०४ बीसवीं शताब्दी- कवि और काव्य

ईसा की बीसवीं शताब्दी का काल संस्कृत काव्य रचना हेतु अत्यन्त उर्वरता का काल रहा। वस्तुतः बीसवीं शताब्दी ही आधुनिक संस्कृत-साहित्य का अर्वाचीनतम काल है। इस कालावधि में भी निरन्तर संस्कृत साहित्य की श्री का संवर्धन होता रहा। अन्य प्रकार के काव्यों की तरह लघुकाव्यों का भी प्रणयन होता रहा। आधुनिक लघुकाव्य के इतिहास की दृष्टि से बीसवीं शताब्दी को दो कालखण्डों में विभाजित किया जा सकता है। स्वातन्त्र्यपूर्व काल तथा स्वातन्त्र्योत्तर काल। भारत में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए चलने वाले लम्बे राष्ट्रीय संघर्ष के कारण संस्कृत-लघुकाव्यों में इसका व्यापक प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ा। इन काव्यों में परतन्त्रता मुक्ति एवं राष्ट्रभक्ति की प्रबल धारा प्रवाहित हुई और सबसे अधिक संख्या में काव्य इसी धारा में लिखे गए। स्वातन्त्र्योत्तर काल अर्थात् बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लघुकाव्य की दिशा में परिवर्तन हुआ। लघुकाव्य का क्षेत्रविस्तार हुआ, अनेक नवीन प्रवृत्तियों एवं शैलियों की उद्भावना हुई। उत्तरोत्तर विषय-वैविध्य भी बढ़ता गया। बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध संस्कृत-लघुकाव्य विधा का चरमोत्कर्ष काल है। अनुदिन बढ़ती युग की दौड़ में बड़े काव्यों के स्थान पर लघु काव्यों की रचना को अधिक प्रोत्साहन दिया गया। लघुकाव्यों की इस दीर्घ परम्परा का विहंगावलोकन करते हुए, हम इस काल के प्रमुख कवियों और उनके काव्यों का समीक्षात्मक विवरण प्रस्तुत करते हैं। १४८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास बीसवीं शताब्दी की काव्य परम्परा का आरम्भ हम उन कवियों से मानते हैं जिनका जन्म तो इस शताब्दी के आरम्भ से कुछ पहले हो गया था, परन्तु उनकी साहित्य-सर्जना का पूरा प्रतिफलन बीसवीं शताब्दी में ही हुआ। अतः यथा सम्भव कालक्रमानुसार इस काल के कवियों के कर्तृत्व का विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

पण्डिता क्षमाराव

इनका रचनाकाल वस्तुतः १६२० ई. सन् से आरम्भ हुआ और संस्कृत-लेखन का आरम्भ १६३१ से हुआ। वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम तथा गांधीजी के जीवन-दर्शन से बहुत प्रभावित थीं, फलतः इनकी सब कृतियों पर इसका प्रभाव पड़ा। और इसीलिए उनमें राष्ट्रभक्ति की लहरियाँ लहरा रही हैं। पण्डिता क्षमा ने महाकाव्य एवं कथाकाव्य भी लिखे, लघुकाव्यों एवं नाट्यकाव्यों की भी सर्जना की। उनके प्रकाशित ग्रन्थ १२ हैं- सत्याग्रहगीता (१६३२), कथापञ्चकम् (१९३४), विचित्रपरिषद्यात्रा (१E३६), शक्ङरजीवनारख्यानम् (१६३६), मीरालहरी (१६४४), उत्तरसत्याग्रहगीता (१९४४), तुकारामचरितम् (१६५०), रामदासचरितम् (१६५३), ग्रामज्योतिः (१६५५), स्वराज्यविजयः (१९६२)। इसके अतिरिक्त ७ एकाङी नाटक, ४ तीन अक्कों वाले नाटक तथा ३५ लघुकथायें आदि भी अप्रकाशित रूप में उपलब्ध हैं। इनके लघुकाव्यों का विवरण इस प्रकार है

विचित्रपरिषद्यात्रा

यह श्रीमती क्षमा की सबसे लघु रचना है जिसमें १६३२ में त्रिवेन्द्रम में हुए ‘अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन’ (ऑल इण्डिया ओरिएण्टल कॉन्फ्रेंस) के अनुभवों का विवरण दिया गया है।

मीरालहरी

कृष्ण-भक्ति में लीन मीरा के जीवन को लेकर कवयित्री क्षमा ने यह काव्य लिखा है। यह पूर्वखण्ड एवं उत्तर खण्ड, दो भागों में विभाजित है। राज परिवार में विवाह होने पर भी कृष्णभक्तिमत्ता मीरा की क्या-क्या प्रताड़नाएँ हुई, क्या कष्ट उन्हें दिये गए, इसका पूरा वृत्त इसमें वर्णित है। मीरा की इस दशा का वर्णन करती हुई क्षमा जी कहती हैं ध्यायन्ती मनसा जपैः प्रणुतिमिः कृष्णप्रसादेप्सिनी लेभे सा क्षणमेकदैव सहसा देवस्य सन्दर्शनम् । दिव्यं तच्च पुनर्विलुप्तमभवत् साऽप्यश्रुधाराजलैः शुष्कापाण्डु ममार्ज वक्त्रनलिनं चेतोवसादं गता।। (मन से जपों और प्रणामों से ध्यान करती हुई, कृष्ण के प्रसाद को चाहने वाली उस मीरा ने सहसा एक साथ उसी क्षण देव कृष्ण का दर्शन पा लिया। पर दिव्य-रूप वे फिर से विलुप्त हो गए और इससे मन में दुःखी हुई मीरा ने आँसुओं के जल की धाराओं से सूखे एवं पीले हुए अपने मुखरूपी कमल को धो डाला।) यह पूरा काव्य भावपूर्ण है, शार्दूलविक्रीडित वृत्त में लिखा हुआ है। ग्रामज्योतिः - यह लघुकाव्य तीन मयूखों में विभाजित हैं प्रथम मयूख का शीर्षक है रेवायाः कथा’ जिसका लघुकाव्य घोषित सूक्तिवाक्य है- ‘देशाच्युदयसक्तानां तृणाय धनसम्पदः। द्वितीय मयूख का नाम है ‘कटुविपाकः’ जिसका लक्ष्य है- ‘परसेवी निजद्वेषी कुलमृत्युर्न संशयः’ तृतीय मयूख ‘वीरभा’ नाम से ख्यात है जिसका सिद्धान्तवाक्य है- ‘दुर्जनोऽपि सतां सङ्गाद् भवत्येव हि सज्जनः ।

स्वराज्यविजयः

यह ५४ अध्यायों का काव्य है जिसमें युगपुरुष महात्मा गान्धी के जीवन के चरम खण्ड में घटने वाली विविध घटनाओं, विशेष रूप से देश के दो खण्ड होकर मिलने वाली स्वराज्य-विजय की घटना की कवयित्री ने दुःख व्यक्त करते हुए लिखा है। गान्धीजी ने हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के रूप में भारत माता का खण्डन चाहने वाले लोगों से कहा था अयि भो बान्धवा मा मा भैष्टास्मिन् प्रस्तुते मनाक् । प्राणेभ्योऽपि हि में प्रेयान् मातृभूमेः सुखोदयः।। खण्डनं स्वशरीरस्य करिष्ये ऽहं सहस्रशः। न तु स्वप्नेऽपि विच्छेदं चिन्तयिष्ये जनुर्भुवः।। (भाइयों ! इस विषय में आप लोग थोड़ा भी मत डरिये। अपनी मातृभूमि का सुखोदय मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। मैं अपने शरीर के हजारों टुकड़े कर लूंगा, पर जन्मभूमि के खण्डन की बात सपने में भी नहीं सोचूंगा।) महात्मा गान्धी की पतितोद्वार, समाज-सुधार आदि सेवाओं का उल्लेख करती हुई, १६४५-४६ वर्ष की घटनाओं का विवरण देती हुई क्षमा देश के खण्डन की विवशताभरी कथा के साथ स्वराज्य प्राप्ति का वर्णन करती हैं। अन्त में गान्धीजी के महानिर्वाण को कवयित्री ने बड़ी भावुकता के साथ अङ्कित किया है। इस प्रकार पण्डिता क्षमाराव बीसवीं शती के संस्कृत काव्य की एक युगनिर्मात्री कवयित्री हैं, जिन्होंने एक ओर संस्कृत को तत्कालीन राष्ट्रीय धारा से जोड़ा और दूसरी ओर आधुनिक युग के अनेक व्यावहारिक एवं राजनीतिक शब्दों का संस्कृत में निर्माण कर अर्वाचीन संस्कृत साहित्य का श्रीसंवर्धन किया। आधुनिक संस्कृत लघुकाव्य को उनका योगदान महनीय एवं अविस्मरणीय है।

प्रभुदत्त शास्त्री

पण्डिता क्षमाराव के जन्म के एक वर्ष बाद अर्थात् १८६२ ई. में प्रभुदत्त शास्त्री का जन्म हुआ और १६७२ तक जीवित रहे। अतः उन्हें बीसवीं शताब्दी का कवि ही मानना उचित है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की शौर्यकथा का उस युग पर पूरा प्रभाव था। अतः शास्त्रीजी ने ‘झाँसीश्वरीशौर्यामृत’ काव्य लिखकर रानी लक्ष्मीबाई के द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गए युद्ध की गाथा को सामने रखा। स्वदेशी के प्रभाववश गान्धीजी ने चारों ओर चर्खे का प्रचार और प्रयोग किया। उसी प्रभाव से कवि ने ‘चर्खावन्दनामृत’ काव्य की रचना की। उन्होंने तीन ‘अमृतकाव्य’ और लिखे-राष्ट्रभक्ति से प्रेरित ‘राष्ट्रध्वजामृत’, आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि के जीवन पर आधारित ‘धन्वन्तरिजन्मामृत’ १५० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास तथा ‘नान्दीश्रद्धामृत’। कवि के दो लघुकाव्य और है -‘संस्कृतवाक्सौन्दर्य तथा ‘श्रीरामकीर्तिकौस्तुभ’।

श्रीकान्तपति शर्मा त्रिपाठी

इनका जन्म सन् १८६२ में गोरखपुर जनपद के एक ग्राम में हुआ था। त्रिपाठी जी ने अपने जीवनकाल में पर्याप्त काव्यरचना की, परन्तु उसका प्रकाशन न हो सका। इधर १८८६ वर्ष में गगनाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद से श्रीकान्त कविताकलापः के नाम से उनके समस्त काव्य-सङ्ग्रह सङ्कलित हैं। अनेक शीर्षकों में विभाजित विविध स्फुट कविताओं के अतिरिक्त कवि द्वारा रचित अनेक सुभाषितों का दर्शन यहाँ होता है। प्रकीर्ण मुक्तक एवं प्रकीर्ण सुभाषित शीर्षक से कवि अनेक सुन्दर पद्यों को उपन्यस्त करता है। गङ्गा, शिव, कृष्ण, कालिका, स्वगुरु आदि की अनेक भावपूर्ण स्तुतियाँ कवि ने लिखी हैं। वनमाला, पुष्करकरण्डक, अरुणोदय, कोजागरा आदि प्राकृतिक उपादानों को ग्रहण कर कवि ने मनोरम चित्राङ्कन किया है। ‘वनमाला’ शीर्षक के अन्तर्गत १ तथा ‘दिव्यालोक’ के अन्तर्गत ५३ श्लोक निबद्ध हैं। “सिंहोन्नताशतकम् एक शतक काव्य है जिसके अन्त में कवि ने अपनी कविता के बारे में लिखा है जानन्ननेकभाषाकल्पं वैभाषिकञ्चयोऽध्यैष्ट। तस्य श्रीकान्तपतेः कृतिमालोक्यान्तरुल्लसन्ति न के।। इसके अतिरिक्त ‘रुक्मिणीहरणम्’, ‘श्येनकपोतीयमाख्यानम्’, ‘निर्वाणामृतम्’, ‘श्रीसीताकटाक्षशतकम्’ आदि कई लघुकाव्यों की रचना त्रिपाठी जी ने की। कवि की लेखनी में शक्ति है, भाषा में प्रौढि और शैली में प्राञ्जलता है। पारम्परिक पण्डितकुल का प्रभाव काव्य पर परिलक्षित होता है। समस्यापूर्ति-परक एक श्लोक द्रष्टव्य है मरालकुलभूषणं स्फटिकमालिकालालितं मुखाब्जमभितः पतन्मधुकरालिझकारितम्। नृणामभयदायकं कनककान्ति सारस्वत कवीन्द्रकुलदैवतं हदि चकास्तु दिव्यं महः ।। (हंसों के समूहरूपी आभूषण वाले, स्फटिकमणि की माला से सुशोभित, मुखरूपी कमल के चारों ओर गिरते हुए भ्रमरों की पंक्तियों के गुञ्जन से गुञ्जित, लोगों को अभय देने वाला, स्वर्णिम कान्ति वाला, बड़े-बड़े कवियों के समूह का देवस्वरूप दैवी सरस्वती सम्बन्धी तेज हमारे हृदय में प्रकाशित हो।)

बदरीनाथ झा १८९३-१९७३

बीसवीं शताब्दी में बिहार में संस्कृत के जो साहित्यकार साहित्य के क्षितिज पर उभरे, उनमें पं. रामावतार शर्मा के बाद ‘कविशेखर बदरीनाथ झा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। १६३६ में प्रकाशित ‘राधापरिणय’ महाकाव्य के अतिरिक्त झा जी की अन्य अनेक कृतियाँ प्रकाश में आई हैं, जैसे प्रमोदलहरी, जो लघुकाव्य १५१ रमेश्वर प्रेस, दरभंगा से १E११ में प्रकाशित हुई। इसमें कवि की आरम्भिक अवस्था की ५३ स्तुतियों को संगृहीत किया गया है। राजस्थानप्रस्थानम् यह एक खण्डकाव्य है जिसमें दरभंगा-महाराज रमेश्वर सिंह की काशी, जयपुर, हिसार, भिवानी, दिल्ली, बीकानेर, चित्तौर, उदयपुर आदि स्थानों की यात्रा का २०५ श्लोकों में रोचक वर्णन है। यह यात्रा दरभंगा-महाराज ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन-संग्रह के उद्देश्य से की थी। ‘अन्योक्तिसाहस्री’-नाम का मुक्तक काव्य १E३८ में काशी से प्रकाशित हुआ था। एक हज़ार अन्योक्तियों से भरी यह रचना दस शतकों में इस प्रकार विभाजित है -जलाशयशतक, खचरशतक, शकुन्तशतक, स्थावरशतक, तरुवरशतक, लताशतक, पशुशतक, यादश्शतक, तथा प्रकीर्णशतक । कविवाणी के विषय में कवि ने अपनी अभिमत दृष्टि इस प्रकार दी है अनलङ्कृताऽपि कविवाग् रमणीया व्यङ्ग्यसङ्गता भवति । निर्भूषणाऽपि रमणीराजति लावण्ययोगेन।। कवि की अन्योक्ति पद्धति का यह पद्य उद्धरणीय है राकेश तेजसा ते ध्वान्तं जगतोऽपसार्य किं विहितम् । यदि कालिमा स्वकीयो द्रागपि दूरीकृतो नायम्।। (हे चन्द्रमा ! तुम्हारे तेज ने यदि अपने इस कलङ्क को झट से दूर नहीं कर दिया तो संसारभर के अंधकार को दूर करके भी क्या कर दिया।) इनके अतिरिक्त कवि के अन्य उल्लेखनीय लघुकाव्य हैं-‘काश्यपकुलप्रशस्तिः’, ‘काव्यकल्लोलिनी’, ‘संस्कृतगीतरत्नावली’ तथा ‘शोकश्लोकशतकम्’ आदि। इस कवि ने अपने कृतित्व से कविशेखर की उपाधि को चरितार्थ किया है।

महीधर वेङ्कटराम शास्त्री

इनका जन्म बीसवीं शताब्दी के प्रथम वर्ष अर्थात् १६०१ ई. में राजमहेन्द्रवर, आन्ध्र-प्रदेश में हुआ था। शास्त्री जी ने संस्कृत में दार्शनिक काव्य लिखने की परम्परा डाली और इस शास्त्रीय परम्परा के दो काव्य लिखे, जिनका विवरण इस प्रकार है ‘मानसरसकेली’-कवि ने इस काव्य को ‘हृदयपद्यं शान्तिकाव्यम्’ कहा है और इसका अंग्रेजी रूपान्तर ‘मिर्थफुल डांस आफ माइंड’ किया है। इसका प्रकाशन १६६६ ई. में हुआ। शास्त्री जी ने दार्शनिक भावभूमि पर इस काव्य को १२ प्रकरणों में विभाजित किया है-बाह्यजगत्, काव्यजगत्, कर्मजगत्, भक्तिजगत्, योगजगत्, नाडीजगत्, चैतन्यजगत् पराशक्तिजगत्, जीवजगत्, अभ्यासजगत् आनन्दजगत् और कैवल्यजगत्। कवि ने इस शान्तरस प्रधान पद्यकाव्य में अन्तःकरण रूप मन के तत्त्व का दार्शनिक चिन्तन किया है। बाह्यजगत् से आरम्भ कर कैवल्य जगत् तक मन के प्राधान्य का प्रतिपादन इसमें किया गया १५२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास है। वस्तु शास्त्रीय है, शैली परिभाषिकपदभूयिष्ठा है। शिखरिणी छन्द का प्रयोग है। मन तथा तदनुरूप अन्यवृत्तियों का विवेचन करते हुए कवि कहता है - मनो बुद्धिश्चित्तं त्वथ पृथगहङ्कार इति तच् चतुर्थायामन्तःकरणमयते कार्यवशतः। मनः संकल्पस्य प्रभुरिति जगत् कार्यमखिलं तदायत्तं तेन प्रचलति चतुर्ध्वस्य महिमा।। (अन्तःकरण कार्य के वश में होकर मन, बुद्धि, चित्त और चौथे अंहकार इन नामों को प्राप्त करता है। मन संकल्प का स्वामी है। इसलिए संसार का सब कार्य उसके अधीन है। इसलिए इन चारों में इसकी महिमा चलती है।) काव्य के ऊपर यह मूलवाक्य अकित है जानाति यश्चित्तगतिं निगूढां स शान्तिमाप्नोति विकारदूरः। ‘दहरचन्द्रिका’-वैयाकरण, साहित्यविद्याप्रवीण, आयुर्वेदविशारद महीधर शास्त्री के इस काव्य का प्रकाशन १६७१ में हुआ। इस काव्य का अंग्रेजी रूपान्तर कवि ने मून लाइट आफ़ थर्ड वेन्ट्रिकल किया है। इस काव्य में भी गूढ एवं जटिल विषय को पद्यबद्ध करके दार्शनिक विषय को काव्यरूप देकर शास्त्रीजी ने सचमुच कठिन कार्य किया है। परब्रह्म भी कृपाप्रप्ति भी कामना इस श्लोक में इस प्रकार व्यक्त की गई है - सहस्रारगर्भ हृदाकाशदहरे विराजत्सुधांशोर्वलक्षोच्चबिम्बात्। निरन्तप्रसाराग्रभूमेर्लसच चन्द्रिकायाः कृपातः समस्तं हि शस्तम्।। सहस्त्रार के गर्भ में, हृदाकाशरूप दावाग्नि में विराजते हुए चन्द्रमा के ऊँचे मण्डल से अनन्त प्रसार की अग्रभूमि में सुशोभित चन्द्रिका की कृपा से सारा विश्व व्याप्त है। समस्त काव्य भुजङ्गप्रयात छन्द में निबद्ध है। इसमें १३७ पद्य हैं। अन्त में कवि कहता है कि यह दहरवन्द्रिका काव्य मनस्सन्ताप करने वालों के हृदय में परमानन्द प्रदान करे। इस प्रकार सृष्टि के गहन दार्शनिक विषयों का काव्य के क्षेत्र में प्रवेश करा कर शास्त्रीजी ने एक विशिष्ट साहित्यिक प्रवृत्ति का प्रवर्तन किया है।

विद्याधर शास्त्री

इनका जन्म ‘मी बीसवीं शताब्दी के प्रथम वर्ष अर्थात् १६०१ में हुआ और वे १९८३ तक जीवित रहे। इन्होंने अनेक लघुकाव्यों की रचना की जिनमें तीन लहरीकाब्य हैं- वैचित्र्यलहरी’, ‘मत्तलहरी’ और ‘लीलालहरी’। एक ‘अनुभवशतक’ नामक लघुकाव्य १५३ शतक काव्य है। तीन काव्य और हैं-‘हिमाद्रिमाहात्म्य’, ‘काव्यवाटिका’ एवं ‘आनन्दमन्दाकिनी।

अमृतवाग्भवाचार्य

आचार्य जी का जन्म १६०३ ई. में हुआ और वे १६८२ तक जीवित रहे। उन्होंने दों स्तोत्र काव्य लिखे-‘परमशिवतोत्र’ एवं ‘मन्दाक्रान्तास्तोत्र’। दो अन्य काव्य हैं-‘राष्ट्रालोक’ तथा ‘अमृतसूक्तिपञ्चाशिका’।

ओट्टूर उष्णि नम्बूदरीपाद

कवि नम्बूदरीपाद का जन्म १६०४ ई. में केरल प्रान्त में हुआ था। आपका ‘राधाकृष्णरसायनम्’ काव्य १६८२ में देववाणी परिषद, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। यह भक्तिरस से परिप्लुत काव्य है। आराध्य राधा और कृष्ण के विषय में कवि के उद्गार व्यक्त हुए हैं। कहीं कवि राधा-कृष्ण की स्तुति करता है, कहीं लीला का वर्णन करता है। वह इस रसायन को भवमहाज्चर से पीड़ित लोगों के लिए स्वास्थ्यकर मानता है। काव्य में २४ शीर्षकों में ५५६ पद्य लिखे गए हैं, जिनमें कहीं कवि नररूप श्रीकृष्णात्मक ज्योति को नमस्कार करता है तो कहीं अपने आराध्य का महत्त्व और अपना लाघव वर्णित करता है। कहीं आत्म-निवेदन करता है तो कहीं कृष्ण की विविध कलाओं का वर्णन करता है। कहीं राधा की अनन्य प्रेमपरता, समर्पणशीलता, त्यागमयता, विरहसाधना, सात्त्विकता आदि गुणों की मनोरम व्यञ्जना करता है, तो कहीं प्रकृति-वर्णन और विविध रसदशाओं को उपन्यस्त करता है। अक्षर-अक्षर में कवि की भक्ति भावना अनुप्रणित है। काव्य में सर्वत्र रस का सागर है, आनन्द की लहरियाँ हैं। समस्त काव्य एक मुक्तक स्तोत्रकाव्य के रूप में है, पर ‘राधाविलास’ प्रकरण में ‘प्रबन्धात्मकता है और वह नौ उल्लासों में विभक्त है। मुख्य रस भक्ति है, वात्सल्य और शृङ्गार दो रस और प्राप्त होते हैं। अलङ्कारों और छन्दों का वैविध्यपूर्ण प्रयोग प्राप्त होता है और उनके अनेक चमत्कार देखने को मिलते हैं। अन्त्यानुप्रासमय भक्तिश्लोक दर्शनीय है कलायकुसुमत्विषे शिरसि बर्हमालाजुषे नवौद्धृतपयोमुषे निगमसौरभेयीपुषे। अघादिखलविद्विषे तरणिजातटे तस्थुषे नराकृतिभुपेयुषे नम इदं परंज्योतिषे ।। (मटर के पुष्प के समान कान्ति वाले, सिर पर मोरपंख की माला धारण करने वाले, नये मेघ के समान, वेद रूपी गाय को पुष्ट करने वाले, पाप आदि दुष्टों से द्वेष करने वाले, यमुना के तट पर स्थित होने वाले मनुष्य की आकृति को प्राप्त करने वाले परम तेज स्वरूप उस कृष्ण को नमस्कार है। सरल भाषा में वियोगव्यथा का यह वर्णन द्रष्टव्य है केशं पयोदे भुकुटीं लतायां नेत्रं सरोजे वदनं शशाङ्के।आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कायं कलाये नटनं तरङ्गे निक्षिप्य राधे क्व गतः प्रियस्ते।।

ब्रह्मानन्द शुक्ल

इनका जन्म १६०४ ई. में उत्तर प्रदेश में हुआ था। आपने महात्मा गान्धी और पं. नेहरू के जीवनचरित पर प्रकाश डालने वाले दो काव्य लिखे ‘श्रीगान्धिचरितम् तथा ‘नेहरूचरितम्’ जिनमें स्वतन्त्रतासङ्ग्राम के स्वरूप का भी दर्शन होता है। श्री गान्धिचरितम् में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये गए अत्याचारों का वर्णन है। उन्हें ‘कुली’ एवं ‘काले’ इन निम्नस्तरीय सम्बोधनों से सम्बोधित किये जाने पर क्षोभ प्रकट किया गया है। साथ ही गान्धीजी के सत्य-अहिंसा आदि साधनों द्वारा देश को स्वतन्त्र कराने का वर्णन किया गया है। इसी बात को आरम्भ में स्थापित करते हुए कवि कहता है अहिंसया सत्यबलेन चैव कार्याण्यसाध्यान्यपि यान्ति सिद्धिम्। इत्थं व्रतं यस्य सदा समृद्ध जयत्यसौ मोहनदासगान्थी।। काव्य के मुखपृष्ठ पर ही कवि ने लिखा है येषामात्माहुतिभिः सम्पूर्णोऽभूत् स्वतन्त्रतायज्ञः। तेषां शाश्वतकीत्यै भूयात् सफला कृतिः सेयम् ।। १६६८ में प्रकाशित ‘नेहरूचरितम्’ भी शुक्ल जी का एक चरित-काव्य है, जिसमें जवाहरलाल नेहरू के समग्र जीवन पर प्रकाश डाला गया है। भारत देश शोभा के वर्णन से युक्त ‘भरतसुषमा’ भी आपका एक लघुकाव्य है।

रमेशचन्द्र शुक्ल

इनका जन्म १६०६ ई. में हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई संस्कृत पाठशालाओं और अन्त में वार्ष्णेय कालेज, अलीगढ़ में अध्यापन कार्य करने में शुक्लजी के जीवन का बहुत भाग बीता। संस्कृत-रचनात्मक साहित्य के प्रणयन में आपकी लेखनी निरन्तर चलती रही। संस्कृत नाटक, निबन्ध, काव्यशास्त्र, स्वतन्त्रता-संग्रामेतिहास आदि विषयों पर रचनाओं के अतिरिक्त शुक्लजी ने अनेक लघुकाव्य लिखे, जो प्रायः राष्ट्रीय सन्दर्भ के ही हैं। इनका विवेचन इस प्रकार है गान्धिगौरवम्-इस काव्य का प्रकाशन गान्धी जन्मशताब्दी वर्ष १६६६ में हुआ। ग्रन्थारम्भ में प्रथम पृष्ठ पर ही कवि ने इसका उल्लेख किया है गान्धिजन्मशताब्या या भाति वेलातिमञ्जुला। तदर्चार्थमिदं किञ्चिदर्प्यते कृतिकैरवम्।। कवि ने स्वतन्त्रता-आन्दोलन के समग्न परिप्रेक्ष्य में गान्धीजी के जीवन पर प्रकाश लघुकाव्य १५५ डाला है। ब्रिटिश शासन का विरोध करने पर गान्धीजी को कठोर कारावास दे दिया गया। इसका वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है मनीषिणं तं जगदेकबन्धु कारालयस्थं विदधुः सिताङ्गाः। मुहुर्मुहुर्भारतभूविभूतिं साध्यात् परं नो विमुखोऽभवत् सः।। इस काव्य में १२५ पद्य हैं जो इन्द्रवजा वृत्त में निबद्ध किये गए हैं। लालबहादुर शास्त्रिचरितम्-इस काव्य का प्रथम संस्करण सन् १८७१ में प्रकाशित हुआ। इसमें भारत के द्वितीय प्रधानमन्त्री लालबहादुरशास्त्री के सरल एवं महान् व्यक्तित्व की गाथा प्रस्तुत की है। आरम्भ में शास्त्रीजी के व्यक्तित्व पर टिप्पणी करते हुए कचि कहता है योऽभूत् प्रकृत्या सरलो विनीतः शान्तिप्रियो भारतमातृभक्तः। ऐक्ये न सत्ये धृतधीरनिष्ठः शास्त्रीड्यते लालबहादुरः सः।। कवि ने शास्त्रीजी के जन्म, शिक्षा-दीक्षा, संस्कार, सरल जीवन की झाँकी प्रस्तुत करते हुए स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनके कूद पड़ने का वर्णन किया है। अन्त में एक-एक पद पर उनके प्रधानमन्त्री पद पर प्रतिष्ठित होने की बातें कवि करता है। अन्य घटनाओं के अतिरिक्त १६६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध की चर्चा कवि ने की है। इस युद्ध के प्रसंग का एक श्लोक द्रष्टव्य है शास्त्री तदा देशजनान् स्वकीयान् उच्चैः सुधीराह्वयति स्म सर्वान् । यत्ते भवेयुः सकलाश्च सज्जाः क्षिप्रं रिपोर्मानविमर्दनार्थम् ।। अन्त में शास्त्रीजी की ताशकन्द यात्रा और ताशकन्द-सन्धि के पश्चात् उनके अकस्मात् हुए निधन का वर्णन कवि ने बड़ी मार्मिकता के साथ किया है। काव्य में १८३ पद्य हैं। वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग अधिक है।

नवभारतपुराणम्

यह तीन सौ पद्यों का काव्य है जिसमें अनेक अर्वाचीन संस्कृत-कवियों के व्यक्तित्व-कृतित्व आदि का विवरण दिया गया है। आधुनिक संस्कृत साहित्य के परिचय के लिए यह काव्य परम उपयोगी है।

भूवैभवम्

इस काव्य में कवि ने भारतभू पर उत्पन्न हुए अनेक महात्माओं, महर्षियों, शास्त्रकारों, विद्वानों, कवियों, लेखकों, दार्शनिकों तथा अन्य महापुरुषों के जीवन और व्यक्तित्व पर स्वल्प प्रकाश डालते हुए उनकी स्तुति की है। किसी विद्वान्-विदुषी पर कुछ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास अधिक पद्य भी प्रस्तुत किये गए हैं। गार्गी, मैन्नेयी जैसी प्राचीन नारियों, वसिष्ठ जैसे ऋषियों, पाणिनि जैसे आचार्यों, शङ्कराचार्य जैसे दार्शनिकों, वाल्मीकि जैसे कवियों का कवि ने पर्याप्त गुणगान किया है। इस काव्य में प्रायः बड़े वृत्तों में निबद्ध २८६ पद्य हैं।

बँगलादेशः

१६७१ वर्ष में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के परिप्रेक्ष्य में लिखे गये काव्य का प्रकाशन १६७२ में हुआ। इस युद्ध की परिणति ‘बैंगलादेश’ नामक स्वतन्त्र राष्ट्र के जन्म में हुई। अपनी स्वतन्त्रता, राष्ट्रियता हेतु संघर्षरत पूर्व पाकिस्तान की जनता को शरण एवं सहायता देने वाले भारत पर पाकिस्तान ने बमबारी कर युद्ध छेड़ दिया। भारत की वीरवाहिनी ने युद्ध में पाकसेना को परास्त किया और अन्ततः पाकसेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा। कवि ने इस युद्ध में अपूर्व शौर्य प्रदर्शित करने वाले कतिपय वीर सैनिकों के युद्ध कौशल का गर्व के साथ बखान किया है। काव्य में २०८ पद्य हैं।

भरतचरितामृतम्

यह २३५ पद्यों का चरितकाव्य है। इसमें कैकेयी के पुत्र भरत के भातृप्रेम एवं त्याग का भावमय वर्णन है। चित्रकूट में भरत राम से अयोध्या वापस चलकर राज्य ग्रहण करने को कहते हैं और राम भरत द्वारा राज्य सञ्चालन में ही प्रजा का कल्याण बताते हैं। इस विवाद में उभरती भरत के चरित की उदात्तता का अंकन कवि ने सुचारू रूप से किया है।

विभावनम्

यह १०१ पद्यों का एक शतक काव्य है जिसमें कवि ने वर्ष १६७० में दिवगत होने वाले संस्कृतकवि पं. ब्रह्मानन्द शुक्ल को भावमय श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है। इस काव्य का प्रकाशन १६७५ ई. में हुआ।

इन्दिरायशस्तिलकम्

अलीगढ़ संस्कृत परिषद् के अष्टम पुष्प के रूप में प्रकाशित ११४ पद्यों के इस काव्य में भारत की प्रथम महिला प्रधानमन्त्री इन्दिरा गान्धी के प्रभाव, महिमा, उपलब्धियों तथा राजनीतिक जीवन की ऊँचाइयों का वर्णन है। देशदारिद्र्य-निवारण, बँगलादेश-निर्माण, श्रमिक-सुरक्षा, पोखरण-परमाणु परीक्षण, अर्यभट्टाविष्कार, बीससूत्रीय कार्यक्रम आदि इन्दिरा गान्धी के जीवन के विविध कार्यकलापों का विवरण इस काव्य में प्रस्तुत किया गया है।

श्रीनेहरूवृत्तम्

इस लघुकाव्य का प्रथम प्रकाशन १ECE ई. में हुआ। ११४ श्लोकों के इस लघुकाव्य में विविध छन्दों में भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू के महान व्यक्तित्व का गुणानुवाद किया गया है। वर्णवृत्तों के नामोल्लेख के साथ कवि ने नेहरूजी का प्रशस्तिगान किया है। नेहरू-जन्म-शताब्दी वर्ष में प्रकाशित होने के कारण यह काव्य अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है।

  • इस प्रकार पं. शुक्ल ने अन्य विधाओं में भी काव्य रचना कर तथा अनेक स्फुट रचनाओं, लेखों आदि से संस्कृत-साहित्य को समृद्ध कर अपना महनीय योगदान किया है। इन काव्यों पर तथा संस्कृत सेवा हेतु आपको अनेक बार उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी तथा दिल्ली संस्कृत अकादमी से पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। लघुकाव्य

जगदीशचन्द्र आचार्य

इनका जन्म १६११ ई. में हुआ। आपके द्वारा रचित कुल सात काव्यों की रचना की सूचना प्राप्त होती है। ये काव्य है - ‘विरहिणी’, ‘सङ्गीतलहरी’, ‘मन्दाकिनीमाधुरी’ और ‘श्रीवासुदेवचरित। ‘गोविन्दगीताञ्जलि’ गीतात्मक काव्य है। ‘ऋतुविलास’ और ‘हंसदूत’ दो काव्य अपूर्ण रूप में प्राप्त होते हैं।

रघुनाथप्रसाद चतुर्वेदी

आपका जन्म १८१२ ई. में हुआ। आपका शिक्षणस्थल एवं कार्यस्थल मथुरा रहा। चतुर्वेदी जी ने कई प्रकार के काव्यों की रचना की। उनकी रचनाओं में व्रज-भाषा का प्रभाव पर्याप्त मात्रा में परिलक्षित होता है। आपके लघुकाव्य प्रमुखतया चार हैं जिनका विवरण इस प्रकार है

शतकद्वयम्

इस काव्य का पूरा नाम है- ‘श्रीमदाचार्य वल्लभतच्छिष्य महाकविसूरशतकद्वयम्’ । स्पष्ट है कि यह काव्य दो शतकों में विभाजित है- प्रथम आचार्य वल्लभशतक है जिसमें १०६ श्लोकों में श्री वल्लभाचार्य का सम्पूर्ण जीवन-परिचय है। उनकी भक्ति के ‘पुष्टिमार्गीय सिद्धान्त तथा समग्र दर्शन को कवि ने उपस्थापित किया है। वस्तुतः आचार्य के पञ्चशताब्दी पर्व पर इस काव्य की रचना विशेष रूप से की गई है। कवि ने इस शतक के अन्त में लिखा है कि पद्यपुष्पों की यह माला संवत् २०३४ में वैशाख-मास में निर्मित की गई है। सूरशतक में कवि ने ब्रजभाषा अष्टछाप के श्रेष्ठ कवि सूरदास का समस्त जीवन परिचय दिया है। जीवन-परिचय के साथ ही उनके कृतित्व, सूरसागर आदि काव्यों का विधिवत् परिचय दिया गया है। सूरदास की जन्मान्धता, साथ ही उत्कृष्ट काव्यरचना पर टिप्पणी करते हुए कवि चतुर्वेदी कहते हैं - काव्यक्षेत्रस्य नेत्रत्वं कोऽत्र धारयितुं क्षमः। माधुर्यपूर्णकाव्येन यश्चातुर्य प्रदर्शयेत् ।। (जो मधुरता से परिपूर्ण काव्य से चतुरता प्रदर्शन कर दे, कवि सूरदास काव्यक्षेत्र का नेत्र बनने में समर्थ है।) इस शतक में १५२ श्लोक हैं। अन्तिम श्लोक के उल्लेखानुसार यह शतक संवत् २०३४में भाद्रपद मास में पूरा हुआ।

शतकाष्टकम्

इस काव्य का पूरा नाम है-‘आदिकविश्रीवाल्मीकि-व्यासकालिदासादि शतकाष्टकम् । यह ग्रन्थ वस्तुतः चतुर्वेदी जी द्वारा आठ संस्कृत-कवियों के विषय में लिखे गए आठ शतकों का संग्रह है। ये आठ कवि हैं आदिकवि वाल्मीकि, महामुनि वेदव्यास, महाकवि कालिदास, भवभूति, भारवि, माघ, बाणभट्ट एवं श्रीहर्ष। शतकों में सर्वत्र अनुष्टुप छन्द का प्रयोग करते हुए कवि ने प्रत्येक कवि के काल, जीवन-परिचय, कृति-परिचय, काव्यगत वैशिष्ट्य, रसयोजना, अलङ्कारयोजना, प्रमुख-पात्र-वर्णन, प्रमुख काव्यसौन्दर्यस्थल’ आदि विविध विषयों को अपने प्रतिपादन में ग्रहण किया है। अनेक स्थानों पर पाद १५८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास टिप्पणियों में अपने कथन के समर्थन में चतुर्वेदी जी ने प्राचीन ग्रन्थों के उद्धरण भी दिये हैं, जिनकी यहाँ काव्य में कोई आवश्यक्ता नहीं थी। वाल्मीकिशतक में बाल्मीकि को अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हुए चतुर्वेदीजी लिखते हैं ऋतुराजामरगिरः काव्यकल्पद्रुमे स्थितम्। । उगिरन्तं त्वार्यधर्म वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ।। प्रत्येक शतक में सौ ही श्लोक नहीं हैं, अपितु सौ से अधिक तथा कहीं-कहीं डेढ़ सौ से अधिक श्लोक हैं। प्रत्येक शतक के रचनाकाल एवं पूर्णता-तिथि का कवि ने विधिवत् उल्लेख किया है। इस प्रकार ये शतक प्रायः विक्रम संवत् २०३४ से २०३६ के मध्य लिखे गए हैं और संग्रह-काव्य का प्रकाशन संवत् २०३६ में हुआ है।

