमुख काव्यकृत्तियाँ हैं- गोस्वामीतुलसीदासशतकम्, काव्यप्रयोजनशतकम्, काव्यकारणशतकम्, विद्योKजनशतकम् तथा स्फूर्तिसप्तशती दिववाणीपरिषद, दिल्ली, १९८२)। इसके साथ ही ये ललिता संस्कृत पत्रिका और कविभारतीकुसुमाञ्जलिः के सम्पादक भी रहे हैं। स्फूर्तिसप्तशती’ गाहासत्तसई तथा आर्यासप्तशती की परंपरा का महत्त्वपूर्ण कोशकाव्य है। इसकी ६८६ गाथाएँ आर्याछन्द में हैं, तथा शेष में विभिन्न छन्दों का प्रयोग किया गया है। कुछ गीतियों का भी संकलन इसी पुस्तक में किया गया है। विषयों की इस रचना में बड़ी विविधता है। कुछ गाथाएँ तिलक, गान्धी आदि राष्ट्रीय विभूतियों पर हैं, कुछ समकालिक समस्याओं पर, कुछ में कवि की नितान्त निजी भावनाएँ हैं, तो कुछ में विभिन्न प्रसंगों, मनोविकारों या भावों को लेकर प्रतिक्रियाएँ हैं। कवि की विचारसरणी सुस्पष्ट और सुलझी हुई है। प्रायः सप्तशती की परम्परा के कोशकाव्यों में मुख्य विषय शृंगार रहता है, जबकि चतुर्वेदी जी की रचना में मुख्य स्वर चिन्तन का है और विवेचनप्रधान शैली है। वैचारिकता और चिन्तन के साथ काव्यात्मकता का आघान अपनी रचना में करने में ये सफल हुए हैं- यह इनकी उपलब्धि कही जा सकती है। साथ ही आर्या छन्द में अभिव्यक्ति का सातत्य और निर्वाह भी श्लाघनीय है। ‘एकान्ताः’ शीर्षक की ये आर्याएँ पठनीय हैं कोलाहलेन शून्या एकान्ता भावनानीताः। वैचारिकविश्वस्मिन् प्रवेशमार्गा इमे धन्याः।। (२१७) रङ्गे रङ्ने रिङगणरेखा रम्या तथैकान्ते। भव्या नव्या सरणिर्मिलतितरां वा तथैकान्ते।। (२२२) (वैचारिक जगत् में कोलाहल से शून्य, भावना से लाये गये ये एकान्त प्रवेश के मार्ग हैं, अतः धन्य हैं। प्रत्येक रङ्ग में, रिंगण की रेखा है, उसी प्रकार एकान्त में है अथवा भव्य तथा नव्य सरणि मिलती है, उसी प्रकार एकान्त में मिलती है।) गीतिकाव्य दूसरी आर्या में अनुप्रास और माधुर्य का समायोजन अच्छा हुआ है। वैचारिकता तथा निबन्धात्मकता के साथ-साथ चतुर्वेदी की रचना में सौन्दर्यबोध, कलात्मक कमनीयता और सौकुमार्य भी कहीं-कहीं मिलता है। स्वरलहरी शीर्षक के अन्तर्गत वे कहते हैं सरिगमपधनिर्बन्धे प्रकम्पमानेव मधुमयी संवित्। रङ्गमयी चित्रमयी विभामयी वा विभासते धारा।। ण (स-रि-ग-म-प-थ इन स्वरों के बाँधने में मधुमयी संवित् प्रकम्पमान सी लगती है अथवा धारा है जो रङ्गमयी, चित्रमयी, विभामयी भासित होती है।) पर स्फूर्तिसप्तशती के अन्तर्गत ही किन्तुशतकम् अपने ढंग की निराली रचना है, जिसमें कवि की सूझ-बूझ तथा विनोदप्रियता भी देखते ही बनती है। इस रचना की सारी सौ आर्याओं के द्वितीय पाद का अंतिम शब्द ‘किन्तु’ है। इन आर्याओं में जीवन की नाना विषम परिस्थियाँ, छोटी बड़ी समस्याएँ और मनुष्य की आकाक्षाएँ प्रकट की गयी हैं। प्रत्येक आर्या उर्दू की गज़ल के शेरों के समान आस्वाद भी देती है। ‘स्फूर्तिसप्तशती’ में अनेक स्थलों पर कवि ने वर्तमान में मुल्यों के हास या नैतिक स्खलन पर टिप्पणियाँ स्पष्ट रूप में प्रकट की हैं। जैसे- बहुमतम् या अवमूल्यनम् शीर्षक के अन्तर्गत समाविष्ट आर्याओं में। कई आर्याओं में उत्पास (व्यंग्य) भी है, जैसे परिचयमहिमा की (४३०-३७) आर्याओं में। मुक्तककाव्य की आधुनिक भावभूमि का स्पर्श करते हुए चतुर्वेदी जी ने वैयक्तिक राग और अनुभूति के अन्तरंग संसार की झलक भी कहीं-कहीं दी है, विशेषतः ‘कृपाणधारा’ (४१२-१७) शीर्षक की गाथाओं में कालान्धकारपटलीसञ्छादितमेतदगणं मनसः। दीपा अप्याशानां निर्वातास्ते विरोधिभिर्भावः। श्वासप्रश्वासानां गतागतैरेवमनुमेया। जीवनसरणिः काचित् खद्योतानां प्रकाशरेखेव।। (मन का यह आंगन काले अन्धकार के पटल से ढका हुआ है। विरोधी भावों के कारण आशाओं के दीप भी बुझ चुके हैं। जुगनुओं की प्रकाश-रेखा की भाँति कोई जीवन-सरिण श्वास-प्रश्वास के गतागतों से कुछ इस प्रकार अनुमेय है।)

