०१ उन्नीसवीं शताब्दी का संस्कृत गीतिकाव्य

उन्नीसवीं शताब्दी में संस्कृत में गीतिकाव्य के -स्फुट पद्य, रागकाव्य, सन्देशकाव्य, प्रशस्ति आदि विभिन्न प्रकारों में प्रचुर मात्रा में रचनाएँ प्रस्तुत की जाती रहीं। इस रचनाक्रम में पूर्ववर्ती संस्कृतकाव्य परंपरा का सहज सातत्य भी है, तथा किंचित् प्रस्थानभेद भी। यह प्रस्थानभेद समग्र भारत में इस शताब्दी में बदली हुई परिस्थितियों के कारण है। यहाँ सर्वप्रथम उन्नीसवीं शताब्दी के संस्कृत गीतिकाव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों पर विचार प्रस्तुत है, और उसके पश्चात् इस काल के प्रमुख कवियों का परिचय दिया जा रहा है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ

राजनीतिक स्थिति का प्रभाव

राजनीतिक दृष्टि से इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही भारत का अधिकांश भाग अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया था। १८१८ ई. में पेशवाई राज्य का अंत होने पर समूचा महाराष्ट्र आंग्ल शासन की प्रभुसत्ता में आ गया। अंग्रेजों ने भारतीय जनता पर भयावह अत्याचार किये, जिसके परिणामस्वरूप १८५७ ई. में नाना साहेब पेशवा, तात्या टोपे तथा रानी लक्ष्मीबाई ने उनके विरुद्ध क्रान्ति का शंखनाद किया। सन् १८५७ की क्रान्ति का गहरा प्रभाव परवर्ती भारतीय साहित्य पर पड़ा, और संस्कृत के कवियों के मानस को भी इस घटना ने उतना ही आन्दोलित किया। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ की मुक्तक रचनाओं में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह का भाव परिलक्षित नहीं होता, क्योंकि इस युग के कवि धार्मिक आस्थाओं के कारण अंग्रेजों की प्रभुसत्ता को दैवी विधान मानते थे। उसके साथ ही छोटी-छोटी रियासतों, रजवाड़ों का पूरी तरह वर्चस्व समाप्त नहीं हुआ था, और इनके आश्रय में संस्कृत के कवि अभी भी पहले की तरह फल-फूल रहे थे। सन सत्तावन की क्रान्ति के पश्चात भारत के शासन के सूत्र महारानी विक्टोरिया ने संभाल लिये। उनकी ओर से प्रसारित घोषणापत्र में भारतीय राजाओं की पुनः प्रतिष्ठा, उनके कार्य में अनधिकृत हस्तक्षेप न करने और भारतीयों की योग्यता के अनुसार शासकीय सेवाओं में नियुक्ति देने की प्रतिश्रुति थी। अप्पाशास्त्री राशिवडेकर ने स्नृतवादिनी (१/१५) में ‘चक्रवर्तिन्याः घोषणापत्रम्’ शीर्षक से इस पत्र का स्वागत किया और इस काल के कतिपय संस्कृत कवियों ने अपने गीतिकाव्यों में आपल शासकों का गुणगान भी किया। श्रीश्वर विद्यालंकार ने प्रिंस आफ वेल्स के भारत आगमन पर “प्रिंसपञ्चाशत्” की रचना 국다 आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास की, तो महेशचन्द्र ने ‘अभिनन्दनपत्रम्" लिखा। महारानी विक्टोरिया की प्रशस्ति में रची गयी कविताओं की संख्या भी बड़ी है। १८७० ई. में महारानी विक्टोरिया के पुत्र ड्यूक आफ एडिनबरा के काशी आगमन पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के सम्पादकत्व में ‘सुमनोऽञ्जलिः नामक रचना मार्च १८७० ई. में प्रकाशित की गयी। इस काव्यसंकलन में उस काल के १५ प्रमुख पंडितों की प्रशस्तियाँ थीं। इनमें पं. राजाराम शास्त्री, पं. बालशास्त्री, ताराचरण तर्करत्न, पं. गंगाधरशास्त्री जैसे इस युग के सर्वश्रेष्ठ पंडित तथा कवि सम्मिलित थे। तथापि इस प्रशस्ति को मात्र अतिथिस्वागत का भाव ही मानना चाहिये, चाटुकारिता या राजभक्ति नहीं। इन्हीं प्रशस्तियों में शीतल प्रसाद की प्रशस्ति में देश में व्याप्त दुर्भिक्ष का भी उल्लेख है, जिससे स्पष्ट है कि संस्कृत कवि विदेशी शासकों का ध्यान देश की दुर्व्यवस्था की ओर खींचना चाहते हैं। इसी भावना से भारतेन्दु ने १८७७ ई. में ‘मानसोपायन’ प्रस्तुत किया। इस संकलन में प्रशस्तिपरकता तथा राजभक्ति का पुट है। अन्य भाषाओं की कविताओं के साथ-साथ इसमें अंग्रेजी शासकों के लिये संस्कृत प्रशस्तियाँ भी हैं, कुछ ६६ कवियों की पद्य रचनाएँ इसमें आरंभ के ३१ पृष्ठों में संकलित हैं। वस्तुतः राजभक्ति की आड़ में इन संस्कृत कवियों ने देश की दरिद्रता का कटु यथार्थ खरे शब्दों में प्रकट कर दिया है दीनानां खलु दीनकर्पटभृतां सुत्पीडितानां गृहे गत्वा सान्त्वनवारिणा द्विगुणितं दुःखं त्वदालोकनात् ।। (दैन्यपूर्ण कपड़े पहने, भूख से पीड़ित दीनजनों के घर जाकर आपने सान्त्वना का जल बरसाया, किन्तु आपको देखने से उनका दुःख दुगुना हो गया।) __यह सत्य है कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक अंग्रेज शासकों की प्रशस्ति में भी रचनाएँ लिखने की प्रवृत्ति बनी रही। इस क्रम में जुबिलिगानम् (१८८७ ई.) चक्रवर्तिविक्टोरियाविजयपत्रम् (१८६६ ई.) आङ्लाधिराजस्वागतम्, एडवर्डमहोदयाभिनन्दनम्, विक्टोरियाप्रशस्तिः, विक्टोरियाचरितसङ्ग्रहः (१८८७), विक्टोरियाप्रशस्तिः (१८६२), राजपुत्रागमनम् (१८६०) आदि रचनाएं सामने आई। सुरेन्द्रमोहन टैगोर ने प्रिंसपञ्चाशत् (१८६७) तथा विक्टोरियामहात्म्यम् (१८६८) की रचना की और कृष्णचन्द्र की प्रीतिकुसुमाञ्जलिः (१८६७ ई.) तथा सम्पत्कुमारनरसिंहाचार्य) की विक्टोरियावैभवम् (१८६६ ई.) आदि कविताएँ भी इसी काल में प्रकाशित हुईं। इनमें से अंतिम रचना को कवि ने संस्कृतचन्द्रिका में प्रकाशनार्थ भेजा था, सम्पादक अप्पा शास्त्री पक्के राष्ट्रवादी थे। उन्हें कवि की प्रशस्तिपरकता अच्छी न लगी और उन्होंने उस कविता को बहुत दिनों तक रोके रखा। १. विवरण के लिये देखिये : संस्कृत का समाजशास्त्र : हीरालाल शुक्ल, पृ. ६४ २. वहीं, पृ. ८६ ३. वही, पृ. ७ गीतिकाव्य २३६ अन्त में कवि के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने पत्रिका (७/८) में उसे प्रकाशित तो किया, पर उसके साथ विदेशी शासकों की चाटुकारिता में काव्यरचना करने वाले कवियों का अधिक्षेप भी इसी कविता के अंत में संपादकीय टिप्पणी के रूप में प्रकाशित किया। साथ ही यह तथ्य भी ध्यातव्य है कि अंग्रेज शासकों के लिये प्रशस्ति के रूप में लिखी गयी रचनाओं में भी परोक्ष रूप से राष्ट्र-भावना संक्रान्त थी। यह युग ही ऐसा था कि राष्ट्र के गौरव तथा उसके भौगोलिक स्वरूप को लेकर संस्कृत कवि का सचेत होना स्वाभाविक था। ‘विक्टोरियाष्टकम्’ नामक रचना में भारतीय वसुन्धरा की सुषमा तथा भारतजननी का भी गुण-गान कवि ने साथ में किया है उत्तुड्गो हिमभूधरो भवति यत्सीमा हयुदीच्यां दिशि नीलाम्बुः परिशोभते च सततं सव्येऽपसव्ये ऽधवा। सेयं भारतभूः सुशीतसलिला शस्यैः फलैः श्यामला मातस्तेऽभयदे पदे प्रकुरुते सानन्दसेवाञ्जलिम्।। (हे माता, उत्तर दिशा में उन्नत हिमालय जिसकी सीमा है, अथवा जिसके दोनों ओर समुद्र निरन्तर शोभित है, सुशीतल जल वाली तथा सस्यों और फलों से श्यामायमान वह यह भारत-मही तुम्हारे अभय दान देने वाले पद-तल में आनन्दपूर्वक सेवाञ्चलि अर्पित करती है। धीरे-धीरे संस्कृत कवि की समाज-चेतना प्रखर होती है और वह अंग्रेजों के शोषणतन्त्र को पहचान कर अपनी कविताओं में उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्थ का संस्कृत गीतिकाव्य वस्तुतः राष्ट्रीय चेतना और जनजागृति का काव्य है। ‘संस्कृतचन्द्रिका’, ‘सूनृतवादिनी’, ‘पण्डित’ तथा ‘विज्ञानचिन्तामणि’ जैसी पत्रिकाओं की संस्कृत काव्य की इस नवीन प्रवृत्ति के संवर्धन में महती भूमिका रही। अन्नदाचरण, अप्पाशास्त्री आदि कवियों के संस्कृत काव्य में इस काल में स्वतन्त्रता की भावना का सुस्पष्ट प्रतिफलन हुआ।

सामाजिक चेतना

उन्नीसवीं शताब्दी भारतीय इतिहास में पुर्नजागरण का काल भी है। इस काल में राजा राममोहन राय, तिलक, अरविंद, महादेव गोविन्द रानाडे, महात्मा गाँधी आदि विभूतियों ने जन्म लिया और विदेशी सत्ता से देश को स्वतन्त्र कराने के साथ-साथ भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों, विषमता, शोषण और पाखंड को दूर करने के लिये भी इन महापुरुषों ने अभियान छेड़ा। इन स्थितियों का प्रभाव संस्कृत कवियों पर भी पड़ा है। ‘विज्ञानचिन्तामणि’ पत्रिका के संपादकों और लेखकों ने विधवा-विवाह का समर्थन किया तथा कन्या-विक्रय का विरोध किया। दादोबा पांडुरंग ने ‘विधवाश्रुमार्जनम्’

  1. विवरण के लिये संस्कृत का समाजशास्त्र, पृ. ६७ २४० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास नामक पुस्तक का प्रणयन किया। महावीरप्रसाद द्विवेदी तथा भारतेन्दु जैसे रचनाकारों ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संस्कृत में कविताएँ लिखीं।

वैविध्य तथा काव्यसमृद्धि

उन्नीसवीं शताब्दी के संस्कृत गीतिकाव्य का वैशिष्ट्य उसमें नयी प्रवृत्तियों तथा नवीन चेतना के साथ नयी विधाओं का अवतरण भी माना जा सकता है। पारंपरिक विषयों तथा पारंपरिक विधाओं में रचना निर्बाध रूप से चलती रही। समस्यापूर्ति, अन्योक्ति तथा श्लेष-काव्यों की रचना इस काल में प्रचुर मात्रा में हुई। कुछ समस्यापूर्तिकाव्य तो ऐसे थे जो पण्डितसमाज में कण्ठहार बन गये। उदाहरण के लिये श्रीरामशास्त्री भागवताचार्य (१८५६-१६१३ ई.) की समस्यापूर्ति ‘पिपीलिका चुम्बति चन्द्रबिम्बम्’ या इन्हीं की ‘मशकगलकरन्ने हस्तियूथं प्रविष्टम्" कल्पनाओं की उड़ान और मनोरंजन विषयवस्तु के कारण लोकप्रिय हुई और आने वाले रचनाकारों ने भी इन पंक्तियों पर नये-नये पद्य रचे। श्लेषकाव्यों में अमरमङ्गलम् नाटक तथा पार्थाश्वमेघमहाकाव्य के प्रणेता प्रसिद्ध तार्किक विद्वान् पञ्चानन तर्करत्न का ‘सर्चमड्गलोदयम्’ उल्लेखनीय है। शृङ्गारप्रधान या ऋतुवर्णनपरक गीतिकाव्य इस काल में बहुत अधिक लिखे गये, जिनमें विधुशेखर भट्टाचार्य का ‘यौवनविलास’ ताराचरण तर्करत्न का ‘काननशतकम्’ हैं। प्रमथनाथ का ‘वसन्ताष्टकम्’, अन्नदाचरण का ‘ऋतुचित्रम्’, कृष्णभट्ट की ‘मुक्तकमुक्तावली’, राजराजवर्मा की ‘विटविभावरी’, परमानन्द शर्मा की ‘शृङ्गारसप्तशती’ आदि महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं। इसी प्रकार दूतकाव्यों की सुदीर्घ प्राचीन परंपरा का सातत्य भी उन्नीसवीं शताब्दी में उसी तरह अव्याहत बना रहा। त्रिलोचन शर्मा (१८०६ ई.) का ‘तुलसीदूतम्’ कृष्ण के मथुरा चले जाने पर व्रज की ललनाओं के व्याकुल मनोभावों का चित्रण प्रस्तुत करता है, इसमें गोपियाँ तुलसी को दूती बना कर कृष्ण के पास भेजती हैं। राजवल्लभ मिश्च (१८३० ई.) का ‘उद्धवदूत’ भी इसी प्रकार का काव्य है। इसी शृंखला में कृष्णनाथ न्यायपञ्चानन ने ‘वातदूत’ तथा गौरगोपाल ने ‘काकदूत’ की रचना की। अजितनाथ (१८८६ ई.) ने ‘वकदूतम्’ रच डाला, तो हरिहर ने ‘कोकिलदूतम्’ (१८५५ ई.) प्रस्तुत किया और रामगोपाल ने ‘कीरदूतम्’। अनेक अन्य दूतकाव्यों का उल्लेख इसी अध्याय में कविपरिचय के प्रसंग में किया जा रहा है। इसी प्रकार स्तोत्रकाव्यों की रचना भी विपुल मात्रा में उन्नीसवीं शती के संस्कृत साहित्य में हुई। रामप्रसाद का रमास्तवः (१८२० ई.) केशवसूर (१८१३-६३ ई.) का केशवस्तोत्र आदि के अतिरिक्त अन्य स्तोत्रकाव्यों का विवरण कविपरिचय के साथ दिया जा रहा है। इनके अतिरिक्त दुःखभजनकृत ‘दुःखभजनस्तोत्रम्’, रामसहाय शर्मा के। ‘परमेश्वरशतकम्’ तथा ‘मातृपितृस्तोत्रम्’ भी उल्लेखनीय हैं। गीतगोविन्द की परंपरा में रागकाव्यों की रचना भी इस काल में हुई। इनमें रामङ्मा कुलशेखर के ‘कुचेलोपाख्यानम्’ तथा ‘अजामिलोपाख्यानम्’ तथा राजा विश्वनाथ सिंह का ‘सङ्गीतरघुनन्दन’ रागकाव्यपरम्परा में महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं। भक्तिभावना, समर्पण तथा गीतिकाव्य सरस कथानिर्वाह के साथ सरल भाषा और ललित शैली के विन्यास के कारण ये तीनों रागकाव्य प्रभावित करते हैं। कुचेलोपाख्यानम् में लघुपदों की योजना के मनोभावों के क्षिप्र उतार-चढ़ाव को व्यंजित करने वाला यह गीत देखिये जलधिसुतारमणेन हि सोऽहं सरससमालिङ्गनतो निस्सन्देहम्। यदि खलु याच्या रचिता हि मया । दास्यति भगवान् सकलं दयया। सरसिजनाथ हरे बहुतान्तां किन्तु वदामि गतौ मम कान्ताम् ।। सङ्गीतरघुनन्दनम् पर जयदेव का प्रभाव अधिक है। वसन्त का वर्णन यहाँ भी उसी पदावली में किया गया है, जो गीतगोविन्द की विशेषता है विहरति रघुपतिरिह ऋतुराजे। किसलयकुसुमसमाकुलतरुकुलकोकिलकीरसमाजे। विकसितमञ्जुलवजुलपुजनिकुञ्जमहोज्ज्वलभासे। विकसितसारससङ्कुलखगकुलसरसीसरसोल्लासे। तरलतरङ्गतरुणलतिकाततिलीलासुखदसमीरे।। तरुपरिरम्भणवलितलतावलिवनविकलीकृतधीरे।

नयी विधाएँ

उपर्युक्त पारंपरिक काव्यविधाओं के साथ नवीन विधाओं में भी रचनाएँ उन्नीसवीं शताब्दी के संस्कृत साहित्य में सामने आने लगीं। गीतिकाव्य के क्षेत्र में शोकगीत, अवगीति या व्यंग्यप्रधान पद्यरचना तथा राष्ट्रभावना से युक्त गीतिकाव्यों का निर्माण नवीन प्रवृत्तियों का परिचायक है। यद्यपि करुणरसप्रधान प्रसंग संस्कृतमहाकाव्यों में भी अनेक आते हैं, पर स्वतन्त्ररूप से विलाप-काव्य या शोकगीति का प्रचलन अंग्रेजी साहित्य में ‘इलेजी’ नामक विधा का प्रभाव कहा जा सकता है। उन्नीसवीं शताब्दी की संस्कृत काव्य रचनाओं में अनेक शोकगीतिकाव्य भी हैं, यथा-करुणात्रिंशिका, विलापलहरी, शोकोच्छ्वासः, अश्रुविसर्जनम् आदि। इनके रचनाकारों का परिचय आगे दिया जा रहा है। अवगीति या व्यंग्यप्रधान (सोत्प्रास) गीतिकाव्य की परंपरा का भी नवोन्मेष उन्नीसवीं शती के संस्कृत साहित्य में हुआ। इससे पाश्चात्त्य साहित्य में ‘सेटायर’ की अवधारणा के समकक्ष चेतना, युग की विसंगतियों के उद्घाटन और उन पर प्रहार के लिये संस्कृत कवि तत्पर हुआ। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की ‘समाचारपत्रसम्पादकस्तवः’, ‘सूर्यग्रहणम् आदि संस्कृत कविताएँ, जिनका विवरण आगे दिया जा रहा है, इस प्रकार की कविता हैं। इनमें संस्कृत कवि का साहस मुखरित है। २४२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इसी प्रकार राजनीतिक चेतना के साथ-साथ राष्ट्र के भवितव्य और अस्मिता की पहचान के लिये भी इस काल में संस्कृत कवि विशेष रूप में अभिव्यक्तिप्रवण बना। ‘भारतविलापः (हरिपद वन्द्योपाध्याय) देव्या गानम् (गोलोकनाथ) आदि कविताओं में समूचे राष्ट्र के प्रति कवि का चिन्ताभाव प्रकट हुआ है।

