०४ बीसवीं शती में प्रकाश में आये महाकाव्यकार

अखिलानन्द शर्मा

(उ.प्र., १८८०-१६५५) वदायूं जिले में सनाढ्य ब्राह्मण कुल में उत्पन्न, पं. टीकाराम के सुपुत्र कवि अखिलानन्द शर्मा ने प्रथम बार, आर्यसमाज के प्रतिष्ठापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के चरित को आधार बनाकर ‘दयानन्द-दिग्विजय’ नामक महाकाव्य का प्रणयन किया, जो इण्डियन प्रेस, प्रयाग से प्रथम बार १६०६ में, और बाद में आर्यधर्मप्रकाशन, सामली से १६७० में प्रकाशित हुआ था। बाद में इसी विषय पर दिलीपदत्त शर्मा ने मुनिचरितामृतम् महाकाव्य (दर्शन प्रेस, ज्वालापुर) और मेधाव्रताचार्य ने दयानन्ददिग्विजय महाकाव्य की रचना की। इक्कीस सर्गों के दयानन्ददिग्विजय महाकाव्य में कवि अखिलानन्द शर्मा ने अपने काव्य के नायक स्वामी दयानन्द को भारत के उन्नायक के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए लिखा यत्कृतं मुनिवरेण भारते भारतोदयकृते शिवं कृतम् । भारतोन्नतिनिविष्टचेतसा भारते भवतु तन्मुदे सताम्।। १८/६२२४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (भारत की उन्नति के लिए दत्तचित्त मुनिश्रेष्ठ ने भारत में भारत के उदय के लिए जो कल्याण का कार्य किया वह यहाँ सज्जनों को आनन्दित करे।) कवि शर्मा की, जीवन के आरम्भ से आर्य-समाज के क्षेत्र में शिक्षा-दीक्षा हुई। उन्होंने उस काल को देखा जिसमें भारत में एक ओर राष्ट्रियता की भावना जाग उठी थी, दूसरी ओर उसमें व्याप्त सामाजिक कुरीतियों के निवारण के प्रति स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे मनीषियों की ओर से भारतीय जन-मानस को जगाने के लिये उद्घोष किया जा रहा था। यह वह काल था जिसमें संस्कृत का रचनाकार अपने लिये नये आयाम की तलाश भी कर चुका था। कवि अखिलानन्द ने स्वामी जी के यशोगान स्वरूप अपनी रचना के प्रति ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखा प्रणम्य भक्त्या परमेश्वरं परं दयालुमाकारविशेषनिर्गतम् । मया दयानन्दयशोविभूषितं विरच्यते काव्यमिदं विलोक्यताम् ।। १/१ (आकार विशेष से रहित परम दयालु परमेश्वर को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके मैं स्वामी दयानन्द के यश से विभूषित काव्य की रचना कर रहा हूँ, इसे देखें।) 1 प्रस्तुत महाकाव्य परम्परा से कुछ इस अर्थ में अलग माना जा सकता है, कि कवि ने न तो किसी देवता को और न ही अपने किसी आश्रयदाता के जीवन-चरित को विषय बनाकर लिखा, बल्कि उसकी रचना का विषय था एक महान् समाज-सुधारक महापुरुष का उदात्त व्यक्तित्व। और, अपने सूर्योपम चरित नायक के सम्बन्ध में उसने यह भी कहा अखडपाखण्डविवादवर्धनासमुत्थनानामतवादवारिदान् । विधूनयन् यो जगतीतले नवं ततान वेदोदितथर्ममुत्तमम् । १/२१ (जिन स्वामी दयानन्द ने फैले पाखण्ड के कारण उत्पन्न नाना मत-वाद के मेघों को हटाते हुए संसार में नये उत्तम वेदोक्त धर्म को प्रसारित किया।) कवि अखिलानन्द की भाषा प्राचीन परम्परागत रचनाकारों की भांति कवित्व प्रदर्शन को प्रश्रय देने वाली न थी, फिर भी उसमें सहज भाव से अलंकारों की संग्रथना से आद्योपान्त काव्यात्मक सौन्दर्य का आकलन किया जा सकता है। आश्चर्य है कवि ने चतुर्दश सर्ग से सर्वतोगमनबन्ध, षोडशदलकमलबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध आदि का प्रयोग कर डाला है। स्वामी दयानन्द रूप सूर्य का उदय हो चुका था, कवि के शब्दों में - अथ स्वविद्याविषयोत्सुको यतिर्दिगन्तरेषु प्रविसारयन् प्रभाम् । मुहुर्दिदीपे तिमिरं विदारयन् दिनोदये भानुरिवातिदुःसहः ।। ११/१ (तब अपनी विद्या के सम्बन्ध में उत्सुक यति दयानन्द दिनोदय काल में सूर्य की भांति दिशाओं में प्रभा को फैलाते तथा अंधकार को बार-बार विदीर्ण करते हुए अतिदुःसह रूप में दीप्त हुए) HARITMERI महाकाव्य नवम सर्ग में कवि ने, जहां नाटक का रूपक देकर महर्षिदयानन्द का यशोवर्णन प्रस्तुत किया है वह उसका, मेरी दृष्टि में अभिनव प्रयोग है - लसन्ति यत्राग्निरविप्रभज्जनाः करे दधाना निगमत्रयीपटान्। गुणत्रयीनाटकसूत्रतां गताः प्रधानभृत्या इव सूचनोधताः।। (हाथ में तीनों वेदों के पट धारण किये हुए, तीनों गुणों के नाटक के सूत्र बने हुए, सूचना देने को उद्यत प्रधान-भृत्यों की भांति अग्नि, सूर्य और वायु, जहां शोभा प्राप्त करते हैं) इसका उपसंहार करते हुए कवि ने लिखा है - इति प्रशस्ते नवरङ्गमण्डपे समागते चापि समस्तमानवे। प्रवक्तुकामा पदविक्रमक्रमं पुरो दिदीपे ननु तद्यशोनटी।। (इस प्रकार प्रशस्त्र रङ्ग-मण्डप पर, सभी लोगों के आ जाने पर, पद-विक्रम के क्रम को बताना चाहती हुई उनके यश की नटी प्रकट हुई) सबसे बड़ी दयनीयता इस बात की थी कि विदेश के लोग धर्म की खोज में लगे हुए थे और अपने देश के वासी सुख की नींद सो रहे थे महानयं शोक इहास्ति विस्तृतो विदेशजाताः किल धर्ममार्गणम्। प्रकुर्वते देशनिवासिनो जनाः सुखेन निद्रामधिगम्य शेरते।। १३/८१ महाकाव्य के अन्त में अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए कवि ने लिखा है - इति परमदयालुर्यस्य साहाय्यमेत्य व्यरचि महदपीदं काव्यरत्नं मयाऽरम्। निखिलजगदधीशः सोऽद्य मे वन्दिताङ्घिर्दिशतु सकलभावैरुत्तमानन्दमित्योम् ।।२१/६६ (इस प्रकार, जिनकी सहायता प्राप्त कर मैंने इस महान् भी काव्य-रत्न का शीघ्र निर्माण कर डाला, वह परमदयालु, समस्त संसार के स्वामी सम्पूर्ण भावों से बन्दित चरणों वाले परमात्मा उत्तम आनन्द प्रदान करें)

सखाराम शास्त्री भागवत

(महाराष्ट्र १८८६-१९३१) कवि का जन्म करवार भूधर दुर्ग के निकट वेदगङ्गा नदी के तटवर्ती गारगोटी" ग्राम में हुआ। विविध शास्त्रों में निष्णात कवि भागवत के अन्तिम दिन सतारा में बीते। कवि ने कई स्तोत्र भी लिखे और ‘ज्ञानेश्वरी’ के चरमाध्यायषट्क का संस्कृत में अनुवाद भी किया, जो प्रकाशित नहीं हुए। इन्होंने अपने मित्रों को संस्कृत में पद्यबद्ध पत्र भी लिखे। ये अपनी रचना ‘अहल्याचरित’ महाकाव्य के पूर्ण होने के कुछ ही समय बाद दिवंगत हो गये। इसे गोविन्द रामचन्द्र राजोपाध्याय ने सतारा से १६२७ में प्रकाशित किया। कवि के मन में त्रिस्थली-प्रयाग, काशी और गया की यात्रा के प्रसंग में अहल्या देवी द्वारा बनवाये गये धर्मशाला और विष्णु-मन्दिर आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास को देखने के पश्चात् आलोच्य रचना के निर्माण का संकल्प उदित हुआ था। “कवि परमानन्द ने शिवभारत की रचना की तो इस कवि ने अहल्याभारत की”। सत्रह सर्गों में निर्मित अहल्याचरित (महाकाव्य) में इस विधा की परम्परा से कुछ हट कर कवि ने इस रचना को गुरु-शिष्य-संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है। प्रथम सर्ग में अहल्या के जन्म और बाल्यकाल का वर्णन है। “अहल्या” शब्द का निर्वचन, कवि की कल्पना के अनुसार इस प्रकार है पैतृकी वृत्तिरेतेषां हल्याऽऽसीन्मेषपालिका। त्यक्त्वा नूनमहल्येयं भविता राष्ट्रपालिका।। १/३६ (हल पर आधारित तथा भेड़ पालन वाली उनकी पैतृक जीविका थी, उसे छोड़कर निश्चय ही राष्ट्र का पालन करने वाली यह अहल्या होगी।) अहल्या का खण्डूजिराय के साथ विवाह होता है। तृतीय में, संसार-सौख्य का वर्णन है। अहल्या गर्भवती होती है, कवि की कल्पना है स्नुषाऽप्यहल्या रजनी विभाति गर्भो हिमांशुगंगनं च कुक्षिः। मल्लादिरायस्य च शोभमानः सौधो महान शारदशुक्लपक्षः।। स्वातीघनो वाऽथ स राजपुत्रो भार्या सुशीला नवशुक्तिका वा। गर्भस्तदा मौक्तिकनामकोऽभून्मल्लारिरायस्य गृहं समुद्रः ।। ३/३०,३१ (वधू अहल्या रजनी थीं, गर्भ चन्द्रमा, कोख आकाश, महल्लारिराय का सुहावना प्रासाद शरत्काल का शुक्लपक्ष था अथवा स्वाती का मेघ वह राजपुत्र, भार्या नई शुक्ति, गर्भ मौक्तिक और मल्लारिराय का भवन समुद्र था।) कवि के अनुसार यह अहल्या भी सतियों में अग्रगण्य है सतीषु ताराप्रमुखासु पूर्व श्रेणीमहल्या प्रथमामवाप। यथा तथाऽस्मिन् समयेऽप्यहल्या श्रेष्ठैव तत्कालसतीष्वभूत्सा।। १/३८ (जिस प्रकार पुराकाल में, तारा आदि सतियों में अहल्या प्रथम श्रेणी की सती हुई उसी प्रकार इस समय भी अहल्या अपने काल की सतियों में श्रेष्ठ हुई।) द्वितीय में, मल्लारि के पुत्र खण्डेराव के साथ अहल्या के विवाह का वर्णन कवि ने शास्त्रीय विधि तथा महाराष्ट्र की लोकपरम्परा के अनुसार करके उसमें सजीवता ला दी है रङ्गक्रीडा वीटिकानां प्रदानं स्यादुन्मोको हस्तपूगीफलस्य। नामग्राहं सर्वसीमन्तिनीभिः साकं सोऽभूदुत्सवो मण्डपे स्वे।। २/३३ (रङ्ग की क्रीडा, पान का बीड़ा देना, हाथ में रखे पूगीफल का खोलना तथा सभी महाकाव्य २७ सुहागिनियों के साथ नाम ग्रहण-इस प्रकार वह अपने मण्डप में उत्सव बन गया) जाटों के साथ युद्ध में मधुपान का व्यसनी खण्डेराव मारा जाता है। अहल्या वैधव्य का भाजन बनती है। दोनों के विषय में कवि लिखता है तमःप्रधानाचरितश्च भर्ता सत्त्वप्रधानाचरिता च तत्स्त्री। भूपस्य गेहेऽवसतामिमौ द्वौ तमःप्रकाशाविव भिन्नरूपौ।। ४/१२ (तमोगुणी आचरण वाला पति, सत्त्व प्रधान आचरण वाली उसकी पत्नी, इन दोनों ने ही राजभवन में तम और प्रकाश की भांति भिन्न रूप होकर निवास किया।) खण्डेराव की मृत्यु पर मल्लारिराय और अहल्या का विलाप बहुत सहज बन पड़ा है। कालिदास के द्वारा प्रस्तुत अज-विलाप और रतिविलाप की स्मृति उत्पन्न होती है। जब अहल्या मरण के लिए तैयार होती है तब मल्लारिराय कहते हैं - बालिके। मम कुलाम्बुधिमुक्ते त्वं सहाभिगममद्य करोषि। त्वत्पुरो दृढशिलां विनिधाय हन्मि मस्तकमिमं मृतिमाप्तुम् ।। ६/३८ (मेरे कुल के समुद्र की मुक्ता हे बालिके ! तू आज पति के साथ सती होकर स्वर्ग जाना चाहती है ? इससे पूर्व, मैं तेरे सामने मजबूत चट्टान रख कर मस्तक फोड़कर मर जाऊँगा।) अन्त में कहते हैं त्वज्जीवने जीवति राष्ट्रमेतत् त्वदत्यये नश्यति तत्क्षणं मे। इतः परं नो कथयामि तुभ्यं प्रियस्व वा पालय वा यथेष्टम्।। ६/१४६ (तेरा जीवन बना रहेगा तब मेरा यह राष्ट्र जीवित रहेगा, तेरे मरते ही तत्काल यह नष्ट हो जायेगा, इससे आगे तुझसे नहीं कहता हूँ, तू जो चाहे, मरे या राष्ट्र का पालन करे।) कवि केवल घटनाओं के निर्देश को प्रश्रय नहीं देता। उसकी यह रचना आधुनिक इस अंश में है कि उसने वर्णनों या वार्तालापों में सन्तुलन नहीं खोया है और न ही भाषा को अनावश्यक अलंकारों के बोझ से ग्रस्त किया है। अहल्या के प्रति उसकी निष्ठा उसके प्रत्येक पद्य में झलकती है। वह उसे शिवाजी महाराज के समकक्ष रखता है पूर्व शिवाजीनृपतिः किलैकः शूरेषु साध्वीषु तथा ह्यहल्या। चण्डांशुरेको जगतीतले वा ज्योत्स्ना जनानन्दकरी तथैका ।। (पहले शूरों में एक शिवाजी महाराज हुए और साध्वियों में अहल्या बाई। संसार में प्रखर किरणों वाला एक सूर्य है अथवा लोगों को आनन्दित करने वाली चन्द्रिका ।) आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास खेद है कि एक अच्छा निर्माण होने के बाद भी यह रचना प्रायः आज अनुल्लिखित ही रहती है।

मेधावत

(महाराष्ट्र १८६३-१९६४) नासिक जनपद के अन्तर्गत “येवला’ में सनातनधर्मी परिवार में जनमे आचार्य मेधाव्रत की शिक्षा आर्य समाज के गुरुकुलीय वातावरण में हुई। इन्होंने आर्य कन्या विद्यालय, बड़ौदा के प्रधानाचार्य के रूप में भी सेवा की। इनका संस्कृत में ‘कुमुदिनीचन्द्र’ नाम का उपन्यास है। इस कवि ने दयानन्ददिग्विजय तथा ब्रह्मर्षिविरजानन्दचरित नाम के दो महाकाव्यों का प्रणयन किया। दयानन्ददिग्विजय के पूर्वार्ध का प्रकाशन १६३८ ई. में आर्यकन्यामहाविद्यालय से तथा उत्तरार्ध का १६४७ ई. में हुआ । उत्तरार्ध के प्रकाशक हैं- श्री सुबोधचन्द्र सत्यव्रततीर्थ विद्यालङ्कृत, जो गुरुकुलविद्यामन्दिर, सूपा (नवसारी) में अध्यापक रहे हैं। हम कह चुके हैं कि आचार्य मेधाव्रत की रचना के पूर्व स्वामी दयानन्द के जीवन पर आधारित दो महाकाव्य प्रकाश में आ चुके थे-एक अखिलानन्द शर्मा द्वारा लिखित दयानन्ददिग्विजय (१६१०) और दूसरा दिलीपदत्त शर्मा का मुनिचरितामृत (१६१८)। नाना कुरीतियों से भरे भारतीय समाज में वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा और समाज-सुधार के पवित्र उद्देश्य को लेकर संघर्ष करने वाले स्वामी दयानन्द का जीवन अनेक कवियों की लेखनी का विषय बना। आचार्य मेधाव्रत ने उस “नररत्न” को अपनी काव्यरचना का विषय बनाया। इदमेव विशिष्टमन्तरं नररत्ने च पृथग्जने च यत्। विपदः प्रतिबुध्य स द्रुतं यतते दिव्यपदोपलब्धये।। द.दि.५/६२ (नर-रत्न तथा सामान्य जन में यह विशेष अन्तर होता है कि नररत्न विपत्तियों को ललकार कर शीघ्र दिव्य-पद की उपलब्धि के लिए प्रयास करता है।) कवि के अनुसार स्वामी दयानन्द ने मनुष्य के चित्त की भित्ति पर आर्य संस्कृति के आदर्श-चित्र का अंकन किया, जो अनेक दृष्टान्त के सु-वर्ण से सुन्दर था अनेकदृष्टान्तसुवर्णसुन्दरं य एवमादर्शसुचित्रमालिखत्। नृचित्तभित्तावतुलार्यसंस्कृतेरहो दयानन्दयतिर्जयत्यसौ।। १/४२ अपने दूसरे महाकाव्य ब्रह्मर्षि विरजानन्दचरित के दस सर्गों में स्वामी दयानन्द के गुरु विरजानन्द के उदात्त जीवन को कवि ने सम्भवतः पहली बार संस्कृत जगत के समक्ष उपस्थापित किया। अपने शिष्य दयानन्द से स्वामी विरजानन्द ने “गुरुदक्षिणा” कवि के शब्दों में इस रूप में मांगी - न सौम्य वाञ्छामि सुवर्णदक्षिणां प्रयच्छ मे जीवनमेव केवलम् । स्वदेशधर्मोद्धरणाय वत्स ते यतो नियुञ्जीय तथा श्रुतं कुरु।। ८/५० महाकाव्य २E (हे सौम्य! मैं तुझसे सुवर्ण की दक्षिणा नहीं चाहता। तू अपने जीवन को ही स्वदेश के उद्धार के लिए मुझे अर्पित कर। हे वत्स, जिस कारण तुझे नियुक्त करूं तू मेरी बात मान)

