आधुनिक संस्कृत-लघुकाव्य उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी की परिस्थितियों की देन हैं। भारत के सामाजिक-राजनैतिक क्षितिज पर घटती विविध घटनाओं के घात-प्रतिघातों ने संस्कृत-लघुकाव्य की प्रवृत्तियों और विधाओं को निर्धारित किया। घटना-वैविध्य के कारण लघुकाव्यों में विषय-वैविध्य आया। समाज के बदलते वपों और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में संस्कृत-कवि का स्वर मुखरित हुआ और तदनुसार अनेक लघुकाव्य लिखे गए। ये लघुकाव्य प्रबन्धात्मक भी थे और मुक्तक भी। स्वल्प कथासूत्र को ग्रहण कर चलने वाले प्रबन्धात्मक काव्यों तथा स्फुट विषयों को लेकर लिखे जाने वाले मुक्तक काव्यों की समानान्तर धारायें इस काल में चलती रहीं। इन लघुकाव्यों के विषयों का जाल अत्यन्त विशाल है। युगानुरूप पाये जाने वाले विविध विषयों के आधार पर ही लघुकाव्य की प्रवृत्तियों और विधाओं का प्रवर्तन हुआ। विषय-वैविध्य की दृष्टि से इस काल के संस्कृत लघुकाव्यों का वर्गीकरण किया जाय तो हम देखेंगे कि आधुनिक युग में जिन विविध विषयों को गृहीत कर इन काव्यों की रचना हुई है, उनके आधार पर इन्हें इस प्रकार वर्गीकृत कर विवेचित किया जा सकता है लघुकाव्य १२३
पुराकथाश्रित काव्य
इस युग के अनेक संस्कृत-कवियों ने पूर्ववर्ती कवियों की सरणि का अनुसरण करते हुए अनेक पुरातन कथाओं एवं पौराणिक उपाख्यानों को विषय बनाकर लघुकाव्यों की रचना की है। मूल उपजीव्य ग्रन्थ रामायण, महाभारत, विविध पुराणों एवं कथाग्रन्थों से विषय लेकर अथवा एक भावांश अथवा वृत्तांश लेकर तथा अपनी मौलिक कल्पना से यथेष्ट परिवर्तन कर इन कवियों ने खण्डकाव्यों की रचना की है। कहीं-कहीं पुरावृत्तों को युगानुरूप नये साँचे में ढालकर प्रस्तुत किया गया है और कहीं पुरातन वृत्त को अक्षुण्ण रखकर नये रस-भाव की सृष्टि की गई है। इस पारम्परिक काव्य के कतिपय उदाहरण हैं कवि हेमचन्द्रराय-कृत ‘परशुरामचरितम्’, स्वयंप्रकाश शर्मा शास्त्री -कृत ‘इन्द्रयक्षीयं काव्यम्’, एन्. कुमारन् आशान-कृत ‘सीताविचारलहरी’, श्री. भि. वेलणकर-कृत ‘विष्णुवर्धापनम्’ आदि।
देवस्तुतिपरक काव्य
लघुकाव्यों में ऐसे भक्तिपरक काव्यों की संख्या बहुत अधिक है, जिसमें किसी एक देवताको आराध्य मानकर उसकी भावपूर्ण स्तुति की गई है। संस्कृत में स्तोत्र-लेखन की परम्परा पुरानी है। अर्वाचीन कवि ने भी अनेक देवताओं, किसी स्थान विशेष पर प्रतिष्ठित मन्दिरों में विद्यमान मूर्तिरूप देवों, पावन तीर्थों, नदियों, गुरुओं, ऋषियों का स्तवन करते हुए उनके प्रति अपने हृदय के श्रद्धामय उद्गार व्यक्त किये हैं। कुछ काव्य केवल एक देव की स्तुति में अर्पित हैं तो दूसरे अनेकानेक देवी-देवताओं की स्तुति से भरे पड़े हैं। एक ओर लीलापुरुष भगवान् कृष्ण की रसमयी लीलाओं का वर्णन करते हुए कवियों ने मधुरा भक्ति का प्रसार किया, जैसे श्री औटूर उष्णि नम्बूदरीपाद कृत ‘राधाकृष्णरसायनम्’ तथा श्री सत्यव्रत शर्मा ‘सुजन’ शास्त्री-कृत ‘श्रीयुगलशतदलम्’, तो दूसरी ओर अन्य अनेक देवी-देवताओं की स्तुतियों में कवियों ने अपने उद्गार व्यक्त किये, जैसे अभिराज राजेन्द्र मिश्र-कृत ‘पराम्बाशतकम्’ तथा ‘श्रीयुगलशतदलम्’, नलिनी शुक्ला-कृत ‘भावाञ्जलिः’, श्रीभाष्यम् विजय सारथि-कृत ‘मन्दाकिनी’ आदि।
राष्ट्रभक्तिपरक काव्य
उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के पैर जम गए थे और पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े देश में उनके विरुद्ध विद्रोह की आवाज़ उठ रही थी। इसी विद्रोह भावना की एक प्रबल अभिव्यक्ति की अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम, जिसकी सेनानायिका थीं, वीराङ्ना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। भारत को अंग्रेजी-दासता से मुक्त कराने के लिए एक ओर वीर एवं वीराङ्गनाओं ने प्राणपण से लड़ना आरम्भ किया तो युग की पुकार के अनुरूप संस्कृत का कवि भी राष्ट्रीय चेतना जगाने वाला साहित्य१२४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास लिखने लगा गया। इसी १८५७ के विद्रोह के