पुनरुत्थानवादी स्वर

वर्तमान की विसंगतियों, पाश्चात्त्य सभ्यता के दुष्प्रभाव तथा विदेशी शासकों द्वारा प्रचारित इस देश की संस्कृति के विरुद्ध प्रामक दुष्प्रचार के कारण अनेक संस्कृत कवियों ने अतीत का गौरवगान किया, तथा वर्तमान की तुलना में उसकी उज्ज्वलता और भव्यता को स्पृहणीय रूप में चित्रित किया। श्रीनिवास दीक्षित अपने ‘कलिपरिदेवनशतकम्’ में कहते हैं मातः श्रुते स्विदिह जीवसि धर्मशास्त्र भ्रातः क्व पर्यटसि मित्र इतिहास। कि क्यापि गौरवमुपैषि गुरो पुराण वेदान्त हा जनक का नु गतिस्तवासीत् ।। (संस्कृत चन्द्रिका ७/१ में प्रकाशित काव्य से) अन्नदाचरण तर्करत्न की दीर्घ कविता ‘तदतीतमेव’ तो भारत के प्राचीन इतिहास का भावविह्वल गुणगान ही है। इस कविता की तुलना हम हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त द्वारा कुछ काल पश्चात् लिखी गयी ‘भारतगीतिका’ नामक काव्यकृति से कर सकते हैं, जिसे राष्ट्रभावना का शंखघोष माना गया था। भारतवासियों को अपने अतीत का बोध वर्तमान में उन आदर्शों और जीवनमूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा कराने के लिये दिया गया है, जो प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने स्थापित किये यदा त्रिकालेक्षणशक्तिमन्तो ज्योतिर्विदो ज्योतिरनन्तदीप्त्या। निरूपयन्ति स्म गतिं ग्रहाणां स्थितिं च तां तां तदतीतमेव ।। यदा कवीनां रसभावपूर्णोत्कण्ठादनन्तानि रसावशानि। पद्यानि निःसृत्य सहस्रवक्त्रे दिदीपिरे हा तदतीतमेव।। अनन्तभक्ताः समनन्तनादैरनन्तगीतैः समनन्तभोग्यैः। यदार्चयन् जन्मधरां समष्ट्या गरीयसी हा तदतीतमेव।। हा वैदिकानां लयतानशुद्धसामादिगीतैरतिविस्मितः सन्। विदग्धसार्थोऽपि च भारतेऽस्मिन् प्रीतिं नवामाप यदा गतं तत् ।। (जब तीनों कालों, भूत-भविष्य-वर्तमान को देखने की सामर्थ्य वाले ज्योतिष विद्वान् लोग ज्योतिष विषय की अनन्त दीप्ति से ग्रहों की उस-उस गति और स्थिति का निरूपण किया करते थे, वह सब बीत गया ! जब कवियों के रस-भाव से भरे कण्ठ से अनन्त २४३ गीतिकाव्य रस-भरे पद्य निकलकर हज़ारों के मुखों में शोभित होते थे, हाय, वह बीत गया। जब अनन्त नादों, अनन्तगीतों तथा अनन्त भोग्य पदार्थों से मिल-जुल कर अनन्त भक्तगण गरीयसी जन्म-भूमि की अर्चना करते थे, हाय वह बीत गया ! जब इस भारत में विदग्धजनों का समूह वैदिक विद्वानों के लय-ताल से शुद्ध साम आदि के गानों से अतिविस्मित होकर अतिशय आनन्द का अनुभव करता था, हाय, वह बीत गया।)

व्यक्तिवाद तथा आत्माभिव्यक्ति

प्राचीन संस्कृत काव्य-परंपरा की तुलना में उन्नीसवीं शती के संस्कृत काव्य में कवि की वैयक्तिक भावनाओं की अभिव्यक्ति या वस्तुनिष्ठ प्रबन्धात्मकता के स्थान पर विषयिनिष्ठ रागात्मकता का उदय देखा जा सकता है। यद्यपि संस्कृत मुक्तककाव्य परंपरा में भर्तृहरि आदि कवियों के पद्यों में भी आत्माभिव्यक्ति तथा कवि का स्वयं का अनुभव व्यक्त हुआ है पर प्रस्तुत काल के गीतिकाव्यों में वैयक्तिकता का स्वर अधिक मुखर तथा प्रत्यक्ष अनुभूत होता है। अन्नदाचरण की ‘क्व गच्छामि’ तथा अप्पाशास्त्री की ‘तिलकमहाशयस्य कारागृहवासः’ जैसी कविताएँ इसका उदाहरण हैं, जिनमें कवि नितान्त निजी अनुभवसंसार को खोलता है। सामाजिक विडम्बनाओं के कारण विचलित कवि ‘क्व गच्छामि’ में अपनी आन्तरिक व्यथा को विशद अभिव्यक्ति देता है दशन्ति तिग्मं हृदयं विवेक सर्पा दशन्त्यत्र सुदीर्घकालम्। व्यथाकुलो भेषजमत्र नेक्षे हरे क्य गच्छामि बत क्व शान्तिः।।

समाजसमीक्षा

प्रस्तुत काल के संस्कृत गीतिकाव्यकारों ने अपने समय के समाज और उसकी प्रवृत्तियों, दुष्प्रवृत्तियों को पहचाना है और उन पर अपनी काव्यात्मक प्रतिक्रिया दी है। इसके पूर्व की संस्कृत कविता में समाज को ले कर कवि की इतनी गहरी चिन्ता तथा सामाजिक स्थितियों से सीधे इस रूप में साक्षात्कार की प्रवृत्ति इतनी उदग्र नहीं है। नवीन शिक्षापद्धति, पाश्चात्त्य सभ्यता के प्रभाव से नागर समाज में व्याप्त होने वाली दुष्प्रवृत्तियों पर इस काल के कवियों ने अपना विशेष विरोध प्रकट किया है। भारतीय नागरिकों के आचार, विचार, वेश-भूषा और दिनचर्या में आये परिवर्तनों को परिलक्षित करते हुए ‘कलिपरिदेवनशतकम्’ में कवि श्रीनिवास शास्त्री कहते हैं सूर्योदये क्वचितबीजकषायपानं धौतं च सार्वदिककञ्चुकमेकवासः। शौचं च सान्थ्यमपि नो शिवकर्म तेषां म्लेच्छैः सहाटनमथानियमा च जग्धिः।। (संस्कृत चन्द्रिका ७-१-१६००) (उनको सूर्य के उदित होने पर “काफी” (खौले बीज) के कसैले रस का पान, सदैव२४४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास लुंगी और घोती का धारण, सन्ध्याकालीन भी शौच का आचरण न करना, मलिन जनों के साथ भ्रमण और भोजन-यह दिनचर्या है।) समाज में सब और व्याप्त अशान्ति और अव्यवस्था को लेकर खिन्न होकर ‘क्व गच्छामि’ कविता में अन्नदाचरण कहते हैं कामः प्रमादो बलवान् प्रमादः शेषाभिमानो विषमा च हिंसा। क्रामन्ति किं नो सततं समन्ताद् घरे क्व गच्छामि बत क्व शान्तिः।। (कामजन्य प्रमाद बलवान प्रमाद है, अभिमान तथा विषम हिंसा-यह सब ओर निरन्तर फैल रहे हैं, हे भगवान्, कहा जाऊँ, कहा शान्ति है ?)

शास्त्रकाव्य

विचारप्रधान शास्त्रकाव्य की परंपरा प्राचीन काल से संस्कृत साहित्य में चली आ रही है। उन्नीसवीं शती तो वैचारिक आलोडन और उथल-पुथल का युग था। अतः यह स्वाभाविक था कि कविता में विचारों की प्रधानता हो तथा युग के तर्कों, विवादों और संशयों के साथ-साथ कवि अपनी परंपरा में निहित विवेक का भी काव्य में उपस्थापन करें। उन्नीसवीं शताब्दी के संस्कृत काव्य की एक विशेषता यह भी है कि काशी तथा अन्य विश्वकेन्द्रों में रहने वाले इस युग के दिग्गज शास्त्रज्ञ पण्डितों ने प्रचुर मात्रा में संस्कृत में काव्य रचनाएँ की। स्वाभावतः ही ऐसी रचनाओं में शास्त्रज्ञान, पाण्डित्य तथा चिन्तन के स्वर प्रमुख हैं। पं. गंगाधर शास्त्री का ‘अलिविलासिसंलापः’ इस दृष्टि से एक उल्लेखनीय काव्य है। पं. शिवकुमार शास्त्री के ‘यतीन्द्रजीवनचरितम्’ काव्य में भी शास्त्रचर्चा और विचारविमर्श के प्रसंग बहुसंख्य हैं। नैतिक उपदेश की दृष्टि से श्री धीरेश्वर की ‘विद्यामञ्जरी’ इस काल में लिखी गयी रचना है। उन्नीसवीं शताब्दी में जिन कवियों का कृतित्व सामने आया, उनमें से महत्त्वपूर्ण कवियों का परिचय यहाँ प्रस्तुत है

लल्ला दीक्षित

लल्ला दीक्षित का जन्म-समय इदमित्थन्तया ज्ञात नहीं है, पर इनकी रचना ‘आनन्दमन्दिरस्तोत्र’ की पुष्पिका में इस काव्य का रचनाकाल १८५६ वि. सं. या १८०२ ई. बताया गया है, जिससे अनुमान किया जा सकता है कि ये अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुए होंगे और उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्थ में विद्यमान थे। इनके पितामह काशी के महाराष्ट्रभारद्वाज कुल में उत्पन्न श्री शंकर दीक्षित थे और पिता लक्ष्मण दीक्षित। आनन्दमन्दिरस्तोत्र इनका स्तुतिकाव्य है, जिसमें भवानी की १०३ पद्यों में स्तुति की गयी है।

श्रीधरन् नम्बी

श्रीधरन नम्बी पट्टाम्बि के पुन्नश्शेरी स्थान के निवासी थे। इनका समय सन् १७७४ ई. से १८३० ई. तक है। स्वयं प्रस्तुत परिचय के अनुसार ये जमोरियन गीतिकाव्य के मन्त्रियों और जमोरियन राज्य के प्रबन्धकर्ताओं के परिवार से संबद्ध थे। भारत पिशरोटी इनके गुरु थे। इनके प्रपौत्र नीलकण्ठ शर्मा संस्कृत के प्रख्यात पण्डित हैं। श्रीधरन के लिखे दो काव्य प्राप्त होते हैं - “विक्रमादित्यचरितम्’ (पॉच सों में राजा विक्रमादित्य की कथा) तथा ‘नीलकण्ठसन्देश’ । नीकण्ठसन्देश में १२६ पद्यों में इण्णवूयर के राजा चेरी पुन्नश्शेरी को कोकिल के द्वारा प्रेमसन्देश प्रेषित है।

विश्वनाथसिंह

विश्वनाथसिंह रीवाराज्य के महाराजा तथा हिन्दी और संस्कृत के प्रख्यात रचनाकार हैं। इनके पिता राजा जयसिंह (१९०९-१६१३ वि. सं.) थे। विश्वनाथसिंह का जन्म सन् १७८६ ई. में हुआ तथा इन्होंने सन् १८३३ ई. से १८५४ ई. तक शासन किया। सन् १८५४ ई.में इनका निधन हुआ। विश्वनाथसिंह का उनके पराक्रम, प्रजाप्रेम, विद्वतिप्रयता तथा साहित्य और कलाओं के प्रति उनके अनुराग के कारण आज भी आदर से स्मरण किया जाता है। ये धार्मिक प्रवृत्ति के राजा थे और राममन्त्र में दीक्षित हुए थे। इनके संस्कृत ग्रन्थ इस प्रकार हैं - दर्शनिक या भक्तिपरक ग्रन्थ-सर्वसिद्धान्तम्, रामरहस्य, राममन्त्रार्थनिर्णय तथा रामपरत्वम् । टीकाग्रन्थ-अध्यात्मरामायण, श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भागवततिलक, रामगीता, भक्तिरसामृतसिन्धु, सङ्गीतरघुनन्दन, रामचन्द्राह्निक, वासुदेवसहस्रनाम आदि पर टीकाएँ। काव्य-सङ्गीतरघुनन्दनम् । चम्पू-रामचन्द्रानिक । नाटक-आनन्दरघुनन्दनम्। सङ्गीतरघुनन्दन रागकाव्य परम्परा की एक उल्लेख्य कृति है। यद्यपि चम्पूशैली का आश्रय लेते हुए कवि ने इसमें बीच-बीच में गद्य का भी सन्निवेश किया है, पर प्रमुखता विभिन्न रागों में गाये जाने वाले गीतों की ही है, और जयदेव के गीतगोविन्द का इस पर सुस्पष्ट प्रभाव है।

सदाशिव

सदाशिव कवि केरल में १८०० ई. में उत्पन्न हुए थे। इनके पिता ऋषिकुल परिवार के नम्बुदरि ब्राह्मण थे, जिनका नाम कुन्नीकुटि तम्पूरन था। सदाशिव कवि गोदवर्मन् युवराज के नाम से भी जाने जाते हैं तथा इन्हें कविसार्वभौम की उपाधि दी गयी थी। इनके रचे हुए कम से कम चौदह ग्रन्थ ज्ञात होते हैं, जिनमें महेन्द्रविजय तथा रामचरित-ये दो महाकाव्य, त्रिपुरदहनचरित, श्रीपादसप्तकस्तोत्र, सुधानन्दलहरीस्तोत्र, मुररिपुस्तोत्र, देवदेवेश्वराष्टक, सदाशिवप्रकरण आदि खण्डकाव्य या स्तोत्र हैं। रससदन नामक भाण भी इनका लिखा प्रकाशित है, तथा अन्य अनेक ग्रन्थ इनके ज्योतिषशास्त्र विषयक हैं। सुधानन्दलहरी गङ्गालहरी से प्रभावित रचना है, जिसमें ३५ पद्यों में गङ्गा के सौन्दर्य का वर्णन और उसके प्रति कवि का भक्तिभाव प्रकट किया गया है। श्रीपादसप्तकस्तोत्र में रमादेवी की स्तुति है, जो कोटिलिंगपुर में काली के नाम से विख्यात हैं। देवदेवेश्वराष्टकम् में शिव की, मुररिपुस्तोत्र में कृष्ण की, त्रिपुरदहनचरितम् में शिव की महिमा का गान कवि ने किया है। सदाशिवप्रकरण में स्फुट श्लोक हैं, जिनमें प्रकृति चित्रण, दुर्गास्तुति, राम की २४६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास स्तुति, राजपुत्रवर्णन, शृंगार आदि विषय हैं। सदाशिव की एक अन्य रचना ‘हेत्वाभासोदाहरणश्लोकाः’ काव्य में दर्शन का मनोरंजक समन्वय प्रस्तुत करती है। इसमें राधाकृष्ण, सीताराम, रामलक्ष्मण के बीच हास्यपूर्ण रोचक संवाद हैं। सदाशिव कवि की रचनाओं में भक्तिभाव की प्रधानता है। त्रिपुरदलनचरितम् में रौद्ररस का भी अंग के रूप में अच्छा परिपाक है। उदाहरणार्थ मुनिवरमुखादाकर्ण्य त्वं पुरत्रयचेष्टितं झटिति घटितक्रोधादुच्चस्तरामुदजृम्भथाः। धणघणरणद्घण्टोत्कण्ठं महोक्षमधिष्ठितः सरभसमवारुक्षो रूक्षाकृतिः स्फटिकाचलात् । (७) (मुनिश्रेष्ठ के मुख से त्रिपुरासुर के व्यवहार की बात सुन कर रूक्ष आकृतिवाले तुमने उत्पन्न प्रबल क्रोध के कारण शीघ्र जम्माई ली, घण-घण रणन करती घंटा वाले उत्कण्ठ नन्दी पर सवार होकर कैलास से वेग के साथ नीचे उतरे।)

तारानाथ तर्कवाचस्पति

तारानाथ के पितामह बंगाल के वैचण्णी ग्राम में निवास करते थे। उनके दुर्गादास तथा कालिदास नामक दो पुत्र हुए, जिनमें द्वितीय कालिदास तारानाथ के पिता थे। तारानाथ का जन्म १८१२ ई. में हुआ। ये बाल्यकाल से ही बड़े विलक्षण बुद्धि के थे तथा अल्पकाल में ही विभिन्न शास्त्रों का इन्होंने अच्छा अभ्यास कर लिया। १८३५ ई. में इन्हें तर्कवाचस्पति की उपाधि प्राप्त हुई। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के परामर्श से १८४४ ई. में इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्राध्यापक का पद स्वीकार किया। मुद्रण की सुविधा के अभाव में स्वयं ग्रन्थ लिख-लिख कर छात्रों को देना, अवैतनिक अध्यापन तथा संस्कृत विद्यालय की स्थापना आदि अनेक प्रशस्त कार्य इन्होंने निःस्वार्थ सेवाभाव से किये। १८८५ ई. से काशी से आ कर वहां अध्यापन करते रहे। इनके पुत्र जीवानन्द भी इन्हीं की भाँति लेखक, समाजसेवी तथा टीकाकार के रूप में प्रख्यात हैं। Vवाचस्पत्यम्’ तथा ‘शब्दस्तोममहानिधि’ तारानाथ के विशाल कोशग्रन्थ हैं। राजप्रशस्तिः इनकी ७५ पद्यों में प्रशस्तिपरक काव्य रचना है, जिसे इन्होंने ड्यूक आफ एडिनबरा के भारत में आगमन के अवसर पर लिखा था। कवि तारानाथ ने इसमें राजा में सद्बुद्धि के समुदाय और प्रजा के कल्याण की कामना व्यक्त ही है क्लेशजन्मपरिहीण ईश्वरो वासनारहित एष भूपते। कर्मपाकपरिमुक्त आदितश्चेतसि प्रणिहितः सदाऽस्तु ते।। (१२) (हे राजन्, यह ईश्वर सदा आपके चित्त में सन्निविष्ट हो, जो क्लेश तथा जन्म से परिहीण, वासना से रहित और आरम्भ से ही कर्म के फल से परिमुक्त है।)

बाबू रेवाराम

बाबू रेवाराम छत्तीसगढ़ के निवासी थे। इनका जन्मकाल इदमित्वम् २४७ गीतिकाव्य रूप से ज्ञात नहीं है। अनुमानतः इनका जन्म वर्ष सन् १८१४ ई. है। इनके प्रपितामह महन्तराय, पितामह शिवसिंह, पिता जगतराय तथा माता सीता थीं। ये जाति के कायस्थ थे। इनके पूर्वज हैहयवंशीय राजाओं के दीवान रहे। अत्यन्त प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेकर भी इनको संर्घषमय जीवन बिताना पड़ा। आय के लिये ये पुस्तक रचना पर आलम्बित रहे या स्वतन्त्र रूप से संस्कृत का अध्यापन भी करते रहे। इनके पण्डित्य तथा रचनाकौशल की प्रशंसा उस समय भी दूर-दूर तक फैल चुकी थी। रीवानरेश ने इनको अपने दरबार में हाथी भेज कर आमंत्रित किया, पर स्वाभिमानवश ये अपना स्थान छोड़ नहीं गये। सन् १८७३ के लगभग दारिद्र्य और कष्टमय जीवन के साथ इनका देहावसान हो गया। इनका निवास रत्नपुर में था, यहाँ अब इनका कोई वंशज या परिवार का घर नहीं है, तथापि रत्नपुर और उसके आसपास इनके विषय में अनेक किंबदन्तियाँ और अनुश्रुतियाँ प्रचलित हैं, जिनसे इनके सन्त व्यक्तित्व और औदात्य का अनुमान होता है।। इनके लिखे हुए तेरह ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं-साररामायणदीपिका, ब्राह्मणस्तोत्र, गीतमाधवकाव्य, नर्मदालहरी तथा गंगालहरी-ये पाँव इनमें से संस्कृत काव्य हैं तथा रामाश्वमेध, विक्रमविलास आदि शेष हिन्दी के काव्य हैं। साररामायणदीपिका में बाबू रेवाराम ने रामायण का सार १०८ श्लोकों में निबद्ध किया है। श्लोकों की भाषा सधुक्कड़ी है, पूरी तरह परिष्कृत संस्कृत नहीं है। शेष तीन काव्य स्तोत्र हैं, तथा गीतमाधव काव्य जयदेव के गीतगोविन्द की शैली पर लिखा गया रागकाव्य है। जयदेव की भाषाशैली का सफल अनुकरण इस काव्य में रेवाराम जी ने किया है तथा राधाकृष्ण के प्रति अपने भक्तिभाव के साथ श्रृंगार की भी अभिव्यक्ति दी है। प्रसाद और लालित्य का मणिकांचन-योग मोहक है। उदाहरण के लिये माधव हे, तिष्ठति राधा केलिगृहे। भवदवलोकनसचकितनयना पुनरनुतळ रचितसमशयना।। (हे माधव, राधा केलिवन में विद्यमान है, जिसकी आँखें आप के अवलोकन से साश्चर्य हैं, आपकी कल्पना करके जो बारबार शयन रचा करती है)। बीच-बीच में मात्रिक छन्दों के विनियोग से कथा को आगे बढ़ाया गया है। अष्टपदियों या गीतियों के साथ सर्वत्र गेय राग का निर्देश किया गया है। संभव है, बाबू रेवाराम अपने इस काव्य का स्वयं गायन करते हों, क्योंकि उनकी संगीतकर्मकता विश्रुत है। १. छत्तीसगढ़ के संस्कृत कवि वायूरेवाराम के काव्यग्रन्थों का अनुशीलन : रायपुर विश्वविद्यालय का शोधप्रबन्ध (अप्रकाशित) पृ. ६०-६४। २४८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सा जिस प्रकार गीतमाधव जयदेव के काव्य की सफल अनुकृति है, उसी प्रकार बाबू रेवाराम की गंगालहरी पण्डितराज के लहरीकाव्य की स्मृति कराती है। भाव और भक्ति की गहनता रेवारामजी की रचना में पण्डितराज की गगालहरी के समान ही है। शिखरिणी छन्द में लालित्य, मसृणता और सानुप्रास पदावली में गंगा के प्रवाह को कवि ने बाँधा है हरेः पादाम्भोजप्रचुरसुषमाशालिसलिलम् जटाजूटाटव्याश्रमरमणशीलं पुररिपोः। सुराणां पीयूषं कतिभुवनभूषं जननि यत् त्वदीयं मे तोयं परिहरतु पापं सुखमयम् ।। (हे माता गंगे, तुम्हारा जल मेरे ताप तथा पाप को हर ले, जो विष्णु के चरण-कमलों में अधिक शोभित है, जो पुरारि शिव के जटाजूट की अटवीं के आश्रम में रमण करने की प्रवृत्ति वाला है, देवताओं का अमृत, अनेक मुवनों की शोभा तथा सुखमय है।) दैन्य, समर्पण तथा भक्ति की पराकाष्ठा इस काव्य में देखने को मिलती है। एक और उदाहरण देखिये अनाथं स्नेहाहं परिलसितसौहार्दसलिले भुवो हारेऽपारोधुरविपुलधारेऽब्धिमहिले। मरुधेनुक्षीरोल्लसितदरकुन्देन्दुरुचिरं तरङ्ग ते तुङ्गं हरतु मम गङ्गे कलिमलम् ।। (अनाथ तथा स्नेहाहं जन के प्रति सौहार्द से युक्त जल वाली, पृथ्वी की हार अपार एवं विकट धारा वाली, हे समुद्र-पत्नी गङ्गा, तुम्हारी उत्तुङ्ग तरंग मेरे कलिजनित मल (या दोष) को दूर करे। शिखरिणी के अतिरिक्त वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग भी इस काव्य में किया गया है। नर्मदालहरी में विषय के अनुरूप उद्दाम प्रवाह तथा प्रबल वेग को सूचित करने के लिये स्नग्धरा छन्द और अनुरूप पदावली का प्रयोग रेवा राम ने किया है। ओजस्वी गाढ़ बन्ध और नृत्यत्प्राय पदावली का यह उदाहरण देखिये खेलन्त्यः सम्पतन्त्यस्तिमिरतमतमीकुञ्जरोत्फालकेलि प्रोत्काण्ठाकुण्ठकण्ठीरवविधुतनवाकल्पवल्लीलहर्यः । वामेवां मामरस्यां मुलविबुधधुनीविस्मयं क्षालयन्त्यः शं दातं, विष्टपानां मुवि भुवनभरोल्लासिचञ्चत्प्रवाहाः।।