बदरीनाथ झा

(बिहार १८६३-१९७४) “कविशेखर” की उपाधि से विभूषित कविवर झा का जन्म मधुबनी मण्डल के सरिसब ग्राम में हुआ। यह ग्राम बहुत पहले से विद्वानों तथा कवियों की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है। पं. झा ने विविध शास्त्रों का विधिवत अध्ययन करके साहित्य के क्षेत्र में अपनी सहजात विशिष्ट प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इन्होंने धर्मसमाजसंस्कृतमहाविद्यालय, मुजफ्फरपुर में साहित्य का अध्यापन किया। राधा-कृष्ण की उपासना को समर्पित कविशेखरजी ने संस्कृत और मैथिली में अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया, जिनमें उल्लेखनीय हैं- संस्कृत का महाकाव्य “श्रीराधापरिणय’ और मैथिली का एकावलीपरिणय। श्रीराधापरिणय महाकाव्य बीस सों का है और इसका प्रकाशन १६३६ ई. में विजय प्रेस, मुजफ्फरपुर से हुआ। कवि ने प्रथम-सर्ग में पञ्चम जार्ज तथा मिथिलेश रमेश्वर सिंह के प्रति शुभाशंसा के पद्य लिखे हैं। सम्पूर्ण महाकाव्य एक ओर परम्परागत महाकाव्यविधा को आधार बना कर रचित है तो दूसरी ओर कविकी परिनिष्ठित भाषा और आई वैष्णव मानसिकता से ओतप्रोत होने के कारण एक आकलनीय कृति बन गया है। आरम्भ में अलङ्कारों का संयोजन जितनी अधिक मात्रा में हुआ है, बाद में भावों की प्रवणता के कारण तथा वर्णनों की सरसता के कारण कुछ शिथिल हो गया प्रतीत होता है। कविशेखर जी की भाषा प्राचीन कवियों की शैली तथा महाकाव्य की गरिमा के अनुरूप है। इसमें उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अर्थान्तरन्यास के चामत्कारिक प्रयोग तो हैं ही, उन्नीसवें सर्ग के द्रुतविलम्बित छन्द में लिखे पद्य शिशुपालवध (माघ) के षष्ठ सर्ग के पद्यों की स्मृति को ताजा कर देने वाले प्रतीत होते हैं, जिनमें प्रभूत मात्रा में यमक का प्रयोग हुआ है। कवि ने श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का वर्णन बारह सर्गों तक किया है। तेरहवें सर्ग में सुरभिशक्रस्तुति के पश्चात् राधा-कृष्ण के प्रणय की मूल कथा आरम्भ होती है। सम्पूर्ण रचना का आधार तो श्रीमद्भागवत है, किन्तु कवि की उसके अपने ही कल्पनालोक में सहृदय को रमाने की विलक्षण क्षमता प्रकट हुई है। अलंकारों के नियोजन में सिद्ध इस कवि ने स्वभावोक्ति को भी प्रश्रय दिया है। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव-प्रसंग में प्रमदाओं का उल्लास इन शब्दों में वर्णित है विकसद्वदनाम्बुजाः स्खलद्वसना भावितनृत्यगीतयः। व्यलिपन् प्रमदाः परस्परं दधिहारिद्ररजोभिरङ्गने ।। २/६३ (आंगन में खिलते कमलों जैसे मुखों वाली, खिसकते वसनों वाली, नृत्य और गीत में संलग्न प्रमदाएं दधि तथा हल्दी के मिश्रित द्रव द्वारा परस्पर लेपन करने लगीं।) आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास काव्य के नायक श्रीकृष्ण निखिल जनों को पीड़ित करने वाले तथा राधा से द्वेष करने वाले को ताड़ित करते है (४/३२)। कवि राधा के सम्बन्ध में लिखता है श्रीसहस्रमपि नैव कथञ्चिद् यत्तुलां श्रयितुमीषदपीष्टे। सा स्वयं तु सुषमात्मकशक्तिर्भासते स्म भवने वृषभानोः।। १४/७६ (जिसकी तुलना हजार लक्ष्मियां थोड़ा भी नहीं कर सकतीं, वह स्वयं शोभामय शक्ति शाली राधा वृषभानु के यहां विराज रही थी।) आद्योपान्त सरस इस महाकाव्य की समाप्ति रासोल्लास के वर्णन से होती है। कवि लिखता है उल्लासः कुतुकस्य विश्वविजयन्यासः सुमेषोभृशं हासः कृष्णबियोगदुःसहरुजो व्यासः कलानां परः । उच्छ्वासः शिशरो रतेरनुपमो वासश्चिरत्नः श्रिया माश्वासः पशुपालपङ्कजदृशां रासश्चिरायाभवत् ।। २०/१०२ (यह रास चिरकाल तक चला, जो कौतुक का उल्लास, पुष्पबाण कामदेव का विश्व पर विजय का न्यास, कृष्ण-वियोग से उत्पन्न दुःसह रोग का अत्यन्त हास, कलाओं का श्रेष्ठ आयाम, रति का शिशिर उच्छास तथा शोभाओं का पुराना आवास एवं गोपागनाओं का आश्वास था। कवि ने श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों को ‘परिपूर्णकाम” किये जाने का उल्लेख करके श्रीकृष्ण और राधा के मधुर, प्रणय-प्रसंग को एक बहुत बड़ी उदात्त मानवीय भावना की ओर संकेत करते हुए अपनी वाणी को विराम दिया है। कविशेखरजी ने अपनी रचनाओं के अनेक शिखरों का निर्माण उस काल में किया जब सम्पूर्ण भारत राष्ट्र महात्मा गान्धी के नेतृत्व में स्वातन्त्र्य के लिए जूझ रहा था। पञ्चम जार्ज के प्रति शुभाशंसा व्यक्त करने वाले इस कवि ने राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी के शहीद होने पर “शोकश्लोकशतक” का भी निर्माण करके अपने उदात्त राष्ट्र-प्रेम का परिचय दिया है।

क्षमाराव

(महाराष्ट्र, १८९०-१६५४) इनका जन्म पूना में हुआ। इनके पिता शकर - पाण्डुरङ्ग पण्डित अपने समय के विशिष्ट विद्वान थे। शिक्षा की व्यवस्था समुचित न होने पर भी अपने पिता के प्रभाव से क्षमा ने अंग्रेजी, मातृभाषा मराठी के अतिरिक्त संस्कृत पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। उनका विवाह राघवेन्द्र राव एम.डी. के साथ हुआ। बहुत समय तक ये अंग्रेजी में लघु कथाएं लिखती रहीं, किन्तु १६३१ के बाद संस्कृत में लेखन में प्रवृत्त हो गयीं। आधुनिक संस्कृत साहित्य के आकाश में एक उज्ज्वल नक्षत्र के रूप में क्षमा का अभ्युदय हुआ। इनके नाम के साथ ‘पण्डिता" शब्द जैसे अनुस्यूत हो गया। महाकाव्य कहना न होगा कि इनके द्वारा लिखित साहित्य का आकलन करने वाला आज भी सहज भाव से यह अनुभव करता है कि विज्जिका, विजयाङ्का, शीला भट्टारिका, अवन्तिसुन्दरी और विजयाङ्का की परम्परा सुरक्षित है। पण्डिता क्षमा को स्वदेशाभिमान अपने पिता से मिला था तो सौन्दर्य अपनी माता उषा से। उन्होंने राष्ट्र-भक्ति की भावना से स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लेने के उद्देश्य से महात्मा गान्धी के यहाँ साबरमती आश्रम में प्रवेश लिया, किन्तु स्वास्थ्य के अनुकूल न होने की स्थिति में, अपने लेखन द्वारा साहित्य की समृद्धि के साथ देश की सेवा का कार्य किया। इनकी अनेक प्रकाशित कृतियों में महाकाव्य, लघु कथाएं, जीवनवृत्त आदि हैं। इनके महाकाव्य हैं-श्रीतुकारामचरित, श्रीरामदासचरित और श्रीज्ञानेश्वरचरित। श्रीतुकारामचरितम् (१६५०), श्रीरामदासचरितम् (१९५३) और श्रीज्ञानेश्वरचरितम् (१९५५) ये तीनों ही रचनाएं महाराष्ट्र के तीन महान् सन्तों के जीवन पर आधारित हैं। एक ओर, पाण्डिता क्षमा जैसी प्रबुद्ध लेखिका ने भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम के महानायक महात्मा गान्धी के जीवन और दर्शन को अपना विषय बनाया तो दूसरी ओर इन तीन सन्तों के जीवन पर अपनी लेखनी चला कर भारतीय जीवन को परम्परागत नैतिकता, पवित्रता एवं सहज मानव-प्रेम से प्रवर्तित करने की ओर भी अपने द्वारा एक साहित्यिक प्रयास किया है। आधुनिक संस्कृत साहित्य में सन्तों के जीवन पर लेखन का कुछ पहले, उन्नीसवीं शताब्दी में ही नया आयाम खुल चुका था। सन्त तुकाराम का जन्म तीन सौ वर्ष पूर्व शिवाजी के समय एक तथाकथित शूद्र कुल में हुआ था। उन्हें वंशानुक्रम से भगवान् पाण्डुरंग के प्रति अगाध भक्ति का संस्कार प्राप्त हुआ था। नौ सर्गों में लिखित श्रीतुकारामचरित में उनके जीवन की विविध घटनाओं का वर्णन है। श्रीरामदासचरितम् में तेरह सर्ग हैं। शिवाजी के गुरु इस महान् सन्त ने अपने शिष्य शिवाजी महाराज को देश की रक्षा के लिए प्रवृत्त किया और उन्हें अपने आशीर्वाद का बल दिया। इस रचना में भारत के अनेक पवित्र स्थानों का वर्णन है। श्रीज्ञानेश्वरचरितम् में आठ सर्ग हैं। तेरहवीं शताब्दी में उत्पन्न महान् सन्त ज्ञानेश्वर की “ज्ञानेश्वरी’’ (गीता पर लिखित व्याख्या) से कौन नहीं परिचित है ! पण्डिता क्षमा ने अपने जीवन के अन्त में, कुछ ही दिन पूर्व इसे लिखकर समाप्त किया था। सन्त ज्ञानेश्वरको नाना सामाजिक अत्याचारों से जूझना पड़ा था। उनके मन में मानव-मात्र के प्रति अपार करुणा थी। कवयित्री ने उनके जीवन को भी विषय बनाकर भोगेश्वर्यपरायण मनुष्य के लिए वेदान्त के प्रशस्त मार्ग पर चल कर अपने को सार्थक बनाने की ओर संकेत किया है। अपनी उपदेशात्मकता के बावजूद इन तीनों कृतियों में भारतीय परम्परागत मानवीय चेतना को शब्द-रूप मिला है। क्षमा ने इन महापुरुषों के जीवन-चरित के ऊपर काव्य-निमार्ण के माध्यम से आधुनिक संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में शृंगार और प्रशस्तिगान की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर लिखने का मार्ग भी प्रशस्त किया है। कवयित्री क्षमा की शैली का एक उदाहरण, श्रीतुकाराम के अन्तर्हित होने के क्षण को लेकर लिखित इस पद्य में आकलनीय है आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास निस्तेजाः समजायताम्बरमणिर्दिव्यप्रभानिर्जितो विद्युत्पुञ्जहता इवाखिलनृणां सम्मीलिता दृष्टयः। स्वप्नोदबुद्ध इवेक्षते जनगणो यावत्समन्तान्नभ स्तावत् सर्वमदर्शि शून्यमनघोऽप्यन्तर्हितस्तापसः।। (सूर्य दिव्य प्रभा से रहित होकर निस्तेज हो गया, बिजली की चमक से हत सी होकर सभी लोगों की आखें बंद हो गयीं, लोग स्वप्न से जगे की भांति अभी देखते ही हैं कि सब ओर शून्य दिखाई देने लगा और पापरहित तापस ने अन्तर्धान प्राप्त किया।) इनके अन्य महाकाव्य हैं-सत्याग्रहगीता और शङ्करजीवनाख्यानम् । इन दोनों काव्यों के महाकाव्यत्व को लेकर मत-भेद सम्भावित है, किन्तु हम उन्हें महाकाव्य के रूप में यहाँ उल्लिखित करने में पक्ष में हैं। ‘सत्याग्रहगीता’ तीन भागों में है। गांधीजी के जीवन पर आधारित इस कृति के प्रथम भाग सत्याग्रहगीता में १६३१ से लेकर गांधी-इरविन पैकट तक की घटनाओं का वर्णन है। द्वितीय भाग उत्तर सत्याग्रहगीता में १८३१ से १६४४ तक का वर्णन है तथा अन्तिम भाग स्वराज्य विजय में भारतीय स्वातन्त्र्य और उसका स्वरूप चित्रित है। यह एक ऐतिहासिक महत् काव्य तो है ही, इसका महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह बहुत अंश तक अपने चरित्र नायक के जीवनकाल में निर्मित एवं प्रकाशित हो चुका था। सभी भागों का प्रकाशन विभिन्न कालों में बम्बई हम यहां तीनों भागों में वर्णित कथानक की चर्चा न करके कुछ अपेक्षित बातों की चर्चा करना चाहेंगे। ये तीनों भाग अध्यायों में विभक्त हैं, इन अध्यायों को सर्ग कहा जा सकता है। इसमें एक मात्र छन्द अनुष्टुप् का आश्रयण लिया गया है। केवल एक पद्य में मालिनी का प्रयोग हैं। घटनाप्रधान रचना होने पर भी यथास्थान इसमें विभिन्न अलंकारों का समुचित प्रयोग हुआ है। प्राकृतिक वर्णनों के प्रति कवयित्री का विशेष झुकाव न होते हुए भी कहीं-कहीं उनका मोहक संकेत है। चरित्रनायक महात्मा गान्धी के जीवन तथा संघर्ष का उद्देश्य देश की स्वतन्त्रताप्राप्ति यहाँ “स्वराज्यविजय” के रूप में वर्णित है। कवयित्री ने अपनी देशभक्ति को अपनी प्रकृत रचनाधर्मिता की प्रमुख प्रवृत्ति मानते हुए विनम्रतापूर्वक कहा है तथापि देशभक्त्याऽहं जाताऽस्मि विवशीकृता। अत एवास्मि तद्गातुमुद्यता मन्दधीरपि।। स.गी. १/३ (तब भी मैं देश-भक्ति के कारण विवश हूँ। अतः मन्दबुद्धि की होकर भी उसे गाने में प्रवृत्त हूँ।) १. सत्याग्रहगीता का प्रथम प्रकाशन १६३२ ई. में पेरिस से हुआ। महाकाव्य “सत्याग्रह” की जो कल्पना चरित्र-नायक महात्मा गान्धी के निजी जीवन-दर्शन के केन्द्र में प्रतिष्ठित थी क्षमा ने उसे ही अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है दुर्बला ननु गण्यन्ते शान्तिमार्गावलम्बिनः। परं सत्याग्रहाद् विद्धि नास्ति तीव्रतरं बलम् ।। स.गी. १०:३५ (शान्ति-मार्ग का अवलम्बन करने वाले लोग दुर्बल ही गिने जाते हैं, लेकिन सत्याग्रह से बढ़कर कोई बल नहीं है, ऐसा जानो।) वीर रस के भेदों में नाना वीरों की कल्पना की गयी है। मेरे विचार में महात्माजी उन वीरों में परिगणनीय हैं जो स्वराष्ट्र के लिए अपने को बलिवेदी पर चढ़ा देते हैं। संक्षेप में कवयित्री क्षमा के सम्पूर्ण सत्याग्रहकाव्य का आकलन करते हुए वाल्मीकि और व्यास की मार्मिक अनुष्टुप प्रधान शैली का आभास मिलने लगता है और सहृदय भाषा की सरलता के साथ विभिन्न घटनाक्रमों में विभिन्न रस के आस्वाद की व्यञ्जना से तन्मय हो जाता है। वास्तव में, सदियों से पराधीनता का कष्ट भोगते आ रहे तथा उसे नियति का फल मान रहे राष्ट्र के लिए स्वातन्त्र्य संघर्ष की चेतना का यह नया आयाम एक नयी अनुभूति थी। स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, लोकमान्य बालगङ्गाधर तिलक आदि महान् नेताओं के पश्चात महात्मा गांधी ने भारतीय जनता की दयनीयता को देखकर स्वातन्त्र्य की प्राप्ति के लिए आशा का सन्चार किया। कुर्वन्तो नित्यमेवं हि स्वातन्त्र्यं प्राप्स्यथाचिरात् । स्वातन्त्रयादपि भूतानां प्रियमन्यन्न विद्यते।। स.गी. (ऐसा नित्य ही करते हुए तुम शीघ्र स्वातन्त्र्य प्राप्त करोगे, क्योंकि स्वातन्त्र्य से बढ़कर प्राणियों का दूसरा प्रिय नहीं है।) शङ्करजीवनाख्यानम्-इसमें १७ उल्लास हैं और इसका प्रकाशन १६३E में २७ न्यूमरीनलेन बम्बई से हुआ है। इसे कवयित्री क्षमा ने अपने विद्वान् गुणसम्पन्न पिता शङ्करपाण्डुरग के जीवन को आधार बनाकर प्रस्तुत किया है। शङ्कर पाण्डुरग ने एक ओर जीवन में राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान को प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया तो दूसरी और वेदों के अध्यापन की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने अपनी पुत्री क्षमा को जो उपदेश दिया, वह उनके उदात्त जीवन को एक महाकाव्य के नायक (प्रधान पात्र) के रूप में प्रतिष्ठित करने वाला है। क्षमा के ही शब्दों में यदि त्वां सज्जनः कोऽपि सौजन्याद् भोजयेत् क्षमे। तदाऽस्मै द्विगुणं दद्याः काले प्रत्युपकारिणी।। नृपोऽपि चेन्महौदार्यात् प्रयच्छेत् पारितोषिकम्। नैव तत्प्रतिगृह्णीयास्तदनर्हाऽसि चैत् क्षमे।।आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास यदि कश्चिन्मनुष्यस्ते हिंसां कुर्यात् सुचेतसा। कुरु तस्य प्रियं भूयस्तदानृण्यं भजस्व च।। दिष्ट्या तु यदि विद्यां ते वितरेत् पण्डितः क्वचित् । सर्वथाऽनुग्रहं तस्य प्रतीक्ष परमादरात्।। । ७/४८-५। (अरी क्षमा, यदि कोई सज्जन तुझे सौजन्य से भोजन कराये तो उन्हें अवसर प्राप्त होने पर प्रत्युपकार के रूप में दुगुना दे। राजा भी यदि तुझे बड़ी उदारता के साथ पारितोषिक दे तो उसे यदि तू उसके योग्य नहीं, तो न ले। यदि अच्छे मन से कोई आदमी तेरा भला करता है तो उसका प्रिय कर तथा उससे उऋण हो । यदि देवयोग से कोई विद्वान् तुझे विद्या-दान देता है तो परम आदरपूर्वक सब प्रकार से उसे उसका अनुग्रह मान।

