विगत शताब्दियों के संस्कृत साहित्य के इतिहास का सम्यक् सिंहावलोकन किया जाय तो हम पायेंगे कि संस्कृत-काव्य अपने समृद्धि काल में जिस उच्चतम शिखर तक पहुँचा था, परवर्ती काल में वह क्षीणतर होता गया, परन्तु रचना की धारा अजस्र गति से प्रवाहित होती रही। अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम भाग को संस्कृत-काव्य रचना का पुनर्जागरण काल या नेवाभ्युदयकाल कहा जा सकता है। इस काल में संस्कृत-कविता नये-नये विषयों और रूपों में प्रस्तुत होने लगी थी। यूरोप तथा अन्य पश्चिमी देशों में संस्कृत-साहित्य का प्रसार भी तीव्रता से होने लगा था। अन्य विधाओं के अतिरिक्त संस्कृत में विविध लघु विषयों पर लघुकथा लिखने की प्रवृत्ति प्रवर्तमान थी। भारत में अंग्रेज़ी शासन की सत्ता चल रही थी। संस्कृत लघुकाव्य में अन्य पूर्वस्थापित विषयों के अतिरिक्त अंग्रेज़ सम्राटों और शासकों के चरित एवं राज्यसम्बन्धी वृत्त भी प्राप्त होते हैं और प्रशस्ति काव्य का यह नया रूप सामने आता है। काव्य-जगत् में नई-नई उद्भावनाओं का जन्म इस युग में होता रहा। अठारहवीं शताब्दी में केरल के कवि राम पाणिवाद तथा उत्तर प्रदेश के विश्वेश्वर पाण्डेय ने प्रभूत रचनात्मक साहित्य प्रदान किया। पूर्व से लेकर पश्चिम तक तथा उत्तर से दक्षिण तक इस काल में अनेक संस्कृत-कवि हुए, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से अनेक लघुकाव्यों की सर्जना कर संस्कृत-साहित्य की श्रीवृद्धि की । यथासम्भव काल क्रमानुसार उन्नीसवीं शताब्दी१३४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास के लघुकाव्यकारों के कृतित्व का विवरण यहाँ प्रस्तुत है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक चरण के कवियों में सर्वप्रथम श्रीमच्चाटु नारायण इलयत (१७६५-१८४३) का नाम लिया जा सकता है, जो केरल में जन्मे कवि हैं। इन्होंने ‘रामचरितम्’ नामक लघुकाव्य लिखा था, जिसमें बालकों के लिए उपयोगी यमक अलङ्कार का निबन्धन है। प्रथम श्लोक में ही यमक का प्रयोग किया है श्रीरामचरितं चित्रं वक्ष्ये संक्षिप्य सादरम्। सन्तु सन्तः प्रसन्ना मे सनामेयमनोमला।। इन्होंने ‘धान्यमुखालयेशसार्धशतकम्’ नामक एक भक्तिप्रधान काव्य भी लिखा है। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण के दूसरे प्रमुख कवि हैं श्री पुन्नश्शेरि श्रीधरन् नम्बी (१७७४-१८३१), जिन्होंने ‘विक्रमादित्यचरितम्’ नामक पाँच सर्गों का काव्य लिखा, जिसमें उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य का वर्णन है। इनका दूसरा काव्य है ‘नीलकण्ठसन्देशः’ जो मेघदूत के अनुकरण पर लिखा हुआ दूतकाव्य है जिसमें नायक स्वयं कवि है जो भारतपुल्ला के उत्तर में कामाकुल अवस्था में रहता हुआ एक दिन नीलकण्ठ को देखता है और उसे दूत बनाकर प्रियतमा के पास भेजता है। इसका आरम्भ भी मेघदूत की भाँति होता है-‘कश्चित् कान्तो विरहविधुरः स्वाश्रमे निस्सहायः। इसी काल में कवि वसुप्रहराज (१७६०-१८६०) ने ‘हंसदूतम्’ काव्य लिखा, जिसमें हंस को प्रणय दूत बनाकर भेजा गया है। कालिदासीय मेघदूत के अनुकरण पर कुट्मत्त्तु कुंज्जुनिन कुरुप (१८१३-१८८५) ने 1/‘कपोतसन्देशः’ काव्य लिखा, जिसमें कबूतर को सन्देशवाहक बनाया गया है। ‘हंससन्देशः’ नामक काव्य तीन पृथक् कवियों द्वारा पृथक् रचे हुए प्राप्त होते हैं। श्रीमती त्रिवेणी (१८१७-१८८८) द्वारा रचे हुए दो दूतकाव्य प्राप्त होते हैं- ‘शुकसन्देशः’ एवं ‘भृगसन्देशः’। १८२० ई. के लगभग रचे गए श्री गङ्गाधर शास्त्री मंगरुलकर के तीन श्रृंगार प्रधान काव्य प्राप्त होते हैं- “विलासगुच्छा, ‘भामाविलासः’ तथा ‘अपराधमार्जनम् । उन्नीसवीं शताब्दी में काव्यों की विविध विधायें सामने आने लगी। इलत्तूर राम स्वामी (१८२४-१६०७) ने ‘अन्यापदेशद्विशती’ काव्य लिखा, जिसमें अन्योक्तिपरक दो सौ पद्य हैं। यह अन्यापदेश-काव्य का सुन्दर उदाहरण है। मुडम्बीस वेंकटराम नरसिंहाचार्य (१८४२-१६२८) ने नीतिपरक काव्य ‘नीतिरहस्स्यम्’ वीररसमय काव्य ‘युद्धप्रोत्साहनम् तथा सामान्य काव्य ‘दैवोपालम्भः’ लिखे। इसी काल के कवि शंकरलाल माहेश्वर के दो काव्य ‘योगवती भाग्योदयम्’ तथा ‘मेघप्रार्थना’ प्राप्त होते हैं। हरिवल्लभ शर्मा (१८४८) का ‘मुक्तकसूक्तानि’ सूक्तिपरक मुक्तक काव्य है। दूतकाव्यों की परम्परा में कृष्णनाथ शर्मा न्यायपञ्चानन भट्टाचार्य (१८३०-१६००) ने १८४५ ई. ‘वातदूतम्’ काव्य की रचना की, जिसमें वायु को दूत बनाकर प्रेषित किया गया है। मेघदूत के अनुकरण पर कृष्णनाथ भट्टाचार्य द्वारा लिखे हुए, सौ मन्दाक्रान्ता वृत्तों के ‘वातदूतम्’ काव्य की विशेषता यह है कि इसमें पतिवियोग से व्याकुल सीता वासन्ती वायु द्वारा अपना विरह-सन्देश राम के पास भेजती है। राम से लघुकाव्य अपनी व्यथा बताती हुई सीता कहती है : सा सिञ्चन्ती नयनसलिलैर्बाहुमूलं कदाचित त्वां पश्यन्ती नखरलिखितं कर्हिचिद् भूमिपृष्ठे। जातं वसं खलसद इवादृष्टिदोषं लपन्ती दुःस्था कालं नयति रजसि व्यालुठन्ती क्वचिच्च ।। दुःखी वह सीता कभी अपने आँसुओं से अपने बाहुमूल को भिगोती हुई, कभी धरती के तल पर नाखूनों द्वारा चित्रित तुम्हें देखती हुई, उत्पन्न हुए वत्स से बिना दृष्टिदोष के बातचीत करती हुई और कहीं धूल में लेटती हुई समय बिताती है। इसी क्रम में सुब्रह्मण्य सूरि (१८५०-१६१३) के ‘बुद्धिसन्देशः’ में बुद्धि द्वारा सन्देश भेजा गया है। चिन्तामणि सहस्रबुद्धे का ‘काकदूतम्’, रङ्गनाथाचार्य का ‘शुकसन्देशः’ पञ्चानन तर्करन का ‘प्राणदूतम्’, अजितनाथ न्यायरत्न का ‘बकदूतम्’, प्रमथनाथ तर्कभूषण का ‘कोकिलदूतम्’ कोच. नरसिंहाचार्य का ‘पिकसन्देशः आदि दूतकाव्य इस युग में प्रसिद्ध हुए। मेघदूत के अनुकरण पर लिखे गए दूतकाव्य कहीं-कहीं व्यंग्यकाव्य के रूप में प्रस्तुत हुए हैं, जैसे चिन्तामणि रामचन्द्र सहस्रबुद्धे का ‘काकदूतम्’, के.