परिप्रेक्ष्य में श्री वासुदेवशास्त्री बागेवाडीकर ने ‘क्रान्तियुद्धम्’ तथा पी. गोपालकृष्ण भट्ट ने ‘महाराज्ञी-झाँसी लक्ष्मीबाई’ काव्य लिखे। पराधीनता-विरोधी संघर्ष की आग आगे भी निरन्तर सुलगती रही। बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में स्वतन्त्रता-संग्राम ने एक नया मोड़ लिया जब भारत के राष्ट्रीय क्षितिज पर अन्य अनेक महापुरुषों के अतिरिक्त महात्मा गान्धी का उदय हुआ, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध सत्याग्रह-आन्दोलन छेड़ा। सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध एक उग्र एवं गर्म युद्ध भी चल रहा था, हज़ारों बलिदानी वीर मातृभूमि की बलिवेदी पर अपने प्राण अर्पित कर रहे थे। इस परिस्थिति में राष्ट्रीय भावना का शङ्खनाद करते हुए संस्कृत-कवियों ने सैकड़ों महाकाव्य, खण्डकाव्य, नाटक और गद्यकाव्य लिखे। पण्डिता क्षमा राब ने “सत्याग्रहगीता’, ‘उत्तरसत्याग्रहगीता’ तथा ‘स्वराज्य-विजयः’ जैसे लघुकाव्य लिखकर महात्मा गान्धी के सत्याग्रह-आन्दोलन को विश्व के समक्ष रखा तथा स्वराज्य-प्राप्ति की कठिन परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। के.एस. नागराजन-कृत ‘भारतवैभवम्’, शिवदत्तमिश्र-कृत ‘भारतवर्षः तथा महादेवशास्त्री कवितार्किकचक्रवर्ती-कृत ‘भारतशतकम्’ जैसे राष्ट्रभक्तिपरक काव्य लिखे गए। स्वराज्य-प्राप्ति के बाद की घटनाओं में १६६२ का भारत-चीन युद्ध, १९६५ का भारत-पाक युद्ध तथा १८७१ का बंगलादेश के जन्म का युद्ध कवियों की वाणी के विषय बने; जैसे सुरेशचन्द्र शास्त्री-कृत ‘वीरोत्साह-वर्द्धनम्’, रमेशचन्द्र शुक्ल-कृत ‘बँगलादेशः’, शशिधर शर्मा-कृत ‘वीरतरङ्गिणी’ आदि। यह अवधय है कि संस्कृत लघुकाव्यकारों की सबसे अधिक सामग्री स्वतन्त्रता-आन्दोलन के विविध पक्षों से मिली। और सबसे अधिक लघुकाव्य इसी राष्ट्रीय भावना की प्रवृत्ति को लेकर रचे गए। भारत की महिमा गाकर राष्ट्रभक्ति जगाने वाले कतिपय प्रसिद्ध लघुकाव्य हैं - पं. यज्ञेश्वर शास्त्री-कृत ‘भारतराष्ट्ररत्नम्’, श्रीधर भास्कर वर्णेकर-कृत ‘श्रमगीता’, लक्ष्मीनारायण शुक्ल-कृत ‘राष्ट्रतन्त्रम्’, श्री महादेवशास्त्री-कृत ‘भारतशतकम्,’ गरिकपाटि लक्ष्मीकान्तैया-कृत ‘भव्यभारतम्’, पं. बालकृष्ण भट्ट शास्त्री-कृत ‘स्वतन्त्रभारतम्’, डॉ. रमाकान्त शुक्ल-कृत ‘भाति में भारतम्’ आदि।
चरितनायक-परक काव्य
भारत में दीर्घकाल तक चलने वाली पराधीनता का काल उत्कृष्ट चरित्र वाले चरितनायकों की उत्पत्ति की दृष्टि से बड़ा उर्वरता का काल रहा। भारत-वसुन्धरा में बीसवीं शती के पूर्वार्ध तक के डेढ़ सौ वर्ष के काल में स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर करने वाले अनेक वीरों, स्वतन्त्रता सेनानियों, महापुरुषों, धार्मिक नेताओं, राजनेताओं के जीवन-चरित को विषय बनाकर अनेक लघुकाव्य लिखे गए। स्वतन्त्रता संग्राम के जननायकों के चरित के माध्यम से अनेक काव्यों में राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रप्रेम एवं राष्ट्रीय भावना ही प्रधान रूप से मुखरित हुई है और उनका मूल स्वर स्वतन्त्रता-आन्दोलन के इतिहास के किसी न किसी पक्ष को उद्घाटित करना है। अतः राष्ट्रभक्तिपरक काव्य एवं कावया लघुकाव्या १२५ चरितनायकपरक काव्य, दोनों समानान्तर धारा में बहकर एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले काव्य है। चरित-काव्य अन्य अनेक काव्य-विधाओं में भी पर्याप्त मात्रा में लिखे गए। लघुकाव्य-विधा के अन्तर्गत पाये जाने वाले प्रमुख प्रतिनिधि-काव्य ये हैं -पं. चुन्नीलाल सूदन-कृत ‘भरतसिंहचरितामृतम्’, पं. ब्रह्मानन्द शुक्ल-कृत ‘श्रीगान्धिचरितम्’, पं. जयराम शास्त्री-कृत ‘श्रीगान्धिबान्धवम्’, श्रीनिवासताडपत्रीकर-कृत ‘गान्धीगीता’, राजनारायण प्रसाद मिश्र-कृत ‘सुभाषचन्द्रोदयम्’, रामशरणशास्त्री-कृत ‘जवाहरजीवनम्’, श्रीधर भास्कर वर्णेकर-कृत ‘जवाहरतरङ्णिी ‘, आचार्य रमेशचन्द्र शुक्ल-कृत श्रीनेहरूवृत्तम्’ तथा ‘लालबहादुरशास्त्रिचरितम्’, विष्णुकान्त झा-कृत ‘राष्ट्रपतिराजेन्द्रवंशप्रशस्तिः’, रमेशचन्द्र शुक्ल-कृत ‘इन्दिरायशस्तिलकम्’, डा. रामाशीष पाण्डेय-कृत ‘इन्दिराशतकम्’ तथा श्रीकृष्ण सेमवाल-कृत ‘इन्दिराकीर्तिशतकम्’ आदि।