गंगा प्रसाद उपाध्याय

(उत्तर प्रदेश १९८१) कवि उपाध्याय का जन्म एटा जिले के नदरई गांव में कायस्थ परिवार में हुआ। इनके द्वारा रचित आर्योदय महाकाव्य (कलाप्रेस, इलाहाबाद १६५१) दो भागों में विभक्त है। पूर्वार्ध में दस सर्ग और उत्तररार्ध में ११ सर्ग हैं। पूर्वार्ध की कथा सृष्टि की उत्पत्ति से आरम्भ होती है। वैदिक धर्म विकास की चर्चा और उसके बाद हास के कारण विदेशी मतवाद का उद्भव होता है। इसमें पृथ्वीराज और जयचन्द के कलह, मुहम्मद गोरी के आक्रमण तथा खिलजीवंश का शासन, मुगलवंश का शासन, अकबर का शासन और जहांगीर के समय ब्रिटिश व्यापारियों का प्रवेश, शिवाजी और औरंगजेब का संघर्ष, सिक्ख गुरुओं का इतिहास, नेपाल का इतिहास, अंग्रजी का आधिपत्य और भारत की मुक्ति आदि वर्णित हैं। दूसरे भाग में स्वामी दयानन्द के आरम्भ से अन्त तक का जीवन वर्णित हुआ है। कथावस्तु की दृष्टि से इतना व्यापक आधार रखने के कारण कवि को अपने कवित्वपक्ष को उजागर करने के लिए अवकाश अपेक्षाकृत कम मिला है, ऐसा कहा जा सकता है। उसके मन में आर्यजाति के प्रति जो निष्ठा है वह उसकी इस रचना में आद्योपान्त झलकती है। आर्यो की शासन-पद्धति को वह आदर्श मानता है निःस्वार्थभावेन चकार शासनं विश्वस्य शान्त्यै यतते स्म सर्वथा। संस्थापयामास समन्वयं भुवि न चक्रवर्ती विततान दासताम् ।।३/१० (सम्राटू ने निःस्वार्थ होकर शासन किया, विश्व की शान्ति के लिए सदा प्रयत्न किया, समन्वय की स्थापना की, दासता को नहीं फैलाया।) वैदेशिक आक्रमण के काल में भारतीय शासकों की दयनीयता के कारण भारत भूमि को दासता के पाश से मुक्त करने वाला न रहा। कवि कहता है पश्येत् को वा स्वहितविषयान् स्वार्थभावान विहाय रक्षेत् को वा रिपुणगणकराद् देशधान्यं धनं वा। कुर्यात् को वा परवशहतां मातरं शल्यशून्यां को वा भव्यां भरतधरणी मोचयेच्छत्रुपाशात् ।। ४/१६ महाकाव्य (स्वार्थ के भावोंको छोड़ कौन अपने हित को देखे? शत्रु के हाथ से देश के धन-धान्य की कौन रक्षा करे? परवश हो हत हो रही मातृ-भूमि को शल्य-रहित कौन करें? कौन भव्य भारत-भूमि को शत्रु के पाश से मुक्त करे?) सम्पूर्ण रचना आर्य-देश की समुन्नति की कामना से ओत-प्रोत है। उसकी पराधीनता उसके विकास में बहुत बड़ी बाधक है। कवि लिखता है काङ्क्षामात्रमलं नृणां न हृदये साध्यस्य पूर्ती क्वचित् योग्यायैव ददाति वाञ्छितफलं विश्वम्भरः सर्वदा। यावद् दुष्टगुणांस्त्यजेन्न जनता जातीयताघातकान तावच्छक्तिमुपैति नैव न च वा मुञ्चेत् पराधीनताम् ।। १०/४ (हृदय में केवल इच्छा मात्र से कहीं साध्य की पूर्ति नहीं होती, सदैव, विश्व का पालनकर्ता योग्य व्यक्ति को ही उसका वाञ्छित फल देता है। जब तक जनता जातीयता के घातक दुष्ट गुणों को नहीं छोड़ती, तब तक उसे शक्ति प्राप्त नहीं होगी और न ही पराधीनता से उसकी मुक्ति होगी।)

भगवदाचार्य

(पंजाब. १८८०-१९७७) स्यालकोट (अब पाकिस्तान में जनमे भगवदाचार्य का पूर्व नाम सर्वजित था। प्रारम्भ में अपने पितव्य के साथ काशी में और बाद में भाई के पास रावलपिण्डी मे रहे। भाई से ही संस्कृत का ज्ञान अर्जित करना आरम्भ किया। कई भाषाओं में भी निपुण हुए। पुनः काशी जाकर संस्कृत के शास्त्रीय ग्रन्थों का अध्ययन किया। आजीवन अविवाहित रहे। घर छोड़कर बाहर चले गये और आर्यसमाज की धारा में कुछ समय भवदेव ब्रह्मचारी के नाम से, फिर बाद में रामानन्द सम्प्रदाय में वैष्णवी दीक्षा लेकर ब्रह्मचारी भगवद्दास बन गये। महात्मा गान्धी के साबरमती आश्रम में भी अध्यापन किया। उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत हो गया। अपने सम्प्रदाय में भी सुधार के लिए प्रयास किया और सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लिया। उनके द्वारा निर्मित साहित्य विशाल है, किन्तु प्रस्तुत में उल्लेख्य है उनके द्वारा तीन खण्डों में निर्मित विशाल श्रीमहात्मगान्धिचरित (१९५१), महाकाव्य । वह कहते हैं कि उन्होंने रामानन्ददिग्विजय महाकाव्य का भी निर्माण किया। श्रीमहात्मगान्धिचरित के तीन भागों के नाम हैं- १. भारतपारिजात (२५ सर्ग) जिसमें गान्धी जी के जन्म से लेकर दांडी यात्रा तक का वृत्तान्त है, २. पारिजातापहार (२६ सर्ग), जिसमें सन् १E४२ के “भारत छोड़ो” आन्दोलन की घटनाएं वर्णित हैं तथा, ३. पारिजातसौरभ (२० सर्ग), जिसमें मृत्यु तक की घटनाओं का वर्णन है। कवि ने भारतरूपी उद्यान में पारिजात पुष्प की भांति खिलने वाला गान्धीजी का व्यक्तित्व है, ऐसा मान कर तीनों भागों का नामकरण किया है। “पारिजातापहार” और उनकी सुगन्धि यथोगाथा के सुदूर व्याप्त होने से पारिजातसौरभ नाम दिया। कवि के ही अनुसार “इन गन्धों के नायक हैं जगद्वन्दनीय महात्मा गान्धी जी”। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास संस्कृत में इतने विशाल रूप में महात्मा गान्धी के व्यक्तित्व को महाकाव्यकी विधा में प्रस्तुत करने का, पण्डिता क्षमा राव के पश्चात् यह दूसरा प्रयास है। इस रचना को आधुनिक संस्कृत साहित्य के एक गौरव ग्रन्थ की मान्यता देने में संकोच नहीं होना चाहिए। कवि यहाँ मात्र एक माध्यम है, एक महापुरुष के चरित को अपनी प्रसन्न वाणी के आवरण में प्रस्तुत करने में। अतः उसने कहीं कवित्व का चमत्कार प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं किया है। सामान्यतः जहाँ भी उपमा आदि अलंकार यहाँ उपनिबद्ध हुए हैं उनमें कवि का कोई प्रयास लक्षित नहीं होता। वर्णनों की उपेक्षा नहीं हुई है, फिर भी उनका सन्तुलित रूप में प्रस्तुत किया जाना आकलनीय है। महात्मा गान्धी के जीवन-दर्शन के मूल में उनका “सत्याग्रह” प्रतिष्टित था। सत्याग्रह के सम्बन्ध में उनका निश्चय कवि के शब्दों में इस प्रकार व्यक्त हुआ है भ्रष्टो भविष्यामि न सत्यमार्गात क्वचित् करिष्ये न परार्थहानिम्। परार्थपीडामपि नो करिष्यामीति प्रतिज्ञामहमाभजामि।। भा.पा. ११/१८ (सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होऊंगा, कहीं दूसरों को हानि नहीं पहुंचाऊंगा, दूसरों को पीडित भी नहीं करूंगा-यह प्रतिज्ञा करता हूँ।) यह भी गांधीजी का कहना था, अपने देशवासियों से सत्याग्रहस्तीव्रममोघमस्त्रं स्थातुं न शक्नोति पुरश्च तस्य । अनीकिनी काऽपि महाबलाऽपीत्येतत्तु जानीथ चिरेण यूयम् ।। भा.पा. १८/१३ (सत्याग्रह एक तीव्र अमोघ अस्त्र है, जिसके सामने बलवती भी सेना नहीं टिक सकती-यह तुम चिरकाल से जानते हो।) भाषा की प्रवाहमयता, प्रसाद तथा विविध छन्दों के प्रयोग के साथ यत्र तत्र वर्णनों के सन्तुलित रूप ने काव्य में कहीं ठहराव आने नहीं दिया है। पुतलीबाई के गर्भ में गान्धीजी के आने के प्रकरण में कवि ने जो षड्तुवर्णन एवं मासवर्णन किया है वह बड़ा सहज बन पड़ा है। पण्डिता क्षमा द्वारा प्रस्तुत गान्धीचरित में मात्र अनुष्टुप के प्रयोग से जो काव्यात्मक छटा की कुछ कमी प्रतीत होती थी वह यहाँ निरस्त हो गयी। गान्धी का व्यक्तित्व एक वीर-पुरुष का व्यक्तित्व था, जो अपनी अहिंसक सेना के साथ एक प्रबल हिंसावादी शत्रु के साथ संघर्ष में कभी पीछे नहीं हटा। अतः यहाँ वीररस को अनुभूत कराने वाली वृत्ति को कवि द्वारा प्रश्रय दिया जाना स्वाभाविक है। कवि ने एक ऐतिहासिक महाकाव्य की रचना की है, किन्तु उसकी लेखनी से एक काव्य या महाकाव्य लिखा गया है न कि इतिहास, इसका उसे आद्योपान्त ध्यान रखना चाहिए। पण्डिता क्षमा के साथ भी यही कुछ कमी रह गयी, जो खटकती है। भगवदाचार्य ने अपनी रचना में ऐसे अनेक स्थल प्रस्तुत किये हैं, बल्कि रचना का अधिकांश स्थल ऐसा है जिसमें कवि केवल महात्माजी के पत्रों की भाषा को अनूदित सा करता चला गया है, महाकाव्य फलतः ऐसे स्थलों में काव्य की चारुता खो सी गयी है। उदाहरणार्थ, पारिजातसौरभम् का प्रथम सर्ग एक पत्र के उत्तर के रूप में प्रस्तुत हुआ है। केवल कवि वहाँ उसका प्रस्तोता या अनुवादक मात्र होकर रह गया है। यह सही है कि कहीं-कहीं ऐसे स्थलों में भी उसकी भाषा में कवित्व का चमत्कार झलक सा गया है। गांधीजी के मन में ऐसा नहीं था कि सभी अंग्रेज़ भारत से चले जायें। एण्डज जैसे उनके अनेक मित्र भी थे। कवि लिखता है यथैकचन्द्रो गगने स्थितो नृणां मनांसि चडूंषि हरत्यनारतम् । तथेदमेण्ज सखित्वमेव मे सितैः सखित्वाय मनोहरं परम् ।। पा.सौ. १/३५ अर्थात् “जिस प्रकार आकाश में रहने वाला एक ही चन्द्र मनुष्यों के मन और नेत्र का हरण सदा करता है वैसे ही श्री एण्ड्ज की मित्रता ही अन्य अंग्रेजों के साथ मित्रता करने के लिए मेरे मन को खींचती है।” कवि महात्मा जी को ‘यतिक्षितीश्वर” जैसे विशेषणों से विशेषित करने में संकोच नहीं करता, यह उसके मन में अपने काव्य-नायक के प्रति अपार श्रद्धा का सूचक तो है ही, साथ ही वह निःसकोच अंग्रेजी स्थानवाची या व्यक्तिवाची संज्ञाओं को अपनी रचना में उदारतापूर्वक अनुस्यूत करता है। ऐसे भी अनेक प्रसंग आये हैं जहाँ मन कुछ क्षणों के लिए कवि की सरल भाषा को आकलित करते हुए आई हो जाता है, इनमें से एक स्थल है बा (गांधीजी पत्नी कस्तूरबा गांधी) के बीमार होकर स्वर्ग सिधारने का प्रसंग (पा.सौ. तृतीय सर्ग)। किन्तु सबसे अधिक मन को अभिभूत करने वाला वह प्रसंग है जब एक हत्यारे के गोलिका-प्रहार से महात्माजी का प्राणान्त होता है और स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जब विलाप की भाषा में कहते हैं न हि रोचिरदः प्रकाशते परितोऽस्मानिह साम्प्रतं ज्वलत् । वयमद्य समावृताः परं तमसामेव चयेन भारते।। न हि राष्ट्रपिताऽद्य वर्तते गुरुदेवो गत एव मां त्यजन् । परमः सुहृदस्तमन्चगादधुना को हि निषेव्यतां मया।। १४ (हमारे चारों ओर जो प्रकाशित हो रही थी वह ज्योति अब बुझ गयी। भारत में हम अन्धकार-समूह से घिर गये हैं। अब राष्ट्र के पिता नहीं रहे। मुझे छोड़ गुरुदेव चले गये। परम मित्र चले गये अब किसकी सेवा करूं?) कवि ने “विलाप” की इस सहज भाषा को अभिव्यक्ति देने के लिए वियोगिनी छन्द का आश्रय लिया है, जिसका ऐसे प्रसङ्गों में कालिदास ने भी लिया है। ऐसे शताधिक पद्य हैं, जिनमें महात्मा गान्धी की वाणी या उनके द्वारा अभिहित उनका निजी जीवन-दर्शन कवि के शब्दों में यथावत् रूपायित सा हो गया है सत्य को लेकर महात्माजी का यह कथन है आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास सत्येन न स्यान्मनसो व्यथा मे सत्यं व्यथायाः परमौषधं में। सत्येन संगत्य जिजीविषामि सत्येन हीनो मृतिमाश्रयामि ।। पा.सौ. ११/६४ (सत्य से मेरे मन को व्यथा नहीं होती, सत्य ही मेरी व्यथा का परम औषध है। सत्य से मिलकर ही जीना चाहता हूँ, सत्य से रहित होकर तो मरण का आश्रयण कर लूंगा।) कवि भगवदाचार्य की लेखनी इस अंश में अवश्य सार्थक है कि उसने अपने युग की एक महान् विभूति को, महनीय चरित को एक विशाल महाकाव्य के आभोग में, गीर्वाण वाणी के माध्यम से प्रस्तुत करने का उत्तम प्रयास किया है। BN जिस प्रकार अपने समय के महापुरुष राम के चरित को आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण के रूप में प्रस्तुत किया कुछ उसी प्रकार संस्कृत भाषा में महात्मा गान्धी के जीवन-चरित और जीवन-दर्शन को आधुनिक संस्कृत साहित्य के कविद्वय, पण्डिता क्षमा राव तथा भगवदाचार्य ने किया।

काशीनाथ द्विवेदी

(उ.प्र.,१८६७-१६६६) “सुधीसुधानिधि” के उपनाम से विभूषित कवि द्विवेदी का जन्म वाराणसी में हुआ। इनके पिता पं. रुद्रदत्त द्विवेदी गोरखपुर के निवासी थे, किन्तु वाराणसी में बस गये थे। कविवर द्विवेदी ने अपने पितृव्य पं. नकच्छेद राम द्विवेदी (पं. उमापति द्विवेदी) के चरणों में विद्याध्ययन किया तथा स्वामी मनीष्यानन्द भी इनके गुरु थे। इनके अत्यन्त निकटवर्ती मित्रों में “कविपति” उमापति द्विवेदी थे। दोनों ने ही गांधीजी के द्वारा प्रवर्तित “असहयोग आन्दोलन” में भाग लिया था। कविवर द्विवेदी की अयाचितोपनतवृत्ति’ प्रसिद्ध है। कहते हैं कि इन्होंने कई वर्ष केवल पत्तियां खाकर गुजार दिये थे! कविवर द्विवेदी की एकमात्र रचना इक्कीस सर्गों का रुक्मिणीहरण महाकाव्य है, जो कई वर्षों की साधना से पूर्ण हुआ था। यह श्रीमद्भागवत के प्रसिद्ध रुक्मिणी आख्यान (१०/५२-५४) पर आधारित है। संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं में इस आख्यान पर अनेक कवियों ने लेखनी उठायी। इस महाकाव्य में, परम्परावादी महाकाव्य विधा में एक विद्वान् कवि की रचना होने के कारण कवित्व और वैदुष्य का मणि-काञ्चनयोग हुआ है। कवि ने मूल कथानक में सामान्य परिवर्तन करते हुए वर्णनों से रचना को खूब ही सजाया और संवारा है। इनकी कल्पनाओं में नूतनता को भी समुचित प्रश्रय मिला है। पारिजातहरण महाकाव्य के कर्ता “कविपति” जी की तथा “सुधीसुधानिधि” की रचनाओं की तुलना की जाये तो उनकी अपेक्षा इनकी भाषा में कुछ अधिक स्फुटता एवं प्रवाहमयता की अनुभूति होती है। कवि ने स्वयं एक प्रसंग में अपनी सम्मत काव्य भाषा को लक्षित किया है-यथोचित सन्धिविधिक्रियास्थितियथायथं कारकसन्निवेशनम् (एकादश सर्ग)। प्रथम सर्ग में ही कवि द्वारा प्रस्तुत रुक्मिणी का विस्तृत नख-शिख वर्णन अभिभूत कर देता है। कवि के अनुसार १. बिना मांगे जो कुछ प्राप्त हो उससे गुज़ारा करना महाकाव्य रुक्मिणी के एक अङ्ग पर पड़ी दृष्टि वहीं की वहीं रुक जाती है, दूसरे अगों तक पहुँचने का नाम नहीं लेती तो कवि इसके समग्र अत्यद्भुत रूप का वर्णन करने में कैसे क्षम हो एकाङ्गसक्ता निपपात दृष्टिरस्या न येनापधनान्तरेषु। तस्मात्कविवर्णयितुं क्षमेत कः सुरूपमत्यद्भुतमेतदीयम् ।। १/१६६ (इसके एक अङ्ग पर चिपकी हुई दृष्टि जिस कारण दूसरे अगों पर नही पड़ती, इस कारण कौन कवि उसके अत्यद्भुत रूप का वर्णन करने की सामर्थ्य रखता है ?) सती प्रथा के प्रति कवि का व्यंग्य आकलनीय है मृतास्वहो प्राणसमासु सत्वरं प्रमोदतेऽन्यां परिणीय पूरुषः। कुलस्त्रियः स्वामिनि संस्थिते पुनर्वहन्ति वैधव्यमसह्यवेदनम् ।। नमोऽस्तु पाखण्डविनिर्मिताय ते द्विजेन्द्र धर्माय विडम्बनात्मने। सहैधसा पत्रलतेव नूतना शवेन सत्रा तरुणी प्रदयते ।। ११/६०, ६१ (प्राणों से भी बढ़कर प्रिय पत्नियों के मर जाने पर पुरुष दूसरी से विवाह करके प्रसन्न हो जाता है, किन्तु कुलीन स्त्रियाँ पति के दिवंगत होने पर असह्य वेदनाओं वाले वैधव्य को धारण करती हैं। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! पाखण्ड द्वारा निर्मित विडम्बना स्वरूप तुम्हारे धर्म को नमस्कार है, ईधन के साथ नूतन पत्रलता की भाँति तरुणी शव के साथ जला दी जाती है।