वी. कृष्णमूर्ति का ‘शुकदूतम्’, तथा बटुकनाथ शर्मा का ‘बल्लवदूतम्’ इसी कोटि के काव्य हैं। इन्हें ‘अनुकरणमूलक व्यंग्यकाव्य’ कहा जा सकता है। सर्वमंगलेश्वर शास्त्री (१७५६-१८३६) ने अनेक हास्यव्यङ्ग्यपूर्ण कविताएँ लिखी हैं। वासुदेव आत्माराम लाटकर का ‘अर्धखरार्भक’, पाटिवीमूर कृष्णकवि का ‘कलिविलासमणिदर्पण’, श्रीनिवास दीक्षित का ‘कलिकष्टकोद्धार, पुन्नश्शेरि नीलकण्ठ शर्मा का ‘सात्त्विकस्वप्नः’, आर.वी. कृष्णमाचार्य का ‘वायसवैशसम, के.सी. राजगोपालाचार्य का ‘कांकः’, मुडुम्बी वेंकटराम-नरसिंहाचार्य का ‘खलावलेहनम् आदि सामाजिक व्यङ्ग्यपरक काव्य हैं। कहीं-कहीं स्तोत्रों में भी कवियों ने व्यङ्ग्य का सहारा लिया है, जैसे ब्रह्मतन्त्र परकाल स्वामी का ‘चपेटिकाहस्तिस्तुति’, शंकर-लाल माहेश्वर का ‘भ्रान्तिभयभञ्जनम्’, कुट्टमत्रु चेरिय रामकुरुप का ‘सर्वगरलप्रमोचनस्तोत्र, कृष्णभाऊ शास्त्री धुले का ‘वाचकस्य प्रतिस्तवः’, कृष्णचन्द्रदास का ‘बालिश-भञ्जनस्तोत्रम्’ आदि । इस काल में कुछ अनुकरणमूलक लहरीकाव्य भी लिखे गए, जैसे पण्डितराज जगन्नाथ की गङ्गालहरी के अनुकरण पर गोदवर्म विद्वान इलिय तम्बुरान (१८००-१९५१) ने ‘सुधानन्दलहरी’ लिखी, इसी तरह शङ्कराचार्य की सौन्दर्यलहरी के अनुकरण पर कैकुलगर राम वारियर (१८३३-१८६५) ‘वागानन्दलहरी’ की रचना की। इस प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी पूर्वार्ध में लघुकाव्यरचना की दृष्टि से दक्षिणभारत अधिक उर्वर रहा। दक्षिण भारत के कवियों ने विविध प्रकार के काव्यों का प्रणयन कर आधुनिक संस्कृत-साहित्य को समृद्ध बनाया। कुछ कवियों ने अठारहवीं शताब्दी की पूर्वस्थापित परम्परा का अनुवर्तन किया और कुछ ने युगानुरूप नये-नये प्रयोग किए। लघुकाव्य-रचना की दृष्टि से उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध पूर्वार्ध की अपेक्षा अधिक उर्वर रहा। अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध १८५७ का विद्रोह इसी काल में हुआ। देश में आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास राजनीतिक उथल-पुथल रही। भारत को आंग्ल शासन की दासता से मुक्त कराने के लिए जो तड़प देश में थी वह राष्ट्र भक्ति से पूर्ण काव्यों के रूप में सामने आई। टी. गणपति शास्त्री ने ‘भारतवर्णनम्’ काव्य लिखा तो अन्नदाचरण तर्कचूडामणि ने भारत के अतीत को याद करते हुए ‘तदतीतमेव’ कृति का प्रणयन किया। शारदाचरण मित्र ने ‘भारतगौरवम्’, परवस्तु कृष्णमाचार्य ने ‘भारतगीतम्’ तथा ‘तिलकमञ्जरीसङ्ग्रहः’, नगरकर ने ‘राष्ट्रियजागृतिः’ जैसे काव्य लिखे। पराधीन भारत को पिंजड़े में बन्द तोते के समरूप मानकर अप्पाशास्त्री राशिवडेकर ने ‘पञ्जरबद्धशुकः’ तथा विधुशेखर भट्टाचार्य ने ‘बद्धविहगः’, काव्यों की रचना की। विधुशेखर भट्टाचार्य के अन्य दो काव्य ‘भारतभूमिः’ और ‘उद्बोधन्’, वरद कृष्णमाचार्य का ‘भारतखड्गाः’ एम. के ताताचार्य का ‘भारतीमनोरथः रामावतार शर्मा का ‘अभिनवभारतम् चारुचन्द्र वन्द्योपाध्याय का ‘मातृसम्बोधनम्’, मेघाव्रताचार्य का ‘मातः का ते दशा’ आदि अनेक काव्य हैं जो पराधीन भारत की दुर्दशा बताते हैं और भारतमाता को इस पारतन्त्र्य-जाल से मुक्त करने की प्रेरणा देते हैं। इसी तरह के काव्य “प्रबोधनम्’ में कवि शालग्राम शास्त्री भारतवासियों को परतन्त्रता-पाश से मुक्ति हेतु उद्बोधित करते हैं भज बोध राजभक्ति,जहि पारतन्त्र्य-पाशम्। त्यज दैववादवगं ननु पौरुषं श्रयस्व ।। यद्यपि संस्कृत-काव्य में अंग्रेज़ी दासता से मुक्ति का स्वर मुखर रहा है, किन्तु संस्कृत-कवियों का बहुत बड़ा वर्ग ऐसा था, जिन्होंने अपने-अपने समय के अंग्रेजी शासकों के चरितों पर काव्य लिखे तथा उनके प्रशस्तिपरक काव्यों की भी पर्याप्त मात्रा में रचना हुई और ऐसे प्रशस्तिपरक काव्यों को प्रकाशन का सुअवसर भी प्राप्त होता रहा। उस काल में प्रकाशित कतिपय संग्रह-ग्रन्थों में ब्रिटिश सत्ताधारी राजाओं एवं राजकुमारों की प्रशस्तियाँ संगृहीत हैं। संग्रहरूप प्रशस्तिकाव्य के रूप में १८७० में ‘वाराणसी से ‘सुमनोऽञ्जलिः’ का प्रकाशन हुआ जिसमें ‘ड्यूक ऑफ एडिनबरा’ की प्रशस्ति है, तथा १८६२ में बाँकीपुर से प्रकाशित ‘मानसोपायनम्’ में प्रिंस ऑफ वेल्स’ की प्रशस्ति है। स्वतन्त्र काव्यों में मंजुलनैषधम् का ‘आंग्लाधिराजस्वागतम्’ (१८२२-१९०६), महेशचन्द्र तर्क चूडामणि का “एडर्वमहोदयस्याभिनन्दनम्’ (१८४५-१६०६), हृषीकेश भट्टाचार्य का ‘राजपुत्रागमनम्’ (१८४६-१६१३), राजा सुरेन्द्र मोहन टैगोर का ‘प्रिंसपञ्चाशत् आदि हैं। सबसे अधिक संख्या में काव्य महारानी विक्टोरिया की प्रशस्ति में लिखे गए, जैसे विक्टोरियाचरितम् कोइतम्बुरान (१८८७) ‘चक्रवर्तिविक्टोरियायाः विजयपत्रम्’-बलदेव सिंह (१८८६), ‘विक्टोरियाप्रशस्तिः’-ब्रजनाथ शास्त्री (१८६२), विक्टोरियाप्रशस्तिः’-मुडम्बी व्यंकटराम नरसिंहाचार्य (१८४१-१६२८), विक्टोरियामाहात्म्यम्’ (सुरेन्द्र मोहन टैगोर), ‘विक्टोरियावैभवम्’ संपत् कुमार नरसिंहाचार्य (१REE), “विक्टोरियाप्रशस्तिः’,टी. गणपतिशास्त्री आदि। इसी तरह राजा जार्ज पञ्चम के जीवन चरित, राज्याधिरोहण आदि को लेकर भी कई काव्य लिखे गये। राधाकृष्ण गोस्वामी ने १८७० में वैवाहिकवर्णनम्’ नाम से एक लघुकाव्य लिखा, १३७ लघुकाव्य जिसमें ‘प्रिंस आफ वेल्स’ के विवाह का वर्णन है। संग्रहरूप प्रशस्तिकाव्य के रूप में १८७० में वाराणसी से ‘सुमनोऽञ्जलिः’ का प्रकाशन हुआ जिसमें ‘ड्यूक आफ एडिनबरा’ की प्रशस्ति है तथा १८६२ में बांकीपुर से प्रकाशित मानसोपायनम् में प्रिंस आफ वेल्स’ की प्रशस्ति है। श्रीश्वर विद्यालङ्कार ने १६०१ में ‘देहलीमहोत्सवम्’ लिखा, जिसमें एडवर्ड के देहली-दरबार का वर्णन है, १६०२ में इलाहाबाद से ‘एडवर्ड-राज्याभिषेकम्’ काव्य प्रकाशित हुआ, तथा १६०३ में शिवराम पाण्डेय ने ‘एडवर्डराज्याभिषेकदरबारम्’ की रचना की। इस प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल तक अनेक संस्कृत-कवियों ने राष्ट्रभक्ति के साथ-साथ राजभक्ति से अधिक सम्बन्ध रखा और उस तरह के अनेक काव्यों की रचना की, जिनमें उस समय के अंग्रेज शासकों एवं सत्ताधारियों के प्रति भारतवासियों की भावना सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप से व्यक्त हो रही थी। अर्वाचीन काल के संस्कृत-कवियों ने अंग्रेज़ शासकों के अतिरिक्त अपने आश्रयदाता राजाओं, सामन्तों आदि को विषय बनाकर तथा उनके जीवन के अनेक पक्षों को लेकर भी लघुकाव्यों की रचना की। इलत्तूर रामस्वामी का ‘तुलाभारप्रबन्धम्’, बाणेश्वर का ‘चित्राभिषेक’ इसी तरह के काव्य हैं। उनीसवीं शती के उत्तरार्ध के काव्यों में वेलत्तेरि केशवन (१८३८-६७) का ‘विशाखविलासः’, कोटक्कोटि मानविक्रम का (१८४५-१६१६) का ‘तुलापुरुषदान’ एवं ‘विशाखविजयोल्लासः’, पुनश्शेरि नीलकण्ठ शर्मा (१८५८-१९३५) का ‘पट्टाभिषेकप्रबन्ध’,टी. गणपति शास्त्री (१८६०-१६२६) का ‘श्रीमूलचरितम्’ एवं ‘तुलापुरुषदानम्’, के.सी. केशव पिल्ला (१८६८-१E१४) का ‘केरलवर्मविलासः’, हरिहरकृपालु (१८७०-१६४६) का ‘रमेश्वरकीर्तिकौमुदी’, अप्पाशास्त्री राशिवडेकर (१८७३-१६१३) का ‘शाहोः कुमारावाप्तिः । एवं ‘उद्वाहमहोत्सवम्’ तथा बालकृष्ण मिश्र (१८८०-१९३४) का ‘लक्ष्मीश्वरीचरितम्’ आदि अनेक आश्रयदाता राजाओं के जीवन-प्रसंगों को विषय बनाकर लिखे गए काव्य हैं। आश्रयदाता राजाओं के अतिरिक्त ऐतिहासिक राजाओं के वृत्त को विषय बनाकर भी काव्य-रचना की गई है। मुड़म्बीस वेंकट नरसिंहाचार्य ने ‘जयसिंहाश्वमेधीयम् काव्य में राजा जयसिंह के अश्वमेध का वर्णन किया है। कोटिक्कोट् मानविक्रम ने ‘केरलविलासः’ में केरल के इतिहास को प्रस्तुत किया है तथा ‘रणसिंगुचरितम्’ लिखकर उज्जयिनी के राजा जयसिंह का चरित वर्णित किया है। इसी प्रकार तेजोभानु पण्डित (१८८०) ने ‘श्रीचन्द्रचरितम्’ लिखकर उसमें चन्दबरदाई का इतिहास वर्णित किया है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि चरितनायकपरक लघुकाव्यों के प्रणयन की दृष्टि से यह काल अत्यधिक समृद्धिशाली रहा। ऐतिहासिक काव्यों पर लेखनी चलाने के अतिरिक्त काल्पनिक काव्यों की भी परम्परा इस अवधि में प्रवर्तित हुई। कवि कोटिक्कोटि मानविक्रम ने १८८० में ‘प्रेतकामिनी’ नामक उत्कृष्ट काव्य रचना प्रस्तुत की। शैलताताचार्य ने १८६२ में ‘दूतचरितम्’ तथा राजराजवर्म कोइतम्बुरान ने १८६३ में ‘विटविभावरी’ काव्य लिखे, जो काल्पनिक कथाओं पर आश्रित १३८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास थे। ऐतिहासिक एवं काल्पनिक चरितनायकों के अतिरिक्त पौराणिक चरित नायकों पर भी अनेक लघुकाव्य रचे गये। राम, कृष्ण, शिव आदि पुराण-पुरुषों एवं देवताओं पर भी इस काल के कवियों ने लेखनी चलाई। १८४० ई. में तमिलनाडु में जन्मी कवयित्री कामाक्षी रामकोटि ने ‘रामचरितम्’ नामक काव्य लिखा, जिसमें कालिदास के रघुवंश की शैली एवं शिल्प का अनुकरण प्राप्त होता है। १८४६ में जन्मे म. वेंकट राघवाचार्य सेतलूर ने ‘रामाष्टप्रास’ नामक रामकथा-काव्य लिखा। इसी तरह केशव नम्बीशन (१८४६-१९२४) ने ‘रामायणम्’ नाम से लघुकाव्य की रचना की तथा गोपालशास्त्री ने ‘रामाभ्युदयम्’ में राम के सम्पूर्ण जीवन की गाथा को निबद्ध किया। दधिभूषण भट्टाचार्य (१८६२) ने पाँच सर्गों में ‘सीतापरिणयम्’ नामक सीता के चरित्र पर आधृत काव्य लिखा। गणपति वेदान्त केसरी (१८७१-१६१३) ने ‘ताटकावधम्’ काव्य की रचना कर विश्वामित्र-यज्ञ-प्रसंग एवं ताडका के वध की कथा को प्रस्तुत किया तो वेंकटेश वामन सोवाणी (१८८२-१६२५) ने चार सर्गों के काव्य ‘रामचन्द्रोदयम्’ में रामायण की कथा का अपनी दृष्टि से निबन्धन किया। सी. शंगुन्नि नायर ने (१८६५-१६४२) ने ‘सीताहरणम्’ काव्य लिखकर सीता के हरण एवं अनुवर्ती प्रसंग