सामाजिक-समस्यामूलक काव्य
आधुनिक भारत की विभिन्न सामाजिक समस्याओं को विषय बनाकर भी संस्कृत-कवियों ने अनेक प्रकार के काव्य लिखे। अस्पृश्यता-निवारण, नारीदुर्दशा, दहेजप्रथा, कुरीति-ग्रस्तता, अष्टाचार, आतकवाद जैसी भीषण सामाजिक समस्याओं की ओर आधुनिक कवि का ध्यान गया और उसने लघुकाव्यों में भी समाज-सुधार की विविध बातों को रखा। मुक्तक काव्यों में निबद्ध स्फुट रचनाओं में कवियों ने राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार, आतङ्कवाद तथा दहेज-प्रथा जैसी विकराल समस्याओं की ओर समाज का ध्यान केन्द्रित किया तथा विभिन्न विवादों के कारण भारत के राष्ट्रीय सङ्घटन के सङ्कट पर चिन्ता व्यक्त की। अनेक मुक्तक पद्यों के अतिरिक्त इस धारा के काव्य हैं जैसे-आतङ्कवाद के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया डा उमाकान्तशुक्ल-कृत भावमय काव्य ‘कूहा’, श्रीमती सरोजिनी देवी-कत ‘स्त्रीशिक्षालयम’, तथा आंशिक रूप से सामाजिक समस्याओं के चित्रण से यक्त काव्य हैं - व्योमशेखर-कृत ‘अग्निजा’, प्रो. रामकृष्ण भट्ट-कृत ‘काव्योद्यानम्’ आदि।
शुद्ध रसात्मक काव्य
इस युग में अनेक ऐसे लघुकाव्यों की रचना हुई है जो विशुद्ध रूप से रसपूर्ण हैं। उनमें प्रसिद्ध रसों में से किसी एक का पोषण हुआ है तथा जो भावप्रवणता के कारण सहृदयों द्वारा आस्वाद्य हैं। किसी गहन भाव-प्रेम, विरह, उत्साह आदि के व्यञ्जित एवं पोषित होने पर ही काव्य रसनीयता को प्राप्त करते हैं और कोमल एवं कठोर दोनों प्रकार के प्रसङ्गों में ये प्राप्त होते हैं। श्री मधुकर गोविन्द माइणकर-कृत ‘स्मृतितरङ्म’ इसी तरह का काव्य है। रामायण की कथा पर आश्रित होते हुए भी पुलिवर्ति शरभाचार्य-कृत ‘यशोधरा’, कृष्णप्रसाद शर्मा घिमिरे-कृत ‘श्रीरामविलापः’ तथा डा. रमाशङ्कर तिवारी-कृत ‘वैदेह्या अतीतावलोकनम्’ शुद्ध रसात्मक होने के कारण इस तरह अलग श्रेणीबद्ध किये गए है। १२६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास
प्रकृतिवर्णनपरक काव्य
संस्कृत-लघुकाव्यों की एक प्रवृत्ति प्रकृति-वर्णन की ओर भी उन्मुख है। प्राचीन कवियों की भाँति अर्वाचीन कवि भी सृष्टि में फैले प्रकृति के नाना रूपों को देखता है, उस पर मुग्ध होता है और उसे कल्पना के विविध रंगों में डूबो कर प्रस्तुत करता है। कतिपय कवियों ने प्रकृति-वर्णन के पारम्परिक रूप को ही लिया है। जैसे रामनारायण त्रिपाठी-कृत ‘ऋतुविलासः’ तथा के.एस. कृष्णमूर्ति शास्त्री-कृत ‘प्रकृति-विलासः’, श्रीसुन्दरराज-कृत ‘सुरश्मिकाश्मीरम्’ आदि । अर्वाचीन युग के संस्कृत-कवि ने इस प्रकार के प्रकृति-चित्रण के अतिरिक्त इस रहस्यमयी प्रकृति के वैज्ञानिक रूप के अवलोकन में भी रुचि ली है; जैसे लछमनसिंह अग्रवाल-कृत ‘कुटुम्बिनी’, तथा डॉ. डि. अर्कसोमयाजी-कृत ‘ब्रह्माञ्जलिः’ इसी कोटि के काव्य है।
दूतकाव्य/सन्देश काव्य
महाकवि कालिदास के अमर काव्य ‘मेघदूत’ के अनुकरण पर जो दूतकाव्य अथवा सन्देशकाव्य लिखने की प्रवृत्ति प्राचीन काल में चली थी वह अर्वाचीन काल में भी अविराम गति से चलती रही। इन दिनों में भी संस्कृत-कवियों ने प्रकृति के विभिन्न उपादानों, चेतन-अचेतन पदार्थों को विरही या विरहिणी के पास प्रणय-सन्देश लेकर दूतरूप में भेजा। हाँ, युग-परिवर्तन के अनुरूप भावों में परिवर्तन आए हैं। पूर्वमेघ-उत्तरमेघ की भाँति दूतकाव्यों में प्रायः पूर्वभाग स्थान-वर्णन एवं प्रकृति-वर्णन से युक्त हैं और उत्तर भाग विरहसन्देश लिये हुए हैं। विरह के अतिरिक्त सामान्य सन्देश वाला काव्य है - सुधाकर शुक्ल-कृत ‘देवदूतम् । एक व्यङ्ग्यपरक दूतकाव्य है - पं. रामावतार शर्मा-कृत ‘मुद्गरदूतम् । अन्य प्रमुख दूतकाव्य हैं वासुदेव-कृत ‘शृङ्गसन्देशः’ विष्णुदास-कृत ‘मनोदूतम्, भोलानाथ-कृत ‘पान्थदूतकाव्यम्’ महालिङ्ग शास्त्री-कृत ‘भ्रमरसन्देशः’, बटुकनाथ शर्मा-कृत ‘बल्लवदूतम्’, पी.