सुन्दरराज

श्री सुन्दरराज का जन्म १३.६.३६ ई. को तजौर के देवनाथविलासग्राम में हुआ। रसायनशास्त्र से एम.एस.सी. करके इन्होंने आई.ए.एस. उत्तीर्ण किया और सम्प्रति भारतीय प्रशासनिक सेवा में हैं। इन्होंने स्तोत्रकाव्यों की बड़ी संख्या में रचना की है, यथा - जगन्नाथसुप्रभातम्, श्रीजगन्नाथस्तोत्रम्, श्रीजगन्नाथशरणागतिस्तोत्रम्, श्रीजगन्नाथमङ्गलाशाासनम्, बदरीशतरििङ्गणी आदि। ‘सुरभिकश्मीरम’ इनका वर्णन काव्य है। जिसमे १०८ पद्य हैं। ३३६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इन्होंने कुछ तमिल प्रबन्धों का संस्कृत में अनुवाद किया है। ‘सूरभिकश्मीरम्” की भाषाशैली तथा अप्रस्तुतविधान कालिदास के काव्य की स्मृति दिलाते हैं। शब्दालंकारों की छटा भी कवि ने कुछ स्थानों पर दिखायी है।। अमरावती नदी के वर्णन में कवि कहता है पुरी सुराणाममरावती किं पुरन्दरं नाकमितो निनीषुः। पुरो गिरेर्निर्झरिणी भवन्ती पुरारिमाराधयतीह पुण्या।। (यहाँ से इन्द्र को स्वर्ग ले जाना चाहती हुई देवताओं की नगरी अमरावती है क्या? पर्वत के सामने बहती हुई पवित्र निर्झरिणी मानो शिव की आराधना कर रही है।) इस काव्य में कश्मीर की विभिन्न नदियों, अमरनाथ आदि तीर्थ स्थानों, पर्वतों और नगरों तथा झीलों का मनोहर वर्णन है। कल्पनाशीलता और सौन्दर्यबोध की दृष्टि से यह काव्य उत्तम है। कश्मीर की सुन्दरियों का वर्णन करते हुए सुन्दरराज कहते हैं विज्ञानिभिस्तत्र विचारणीयं विवस्वता विस्फुरता विनैव। विकासमायान्ति विचित्रमत्र विलासिनीनां वदनाम्बुजानि ।। (विज्ञानविदों द्वारा यह विचारणीय है कि स्फुरित होते हुए सूर्य के बिना ही यहाँ, आश्चर्य है कि विलासिनियों के मुख-कमल विकसित रहते हैं।) सूर्योदय शीत ऋतु में कश्मीर में दृष्टिगोचर नहीं होता, फिर भी सुन्दरियों के वदन-कमल खिले दिखते हैं। यहाँ विभावना अलंकार का प्रयोग चमत्कारपूर्ण होता है तथा तथ्यपूर्ण भी है। इसी प्रकार स्थान-स्थान पर समासोक्ति, उपमा, रूपक स्वभावोक्ति आदि अलंकारों का कुशल विन्यास किया है।

व्योमशेखर

व्योमशेखर का मूल नाम बिशनलाल गौड़ है। इनका जन्म दिसम्बर १६३७ ई. में मुरादाबाद (उ.प्र.) के लच्छमपुर ग्राम में हुआ। वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय के शास्त्री तथा व्याकरणाचार्य की उपाधियाँ इन्होंने अर्जित कीं। १६६५ ई. में आगरा विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. तथा १६७३ ई. में मेरठ से पी-एच्.डी. प्राप्त की। सम्प्रति ये लाजपतराय स्नातकोत्तर महाविद्यालय साहिबाबाद में संस्कृत प्राध्यापक हैं। हिन्दी और संस्कृत में इन्होंने कविताएँ तथा लेख प्रकाशित किये हैं। संस्कृत में ‘अग्निजा’ के नाम से इनके गीतों और मुक्तकों का संग्रह प्रकाशित है। इनके गीतों पर समाजवादी विचारधारा का विशेष प्रभाव है तथा सर्वहारावर्ग के शोषण पर इन्होंने विरोध का भाव व्यक्त किया है। इस दृष्टि से ‘श्रमिकाया अयं बालः’ शीर्षक गीत (अग्निजा, पृ. ३२) उदाहरणीय है। वर्तमान में व्याप्त संवेदनहीनता पर कटाक्ष करते हुए एक गीत में ये कहते हैं - नीरवे तमसातटे क्रौञ्चस्तु भूयो हन्यते। क्रौञ्चजायाया विलपनं ब्रूहि केन श्रूयते गीतिकाव्य ३३७ (तमसा नदी के नीरव तट पर क्रौञ्च पक्षी तो बार-बार मारा जाता है। बोलो, क्रौञ्चपत्नी का विलाप कोई सुनता है ?) शोषित जनों की हाय का अभिशाप भयंकर होगा इस मन्तव्य को ग़ज़ल की शैली में इन्होंने इस प्रकार प्रकट किया है वयं श्वसिमः श्वसन्त्यपि ते, न यूयं नो पुनः श्वसिथ। न जाने केन निःश्वसितं जगन्निर्दग्धमिदमास्ते।। (अग्निजा, पृ. ३२)

अमरनाथ पाण्डेय

अमरनाथ पाण्डेय का जन्म ६ अक्टूबर १६३७ ई. में पं. रामनरेश पाण्डेय के यहाँ हुआ। सम्प्रति आप काशीविद्यापीठ, वाराणसी में संस्कृत विभाग में आचार्य तथा अध्यक्ष हैं। भास्वती, दूर्वा आदि पत्रिकाओं में इनकी मुक्तक रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। ‘कविता’ शीर्षक अपनी कविता में वे संस्कृत की अभिनवकाव्यरचना का वैशिष्ट्य निरूपित करते हुए कहते हैं प्रकृतिसुन्दरी नवभङ्ग्या समुदेति काव्यसंसारे भावकल्पना-सङ्घटना-निर्मित-चारुप्रसारे वर्तमानसन्दर्भराजिरत्येति पूर्वकविमानम् अयि कविते, प्रतनु वितानम् ।। (दूर्वा-५, मई, १६८७) (री कविते, तू अपना वितान फैला, क्योंकि प्रकृति की सुन्दरी भाव-कल्पना की सङ्घटना द्वारा जिसका सुन्दर प्रसार बना हुआ है ऐसे काव्य के संसार में नयी भगिमा के साथ समुदित हो रही है, साथ ही पूर्व कवि के मान को वर्तमान के सन्दर्भ पार कर “सौन्दर्यवल्ली’ (भारतीय विद्या प्रकाशन, जवाहरनगर, दिल्ली-७, १६६५) कवि पाण्डेय का स्तोत्रकाव्य है, जो १०८ वसन्ततिलका वृत्तों में निबद्ध है। इसमें दर्शन तथा साहित्य-सौन्दर्य की त्रिवेणी का समागम करते हुए दुर्गा की स्तुति की गयी है। भक्तिभाव की तन्मयता और चिन्तन की प्रौढि दोनों यहाँ एकत्र हैं उत्थानरासरसिके रमसे प्रसन्ना प्रीता शिवेन सहिता त्वरितं धुलोके। उल्लासयस्यमृतसिन्धुमथ प्रवाहै रम्ब प्रवृद्धविपदं सपदि क्षिणोषि ।। (८२) (हे उत्थान रूपी रास की रसिके मां, प्रसन्न और प्रीत तू शीघ्र विश्व के साथ धुलोक में अर्थात् सहस्रार पद्म में रमण करती है, अमृत के समुद्र को ज्वारों से उल्लसित करती है तथा बढ़ी हुई विपत्ति को शीघ्र नष्ट करती है।) अर्थालंकारों के साथ-साथ शब्दालंकारों का भी अनेकत्र प्रयोग करके भाषा की ३३८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास विच्छित्ति कवि ने प्रकट की है। एक उदाहरण यमक के विन्यास की दृष्टि से प्रस्तुत है वित्तं विकारसहितं न हितं करोति चित्तं विकाररहितं सहितं करोति। त्वद्ध्यानमग्नमहितं रहयत्यवश्य शम्भुप्रसादसहितं महितं विधत्से ।। (५५) - (विकास से युक्त वित्त हित (भला) नहीं करता, विकार से रहित चित्त हितयुक्त करता है। तुम्हारे ध्यान में डूबे वित्त वाले को अवश्य ही अहित त्याग देता है और हे माता, तू शम्भु के प्रसाद से युक्त चित्त वाले को महित अर्थात् पूजित बनाती हो।)