को भावपूर्ण शैली में निबद्ध किया है। एलत्तूर सुन्दरराज अय्यंगार (१६४१-१६०५) ने ‘नीतिरामायणम्’ तथा सुब्रह्मण्य सूरि (१८५०-१६१३) ने ‘आसेचकरामायणम्’ लिखकर रामायण के लघुरूप को नीतिपरकता के साथ प्रस्तुत किया। रामकाव्य-प्रणयन की परम्परा आगे बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भी प्रवर्तमान रही। राम की भांति कृष्ण, शिव आदि देवताओं के चरितों को ग्रहण कर पर्याप्त काव्य-सर्जना इस काल में हुई। कुट्टमत्त चेरिय रामकुरुप का ‘रुक्मिणी-स्वयंवर’ एक तीन सर्गों का काव्य है जिसमें रुक्मिणी से सम्बद्ध कृष्णकथा को यमक अलङ्कार के विशिष्ट प्रयोग सहित निबद्ध किया गया है। मूरिइल नारायण नम्बीश (१८५२-१६२२) ने ‘पूतनामोक्षम्’ नामक एक चार सगों का काव्य लिखा, जिसमें बालक कृष्ण द्वारा स्तनपान द्वारा पूतना राक्षसी के वध की कथा है। काव्य में छन्दों एवं अलङ्कारों के सुन्दर प्रयोग प्राप्त होते हैं। पूतनामोक्ष का वर्णन कवि ने इस प्रकार किया है - बालेन तेन मृगराजकिशोरलीलालोलेन दारितपयोधरकुम्भदीना। नक्तंचरी भयदकुञ्जरसुन्दरीव भूमौ पपात परिधूतकचोनदन्ती।। (सिंहशावक के समान खेल में चञ्चल उस बालक कृष्ण के द्वारा कस कर स्तनों के काट लेने से दीन हुई, बिखरे बालों वाली, जोर से चीखती हुई वह राक्षसी पूतना भयानक हथिनी के समान भूमि पर गिर पड़ी)। इसी प्रकार वटपल्लि भास्करन मूत्तत (१८०५-१८७५) का ‘कृष्णोदन्तम्’, वासुदेव आत्माराम लाटकर (१८५४) का ‘अहिमहिहननम्’ तथा गुरुप्रसन्न भट्टाचार्य का ‘माथुरम्’ तथा भट्टगिरिधारि शर्मा का ‘श्रीगोविन्दगीता’ आदि काव्य कृष्ण के चरित पर रचे गए हैं। हरिदास सिद्धान्त-वागीश (१८७७-१६६५) ने कृष्णचरित पर ‘रुक्मिणीहरणम्’ तथा शङ्कर लघुकाव्य १३ के चरित पर ‘शङ्करसम्भवम्’ काव्यों की सर्जना की। शिव-पार्वती की कथा पर लिखे गये अन्य काव्य हैं - गोपाल शास्त्री (१८५३-१६२४) का ‘श्रीगौरीपरिणयम्’, अम्बिकादत्त व्यास (१८५८-१६००) का ‘शिवविवाहः’, तथा परीक्षित् रामवर्म राजा (१८७७-१६६५) का ‘सुकन्याचरितम्’ आदि। शीवुल्लि नारायण नम्बूदरी का ‘पार्वतीविरहः’ (१८६E) तथा नारायण शास्त्री खिस्ते का ‘यक्षाध्वरध्वंसम्’ (१९१०) भी इस काल के सुन्दर शिवचरितपरक काव्य हैं। परीक्षित रामवर्म राजा ने अम्बरीषविजयम् नाम से भक्तिमय काव्य भी लिखा है। महाभारत एवं भागवत के चरितनायकों को काव्य का विषय बनाकर जिन काव्यों की रचना हुई उनमें प्रमुख हैं-शङ्करलाल माहेश्वर (१८४४-१६१६) के ‘पाञ्चालिचरितम्’, ‘अरुन्धतीविजयम्’ तथा ‘प्रसन्नलोपामुद्रम्’ कोटिक्कोट मानविक्रम एट्टन तम्बुरान के ‘ध्रुवचरितम्’ तथा ‘विश्रुतचरितम्’ और राधाकृष्ण तिवारी के दो काव्य प्राप्त होते हैं-‘गजेन्द्रचरितम्’, जिसमें गजेन्द्र मोक्ष की कथा है तथा ‘दशावतारचरितम्’, जिसमें विष्णु के दस अवतारों का वर्णन है। कुछ कवियों ने अपने गुरुओं तथा अन्य श्रद्धेय जनों के चरित का चित्रण करने के लिए भी लघुकाव्यों की सर्जना की है, जिनमें पैंगानाडु पञ्चापगेश शास्त्री का ‘शकरगुरुचरितसङ्ग्रहः’ उल्लेखनीय है। इसमें कवि ने शङ्कराचार्य का चरित प्रस्तुत किया है। उन्नीसवीं शताब्दी के कावेयों ने अपने युग की परिस्थितियों के अनुरूप तथा अपनी प्रतिभा के अनुकूल विविध आधुनिक एवं पारम्परिक विषयों को ग्रहण कर काव्य-रचना की। तत्कालीन राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप हुई साहित्य-रचना के अतिरिक्त प्रेम एवं श्रृंगार के विषयों पर भी कवियों ने काव्य लिखे। इस काल में रचे गये अनेक काव्य ऐसे भी हैं जो रसराज शृंगार के माधुर्य से आप्लावित हैं। महेशचन्द्र तर्कचूडामणि ने ‘काव्यपेटिका’ नामक सङ्ग्रह के अन्तर्गत ‘शृंगारकाव्यानि’ (१८६६) में अनेक शृंगारपरक पद्य लिखे। इससे पूर्व शती के पूर्वार्द्ध में गंगाधरशास्त्री मंगरूलकर ने ‘विलासगुच्छः’, ‘भामाविलासः’ तथा ‘अपराधमार्जनम्’ ये तीन शृंगारपरक काव्य लिखे। कोटिक्कोट मानविक्रम तम्बुरान ने शृंगार के क्षेत्र में भी अपनी लेखनी चलाई तथा ‘शृंगारमञ्जरी’ एवं ‘भामिनीचरितम्’ ये दो संयोगशृंगारपरक काव्यों की सर्जना की। हरिवल्लभ शर्मा (१८४८) की ‘ललनालोचनोल्लासः’ तथा ‘कान्तावक्षोजशतोक्तयः’ अमर्यादित शृंगार की रचनायें हैं। व्रजरत्न भट्टाचार्य (१९५५) का ‘प्रमोदविलासः’, रंगाचार्य (१८५६-१६१८) का ‘शृंगारनायिकातिलकम्’ , राजवर्म कोइतम्बुरान (१८६३-१६१८) का ‘शृंगारभृङ्गार’, विधुशेखर भट्टाचार्य का ‘यौवनविलासः’ आदि अनेक इस काल की शृंगारपरक रचनायें हैं। प्रकृति के सौन्दर्य को परिप्रेक्ष्य में रखकर लिखे गए काव्यों की भी इस काल में कमी नहीं है। इस काल के कवि का भी मन प्रकृति के विविध रूपों को देखकर मुग्ध होता है और इसी भावभूमि पर अनेक काव्यों का सर्जन होता है। प्रकृति के आलम्बन एवं उद्दीपन दोनों रूपों को ग्रहण कर काव्य लिखे गए हैं। महेशचन्द्र तर्कचूडामणि के सुप्रसिद्ध काव्य-संग्रह ‘काव्यपेटिका’ में प्रकृति-वर्णन भी पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता है। उन्होंने |१४० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास षड्ऋतुओं का वर्णन सुन्दर रूप में किया है, साथ ही प्रातः मध्याहून, सायं, चन्द्रोदय