स्वातितिरुनाल रामवर्म कुलशेखर (बञ्चीश्वरमहाराज)

रामवर्मकुलशेखर त्रावणकोर के राजा थे। इनका जन्म सन् १८१३ ई. में हुआ। स्वातिनक्षत्र में जन्म लेने के कारण इन्हें गीतिकाव्य २४६ स्वातितिरुनाल भी कहा जाने लगा। माता के गर्भ में आते ही इन्हें राज्य का उतराधिकारी घोषित कर दिया गया था, अतः इन्हें ‘कर्मश्रीमान् की उपाधि भी मिली । वन्चीश्वर इनका कुल है। पुत्र के जन्म के पश्चात् ही इनकी माता रानी लक्ष्मीबाई का देहावसान हो गया और इनकी मौसी ने इनका भरण-पोषण किया। तेरह वर्ष की आयु में ही रामवर्मा ने संस्कृत, मलयालम, कन्नड, तेलुगु, तमिल, मराठी हिन्दी तथ फारसी भाषाओं पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। त्रावणकोर के दीवान श्री सुब्बाराय इन्हें अंग्रेजी सिखाते थे। सन् १८२६ ई. से इन्होंने त्रावण-कोर राज्य पर शासन आरम्भ किया और अपने को बड़ा सुयोग्य शासक प्रमाणित किया। राज्य में चिकित्सालय, पाठशालाओं, न्यायालय तथा मुद्रणालय की व्यवस्था इन्होंने करायी। इनके शासनकाल को त्राणकोर राज्य का स्वर्णकाल कहा जाता है। अंग्रेज जनरल कुलेन को इनकी योग्यता, न्यायप्रियता तथा प्रजावत्सलता से स्वाभावतः डाह थी और उसने इनके कार्य में बाधाएँ देना शुरू किया, जिससे खिन्न हो कर रामवर्मा शासन और राजनीति से विमुख तथा उदासीन हो गये तथा साहित्यसाधना में मन लगाने लगे। सन् १८४७ ई. में ३८ वर्ष की आयु में ये दिवंगत हुए।। संस्कृत में रामवर्मा की निम्नलिखित रचनाएँ मिलती हैं-स्यानन्दूरपुरवर्णनप्रबन्ध (त्रावणकोर राज्य से प्रका., १६२० ई.) पद्नाभशतक (ओरियंटल मैन्यु. लाइब्रेरी त्रिवेन्द्रम के जर्नल में प्रका., अजामिलोपाख्यान त्रिवेन्द्रम् संस्कृत सीरीज में प्र. कुचेलोपाख्यानम् (प्रका. वही) तथा भक्तिमञ्जरी (त्रावणकोर राज्य से प्रका. १६०४ ई.)। प्रथम रचना चम्पू काव्य है, जिसमें त्रिवेन्द्रम् के मन्दिर के निर्माण और उसमें होने वाले उत्सव का वर्णन है। भक्तिमञ्जरी में एक सहस्र पद्य हैं, जो दस शतकों में विभक्त हैं। विभिन्न छन्दों का चयन कवि ने प्रत्येक शतक में किया है। भक्ति की महत्ता का गायन तथा दार्शनिक विवेचन इस रचना में हुआ है। इसके साथ ही भागवत तथा विष्णुपुराण से कथाएँ भी उद्धृत की गयी हैं। राजवर्मा का संगीत पर असाधारण अधिकार था, और इनके अजामिलोपाख्यानम् तथा कुचेलोपाख्यानम् रागकाव्य हैं। कुचेलोपाख्यानम् सुदामा की कथा पर आधरित है। कवि ने पदों के साथ राग और ताल का निर्देश दोनों रचनाओं में किया है। रामवर्मा ने संस्कृत, मलयालम, हिन्दी कन्नड, तेलग, मराठी आदि भाषाओं में स्तुतिपरक कीर्तनों, पदों, चौपालों तथा ठुमरियों की भी रचना की थी। संगीतकार के रूप में उनकी प्रतिभा की सराहना अनेक समकालीन कलाविदों ने की है तथा उन्हें कर्नाटक के महान् सन्त-गायक त्यागराज और मुत्तुस्वामी दीक्षित के समकक्ष माना है।

सीतारामभट्ट पर्वणीकर

सीताराम भट्ट जयपुर नरेश महाराज जयसिंह द्वितीय (१८१८-१८३४ ई.) की राजसभा के कवि थे। इनके एक पूर्वपुरुष माधवभट्ट भी जयपुर के तत्कालीन राजा विष्णुसिंह की कीर्ति सुन कर महाराष्ट्र से जयपुर आये थे। उनकी पांचवी पीढ़ी में सीताराम हुए। सीताराम ज्योतिष, न्याय, छन्दःशास्त्र और व्याकरण आदि शास्त्रों में पारंगत थे। उनके लिखे प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं २५० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास महाकाव्य - नृपविलास, जयवंश, नलविलास, रामचरित आदि। साहित्यशास्त्रीय ग्रन्थ - काव्यप्रकाशसार, साहित्यसार, नायिकावर्णन, साहित्यसुधा, साहित्यतत्त्व, साहित्यार्णव, साहित्यतरङ्गिणी आदि। व्याकरण पर - चतुर्दशी व्याख्या। ज्योतिष पर - जातकपद्धति, ज्योतिःपद्धति। टीकाग्रन्थ - कुमारसम्भवटीका तथा घटकर्परकाव्यटीका। इन रचनाओं के अतिरिक्त सीताराम भट्ट के निम्नलिखित स्तोत्रकाव्य हैं सूर्याष्टक, गङ्गाष्टक, देव्यष्टक, भैरवाष्टक, विष्ण्वष्टक, हनुमदष्टक, शिवाष्टक, हेरम्बाष्टक, जम्बुवाहिन्यष्टक, गुर्वष्टक।

रघुराजसिंह

रीवानरेश महाराज विश्वनाथसिंह के सुपुत्र महाराज रघुराजसिंह हुए। इनका जन्म सन् १८२३ ई. में हुआ था तथा शासनकाल १६५४ ई. से १८८० ई. के मध्य रहा। ये अस्त्र-शस्त्रसंचालन में निपुण थे और मृगया में विशेष रुचि रखते थे। इनकी आठ पलियाँ थीं और सन्तानों में सर वेंकटरमण इनके उत्तराधिकारी हुए। १८५७ ई. के विद्रोह में इन्होंने अंग्रेजीशासन का साथ दिया और उसके पारितोषिक में इन्हें सरकार ने सोहागपुर का इलाका प्रदान किया। दुर्भिक्ष के समय उत्तम प्रबन्ध के लिये १८७७ ई. में दिल्ली दरबार द्वारा जी.सी.एस.आई. की उपाधि भी प्रदान की गयी। अपनी दानशीलता के लिये रघुराजसिंह माने जाते रहे हैं, तीर्थस्थलों में बार-बार इन्होंने अपने सारे आभूषण उतार कर दान किये। १८७५ ई. में इन्होंने रीवा राज्य का प्रबन्ध अंग्रेजी सरकार को सौंप दिया और भगवद्भजन में समय व्यतीत करने लगे। १८८० ई. में इनका स्वर्गवास हो गया। रघुराजसिंह के नाम से हिन्दी तथा संस्कृत में प्रचुर साहित्य प्राप्त होता है। हिन्दी में रामस्वयंवर, आनन्दाम्बुनिधि, रुक्मिणीपरिणय आदि इनकी कृतियाँ हैं, तथा संस्कृत में सुधर्माविलास, नर्मदाष्टकम्, शम्भुशतकम्, रघुराजमङ्गलचन्द्रावली आदि इनके काव्य हैं। सुधर्माविलास में सोलह उल्लासों में सुधर्मा की सभा, विभिन्न प्रकार की साधनापद्धतियाँ, वैकुण्ठ, दशावतारस्तुति, रामावतारस्तुति, कृष्णस्तुति आदि विषय हैं। शम्भुशतकम् की रचना तिथि संवत् १८१८ पौष कृष्ण १२ दी गयी है। जगदीशशतकम्’ में ११० पद्यों में भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति है। कवि ने आर्तभाव से श्रीकृष्ण को पुकारा है - किं किं ब्रवीमि पतितोद्धरणं हि लोके यद्यत्त्वया कृतमनन्त चतुर्युगेषु। तस्मात् त्वदीयचरणं शरणं गतोऽहं मामुद्धरस्व कृपया जगदीश कृष्ण।। (२३) डॉ. सुयुम्न आचार्य ने रगाचार्यबाधूल की टीका तथा अपनी व्याख्या और अनुवाद के साथ इसे पुनः प्रकाशित किया है। प्रकाशक-वेदवाणीवितानम्, कोलगवा सतना (म.प्र.) २५१ गीतिकाव्य (हे अनन्त, चारों युगों में जो-जो आपने पतितजनों का उद्धार किया है उसके बारे में क्या-क्या कहूँ ? इसलिए मैं आपके चरणों में शरणागत हूँ। हे जगदीश कृष्ण, कृपा करके मेरा उद्धार कीजिए।

गोमतीदास रामस्वामीशास्त्री

गोमतीदास रामस्वामी का जन्म सन् १८२३ के नवम्बर माह में केरल के इलत्तूर ग्राम में हुआ था। गोमतीदेवी इनकी कुलदेवी थीं। एक बार पञ्चशती के अध्ययन के समय इन्हें गोमती ध्यान में दिखायी दी। तब से वे अपने को गोमतीदास कहने लगे। अपनी समस्यापूर्तियों तथा काव्यप्रतिभा के कारण ये महाराज एलम् तिरुनाल के विशेष कृपापात्र बने। १५ अक्टूबर १८८७ के दिन इनका निधन हुआ। इनके देहावसान का समाचार सुन कर महाराज एलम् के अनुज केरल वर्मा ने यह आर्या अपने भाई को लिख कर भेजी थी श्रीशङ्करोपमानाः श्रीमदानन्दनाथगुरुचरणाः। श्रीमोदिनीसनाथाः श्रीपुरमेवापुरद्य पूर्वाणे।।। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रतिभाशाली संस्कृतरचनाकारों में गोमतीदास गणनाई हैं। इन्होंने काव्य, नाटक, काव्यशास्त्र, व्याकरण, दर्शन आदि विविध विधाओं में अपनी लेखनी व्यापृत की । भटिकाव्य की शैली पर लिखा सुरूपराघवमहाकाव्य, कीर्तिविलासचम्पू (महाराजा एलम के जीवन पर) काशीयात्रानुवर्णन, कैवल्यवल्लीपरिणयनाटक (अनुपलब्ध), रामोदयः, वृत्तमुक्तावली, क्षेत्रतत्त्वदीपिका (रखागणित) तुलाधारप्रबन्ध आदि इनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। इनके खण्डकाव्यों में ‘गौण्यप्रबन्ध’ एक अनोखी रचना है, जिसमें नेपियरनामक गवर्नर के जाने पर मद्रास प्रान्त के कृषकों की मनोभावनाओं का चित्रण है। इन्होंने ४५ वर्षों में पार्वतीपरिणय नामक यमककाव्य भी लिखा। इस पर कालिदास के कुमारसम्भव का प्रभाव है। ‘अम्बरीशचरित’ तथा ‘गान्धारचरित’ इनके पौराणिक कथाओं पर आधारित खण्डकाव्य हैं। इनके अतिरिक्त इनके स्तुति-काव्यों की संख्या बहुत बड़ी है, जिनमें अश्वत्थगणनाथाष्टकम्, धर्मसंवर्धिनीस्तोत्र, आर्याद्विशती, त्रिपुरसुन्दरीगीता, ललितागीतम, कृष्णदण्डक, अष्टप्रासशतकम् आदि का उल्लेख मिलता है। इनके काव्य में अलंकारों का यथोचित विन्यास कल्पना की छटा तथा दार्शनिक चिंतन का पुट मिलता है, भाषा का इनका अभ्यास परिष्कृत है। अष्टप्रासशतकम् से यह उदाहरण देखिये भूतं भव्यमिदं भवच्च निखिलं भूतं यदेकाश्रयं जातं जीवति सम्परैति नियतं गीतं श्रुतैमौलिभिः। पूतं ब्रह्म सनादनन्तनगरे पीतं सकृल्लोचनैः प्रीतं भोगिशयं हृदिस्थकमलं पोतं भवाब्येभजे।। (५२) २५२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (यह भूत, भविष्य और वर्तमान समस्त भौतिक जगत् एक मात्र जिसके आश्रित हैं, (यहाँ तक कि) निश्चित रूप से उत्पन्न होता, जीवित रहता और मृत्यु को प्राप्त होता है, जो श्रेष्ठजनों द्वारा गीत है, पवित्र ब्रह्म (मन्त्र) है, तिरुअनन्तपुर में जो सदा दृष्टिगोचर होता है, उस प्रसन्न शेषशायी हृदयगत कमल वाला तथा संसार-सागर में पोत को भजता

सदाशिव शास्त्री

सदाशिव शास्त्री का जन्म १८२६ ई. में हुआ। ये केरल में ततमपुर के निवासी थे। इनका गोत्र शाण्डिल्य था। इनके पिता शूकर सोमयाजी भी संस्कृत के अच्छे पण्डित थे। इन्होंने बालक सदाशिव को अलंकारशास्त्र आदि का अध्ययन कराया। तेरहवें वर्ष में पितृवियोग का आघात पा कर सदाशिव देशभ्रमण के लिये निकल पड़े। प्रयाग में इनकी डॉ. भाऊजी से भेंट हुई। उनके साथ ये मुम्बई आ गये और वहाँ रहकर चार वर्ष पुराणों का संशोधन करते रहे। भाऊ जी के स्वर्गवास हो जाने पर विक्रम सं. १६३० में ये बीकानेर चले गये और वहाँ से रामसिंहद्वितीय के आश्रय में जयपुर आये। यहां रह वसन्तशतक, दुर्गाशतक तथा गोपालशतक इन तीन काव्यों की रचना की। संवत् १६४७ में अदाचल (आबू) में रह कर पं. गोपीनाथ शर्मा के साथ इन्होंने ‘अर्बुदाचल माहात्म्य’ का प्रणयन किया। उसके पश्चात् संस्कृत पाण्डुलिपियों, ग्रन्थों आदि के अध्ययन-अनुसंधान के लिए ये कश्मीर गये और वहाँ रह कर काश्मीरशतक की रचना की। सदाशिव शास्त्री की शैली चमत्कारपूर्ण है। विषयवस्तु तथा भावबोध की दृष्टि से उसमें नवीनता नहीं है। चित्रालंकारों के प्रयोग में दक्षता का प्रदर्शन उन्होंने प्रायः किया। वसन्तशतकम् से एक उदाहरण देखिये - स्फुटममारजनी सुदिनीकृता बलतदुज्ज्वलचम्पकवन्यया। द्रुतमहारजतप्रतिमश्रिया नमितयाऽमितया सुमसम्पदा ।। (४५)

रामवारियर

रामवारियर का जन्म तालचिप्पली के बैकुलन्नार नगर में १८३२ ई. में हुआ था। व्याकरण, अलंकार तथा तर्कशास्त्र की उच्च शिक्षा इन्होंने गोविन्द नाम्बियार से प्राप्त की। इन्होंने अनेक संस्कृत काव्यों की मलयालम में टीकाएँ लिखी हैं। कुमारसम्भव के तीन सर्गों पर संस्कृत में इनकी टीका मिलती है। संस्कृत काव्यों में इनके स्फुट पद्यों के अतिरिक्त वागानन्दलहरी, वामदेवस्तव, विद्युन्मालास्तुति, विद्याक्षरमाला आदि काव्य इन्होंने लिखे। वागानन्दलहरी सरस्वती की स्तुति में है, इसमें १०८ शिखरिणी छन्द हैं। शंकराचार्य की सौन्दर्यलहरी का इस पर प्रभाव है। कवि ने इस पर स्वोपज्ञ टीका भी प्रस्तुत की है। वामदेवस्तव में भगवान शंकर का स्तवन है। इस काव्य में स्रग्धरा छन्द का प्रयोग है। इसकी भी कवि ने अर्थप्रकाशिका नाम की टीका प्रस्तुत की है।

वीरराघव

वीरराघव कवि का जन्म शाहजीपुरम् नामक ग्राम में हुआ। इनका जीवनकाल १८२० ई. से १८८२ ई. के बीच माना गया है। ये तंजौर के महाराज शिवेन्द्र या शिवजी (१८३५-६५ ई.) के आश्रित रहे। इन्होंने संगीत, नाट्यशास्त्र तथा धर्मशास्त्र का गीतिकाव्य २५३ विशेष अध्ययन किया। संस्कृत में इनके निम्नलिखित दस ग्रन्थ हैं - नाटक-वल्लीपरिणयम् तथा रामराज्याभिषेकम्। स्तोत्र-रामानुजाचार्याष्टकम्, रामानुजाष्टोत्तरनामस्तोत्रम्, रामानुजाष्टकम्, रामानुजातिभानुस्तवः तथा पार्वतीस्तोत्र आदि।