उमापति शर्मा द्विवेदी

(उत्तर प्रदेश, १८९८-) देवरिया जनपद में उत्पन्न कवि द्विवेदी ने अपने जीवन काल में स्वातन्त्र्य संग्राम में, अध्ययन छोड़कर भाग लिया था। बाद में अध्ययन में प्रवृत्त हुए। अपनी काव्य-लेखन की सफल प्रवृत्ति के कारण इन्हें “कविपति” कहा गया। इनके द्वारा २१ सर्गों में लिखित पारिजातहरण महाकाव्य १६५७ ई. में प्रकाशित हुआ, जिसे प्रकाशित किया, श्रीललन शर्मा पाण्डेय, व्यवस्थापक गोस्वामी तुलसीदास महाविद्यालय, पड़रौना दिवरिया) ने। श्रीमद्भागवत के एक निर्देश पर कवि ने श्रीभगवान के गुणानुवाद रूप इस महाकाव्य की रचना द्वारा अपने को कृतार्थ मान लिया और इसके प्रकाशन से निरपेक्ष रहे। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के ५६वें अध्याय की संक्षिप्त कथा पर पारिजातहरण का कथानक आधृत है। द्वारका में रैवतक पर्वत पर रुक्मिणी द्वारा किये गये याग के प्रसंग में ऋषि नारद रूक्मिणी को पारिजात पुष्प अर्पित करते हैं। इस पर सत्यभामा रुष्ट हो जाती हैं। श्रीकृष्ण पारिजातवृक्ष को ही लाकर उसे अर्पित करने की प्रतिज्ञा करते हैं तथा नारद को इन्द्र से पारिजात मांगने के लिए भेजते हैं, किन्तु इन्द्र अस्वीकार कर देते हैं। तब श्रीकृष्ण सत्यभामा को लेकर गरुड़ द्वारा स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते हैं। सात्यकि और प्रद्युम्न भी वहां जाते हैं, पारिजात को लेते हैं, किन्तु इन्द्र के साथ वहाँ युद्ध छिड़ जाता आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास है। युद्ध के वैषम्य की शान्ति के लिए श्रीकृष्ण शिव की स्तुति करते हैं। सन्धि की सफलता के लिए कश्यप शिव की स्तुति करते हैं और वर प्राप्त होता है। कश्पय आकर मातृमहिमा का वर्णन करते हैं। भगवान् भीमासुर के वध के लिए पाताल जाते हैं और उसका वध करते हैं। पृथ्वी उनकी मानसी पूजा करती हैं। भगवान् राजकन्याओं का उद्धार करते हैं। दिति का कुण्डल लेकर कश्यप आदि के साथ स्वर्ग आते हैं और उपहारस्वरूप पारिजात को लेकर द्वारिका लौट आते हैं और सत्यभामा के भवन में उसका रोपण करते हैं। यह एक मूलतः धार्मिक कथा है जिसमें भीमासुर जैसे आततायी का वध एक सांयोगिक घटना के रूप में निबद्ध है। “कविपति” जी ने इस सामान्य से कथानक को, महाकाव्य के पारम्परिक लक्षणों की सीमा में, भारवि और माघ के आदर्श पर चलते हुए एक प्रौढ़ काव्य-रचना का रूप दिया है। कहीं-कहीं श्लध शङ्गार को प्रश्रय मिल गया है, फिर भी रचना आद्योपान्त कवि की अनन्य सामान्य प्रतिभा को व्यजित करने में क्षम है। बीसवीं शती में इस प्रकार की प्रौढि को प्रश्रय देने वाली तथा पारम्परिकता को कुछ अधिक मात्रा में निर्वाह करने वाली काव्य कृतियाँ कम नहीं लिखी गयीं। यह परम्परा, लगभग ‘कविशेखर" बदरीनाथ झा के श्रीराधापरिणय महाकाव्य वाली है। पूर्वार्ध और उत्तरार्थ, दो भागों में विभक्त पारिजातहरण महाकाव्य में यत्र-तत्र शब्दालंकार संयोजन को अधिक प्रश्रय मिला है। जैसे, तृतीय सर्ग के द्रुतविलम्बित छन्द में लिखे पद्यों में यमक का सुनियोजन। उदाहरणार्थ, अपि करेणुकरेऽणुविशृङ्घणं विदधतो दधतो मदविभ्रमम्। समुपबृंहितबृंहितका ययुः शमदरम्मदरञ्जिकटा घटाः।। ३/११ (हथिनियों की सूंड को अपनी सूड से सूंघते हुए, मदविदलित गति से चलने वाले, जोर जोर से गड़गड़ ध्वनि करते, मद-धार के रज्जित गण्ड वाले कल्याणपुर्ण निर्भय हाथियों का झुंड चल रहा था।) __ यह कुछ कम आश्र्चयकारी बात नहीं कि परम्परावादी ‘कविपति" जी ने परम्परा से कुछ हट कर कवित्त और दोहा आदि हिन्दी के छन्दों का भी यहां प्रयोग किया है (पञ्चदश का कवि श्लेषाश्रित उपमा के सुनियोजन द्वारा शरत्के अवतरण का दृश्य इस प्रकार प्रस्तुत करता है श्वेताम्बरा रसिकहंसगतिप्रसन्ना शृङ्गारहारकुसुमोत्करकाम्यकान्तिः। उल्लासितस्वसमयाश्रितबन्धुजीवा वाग्देवतेव समुदेति मुदे शरन्नः ।। १०/१२ (श्वेत वसन वाली, अथवा स्वच्छ आकाश वाली, शृङ्गार के लिए उपयुक्त हार के महाकाव्य फूलों के कारण कमनीय कान्ति वाली, ज्ञान के आश्रित बन्धुओं के प्राणों को उल्लसित करने वाली अथवा खिले अपने समय के बन्धुजीव नाम के फूलों से युक्त, वाग्देवता की भाँति शरत् हमारी प्रसन्नता के लिए उदित हो रही है।) कविपतिजी के कुछ ऐसे पद्यों को आचार्य पं. बलदेव उपाध्यायजी ने “काशी की पाण्डित्य परम्परा” में उद्धृत किया है जिनमें उनकी काव्य-दृष्टि संकेतित हुई है नैवौचिती परिहताऽस्त्यनया कदाचिन्निाजभावरमणीयपदक्रमा च। आरोपशून्यसरसाभिहिता समर्था मान्या न कस्य तब वाक् कुलजाङ्गनेव।। १०/५८ (इसने औचिती का परित्याग कभी नहीं किया, निर्व्याज भाव के कारण जिसके पद-क्रम रमणीय हैं, जिसकी बात आरोप-रहित एवं सरस है और जो समर्थ है, ऐसी कुलीन अङ्गना की भांति तुम्हारी वाणी किसे मान्य नहीं है।) “कविपति” द्विवेदी ने वर्णनों को इतना प्रश्रय दिया है कि लगता है, वर्णनों के लिए वर्णन प्रस्तुत कर रहे हैं। यज्ञ के प्रकरण में उसकी इतिकर्तव्यता को लेकर कवि ने जो शास्त्रीय चर्चा छेड़ दी है (चर्तुथ सर्ग) वह भले ही उसके पाण्डित्य को प्रमाणित करने वाली मानी जाय, किन्तु वहाँ उसका कवित्व दब गया सा प्रतीत होता है। कहीं कहीं वह वर्गों के परस्पर प्रभाव की बात बड़ी सफलता से कहते हैं जैसे - हरिहरिन्मणिद्योतो नारदः शारदेन्दुदृक् । आकालिकीमपूर्वाञ्च सन्ध्यां तत्सङ्गमो व्यधात् ११४/६४ (हरिन्मणि के समान कान्ति वाले कृष्ण और शरत् काल के चन्द्र की भांति दृष्टि वाले नारद, इन दोनों के संगम ने असामयिक और अपूर्व सन्ध्याकाल का दृश्य उपस्थित कर दिया) कवि की शब्दयोजना सन्तुलित एवं मनोहर है। कहीं-कहीं उपमानों का एक ही साथ सन्निवेश और अनुप्रास की अनुगूंज से लालित्य की सृष्टि करने में वह सफल हुआ है।

विन्ध्येश्वरीप्रसाद मिश्र

(बिहार) चम्पारण जिले के सरारा ग्राम के निवासी कविवर मिश्र ने काशी में ही अध्ययन और अध्यापन किये। ये भारतधर्म महामण्डल से जुड़े रहे। इन्होंने महाभारत और पद्मपुराण में प्राप्त कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध से सम्बद्ध कथानक को लेकर २२ सर्गों में कर्णार्जुनीय महाकाव्य की रचना की। इनकी दूसरी महाकाव्य-रचना महर्षिज्ञानानन्दचरित है, जो २३ सर्गों में प्रस्तुत हुई है तथा श्री-भारतधर्ममहामण्डल, जगतगंज, वाराणसी से प्रकाशित है। इस दूसरे महाकाव्य के १९६८ में प्रकाशन के पूर्व ही कविवर मिश्र दिवंगत हो गये। ‘अर्वाचीनसंस्कृतमहाकाव्यानुशीलनम्’ (१८८१) के लेखक डॉ. रहसविहारी द्विवेदी को ४२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कर्णार्जुनीय महाकाव्य में साम्प्रतिक युगजीवन के सम्बन्ध में चित्रण नहीं मिला है। वस्तुविन्यास में कवि केवल पौराणिक शैली का अनुहरण करता है। जहाँ तक भाषा की प्रौढि की बात है वह इस रचना में प्राप्त होती है। यहाँ, भीम और दुर्योधन के एक संवाद को डॉ. द्विवेदी ने यह कह कर उद्धृत किया है कि वाग्व्यवहार में अशिष्ट शब्द के उच्चारण के कारण पात्र की गरिमा अरक्षित जैसी लगती है भीमः बलवानपि जम्बुकात्मजः किमु सिंहस्य पुरः प्रसर्पति। निहितोऽपि सुवर्णपिञ्जरे किमु काकः क्रतुहव्यभुग भवेत्।। अपि पश्यत मन्दधीरयं यधमः सूतसुतो भवन्नपि । परिवाञ्छति सव्यसाचिना सह योद्धुं नितरामपत्रपः ।। सुयोधनः ननु भीम सुसान्निपातिकज्वरसंश्लिष्ट इव प्रतीयसे ।। नृपतिः किल कर्ण एषको नृपसिंहासनमास्थितो वरम्। इति यस्य न विद्यते भवे ऽभिमतं तस्य हि मूर्ध्नि मे पदम् ।। तमहं समरार्थमाह्वये द्रुतमायातु स वीरसम्मुखम्।। यदि नेति निजानने तथा मसिमालिप्य पलायतामितः ११५/१३२,३४,३७ (बलशाली भी स्यार का वंशज क्या सिंह का सामना करता है? कौवे को सोने के पिजड़े में भी रख दिया जाय तो क्या वह यज्ञ के हव्य को खाने का पात्र हो सकता है? और देखो, अधम तथा मूर्ख कर्ण सूत का पुत्र होता हुआ निर्लज्ज होकर अर्जुन के साथ युद्ध करना चाहता है !) (भीम, लगता है तुम्हें सन्निपात का ज्वर हो गया है, जिससे कि बड़बड़ा रहे हो। यह कर्ण सिंहासन पर आसीन राजा है, ऐसा संसार में जिसे अभिमत नहीं उसके मस्तक पर मेरा पैर है। उसे मैं समर के लिए बुलाता हूँ, वह शीघ्र इस वीर के सम्मुख उपस्थित हो और यदि नहीं, तो अपने मुख में कालिख पोत कर यहाँ से भागे।) . यहाँ, क्रोध की स्थिति में भीम तथा सुयोधन के मुख से कुछ अशिष्ट से लगने वाले शब्द का उच्चारण किया जाना बहुत अनुचित भी नहीं कहा जा सकता है। कवि का दूसरा महाकाव्य श्रीभारतधर्म महामण्डल के संस्थापक स्वनामधन्य महामनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी के जीवन पर आधारित है। कवि को स्वामीजी के सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। महाकाव्य में इतिवृत्तात्मकता को अधिक प्रश्रय मिला है तथापि चरित्र-नायक के व्यक्तित्व को उभारने में कवि को सफलता मिली है। वेदी रीति वाली कवि की भाषा में कहीं-कहीं अलंकार सहज भाव से अनस्यूत लगता है - महाकाव्य प्रकृतिः किल यस्य यादृशी नहि यत्नातू परिवर्तते क्वचित। सहितः सितर्शकरादिभिः, न च निम्बो विजहाति तिक्तताम् ।।६/११ (जिसका जैसा स्वभाव होता है वह कहीं यत्न से नहीं बदलता है, चीनी के साथ होने पर भी नीम अपना तीतापन नहीं छोड़ता।) निश्चय ही शान्तरस प्रधान इस रचना में कवि ने अपने चरित-नायक के माध्यम से संसार को अभिधा की ही भाषा में कुछ उपदेश देते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है।

गोस्वामिबलभद्रप्रसाद शास्त्री

(उत्तरप्रदेश) गोस्वामी प्रकाशन, सकाहा हरदोई से १६७५ में प्रकाशित बारह सर्गों में रचित गोस्वामी जी का नेहरुयशःसौरभमहाकाव्य पं. जवाहर लाल नेहरू के राष्ट्रिय चरित्र पर रचित संस्कृत की अनेक कृतियों में से एक है। परम्परागत महाकाव्य के लक्षणों पर निर्मित इस काव्य में कवि की समर्थ लेखनी यथास्थान प्रकट होती है। अपने काव्य नायक के चरित के वर्णन के माध्यम से कवि ने अपनी राष्ट्रभक्ति को भी इस रचना में अनुस्यूत किया है। कवि कहता है कि अपना अपमान, प्रतिभा का उपहास, भूसम्पत्ति और स्वर्ण-धन का अपहरण तथा विद्या-कला-संस्कृति का सर्वनाश देखता हुआ भी वह कौन है जो दासता को सहता है आत्मापमानं प्रतिमोपहासं स्वसम्पदास्वर्णधनापहारम् । विद्याकलासंस्कृतिसर्वनाशं पश्यन्नसौ दास्यमपीहते कः।। ५/३८

विश्वनाथ केशव छत्रे

(महाराष्ट्र, १९०६) कवि छत्रे ने अनेक संस्कृत तथा मराठी ग्रन्थों की रचना की। भारतीय रेल विभाग में लिपिक के रूप में सेवा से निवृत्त होकर सिद्धेश्वर आली, जोगलेकर वाडा, कल्याण जि. ठाणे (महाराष्ट्र) में निवास किया। दस सगर्गों में रचित सुभाषचरित महाकाव्य के अतिरिक्त तीन और महाकाव्य, १८ सर्गों में उपनिबद्ध एकनाथचरित, श्रीसातवलेकरचरित, भारतीयस्वातन्त्र्योदय लिखे। एकनाथचरित का सर्गों का प्रथम भाग प्रकाशित हुआ और बारह सर्गों के श्रीसातवलेकरचरित का निर्माण १६८३ में पूरा हुआ, किन्तु यह अप्रकाशित है। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस (१८६७-१६४५) के महनीय जीवन पर लिखित सुभाषचरित महाकाव्य अपने चरित-नायक के त्यागमय जीवन की ही भाँति एक सार्थक प्रयास है। नेताजी ने भारत से पैदल पलायन किया था तब उनका मार्ग कितना कठिन था, किन्तु प्रबल देशभक्ति के कारण अत्युच्च विद्या से समलङ्कृत, भोग की ओर से निवृत्त सुभाष ने जंगल में पैदल प्रस्थान किया- ः कियत्यहो भारतभूमिभक्तिस्त्यक्त्वा यदर्थ विषयोपभोगान्। अत्युच्चविद्यासमलङ्कृतोऽसौ पद्भ्यां युवा याति वने सुभाषः ।। ७/४६ कवि ने अपने चरित नायक के विषय में ठीक ही कहा है कि पीछे चलने वाले तो हजारों बार-बार मिलेंगे, पर नेताजी के समान नेता बार-बार नहीं प्राप्त होगा।आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास भूयो हि लभ्या अनुगाः सहनं नेता तु नेताजिसमो न भूयः।

बालकृष्ण भट्ट

(उत्तर प्रदेश) कवि भट्ट का जन्म पर्वतीय क्षेत्र टिहरीगढ़वाल के जाखौली ग्राम में हुआ। इन्होंने अपने ही जिले के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर सेवाकार्य किया था। इनके द्वारा रचित सत्ताइस सर्गों का कनकवंश महाकाव्य स्वयं कवि द्वारा चार भागों में प्रकाशित कराया गया है (१६५२,१६५४,१६६१, १६६६)। कवि भट्ट की ही दूसरी रचना भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति (१६४७) के अवसर पर रचित स्वतन्त्रभारतम् नाम का खण्ड काव्य (दो भागों में विभक्त) है। कवि ने इसे ‘भारतस्वातन्त्र्यालोकः" भी कहा है। इस ऐतिहासिक काव्य में गढ़वाल के परमारवंशीय नरेश कनकपाल के वंश का वर्णन है। इसका कथा-क्षेत्र ईसा की सातवीं शताब्दी के अन्तिम चरण से बीसवीं शताब्दी के मध्यकाल तक, अर्थात् कनकपाल के सिंहासनाधिरूढ होने से लेकर मानवेन्द्र शाह के शासन काल तक फैला हुआ है। कवि ने इस समग्र कथावस्तु को बड़ी भावुकता के साथ प्रस्तुत किया है। प्रथम श्लोक इस प्रकार है अनन्तकल्याणगुणैकसिन्धुःविधेर्विधानस्य कृतेऽस्ति हिन्दुः। समस्तभूमण्डलमण्डनेशः स राजते भारतवर्षदेशः।। (वह भारत देश शोभायमान है, जो अनन्त कल्याण-गुणों का एक सागर है, विधाता के विधान के लिए हिन्दु है तथा समस्त भूमण्डल का श्रेष्ठ भूषण है।) स्वाभाविक है जो कवि ने हिमालय की प्राकृतिक रम्यता और उसमें प्रचहमान अनेक नदियों और विराजित तीर्थों का वर्णन किया है।

सत्यव्रत शास्त्री (१९३०)