आदि का वर्णन उद्दीपन रूप में प्रस्तुत किया है। इन वर्णनों में चारुता एवं सहजता है। वसन्त-वर्णन का यह पद्य कितनी सरल-सहज शैली में लिखा गया है द्रुमाः सुवेषा इव जातपत्रा लताः सकामा इव पुष्पवत्यः। दिशश्च मृष्टा इव निस्तुषारा नवेव जाता जगती वसन्ते।। (नये पत्तों से लदे हुए वृक्ष सुन्दर वेष वाले लोगों की भांति, पुष्पों से लदी लताएं काम से पीड़ित रजस्वला स्त्रियों की तरह, तथा बर्फ से रहित हुई दिशायें मांजी हुई सी, इस तरह वसन्त में सारी धरती नई-नई सी हो गई। कवि सार्वभौम कुच्चुनि तम्बुरान (१८५८-१६२६) ने ‘सूर्योदयः’ नामक काव्य लिखा। परमेश्वर झा (१८५६-१६२०) का ‘ऋतुवर्णनकाव्य’ तथा अन्नदाचरण तर्कचूडामणि का ‘ऋतुचित्रम्’ (१८६८), ये दो काव्य कालिदास के ऋतुसंहार के अनुकरण पर रचे गये हैं। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले दो कवियों, महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा श्रीधर पाठक ने संस्कृत में भी लघु-काव्य रचना कर अपना योगदान किया है। द्विवेदीजी ने ‘प्रभातवर्णनम्’ काव्य लिखा है जिसमें प्रकृति के केवल बाह्य रूप का चित्रण है। श्रीधर पाठक (१८५६-१६२८) का चौदह श्लोकों का अति लघुकाव्य है जिसमें शिमला के सौन्दर्य का सुन्दर वर्णन है। उनके ‘नववसन्तगीतम्’, के ऋतुवर्णन के साथ अन्त्यानुप्रास का मनोरम दर्शन है - जय जय भारतभुवि नववसन्त सय जय नन्दनाच-दापतादगन्त। कलरवनवशिक्षितमधुपमाल क र मञ्जरितनवलदलमृदुरसाल। नागालामाल पिकशुकनिनादनन्दितनिकुञ्ज द्विगुणितवियोगिजनदहनपुञ्ज।। (भारतभूमि में विद्यमान हे नववसन्त! तुम्हारी जय हो, अपनी आनन्दित करने वाली कान्ति से दिशाओं को दीप्त करने वाले तुम्हारी जय हो। नये कलरव की शिक्षा पाये हुए भ्रमरसमूहों वाले, नई मञ्जरियों से शोभित कोमल आम्रवृक्षों वाले, कोयल एवं तोते के शब्दों से कुजों को गुज्जित करने वाले तथा वियोगी जनों की बिरहाग्नि को दुगना करने वाले वसन्त! तुम्हारी जय हो।) बंगाल की कवयित्री सरोजमोदिनी देवी ने ‘क्षणप्रभा’, ‘शरत्’ तथा ‘प्रावृट्’ (१८६४-६५) इन कविताओं की रचना की है। रघुपति शास्त्री के ‘हेमन्तो वसन्तोत्सवः’ (१८६७) में वसन्तोत्सव का, कृष्णराम व्यास के ‘होलामहोत्सव’ में होली के त्योहार का सुन्दर चित्रण लघुकाव्य १४१ है। विधुशेखर भट्टाचार्य की ‘वर्षावैभवम्’ ‘वसन्तः’ तथा ‘ग्रीष्मः’ ऋतुवर्णनपरक रचनायें हैं। पं. रामावतार शर्मा ने भी अपने काव्यों में ऋतुओं के मनोरम चित्र उपस्थित किए हैं। अप्पाशास्त्री राशिवडेकर ने मासिक पत्रिका ‘संस्कृतचन्द्रिका’ के बारह अड्कों में चैत्र से फाल्गुन तक बारह महीनों का मनोरम वर्णन प्रस्तुत किया है। उनके लघु काव्यों में भी अनेकत्र प्रकृति का बिम्बग्राही चित्रण है। अम्बिकादत्त व्यास की ‘पुष्पवर्षाः एक भावपूर्ण कविता है। राजराज वर्म कोइतम्बुरान ने ‘मेघोपालम्भः’ में मेघ को उलाहना दी है। आधुनिक युग के कवियों ने अपने समकालीन समाज के विविध रूपों पर कटाक्ष एवं व्यंग्य अपने काव्यों के माध्यम से ही किया है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में बाबा दीक्षित वाटवे कुरुन्दवाडकर ने ‘कल्पितकलिवृत्तादर्शपराणम’ जैसा पराणशैली का काव्य लिखकर अंग्रेजी सभ्यता में पले हुए लोगों पर अधिक्षेप किया था। काव्य में यह प्रवृत्ति आगे भी चली। गीता के अनुकरण पर मद्रास के एल. रंगीलादास ने ‘कांग्रेसगीता’ (१९०५) लिखी, जिसमें सूरत के कांग्रेस अधिवेशन पर व्यंग्य है। तथा चिन्तामणि रामचन्द्र शर्मा की ‘श्रीचहागीता’ (१E१६) है, जिसमें वासनासक्त लोगों पर व्यंग्य है, साथ ही एक अध्याय में व्यसनासक्त विद्यार्थियों पर व्यंग्य है। चहागीता का अन्तिम श्लोक गीता की भांति इस प्रकार है यत्र पेयेशटीदेवो यत्र कप्यधरा नराः। तत्राल्पायुर्विपद् रोगा ध्रुवाऽनीतिमतिर्मम।। चाय की तरह काफी भी कवि की लेखनी का रोचक विषय बनी। एम.वी. सम्पत्कुमार आचार्य ने काफी की स्तुति में तीन लघुकाव्यों की रचना की-‘काफीषोडशिका’, ‘काफीपानीयम्’ तथा ‘काफीत्याग-द्वादश-मञ्जरीका’। महावीर प्रसाद द्विवेदी भी तीखे व्यंग्य का सहारा लेकर अपनी बात कहते हैं। उन्होंने ‘कान्यकुब्जलीलामृतम्’ में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों पर व्यंग्य किया है। “सूर्यग्रहणम्’ में धर्म के नाम पर होने वाले अनैतिक कार्यों का पर्दाफाश किया गया है। शालग्नाम शास्त्री ने आधुनिक युग की पाश्चात्त्य शिक्षा पर करारा व्यंग्य किया है चातुर्य चाकरीमात्रे कौशलं बूटपालिशे। भाले लिखति चैतावत् शिक्षा पाश्चात्त्यचालिता।। बी.ए. पर्यन्तशिक्षायां सहस्राणां तु विंशतिः। व्ययीभवति चित्तं तु केवलं दासवृत्तये ।। इस काल के प्रमुख दार्शनिक काव्य हैं - श्रीनिवासाचार्य का ‘हंसविलाप’, गंगाधर शास्त्री का ‘अलिविलासिसंलापकाव्य’, पंचानन तर्करन का ‘इन्द्रियानुशासन’, नीलकण्ठतीर्थपाद का ‘विधुनवसुधाझरी’ तथा विधुशेखर भट्टाचार्य के ‘जीर्णतरु’ एवं ‘चित्तविलास’ काव्य । उन्नीसवीं शताब्दी के कवियों ने संस्कृत-काव्य-रचना की विविध धाराओं एवं विधाओं १४२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास को अपनाते हुए नीतिकाव्यों का प्रणयन भी किया और प्रशस्तिकाव्यों का भी, शतक-काव्यों की भी रचना की और ‘लहरी’-काव्यों की भी, अनेकानेक देवी-देवताओं पर स्तोत्र-काव्य भी लिखे और दार्शनिक काव्य भी, अन्योक्तिपरक काव्य भी रचे गए और प्रतीकपरक भी। रस की सरसता से युक्त भी काव्यों की सर्जना हुई और व्यंग्य की वक्रता से युक्त काव्यों की। इस काव्यपरक विवेचन के पश्चात् अब उन्नीसवीं शताब्दी के उन कतिपय कवियों के कृतित्व का विवेचन किया जा रहा है जो लघुकाव्य-प्रणयन के क्षेत्र में स्तम्भभूत एवं प्रतिष्ठित हैं और जिनकी विशेष महत्ता के कारण उन पर पृथक् प्रकाश डालना अनिवार्य है। स्वल्प संख्या वाले ऐसे कवियों का स्वल्प विवरण यहाँ प्रस्तुत है