के. कृष्णमूर्ति शास्त्री-कृत ‘शुनकदूतम्-’, चिन्तामणि रामचन्द्र सहस्रबुद्धे-कृत ‘काकदूतम्’ रामाशीष पाण्डेय-कृत ‘मयूखदूतम्’ परमानन्दशस्त्री-कृत ‘गन्धदूतम्’, कृपाराम त्रिपाठी-कृत ‘तरङ्गद्तम्’, तथा अज्ञातकर्तृक ‘हंससन्देश’ ‘चकोरसन्देहः’ ‘मरुत्सन्देशः’ आदि। दयानिधिमिश्र-कृत ‘सूर्यदृतम्’, मधुसूदन तर्कवाचस्पति-कृत ‘हनुमत्सन्देशम्’, नारायण रथ-कृत ‘कपोतदूतम्’। प्रबोधकुमार मिश्र-कृत ‘स्वप्नदूतम्’ तथा मलयदूतम्’ भी इसी विधा के लघुकाव्य हैं। रागात्मक तत्त्व की प्रधानता के कारण दूतकाव्यों को यद्यपि गीतिकाव्यों के अन्तर्गत ही गिना जाना चाहिए, परन्तु सभी दूतकाव्यों में उत्कृष्ट गीतितत्त्व विद्यमान न होने से उनमें गीतिकाव्य बनने की क्षमता नहीं है। अतः उन्हें सामान्यतया लघुकाव्य विधा के अन्तर्गत श्रेणीबद्ध किया गया है। उनका विवेचन गीतिकाव्य के प्रसङ्ग में भी किया जा सकता है। १२७
अन्योक्ति-परक काव्य
अन्यापदेश रीति से बात कहने की रीति पुरानी है, जिसे अर्वाचीन युग में पण्डितराज जगन्नाथ ने नव जीवन प्रदान किया। लघुकाव्यकारों ने आधुनिक युग के जीवन की विषमताओं-जटिलताओं को कहने के लिए और हल्की-फुल्की छींटाकशी करने के लिए अन्योक्ति को माध्यम के रूप में चुना। कुछ काव्य पूर्णतः अन्योक्तिपरक लिखे गए तथा कुछ मुक्तकों में आंशिक रूप से अन्योक्तितमय पद्य सङ्कलित हुए। अन्योक्ति के माध्यम से कवियों ने व्यङ्योक्ति का भी काम लिया और समाज पर कटाक्ष भी किए। प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों, पशु-पक्षियों तथा विविध चेतन प्राणियों एवं अचेतन पदार्थों को प्रस्तुत रूप में सामने रखकर कवियों ने अप्रस्तुत मनुष्य आदि की प्रशंसा की और इस तरह जीवन के अनेक अनुभवों का रेखाङ्गन तथा सत्यों का उद्घाटन किया। यह अन्योक्ति-साहित्य संस्कृत भाषा की एक अमूल्य निधि है। अन्योक्तिमय लघुकाव्यों में कतिपय अपने नाम में ही ‘अन्योक्ति’ शब्द को समाविष्ट कर चलते हैं, जैसे मथुरा प्रसाद दीक्षित-कृत ‘अन्योक्ति-तरणिी”, अभिराजराजेन्द्र मिश्र-कृत ‘आर्यान्योक्तिशतकम्’ आदि। कतिपय अन्य काव्य ऐसे हैं जिनके नाम में अन्योक्ति शब्द नहीं है, पर वे उत्कृष्ट अन्योक्ति-काव्य हैं जैसे राम करण शर्मा-कृत ‘वीणा’, ‘सन्ध्या’ एवं ‘शिवशुकीयम्’ काव्य। स्फुट रूप में बिखरे हुए अन्योक्तिपरक पद्य तो अर्वाचीन काव्यों में भी हजारों की संख्या में भरे पड़े हैं।
हास्य-व्यङ्मयपरक काव्य
संस्कृत-साहित्य में हास्य की कमी सामान्यतया पाई जाती है। आधुनिक कवियों ने इस दिशा में कुछ योगदान किया है। शुद्ध हास्य-परक काव्य संख्या में कम हैं, परन्तु वर्तमान युग में अनुदिन बढ़ती सामाजिक विषमताओं, राजनैतिक आडम्बरों, दुहरे मानदण्डौं एवं घटते जीवन मूल्यों ने आधुनिक संस्कृत-कवि को भी तीखी बात कहने को विवश किया तथा अनेक कवियों ने सोत्प्रास शैली में व्यङ्ग्यमय पद्य लिखकर इस कुत्सित व्यवस्था के प्रति अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। विशेष रूप से स्वातन्त्र्योत्तर संस्कृत-काव्यों में अनुदिन गिरते राष्ट्रीय चरित्र, भष्टाचार तथा स्वतन्त्रता-प्राप्ति के दुरुपयोग आदि को कवियों ने व्यङ्ग्योक्तियों के माध्यम से प्रकट किया है और इस प्रकार मुक्तक काव्यों में स्फुट पद्यों में इनकी अभिव्यक्ति हुई है और व्यङ्ग्योक्ति अन्योक्ति-वक्रोक्ति से संवलित यह काव्यविधा अर्वाचीन संस्कृत-साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। इस युग में एम.पी. सम्पत्कुमार आचार्य ने काफी जैसे विषय पर काफीपानीयम्’ आदि तथा श्रीरंगम् बैंकटेश्वर ने ‘काफीशतकम्’ लघु काव्य लिखे तो वासुदेव आत्माराम लाटकर ने ‘अर्धखरार्भक काव्य की रचना की। हास्य-व्यङ्ग्य को ही विषय बनाकर लिखे गए कुछ काव्य इस प्रकार हैं-शैलताताचार्य-कृत ‘कपीनामुपवासः’, वागीश शास्त्री-कृत ‘नर्मसप्तशती,’ प्रशस्यमित्र शास्त्री-कृत ‘हासविलासः’ वनेश्वर पाठक-कृत ‘हीरोकाव्यम्’, शिवदत्तशर्मा चतुर्वेदी-कृत १२८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ‘हाहा-हूहू शतकम्’ आदि। रुद्रदेव त्रिपाठी, वीरभद्र मिश्र, केशवचन्द्रदाश, कृष्णलाल, राजेन्द्र मिश्र, देवदत्त भट्टि आदि की रचनाओं में व्यङ्ग्य का स्वर मुखर है। ‘मुद्गरद्तम्’ तथा ‘वानरसन्देशः व्यङ्ग्यविधा (सेटायर) के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