इनका जन्म लाहौर, जो अब पाकिस्तान का एक शहर है, में हुआ। आपके पिता चारुदेव शास्त्री विशेष रूप से पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त विद्वान थे। देश के विभाजन के पश्चात् इन्होंने पिता के साथ अम्बाला और जालन्धर में रहकर अध्ययन किया। विशेष अध्ययन वाराणसी में किया तथा १६५६ में दिल्ली विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग में विभिन्न पदों पर अध्यापन करते हुए आचार्य के पद से अवकाश ग्रहण किया। आपकी रचना श्रीगुरुगोविन्दसिंह-चरित (१E६७) पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, १८६८ में प्राप्त हुआ। कविवर शास्त्री द्वारा रचित तीन महाकाव्य प्रकाश में आये। १. श्रीबोधिसत्त्वचरित, जो प्रथम बार १६६० में प्रकाशित हुआ तथा दूसरी बार १९७३ में, मेहरचंद लछमन दास, दरियागंज दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया। २. इन्दिरागान्धीचरितम्, जो भारतीय विद्या प्रकाशन दिल्ली से १६७६ में प्रकाशित हुआ। ३. श्रीरामकीर्तिमहाकाव्य मूलामल सचदेव प्रतिष्ठान और अमरनाथ सचदेव प्रतिष्ठान, बैंकाक द्वारा १EE0 में प्रकाशित किया गया। चौदह सर्गों का प्रथम महाकाव्य श्रीबोधिसत्त्वचरित पालि-साहित्य की (और संस्कृत महाकाव्य में भी प्राप्त होने वाली) कुछ जातक कथाओं पर आधारित है। इनमें बुद्धत्व प्राप्ति से पूर्व, बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाएं है। बोधिसत्त्व नाना जन्म ग्रहण करके उदात्त कर्म करता है और अन्ततः बुद्धत्व को प्राप्त होता है। प्राचीन महाकाव्य के लक्षण के अनुसार, या तो एक नायक का सम्पूर्ण चरित वर्णित होता है या एक वंश के अनेक नायकों का। रघुवंशकी भांति एकवंश के अनेक नायकों का चरित तो आलोच्य रचना में वर्णित नहीं है, फिर भी यहां बोधिसत्त्व सभी कथाओं में बुद्धत्व की प्राप्ति के एक मात्र उद्देश्य से प्रयत्नशील है अतः असम्बद्ध घटनाओं में भी एकसूत्रता सी बन गयी है। इस प्रकार-आधुनिक संस्कृत के एक प्रतिष्ठित कवि द्वारा परम्परा से अलग हटकर लिखित इस रचना को महाकाव्य की श्रेणी" में स्थापित करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। कवि के एक आलोचक डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गुप्त के शब्दों में ‘कथानक की सीमाओं के होते हुए भी कवि उक्त पात्रों (जैसे अरिष्टपुर का नरेश शिबि, युक्तमना कृषक, संघ और उसका मित्र पीलिय) एवं अन्य पात्रों में चरित्र का क्रमिक विकास दिखाने में सफल हुआ है।" (भूमिका) चरित्र के क्रमिक विकास में डॉ. गुप्त को सर्वाधिक मात्रा में अन्तर्द्धन्द्ध का अनुभव अरिष्टपुर नरेश शिवि के चरित्र में हुआ है, जो पहले सेनापति की सुन्दर पत्नी के प्रति पाप-पूर्ण दृष्टि रखता है और बाद में पश्चात्ताप की अग्नि में तप कर सोने के समान निर्मलचरित्र हो जाता है। उन्मदन्ती के सौन्दर्य में शृङ्गार को प्रश्नय मिला है अनङ्गरङ्गस्थलमन्तरङ्गं तरङ्गयन्ती कुटिलैः कटाक्षैः । असौ विशालायतपक्ष्मलाक्षी मनोहरन्मे वनकिन्नरीव ।। मणिप्रभोद्भासितकुण्डलश्रीझेमद्युतिर्विद्युदिवोल्लसन्ती। मुग्धा विदग्धोचितलीलया मां व्यलोकयत्सा चकिता मृगीव ।। ८/६६-७ (अपने कुटिल कटाक्षों से कामदेव के रंगस्थल रूप मेरे अन्तरंग को तरंगित करती हुई यह विशाल, आयत तथा पक्ष्मल नेत्रों वाली वन-किन्नरी की भांति मेरा मन हर चुकी है। मणिकी प्रभा से उद्भासित कुण्डल-शोभा वाली, सूवर्णकान्तिवाली, बिजली की भांति कौंधती हुई उस मुग्धा ने विदग्ध के समुचित लीला से चकित मृगी की भांति मुझे निहारा ।) हालांकि यहां अनुचित कामभावना की उत्पत्ति के कारण शृङ्गार के आभास की कोटि का रस अभिव्यक्त है। कवि की दूसरी महाकाव्य-कृति है, इन्दिरागान्धीचरित, जिसमें २५ सर्ग हैं। यह भारतीय स्वतान्त्र्य संग्राम के अन्तिम चरण के कालखण्ड के कथानक पर आधारित है, जिसमें महात्मा गान्धी का पदार्पण हो चुका था और प्रयाग में बसा कश्मीरी नेहरूपरिवार उस संग्राम से सर्वात्मना जुड़ चुका था। पं. मोतीलाल नेहरू का “आनन्द-भवन" उसका केन्द्र बन चुका था। महाकाव्य की चरितनायक इन्दिरा का जीवन उसी घटना-संकुल आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास वातावरण में विकसित होता है। कवि के अनुसार, उसे अपने दादा मोतीलाल से उदारता और उच्च परिष्कृत रुचि, पिता से स्वाध्यायशीलता औद अदम्य साहस, पितामही से अपने देश के साहित्य में भक्ति और दृढ़ आस्था के संस्कार प्राप्त हुए तो उसमें मां कमला ने प्राचीन संस्कृति में प्रेम और सौकुमार्य के संस्कार डाले। महाकाव्य के प्रथम से लेकर बीसवें सर्ग तक इन्दिरा गान्धी के चरित के विकास क्रम को भूमिका के रूप में प्रस्तुत करके अन्तिम पांच सर्गों में कवि ने केन्द्र में मन्त्री पद प्राप्त करने से लेकर १६७६ तक की घटनाओं का वर्णन किया है। महाकाव्य में किसी महान् व्यक्तित्व के महत् कार्यों का मूलतः वर्णन होता है, अतः इन्दिरागान्धीचरित एक ऐतिहासिक श्रेणी का महाकाव्य कहा जा सकता है। इसमें कवि ने इतिवृत्तात्मकता को अधिक प्रश्रय दिया है, फिर भी उसकी भाषा में घटनाओं को प्रस्तुत करने में कवित्व का स्पर्श निरन्तर बना होने से एक गतिशीलता के साथ सरलता का भी अनुभव होता है। इन्दिरा की मां कमला का क्षयरोग से देहान्त हो जाता है। वह मातृवियोग के कारण अत्यन्त दु:खी होने पर भी अपना धैर्य नहीं खोती (१२/३५) और जब उसका विवाह फिरोज गांधी के साथ सम्पन्न हो रहा था तब उस सुखद वातावरण में भी मां के न रहने के कारण एक विषाद की सूक्ष्म रेखा उसकी आंखों में झलक रही थी (१५/२५)। वर्णनों में कवि ने संक्षिप्तता बरती है। प्रयाग, शर्मण्यदेश, स्वीटजरलैण्ड के वर्णन आकर्षक हैं। शान्तिनिकेतन के वर्णन के प्रसंग का यह पथ आकलनीय है सुकविता सुकवेरिव कस्यचित् सुघटिता प्रतिमेव सुशिल्पिनः। सुरमणीयमृषेरिव दर्शनं लसति शान्तिनिकेतनमद्भुतम् ।। १२/५ (किसी सुकवि की सुकविता की भाँति, अच्छे शिल्पी की सुघटित प्रतिमा की भांति, सुरम्य ऋषि के दर्शन की भाँति अद्भुत “शान्तिनिकेतन” सुशोभित है।) इन्दिरा का व्यक्तित्व अन्त के पांच सर्गों में पूर्ण विकसित होकर प्रस्तुत हुआ है और कवि को उसके प्रस्तुतीकरण में पर्याप्त सफलता मिली है। घटना-प्रधान इस महाकाव्य के अपेक्षाकृत छोटे-छोटे सर्गों में कवि ने अपने युग के एक प्रखर व्यक्तित्व को महाकाव्य का विषय बनाने का एक सफल प्रयास किया है। यह भी कहा जा सकता है कि अपने आश्रयदाता के प्रशस्तिगान वाली प्राचीन मानसिकता से कवि ने अपने को असंस्पृष्ट रखते हुए यथार्थ को उभारने का प्रयास किया है। श्रीरामकीर्तिमहाकाव्य २५ सर्गों में पूर्ण हुआ है। यह मूल थाईदेश की रामायण पर आधारित है। जैसा कि स्वयं कविवर शास्त्री ने अपने “आत्मनिवेदनम्” में यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने थाई-देशों में प्रचलित “रामकीर्ति” नाम की रामगाथा को उपजीव्य-ग्रन्थ के रूप में लिया है तथा जो उपाख्यान श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अथवा अन्य भारत में प्रसिद्ध रामायणों में उपलब्ध नहीं होते, उन्हें विशेष रूप से लिया है, जिससे थाई-रामायण के राम का कथागत वैशिष्ट्य समुन्मिषित हो । उनका यह भी कहना है कि “रामकीर्ति” की महाकाव्य रामगाथा उनके सूत्रमात्र है, उसे परिवतर्तित न करते हुए उन्होंने अपनी शैली में अपना भी कुछ जोड़ा है। प्रथम सर्ग में पहले के पांच पद्य कवि ने ‘थाइदेशविलास" नामक की अपनी रचना से उद्धृत किये हैं। नगर की राजधानी “बैकाक” के इतिहास, रामकीर्ति के नाम से ख्यात रामगाथा के इतिवृत्त और उसके प्रति उस देश के वासियों की आत्मीयता की चर्चा है। द्वितीय सर्ग में अनोमतन् नाम के आध नृपति के जन्म का वर्णन है। इस प्रसंग में हिरन्त यक्ष नाम के असुर का उपद्रव, देवताओं का उसके प्रतीकार के लिए ईश्वर के पास गमन, ईश्वर द्वारा नारायण का स्मरण, नारायण द्वारा हिरन्त यक्ष का वध, तब क्षीरसागर पर पहुंचे नारायण द्वारा पद्म पर सो रहे एक शिशु का दर्शन, उसे ईश्वर को उपहृत करना, ईश्वर द्वारा उसका नाम अनोमतन् रखा जाना तथा यह आदेश देना कि यह पृथ्वी का प्रथम राजा होगा, ईश्वर के आदेशानुसार महेन्द्र द्वारा अयोध्यापुरी का निवेशन, अनोमतन् से दशरथ और दशरथ से श्रीराम की उत्पत्ति का इतिवृत्तात्मक निर्देश किया गया है। कवि ने वाल्मीकीय रामायण और “रामकीर्ति” में प्राप्त होने वाले समान पात्रों की संज्ञाओं को तो वाल्मीकीय रामायण के अनुसार ही रखा है, हालांकि “रामकीर्ति” में उनके उच्चारण में भेद पाया जाता है, जैसे “दशरथ” के लिए “तोत्सरोत्” आदि, किन्तु जो संज्ञाएं मात्र रामकीर्ति में प्राप्त हैं उन्हें अपरिवर्तित रूप से रखा है। यहां प्रत्येक सर्ग की कथा को उद्धृत करना सम्भव नहीं। कवि ने सर्वत्र मूलकथा की इतिवृतात्मकता सुरक्षित रखी है, जिसमें उसके द्वारा प्रस्तुतीकरण में कवित्व के स्पर्श की सामान्य अनुभूति होती है। कवि की यह प्रवृत्ति उसके अन्य महाकाव्यों में भी लक्षित हुई है। अनेक मार्मिक प्रसंगों को अवर्णित छोड़ दिया गया है। चतुर्थ में लीला की उत्पत्ति के तुरंत बाद सीता का विवाह प्रसंग उपस्थित हो जाता है। यहां धनुभंग से कुपित परशुराम रामासुर के रूप में आकर युद्ध करते हैं। यहां ऐसी अनेक घटनाओं की सूचना है जो भारतीय रामायणों से सम्भवतः ज्ञात नहीं हैं, जैसे कैकेयी की दासी कुब्जा के मन में बाल्यकाल में राम के साथ घटित एक घटना के कारण द्वेष का भाव बना हुआ था आदि। वनवास, सीताहरण, जटायु-वृत्तान्त, हनुमान् से सम्पर्क, सुग्रीव से मैत्री, वालि का बध आदि घटनाएं सामान्य वर्णनों के साथ सूचित कर दी गयी है। इसी प्रकार हनुमान का लंका-गमन, सीता से भेंट और लंकादहन के प्रकरण सूचित मात्र हो जाते हैं। नवम सर्ग में रावण द्वारा दो स्वप्नों का दर्शन और विभीषण से उनके फल के सम्बन्ध में पूछने की चर्चा है। कवि ने इस प्रकरण को “शार्दूलविक्रीडित” छन्द में प्रस्तुत किया है। विभीषण द्वारा स्वप्नों के फल कहे जाने पर रावण क्रुद्ध हो कर कहता है शक्तिं न्यूनां गणयसि कथं राघवान्मे विजेतु दिक्पालानां सकलभुवनस्पृहूयकीर्तेर्विमूढ। क्वाहं वीरो जगति विदितो राक्षसानामधीशो आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास राज्याद् भ्रष्टो वनमथिवसन् राघवो वा पुनः क्व ।। ६०/१५ (मूर्ख, तू दिक्पालों के विजेता तथा सारे संसार में स्पृहणीय कीर्ति वाले मुझ रावण की शक्ति को राम से कैसे कम मानता है ? कहाँ राक्षसों का अधिपति जगत् में विख्यात वीर और कहां राज्य से च्युत वनवासी राम!) रावण द्वारा निष्कासित एवं अपमानित विभीषण राम की शरण में आता है। अब रावण की ओर से राम के शिविर में शुक्रसार का आगमन और हनुमान द्वारा उसकी दुर्गति, स्वयं साधु के वेश में रावण का आगमन और राम को सलाह देना कि रावण रूपी अग्नि में शलभायायित न हो, किन्तु राम के मुख से यह प्रतिज्ञा सुनता है और लौट जाता है। चापद्वितीये मयि युध्यमाने स्थातुं ममाग्ने न भवेदलं सः। एकैकशः कर्तयितास्मि तस्य तीक्ष्णैर्दशास्यानि शरैरहं द्राक् ।। ६/५१।। (जब धनुष लेकर मैं युद्ध करूंगा तो वह मेरे सामने नहीं ठहर सकता। तीक्ष्ण बाणों से मैं एक-एक करके दसों सिर काट डालूगां ।) रावण माया आरम्भ करता है। वह वेञ्जकयी नाम की राक्षसी को भेजता है जो मृत सीता के रूप में राम को पानी में तैरती दिखायी देती है। अन्त में वह हनुमान द्वारा पकड़ ली जाती है। विभीषण बताते हैं कि यह उनकी पुत्री है और अपने इस कृत्य के कारण वधार्ह है, किन्तु यह कहते हुए हनुमान इसे क्षमा कर देते हैं एवं सखे नैव भवेत् कदाचित् हन्यां कथं मित्रवरस्य कन्याम् । यथा तवेयं हि तथा ममापि क्षम्यो मयाऽस्याः प्रथमापराधः।। १०/२१ (मित्र ! ऐसा कभी नहीं होगा, मित्रवर की पुत्री को कैसे मार सकता हूँ ? जैसे यह तुम्हारी कन्या है वैसे मेरी भी है, इसका पहला अपराध मेरे द्वारा क्षम्य है।) राम की आज्ञा से हनुमान वेजकयी को लंका पहुंचाने जाते हैं और मार्ग में ही उसके प्रेम पाश के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करते हैं। उन्हें एक “असुरफद’ नाम का पुत्र होता है। हनुमान् के साथ सुवर्णमत्स्या का एक और प्रणयप्रसंग घटित होता है। वह मुग्ध होकर मन में सोचती है दृष्ट्वैनमन मनसः सुतरामनीशा जाने न किं खलु मया करणीयमत्र । पर्याकुलेव लुलितेव सुविह्वलेव वल्लीव पौरुषतरुं श्रयितुं लषामि।। १२/४२ (इन्हें देखकर ही पूरा मन दे बैठी, समझ में नहीं आता, यहां क्या करूं ? पर्याकुल-सी, लुलित-सी, विह्वल-सी लता की भांति इनके पौरुष रूपी वृक्ष का आश्रय लेना चाहती हूँ महाकाव्य मैयराब का विस्तृत उपाख्यान दो सर्गों में उपनिबद्ध है जिसमें हनुमान् राम को पाताल देश से ले आते हैं। कुम्भकर्ण, इन्द्रजित और रावण के वध की घटनाएं घटित होती हैं। अन्त के बीसवें सर्ग से पच्चीसवें सर्गों तक उत्तररामचरित की घटनाएं घटित होती हैं। एक प्रसंग में राम सीता से अयोध्या चलने के लिए निवेदन करते हैं किन्तु सीता यह कहकर ठुकरा देती हैं जीवामि देवादहमय राजन् मृता त्वहं त्वत्कृत आसमेव। मृतां गृहाणैव तु मां त्वमद्य त्वया मया किं करणीयमस्ति ।। २३/२२ तत्स्वस्ति तेऽस्तु व्रज राजधानी न्यायेन सर्वाः प्रकृतीः प्रशाधि। पत्नी तवाहं तव नित्यमेव धास्यामि कल्याणमहं स्थिताऽत्र ।। २३/३० (हे राजन! मैं भाग्य से आज जीवित हूं, तुम्हारे लिए तो मर ही चुकी थी, आज तुम मुझे मरी हुई को ग्रहण करो, तुमसे मुझे क्या लेना-देना है ? इसलिए तुम्हारा कल्याण हो, तुम राजधानी लौट जाओ और न्यायपूर्वक प्रजाओं का शासन करो, मैं तुम्हारी पत्नी नित्य ही बनी रहूंगी और यहां रह कर कल्याण करूंगी।) तब राम सीता के दोनों पुत्रों को अपने साथ अयोध्या ले जाने के लिए उसकी अनुमति चाहते हैं। वह व्याकुल हो जाती है, किन्तु अन्त में यह कह कर उन्हें ले जाने की अनुमति देती है पत्युर्वियोगो मयका विसोढश्चिराय सम्प्रत्यहमाश्रमेऽस्मिन् । दीर्घ सहिष्ये सुतयोर्वियोगं सीताऽस्मि सर्वं मम सड्यमेव।। २३/४३ (पति का वियोग मैंने चिरकाल तक सहन किया, अब इस आश्रम में, पुत्रों का दीर्घ वियोग भी सहूंगी। मैं सीता हूं, मुझे सब सहना है।)

  • चौबीसवें सर्ग में राम सीता के दोनों पुत्रों-मंकुट और लव द्वारा सन्देश देते हैं कि यदि वह अयोध्या नहीं आयेगी तो उनके आंसू उनके प्राण हर लेंगे। यह सन्देश पाकर सीता राम के अन्तिम दर्शन के लिए अयोध्या आने की प्रतिज्ञा करती है। राम बहुत व्याकुल होते हैं। सीता के मिलन के लिए अनेक उपाय सोचते हैं। अन्त में हनमान को छदम रूप से यह सूचित करने के लिए भेजते हैं कि राम दिवंगत हो गये। इस सूचना से वह मूर्छित होकर गिर जाती है। फिर वह हनुमान के साथ अयोध्या आती है और विलाप करती है। तभी राम उसके सामने प्रकट हो जाते हैं। इससे पति द्वारा अपने को छलित अनुभव करके दुःखी होती है। वह पुनः “शठोत्तम” राम के वचन पर विश्वास न करने का निर्णय लेती है। जब राम कहते हैं कि वह कैसे जायेगी, द्वार तो रुद्ध हैं। इस पर उसे परम विस्मय होता है। वह इष्टदेवता से प्रार्थना करती है। उसी समय पृथ्वी विदीर्ण हो जाती है और वह पाताल लोक चली जाती है। अन्तिम २५ वें सर्ग में भगवान शंकर के प्रयास से राम और सीता का मिलन सम्पन्न होता है। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कविवर शास्त्री के सभी महाकाव्यों में घटनाओं के बाहुल्य के कारण इतिवृत्तात्मकता को कवित्व के स्पर्श की अपेक्षा अधिक प्रश्रय मिला है, फिर भी अपनी प्रासादिक प्रवाहमयी शैली के कारण तथा यत्र-तत्र मर्म-स्मर्शी प्रसंगों को अनुस्यूत करने के कारण इनकी आधुनिक संस्कृत महाकाव्यकारों में एक प्रतिष्ठा है और इनका “रामकीर्ति महाकाव्य” एक नये आयाम को उद्घाटित करने वाली रचना सिद्ध होगी, ऐसा विश्वास होता है।

ब्रह्मानन्द शुक्ल

(उत्तर प्रदेश, १९०४-१९७०) मुज़फ्फरनगर जिले के चरथावल ग्राम में जनमे कवि शुक्ल ने खुरजा के श्रीराधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय में साहित्य विभाग के अध्यक्ष के रूप में सेवा की। इनमें संस्कृत के पाण्डित्य के अतिरिक्त कवित्व का भी विशेष गुण था। इन्होंने अनेक कृतियां संस्कृत साहित्य को दी, जिनमें लघुकाव्य श्रीगान्धिचरितम् भी है। इनकी अन्तिम रचना श्रीनेहरुचरित महाकाव्य है जो अट्ठारह सर्गों में निर्मित है, जिसका प्रकाशन शारदासदनम् ३८ राधाकृष्ण, खुरजा (उ.प्र.) से १६६६ में हुआ है। म स्वयं कवि शुक्ल ने लिखा है कि यहां लक्षण ग्रन्थों में प्रतिपादित महाकाव्य के लक्षणों का उन्होंने परिपालन नहीं किया है, प्रत्युत युगानुसार महाकाव्य के लक्षण को ध्यान में रखकर रचना की है। श्रीनेहरूचरित में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के जीवन चरित को आधार बनाया गया है। कवि ने पं. नेहरु के जन्म से लेकर उनके दाम्पत्य सौख्य के वर्णनों में महाकाव्य का तीन चौथाई भाग लगाया है। नेहरूजी का जन्म किसी योगीश्वर के पुर्नजन्म ग्रहण के रूप में होता है (चतुर्थ सर्ग)। विदेशों में अध्ययन, पिता पं. मोतीलाल के निर्देश पर गांधी जी के साथ होना और कांग्रेस के एक सदस्य के रूप में देश की सेवा में जुट जाना, कमला के साथ विवाह, पिता, पत्नी और माता के स्वर्गवास, पुत्री इन्दिरा के लिए उच्च शिक्षण का निश्चय वर्णित होते हैं और चतुर्दश सर्ग के अन्त में, पं. नेहरू प्रधान मन्त्री होते हैं। बाद के सगों में नेहरूजी के विविध कार्यकलापों का वर्णन है। काव्य का अन्त उनके स्वर्गवास की घटना को लेकर होता है। यहां कवि ने इतिवृत्तात्मकता को प्रश्रय दिया है, फिर भी कवि का कवित्व पक्ष बहुत शिथिल नहीं हुआ है। वर्णनों के लिए उसे पर्याप्त अवसर मिलता है, किन्तु उनमें वह उलझता नहीं। वर्णनों में वस्तुस्थिति को यथार्थ रूप से प्रस्तुत करने में उसका अधिक मनोयोग लक्षित होता है। पं. नेहरू के रूप में काव्य का नायक न केवल देश के पारतन्त्र्य की समस्या, बल्कि एक ही साथ अनेक पारिवारिक कठिनाइयों से भी जूझता हुआ निर्दिष्ट हुआ है पितरौ स्थविरौ जातौ पुत्री पञ्चदशाब्दिका। पत्नी रोगाकुला हन्त कीदृशीयं विडम्बना ।। १३/५२ (माता-पिता बूढ़े हो चले, पुत्री पांच साल की है, पत्नी रोग से पीड़ित है, हाय कैसी विडम्बना है !) महाकाव्य कविने यमक, परिसंख्या आदि अलंकारों को भी यथास्थान प्रश्रय दिया है। वह अपने नायक के देश सेवा व्रत को इन शब्दों में, नायक के मुख से व्यक्त करता है कदापि नाहं विचलामि सत्यात् पथः स चैवं करुणां करोतु। शरीरमेतन्मम देशसेवारतस्य कामं विलयं प्रयातु।। ६/२२ (सत्य के पथ से मैं कभी विचलित नहीं होउं, वह ऐसी करुणा करे। देश की सेवा में लगे मेरा यह शरीर चाहे विलीन ही क्यों न हो।) कवि अपने नायक के सम्बन्ध में कहता है कष्टैरनेकैः परिपीडितोऽपि न लेशतोऽयं चलितो बभूव। वेगैर्नदीनां परिवारितोऽपि यथाऽचलो नैष चलः कदाचित्।। १३/३० (अनेक कष्टों से नितान्त पीडित होकर भी यह विचलित नहीं हुआ, जैसे नदियों के वैगों से घिरा पर्वत भी विचलित नहीं होता, अपने स्थान से नहीं हटता।) इस रचना में कविने पाकिस्तान बनने के पश्चात् पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हुए दंगों का भी वर्णन किया है जो संस्कृत रचनाओं में विरलता से वर्णित हुए हैं। सामान्यतः इस रचना के लेखन से कवि शुक्ल को उत्तम कवियों की गणना के अवसर पर उल्लेखनीय माना जा सकता है।