उमापति त्रिपाठी

श्री उमापति त्रिपाठी अयोध्या निवासी रामभक्त कवि थे। इनका जन्म गोरखपुर जिले के मझौली राज्य में पिण्डी ग्राम में संवत् १८६१ (सन् १८३४ ई.) में हुआ था। इनकी शिक्षा काशी में हुई। पच्चीस वर्ष की आयु में शास्त्रार्थ के निमित्त इन्होंने देशाटन आरम्भ किया। भारत की सुदीर्घ यात्रा में इन्होंने ग्वालियर के सिन्धिया दरबार, रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह, बिठूर के पेशवा बाजीराव, लखनऊ के नवाब बाजिदअली शाह, बलरामपुर के राजा दिग्विजय सिंह तथा अवधमण्डल के राजा दर्शनसिंह की राजसभा में धन-मान अर्जित किया और अयोध्या लौट आये। अनुश्रुति है कि राजाओं से प्राप्त विपुल धन को इन्होंने पण्डितों में वितरित कर दिया था। इन्होंने ४६ वर्ष तक अयोध्यावास कर संवत् १६३० (सन् १८७३ ई.) में जीवनलीला समाप्त की। अयोध्या के नये घाट पर इनकी वंशपरम्परा फल-फूल रही है। अपने वैदुष्य और रचनाशक्ति के कारण त्रिपाठी जी की तुलना शंकराचार्य तथा पण्डितराज जगन्नाथ से की जाने लगी थी। कहा जाता है कि रीवानरेश राजा विश्वनाथसिंह की सभा में इन्होंने भागवत के एक पद्य के ४७ अर्थ कर डाले थे। व्याकरण के पाण्डित्य के कारण इन्हें ‘अभिनवपाणिनि’ भी कहा जाता था। ‘कोविद’ उपनाम से इन्होंने हिन्दी में अनेक काव्य लिखे हैं। संस्कृत में अनेक टीकाओं, ‘भाष्यों तथा पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने निम्नलिखित काव्य रचे हैं -उमापतिशतकत्रय, सुधामन्दाकिनी, रामजानकीस्तोत्र, रघुनन्दनषोडशक, अयोध्याविंशतिका, रघुनाथस्तोत्र, रामस्तोत्र, जानकीस्तोत्र, कालिकाष्टकम्, शङ्कराष्टकम तथा श्रीविंशतिका। सख्यसरोजभास्कर में इन्होंने रसिकोपासना की शास्त्रीय और काव्यशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की है। तदनुसार त्रिपाठी जी के सारे काव्यों की पदावली सरस और अनुप्रास-झंकार से समन्वित है। यमक के बड़े कठिन बन्धों का भी इन्होंने प्रयोग किया है। ‘सुधामन्दाकिनी’ से कुछ उदाहरण देखिये तव नखांशुकलाविकलो विघुः क्षयति मासि विलक्षणलक्षणम्। परमतावक तावकविश्रुतिः श्रुतिजनो न तनोति मनोव्यथाम् ।। दुरितदार उदारसुदारको बृहदुदार उदारसुदारकः। , वृतकुमारकुमारकुमारको वृतकुमार कुमारकुमारकः।।

गोपीनाथ दाधीच (डेरोल्या)

साहित्यशास्त्र के उद्भट पण्डित श्री गोपीनाथ दाधीच जयपुरनरेश महाराज रामसिंह (१८३५-८०) के आश्रय में रहे। कृष्णरामशास्त्री ने अपने ‘जयपुरविलास’ काव्य में इनके विषय में लिखा है२५४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास चकार यः स्वानुभवाष्टकं तथा गीतां जगौ देशिकलावनीपदैः। ज्ञानोदयं स्वात्मनि घोषयन् स्वयं नाथः सगोपीप्रथमोऽस्ति काव्यवित् ।। ५/४३ (उस काव्यज्ञ गोपीनाथ ने ‘स्वानुभवाष्टक’ की रचना की और देशी लावनी के पदों से अपने में ज्ञान के उदित होने की घोषणा करते हुए गीता को गाया।) गोपीनाथ के पिता जयपुर के निवासी मालीराम जी थे। गोपीनाथ जी जयपुर संस्कृत पाठशाला में अध्यापक रहे। अपने हिन्दी ग्रन्थ ‘उपदेशामृतघटी’ में कवि ने स्वरचित छह हिन्दी रचनाओं तथा बाईस संस्कृत प्रबन्धों का नामोल्लेख किया है। इनमें माधवस्वातन्त्र्यम् नाटक, प्रधानरसदृष्टान्तपञ्चाशिका तथा वृत्तचिन्तामणिः-ये शास्त्रीय ग्रन्थ हैं और नीतिदृष्टान्तपञ्चाशिका, स्वानुभवाष्टक, रामसौभाग्यशतक, शिवपदमाला, दधिमथपञ्चाशिका, आनन्दनन्दनकाव्यम्, कृष्णार्यासप्तशती, हरिपञ्चविंशतिः, विश्वनाथविज्ञप्तिपञ्चाशिका, स्वजीवनचरितम्, भावनगरप्रशस्तिः, सुतजन्महोत्सवः ये काव्य हैं। इनके अतिरिक्त भी इनके कुछ काव्य और शास्त्रीय ग्रन्थ पुरातत्त्वमन्दिर जयपुर में मिलते हैं। वस्तुतः दाधीच जी का कृतित्व अतिशय व्यापक और विपुल है। रामसौभाग्यशतकम् में इन्होंने सवाई रामसिंह के भाई सौभाग्यसिंह का चरित चित्रित किया है। यह १०९ पद्यों की प्रशस्ति है। सुतजन्ममहोत्सवः शेखावटीभूषण खेतड़ी नरेश अजीतसिंह वर्मा के पुत्रजन्मोत्सव के उपलक्ष्य में लिखा गया है।

श्री कृष्णरामभट्ट

श्री कृष्णरामभट्ट ने अपने जयपुरविलास खण्डकाव्य में स्वपरिचय इस प्रकार दिया है श्रीमद्गौतममगोत्रभूषणमणिः प्रत्यर्थिचिन्तामणि र्वामाचारतमिस्रपुष्करमणी रोगातचिन्तामणिः। पृथ्वीपालकृतादरोऽखिलबुधश्रेणीशिरःशेखरो लल्लूरामभिषग्वरोऽभवदिह प्रख्यातविश्वम्भरः।। योगान्वितः सुरसभावनकर्मदक्षः काव्यादरः पुरविभावलयं दधानः। पुत्रोऽभवद् गुरुसमृद्धिरमुष्य वैद्यविद्याचणो जगति कुन्दनरामनामा।। गुरुप्रसादाधिगतार्थबोथौ वैद्यागमाकुण्ठितवाक्प्रसारौ। श्रीकृष्णरामो हरिवल्लभश्च द्वावात्मजौ तस्य कवी अभूताम् ।। श्री कृष्णराम ने काव्यप्रकाश, छन्दःशास्त्र तथा गणित का अच्छा अध्ययन किया था। जयपुरनरेश राजा रामसिंह (१८३५-८० ई.) कवि श्रीकृष्णरामभट्ट के आश्रयदाता रहे। श्रीकृष्णरामभट्ट की १८ रचनाएँ प्राप्त होती हैं - जिनमें कच्छवंश ऐतिहासिकमहाकाव्य है, जयपुरमेलककौतुकम् माधवपाणिग्रहणोत्सवः सम्राट्सुताभिनन्दनम्, काव्यमाला आदि प्रशस्तिपरक या वर्णनात्मक काव्य हैं। चत्वारिंशत्पद्यावली, मुक्तक-मुक्तावली, सारशतकम् आर्यालङ्कारशतकम् तथा जयपुरविलास इनकी काव्य रचनाओं में विशेष उल्लेखनीय हैं। २५५ गीतिकाव्य पलाण्डुराजशतकम् आयुर्वेद से संबद्ध मनोरजंक रचना है। सिद्धभैषजमणिमाला, छन्दोगणितम् आदि इनकी शास्त्रीय रचनाएँ हैं। ‘जयपुरविलास’ इनका जयपुर नगर के सौन्दर्य और सांस्कृतिक परिवेश को जानने के लिये वस्तुतः उपादेय है। श्रीकृष्णराम भट्ट की शैली बड़ी मंजी हुई तथा रचनाबन्ध प्राचीन कवियों के समकक्ष हैं। वर्णनकला में वे दक्ष हैं। द्वितीय उल्लास में रामनिवास के वर्णन में उन्होंने लिखा है द्राक्षामण्डनमण्डितं द्रुमशिखाव्यालम्बिलेखं पयो यन्त्र श्रीमदखर्वपर्वतगृहं लीलाशकुन्तध्वनि। छायामञ्जुनिकुञ्जपुञ्जजठरभाजिष्णुपट्टासनं रम्यं रामनिवासमस्ति नृपतेरुद्यानमुद्यानकम् ।। (२/८५) (नृपति का ‘राम निवास’ नाम का रम्य उद्यान, वास्तव में उद्यान है, जो अंगूर के मण्डपों से मण्डित, जिसके पेड़ों की शिखाओं पर लेख (2) लटकर रहे हैं, जहाँ जलधारा यन्त्रों के कारण शोभायमान बड़े पर्वत-गृह हैं, जहाँ लीलापक्षियों का कलरव है, छाया के सुन्दर निकुञ्जसमूह के मध्यभागों में शोभनशील पट्टासन हैं।) सारशतकम् (निर्णयसागरप्रेस, १८८७ ई.) में कवि ने कुल १०५ पद्यों में कालिदास, भारवि, माघ और हर्ष के महाकाव्यों का सार प्रस्तुत किया है। ‘मुक्तकमुक्तावली’ (प्र. वही, १८८७ ई.) में सात सर्ग हैं- देवतास्तवन, समस्यापूरण, उद्दीपनवर्णन, शृङ्गारवर्णन, काव्यप्रशंसा, हास्य तथा सङ्कीर्णवस्तुवर्णन। अंतिम सङ्कीर्णवस्तुवर्णन में वापी, गङ्गा, वैद्य, विक्टोरियावर्णन, रेल, तार, नटी अदि विषय हैं। इसके अंत में राजस्थानी तथा हिन्दी में भी दोहा आदि छन्दों में रचनाएँ हैं। कवि श्रीकृष्णराम ने काशीनाथस्तवः में शंकर की, आर्यालङ्कारस्तवः में त्रिपुरसुन्दरी की तथा गोपालगीतम् में श्रीकृष्ण की स्तुति की है। वस्तुतः श्रीकृष्णराम भट्ट का रचनात्मक अवदान इस युग के संस्कृत साहित्य की उपलब्धि कहा जा सकता है। इनके समकालीन श्री दुर्गाप्रसाद पण्डित ने इनके विषय में लिखा है– उथल्लावण्यलीलावलयितवपुषां स्वर्गवाराङ्गनाना-: माश्लेषे यः प्रमोदः स्फुरति च गरिमा योऽमृते माधुरीणाम् । सौरभ्यं कुङ्कुमै यत् पयसि विमलता याप्यहो यत् समस्तं मित्रैकत्रेक्षितुं चेदभिलषसि तदा पश्य कृष्णस्य काव्यम् ।।

  • संस्कृतचन्द्रिकाखण्ड -११, संख्या-२

हरिवल्लभ भट्ट

श्री कृष्णभट्ट के ही अनुज हरिवल्लभ भट्ट थे। स्वरचित ‘जयपुरपञ्चरङ्गम्’ में इन्होंने अपने को श्रीकृष्णराम भट्ट का वैमातृक कनिष्ठ भ्राता २५ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास बताया है। हरिवल्लभ ने शब्दानुशासन का अध्ययन अपने पिता से, काव्य-कोश-छन्दोविधानादि का अध्ययन अपने अग्रज से तथा वैद्यक का अध्ययन स्वयं किया। इनकी सात संस्कृत काव्यकृतियां प्रकाशित हैं - जयपुरपञ्चरङ्गम्, कान्तावक्षोजशतकम्, ललनालोचनोल्लासः, दशकुमारचरित्रम्, देवीस्तोत्रम्, शृङ्गारलहरी तथा गौर्यलङ्कारः । जयपुरपञ्चरङ्गम्-ऐतिहासिक वर्णनात्मक काव्य है, जो पॉच सर्गों में विभाजित है। इसमें इष्टदेवतादिस्तुति के अनन्तर जयपुरनगर का वर्णन तथा सवाई जयसिंह द्वितीय से लगा कर सवाई माधवसिंह द्वितीय तक की पीढ़ी के जयपुरनरेशों की प्रशस्तियाँ हैं। दशकुमारचरित्रम् काव्य दण्डी के दशकुमारचरित का ११३ पद्यों में सारांश है। कान्तावक्षोजशतक १०१ पद्यों का शृंगाररसमय काव्य है। इसमें कविकल्पना, भाषा के चमत्कार, शब्दसौष्ठव और व्यंजनाओं का रमणीय समन्वय है। इसी प्रकार ललनालोचनोल्लास में सुन्दरी के कटाक्षों का १०३ पद्यों में रोचक चित्रण है। इसी विषयवस्तु को लेकर १०३ पद्यों में ही कवि ने शृङ्गारलहरी की रचना की है। कवि ने अपने शृंगारित काव्यों या स्तोत्रों में प्राचीन परिपाटी का ही अनुकरण अधिक किया है। अलंकारों का सायास विन्यास हरिवल्लभ भट्ट के काव्य में मिलता है। ललनालोचनोल्लास का यह उदाहरण द्रष्टव्य है भवतीह यादृशो यः स तादृशेनैव रज्यते प्रायः। यदपाङ्गा हि नताङ्ग्या अनङ्गराज्ञो नवाः सुहृदः ।। कवि ने नताङ्गी (सुन्दरी) के अपाङ्ग (चितवनो) को अनङ्ग कामदेव रूपी सम्राट का मित्र कहा है।

ताराचरण तर्कभूषण

ताराचरण काशी की पंडित मण्डली में पिछली शताब्दी के श्रेष्ठ विद्वानों में गिने जाते थे। ये काशीनरेश ईश्वरीनारायणसिंह के आश्रय में रहे और उनके आदेश से इन्होंने सन् १८६६ ई. में काशिराजकाननशतक काव्य लिखा था। इनके पुत्र पं. प्रमथनाथ तर्कभूषण ने अपने कोकिलदूतम् काव्य में पिता का परिचय इस प्रकार दिया है पूर्वाशावदनाद् दिवाकरमणिश्चन्द्रोऽब्धिमध्यादिव प्रोद्भूतो भुवनप्रसारकिरणख्यातिर्वसिष्ठान्वयात्म क विद्ववृन्दविनिद्रदर्पनलिनीनागाधिनाथायितः । श्रीताराचरणो द्विजः सुविदितः पाण्डित्यवारांनिधिः।। -कोकिलदूतम्- १०५ (मानों पूर्व दिशा के मुख से सूर्यमणि की भाँति, समुद्र के बीच से चन्द्र की भाँति भुवन में फैली किरण रूपी ख्यातिवाले वसिष्ठकुल में उत्पन्न, विद्वत्समूह के विकसित दर्प की नलिनी के लिए ऐरावत के आचरण वाले, पाण्डित्य के समुद्र द्विज श्री ताराचरण सुविदित हैं। गीतिकाव्य साताराचरण न्यायशास्त्र में पारंगत थे तथा काव्यरचना में भी उतने ही निपुण थे। उक्त काशिराजकाननशतक के अतिरिक्त इन्होंने शगाररत्नाकर, रामजन्मभाण तथा राधाष्टक की रचना की थी। शृङ्गारत्नाकर इनका काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है, जिसमें विशेषतः रसों और छन्दःशास्त्र का विवेचन है। काशिराजकाननशतकम् में किसी विरही पथिक की मनोदशा का चित्रण है, जिसे सुरम्य नैसर्गिक वातावरण में अपनी प्रिया की स्मृति व्यथित करती है और वह प्रकृति के प्रत्येक उपादान में उसी की छवि निरखता है। इस काव्य की रचना कवि ने विन्ध्यगिरि के शिखर पर विचरते हुए चन्द्रप्रभा नदी के तट पर निवास करते हुए की थी। इस रचना में विरह की उग्रता के साथ मिलन की आतुरता व्यंजित की गयी है किं किं सखे….रदच्छदकामुकेन सम्भाव्य सीत्कृतिसमुल्लसिताननेन। शीतव्रणव्यथितमोष्ठयुगं प्रचुम्ब्य दासो भविष्यति कदैव पुनः कृतार्थः ।। राधाष्टकम् भी तर्कभूषण जी की शृंगारप्रधान रचना है, जिसके पद्य इन्होंने शृङ्गाररत्नाकर में उद्धृत किये हैं।

महेशचन्द्र तर्कचूडामणि

महेशचन्द्र तर्कचूडामणि का जन्म १८४१ ई. में दीनाजपुर जिले के अंतर्गत राजारामपुर ग्राम में पं. ईशानचन्द्र के घर पर हुआ। नवद्वीप की ‘विदग्धजननीपरिषत्’ ने इन्हें तर्कचूडामणि की उपाधि से अलंकृत किया था। इसके साथ ही तत्कालीन दिनाजपुराधीश श्री गिरिनाथराय की राज्यसभा में १८६६ ई. में इन्हें सभापण्डित का पद भी प्रदान किया गया। इनके प्रमुख काव्य हैं- निवातकवचमहाकाव्यम्, दिनाजपुरराजवंशम्, भूदेवचरितम् महाकाव्यम्, काव्यपेटिका-कोशकाव्यम् एवं भगवच्छतकम्। इनके अनेक निबन्ध तथा काव्यरचनाएँ संस्कृतचन्द्रिका, मित्रगोष्ठी आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही थीं। इसके साथ ही इनके अनेक अप्राप्त प्रबन्धों का भी उल्लेख मिलता है। संगीत तथा चित्रकला की कुशलता की प्रतिच्छवि इनकी कविता में भी संक्रान्त हुई है। इनके लघुकाव्यों में गङ्गाष्टकम, दुर्भिक्षे प्रार्थना, विक्टोरिया-महाराज्यां परलोक गतवत्यां रचितानि सप्तकाव्यानि आदि उल्लेखनीय हैं। ‘दुर्भिक्षे प्रार्थना’ में बंगाल के अकाल का मार्मिक चित्रण हुआ है। गङ्गाष्टकम् में संगीतात्मकमता का पुट बड़ी कुशलता से कवि ने दिया है। मामुद्धर हरसुन्दरि गड्गे स्वर्गारोहणसोपानावलिभगीललिततरगे।

प्रमथनाथ

ताराचरण तर्कभषण के आत्मज प्रमथनाथ का जन्म १८४३ ई. में बंगाल के भाटापारा में हुआ। इन्होंने ताराप्रसन्न विद्यारत्न से साहित्य, वीरेश्वरतीर्थ से धर्मशास्त्र, विद्योदयपत्रिका के यशस्वी संपादक हृषीकेश भट्टाचार्य से सांख्य तथा म. म. शिवचन्द्र सार्वभौम से नव्यन्याय का अध्ययन किया। कुछ काल भट्टपल्ली में रह कर ये अध्ययन के लिये काशी आ गये और यहाँ स्वामी विशुद्धानन्द के शिष्य बन गये। आयुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास अध्ययन पूरा कर के ये कलकत्ता के संस्कृत विद्यालय में वेदान्त के व्याख्याता नियुक्त हुए तथा तत्पश्चात् काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्यविद्यासंकाय में प्राचार्य के पद पर भी कार्यरत रहे। अपने पिता की भाँति इन्होंने भी तर्कभूषण की पदवी प्राप्त की थी। इनकी काव्यरचनाओं में रासरासोदय (१८६१ ई.) विजयप्रकाश (१८६१ ई.) तथा कोकिलदूतम् (१८८७ ई.) उल्लेखनीय हैं। कोकिलदूतम् में १०६ पद्य है। इसमें एक बंगतरुणी विदेश गये अपने पति के लिये कोकिल को दूत बना कर भेजती है। इस काव्य की रचना कवि ने काशीनरेश ईश्वरीनारायणसिंह की प्रेरणा तथा युवराज प्रभुनारायण सिंह के अनुमोदन से की थी। काव्यारम्भ के पूर्व उत्सर्गपत्रम् में कवि ने काशीनरेश के गुणों का ही स्मरण करते हुए उनको यह कृति अर्पित भी की है। ‘विजयप्रकाशः’ में तर्कभूषणजी ने अपने गुरु विशुद्धानन्द स्वामी का जीवनचरित पद्यबद्ध किया है। तर्कभूषण जी की भाषाशैली सरस और मसृण है। कोकिलदूतम् में मेघदूत का प्रभाव स्पष्ट है। विरहिणी नायिका की स्थिति का वर्णन है ताम्बोलोत्यो रदवसनयोर्दृश्यते नैव रागो नो वाऽतुल्या बत चरणयोर्लक्ष्यतेऽलक्तकश्रीः। सूक्ष्मस्पर्शा कठिनकठिना स्नेहसम्पर्कहीना गाढोत्कण्ठां दिशति सुहदामेकवेणी च तस्याः।। (७६) (उसके होठों का ताम्बूलजनित राग नहीं दिखता, न ही चरणों में अनुपम अलक्तक की शोभा लक्षित होती है और सूक्ष्म स्पर्श वाली अतिशय कठिन, तैल के सम्पर्क से रहित उसकी एकवेणी सुहृद् जनों की अत्यधिक उत्कण्ठा उत्पन्न करती है।)