महेशचन्द्र तर्कचूडामणि
१८४१ ई. में दिनाजपुर मण्डल में जन्मे कवि महेशचन्द्र को तर्कचूडामणि की उपाधि से अलङ्कृत किया गया था। उनकी कविताओं का संग्रह १९०६ में कलकत्ता से ‘काव्यपेटिका’ के नाम से प्रकाशित हुआ। कविकृत कविताओं की इस सन्दूक में दो प्रकरण हैं, जिनमें पन्द्रह-पन्द्रह कविताओं का संग्रह है। इनका विवरण इस प्रकार है - प्रथम प्रकरण-मङ्गलकाव्यम्, कवेर्विनयः, शृंगारकाव्यानि, वसन्तवर्णनम्, ग्रीष्णवर्णनम्, प्रावृड्वर्णनम्, शरद्वर्णनम्, हेमन्तवर्णनम्, शिशिरवर्णनम्, प्रभातवर्णनम्, मध्यान्हवर्णनम्, सायाह्नवर्णनम्, तमोवर्णनम्, चन्द्रोदयवर्णनम्, तथा युवराजपदमलकुर्वतः सप्तम एडवर्डमहोदयस्याभिनन्दनम्। द्वितीय प्रकरण- मङ्गलाचरणम्, राजप्रशस्तिः, धनप्रशस्तिः, पण्डितप्रशस्तिः, प्रास्ताविकानि, शान्तकाव्यानि, रामाष्टकम्, दक्षिणकालिकाष्टकम्, दुर्गाष्टकम्, गङ्गाष्टकम्, सूर्याष्टकम्, अन्नपूर्णाष्टकम्, कृष्णाष्टकम् तथा उपसंहारकाव्यानि। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘भगवच्छतकम्’ नामक स्तुतिपरक शतककाव्य, यमक के प्रयोगवैचित्र्य से युक्त ‘महायमकम् काव्य तथा स्फुट कविताएं ‘काव्यपरिमलः’ ‘दुर्भिक्ष प्रार्थना’ ‘सुभाषितानि’ ‘समस्यापूर्तयः’ ‘दरभङ्गाधिराजस्य कृते ‘विलापः’ आदि लिखीं। ‘कवेर्विनयः’ में कवि अपने भाव को इस प्रकार प्रकट करता है - काव्यानि सन्ति रसवन्ति यदीतराणि सन्तः कृति मम तथापि विलोकयन्तु। पद्मषु सत्स्वपि मधुव्रतसार्थ एव . पुष्पाणि लेढि कुटजस्य न काकलोकः।। (यद्यपि अन्य अनेक रसमय काव्य हैं, तथापि सज्जन लोग मेरी कृति को देखें। कमलों के रहने पर भी भ्रमरों का समूह ही कुटज के पुष्पों का आस्वादन करता है, कौवों का समूह नहीं)
केरल वर्मा
वलिय कोइलम्पुरान का जन्म १९४५ ई. में केरल में लक्ष्मीपुरम् के
१४३ चंगनाशेरि उच्च घराने में हुआ था। वे तिरुवनंतपुर राजमहल ग्रंथालय के अधिकारी थे। वे चार तिरुनाल राजाओं के कार्यकाल में रहे। किन्तु मध्य में आइल्यं तिरुनाल राजा किसी कारण से इनसे कुपित हो गये और इन्हें १९७५ में कारागार में डाल दिया। इन्होंने अपनी अधिकांश उत्कृष्ट रचनाएं कारागार में ही रहकर लिखीं। इनकी कवि-प्रतिभा के सम्मान में इनको ‘केरल-कालिदास’ की उपाधि प्रदान की गई थी। कवि केरल वर्मा की उत्कृष्ट कृति है “क्षमापणसहस्रम्’ जिसको उन्होंने जेल में महाराज से अपने अपराधों की क्षमा याचना के लिए लिखा। क्षमा-याचना हेतु इतना बड़ा काव्य लिख जाना एक अद्भुत बात है, जिसमें पचास विंशतियों में विभाजित कर एक हजार श्लोकों की रचना की गई है। पूरा काव्य पाश्चात्ताप की अभिव्यक्ति से भरा है। एक और इसमें तिरुनाल राजा के उत्कृष्ट गुणों की प्रशंसा की गई है, दूसरी और कवि ने गहन भावना के ज्वार में अपना हृदय उडेल कर रख दिया है। क्षमापण भाव के इस आवेग के साथ कवि ने छन्दों एवं अलकारों का चमत्कारपूर्ण प्रयोग किया है। क्षमायाचनापरक एक पद्य द्रष्टव्य है नत्वा साष्टाङ्गपातं तव पदकमले मूर्ध्नि विन्यस्तहस्तः स्फायद्बाध्याम्बुधाराव्यतिकरकलुषीभूतनेत्रोऽतिमात्रम् । भूयो भूयोऽपि याचत्ययमतिकृपणो विप्रतीसारमग्नो दासस्ते सर्वमागोऽप्यनितरशरणस्यास्य नाथ! क्षमस्व ।। १/५ तुम्हारे चरण-कमलों में साष्टाङ्ग नमन करके सिर पर हाथ रखे हुए, बढ़ती हुई आँसुओं की धारा के समूह से अत्यधिक कलुषित हुए नेत्रों वाला, अत्यन्त दीन, पश्चात्ताप में डूबा यह दास अपने सब अपराधों के लिए क्षमा मांगता है। हे स्वामिन्! कहीं अन्यत्र शरण न पाने वाले इसे क्षमा कर दीजिए।) ज्ञातव्य है कि यह काव्य तिरुवनन्तपुर से १EE२ में प्रकाशित हो चुका है। क्षमापणसहस्र के अस्वीकार होने पर कवि ने ‘यमप्रणामशतकम्’ लिखा, जिसमें यम से महाराज के मारने की प्रार्थना है। कामाक्षी की स्तुति में उन्होंने ‘क्षमापणाष्टक’ भी लिखा है। राजप्रशंसापरक काव्यों में कवि के ‘विशाखराजप्रशस्तिः’ ‘श्रीमूलकमहाराजपादपद्मशतकम्’ तथा ‘तुलाभारशतकम्’ काव्य प्राप्त होते हैं। महारानी विक्टोरिया की प्रशस्ति में ‘नक्षत्रमाला’ तथा ‘विक्टोरियाचरितसंग्रहः’ दो लघुकाव्य प्राप्त हैं। उनके द्वारा रचित स्तोत्र काव्य अनेक हैं-जैसे ‘व्याघ्रालयेशशतकम्’ ‘शोणाद्रीशस्तोत्र’, ‘गुरुवायुपुरेशस्तोत्र’, ‘स्कन्दशतकम्’, ‘चंगनादीश्वरीस्तोत्र’, ‘त्रिशत्यन्तम्’, ‘ललिताम्बास्तोत्र’, ‘दण्डनाथस्तोत्र’, ‘शत्रुसंहारप्रार्थनाष्टकम् आदि।
मानविक्रम तम्पुरान