वैदेशिक-यात्रावृत्त-विषयक काव्य
वर्तमान शती में अनेक भारतीय संस्कृतज्ञ विद्वानों की भारत से बाहर के देशों और द्वीपों में यात्राएं हुईं। जर्मनी, फ्रांस, थाईलैण्ड, बाली आदि देशों की शैक्षणिक-सांस्कृतिक यात्राओं के विविध प्रकार के अनुभवों को इन कवियों ने अपनी कविताओं में रेखाड्कित किया। इन रचनाओं से संस्कृत को अन्तर्राष्ट्रीय विषय-वस्तु ग्रहण करने के कारण विस्तार मिला तथा आधुनिक, काव्य में नवीनता का प्रवर्तन हुआ। इस विधा के प्रमुख काव्य है सत्यव्रत शास्त्री कृत ‘शर्मण्यदेशः सुतरां विभाति’ तथा ‘थाईदेशविलासम्’, राजेन्द्र मिश्र-कृत ‘बालीप्रत्यभिज्ञानशतकम्’ डा. रमाकान्त शुक्ल-कृत ‘भाति मौरीशसम्’। इन यात्राओं के प्रसङ्ग में कवियों की जो विमान द्वारा यात्राएं हुई इन यात्रानुभवों को भी उन्होंने काव्यबद्ध किया और संस्कृत में विमान-काव्य की भी अवतारणा हुई। विमानयात्रा पर मुक्तक कविताएँ भी लिखी गईं और सम्पूर्ण लघुकाव्य या काव्यांश भी, यथा प्रभाकर नारायण कवठेकर-कृत भूलोकविलोकनम्’, राधावल्लभ त्रिपाठी-कृत ‘धरित्री-दर्शनम्’ तथा राजेन्द्रमिश्र-कृत ‘विमान-यात्राशतकम्’ आदि।
अन्तर्राष्ट्रीय चेतना-परक काव्य
यह विशेष रूप से ध्यातव्य विषय है कि उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी का संस्कृत-कवि राष्ट्रीय विषयों की तरह अनेक अन्तर्राष्ट्रीय वृत्तों एवं विचारों से प्रभावित हुआ और उन्हें अपने काव्यों में स्थान दिया। इस विशेषता के कारण संस्कृत-साहित्य ने अपनी पुरातन परम्परावादिता को त्याग कर नया रूप धारण किया। भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के चलते रहने पर विश्व एवं भारत के राजनैतिक मञ्च पर जो घटनाएँ घटीं वे इन लघुकाव्यों में प्रतिबिम्बित हुई। उदाहरणार्थ ऐसे काव्य है-केरलवर्म वलिय कोइतम्बुरान-कृत ‘विक्टोरियाचरितम्’, अप्पाशास्त्री-राशिवडेकर-कृत ‘उद्धाहमहोत्सवम्’ तथा राधा-कृष्ण गोस्वामी कृत ‘वैवाहिकवर्णनम्’ (प्रिंस ऑफ वेल्स का विवाह), शिवराम पाण्डेय-कृत ‘एडवर्डराज्याभिषेकदरबारम्’ तथा ‘जार्जाभिषेकदरबारम्’, क.स. अय्यास्वामी शास्त्री अय्यर-कृत ‘जार्जवंशम्’, म.क. कोच नरसिंहाचार्य-कृत ‘जार्जमहाराजविजयः’, जी.वी. पद्भनाभाचार्य-कृत ‘जार्जचरितम्’ आदि। इस प्रकार केवल जार्ज पञ्चम की प्रशस्ति में कई काव्य लिखे गए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उभर कर आई चेतना एवं विचारधारा ने भी संस्कृत-कवि को प्रभावित किया। लेनिन और मार्क्स का समाजवादी चिन्तन संस्कृत-कविता में आया, यथा पद्मशास्त्री-कृत ‘लेनिनामृतम्’ केवलानन्द शर्मा-कृत ‘लेनिनकुसुमाञ्जलिः’, शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी-कृत ‘कार्लमार्क्सशतकम्’ आदि। प्रसिद्ध जर्मन नाटककार मेक्सिम गोर्की के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर रघुनाथ प्रसाद लघुकाव्य चतुर्वेदी ने ‘मेक्सिमगोर्कीपञ्चशती’ लिखी। नये राष्ट्र के रूप में बंगलादेश के उदय पर रमेश चन्द्र शुक्ल ने ‘बँगलादेशः’ काव्य लिखा। हर्षदेव माधव की ‘जापानदेशे’, ‘मिस्रदेशे’ आदि अनेक कविताओं में विश्वचेतना प्रभूत मात्रा में परिलक्षित होती है।
छन्दोमुक्त निर्बन्ध काव्य
विगत दो दशकों से संस्कृत-साहित्य-जगत् में लघुकाव्य की एक अन्य चारा भी प्रवाहित हुई, जिसमें पारम्परिक छन्दोविधान का नितान्त अभाव है और यह कविता छन्द के बन्धन से नितान्त निर्मुक्त है। हाँ, उसमें अपने प्रकार की एक लय एवं गति विद्यमान है। उधर हिन्दी साहित्य में भी कविता छन्दों के बन्धन को तोड़कर प्रगतिवादी और फिर प्रयोगवादी युग में प्रवेश कर नये-नये प्रयोग कर रही थी। कुछ यहाँ से और कुछ पाश्चात्य काव्यशैली से प्रभाव ग्रहण कर संस्कृत में भी नई कविता का यह रूप बना। यह कविता समग्रतया आधुनिक युगबोध पर आश्रित है और आधुनिक मानव-जीवन के विविध पक्षों, मानसिक द्वन्द्वों, संत्रासों, पीडाओं