रामकैलाश पाण्डेय

रामकैलास पाण्डेय का जन्म सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में सन् १६३६ ई. में हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. करके इन्होंने वहीं शोधकार्य भी आरम्भ किया तथा दो वर्ष इसी विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया। तत्पश्चात् ये भारतीय विद्या भवन, मुम्बई में कायर्रत रहे और १६७२ ई. में पैजपुर (महाराष्ट्र) में गुरुकुल संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य नियुक्त हुए। भाषणकला के लिये विख्यात कवि पाण्डेय को १६४७ ई. में वाराणसी में भारत शासन की विधिमन्त्री डा. सरोजिनी के द्वारा महाकवि के रूप में सम्मालित किया गया और स्वामी शंकरानन्द सरस्वती के द्वारा आशुकवि की उपाधि भी इन्हें प्रदान की गयी। हनुमदष्टकम्, भारतशतकम् तथा महाकविशतकम् इनके प्रकाशित काव्य हैं। भारतशतकम् में पाण्डेय जी की तेरह गीतिरचनाएँ हैं संकलित हैं। यह रचनाएँ पूर्व में संस्कृत प्रतिमा, संवित, श्रीपण्डित आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। चार रचनाओं को छोड़कर शेष गीतियों की विषयवस्तु राष्ट्रिय भावना से सम्पृक्त है। पहली रचना भारतशतकम है, जो पृथक रूप से भी पस्तकाकार प्रकाशित है। यह काव्य चीन आक्रमण के समय १६६२ ई. में लिखा गया था। देशवासियों में राष्ट्रगौरव को जागृत करने के लिये कवि ने इस में राम, हनुमान, कृष्ण, अर्जुन, व्यास, बुद्ध, चन्द्रगुप्त, अशोक, पाणिनि आदि मनीषियों का गुणगान भी किया है तथा झांसी की रानी, राणा प्रताप, शिवाजी आदि देशभक्तों के चरित्र पर भी प्रकाश डाला है। अंत में अपनी प्रगतिशील दृष्टि तथा संस्कृताभ्युदय की कामना की अभिव्यक्ति करते हुए कवि कहता है जायन्तां देशभक्ता रणविधिनिपुणा भारतेऽस्मिन् बलाढ्याः विद्या वैज्ञानकी च प्रसरतु सततं स्वामभिख्यामुपेता। सर्वे गीर्वाणवाणी सुखविभवपरा भारतीयाः पठेयुः देशाः शान्तिं लभन्तां जनमनसि सदा वर्धतां प्रीतिरेव।। (१०१) (इस भारत में देश के भक्त रण के नियमों में निपुण तथा बलशाली हों, और अपनी गीतिकाव्य 국트 शोभा को प्राप्त होकर वैज्ञानिकी विद्या निरन्तर फैले, सुख तथा विभव के साधन में लगे सभी भारतीय गीर्वाण-वाणी संस्कृत को पढ़े, देशों में अमन-चैन हो, सदा जन-मानस में प्रीति बढ़ें) इस संकलन में अन्य रचनाएँ-भारतम् प्रति, हे कालिदास, राणाप्रतापः, शिववीरः, महात्मा गान्धिमहोदयः आदि हैं ।

उमाकान्त शुक्ल

उमाकान्त शुक्ल का जन्म १८.१.१६३६ ई. को हुआ। आप खुरजा निवासी पं. ब्रह्मानन्दशुक्ल के आत्मज हैं। इस समय आप सनातन धर्म महाविद्यालय, मुजफ्फरनगर में संस्कृत के प्राध्यापक हैं। मङ्गल्या, परीष्टिदर्शन, चाङ्गेरिका तथा कूहा ये चार काव्यरचनाएँ आपकी प्रकाशित हैं। मगल्या आर्या छन्द में निबद्ध मुक्तकों का सरस मनोहारी संग्रह है। इसमें गाहासत्तसई तथा गोवर्धनाचार्य की गाथाओं के समतुल्य अभिव्यक्ति की छटा है, और आधुनिक गज़ल की कोमलता, सौन्दर्य तथा रागात्मिका वृत्ति भी। कवि ने सौन्दर्यानुभूति के लिये रसिक पाठकों को आमंत्रित किया है सौन्दर्य परितो मां कृतसौन्दर्यावगाहनश्चाहम्। यदि वाञ्छसि तत् पातुमुपविश मे चेतसि क्षणकम् ।। (मेरे चारों ओर सौन्दर्य है और मैंने सौन्दर्य में अवगाहन किया है, तुम उसे पान करना चाहते हो तो क्षण भर मेरे चित्त के पास रहो) करुणा और संवेदना को रचना तथा भावन की पहचान मानता हुआ वह कहता है करुणाऽऽया मे माता विरहो जनकः सहोदरः शोकः। उत्कलिका च वयस्या कविताऽहं चञ्चला बाला।। अश्रुकणं त्वां याचे करुणावरुणालयं च याचे त्वाम्।। उत्कलिका त्वां येन काव्यलता स्यात् सुपल्लविता।। (करुणा मेरी आद्या जननी है, विरह पिता, शोक सहोदर भाई और उत्कलिका मेरी सहेली है और मैं चञ्चल बाला कविता हूँ। तुम से अश्रुकण की, करुणा के समुद्र की और उत्कलिका की याचना करता हूँ, जिससे मेरी काव्यलता सुपल्लवित हो।) कवि की मुक्तक रचना हिन्दी की श्रेष्ठ छायावादी तथा रहस्यवादी कविता के समान भावबोध और संवेदना की गहराई, प्रतीक विधान की प्रत्यग्रता और अर्थालड्कारों के उचित प्रयोग के कारण समकालिक संस्कृत काव्य का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। श्री शुक्ल की दूसरी उल्लेख्य गीतिकाव्यकृति ‘कूहा’ है, जिसमें इन्दिरागान्धी के दुखद निधन के अनन्तर समूचे राष्ट्र की वेदना को मार्मिक अभिव्यक्ति दी गयी है। काव्य का आरम्भ हिमालच के वर्णन से होता है, जहाँ राजीव गान्धी अपनी मां की भस्म बिखेरने जाते हैं। हिमालय का यह वर्णन कालिदास के हिमालय वर्णन के समकक्ष है ३४० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास द्रुतं वहन्त्यो विशदप्रवाहा नद्यो यदीया करुणां गिरन्ति । दम्भोलिकोटीरपि दम्भयन्त्यः शिला यदीयं द्रढिमानमाहुः ।। (तीव्र वेग से विशद प्रवाह के साथ बहती नदियाँ जिस हिमालय की करुणा को व्यक्त करती हैं, और करोड़ों वज्राघातों को भी विदीर्ण कर देने वाली जिसकी शिलाएँ उसकी दृढता की कथा कहती हैं। उमाकान्त शुक्ल प्राचीन कालजयी कविता की सामर्थ्य तथा आधुनिक भावबोध दोनों की विलक्षण सन्धि अपने काव्य में उपस्थित करते हैं।