मैक्सिम गोर्की-पञ्चशती

कविवर चतुर्वेदी की यह एक अनुपम काव्य कृति है। विश्व-प्रसिद्ध महान् सर्वहारा लेखक मैक्सिम गार्की के क्रान्तिकारी व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालने वाली यह प्रथम संस्कृत काव्यकृति है। इसका प्रकाशन १८८६ ई. में हुआ। इसमें ५५४ अनुष्टुप श्लोक हैं। रूस के इस प्रसिद्ध साहित्यकार की कथा का आरम्भ करते हुए कवि ने कहा मैक्सिम गोर्की रूसराष्ट्रे तथा साहित्यिकोऽभवत् । साहित्यिकेषु विश्वस्य येन सुख्यातिरर्जिता।। इस रचना का आरम्भ १४ दिसम्बर, १८८७ की उस घटना से हुआ जिसमें रूस के कजान नामक प्रदेश में युवक ने आत्महत्या का प्रयास किया था, परन्तु वह असफल हो गया था। शरीर में गोली मारने के बाद भी आत्मबल से वह जीवित बच गया। उसी युवक के बारे में कवि कहता है। अनन्तरं स युवको मैक्सिमगोर्कीतिनामतः। अस्य देशस्य चोत्कृष्टो लेखकाग्रेसरोऽभवत्।। इसके बाद कवि गोर्की के जीवन-परिचय, रचनाओं, विविध कठिन संघर्षों, त्रासद दुःखों, उनके द्वारा किये गए विविध कार्यों-व्यवसायों, तथा अनेकानेक घटनाओं को कवि व्योरेवार ढंग से देता है। इन कठोर मार्गों से होकर कवि गोर्की का जनवादी साहित्य जन्म लेता है। इस काव्य में उनके रचना-संसार के विविध रूपों और प्रकारों का समीचीन वर्णन प्राप्त होता है। उनके नाटकों, उपन्यासों, कथाकाव्यों के पात्रों तक का विवरण इस पञ्चशती में प्राप्त होता है। इस प्रकार अपने काव्यों के माध्यम से विश्व में समाजवादी-साम्यवादी विचारधारा का प्रसार करने वाले इस महान् रचनाकार पर रची गई यह कृति संस्कृत-काव्य सर्जन के क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी कदम है। इसने संस्कृत भाषा की अन्तर्राष्ट्रीयता एवं अर्वाचीनता, दोनों को सम्बल दिया है।

गान्धीगरिमकाव्यम्

इस काव्य में कवि ने महात्मा गान्धी के महान् व्यक्तित्व को विषय बनाकर उनकी गरिमा का गान किया है। इस काव्य पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी से पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

मुक्तकमौक्तिकम्

इस लघुकाव्य में सुन्दर, जीवनोपयोगी पद्यों का सङ्कलन है। इस प्रकार पं. चतुर्वेदी ने अर्वाचीन संस्कृत साहित्य को प्रभूत योगदान कर उसमें अपना गौरवपूर्ण स्थान बनाया है।

सत्यव्रत शर्मा ‘सुजन’ शास्त्री

इनका जन्म सन् १८१२ में बिहार प्रदेश में हुआ था। आपने श्रीकृष्णभक्तिपरक काव्य लिखा, जिसके आरम्भिक आलेख ‘योतनिका’ में कवि ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह ग्रन्थ गीतिकाव्य (राधाकृष्णयुगलीयरहोगीतिकाव्य) है, यद्यपि यह काव्य अनेक प्रकार के वार्णिक एवं मात्रिक छन्दों में निबद्ध है, परन्तु कवि के अनुसार यहाँ के श्लोक भी गीत हैं। इसलिए छन्द के कारण तो यहाँ श्लोकत्व है, पर भाव-निबन्ध में गीतत्व है। वस्तुतः काव्य के अन्तिम विभाजन ‘गान्धर्वी’ में लगभग ४६ गीतों का भी संग्रह है। अन्य आठ विभाजनों में विविध छन्दों के श्लोक ही हैं। अतः कुल ६ विभाजन इस प्रकार हैं-श्रीध्यानमङ्गलम्, वेणुपुरणम, स्तवस्तबकः, नामविरहः, अश्रुवेणी, प्रेम-निकषः, आर्त्तवार्त्तिः, चित्रजल्पः और गान्धर्वी। इस काव्य का मूलविषय है भक्ति तथा प्रेम। गौडीय, वाल्लभ एवं राधावल्लभीय महान् प्रेमदर्शन ही इस रचना की पृश्ठभूमि में है। कवि कभी राधा तो कभी कृष्ण के चरणयुगल की स्तुति करता है, कभी युगल के प्रति भक्ति प्रकट करता है। यह भक्तिरसाप्लवित पद्य द्रष्टव्य है युगपद्रसद्वय-लसदलात्मके नखरद्रवन्मधुरभावप्रस्रवे धृतकृष्णरागललिते हि राधिका पदयुग्मके मम मनो निलीयताम् ।। (एक साथ दो रसों से सुशोभित होते हुए दलस्वरूप, नाखूनों से द्रवित होते हुए मधुर भाव के प्रवाह वाले कृष्ण के प्रति प्रेम रखने के कारण ललित राधिका के चरणचुगल में मेरा मन विलीन हो जाये ।) राधा-कृष्ण के युगल-प्रणय का प्रस्तुत चित्र कितना मनोहारी है अन्योन्यं प्रतिवीक्ष्य प्रक्रमविकासस्पर्धिपमाननौ कृष्णे नृत्यति वेणुकूजनकले राधानुनृत्ताकुला। चित्रं मन्मथमन्मथो विजयते वामे यदा राधिका संश्लेष्टुं युगलं तदेव हृदयं रोरुद्यमानं मम ।। (दोनों एक दूसरे की ओर देखकर क्रमिक विकास की स्पर्धा करने वाले कमलरूप मुखवाले हैं। वंशी के शब्द में सुन्दर कृष्ण के नृत्य करने पर राधा उनके बाद में नृत्य करने में व्याकुल हैं। १६० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

टी. वी. परमेश्वर अय्यर

इनका जन्म १६१५ ई. में केरल प्रान्त के कालीकट नगर में हुआ। आरम्भ में ये मलयालम भाषा में लिखते थे। बाद में इन्होंने संस्कृत भाषा में रचना आरम्भ की। ‘संस्कृत-साहित्य-प्रोफेसर के रूप में स्विटज़रलैण्ड में कई वर्ष रहे तथा संस्कृतज्ञ के रूप में पेरिस, पूर्व जर्मनी, स्वीडन, वेस्ट इण्डीज़ आदि स्थानों का भ्रमण किया। स्विस्देशप्रकृतिवर्णन के यह स्विटज़रलैण्ड का हिमपातवर्णन अत्यन्त मनोरम है अदृश्याम्भस्तलेऽमुष्मिन् कासारे धूमिकावृते। क्षीराम्भोनिधिरेवायमिति जाता मतिर्मम।। (जिसमें जल का तल दिखाई नहीं पड़ रहा है ऐसे धुंध से ढके हुए इस तालाब में यह क्षीरसागर की रेखा है ऐसी मेरी बुद्धि हुई।) कविवर अय्यर ने स्विटज़रलैण्ड, जर्मनी, स्वीडन आदि देशों के राष्ट्रगीतों का संस्कृत में पद्यानुवाद किया तथा फ्रांस, कनाडा, अमेरिका आदि देशों का बहुधा वर्णन किया। ‘स्विस्देश-प्रकृतिवर्णनम्’ ‘जर्मनीयात्रा-वर्णनम्’ ये दो इनके वैदेशिक यात्रावृत्तपरक काव्य हैं तथा ‘स्वास्थ्यसूक्तिरत्नावली’ में स्वास्थ्यविषयक रोचक पद्य हैं। ये अप्रकाशित काव्य हैं। इनके प्रकाशित काव्यों में प्रमुख है ‘साहित्यकौतुकम्’ काव्य, जो ‘देववाणीपरिषद्’ दिल्ली से १६८३ में प्रकाशित हुआ है। यह काव्य आठ स्तबकों में विभाजित है। स्तबकों का विभाजन अष्टकों में हैं। जो संख्या में ३४ हैं। ये स्तबक विषयानुसार विभाजित हैं। यथा, प्रार्थनास्तबक, देशीयस्तबक, प्रेरकस्तबक, महापुरुषस्तबक मनोरञ्जनस्तबक, उपस्कृतिस्तबक, प्राणामृतस्तषक एवं धर्मोपदेशस्तबक। प्रत्येक अष्टक में आठ-आठ शार्दूलविक्रीडित छन्द हैं। कवि के वर्णनीय विषयों में भक्ति, देशप्रेम, राजनीति, प्रकृति, महापुरुष दर्शन, धर्म आदि हैं। अनेक स्थलों पर कवि तीखे व्यङ्ग्य करता है और समाज-व्यवस्था पर आघात करता है, जैसे ‘राष्ट्रनेत्रष्टकम्’ के अन्तर्गत कवि आधुनिक नेताओं पर कठोर प्रहार करता हुआ कहता है गेहं गेहमुपेत्य तत्परतया चक्रे पुरा याचनां सर्वेषां मतदायिनामुपकृतेर्निर्वाचने स्वस्य यः। पूर्णे लोकसभासदस्यचयने मन्त्री बुभूषुर्मुदा होकच्छत्रधरोपमो विजयते राष्ट्रस्य नेता महान ।। (पहले तो तत्परता के साथ घर-घर जाकर चुनाव में समस्त मतदाताओं से याचना की। लोकसभा के सदस्य के रूप में चयन पूरा हो जाने पर फिर मन्त्री होने की इच्छा वाले एकछत्रधारी राजा के समान राष्ट्र के महान् नेता की जय हो।) । अनेक आधुनिक महापुरुषों के चरित को भी कवि ने उपन्यस्त किया है। कवि अय्यर के दो और प्रकाशित काव्य हैं- आभाणकमजरी तथा सदाशयसमुच्चयः। आभाणकमञ्जरी में अनेक जीवनोपयोगी सुभाषितों एवं सद्वचनों का संग्रह है। इसमें अन्य भाषा की लघुकाव्य १६१ लोकोक्तियों का संस्कृत-पद्यरूपान्तर है। इसी तरह सदाशयसमुच्चय अन्य भाषाओं की सूक्तियों का संस्कृतपद्यरूपान्तर है। इस प्रकार मौलिक एवं अनूदित, प्राचीन तथा अर्वाचीन विषय वाले उभयविध काव्य की रचना करने वाले कवि अय्यर वस्तुतः आधुनिक संस्कृत साहित्य के सफल कवि हैं।

यज्ञेश्वर शास्त्री

इनका जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में विक्रम संवत् १९७२ में हुआ। वे उसी जनपद के नवजीवन किसान कालेज, मवाना में संस्कृत अध्यापक रहे। इनका ‘राष्ट्ररत्नम राष्ट्रभक्तिपरक लघुकाव्य है जिसका प्रकाशन १८७३ में हुआ। कवि ने भारत राष्ट्र के रत्नभूत इक्कीस मनीषियों, वीरों, राजनेताओं का काव्यमय परिचय इसमें प्रस्तुत किया है, जिनमें वीराङ्गना महारानी लक्ष्मीबाई से आरम्भ कर दयानन्द, तिलक, मालवीय, गान्धी, पटेल, लाजपतराय, विनोबा, राधाकृष्णन, नेहरू, सुभाष बोस, राजेन्द्र । प्रसाद, आजाद, भगत सिंह, गफ्फार, किदवई, नायडू, वी.वी. गिरि, शास्त्री, इन्दिरा, कर्णसिंह इन २१ विभूतियों का परिचय दिया है। महारानी लक्ष्मीबाई के वीराङ्गना रूप का वर्णन करते हुए कवि कहता है कृपाणहस्ता तुरगाधिरूढा दुर्गेव दुर्गारिषु चेष्टमाना। विद्युतप्रवेगादसिचालनातू सा न हि क्षणायापि दधे विरामन् ।। (हाथ में तलवार लिये हुए, घोड़े पर चढ़ी हुई, दुर्ग के शत्रु अंग्रेज़ों पर दुर्गा के समान चेष्टा करती हुई, बिजली के वेग से चलने के कारण उसने क्षणभर के लिए भी विराम नहीं किया। कवि ने प्रत्येक महापुरुष के व्यक्तित्व और लघु जीवनवृत्त को अपने इस लघुकाव्य में प्रकाशित करने का प्रयत्न किया है। महात्मा गान्धी के व्यक्तित्व का चित्राङ्कन करते हुए कवि कहता है कौपीनधारी कृशदेहबन्यो हस्ते समालम्बितलम्बदण्डः। आजानु-खादी-पट-वेष्टितश्च स भारतस्य प्रतिभूतिरासीत् ।। (लँगोट धारण करने वाला, दुबले-पतले शरीर वाला, हाथ में लम्बा डण्डा लिये हुए, घुटने तक खादी के वस्त्रों से ढका हुआ वह भारत की प्रतिमूर्ति था।) _ भारत भूमि के सच्चे सेवक एवं भारत राष्ट्र की बलिवेदी पर अपने प्राण निछावर करने वाले लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल तथा युगपुरुष सुभाषचन्द्र बोस को कवि ने मागार रस आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास मार्मिक शब्दों में याद किया है। सुभाष से कवि ने इस प्रकार कहा है सुभाष ! त्वं क्वासि, क्व नु वद विभासि स्ववपुषा यशोभिस्ते देशोऽवजदयमशेषो धवलताम्। स्वदेशाय त्यागः स खलु तव भागः सुनियतो यतो वीतं दास्यं तव तु पुनरास्यं न सुलभम् ।।

विष्णुदत्त शुक्ल

इनका निधन १६६४ ई. में हुआ। उसके पश्चात् डा. ब्रजलाल वर्मा के सम्पादन में उनका काव्य ‘गंगासागरीयम्’ प्रकाशित हुआ। ‘गंगासागरीयम् एक प्रबन्धकाव्य है जिसकी कथावस्तु का आधार परम्परागत गंगावतरण का ही पौराणिक आख्यान है। परन्तु कवि ने कथानक आदि के संयोजन में अपनी विलक्षण काल्पनिकता का परिचय दिया है। काव्य में गङ्गा का विवाह सागर से कराया गया है। इसीलिए यह नाम पड़ा है। काव्य का आरम्भ कालिदास के विश्रुत महाकाव्य ‘कुमारसम्भव’ के आरम्भ की भाँति होता है अस्त्युत्तराखण्डपदे समृद्ध स्वनामधन्यो हिमवान् महीभृत्। आश्यामपेशावरविस्तृतस्य राज्यस्य नान्तं विभवस्य तस्य।। (समृद्ध उत्तराखण्ड नामक स्थान में स्वनामधन्य हिमालय नाम का एक पर्वत है। श्याम से पेशावर तक फैले हुए उसके राज्य के वैभव का कोई अन्त नहीं है।) हिमवान् की कन्या गङ्गा के जन्म से लेकर उसके जीवन के एक खण्ड की कथा इसमें वर्णित है। ऋतुएँ, दिन-रात्रि, प्रातः-सन्ध्या, पर्वत, नद-नदी, सरोवर, सूर्य-चन्द्र, नक्षत्रों, पशुओं, पक्षियों का मोहक चित्रण इसमें प्रस्तुत किया गया है। कवि ने सुन्दर कवित्वमयी शैली में गंगा की वन्दना की है, यथा इयं धरा सैव जटाकलापो विष्णोः पदं ब्रह्मकमण्डलुश्च । पूरा समस्ता कृपया यया सा गङ्गा गिरो मे विमलीकरोतु। पुण्यसलिला गङ्गा के प्रवाह की भाँति कवि का काव्य-प्रवाह भी अव्याहत गति से चला है। माता-पिता द्वारा सन्तान के विषय में कितना हस्तक्षेप होना चाहिए इस बिन्दु पर कन्या गङ्गा और पिता हिमवान का जो विवाद है वह आधुनिक नारी-स्वातन्त्र्य के विचारों का पोषक है। काव्य में नैतिक एवं आध्यात्मिक विचारों का भी सन्निवेश है। अलङ्कारों एवं छन्दों का बहुलता से प्रयोग है। कलेवर की दृष्टि से इसे एक महाकाव्य कहा जा सकता है।

जीव न्यायतीर्थ

कलकत्ता विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्रध्यापक श्री जीव न्यायतीर्थ ने ‘सारस्वतशतक’ नामक शतक चित्रकाव्य की रचना की, जिसका प्रकाशन कलकत्ता विश्वविद्यालय से १६६५ में हुआ। कवि आत्मकथन के रूप में यह स्वीकारता है कि यह काव्य नवीन कल्पना-कौशल से बनाया गया है। आरम्भ में अनेक अनुष्टुपों के माध्यम से कवि ने सरस्वती की वन्दना की है, जैसे स्वस्तिकाबन्ध यमक के प्रयोग द्वारा इस श्लोक में सरस्वती की स्तुति की गई है तामहं तामसे चित्ते नित्यतामरसासनाम् । सारदां सारदाज्योतिर्न संसारमथार्थये ।। कवि ने चित्रकाव्य के विविध पारम्परिक प्रयोगों को दर्शाया है। परन्तु कुछ चित्र कवि द्वारा मौलिक रूप से उद्भूत भी हैं, जैसे घण्टा, वीणा, पुस्तक, हंस, मयूर, विमान, धेनु, महिष, छाग आदि के चित्रबन्ध । लता तन्तु ग्रथित पुष्पमाला को समर्पित करने के लिए कवि ने सरस्वती-स्तुतिपरक लताबन्ध चित्रकाव्य प्रस्तुत किया है लीलाबालाविलासा युवतिबलवती भारती रम्यरगा माता ख्याता स्मितांशुस्मृतशतसितगुर्मालिभा लग्नलक्ष्मीः। आशापाशार्तिशान्त्यै स्फुरतु रतुरसा श्वेतपूतत्रितन्त्री नादहलादप्रदश्रीः सकलकविकलाकौशलं सन्दिशन्ती।। (क्रीडामयी बाला के विलासों वाली, बलवती युवती भारत की सुन्दर गङ्गा माता के रूप में प्रसिद्ध है, जिसके मुस्कान की किरणों से सैकड़ों चन्द्रमा याद आते हैं, कान्तियुक्त लक्ष्मी वाली ऐसी श्वेत और पवित्र त्रिपथगा नाद के आह्लाद को प्रदान करने वाली शोभा से युक्त, समस्त कवियों की कला के कौशल का सन्देश देती हुई आशा के बन्धन की पीड़ा का शमन करने के लिए वेगपूर्वक स्फुरित हो।) इस प्रकार १०८ पद्यों में अन्य अनेक बन्ध चित्रित हैं। कवि के सरस्वती देवी के प्रति भावभरे उद्गार हैं। अतः यह एक स्तुतिप्रधान आधुनिक शतक काव्य है।

ईशदत्त शास्त्री ‘श्रीश’ १९१५-१९४४

ईशदत्तपाण्डेय का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ के ‘मुगमास’ ग्राम में हुआ और अध्ययन वाराणसी में किया। इनके प्रताप-विजय लघुकाव्य का प्रकाशन १६३६ ई. में वाराणसी से हुआ। काव्य सरस्वतीस्तव से आरम्भ होता है। कवि भारतवर्ष और फिर मेवाड़भूमि की कथा का गान करता है और तब ‘प्रतापी प्रताप’-शीर्षक से महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा कहने लगता है। इस शोर्यकथा का एक पद्य इस प्रकार हैआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास अटाट्यमानो एटवीषु सन्ततं स्वतन्त्रतार्थ सकलत्रपुत्रकः। अवाप दुःखं न हि किं व्यथाकुलः स वीरतायास्तनयो वरान्वितः।। (स्वतन्त्रता के लिए पत्नी और पुत्रों के साथ जंगल-जंगल भटकते हुए वीरता के पुत्र वर पाये हुए व्यथा से व्याकुल इस राणा ने क्या-क्या दुःख नहीं झेले!) इसके बाद देश-दशा’ शीर्षक से भारत की तत्कालीन दशा एवं मुगल-साम्राज्य का आधिपत्य वर्णित करता है तथा ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ से भारतभूमि को मुगल-दासता से मुक्त कराने की कठोर प्रतिज्ञा करता है। ‘मान-मान हानिः’ में मानसिंह के तिरस्कार का वर्णन है, और ‘राणा-रणघोषणा’ में राणा प्रताप द्वारा युद्ध की घोषणा कर दी जाती है। ‘रणाणे राणाप्रतापः’ में हल्दी घाटी के भीषण ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन है। ‘कुन्त-कौटिल्यम्’ में राणा के भाले द्वारा शत्रु-दलन दिखाया गया है, ‘चेतक-चक्रमणम्’ में उनके घोड़े चेतक का युद्धनैपुण्य वर्णित है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है निशम्य राणा-कृत-कुन्त-टङ्कृति स चेतकश्चारु चकार हुड्कृतिम् । उदावेगोच्छलदच्छकेसरः चचाल युद्धे ऽप्यचलां प्रचालयन् ।। (राणा के द्वारा किये गए भाले की आवाज़ सुनकर वह चेतक सुन्दर हुकार भरता था। तीव्र वेग वाला, उछलते हुए स्वच्छ गर्दन के बालों वाला वह घोड़ा चट्टानों को भी कँपाता हुआ युद्ध में चला।) _ पूरा काव्य इसी प्रकार की औजस्विनी भाषा से युक्त है। कवि को अलङ्कारों में यमक एवं अनुप्रास अलङ्कारों से विशेष प्रेम है और यह अलङ्कार-कृत पद-सन्निवेश काव्य में विद्यमान वीररस के अधिकाधिक उद्दीपन में सहायक होता है।

ए. वि. कृष्ण वारियर

कृष्ण वारियर द्वारा रचित ‘भारतवैजयन्ती यात्रा च’ दो भागों में विभाजित एक लघुकाव्य है, जिसको स्वयं कवि ने काव्य के शीर्षभाग ‘माइनर पोएम’ की संज्ञा दी है। प्रथम भाग ‘भारतवैजयन्ती’ में ३४ पद्य हैं और यात्रा’ में १४६ । सन् १६४७ में भारत के परतन्त्रता-मुक्त होने पर कवि ने इसे लिखा है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति पर भारत की त्रिवर्ण वैजयन्ती गौरव के साथ फहरा रही है। यह इसी तरह भासित होती रहे इयं भारती भासतां वैजयन्ती जयन्ती मनो मानवानां विशन्ती। लघुकाव्य स्वतन्त्रान् सतो राज्यतन्त्रप्रवीणान सृजन्ती हरन्ती समस्तं जनाधिम् ।। इसी क्रम में कवि भारतमाता की बार-बार स्तुति करता है, गान्धीजी की शान्ति और अहिंसा के मार्ग की प्रशंसा करता है। तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद एवं प्रधानमन्त्री पं. नेहरू की चर्चा करता है। इसमें उपजाति छन्द का सर्वाधिक प्रयोग है। यात्रा वाले उत्तरार्ध भाग में भारत देश की अपनी यात्रा का वृत्तान्त वर्णित है। कवि की यात्रा राम-सेतुबन्ध स्थल से आरम्भ होती है। कवि भारत के विविध प्रदेशों में भ्रमण करता है और वहाँ के वासियों के अलग-अलग रहन-सहन, वेषभूषा आदि का वर्णन करता है, जैसे चण्डीगढ़ प्रदेश में पहुंचने पर सिक्खों का वर्णन कवि इस प्रकार करता है दीर्धेः केशैर्धवलवलयैः कङ्कतैर्लम्बकू.ः कच्छाबन्धैः समरविरतैश्शान्तिरम्यैः कृपाणैः। गात्रैः क्षत्रप्रभवपिशुनैश्चातिकल्याणरूपा जेजीयन्ते विजयसुहृदः ‘केशिनो’ वीरमुख्याः।। (लम्बे बालों, सफेद रंग के कड़ों, बाल बाँधने के कंधों, लम्बी दाढ़ियों, शिर पर बँधी पगड़ियों, युद्ध से विरत, शान्ति के कारण सुन्दर कृपाणों, क्षत्रिय के प्रभाव को सूचित करने वाले शरीरों से अति कल्याणमयी रूप वाले श्रेष्ठ वीर सिक्ख युद्ध में विजय प्राप्त करते हैं।) इसी क्रम में कवि ने हरिद्वार, ऋषिकेश, नंगल, अमृतसर, देहरादून, आगरा, मथुरा, दिल्ली, बनारस, गया, इलहाबाद, बम्बई आदि नगरों का सुन्दर वर्णन किया है। लघु छन्दों के अतिरिक्त कवि ने मन्दाक्रान्ता छन्द का सर्वाधिक प्रयोग किया है। राष्ट्रभक्ति एवं यात्रावृत्त की दृष्टि से यह द्विधा विभाजित स्वयं में एक सुन्दर काव्य है।

के. केशवन् नायर

ये केरल प्रदेश के कवि हैं जो रामकृष्ण गुरुकुल विद्यामन्दिर, पुरनाट्टकरा में संस्कृत-अध्यापक थे। कवि नायर द्वारा रचित ‘निवेद्यम्’ काव्य का प्रकाशन १६७० ई. में हुआ। कवि ने देवी सरस्वती को काव्यरूपी निवेद्य या नैवेद्य समर्पित करते हुए इसका यह नामकरण किया है गैर्वाणीदेवि मातर्महितगणनिधे, सन्ति ते पण्डिताया भूयांसो भूरिसम्पद्विलसितयशसो विश्वविख्यातविद्याः। यद्यल्पज्ञोऽपि तावद् गुणगणविभवैस्तैश्च हीनस्तथापि प्रीत्या दद्यामहं ते विरसमपि गृहाण त्वमेतन्निवेद्यम्।। हि पूजित गुणों की भण्डार माँ संस्कृतदेवी ! तुम्हारे बहुत से प्रभूतसम्पत्ति से सुशोभित यश वाले, विश्वभर में प्रसिद्ध विद्याओं वाले श्रेष्ठ पण्डित हैं। यद्यपि मैं अल्पज्ञ हूँ और विविध गुणसमूहों की सम्पत्तियों से हीन हूँ, फिर भी प्रेम से तुम्हें मैं यह नीरस भी नैवेद्य दे रहा हूँ, तुम इसे ग्रहण करो।) ६६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इस लघुकाव्य में स्फुट रचनायें है जिनको १३ शीर्षकों में विभाजित किया गया है निवेद्यम्, नमस्तस्मै, मुक्तकानि, श्रीरामकृष्णपञ्चकम्, भारतीयप्रतिज्ञा, गुरुप्रणामः, श्रीकृष्णस्तवः, - प्रभावसूर्यः, निवापाञ्जलिः, वितर ते दिव्यदर्शनम्, वाल्मीकिदशकम्, दुष्यन्तानुतापः तथा भारतस्तवः। एक मुक्तक इस प्रकार है कालः कलिमयो यस्मिन विद्या मानमयी नृणाम्। गुरवो लघवो जाताः केरलेषु विशेषतः।। ‘भारतीय-प्रतिज्ञा’ शीर्षक के अन्तर्गत १६६२ में भारत पर चीन का आक्रमण होने पर कवि ने दस अनुष्टुप् छन्द लिखे हैं। ‘निवापाञ्जलिः’ में महात्मा गान्धी की हत्या कर दिये जाने पर उनके हत्यारे को कोसते हुए कवि कहता है नाथुराम इति मर्त्यराक्षसः कोऽपि हिन्दुमतकण्टको शुचिः। देवकल्पमवधीन्महात्मणि लोकसेवनरतं शुचिस्मितम् ।। काव्यः में प्रायः प्रचलित वार्णिक एवं मात्रिक छन्दों को ग्रहण किया गया है। विविध अवसरों पर लिखे गए स्फुट श्लोकों का यह एक सुन्दर संग्रह है।

के. एल. व्यासराज शास्त्री

विद्यासागर, महोपाध्याय, शिरोमणि, साहित्यनिपुण, विद्यालङ्कार उपाधियों से विभूषित व्यासराज शास्त्री प्रेसिडेन्सी कलाशाला, मद्रास में संस्कृताध्यापक थे। इनका ‘महात्मविजयः’ महात्मा गांधी के स्वातन्त्र्य-संग्राम के वर्णन से युक्त लघुकाव्य है। प्रथम श्लोक में ही महात्मा गाँधी के प्रभाव और महत्त्व का वर्णन करते हुए कवि कहता है महात्मगान्धिर्महितापदानः । क्षितौ समन्तात् प्रथिताभिधानः।। मनोवचःकर्मभिरेकरूपो महात्मनामप्यभवन्महात्मा।। महात्मा गांधी के सरल, किन्तु प्रभावी रूप का चित्रण इस काव्य में किया गया है। गांधीजी के जीवन की अन्यान्य घटनाओं का, अन्त में उनकी दुःखद हत्या का वर्णन कवि ने बड़े मार्मिक ढंग से किया है। गोली मारे जाने पर गान्धीजी के गिरने का वर्णन करते हुए कवि कहता है त्वय्यम्ब भूयो मम जन्म भूया दितीव घात्रीमुपगृहमानः। श्रीरामरामेति गिरन् विशोकः शोकाम्बुधौ लोकममज्जयत् सः।। १६७ (हे माता | पुनः तुम पर मेरा जन्म हो ऐसा मानकर मानों, पृथ्वी का आलिङ्गन करते हुए, ‘हे राम राम’ ऐसा कहते हुए शोकरहित उन महात्मा ने संसार भर को शोकसागर में डुबो दिया) काव्य में १०८ श्लोक हैं, उपजाति वृत्त का प्रयोग है।

जयराम व्यंकटेश

कवि श्री जयराम व्यंकटेश पल्लेवार ‘जयेश’ के लघुकाव्य ‘मोहन-मञ्जरी’ का प्रकाशन महाराष्ट्र से गान्धी-जन्म शताब्दी वर्ष १९७० में हुआ। काव्य के ऊपर ही काव्य-काल एवं कवि-परिचय परक श्लोक उद्धृत है। आरम्भ में गान्धीजी के समस्त प्रसिद्ध नामों की व्युत्पत्ति का वर्णन करते हुए कवि कहता है अर्धाम्बरत्वेन निवेदितं वपुः सन्थार्य निष्काञ्चनलाक्षिकं ननु। यातो यदा वर्तुलसंनिवेशकम् मुमोह सभ्यान कृतनाममोहनः।। (आधे वस्त्र से जिसका शरीर ढका रहता है, बिना सोने के ही लाख की तरह चमकने वाले शरीर को धारण कर जब गान्धीजी जाते थे तो मोहननामधारी वे सज्जनों को मोह लेते थे। गान्धीजी की जीवन-कथा, विचारधारा, व्यक्तित्व और उनके आन्दोलन के समग्र रूप को कवि ने रेखाङ्कित किया है। द्वितीय गुच्छ में गान्धीजी के जीवन के विरोधाभासों को कवि ने इस प्रकार प्रकाशित किया है कृशाङ्गयष्टिस्तु करे च यष्टिः तथापि धर्माचरणे समष्टिः। जनस्य कार्ये कृतजीवनेष्टिः अभूच्च रम्या हि तवाङ्गयष्टिः।। गान्धीजी के समकालीन अग्रगण्य नेताओं की भी चर्चा की गई है। अन्त में राष्ट्र हेतु गान्धीजी की आत्माहुति के वर्णन के साथ यह काव्य समाप्त होता है।

पुलिवर्ति शरभाचार्य

कवि शरभाचार्य का जन्म आन्ध्रप्रदेश के गुंटूर जनपद में हुआ था। इनके ‘यशोधरा’ काव्य का प्रकाशन १६७० ई. में हुआ। कवि ने इस काव्य में अवतारी पुरुष गौतम बुद्ध के तत्त्वज्ञान के बाद महाभिनिष्क्रमण कर जाने पर यशोधरा के आर्त विलाप का वर्णन किया है शुद्धान्तकान्ता परिवारमध्ये हठाद् वियोगाशनिपातविद्धा। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास हा नाथ हा वल्लभ हा प्रियेति आक्रन्दयामास भृशं सती सा।। (परिवार के बीच अन्त पुर की कान्ता सती वह यशोधरा बरबस वियोग रूपी वन के गिरने से घायल हुई ‘हा नाथ, हा प्रिय, हा पतिदेव’ ऐसा कहकर ज़ोर से चिल्लाने लगी।) समस्त काव्य को कई शीर्षकों एवं खण्डों में विभाजित कर दिया गया है, यथा महाभिनिष्क्रणम्, एकान्तवासः, गौत्तमतपोनिष्ठा, बुद्धधर्मः एवं भगवदर्शनम् । काव्य में कुल २८६ श्लोक हैं। कवि शब्दाटोप का लोलुप नहीं है, काव्य में कहीं कृत्रिम अलङ्कार-सन्निवेश नहीं है और न अनावश्यक वर्णन हैं। काव्य में सबसे अधिक उपजाति छन्द का प्रयोग है। इसके अतिरिक्त अनुष्टुप, मजुभाषिणी, मालिनी, शिखरिणी आदि वृत्तों का प्रयोग है। ‘भगवदर्शन’ नामक सर्ग में यशोधरा भी भगवान आत्मेश्वर को प्राप्त कर, उनके उपदेश से मोहरहित हो, भिक्षुकी होकर निर्वाण को प्राप्त हुई।

द्विजेन्द्रलाल शर्मा पुरकायस्थ

कवि पुरकायस्थ अध्यापक थे और ‘काव्यतीर्थ’ उपाधि से विभूषित इनके ‘अलका-मिलनम्’ काव्य का प्रकाशन १९५४ ई. में हुआ। कालिदास के मेघदूत की कथा को आगे बढ़ाते हुए कवि ने अलकापुरी में विरहाकुल यक्ष तथा उसकी पत्नी के पुनर्मिलन को विषय बनाकर यह काव्य लिखा है। इसमें दो सर्ग हैं। आद्य सर्ग में विरहिणी का विरहावशेष संक्षेप में प्रकट किया गया है। अन्त्य सर्ग में दोनों का मिलनोत्सव, रागानुभव-भोगों का वर्णन है। मेघदूत के अनुकरण पर ही कवि ने मन्दाक्रान्ता वृत्त चुना है। यद्यपि मेघदूत में मधुरतम भावाभिव्यञ्जन के पश्चात् यह काव्य कोई अतिरिक्त काव्यानन्द प्रदान नहीं कर पाता। कालिदास के वियोग-वर्णन के बाद यह संयोग-वर्णन बहुत फीका-फीका लगता है। प्रिय-मिलन का एक शृङ्गारिक चित्र प्रस्तुत है भावावेगाप्रतिहतमतिः स्पन्दहीनेव तन्वी तं कामार्ता प्रियमुखसुधापानमिच्छुश्चुचुम्ब। नन्दाधिक्यान् मदनविवशा वाक्पटुत्वोज्झिताऽपि स्वाङ्गीकारः स्फुटयति रती नेत्रपातैर्विलोलैः ।। (भावावेग से न मारी गई बुद्धिवाली, स्पन्दनहीन हुई सी, प्रिय के मुखरूपी अमृत के पान की इच्छा करती हुई, काम से पीडित उस छरहरे शरीर वाली नायिका ने नायक का चुम्बन कर लिया। पुनः कामजन्य आनन्द की अधिकता के कारण वाणी की पटुता को छोड़ी हुई वह चञ्चल कटाक्षों द्वारा अपनी स्वीकारोक्ति को प्रकट कर रही है। प्रथम सर्ग में ४१ तथा अन्तिम सर्ग में १६ श्लोक हैं।

वेलूरि सुब्बारावु शर्मा

विशाखापत्तन-स्थित आन्ध्र विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त संस्कृत-आचार्य हैं। उन्होंने मेघदूत के अनुकरण पर ‘दाक्षिणात्य-मेघसन्देश’ नामक काव्य लिखा, जिसका दूसरा नाम ‘सुन्दरीमेघसन्देश’ भी है। खण्डकाव्य श्रेणी में होने पर भी इस लघुकाव्य १EE काव्य को छ: सर्गों में निबद्ध किया गया है। इसमें ३१० पद्य हैं जो मन्दाक्रान्ता वृत्त में ही लिखे गए हैं। यह विरहकाव्य है और प्रियतमा से विरह की स्थिति में विरही नायक की मनःस्थिति का विवेचन करता है। इस काव्य का नायक एक कवि है जो विवशतापूर्वक अपनी प्रियतमा नवोढा पत्नी सुन्दरी से वियुक्त होकर मेंगलोर, पश्चिम समुद्र तट पर जाकर रहता है। वह दक्षिण-पश्चिम मानसून के पहले बादल को देखता है और भारत के पूर्वी समुद्रतट पर स्थित भीमवरम् नामक स्थान में रह रही अपनी नवोढा वधू को प्रणय-सन्देश भेजता है। वह भारत के दक्षिण में स्थित अनेक सुरम्य स्थलों से होते हुए मेघ को आगे बढ़ने का मार्ग बताता है। थोड़ा वक्र होते हुए भी कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र होते हुए मेघ जाता है और लौटते समय मद्रास, मैसूर से होकर आता है। मार्ग के सारे स्थलों का वर्णन कवि ने बड़ी सुन्दरता के साथ किया है। काव्य यद्यपि व्यञ्जना प्रधान है, पर बीच-बीच में शास्त्रीय अवधारणाओं को भी स्थान दिया गया है। वस्तु एवं उसका विन्यास अच्छा है। विरह वर्णन एवं प्रेमविह्वलता का यह पद्य उदाहरणार्थ द्रष्टव्य है नेमे झञ्झाश्वसनविसरा दीर्घनिःश्वासवारा नायं व्याप्ती जलदनिवहः केशहस्तो बिहस्तः। नेमा थारा नवजलमुचामश्रुधारा मृगाक्ष्याः प्रावृण्नेयं घनतरमहाकालरात्रिः प्रियायाः।। (ये आँधी और हवा का फैलाव नहीं है, अपितु लम्बी-लम्बी साँसों का समूह है। यह मेघों का समूह नहीं फैला हुआ है, अपितु नायिका की व्याकीर्ण केशराशि है। ये नये वादलों की धारायें नहीं हैं अपितु उस मृगनयनी के आँसुओं की धारायें हैं। यह वर्षा भी नहीं है, अपितु प्रियतमा की घनी महाकालरात्रि है।) काव्य के विविध प्रसङ्गों, कठिन शब्दों, व्याकरणगत व्युत्पत्तियों एवं विविध शास्त्रीय विषयों के व्याख्यान हेतु स्वयं कवि ने ‘सुन्दरीतोषिणी’ नामक संस्कृत व्याख्या लिखी है, जो काव्य के अवगमन में सहायिका सिद्ध होती है। दूतकाव्य-परम्परा की यह एक और सुन्दर कड़ी है।