कमलेश मिश्र (१८४४-१९३५)

बिहार के जहानाबाद में अरवल के निकट वेलखरा ग्राम में उत्पन्न, आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के सहपाठी कमलेश जी का जन्म एक प्रतिष्ठित विद्वान् शाकद्वीपीय ब्राह्मणकुल में हुआ। कहते हैं कि आप के पितामह “निर्णयसिन्धु” के प्रणेता कमलाकर भट्ट के शिष्य थे। कमलेश जी का कई भाषाओं पर अधिकार था और इन्होंने काशी के प्रख्यात विद्वान् गङ्गाधरशास्त्री के पिता नृसिंहदत्तशास्त्री जी से साहित्य का अध्ययन किया था। सहाध्यायी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के लिखे कई पत्र इनके वंशधरों के पास सुरक्षित हैं। इनका गीतिकाव्य “कमलेशविलासः” १६५५ ई. में प्रकाशित हुआ। जयदेव के ‘गीतगोविन्द” की परम्परा में लिखित “कमलेशविलासः” को आधुनिक संस्कृत साहित्य की एक उपलब्धि माना जा सकता है। भगवद्भक्ति की उदात्त भावभूमि पर १३ सर्गों में रचित इस रचना में, सोहर, दादराताल में भैरवी राग से गेय, हरिगीतिका गजल, दोहा, पृथ्वी, दिक्पाल छन्द, रेखता, कौव्वाली, ठुमरी, होली, चैता, कजली, गीतिकाव्य २५ झूलनामलार, विहाग, खेमटा, टोड़ी, लावनी, झूमर, नहछू आदि का सुललित प्रयोग हुआ है। यह सम्भवतः संस्कृत का प्रथम गीतिकाव्य है जिसमें लोकधुन में तथा शास्त्रीय रागों में गाये जाने वाले गीतों के साथ फारसी परम्परा में प्रचलित गज़लों का भी प्रयोग किया गया है। आगे चल कर जयपुर के पं. भट्टमथुरानाथ शास्त्री ने इस प्रकार के उत्तम प्रयोग किये। सुकवि कमलेश ने कहा है कि इनके गीतों के स्वर-ताल की मधुरिमा में ही न भूल जायें, प्रत्युत इनके पवित्र अर्थ के ग्रहण द्वारा भगवान के पावन पदों में मन को रमा दें। कमलेशगीतमिदं मुदा स्वरतालमजिममञ्जुलम् । शृणु तस्य तत्र पदे मनोऽपि समाविधेहि सुपावने। बरसात के इस गीत में कितनी चित्रमयता है “चम चम चमत्कृदाचञ्चन्ती चपला मुहुरुदरे संभाति। प्रिय क्व हे | ति च चातकी, पिकी कुहरिति कौति; नदति घने शिखिना समं शिखिनी नटति च नौति। तदिदं दृक्श्रुतिपातमशेषं हृदि मे बहुशूलं प्रददाति।। (कमलेशविलास के सम्पादक तथा कवि के वंशज श्रीमोहन शरण मिश्र ने प्रस्तुत गीतिकाव्य की उत्तम भूमिका लिखी है, जिसमें भारतेन्दुहरिश्चन्द्र के दो संस्कृत गीतों को उद्धृत किया है।)

केरलवर्मा

केरलवर्मा वलियकोकिल तम्पूरन तथा केरलकालिदास के नामों से भी जाने जाते हैं। इनके पिता का नाम मुल्लप्पिली नारायण तथा माता का नाम अम्बादेवी था। चौदह वर्ष की आयु में राजकुमारी लक्ष्मीबाई से इनका विवाह हुआ, और तब से ये वलिय कोयिल तम्पूरन कहे जाने लगे। विवाह के पश्चात् इन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा। राजराजवर्मा इनके काका थे। उन्होंने इनकी शिक्षा में बहुत रुचि ली। इन्हें १८५७ ई. से १८८० ई. तक एलेप्पी में निवास करना पड़ा, क्योंकि राजा एल्यम् तिरुनाल इन से कुपित हो गये थे। राजा के निधन के अनन्तर ये पुनः राजसभा में प्रतिष्ठित हुए। अभिज्ञानशाकुन्तल के मलयालम अनुवाद के कारण इन्हें केरलकालिदास कहा जाने लगा। ६६ वर्ष की आयु में मोटर दुर्घटना में इनका निधन हो गया।

  • केरलवर्मा ने संस्कृत तथा मलयालम में १८ ग्रन्थ लिखे। इनका मयूरसन्देश संस्कृतमिश्रित मलयालम (मणिप्रवालम् शैली) में रचित है। इनके काव्यों में विशाखविजयम् महाकाव्यम्, शृङ्गारमञ्जरी भाण, श्रीमूलपादपद्माष्टक, चित्रावली, अमृतमन्थन, तुलाभारशतक, कंसवधचम्यू: आदि उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त विक्टोरियाचरितसङ्ग्रह, यमप्रमाणाष्टक, क्षमापणसहस्त्रम्, शकुन्तलापरिणय आदि भी इनकी रचनाएं हैं। केरल वर्मा ने चित्रश्लोकावली में चित्रकाव्य का चमत्कार प्रदर्शित किया है। २६० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास श्रीमूलपादपद्माष्टक, गुरुपवनपुरेशस्तव तथा ललितास्तव इनके स्तोत्रकाव्य हैं। राजा द्वारा कारागार में डाल देने पर इन्होंने मुक्ति के लिये “क्षमापणसहस्त्र” काव्य भी लिखा था, जिसमें ५१ भागों में २०-२० पद्य हैं। इस काव्य का राजा पर प्रभाव न होने पर इन्होंने “यमप्रणामाष्टक” लिख डाला जिसमें १०१ पद्यों में मथुरानिवासियों की ओर से कंस को , मारने के लिये यम से प्रार्थना निवेदित है। इस काव्य का वांछित प्रभाव हुआ। दण्डनाथस्तोत्र तथा शत्रुसंहाराष्टक में भी कवि ने स्तुति के साथ-साथ शत्रु के विनाश की कामना प्रकट

मानविक्रम एट्टनतम्पूरन् कविराजकुमार

मानविक्रम कविराजकुमार का जन्म १८४५ ई. में पतिन्नार कोविलकम् नामक स्थान में हुआ तथा निधन १६२० ई. में हुआ। इन्होंने भी संस्कृत तथा मलयालम् दोनों भाषाओं में साहित्य लिखा है। इनकी सहायता से संस्कृत में पुन्नसेरी नीलकण्टशर्मा ने ‘विज्ञानचिन्तामणि’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया था। इन्होंने संस्कृत में बहुसंख्य स्तोत्र काव्यों की रचना की, जिनमें कृष्णाष्टपदी, कृष्णकेशादिपादवर्णन, किरातसप्तपदी तथा स्तवमञ्जरी उल्लेखाई हैं। इनकी अनेक रचनाएँ नीतिपरक भी हैं, यथा-वैराग्यतरङ्गिणी, सूक्तिमुक्तामणिमाला, उपदेशमुक्तावली आदि। इन्होंने संस्कृत में रागतालनिबद्ध गीत भी लिखे।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

हिन्दी के इस युगप्रवर्तक यशस्वी साहित्यकार ने संस्कृत में तीन सोत्प्रास शैली के मुक्तक कार्यों की रचना की-मदिरास्तव, अंग्रेजरतव तथा वैश्यास्तवराज । तीनों ही काव्य व्याजनिन्दा के अच्छे उदाहरण हैं और इनमें भारतेनदु की हास्यविनोदवृत्ति, समाजचेतना तथा व्यंग्यप्रवणता के दर्शन होते हैं। मदिरास्तवराज में प्रासंगिक रूप से असंस्कृत शब्दों का भी प्रयोग है। यथा कलवारप्रिया काली कलपरियानिवासिनी।। होटलीलोटलीलोटनाशिनी पोटलीचला।। धनमानादिसंही अण्डहोटलवारिणी। पञ्चापञ्चपरित्यक्ता पञ्चपञ्चप्रपञ्चिता।। “सीतावल्लभस्तोत्र’ भारतेन्दु की स्तुतिपरक रचना है, जिसमें उन्होंने श्रीराम के प्रति मधुरोपासना की पद्धति के द्वारा भक्तिभाव को व्यक्त किया है। उन्होंने आराध्या सीता की चारुशीला, हेमा, क्षेमा, सुशीला आदि प्रमुख सखियों तथा युगल सेवा में लग्न कमला, विमला आदि मिथिलावासिनियों के प्रति भी अपनी श्रद्धा अर्पित की है। इस काव्य में भारतेन्दु ने सीतातत्त्व का निरूपण भी किया है। क्षामापणसहस्त्रम् डॉ. पूवनूर रामकृष्ण पिल्ले द्वारा सम्पादित होकर सम्पादक द्वारा अनिता प्रकाशन प्रशान्तनगर, तिरुवनन्तपुरम-६६५०११ से १६६२ में प्रकाशित है-(सं.) २६१ गीतिकाव्य

गंगाधर शास्त्री

गंगाधर शास्त्री श्रीनृसिंह शास्त्री के ज्येष्ठ पुत्र थे। इनका जन्म १८५३ ई. में काशी में हुआ था। इनका परिवार मूलतः मैसूर का निवासी था। काशी में । इन्होंने पं. बालकृष्ण भट्ट तथा पं. राजाराम शास्त्री आदि श्रेष्ठ गुरुजनों से वेद, वेदाङ्ग, काव्य शास्त्र आदि का सम्यक् अध्ययन किया । उस समय के गणमान्य विद्वान् श्रीगटूलालजी शास्त्री के साथ हुए शास्त्रार्थ के अवसर पर इनके द्वारा पूरित “बभौ मयूरो लवशेषसिंहः” की अत्यन्त कठिन समस्यापूर्ति आज भी पंडितों में प्रसिद्ध है। इनके पाण्डिल्य से प्रभावित होकर सरकार ने इन्हें सी.आई.ई. की उपाधि दी थी। ‘अलिविलासिसंलापः’ नामक खण्डकाव्य पं. गंगाधरशास्त्री की अद्भुत काव्यप्रतिमा का उदाहरण है। नौ सर्गों में विभाजित इस काव्य के निर्माण का उद्देश्य कवि ने ग्रन्थान्त में इस प्रकार बताया है प्राज्ञैरिदं प्रतिपदध्वनिसावधानै रन्वेक्ष्यमाणमसकृन्नवखण्डकाव्यम्। धर्मार्थकामपरमुक्तिसमीक्षणेषु दाक्ष्यं फलिष्यति सभासु सदादराहम्।। (६/११८) इस काव्य में भारत के तीर्थस्थलों तथा द्वादश दर्शनों (षड्दर्शन, जैन, बौद्ध तथा चार्वाक) का विशद वर्णन है। दर्शन के गूढ़ तत्त्व तथा काव्यात्मकता का समन्वय कवि करने में सफल हुआ है। दार्शनिक चिन्तन की गहराई के साथ सौन्दर्यबोध की रमणीयता यहाँ अनुभूत होती है। पार्वती के वर्णन में कवि कहता है कलिन्दतनयां शिरस्युरसि तुङ्गशैलद्वयं वहन्त्युदरचारितोरगशिशुस्तपो दुश्चरम्। विधाय शरदम्बुदे स्थितिमनीश्वरी बिभ्रती बिभर्ति भजतो जनान् इह हि कापि सौदामनी।। (५/१२) (कोई विलक्षण विद्युत जो कालिन्दी को सिर पर, उन्नत दो पर्वतों को वक्ष पर धारण कर रही है, उदर प्रान्त में सर्प-शिशु को जिसने रखा है, दुश्चरतप करके शरत्कालिक मेघ में असमर्थ स्थिति कर रही है, सेवा करने वाले लोगों का भरण-पोषण करती है।)

  • ‘अलिविलासिसंलापः’ के अतिरिक्त शास्त्री जी ने हंसाष्टक नाम का काव्य भी लिखा था, जिसमें श्लेष के द्वारा आत्मा तथा हंस का युगपत् वर्णन है। गंगाधरशास्त्री के पट्ट शिष्य श्री रामावतार शर्मा ने उनकी प्रशस्ति में उचित ही कहा है १. विवरण के लिये द. काशी की पाण्डित्य परम्परा, पृ. २३६ BER आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ‘गताधोंऽद्य जगन्नाथः नापेक्ष्योऽप्पयदीक्षितः। तर कटुवाग वेङ्कटार्योऽपि सति गङ्गाधरे गुरौ।।’

रामशास्त्री तैलंग

गंगाधर शास्त्री के ही अनुज श्री रामशास्त्री तैलंग काशिराज संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापक रहे, तथा १६२५ ई. में ६५ वर्ष की आयु में इनका देहावसान हुआ था। इन्हें महामहोपाध्याय तथा साहित्यसुधाकर की पदवियों से सम्मानित किया गया था। पं. बलदेव उपाध्याय ने काव्य निर्माण में इनकी प्रतिमा को अलौकिक बताया है। शब्दचयन की दृष्टि से इनका काव्य अत्यन्त उत्कृष्ट है। इनकी रचनाएँ ‘सूक्तिसुधा’ के विभिन्न अंकों में प्रकाशित होती रहीं जिनमें से अधिकांश का विषय ऋतुवर्णन है। ३६ पद्यों में वर्षा विलास, ४E पद्यों में ग्रीष्म विलास ५५ पद्यों में वसन्त-विलास तथा ३६ पद्यों में शरद्विलास-ये चार काव्य महाकवि कालिदास के ऋतुसंहार का स्मरण कराते हैं। इन काव्यों में कवि ने कहीं पर अत्यंत मनोहर कल्पनाओं का वितान खड़ा किया है, तो कहीं जनजीवन के चित्र प्रस्तुत किये हैं। मेघ के गर्जन की उत्प्रेक्षा उसने विद्युत् रूपी प्रिया को डपटते हुए प्रिय की तर्जना में की है सौवर्णवर्णमदचूर्णनदक्षकान्तिं बाले मुधैव भवतीं प्रबिडम्बयन्तीम् । शम्पां प्रकम्पवपुष वनितां स्वकीयां गर्जन्नु तर्जयति वारिधरोऽयमघ ।। ऋतुवर्णनपरक उक्त काव्यों के अतिरिक्त सूर्ययाचना, गौरीस्तवः तथा शिवाश्वधाटी ये तीन काव्य भी तैलंग जी रचित उपलब्ध होते हैं। भाषा का लालित्य और नादसौन्दर्य इन काव्यों में प्रभावोत्पादक है। सूर्ययाचना का यह उदाहरण देखिये संसारघोरसागरतरणिः कल्याणतेजसामरणिः। निःश्रेयसस्य सरणिर्वितरतु करुणामयीं दृशं तरणिः।। शिवाश्वघाटी में अश्वधाटी जैसे अप्रचलित और दुरूह छन्द का आश्रय लेकर तैलंग ने अप्रतिम शब्दवैदुषी का परिचय दिया है। भाषा पर असाधरण अधिकार तथा अनुप्रास के सतत निर्वाह की क्षमता का परिचय उनकी इस रचना से मिलता है। आरम्भिक पद्य है वन्दामहे कमपि वन्दारुलोकमनु मन्दारपादपवरं वृन्दारकेन्द्रसुखकन्दायितं विनतनन्दात्मजस्तुतपदम्। कुन्दावदातमहिवृन्दाञ्चितं विमलमन्दाकिनीभृतजट सन्दारितान्धकमनिन्दास्पदं शिरसि सन्दानितेन्दुमनघम् ।। १. वही पृ. २४E पर उधृत । २. काशी की पाण्डित्य परम्परा, पृ० ३४७ गीतिकाव्य २६३

नारायण भट्ट

नारायण भट्ट सखाराम के द्वारा दत्तक पुत्र के रूप में पालित हुए थे। सखाराम भट्ट जयपुरनरेश सवाई जयसिंह तृतीय (१८१८-१८३४ ई.) के शासनकाल में हुए। नारायणभट्ट वस्तुतः ग्वालियर के पर्वणीकर परिवार में जन्मे थे और इनका जन्मकाल १८५५ ई. है। इनके पिता गोविन्द भट्ट ने संस्कृत में ललिताकरुणाष्टक तथा दुर्गापुष्पाञ्जलिः नामक काव्यों की रचना की थी। नारायण भट्ट बाल्यकाल से ही विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न थे। आठ वर्ष के होने तक इन्होंने लघुसिद्धान्तकौमुदी तथा बारहवें वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते रघुवंश, पुरुषसूक्त आदि का सम्यक अध्ययन कर लिया था। चौदह वर्ष की आयु में इन्होंने ग्वालियर राज्य के शिलालेखों का अंग्रेजी अनुवाद कर के आंग्ल शासकों से पुरस्कार पाया। अपने धर्म भ्राता गंगाराम भट्ट का निधन हो जाने पर ये जयपुर पीठाधिकारी के रूप में जयसिंह द्वितीय के शासन में राजगुरु के पद पर प्रतिष्ठित हुए। उस काल के अनेक प्रतिष्ठित पण्डित तथा कवि इनकी मित्रमण्डली में थे। इनकी सहायता से ही पं० दुर्गाप्रसाद ने काव्यमाला सीरीज का प्रकाशन आरंभ किया था। इनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं-पञ्चपञ्चाशिका (५०० पद्यों का संग्रह), संस्कृतश्लोकशतकसंग्रह (स्वरचित संस्कृत पद्यों का संकलन), स्वमित्रश्लोकसंग्रह, नवीनश्लोक, काव्यभूषणशतक (साहित्यशास्त्र) चतुर्दशीसूत्रीव्याख्या, श्लोकबद्धसिद्धान्तकौमुदी, परिभाषाप्रतिच्छविः, धर्मकल्पलतावृत्तिः आदि। इनके अतिरिक्त ज्योतिष, धर्मशास्त्र आदि पर इनकी अनेक शास्त्रीय रचनाएँ हैं। इनकी मुक्तक रचनाओं में रसिकाष्टक उल्लेखनीय है। यह शृंगारप्रधान काव्य है, जिसकी रचना कवि ने सोहलवें वर्ष में की थी।