दीपक घोष

दीपक घोष का जन्म २४ जनवरी १E४१ के दिन कलकत्ता में हुआ और वहीं इनकी शिक्षा हुई। सम्प्रति ये कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्रवाचक हैं। श्री घोष ने कई विलापकाव्य संस्कृत में लिखे हैं, जिनमे पाँच विलाप-काव्यों का संग्रह ‘विलाप’-पञ्चिका’ के नाम से प्रकाशित है (कलकत्ता, १६८E)। मेघविलापम्, (१३ पद्य), सुरवाग्विलापम् (३२ पद्य), अमरविलापम् (१४ पद्य), उज्जयिनीविलापम् (तीन पद्य) तथा अलकाविलापम् (२६ पद्य) इन पांचों विलापों में कवि ने विभिन्न छंदों का प्रयोग करते हुए सरल और सरस भाषा में अभिप्राय व्यक्त किया है। अतीत के गौरव की ओर संकेत करते हुए समकालीन स्थितियों की विडंबना का उद्घाटन इन काव्यों में किया गया है। अभिनवपरिकल्पना और युगबोध की दृष्टि से मेघविलापम् प्रभावित करता है। कवि ने इसे ‘सोल्लुण्ठकाव्य’ की संज्ञा दी है। कालिदास के मेघदूत में यक्ष के भवन का जो वैभव और सौन्दर्य चित्रित है, उसके समानांतर कवि ने यहाँ एक आधुनिक भारत के एक दरिद्र व्यक्ति के घर का दैन्य और अभाव चित्रित किया है। यक्ष के सदन में ऐश्वर्य का साम्राज्य है, मेघविलापम् के नायक के घर में स्थितियाँ उसके ठीक विपरीत हैं। स्थितियों का विपर्यय प्राचीन कालजयी काव्य और आज के काव्य की संवेदना का अंतर भी रेखांकित करता है। मेघदूत की पदावली या पंक्तियों का पुनरावर्तन विडंबना के बोध को तीखा बनाता है। उदाहरणार्थ हासोऽज्ञातो मधुमयमुखादश्रुधौते गृहे मे दन्तैर्घट्टः कुटिलवदने साश्रुवर्णे बसन्ते। मेघालोके प्रथयति कविः काव्यमालां सुगन्धिं REE मेघालोके मम तु हृदयं सर्वथा भीतभीतम् ।। (२) कवि ने मेघ के आगमन पर अनुभव में आने वाले प्रमोद के स्थान पर अतिवृष्टि से होने वाली विभीषिका का चित्र खींचा है, जिसम उसका अपना देश-काल का अनुभव व्यक्त हुआ है। इसी दृष्टि से अलकाविलापम् भी स्थितियों के विपर्यय को लेकर लिखा गया है। शाप से मुक्त होकर यक्ष अलका लौटता है, और अपने भवन को उजड़ा हुआ पाता है, और यक्षिणी उसे नहीं मिलती। कुल मिलाकर दीपक घोष के काव्यों में निराशावादी स्वर गीतिकाव्य प्रबल है, उसके साथ व्यंग्य की प्रखरता भी है।

भास्कराचार्य त्रिपाठी

भास्कराचार्य त्रिपाठी का जन्म इलाहाबाद के निकट माण्डर जसरा नामक ग्राम में अनन्त चतुर्दशी संवत् १EEE (१३.६.४२) को हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। छात्रावस्था से ही संस्कृत काव्य-रचना में इनकी सार्थक प्रवृत्ति थी और इसी काल में डा. व्ही.राघवन ने ‘संस्कृत प्रतिभा’ में इनका अजाशती कथाकाव्य प्रकाशित करते हुए उन्हें बालकवि की उपाधि दी। सम्प्रति ये मध्यप्रदेश की शासकीय महाविद्यालयीय सेवा में प्रोफेसर हैं तथा आठ वर्षों से म.प्र. संस्कृत अकादमी के सचिव और संस्कृत त्रैमासिक ‘दूर्वा’ का सम्पादन कार्य कर रहे हैं। श्री त्रिपाठी ने संस्कृत में रूपक, गद्य, खण्डकाव्य तथा गीतिकाव्यों की प्रचुर मात्रा में रचनाएँ की हैं। इनके लगभग सौ गीतकाव्य तथा लघुकाव्य विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। वक्रोक्ति की विच्छित्ति, भाषा पर असाधारण अधिकार, समसामयिक सामाजिक तथा राजनीतिक सन्दर्भ, व्यंग्य और विडम्बना का तीखापन इनके काव्य की विशेषताएँ हैं। मिथकों, प्रतीकों और बिम्बों का दुर्लभ विन्यास करने में भी इन्होंने निपुणता का प्रदर्शन किया है। इनकी रचनाओं में शिल्प और आयास तथा परिष्कार पर आग्रह अत्यधिक है तथा कहीं-कहीं क्लिष्ट, जटिल और अप्रचलित पदावली का प्रयोग भी ये करते हैं। भोजपुरी अंचल के लोकगीतों का रूप भी इनके अनेक गीतों में उभरता है, कुछ गीतों में राष्ट्रीय भावनाओं को अभिव्यक्ति दी गयी है। समकालिक जीवन पर कवि की टिप्पणियाँ मार्मिक हैं। यथा आगतः खलु कालः कोऽयम् पौरवो रक्षति नहि विनेयम्। अपि वृद्धा गौतमी न सम्प्रति निर्भयसञ्चारा, शारद्वतशिष्येण हन्यते वत्सलसम्भारा।’ (यह कौन सा समय आ गया है कि पुरुवंश में उत्पन्न दुष्यन्त अनुशासन का पालन नहीं कर रहा है ! अब बूढ़ी गौतमी भी निर्भय होकर सञ्चरण नहीं करती। वत्सल-सम्भार वाली वह शारद्वत शिष्य द्वारा मारी जा रही है!) ‘मृत्कूटम’ ‘खण्डकाव्य इनकी विशेष उपलब्धि कहा जा सकता है। इसमें मनुष्य जीवन की सारी विभीषिका, उपलब्धि, आंकाक्षा, आशा और वासना के घात-प्रतिघात का मार्मिक निदर्शन है। गर्भावस्था से वार्धक्य और मुमूर्षा तक की सारी अवस्थाओं का सूक्ष्म पर्यवेक्षण के साथ चित्रण है। एक उदाहरण देखें १. प्रख्या, भाग-१, पृ. १४-१६, पर प्रकाशित ‘अभिज्ञानम्’ कविता से। ३४२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास दुग्धाब्धिः कृत्स्नगेहे विलुलितमधुरा दुग्धधारा मुखाब्जे मुग्धाभिर्गीयमानं स्वरगृहमभितो मङ्गलं दुग्धगन्धि। दन्ताली दुग्धमुग्धा कलितकिलकिला दुग्धसौख्यानि दुग्धे । मृत्कूटे दुग्धरागं भणति वसुमती स्नाप्यते दुग्धपूरैः।। (११) (माटी का पुतला जब पहली बार दूध चाहता है, सारे घर में छलक पड़ता है दूध का सागर, मुँह से बरबस टपकती दूध की धार, नवेलियों द्वारा गाई जाती सोहर में दूधिया गमक, दूध की नन्हीं देंतुलियाँ और दूध की साध जैसी-लुभावनी किलकारियाँ, लगता है, सारी धरती दूध के फब्बारों से नहा उठी हो।)