श्रीधर भास्कर वर्णेकर

३.७. १९१८ ई. में जन्मे कवि वर्णेकर दीर्घ काल तक नागपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के आचार्य रहे। संस्कृत में अनेक महाकाव्य एवं गीतिकाव्य लिखकर वर्णेकर जी ने राष्ट्रभक्ति तथा ईश्वरभक्ति के कवि के रूप में विशेष ख्यति अर्जित की। आपका एक लघुकाव्य ‘श्रमगीता’ नाम से है जिसमें ११८ पद्य हैं जिसमें गान्धीजी ने श्रम का महत्त्व समझाया है। दूसरे काव्य का विवरण प्रस्तुत है

वात्सल्यरसायनम्

यह काव्य शक १८८४ में शारदागौरवग्रन्थमाला के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ है। इसका दूसरा नाम ‘श्रीकृष्णबाललीलाशतकम्’ भी दिया गया है। इसमें श्रीकृष्ण की आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास बाललीलाओं का चित्रण करने वाले १०४ पद्यों का संकलन कर कवि ने श्रीकृष्ण-भक्ति की अभिव्यञ्जना की है। भक्ति रस के पूर्ण पोषण वात्सल्य रस द्वारा ही प्राप्त हुआ है। श्रीकृष्ण की मनोहर बाल लीला को दार्शनिक भावभूमि पर उतारते हुए कवि कहता है मृदु भक्षिता कितव ! किं न गुडो गृहे नः ? सन्तर्जितोऽतिपरुषं हि यशोदयैवम् । तां नेति नेति निगदन् ननु वेदवाक्यं चित्ते सदा वसतु बालजगद्गुरूमे ।। (बदमाश, तूने मिट्टी खाई ? क्या हमारे घर में गुड़ नहीं है ? यशोदा माता ने कृष्ण को इस तरह बड़ी कड़ी फटकार लगाई। उस माँ से ‘नेति नेति’ (मैंने नहीं खाई, नहीं खाई) इस तरह वेदवाक्य बोलते हुए ऐसा समस्त जगत् का पिता बालक कृष्ण सदा मेरे चित्त में निवास करे।) गोरस चुराने में प्रवीण कृष्ण का एक और बालरूप दर्शनीय है गोपीजनेन बहुशः परिभय॑मानः क्रुद्धाम्बयोघृतकर प्रतितर्व्यमानः। तातं भियेव शरणं हि गवेषमाणः हृद्गहरे वसतु गोरसतस्करो मे।। (गोपीजनों द्वारा बार-बार खरी-खोटी बातें सुनाया जाता हुआ, क्रुद्ध माता के द्वारा हाथ उठाकर डाँटा जाता हुआ, डर के कारण पिता की शरण खोजता हुआ वह माखनचोर कृष्ण मेरे हृदय रूप गह्वर में निवास करे।) कवि ने वर्षाविहार, शरविहार, दशावतारलीला, मथुराभिनिष्क्रमण एवं मथुराप्रवेश शीर्षकों से कंसवध प्रसंग तक की बाललीलाओं का वर्णन किया है। समस्त काव्य प्रायः वसन्ततिलका वृत्त में रचित है।

कृष्णप्रसाद शर्मा घिमिरे

कविरत्न, विद्यावारिधि, भागवत कवि कृष्णप्रसाद शर्मा घिमिरे का जन्म सन् १६१E में हुआ। ये नेपाल के निवासी हैं। आपने अनेक विधाओं में काव्य लिखे। उनका ‘श्रीरामविलापः खण्डकाव्य १६७३ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें पुष्करिणी पम्पा को देखकर देवी सीता को याद करके भगवान् राम द्वारा किया गया विलाप वर्णित है। श्रीराम लक्ष्मण को सम्बोधित कर अपनी मनोव्यथा कहते हैं। विविध ऋतुओं, अनेक पक्षी, प्रकृति के अन्य अङ्ग वृक्ष, लतादि सब राम को विरहकाल में पीडित करते हुए प्रतीत होते हैं। प्रकृति में विविध रूपों में फैला आनन्द राम को कष्ट देता हुआ प्रतीत होता है। वसन्त ऋतु की दाहकता और पीडकता का वर्णन करते हुए कवि वाल्मीकि की विरहपरक पंक्तियों को याद दिला देता है। राम लक्ष्मण से कहते हैं: लपुकाव्य शाखाः शुभा विटपिनां परितो ज्वलभि रिद्धैः सुमैः किसलयैरपि शोणिताभैः । सोऽसौ वसन्तहुतभुक् प्रियया विहीनं मां भस्मसादिव करोति विलोक्य दीनम् ।। (चारों ओर जलते हुए समृद्ध पुष्पों, लाल कान्ति वाले नवपल्लवों से वृक्षों की शाखाएँ भर गई हैं। वह यह वसन्त रूपी आग प्रिया से हीन और दीन देखकर मुझे जलाकर राख बनाये दे रही है। पूर्वार्ध में ८१ तथा उत्तरार्ध में ८६ श्लोक हैं। पूरे काव्य में वसन्ततिलका छन्द है। राम की प्रगाढ़ व्यथा को कवि ने यह कह कर प्रकाशित किया है कि सीता की खोज उनके लिए मृगभरीचिका बन गई है और हमारे वन-वन में भटकने का कुछ फल नहीं निकला है पश्याय लक्ष्मण ! वयं बहुदु:खयोगा दत्रागता जनकजाविरहार्तियुक्ताः। अन्वेषणं विदधतो विपिने मृगाक्ष्या भ्रान्ता सुधा मृगमरीचिकयैव वृत्त्या ।। उत्तरार्थ प. स. ५ हे लक्ष्मण ! देखो बहुत-भारी दुःख के कारण हम सीता के विरहःदुख की पीड़ा से युक्त हुए यहाँ आए हैं। वन में मृगनयनी सीता की खोज करते हुए हम मृगमरीचिका में फंस व्यर्थ में इधर-उधर भटक रहे हैं। कवि इसे परब्रह्मरूप राम की परिदेवन-निदर्शनात्मिका व्याजस्तुति मानता है। इस तरह यह भक्तिपरक स्तोत्रकाव्य भी है। पर इसका मूल स्वर विप्रलम्भ शृङ्गार की ओर भी उन्मुख है। इसमें कविकृत हिन्दी अनुवाद साथ ही है।

सुरेशचन्द्र त्रिपाठी

श्री त्रिपाठी सारस्वत खत्री पाठशाला इण्टर कालेज, प्रयाग में अध्यापक थे। कवि आरम्भ में यह स्वीकार करता है कि भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. नेहरू की ७३ वीं जन्म वर्षगाँठ पर मैंने राष्ट्र के वीरों की उत्साहवृद्धि के लिए ‘वीरोत्साह-वर्धनम्’ काव्य लिखा। वस्तुतः १६६२ में भारत पर चीन के बर्बर आक्रमण के बाद यह काव्य लिखा गया। इसमें वीरों का उत्साह बढ़ाने के लिए नितान्त अनुकूल छन्द ‘प्रमाणिका’ का प्रयोग किया गया है। काव्य को १२ प्रकरणों में विभाजित किया गया है। आरम्भ में कवि हिमालय की गरिमा का गान करता है। कवि यह बात कई बार दुहराता है कि चीन ने भारत के साथ विश्वासघात किया और कृतघ्नता का व्यवहार किया कृतघ्नचीनवासिनो विचार्य मित्रतां न ते प्रभारतं च भारतं समाक्रमन्त कुत्सिताः।। १७२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास चीन के आक्रमण के समय की राजनैतिक परिस्थितियों तथा परवर्ती प्रभाव को कवि ने सुन्दर ढंग से रेखाकित किया है कि कैसे उस समय सारे देश ने एक होकर धन, जन, बल एकत्र कर इस युद्ध का सामना किया। इस युद्ध में शहीद हुए कतिपय वीरों की गाथा को भी कवि ने दिया है। कवि ने स्वयं इसे ‘युद्धकाव्य’ की संज्ञा दी है। बाद में १६६५ में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की विजय पर ‘जयध्वजम्’ काव्य मी त्रिपाठी जी ने लिखा।

गोस्वामी बलभद्रप्रसाद शास्त्री

इन का जन्म उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सन् १E२५ में हुआ। महाभारत के द्रोणपर्व की कथा पर आधृत आपका ‘चक्रव्यूहम्’ नामक खण्डकाव्य १६७३ में भाषा विभाग, हरियाणा द्वारा प्रकाशित हुआ। यह ७ सर्गों में निबद्ध है। अतः इसे महाकाव्य की श्रेणी में गिना जाना चाहिए, पर कवि ने स्वयं इसे खण्डकाव्य की संज्ञा दी है। कलेवर की दृष्टि से भी यह सामान्य लघुकाव्य से बड़ा ही है। इसमें नायक अभिमन्यु है। अनेक महारथियों द्वारा एक साथ प्रहार किये जाने पर उनका प्रतिरोध करते हुए तथा वीरता के साथ लड़ते हुए अभिमन्यु का वीरगति को प्राप्त होना वर्णित है यथा वृतो बालवरो मदान्चै रणेऽन्ततो वीरगति प्रयातः। तथा हि शौर्य सुकुमारकस्य प्रभावितं बालमनश्चकार ।। कवि ने उत्तरा के माध्यम से एक आदर्श नारी-चरित्र को रेखांकित किया है। उत्तरा एक सामान्य नारी का दुर्बल चरित्र नहीं है, अपितु वह एक वीर-नारी, बीर-पत्नी एवं बीर-युवती के रूप में प्रस्तुत की गई है। कवि अन्त में राष्ट्र कल्याण की कामना करता हुआ कहता है देशः समन्तात् कुटिलप्रचारैराचारहीनैः परिवीक्षितोऽयम्। भूयात् कृतिर्मे जनचेतनार्थं यूनामसौ चेतसि शङ्खनादः।। (यह देश कुटिल प्रचार करने वाले, आचारहीन लोगों से चारों ओर से घिरा हुआ है। मेरी रचना जनचेतना के लिए युवा लोगों के हृदय में शङ्खनाद का काम करे।) कवि के अन्य काव्यों में ‘दूताञ्जनेयम्’ नामक सन्देशकाव्य १६६३ ई. में प्रकाशित हुआ है। ‘भागीरथीदर्शनम्’ तथा ‘ज्योतिष्मती’ दो अन्य काव्य भी गोस्वामीजी ने लिखे हैं।

श्रीभाष्यम् विजयसारथि

कविवर विजयसारथि संस्कृत साहित्य में अपनी विशिष्ट रचनाशैली लेकर आते हैं। इनके प्रायः समस्त काव्य एक गीतात्मक लय को लेकर चलते हैं जिसमें प्रायः अन्त्यानुप्रास रहता है। व्याकरण के कठिन प्रयोगों, विशेष रूप से क्रियापदों के कठिन एवं अप्रचलित प्रयोगों के कारण आपके काव्यों में सर्वत्र एक दुरूहता एवं कृत्रिमता का समावेश हो गया है। विजयसारथि के काव्य हैं-शबरीविलापः, विषादलहरी, आत्मदानम्, श्रीशैलमल्लिकार्जुनसुप्रभातम्, उन्मनी अवस्था, सुहृल्लेखः, मन्दाकिनी, रासकेली, लघुकाव्य १७३ बाससरस्वतीसुप्रभातम्, भारतजननीसुप्रभातम्, अश्रुतर्पणम् तथा भारतभारती। सबसे अधिक प्रसिद्धि आपने ‘मन्दाकिनी’ काव्य के कारण पाई। पर यह भी साङ्गीतिक लय पर चलने वाला एक गीतिकाव्य है, “रासकेली’ भी इसी श्रेणी का है। अतः लघुकाव्य की परिधि से बाहर के गीतिकाव्य होने के कारण यहाँ उनका विवेचन नहीं किया जा रहा है। केवल एक काव्य का विवेचन प्रस्तुत है। भारतभारती-१६६१ ई. में आन्ध्रप्रदेश से प्रकाशित ‘भारत-भारती’ काव्य वस्तुतः कवि विजयसारथि द्वारा रचित २४ लघुकाव्यों का सङ्ग्रह है। यद्यपि ये काव्य विविध विषयों पर लिख गए हैं, पर उनका प्रमुख स्वर राष्ट्रभक्ति का ही है। प्रथम खण्डकाव्य ‘भारतीसुप्रभातम्’ में ४४ पद्य हैं। भारत के बाह्य सौन्दर्य एवं आध्यात्मिक महत्त्व को प्रकाशित करते हुए कवि अन्त में अपनी रचना के प्रति शुभाशंसा व्यक्त करते हुए कहता है रसालपल्लवग्रास-विकस्वर-पिकस्वरा। भारतश्रेयसे भूयाद् वाणी विजयसारथेः।। इस सङ्ग्रह के द्वितीय लघुकाव्य का नाम ही ‘भारत-भारती’ है, जिसमें ६० पद्य हैं। कवि यह कामना करता है कि उसका देश भारत जाति, सम्प्रदाय और रंग आदि के भेदों को भुलाकर अपना पुराना गौरव प्राप्त करे। अपनी अलङ्कृतिमयी भाषा एवं दीर्घसमासान्त पदावली का प्रयोग करते हुए कवि भारतभूमि की इस तरह प्रशंसा करता है मरुन्मुदासुधाझरी-सुमाधुरीजरीहरत-हरिहरीतरीतरत् सुचितुकलापरीमला। समुन्मनत् समुन्मनीकलावनी-कलापिनी कृपावनी सुपावनी चकास्तु भारतावनी।। (वायु की मोदभरी अमृत की झड़ी की मधुरता का हरण करने वाली दिशारूपी गुफाओं में तैरती हुई सुन्दर गन्ध वाली, अति उल्लसित होती हुई कला की भूमि, मयूरीरूप कृपा की स्थली अत्यन्त पवित्र भारत भूमि सुशोभित हो।) आगे ‘उपस्सूक्तम्’, ‘भारतमहिम्नःस्तुतिः’, ‘संस्कृतप्रशस्तिः’, ‘नमोवाकः’, चेगुर्तिवेणुगोपालसुप्रभातम्’, ‘श्रीवासरसुप्रभातम्’ आदि काव्यांशों में कवि ने अपनी शदालङ्कार-भार से लदी कठिन व्याकरण-प्रयोग से समन्वित शैली का प्रदर्शन किया है। वस्तुतः कवि श्रीभाष्यम् कवित्व एवं पाण्डित्य के सुन्दर समन्वय हैं और उन्होंने प्रभूत साहित्यसर्जना कर संस्कृत की श्रीवृद्धि की है। ‘आवाहनम्’ कवि विजयसारधि की दूसरी ऐसी रचना है जिसको लघुकाव्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसमें गीतियाँ दो-एक ही हैं शेष वार्णिक-मात्रिक छन्दों में निबद्ध पद्य हैं। इसका प्रकाशन १EE१ ई. में हुआ है। काव्य का आरम्भ राष्ट्रिय कविता ‘राष्ट्रसूक्त’ से होता है। आगे चलकर कवि ‘कविसूक्त’ भी उपन्यस्त करता है। कवि कहता है कि हे कवि! तेरा संसार कितना विचित्र है, तेरे न जाने कितने रूप हैं, कितने नाम हैंआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास * अयि कवे | जानात्ति को नाम नामानि प्रतिफलं भिन्नानि तव रूपधेयानि। ‘कौलेयसूक्त’ में कवि ने एक एक सामाजिक अधिक्षेप उपस्थापित किया है। विषादलहरी’ शीर्षक से कवि ने विस्तार से भगवान के सामने अपनी विषादमयी वेदना को व्यक्त किया है, यथा स्वामिन् हे करुणानिधे । श्रुतितनो विश्वकमूर्ते विभो काचिद्दीनतनूर्विषादलहरी मन्मानसं विद्रुतम् । विष्ट्वा द्रावकरी विषादमयरीतिं गातुमेवं परं प्रारब्धेश शृणुष्व देव ! कृपया तां द्राविणीगीतिकाम्।। ‘आहुतिः’ कविता को कवि ने उच्छ्वासों में विभक्त किया है तथा पौराणिक आख्यान द्वारा उपन्यस्त किया है। कवि विजयसारथि की भाषा में एक विशेष चमत्कार एवं परिष्कार है, छन्दों के प्रयोग में वैविध्य है, भावों में गहनता एवं व्यापकता है। उनका विषय-निर्वाह एवं शैली-प्रयोग मौलिक है। वे प्रौढ़ कविता के धनी हैं, युगकर्ता एवं युगोद्धर्ता हैं।

यतीन्द्रनाथ भट्टाचार्य

कवि यतीन्द्रनाथ सेण्ट पॉल्स कालेज, कलकत्ता में प्रोफेसर थे। उनका स्फुट पद्यों का संग्रह ‘काकली’ १६३१ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें कुछ स्तोत्र हैं। इसमें सविता, सोम, अतिथिसत्कार, परोपकार, धात्री पन्ना, राजा हरिश्चन्द्र, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि पर स्फुट कविताएँ हैं। रथेद्धता छन्द में ‘सविता’ शीर्षक के अन्तर्गत सूर्य पर ये पद्य दर्शनीय हैं भाति पश्यत हरेहर्रिन्मुखै सूर्यबिम्बमरुणं निक्षाक्षये। ओड्रपुष्पमिव कृत्रिमे वने प्रस्फुटं मघवतो दिवस्पतेः ।। (देखो, पूर्वदिशा के मुख भाग में रात बीत जाने पर प्रातःकाल लाल रंग का सूर्यबिम्ब ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे स्वर्ग के स्वामी इन्द्र के नन्दन वन में खिला हुआ जवाकुसुम का फूल हो।)

महालिङ्ग शास्त्री

दक्षिण भारतीय प्रौढ़ कवि महालिङ्ग शास्त्री ने तीन लघु काव्यों की रचना की, जिनका विवरण इस प्रकार है - किङ्किणीमाला-यह काव्य १E३४ ई. में मद्रास से प्रकाशित हुआ। इसके परिचय रूप में कवि ने लिखा है ‘लघीयसां विचित्र-विषयाणां खण्डकाव्यानां समाहारः’। इसमें वस्तुतः देवस्तुति, नायिका-वर्णन, प्रणय-प्रसङ्ग, प्रकृतिवर्णन, रामविलाप, जीवन-दर्शन, कवि-सर्जना आदि विविध विषयों पर विविध छन्दों में पद्य लिखे गये हैं। “आकाशतारा’ शीर्षक के अन्तर्गत आकाश के तारों का वर्णन कवि की रचनाशीलता को प्रकट करता है आकाशताराः स्फुरणप्रकाराः पश्यात्युदाराः करकानुकाराः। फेनायमाना वियदम्बुराशेर्बिन्दूपमाना नभसो वराशेः।। लघुकाव्य १७५ यहाँ अन्त्यानुप्रास दर्शनीय है। जार्ज पञ्चम के यशोगान से युक्त ‘जार्जपञ्चकम्’ भी इसी काव्य का अङ्ग है। कतिपय गद्य गीतात्मक भी है। वनलता-१८५५ ई. में तंजौर से प्रकाशित ‘वनलता’ काव्य में पांच सर्ग हैं। यक्ष की प्रियतमा यक्षिणी कुबेर के शाप से वनलता बन जाती है और वन में रहती है। यक्ष अलका छोड़ देता है और धरती पर जाकर राजकुमार के रूप में जन्म लेता है और बाद में शाप-विमोचन से दोनों का पुनर्मिलन होता है। इसमें शाप-विमोचन में राजकुमार द्वारा की गई शिवस्तुति कारण मानी गई है। प्रकृति वर्णन का यह उदाहरण सुन्दर है कुमुदिनी मुमुदे जहषुस्तदा मधुलिहः पुलिनानि चकाशिरे। परितुतोष चकोरपरम्परा स च युवा हृदि कौतुकमानशे।। भारतीविषादः-शास्त्रीजी का यह तृतीय लघु काव्य है जो श्रीसाहित्यचन्द्रशाला, तिरुवालगाडु, तंजौर से १६६४ ई. में प्रकाशित हुआ। ग्रन्थ के ऊपर यह श्लोक अकित है - ऊनविंशतिवर्षेण काव्यं तत् प्रथमं कृतम्। कविना भारतीदेव्या विषादाख्यं विषादिना।। इसमें वसन्ततिलका वृत्त में १५२ पद्य संगृहीत हैं। विज्ञान एवं पाश्चात्त्य ज्ञान के प्रभाव से इस युग में संस्कृत भाषा को जो विपरीतता सहन करनी पड़ रही है, कवि ने उस पर दुःख व्यक्त किया है।

डि. अर्कसोमयाजी

आन्ध्र प्रदेश निवासी डि. अर्कसोमयाजी केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ तिरुपति में खगोलशास्त्र के प्रवाचक रहे हैं। सन् १९६० में इसी विषय पर आपका एक काव्य ‘ब्रह्माञ्जलिः’ नाम से प्रकाशित हुआ, जिसको कवि ने ‘परमेश्वरार्पिता श्लोकमालिका’ कहा। इसमें कवि ने उनचास शीर्षकों में विविध विषयों पर सुन्दर पद्यों की रचना की है। कवि ने कहीं गौडी और कहीं वैदर्भी रीति की उपासकता दिखाई है। सृष्टि, ईश्वर, मनुष्य, प्रकृति, आत्मा, भारतदेश आदि विविध विषयों को लेकर कवि ने अपनी वाणी का प्रसार किया है। ‘प्रकृति ग्रन्थ’ के अन्तर्गत कवि विश्व के विद्वानों को ब्रह्माण्ड रूपी अनन्त ग्रन्थ को पढ़ने और उसके रहस्यों को जानने के लिए कहता है - किमु ग्रन्थान् विद्वन्! पठसि नरमेधाविरचितान् पठ ब्रह्माण्डाख्यं दुहिणरचितं ग्रन्थमतुलम्। असंख्याका गोलाः कथमिव नभोगर्भनिहिताः कया शक्त्या भूमिर्लुठति गगने कन्दुक इव ।। हे विद्वन्! मनुष्य की बुद्धि से बने हुए ग्रन्थों को क्यों पढ़ते हो ? विधाता के बनाये हुए इस ब्रह्माण्ड रूपी अनुपम ग्रन्थ को पढ़ कि इस आकाश के गर्भ में असंख्य गोले कैसे १७६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास । रखे हैं ? किस शक्ति से भूमि आकाश में गेंद की तरह लौट रही है। कवि ने इस तरह के प्रकृति-रहस्यों की जिज्ञासा प्रकट करने वाले अनेक प्रश्नों को पूछा है। धर्म एवं दर्शन के विषय इसमें समाहित हैं। उनका निष्कर्ष है कि ब्रह्माण्ड एक एवं अविभाज्य है। खगोल विद्या जैसे गम्भीर रहस्यात्मक विषय पर काव्य लिखकर अर्कसोमयाजी ने एक नितान्त नवीन कार्य किया है।

स्वयंप्रकाश शर्मा शास्त्री

साहित्याचार्य, ज्योतिषाचार्य शास्त्रीजी का ‘इन्द्रयक्षीय काव्य १६७० ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें कवि ने उपनिषद् की कथा को काव्य का रूप प्रदान किया है। अलङ्कारों के सुन्दर सनिवेश से युक्त अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग इसमें प्राप्त होता है। आध्यात्मिक तत्त्वों की शिक्षा एवं सांस्कृतिक ज्ञान की वृद्धि के लिए यह ग्रन्थ उपादेय है। इसमें चार सर्ग हैं। कथावस्तु केनोपनिषद् की देव-राक्षस-युद्ध-कथा पर आधृत है। ब्रह्मविद्या का उपदेश इसका प्रधान उद्देश्य है।

मधुकर शास्त्री

इनका ‘गान्धिगाथा’ काव्य राजस्थान संस्कृत अकादमी, उदयपुर से १६७३ ई. में प्रकाशित हुआ। इसके दो भाग हैं-पूर्व एवं उत्तर। पूर्वभाग में जीवन-दर्शन है और उत्तर भाग में गान्धि-वाणी। यह हिन्दी के नये गेय छन्दों की लय पर लिखा गया काव्य है। इसमें कवि ने गान्धीजी के जन्म, बाल्यकाल, शिक्षा-दीक्षा, जीवन की विविध घटनायें, गान्धी पर अन्य मनीषियों के प्रभाव, विदेश-यात्रा, दक्षिण अफ्रीका-गमन-आगमन, स्वतन्त्रता-आन्दोलन में गान्धीजी की भूमिका, और प्रमुख राजनीतिक घटनाओं का विवरण दिया है। द्वितीय भाग में गान्धीजी के सिद्धान्तों का संकलन है। गान्धीजी के सत्याग्रह और नमक आन्दोलन का वर्णन करता हुआ कवि कहता है अनुबन्धानेकादश गान्धी न्यदधा राज्यसमक्षं । तदस्वीकृतवानान्दोलनमुद्घोषितवान् प्रत्यक्षम् । लवण-नियम-समतिक्रमणेऽस्याऽभवन्निश्चयो गाढं डाँडीयात्रामकृत मनुष्यैः षट्सप्ततिना सार्धम् ।। पूर्व भाग में २४७ तथा उत्तर भाग में १०६ पद्य हैं।

गरकपाटि लक्ष्मीकान्तैया

इन्होंने संस्कृत में अनेक काव्यों की सर्जना की है। जैसे हरस्तुतिः, कीरसन्देशः, अष्टकपञ्चकम, जलधिजानन्दलहरी, श्रीभवानीशङ्करस्तुतिकुसुमाञ्जलिः, भारतरत्नम्, विश्वकविः, श्रीविद्याशङ्करभारतीविजयः, श्रीश्रीनगगिरि-श्रीजगद्गुरुचरितसंग्रहः, श्रीवेङ्कटेश्वरस्तुतिः, श्रीनारायणतीर्थयतीन्द्रचरितम् तथा भव्यभारतम् । भव्यभारतम् का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत है इस लघु काव्य का प्रकाशन १६७४ ई. में हुआ। यह मयूखों में विभाजित है और इसमें सात मयूख हैं। भारतवर्ष की महिमा का गान, यहाँ के पवित्र प्राचीन ग्रन्थ, आश्रम, गुरुकुल, प्राचीन विश्वविद्यालय, ग्राम, भारत के पुण्य-क्षेत्रों, प्रमुख आचार्यों, सम्राटों, लघुकाव्य १७७ संस्कृत-कवियों, राष्ट्रभाषा-कवियों की गौरव-गाथा इसमें प्राप्त होती है। भारत के प्राचीन प्रमुख आचार्यों की चर्चा करता हुआ कवि कहता है श्रीमद्व्यासश्शुकमुनिवरश्चात्मविद्गौडपादः श्रीगोविन्दो गुरुवरगुरुश्शङ्करश्शङ्करायः। श्रीमद्रामानुजगुरुवरः पूर्णबोधो यतीन्द्रः श्रीचैतन्यप्रभृतिगुरवः प्राभवन्यत्र चान्ये।।

के.एस. कृष्णमूर्ति शास्त्री

इनका ‘प्रकृतिविलासः’ काव्य सन् १९५० में प्रकाशित हुआ। इसमें प्राकृतिक सौन्दर्य के विविध वर्णन विविध शीर्षकों के अन्तर्गत प्राप्त होते हैं यथा-सारस्वतसर्वस्वम्, काननकामनीयकम्, पर्वतपारम्यम्, समीरसमर्हणम्, त्रिपथगासौभाग्यम्, द्विजराजसाम्राज्यम्, प्रभाकरप्रभावः, शर्वरीसौन्दर्यम् आदि । वन की सुन्दरता का एक चित्र दर्शनीय है गीति मुधा मधुकरीषु वितन्वतीषु हंसीषु पक्षपुटताडनतोऽप्सु तालान् । तीरद्रुमेषु विकिरत्सु सुमान्यभीषणं लक्ष्मी नर्त सरसीरुहरङ्गधाम्नि।। (भमरियों के सहर्ष गीत गाने पर, हंसिनियों के जल में अपने दोनों पंखों के मारने से ताल बजाने पर, तटवर्ती वृक्षों के बार-बार फूल बरसाने पर कमलरूपी रङ्गस्थल पर लक्ष्मी ने नृत्य किया। समस्त काव्य में शैली सरस, अलङ्कारमयी एवं समासभूयिष्ठ है।

बालकृष्ण भट्ट शास्त्री

इनका ‘स्वतन्त्रभारतम्’ काव्य भारत के स्वतन्त्र हो जाने पर सन १६४६ में लिखा गया। कवि भारत को मिली स्वतन्त्रता के इतिहास पर दृष्टि रखता हुआ ही त्याग-बलिदान के बाद मिली स्वतन्त्रता की चर्चा करता है। वह स्वतन्त्रता के सेनानायकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। कवि ने स्वतन्त्र भारत की नई समस्याओं की ओर ध्यान केन्द्रित कराया है। भारत का विभाजन, गान्धीजी की हत्या, शरणार्थी समस्या आदि पर प्रकाश डाला है।

सी.आर. स्वामिनाथन

शास्त्रपुरम् रामकृष्ण स्वामिनाथन का जन्म सन् १९२७ में पालघाट केरल में हुआ था। देववाणी परिषद्, दिल्ली से १६८३ में प्रकाशित आपके काव्य “श्रीबदरीशसुप्रभातम्’ को स्वयं कवि ने स्तोत्रकाव्य की संज्ञा दी है। भगवान् बद्रीनारायण और उनके आवासभूत हिमालय पर्वत पर विराजमान बदरिकाश्रम की महिमा का गान कवि ने भक्ति-भाव से प्रेरित होकर किया है। श्रीमद्भागवत और महाभारत में बदरीक्षेत्र से सम्बन्धित जो कथन हैं उनका भी उल्लेख यहाँ किया गया है। कवि ने प्रत्येक श्लोक के १७८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास चतुर्थ चरण के रूप में ‘श्रीनाथ ते बदरिकेश्वर सुप्रभातम्’ यह पदावली रखी है। शेष तीन चरण इसी पर आकर समाप्त होते हैं। पूरे काव्य में आराध्य देव के प्रति समर्पण भाव है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है - भागीरथीतटविहार भवाब्धिपोत भाग्यस्वरूप भुवनस्य भयापहारिन्। भीमाभिवन्ध भगवन् भुजगेन्द्रशायिन् श्रीनाथ ते बदरिकेश्वर सुप्रभातम् ।। यथास्थान उपयुक्त अलङ्कार भी प्रयुक्त हुए हैं। पं. रघुनाथ शर्मा ने इस काव्य पर संस्कृतटीका लिखी है।

श्रीशैल ताताचार्य

कवि श्रीशैलताताचार्य शिरोमणि तजौरस्थित पञ्चनद संस्कृत महाकलाशाला में मीमांसा-दर्शन के प्राध्यापक थे। मीमांसक होते हुए भी आपमें कवित्व गुण विद्यमान था, जिसकी प्रशंसा कुप्पू स्वामी शास्त्री एवं एस. वेदान्त आयंगर जैसे विद्वानों ने की है। आपके दो लघुकाव्य प्रकाशित हैं जिनका विवरण इस प्रकार है कपीनामुपवासः-यह लघुकाव्य १६२५ ई. में कुम्भकोणम् से प्रकाशित हुआ। यह ३१ श्लोकों का एक हास्य काव्य है जिसमें व्यङ्य का पुट भी विद्यमान है। एक बार एक बन्दरों के राजा (कपिसार्वभौम) ने बन्दरजाति के लोगों का एक सम्मेलन बुलाया और उसमें यह कहा कि जब हमारी जाति में शौर्य, वीर्य और विद्या की दृष्टि से अनेक महान लोग हुए हैं ; बाली, सुग्रीव, नल और हनुमान जैसे लोग हमारी जाति में हुए हैं तब हमें मनुष्य जाति से हीनतर क्यों माना जाता है - किन्तावदस्मासु न विद्यते यन्मनुष्यजातेरवरा भवेम। किं वा मनुष्येष्वधिकं चकास्ति यतः प्रकृष्येत मनुष्यवर्गः।। अतः मनुष्यों के समान अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए उस वानरराज के निर्देश पर सब बन्दरों ने एकादशी के दिन उपवास रखने का निश्चय किया। किसी तरह कठिनाई से उन्होने इस व्रत का पालन भी किया और अन्ततः एक वानर की प्रेरणा से वे वृक्षों पर चढ़ गये। अपने चपल स्वभाव के कारण अन्ततः उन्होंने वृक्षों के समस्त फलों का भक्षण कर लिया और उनका उपवास टूट गया। इस तरह हास्य को एक सामान्य रूप इस लघु काव्य में प्राप्त होता है। मुग्धाञ्जलिः-यह भी २७ श्लोकों का अतिशयलघुकाव्य है जिसमें आराध्य के प्रति आराधक के अनवद्य उद्गार भरे हुए हैं। वह आराध्य को ही एकमात्र शरण मानता है। वह आर्तबन्धु भगवान् के आगे अञ्जलिबद्ध होकर खड़ा है कि उसकी रक्षा करें। न उसके पास भक्ति है, न शक्ति है और लोकस्थिति अत्यन्त भयप्रद है। अतः ऐसी स्थिति में ईश्वर ही रक्षक हैं। इस प्रकार इस काव्य में हृदय की विशुद्ध भावना व्यक्त हुई है। अतः यह एक लघु भक्तिकाव्य है। एक उदाहरण है लघुकाव्य १७ शस्त्राणि युद्धखलतां गमितानि लोके नैवास्ति योगसरणिर्न तपो न मन्त्रः। केनाधुना कमललोचन वीतमोहो दिव्यं त्वदीयपदपङ्कजमाश्रयेयम् ।।

श्री. भि. वेलणकर

संस्कृत की कई काव्यविधाओं में रचना करने वाले वेलणकर प्रतिभाशाली कवि हैं, जिन्होंने अनेक नाटक, गीतिकाव्य एवं खण्डकाव्य लिखकर संस्कृत-साहित्य को समृद्ध किया है। उनका ‘जवाहरचिन्तनम्’ काव्य १६६६ ई. में, सुरभारती भोपाल से प्रकाशित हुआ, जिसमें जवाहरलाल नेहरू के जीवन पर ७७ गीतों का सङ्ग्रह है। १९६७ ई. में प्रकाशित ‘विरहलहरी’ दूसरा गीतिकाव्य है। इनके अन्य काव्य हैं-अहोरात्रम्, गीर्वाणसुधा, विष्णुवर्धापनम्, गुरुवर्धापनम्, जयमङ्गला, जीवनसागरः, संगीतसौभद्रम्, कालिदासचरितम्, कालिन्दी, कैलासकम्पः, स्वातन्त्र्यचिन्ता, मेघदूतोत्तरम् आदि। यद्यपि कवि वेलणकर का काल एवं क्षेत्र, दोनों ही व्यापक हैं, फिर भी उन्हें लघुकाव्य के बीसवीं शती के सातवें दशक का समृद्धिकारी कवि कहा जा सकता है।

राजाराम शुक्ल

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रणवीर संस्कृत विद्यालय में साहित्य के प्रधानाध्यापक कवि शुक्ल के ‘जवाहरज्योतिः’ काव्य का प्रकाशन १६६७ ई. में हुआ। इसमें पं. जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व का सुन्दर वर्णन प्रस्तुत किया गया है। ज्योति के विषय में एक स्थान पर कवि कहता है श्रीभारतीया ननु लोकतन्त्र सिद्धाः स्वयं सच्चरितैश्चरित्रैः। यतः सहास्तित्वमति प्रलभ्य जवाहरज्योतिरितश्चकास्ति ।। सहास्तित्व रूपी सिद्धान्त का अवलम्बन करने वाली जवाहरज्योति यहाँ प्रकाशमान है। इस चरितवर्णन के साथ भारत और पाकिस्तान के कटु कूटनीतिक सम्बन्धों और संघर्षों का विवरण भी कवि ने दिया है।

के.एस. नागराजन

इनका ‘भारतवैभवम्’ काव्य राष्ट्रीय काव्यमाला के अन्तर्गत बंगलौर से १६७४ में प्रकाशित हुआ। इसमें आठ छोटे-छोटे पद्यकाव्यों का संग्रह है। इसमें पहली कविता ‘भारताम्बिकास्तुति’ है जो १२ पर्यों में है। ‘भारतमहिमा’ दो सौ पद्यों में है। तृतीय ‘भारतभावना’, चौथी कवीन्द्र रवीन्द्र को लेकर लिखी गई १६ वद्यों की, पाँचवी ‘नवकर्णाटवैभव’ नाम की २३ पद्यों की, छठी मोतीलाल नेहरू की प्रशंसापरक, सातवीं आर्य विश्वेश्वर को विषय बनाकर लिखी हुई, और आठवीं ‘गान्धीमहिमा’, इस तरह राष्ट्रभक्ति को विषय बनाकर लिखी गई कई कविताएँ यहाँ विद्यमान हैं। भारत की महिमा का गान करते हुए कवि कहता है - अखण्डभूमण्डलमण्डनाहश्चाखण्डलादित्रिदशप्रशस्तः। दिगन्तविश्रान्तविशेषकीर्तिर्विराजतेऽसौ भरताख्यखण्डः।। (अखण्ड पृथ्वीमण्डल को सुशोभित करने योग्य, इन्द्र आदि देवताओं से प्रशंसा प्राप्त, १८० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास विभिन्न दिग्भागों में फैली हुई विशेष कीर्ति वाला यह भारतवर्ष सुशोभित हो रहा है।)

रामनाथ आचार्य

वाल्मीकि संस्कृत महाविद्यालय, नेपाल के भूतपूर्व प्रधानाचार्य कवि - आचार्य ने स्फुट पद्यों से युक्त ‘पद्यमालिका’ नामक काव्य लिखा, जिसका प्रकाशन १६७६ ई. में हुआ। काव्य पारम्परिक छन्दों एवं विषयों से युक्त है। आरम्भ में अनेक देवी-देवताओं की स्तुतियाँ हैं।

चुन्नीलाल ‘सूदन’