क्षेमधारिसिंह शर्मा

(१८९३-१९६१) दर्शन (विशेषतः शाक्तदर्शन) के अध्ययन-मनन के साथ उपासना में सहज प्रवृत्ति रखने वाले क्षेमघारिसिंह का जन्म मिथिला के राजपरिवार में हुआ। ये कवि के रूप में अपनी ख्याति से निरपेक्ष रहे और सही अर्थ में स्वान्तःसुखाय ही काव्य रचना में प्रवृत्त हुए। इनकी दार्शनिक भाव वाली अनेक कृतियां अप्रकाशित रह गयीं। सुरथचरित महाकाव्य का प्रकाशन भी इनकी मृत्यु के पश्चात् हुआ। मार्कण्डेयपुराण के ८१वें अध्याय से लेकर ६३ वें अध्याय में उपनिबद्ध देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गासप्तशती के नाम से जाना जाता है, के प्रथम अध्याय और त्रयोदश अध्याय के कथाभाग को कवि ने आधार बनाकर १८ सर्गों में सुरथचरित महाकाव्य की रचना की, जो क्षेमधारिस्मृतिप्रकाशन, मधुबनी (बिहार) से १६६७ में प्रकाशित हुआ। महाकाव्य के लक्षण का अनुगमन करते हुए कवि ने राजा सुरथ को धीरोदात्त नायक के रूप में तथा अंगीरस के रूप में शान्त को प्रतिष्ठित किया है। प्रसंगतः अन्य रसों का तथा प्रकृति के वर्णनों का भी रमणीय प्रसादगुणमय नियोजन कवि ने किया है। कविता निर्माण में प्रवृत्त कवि ने देवी (दुर्गा) की करुणामयी दृष्टि को महत्त्व दिया है काचित् पिपीलिका चन्द्रं यातु जातु लघीयसी। पद्भ्यां वा यदि तस्यास्तु भवेद्धि करुणामयी।। १/१३ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (कोई क्षुद्र चींटी कभी चन्द्र तक पैरों से चलकर पहुंच जाये, यदि उस पर करूणामयी । दृष्टि पड़ जाये। कवि की जननी दुर्गा के प्रति अगाध निष्ठा से प्रेरित यह काव्य एक आकलनीय रचना बन पड़ा है। कवि ने सीता और राधा को भी उसी दुर्गा का अवतार माना है प्रदेश संस्कृत FEEL प्र.मा दिदि र सीता स्वयं सा भुवनस्य धात्री समागता रामगृहे च लक्ष्मीः। आधैव शक्तिर्भवरक्षणाय जाता पृथिव्या जनकस्य कन्या।। ११/२४ कृष्णस्य माया परमेव शक्तिः काचिच्च लोकप्रथिताऽप्यदृश्या। दृश्या च राधा पुरगोपजाता रासेश्वरी या शरदः प्रभेव ।। ११/३३ स्वयं वही भुवन का पालन करने वाली आधा शक्ति संसार की रक्षा के लिए जनक की कन्या होकर राम के गृह में लक्ष्मी के रूप में आयी और कोई लोक में प्रसिद्ध परम अदृश्य शक्ति ही दृश्य होकर शरत् की प्रभा जेसी गोपकन्या रासेश्वरी राधा हुई) कवि की अन्य प्रकाशित रचनाएं हैं- श्री स्तुतिमाला और शतनामपञ्जिका।

कालीपद तर्काचार्य-(१८८८)

इनका जन्म बंगाल (अब बांग्लादेश) के फरीदपुर जिले के कोटलिपारा-उनशिया ग्राम में हुआ था। इनका उपनाम काश्यपकवि था। ये मधुसूदन सरस्वती तथा हरिदास सिद्धान्तवागीश के वंशज थे। इन्होंने १६३२ में कलकत्ता के संस्कृत कालेज में न्याय का अध्यापन किया तथा महामहोपाध्याय की उपाधि से भूषित हुए। इनके अनेक रूपक हैं तथा दो महाकाव्य हैं-सत्यानुभाव और योगिभक्तचरित। सत्यानुभाव प्रसिद्ध पौराणिक सत्यनारायण कथा पर आधारित एवं २४ सर्गों में रचित है। इसकी रचना सातवें दशक में हुई और संस्कृत साहित्य परिषद कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। इसमें कलि के प्रभाव का वर्णन, रमोपदेश, नारद वैकुण्ठ प्रवेश, नारद प्रेरणा, दरिद्र ब्राह्मण भिक्षाटन, नारदोपदेश, प्रदोषवर्णन, सत्यपूजोत्सव, ब्राह्मणवणिक्संवाद, वैश्यकृत सत्यपूजामहोत्सव, वाणिज्य व्यवसाय आदि से लेकर वणिक् की सभी विपत्तियों से मुक्ति से अन्त होता है। सामान्यतः इस महाकाव्य में ऐसा कुछ नहीं लगता, जिसे कवि की दृष्टि किसी आधुनिक भाव बोध से समन्वित रचना की ओर है अन्यथा वह ऐसा सामान्य कथानक का आधार नहीं अपनाता। फिर भी कवि अपने राष्ट्र के प्रति शुभ भावना अपने पान के माध्यम से इन शब्दों में व्यक्त करता है - चरति भारतवक्षसि सन्ततं करुणरोदनमन्तरदारणम् । शमय सोमकरैरिव तापितं सदुपदेशाकथामृतधारया।। १/५४ (मारत के वक्ष में सदा हृदय को विदीर्ण करने वाला करुण रोदन प्रवर्तमान है। आप सदुपदेशविप कथामृत की धारा से उस ताप का शमन करें।)

भोलाशङ्कर व्यास

(जन्म १९२४) बूंदी राजस्थान के नरेशों के कुलगुरु-परिवार में महाकाव्य फाल्गुन कृष्ण द्वादशी वि.सं. १६८१ को जन्मे कविवर व्यास का आरम्भिक अध्ययन उनके पितामह पं. गोवर्धन शास्त्री, पितृव्य कन्हैयालाल जी न्यायाचार्य तथा पिता शिवदत्त शास्त्री के घरके संस्कृत विद्यालय में सम्पन्न हुआ। बाद में इन्होंने पाश्चात्त्य पद्धति से अध्ययन करके काव्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र तथा भाषाशास्त्र का विशेष अध्ययन किया और इन विषयों पर ग्रन्थों का निर्माण भी किया। का.हि.वि. वि. वाराणसी के हिन्दी विभाग के आचार्य तथा अध्यक्ष पद पर कार्य करते हुए सेवानिवृत्त हुए हैं। इनके द्वारा हिन्दी में लिखित पण्डितराज जगन्नाथ के जीवन पर आधारित मौलिक उपन्यास ‘समुद्रसङ्गम” एक उत्तम कृति है। व्यासजी ने १६ सर्गों में “शक्तिजयम्” (महाकाव्य) की रचना की है, जिसके आरम्भिक पांच सर्ग राजस्थान संस्कृत अकादमी (जयपुर) की प्रमुख पत्रिका (स्वरमङ्गला) में प्रकाशित हो चुके हैं। इस महाकाव्य की कथावस्तु दुर्गासप्तशती के उत्तरचरित (शम्भवध-प्रकरण से ली गई है, पर कवि ने शम्म और निशम्भ को काम तथा क्रोध वत्तियों का प्रतीक माना है, जो जीवों को ‘पाश’ में आबद्ध कर “पशु” बना देते हैं। परम शिव (पशुपति) की आनन्दशक्ति पराम्बा के अनुग्रह (शक्तिपात) के कारण ही शुम्भ और निशुम्भ पर विजय प्राप्त कर पाते हैं। वे इसके लिए अपनी-अपनी शक्तियों को भी युद्ध में प्रवृत्त करते हैं। इस काव्य में देवी दुर्गा के परामर्श पर देवरमणियों की सेना की तैयारी और युद्ध का वर्णन किया गया है और स्थान-स्थान पर त्रिकदर्शन और विशेषतः प्रत्यभिज्ञादर्शन के सिद्धान्तों का भी संकेत मिलता है। इसकी शैली तथा शिल्प पर कालिदास, माघ तथा श्रीहर्ष का प्रभाव कहीं-कहीं लक्षित होता है। प्राचीन महाकाव्यों में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख छोटे-बड़े छन्दों के निबन्धन में कवि बहुत जागरूक है। एक सर्ग आर्यागीति (मात्रिक) छन्द ब्रह्मा, तदनन्तर आकाशवाणी के आदेश पर शुम्भ से हारे देवता शक्ति की सेवा में कैलास आते हैं। इस समय शीत ऋतु गुजारने के लिए शिव के मित्र कुबेर के यहां लंकापुरी में रुकते हैं (१ से ४ सर्ग तक)। पञ्चम में शीत ऋतु के बाद बसन्त का आगमन चित्रित है, पद्य आकलनीय है - वाताश्लेषझरत्तुषारकणिकाप्रस्वेदिनी मेदिनी किं किजल्ककरम्बककण्टभरैरामोदयन्ती भृशम्। सूनैर्मञ्जुलयत्यहो स्मितिसुधापूरप्रभाभास्वरै मल्लीवल्लिमतल्लिका सुरमिता गन्धोन्मदं काननम् ।। (वायु के संश्लेष से झरते तुषार-कणों के पसीने वाली केसर-समूह के रोमाञ्च भार से पृथ्वी को आमोदित करती हुई, स्मिति के अमृत-प्रवाह से जनित प्रभा के भास्वर पुष्पों से सुरभित श्रेष्ठ मल्ली-लता गन्धोन्मद वन-प्रान्त को क्या रमणीय बना रही है!) षष्ठ सर्ग में कुबेर द्वारा दर्शित मार्ग में हिमनदों को पार करते हुए सस्त्रीक देवता कैलास पहुंचकर समाधिस्थ शिव के दर्शन करते हैं। यहां कुबेर देशिक (गुरु) हैं, देवताआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास साधक और कैलास को पिण्डान्तवर्ती परम-पद का प्रतीक भी संकेतित किया गया है। इस प्रकार काव्य तथा दार्शनिक उन्मेष की सुन्दर योजना इस सर्ग में मिलती है। कैलास पहुंचने का दार्शनिक वर्णन कवि ने पुष्पिताग्रा छन्द में इन शब्दों में किया है निजपरगतभेदभित्रमुच्चैः शिवसखदेशिकदर्शिताध्वना ते। पदमतिगहनं प्रपेदिरे द्रागमरवराः परमव्ययं सुखेन ।। (वे श्रेष्ठ देवता शिव के मित्र कुबेर द्वारा दिखाये गये मार्ग से, जहां अपने पराये का भेद मिट जाता है ऐसे ऊँचे, अतिगहन तथा अव्यय पद पर सुखपूर्वक शीघ्र पहुंच गये।) यहां “देशिक”, “अध्या’” “अव्यय”, “पर” “पद” शब्द समाधि दशा में साधक के पहुंचने का भी संकेत करते हैं। सातवें सर्ग में समाधिस्थ शिव से शक्ति के स्पन्दन, शक्ति के लीला-विलास का सुकुमार नृत्य के रूप में चित्रण तथा शिव के सात्वतीवृत्तिमय उद्धत नृत्य का वर्णन है, जो समाधिदशा में शिवशक्ति के यामल स्वरूप की लीलाओं का काव्यमय प्रस्तुतीकरण है आवर्तभङ्गीभिरपाङ्गलासं लास्यं नटन्त्या जगतां जनन्याः। मल्लीसुमैर्नद्धगुणा नितम्बद्वये स्खलन्ती पतति स्म वेणी।। (जब जगन्माता ने आवर्त की भङ्गियों से अपाङ्गलास का लास्य आरम्भ किया तब उनके नितम्बों पर मल्ली के फूलों से बंधी वेणी खिसककर गिरने लगी।) आठवें सर्ग में पराशक्ति देवों पर प्रसन्न हो उन्हें शुम्भ पर विजय पाने का उपाय यह बताती हैं कि वे अपनी शक्तियों की सेना का निर्माण करें, जिन्हें युद्ध कौशल सिखाने को वह स्कन्द को आदेश देती हैं और युद्ध के समय स्वयं सहायतार्थ उपस्थित होने को कहती हैं। नवम में स्कन्द सस्त्रीक देवों को युद्ध-कौशल सिखाते हैं। दशम सर्ग में पराशक्ति स्वयं उपस्थित हो देवसभा में भावी युद्ध पर विचार कर शुम्भ के पास शिव को समझाने भेजती हैं। एकादश में चण्ड-मुण्ड अपूर्व लावण्यमयी एक सुन्दरी को हिमालय में विचरता देख शुम्भ को उसे ला लेने की सलाह देते हैं। द्वादश में शुम्भ का दूत आकर शुम्भ का प्रणय निवेदन करता है। देवी उसी को पति बरने की बात कहती हैं जो उसे युद्ध में जीत सके। त्रयोदश में धूम्राक्ष सेना के साथ आता है, युद्ध होता है। यहां दुर्गा के सिंह का रिपु सेना पर आक्रमण सुन्दर बन पड़ा है। चतुर्दश में चण्ड-मुण्ड तथा तदनन्तर रक्तबीज का देवशक्तियों के साथ युद्ध का वर्णन है। इनके मारे जाने पर पञ्चदश में निशुम्भ तथा शुम्भ का देवी के साथ युद्ध तथा उनके संहार का वर्णन है। अन्तिम षोडश सर्ग में कविकृत पराशक्ति की स्तुति है रजनिविरती प्रत्यूषेषु स्फुरच्चितसागरे रवविरहितं स्वान्तर्गीतं लयोत्कलिकाकलम् । महाकाव्य मधुरमधुरैश्छन्दोभेदैः परार्थरसोलवणैः प्रथयसि परे मूर्ति रम्या कवेः किल वैखरीम् ।। यहां कवि की रचना-प्रक्रिया का संकेत है, जहां कवि की वैखरी के रूप में पराशक्ति स्वयं स्वान्तर्गीत (पश्यन्ती तथा मध्यमा) की स्थिति में लहरियों सी उठती क्रमशः शब्द, अर्थ तथा रस से युक्त रचना होकर प्रकट होती है। निखिलजगतीमामोदाकां तनोति सुगन्धिता परशिवकलाभूमिश्चास्ते महाफलकारणम् । जयति विनतानन्दास्वादास्पदं पदमुच्चकै हरतरुवरस्येयं रम्या महारसमञ्जरी।। यहां विशिष्ट आनमञ्जरी के द्वारा पराशक्ति का वर्णन है, जो परमशिव के वृक्ष पर बहुत ऊँचे लगी है और परानन्द (महारस) से युक्त है तथा महाफल (मोक्ष या जीवन्मुक्ति) का कारण है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण रचना एक ओर गम्भीर आध्यात्मिक पुट के कारण प्रौढ़ है तो दूसरी ओर कवि की अपूर्व वर्णन क्षमता के साथ कवित्व के स्पर्श से उल्लसित है।

रेवाप्रसाद द्विवेदी (मध्य प्रदेश, १९३५)