केरल के एक अन्य प्रसिद्ध कवि कोटिक्कोट मानविक्रम एट्टन तम्पुरान का जन्म भी १८४५ ई. में मलाबार में हुआ। उन्होंने भी प्रभूत काव्य-सर्जना की।१४४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास उनके ‘केरलविलास’ में केरल की उत्पत्ति का वर्णन है। दूसरे खण्डकाव्य ‘रणसिंगराजचरितम्’ में उज्जयिनी के राजा रणसिंगु का चरित वर्णित है। ‘तुलापुरुषदान’ विशाखं तिरुनाल के तुलादान के अवसर पर लिखा गया था। कवि तम्पुरान ने एक शृंगाररसमय काव्य ‘शृंगारमञ्जरी’ का भी प्रणयन किया। ‘जननीस्तवः’ में माता की महिमा का बखान है। ‘धन्याधन्यविवेचनी’ में प्रतिश्लोक में कवि ने धन्यों और अधन्यों के क्रमशः गुणों और दोषों का विवेचन किया है। ‘प्रेतकामिनी’ एक रोचक गीतात्मक काव्य है, जिसमें काशी की एक कन्या की, पति की मृत्यु के बाद भी प्रेतात्मा के रूप में आकर उसकी उस कामिनी के साथ रमण करने की कथा वर्णित है। ‘किराताष्टपदी’ भक्तिपरक गीतिकाव्य है। ‘प्रश्नोत्तरमाला’ में एक योगी का मुमुक्षु को तत्त्वोपदेश है। ‘वृद्धविलापः’ काव्य में वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर कवि का निर्वेद भाव व्यक्त हुआ है। इन्होंने चरित काव्यों की भी रचना की है। जैसे - ‘स्वर्गारोहणशतकम्’, ‘भामिनीचरितम्’, ध्रुवचरितम्’। विशाखं तिरुनाल पर ‘विशाखविजयोल्लासः’ लिखा है। ‘उपदेशमुक्तावली’ में तीन सौ दृष्टान्तयुक्त उपदेश हैं। दो भक्तिपरक अष्टपदियाँ भी लिखी हैं। कवि का रचनाक्षेत्र बहमखी है। उनका अंगारपरक एक उदाहरण द्रष्टव्य है जिससे उनकी प्रियतमा में भारत के विभित्र प्रान्तों की रमणियों का चातुर्य दिखाई पड़ रहा है - भर्तृत्वे केरलानां भणितविलसिते पाण्ड्यभूमण्डितानां चोलानां चारुगीते यवनकुलभुवं चुम्बने कामुकानाम् । गौडानां सीत्कृतेषु प्रतिनवविविधालिगने मालवानां चातुर्य ख्याति चैतत् त्वयि सकलमिदं दृश्यते वल्लभाद्य ।।
अप्पाशास्त्री राशिवडेकर
अप्पाशास्त्री आधुनिक काव्यक्षेत्र के युगप्रवर्तक कवि हैं। उनका जन्म १८७३ ई. में महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिला के अन्तर्गत राशिवडे ग्राम में हुआ था। वे बहुमुखी कारयित्री प्रतिभा के धनी थे। उनके कवित्व का प्रसार मासिक ‘संस्कृत चन्द्रिका’ तथा साप्ताहिक ‘सूनृतवादिनी’ से विशेष हुआ। समस्यापूर्ति रूप अनेक स्फुट पद्य उन्होंने लिखे। कविवर ने ‘शाहोः कुमारावाप्तिः’ एवं ‘उद्वाहमहोत्सवम्’ काव्यों द्वारा अपने समय के अंग्रेज़ राजकुमार “प्रिंस ऑफ वेल्स’ के प्रशासनिक एवं वैवाहिक वृत्तों को निबद्ध किया है। कवि ने राष्ट्रीय सन्दर्भ के भी काव्य लिखे। ‘पञ्जरबद्धशुकः’ में उन्होंने पराधीनता के पाश में बँधे भारत का स्वरूप चित्रित किया है, तो ‘तिलकस्य कारागृहनिवासः’ बालगङ्गाधर तिलक के जेल में बन्द होने का इतिवृत्त वर्णित है। स्तोत्रकाव्यों की परम्परा में उन्होंने ‘श्रीकण्ठपदभूषणम्’ की रचना की है। ‘संस्कृत-चन्द्रिका’ पत्रिका की मासावतरणिकाओं में उन्होंने चैत्र से लेकर फाल्गुन तक बारहों महीनों का वर्णन किया है। उनके वर्णनों में प्रकृति के विविध आलम्बनगत एवं उद्दीपनगत रूप मिलते हैं। ‘मल्लिकाकुसुमम्’ में कवि ने मालती लता के पुष्प के माध्यम से मानवीय भावना को चित्रित किया है। ‘कुसुमस्तबकः’ में कवि ने पुष्प के सौन्दर्य, सौरभ, लघुकाव्य पराग आदि बाह्यगुणों के साथ उसके देवपूजोपयोगिता आदि गुणों की प्रशंसा की है। ‘दावानलविलासः’ में पर्वत प्रदेश पर उठी हुई जंगल की आग का वर्णन किया गया है। “उपवनतटाकम्’ काव्य में चांदनी भरी रात में उपवन के तट पर स्थित सरोवर के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन है। ‘कविप्रभावः’ तथा ‘धाता थत्ते धियं कवेः भी उनके उत्कृष्ट लघु काव्य हैं। राशिवडेकर ने दुःख-शोकमय विलाप-काव्य भी लिखे हैं। ‘निर्धन-विलापः’ में निर्धनता का करुण वर्णन किया है, ‘वल्लभविलापः’ में वियोगिनीवृत्त में प्रिय का विलाप तथा ‘विधुरविलापः’ में पत्नी के निधन पर पति का विलाप वर्णित किया गया है। ‘सुधाकरसुभाषितम्’ नाम से एक सुभाषित-काव्य भी उन्होंने लिखा है, जिसमें उनका जीवन-दर्शन प्रतिबिम्बित होता है। उनके अन्य लघुकाव्य हैं- ‘उदरप्रशस्तिः (सामाजिक व्यंग्य) ‘आशीर्वचनरलमालिका’ ‘आक्रन्दम्’ (स्तोत्रकाव्य), ईशानन्दपुष्पाञ्जलिः’ (स्तोत्रकाव्य) आदि । लघुकथा, नाटक, आलोचना आदि अतिरिक्त लेखन को न जोड़ें तब भी राशिवडेकर जी का काव्य-साहित्य की प्रभूत श्रीवृद्धि करने में अपूर्व योगदान है। वे सचमुच एक युगान्तरकारी कवि हैं और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त को ‘राशिवडेकर-युग’ के नाम से जाना जा सकता है। उनके विशाल वाङ्मय से केवल दो उदाहरण देना पर्याप्त होगा, जिसमें से एक में (पञ्जरबद्धशकः) उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से परतन्त्रता में बंधे भारत का चित्रण किया है - शुक सुवर्णमयस्तव पजरो विविधरत्नचयप्रतिमण्डितः। कलयते हृदयं न मुदान्वितं समपसार्य मनः क्लममन्वहम् ।। (हे तोते! सोने से बना, विविध रत्नों के समूह से सुशोभित तुम्हारा यह पिंजरा मन के खेद को दूर कर हृदय को प्रसन्न नहीं करता है।) विधुरविलापः’ का यह पद्य भी कवि के मार्मिक चित्रण को व्यक्त करता है - भवदाननशोभया तया विजितत्वात् खलु हन्त सन्ततम्। विधुरं विधुरङ्गनामणे कुरुते ते वसतिं मनो मम।। (हे रमणियों में श्रेष्ठ प्रिये! तुम्हारे मुख की उस शोभा से जीते जाने के कारण चन्द्रमा तुम्हारे निवास स्थान मेरे मन को विधुर बनाये दे रहा है।)