इनके द्वारा रचित ‘भरतसिंहचरितामृतम्’ काव्य वर्ष १६७६ में सहारनपुर, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित हुआ। कवि ने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले त्यागी, राष्ट्रभक्त, वीर सरदार भगतसिंह को इस काव्य का नायक बनाया है। इसमें भगतसिंह का पूरा जीवनवृत्त और स्वतन्त्रता संग्राम में उनके बलिदान की कथा विस्तार से वर्णित है। भगतसिंह का शौर्यगान करते हुए कवि कहता है - स्वातन्य-सगर-विलासरता नरा ये उत्सारणे रिपुकुलस्य निबद्धखड्गाः। तेषां वरेण्यसुविशालभुजान्तरालं वो नृसिंहसदृशोऽत्र स भक्तसिंहः।। (स्वतन्त्रता-संग्राम के विलास में लगे हुए जो लोग शत्रुसमूह को उखाड़ फेंकने के लिए तलवार उठाये हुए हैं उनकी सुन्दर विशाल भुजाओं के मध्य में नरसिंह के समान वह भगतसिंह वर्णनीय है।)

रामकृष्ण भट्ट

श्रीभट्ट दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू महाविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष पद पर रहे। आपका ‘काव्योद्यानम्’ काव्य १९७२ ई. में प्रकाशित हुआ। यह छ: अध्यायों में विभक्त एक बृहत् काव्य है जिनके नाम इस प्रकार है - १. गाणपतम् २. भागवतम् ३. सारस्वतम् ४. पत्रपुष्पम् ५- साप्तपदीनम् एवं ६. मौक्तिकम्। प्रथम अध्याय में प्रायः स्तुतियाँ हैं जो गणेश से आरम्भ होकर अन्य आराध्य देवों तक जाती हैं। द्वितीय अध्याय में महापुरुषों, पूज्य जनों की वन्दनाएँ हैं। सारस्वतम् में कवि-काव्य-विषयक विभिन्न विषय हैं। विभिन्न वर्ग के लोगों के प्रति शुभाशंसाएँ व्यक्त की गई हैं। यत्र-तत्र कवि एक विषय को लेकर समस्यापूर्ति करता हुआ कई पद्य लिखता है, जैसे ‘विषमा समस्या’ नामक समस्यापूर्ति का गरीबी पर लिखा एक पद्य द्रष्टव्य है - देशे स्वतन्त्रेऽप्यधुनाऽस्मदीये वासोनिवासाशनजातलामे। कल्यार्जने निःस्वतया जनानां कार्पण्यभाजां विषमा समस्या।। इनके काव्य में प्रौढि, उदारता एवं वैदग्ध्य सभी गुण विद्यमान हैं। अष्टम दशक में काव्य पारपरिकता के साथ आधुनिकता का भी वरण कर रहा था इसका उदाहरण यह काव्य है।

रामशरण शास्त्री

कविवर शास्त्री का ‘जवाहरजीवनम् लघुकाव्य सेवक संघ, बरनाला, लघुकाव्य ११ संगरूर, पंजाब से प्रकाशित हुआ। इसमें कवि धर्म और संस्कृति के पवित्र पृष्ठाधार पर पण्डित नेहरू की जीवन-यात्रा अड्कित करता है। इसमें नेहरू परिवार के पूर्वपुरुषों का काश्मीर से दिल्ली-आगमन, पश्चात् आगरा-प्रयाग में उनका प्रवास, पं. मोतीलाल नेहरू का वर्चस्व, आनन्दभवन वर्णन, जवाहर-जन्म, बाल्यावस्था, स्वतन्त्रता-संग्राम, उनके राजनीतिक जीवन, महाप्रस्थान तक की घटनाओं का रोचक इतिवृत्तात्मक चित्रण है। सम्पूर्ण काव्य को २१ भागों में घटनाक्रमानुसार विभाजित किया गया है। जवाहरलाल के जन्म का वर्णन कवि ने ज्योतिष की स्थिति के अनुसार इस प्रकार किया है जातो जवाहरो योगी राज्य-ग्रहसमन्वितः। मुक्तारत्नैः समुद्भूतो मणिरूपो जवाहरः।। जवाहर के जन्म को पुण्यकर्म का फल मानते हुए कवि ने उनकी तुलना रघुवंशी राजा दिलीप से की है। काव्य में प्रसङ्गवश काश्मीर की सुषमा का मनोहर वर्णन किया गया है। भारत के परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े रहने पर उभरे स्वतन्त्रता-आन्दोलन का कवि ने पूरा ब्यौरा दिया है। जवाहरलाल के निधन पर सारा राष्ट्र किस तरह शोकाकुल हो गया, इस स्थिति को प्रकट करते हुए कवि तिरंगे झण्डे में लिपटे उनके पार्थिव शरीर को देखकर लोगों के भावों का वर्णन करता है - जवाहरोऽमरो नित्यं पितृव्योऽप्यमरोऽस्ति वै। इति घोषस्पृशैर्देवैवर्षणं क्षणदं कृतम् ।। समग्र काव्य में प्रायः अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग है, परन्तु अनेक भावमय वर्णनपरक स्थलों में कवि स्वयं बड़े तदनुरूप छन्दों की ओर प्रवृत्त हो जाता है।

मिजाजीलाल शर्मा

शर्माजी का ‘जवाहरचरितम्’ उत्तरप्रदेशीय जनपद इटावा से १६८० में प्रकाशित हुआ। यह दो सर्गों में निबद्ध है। श्रीनेहरू में धीरोदात्त नायक के सारे गुण विद्यमान हैं। जवाहर की तुलना राजा रघु से करता हुआ कवि स्वीकार करता है कि उनका जन्म भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए हुआ है। अतः यह केवल नेहस्वजी की कथा नहीं है, अपितु अंग्रेजी शासन से भारत की मुक्ति की गाथा है।

लछमनसिंह अग्रवाल

आठवें दशक में विशेष रूप से प्रकाशित होने वाले अग्रवाल ऐसे कवि हैं जो चलती धारा से हटकर विज्ञान, प्रकृति आदि विषयों पर काव्य-प्रणयन में प्रवृत्त हुए। ये अन्धे थे। प्रकाशनवर्षक्रमानुसार, आपके काव्य इस प्रकार हैं - कालरात्रिः (१८७७) राष्ट्रदर्पणः (१६८०), विज्ञानगीतम् (१८८१), कुटुम्बिनी (१९८२), पद्यपुष्पवाटिका (१८८३), कालचक्रम् (१९८६) मानसरासकेली तथा श्रीरामरसायनम् । इनके प्रमुख काव्यों का विवरण इस प्रकार है - ‘कुटुम्बिनी’ लघुकाव्य दो भागों में विभक्त है। पूर्वभाग को प्रकृतिखण्ड तथा उत्तर भाग को प्रवृत्तिखण्ड नाम दिया गया है। पूर्वभाग में ५१ तथा उत्तर भाग में ६१ पद्य हैं। १८२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ग्रन्थ की विषयवस्तु पूरी तरह विज्ञानपरक है। इस काव्य में विज्ञान से कल्पना का, पुराख्यानों से इतिहास का, समाजशास्त्र से भूशास्त्र का, व्याकरण से निरुक्त का तथा वास्तविकता से कल्पना का मनोहारी समन्वय दर्शनीय है। इस छोटे से काव्य में पृथिवी के अन्य नामों की निरुक्तियाँ, प्राकृतिक सौन्दर्य वैज्ञानिक दृष्टि से शब्दों की व्युत्पत्तियाँ, डार्विन के विकासवादी सिद्धान्त का आश्रय लेकर औद्योगिकता की प्राप्ति-पर्यन्त मानव-सृष्टि का विकास, विज्ञानकी ध्वंसकताशक्ति आदि का प्रतिपादन काव्य की परिधि में किया गया है। पृथ्वी के स्वरूप का वर्णन करते हुए कवि कहता है ध्रुवप्रदेशोज्ज्वलतन्तुजाल-समुद्रचण्डातकवीतगात्री। नामानि यस्या गुणसार्थकानि अमन्दलावण्यमयी गरिष्ठा।। पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई इस रहस्यमय प्रश्न का विवरण देते हुए कवि कहता है कि बीजमादावभवन् तरुर्वा किमण्डमासीत् प्रधर्म खगो वा। पूर्व शिशुर्वा पुरुषोऽथवाज क्षितौ रहस्यानि बहूनि नूनम् ।। ‘श्रीरामरसायन’ काव्य में ३५५ वियोगिनी पद्यों में रामकथा वर्णित है। काव्य यद्यपि लघु है, पर सात सर्गों में निबद्ध है। संक्षेप में रामकथा वर्णित है। उपसंहार में लव एवं कुश, बप्पा रावल, संग्राम सिंह, महाराणा प्रताप, शिवाजी आदि राष्ट्र वीरों का उल्लेख कर इस कथातन्तु को कवि आधुनिक काल तक ले आया है।

राजनारायण प्रसाद मिश्र

श्री मिश्र, उत्तर प्रदेश स्थित पीलीभीत के निवासी हैं। उनका ‘सुभाषचन्द्रोदय’ काव्य नूतन प्रकाशन, पीलीभीत से १६८७ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें स्वतन्त्रता-संग्राम के अद्वितीय योद्धा सुभाषचन्द्र बोस का जीवन-परिचय एवं व्यक्तित्व निबद्ध है। यह काव्य तीन आलोकों में विभक्त है-आद्यालोक, मध्यालोक तथा अन्त्यालोक । भूमिका में भारतवर्ष के गौरवगान के पश्चात् कवि सुभाषचन्द्र के जन्म रूप उदय का वर्णन करता है, जिसका यह प्रास्ताविक पद्य है - अपास्य यानां समुपास्य पौरुषं रुषं बधादाङ्गलशासनाय यः। सुभाषिता यस्य शुभा सिता सुभा सुभाषचन्द्रोऽभवदद्भुतोदयः।। सुभाषचन्द्र के जन्म को चन्द्रोदय कहकर कवि ने श्लिष्ट प्रयोग किया है - सुभाषचन्द्रोदयचारुचन्द्रिका विकारहीना चिरभव्यदिव्यता। हतान्तरिक्षाखिलध्वान्तश्यामिका विकासिताशा प्रसरत्वमागता।। (सुभाष रूपी भासमान चन्द्रमा के उदय से उत्पन्न विकारहीन, चिरकाल तक भव्य और दिव्य, अन्तरिक्ष के समस्त अन्धकार और कालिमा को विनष्ट करने वाली, दिशाओं को विकासित करने वाली सुन्दर चाँदनी फैल गई।) १८३ लघुकाव्य कवि सुभाष के जन्मदिन २३ जनवरी, १८६७ से आरम्भ कर उनके बाल्यजीवन, शिक्षा, स्वतन्त्रता-संग्राम में कूदना, जेल यात्राएँ, कांग्रेस से सम्बन्ध, स्वातन्त्र्य-संग्राम को उग्र करने के लिए पेशावर, काबुल, बर्लिन, जर्मनी से जापानयात्रा, सिंगापुर, रंगूर, बैंकाक आदि की सब यात्राओं का मार्मिक चित्रण किया गया है। उनके वर्णनों में यत्र-तत्र वैज्ञानिकता, दार्शनिकता तथा व्याकरणात्मक नूतनता का समावेश है। भाषा सरल, एवं प्रसादगुणयुक्त है। वस्तुतः यह वीररसप्रधान एवं वीरगाथापरक काव्य है।

मथुराप्रसाद दीक्षित

महामहोपाध्याय दीक्षित का अन्योक्तिपरक काव्य ‘अन्योक्तितरगिणी’ १६६६ ई. में प्रकाशित हुआ। कवि ने विविध जीव-जन्तुओं, प्राकृतिक उपादानों को विषय बनाकर जीवन के विविध व्यवहारों पर सुन्दर अन्योक्तियाँ लिखी हैं। उनकी अन्योक्तियाँ प्रायः चुटीली, विनोदभरी, अथवा व्यङ्ग्य भरी होती हैं। अन्योक्तियाँ सम्बोधनात्मक हैं। उन्होंने मत्कुण, झांकारक, कुक्कुर, रासभ, टिट्टिभ, वृश्चिक, ज्योतिरिङ्गण आदि जीवों, वृक्षों, लताओं, पुष्पों, तथा अन्य अनेक चेतन-अचेतन प्राणियों, पदार्थों को सम्बोधित किया है। अभावग्रस्त लोगों का रक्तशोषण करने वाले लोगों पर फबती कसते हुए कवि कहता है रे रे मत्कुण ! रक्तपानचतुरो मायाविनामग्रणी - विक्रान्तोऽसि पलायने पटुतरस्त्वामस्मि सम्प्रार्थये। एते क्लान्ततरा निरन्नवसनाः क्षामाः क्षुधापीडिताः, छात्रास्तान् परिहाय शोणितयुतानन्यान्नरान् शोषय ।। (अरे खटमल ! तू लोगों का रक्त पीने में चतुर, मायावियों में सबसे आगे और बड़े भयंकर है, तू भाग जाने में भी बड़ा चतुर है। ये छात्र बहुत थके हुए हैं, अन्न-वस्त्र से हीन, दुर्बल एवं भूख से पीडित हैं। इनको छोड़कर तू रक्त से भरे हुए अन्य लोगों का खून चूस)

  • इस प्रकार इस काव्य में सौ अन्योक्तिमय पद्य हैं। भाषा अत्यन्त प्राञ्जल एवं शैली मधुर है। अन्योक्ति-साहित्य के क्षेत्र की यह एक अनुपम देन है।

विश्वेश्वर विद्याभूषण काव्यतीर्थ

ये पश्चिम बङ्ग संस्कृति शिक्षा परिषद् के सदस्य, पश्चिम बङ्ग शिक्षाधिकार सेवा से निवृत्त अध्यापक तथा ऋषिधाम के कुलपति थे। इनका काव्यकुसुमाञ्जलि काव्य १६८० ई. में प्रकाशित हुआ। रूपकमञ्जरी ग्रन्थमाला के अष्टम पुष्परूप इस काव्य में ७३ शीर्षकों में पद्यों का संकलन है। छन्दःप्रयोग पारम्परिक है। कवि विश्वदेवनन्दन, वाणी-वन्दन तथा सुरभारती-वन्दन से काव्य आरम्भ करता है। अनेक कविताएँ स्तुतिपरक, कुतुवर्णनपरक तथा हिमालय-गङ्गादिवर्णनपरक हैं। ‘मधुपूर्णिमाया भावपुष्पाञ्जलिः’ शीर्षक कविता से एक श्लोक उघृत है हे श्रीकान्त कृतान्तभीतिविकले सन्तापतप्ते जने लीला-लास्य-मधुप्रमोदललिता दृष्टिं विकीर्यामलाम् ।१६४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास क्रीड त्वं मुरलीधरश्चिरसुखं मच्चित्तवृन्दावने भक्तिस्यन्दमयीं प्रवाह्य यमुनां पीताम्बरः श्रीधरः।। (हे लक्ष्मी के पति भगवान् विष्णु ! यमराज के भय से व्याकुल, सन्ताप से तपे हुए लोगों पर अपनी लीला और नृत्य के आनन्द के कारण ललित निर्मल दृष्टि को डालकर पीत वस्त्र एवं मुरली धारण करने वाले तुम मेरे हृदय रूपी वृन्दावन में भक्ति के प्रवाह से युक्त यमुना को प्रवाहित करके चिरकाल तक सुख देते हुए क्रीडा करो।) अनेक कविताएँ स्मृतितर्पणरूप तथा श्रद्धाञ्जलिरूप भी हैं।

उमाशङ्कर शर्मा त्रिपाठी

महाकाव्य एवं गीतिकाव्य के क्षेत्र में किये गये सर्जन के अतिरिक्त श्री त्रिपाठी ने लघुकाव्य लिखे तथा अन्य अनेक मुक्तक रचनाएँ भी प्रस्तुत की। आपकी ‘अहं राष्ट्री’ नामक लघुकाव्यकृति सर्वाधिक प्रसिद्ध हुई, जिसमें राष्ट्रीय नेताओं के महनीय चरित्रों का अङ्कन है। इनकी दूसरी लघुकृति ‘रसभारती’ हास्यरसमयी है। त्रिपाठीजी की रचनाओं में प्रगति का शङ्खनाद है। भारतीय समाज में युगानुरूप होने वाले सुधार के लिए कवि की वाणी प्रस्फुटित होती है। अस्पृश्यता की कुप्रथा के विरुद्ध बोलते हुए कवि कहता है कि बड़े-बड़े देव-मन्दिरों का निर्माण करने वाले वे ही लोग हैं जिन्हें इनमें जाने से रोका जाता है - केषां कीर्तिहरिगृहमिदं मन्दिरं नेत्ररयं वेदज्ञैः किं विरचितमिदं क्षत्रियैर्वाऽथ वैश्यैः। अस्पृश्यानां दिशति धवलां सभ्यतावमपंक्ति प्रासादोऽसौ नभसि पवनाश्लेषकम्पत्पताकः।। त्रिपाठीजी ने अनेक आधुनिक विषयों पर अपनी लेखनी सार्थक कर संस्कृत काव्य-जगत् में नया आन्दोलन भी चलाया है और यथावसर पारम्परिक विषयों पर पारम्परिक शैली में भी काव्य-रचना की है।

रेवा प्रसाद द्विवेदी ‘सनातन’

इन्होंने सातवें-आठवे दशक में प्रसिद्ध ‘सीताचरितम्’ महाकाव्य सहित अनेक काव्यों का प्रणयन किया। अनेक स्फुट कविताओं के अतिरिक्त आपका ‘रेवाभद्रपीठकाव्यम् एक प्रसिद्ध लघुकाव्य है, जिसका प्रकाशन १६८८ ई. में हुआ। कवि ने अपने जन्मस्थान एवं गृहग्राम के वर्णन से काव्य का आरम्भ किया है। नर्मदानदी के तट पर स्थित, मध्य प्रदेश के भोपालभुक्ति में स्थित नादनेर ग्राम का वर्णन कवि ने सुचारू रूप से किया है। साथ ही रेवा नदी का सौन्दर्य-वर्णन भी किया है, जिसका एक उदाहरण इस प्रकार है - श्रीरेवा या धरित्रीपरिसर उदयतक्षात्र-विप्र-प्रताप व्यामिश्रस्याद्भुतात्मा भवति खलु पदं वर्त्मनोऽध्यात्मनीतेः। लघुकाव्य मन्ये नो वारिधारां वहति भगवती नर्मदास्मिन् प्रदेशे तां ब्रह्मक्षत्रधाम्नां प्रणयमसृणतां प्रीतिधारां वदामः।। काव्य में शार्दूलविक्रीडित, स्रग्धरा जैसे बड़े छन्दों का प्रयोग है। भाषा प्रौढ़, कठिन एवं पाण्डित्यपूर्ण है। वस्तुतः आपकी कविता में पाण्डित्य एवं वैदग्ध्य का अद्भुत मिश्रण प्राप्त होता है। द्विवेदीजी की स्फुट रचनाओं में से ‘मातुःस्तुति’ का एक पद्य द्रष्टव्य है - मातश्चित्तवितर्दिकामधिवसन्तीच्छामयूरी भम प्रत्यग्रान् विषयामिधान् विषधरान् संप्रेक्ष्य नृत्यत्यसौ। सूते किञ्च विचित्रपोतकगणं तत्रैव नृत्यत् स्थिरं कोन स्यान्मृगयुर्विना तव शुभं दिव्यं कृपाविभ्रमम्।। यद्यपि कविवर द्विवेदी की कविता में अनेक आधुनिक विषयों का भी समावेश हो गया है, परन्तु उनकी कविता शैली की दृष्टि से काशी की प्रौढ परम्परा का ही प्रतिनिधित्व करती है।

शतपत्रम्-‘सनातन’ कवि द्विवेदी का यह लघुकाव्य १६८७ ई. में कालिदास संस्थान, वाराणसी से प्रकाशित हुआ। कवि ने इसमें कविता के विषय में ११५ पद्य लिखे हैं। कविता क्या है इस बात को यहां प्रत्येक पद्य में अलग-अलग रीति से प्रतिपादित किया गया है। कविता प्रणयतरल हृदय का मुक्तबन्धन संविधान है, हृदय की संसिसृक्षा है। कविता कवि का स्वगत है, वह स्व के बिम्ब के प्रतिबिम्ब का शब्दात्मक प्रतिबिम्बन है

कविता स्वगतं कवैः स्वबिम्ब-प्रतिबिम्ब-प्रतिबिम्बनं वचःसु । अत एव तु तां विभावयामोऽपरलभ्यं परमात्मनो विलासम्।। प्रत्येक पद्य ‘कविता’ पद के प्रयोग से आरम्भ होता है और कविता के स्वरूप का विविध कल्पनाओं, रूपकों और प्रयोगों के द्वारा उद्घाटन करता है और कविता को विविध रूपों में परिभाषित करता है। एक सिद्ध कवि और आचार्य द्वारा कविता को इस प्रकार लक्षित करना काव्य के क्षेत्र में काव्यशास्त्र का सुन्दर प्रयोग है।

‘प्रमथः

१९८८ में प्रकाशित इस काव्य को कवि ने अंग्रेजी में ‘Poems on Atomic Age’ इस नाम से लक्षित किया है। वस्तुतः यह एक संकलनकाव्य है, जिसमें नौ रचनायें संगृहीत हैं। प्रथम ‘प्रमथ’ परमाणु युग के विषय विपाक को लक्षित कर शान्ति कामना से निष्पन्न भावमयी रचना है, द्वितीय ‘चतुर्दशी’ वैराग्यमयी, तृतीय ‘प्रलापाः’ आर्थिक वैषम्य पर प्रहार करने वाली, चतुर्थ ‘निसर्गः’ मात्सर्य-प्रतिशोधमयी, पञ्चम ‘किं नु करोमि’ नियतिचक्र के वैपरीत्य को बताने वाली, षष्ठ ‘नमो विषाय’ समाज-समीक्षा-परक, सप्तम ‘मृत्यो’ दार्शनिकतामय, अष्टम ‘कस्त्वं काम’ मनोवैज्ञानिक तथा नवम ‘भावाः’ आन्तरिक द्वन्द्व का निरूपण करने वाली है। ‘प्रमथः’ से एक उदाहरण द्रष्टव्य है १८६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास भगवन्! न हि ताण्डवस्य वेला ननु विज्ञानवधूः सकौतुकैव। इयमय सयावका कथञ्चित् क्रमते कौतुकवेश्मने वराकी ।। हे भगवन्! यह ताण्डव का समय नहीं है। विज्ञानरूपी वधू तो कौतूहलयुक्त है ही। यह इस समय लाल रंग का महावर लगाये हुए बेचारी किसी तरह कौतुकगृह में जा रही है।

परमानन्द शास्त्री

इनके शैक्षणिक जीवन का अधिकांश भाग अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग में प्राध्यापक एवं आचार्य के रूप में काम करते हुए बीता। शास्त्रीजी ने अनेक मधुर गीतों का प्रणयन किया और पारम्परिक छन्दों में काव्य-रचना की है। आपने सरल एवं प्राञ्जल भाषा-शैली का प्रवर्तन किया है, जिनका विवरण इस प्रकार है -

  • गन्धदूतम्-मेघदूत के अनुकरण पर लिखे गये दूतकाव्य ‘गन्धदूतम्’ का प्रकाशन वर्ष १७७ में हुआ। पति से मान करके पिता के घर गई हुई पत्नी के पास नायक कमल के गन्ध को दूत बनाकर भेजता है। उसकी पत्नी वाराणसी में रह रही है। नायक गन्धदूत को फरीदाबाद, ब्रज प्रदेश आदि के मार्ग से भेजता है। इसी यात्रा-क्रम में आगे मधुरा, आगरा आदि का वर्णन करते हुए कवि कहता है आद्य क्षेत्रं त्रिभुवनगुरोश्चक्रिणो राजनीते तिस्तस्मात्तदनु मधुरां नाम गच्छेः पुरीं त्वम्। भूयो यायास्त्वमनुयमुनावीचिघौताञ्चलां तां लोलागारं मुगलनगरीमागरां नागरीणाम्। (हे भाई गन्ध! तीनों लोकों के स्वामी चक्रधारी भगवान् कृष्ण की राजनीति का यह आदि स्थल है, अतः तुम मथुरा नगरी को अवश्य जाना। फिर तुम यमुना नदी की लहरों से धोये गए आँचल वाली नगरवासिनी रमणियों की सुन्दर घरों वाली मुगल नगरी आगरा को जाना) पूर्वगन्ध और उत्तरगन्ध, दो भागों में विभाजित इस काव्य में कवि ने एक ओर बड़े औद्योगिक नगरी का वर्णन कर पर्यावरण प्रदूषण, धुआँ उगलती चिमनियों आदि का वर्णन किया है तो दूसरी ओर ग्राम्य वर्णन में वहाँ की सुरम्य प्रकृति एवं सरल रीतियों का भी वर्णन किया है। अनेक ऐतिहासिक स्थानों एवं व्यक्तियों को भी कवि ने अपने काव्य में स्थान दिया है। इस तरह कवि आधुनिक भारत के चित्र को भी दिखाता है और साथ ही शराब पीने के दुर्व्यसन से होने वाली बुराइयों को भी समाज के सामने रखता है। सुरापान की बुरी आदत छोड़ने के आश्वासन के बाद ही पति को पत्नी से मिलन संभव हो पाता है। १८७ लघुकाव्य कौन्तेयम्-राधेय कहलाने वाले कुन्तीपुत्र कर्ण को परम्पराविरुद्ध रीति से ‘कौन्तेय’ कहकर कवि परमानन्द ने ‘कौन्तेयम्’ काव्य लिखा है। इस खण्डकाव्य को ‘कर्णः’, ‘कुन्तीः’, ‘अर्जुनः’, और ‘कृष्ण’, चार भागों में विभाजित किया गया है। कर्ण न तो पुत्र होकर माता का वात्सल्य पा सका, और न क्षत्रिय होते हुए भी क्षत्रिय के रूप में समाज में स्वीकार किया जा सका। कवि ने कर्ण की इस व्यथा को उभारा है जन्मना क्षत्रियः कौन्तेयः संयोगाल्लोके राधेयः सूतसुतोऽस्मि गृहीतः। क्षत्रोचितगुणो न जातेम॒षैव दोषैर्भूयो भूयो एपमानझरो बहु पीतः।। कुन्ती के माध्यम से कवि ने भारतीय नारी की विवशता एवं उसके सामाजिक विषपान एवं बलिदान की व्यथा कही है। अर्जुन और कृष्ण के वचनों के माध्यम से कवि ने मिथ्या कुलजातिदम्भ, अर्जुन की ग्लानि, परस्पर वैर का कारण आदि विषयों को दिया है। अतः यह काव्य भी समाज की रूढियों के विरुद्ध कवि की आवाज है। परमानन्दसूक्तिशतकम्-इस लघुकाव्य में कवि ने १०८ सूक्तिरूप श्लोकों को संगृहीत किया है और इनसे आधुनिक जीवन की विषमताओं और कुटिलजाओं को दर्शाया है। सीता के विषय को लेकर निर्मित यह सूक्ति कितनी मर्मभेदिनी है - सीताभूत् खलुमन्थरारजकयोहतोर्वने वासिनी जाताः सम्प्रति मन्थरा प्रतिगृहं श्वश्रूननान्दादयः। दहेज के कारण जलाई गई युवती की व्यथा को कवि ने इस तरह कहा है - वक्षस्ताडितकेन शोकविकलैराक्रन्द्यते । बाहुभिः धिक्कारः स्फुटितोऽद्य कोऽपि नगरे स्टोवः पुनः कौतुकी। काव्य में अनेक अन्योक्तियाँ तथा अनेक व्यंग्योक्तियाँ भी हैं। वानरसन्देशः-भारतीय राजनीति के क्षेत्र में नेताओं द्वारा पदलोभ के कारण आचारनीति छोड़कर जिस दुर्नीति का पालन किया जा रहा है और उससे इस क्षेत्र में जो भ्रष्टता एवं मूल्यहीनता आ गई है, कवि ने उसे व्यङ्ग्यात्मक रूप से प्रकट किया है। विप्रश्निका - यह भी सौ श्लोकों का एक लघु काव्य है जिसमें कवि ने जीवन के विविध विषयों और समस्याओं पर प्रश्न उपस्थापित किए हैं। परिदेवनम् - जून १६८० में विमान-दुर्घटना में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी का असामयिक निधन हो जाने पर कवि ने इस काव्य को लिखा था। इसीलिए उन्होंने इसे ‘शोकगीतिः’ नाम दिया है। इस प्रकार शास्त्रीजी के काव्य-प्रणयन में अत्यधिक वैविध्य विद्यमान है।

सुन्दरराज

इनका जन्म १६६३ ई. में तजावूर जनपद में हुआ था। श्री सुन्दरराज १८८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी अनेक संस्कृत-काव्यों की प्रणयन किया, जैसे श्रीजगन्नाथसुप्रभातम्, श्रीजगनाथस्तोत्रम्, श्रीजगन्नाथशरणागतिस्तोत्रम्, श्रीजगत्राधमङ्गलाशंसनम्, मङ्गलाशंसनम्, बदरीशतरङ्गिणी, सुरश्मिकाश्मीरम् आदि। दो प्रमुख काव्यों का विवरण इस प्रकार है

सुरश्मिकाश्मीरम्

इस काव्य का प्रणयन एवं प्रकाशन काल १६८३ ई. है। यह लघुकाव्य १०८ उपजातिवृत्तों में उपनिबद्ध है। इसमें सरल, सरस पदावली में काश्मीर प्रदेश की शोभा वर्णित है। काश्मीर की नैसर्गिक रमणीयता, सांस्कृतिक गौरव, प्राचीन वैभव एवं अद्यतन सौन्दर्य का कवि की लेखनी से चित्रण हुआ है। कवि का बिम्बविधान इस पद्य में दर्शनीय है - कान्तारशान्तः कुलशैलकान्तः कासारकूलैः करणानुकूलः। कालो वसन्तः कविकोकिलानां काश्मीरसंज्ञो विषयो मनोज्ञः।। (जिसमें शान्त वन है, सुन्दर ऊँचे पर्वत हैं, झीलों के तटों से जो इन्द्रियों को सुख प्रदान करने वाला है ऐसा काश्मीर देश कविरूपी कोकिलों के लिए सुन्दर वसन्त है।) __कवि ने काश्मीर प्रदेश के प्रत्येक सुन्दर स्थल, उद्यान, नदी, गुहा, आदि का सुन्दर वर्णन किया है। काश्मीर से सम्बन्धित जनश्रुतियों, महापुरुषों एवं तत्तत् वस्तुओं का वर्णन भी यथावसर किया गया है। कवि ने सर्वत्र वैदर्भी रीति का ही आश्रय लिया है। अनेक अलकारों के माध्यम से कवि ने अपनी बात को अधिक चारुता से उपन्यस्त किया है। यथा - काश्मीरनाम्नी तरुणी किमेषा हेमन्तशीतौ किमृतू निशीथः। किं कम्बलोऽयं धवलस्तुषारः शेते यमावृत्य नतोन्नताङ्गी ।। श्रीबदरीशतरङ्गिणी-कवि सुन्दरराज ने भारतीय संस्कृति के अमरधाम श्री बदरीश क्षेत्र अथवा श्री बदरीनाथ का स्वयं साक्षात्कार कर काव्यमय वर्णन उपन्यस्त किया है। बदरीनाथ, केदारनाथ क्षेत्र में स्थित नदियों, मन्दिरों, पुराणप्रसिद्ध स्थानों का कवि ने मनोरम वर्णन किया है जो भौगोलिक दृष्टि से नितान्त उपयुक्त हैं। इस काव्य में यात्रा-वृत्तान्त, शतक-काव्य और स्तोत्र काव्य तीनों का समन्वय अथवा सङ्गम है, जिससे यह पर्यटकों, भक्तों एवं रसिकों के लिए समान रूप से उपयोगी एवं प्रिय है। भारतीय संस्कृति के प्राणभूत इस काव्य में राष्ट्रभक्ति-भावना भी है तथा मानवता के लिए अमृतमयी शान्ति का संदेश भी। अलङ्कारों का प्रयोग सहज है। अनुष्टुप्, उपजाति, मालिनी, वियोगिनी, छन्दों के सुन्दर प्रयोग हैं। श्लेष अलङ्कार का चमत्कारपूर्ण प्रयोग द्रष्टव्य है जिगमिषन् बदरीं शतरगिणीं श्रयति या बदरीशतरङ्गिणीम्। पठति यो बदरीशतरङ्गिणीम् स लभते बदरीं शतरङ्गिणीम्।। लघुकाव्य १८६

रामाशीष पाण्डेय

श्री पाण्डेय राँची विश्वविद्यालय के मारवाड़ी कालेज में संस्कृतविभागाध्यक्ष रहे हैं। संस्कृत-नाटक-लेखन के अतिरिक्त लघुकाव्य-क्षेत्र में भी इन्होंने सर्जन-कार्य किया, जिसका विवरण इस प्रकार है - मयूखदूतम्-यह संस्कृत दूत काव्य-परम्परा का अन्यतम काव्य है जिसका प्रकाशन १६७४ ई. में हुआ। काव्य का विषय नितान्त आधुनिक है। इसका नायक मानव के शिक्षित वर्ग का प्रतिनिधि है जो प्रेम-तत्त्व में अपनी आस्था रखता है। नायिका एक पाश्चात्त्य रमणी है जो राष्ट्रीय भावना एवं प्रेम भावना के समायोजन में तत्पर है। यहाँ मयूख को दूत रूप में भारत के पटना नगर से इंग्लैण्ड भेजा जाता है। अतः इस बीच के प्रमुख स्थलों का भौगोलिक एवं प्राकृतिक वर्णन उपस्थित किया गया है। छन्द मन्दाक्रान्ता ही है। इन

  • सूर्यकिरणरूप दूत को पटना से काशी, प्रयाग, आगरा होते हुए दिल्ली भेजा गया है और फिर वहाँ से करांची, मक्केश्वर, यूनान, रोम, पेरिस, लन्दन होते हुए इंग्लैण्ड पहुंचने के लिए कहा गया है। पाश्चात्त्यदेशीय नगरों की अपेक्षा भारतीय नगरों तथा अन्य स्थलों के वर्णन अधिक सुन्दर हैं। दौत्यकर्म को विदेश-गमन के प्रसङ्ग से जोड़कर कवि ने आधुनिकता का अच्छा पुट दिया है। इन्दिराशतकम्-भारत की पूर्वप्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के जीवन एवं व्यक्तित्व पर आधारित सौ श्लोकों का काव्य है। इन्दिराजी के जन्म से लेकर मृत्यु तक की घटनाओं का वर्णन सरल सपाट भाषा में किया गया है। इन्दिराजी की हत्या का वर्णन कवि इस प्रकार करता है - वेदाष्टनिध्यब्जयुतेऽथ वर्षे दिल्ल्यां स्वगेहे निजरक्षकाभ्याम् । | अक्तूबरे मासि हता मराली क्षीराज्जलं स्वेदयितुं निमग्ना।। प्रहेलिकाशतकम्-बालकों के मनोविनोद एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से कविवर पाण्डेय ने सौ पहेलियों का यह काव्य लिखा है। पहेली-पद्धति के अनुसार प्रत्येक पद्य में कवि प्रश्न उपस्थित करता है और कोष्ठक में उसका उत्तर लिख देता है जो प्रायः बुद्धि को व्यायाम कराने वाला एवं चमत्कार उत्पन्न करने वाला होता है। भाषा अत्यन्त सरल एवं बालकों के लिए ग्राह्य है। इनकी नवीनतम कृति “काव्यकदम्बकम्’ नाम से प्रकाशित हुई है।

हजारीलाल शास्त्री

श्री शास्त्री हरियाणा राज्य के एक प्रतिष्ठित काव्यसर्जक हैं जिन्होंने संस्कृत की अन्य काव्यविधाओं के अतिरिक्त ये सात काव्यशतक लिखे शिवप्रतापविरुदावली, इन्दिराविजयप्रशस्तिशतकम्, शिवशतकम्, महर्षिदयानन्दशतकम्, सगुणब्रह्मस्तुतिशतकम्, और कादम्बरीशतकम्। इनमें से कुछ काव्यों का परिचय इस प्रकार है शिवप्रतापविरुदावली - इस शीर्षक से शास्त्रीजी ने वीर शिवाजी एवं महाराणा प्रताप के जीवनचरित को आधार बनाकर दो शतक काव्य लिखे हैं-प्रतापविजयनामक प्रथमशतक १६० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास तथा शिवराजविजयनामक द्वितीयशतक। इन दोनों शतकों में इन दो वीरों की विजयगाथा कवि ने हिन्दू संस्कृति की रक्षा एवं आर्य जनता की जागृति का सन्देश दिया है। राणा प्रताप और उनके परिवार को जंगल में रहकर कितने कष्ट भोगने पड़े उसका एक उदाहरण कितना मार्मिक है जब भूखी बच्ची के हाथ से बिलाव घास की रोटी भी छीनकर ले जाता है हा! चैकदा सुरचिते तृणबीजचूर्णैः भोक्तुं मुदा करते करपट्टिके द्वे। व्यात्ताननौ वनभवः कुविडाल एको जग्राह हन्त! करतो नृपबालिकायाः।। इन्दिराविजयप्रशस्तिशतकम्-इस लघुकाव्य में श्रीमती इन्दिरा गान्धी के महिमाशाली व्यक्तित्व एवं राजनीतिक उपलब्धियों का दिग्दर्शन कराया गया है। कवि आरम्भ में ही उनके प्रधानमंत्री जैसे उच्च पद की प्राप्ति पर अपनी शुभाशंसा व्यक्त करता है। प्रसङ्गवश कवि स्वदेश के गुणगौरव का भी बखान करता है और उसकी दुर्दशा पर चिन्ता भी व्यक्त करता है। अन्त में इन्दिराजी की बंगलादेश के उदयकाल में हुई विजय की चर्चा कर काव्य समाप्त होता है समस्तां स्वदेशस्य शक्तिं नियोज्य सुमातेन्दिरा वङ्गदेशं स्वतन्त्रम्। विधायार्यवीराङ्गनेयं कुपाकाद् हसन्ती मुदासीद् यशोभिः सुपूता।। कवि इसे इन्दिरा-सम्बन्धी ‘प्रशस्ति-प्रशस्त लघु ग्रन्थ’ कहता है। शिवशतकम्-शास्त्रीजी ने वैराग्य-प्राप्ति के उद्देश्य से भगवान शिव की स्तुति में इस शतक को लिखा है। शिव के लगभग सब विशेषणों को कवि ने यहां प्रयुक्त कर दिया है। शास्त्रीजी ने अपने शतकों से इस शती के आठवें दशक की संस्कृत-कविता का प्रतिनिधित्व किया है।

शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी

प्रख्यात संस्कृत पण्डित म.म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी के आत्मज शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी का जन्म जयपुर में सन् १६३४ में हुआ था। __ दीर्घकाल से वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य सङ्काय में साहित्य के प्राध्यापक एवं आचार्य पद पर प्रतिष्ठित रहे । बाल्यकाल से ही लेखन-प्रवृत्ति होने के कारण इन्होंने कई संस्कृत काव्य लिखे, जिनमें शतक काव्यों को विशेष प्रसार मिला। आरम्भिक शतकों में प्रमुख हैं-गोस्वामि-तुलसीदास-शतकम्, काव्यप्रयोजनशतकम्, काव्यकारणशतकम्, तथा विद्योपार्जनशतकम्। ये शतक १६८२ से पूर्व प्रकाशित हो चुके थे। १६८२ में ‘स्फूर्तिसप्तशती’ का प्रकाशन हुआ। इसके अतिरिक्त कविवर चतुर्वेदी ने ‘यात्राशतकम्’, ‘सी.वी. रमणशतकम्’, ‘कार्लमार्क्सशतकम्’, विद्याशतकम्, ‘यावत्तावत्शतकम्’, तथा ‘हाहा-हूहूशतकम्’, जैसे शतक काव्यों की भी रचना की जिनकी चर्चा उनके ‘चर्चामहाकाव्यम्’ में आ गई है। आधुनिक विज्ञान और राजनीति के विषयों पर काव्य लिखकर डॉ. चतुर्वेदी ने संस्कृत-साहित्य की लघुकाव्य १६१ समसामयिकता को सुपुष्ट किया है। कार्ल मार्क्स और सी. वी. रमण दोनों पर संस्कृत-लेखन आधुनिकता से जोड़ता है। चतुर्वेदी जी की अन्यतम कृति का परिचय इस प्रकार है - स्फूर्तिसप्तशती - कविवर चतुर्वेदी ने आरम्भ में संस्कृत और बाद में हिन्दी में भी अपनाई गई ‘सतसई-परम्परा’ को आगे बढ़ाते हुए सात सौ उन्नीस पद्यों का यह ‘स्फूर्तिसप्तशती’ काव्य लिखा है। कुछ स्थलों को छोड़कर प्रायः सभी पद्य मुक्तक ही हैं। काव्य में विद्यमान E६ विषयों को चार भागों में विभक्त किया गया है-आर्याभागः, समस्यापूर्तयः, नानाच्छन्दांसि गीतानि च। आरम्भ में आर्याछन्द द्वारा कवि ने विविध विषयों पर लेखनी चलाई है। देवस्तुति, महापुरुषप्रशंसा, संस्कृत-संस्कृति-निष्ठा, दार्शनिकता, प्रगतिशीलता, विनोदप्रियता, व्यङ्ग्यवक्रता, समसामयिकता आदि प्रवृत्तियाँ भूरिशः दिखाई पड़ती हैं। इसी काव्य का एक अंश है चतुर्वेदीजी का ‘किन्तुशतकम्’, जिसमें आधुनिक सामाजिक परिवेश में व्याप्त यथार्थ और आदर्श के बीच की विसंगतियों को दिखाया गया है। ऐसी ही किन्तु-निर्दिष्ट विसंगति दर्शनीय है - धर्मों देशो राष्ट्रमिति शब्दाः प्रोत्रताः किन्तु। धूर्तमुखैर्निर्गमनादेते सर्वे निरर्थका जाताः।। कवि की आर्यायें वस्तुतः बहुत सुन्दर बन पड़ी हैं। आर्याओं के अतिरिक्त समस्यापूर्तियों में भी उन्होंने आधुनिक विषयों पर सुन्दर पद्य लिखे हैं। जैसे-‘को विहातुं समर्थः’ की पादपूर्ति में कवि रिश्वत पर एक अच्छा व्यङ्ग्य लिखता है उत्कोचानामिह शबलताऽनन्तरूपेषु दृश्या यत्रोत्कोचप्रबलतरता तत्र भोग्या विलासाः। अधोत्कोचः शिव इति हरिर्वाऽथ देवो हनूमान् चञ्चद्रूपं द्रविणमतुलं को विहातुं समर्थः ।। (इस संसार में रिश्वतों की विविधता अनेक रूपों में दिखाई पड़ती है। जहाँ रिश्वत की अत्यधिक प्रबलता होती है, वहां विलास भोगने योग्य होते हैं। आज रिश्वत ही शिव, विष्णु अथवा हनुमान है। चञ्चल रूप वाले अनुपम धन को कौन छोड़ सकता है ? अर्थात् कोई नहीं। इस प्रकार चतुर्वेदी जी की कविता में स्वातन्त्र्योत्तर भारत के बदलते परिवेश का समग्र स्वरूप झांकता है और इस क्रम में आठवें-दसवें दशक के मध्य में उनकी कविता विशेष रूप से प्रकाश में आई है।

विठल देवमुनि सुन्दर शर्मा

कविवर सुन्दर शर्मा उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद की संस्कृत परिषद् में परिशोधन सहायक हैं। इन्होंने मुख्यतः २ शतककाव्य लिखे जिनका विवरण इस प्रकार है - १६२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास श्रीनिवासशतकम्-इस शतक का प्रकाशन १९८७ ई. में हुआ। यह एक चरितप्रधान काव्य है। ‘देवीशतकम्’ भी इनका एक भक्तिपूर्ण लघुकाव्य है। वीराजनेयशतकम्-यह शतक १६७१ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें १०८ पद्य हैं। इसमें वीर हनुमान् के प्रति भक्ति प्रदर्शित की गई है और उनके गुणों का गान किया गया है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है - लता तवज्रपातजनिता न च हानिरासीद् वातात्मजात्। तव काचिदपीह हिंसा । रक्तौ हनू तव हि देव ततो हनूमान् वीराञ्जनेय! रघुवीरपदाब्जभृग! ।। ‘छायापतिशतकम्’ और ‘शम्भुशतकम्’ ये और शतक काव्य उन्होंने लिखे हैं, जिनका प्रकाशन १९८३ वर्ष से पहले हो चुका था।

सत्यव्रत शास्त्री

साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित सत्यव्रत शास्त्री ने अपने प्रसिद्ध वैयाकरण पिता प्रो. चारुदेव शास्त्री से संस्कृत ज्ञान को पितृ-परम्परा द्वारा प्राप्त किया। दीर्घकाल तक शास्त्रीजी दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में आचार्य-अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। शास्त्रीजी में विवेचनात्मक एवं रचनात्मक दोनों प्रकार की प्रतिभा विद्यमान है। इन्होंने दो महाकाव्यों के अतिरिक्त ‘श्रीगुरुगोविन्दसिंहचरितम्’ खण्डकाव्य तथा ‘बृहत्तरं भारतम् शतक काव्य लिखे। शास्त्रीजी ने अनेक देशों की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक यात्राएं की। अपनी इन यात्राओं के वृत्तों को संस्कृत-भाषा में पद्यबद्ध कर वैदेशिक वृत्त-वर्णन-परक नवीन काव्य-रूप का प्रवर्तन किया। इस धारा के उनके दो लघुकाव्य है, जिनका विवेचन इस प्रकार है - शर्मण्यदेशः सुतरां विभाति-अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, लखनऊ द्वारा प्रकाशित इस काव्य में कवि ने वर्ष १६७५ में जर्मनी जाने पर वहाँ अनुभूत यात्रा पर अपना यात्रावृत्त लिखा है। कवि ने वहाँ जिन प्रमुख विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दिये, अनेक संस्कृत विद्वानों से भेंट की तथा जिन-जिन स्थानों पर भ्रमण किया, उनका ब्यौरेवार वर्णन यहाँ प्राप्त होता है। अपने यात्रा-वर्णन का आरम्भ करते हुए कवि कहता है योरूपभूमण्डलमध्यवर्ती पारं समृद्धेः परमभ्युपेतः। नानानदी-प्रस्रवणैः सुरम्यः शर्मण्यदेशः सुतरां विभाति ।। (पृथ्वीमण्डल के एक भाग यूरोप के मध्य में स्थित अत्यन्त समृद्ध एवं सुन्दर तथा अनेक नदियों और झरनों से सुहावना लगने वाला जर्मनी देश अत्यधिक सुशोभित होता है।) कवि सर्वप्रथम विमान से फ्रांकफुर्ट नगर पहुँचने का वर्णन करता है। फिर वहाँ मारबुर्ग और टोरीन नगरों में होता हुआ वह जर्मनी की राजधानी बॉन पहुंचता है। बॉन लघुकाव्य का वर्णन करते हुए कवि कहता है कूलद्वये तस्य नदस्य तावद् बॉनाख्यमास्ते नगरं निविष्टम्। यस्योपकण्ठे वलया गिरीणां सौन्दर्यमत्यद्भुतमर्पयन्ति।। सांस्कृतिक एवं शैक्षिक स्वरूप के अतिरिक्त जर्मनी के प्राकृतिक सौन्दर्य का भी कवि चारुतापूर्वक वर्णन करता है। प्राच्यविद्या एवं संस्कृत से सम्बद्ध अन्य अनेक जर्मन संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जाकर, वहाँ के विद्वानों से साक्षात्कार कर, विविध विषयों पर व्याख्यान देकर कविवर शास्त्रीजी ने जो अनुभव प्राप्त किये, उन सबका सञ्चय इस लघुकाव्य में किया गया है। वैसे समस्त काव्य सूचना-सङ्कलन बहुल होने के कारण अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि का नहीं है, परन्तु आधुनिक संस्कृत काव्य में एक नई धारा प्रवाहित करने के कारण इसका विशिष्ट योगदान है। थाईदेशविलासम्- १६७७ ई. में जब कविवर शास्त्री की नियुक्ति थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक में स्थित चुलालौकौर्न विश्वद्यिालय में भारतीय विद्याध्ययनपीठ के अभ्यागताचार्य के रूप में हुई तो इस यात्रा को साहित्यिक रूप कवि ने इस लघुकाव्य के माध्यम से दिया और जो बाद में १६७E ई. में ईस्टर्न बुक लिंकर्स, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। आरम्भ में यात्रावृत्त का प्रवर्तन करते हुए कवि कहता है अस्त्येशियानामनि सुप्रसिद्ध द्वीपे विशालेऽतिविशालकीर्तिः।। आग्नेयदिङ्मण्डलमौलिभूतो देशोऽतिरम्यो भुवि थाइलैण्डः।।। कवि थाईलैण्ड की सुदृढ़ सांस्कृतिक परम्परा धार्मिक अवस्था, रामकथा और रामायण के प्रचार, का वर्णन करता हुआ उनकी राजधानी बैकांक के विविध स्थानों, बाजारों प्राकृतिक दृश्यों, कलाओं आदिका दर्शन कराता है। थाईदेश की राजकुमारी का भी सुरम्य वर्णन कवि ने प्रस्तुत किया है। वर्णनीय व्यक्ति एवं वस्तु के अनुसार काव्य में छन्दों का’ भी परिवर्तन किया गया है। भारत की पुरातन भाषा संस्कृत में अधुनातन वैदेशिक यात्राओं का ऐसा तथ्यपूर्ण वर्णन निश्चित रूप से संस्कृत साहित्य के क्षेत्र का विस्तार करता है और संस्कृत को अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर खड़ा करने में सहयोग करता है।

वागीश शास्त्री

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के अनुसन्धान संस्थान के भूतपूर्व निदेशक आचार्य भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘वागीश’ शास्त्री संस्कृत जगत् में हास्य-व्यङ्ग्यकार के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं। इनकी काव्यकृति ‘नमसप्तशती’ वि.सं. २०४१ में प्रकाशित हुई, जिसको स्वयं कवि ने ‘शिष्ट-हास्य-व्यङ्ग्योक्तिविराजिता’ तथा ‘शिष्टहास्यरससुधाधाराऽऽप्लाविता पद्यमयी’ रचना कहा है। इसमें सात अध्याय हैं जिनको क्रमशः शैक्षिक, कौटुम्बिक, सामाजिक, व्यावसायिक, चैकित्सिक, आरक्षित और दाण्डिक नामों से विषयानुसार विभाजित किया गया है। इस लघुकाव्य में कवि ने कभी एक, कभीआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास दो, तीन या चार पद्यों को लेकर एक-एक विषय पर हास्य की धारा बहाई है अथवा चुटीले व्यङ्ग्य कसे हैं। हमारे दैनन्दिन पारिवारिक, शैक्षिक, अथवा सामाजिक जीवन में जो घटनाएँ घटित होती हैं, कवि ने उन्हीं से विषय लेकर ये हास्य-व्यङ्ग्य के पद्य लिखे हैं। हास्य का एक छोटा-सा उदाहरण प्रस्तुत है जिला सखि ! कोलाहलं श्रुत्वा नक्तं बुद्धा व्यलोकयम्। खट्वाधश्चरणौ चौरः ? भीतः प्राणप्रियो मम।। दहेज-प्रथा पर एक हास्य-व्यङग्य की फुलझड़ी छोड़ते हुए कवि कहता है पुत्रं विवाहयित्वा च कश्चित् प्रत्यागतो जनः। प्राहुस्तत् सुहृदस्तं भोः। किं वृत्तं वद मित्र नः।। किं वदानि सखायो वो दण्डितोऽहं शतं खलु । कारावासश्च पुत्रस्य आजन्म समजायत।। (पुत्र का विवाह कराकर एक व्यक्ति वापस लौट आया। उसने उसके मित्रों में कहा, ‘मित्र ! क्या हुआ? हमें बताओं ! उसने कहा, मित्रों ! क्या बताऊँ। मैं तो सैकड़ों रुपयों से दण्डित हो गया और मेरे पुत्र को जीवनभर का कारावास हो गया।) आतकवाद की समस्या पर कवि ने ‘आतङ्कवादशतकम्’ नामक काव्य लिखा है जिसमें आतङ्कवाद और राष्ट्रवाद को पूर्वार्ध और उत्तरार्ध के रूप में निबद्ध किया गया है।

रुद्रदेव त्रिपाठी

इनका जन्म १६२५ ई. में मालवा प्रदेश के मंदसौर में हुआ था। त्रिपाठीजी दीर्घकाल तक लालबहादुर शास्त्री केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, दिल्ली में प्राध्यापक रहे। ‘मालवमयूरः’ नामक मासिक संस्कृत-पत्र के सम्पादन द्वारा उन्होंने संस्कृत में प्रभूत साहित्य सर्जना का क्षेत्र-विस्तार किया। त्रिपाठी जी को हास्य कवि के रूप में बहुत ख्याति मिली और वे हास्य रस के प्रतिनिधि कवि के रूप में माने जाने लगे। उन्होंने जिन लघुकाव्यों की सर्जना की, उनमें दूतकाव्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिनका विवेचन इस प्रकार है पत्रदूतम्-दूतकाव्य होने पर भी शृगारपरक कोटि में न आने वाले इस काव्य में कवि ने गुरुपूर्णिमा के अवसर पर गुरु के चरणों में उपस्थित न होने की स्थिति में पत्र को ही दूत बनाकर भेजा है। एक दिन बम्बई के समुद्रतट पर भ्रमण करते हुए कवि समुद्र के ज्वार को देखता है, जिससे उसे गुरुपूर्णिमा का स्मरण हो आता है और गुरु पूजन हेतु न पहुँच पाने पर मन्दसौर में स्थित अपने गुरु स्वामी कृष्णानन्द तीर्थ के पास क्षमायाचना से पूर्ण पत्र को दूत रूप में प्रेषित करता है। पत्र में बम्बई सेण्ट्रल से देहरादून एक्सप्रेस द्वारा की जाने वाली यात्रा में मार्ग में पड़ने वाले अनेक स्टेशनों का कवि वर्णन करता है। महत्त्वपूर्ण नगरों का विशेष वर्णन किया गया है। गाड़ी के चलते रहने पर बीच में आने वाले प्रातः रात्रि, मध्याह्न, सूर्यास्त आदि का भी वर्णन कवि ने किया है। साथ ही १६५ लघुकाव्य संवेदनात्मक स्तर पर उसने कुलियों और श्रमिकों की दशाओं, यात्रियों की कठिनाइयों तथा दीनजनों की जीवन-परिस्थितियों का भी वर्णन कर काव्य को आधुनिक रूप दिया है। पुत्रदूतम-आधुनिक समाज की विषमताओं को उभारने वाले इस काव्य में अपने मार्ग से भटके हुए, राजनीति के दलदल में फंसे हुए दिल्ली स्थित नायक के पास एक भोली ग्रामवधू द्वारा अपने पुत्र को दूत बनाकर भेजा गया है। पादत्राणदूतम्-यह हास्यमूलक लघुकाव्य है। कवि के विनोदिनी’ नामक ‘विनोद-पद्य-संग्रह’ में इसके कुछ पद्य छपे हैं। एक बार किसी कालेज के एक मनचले छात्र ने किसी सुन्दर कन्या पर आसक्त होकर उससे प्रेम करने का निश्चय किया - कश्चित् कामी प्रणयगुरुणा मोहमाप्तः कदाचिद् बालामेकां पठनसमये पाठशालां प्रयान्तीम् । दृष्ट्वा हृष्ट्वा मृदुलमृदुला चित्रवस्त्रावृताङ्गी मात्मायत्तां कथमपि सपद्येव कर्तुं व्यवास्यत्।। धीरे-धीरे उसकी आसक्ति बहुत बढ़ गई और प्रेमरोग से ग्रस्त वह अपने साथी मित्रों के सामने एक ही रट लगाने लगा धन्या कन्या वसति हृदि में कालिजस्यैव नान्या। कि परन्तु उस बालिका ने उस युवक को शिक्षा देने की योजना बनाई और ‘पादत्राण’ को दूत के रूप में भेजा, जिसने उस मनचले प्रेमी को ठीक कर दिया। इस प्रकार कविवर त्रिपाठी के दूतकाव्य आधुनिक परिवेश के हास्य-व्यङ्ग्य से युक्त हैं। ‘विनोदिनी’, ‘डिण्डिमः’ तथा ‘हाहा-हूहूः आपके अन्य हास्य-काव्य हैं, जिनमें उन्मुक्त हास-परिहास का वातावरण प्राप्त होता है। इन्होंने समस्या पूर्ति-परक काव्य के रूप में शिखरिणीछन्दोमयी श्रीबटुकभैरवलहरी की भी रचना की है। हास्य रस की इनकी अनेक कवितायें स्फुट रूप से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

रमाशङ्कर तिवारी

‘वैदेह्या अतीतावलोकनम्’ के रचयिता कवि तिवारी समीक्षक होने के साथ-साथ साहित्यकार भी हैं। वर्ष १६६0 में प्रकाशित यह लघुकाव्य परित्यक्ता सीता के अतीत का सीता द्वारा अवलोकन है। इसमें सीता के व्यथामय करुण भावों को अभिव्यक्ति मिली है। सीता बाल्यकाल से लेकर माँ बनने तक की अपनी व्यथाकथा को याद करती हैं और अन्त में निश्चित करती हैं कि वे राम-भवन नहीं जायेगी और यहीं मातृधर्म का निर्वाह करेगी। सीता के अतीत जीवन के अनेक मार्मिक पक्षों को कवि ने स्थल-स्थल पर उद्घाटित किया है। विवाह के पश्चात् सीता का मिथिला से अयोध्या को प्रस्थान कैसी भावभूमि में होता है इसका वर्णन करते हुए कवि कहता है १६६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास विस्मर्तुं न प्रभवामि भावार्द्रप्लवनं अयोध्यायै यदा प्रस्थानमक्रियत। अव्यधयन्मां पित्रोविप्रयोगश्च मावि ह्यपीडयन्मां पित्रोविप्रयोगश्च।। वन में अचानक बिना अपराध बताये सीता का इस तरह राम द्वारा परित्याग किया जाना कितना कष्टप्रद है, सीता के इस मर्मभेदी दुःख को कवि इस तरह व्यक्त करता है नाजानं कः कर्मदोषः प्रमादश्च का च च्युतिः कस्त्वगुणोऽपराधः, येनाऽदण्ड्य्य ऽहं भर्चा प्रेमिणा वा स्वामिना, राज्ञा, लोकभृता वा। सहसाऽकस्माद् विनाऽग्रज्ञानञ्च बिना पूर्वलिङ्गमज्ञात्वाऽभियोगनम् ।। कवि ने छन्द के विषय में पारम्परिकता छोड़कर नवीनता का प्रयोग किया है। जनक की सभा में शिवधनुष को कौन उठा पायेगा इसकी सीता की माता के मन में जो अनेक शङ्काएँ होती हैं उनका चित्रण ‘का निश्चितिः’ से आरम्भ करके (का निश्चितिः रम्यरूपो भवेत् सः) तेरह वाक्यों द्वारा किया गया है। शैली में नवीनता है, पर काव्य पूरी तरह अनवद्य नहीं है। इसी भाव भूमि और रचनारीति पर तिवारीजी ने ‘राधाया अतीतावलोकनम्’ काव्य भी लिखा है।

राजेन्द्र मिश्र-अभिराजोपाव राजेन्द्र मिश्र बीसवीं शती उत्तरार्ध की संस्कृत-कविता के एक युगनिर्माता कवि हैं। वे दो दशकों से सुरभारती को अनेक सुन्दर काव्यरत्न प्रदान करते आ रहे हैं।

उन्होंने दीर्घकाल तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन-कार्य किया और बाद में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। अनेक अन्य पुरस्कारों के अतिरिक्त वे अपनी उत्तम कृतियों के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा बिड़ला वाचस्पति पुरस्कार से भी सम्मानित हुए। आचार्य मिश्र ने महाकाव्य, गीतिकाव्य, नाटक, कथा-काव्य, स्फुट काव्य आदि अनेक विधाओं में साहित्य-सर्जना की, एक के बाद एक शतक काव्य लिखे और भाव, भाषा, शैली, लय, छन्द आदि के नये-नये प्रयोगों का प्रवर्तन किया। कवि अभिराज के लघुकाव्यों का पृथक्-पृथक् विवेचन इस प्रकार है “आर्यान्योक्तिशतकम्-१६७५ ई. में प्रकाशित इस शतककाव्य में आर्या छन्द में निबद्ध सुन्दर अन्योक्तियों का सङ्कलन है जिनके द्वारा अन्यापदेश रीति से आह्लादकारिणी शैली में जीवन के कटु सत्यों एवं अनुभवों को कह दिया गया हैं। अनेक स्थलों पर तीखे व्यङ्ग्यों एवं कटाक्षों का आश्रय लिया गया है। अन्योक्तियों को विषयानसार वर्गों में विभाजित कर लघुकाव्य १६७ लिया गया है, जैसे विबुधवर्ग, मानववर्ग, पशुवर्ग, विहगवर्ग, प्राणिवर्ग, विटपिवर्ग तथा प्रकीर्णवर्ग। संकुचित दायरे में रहकर अपने को ही सब कुछ मानने वाले कूपमण्डूक पर अन्योक्ति करते हुए कवि कहता है - कथमधिपतिर्न दर्दुर। भवसि यदि कूप एव ब्रह्माण्डः। मूढ ! तवेयं श्रान्तिः क्ष्यति शीघ्रं बहिरागते।। नवाष्टकमालिका -१६७६ में प्रकाशित यह रचना देवस्तुतियों एवं कविकृत आत्म-निवेदनों का सङ्कलन है। कवि की मान्यता है कि ईश्वर के समक्ष ‘आत्माभिप्राय-निवेदन’ ही स्तुतिकाव्य का प्राणतत्त्व है। परमेश्वर की स्तुतियों को क्रम से मरन्दमाधुरीस्तवनम्, दुकूलचौरचरितम् आदि दस शीर्षकों में विभक्त किया गया है, जिनमें से प्रत्येक में ग्यारह श्लोक हैं। कवि की पितृविहीनता से समुत्पन्न वेदना बार-बार काव्य में छलक पड़ती है और माँ दुर्गा से अपना आर्तनाद करता है। शङ्कर, विष्णु, राम, कृष्ण आदि की भी कवि वन्दना करता है। कृष्ण के लीलामनोहर रूप की झाँकी प्रस्तुत करता हुआ कवि कहता है वरवेणु-निनादपरम्परयैव वशीकृतलोकमुदारवरम्। मधुराधिपति, कलयामि मुदा व्रजबल्लवदारदुकूलहरम् ।। कवि ने वर्णनीय विषय के अनुरूप कोमल अथवा कठोर भाषा का प्रयोग किया है। छन्दोवैविध्य भी दर्शनीय है। पराम्बाशतकम् - १८9 में प्रकाशित यह शतक भगवती रुद्राणी को समर्पित मौलिक स्तोत्रकाव्य है। कवि अपने को अनाथ, अशरण मानकर माँ देवी से अपनी रक्षा हेतु प्रार्थना करता है - ‘त्वमेव त्वमेव त्वमेवाम्ब पाहि’ कवि सर्वात्मना पराम्बा के चरणों में समर्पित है और उसे ही अपने जीवन का आश्रय मानता है। वह देवी के विविध रूपों का बखान करता है, उनके वंश का वर्णन करता है और विविध रूपों में देवी की स्तुति करता है। संस्कृत के स्तोत्रकाव्यों में इस काव्य का प्रमुख स्थान स्थापित हो गया है। अभिराजसप्तशती-१६८७ ई. में प्रकाशित यह काव्य अन्य सप्तशती काव्यों की तरह केवल एक विषय के सात सौ पद्यों का संग्रह नहीं है, अपितु भिन्न विषयों वाले, भिन्न वृत्तों वाले, यथाकाल, यथारुचि, यथासन्दर्भ रचे गये भिन्न प्रवृत्ति वाले सात शतक काव्यों का संग्रह है। इस दृष्टि से प्रत्येक शतक काव्य को एक लघुकाव्य कहा जा सकता है। इनके नाम है - नव्यभारतशतकम् २. मातृशतकम् ३. प्रभातमङ्लशतकम् ४. सुषाषितोद्धारशतकम् ५. चतुर्थीशतकम् ५. भारतदण्डकम् तथा ७. सम्बोधनशतकम्। ‘नव्यभारतशतकम्’ में कवि वर्तमान भारत की दुर्दशा पर दुःख व्यक्त करता है - तदेव भारतं राष्ट्र प्राप्तभूरिसमस्यकम्। पीड्यते नितरां हन्त लोकतन्त्रसमाश्रितम् ।। १६८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास वर्तमान भारत की सामाजिक एवं राजनीतिक दशा अत्यन्त जर्जर एवं शोचनीय है। कवि ने उसी पर चिन्तायुक्त हो प्रकाश डाला है। ‘मातृशतकम्’ में मातृरूपा शक्ति को संसार की सर्वोत्कृष्ट शक्ति एवं सर्वविध आराध्य मानकर उसके प्रति श्रद्धा भावना व्यक्त की गई हैं। ‘प्रभातमङ्गलशतकम्’ में कवि ने अनेक देवी-देवताओं के माहात्म्य का वर्णन करते हुए उनसे प्रातःकालीन मङ्गलकामना की है। कवि तीर्थराज प्रयाग से जुड़ा हुआ है। अतः उसको उपमान बनाकर देवी सरस्वती से मङ्गल-याचना करता है या कालिदास-भवभूति-कवित्वनीर स्रोतोऽनुभूत-नवयामुनगाङ्गसङ्गा । सा तीर्थराजधरणीव विमुक्तिशक्ता हंसानना दिशतु मे नवसुप्रभातम्।। जो कालिदास और भवभूति इन दो कवियों के कवित्व के जल-प्रवाह से गङ्गा और यमुना के नये सगम का अनुभव करती है ऐसी वह तीर्थराज प्रयाग की धरती के समान मोक्ष में समर्थ हंसवाहिनी सरस्वती मुझे नया शुभ प्रभात प्रदान करे। ‘सुभाषितोद्धारशतकम्’ भी अनुष्टुप् छन्द्र में लिखित एक ऐसा काव्य है जिसमें संस्कृत के पूर्वप्रयुक्त प्रसिद्ध सुभाषितों को आधुनिक नये सन्दर्भ से जोड़कर व्यंग्य शैली में प्रस्तुत किया गया है। आधुनिक विद्या-केन्द्रों में अयोग्य जनों की नियुक्तियों पर कटाक्ष करते हुए कवि सुभाषित का उद्धार करता है विश्वविद्यालये को वा नियुक्तो न बुथायते । अश्मापि याति देवत्वं महभिः सुप्रतिष्ठितः।। अनुष्टुप् छन्द में लिखित ‘चतुर्थीशतकम्’ में भी कवि ने व्यंग्यात्मक रीति से ऐसे दुर्जन के प्रति बार-बार नमस्कार अर्पित किया है जिससे सज्जन का जीवन बार-बार दुष्प्रभावित होता है। ‘भारतदण्डकम्’ में कवि ने दण्डक छन्द में भारत देश के बृहत् स्वरूप का दर्शन कराते हुए उसकी महिमा का गान किया है तथा दिव्य भाषा में भारत के भव्य रूप का दर्शन कराया है। ‘सम्बोधनशतकम्’ में किसी न किसी चेतन प्राणी अथवा अचेतन पदार्थ को सम्बोधित कर कवि ने अपने मन की व्यथा कही है। कवि को समाज से जो प्रतारणा, प्रवञ्चना मिली, उसकी पूर्णअभिव्यक्ति इस शतक में हुई है। कवि ने रात्रि, मृत्यु, पर्वत, घनागम, दूर्वा, प्रयाग, प्रसून, चातक, भ्रमर आदि को सम्बोधित कर अपनी मनोव्यथा को प्रकट किया है। शताब्दीकाव्यम् कवि मिश्र ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शताब्दी-समारोह के अवसर पर १६८७ में पाँच सर्गों का यह शताब्दी-काव्य लिखा, जिनके नाम हैं-प्रस्तावना, १६E लघुकाव्य संस्थापना, संगणना, गवेषणा, एवं प्ररोचना। इसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अतीत एवं वर्तमान से सम्बद्ध विविध पक्षों की काव्यमयी समीक्षा एवं वर्णना प्रस्तुत की गई है। विमानयात्राशतकम्-इस शतक में कवि ने भारत की राजधानी नई दिल्ली से बाली द्वीप की राजधानी डेनपसार तक की अपनी हवाई यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया है। विमानों की आन्तरिक साजसज्जा से लेकर विमानगवाक्ष से दिखते प्राकृतिक दृश्यों का भी इसमें सुचारु वर्णन किया गया है। देववाणीहुड्कारशतकम्-यह शतक कवि के बाली द्वीप के प्रवासकाल में तब लिखा गया था जब नई शिक्षा नीति से संस्कृत का बहिष्करण कर दिया गया। संस्कृत भाषा ने अपने हनन पर क्रोध में हुकार भरी है। ‘बालीविलासम्’ ‘बालीप्रत्यभिज्ञानशतकम्’ तथा यबसाहित्यशतकम्’ इन तीनों लघुकाव्यों में कवि ने बाली द्वीप के आन्तरिक एवं बाह्य सौन्दर्य का वर्णन किया है। इसी प्रवासकाल में कवि ने मृगाकदूतम् नामक दूतकाव्य भी लिखा, जिसमें चन्द्रमा को भारत की धरती पर दूतरूप में प्रेषित किया गया है और उसके द्वारा भारत की संस्कृत-विद्वत्-परम्परा का भी विवरण दिया गया। ‘अभिराजशतक’ कवि के स्वानुभूतिपरक वचोनिःश्वासों का सङ्कलन हैं। ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम’ शीर्षक काव्य में कवि ने तत्कालीन श्रद्धेय महापुरुषों की प्रशस्ति प्रस्तुत की है। इस प्रकार कवि मिश्र ने लघुकाव्य की परिधि में आने वाले विविध प्रकार के काव्य लिखकर संस्कृत-साहित्य का श्रीसंवर्धन किया है। वे अपने साथ के अपने काल की समग्र परम्परा को लेकर चले हैं। उनके काव्यों में समकालीन अर्वाचीन संस्कृत-कवियों की काव्य-परम्परा पूरी तरह प्रतिबिम्बित होती है जो संस्कृत-साहित्य के इतिहास के भावी समीक्षकों के लिए दीपशिखावत् मार्ग-दर्शन करते रहेंगे।

कृष्णलाल

कवि लाल दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृतविभागीय आचार्य पद पर प्रतिष्ठित रहे हैं। वे आधुनिक संस्कृत कविता में मुक्त छन्द की आधुनिक शैली के जन्मदाता हैं। संस्कृत-छन्दोविधान की सुदृढ़ परम्परा के रहते हुए छन्दोबन्ध तोड़कर मुक्त काव्य लिखना सचमुच इस क्षेत्र में एक नई क्रान्ति है। आचार्य लाल के काव्यों में मुक्त और बद्ध दोनों धारायें प्रवाहित हुई हैं। अनेक रूपकों के अतिरिक्त आपके चार लघुकाव्य प्रकाशित हुए। ‘शिजारवः’ प्रथम लघुकाव्य १६६६ में प्रकाशित हुआ, जिसमें बड़ी-छोटी इकसठ कविताओं का संग्रह है। उसमें छन्दोबद्ध एवं छन्दोमुक्त दोनों प्रकार की रचनाएँ हैं। प्रत्येक शीर्षक के अन्तर्गत निबद्ध कविताएँ भिन्न-भिन्न विषयों से सम्बद्ध हैं जो अलग-अलग समयों में लिखी गई प्रतीत होती हैं। कुछ कविताएँ स्तुति रूप हैं तो कुछ प्रकृति-वर्णन-परक, कुछ उपदेशात्मक हैं तो कुछ सन्देशात्मक, किसी कविता में आधुनिक जीवन की विडम्बना का दर्शन है तो कहीं जीवन की छोटी-छोटी अनुभूतियो का प्रदर्शन, कहीं तीखे व्यङ्ग्य हैं तो कहीं सहज अन्योक्तियां। कहीं-कहीं कवि सीधे सपाट ढंग से भी अपनी बात कहता है। ‘नवमानवः शीर्घक कविता में कवि कहता है - आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास परमहमधुना नवयुगस्य प्रकाशेनास्मि नवमानवः नवचेतना, नवबुद्धिरपि नवभावना जागरिता मयि । सर्वानहं त्रोटयिष्यामि बन्धनान् हसिष्यामि गास्यामि स्वरेणोन्मुक्तबन्धेन स्वतन्त्रः सर्वदा। जिस तरह यहाँ नवयुग में सारे बन्धन तोड़ने की बात कही गई है, उसी प्रकार नवकविता में भी छन्द आदि के बन्धन टूट रहे हैं। उर्वीस्वनः - १६७६ ई. में प्रकाशित इस काव्य में छियालीस कविताओं का संग्रह है। राष्ट्रीय, सामाजिक, देशभक्तिपूर्ण, वीरत्व-भावनामय, उद्बोधनपरक, सन्देशात्मक, संवेदनात्मक आदि विविध विषयों को लेकर ये स्फुट कविताएँ लिखी गई हैं। इसमें भी ‘मुक्तोऽहमद्य’ शीर्षक वाली कविता में कवि कहता है - मुक्तोऽहमय निखिलबन्धनेम्यो मुक्तोऽस्मि, मुक्तोऽस्मि । अद्य श्वाससङ्गीतझङ्कृतिर्मयाऽनुभूयते। शशिकरनिकर:-कृष्णलाल का यह तृतीय काव्य-सङ्ग्रह है जो १६६० ई. प्रकाशित हुआ है। इस नवीनतम सकलन में कवि ने नवीनतम भावभूमि पर उतर कर लेखन किया है। चालीस कविताओं के इस काव्य में छन्दोगत स्वच्छन्दता का बाहुल्य है, तथापि कतिपय पारम्परिक छन्द हैं तो कतिपय गीत भी हैं जिनमें ध्रुवा का उल्लेख भी है। कवि ने जीवन में समय-समय पर आने वाली विविध अनुभूतियों के खण्डों को, आधुनिक जीवन के विविध भावबोधों को और विविध सामाजिक समस्याओं को मुक्तचित्त से सामने रखा है। समाज के विभिन्न वर्गों पर कवि ने तीव्र कटाक्ष किया है। ‘दूयतेतरां मम चेतः’ शीर्षक कविता में नेताओं पर व्यङ्ग्य करते हुए कवि कहता है - दूयतेतरां मम चेतो वीक्षे यावत् कपटमयं नेतारम् यः खलु शासनमदे निमग्नो नैव विगणयन् जनसामान्य सततं निजपदरक्षणनिरतः संघर्षयति जनान् परस्परम् । ‘मामाह्वयन्ति नगा विशालाः’ शीर्षक कविता में कवि जहाँ प्रकृति द्वारा आह्वान किये जाने की कल्पना करता है, वहाँ ‘कालिदासमुखरिता सृष्टिः’ कविता में वह कालिदासीय दृष्टि से, प्रकृति का अवलोकन करता है। भारत मे भविष्यति’ तथा ‘भारतीयं नववर्षम्’ कविता राष्ट्रभक्ति से प्रेरित प्रतीत होती हैं तो ‘किं कारणम’ और ‘प्रश्नः’ में कवि जगत के विषय में विविध प्रश्न उत्थादित करता है। ‘जीवनचक्रम्’ जैसी कविताओं में जीवन की रहस्यमयी गुत्थियों का प्रदर्शन करता है। पचास पञ्चचामर वृत्तों में लिखी ‘सागरलङ्घनम्’ कविता में कवि ने राम के सागर-लयन के वृत्त को राष्ट्र के विपल्लंघन के रूप में तत्पश्चात् सीता लघुकाव्य २०१ प्राप्ति को राष्ट्रोन्नति प्राप्ति के रूप में कल्पित किया है। इस प्रकार यह सकलन कवि कृष्णलाल के नवीन काव्यजगत् को दर्शित करता है तथा आधुनिक संस्कृत काव्य की नई धारा को लक्षित करता है। सन् १९७६ में कवि कृष्णलाल का ‘शतदलम्’ नामक लघुकाव्य भी प्रकाशित हुआ, जिसमें छोटे-छोटे भावखण्डों का सकलन सौ पद्यों में किया गया है। इस प्रकार इसे उनकी चतुर्थ लघुकाव्य-कृति कहा जा सकता है।