कविवर द्विवेदी का जन्म भोपाल के निकट ‘नादनेर’ ग्राम में हुआ। विशेष अध्ययन के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आये और वहीं बाद में संस्कृत महाविद्यालय में प्राध्यापक हुए। आरम्भ में इनके अनेक काव्य और मौलिक साहित्यशास्त्रीय ग्रन्थ प्रकाश में आये। ये कारयित्री तथा भावयित्री, दोनों प्रकार की प्रतिभा से सम्पन्न हैं। इनके दो महाकाव्य प्रकाशित हुए - सीताचरित (१६६०) जिसका प्र.सं. सागर वि.वि. (सागर) की संस्कृत परिषद द्वारा प्रकाश में आया और उसका षष्ठ परिष्कृत संस्करण कालिदास संस्थान, २८ महामनापुरी, वाराणसी से उत्तरसीताचरितम् के नाम से १६६० में प्रकाशित हुआ है। दूसरा महाकाव्य स्वातान्त्र्यसम्भव उक्त कालिदास संस्थान से १६६० में प्रकाशित हुआ है, जिस पर कवि को साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का प्रतिष्ठित पुरस्कार और के.के. विरला फाउण्डेशन, नई दिल्ली का वाचस्पति पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। दस सर्गों में प्रस्तत उत्तरसीताचरित महाकाव्य कवि की काव्ययात्रा का पहला पडाव है, क्योंकि इसका निर्माण छात्र-जीवन से ही आरम्भ हो चुका था। इसमें वनवास से आगमन के पश्चात् राम द्वारा सीता के निर्वासन की प्रसिद्ध घटना को आधार बनाया गया है। कविवर द्विवेदी ने मूल कथा में अपने अनुसार कुछ मोड़ दिये हैं। यहां प्रमुख पात्र सीता करुणा का पात्र अबला नहीं है, कयोंकि कवि के अनुसार , महामुनियों के शोणित से उसे ओजस् की ज्योति प्राप्त हुई है (३/४६)। । सर्वसहा भगवती पृथ्वी से उसे शरीररत्न, महायोगी विदेह (जनक) से विनय-योग आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास प्राप्त हुआ है। बुद्धि-प्रधान सूर्यवंश की कुलवधू होकर चौदह वर्षों तक वनवास द्वारा वह पतिव्रतकी सुवर्णमुद्रा परीक्षित हो चुकी है तथा वह नितान्त उदात्त चित्तवाली नारी है। सीता के सम्बन्ध में यह श्लोक आकलनीय है - निमिकुलतपसां वा सत्फलं, पुण्यपाको रविकुलजनुषां वा जानकीत्यार्यलक्ष्मीः। व्यरुचदवनिपालस्यार्धमुद्रासनस्था श्रितवपुरिव लोकस्योदयायौषसी श्रीः।। उ.सी.स. १/६८ अर्थात् तब राजा राम के आधे आसन पर विराज रही, निमिकुल की तपस्याओं का सुफल या सूर्यवंशीय महात्माओं के पुण्यों का परिपाक जानकी नामक आर्य-लक्ष्मी ऐसी लग रही थी जैसे संसार के मंगलविधान के लिए शरीर धारण करके उपस्थित हुई उषा की श्री हो। यहां अपने सम्बन्ध में परिवाद (लोकनिन्दा) को लेकर विलाप करके परिवार जनों के बीच “परित्याग’ के निर्णय को न कह पा रहे राम की मनःस्थिति से अवगत होकर सीता स्वयं वन जाने का अपना निर्णय सुनाती हैं - यामि मातर इतः स्वतस्ततो यामि, यामि विपिनं न मे व्यथा। कीर्तिकायमवितुं समानुषा मृत्युतोऽपि न हि जातु बिभ्यति ।।३/३१ (माताओं, मैं यहां से जाती हूँ, स्वयं ही जाती हूँ, और मुझे इसकी कोई व्यथा नहीं। अपनी कीर्ति की रक्षा के लिए अच्छे दम्पती और सत्पुरुष मृत्यु से कभी नहीं डरते।) सीता के सम्बन्ध में लोकापवाद के पीछे अपनी ही त्रुटि मानते हुए राम उसे जनता में व्याप्त अशिक्षा को स्वीकार करते हैं (२/२६)। अग्रज की आज्ञा से विवश लक्ष्मण सीता को उसकी ऊर्मिला आदि बहनों से भेंट करवाते हैं, अन्ततः गर्भवती सीता को वन में छोड़ आते हैं। सम्पूर्ण रचना कविवर द्विवेदी की नवोन्मेषिणी प्रतिभा से प्रसूत होकर एक अलग ही प्रभाव छोड़ती है। भारतीय संस्कृति के रस से पोर-पोर भीने कवि के हृदय से निर्गत इस रचना की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें कवि की राष्ट्रीय भावना का आद्योपान्त समुल्लास और जहां तक भाषा और लालित्य का प्रश्न है, ऐसी रचनायें कम दृष्टिगोचर होती है। अलङ्कारों का सनिवेश कहीं आरोपित नहीं प्रतीत होता। “राष्ट्रदेवी” सीता के चारित्र से सम्भूषित प्रस्तुत महाकाव्य को स्वातन्त्र्योत्तर संस्कृत साहित्य की एक उपलब्धि माना जा सकता है। कविवर द्विवेदी में कालिदास की रसपेशलता, माघ मसृणता और भारवि का अर्थगाम्भीर्य, एक साथ अनुभूत किये जा सकते हैं। इस रचना के प्रकाशन के पश्चात् उन्हें साहित्य जगत में प्रभूत प्रतिष्ठा मिली है। महाकाव्य ५७ “स्वातन्त्र्यसम्भव’ २८ सर्गों का विशाल महाकाव्य है, जिसमें झांसीश्वरी महारानी लक्ष्मीबाई से लेकर प्रियदर्शिनी इन्दिरा गांधी तक भारत में घटित घटनाओं को ऐतिहासिक आधार बनाया गया है। कवि ने इस रचना को, सहृदयों को सुनने के लिए आमन्त्रित करते हुए कविता के रूप में राष्ट्रीय महास्फोट कहा है - तां सन्तः श्रोतुमर्हन्ति स्वत्वस्वत्वाद्वयर्षयः। कवितात्मनि रेवाया महास्फोटेऽत्र राष्ट्रिये।। १/४ कवि ने स्वयं स्वतन्त्र्यसम्भवरूपी त्रिदशापगा (गङ्गा) को लक्ष्मी (झांसीश्वरी) और इन्दिरा (गान्धी) रूपी तटयुगी से परिवेष्ठित कहा है (१/५३)। आरम्भ में ही उसने सुमेरु के शिखर से लेकर दक्षिण समुद्र तक फैले भारतवर्ष रूपी विष्णु की वन्दना करके अपने प्रस्तुत सम्पूर्ण कृतित्व को एक राष्ट्रीय रूप प्रदान किया ही (२/७), साथ ही मानव की महनीयता का आरोप के साथ गान भी किया है (२-६-२२)। द्वितीय सर्ग में वाराणसी वर्णन, काशी में लक्ष्मीबाई के जन्म-वृतान्त से कथा का आरम्भ हुआ है। ‘जनविद्रोह” नामक तृतीय सर्ग में भारत की धरित्री का गुणगान करते हुए कवि ने झांसीश्वरी की आंग्लों के साथ युद्ध में वीर-गति प्राप्त होने की चर्चा के साथ भारतीय इतिहास के अनेक कालों में वैदेशिकों के आक्रमण के क्रम में “गुरुण्डों” के शासन की बात कही है। भारत में सय शक्ति की स्थापना के काल में गोखले, मालवीय, तिलक, श्री अरविन्द, रवीन्द्र के उदित होने पर एक नया जागरण होता है और फलस्वरूप सबके मन में एक राष्ट्र का भाव उदित होता है। मुक्ति के मंत्र जन-जन में गूंजने लगते हैं। चतुर्थ सर्ग में प्रयाग के विस्तृत वर्णन के पश्चात् मोती लाल नेहरू और स्वरूप रानी से जवाहर लाल की उत्पत्ति ओर कमला के साथ उनके विवाह का निर्देश है। पञ्चम सर्ग में, पं. जवाहर और कमला के परस्पर प्रणय-बन्धन का विस्तृत वर्णन है। कवि के अनुसार - तां प्राप्य रम्यां कमलां कदल्या गर्भादिवासादितगात्रलक्ष्मीम्। जवाहरान्तःकरणं सुधाया महासमुद्रे नु बभूव मग्नम्।। तं प्राप्य तस्या अपि वंशगुल्मात् समुच्छलन्तं नु हिरण्यवाहम्। ज्योतीरथाया इव वीचिभङ्गाः प्रशान्तिमापुर्ननु दृक्तरङ्गाः।।२, ३ अर्थात् मानो कदली के गर्भ से निकली अङ्गकान्ति वाली उस कमला को पाकर जवाहर का अन्तःकरण सुधा के महासमुद्र में जैसे डूब गया। और, वंशगुल्म से समुच्छलित हो रहे हिरण्यवाह (शोणनद) (रूप उस) (जवाहर) को प्राप्त कर ज्योतीरथा नदी के तरङ्ग-भंगों जैसे उस कमला के दृक्तरङ्ग प्रशान्त हो गये। इसी क्रम में उद्दीपन विभाव, वसन्त का वर्णन भी कवि ने किया है। कमला के दोहद लक्षण के निर्देश के, क्रम में कवि बिल्कुल दार्शनिक हो उठा है आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास भेदादभेदं प्रतिपद्यं भेदं पुनव्रजन्ती रसकुल्यकेव। दाम्पत्यधारा कमलाशिरासु जवाहरस्याप विवर्तनानि।। ५/७६ (भेद से अभेद प्राप्त करके पुनः भेद प्राप्त करती हुई रसकी छोटी नदी की भांति जवाहर की दाम्पत्य-धारा कमला की शिराओं में उद्वेलित होने लगी।) षष्ठ सर्ग मे, कमला के गर्भ में कन्या के आगमन को कवि ने “परा आनन्दमयी” के प्रवेश के रूप में प्रस्तुत किया है (२,८) गर्भ मङ्गल’ नाम का यह सर्ग भी आटोप के साथ प्रस्तुत हुआ है। “दोहदपूरण” नाम के सप्तम सर्ग में तरुण पति-पत्नी का कश्मीर में निवास, कश्मीर की सुषमा का विशद वर्णन, परस्पर रसमय वार्तालाप है। अष्टम में भारत की ग्रामलक्ष्मी का उत्तम वर्णन प्रस्तुत हुआ है। नवम में, जवाहर और कमला प्रयाग आ जाते हैं। यह अवसर था जब भारत में स्वातन्त्र्य युद्ध छिड़ा था। कवि के अनुसार जिस “संघशक्ति” ने दुर्गा के रूप में महिषासुर की स्वार्थप्रधान धृष्टता को नष्ट किया, वही अब सहस्रमूर्ति होकर अवतीर्ण हुई और उस नन्दजा ने “मोहन” (मोहनदास गांधी, श्लेष से कृष्ण) को सेनानी के रूप में वरण किया। चारों ओर जनान्दोलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी। गर्भवती कमला उठ खड़ी हुई और “कुमार-वहिन” के नवावतार जवाहर स्वराज्य-युद्ध के लिए तैयार हो गये। कमला पुत्री को जन्म देती है, स्वरूपरानी ने उसे “इन्दिरा” कहा तो जवाहर ने “प्रियदर्शिनी”। एकादश सर्ग में कवि ने “सरसी” नामक रचना संदृब्ध की है। स्वातन्त्र्य संग्राम को लेकर हिंसोपद्रव होने लगे। जवाहरलाल आदि नेता कारागार में डाल दिये गये। सत्याग्रह में प्रवृत्त लोग गुरुण्डों की अवहेलना करने लगे। बालिका इन्दिरा ने भी वानरी सेना का गठन किया। फीरोज से उसका परिचय होता है। कवि ने इसी प्रसंग में राष्ट्रध्वज का वर्णन (१२/१५-३५) किया है। कमला रूग्ण हो जाती है और उसके दिवंगत होने की घटना घटित होती है। जवाहर के माता-पिता भी अस्वस्थ होने लगते हैं। फीरोज के साथ इन्दिरा का विवाह हो जाता है। वे दोनों कश्मीर को चले जाते हैं। इन्दिरा के राजीव नाम का पुत्र होता है। स्वरूप रानी का देहान्त हो जाता है। मोतीलाल फिर भी राष्ट्र को वैदेशिक पाश से मुक्त कराने में लगे रहते हैं। बाद में वे भी दिवंगत होते हैं। जवाहरलाल मृत्यु को लेकर चिन्तन करते हैं। (१३/१७-६८) जवाहरलाल, इन्दिरा, फीरोज मोहनदास गान्धी के नेतृत्व में उनके अनुगत हो गये। भारत के स्वातन्त्र्य-सूर्योदय की बेला तो आती है किन्तु वैदेशिकों की कूटनीति के कारण भारत का विभाजन हो जाता है। इस क्रम में कविवर द्विवेदी का यह विलक्षण महाकाव्य २८ सर्गों तक ग्रथित हुआ है। एक और कवि का कवित्व उसकी प्रखर प्रतिभा से समुल्लसित है तो दूसरी और भारतीय संस्कृति की निगूढ़ दीप्ति से उसके द्वारा निर्मित भाव-मय निर्माण आलोकित हो उठा है। सामान्यतः कवित्व-प्रीढ़ि के कारण ऐसे बहुत से तत्त्व अकस्मात् सम्पृक्त हो गये हैं जो कवि की दार्शनिक चेतना के कारण यहां अनुस्यूत हो गये हैं। इससे सामान्य पाठक को काव्य में अन्तःप्रवेश में कठिनाई का होना स्वाभाविक है। यदि कविवर द्विवेदी स्वयं महाकाव्य ५६ इसकी व्याख्या लिखें तो साहित्य जगत् का उपकार होगा, अन्यथा इस गम्भीर रचना के अनेक पक्षों के अस्पृष्ट रह जाने का डर है। कविवर द्विवेदी अपने दोनों ही महाकाव्यों के कारण आधुनिक संस्कृत साहित्य के आकाश में देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में परिगणित होंगे। कहीं-कहीं उनके द्वारा प्रस्तुत बात कवित्व की ऊंचाई का स्पर्श करती हुई भी व्याख्यागम्य होने के कारण उद्विग्न करती है तो कहीं-कहीं सरस वाग्विच्छित्तियों के कारण मन को मुग्ध भी करती है। ठीक ही, जैसा कि कवि ने कहा है, पुरातन और नवीन का उसकी रचना में एक साथ स्वाद का अनुभव होता है (स्वा. सं.२८/३)।

श्रीधर भास्कर वर्णेकर (महाराष्ट्र १९१८)

नागपुर में जन्मे कविवर वर्णेकर ने वहीं आरम्भ से विश्वविद्यालय पर्यन्त शिक्षा पायी और नागपुर विश्वविद्यालय में ही संस्कृत विभाग के प्राध्यापक हुए और बाद में अध्यक्ष हुए। इन्होंने संस्कृत की अनेक विधाओं में लेखन के साथ, “अर्वाचीन संस्कृत साहित्य” नाम से मराठी में शोध-प्रबन्ध लिखा और ‘संस्कृतभवितव्यम्’ पत्रिका का सम्पादन किया। इन्हें काञ्चीपीठ के शंाचार्य ने ‘प्रज्ञाभारती’ की उपाधि से विभूषित किया, इनके साहित्य का संग्रह ‘प्रज्ञाभरतीयम्’ नाम से १६६३ में समग्र रूप में प्रकाशित हुआ। इन्हें रामकृष्ण डालमिया श्रीवाणी सम्मान भी मिला। छत्रपति शिवाजी के गौरवमय चरित्र पर निर्मित, ६. सर्गों का इनका महाकाव्य श्रीशिवराज्योदय शारदा गौरव ग्रन्थमाला, ४२४ सदाशिव पेठ, पूना से १६७२ में प्रकाशित हुआ। इस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (नई दिल्ली) प्राप्त हुआ। कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा से समान रूप से सम्पन्न कविवर वर्णेकर की लेखनी से प्रसूत यह महाकाव्य आद्योपान्त राष्ट्रीय चेतना मूलक सहज उद्गारों से आप्लावित है। अपने चरित्र नायक के उज्ज्वल चरित्र को प्रस्तुत करने में कवि को अपूर्व सफलता मिली है। इसके पीछे कवि के स्वयं के अन्तर्मन में निहित उस महान् चरित्र के प्रति अतिशय श्रद्धा को भी मुख्य कारण कहा जा सकता है। इस ऐतिहासिक महाकाव्य में कवि ने कवित्व की सहजता को सुरक्षित रखते हुए इसके ऐतिहासिक पक्ष को भी सुरक्षित रखने का प्रयास किया है अतः एक प्रकार से अपने चरित्र नायक की कर्मभूमि को आनुसन्धानिक दृष्टि से भी आकलित करने का इसमें प्रयास अभिलक्षित होता है। महाकाव्य का आरम्भ सह्याद्रि के वर्णन से होता है। अष्टसिद्धि सम्पन्न विनायक, दक्षिणाभिमुख हनुमान, भगवान् पाण्डुरङ्ग और महापुरुषों, जैसे ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास के वर्णन प्रस्तुत किये गये हैं। तृ.स. में वसन्त का वर्णन संक्षिप्त किन्तु मनोरम हुआ है। इसी बेला में शाहजी और जीजा का वैवाहिक मंगल संविधान सम्पन्न होता है। माता जीजा ने ही बालक शिवाजी की धर्मगुरु का काम किया, जिनके उपदेशों का प्रभाव शिवाजी के जीवन पर विशेष रूप से पड़ा। कवि के शब्दों में शिवाजी का यह प्रतिज्ञा-वाक्य उनके शौर्य सम्पन्न व्यक्तित्व के कितना अनुरूप है - आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास किं जीवितेन विभवेन सुखेन तेन किं भारभूतकरवालधनुःकृपाणैः। किं पौरुषेण यदि न प्रभवामि पातुं गौदेववेदवनिताद्विजसाधुसङ्घान् ।।११८/२६ अर्थात् उस जीवन विभव, सुख तथा भारभूत तलवार, धनुष, कृपाण से क्या यदि मैं अपने पौरुष से गो-देवता, वेद, वनिता, विन, साधुसङ्घ की रक्षा नहीं कर सकता हूँ। भगवती दुर्गा का शिवाजी के प्रति यह कथन भी उनके व्यक्तित्व को कितना उजागर करने वाला है - वत्स त्वदन्यो जगतीतलेऽस्मिन् न जातु जातो न जनिष्यते वा। मदेकनिष्ठः खलु धर्मवीरो त्वदेकसंस्थं हृदयं मदीयम् ।।१६/४३ (हे वत्स, तुझसे बढ़कर इस संसार में मेरे प्रति निष्ठा वाला धर्मवीर न उत्पन्न हुआ है और न होगा, कयोंकि मेरा हृदय तेरे प्रति एकमात्र स्थित है। वैसे तो सम्पूर्ण रचना में राष्ट्र और धर्म की रक्षा के प्रति जागरूक करने वाली उत्तमोत्तम वाग्विच्छित्तियां मिलती हैं, विशेष रूप से जय कामना से पूर्ण कवि के ये दो पद्य उद्धरणीय हैं - जयोऽस्तु रामस्य रघूत्तमस्य श्रीरामदासस्य गुरोर्जयोऽस्तु। जयोऽस्तु ते विट्ठलपाण्डुरङ्ग सदा तुकाराममुनेर्जयोऽस्तु।। जयोऽस्तु नित्यं शिवशासनस्य हिन्दूस्वराज्यस्य चिरञ्जयोऽस्तु। जयोऽस्तु धर्मस्य सनातनस्य जयोऽस्तु राष्ट्रस्य च भारतस्य ।। २६/४६, ४७ अर्थात् रघुश्रेष्ठ राम की जय हो, गुरु रामदास की जय हो, विठ्ठल पाण्डुरङ्ग तुम्हारी जय हो, सदा तुकाराम मुनि की जय हो, नित्य शिवाजी के शासन की जय हो, चिरकाल तक हिन्दू स्वराज्य की जय हो, सनातनधर्म की जय हो और भारत राष्ट्र की जय हो। कविवर वर्णेकर का आधुनिक संस्कृत साहित्य को योगदान सदा स्मरणीय रहेगा, ऐसा कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।।

प्रभुदत्त स्वामी (उत्तर प्रदेश १९१४)