एवं भावबोधों को उद्घाटित एवं अभिव्यजित करती है। नई संवेदनाओं, नये प्रतीकों एवं नई शैलियों को जन्म देने के कारण हम इसे ‘नई संस्कृत-कविता’ कह सकते हैं। इस विधा के काव्य किसी अन्य काव्य-श्रेणी में अन्तर्भूत न हो सकने के कारण सामान्यतया लघुकाव्य-विधा के अन्तर्गत ही परिगणित किये जा सकते हैं। इस विधा के प्रतिनिधि कवि एवं काव्य हैं-कृष्णलाल-कृत ‘उर्वीस्वनः’, ‘शिजारवः’ एवं ‘शशिकरनिकरः’, देवदत्त भट्टि-कृत ‘इरा’ और ‘सिनीवाली’, केशवचन्द्रदास-कृत ‘महातीर्थम्’ ‘भिन्नपुलिनम्’, ‘अलका’, ‘ईशा’ आदि, हर्षदेव माथव-कृत ‘रथ्यासु जम्बूवर्षाणां शिराणाम्’, इन्द्रमोहन सिंह-कृत ‘हिरण्यरश्मिः’, व्योमशेखर-कृत ‘अग्निजा’, मायाप्रसाद त्रिपाठी-कृत कतिपय काव्य आदि।
बाल-काव्य
संस्कृत में स्फुट रूप से वात्सल्य रस एवं बालवर्णन के अनेक सुन्दर प्रसङ्ग प्राप्त होते हैं, पर सामान्यतया यहाँ बाल-साहित्य का अभाव पाया जाता है। आधुनिक संस्कृत-कवियों ने इस कमी की ओर ध्यान दिया है और पृथक् बालोपयोगी साहित्य लिखना आरम्भ किया है। बालगीतों, बाल-नाटकों एवं बाल-कथाओं के सङ्कलन प्रकाशित होने लगे हैं। बालवर्णन-परक लघुकाव्यों में वासुदेव द्विवेदीशास्त्री के ‘बालकवितावलिः’ ‘दीपमालिका’ आदि काव्य, राम किशोर मिश्र-कृत ‘बालचरितम्’, गणेश गंगाराम पेंढारकर-कृत ‘शिशुलीलालाघवम्’, श्रीधर भास्कर वर्णेकर-कृत ‘वात्सल्यरसायनम्’ आदि उल्लेखनीय हैं। लघु बाल-कविताओं के विकास में ‘बालसंस्कृतम्’ ‘लोकसंस्कृतम्’ तथा ‘चन्दामामा’ आदि संस्कृत-पत्रिकाओं का बहुत योगदान है। मा आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास
शतक काव्य
लघुकाव्य का यह वर्गीकरण विषयानुसारी न होकर स्वरूपानुसारी है। प्राचीन संस्कृत-साहित्य की तरह अर्वाचीन साहित्य में भी सौ श्लोकों के शतक काव्य तथा सात सौ श्लोकों के सप्तशती-काव्य लिखे गए, जिनमें शतक-काव्यों की संख्या बहुत विशाल है। किसी एक विषय को लेकर उस पर सौ श्लोक लिख देना लघुकाव्य का एक उत्कृष्टतम रूप है। विषय की दृष्टि से विचार किया जाय तो ये शतक काव्य प्रायः देवस्तुति, लोकनीति तथा राष्ट्रभक्ति विषयों से सम्बद्ध हैं। हास्य-व्यङ्ग्य तथा यात्रावृत्त आदि विषयों पर भी शतक काव्य हैं, कतिपय स्फुट विषयों के भी शतक हैं। सप्तशती-काव्यों में गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न-कृत ‘गिरिधरसप्तशती’, शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी-कृत ‘स्फूर्तिसप्तशती’, राजेन्द्र मिश्र-कृत ‘अभिराजसप्तशती’ का उल्लेख किया जा सकता है। कतिपय प्रमुख शतक काव्य में हैं-गुमानी कवि-कृत ‘उपदेशशतकम्’, प्रीतमलाल नृसिंहलाल कच्छी-कृत ‘शक्तिशतकम्’, ति.गु. वरदाचार्य-कृत ‘कृष्णशतकम्’, ‘भास्करशतकम्’ तथा ‘कालहस्तीश्वरशतकम्, विठलदेवमुनिसुन्दर शर्मा-कृत ‘वीराञ्जनेयशतकम्’, ‘श्रीनिवासशतकम्’, ‘शम्भुशतकम्, ‘देवीशतकम्’ “छायापतिशतकम्’, महादेवशास्त्री कवितार्किकचक्रवर्ती-कृत “भारतशतकम्’, रामकृष्णकवि-कृत ‘सारशतकम्’, हरेकृष्ण शतपथी-कृत ‘कविशतकम्’, गदाधर दाश-कृत ‘मेघशतकम्’, ‘विद्याधरशास्त्री-कृत ‘अनुभवशतकम्’, पद्मशास्त्री-कृत ‘सिनेमाशतकम्’ श्रीधर भास्कर वर्णेकर-कृत ‘स्वातन्त्र्यवीरशतकम्’, कैलाशनाथ द्विवेदी-कृत ‘गुरुमाहात्म्यशतकम्’, केवलानन्द शर्मा-कृत ‘यतीन्द्रशतकम्’, कृष्णभाऊ शास्त्री धुले-कृत ‘विज्ञानशतकम्’, पी. रामचन्द्रडु-कृत ‘कुमतिशतकम्’, नलिनी शुक्ला-कृत ‘वाणीशतकम्’, रामकरण शर्मा-कृत ‘पाथेयशतकम्’, श्रीकृष्ण सेमवाल-कृत ‘सर्वमङ्लाशतकम्’ एवं ‘‘इन्दिराकीर्तिशतकम्’, रामकृष्णशास्त्री कृत ‘इन्दिराशतकम्’ तथा रामाशीष पाण्डेय-कृत ‘इन्दिराशतकम् प्रहेलिकाशतकम्’ आदि। अनेक काव्य ऐसे भी हैं जिनमें श्लोकसंख्या तो सौ के लगभग ही है, पर नाम्ना उन्हें ‘शतकम्’ नहीं कहा गया है।
लहरी काव्य