देवदत्त भट्टि

संस्कृत में प्रयोगशील शैली का प्रवर्तन करने वाले देवदत्त भट्टि का कार्यक्षेत्र पंजाब है तथा ये इसी प्रान्त के मालेरकोटला राजकीय महाविद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। कवि ने यह स्वीकार किया है कि उसने अपने प्रबन्ध में प्रयोगशील शैली में आधुनिक काव्य की प्रतिनिधिभूत कविताओं का ही समावेश किया है। कवि के दो लघुकाव्य प्रकाशित हैं जिनका विवरण इस प्रकार है - ‘इरा’-कवि ने इस काव्य को, आरम्भिक पृष्ठ पर ‘विश्व संस्कृत-साहित्य में प्रयोगशील कविता का नवावतार’ अभिहित किया है। कविता की यह विधा वर्तमान परिवेश का अङ्कर है, यही आज के द्वैतभरे जीवन पर प्रहार कर सकती है। कवि ने इस कृति की लघु कविताओं में ऐसे ही विषयों को रखा है। यह लघु कविता कभी हल्का सा गुदगुदाती है और कभी हल्का प्रहार करती है। कवि रस जैसे प्राचीन काव्यशास्त्रीय प्रतिमान को असाम्प्रतिक मानता है। इसीलिए उसकी कविता में रस न होकर व्यङ्ग्य प्राप्त होता है, जैसे ‘क्रय’ शीर्षक कविता में कवि कहता है - चेत्त्वम् सत्यसन्थत्वम् विश्रब्धताम् निष्ठाम् निर्व्याजत्वमार्जवं च क्रेतुमिच्छसि ? क्रीणीहि कुक्कुरमेकमेकम्। मानवेषु नेदं लम्यते। सिनीवाली-कविवर भट्टि की प्रयोगवादी कविता का यह दूसरा संग्रह १६८६ ई. में प्रकाशित हुआ। काव्य के आरम्भ में ‘पुरोवाक्’ में कवि कहता है कि मेरी यह कविता शब्दसम्भारमात्र है, रसात्मिका कविता नहीं है। काव्य के आरम्भ में कवि का यह कथन कितना सुन्दर एवं समीचीन है - ‘सिनीवाली’ नवं काव्यं मुक्तकं विदधे प्रियम्। पुराणी देवभाषेयं युवतिर्दृश्यते पुनः।। इस काव्य में भी उनकी सब कविताएं छन्दोबन्धविमुक्त एवं आधुनिक भावबोध से संस्पृष्ट हैं। प्रथम कविता में ही ‘सिनीवाली’ शब्द का प्रयोग हुआ है - २०२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास तस्य निघने युगोऽरोदीत् मानवता अकालमृत्युना हता, साधुता च हता। ममान्तर्मानसम्, नभसः कन्दनम्। अवृश्चदपिंशच्च। (?) तारकाः अश्रूणि प्रावहम्। सिनीवालीनिशायाम् दिशोऽक्रन्दन । (उसके मरने पर युग रोया। मानवता अकाल मृत्यु से खींची गई और सज्जनता मारी गई। मेरा अन्तर्मन आकाश का क्रन्दन हुआ। मैंने तारारूप आँसुओं को बहाया। प्रतिपदा की अधरी रात में दिशाओं ने क्रन्दन किया।)

केशवचन्द्र दाश

उत्कल प्रदेशीय केशवचन्द्र दाश भी अर्वाचीन संस्कृत काव्य की मुक्तछन्दधारा के प्रतिनिधिभूत कवि हैं। वे जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी में न्याय दर्शनविभाग के अध्यापक एवं अध्यक्ष हैं। संस्कृत रचनात्मक साहित्य के अन्तर्गत उपन्यास एवं कहानी को नया रूप देने के साथ ही श्री दाश ने कविता को आन्तर और बाह्य विधान में नया रूप प्रदान किया है। उनके प्रकाशित कविता-संग्रह हैं- प्रणयप्रदीपम् (१E७E) हृदयेश्वरी (१६८१), महातीर्थम् (१३६२), भिन्नपुलिनम् (१८८३), अलका (१६८६) तथा ईशा। इन लघुकाव्यों में कवि के अन्तर्गत विद्यमान एक दार्शनिक सर्वत्र दिखाई देता है और सब काव्य दार्शनिकता से परिपूर्ण हैं। कवि ने मुक्तक कविताएँ लिखी हैं और मुक्तक शैली में लिखी हैं। इनके काव्यों का विवरण इस प्रकार है अलका-अलका काव्य में कवि केशवचन्द्र दाश का कल्पनावैभव, विषय वैविध्य, नये-नये प्रतीकों के प्रयोग, प्रसादमयी काव्यपंक्तियाँ, आधुनिकयुगीन संवेदना, शास्त्रगम्भीर अर्थरमणीयता और शब्दों की व्यञ्जनक्षमता आदि गुण सर्वत्र दिखाई पड़ते हैं। कतिपय उदाहरण द्रष्टव्य हैं राजवधूनाभिरन्ने अन्धायते कलहंसध्वनिः जनबहुलनगरेऽस्मिन् पुनः पुनरपि देहो मार्गायते। (राजबधू के नाभिछिद्र में कलहंसों की ध्वनि अन्धी सी हो जाती है। लोगों से भरे इस नगर में फिर से शरीर मार्ग-सा बन जाता है।) त्वं पुनः मधु सञ्जायसे, प्राच्यस्य मे विचारचषके। ईशा-कवि दाश का यह काव्य १EE२ ई. में लोकभाषा प्रचार समिति, पुरी से प्रकाशित हुआ है। ईशा’ में कवि एक ऐसे यात्री की भाँति प्रस्तुत है जो सदा नया गन्तव्य ढूँढता रहता है-‘नवनिलयान्वेषणे भमति पुरातनपान्थः’। अन्त में इस खोज की परिणति प्रायः निराशा में ही होती है-‘आशाबन्धो बन्धुरः केवलः । अद्य त्वत्सत्तासन्धानम् । प्रतिभाति लघुकाव्य २०३ साक्षात् पलाण्डुकेशराविषणम् ।’ वह बार-बार व्यथा, आक्रोश और क्लेश का अनुभव करता है। अपने चिन्तन की चरमावस्था में वह कहता है सन्ध्याकालवन्ध्यायाः क्रन्दने आशाबन्धो बन्धुरः केवलः। पुनरपि वासरो धूसरः भागे भागै विभागे विभागे युगे युगे . . अभियोगे: विधिश्च बधिरः। कालः कलायते . . . सरले. . .तरले अविरले विरलीविधातुम् मरालीनयने परन्तु । ‘ईशा"भाषामाहरति हरति … विहरति । परन्तु चिरजिजीविषा मानव की आशाओं का केन्द्र है। कवि प्रसादमयी शैली में जीवन के गहन रहस्यात्मक तत्त्वों का उन्मेष करता है। रहस्यात्मकता के आवरण में लिप्त होने पर भी भारत और भारतीयता की वर्तमान संकटापन्न दशा के प्रति भी वह सजग है, यथा - गृहमिव कुरुक्षेत्र कर्मशाला हिंस्रमाला गङ्गानदी न चिरप्रवाहा सम्मुखे दण्ड्यमाना भारतीयता नः क्रीतदासी इव। समग्र काव्य सौ विषय-शीर्षकों में विभक्त है, जिसमें लघु कवितावली की धारा प्रवाहित है। कवि दाश के समस्त काव्यों में भाव और भाषा का एक समन्वित प्रवाह दृष्टिगोचर होता है। उनमें कहीं पारम्परिक वार्णिक अथवा मात्रिक छन्द का प्रयोग नहीं है, परन्तु सर्वत्र एक लय है, गति है, भाषा में एक विशेष रागात्मक प्रवाह है। अनेकत्र सहज अनुप्रास एवं अन्त्यानुप्रास कविता के सौन्दर्य में वृद्धि करते हैं। संस्कृत-काव्य जगत् में यह एक अभिनव प्रयोग है और कृष्ण लाल और देवदत्त भट्टि की प्रयोग-परम्परा में रहते हुए भी केशवचन्द्र दाश की यह छन्दोनिर्बन्धता की अपनी एक विशिष्ट शैली है। दाश अपनी रचनाशीलता में निरन्तर अग्रसर हैं। इस प्रकार ‘प्रणयप्रदीपम्’ में अपनी प्रथम भावाभिव्यक्ति देने वाले कवि ने ‘हृदयेश्वरी में अपने प्रियतम को अन्तर्हृदय में ढूँढने की चेष्टा की है। वर्तमान सामाजिक स्थिति पर लिखित ‘महातीर्थम्’ प्रेम और स्वार्थ का समन्वय है। ‘भिन्नपुलिनम रोमाण्टिक भाव से ऊपर की कृति है जिसमें समुद्र और समुद्रतट को भिन्न बताया गया है।

हर्षदेव माधव

आधुनिक संस्कृत काव्यजगत् में शैली-प्रवर्तन की दृष्टि से क्रान्ति लाने वाले तथा संस्कृत-कविता को विश्व-कविता के समानान्तर उपस्थापित करने वाले हर्षदेव माधव एक सशक्त कवि हैं। गुर्जर भूमि में, अहमदाबाद नगर में अपना कवि जीवन बिताने वाले कवि माधव ने बाल्यकाल में ही काव्यसर्जना आरम्भ कर दी थी। १६७५ से ही गैर्वाणी, भारती, भारतोदयः, अजस्रा, स्वरमगला, विश्वभाषा, संविद्, अभिनवसंस्कृतम्, संस्कृतरत्नाकर, हेमवती आदि संस्कृत-पत्रिकाओं में कवि माधव की अनेक संस्कृत-कवितायें प्रकाशित होती२०४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास रही हैं। इनका प्रथम काव्य ‘रथ्यासु जम्बूवर्णानां शिराणाम् संस्कृत सेवा समिति, अहमदाबाद से १६८५ में तथा द्वितीय काव्य ‘अलकनन्दा’ पार्श्व प्रकाशन, अहमदाबाद से १६६० में प्रकाशित हुआ। कवि हर्षदेव अर्वाचीन संस्कृत-साहित्य-भूमि पर एक नितान्त नवीन शैली लेकर अवतरित हुए हैं। संस्कृत के अतिरिक्त वे गुजराती और अंग्रेजी में भी प्रतिष्ठित कवि है और उनका आंग्लकवित्व उनकी संस्कृत-कविता में सर्वत्र झाँकता है। अंग्रेजी शब्दों का प्रभूत प्रयोग और कभी-कभी मूल लिपि में ही प्रयोग उनकी संस्कृत कविता में सर्वत्र झाँकता है, और इसे उनके काव्य का एक दोष भी माना जा सकता है। आपकी अनेक कविताओं का अंग्रेजी में काव्यानुवाद होकर अमेरिका से प्रकाशित हो चुका है। कवि माधव ने जापान देश में प्रचलित त्रिपादयुक्त सप्ताक्षरी कविता ‘हाइकू’ तथा पञ्चपादयुक्त ‘तान्का’ नामक काव्यप्रकार को संस्कृत-साहित्य में प्रविष्ट कराया है। आंग्ल-साहित्य में एझरा पाउण्ड तथा उसके समकालीन कवियों द्वारा उद्भावित ‘मोनो इमेज’ नामक काव्यविधा का प्रयोग संस्कृत में प्रवर्तित करने वाले माधव ही हैं। दक्षिण कोरिया से कवि ने ‘सीजो काव्य’ नामक काव्यप्रकार का आहरण कर संस्कृत में प्रयोग किया। कवि हर्षदेव के भाव एवं भाषा दोनों में पर्याप्त विलक्षणता है। एक स्थान पर अपनी काव्ययात्रा के विषय में टिप्पणी करते हुए लिखते हैं- ‘पुष्पस्य एक्सरेच्छविरस्ति मे कविता’ मेरी कविता पुष्प की एक्सरे छवि है। ‘संस्कृत के वर्तमान कवि के रूप में मैं क्षुब्ध हूँ, खिन्न हूँ, प्राचीन संस्कृति की भव्यता और अर्वाचीन सभ्यता की वेदना मेरी काव्यरचनाओं में प्रवाहित है। स्वप्नों और शब्दों के निर्मक्षिक ध्वंसावशेषों में मैं खो गया हूँ। मेरी लेखनी में वेदना, व्यथा, अस्तित्व-संघर्ष स्याही के रूप में है, ऐसा में मानता हूँ, ‘जैसा कि अपने हाइकू काव्य में कवि ने कहा है मम स्वप्नानि मोहजोदडो गृहम् को बसेत् तत्र। अर्वाचीन सभ्यता के विषय में कवि की निराशा ‘ताका’ काव्य में मुखरित हुई है आभुपुष्पिता बोगेमपुष्पलता गन्धरहिता यथा हि अर्वाचीना प्रसृताऽस्ति सभ्यता। अणुबम की विभीषिका से त्रस्त मानवता के लिए कवि की यह मोनो इमेज ‘नगरम् कविता दर्शनीय है २०५ लघुकाव्य बुद्धस्य शिक्षापात्रे निमज्जितमस्तिं अणुबोम्बदग्थं नगरम्। ‘रणम्’ शीर्षक दो पंक्ति की कविता इस प्रकार है - अद्य हर्षदेवमाधवो रणस्य पर्यायोऽस्ति श्वो रणं हर्षदेवमाधवस्य पर्यायो भविष्यति। जापानदेशीय हाइकू कविता का संस्कृत भाषा में प्रयोग कवि ने इस प्रकार किया है हिन्दोलशून्य-/गृहे मृतगृहिण्याः/स्वरोऽयं कुतः बलाकापंक्तिः /सरसि पत्रारूढ/ वर्णमालावत्। सचमुच कवि माधव ने संस्कृत में मुक्त छन्द के एक नितान्त नवीन एवं परम्परा से भिन्न स्वरूप का प्रवर्तन किया है। उन्होंने संस्कृत-कविता में कल्पनावाद (इमेजिनेशन) प्रतीकवाद (सिम्बोलिज्म) अतिवास्तववाद (सर्गिअलाइज़ेशन) एवं घनवाद (क्यूबिज्म) इत्यादि वादों का प्रयोग कर एक नई संवेदना एवं काव्य-भावना की उद्भावना की है। अपनी ‘संकेतरहिते नगरे’ शीर्षक कविता में कवि कहता है - संकेतरहितं पत्रं भूत्वा अहं निवसामि तव नगरे अलकनन्दे ! शाकिनीवत प्रस्खलन्ति बसयानानि लोष्टवत् स्तब्ध नगरोद्याने सरोवरस्य जलम्। कीटशलमतुल्या नागरकाः सूकरदन्तसमः ट्यूबलाइटप्रकाशः। (हे अलकनन्दे ! मैं पतारहित पत्र बनकर तुम्हारे नगर में रह रहा हूँ। बसगाड़ियाँ पिशाचिनी की भाँति फिसल रही हैं। नगर के बाग में तालाब का पानी ढेले की तरह रुक गया है। नगरवासी जन कीट-पतङ्गों की तरह हैं और ट्यूबलाइट का प्रकाश सुअर के दाँत की तरह है।) समुद्र के स्वरूप पर कवि की आधुनिक उपमा के प्रयोग से युक्त ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं - समुद्रः जिप्सीयुवतिपृष्ठदेशसमोऽनावृतः। २०६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास हब्सीयुवतिनेत्रप्रतिमः श्यामः समुद्रः होनोलुलुसुन्दरीहस्तसन्निभो मसृणः। कवि माधव के काव्यों में ‘मिस्रदेशे ‘जापानदेशे’ जैसी कवितायें भी मिलती हैं, कुछ गज़ल-गीतियाँ भी लिखी हैं पर उनके गीत की भी अपनी एक विशिष्ट शैली है। उनके अन्य विचित्र प्रयोगों में हैं प्रतीक द्वारा अभिव्यक्ति, संकेतों द्वारा अभिव्यक्ति, गणित की संज्ञाओं या गणितीय प्रयोगों द्वारा कविता, प्रतिच्छाया (Shadow) काव्य तथा पिरामिड (Pyra mid) काव्य आदि द्वारा काव्य रचना, जो आधुनिक चित्रकाव्य के नये रूप कहे जा सकते हैं। कवि माधव का उद्देश्य है विश्वकविता के मञ्च पर संस्कृत-काव्य को खड़ा करना। इस प्रयोग प्रखर कवित्व के कारण उन्हें संस्कृत का क्रान्तिकारी कवि कहा जा सकता है।

इन्द्रमोहन सिंह

पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के संस्कृत विभाग के प्रवक्ता इन्द्रमोहन सिंह ने भी इसी मुक्त छन्द शैली में ‘हिरण्यरश्मिः’ नामक अभिनव काव्य-सङ्ग्रह की रचना की है। कवि ने गीत एवं स्फुट पद्यों को मिलाकर उसमें ६६ कविताओं का सङ्कलन किया है। गीतों में सङ्गीततत्त्व है, गेयता है और स्फुट पद्यों में प्रायः लयबद्धता तो है ही, पर पारम्परिक छन्दों के प्रयोग का अभाव है। कुछ पद्यों में उर्दू गज़ल का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। छन्दोमुक्तता के पर्याप्त दर्शन होते हैं। मुक्त छन्द शैली का प्रेमविषयक पद्यांश द्रष्टव्य है - प्रिये ! त्वं तिमिरे किरणवत् नीरदेषु गृहविहीनेषु खिन्नेषु त्वं विद्युत् प्रणयमयी सारा काजल विरहानले कठिने त्वं मिलनगीतिका रम्या। शृंगार के आधुनिक प्रसङ्गों को भी कवि ने ग्रहण किया है, जैसे विश्वविद्यालय की युवती का चित्रण करते हुए कवि कहता है चलापाङ्गबाणैर्युवकान् प्नती कुसुमचापयष्टिरिव तनुमध्या क्षीबा सोमलतेव नन्दन-वन-पवनचालितेव आगच्छति विश्वविद्यालययुवतिः। लपुकाव्य २०७ प्रणय-चित्रण के अतिरिक्त ‘नेतृचरितचर्चा’ ‘पदलोलुपता’ जैसे आधुनिक युग के विषयों पर कवि ने लेखनी चलाई है, परन्तु पूरा काव्य मुख्यतः प्रणयविषय पर ही समाधृत है। इस कृति को आधुनिक गीतिकाव्य तथा छन्दोमुक्त शैली का लघुकाव्य दोनो कहा जा सकता है।

विशनलाल गौड़ ‘व्योमशेखर’

व्योमशेखर की रचना ‘अग्निजा’ का प्रकाशन १९८४ ई. में हुआ। व्योमशेखर संस्कृत-काव्य के क्षेत्र में नई समाज-व्यवस्था की स्थापना के आग्रह को मानने वाला कवि है। उसका रचना संसार लोकानुभव की भित्ति पर टिका है। उसकी रचना में मानवीय सहानुभूति का सौन्दर्य है और मानवीय शोषण-पद्धति को बदल डालने का प्रखर स्वर है। आरम्भ में ही अग्नि को जगाता हुआ वह कहता है उबुध्यस्वाग्ने ! प्रजागरमन्त्रनादः विश्वजनस्वापनाशी लोपयंस्तन्द्राम् प्रातः सवनेषु समुदीरितः केन ? विश्व-चेतना का आह्वान करने वाले कवि को प्राची दिशा रक्तानना दिखाई देती है, सूर्य भी लाल उगता हुआ आ रहा है, क्रान्ति का बिगुल बज उठा है। चारों और नव जयनिनाद है। ‘श्रमिकाया अयं बालः’ कविता में कवि एक दुःखिनी श्रमिका के भूखे-नंगे बालक का करुण चित्र खींचता है - रे नग्नः क्षुधितः स्वपिति देशस्य भाग्यं रोदिति श्रमिकाया अयं बालः कवि बार-बार कृषक, श्रमिक और सैनिक का गुणगान करता है। उसे दुःख है कि बड़े-बड़े विद्यालय-भवनों के निर्माण में अपना पसीना बहाने वाली श्रमिका का बालक कभी उस विद्यालय में प्रवेश न कर सकेगा। युग-इतिहास करवट ले रहा है। इसी इतिहास-भैरवी कविता में इसी काल चक्र के परिर्वतन की चर्चा करते हुए कवि कहता है - मुहुर्मुहू रणति जीवनसमराजिरे विबोधयन्ती चेतनां नवनवोन्मेषाम् आलोकपथं दिशति पुरोगामिनः सततगतिशीलस्येतिहाससूर्यचक्रस्य । (यह इतिहास-भैरवी जीवन-संग्राम में बार-बार गूंज रही है, नये-नये उन्मेषों वाली चेतना को जगा रही है। यह लगातार चल रहे इतिहास-सूर्य के पहिए का आगे और आगे बढ़ता प्रकाशमय मार्ग बता रही है।) २०८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास समस्त काव्य में इसी तरह के मुक्त छन्द की धारा प्रवाहित हुई है। पर ओजस्विता होने के कारण भाषा में अपूर्व गति है, स्पन्दन है, कहीं-कहीं छन्दोबद्ध पद्य एवं गीत भी हैं। संस्कृत में नवयुगीन भावधारा को लाने और शोषणविहीन समाजवादी व्यवस्था की वकालत करने के कारण यह काव्य एक नया प्रयोग है। कवि का स्वयंकृत हिन्दी पद्यानुवाद भी साथ में विद्यमान है। ‘अहं राष्ट्री’ व्योमशेखर के अन्दर की आग का ‘अग्निजा’ के बाद दूसरा स्फुलिङ्ग है। इसका प्रकाशन १६६० ई. में हुआ। समस्त काव्य सरल एवं सरस शिखरिणी छन्द में है, जिससे राष्ट्रभक्ति की धारा का गीत्यात्मक स्वर फूटता हुआ दिखाई पड़ता है। कवि ने अहं राष्ट्री के चेतनामय मन्त्र को वैदिक ऋषि की वाणी से लिया है। वैदिक राष्ट्री का तादात्म्य आधुनिक भारत माता से जुड़ गया है। कवि ने ‘आत्मगतम्” में यह स्वीकार किया है कि ‘अहंराष्ट्री में मेरा भावलोक मुख्यतया दो प्रकार से प्रवर्तित हुआ है-साहित्य, संस्कृति एवं इतिहास से प्रदत्त राष्ट्रीय महिमा का भाव तथा मेरा इन्द्रियों के साक्षात् संवेदन विषय वाला भाव। दोनों प्रकार के भावलोक में स्वर की अस्मिता, राष्ट्र के प्रति आत्मीयता दृश्यमान है। राष्ट्रप्रेम का आह्वान करती राष्ट्रभक्ति अपना परिचय देती हुई कहती है - अपूर्वा गायत्री हिमगिरिनिनादा हिमसुता युगानामालोकं दिशति मधु सम्बोधयति च। ममामाः पुत्रा भरतपुरुषा विस्मरत नो स्वतन्त्राऽहं राष्ट्री जलधिवसना चास्मि गिरिजा।। (हिमालय से निनाद करती हुई कोई अपूर्व गायत्री गगा युग-युग का आलोक देती मधुमय सम्बोधन कर रही है। भरतवंशी मेरे अमरपुत्रों ! मत भूलो, मैं स्वतन्त्र राष्ट्रशक्ति हूँ। सागर का परिधान पहने में हिमाद्रि-बाला भारती धरा हूँ।) । यह राष्ट्रशक्तिरूपा भारत माता धर्म, जाति, प्रान्त वर्ण आदि की संकीर्णताओं से परे है और ये सभी संकीर्णताएँ विराट एवं उदान्त राष्ट्रीय भावना में विलीन हो गई हैं। भारतमाता की अनन्त सौन्दर्यराशि अनेक नदियों, पर्वतों, वनों आदि में दिखाई पड़ रही है। भारत की आत्मशक्ति यहाँ की महान् संस्कृति एवं दर्शन में हैं। कवि प्रसंगतः इस महान् राष्ट्र के पुरातन ऋषियों, कवियों, दार्शनिकों, राजाओं, एवं महापुरुषों का भी स्मरण करता है। अन्त में कवि कामना करता है कि चिरविजयी मेरा राष्ट्र सदा विजयी रहे-‘निकामं कामो मे चिरविजयि राष्ट्र विजयताम्।।

रमाकान्त शुक्ल

शुक्लजी का जन्म १६४० ई. में उत्तर प्रदेश के खुर्जा नगर में हुआ था। पितृ-परम्परा से ही आपको संस्कृत-रचना की प्रवृत्ति मिली। सम्प्रति वे राजधानी कालेज, दिल्ली में हिन्दी के प्राध्यापक एवं देववाणी परिषद्, दिल्ली के सचिव हैं। वे राष्ट्रभक्तिपरक काव्यरचना के क्षेत्र में अधिक प्रसिद्ध हो गए हैं और उनके लघुकाव्य, लघुकाव्य गीतिकाव्य तथा नाट्यकाव्य सभी राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत हैं। उनकी अनेक स्फुट रचनाएँ जैसे ‘भारतजनताऽहम्’ तथा ‘क्रूरहृदय मेघ’ कवि-सम्मेलनों में बहुत प्रसिद्ध हुई हैं। ‘अर्वाचीनसंस्कृतम्’ पत्रिका के सम्पादक रूप में भी शुक्ल जी ने अपने तथा अपने युगीन कवियों के साहित्य का पर्याप्त प्रकाशन किया है। आपके लघुकाव्यों का विवरण इस प्रकार है

  • भाति मे भारतम्-यह रचना देववाणी परिषद, दिल्ली से प्रथम बार, १६८० में प्रकाशित हुई। अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त करने के कारण इसके दो संस्करण और निकल चुके हैं। यह राष्ट्रभक्तिपरक रचना भारत के समग्र स्वरूप का उद्घाटन करती है। यह पारम्परिक स्रग्विणी छन्द में लिखी गई है, पर कवि-सम्मेलनों में कवि द्वारा इसके गान से तथा दूरदर्शन पर प्रसारण से गेयताधर्म के कारण इसने एक गीत का रूप धारण कर लिया है। यह शतक काव्य है। इसमें १०८ छन्द हैं। इसमें देशवासियों, भारतराष्ट्र तथा भारतीय संस्कृति के आकर्षक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। भारत के ऐतिहासिक एवं भौगोलिक स्वरूप, धार्मिक एवं सांस्कृतिक गौरव, औद्योगिक एवं वैज्ञानिक विकास, आन्तरिक एवं बाह्य सौन्दर्य आदि विविध पक्षों को उद्घाटित किया गया है। भारतदेश के पुरातन स्वरूप से लेकर अद्यतन स्वरूप तक विधिवत् प्रकाश डाला गया है। भारत के कवियों, महापुरुषों, पर्वो, नीति-रिवाजों, परम्पराओं, भाषाओं, आध्यात्मिक विचारों एवं गौरव-ग्रन्थों-सभी का यशोगान करते हुए कवि आधुनिक युग के भारत का भी वर्णन करता है। भारत के राष्ट्रीय संघटन पर विचार व्यक्त करता हुआ कवि कहता है - मन्दिरैमस्जिदैश्चैत्यगिर्जागृहै - रायगेहैर्गुरुद्वारकैर्धाजितम्। कर्मभूःशर्मभूधर्मभू-मर्मभूः भूतले भाति मेऽनारतं भारतम्।। इस राष्ट्रीय काव्य ने सचमुच भारतराष्ट्र की आत्मा को हमारे सम्मुख रख दिया है। अनेक विद्वत्तल्लजों में इस पर अपनी समीक्षा लिखकर इस काव्य का यशोवर्धन किया है। जय भारतभूमे-यह भी १०८ पद्यों का ही काव्य है, परन्तु इसमें ताटक, भुजङ्गप्रयात, आर्या, तोटक, मालिनी, द्रुतविलम्बित, शार्दूलविक्रीडित आदि अनेक प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध छन्दों का प्रयोग होने पर भी इसका स्वरूप गीतिकाव्यात्मक है। अन्त्यानुप्रास एवं ध्रुवा का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में हुआ है। इस काव्य का प्रकाशन १६८१ ई. में देववाणी परिषद् द्वारा ही हुआ। काव्य सात शीर्षकों द्वारा सात खण्डों में विभाजित है-जय भारतभूमे !, भजे भारतम, मम भारतं विजयते, भारतभूमिर्विलसति, जय भारतमेदिनि, भारताख्यः स्वदेशः तथा दिव्यं मम भारतम् । इस प्रकार समग्र काव्य में आदि से लेकर अन्त तक भारतभूमि की ही महिमा २१० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास एवं गरिमा का गान किया गया है। हर पद्य में कवि भारतभूमि को प्रणाम करता है, उसकी जय-जयकार करता है तथा उसकी उन्नति की कामना करता है। उसे आशा है कि उसके देश से बलात्कार, हत्या, अशिक्षा, वधूदाह, प्रहार आदि दोष अवश्य एक दिन समाप्त होंगे बलात्कार-हत्यापहार-प्रहाराः अशिक्षा-वधूदाह-भिक्षाप्रचाराः । कदाचित्तु लुप्ताः भविष्यन्ति यस्मात् (अवश्यं विलुप्ता भविष्यन्ति यस्मात्) भजेऽहं मुदा भारतं स्वदेशम् भजे तं मुदा भारतं दिव्यदेशम्। _कवि शुक्ल को बीसवीं शती के नवम दशक का कवि कहा जा सकता है। उन्होंने स्वतन्त्र भारत की महिमा का जो गान किया है वह यथार्थ की धरती पर आकर खण्डित भी हो जाता है। अतः उन्होंने ‘भाति में भारतम्’ के विपरीत ‘रौति में भारतम्’ कविता भी लिखी, जिसमें भारत की दुर्दशा का चित्रण है। इसी तरह ‘राष्ट्रदेवते’ में कवि ने आतङ्कवाद के विरुद्ध तीखा स्वर अपनाया है।

उमाकान्त शुक्ल

सनातनधर्म कालेज, मुजफ्फरनगर के संस्कृत-प्राध्यापक उमाकान्त शुक्ल भी आधुनिक युग के सिद्धहस्त संस्कृत-कवि हैं, अन्य अनेक स्फुट कविताओं के अतिरिक्त उनके ‘मङ्गल्या’, चाङ्गेरिका’ तथा ‘कूहा’ प्रसिद्ध काव्य हैं। ‘कूहा’ का लेखन और प्रकाशन वर्ष १६८४ में देववाणीपरिषद, दिल्ली से हुआ, जब उसी वर्ष भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी की जघन्य हत्या हुई। इस काव्य में कवि ने इन्दिरा गान्धी की जीवन-गाथा और विविध गुणों का समग्रतया वर्णन किया है। काव्य में कथावस्तु मात्र इतनी है कि दिवङ्गत श्रीमती इन्दिरा गान्धी की अस्थिभस्म को हिमाचल पर बिखेर कर वहाँ से लौटे हुए इस काव्य के नायक राजीव गान्धी अपनी माँ का स्मरण कर रहे हैं। इसी प्रसङ्ग में कवि ने उनका जीवनचरित संक्षेप में वर्णित किया है। इसके बाद राजीव गान्धी देश की कल्याणकामना करते हुए अपनी राजधानी आते हैं और भारतमाता की सेवा में तत्पर होते हैं। राष्ट्र की कल्याणकामना के प्रसङ्ग में ही कवि ने कहा है कि इस राष्ट्ररूपी पद्मखण्ड पर जो धनी पीड़ा की कहा (धून्ध) छाई हुई है उसे उदित होते हुए विवेक रूपी सूर्य की किरणों का प्रकर्ष काट डाले व्याप्तास्त्यकस्मादिह राष्ट्रपग - षण्डे घना सम्प्रति यार्तिकूहा। झटित्यमुं कृन्ततु कोऽप्युदेष्यन् विवेकमार्तण्ड-करप्रकर्षः।। ខ្ញុំ लघुकाव्य इसी राष्ट्रव्यापी कुञ्झटिका को व्यक्त करने के लिए कवि ने काव्य का नाम ‘कूहा’ रखा है।

नलिनी शुक्ला

बीसवीं शती के आठवें-नवें दशक में अपनी काव्य प्रतिभा के प्रकाश से संस्कृत-जगत को आलोकित करने वाली नलिनी शुक्ला ‘व्यथिता’ कानपुर-स्थित आचार्य नरेन्द्रदेव महिला महाविद्यालय में संस्कृत-प्राध्यापिका हैं। उन्होंने गीतिकाव्य, लघुकाव्य एवं नाटक तीन विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है तथा संस्कृत-कवयित्री के रूप में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त की है। उनकी अनेक काव्यकृतियाँ पुरस्कृत एवं सम्मानित हो चुकी हैं। श्रीमती शुक्ला के लघुकाव्यों का विवरण इस प्रकार है __प्रकीर्णम् - यह सौ श्लोकों का एक शतक काव्य है जिसका प्रकाशन १६७६ में हुआ। कवयित्री ने अनुष्टुप् छन्द के माध्यम से लोकवैषम्य के कारण हुई अपनी व्यथा को कहा है। स्वतन्त्रता प्राप्ति पर व्यङ्ग्य करती हुई वह कहती है मन्ये स्वतन्त्रता प्राप्ता धूतैरेव हि केवलम्। तेषामेव भृताः कोषाः सज्जनाः क्षीणतां गताः।। भावाञ्जलिः-श्रीमती शुक्ला के इस भावमय काव्य का प्रकाशन १६७७ में हुआ। यह भक्तिमय स्तोत्रकाव्य है जिसमें २१ स्तोत्र हैं। पद्य प्रायः पारम्परिक ही हैं, पर अनेक स्थलों पर गीतों का प्रयोग किया गया है। अनेक आराध्य देवी-देवताओं के प्रति कवयित्री ने कहीं भावभरी अञ्जलि की प्रस्तुति की है, कहीं उनकी स्तुति की है, कहीं आत्म-निवेदन, कहीं उपालम्भ तो कहीं अनुरोध की अभिव्यक्ति की है। ‘चाणीपञ्चदशी’ में वाग्देवी सरस्वती का स्तवन करती कवयित्री कहती है त्रिलोके विख्यातस्तव जननि ! कारुण्यमहिमा न दृष्टिस्नेहार्दा सरसति ममागेष्वपि सुधाम्। कियत्कालो यातौ वितरसि दृशं नैव सुभगे मृतप्रायप्राणेष्वमृतरससञ्चाररुचिराम् ।। (हे माता ! तुम्हारी करुणा की महिमा तो तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। तुम्हारी स्नेह से भीगी दृष्टि मेरे अगों पर भी अमृत नहीं बरसाती है। तुम तो मृतप्राय प्राणों में भी अमृतसमरस का सञ्चार करने में निपुण हो। हे सुभगे ! कितना समय बीत गया है। तुम अपनी दृष्टि मुझ पर नहीं डाल रही हो।) समग्र काव्य में कवयित्री ने अपनी मानसिक व्यथा को आराध्य के समक्ष प्रकाशित किया है तथा उससे बार-बार अपने उद्वार की प्रार्थना की है। ‘देवीदेवनम्’ ‘चरणचिन्तनम्’, ‘व्यथामन्धनम्’ जैसे सानुप्रास शीर्षकों में भावमय पद्य अलकारमयी भाषा में गुम्फित हैं। कृष्ण के जितने भी लीलामय रूपों का इसमें ध्यान प्रस्तुत किया गया है वह अत्यन्त सरस है। अतः यह भक्तिरसमाधुरी से युक्त एक उत्तम काव्य है। २१२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास वाणीशतकम्-१९८१ में कवयित्री शुक्ला का यह शतक काव्य प्रकाशित हुआ। इसमें शिखरिणी छन्द में पराम्बा, भगवती, वाग्वादिनी, महासरस्वती की साधनामयी वन्दना प्रस्तुत की गई है। इस स्तुति का प्रत्येक श्लोक कवयित्रीकृत देवी की साधना के किसी न किसी विशिष्ट दिव्य रहस्य की गूढ भावना को व्यक्त करता है। जपमाला के १०८ दानों की तरह इस स्तोत्र में १०८ पद्य हैं। एक स्तोत्र द्रष्टव्य है रविस्त्वं कामाख्यः प्रकटमुखबिन्दी समरसात् स्तनद्वैतव्यक्त्या . हिमकरणवन्यात्मकवपुः।। त्रिबिन्दूनां तत्त्वं कलयति च हार्दामपि कलाम जनोऽसी दिव्ये ते जननि ! रमते धाम्नि सुचिरम् ।। इस प्रकार यह दार्शनिक एवं तान्त्रिक पृष्ठभूमि से संवलित, भावपूर्ण, सरस संस्कृत-पद्यकाव्य है। कवयित्री नलिनी निरन्तर अपने भावमय लेखन से संस्कृत-साहित्य को समृद्ध कर रही हैं। अभी उनके कुछ काव्य अप्रकाशित हैं जो प्रकाशित होकर साहित्यश्री का सवर्धन करेंगे।

जगन्नाथ पाठक

संस्कृत-काव्य-जगत् में उर्दू-फारसी की गजल शैली पर आधारित गीतधारा एवं भावधारा का प्रवर्तन करने वाले कवि जगन्नाथ राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के विद्यापीठों में उपाचार्य एवं प्राचार्य पद पर अधिष्ठित रह चुके हैं। आरम्भ में आपने ‘कापिशायनी’ काव्य की रचना की, जिस पर साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ, बाद में आपके ‘मृद्वीका’ और ‘पिपासा’ के उत्कृष्ट गीतिकाव्य प्रकाशित हुए, जिनमें ‘मृद्वीका’ पर वे ‘वाचस्पति पुरस्कार’ से सम्मानित हुए। ‘पिपासा’ समग्र रूप से सुन्दर गीतिकाव्य है। पर प्रायः वियोगिनी छन्द में निबद्ध ‘कापिशायनी’ एवं ‘मृद्वीका’ द्वारा भी कवि ने गीतशैली में ही काव्यरसयिताओं को सुस्वादु चषकपान कराया है। कापिशायनी को स्वयं कवि ने ‘द्राक्षारसमयी नूतनमुक्तककाव्यरचना’ तथा मृद्दीका को ‘नूतनकाव्यमधुपरिपाकः’ कहा है और पूर्ण रागात्मकता के साथ सहृदयों के हृदयों में अमन्द आनन्द का सञ्चार कराया है। अतः भावोच्छ्वास एवं रचना शैली की दृष्टि से तीनों काव्य गीतिकाव्य की श्रेणी में ही आते हैं और समीक्षकों ने उन्हें इसी रूप में मान्यता दी है। अतः यहां उनका विवेचन न कर पाठक जी के नवीनतम काव्य ‘विच्छित्तिवातायनी’ का विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है। विच्छित्तिवातायनी-यद्यपि १६८० ई. में ‘कापिशायनी’ के प्रकाशन के पश्चात् कवि पाठक संस्कृत-काव्यजगत् के समुन्नत शिखर पर आरूढ़ हो गये और सम्पूर्ण नवम दशक में उत्तमोत्तम साहित्य-साधना के आधार पर उन्होंने पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त की। १६६१ में उनकी ‘विच्छित्ति-वातायनी’ नामक मुक्तक-काव्य-कृति प्रकाशित हुई। इस कृति के छ: भागों में पहला एवं प्रमुख भाग विच्छित्ति-वातायनी ही है। कलेवर की दृष्टि से भी यह भाग बहुत बड़ा है। इसमें १४५४ आर्याएं हैं। सभी १०१ पद्यसंख्या वाले पांच भाग इस कृति में लघुकाव्य २१३ और संसक्त हैं, जिनके नाम हैं - श्रीकृष्णभावनाशतकम् (सराधाभावम्) रामत्वशतकम्, कविताशतकम्, स्त्रीशतकम् एवं सौन्दर्यकारिका । समग्र कविता की रचना आर्या छन्द्र में हुई है। कवि आरम्भ में अपनी कविता का उद्देश्य बताते हुए कहता है कि उसके लिए कविता केवल साध्य है, न वह यश के लिए है और न धन के लिए - केषाञ्चित् कवितेयं साधनामास्तां धनस्य वा कीतः। अस्माकं तु मतेयं सुमहत् साध्यं नु जगतीह।। कवि ने जीवन के विविध पक्षों का स्पर्श कर उन पर हल्का रंग चढ़ाया है। उनकी आर्या की लघु रचना कदाचित् मन को स्पन्दित कर देती है, कभी हल्का गुदगुदाती है, कभी सोचने को विवश कर देती है, कभी मर्म पर प्रहार करती है और कभी आधुनिक युग की विडम्बनाओं, विसंगतियों का खुला प्रदर्शन करती है। देश की वर्तमान दुर्दशा का प्रदर्शन करता हुआ कवि कहता है - राज्ञो घट्ट विलपति, शान्तिवनं वर्तते विषीददिव। शक्तिस्थलमनुताम्यति दर्श दर्श निजं देशम् ।। (दुर्दशापन्न अपने देश को देख-देखकर राजघाट विलाप कर रहा है, शान्तिवन दुःखी हो रहा है और शक्तिस्थल अत्यन्त व्यथित हो रहा है। अपनी बात को अनेकशः कवि अन्योक्ति के माध्यम से अथवा प्रतीकों के द्वारा कहता है, जैसे - खर्जूराणां मध्ये सहकारः कश्चिदेक उत्पन्नः। दुःखाकरोति मां खलु तस्य तदस्थानपतितत्वम्।। अन्य शतकों में कविवर पाठक ने अतिमधुर भावव्यञ्जना की है। श्रीकृष्णभावनाशतकम्’ में राधाभाव का वर्णन करते हुए कवि कहता है - व्रजभुवि शुभे प्रयागे राधाभावेन गाङ्गसलिलेन। श्रीकृष्णाख्ययमुनया समजायत सामः कश्चित् ।। ‘रामत्वशतकम्’ में रामत्व की व्याख्या करते हुए कवि कहता है - व्यर्थे वेदविधाने व्याकीर्णे शास्त्रमार्गसन्धाने। सेतुर्मर्यादाया अनुशासनमेव रामत्वम् ।। इस प्रकार ये शतक काव्य अपने-अपने वैशिष्ट्य से संबंधित हैं। इस सङ्कलन से भिन्न इन शतकों को माना जाय तो वस्तुतः ये लघुकाव्य होंगे। इस प्रकार कवि पाठक अपनी संस्कृत-काव्य-साधना की विधा में प्रतिभा-प्रकर्ष से समन्वित एक ऐसे कवि हैं जिन्होंने स्वयं२१४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास अपने लिए मौलिक मार्ग का निर्माण किया है और उसी पर तबसे अब तक चल रहे हैं।