राजेन्द्र मिश्र

राजेन्द्र मिश्र का जन्म जौनपुर जनपद में सई नदी के तटवर्ती द्रोणीपुर ग्राम में २६ दिसम्बर १६४३ ई. को हुआ। सम्प्रति आप हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में आचार्य तथा अध्यक्ष हैं। १६६० ई. से आपने संस्कृत में काव्यरचना का श्रीगणेश ‘गीतरामचरितम्’ लिख कर किया और गत बाईस वर्षों में भोजपुरी, हिन्दी तथा संस्कृत में विभिन्न विधाओं में विपुल साहित्य की सृष्टि कर प्रतिष्ठा प्राप्त की। एकांकी (भाण, प्रहसन आदि) महाकाव्य (जानकीजीवनम् तथा वामनावतरणम्) और लघुकाव्य कथा गीति-इन चार विधाओं में संस्कृत साहित्य को आपका विशेष योगदान रहा है। खण्डकाव्यों या स्तोत्रकाव्यों में आर्यान्योक्तिशतकम् (१९७५) नवाष्टकमालिका (१E७६) पराम्बाशतकम् (१६८१), शताब्दीकाव्यम (१९८७) तथा अभिराजसप्तशती (१E८७) आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं, तथा गीतसंकलनों में वाग्वघूटी (१६७८), मृद्वीका (१६८५) तथा श्रुतिम्भरा (१६८६) प्रकाशित हैं। अपने विभिन्न लोकगीतविधाओं का भावबोध लय, तर्ज और छन्दःसंस्कारसंस्कृत भाषा के काव्यविश्व में प्रतिष्ठापित किया है। चैत्रकम् (चैती), सूतगृहगीतम् (सोहर), स्कन्धहारीयम् (कहरवा), नक्तकम् (नकटा) प्रचारगीतम् (पचरा) आदि विधाओं के अनेक गीत आपने लिखे हैं, जिनसे आधुनिक संस्कृत कविता को न केवल बृहत्तर रसिक समाज में लोकप्रियता प्राप्त हुई, बल्कि उसकी काव्यसम्पदा में भी नये आयाम जुड़े। इसी प्रकार संस्कृत में गज़ल-गीतियों की भी श्री मिश्र ने विपुल मात्रा में रचना की है। मिश्र जी की गज़लों में वेदना, अन्तर्द्वन्द्व तथा गहन वैयक्तिक अनुभूतियाँ भी हैं, और देश की वर्तमान स्थितियों पर तीखा व्यंग्य भी। कुछ गीतियों के उदाहरण द्रष्टव्य हैं जायते निर्झरी हन्त कूलङ्कषा एधते साम्प्रतं भारते दुर्दशा। (श्रुतिम्भरा, पृ. ४०) निर्दयं विरौम्यहं कोऽपि नो शृणोति में मामके हि भारते कीदृशी स्वतन्त्रता ? १. प्र. गङ्गानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, प्रयाग १EE२ । २४३ गीतिकाव्य शौकतापजर्जरा द्रोहमारभगुरा अद्य दृश्यते न किं भारते वसुन्धरा ? (नदी तट-बन्ध तोड़ रही है, भारत में दुर्दशा बढ़ रही है। मैं निर्दय रुदन कर रहा हूँ, मेरी कोई नहीं सुनता, मेरे भारत में कैसी स्वतन्त्रता ? पृथ्वी आज क्या शोक के ताप से जर्जर, द्रोह-भार से भगुर नहीं दिखाई देती ?) इनकी गजलगीतियों में कहीं विरहानुभूति की तीव्रता है, तो कहीं फक्कड़पन की मस्ती। विरह की एक गज़ल-गीत का मतला है नहि जगदतिरुचिरं त्वया विना जीवनमपि न चिरं त्वया विना (तेरे बगैर संसार अतिरुचिर नहीं लगता और जीवन भी चिर-स्थायी नहीं लगता।) एक अन्य गज़ल में कवि कहता है-कुछ उम्र घर में कटी, कुछ पेड़ों तले। पर मनुष्यों या देवताओं की भीड़ में नहीं किञ्चिद् गृहे व्यतीतं किञ्चित् तले दुमाणाम्, न कदम्बके नराणां न कदम्बके सुराणाम् ।

पुष्पा दीक्षित

पुष्पा दीक्षित का जन्म १२.८.१६४३ ई. के दिन जबलपुर में दर्शन, साहित्य, व्याकरण के सुविज्ञ तथा आयुर्वेदविशेषज्ञ पं. सुन्दरलाल शुक्ल के घर हुआ। बाल्यावस्था में विवाह तथा तदनन्तर विषम परिस्थितियों में इनका जीवन व्यतीत हुआ। संप्रति ये विलासपुर के शासकीय महाविद्यालय में संस्कृत प्राध्यापिका हैं। १६८४ ई. में इनकी नीतियों का संग्रह ‘अग्निशिखा’ प्रकाशित हुआ। इसके अनन्तर इनकी अनेक गीतियाँ ‘दूर्वा’ तथा अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। अग्निशिखा’ की सभी गीतियों में विप्रलम्भ श्रृंगार के साथ आधुनिक कविता की रहस्यवादी धारा का रमणीय संयोग है। उपालम्भ, विरह की पीड़ा, उत्कण्ठा, प्रेम की अनन्यता और चेतना का तदाकाराकारित रूप-पुष्पा जी के काव्य में जिस तरह व्यक्त हुए हैं, उसने उनके काव्य को अद्वितीय ऊँचाई, भावगाम्भीर्य और औदात्य दिया है। भावों का आवेग तथा पदावली की सटीकता कवयित्री की अनुभूतिप्रवणता तथा काव्यसाधना दोनों के परिचायक हैं। उसकी दृष्टि में प्रेम एक अनिर्वचनीय सर्वव्यापी अनुभव है, भाषा उसे समग्र रूप में व्यक्त करने में अक्षम है न वर्णस्तद् वयं प्रिय यदनुभूतं हृदि मया क्षरत्वं गच्छेन्मेऽनवरतविलापेऽक्षरकुलम् । विभिन्नैः शब्दाविपुलविपुलः कोशनिकरः क्षमो नो क्षन्ता वा विशकलितमेतत्कलयितुम् ।।३४४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (हे प्रिय, जो मैंने हृदय में अनुभव किया उसे वर्णों द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता, निरन्तर विलाप में मेरे अक्षर- समूह के क्षर या नष्ट हो जाने की सम्भावना है, विभिन्न प्रकार के शब्द-अर्थों से भरा कोश-समूह इसे व्यक्त करने में न समर्थ है और न होगा।) प्रेम की आकस्मिकता का अनुभव भी इसी प्रकार मनुष्य को हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ कर देने वाला है इयमग्निशिखा ज्वलिता सहसैव कथं हृदये। निशितैस्तव दृष्टिशरैः सकलं शकलीक्रियते।। (पृ. ३) तथा अयमेव मेऽपराघस्त्वमवेक्षितो मया किम् ? स्नेहस्फुलिङ्ग एव ज्वलितो न मानसे किम् ? (पृ. ३८) (यह अग्नि-शिखा अचानक ही कैसे हृदय में भड़क उठी ? तेरे तेज़ दृगुबाणों से सब कुछ टुकड़े-टुकड़े किया जा रहा है! क्या यही मेरा अपराध है कि मैंने तुझे देखा ? मानस में स्नेह का यह स्फुलिङ्ग क्या जल नहीं उठा है !) 1 अग्नि-शिखा के सारे ४८ गीतों में वेदना की तीव्रता और भाव की अपार ऊर्जा है। कवयित्री के परवर्ती गीतों में सामाजिक स्थितियों का बोध, स्रोत्पास विडम्बना और दार्शनिक गहराई आ गयी है। अप्रस्तुतविधान तथा कल्पना के रमणीय विनियोग की दृष्टि से भी पुष्पाजी का गीतिकाव्य उत्तम है।