परमेश्वर झा

परमेश्वर झा का जन्म मिथिला में सन् १८५६ ई. में तरौनी ग्राम में हुआ। इनके पितामह दरभंगा नरेश श्री छत्रसिंह (१८०७-२६ ई.) के सभा-पण्डित थे। इनके पिता पूर्णनाथ झा अपने समय के अच्छे विद्वान थे। परमेश्वर झा ने श्रेष्ठ गुरुओं से धर्मशास्त्र, सांख्यवेदान्त, व्याकरण तथा न्याय का सम्यक् अध्ययन किया। अध्ययन समाप्ति के पश्चात ये झालरापाटन में संस्कृत शिक्षण के अध्यक्ष नियुक्त हुए। १८८० ई. में यह पद त्याग कर इन्होंने बनैली के राजा पद्मानन्दसिंह की राजसभा में पण्डित का पद ग्रहण किया, पर यहाँ की भी जलवायु प्रतिकूल होने से यह पद भी त्याग कर गंधवारि ड्योढ़ी की महारानी चन्द्रावती के द्वारा स्थापित संस्कृत पाठशाला में प्रधान अध्यापक हो गये और फिर दरभंगा की राजसभा में प्रधानपण्डित के पद पर भी रहे तथा दरभंगाराजसंस्कृत पुस्तकालय के अध्यक्ष पद को भी इन्होंने अलंकृत किया। नाम परमेश्वर को उनके पाण्डित्य के लिये भारतधर्ममण्डल ने “वैयाकरणकेसरी”, बिहार पण्डित सभा ने ‘विद्यानिधि’ तथा भारतसरकार ने महामहोपाध्याय की उपधियाँ दी थीं। इनकी लिखी ३० रचनाएँ मिलती हैं, जिनमें प्रमुख हैं-मिथिलातत्त्वविमर्श, ऋतुदर्शन, यक्षसमागम, परमेश्वरकोष आदि। इनके अनेक ग्रन्थ धर्मशास्त्र तथा ज्योतिष से संबद्ध हैं। “मिथिलातत्त्वविमर्श” इनका अनुसन्धापरक ग्रन्थ है।आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास यक्षसमागम काव्य कालिदास के मेघदूत का उपसंहार कहा जा सकता है। यक्ष और यक्षिणी के पुनर्मिलन के अवसर के प्रमोद का इसमें चित्रण किया गया है। इस काव्य में ३५ पद्य हैं। परमेश्वर झा का अन्य काव्य ‘ऋातुवर्णन” भी कालिदास के ऋतुसंहार से प्रभावित है। पं. बलदेव उपाध्याय ने परमेश्वर झा की काव्यप्रतिभा को विलक्षण बताते हुए उनके यक्षसमागम का यह पद्य उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया है निश्वासस्याप्यधिकखरतां योऽधरस्तेन सेहे धीरो दध्यात् कथमिव तुला पल्लवस्तस्य बालः। बिम्ब निम्बोपमथ रसे का सुधा पीतपीता कान्ते स्वान्ते बहु कलयता तुल्यता क्वापि नापि।। उपाध्यायजी ने इनकी गद्यशैली की भी सराहना की है। परमेश्वर झा के विषय में पं. मधुसूदन ओझा ने यह प्रशस्ति की थी अमृतं मृतकेन लभ्यते मधुनोऽप्येकरसत्वदूषणम् । अधरं मधुरन्न कर्णयौरतुलन्ते रचनं विभावये।।

शिवकुमार शास्त्री

काशी की विद्वन्मण्डली में सदा स्मरणीय पं. शिवकुमार शास्त्री का जन्म काशी के ही निकट उन्दी ग्राम में १८५७ ई. में हुआ। इनके पिता पं. रामसेवक मिश्र तथा माता मतिरानी देवी थीं। शिव की आराधना करने पर इन्हें शिवकुमार के रूप में पुत्र का मुख देखने को मिला था। इनको बाल्यकाल में अपने चाचा के यहाँ रह कर बड़ा कष्ट झेलना पड़ा। चौदह वर्ष की आयु में ये काशी गये और पं. दुर्गादत्त से लघुकौमुदी का अध्ययन करने लगे। अनंतर बाल शास्त्री, राजाराम शास्त्री जैसे विश्रुत पंडितों से ज्ञानार्जन का इन्हें अवसर मिला। १८७५ ई. से १८७E ई. तक ये काशी के संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापन करते रहे। इसके पश्चात् ये दरभंगानरेश द्वारा काशी में ही स्थापित संस्कृत पाठशाला में यावज्जीवन अध्यापन करते रहे। इनकी रचनाओं में ‘यतीन्द्रजीवनचरित’ विविध छन्दों में निबद्ध ११३ पद्यों का मनोहर जीवनचरितात्मक काव्य है, जिसके नायक काशी में दुर्गाकुण्ड के निकट आनन्दबाग में निवास करने वाले भास्करानन्द सरस्वती हैं। चरितनायक के जीवन की घटनाओं का वर्णन करते हुए कवि शिवकुमार जी ने इस काव्य में दर्शन, धर्म और अध्यात्म का समावेश किया है। भाषा की प्रौढ़ता, पदशय्या की आकर्षकता तथा महनीय चरित्र के उपस्थापन के कारण यह काव्य प्रभावित करता है। स्थान-स्थान पर यमक, श्लेष, अनुप्रास आदि शब्दालंकारों के साथ परिकर आदि अर्थालंकारों का विन्यास कुशलता के साथ किया गया है। उदाहरण के लिये गीतिकाव्य कलघौतसुशोभितसौधततिः कलहंसगतिः सुदतीसुततिः। कलनादिरिरंसुपतत्रिततिः कलयेन्न वशं प्रतिपक्षततिः।। ‘लक्ष्मीश्वरप्रताप’ कवि शिवकुमारजी का प्रशस्तिकाव्य है, जिसके नायक दरभंगानरेश लक्ष्मीश्वरसिंह हैं। यह काव्य अब अनुपलब्ध है। पं. बलदेव उपाध्याय द्वारा उद्धृत निम्नलिखित श्लोक से इसके गुणगणातिशय को समझा जा सकता है पूर्णा चान्द्री कला वा दिशि दिशि लहरी क्षीरसिन्धुत्थिता वा कुन्दालीमालिका वा शिवनिलयगिरेः कान्तिरेवोद्गता वा। हंसानां संहतिर्वेत्यवनितलबुधैस्तपते यस्य कीर्तिः योऽयं लक्ष्मीश्वराख्यो जगति विजयते नायकस्तीरभुक्तेः।।’

शीतलप्रसाद त्रिपाठी

इनके देशकाल का विवरण अनुपलब्ध है। इन्होंने करुणात्रिंशिका की रचना की थीं। करुणात्रिंशिका में डुमरांव के राजा राधा प्रसाद के निधन के अनन्तर प्रजा में व्याप्त शौक का मार्मिक चित्रण किया गया है। कवि ने राधा प्रसाद के सद्गुणों का वर्णन भी किया है। इस काव्य की रचना कवि ने डुमराव के राजा के काशी में निधन होने पर की थी। अतः इस काव्य का रचनाकाल १६५१ विक्रमाब्द या १८६४ ई. ठहरता है। जानकीमंगल नामक हिन्दी नाटक के लेखक तथा भारतेन्दु के समकालीन शीतलाप्रसाद त्रिपाठी से इस कवि की अभिन्नता अनुससन्धेय है। हिन्दी नाटक-साहित्य के इतिहास के लेखक श्री सोमनाथ गुप्त ने इन्हीं शीतलप्रसाद त्रिपाठी को ‘रामचरितावली’ का कर्ता होने की संभावना भी सूचित की है। करुणात्रिंशिका में छन्द का चयन अनुरूप है और भाषा भी शोकोद्वेग को व्यक्त करने में समर्थ है। काव्य दिवंगत व्यक्ति को संबोधन के रूप में निबद्ध है। राधाप्रसाद के दिवंगत होने पर कवि को डुमरांव की धरती विधवा सी प्रतीत होती है ‘त्वयि मुक्तिपदं गतेऽधुना, विधवेयं डुमरांवमेदिनी। (पद्य-५)

कन्हैयालाल शास्त्री

कन्हैयालाल शास्त्री का भी जीवन-परिचय प्राप्त नहीं होता है। इनकी संस्कृत रचनाएँ ‘संस्कृत-चन्द्रिका’, ‘विज्ञानचिन्तामणि’, ‘सूर्योदय’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं, जिनसे इनके साहित्य का रचनाकाल अनुमित होता है। इन्होंने काशीश्वरश्लेष, शिवपञ्चाशिका तथा शोकोच्छ्वासः ये गीतिकाव्य लिखे थे। शोकोच्छ्वासः में बीस पद्यों में कवि ने अपने मित्र सर रमेशचन्द्र के निधन पर शोक व्यक्त किया है।

यादवेश्वर तर्करत्न

यादवेश्वर बंगप्रदेश के निवासी थे और रामकृष्ण परमहंस के वशंज थे। इनके पूर्वज रंगपुर जनपद के अन्तर्गत इटाकुमारी ग्राम में निवास करते थे। इन्होंने विशुद्धानन्द सरस्वती से अध्ययन किया था और उनके दिवंगत होने पर ‘अश्रुविसर्जनम्’ १. बिबरण के लिये न.-काशी की पाण्डित्य परम्परा, पृ. २०६-२४ २६६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास नामक शोक-काव्य लिखा था। इन्होंने म.म. कैलासचन्द्र शिरोमणि से न्यायशास्त्र का भी अध्ययन किया था। इनके पाण्डित्य से प्रभावित हो कर वाराणसी में संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य श्री ग्रिफिथ ने इनके लिये पाश्चात्त्य दर्शन का अध्ययन करने की व्यवस्था की। काशी में अध्ययन समाप्त कर के यादवेश्वर जी रंगपुर के हाईस्कूल में शिक्षक नियुक्त हुए। कुछ समय वहीं पर स्थापित महाविद्यालय में भी इन्होंने अध्यापन किया और रंगपुर में ही संस्कृत पाठशाला में अध्यापन करते रहे। इनके अध्यापन की शैली से आकृष्ट हो कर दूर-दूर से छात्र इनके पास पढ़ने आते थे। यादवेश्वर जी को तर्करत्न, पण्डितराज, पण्डितकेशरी तथा महामहोपाध्याय जैसी उस युग की सर्वोच्च उपाधियों से अलंकृत किया गया था। राजनीति तथा समाजसेवा के कार्यों में भी इनकी महती भूमिका रही। इनके संस्कृत में रचित १३ काव्यों का उल्लेख पं. बलदेव उपाध्याय ने किया है, जो इस प्रकार है-शौकतरङ्गिणी, वाणीविजयम्, सुभद्राहरणम्, चन्द्रदूतम्, प्रशान्तकुसुमम्, अश्रुबिन्दुम, अश्रुविसर्जनम्, राज्याभिषेककाव्यम्, रत्नकोषकाव्यम्, अन्नपूर्णास्तोत्रम्, शिवस्तोत्रम्, गङ्गादर्शनकाव्यम् तथा भारतगाथा। इनमें से प्रथम काव्य की रचना इन्होंने मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही कर डाली थी। बंगाली भाषा में भी इन्होंने कविताएँ, उपन्यास तथा वैचारिक गद्य का निर्माण किया। इनके संस्कृत काव्यों में प्रशान्तकुसुमम् का प्रकाशन कलकत्ता से १८८१ ई. में हुआ था। इस काव्य की रचना संसार की असारता के बोध से प्रेरित हो कर की गयी थी। कवि स्वयं कहता है द्विजरामघनाश्रमङ्गतोऽपगताध्वश्रम एष बालिशः। प्रविलोक्य भुवोऽप्यसारतामपि संसारमनन्तमालयम् ।। (उपसंहार पद्य -४) अश्रुबिन्दु तथा अश्रुविसर्जन, दोनों ही करुणरसप्रधान विलापकाव्य हैं। पहला काव्य ब्रिटिश साम्राज्ञी के स्वर्गवास पर १६०१ ई. में लिखा गया था और दूसरा अपने गुरु विशुद्धानन्द सरस्वती के परलोकगमन पर। FE ‘अश्रुविसर्जनम्’ काशी के पण्डितसमाज और सांस्कृतिक क्षितिज से परिचय प्राप्त करने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण रचना है। इसमें २६३ पद्य हैं। मन्दाकान्ता छन्द का प्रयोग यहाँ कवि ने भाव के अनुरूप किया है। भाषा में सहजता और प्रवाह है। विशुद्धानन्द सरस्वती का अनुपम चरित्र श्रद्धाभाव से प्रस्तुत करते हुए कवि ने यहाँ उपमाओं और अन्य अलंकारों का अच्छा प्रयोग किया है। उपमा और अनन्वय के उचित प्रयोग का यह उदाहरण द्रष्टव्य है १. विवरण के लिये देखें-काशी की पाण्डित्य परम्परा, पं. बलदेव उपाध्याय पृ. ५२५-२८ गीतिकाव्य २६७ तेभ्यो दत्वा स्वयमपि तथा तेन सम्भूषितोऽभूत् सिन्धो रत्नं हरिरिव सुरेभ्योऽर्पयन कौस्तुभेन। स्मातैवैयाकरणकृतिभिस्तार्किकैः काव्यकृद्धि र्मीमांसाज्ञैः सदसि सततं विज्ञवेदान्तिकैश्च ।। सांख्याचार्यः स स इव महाविस्मितैर्वीक्ष्यते यः कंसारातिर्हरिरिव जनै रङ्गभूमिं प्रविष्टः।। (जिस प्रकार भगवान विष्णु देवताओं को समुद्र के रत्न अर्पित करके स्वयं कौस्तुभ रत्न से विभूषित हुए, उसी प्रकार वह उन्हें देकर स्वयं शोभा प्राप्त हुए। जिस प्रकार रङ्गभूमि में प्रविष्ट विष्णु को लोगों ने देखा उसी प्रकार उन्हें भी स्मृति, व्याकरण, न्याय, काव्य, मीमांसा तथा वेदान्त एवं सांख्य के पण्डितों ने सभा में उस-उस रूप में, स्मृति आदि के विद्वान् के रूप में, देखा। आरम्भ में कवि ने धरती को युवती तथा काशी को उसके रम्यसुन्दरबिन्दु तथा गंगा को अर्धचन्द्राकृति के रूप में प्रस्तुत करते हुए अपनी कल्पनाशीलता का अच्छा परिचय दिया है एषा धन्या धरणियुवतेः केशसीमन्तसीम स्निग्धज्योतिर्जयति नितरां रम्यसिन्दूरबिन्दुः। काशी यत्र त्रिपुरजयिनो हेमवत्या विलास श्चन्द्रार्धााकृतिसुरधुनी यत्परस्ताच्चकास्ति।। सागरिका (५/४) में प्रकाशित (यह धन्य काशी नगर धरणि रूपी युवती के केश-सीमन्त के प्रदेश में स्निग्ध ज्योति से सम्पन्न रम्य सिन्दूर बिन्दु के रूप में सर्वोत्कृष्ट है जहाँ पार्वती की विलासरूप त्रिपुरारि शिव के अर्धचन्द्र की आकृतिवाली गङ्गा जिसके आगे शोभायमान है।)

विधुशेखर भट्टाचार्य

विधुशेखर भट्टाचार्य का जन्म बंगाल के मालदह जिले के अन्तर्गत हरिश्चन्द्रपुर ग्राम में १० अक्टूबर १८७८ को हुआ था। इनके पिता त्रैलोक्यनाथ भट्टाचार्य कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे थे। विधुशेखर जी ने पारंपरिक रीति से संस्कृत के अध्ययन के साथ-साथ अंग्रेजी का भी अध्ययन किया। छात्रावस्था में ही इनकी काव्यरचना की प्रवृत्ति फलवती हो गयी थी। विशेष अध्ययन के लिये ये काशी आये और वहां म. म. रामावतार शर्मा के साथ मित्रगोष्टी नामक संस्कृतपत्रिका का संपादन तथा प्रकाशन इन्होंने आरंभ किया। विधुशेखर शास्त्री ने पालि तथा तिब्बती भाषाओं में प्रवीणता प्राप्त कर के बौद्ध धर्म और दर्शन का गहन अध्ययन किया था। भारत शासन के द्वारा महामहोपाध्याय तथा शन्तिनिकेतन विश्वविद्यालय के द्वारा मानद डी. लिट. की उपाधियों से उन्हें विभूषित किया गया था। ये तीस वर्ष से अधिक समय तक शान्तिनिकेतन में अध्यापन तथा विद्याराधन में तल्लीन रहे। २६८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इन्होंने सन् १८६६ ई. में दशावतारस्तोत्र की रचना की थी। ‘यौवनविलास’ इनकी शृङ्गारमय रचना है। इसमें पांच विलास हैं तथा नायक और नायिका की अनुरागमय । चेष्टाओं का चित्रण हुआ है। कामसूत्र का प्रभाव तथा अतिरंजित शृंगार भी इसमें मिलता है। मुख्य रूप से सम्भोग शृंगार ही इसमें अभिव्यक्त हुआ है। तथापि अप्रस्तुतविधान के द्वारा विप्रलम्भ की भी अभिव्यक्ति हृदयग्राही रूप में की गयी है। उदाहरणार्थ - निकुचन्मधुकोषचलभ्रमरावलिकतवतो विरहाइ विकला। सरसा नलिनी नयनाञ्जनमागलदसभरैः खलु मुञ्चति हा।।

लक्ष्मी राज्ञी

लक्ष्मी राज्ञी का जन्म मलावार के राजपरिवार में उत्तवलत्तू कुल में हुआ था। इनका जीवनकाल १८४५ ई. से १९०६ ई. तक है। इन्होंने १६०० ई. में ‘सन्तानगोपाल’ नामक सर्गत्रयात्मक खण्डकाव्य की रचना की, जो श्रीमद्भागवत पर आधारित है। डा. कुंजुनि राजा ने इनके एक अन्य ग्रन्थ ‘भागवत-संक्षेप’ का भी उल्लेख किया है। सन्तानगोपाल काव्य कृष्ण, अर्जुन तथा विष्णु के चरित्र के माध्यम से रविवर्मा को शिक्षा देने के लिये रचा गया था। अर्जुन के अनुरोध पर श्रीकृष्ण के द्वारा एक ब्राह्मण के मृत पुत्र को ‘विष्णुलोक से वापस लाने की कथा इसमें विशेष रूप से प्रतिपादित है।

श्रीनिवास दीक्षित

श्री निवास दीक्षित कुम्भकोणम् के निवासी थे। संस्कृतचन्द्रिका पत्रिका के कुछ अंकों में दिये गये उल्लेखों के आधार पर इनका समय उन्नीसवीं शती के मध्य से ले कर बीसवीं शती के दूसरे वर्ष तक है। इनके पिता राम स्वामी और माँ सीताम्बा थीं। इन्होंने गुरुकुल पद्धति से विद्याध्ययन करते हुए चौदह वर्ष की आयु में पूरी सिद्धान्तकौमुदी सिद्ध कर ली थी। इन्होंने उस समय के सुप्रसिद्ध शिवाद्वैताचार्य अप्पयदीक्षित के पास विद्याध्ययन करते हुए शिवाद्वैत का विशेष अभ्यास किया। ब्रह्मविद्या पत्रिका का सम्पादन करते हुए इन्होंने अपने दार्शनिक चिन्तन का विशेष उपयोग किया। संस्कृत में इन्होंने मुक्तक, नाटक, स्तोत्र तथा प्रशस्तियों की रचना की। इनकी शतक रचनाएँ हैं-विज्ञप्तिशतक, कलिवैभवशतक, आस्थानुभवशतक, जगद्गुरुधामसेवाशतक । नाटक के क्षेत्र में इनके तीन प्रबन्ध है-कलिकण्टकोद्धार, शूरमयूरजैवजैवातृ तथा सौम्यसोम। इसके अतिरिक्त उपनिषद् पुराण तथा अध्यात्म पर इनके कई ग्रन्थ है। विज्ञप्तिशतक में राष्ट्र-भावना को अभिव्यक्ति दी गयी है। संस्कृत चन्द्रिका से इसके १८६६ में प्रकाशित होने की सूचना मिलती है। इस काव्य में धर्म तथा नैतिकता के हास पर भी कवि ने वेदना प्रकट की है। कलिवैभवशतक का अपर नाम कलिपरिदेवनशतक भी है।