रामावतार शर्मा १८७७-१९२९
आधुनिक संस्कृत-साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र म.म. रामावतार शर्मा का जन्म में बिहार के छपरा में हुआ था। उन्होंने पटना, १४६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कलकत्ता तथा वाराणसी में अध्यापन कार्य किया। वे ‘मित्रगोष्ठी’ पत्रिका के सम्पादक रहे। पं. रामावतार में कवित्व एवं पाण्डित्य का अपूर्व समन्वय था। उनकी प्रखर मेधा और अद्भुत कवित्वशक्ति का प्रमाण यह है कि उन्होंने अठारह-उन्नीस वर्ष की कैशोर्यावस्था में (१८६४ ई.) में ‘मारुतिशतकम्’ जैसे प्रौढ़ काव्यों की रचना की। ‘मारुतिशतकम्’ की भाँति शङ्कर की स्तुति में कवि ने ‘शम्भुशतकम्’ लिखा है, कृष्ण की स्तुति में कृष्णस्तवकल्पतरुः तथा सरस्वती के स्तवन रूप में ‘सरस्वत्यष्टक’ की रचना की है। ‘अभिनवभारतम्’ जिसे ‘भारतीयमितिवृत्तम्’ भी कहा जाता है, में भारत का इतिहास निबद्ध है। ‘शतश्लोकीयं धर्मशास्त्रम्’ तथा ‘सत्यदेवकथा’ उन्हीं की रचनायें हैं। सात अध्यायों में निबद्ध “श्री सत्यनारायण की कथा’ काव्य सत्यनारायण की कथा के अनुकरण पर निबद्ध है। इसमें कवि के प्रतीक रूप पात्र मुगरानन्द से मूर्खताग्रस्त एवं पापदूषित भारत के उद्धार का उपाय पूछा गया है। उत्तर के रूप में समग्र ब्रह्मांड का भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिचय देते हुए भारत की अतीत एवं वर्तमान दशा का चित्रण किया गया है। पण्डित शर्मा का सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य है ‘मुद्गरदूतम्’, जो दूतकाव्य-परम्परा का अंग होने पर भी शृंगारिक या वियोगपरक नहीं है, अपितु यह सर्वथा नवीन पैरोडी है या हिन्दू समाज की बुराइयों पर एक हास्यप्रधान मार्मिक चोट है। इसमें व्यभिचारी मूर्खदेव का विचित्रतापूर्ण वर्णन है। यह काव्य पूर्वमुद्गर, मध्यमुद्गर एवं उत्तरमुद्गर तीन भागों में विभाजित है तथा इसमें १८८ पद्य मन्दाक्रान्ता वृत्त में हैं। कवि शर्मा ने ‘जार्जप्रशस्तिः’ नाम से एक प्रशस्तिकाव्य भी लिखा है। प्रकृति के रम्य रूपों के उद्घाटन में उनकी काव्यकला का प्रकर्ष दिखाई पड़ता है। उनके वसन्तवर्णन में कितनी रमणीयता है - प्रियकथां मलयानिल एकया नुययुजे परया किल कोकिलः । ललनया विनयेन समुल्लसत् कुतुकया तु कयापि मधुव्रतः।। (किसी एक रमणी ने मलयानिल से प्रिय की कथा को पूछा तो दूसरी ने कोयल से और विनयपूर्वक उल्लसित कौतूहल वाली एक ललना ने भ्रमर से प्रेमकथा को पूछा।)
विधुशेखर भट्टाचार्य
ये अनेक विश्वविद्यालयों में संस्कृत-प्राध्यापक रहे। अपने प्रतिभाबल से उन्होंने प्रभूत साहित्य-सर्जना की। उन्होंने राष्ट्रभक्ति सम्बन्धित तीन रचनाएँ लिखी हैं - ‘भारतभूमिः’ ‘बद्धविहंगः’ तथा ‘उद्बोधनम् । बद्धविहगः में कवि पराधीन भारत का प्रतीकात्मक ढंग से वर्णन करता है। ‘उद्बोधनम्’ में वह परतन्त्रता में जकड़े देशवासियों को जगाता है। भट्टाचार्य ने अनेक प्रकृति-वर्णनपरक कवितायें लिखी हैं, जैसे ‘वर्षावैभवम्’, ‘वारिदामन्त्रणम्’, ‘प्रभातकुन्दम्’, ‘चन्द्रिकाप्रशस्तिः’, ‘मलयमारुतः’, ‘वसन्तः’, ‘ग्रीष्मः’ आदि। ये सभी मित्रगोष्ठी पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं, जिसके वे स्वयं सम्पादक थे। एक ओर लघुकाव्य उन्होंने ‘यौवनविलासः’ जैसी शृंगारिक तथा ‘चित्तवलासः’ जैसी दार्शनिक रचनायें लिखीं हैं तो दूसरी ओर ‘जीर्णतरुः’ जैसी वृद्धावस्था को लक्ष्य करके लिखी गई तथा ‘नैराश्यम्’ जैसी निर्वेदपरक रचनायें भी हैं। ‘प्रातृविलापः’ कारुण्यपूर्ण कविता है। समस्यापूर्ति के अतिरिक्त विधुशेखर जी ने स्तोत्रकाव्यों की भी रचना की है, जैसे ‘प्रार्थनापरिपाकः’, ‘शिवस्तोत्रम्’ ‘दुर्गाशतकम्’ आदि।
भट्ट मथुरानाथ शास्त्री
(उपनाम मंजुनाथ) का जन्म जयपुर में १८८६ ई. में हुआ। यद्यपि उनके काव्य का प्रतिफलन बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में ही हुआ, तथापि शास्त्रीजी को उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी के आधुनिक लघुकाव्य का मध्यसेतु कहा जा सकता है। भट्टजी लम्बे समय तक जयपुर में संस्कृत-शिक्षा के अधीक्षक रहे तथा ‘संस्कृतरत्नाकर’ एवं ‘भारती’ संस्कृत-पत्रिकाओं का सम्पादन करते रहे। उन्होंने ‘ईश्वरविलासः स्वतन्त्र खण्डकाव्य तथा ‘पद्यमुक्तावली’ नामक काव्य-संग्रह लिखा। ‘त्रिपुरसुन्दरीस्तवराज’ उनका स्तोत्रकाव्य है। ‘म कवितानिकुञ्ज’ में उनकी अधोलिखित कवितायें प्रकाशित हैं-साहित्यवैभवम्, जयपुरवैभवम्, संस्कृतगाथासप्तशती, संस्कृतसर्वस्वम् तथा काव्यकलारहस्यम् । इन प्रमुख कवियों के अतिरिक्त जिन अन्य अनेक कवियों ने लघुकाव्य-क्षेत्र में अपना योगदान किया है उनके कृतित्व की चर्चा उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक विवरण में आ चुकी है। उन्नीसवीं शताब्दी के सातत्य में ही बीसवीं शताब्दी के कवियों एवं काव्यों का विवेचन प्रवर्तमान है।