हरिदत्त शर्मा

१६४५ ई. में हाथरस (उत्तर प्रदेश) में जन्म तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षणरत हरिदत्त शर्मा आधुनिक युग के ललित गीतकार हैं। उनका प्रथम काव्य ‘गीतकन्दलिका’ १६८३ ई. में गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। पुनः १६८६ ई. में ‘उत्कलिका’ नामक परिष्कृत गीतिकाव्य तथा १६६२ में ‘बालगीताली’ का प्रकाशन हुआ। गीतों में विद्यमान माधुर्य तथा उनके प्रस्तुतीकरण के श्रवणमाधुर्य के कारण प्रकृत कवि को ‘कविपुस्कोकिल’ की उपाधि से अलङ्कृत किया गया। व्रजप्रदेश की निकटस्थताके प्रभाव से हरिदत्त कवि के अनेक गीत व्रजभाषा के गीतों की लय पर लिखे गए हैं। छन्दों की भाँति गीतों के विषयों में भी नवीनता है। कतिपय गीतों में प्रेम और विरह की भावतरलता, तो कतिपय में राष्ट्रीयता तथा देशभक्ति के स्तर मुखरित हैं। सामाजिक समस्याओं एवं विषमताओं को विषय बनाकर भी कुछ गीतों की रचना हुई है तो प्रकृति के विविध रूपों पर भी कवि की लेखनी चली है। ‘उत्कलिका’ में कविकृत गीतिकाव्य ३४५ योरोपीय देशों की सांस्कृतिक यात्राओं के अनुभवों पर भी गीत निबद्ध है, जीवन की विविध विसंगतियों, सृष्टि एवं संसार की गहन विरूपताओं पर गीतों का गुम्फन हुआ है। बालगीताली द्वारा बाल-मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर सरल, सुमधुर गीत-रचना द्वारा बाल साहित्य की कमी पूरी करने की दिशा में काम किया गया है।

राधावल्लभ त्रिपाठी

राधावल्लभ का जन्म १५ फरवरी १६४६ को मध्यप्रदेश में राजगढ़ जिले में हुआ। इनकी शिक्षा म.प्र. के विभिन्न नगरों में हुई। संप्नति ये सागर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में आचार्य और अध्यक्ष हैं। इनकी संस्कृत कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। अनेक विद्वत्तापूर्ण या समीक्षात्मक ग्रंथों, हिंदी में उपन्यास, नाटक और कहानी-संग्रहों के अतिरिक्त संस्कृत में इनके दो काव्यसंग्रह प्रकाशित हैं-सन्धानम्, (१६८८) तथा लहरीदशकम् (9EE१ )। सन्धानम् में ५५ कविताएँ अन्तर्जवनिकम्, बहिर्जवनिकम्, लहरीलीलायितम्, गीतवल्लरी तथा नमोवाक्- इन पाँच खण्डों में विभाजित हैं। लहरीदशकम् में दस लहरीकाव्य संकलित हैं। राधावल्लभ की कविताओं में विषयवस्तु की नवीनता, आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों की विसंगतियों का व्यंग्यपूर्ण चित्रण और भावप्रवणता के साथ कल्पना की सम्पन्नता आदि उल्लेख्य विशेषताएँ हैं। योरोपयात्रा के समय विमान से हिमाच्छादित धरती को देखते हुए कवि कल्पना करता है स्यूतं स्यूतं पुनरपि च यच्छीर्यते थार्यमाणं गात्रे क्लृप्तं कथमपि तथाऽच्छादने नालमेव। धृत्वा देहे हिममयमितं श्वेतकापासवस्त्रं पृथ्वी शेते विकलकरणा निर्धना गेहिनीव ।। (दरिद्र गृहिणी की भाँति, व्याकुल इन्द्रियों वाली पृथ्वी ठंडे इस सफेद सूती वस्त्र को शरीर पर धारण करके सो रही है, इसका वस्त्र बार-बार सीये जाने पर भी धारण करने पर गलता जा रहा है। अड्ग पर पूरा भी नहीं पड़ता और न ही ओढ़ने का काम करता है। यहाँ स्थान-स्थान से फटी सफेद चादर ओढ कर सोती गृहिणी का उपमान बर्फ से ढकी धरती नवीन कल्पना है। ‘जनतालहरी’ कविता में कवि ने आज के भारतीय जन के स्वप्नों, संघर्षों और आस्थाओं का चित्रण किया है।