राधावल्लभ त्रिपाठी

अपनी रमणीय काव्यकला से साहित्य-सदन को समलङ्कृत करने वाले राधावल्लभ त्रिपाठी लम्बे समय से मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष पद पर अधिष्ठित हैं। अनेक मुक्तक कविताओं के अतिरिक्त आपका प्रथम मौलिक काव्य-सङ्ग्रह ‘सन्धानम्’ नाम से १६८६ में प्रकाशित हुआ। /लहरीदशकम्-कवि राधावल्लभ के इस काव्य का प्रकाशन १६६१ में संस्कृत परिषद्, सागर विश्वविद्यालय से हुआ। यह लघुकाव्य दस लहरीकाव्यों का सङ्कलन है। वसन्तलहरी, निदाघलहरी, प्रावृड्लहरी, धरित्रीदर्शनलहरी, जनतालहरी, रोटिकालहरी, नर्मदालहरी, मृत्तिका लहरी, अद्यापिलहरी एवं प्रस्थानलहरी। का। कवि समाज के वर्तमान स्वरूप के सन्दर्भ को लेकर चलता है। प्रकृति-वर्णन के समस्त सन्दर्भ पारम्परिक शैली के वर्णन नहीं हैं, अपितु नवीन दृष्टि लिये हुए है। वसन्तलहरी में वसन्त-वर्णन में कवि यह दिखाना चाहता है कि आधुनिक औद्योगिक नागरी सभ्यता के मध्य बसन्त का आनन्द कहीं खो गया है, जैसा कि वह कहता है - यानागमव्यतिकराकुलिताश्च मार्गाः पित्रोलगन्धपरिपूरितदिङ्मुखास्ते। धूमः प्रसर्पति च राजपचे पुरेऽस्मिन् धूलिं बिभर्ति वसुधाऽसितडामराका।। (सारे मार्ग गाड़ियों के आने-जाने की बाधा से व्याकुल हो गये हैं, पेट्रोल की गंध से समस्त दिशायें भर गयी हैं। सड़क और नगर में धुंआ फैल रहा है। काले तारकोल से युक्त पृथिवी धूल धारण कर रही है।) । आगे एक पद्य में कवि स्पष्ट रूप से यह कह देता है कि वह अब वसन्त को प्राचीन नहीं, नवीन दृष्टि से देख रहा है - काव्याङ्गणं समवतारयितुं समीहे सर्व पुरातनमिदं न हि वर्ण्यजातम्। त्यक्त्वा चमत्कृतिततिं प्रतिबिम्बकल्पां वासन्तिकं विशदयन्तु गिरो मदीयाः।। भाव के साथ-साथ कवि ने उपमायें भी नये रूप की दी हैं। ग्रीष्मकाल को दाहकारक होने के कारण आतङ्कवादी खल के समान बताया गया है - आतङ्कवादिखलवनिदाघो दाघमश्नुते। छाया का उपमान ससुराल में पीड़ित की जाती हुई बहू को बनाया गया है - -लघुकाव्य २१५ श्वशुरालयसम्प्राप्ता पीड्यमाना वधूरिव। छायां छायाप्यहो कोणे मार्गमाणा लयं गता।। आकाशरूपी मञ्च पर चढ़े हुए केवल गरजने वाले और न बरसने वाले मेघों की उपमा केवल भाषण देने वाले और कुछ काम न करने वाले नेता से दी गई है - समारूढनभोमञ्चो गर्जन मेघो न वर्षति। भाषमाणोऽक्रियो नेता जनतायाः पुरो यथा।। धरित्रीदर्शनलहरी में कवि ने अपनी पूर्व जर्मनी देश की यात्रा के उपक्रम में की गई विमानयात्रा के अनुभवों का सूक्ष्मता से वर्णन किया है। विमान में बैठकर बाहर के दृश्यों का अवलोकन किया जाये और विशेष रूप से पृथ्वी को देखा जाय तो कैसा रोमाञ्चक अनुभव होता है, यह काल्पनिक चित्रण कवि ने किया है। जनतालहरी में कवि ने भारतीय जनता की वर्तमान दशा का विविध रूपों में चित्रण किया है। शाकुन्तल की शब्दभूमि पर रचित पैरोडी रूप अनेक श्लोक हैं, जिनमें यह द्रष्टव्य है - गच्छति पुरतो देशः, पुनरिह पश्चात् प्रधृष्यते जनता।। | कोऽयं समाजवादः प्रगतिर्वा कीदृशी सेयम्।। रोटिकालहरी में जीवन में रोटी का महत्त्व वर्णित है। चार तरङ्गों में विभाजित नर्मदालहरी में नर्मदा नदी के ऐतिय, स्वरूप एवं माहात्म्य का मनोरम वर्णन है। मृत्तिकालहरी में देश की मिट्टी का वर्णन है। ‘अद्यापिलहरी’ में श्लोकों की पद्यपंक्तियों ‘अद्यापि’ से प्रारम्भ होती हैं। ‘प्रस्थानलहरी’ में जीवन-यात्रा के समापन के बाद अन्तिम प्रस्थान का वर्णन किया गया है।

रसिक विहारी जोशी

‘करुणाकटाक्षलहरी’ के रचयिता जोशी जी दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागीय आचार्य पद पर अनेक वर्षों तक प्रतिष्ठित रहे। अपने पिता श्री राम प्रताप को उन्होंने काव्य के आरम्भ एवं अन्त में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है। उनके ‘मोहभङ्गम्’ महाकाव्य के पश्चात् इस लहरीकाव्य का प्रकाशन १८७७ ई. में भारतीय विद्या प्रकाशन, दिल्ली से हुआ। कवि की यह मान्यता है कि पूर्व काव्य की रचना से मेरी सब व्यथा नष्ट हो गई, मेरा मोहभङ्ग हो गया और कटाक्षलहरी मेरे चित्त में प्रवेश कर गई। कवि कृष्णप्रिया राधा की करुणामयी कटाक्षलहरी को विविध प्रकार के उपमानों, रूपकों और प्रतीकों में बाँधकर प्रस्तुत करता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है राधे! ते करुणाकटाक्षलहरी नीलाम्बुजस्पर्धिनी कालिन्दी प्रतिभाति काऽपि विमला सम्पत्सुधावर्षणे। किं वा मौक्तिककान्तिपुजजयिनी सारस्वतेयी च्छटा किं वा कैरविणीरुचां मदरिपुर्भागीरथीसन्ततिः।। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (हे राधे! तुम्हारे करुणमय कटाक्षों की तरङ्ग नीलकमल से स्पर्धा करने वाली है, वह सम्पत्ति रूपी अमृत के वर्षण में निर्मल यमुना प्रतीत होती है। अथवा क्या यह मोतियों की कान्ति के समूह को जीतने वाली सरस्वती की छटा है अथवा कैरविणियों की कान्तियों के समूह को हरने वाली गङ्गा की सन्तति है ?) राधा की इस करुणाकटाक्षलहरी को ही कवि ने संसार-सागर से तारने वाली, विद्या, यश, वैभव, आदि की वृद्धि करने वाली, कल्पवल्ली के समान मनोरथ पूर्ण करने वाली आदि कहा है। कवि भक्तिरस से आप्लावित हो राधा के मधुर ममतामय एवं वात्सल्यमय स्वरूप के आगे नतमस्तक होना चाहता है। इस प्रकार मधुरा भक्ति की उत्तम रचना होने से यह काव्य वस्तुतः मधुर है। रसात्मकता को अलङ्कारात्मकता पुष्ट करती है। अनेक अलङ्कारों के सुन्दर प्रयोगों की छटा से यह एक मनोरम काव्य बन गया है। समस्त काव्य में प्रायः शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग है जिसका निर्वाह कवि द्वारा सुचारु रूप से किया गया है। अर्वाचीन युग में इस भक्तिमय लघुकाव्य की सर्जना कर कविवर जोशी ने संस्कृत-साहित्य की श्रीवृद्धि की है।

प्रियव्रत शर्मा

इनका जन्म १६२० ई. में बिहार में हुआ था। ये दीर्घकाल तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के आयुर्वेदीय संस्थान में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित रहे। इन्होंने रोगियों के लिए जैसे आयुर्वेद के विविध रसायनों का निर्माण किया, वैसे ही सहृदयों के लिए काव्य-रसायन का सर्जन किया। सर्वप्रथम इन्होंने ‘श्रीमदयोध्याप्रसादचरितम्’ लिखा, पुनः अपने पितृचरण के चरित को विषय बनाकर ‘श्रीरामावतारचरितम्’ की रचना की, जिसका प्रकाशन १६४८ ई. में हुआ। यह पांच सर्गों का काव्य है, जिसमें पहले सर्ग में भारतवर्ष का और दूसरे सर्ग में बिहार का वर्णन है। आगे के सर्गों में श्री रामावतार की अनेक विशेषताओं तथा आयुर्वेद-सम्बन्धी उपलब्धियों का विवेचन किया गया है। कविवर प्रियव्रत ने ऋतुवर्णनों पर अपनी लेखनी विशेष रूप से चलाई है। इस सन्दर्भ में उनका ‘वसन्तशतकम्’ नामक शतक काव्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसका प्रकाशन १६७० में हुआ। इसमें अत्यन्त सुरम्य एवं ललित भाव एवं भाषा में वसन्त का वर्णन उपस्थापित किया गया है। वसन्त के आगमन की चर्चा करता हुआ कवि कहता है शरानस्यन् पश्यन् दिशि दिशि मदापूर्णितदृशा मृषौदस्यन् पान्थान् प्रियजनवियुक्तान् विकलयन्। उषःकाले भाले दिनकरकरामृष्टमधुरो वसन्तोऽयं प्राप्तः कमलमुकुलानीव कलयन् ।। (बाणों को फेंकता हुआ, दिशा दिशा में मद से घूमते हुए नेत्रों से देखता हुआ, पथिकजनों को झूठे उकसाता हुआ, प्रियजनों को व्याकुल करता हुआ, प्रातःकाल के मस्तक पर सूर्य की किरणों के स्पर्श से मधुर यह वसन्त मानों कमल-कलियों को खिलाता हुआ पहुंच गया है।) २१७ लघुकाव्य पूरे काव्य में इसी तरह की वसन्तच्छटा शिखरिणी छन्द में आबद्ध होकर प्रस्तुत है। अन्त में कवि कहता भी है-‘शुभास्ते पन्थानो लसतु तव सिद्धिः शिखरिणी।

भोलानाथ मिश्र

इनका जन्म मुजफ्फरपुर, बिहार में हुआ था। उन्होंने अनेक काव्यों का प्रणयन किया, जिनके नाम कालक्रमानुसार इस प्रकार हैं-‘कालतत्त्वम्’ (१६४८) ‘गान्धि-गरिमा’ (१९५०) ‘गीतायां समता’ (१९६१), ‘भारतीयसर्वस्वम्’ (१६८३) तथा ‘इन्दिरा-काव्यम्’ (१९८८)| अन्तिम काव्य का विवरण इस प्रकार है

  • इन्दिरा-काव्यम्-यह काव्य प्रधानमन्त्री पद पर आरूढ़ श्रीमती इन्दिरा गान्धी के हृदय-विदारक हनन पर लिखा गया है। काव्य में स्रग्विणी छन्द का प्रयोग किया गया है। प्रत्येक पद्य ‘इन्दिरा’ इस शब्द से आरम्भ होता है। उनमें इन्दिरा के व्यक्तित्व एवं कार्यों का गुणानुवाद प्रभूत मात्रा में किया गया है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है इन्दिरा मानवत्वं दिशन्ती स्वतो विश्वबन्धुत्वतो विश्वशान्तिश्रिता। सर्वतः प्रेम-पीयूष-गङ्गाजलै विश्वचेतः पुनन्ती दिवं प्रस्थिता।। काव्य में कुल ६१ पद्य हैं। भाषा नितान्त सहज, सरल एवं सुबोध है। इन्दिरा गान्धी के इस तरह हिंसात्मक रीति से हत होकर स्वर्ग चले जाने पर कोटि-कोटि भारतीयों की तरह कवि के हृदय पर भी जो आघात हुआ उसी की अभिव्यक्ति यहां हुई है। काव्य में राष्ट्रभक्ति, कारुण्य एवं चरितस्तुति तीनों का समिश्रण हुआ है।

आनन्द झा

झा जी मूलतः नैयायिक थे। उन्होंने लम्बे समय तक लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राच्यविद्या विभाग में अध्यापन-कार्य किया। कविवर झा प्रौढ कवित्व के धनी हैं। अनेक स्फुट पद्य-समूहों के अतिरिक्त उन्होंने ‘चन्द्रावतीचरितम्’ काव्य लिखा, जिसमें बिहार के बनैली स्टेट की रानी चन्द्रावती के जीवनचरित का वर्णन किया है। कवि ने पुष्पचयन, पूजाभाजन-संस्करण, महेशगीताभ्यास, यज्ञोपवीत-रचना आदि मैथिल बालिकाओं के बाल्यावस्था में किये जाने वाले संस्कारों का वर्णन किया है। काव्य में पदमधुरता, भावगम्भीरता, सालङ्कारता, श्रुतिहारिता के गुण सर्वत्र विद्यमान हैं। काव्य में १०१ पद्य हैं। कविवर झा के अनेक पाडित्यपूर्ण समस्यापूर्तिपरक पद्य लिखे हैं। उनकी विद्वन्मनस्तोषिणी शैली के दर्शन उनके दण्डक-प्रयोगों में होते हैं। सङ्गम विषय पर लिखे गए उनके दण्डक का पूर्वांश इस तरह है-(मत्तमातङ्गदण्डकम्) - श्रीत्रिवेण्या बुधैर्दृश्यतां सङ्गमः, श्रीत्रिवेण्या न कैः पूज्यतां सङ्गम स्तत् कवीन्द्ररये वर्ण्यतां सङ्गम स्तत् कवीन्द्रैरये वर्ण्यतां सङ्गमः।। २१८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

श्रीकृष्ण सेमवाल

आरम्भ में दिल्ली प्रशासन के विद्यालयों में संस्कृत अध्यापक रहे और तदनन्तर दीर्घकाल तक दिल्ली संस्कृत अकादमी के सचिव पद पर प्रतिष्ठित रहे सेमवाल जी का लघुकाव्य-लेखन राष्ट्रभक्ति एवं राष्ट्रीय राजनयिकों के चरितवर्णन की ओर अधिक उन्मुख रहा है। अधिकतर काव्यों के प्रकाशन-काल की दृष्टि से सेमवालजी को नवम दशक का ही कवि कहा जा सकता है। वे अत्यन्त सरल एवं सीधी-सपाट शैली के कवि हैं। उनके काव्यों का विवरण इस प्रकार है - इन्दिराकीर्तिशतकम् - इस लघुकाव्य का प्रकाशन वर्ष १६७६ में भारतीय भाषा संगम, नई दिल्ली से भारत की तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरागांधी के जन्मदिवस, १८ नवम्बर, १७६ को हुआ। इस काव्य में श्रीमती गांधी के व्यक्तित्व को भारत की आशाओं, आकाक्षाओं के प्रतीक रूप में देखा गया है। इन्दिरा के बाल्यजीवन से लेकर स्वतन्त्रता-आन्दोलन में भाग लेने की सारी घटनाओं, विवाह, दो पुत्रों का जन्म, पति-निधन, पितृ-निधन, मन्त्रालय-प्राप्ति तथा प्रधानमन्त्रित्व प्राप्ति आदि का ब्यौरेवार वर्णन इस काव्य में है। अलङ्कारों के सहज प्रयोग से युक्त यह काव्य एक उत्तम लघुकाव्य है। महाप्रयाणम्-जिन इन्दिरागान्धी के यशोगान में कवि ने पूर्व काव्य लिखा था उनकी, उनके रक्षक द्वारा गोली मारकर नृशंस हत्या कर दिये जाने पर कवि ने श्रद्धाञ्जलि के रूप में ‘महाप्रयाणम्’ नामक काव्य लिखा जिसका प्रकाशन देववाणी परिषद्, दिल्ली से वर्ष १६८५ में हुआ। कवि ने इस काव्य में इन्दिरा गान्धी की हत्या से हुए राष्ट्रव्यापी शोक एवं हाहाकार का मार्मिक चित्र खींचा है। एक पद्य इस प्रकार है प्रातः प्रयाणमतुलं जनताहिताय, गेहात् कृतं सपदि हृष्टहृदा ययाद्य। मार्गे दुरात्मचरितैः जननी हता सा हा भारतं विनिहतं निहतं धरायाम् ।। हिमादिपुत्राभिनन्दकाव्यम्-चरितकाव्य-परम्परा के अन्तर्गत सेमवालजी का यह काव्य भी है, जिसका प्रकाशन १६८० ई. में हुआ। इसमें उन्होंने राजनेता हेमवतीनन्दन बहुगुणा के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं चरित्र को संस्कृत भाषा में निबद्ध किया है।

  • पीयूषम्-‘कविरत्न’ सेमवाल का यह काव्य ईस्टर्न बुक लिंकर्स, दिल्ली से १६८२ में प्रकाशित हुआ। यह वस्तुतः अन्योक्ति काव्य है और कवि ने इसे ‘अन्योक्ति-अनुरक्ति शक्ति-संवलितम्’ कहा है। इस काव्य को कवि ने तीन भागों में विभाजित कर रचा है - प्रथम, अन्योक्तिपीयूषम्, जिसमें अन्योक्ति के माध्यम से प्राकृत वस्तुओं को लक्ष्य कर जीवन के सुख-दुःख, लाभालाभ, मानापमान, उत्थान-पतन आदि विविध पक्षों का वर्णन है। द्वितीय अनुरक्ति-प्रकरण में प्रियानुराग के विषय को लेकर उसका विकास वर्णित किया गया है। शक्ति-प्रकरण में भगवती जगदम्बा के चरणों में भक्तिपरक अभ्यर्थना वर्णित है। अन्योक्ति २१६ लघुकाव्य के माध्यम से आज की चाटुकारिता के युग पर कटाक्ष करता हुआ कवि कहता है - ये कुक्कुराः प्रतिदिनं परितो भवन्तं लागूलचालनरता नितरामटन्ति। हा तेऽधुनाऽपि भवता सुकृपावरोधे दुष्कर्तने तव रतास्तु भवन्ति नूनम् ।। सर्वमङ्गलाशतकम्-१६८७ ई. में ‘पीयूषम्’ काव्य का अंश रूप यह शतक काव्य हिन्दी-अंग्रेजी अनुवाद सहित पृथक् प्रकाशित हुआ। इस प्रकार कविरत्न सेमवाल के समस्त काव्य लघुकाव्य ही हैं जो प्रायः ईश्वरभक्ति एवं देशभक्ति से सम्बन्ध रखते हैं। वे नवम दशक के प्रसिद्ध एवं सुज्ञात कवि हैं।

प्रशस्य मित्र शास्त्री

संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में नवीन रीति से हास्य एवं व्यङ्ग्य की अवतारणा करने वाले प्रशस्य मित्र शास्त्री का जन्म १E४८ ई. में हुआ। आपका कार्यक्षेत्र संस्कृत अध्यापक के रूप में फीरोजगांधी कालेज, रायबरेली, उत्तर प्रदेश है। कवि प्रशस्यमित्र ने हास्यकवि के रूप में संस्कृत-कविसम्मेलनों एवं सञ्चारमाध्यमों में विशेष लोकप्रियता प्राप्त की तथा अत्यन्त सरल-सुबोध भाषा में दैनन्दिन व्यवहार के विषयों को लेकर हास-परिहास के विषयों को उपस्थापित किया तथा समाज के विविध अगों पर व्यङ्ग्य, अधिक्षेप या आधात किया। मित्र जी द्वारा लिखित सैकड़ों हास्य-व्यङ्ग्य की रचनाएं विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, पर अब पुस्तकाकार में प्रकाशित हैं-‘हास-विलासः’, ‘व्यङ्ग्यविलासः, तथा ‘कोमलकण्टकावलिः’, इन नामों से जिनमें ‘व्यङ्ग्यविलासः’, गद्यरचना है, शेष दो लघुकाव्य हैं। हास-विलासः - १९८६ ई. में प्रकाशित अपने ‘हास-विलासः’ नामक सङ्कलन को स्वयं कवि ने ‘आधुनिकतमा संस्कृत हास्य-व्यम्य रचना’ कहा है। सचमुच प्रशस्य मित्र ने आधुनिक जीवन के विविध सन्दर्भो को लेकर २०१ कविताएँ लिखीं हैं जिनमें गुदगुदी एवं हँसी उत्पन्न करने की अपूर्व क्षमता है। चार, छः, आठ पंक्तियों के इस वृत्त में घूमने पर अन्त में निश्चित रूप से हँसी का फव्वारा फूट पड़ता है। जैसे विवाहानन्तर प्रथम ‘निशा’ में किसी व्याकरण के विद्वान् पति से नवोढा पत्नी के ‘प्रथमः पुरुषश्चासि त्वमेव मम जीवने’ कहने पर पति द्वारा ‘मध्यमः पुरुषः कस्ते ? उत्तम पुरुषश्च कः ? यह पूछा जाना पाठक के लिए एक अच्छे मनोविनोद का विषय बन जाता है। शास्त्रीजी ने संस्कृत की अनेक पुरानी सूक्तियों का नये हास्य सन्दर्भो में बहुत अच्छा उपयोग किया है। नेता पर व्यङ्ग्य करते हुए कवि कहता है विद्वत्त्वञ्च नृपत्वञ्च नैव तुल्यं कदाचन। गृहेऽपि नाय॑ते विद्वान् नेता सर्वत्र पूज्यते।। २२० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास इस प्रकार कवि ने सैकड़ों पूर्वप्रचलित सुभाषितों को तोड़-मरोड़कर अथवा उसको वर्तमान संदर्भ से जोड़कर समाज के विभिन्न वर्गों की व्यवस्था पर अथवा राजनीति के विविध पक्षों पर करारी चोट की है। इस काव्य पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशेष पुरस्कार प्राप्त हुआ। कोमलकण्टकावलिः- कवि प्रशस्य मित्र की यह रचना १EE में प्रकाशित हुई। काव्य का विभाजन कण्टकों में किया गया है। प्रथम से लेकर नवम कण्टक तक नौ प्रकरणों का विषय-विभाजन इस प्रकार से किया गया है-राजनीति-प्रकरण, दाम्पत्य-प्रकरण, प्रेमिका-प्रकरण, विद्यालय-प्रकरण, न्यायालय प्रकरण, आपण-प्रकरण, माणवक -प्रकरण, यात्रा-प्रकरण एवं विप्रकीर्ण प्रकरण। मनुष्य के सामाजिक जीवन के इन विविध प्रकरणों में विभिन्न रूपों में कवि ने हास्य के विविध प्रसङ्ग उपस्थापित किये हैं। पर इससे भी अधिक तीव्रतर है कवि का व्यङ्ग्य-प्रयोग, जिससे वह समाज के दूषित पक्षों पर प्रहार करता है। पहली ही कविता ‘सत्यमेव जयते’ में कवि ने आज की खोखली, आडम्बरपूर्ण एवं मिथ्याचारमयी राजनीति का पर्दाफाश किया है। किस तरह झूठ की नींव पर यह राजनीति का भवन खड़ा है जिसमें आचार-संहिता का नितान्त अभाव है। इसका वर्णन करते हुए ‘द्वौ करौ मन्त्रिणामिमी’ शीर्षक के अन्तर्गत कवि कहता है जनानां तु यथाऽन्येषां द्वौ करौ भवतस्तथा, मन्त्रिणामपि वर्तेते द्वौ करौ भारते परम् । करेणैकेन रक्षन्ति निजकुर्सी प्रयत्लतः, परेषां कम्पयन्ते च कुर्सीम् अन्यकरेण ते।। प्राचीन संस्कृत-साहित्य में हास्य का जो अभाव मिलता है, अर्वाचीन साहित्य के इन कवियों ने उस अभाव को अब पर्याप्त मात्रा में दूर कर दिया है और हास्य के साथ-साथ व्यङ्ग्य और अधिक्षेप को अत्यधिक अपना लिया है। कविवर प्रशस्य मित्र के काव्य-सर्जन ने इस हास्य-व्यङ्ग्य विधा को इस दशक में साहित्य में पूर्ण प्रतिष्ठित पद दिलवाया है। इस विधा का उन्नयन बीसवीं शती के नवम दशक के संस्कृत-साहित्य की एक उपलब्धि है।

हरिनारायण दीक्षित

दीक्षित जी का जन्म १६३६ में उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद में हुआ था। उनका कर्मक्षेत्र नैनीताल रहा और कुमायूँ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में वे अध्यापक एवं आचार्य पद पर प्रतिष्ठित रहे। उन्होंने कई विधाओं में काव्य लिखे, जिनमें ‘भीष्मचरितम्’ महाकाव्य पर साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ। ‘श्रीहनुमद्भूतम्” दीक्षित जी का १६८७ में प्रकाशित सन्देशकाव्य है, जिसमें लङ्कापुरी में राक्षसराज रावण द्वारा बन्दी बनाई गई सीता का हनुमान जैसे निपुण दूत द्वारा राम को प्रेषित किये जाने वाले सन्देश का वर्णन है। सीता की खोज कर, अनेक राक्षसों का संहार कर, लड्का को जलकर जब हनुमान राम के पास लौटने लगते हैं तो सीता उन्हें अपना विरह सन्देश देती हैं। वे विरह कातर हो राम से बार-बार अपने को इन राक्षसों के जाल से शीघ्र मुक्त कराने लघुकाव्य २२१ की प्रार्थना करती हैं। सीता की चिन्तार्द्रता एवं विहलता इस पद्य में व्यञ्जित है त्वं मे प्राणास्त्वमसि दयितस्त्वं सखा त्वञ्च स्वामी त्वं मे भर्ता हृदयरमणो जीवनाधारहेतुः। स्वीयां जायां विपदि पतितां मोचयागच्छ शीघ्र घ्यायं ध्यायं तव बलमहं साम्प्रतं जीविताऽस्मि ।। विरह के प्रसङ्ग में कवि ने कुछ भावमयी सूक्तियों का भी सर्जन किया है, जैसे आशा नूनं कथमपि पते ! प्रेयसीनां विदेशे पत्यौ दूरे विरहविधुरं प्राणवायुं बिभर्ति। । सीता राम को संयोगकाल में अनुभूत सारे सुखों का स्मरण कराती हैं जो इस समय विरह में कष्ट दे रहे हैं। अन्य दूतकाव्यों की तरह यह काव्य भी मन्दाक्रान्ता वृत्त में लिखा गया है। काव्य में भाव-सौरभ और शिल्प-सौन्दर्य का मञ्जुल समन्वय है। कुल मिलाकर यह एक लघुकाव्य है।

इच्छाराम द्विवेदी

द्विवेदी जी एकरसानन्द केन्द्रीय संस्कृत विद्यालय, मैनपुरी में प्राधापक हैं। वे मूलतः गीतकार हैं और उनके गीतों का संकलन ‘गीतमन्दाकिनी’ प्रकाशित भी हो गया है। लघुकाव्य के रूप में उनके दो दूतकाव्य प्रकाशित हुए हैं जिनका विवेचन इस प्रकार है। दूतप्रतिवचनम्-यह काव्य १६८६ ई. में देववाणी परिषद, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। आधुनिक कवि इच्छाराम द्विवेदी ‘प्रणव’ मेघदूत के अनुकरण पर लिखे गए इस काव्य में अलकापुरी से रामगिरि वापस लौट आए मेघ से आधुनिक युग का दुरवस्थापूर्ण वृत्तान्त सुनवाते हैं। यह वृत्तान्त तथ्यपूर्ण तो है, पर इसमें हास्य-व्यङग्य का पुट पूरी तरह विद्यमान है। कवि ने इसे स्वयं व्यङ्ग्य काव्य कहा है। जिन वस्तुओं एवं व्यक्तियों को मेघदूत का मेघ देखता है यहाँ भी उनका नाम है, पर उनका स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अब भारतवर्ष वैसा सुरम्य एवं सुवृत्त देश नहीं रह गया है। अब वहाँ धर्म परम्परा छिन्न-भिन्न हो गई है। अब वहाँ यक्षिणी का वह स्वरूप नहीं दिखाई दे रहा है। अब वह किस तरह की आधुनिका हो गई है इसका वर्णन करते हुए कवि कहता है तन्वी श्यामा शिखरिदशना यक्षिणी या त्वदीया टी. वी. मध्ये चपलनयना तारिका दृश्यते सा। कान्ते स्वाने विमलबटिक फेनिलं लिम्पमाना स्नान्त्युन्मुक्ता भवति विविधक्कय्यवस्तुप्रचारे।। देश के विविध स्थानों में व्याप्त प्रदूषण, समाज एवं राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार, २२२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास चारित्रिक पतन एवं आधुनिकता की अन्धी दौड़ आदि का कवि ने पर्याप्त वर्णन किया है। उन्होंने अनेक शब्दावलियाँ पक्तियाँ एवं पाद ज्यों की त्यों मेघदूत से ग्रहण किये हैं। मित्रदूतम्-‘दूतप्रतिवचनम्’ के बाद कविवर “प्रणव’ ने ‘मित्रदूतम्’ नामक दूतकाव्य लिखा। इसमें मैनपुरी निवासी कवि इच्छाराम ने ज्येष्ठ मास की धूप से सन्तप्त होकर हिमालय की यात्रा करने का विचार किया। यात्रा समाप्त होने पर उसने दिल्ली में वाणीविहार स्थान रहने वाले अपने प्रिय मित्र रमाकान्त शुक्ल को यह पत्र लिखा और इसी पत्र को मित्रदूत दूत के रूप में मेजा। जून, १६६० में यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ की इस यात्रा को सपत्नीक सानन्द सम्पन्न करने वाले कविवर ‘प्रणव’ भावप्रवण हो उसका वर्णन करते हैं। इस यात्रा का मार्ग मेरठ, हरिद्वार मसूरी, नौगाँव, बड़कोट, हनुमानचट्टी, नारदचट्टी, जानकीचट्टी, मसूरी, ब्रह्मखाल, धयसू, उत्तरकाशी, टिहरी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा, अगस्त्यभूमि, गुप्तकाशी, सोनप्रयाग, गौरकुण्ड, रामबाड़ा, केदारनाथ, आदि शंकर की समाधि, गौरीकुण्ड, चमोली, पीपलकोटि, जोशीमठ, विष्णु प्रयाग, बदरीनारायण धाम है। इन सब स्थानों की प्राकृतिक रमणीयता के वर्णन के साथ उनके सांस्कृतिक-धार्मिक महत्त्व का भी आकलन कवि ने किया है। त्रिलोकीनाथ के मन्दिर में जाकर कवि ने इस काव्य को समर्पित करने की बात कही है। बन्यो ! गत्वा त्रिभुवनपतेर्मन्दिरे त्वं प्रयाणे नश्शब्दैर्मम जडमतेर्वन्दनं संवदस्व। इच्छारामो द्विजकुलगतो देव ते पादपद्मे यात्रावृत्तं झटिति रचितं प्रेषयन् मित्रदूतम् ।। अन्य दूतकाव्यों की तरह यह भी मन्दाक्रान्तावृत्त में लिखा दूतकाव्य है, पर इसका विषय कान्ताविषयिणी रति एवं तज्जन्य वियोग नहीं है, अपितु भगवद्विषयिणी रति एवं तद्विषयिणी भक्ति है। इस दृष्टि से सामान्य दूत काव्य-परम्परा से यह विशिष्ट है। अनेक धामों के वर्णन से युक्त यह काव्य भारत की धर्मप्राण जनता का कण्ठहार है, साथ ही संस्कृत-लघुकाव्यमाला का हीरक हार भी।।

कृपाराम त्रिपाठी

कृपाराम त्रिपाठी ‘अभिराम’ का जन्म उत्तर प्रदेश के गोंडा जनपद में हुआ था और वे बलरामपुर स्थित महारानी लालकुँवरि महाविद्यालय में संस्कृत के अध्यापक रहे। उनके दो लघुकाव्य प्राप्त होते हैं तरङ्गदूतम्-यह भी दूतकाव्य-परम्परा का एक सुन्दर काव्यरत्न है जिसमें समुद्र की तरङ्ग को दूत बनाया गया है। इस काव्य की नायिका ‘कला’ लंका के राजा विभीषण की कन्या है तथा नायक ‘विमन्यु अविन्ध्य का कल्पित पुत्र है। नायक रावणारि श्रीराम की आज्ञा से समुद्र के पार सेतुबन्ध पर रामेश्वरम् में प्रवास कर रहा था। वह शिव के आराधन में तल्लीन था, तथापि वह अपनी प्रियतमा से दूर रहकर हृदय में बार-बार उसकी याद लघुकाव्य ਜੇ ਕੇ ੩ करता था। इस काव्य में विरह की अवधि सोलह महीने हो जाती है। इस तरह एक वर्ष बीतने के बाद चार माह शेष रह जाने पर अत्यन्त विरहविकल हो नायिका नायक को समुद्र की तरङ्गों द्वारा सन्देश भेजती है। विरह विधुरा कला अपने विरहविहल प्रिय की दशा का मार्मिक चित्रण करती हुई कहती है तत्रैकस्मिन् मम सहचरस्तीरमासाद्य काले पश्यन्नूमीः पुलकिततनुर्दर्शनीयस्त्वयैकः । यस्त्वां दृष्ट्वा सजलनयनो निर्निमेषो महात्मा किञ्चिद् ध्यायत्यविचलमनास्तं विजानीहि कान्तम् ।। (वहाँ एक समय समुद्र तट पर पहुँचकर तरङ्गों को देखते हुए, पुलकित शरीर वाले मेरे सहचर को तुम देखोगे, जो तुम्हें देखकर अश्रुपूर्ण नेत्रों वाला, अपलक होकर जो महात्मा कुछ ध्यान निश्चल मन होकर करे, उसे ही मेरा प्रियतम समझना।) नायिका द्वारा लहर से सन्देश ले जाने का निवेदन, समुद्र-तट का प्राकृतिक चित्रण तथा लहर का समग्र वर्णन अत्यन्त सुन्दर है। काव्य में एक ओर भारत की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन है तो दूसरी ओर दूतकाव्य की भावतरलता एवं स्निग्धता विद्यमान है। १६८८ में प्रकाशित यह काव्य उ. प्र. संस्कृत अकादमी द्वारा पुरस्कृत है। कुटजकुसुमाञ्जलिः - अभिराम के द्वितीय काव्य ‘कुटजकुसुमाञ्जलिः’ का प्रकाशन १EE१ ई. में हुआ। ‘कुटज’ इस नाम की कल्पना सम्भवतः कवि को मेघदूत के पद्य ’ स प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः से हुई। काव्य में तीन सौ श्लोक है। यह १८ स्तबकों में विभाजित है। काव्य में विषयवैविध्य भी है और छन्दोवैविध्य भी। राष्ट्रिय एकता, नारियों का महनीय स्वरूप, देववाणी की गरिमा, श्रमशोषण की निन्दा, ऋतुवर्णन, साम्प्रदायिक एकता, विश्वबन्धुत्व, सुजन-दुर्जन, प्रकृति-विवेचन, आत्मनिरीक्षण, स्वदोषदर्शन, अयोध्यामहिमा, आतङ्कवाद, पृथक्तावाद, हिंसा, आघात-प्रतिघात, राष्ट्रद्रोह, वधूदहन, ऋतुवर्णन, आधुनिक भारत दशा वर्णन आदि विषय इनमें संगृहीत हैं। भाषा लालित्यपूर्ण एवं अलंकारमयी है। अन्योक्तिमय वसन्त-वर्णन प्रसङ्ग द्रष्टव्य है आयातः कुसुमाकरस्त्विति मनस्याधाय न स्थीयते खिन्नैः पर्णविहीनशाखिभिरपि स्थाणुत्वशेषैर्ननु । चन्द्रोऽसौ सुरपीतषोडशकलः पूर्णत्वलाभाशया क्षीणः सन्नपि नाम्बरेऽभ्युदयति व्यर्थ जनो रोदिति।। आधुनिक भारत की राष्ट्रिय एकता के सन्दर्भ में भी कवि ने पद्य लिख्खे हैं। इस प्रकार कविवर कृपाराम भी इस शताब्दी के नवें दशक की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं जिनके दो लघुकाव्य अपने उत्कृष्ट काव्यगुणों से उन्हें उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं। उनकी रचनाएँ वस्तुतः अभिराम हैं।ਜਾ ੨ ॥ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