लक्ष्मणसूरि

इनका समय १८५ ई. से १E१६ ई. पर्यन्त है। इनके पिता मुत्तुसुब्बा अय्यार रामनाड़ के श्री विल्लीपुतुर में पुण्डडेली ग्राम में निवास करते थे। सर्वशास्त्रविशारद होने के कारण लक्ष्मणसूरि को महामहोपाध्याय की पदवी प्राप्त हुई। इनकीरचनाएँ इस प्रकार हैं २६६ गीतिकाव्य महाकाव्य-कृष्णलीलामृत । नाटक-देहलीसाम्राज्य तथा पोलस्स्यवध । गद्य - भीष्मविजय, भारतसंग्रह तथा रामायणसंग्रह । गीतिकाव्य-विप्रसन्देश, सुभगसन्देश, मनःसन्देश, वेङ्कटस्तव। संस्कृतटीकाएँ-उत्तररामचरित, महावीरचरित, वेणीसंहार, बालरामायण रत्नावली आदि पर। वेड्कटस्तवः का रचनाकाल १६०३ ई. है परन्तु इसका प्रकाशन १६१८ ई. में हुआ। सुभगसन्देश का प्रकाशन पूर्णचन्द्रोदय प्रेस तंजौर से हुआ, विप्रसन्देश का प्रकाशन भी इसी प्रेस से १६०६ ई. में हुआ। विप्रसन्देश में शिशुपाल से अपना विवाह निर्धारित कर दिये जाने पर रुक्मिणी के द्वारा एक ब्राह्मण के मुख से श्रीकृष्ण को सन्देश भिजवाया गया है। लक्ष्मणसूरि प्रसन्न, मधुर और उदार शैली के कवि हैं। विप्रसन्देश में सन्देहालंकारसमन्वित सौन्दर्य वर्णन का यह पद्य देखिये किं क्षीराब्धेरतिपरिचयाद् द्रष्टुमभ्यागतोर्मि श्चन्द्रज्योत्स्ना किमु परिचरत्यात्मनोऽक्षय्यतायै। किं वा गङ्गा प्रवहति पुनः किं नु वा मूर्धजानां चूडामुक्ता विडिति बहुथा तय॑ते यन्नखश्रीः ।। (उत्तरभाग,१४) (जिनके नख की कान्ति इस प्रकार बहुत प्रकार से तर्क का विषय होती है क्षीरसागर की ऊर्मि अतिपरिचयवश देखने के लिए पहुंची है क्या? अथवा चन्द्र की ज्योत्स्ना अपने अक्षय्य होने के लिये सेवा कर रही है क्या ? अथवा गङ्गा पुनः प्रवाहित हो रही है क्या? अथवा (उनके) बालों की चूडामणि की कान्ति है क्या ?) रुक्मिणी के सन्देश में आतुरता, विवशता और करुण पुकार के भाव कवि ने मार्मिक रूप से व्यक्त किये हैं सङ्कल्पानामिति बहुशतैर्हर्षशोकादिमूलैः सन्तानेनाविरतमुदितैस्तप्यमानामजस्रम् । किं मां पश्यन्नपि न कुरुषे सन्निधिं नेतुमिच्छां निर्द्वन्द्वानामपि खलु भवेद् मृत्युदुःखेन दुःखम् ।। (उत्तरभाग, ४७) (हर्ष शोक आदि जिनके मूल हैं, ऐसे शताधिक, निरन्तर उदित संकल्प-सन्तान से सतत तप्त हो रही मुझको देखते हुए भी निकट ले जाने की इच्छा क्यों नहीं करते हो? द्वन्द्व रहित लोगों को भी मृत्यु के दुःख से दुःख होता है।)

ए. आर. राजवर्मा

ए. आर. राजवर्मा का जन्म १८६३ ई. में चन्नासेरी के लक्ष्मीपुरम् राजप्रसाद में हुआ। इनके पिता भरणीतिरुनाल तम्पूरत्ती थे। केरलवर्मा इनके पितृव्य थे। इन्होंने उनसे भी शिक्षा पायी थी। बाल्य से ही ये पद्यरचना करने लगे थे और बालकवि कहे जाते थे। १८८६ ई. में इसी राज्य में संस्कृत विभाग के सुपरिटेंडेंट नियुक्त २७० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास हुए। इन्होंने ‘नारायणभट्ट और उनका कृतित्व’ इस विषय पर अनुसंस्थान कार्य किया था। १६१८ ई. में इनका देहावसान हो गया। मलयालम में लिखे ‘केरलपाणिनीय’ ग्रन्थ के कारण इन्हें केरलपाणिनि की उपाधि मिली थी। संस्कृत में आङ्ग्लसाम्राज्य (महाकाव्य), गैर्वाणीविजय (रूपक), उद्दालकचरित (गद्यकाव्य) तथा विटविभावरी, वीणाष्टक, देवीमङ्गल, देवीदण्डक, मित्रश्लोक, पितृवचन, राममुद्रासप्तक, मेघोपालम्भ तथा पद्मनाभशतक अदि गीतिकाव्यों की रचना इन्होंने की। विटविभावरी इनकी उल्लेखनीय रचना है। इसमें शृंगाररस की प्रमुखता है। यह चार यामों में विभक्त है और राधाकृष्ण के प्रेम का इसमें चित्रण है। नायिका राधा की विभिन्न प्रेम-दशाओं का चित्रण कवि ने तल्लीन भाव से किया है। यथा व्याधि के चित्रण में पार्श्वगप्रियसखीकरलीनां पाणिपद्मधृतपाण्डुकपोलाम्। प्रेमभूः सुपरिमार्जितचक्षुः प्रेयसी प्रियतमोऽथ ददर्श।। (३/११) (प्रेम के आधार, सुपरिमार्जित नेत्र वाले प्रियतम ने बगल में बैठी प्रियसखी के हाथ पर पड़ी तथा अपने पाणि-पद्म पर पाण्डुवर्ण कपोल को रखे हुई प्रेयसी को देखा।) कवि ने अलंकारों का मनोरम विन्यास किया है तथा उसके साथ-साथ भावधारा को भी अक्षुण्ण प्रवाहित किया है। स्मृति भाव के साथ अनुप्रास तथा उत्प्रेक्षा का समावेश देखिये अन्येधुराकुञ्चितकण्ठनालं प्रोष्यागताया मधुरस्मितं तत्। अपाङ्गमालामयकीलजालैरद्यापि मे चेतसि खातमास्ते।। (२/७) (दूसरे दिन, कण्ठनाल को सिकोड़कर उसने जो मधुर स्मित किया वह मेरे चित्त में कटाक्षमाला के कीलों के साथ आज भी गड़ा हुआ है।)

महावीर प्रसाद द्विवेदी

ये हिन्दी साहित्य में युगप्रवर्तक आचार्य के रूप में विख्यात हैं। इनके संस्कृत-प्रबन्धों के अनुवाद भी विश्रुत हैं। ये समय-समय पर संस्कृत काव्य-रचना करते रहते थे। अपनी पत्नी का स्मारक बनवा कर उस पर स्मृति लेख संस्कृत में पद्यबद्ध कर इन्होंने लगवाया था। अपने साहित्यिक मित्रों को भी कभी-कभी ये संस्कृत में पद्यात्मक पत्र लिखते थे। काशी के श्रीराम पत्र के संपादक ने इनसे लेख भेजने का अनुरोध किया, उस समय ये रुग्ण थे और इन्होंने श्रीराम के श्लेष का संकेत करते हुए पत्र के संपादक को शिखरिणी छन्द में यह मार्मिक पत्र लिखा था अनेकाधिव्याधिव्यथितहृदयं दीनवदनं विहीनं पुत्रादिस्वजनसमुदायेन जगति। अतित्रस्तं ग्रस्तं हतविधिविलासैः सपदि मां शरण्य श्रीराम त्रिभुवनपते पाहि रमया।। २७१ गीतिकाव्य क्षीणशक्तिर्जराजीर्णो मन्ददृष्टिरहं बुध। पत्रादाने प्रदाने च न समर्थोऽस्मि क्षम्यताम् ।। (त्रिभुवन के पति शरणागत रक्षक हे श्रीराम, अनेक आधि-व्याधियों से व्यथित हृदय वाले दीन मुख वाले, पुत्र आदि स्वजन समुदाय से रहित, संसार में अतिशय त्रस्त, हत भाग्य-विलास से ग्रस्त मुझे शीघ्र आप रमा (सीता) के साथ बचाइये। हे विद्वान, मेरी शक्ति क्षीण हो चुकी है, जरा से जीर्ण हूँ तथा दृष्टि भी मंद पड़ गयी है, अतः पत्र-व्यवहार में समर्थ नहीं हूँ, अतः क्षमा करें।) द्विवेदी जी की संस्कृत कविताएँ उनके सुमन नामक काव्यसंकलन में संगृहीत हैं। इनमें से प्रमुख मुक्तक रचनाएँ हैं-कथमहं नास्तिकः, कान्यकुब्जलीलामृतम्, समाचारपत्रसम्पादकस्तवः, तथा सूर्यग्रहणम्। कथमहं नास्तिकः ? शीर्षक कविता में छद्म धार्मिकता का विरोध करते हुए युगानुरूप सच्ची आस्तिकता का स्वरूप उद्घाटित किया गया है नित्यं जपामि यदहं शुचि सत्यसूत्रं लोके तदस्तु मम मन्त्रजपः पवित्रम्। या सज्जनेषु भगवन् मम भक्तिरेषा सैव प्रभो भवतु देवगणस्य पूजा।। सर्वेषु जीवनिचयेषु दयाव्रतं मे श्रेयो ददातु निखिलं नियतव्रतानाम्। अच्छाच्छचन्दनरसादपि शीतदो मा मानन्दयत्वनिशमीश परोपकारः।। (जो कि मैं पवित्र सत्य-सूत्र का नित्य जप करता हूँ, अतः वह मेरा मन्त्र-जप पवित्र हो और हे भगवन, सज्जनों के प्रति जो मेरी भक्ति भावना है, हे प्रभो, वही देवताओं की पूजा के रूप में स्वीकृत हो! हे ईश्वर ! सभी प्राणियों के प्रति मेरा दया का व्रत मुझे नियम-व्रतों के समय श्रेय को प्रदान करे और स्वच्छ श्वेत चन्दन-रस से भी अधिक शैत्य प्रदान करने वाला परोपकार मुझे सदा आनन्दित करे।) ‘काव्यकुब्जलीलामृतम्’ में ३४ पद्य हैं। सामाजिक चेतना तथा व्यंग्य की दृष्टि से यह अनूठी रचना है। कवि ने कान्यकुब्जब्राह्मणों की लोलुपता, पाखण्ड, अन्धविश्वासवृत्ति पर कड़ा प्रहार किया है। व्यंग्य के साथ हास्य का भी अच्छा पुट रचना में दिया गया है। यथा १. विस्तृत विवरण के लिये सागरिका (संस्कृत त्रैमासिक) में प्रकाशित लेख ‘आचार्यश्रीमन्महावीरप्रसादहिवेदिनः संस्कृतकवित्वम्’ द्रष्टव्य है। सागरिका २२/२,पृ. २३-२८ २७२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सदैव शुक्लारुणपीतवर्णपाटीरपकावृतसर्वभाल। आभूतलालम्बिदुकूलधारिन हे कान्यकुब्जद्विज ते नमोऽस्तु।। (सदैव श्वेत, लाल तथा पीत वर्ण के चन्दन पङ्क से चर्चित ललाट वाले, भूतल तक लटके दुकूल वस्त्र धारण करने वाले हे कान्यकुब्ज ब्राह्मण, आपको नमस्कार है।) कान्यकुब्जों की यौतुक (दहेज) के लिये लिप्सा तथा घर में आयी बहू को सताने की दुष्प्रवृत्ति को भी इसी सोत्यास शैली में कवि ने उघाड़ा है अहो दयालुत्वमतः परं किं यथेहितं तद् द्रविणं गृहीत्वा। निन्द्यानपि त्वं विमलं करोषि तदीयकन्यापरिपीडनेन ।। व्याजस्तुति अलंकार के प्रयोग की यह रचना अच्छा उदाहरण है। ‘समाचारपत्रसम्पादकस्तवः’ में भी इसी प्रकार अखबार के सम्पादकों की करतूतों को कवि ने अपने पैने व्यंग्यप्रहारों का विषय बनाया है। छद्म को उघाड़ने में आचार्य द्विवेदी ने गहरी अन्तर्दृष्टि का परिचय दिया है। व्याजस्तुति अलंकार के सटीक प्रयोग, शैली के चुलबुलेपन और शिष्टहास्य के व्यंग्य की प्रखर धार के कारण यह रचना और भी आकर्षक है। कवि की दृष्टि यथार्थवादी है पत्रे स्वकीये जगदेकनेत्रे शिशुं त्रिपादं त्रिशिरस्करं च। सृजत्यजत्रं कुतुकेन तेन सम्पादक त्वं चतुराननोऽसि ।। आकृष्टमुच्चैलघुपत्रमूल्यं नवोपहारादि विघेर्विधाने। समस्तमायाविशिरोमणित्वात् त्वमेव सम्पादक माधवोऽसि ।। ‘सूर्यग्रहणम्’ कविता में सूर्यग्रहण के अवसर पर भारतीय समाज में विभिन्न वर्गों के लोगों का व्यवहार और प्रतिक्रियाएँ उसी पैनी व्यंग्यप्रवण शैली में व्यक्त की गयी हैं। इस अवसर पर ज्योतिषी, पुजारी आदि भोले-भाले लोगों को किस प्रकार मुर्ख बना कर उनसे द्रव्य ऐठते हैं यह कवि ने निदर्शित किया है युद्ध भविष्यति नृपेषु परस्परेषु लोकं गमिष्यति यमस्य रुजा प्रजा च। धान्यं धनं बहु हरिष्यति चौरवर्ग इत्यादि कैश्चिदिह सूरिभिरन्वभावि ।। महावीरप्रसाद द्विवेदी की एक अन्य कविता ‘प्रभात-वर्णन’ उनके निसर्गप्रम का उदाहरण प्रस्तुत करती है। वैदर्भी तथा उत्प्रेक्षा के कल्पनाशील प्रयोग के कारण यह रचना भी रोचक बन पड़ी है। उदाहरणार्थ २७३ गीतिकाव्य ममाचिरात् सम्भविता समाप्तिः शुचा हृदीतीव विचिन्तयन्ती। उषःप्रकाशप्रतिभामिषेण विभावरी पाण्डुरतां बभार।। (शीघ्र ही मैं समाप्त हो जाऊँगी, ऐसा हृदय में सोचती हुई रात्रि उषःकाल के प्रकाश के प्रतिभास के बहाने पाण्डुर वर्ण की हो गयी।) आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने युगानुरूप सरल शैली में नवीन विषयों पर भी लिखा था, पारंपरिक विषयों पर काव्य लिखते समय भी कहीं-कहीं कल्पना की नूतनता प्रकट की है। यद्यपि आचार्य द्विवेदी की हिन्दीसेवा तथा ‘सरस्वती’ मासिक पत्रिका के सम्पादन का अधिकांश काल बीसवीं शती (१६०३ ई. से १६२० ई.) में आता है, पर इनके संस्कृतकवित्व का रचनाकाल अधिकांशतया उन्नीसवीं शती के अन्तर्गत (१८५७ ई. से लगभग १६०० ई.) ही आता है। द्विवेदी जी ने अपनी अनेक संस्कृत कविताएँ ‘सुमन” उपनाम से पत्रिकाओं में प्रकाशित कराई। उक्त रचनाओं के अतिरिक्त संस्कृत में इनकी कुछ और कविताए हैं-शिवाष्टकम्, अयोध्याधिपस्य प्रशस्तिः, मेधमालां प्रति चन्द्रोक्तिः, प्लेगस्तवराजः, काककूजितम् आदि।

सरोजमोहिनी देवी

सरोजमोहिनी देवी का परिचय अप्राप्य है, पर इनकी अनेक कविताएं ‘संस्कृतचन्द्रिका’ के पुराने अंकों में मिलती हैं। क्षणप्रभा’, ‘शशद्वर्णन प्रादृट् आदि काव्यों में इन्होंने स्त्रीहृदय के सौकुमार्य के साथ बड़ी लयात्मक भाषा में प्रकृति के मनोहर चित्र अंकित किये हैं। शरवर्णन का यह पद्य देखिये नीरद इह गर्जति खलु, वर्षति नहि जीवनम् । सन्ततमिव वर्षणप्रिय चातकघनजीवनम् ।।

अन्नदाचरण

महाकवि अन्नदारण का जन्म बंगाल के नोआखाली जिले के अंतर्गत सोमपाड़ा ग्राम में सन् १८६२ ई. में हुआ था। वैदुष्य उन्हें वंशपरम्परा से प्राप्त हुआ। कलकत्ता तथा वाराणसी में उन्होंने उच्चशिक्षा प्राप्त की तथा न्याय-वैशेषिक का विशेष अध्ययन कर के काशी के पण्डितसमाज द्वारा तर्कचूडामणि की उपाधि से अलंकृत किये गये। पिता के द्वारा छोड़े गये ऋण को चुकाने के लिये अपनी सारी संपत्ति नीलाम कर के ये आजीवन अपरिग्रही हो कर रहे तथा अध्यापन का व्यवसाय अपनाया। १. संस्कृतचन्द्रिका ३/१२, १८६४ ई. में प्रकाशित। २. वही, २/५, १८६४, ३. वही, २/७, ८६४, ४. वही, ३/५, १८६५२७४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास अन्नदाचरण काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन करते हुए सुप्रभातम् तदा सूर्योदय पत्रिकाओं के प्रकाशन और सम्पादन के दायित्व का भी निर्वाह करते रहे। उनकी संस्कृत रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और आधुनिक संस्कृत काव्य को उन्होंने चार महत्त्वपूर्ण रचनाएं पुस्तकाकार प्रकाशित करवा कर अर्पित की-दो महाकाव्य रामाभ्युदयम् तथा महाप्रस्थानम् और दो गीतिकाव्यों या लघुकाव्यों के संकलन- ऋतुचित्र तथा सुमनोऽञ्जलिः। ऋतुचित्रम् में छहों ऋतुओं की नैसर्गिक अभिरामता और स्थावर-जंगम जगत में उनसे होने वाले विवर्तन का वर्णन किया गया है। सुमनोञ्जलिः में विभिन्न विषयों पर रचना है जिनके शीर्षक इस प्रकार हैं- ‘प्रणतिः" आशा, शिशुहास्यम्, दशासादृश्यम्, किमेष भेद, श्मशानम्, का गतिः, आत्मनिवेदने उपदेशः, परिणामभूमिदर्शनम्, गन्तव्यस्थाननिर्देशः, कल्पना, वनविहङ्गः, निद्रा, क्व सुखम्, तदतीतमेव तथा प्रार्थना। अन्नदाचरण का एक अन्य खण्डकाव्य ‘क्व गच्छामि’ जो उक्त दोनों संकलनों में सम्मिलित नहीं है, संस्कृतचन्द्रिका में प्रकाशित हुआ था। अन्नदाचरण के लघुकाव्यों में भाषा की प्रासादिकता तथा अभिव्यक्ति की सुस्पष्टता है। उस समय की सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों की प्रतिच्छवि भी उनकी कविताओं में मिलती है। सामाजिक विषमता तथा अन्याय और दरिद्र जनों के शोषण के विरुद्ध उन्होंने अपना स्वर मुखरित किया है। शार्दूलविक्रीडित और स्रग्धरा जैसे लंबे छन्दों का उन्होंने प्रयोग नहीं किया है। उपेन्द्रवजा, द्रुतविलम्बित जैसे छन्दों का प्रयोग इनकी कविताओं में अधिक है। । ‘ऋतुचित्रम्’ पर यद्यपि कालिदास के ऋतुसंहार का प्रभाव व्यक्त है, तथापि कवि ने अपने देश-काल और विशेषतः भारतीय जन-जीवन की दशा पर दृष्टिपात किया है। वर्षों के आगमन पर किसानों के विषय में वे लिखते हैं - सुवर्षणैः कुत्रचिदत्र शस्यसम्पन्निदानैः कृषकाः प्रफुल्लाः। क्वचिन्निराशत्वविषण्णभावमीयुः समन्ताद् बत तद्वियोगात्। अहो इदानी कतिचिद् दरिद्रा अनावृते वृष्टिजलाभिषिक्ते। गृहे ऽतिदुःखैर्निजदुष्कृतानि स्मृत्वैव मर्मव्यथया रुदन्ति।। (१०,१५) (यहाँ कहीं पर अच्छी वर्षा होने से कृषक लोग सस्य सम्पदा के कारण प्रसन्न हैं, कहीं पर वर्षा के पूरे अभाव के कारण नैराश्य और विषाद को प्राप्त कर रहे हैं। खेद । कि आजकल कुछ गरीब लोग छाजन से रहित, बरसान के पानी से भीगे गृह में अतिदुःख के कारण अपने पापों को याद करके मर्मान्तक व्यथा से रो रहे हैं) ‘दशासादृश्यम्’ शीर्षक कविता में अन्नदाचरण ने समाज में व्याप्त विषमता पर खेच प्रकट किया है। इसी बात को ‘किमेष भेदः’ शीर्षक कविता में भी ये कहते हैं - गीतिकाव्य एको रसज्ञासुखदं सुभोज्यं प्राचुर्यतो भोक्तुमहो न शक्तः। न विन्दतेऽन्योऽणुकमन्नचूर्ण किमेष भेदः समदर्शि सर्गे।।।। एकः शिरीषातिकुमारवस्त्रावृतां सुशय्यामधिशेत एव। न लभ्यतेऽन्येन धरापि शुष्का किमेष भेदः समदर्शि सर्गे ?|| (२, ३) (यह कैसा भेद है जो संसार में दीख पड़ता है कि एक के पास रसना को सुख देने वाला सुभोज्य पदार्थ इतनी मात्रा में है कि उसका उपभोग नहीं कर पाता है और दूसरा अन्न का थोड़ा चूर्ण नहीं प्राप्त करता ! और, एक है जो शिरीष से भी कोमल वस्त्र से ढकी सेज पर शयन करता है, दूसरे को सूखी जमीन भी नसीब नहीं होती!) अन्नदाचरण के काव्य में कोमल भावनाओं, हार्दिक करुणा तथा नये युग के चिन्तन को अभिव्यक्ति मिली। इनकी सभी रचनाओं का प्रकाशन नोआखाली से उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों तथा बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों के बीच में हुआ। उक्त साहित्यिक रचनाओं के अतिरिक्त इन्होंने काव्यचन्द्रिका तथा शब्दशक्तितत्त्व नामक शास्त्रीय ग्रन्थों का भी प्रणयन किया था।