विन्ध्येश्वरीप्रसाद

विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र का जन्म मध्यप्रदेश के ग्राम बहरा में १८. ३.५६ को हुआ। सम्प्रति ये विक्रम विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्राध्यापक हैं। इनका ‘सारस्वतसमुन्मेषः’ नाम से कविता संग्रह प्रकाशित है तथा इसके अतिरिक्त पत्रिकाओं में इनकी अनेक रचनाएँ छपी हैं। नवगीतविधा हिन्दी के नवीन छन्दों में इन्होंने ललित रचनाएँ की हैं। लय, सौकुमार्य तथा रागात्मकता इनके काव्य का वैशिष्ट्य है। पदशय्या की श्लक्ष्णता और काव्यपाक की सरसता की दृष्टि से कवि विन्ध्येश्वरी ३४६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास प्रसाद का रचनाबन्ध मनोहर है। पिछले कुछ वर्षों से इन्होंने नवगीत विधा में अनेक रचनाएँ की हैं, जिनमें कहीं गहरा व्यंग्य, कहीं मनोवेदना तो कहीं सामाजिक अन्तर्विरोधों का सूक्ष्मेक्षिका से उद्घाटन है। पर इनके अपने रचनाकाल के आरंभिक वर्षों में लिखे गये सवैया, घनाक्षरी, दोहा सोरठा, आदि व्रजभाषा के छन्द भी उतने ही प्रभावशाली हैं। कतिपय उदाहरण द्रष्टव्य है यमुनावटमञ्जुलकुञ्जघने घनसाररसावलिते विपिने विपिने नवनीरजगन्धयुते युतपङ्कजकोषमिलिन्दजने। जनमानसमानिनि मोदमुदे मुदिताधरपानपुटे कमने कमने ननु रासरसे सुविभाति शरत् सखि नैशसरत्पवने।। सवैया छन्द में शरद् ऋतु के वातावरण का यह सुन्दर चित्र है। इस कवि की घनाक्षरी की रचना भी इसी प्रकार प्रौढ है कलितकदम्बनिकुरम्बकेलिकुञ्जघने पुलिने कलिन्दजायाः लघु-लघु सा विभाति । ललितवनालीपरिवेष्टिते नु वृन्दावने नव्यामेव शोभामावहन्ती तरसा विभाति । वलितनिरभ्रताम्रतारकिततारापथ सञ्चारामन्दचन्द्रसारसरसा विभाति। सरति समीरे सखि यामुने गभीरे नीरे धीरे बलवीरे शरदेषा सहसा विभाति। विन्ध्येश्वरी प्रसाद की कविता में प्रसंगानुसार यमक और श्लेष का प्रयोग बड़ा चुटीला होता है। इन्होंने इस शैली में छोटे-छोटे अनुष्टुप् जैसे छन्दों में पैनी बातें कहीं हैं। इसी शैली में संस्कृत में अनेक गज़ल-गीतियाँ भी इन्होंने लिखी हैं। प्रेम और रुमान से सम्पृक्त गज़ल के भावजगत् में राजनीतिक व्यंग्य का निवेश करने वाले संस्कृत कवियों में | राजेन्द्र मिश्र के बाद इनका नाम लिया जा सकता है। इनकी एक गज़ल उदाहर्तव्य है वद विधुवदने त्वदीयमानसे कथं भीतिः ? अपरिचितं कलयसि मयि प्रणयिनि, का संशीतिः? किं त्वया पीतमिदं मैरेयं नाद्य रुद्धासि देहलीषु साम्प्रतं हि देवि “देहली’ - संस्थिता तथापि ते न सम्प्रीतिः।। (हे चन्द्रमुखी बोल, कैसा तेरे मन में डर है ? हे प्रणय वाली, कैसे मुझे अपरिचित समझ रही हो ? मेरे प्रति कौन सा संदेह है ? क्या तूने इस मदिरा का पान कर लिया है ? ३४७ गीतिकाव्य अब तू देहलियों में बन्द नहीं है, ‘देहली’ में संस्थित है तब भी तेरी सम्प्रीति नहीं है ?) | इस युवा कवि के दो काव्यसंकलन ‘सारस्वतसमुन्मेषः’ तथा ‘गीतिवल्लरी’ देववाणी परिषद्, दिल्ली से प्रकाशित हैं।

केशवचन्द्र दाश

बहुमुखी प्रतिभा के धनी युवा कवि श्री केशवचन्द्र का जन्म ६ मार्च १६५५ ई. को उड़ीसा में हाटसांह ग्राम (जिला-कटक) में हुआ। इन्होंने आधुनिक तथा पारम्परिक दोनों विधियों से संस्कृत विद्या का गहन अध्ययन किया तथा दर्शन और विशेषतः भाषाशास्त्र एवं नव्यन्याय में विशेषज्ञता प्राप्त की। संप्रति ये श्रीजगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय में नव्यन्याय विभाग में अध्यक्ष हैं। 5- कवि केशवचन्द्र की अब तक ३० से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें अधिकांश संस्कृतकाव्य मौलिक हैं। संस्कृत में कई मौलिक उपन्यास, कहानीसंग्रह, बालोपयोगी उपन्यास या कथासंग्रह लिखे तथा प्रकाशित कराये हैं। इन्हें अनेक अवसरों पर राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अलका (१९८६), हृदयेश्वरी (१६८१ ई.), महातीर्थम् (१६८२ ई.) भिन्नपुलिनम् (१६८३ ई.) इनकी मुक्तक रचनाओं के पुस्तकाकार संग्रह हैं। इनकी कविताओं का नवीनतम संग्रह ‘ईशा’ (१६८१ ई.) है, जिसमें सौ कविताएँ संकलित हैं। केशवचन्द्र ने मुक्तछन्द में ही कविताएँ लिखीं हैं तथा इनके काव्य का भावबोध सर्वथा नवीन है। आधुनिक जीवन की विसंगति, परम्परा और आधुनिकता का द्वन्द्व, महानगर के जीवन का तनाव, पीछे छूट गये अकलुष पावन ग्राम जीवन की स्मृतियाँ जटिल प्रतीकों तथा बिम्बों के माध्यम से इनकी कविता उपस्थित करती है। 14- कवि ने स्वयं अपनी काव्ययात्रा को असंगति में संगति की खोज के रूप में लक्षित किया है (ईशा, भूमिका)। जीवन की रिक्तता और व्यर्थता का गहरा अनुभव केशवचन्द्र की कविताओं में अनेकत्र हैं, फिर भी वे जीवन को वरेण्य समझते हैं- ‘इच्छायाः शेषकणे, जीवनं तथापि जृम्भते’। आज की भौतिकवादी लिप्सा के जगत् में सर्जना कठिन से कठिनतर कार्य होता जा रहा है- यह कवि अनभव करता है निधिभवनस्य/अलिन्दे यथा/श्रूयते भौतिकतास्वरः/विक्षिप्तदीनतासु च/चीत्करोति/ शैलकल्पक्षुधा/कमहं श्रावयिष्यामि/प्रसूतिकाव्यथां मम ? (ईशा. पृ. ४)। (कोश-गृह के बरामदे पर भौतिकता की आवाज सुनायी देती है। पहाड़ जैसी भूख पागल दीनताओं में चीत्कार कर रही है, प्रसव की पीडा किसे मैं सुनाऊ ?) फिर भी अपने अस्तित्व का अनुभव अपने को खोने में, समष्टि में लय है, फेंकी गयी गैंद की तरह लौटने में नहीं, असीम में डूब जाने में है नाहं निक्षिप्तकन्दुकः/प्रत्यागभिष्यामि/भूतलं संस्पृश्य/परमेको मिमिलिषु:/आषाढस्य बिन्दुः। (वही. पू. १) (मैं फेंकी गयी गेंद नहीं हूँ। लौट आऊँगा। भूतल को छूकर। लेकिन, अकेली, मिलन की इच्छा वाली ! आषाढ की बूंद हूँ !) ३४८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कवि ने अपने अन्तर्जगत् के जटिल भावसंवेगों को अंकित करने के लिये सर्वथा अछूते बिम्बों या उपमानों की सृष्टि की है। देह और चेतना के पार्थक्य को निरूपित करता हुआ वह कहता है अनभिज्ञशरीरतो मम मनो विगलति यथा कश्चिद् वयस्कप्रणवः वृत्तित्यक्तब्राह्मणस्य मुखात्। (अलकां, पृ. ८) (मेरे अनभिज्ञ शरीर से मन विगलित होता है, जैसे कोई प्रौढ़ प्रणव बेरोज़गार ब्राह्मण के मुख से)। इस अन्तर्जगत् में कवि स्वयं को स्वयं से अलग करके देखता है। तब ‘सम्बोधन’ सम्भव होता है। ‘सम्बोधन’ और उससे जुड़ी हुई विशिष्ट पदावली केशवचन्द्र के काव्य में प्रयुक्त हुई है। उनकी कविता को आत्मा का आत्मा से ही आत्मालाप और स्पृहाहीन होने की स्पृहा की अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। इस अभिव्यक्ति के द्वारा कवि जिस धरातल पर पहुँचता है, वह असीम का अनुभव देता है। इस असीम को उसने ‘अलका’ भी कहा है। इस अलका तक पहुँचने के लिये वह स्वयं ही सन्देश देता है, स्वयं ही दूत भी है, स्वयं ही यात्री भी। मेघकथा न पृच्छ माम् अहं हि स्वयं दूतो मम नगरस्य अहं च स्वयं प्रभुः न कस्य किङ्करः (वही, पृ. ४६) (मेघ की वार्ता मुझसे मत पूछो। मैं स्वयं दूत अपने नगर का हूँ और मैं स्वयं स्वामी हूँ, किसी का किंकर नहीं)