शतक काव्य की भाँति लहरीकाव्य भी आधुनिक संस्कृत-लघुकाव्य की एक तकनीकी विधा है जो विषय पर आधृत न होकर रचना वैशिष्ट्य पर आधृत होती है। अनेक कवियों ने अपने लघुकाव्यों के नाम तत्तत् विषयों के साथ ‘लहरी’ शब्द जोड़कर रखे हैं। अतः भक्ति, प्रेम, राष्ट्रीय भावना, चरितप्रशस्ति, वर्तमान युगचेतना आदि विविध विषयों पर इन लहराकाव्यों की रचना हुई है। अतः पूर्वगृहीत अनेक विषय ही इन काव्यों के विषय हैं। कतिपय प्रमुख लहरी-काव्यों के नाम इस प्रकार हैं- पण्डिता क्षमाराव-कृत ‘मीरालहरी’, प्रकाशशास्त्री-कृत ‘भावलहरी’, मेघाव्रत-कृत ‘दयानन्दलहरी’, एन्. कुमारन् आशान-कृत ‘सीताविचारलहरी’, काशीनाथ रघुनाथ वैशम्पायन-कृत-‘जवाहरगंगालहरी’, के. भास्कर १३१ पिल्लई-कृत ‘प्रेमलहरी’, गोपीनाथ द्राविड़-कृत ‘काशीलहरी’, विद्याधरशास्त्री-कृत ‘वैचित्र्यलहरी, ‘मत्तलहरी’, ‘लीलालहरी’, जगदीशचन्द्र आचार्य-कृत -‘संगीतलहरी’, मधुकरशास्त्री-कृत ‘मारुतिलहरी’ एवं ‘मातृलहरी, श्री भाष्यम् विजयसारथि-कृत ‘विषादलहरी’, श्रीधर भास्कर वर्णेकर-कृत ‘मातृभूलहरी” राधावल्लभ त्रिपाठी-कृत ‘लहरीदशकम्’ आदि।
चित्रकाव्य
संस्कृत में चित्रकाव्य-रचना की परम्परा प्राचीन है, पर अर्वाचीन कवियों ने भी इस परम्परा का परित्याग नहीं किया है और समय-समय पर विविध प्रकार से अपनी रचना चातुरी का प्रदर्शन किया है। इस प्रकार के काव्य प्रधानतया शब्दगत चमत्कार से परिपूर्ण होते हैं। इनका उद्देश्य मनोरञ्जन एवं बौद्धिक व्यायाम, दोनों है। संस्कृत पद्य-रचना में होने वाले विविध प्रयोग जैसे प्रहेलिका, प्रश्नोत्तर, चित्र-रचना, समस्यापूर्ति आदि इस विधा के अन्तर्गत आते हैं। इस युग में भी कवियों ने शब्दों के माध्यम से विविध प्रकार के आकारचित्र बनाने की परम्परा को अक्षुण्ण रखा है। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने अपने “साहित्यवैभव’ एवं ‘जयपुरवैभव’ काव्यों में आकारचित्र शैली को पर्याप्त स्थान दिया है। तथा ‘चित्रचत्वर’ नामक एक पृथक् सर्ग भी लिखा है। इसके अतिरिक्त इस विधा के कतिपय लघुकाव्य हैं-कविचक्रवर्ती देवीप्रसाद-कृत ‘चित्रोपहार-काव्य’, दामोदर मिश्र-कृत ‘चित्रबन्ध-काव्य’, रामरूप पाठक-कृत, ‘चित्रकाव्यकौतुक’, रामावतारशर्मा-कृत ‘चित्रबन्धावतारिका’, ‘वी. रामचन्द्रन्-कृत ‘रामचरित-चित्रकाव्य’, रुद्रदेव त्रिपाठी-कृत ‘चित्रालङ्कार-चन्द्रिका’, श्रीजीवन्यायतीर्थ-कृत ‘सारस्वतशतकम्’ नित्यानन्द शास्त्री-कृत ‘हनुमदूतम्’, मधुसूदन तर्कवाचस्पति-कृत ‘हनुमत्सन्देशम्’, पं. मूलचन्द्र शास्त्री-कृत ‘वचनदूतम्’। किसी काव्य के पाद, पद, पदांश, सूक्तिवाक्य आदि को आधार बनाकर अनेक समस्यापूर्तियाँ प्रचलित हुई हैं। समस्यापूर्ति- साहित्य के विविध रूप संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं में देखे जा सकते हैं। अप्पाशास्त्री राशिवडेकर ने ‘समस्यापूर्ति’ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन १६०० ई. से आरम्भ किया था। आधुनिक संस्कृत-पत्रिकायें भी निरन्तर इस सामग्री को प्रकाशित कर रही हैं। संस्कृत-कवि सम्मेलनों में समस्यापूर्ति के विपुल स्वरूप का प्रदर्शन होता है। समस्यापूर्ति को आधार बनाकर आयोजित किये गए कवि-सम्मेलन के आधार पर, अनेक कवियों की समस्यापूर्तिविषयक पद्यों के सङ्कलन ‘कविभारतीकुसुमाञ्जलिः (वाराणसी), ‘वाणीविलसितम्’ प्रथम एवं द्वितीय भङ्गी (दो खण्डों में) गङ्गानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इलाहाबाद से प्रकाशित हुए हैं।
नीति-सूक्ति-परक काव्य
प्राचीन संस्कृत-काव्य परम्परा की भाँति अर्वाचीन संस्कृत में भी नीतियों एवं सूक्तियों से समन्वित लघुकाव्य रचे गए। जीवन के विविध व्यवहारों, रीतियों, नीतियों को विषय बनाकर तथा विविध सूक्तियों को गृहीत कर कवियों ने मुक्तक काव्यों का प्रणयन किया। १३२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास लघुकाव्यों में ऐसे सैकड़ों नीतिवचन एवं सुभाषितवचन भरे पड़े हैं। केवल नीति पर आधारित कतिपय सूक्ति-काव्य इस प्रकार हैं-गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न-कृत’ ‘नवरत्ननीतिरचनावलि’ एवं ‘अमरसूक्तिसुधाकर’, नित्यानदशास्त्री-कृत ‘आर्यामुक्तावली’ अमृतवाग्भवाचार्य-कृत ‘अमृतसूक्तिपञ्चाशिका’, प्रा.दे.खे. खण्डीकर-कृत ‘सुवचनसन्दोहः’ आदि।
प्रकीर्ण काव्य