मधुसूदन मिश्र

मिश्र जी राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली में उपनिदेशक पद पर प्रतिष्ठित रहे हैं। उनके दो काव्य प्राप्त होते हैं-‘स्वेतम्’ और ‘श्रीहनुमत्स्तोत्रम्’। तीसरा काव्य ‘प्रबुद्धराष्ट्रम्’ भी प्रकाशित है। स्वेतम्-यह काव्य तारा प्रकाशन, दिल्ली से १६८६ में प्रकाशित हुआ। यह छः सर्गों में निबद्ध काव्य है। अतः इसे एक दृष्टि से महाकाव्य कहा जा सकता है, परन्तु न तो कवि ने इसे कही महाकाव्य संज्ञा दी है, और न इसमें कथावस्तु आदि की दृष्टि से महाकाव्य के वैशिष्ट्य हैं। कवि ने काव्य के प्रथम सर्ग से पूर्व ‘पूर्वकथा’ द्वारा संक्षेप में इस रचना का प्रयोजन बताया है कि इस काव्य में आत्मचरित वर्णित करने को उद्यत हुआ हूँ। प्रथम सर्ग से ही कवि जीवन के कुछ कटु अनुभवों का वर्णन करता है। अपने-पराये की कटु अनुभूतियों का वर्णन करता हुआ वह कहता है स्वजनैरपमानितः क्वचित्परकीयैश्च समाहतोऽन्यतः। स्वपरेतिपदद्वयं गतं पदवाच्यार्थविहीनतां शनैः।। इसके अतिरिक्त कवि ने अपने जर्मनी आदि देशों के भ्रमण के अनुभवों को उपन्यस्त किया है। प्रकृति-वर्णन को भी कवि ने पर्याप्त स्थान दिया है। वर्णनानुसार छ: सर्गों के नाम है- शिशिरर्तुप्रभातम्, वसन्तारम्भः, वसन्तपूर्वाणः, निदाघमध्याहूनः, वर्षतुः तथा शरदपराहणः। हनुमतस्तोत्रम् - १६६० में प्रकाशित यह लघुकाव्य शिखरिणी छन्द में निबद्ध एक भक्तिपूर्ण काव्य है। कवि अनेक प्रकार से हनुमान के विविध रूपों का वर्णन करता है, उनकी स्तुति करता है, और उनके प्रति अपना समर्पण-भाव व्यक्त करता है। ‘हनूमन भक्तानामभयद महावीर वरद” इस चतुर्थ चरण के साथ कवि ने कई श्लोक निबद्ध किए हैं।

श्यामानन्द झा

ये जे. बी. एम. संस्कृत कालेज, बम्बई में प्रधानाध्यापक रहे। इनके दो लघुकाव्य प्राप्त होते हैं। मधुवीथी-यह समस्त पद्यकाव्य सुन्दर अन्योक्तियों का सङ्कलन है। अन्योक्तियों में भाव एवं भाषा की दृष्टि से पण्डितराज जगन्नाथ की कविता का अनुकरण है। कविता को सम्बोधित एक उदाहरण द्रष्टव्य है– कोकिलतां काकोले वालेये चेत्तुरङ्गतां कोले। मदकलतां किल कलयति सकलः कविते ! न ते कालः।। वायु को सम्बोधित एक अन्य अन्योक्ति द्रष्टव्य है दित्सति जलद-वदान्यश्चातकवृद्धोऽभिशंसते वृद्धिम्। मध्ये समीर ! किं रे प्रत्यूहं प्रत्यहं तनुषे ।। लघुकाव्य काव्य में १८८ पद्य हैं, आर्या छन्द का प्रयोग सर्वाधिक है। कर्णिका-इस पद्यकाव्य में १४२ पद्य हैं। इस काव्य में भी प्रकृति के विविध उपादानों को लेकर कवि ने सुन्दर अन्योक्तियों की रचना की है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है काकस्य शुष्कं कलमाकलय्य किं कोकिल ! त्वं किल हा जहास। मातापि तत्याज यदा तदानी मपालयत्त्वामयमेक एव ।। सर्वत्र भाषा में माधुर्य है, शैली में सौकुमार्य है। ‘श्यामानन्दरचनावलिः’ (डॉ. किशोरनाथ झा द्वारा सम्पादित) पठनीय है।

पी.सी. वासुदेवन इलयत

केरल की संस्कृत-काव्य-परम्परा की अन्यतम कड़ी हैं। इनका ‘भक्तितरङ्गिणी’ काव्य, जिसे कवि ने ‘लघुकाव्यसमुच्चयः’ नाम दिया है, केरल संस्कृत अकादमी, त्रिचूर से १९८७ में प्रकाशित हुआ है। इसमें विभिन्न अवसरों पर कवि द्वारा लिखे गए भक्तिमय पद्यों का सङ्कलन है। अनेक स्थलों पर पद्य गीतात्मक हैं तथा भक्ति की तन्मयता में वृद्धि करने के कारण सङ्गीतात्मक हैं। आरम्भ में ही कवि ने ‘गुरुवायुपुरेशसुप्रभातम्’ लिखकर स्थानीय देव की स्तुति प्रस्तुत की है। गुरुवायुपुरेश्वर पर कवि ने सुन्दर दण्डक भी लिखे हैं जिनमें प्रवाहमयी तथा स्तरीय भाषा का प्रयोग हुआ है। इक्कीस तरङ्गों में कवि ने यथास्थान भक्ति के विविध रूपों को दर्शाया है। अनेक पद्यों एवं गीतों में कृष्ण लीला के विविध प्रसङ्ग उपस्थित किये गये हैं। ‘नवनीतकृष्णस्तवः’ में कवि श्रीकृष्णभक्ति पर लिखते हुए कहता है पिच्छाञ्चलाञ्चितमणीमुकुटाभिरामं लोलालकान्तललितालिकसन्निवेशम्। चिल्लीलतामृदुविलासविशेषरम्यम् कारुण्यवर्षिनयनान्तमुपाश्रये त्वाम् ।। (मोरपंख के खण्ड से युक्त मणिमय मुकुट से सुन्दर लगने वाले, चञ्चल धुंघराले बालों से सुशोभित मस्तक प्रदेश वाले, चिल्लीलता के कोमल विलासों से विशेष सुन्दर, करुणा बरसाने वाले कटाक्ष से युक्त भगवन् कृष्ण ! मैं तुम्हारा आश्रय लेता हूँ) भक्ति के मधुर प्रसङ्गों के कारण भाषा में भी माधुर्य आ गया है। मधुरता के साथ . किया गया यह पदसंयोजन दर्शनीय है अरुणकोमलं तरुणसुन्दरं करुणयाकुलं वरुणपूजितम्। तरणितेजसं मरणमोचकं शरणमाश्रये शबरिकेश्वरम् ।। इस प्रकार ‘भक्तितरङ्गिणी भक्तिपरक पद्यों का एक सुन्दर सङ्कलन है।

निष्ठल सुब्रह्मण्य

श्री निष्ठल सुब्रह्मण्य शर्मा का जन्म १६२० ई. में हुआ था। २२६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास उनका भक्तिपूर्ण लघुकाव्य ‘चैतन्यनन्दनम्’ १९८१ ई. में कवि की मृत्यु के उपरान्त प्रकाशित हुआ। चैतन्य का अर्थ है ब्रह्म । ‘सगुणं ब्रह्म नन्दयतीति चैतन्यनन्दनम्’ कविकृत इस विग्रह से ग्रन्थ के नाम का अर्थ स्पष्ट होता है। इस काव्य में विविध देवताओं की स्तुतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। काव्य को ‘स्वर्णधारास्तुतिः’, ‘तारुण्यतटिनी’, ‘हरिरसायनम्’, “श्रीकण्ठशतकम्’, ‘श्रीशक्तिनुतिः’ आदि शीर्षकों में विभाजित किया गया है। कतिपय शीर्षकों के अन्तर्गत श्लोकसंख्या अत्यल्प है। सभी पद्य भावगर्भित, भक्तिप्लावित एवं वैराग्यजनक हैं। आरम्भ में कवि ने देवी, कुमार तथा गणेश के स्तोत्र प्रस्तुत किये हैं। ‘तारुण्यतटिनी’ में भक्तिभावानुकूल छन्द शिखरिणी का सुन्दर प्रयोग किया गया है। स्तुतियों के मध्य अनेक शब्दार्थलकारों एवं चित्रालङ्कारों का सुन्दर प्रयोग मिलता है। व्याकरणसिद्ध शब्दों का यह प्रयोग द्रष्टव्य है सुध्युपास्यः कथं चाहं भवेयं मध्वरे प्रभो। घात्रंशं च त्वमादाय संख्यावन्तं सृजाच्युत।। (हे मधुदैत्य के शत्रु प्रभो ! मैं विद्वानों द्वारा उपसनायोग्य कैसे हो सकता हूँ हे विष्णो ! आप ब्रह्मा का अंश लेकर विद्वान की सर्जना करें।) एक ओर महाभारतीय कथा पर आश्रित यह प्रयोग द्रष्टव्य है शरीरे विरटावासे पञ्चप्राणैश्च पाण्डवैः । द्रौपद्या प्रज्ञया युक्ताश्चन्त्यज्ञातवत्सरम् ।। ‘नीरजा’ शब्द का यह अलकारमय प्रयोग कितना मनोरम है मधुकरकुलशोभितनीरजा, तुजतु च सुगुणामति नीरजा। मुनिवरवरदा भुवि नीरजा, कुवलयनयना जननीरजा।। इस प्रकार अलकृत भाषा द्वारा अनेक देवी-देवताओं की भक्तिमयी स्तुतियाँ प्रस्तुत कर कवि निष्ठल ने इस लघु स्तोत्र काव्य की रचना की है।

हरिकान्त झा

‘जम्बू-कश्मीर-सुषमा-रलम्’ के रचयिता हरिकान्त झाा बिहार के मधुबनी जनपद में स्थित जनकनन्दिनी संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापक रहे हैं। अपनी जम्मू-कश्मीर प्रदेश की यात्रा को कवि ने लेखनी का विषय बनाकर उसे अमरत्व प्रदान किया है। कवि ने हिमालय की गोद में बसे जम्मू-कश्मीर प्रदेश का एक ओर तो प्राकृतिक वर्णन किया है, दूसरी ओर पौराणिक आख्यान प्रस्तुत कर उसके पुरातन स्वरूप का भी दर्शन कराया है। जम्बूतवी के रूप में इस प्रदेश की उत्पत्ति पर प्रकाश डालकर कवि ने इसके इतिहास का अन्वेषण किया है। इस काव्य में जम्बू-कश्मीर का इतिवृत्त, आकाशवाणी, महामुनिकश्यप-सङ्कल्प, जलासुर-वध, कश्मीर नामोत्पत्ति कश्मीर-सुषमा, आदि विषय १८ ‘श्री’ नामक विभाजनों में विभक्त हैं। काव्यारम्भ में कश्मीर का वर्णन करते हुए कवि कहता है ਜੋ ਕੇ लघुकाव्य जम्बू-कश्मीरघाटी तुहिनगिरितटी दिव्यचीनार-बाटी पाटीरामोदशाटी सुरनगर-नटी-सेविता भूमिलक्ष्मीः। सानन्दं नन्दयन्ती जगदिदमखिलं भूषयन्ती नगेन्द्रम तीव्रध्वान्तान्धकान्ते त्रिनयनसमरे प्राप्तशक्तिर्विभातु।। (जम्मू-कश्मीर की घाटी हिमालय की तटवर्तिनी, दिव्य चिनार वृक्षों की वाटिका वाली, गुलाबों की सुगन्धित साड़ी वाली, स्वर्ग की अप्सराओं से सेवित, भूमि की लक्ष्मीरूप है। वह इस समस्त जगत् को सानन्द हर्षित करती हुई, हिमालय को सुशोभित करती हुई, तीव्र अन्धकाररूप अन्धकासुर का नाश करने वाले शङ्कर-सम्बन्धी युद्ध में शक्ति प्राप्त कर सुशोभित हो।) छन्द एवं अलङ्कार के सौन्दर्य से युक्त हिमालय की सुषमा का यह वर्णन दर्शनीय है तुहिन-सुन्दर-सानु-सुशोभितः सुरसरिद्वरवारिविभूषितः। नभसि शम्भुतपोधवलीकृतः शिवनगो हिमवानिव शोभते।। इस प्रदेश के हिमालय पर्वत, अमरनाथ गुहा, मन्दिर, नद-नदी, नगर आदि की प्राकृतिक सुषमा के वर्णन के साथ कवि ने यहाँ के राजाओं, कवियों, विद्वानों आदि का भी पर्याप्त वर्णन किया है। और उसे कवियों की क्रीडा भूमि,मुनियों की कर्मभूमि, बुधों की विद्याभूमि, एवं नरों की रत्नभूमि कहा है। वस्तुतः कश्मीर की सुषमा का मनोरम चित्र प्रस्तुत करने वाला यह एक मनोरम काव्य है।

कालिका प्रसाद शुक्ल

श्री शुक्ल उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के निवासी तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में व्याकरण विभाग के अध्यक्ष थे। उनका ‘भास्करभावभानवः’ काव्य जिसको उन्होंने ‘सूर्यशतकम्’ नाम भी दिया है, कवि के उल्लेखानुसार विक्रम संवत्सर २०३० में पूरा हुआ। इसका प्रकाशन ‘सुधी’ गन्थमाला के चतुर्थ पुष्प के रूप में १६८३ में हुआ। कवि ने इस काव्य में सूर्योपासना को आधार मानकर सूर्य की महत्ता ख्यापित करने वाले १० श्लोकों की रचना की है। इस शतक के माध्यम से यहाँ सूर्य की उपासना की गई है। समस्त शतक शिखरिणी छन्द में रचित है। सूर्य की भक्तिपूर्वक स्तुति करता हुआ कवि कहता है तमो भिन्दन पादैरुदयगिरिगर्व विदलयन् दिशः प्राच्या वामं वदनविधुमालं पिशुनयन् । द्विजालीनामय कमलदलगन्धं सफलयन धरां धाम्ना सिञ्चन् विमलकरभानुर्विजयते।। (अपनी किरणों से अन्धकार को नष्ट करता हुआ, उदयाचल के गर्व को खण्डित करता हुआ, पूर्वदिशा के सुन्दर मुखचन्द्र से युक्त मस्तक को सूचित करता हुआ, २२८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास द्विजसमूहों के अर्ध्य और कमल दलों की गन्ध को सफल बनाता हुआ, धरती को तेज से सींचता हुआ निर्मल किरणों वाला सूर्य सर्वोत्कृष्ट है।) कवि ने सालङ्कार सुन्दर शैली का प्रयोग करते हुए एक ओर सूर्य का मनोरम प्राकृतिक वर्णन किया है तो दूसरी और असकी महिमा और गरिमा का गान किया है। सूर्य की पौराणिक महत्ता पर भी प्रकाश डाला गया है। वस्तुतः सूर्य को कवि ने व्याधियों का नाशक, मुक्ति का दायक तथा पापों का शामक माना है। अन्त में कवि कहता है कि हे सूर्य ! इस शतक में तुम्हारे अनुपम गुणों का कीर्तन है। यह शुद्ध भक्ति से लिखा गया है। यह शतक इस प्रकार भगवान् सूर्य को समर्पित एक स्तोत्र काव्य है। #### अखण्डानन्द सरस्वती
पूर्वाश्रम के शान्तनुबिहारी द्विवेदी ब्रह्मलीन स्वामी अखण्डानन्द जी महाराज श्रीमद्भागवत के अन्यतम प्रवक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं। उनका हनुमत्स्तोत्र आनन्दकानन प्रेस, वाराणसी से १६८८ में द्वितीय बार प्रकाश में आया। कहते हैं कि स्वामी जी ने हनुमान जी के विग्रह में साक्षात् परा विद्या का दर्शन किया। पं. विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में यह स्तोत्र साधना की दृष्टि से तो सिद्ध है ही, काव्य योजना की दृष्टि से भी अपूर्व है। जब वे मारुति की आरती करने की बात सोचते हैं तो वे देह को दीया, जीवन को तेल, प्राणों की बाती, जीवात्मा को ज्योति, वाणी मात्र को घण्टे की ध्वनि और चपलता मात्र को नृत्य के रूप में परिवर्तित करके स्व को ही आरती बना देते हैं। देहः पात्रं जीवनं स्नेहधारा वर्तिः प्राणा ज्योतिरात्मैष जीवः। 10 भिवाचो ध्वानं चापलं नृत्यमित्थं स्वारार्तिक्यं मारुतेश्चिन्तयेऽहम् ।। कहते हैं कि “इससे ऊंची कविता और क्या होगी ?” वस्तुतः, पं. रामावतार शर्मा द्वारा रचित ‘मारुतिशतक’ के बाद आधुनिक संस्कृत के स्तोत्र साहित्य को गौरवान्वित करने वाली यह दूसरी कृति है। इसका प्रथम संस्करण वि.सं. २०११ में कानपुर से प्रकाशित हुआ था।

विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ‘विनय’

(जन्म १६५६ ई.) मिश्र जी पहले सागर विश्वविद्यालय, सागर और अब विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में संस्कृत-प्राध्यापक हैं। उनकी स्फुटरूप में रचित अनेक रचनाएँ ‘दूर्वा’, ‘सागरिका’ आदि संस्कृत-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनका एक कविता-संग्रह ‘सारस्वत-समुन्मेषः’ नाम से १६८५ ई. में देववाणी परिषद दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में रचनाओं का विभाजन गीतवल्लरी’ और ‘श्लोकमञ्जरी’ इन दो भागों में किया गया है। गीतवल्लरी में तो कवि के चौदह गीत सङ्कलित हैं। श्लोकमञ्जरी में आरम्भ में कवि ने कुछ देवताओं की स्तुति में पद्य लिने हैं। कवि ने एक ओर भाव और दूसरी और प्रकृति, दोनों को संवेदना के स्तर पर जोड़ा है। ‘पिकपञ्चदशी’ में पन्द्रह मन्दाक्रान्ताओं में विरहिणी गोपी द्वारा कोकिल के प्रति उद्गार व्यक्त किये गए हैं। कवि व्रज की होली आदि का वर्णन तो करता ही है, साथ ही व्रज के २२६ लघुकाव्य | सवैया घनाक्षरी आदि छन्दों का प्रयोग मनोरम रीति से करता है, जैसे शरद्वर्णन-परक यह सवैया छन्द का प्रयोग कितना मनोरम है ! यमुनावटमञ्जुनिकुञ्जघने घनसाररसावलिते विपिने विपिने नवनीरजगन्धयुते युतपङ्कजकोषमिलिन्दजने। जनमानस-मानिनिमानमुदे मुदिताधरपानपुटे कमने । कमने ननु रासरसे सुविभाति शरत् सखि ! नैशसरत्पवने।। (यमुना के तट पर स्थित वट के घने कुज्ज में, कपूर के रस से युक्त, नये कमलों की सुगन्ध से व्याप्त, कमल के कोष में बन्द भ्रमरसमूहों वाले वन में लोगों के मन एवं मानिनियों के मान को खोलने वाले, हर्षित होकर अधरसम्पुट के पान से युक्त कामदेव के होने पर कमनीय रासरस में एवं रात्रिकालीन बहते हुए पवन में यह शरद ऋतु सुशोभित हो रही है। माना यहाँ यमक एवं अन्त्यानुप्रास की छटा हलादक है। कवि ने संस्कृत में दोहा छन्द का भी प्रयोग किया है। आर्या छन्द में सारिकाविषयिणी यह अन्योक्ति कितनी हृद्य है श्यामे कटूक्तिकुशले वामे तव नाम सारिकेति वृथा। भ्रमसि पलाशपलाशे निःसारे सारकामनया।। कविवर मिश्र की कविताओं में आधुनिक समाज पर तीखे व्यङ्ग्य भी प्राप्त होते हैं। सचमुच ये आधुनिक संस्कृत काव्य के प्रतिनिधि-कवि हैं।

गुरुप्रसन्न भट्टाचार्य

महोपाध्याय श्री गुरुप्रसन्न भट्टाचार्य, वेदान्तशास्त्री द्वारा रचित ‘माथुरम् लघुकाव्य १६३३ ई. में प्रकाशित हुआ। इसके पूर्वार्ध और उत्तरार्थ दो भाग हैं। यह कष्ण की मथुरा भक्ति को विषय बनाकर लिखा गया काव्य है। समस्त काव्य में मन्दाक्रान्ता वृत्त है। कृष्ण के व्रज छोड़कर मथुरा चले जाने पर गोपियों का यह कथन द्रष्टव्य है लब्ध्वा प्रेम्णा भुवनसुभगं दुर्लभं वासुदेवं गर्वोऽस्माकं किमु परिभवोदकं एवाध चूर्णः । नो चेत् सोऽयं प्रणयरसिको गोपिकावल्लभोऽपि त्यक्त्वा गोपीः क्षणमपि कथं निष्ठुरोऽन्यत्र वास्ते।। १२० पद्यों के इस काव्य में राधा को कृष्ण की शक्ति माना गया है और दार्शनिक भावभूमि पर कृष्णभक्ति की व्याख्या हुई है।

हरिपददत्त सांख्यवेदान्ततीर्थ

श्री हरिपददत्त पश्चिमी बंगाल के निवासी थे। उनकी लघुकाव्यकृति ‘कवितावली’ १६७० ई. में प्रकाशित हुई। यह पाँच भागों में विभाजित है - २३० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ऊर्मिः , वर्षाशतकम्, लिपिः, कूहा तथा सम्पुटम् । कवि आरम्भ में ही कह देता है कि उसके भाव भी नवीन हैं रीति भी नवीन है। ‘ऊर्मिः ’ अंश से एक पद्य उद्धृत है - विजने वसतो मनसि मे भाति गतं किमिव किमिव वा लब्धम् । प्राप्तुं किमिव चाद्यावशिष्यते स्थितं किमपि जीविते शून्यम् ।। (निर्जन स्थान में रहते हुए मेरे मन में यह प्रतीति होती है कि हमने क्या खोया और क्या पाया, और अब क्या प्राप्त करना शेष रह गया है। अब जीवन में कुछ शून्य बचा है।)

दीपक घोष

‘राजनीतिलीलाशताधिकम्’ के रचयिता दीपक घोष पश्चिम बङ्गाल के सुकवि हैं। आपका यह काव्य पहले ‘अर्वाचीनसंस्कृतम्’ दिल्ली से प्रकाशित हुआ, बाद में स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में। आधुनिक युग में प्रचलित राजनीति के कलुषित रूप को कवि ने तीखेपन के साथ उपन्यस्त किया है। कवि आरम्भ से ही अमित कीर्ति और अनन्त शक्ति वाली राजनीति को प्रणाम करता है - भो राजनीते ! प्रणमाम्यहं त्वां पुनः पुनस्ते पदयोः प्रणामः। अनन्तकीर्तीरमिताश्च शक्तीः शक्नोमि मातुं न तव क्षमस्व।। यह राजनीति अत्यन्त विचित्र है। कवि राजनीति पर तीखे व्यङ्ग्य कसता है और उसकी घोर स्वार्थसाधनता को प्रकट करता है। राजनीति अपनों के अतिरिक्त किसी को नहीं देखती है। राजनीति सर्वलाभकर व्यवसाय है। यही कारण है कि कलाकार, शिल्पी, अभिनेता, अध्यापक, सैनिक सब अपने-अपने काम को छोड़कर राजनीति के सेवन की ही इच्छा रखते हैं और सब निर्वाचित होने की इच्छा से राजनीति का चरण चाटन करते हैं एवं तवाङ्ग्रिस्फुटपङ्कजामृत निष्यन्दबिन्दून परिलेढुकामाः। एकैकशो देशविशिष्टशिष्टा निर्वाचनप्रार्थितया समेताः। इस प्रकार आधुनिक राजनीति के कुत्सित रूप पर अधिक्षेप करने वाली कवि की यह कविता आगे और भी अधिक वृद्धि को प्राप्त हो रही है। विलाप-पञ्चिका’ नाम से कवि का एक और काव्य १८८६ में प्रकाश में आया है। २३१ लघुकाव्य

दिगम्बर-महापात्र

श्री महापात्र उत्कल प्रदेश के प्रतिष्ठित कवि हैं। उनके ‘सुरेन्द्रचरितम्’ महाकाव्य, रारुचिरम्’ बालकाव्य, ‘मानससन्देशम्’ सन्देशकाव्य तथा ‘व्यस्तरागम्’ प्रकीर्णकाव्य हैं। रङ्गरुचिरम् में बालमनोविज्ञान पर आश्रित ४४ कविताएँ हैं। मानससन्देशम् में कवि का मानसहंस उत्कल प्रदेश के पुरी क्षेत्र का दर्शन करने के पश्चात् कोर्णाक, चिलिका, बिहार, आगरा, दिल्ली, श्रीनगर, कैलाशपर्वत आदि स्थानों के दृश्यों को देखता हुआ मानसरोवर प्रस्थान करता है। यहाँ दो हंसों का कथोपकथन अत्यन्त मनोरम है। काव्य में प्रकृति वर्णन अत्यन्त मनोहारी है। ‘ऋतुचक्रम्’ एवं ‘भवते रोचते यथा’ ये दो इनके अन्य लघुकाव्य हैं। कवि का ‘व्यस्तरागम्’ लघुकाव्य १Et0 में प्रकाशित हुआ। कवि ने इधर-उधर फैली हुई अपनी रागलताप्लुत कविताओं को संगृहीत कर इस काव्य में ग्रथित किया है। अतः इसका नाम ‘व्यस्तरागम्’ रखा गया है। काव्य में सत्य उल्लास, शिव उल्लास, सुन्दर उल्लास नाम से तीन उल्लास हैं। शेष भाग में प्रकीर्ण श्लोक हैं। इस प्रकार ६२ शीर्षकों में निबद्ध यह काव्य विषयवैविध्य से भरा है। काव्य श्रीजगन्नाथाष्टक से आरम्भ होता है। जीवन की विविध संवेदनाओं को प्रेम और वैराग्य के विविध प्रसङ्गों को, अनेक सामाजिक समस्याओं और प्रकृति के विविध चित्रों को कवि ने स्थान दिया है। कहीं-कहीं अन्योक्ति के भी दर्शन होते हैं। प्रहेलिकाओं और उक्ति-प्रत्युक्तियों के भी प्रयोग प्राप्त होते हैं। कहीं-कहीं गीत रूप छन्दों का प्रयोग है। अन्य अनेक छन्दों का अनेकानेक भावों के साथ सामञ्जस्य मिलता है। शिखरिणी छन्द में ‘पदे मे वेपेते’ शीर्षक के अन्तर्गत यह पद्य दर्शनीय है महाघोरेऽपारे भवजलनिधी सङ्कटमये कथं पारं यायामृत उडुपसाह्याद् वद सखे। परं दूरे दृष्ट्वाऽशयपथमसीमं त्वहरहः पदे मे वेपेते पुनरपि तरामीह तदहो।। (अपार महाघोर सङ्कटों से भरे संसार रूपी सागर में हे मित्र ! छोटी सी नाव के सहारे के बिना मैं कैसे पार जाऊँ यह बताओ। किन्तु दिन-रात अपने असीम आशय-पथ को दूर पर देखकर मेरे दोनों पैर काँप रहे हैं। फिर भी आश्चर्य है कि मैं तैर रहा हूँ।)

पुल्लेल रामचन्द्रुडु

ये उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद में संस्कृत के आचार्य रहे। रामचन्द्रुडु एक प्रौढ संस्कृत कवि हैं। इनका कृतित्व १EE३ में ‘श्रीरामचन्द्रलघुकाव्य-संग्रह’, के रूप में सामने आया है। इस संग्रह में १६ शीर्षकों में विविध विषयों के मुक्तक श्लोक संगृहीत हैं। कवि ने इन कविताओं के माध्यम से आधुनिक जीवन की संवेदनाओं, विषमताओं, संत्रासों और विसंगतियों को रेखाकित किया है। कई स्थानों पर कवि ने व्यङ्ग्य और अधिक्षेप का आश्रय लिया है, तो कहीं अन्योक्ति का, कहीं पैरोडी के माध्यम २३२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास से अपनी बात कही है तो कहीं उपदेशात्मक सूक्ति के माध्यम से। पैरोडी का प्रस्तुत प्रयोग द्रष्टव्य है - नाहं जानामि पाठ्यांशान् नाहं जानामि पाठनम्। जानामि त्वधिकारस्थान् नित्यं पादाभिवन्दनात्।। लोगों की मोहमयी प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए कवि कहता है - धाता पूर्वमशेषभूमिवलयं निर्माय चास्मत्कृते स्वादिष्ठानतया ससर्ज विविधान् जन्तून नरादीनिमान् । हा हा हन्त ! करालकालविकृतिः किं वाद्य ते वर्ण्यतां . __स्वेयं भूमिरिति ब्रुवन्नधिकृति प्रेप्सत्ययं श्वापदः।। (पहले विधाता ने समस्त भूमण्डल को हमारे लिए बनाकर स्वादिष्ट अन्न होने के कारण इन विविध जन्तुओं मनुष्यों आदि को बनाया। किन्तु दुःख की बात है ! इस कराल काल के विकार का क्या वर्णन किया जाय । यह भूमि हमारी है ऐसा कहता हुआ यह पशु इस पर अपना अधिकार जताना चाह रहा है।) 1 कवि ने संस्कृतभाषा, भारतदेश, वसन्तागमन, कविकुलकोकिल, आधुनिक काव्यलक्षण जेसे विषयों पर लेखनी चलाई है तथा अद्वैत वेदान्त जैसे दार्शनिक विषयों पर भी पद्य लिखे हैं। कवि में सुभाषित लिखने की प्रवृत्ति बहुत है जिसमें जीवन के अनेक रहस्यों का उद्घाटन होता है। रामचन्दुडु के काव्यसंग्रह में अनेक अंग्रेजी शब्दों का संस्कृतीकरण किया गया है तथा कुछ नये संस्कृत-शब्द भी गढ़े गए हैं। भाषा में प्रौढ़ता, प्राञ्जलता एवं व्याकरणनियमबद्धता के सर्वत्र दर्शन होते हैं। इस संग्रह से पूर्व कवि की कविताएँ ‘स्तुतिमञ्जरी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थीं। ये दोनों संग्रह कवि के दीर्घकालीन एवं अनवरत कृतित्व का दर्शन कराते हैं।

रामचन्द्र (हरिशरण) शाण्डिल्य

इनका जन्म १६२७ ई. में पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में हुआ था। देश-विभाजन के पश्चात् इनका परिवार राजस्थान आ गया। इनकी चार लघुकाव्य-कृतियाँ उपलब्ध हैं। १E८८ में प्रकाशित “यात्राप्रसङ्गीयम’ दो खण्डों का खण्डकाव्य है। पूर्वार्ध में कवि के यात्राप्रसङ्ग में प्रकृति का रोचक वर्णन, एक युवती को बचाना, स्वप्नावस्था में उसके साथ प्रेमालाप, शृङ्गाररस का समावेश और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा माता-पिता के परित्याग से स्वप्नभग का वर्णन है। उत्तरार्ध में संसार की असारता के वर्णन से शान्तरस की प्रतिष्ठापना है तथा शृगार और वैराग्य के मध्य लोकनीति का प्रदर्शन करते हुए दार्शनिक प्रबोध द्वारा मोक्ष का उपाय वर्णित है। कवि शाण्डिल्य का दूसरा लघुकाव्य ‘ऋतुवर्णनम्’ है, जिसमें छः ऋतुओं का ललित वर्णन है। यद्यपि यह शृङ्गाररस से परिप्लुत काव्य है, तथापि भूगोल, खगोल, आयुर्वेद, साघुकाव्य २३३ ज्योतिष आदि शास्त्रों से ऋतुओं का सम्बन्ध स्थापित कर उसे लोकहितकारक रूप भी दिया गया है। उनका एक अन्य काव्य ‘स्तोत्रावलिः’ है, जिसमें भारतमाता की वन्दनासहित विविध देवों की स्तुति में सोलह स्तोत्र हैं। मेघदूत के अनुकरण पर लिखा गया ‘कामदूतम्’ शाण्डिल्यजी का सर्वोत्तम काव्य है। विप्रलम्भ शृङ्गार पर आश्रित रहने के साथ-साथ यह राष्ट्रीय भावना से भरा है, और भारत के विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान में बसे सिन्धियों की व्यथाओं का चित्रण करता है। पाकिस्तान में रह रही एक प्रेमिका भारत में विद्यमान अपने प्रेमी के पास कामदेव द्वारा अपना विरह-सन्देश भेजती है। और फिर प्रेमी का उत्तर भी उसे प्राप्त होता है। काम की यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले सड़सठ नगरों का वर्णन कवि ने किया है। मेघ के ही अनुकरण पर इसमें पूर्वकाम एवं उत्तरकाम दो भाग हैं। प्रेम के प्रसङ्ग में राष्ट्रीय सन्दर्भ का विनियोजन होने के कारण यह एक सुन्दर काव्य है।

वनेश्वर पाठक

सेण्ट जेवियर्स कालेज, रांची के संस्कृत प्राध्यापक वनेश्वर पाठक ने अन्य लघुकाव्यों के अतिरिक्त ‘प्लवङ्गदूतम्’ नामक दूतकाव्य लिखा है, जिसका प्रकाशन १९७५ ई. में हुआ। अन्य दूतकाव्यों की भाँति इसमें भी दो भाग हैं - पूर्वनिःश्वास तथा उत्तरनिःश्वास। एक भारतीय जन नौकरी करने के लिए अपनी पत्नी के साथ पेशावर (सम्प्रति पाकिस्तान में स्थित) जाता है। वहाँ बस जाने के बाद किसी काम से जब वह काशी आता है तो १६७१ ई. के दिसम्बर मास में भारत के साथ पाकिस्तान की लड़ाई छिड़ जाती है और वह प्रवासी पाकिस्तान लौटने में असमर्थ होकर वहीं पत्नी-वियोग में दिन काटता हुआ एक दिन विश्वनाथ-मन्दिर पहुँचता है और वहाँ भक्तों के साथ बैठकर भगवान् राम की कथा सुनने लगता है। वहीं उसके सामने एक भोलाभाला प्लवड्ग (वानर) दिखाई पड़ता है जिसका वर्णन कवि इस प्रकार करता है - श्रुत्वा सीतां प्रति हनुमता वाचिकं प्राप्यमाणं श्रीरामेण व्यथितमनसा सोऽतिचिन्तानिमग्नः । दृष्ट्वा चाग्ने कमपि सहसाऽऽगत्य तत्रोपविष्टं शान्तं सौम्यं परमसरलं हर्षमाप प्लवङ्गम् ।। उस प्लवङ्ग से वह अपनी प्रिया के पास सन्देश पहुँचाने की प्रार्थना करता है। पहले वह काशी से पेशावर के समीपवर्ती जावरोद (जावूद) नामक गाँव तक के गन्तव्य मार्ग का वर्णन करता है। उसे काशी से प्रयाग, आगरा, मथुरा, दिल्ली, अम्बाला, लुधियाना, भाखरा-बन्ध, जालन्धर, अमृतसर, लाहौर, रावलपिण्डी तथा पेशावर होते हुए जाबूद पहुँचना है। द्वितीय निःश्वास में प्रवासी अपनी पत्नी के रूप उसकी मनोदशा का मार्मिक वर्णन करता है तथा सन्देश प्रेषित करता है। अन्त में विरहिणी पत्नी से उसका भारत में ही मिलन होता है। पाठक ने कुमारसम्भव और शिवपुराण के आधार पर ‘तवास्मि दासः’ तथा हास्य-व्यङ्ग्य परक खण्डकाव्य ‘हीरोचरितम्’ भी लिखा है। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी

व्रज मण्डल के संस्कृत-कवियों में श्री चतुर्वेदी अग्रगण्य हैं। वे मथुरा जनपद के अन्तर्गत ‘ओरियण्टल इन्स्टीट्यूट ऑफ फिलासफी’ में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। संस्कृत-पत्रिका ‘व्रजगन्धा’ के सम्पादन से भी आपको सुयश मिला। चतुर्वेदीजी का ‘श्रीद्वारिकाधीशमहाकाव्यम्’ प्रसिद्ध है। व्रजकवि के रूप में अपने लघुकाव्य ‘श्रीव्रजस्तवमालिका’ में उन्होंने व्रजभूमि की महिमा का बखान किया है। ‘नन्दोत्सवः’ में श्रीश्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात् नन्द के घर में होने वाले आनन्द का वर्णन है। उनका अन्य प्रसिद्ध लघुकाव्य है-भारतस्तवमालिका’ जिसमें अनेक देशभक्ति के पद्य एवं गीत निबद्ध हैं। हमारे राष्ट्रीय एवं सामाजिक जीवन से सम्बद्ध कुछ विषयों पर भी कवि ने लेखनी चलाई है, जैसे प्रदूषण समस्या, दाय (यौत) प्रथा, बीससूत्रीय कार्यक्रम आदि। काव्य में राष्ट्रभक्ति की धारा अविरल रूप से प्रवाहित है। ‘भारतराष्ट्रगीतिः’ में व्रजक्षेत्र का वर्णन करते हुए कवि कहता है यस्य वृन्दावनं कण्ठहारप्रभ माथुरं मण्डलं वैजयन्तीनिभम्। शैलगोवर्धनो हारकं मौक्तिकं भारतं भारतं नौमि भावप्रदम्।। कवि ने अपने काल के दो प्रधानमन्त्रियों के चरितों से अभिभूत होकर दो लघुकाव्य लिखे - “श्रीमती-इन्दिरागान्धीकाव्यम्’ तथा ‘श्रीराजीवगान्धीकाव्यम् । प्रथम काव्य में इन्दिरा गान्धी के शासनकाल की कुछ घटनाओं एवं प्रसङ्गों को सङ्कलित कर उनका प्रशस्तिगान किया गया है। द्वितीय काव्य में नेहरू वंश के ऐतिह्य का वर्णन करता हुआ कवि राजीव गान्धी के प्रधानमंत्री बनने की परिस्थितियों का तथा तत्कालीन समस्याओं का ब्यौरा देता है। कवि चतुर्वेदी ने प्रायः सरल छन्दों का प्रयोग किया है। उनके अनेक पद्यों में ब्रजभाषा के छन्दों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। चतुर्वेदीजी एक सरल, सरस एवं सहज संस्कृत-कवि हैं।