  • एक अर्थ में यह नयी कविता में, नये उपमानों, भावमय बिम्बों के साथ औपनिषदिक दर्शन का पुनराविष्कार है। संसार के सारे संसरण के स्तब्ध कर देने वाले कवि के द्वारा नये संसार की सृष्टि है। कवि कहता है कि चुम्बन लेते अधर में निमज्जित होते हास्य की तरह संसार को उसने निमज्जित अवनी अवैखरी लीला-माला में निमज्जित करा लिया है, तो कदाचित् वह इस नयी सृष्टि की ओर इंगित कर रहा है, इसी स्थिति में उसे ‘त्वम्’ भासित होता है - संसारो निमज्जति स्वयं अवैखरीलीलामालिकासु हास्यं यथा चुम्बिष्यदधरे त्वमवभाससे यदा (वही, पृ.२) केशवचन्द्रने वर्तमान की विसंगतियों को अन्तर्मन की इसी उन्नत एकान्त नीरव भूमि पर खड़े होकर देखा है और उन्हें अपनी इस तटस्थ दृष्टि के आलोक में चित्रित किया है। संस्कृत के आधुनिक कवियों में ये सर्वथा भिन्न और अछूते अनुभव का साक्षात्कार भावक को देते हैं। गीतिकाव्य

महाराजदीन पाण्डेय

महाराजदीन पाण्डेय (जन्म ३०.११.१९५६ ई.) इस समय नरेन्द्रदेव महाविद्यालय, बभनान (जिला-गोण्डा), उत्तर प्रदेश में संस्कृत प्राध्यापक हैं। ये इसी जिले के महादेवा निश्चलपुरवा ग्राम के निवासी हैं। इनकी संस्कृत कविताएँ, गीतियाँ पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। ‘यौतकीयम्’ इनका रूपक है तथा ‘मौनवेधः’ (9EE9) काव्यसंग्रह प्रकाशित है। अपनी काव्य दृष्टि को स्पष्ट करते हुए भी पाण्डेय ने लिखा है पथ्यं ये कटुकं कवित्वविषयीकर्तुं यतन्तेऽधुना। यत्सत्यं कविता तदीयकविताऽन्येषां तु गल्लध्वनिः।। (जो आजकल कड़वी दवा को कवित्व का विषय बनाने का प्रयास करते हैं, ठीक उनकी कविता तो कविता है, दूसरों की कविता गले की गलगलाहट’ है।) इस प्रकार ये काव्य में तथ्यकथन और यथार्थ को महत्त्व देते हैं। तदनुसार इनकी अनेक रचनाओं में सामाजिक अन्याय और विसंगतियों पर पैने प्रहार हैं। मौनवेधः में संकलित कविताओं में ‘नमस्यास्ते गुरुम्मन्याः में ये कहते हैं पदं लीढ्वा पदं प्राप्ताः वञ्चनैः सम्पदं प्राप्ताः चाटुवचनैः पटूनामनुपदं ये सन्ततशरण्याः । (पृ. ४) (जो पद (पैर) को चाट कर पद (स्थान, ओहदा) प्राप्त कर चुके हैं, वञ्चनों से सम्पत्ति को प्राप्त कर चुके हैं और चाटुवचनों से पटु-जनों के पग-पग पर निरन्तर शरणगत हैं।) ‘धर्मनिर्मोकं दधानाः’ शीर्षक मुक्त छन्द में लिखी कविता में भी पाखण्ड की विडंबना की गयी है। श्री पाण्डेय ने वर्तमान भारत में नैतिक मूल्यों के हास, सामाजिक विषमता, शोषण और बढती हुई अमानवीयता को अपनी कविता में उद्घाटित किया है। इस दृष्टि से इनकी ‘विविक्तो वर्तमानः’ शीर्षक लंबी कविता उदाहरणीय है। अनेक गज़ल-गीतियों में वैयक्तिक वेदना और अपने अन्तर्मन के एकान्त को कवि ने मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। ‘नखरैलेखयामि निजं व्रणम् (पृ. २८), कुशलं न पृच्छ लिम्प, न लवणोदकं व्रणे (पृ. ४१) तथा ‘निशा शीतलायते’ (पृ. ४५) आदि गज़लगीतियाँ इसके उदाहरण हैं। असंस्कृत शब्दों का कहीं-कहीं खटकने वाला प्रयोग इन्होंने अपनी गीतियों में किया है, यथा करे धृत्वा लालटेनम्, ईश्वरं ढुण्ढामि’ (पृ. १७)। अपने स्थलों पर अप्रस्तुत विधान, बिम्ब या भाव उर्दूकाव्य से अनूदित करके प्रस्तुत किये गये से लगते हैं, जैसे समाधावपि क्लिश्यते चेतना मे (पृ.४८) कब्र में भी बेचैनी होने के लिये, या भग्नकाचायिता भावनोच्चीयते (पृ.१७) फूटे शीशे के बिम्ब के लिये। ३५० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास श्री पाण्डेय ने छन्द तथा विधाओं की दृष्टि से विविधता और प्रयोगशीलता का परिचय दिया है। लोकगीत, ग़ज़ल मुक्त छन्द के अलावा इन्होंने कुण्डलिया और दोहा छन्दों में भी रचनाएँ की हैं तथा संस्कृत के मात्रिक छन्दों का भी प्रयोग किया है। लोकभाषाओं से मुहावरे लेकर इन्होंने संस्कृत की पदावली को संपन्नतर बनाने का प्रयास भी किया है। इस दृष्टि से ‘रासभाः सिंहचर्माम्बरैरावृताः’ या ‘चळते मुखरीव मौखर्यम्’ (मुखरता लगाम के दहाने की तरह चलायी जा रही है) इत्यादि पंक्तियाँ आकर्षित करती हैं।