रामवतार शर्मा

इनके पिता का नाम पं. देवनारायण शर्मा और माता का नाम गोविन्ददेवी था। पाँच वर्ष की आयु से ही इन्होंने संस्कृत के पद्य कण्ठाग्र करना आरंभ कर दिया था। १८८१ ई. में प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण कर के ये राजकीय संस्कृत महाविद्यालय काशी में पण्डित गंगाधर शास्त्री के श्रीचरणों में अध्ययन करने के लिये आ गये। ये बंगीय संस्कृत परिषद्, कलकत्ता विश्वविद्यालय तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय की परीक्षाएँ भी उत्तीर्ण करते हुए १८६७ ई. में प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम स्थान के साथ साहित्याचार्य परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। इस बीच पिता का निधन हो जाने के कारण परिवार के भरण-पोषण का दायित्व इनके ऊपर आ गया। इन्होंने छपरा जिला स्कूल में संस्कृत शिक्षक के पद पर कार्य करना आरंभ कर दिया। इस पद पर कार्यरत रह कर भी वे पंजाब और कलकत्ता विश्वविद्यालयों की कई परीक्षाओं में बैठे और स्वर्णपदकों से अलंकृत हुए। १९०१ ई. से १६०५ ई. तक ये वाराणसी के सेंट्रल हिन्दू कालेज में प्राध्यापक रहे और ११-४-१६०६ से पटना कालेज में। १६०७ ई. में यहाँ से अवकाश प्राप्त होने पर इनकी नियुक्ति कलकत्ता विश्वविद्यालय में हो गयी। वहाँ से ये फिर कुछ समय के लिये पटना कालेज में ही सेवा करते रहे। १E१E ई. से १E२२ तक महामना मालवीय जी के आदेश के अनुसार बिहार शासन से अवकाश ले कर हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में प्राच्य महाविद्यालय में इन्होंने प्राचार्य का पद संभाला। वहाँ से लौट कर पुनः आजीवन पटना कालेज में ही कार्यरत रहे। म. म. रामावतार शर्मा की प्रतिभा बहुमुखी थी और उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं को अपने मौलिक सर्जनात्मक उन्मेष से संपन्न किया। उनकी वैदुषी तो अप्रतिम थी ही। उनके लिखे प्रमुख पद्य काव्य ये हैं -मारुतिशतकम्, शम्भुशतकम्, कृष्णस्तवककल्पतरुः, मुद्गरदूतम्, अभिनवभारतम्, सत्यदेवकथा, शतश्लोकीयं धर्मशास्त्रम् आदि। इनके अतिरिक्त २७६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास शर्मा जी ने धीरनैषधम् नाटक, जयप्रकाशचरितचम्पूः, साहित्यरत्नावली आदि की भी रचना की। उनके लिखे अनेक स्फुट काव्य भी मिलते हैं, तथा-वसन्तवर्णनम्, सरस्वत्यष्टकम्, ज्योर्जप्रशस्तिः तथा अनेक अन्योक्तियाँ। हिन्दी और अंग्रेजी में भी इनका विपुल शोधपूर्ण चिन्तापरक या पाण्डित्यपूर्ण साहित्य है। धीरनैषध नाटक की रचना इन्होंने अठारह वर्ष की आयु में कर डाली थी। मारुतिशतक, शम्भुशतक, कृष्णस्तबककल्पतरुः आदि रचनाओं का लेखनकाल १८६५ ई. के लगभग है, जब इनकी आयु इक्कीस वर्ष की थी। मारुतिशतक स्रग्धरा छन्द में रचित प्रौढ़ रचना है। स्तुतिपरक होने के साथ-साथ यह हनुमान के विलक्षण चरित को भी एक-एक पद्य में ओजस्वी रूप में प्रस्तुत करता है। लंकादहन का दृश्य चित्रित करते हुए कवि कहता है हा मातस्तात हा हा प्रिय इह दयिते वत्स हा क्वासि यातो हा दग्धो हा मृतोस्मि स्फुटति बत शिरो हन्त दैवं नृशंसम्।। इत्थं कोलाहलैर्यो रजनिचरपुरी सम्भृतां दाहकाले चक्रे सोयं कपिर्वः प्रदिशतु सततं सन्ततं सौख्यराशिम् ।। (जिन हनुमान जी ने लड़कादाह के समय रावण की राजधानी में हल्ला मचा दिया और सभी चिल्लाने लगे-हा मातः, हा तात, हा प्यारे, हा प्रिय, हा पुत्र, हा तू कहाँ गया! हा मैं जला, हा मैं मरा, मेरा सिर फूट रहा है, हाय विधाता क्रूर है! वे हनुमान जी आप लोगों को सदा अविच्छिन्न सुख प्रदान करें।) शम्मुशतक अपूर्ण है। यह मन्दाक्रान्ता छन्द में लिखा गया है। मारुतिशतकम् में नृत्यत्यायपदावली का फड़कता हुआ विन्यास है, तो इस काव्य में शिष्ट हास्य, सौकुमार्य और श्रृंगार की छटा का भी भक्तिभाव के साथ अपूर्वयोग हुआ है। दीर्घ समास-रचना में भी कवि ने प्रासादिकता तथा माधुर्य की रक्षा अव्याहत रूप में की है। यथा गौरीदोलतिकाप्रसङ्गविगलद्भस्माङ्गरागोज्ज्वल ग्रीवाहालहलप्रभाच्छुरणया श्यामायितात्मप्रभम्।। मौलिस्थास्नुसुरापगातटवनीवानीरजालोपमं चूडाचन्द्रमरीचिमण्डलमुमानाथस्य मथनात्वघम्।। (उमापति शिव के सिर के चन्द्र का किरण-मण्डल पाप को नष्ट करे, जो गौरी पार्वती की भूलता के सम्पर्क से गिर रहे भस्म के अंगराग के कारण उज्ज्वल है, जिसकी अपनी प्रभा शिव की ग्रीवा में स्थित हालाहल की प्रभा के मिलने से श्यामायित है और जो शिव के सिर पर रहने वाली सुरापगा गंगा के तट-वन के वेतस-जाल जैसा लगता है।) श्रीकृष्णस्तबकल्पतरुः में दो प्रकाण्डों में क्रमशः २२ तथा ४८ पद्य हैं। इसमें माधुर्य तथा भक्तिभाव की तल्लीनता और भी उत्कर्ष पर है। २७७ गीतिकाव्य अभिनवभारतम् शर्माजी की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रचना है। यह १६११ ई. में लिखी गयी थी। इसमें दो तंरग है- भारतीयेतिहासतरङ्गः तथा देशान्तरीयेतिहासतरङ्गः । कवित्वशक्ति के साथ-साथ शर्मा जी की व्युत्पत्ति और देशकालावबोध का भी परिचय इस रचना से मिलता है। भातीयेतिवृत्त की अंतिम पाँचवीं वीची में शर्मा जी ने अपने गुरु गंगाधर शास्त्री तथा पिता की जो प्रशस्ति की है, वह उनकी सहृदयता का उत्कृष्ट उदाहरण है। __ देशान्तरीयेतिवृत्त में अठारह वीचियों तथा ४२४ पद्यों में मिश्र, रोम, फारस आदि देशों का इतिहास प्रस्तुत किया गया है। प्रायः कवि ने वैदेशिक नामों का संस्कृतीकरण कर दिया है, जैसे अलिकचन्द (अलेग्जेंडर), प्रलिम्प (फिलिप) आदि। सा मुद्गरतम् आधुनिक संस्कृत साहित्य में अपने ढंग की निराली ही रचना है, जिसमें शर्मा जी का विलक्षण विनोदी स्वभाव, पैने व्यंग्य की मार, देश के प्रति गहरा लगाव और समसामयिक स्थितियों के प्रति जागरूकता के साथ उनकी प्रगतिशील दृष्टि प्रतिफलित हुई है। यह काव्य मेघदूत की पैरोडी है और १६१४ ई. में इस नवीन विधा की परिकल्पना तथा उसके साथ मौलिकता का निर्वाह शर्मा की विलक्षण प्रतिभा का परिचायक है। १४८ मन्दराकान्ताओं को कवि ने पूर्वमुद्गर, मध्यमुद्गर तथा उत्तरमुद्गर इन तीन भागों में विभाजित किया है। पाखण्ड तथा दम्भ पर ऐसा सोत्प्रास शैली में प्रहार दुर्लभ ही है नीतिव्याख्यासमितिषु तथा धर्मवार्तासदासु प्रायो नाट्येष्वथ शवखनिष्वाश्रमेषूद्भटानाम्। व्यर्थं क्षिप्त्वा भरतवसुधाद्रव्यकोटीः स कीटो देशप्रेमोल्वणमणितिभिर्नाशयामास विद्याम् ।। पूर्वमुद्गर-१५ (नीति की व्याख्या की समितियों, धर्मवार्ता की सभाओं में, नाट्यों में, कब्रगाहों तथा उद्भटों के आश्रमों में उस कीड़े ने प्रायः भारत भूमि के करोड़ों रुपये व्यर्थ गंवाकर देश-प्रेम की भारी-भरकम बातों से विद्या को नष्ट किया है।)

अप्पाशास्त्री राशिवडेकर

अप्पाशास्त्री राशिवडेकर का जन्म१८७३ ई. में हुआ। राशिवडे ग्राम के निवासी श्री सदाशिवशास्त्री इनके पिता थे। कोल्हापुर के पं. कान्ताचार्य से इन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया था और कोल्हापुर में ही आरम्भ से निवास करते रहे। बंगाल के पं. जयचन्द्र शर्मा सिद्धान्तभूषण द्वारा १८६३ ई. से प्रारंभ की गयी प्रतिष्ठित संस्कृत पत्रिका ‘संस्कृतचन्द्रिका’ के सम्पादकत्व का दायित्व इन्होंने सम्भाला, तथा इसके पश्चात् सूनृतवादिनी नाम से पाक्षिक अखबार भी संस्कृत में प्रकाशित करने लगे।

  • अप्पाशास्त्री के पाण्डित्य से प्रभावित होकर बंगीयसंस्कृत परिषद् के सम्मेलन में विद्वानों ने इन्हें वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत किया था। वाराणसी भारत धर्ममण्डल ने उन्हें विद्यालंकार और महोपदेशक की पदवी भी दी थी। २५-१०-१६१३ को उनका निधन हो गया। २७८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास संस्कृत साहित्य की अनेक विधाओं में लेखनी व्याप्त करके अप्पाशास्त्री जीवनपर्यन्त सेवा करते रहे। इन्होंने कलियुग की विषमस्थितियों का चित्रण प्रस्तुत करते हुए ‘अधर्मविपाकम्’ नाटक लिखा था। संस्कृत में अनेक कहानियाँ भी इन्होंने लिखी तथा अनेक प्राचीन ग्रन्थों पर टीकाओं की रचना भी की। कथाएं- इनके लिखे प्रमुख संस्कृत खण्डकाव्य ये हैं- वेषमाहात्म्यम्, व्यसनविमोक्षः, प्राधान्यवादः, बकचापलम्, विमुग्धे विप्रलब्धासि । है इनके खण्डकाव्यों में श्रीमहाराजक्षत्रपतिशाहोः कुमारावाप्तिः, तिलकमहाशयस्य कारागृहवासः, श्रीकण्ठपदभूषणम्, मल्लिकाकुसुमम्, कुसुमस्तबकः, दावानलविलासः, निर्धनविलासः, उद्वाहमहोत्सवम्, आशीर्वचनरत्नमालिका, पञ्जरबद्धः शुकः, वल्लभविलापम्, आक्रन्दनम्, उपवनतटाकम् आदि हैं। अप्पाशास्त्री के संस्कृत काव्य में उस समय की राजनीतिक स्थितियों के प्रति जागरूकता, स्वतन्त्रता संग्राम से संलग्नता, नवीनता और साहस के साथ-साथ नवयुगबोध, दीन और दलितों के प्रति करुणा तथा भारतीय नैसर्गिक सुरम्यता के प्रति आकर्षण व्यंजित
  • इस दृष्टि से उनकी कविता ‘पञ्जरबद्धः शुकः स्मरणीय है। इसमें पंरजबद्ध शुक की अन्योक्ति के माध्यम से पराधीन भारत की वेदना को कवि ने व्यक्त किया है। इस कविता से प्रभावित हो कर हिन्दी कवि मैथिलीशरण गुप्त ने इसका संस्कृत से हिन्दी में काव्यानुवाद किया था, जो महावीरप्रसाद सरस्वती के द्वारा संपादित सरस्वती जैसी श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका में (अगस्त, १६६१) प्रकाशित हुआ था। कवि पराधीनता को मृत्यु के समान दारुण बताता हुआ कहता है शुक सुवर्णमयस्तव पञ्जरो न खलु पजर एष विभाव्यताम् । मुखमिदं ननु हेमशलाकिका रदनशालि मृतैरतिभीषणम्॥ हि शुक, इस अपने सोने के पिंजरे को पिंजरा मत समझ, यह तो सोने की सलाखों रूपी दाँतों वाला मृत्यु का अति भीषण मुख है।) ॐ इसी प्रकार ‘तिलकमहाशयस्य कारागृहवासः’ शीर्षक कविता भी लोकमान्य तिलक के प्रति कवि की श्रद्धा-भावना के साथ-साथ उनकी राष्ट्र सपर्या के प्रति आस्था को व्यक्त करती है। इस कविता में ३७ पद्य हैं। कवि ने अंग्रेज सरकार द्वारा कारागार में तिलक को दिये जाने वाले कष्टों पर संवेदनामय शैली में अपना क्लेश प्रकट किया है। अप्पाशास्त्री जी की अनेक कविताएं प्रकृतिचित्रण से संबद्ध हैं। ‘ऋतुचित्रम्’ उनकी एक श्रेष्ठ कविता है, जिसमें ऋतुसंहार के समान छहो ऋतुओं का क्रमशः सुन्दर वर्णन है। गीतिकाव्य २७६ इसमें कवि ने समकालिक सामाजिक विसंगतियों की ओर संकेत किया है। सहोक्ति अंलकार के मार्मिक निर्वाह के साथ आम जनता की ग्रीष्म ऋतु में अनुभूत कष्टपरंपरा को उद्घाटित करते हुए वह कहता है शस्यं शुष्यति सर्वमेव भुवने पुंसां सहैवाशया प्रम्लायन्ति लता नितान्तमधुना साकं प्रजानां मुखैः। उद्दाम समुदेति च प्रतिपलं चोष्मा समं मानसै स्तापैः क्यापि विलीयते बत शुचावल्यागते यद्धनः।। (संसार में लोगों की आशा के साथ पूरा धान सूखता जा रहा है, अब प्रजा जनों के मुख के साथ लताएं अत्यन्त मलिन हो रही हैं, मन के तापों के साथ प्रतिपल गर्मी बढ़ती जा रही है, ग्रीष्मकाल के आने पर भी मेघ कहीं विलीन है।) शास्त्री जी की वल्लभविलापः कविता अपनी पत्नी के निधन पर लिखी गयी अत्यन्त कारुणिक अभिव्यक्ति है। इस प्रकार उनकी ‘मल्लिकाकुसुमम्’ में भी सुकुमार भावों को व्यक्त किया गया है। इस कविता में एक युवक मालतीलता में केवल एक पुष्प देख कर उसे तोड़ कर फेंक देता है। इस छोटी सी घटना के माध्यम से कवि ने व्यक्ति की बन्धुबान्धवरहित एकाकी स्थिति का करुण चित्र प्रस्तुत किया है। उक्त काव्यों के अतिरिक्त शास्त्री जी ने अनेक स्फुट पद्य तथा स्तुतिपरक काव्य भी लिखे हैं।

रामनाथ

रामनाथ का जन्म उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में हुआ। इनके पिता का नाम कालिदास था। इनके अग्रज उत्तम विद्वान थे। अपनी आर्यालहरी में रामनाथ ने अपना परिचय इस प्रकार दिया है नन्दनकाननकल्पे भुवि कविपिककुलकलस्वनोद्गारैः। नगरे शान्तिपुराख्ये निवसति वसतौ बुधानां यः।। कोशव्याकृतिकाव्यच्छन्दोऽलंकार-तर्कविज्ञानम् । योऽवाप पुण्ययशसः श्रीनाथादग्रजादग्रे।। (कवि रूपी कोकिल के मधुर कूजित के उद्गारों से पृथ्वी पर नन्दन काननके सदृश, बुधजनों के निवास शान्तिपुर नाम के नगर में जो रहता है, जिसने पहले पुण्य यश वाले श्रीनाथ नामक अग्रज से कोश, व्याकरण, काव्य, छन्द, अलंकार तथा तर्क शास्त्रों का विशेष ज्ञान अर्जित किया, कवि कालिदास का पुत्र विनीत इस रामनाथ ने इसकी रचना की।) रामनाथ के तीन काव्यों का उल्लेख मिलता है- वासुदेवविजय महाकाव्य, विलापलहरी तथा आर्यालहरी खण्डकाव्य। इसके अतिरिक्त आर्यालहरी में ही कवि ने अपने विषय में २८० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कहा है- “वेदान्तशास्त्रविषये यस्य च कृतयो विराजन्तें” (१८१७) इससे सिद्ध होता है कि इन्होंने अनेक शास्त्रीय ग्रन्थों की भी रचना की थी। आर्यालहरी का प्रणयन रामनाथ ने राजा यतीन्द्रमोहन के आदेश से किया था। (वही, पद्य सं. ८११) । इस काव्य का प्रमुख विषय श्रृंगार है । आरंभ में गङ्गा, शिव, पार्वती आदि देवताओं की स्तुतियाँ तथा कविप्रशंसा, सज्जनप्रशस्ति, दुर्जननिंदा, सत्काव्यश्लाघा आदि विषय हैं। कुछ पद्य नीतिपरक भी हैं तथा कुछ अन्योक्तियाँ और आधुनिक नवाविष्कृत वस्तुओं से संबद्ध पद्य भी इस काव्य में हैं। विलापलहरी की रचना कवि ने १८६४ ई. में की। इस काव्य में नरकासुर के वध से खिन्न माता पृथिवी का शोक चित्रित किया गया है। मातृहृदय की पीडा का करुण वर्णन यहाँ हुआ है। पुत्र भले ही कितना ही दुष्ट निकल जाय, माता को तो उसके न रहने पर शोक होता ही है। इस काव्य में कृष्ण के कथनों में कहीं-कहीं गीता का प्रभाव झलकता है। यथा हन्ता न कालो, न मृतिर्न चाहं सुतो हतस्ते निजकर्मणैव ।। (पद्य-८१) (उसे काल ने नहीं मारा, न मृत्यु ने और न ही मैंने, तुम्हारा पुत्र अपने कर्म से ही मारा गया।) पृथ्वी के विलाप में करुण रस के साथ वात्सल्य की भी अभिव्यक्ति हुई है आगच्छ शीघ्र सुत सज्जितानि भक्ष्याणि साक्षादमृतोक्षितानि। आदाय बालव्यजनं वधू, पन्थानमुत्पश्यति कातराक्षी ।। (पद्य-६२) (हे पुत्र, शीघ्र आ, साक्षात् अमृत-सिक्त भोज्य पदार्थ तैयार हैं। कातर आँखोवाली मेरी बहू व्यंजन लेकर तेरा बाट जोह रही है।)