आधुनिक संस्कृत-लघुकाव्यों के प्रस्तुत वर्गीकरण से यह स्पष्ट होता है कि ये प्रायः किसी न किसी विषय को प्रधान रूप से लेकर चले हैं। पर कुछ काव्य ऐसे भी लिखे गए जो एक नहीं अपितु अनेक स्फुट विषयों के सङ्कलन हैं। ये काव्य विविध विषयों के मिश्रित रूप हैं। इस प्रकार के कुछ काव्यों में तो इन मुक्तकों को शीर्षक देकर विभिन्न वर्गों में विभाजित कर लिया गया है और कुछ अन्य काव्यों में मुक्त रूप से विविध विषयों पर लिखे गए पद्यों का सङ्कलन कर लिया गया है। विविध मिश्रित विषयों पर रचे गए इन काव्यों को हम प्रकीर्ण लघुकाव्य कह सकते हैं। ऐसे काव्यों की संख्या संस्कृत में प्रभूत है। कतिपय प्रमुख प्रकीर्ण काच्यों के नाम इस प्रकार हैं-हरिपाददत्त-कृत ‘कवितावली’, चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख-कृत ‘संस्कृत-काव्यमालिका’, विश्वेश्वर विद्याभूषण-कृत ‘काव्य-कुसुमाञ्जलिः, भट्ट मथुरानाथ शास्त्री-कृत ‘पद्यमुक्तावलिः’ अनन्त विष्णु काणे-कृत ‘काव्यसरित्’, श्रीकान्त त्रिपाठी-कृत ‘श्रीकान्त-कविताकलापः’, रामनाथ आचार्य-कृत ‘पद्यमालिका’, यतीन्द्रनाथ भट्टाचार्य-कृत ‘काकली’, महालिङ्ग शास्त्री-कृत ‘किङ्किणीमाला’।
अनूदित काव्य
आधुनिक युग में विभिन्न भारतीय तथा वैदेशिक भाषाओं के सुन्दर काव्यों के संस्कृत भाषा में अनुवाद की भी प्रवृत्ति पर्याप्त मात्रा में प्रचलित हुई। अनेक संस्कृत-कवियों ने अन्य भाषाओं के लघुकाव्यों का संस्कृत में पद्यानुवाद प्रस्तुत किया जिससे संस्कृत-साहित्यकी समृद्धि में वृद्धि हुई। ऐसे अनूदित काव्यों को हम संस्कृत लघुकाव्य का ही एक प्रकार मानते हैं। प्रमुख अनूदित काव्य हैं-एम.ओ. अवरा के मूल मलयालम काव्य का श्री के.पी. नारायण पिषारोटी-कृत ‘महात्यागी’ नाम से किया गया अनुवाद, उमर खैयाम की रूबाइयों का पं. गिरिधर शर्मा द्वारा ‘अमरसूक्तिसुधाकर’ नाम से किया गया अनुवाद, वी. सुब्रह्मण्य अय्यर द्वारा ‘पद्यपुष्पाञ्जलि’ नाम से किया गया अंग्रेजी कविताओं का संस्कृतनुवाद, मराठी कवि मोरो पन्त की कविताओं का डी.टी. सकूरिकर द्वारा ‘गीर्वाणकेकावली’ नाम से किया गया अनुवाद, टैगोर की बँगला कविताओं का फटिकलाल दास-कृत पद्यानुवाद, ‘तिरुक्कुरल’ तमिल कविता का अप्पा वाजपेयी द्वारा किया गया ‘सुनीतिकुसुममाला’ नामक काव्यानुवाद, तमिल कवि औचई की कविताओं का वाई. महालिङ्ग शास्त्री द्वारा ‘द्रविडार्यसुभाषितसप्तति’ नाम से किया गया अनुवाद; तेलुगु भाषा के तेलगुशतक, सुमतिशतक, वेमनशतक, दाशरथिशतक, कृष्णशतक, भास्करशतकों के चित्तिगुदुरु वरदाचारियर-कृत अनुवाद, श्रीअरविन्द लघुकाव्य की कविताओं का टी.वी. कपालि शास्त्री द्वारा ‘कविताञ्जलिः’ नाम से किया गया अनुवाद, रघुनाथ चौधरी के असमिया भाषा में लिखित काव्य का ‘केतकी-काव्यम्’ नाम से पं. मनोरञ्जन शास्त्री द्वारा किया गया अनुबाद, मलयालम-कवि कुमारन आशान् के काव्य का एन. गोपाल पिल्लई द्वारा ‘सीताविचारलहरी’ नाम से किया गया अनुवाद, हिन्दी भाषा के कवि बिहारी की सतसई का प्रेम नारायण द्विवेदीकृत ‘सौन्दर्यसप्तशती’ नामक अनुवाद, अंग्रेजी कवियों की कविता का गोविन्दचन्द्र पाण्डेय द्वारा ‘अस्ताचलीयम्’ के नाम से किया गया अनुवाद। संस्कृत-लघुकाव्य की इन विविध प्रवृत्तियों एवं विधाओं का पर्यालोचन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आधुनिक युग में लघुकाव्य ने विविध नये-नये रूप धारण किये हैं, उसका बहुमुखी विकास हुआ है और उसने आधुनिक युग की अनेक धाराओं में प्रवाहित होकर अपना क्षेत्र विस्तार किया है। इन विविध धाराओं और विषय विस्तारों को ध्यान में रखकर ही इन लघुकाव्यों का वर्गीकरण किया गया है। इसके अतिरिक्त भी इनके कुछ और वर्ग बन सकते हैं और कुछ लघुकाव्य उनमें समाविष्ट हो सकते हैं। परन्तु अर्वाचीन युगीन समस्त प्रमुख प्रवृत्तियों एवं विधाओं का आकलन यहाँ कर लिया गया है। इस विवेचन से संस्कृत काव्य की दो शताब्दी के कालक्षेत्र में फैली विविधताओं का ज्ञान होता है। इस विधानुसारी विवेचन के पश्चात् ही अब कवि-काव्यानुसारी विवेचन तथा साहित्येतिहास-समीक्षण करना सुविधाजनक एवं समीचीन होगा।