कवि स्वामी का जन्म मेरठ जनपद के किशनपुर बराल में, एक वैष्णव विद्वान परिवार में हुआ। इन्होंने अपने जनपद के विभिन्न संस्कृत विद्यालयों में संस्कृत का अध्यापन किया। आपके दो महाकाव्य प्रकाश में आये, पूर्व -भारतम् और मौर्यचन्द्रोदयम्। पूर्वभारतम् का प्रकाशन मानसरोवर, मेरठ से १६७४ में हुआ जबकि मौर्यचन्द्रोदयम् का १६८५ में। इनकी अतिरिक्त रचनाओं में देवकीनन्दनम् (खण्डकाव्य), रामाचार्यकुसुमाञ्जलिः, और श्रीकृष्णबोधस्तवामृतम् (दोनों स्तोत्रकाव्य) हैं। पूर्वभारत २१ सर्गों का महाकाव्य है। मूल कथा मनु से आरम्भ होती है और यवनराज सिकन्दर द्वारा भारत पर आक्रमण तथा उसकी पराजय से समाप्त होती है। एक महाकाव्य E9 विस्तृत पीठिका में रचित इस महाकाव्य के कवि ने प्रथम पद्य में पूरे आर्य देश को धराभूत विष्णु के रूप में देखा है - अस्त्यद्रिराजाद् दिशि दक्षिणस्यां महाहिमोद्भासितभव्यभालः। पयोनिधिक्षालितपादपद्मो हरिर्धराभूत इवार्यदेशः।। (अद्रिराज हिमालय से दक्षिण दिशा की ओर, हिम शक्ति से उद्भासित भाल, समुद्र से प्रक्षालित चरणकमल वाला घरा का रूप धारण किये हुए विष्णु जैसा आर्यदेश है)। भारत की महिमा के आख्यान के पद्य भी आकलनीय हैं - यस्मिन् कुलीनाः परदुःखदीनाः परार्थलीना स्वसुखान्युपेक्ष्य। प्राणार्पणेनापि विपत्तिभाजां कुर्वन्ति रक्षां शरणागतानाम् ।। १/३१ (जिस आर्य देश में कुलीन परदुःखकातर, परोपकार में लीन लोग अपने सुखों की उपेक्षा करके अपने प्राण न्योछावर करके भी शरण में आये विपद्ग्रस्त लोगों की रक्षा करते हैं। मनु से युधिष्ठिर तक स्थिति श्लघनीय रही, किन्तु वैदेशिक आक्रमणों के बाद, क्रमशः देश की स्थिति में विकार उत्पन्न होने लगे। हिंसा का प्राबल्य हो गया। पुरु के मुख से सिकन्दर के प्रति यह उक्ति भारतीय राष्ट्र की सहज ओजस्विता से दीप्त है - शिरो नतिं गच्छति ये स्वधर्मस्वदेशरक्षावतिनः पुरस्तात्। तद्रोहिणो मूर्धविभक्तये तु ममैष जागर्ति करे कृपाणः।। १६/१४ (अपने धर्म, अपने देश की रक्षा के व्रती लोगों के सामने मेरा सिर झुक जाता है और देशद्रोहियों के सिर काट डालने के लिए मेरे हाथ में यह कृपाण समुद्यत है।) मौर्यचन्द्रगुप्त २० सर्गों में रचित है। इसमें मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त के चरित के साथ चाणक्य का विलक्षण व्यक्तित्व भी वर्णित है। कविवर स्वामी के शब्दों में राष्ट्र किसे कहते हैं, यह इन दो पद्यों में आकलनीय है तद् भूखण्डं वादयो वा दिशो वा नैतद् राष्ट्र राष्ट्रविज्ञा दिशन्ति। भाषा भक्तिः सम्यता संस्कृतिश्चेत्येतत्प्राणं राष्ट्रमाहुश्चिरत्नाः।। जातिधर्मो जातिधर्मप्रसूता भाषा भक्तिः सभ्यता संस्कृतिश्च। एतैस्तत्त्वैः प्राणितां मातृभूमिं राष्ट्र प्राहू राष्ट्रतत्त्वार्थविज्ञाः ।। १५/४१५१ (जाति धर्म तथा जाति और धर्म से उत्पन्न भाषा, भक्ति, संस्कृति और सभ्यता इन तत्त्वों से प्राणित मातृभूमि को राष्ट्र के तत्त्वज्ञ लोग ‘राष्ट्र" कहते हैं।) कवित्व की दीप्ति और राष्ट्रीय चेतना दोनों का कविवर स्वामी की इन रचनाओं में अद्भुत समागम है। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

त्र्यम्बक आत्माराम भण्डारकर (महाराष्ट्र १८९७)

कवि भण्डारकर ने ‘विद्यार्थी’ नाम से आत्मचरित" का प्रणयन किया है, जो तारा प्रिंटिंग वर्क्स वाराणसी से १E७३ में मुद्रित हुआ है। उससे कवि के जीवन के सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका जन्म महाराष्ट्र के चन्दूपुर मण्डल के तोरण ग्राम में हुआ था। “तिलक” आदि नेताओं द्वारा प्रवर्तित “स्वदेशी” आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया था। वे अध्ययन के लिए कम्बल मात्र लेकर वाराणसी आ गये और बहुत समय तक भिक्षावृत्ति द्वारा जीवन-निर्वाह करते हुए अध्ययन किया और वसन्त कालेज राजघाट, वाराणसी में संस्कृत का अध्यापन किया और वहीं से सेवानिवृत्त हुए। कवि भण्डारकर द्वारा अठारह सर्गों में निर्मित श्रीस्वामिविवेकानन्दचरित महाकाव्य चौखम्भा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी १६७३ में प्रकाशित हुआ। कवि ने इसका निर्माण “भारतीय युवकों के उपकार” के लिए किया था। कवि की संस्कृत में स्वोपज्ञ व्याख्या भी मूल रचना के साथ प्रकाशित हुई है। कवि भण्डारकर की यह रचना वर्णन-प्रधान न होकर स्वामी विवेकानन्द (पूर्वाश्रम के नरेन्द्रनाथ दत्त) के उदात्त जीवन के यथार्थ पक्ष को सहज-सरल कविता की भाषा में प्रस्तुत करती है और इस कारण यह एक पठनीय कृति है। स्वामी विवेकानन्द का जीवन अपने महान गुरु श्रीरामकृष्ण की प्रेरणा से एक ओर तत्त्व-चिन्तन को समर्पित था तो वहीं दूसरी और राष्ट्र की सेवा के लिए भी उत्सर्जित था। आरम्भ में जिज्ञासु नरेन्द्र के मन में पाश्चात्य और पौरस्त्य विचार-धाराओं के विषय में, समाज में व्याप्त सुख-दुःख, समता-विषमता, स्पृश्यास्पश्य की भावना को लेकर संकल्प-विकल्प का भाव था। वे सच्चे गरु की तलाश में भटके और शान्ति की तलाश की। उन्होंने महर्षि देवेन्द्रनाथ से भेंट की। कवि ने उनकी इस मनःस्थिति को बहुत सही ढंग से प्रस्तुत किया है। अन्त में उन्हें दक्षिणेश्वर के संत श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप में सच्चा मार्ग-दर्शक प्राप्त हुआ और श्री रामकृष्ण द्वारा ‘विवेकदीप" प्रचलित हुआ। कवि के अनुसार, श्रीरामकृष्ण और नरेन्द्र के बीच इस प्रकार का गुरु-शिष्य का सम्बन्ध स्थापित हुआ, जिसे तर्क शास्त्र की एक परिभाषा के अनुसार ‘अयुतसिद्ध" सम्बन्ध जैसा सम्बन्ध कहा जा सकता है विना नरेन्द्र नहि रामकृष्णः श्रीरामकृष्णं न विना नरेन्द्रः। सम्बन्ध एषोऽयुतसिद्धतुल्यो यथा गुणानां गुणिना सहास्ते।। ४/१ (नरेन्द्र अर्थात् विवेकानन्द, के बिना श्री रामकृष्ण नहीं और नरेन्द्र के बिना श्रीरामकृष्ण नहीं, यह सम्बन्ध अयुतसिद्ध जैसा है, जैसे गुणों का गुणी के साथ होता है।) श्री रामकृष्ण ने शिष्य नरेन्द्र को अपने स्पर्श के द्वारा समाधि में लीन कर दिया और उसे अद्वैत की चेतना से जोड़ दिया (४/१३६)। गुरु की प्रेरणा से नरेन्द्र ने अपने जीवन का उद्देश्य लोकसेवा बनाया (४/५३)। महाकाव्य नरेन्द्र के पिता का स्वर्गवास हो जाता है। परिवार में दारिद्र्य का कष्ट व्याप्त है। नरेन्द्र की श्रद्धा डगमगा जाती है। वह पुनः श्रीरामकृष्ण के पास आता है। फिर उसके मन में गुरु के उपदेश से शिव-स्वरूप अखिल जीव की सेवा को जीवन का लक्ष्य बनाने का निश्चय स्थिर होता है (५/५४)। श्री रामकृष्ण रुग्ण हो गये। उन्होंने नरेन्द्र को दीक्षा दी और तबसे नरेन्द्र का नाम ‘विवेकानन्द’ हुआ। गुरु का निर्वाण हो जाता है। स्वामी विवेकानन्द अपने “मिशन” में लग जाते हैं। हिमालय की यात्रा करते हैं। इनका यश चतुर्दिक फैलने लगता है। भारत-अमण, शिकागो की यात्रा, वहां की धर्म-सभा में व्याख्यान, यूरोप का भ्रमण, भारत आगमन, सेवाश्रम की स्थापना आदि के बाद परिनिर्वाण । उपदेशों के अमूल्य रत्नों से आद्योपान्त भरे और देशभक्ति, जनसेवा की भावनाओं को मन में प्रतिफलित करने वाले इस प्रेरक महाकाव्य में शमप्रधान काव्य के तत्त्वों को भी एक सीमा तक प्रश्रय मिला है। कवि ने प्रत्येक सर्ग के प्रथम अक्षर में- “श्रीस्वामिविवेकानन्दचरित महाकाब्य” के प्रत्येक अक्षर से आरम्भ किया है और एक सर्ग में, प्रत्येक पद्य के तीसरे पद्य में इस पद्य के प्रत्येक अक्षर को अनुसूत किया है “शुद्धे दत्तकुले जनिर्गिरिपतौ धीर्भारतस्योन्नती सङ्कल्पोऽमलदक्षिणेश्वर-गुरौ सत्तत्त्वबोधोदयः। पाश्चात्त्येषु च विश्वधर्मकथनं श्रीरामकृष्णाश्रमः सेवा जीवहरेविवेकचरितं यत्पुण्यसङ्कीर्तनम् ।।” (शुद्ध दत्त-कुल में जन्म, हिमालय पर चिन्तन, भारत की उन्नति के विषय में संकल्प, निर्मल दक्षिणेश्वर के गुरु के कारण सत्तत्त्वबोध का उदय, पाश्चात्त्य लोगों को विश्वधर्म का उपदेश, श्रीरामकृष्ण के आश्रमों द्वारा जीव-रूपी भगवान् की सेवा-इस प्रकार विवेकानन्द का चरित पवित्र संकीर्तन है।) इस पद्य में स्वामी विवेकानन्द के समग्र चरित का सार-संक्षेप दे दिया गया है। इसी प्रकार सप्तम सर्ग में भी एक पूरा पद्य अनुस्यूत किया गया है। इस प्रकार कवि त्रयम्बक भण्डारकर द्वारा रचित यह महाकाव्य आधुनिक संस्कृत साहित्य की एक पठनीय कृति बन गया है। इस कवि ने प्रत्येक सर्ग के अन्त में अपने इस महाकाव्य को इन-इन विशेषणों से विशेषित किया है लोकं मोहतमोहतं धृतहितालोकं विधातुं क्षमे विश्वाध्येयगुणे विवेकचरिते धर्मप्रधानाश्रमे। (यह महाकाव्य, मोह के अन्धकार से इस संसार को, कल्याण कर आलोक प्राप्त कराने में समर्थ है, इसके गुण सभी के द्वारा विचारणीय है तथा यह धर्म का प्रधान आश्रय है।) और, अपने सम्बन्ध में “नैषधकार” की शैली में प्रत्यग्दर्शनबोधविहितप्रश्र, आर्य, सुपर्ववाङ्मयसुधाचार्य, अभ्यस्तश्रुतिशास्त्रभारतपुरातत्त्व, काशी में द्वादश वर्ष भैक्ष्यचरणासक्त,आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास तत्त्वज्ञान पुराण संस्कृत गिरा का शिक्षक, ज्यौतिषशास्त्रशीलनपरस्वान्त, अद्वैताश्रमसेवक मन वाला, बचपन में स्वामीजी के दर्शन सुख को प्राप्त, हिन्दी में नये नृत्य नाटक का रचयिता, स्वामीजी पर खण्डकाव्य की रचना करने वाला, चित्रकला में विशेष ख्यात, वाणीमन्त्र के जप में प्रसक्त आदि विशेषणों से विभूषित किया है।

उमाशङ्कर शर्मा त्रिपाठी (१९२२-१९८२ उ.प्र.)

इनका जन्म देवरिया जनपद के सिगहा ग्राम में हुआ। मुख्यतः ये अंग्रेजी साहित्य के अध्येता तथा अध्यापक रहे, किन्तु इन्होंने संस्कृत से लगाव के लिए विशेष रूप से श्रेय अपने पिता पं. रामनरेशमणि त्रिपाठी को दिया है। इन्होंने काशी विद्यापीठ में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन किया और शिवाजी के चरित्र पर आधारित क्षत्रपतिचरित महाकाव्य की रचना की, जो मिहिरमणि त्रिपाठी द्वारा आनन्द कानन प्रेस, दुण्डिराज, वाराणसी में मुद्रित होकर प्रकाशित किया गया। इसके अतिरिक्त कवि त्रिपाठी ने उमरखय्याम की रुबाइयों का संस्कृत में पद्यानुवाद, महात्मागान्धी की सूक्तियों का अनुष्टुप् छन्द में रूपान्तरण, भारतीगीतम् नाम से संस्कृत के गीत तथा विनोदपूर्ण अन्योक्तिमय संस्कृत काव्य “रासभारती’ का प्रणयन किया। २१ सर्गों के क्षत्रपतिचरित महाकाव्य में कवि त्रिपाठी ने अपनी उत्कृष्ट रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया है। इन्होंने बाल्मीकि, व्यास और कालिदास को अपना आदर्श माना है। इसी कारण पाण्डित्य के प्रदर्शन से बचते हुए ‘अकाण्डप्रथन” को प्रश्रय नहीं दिया है। कवि को सत्य का अपलाप अभीष्ट न था, इस कारण उसने स्वीकार किया है कि महाकाव्य में महाराष्ट्र, काश्मीर आदि अनदेखे स्थलों के वर्णन में प्रकृति का अंकन अतिसामान्य, सतही ढंग से हुआ है। प्रथम सर्ग में कवि की विनम्रता प्रकट हुई है। उसने अपने आदर्शभूत महान् कवियों का स्मरण किया है और कहा है शिवपात्रं वचो ब्राह्मी प्रस्तावो मातृभूत्सवः (स्तवः)। सर्वमेतत् परं दैवात् सूत्रधारोऽहमीदृशः।। १६ (शिव, शिवाजी) पात्र हैं, ब्राह्मी (संस्कृत भाषा) वाणी है, मातृभूमि का स्ववगान प्रस्ताव है, पर ऐसा मैं सूत्रधार हूं, यह सब कुछ संयोगवश घटित हुआ है। कवि की दृष्टिमें, वे ही व्यक्तिवाणी के विषय होते हैं अर्थात् उन्हीं को लेकर काव्य का निर्माण किया जाना चाहिए जो आशा का सञ्चार करके नैराश्य को, तेज द्वारा अन्धकार को, प्रबोधन द्वारा मोह को तथा शौर्य द्वारा भय को दूर करते हैं। साथ ही कवि के चरित्र-नायक ने राष्ट्र की जिस स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष किया उसके विषय में कवि कहता है उद्यमाराधिता नित्यं शीलिताउनलसवतैः । स्वतन्त्रता सुविद्येव वर्धिष्णुरमृतायते।। १/१० महाकाव्य (जब अनलस होने का व्रत धारण करने वाले लोग उद्यम द्वारा आराधन करते हैं तब स्वतन्त्रता सुविद्या की भांति नित्य प्रवर्धित होती हुई अमृत-फल देती है।) दूसरे सर्ग में हिमालय से आरम्भ करके भारतीय राज्यों, तीर्थो का भव्य सांस्कृतिक वर्णन हुआ है जो इस महाकाव्य के भव्य भवन की सुदृढ़ भूमिका (आधारभित्ति) का काम करता प्रतीत होता है। यह सर्ग पूरा कवि के सहज काव्य-निर्माण का, प्रतिभा के साथ अपनी महनीय राष्ट्रिय सांस्कृतिक परम्परा के प्रति सूक्ष्मेक्षिका का परिचायक बन पड़ा है। इस प्रकारण में कवि ने स्वातन्त्र्य-संधर्ष काल की अनेक विभूतियों के उल्लेख के साथ उनके प्रति अपने सादर श्रद्धा-सुमन भी निवेदित किये हैं। अन्त में चरित-नायक शिवाजी के जन्म की चर्चा की है। कवि की मान्यता है कि आज जो हम हैं यह उस भारतीय शूरवीर के तेज के कारण ही सम्भव हुआ है आदर्शयाथार्थ्यविदात्मनन्दिनी सा देवमायेव चरित्रदेवता। तं रत्नसुनुं सुषुवे प्रजाभरं यत्तेजसाऽद्यापि वयं वयं युगे।। २/१७८ (आदर्श और याथार्थ्य को जाननेवाली, आत्मनन्दिनी, देवमाया की भांति इस चरित्रदेवता ने प्रजा का भरण करने वाले उस पुत्ररत्न को उत्पन्न किया, जिसके तेज के कारण आज के युग में हम हम हैं। ) तृतीय में क्षत्रपति की मातृभक्ति, साहस, दक्षता का वर्णन है। उनका उज्ज्वल चरित्र तब और भी प्रदीप्त हो उठता है जब वे पालकी में लायी गयी शत्रुबधू से कहते हैं, मेरे रहते, दिल्ली का बादशाह भी तेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता, अब तो तू अपने पिता के घर आ गयी है, अतः क्यों दुःखी होती है (३/१२१)। चतुर्थ सर्ग में कवि कल्पना से समुद्र के तट पर एक भग्न देवमन्दिर में सोये शिवाजी के समक्ष श्वेतवसना एक नारी को उपस्थित करता है। कालिदास के रघवंश के १६वें सर्ग में कश के समक्ष अयोध्या की अधिष्ठात्री देवी भी कुछ इसी प्रकार प्रस्तुत हुई है। यह सर्ग कवि के एक आलोचक के अनुसार, “राष्ट्रबोध का, सांस्कृतिक प्रबोधन का प्रभावपूर्ण उद्योग है, अकर्मण्य राजाओं, उच्छृङ्ख्ल राज्यसत्ता तथा कातर न्यायबुद्धि के प्रति उत्कट उपालम्भ है।” महाकाव्य के आगे के सर्गों में क्षत्रपति के विनाश के लिए बीजापुर में मन्त्रणा, अफजल खान का सैनिक अभियान, अफजलखान और शिवाजी के दूतों को एक दूसरे के पास आगमन, अफजलखान का बघ, मुगलसेनापति शायिस्ता खान का पराभव, समर्थ गुरु रामदास के प्रति शिवाजी महाराज की गरुभक्ति. आमेरनरेश जय सिंह के अनुरोध पर आगरा के लिए प्रस्थान, क्षत्रपति की कैद से मुक्ति, प्रच्छन्न वेष में क्षत्रपति का दक्षिण की ओर गमन, कोण्डना विजय, बादशाह के पास जजिया के विरुद्ध क्षत्रपति का निवेदन, राज्याभिषेक, शासनपद्धति आदि चर्णित हैं। षष्ठसर्ग में कवि द्वारा ऋतुवर्णन के प्रकरण में द्रुतविलम्बित छन्द में यमक का प्रयोग रघुवंश के दशम सर्ग के संस्कार को उबुद्ध करता है। सम्पूर्ण महाकाव्य कवि की जागरूक काव्य-चेतना एवं पवित्र राष्ट्रप्रेम से उल्लसित है। इसके सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है ६६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास कि यह कविवर त्रिपाठी की प्रतिभा का एक ओर चमत्कार है तो दूसरी ओर शिवाजी के महनीय व्यक्तित्व का उत्तम चित्र-फलक है।

परमानन्द शास्त्री (उ.प्र. १९२६)

कविवर शास्त्री का जन्म मेरठ जिले के अनवरपुर ग्राम में हुआ। इन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण किया। ‘संस्कृत गीत काव्य के विकास" विषय पर शोध कार्य में सफल कवि के लेखन एवं आलोचन के विषय रहे, हिन्दी कवि बिहारी, प्राकृतकाव्य गाथा सप्तशती और धोयी कवि का पवनदूत। इन्होंने संस्कृत में अनेक लघुकाव्यों के अतिरिक्त दो महाकाव्यों की रचना की जनविजयम् और चीरहरणम् । जनविजय का प्रकाशन स्वयं कवि द्वारा १६७८ में किया गया और चीरहरण को भी स्वयं कवि ने १९८३ में प्रकाशित किया। कवि को उनके चीरहरण महाकाव्य पर मध्यप्रदेश साहित्य परिषद ने १६८५ में कालिदासपुरस्कार से पुरस्कृत किया है। जनविजय पन्द्रह सर्गों में रचित है। इसमें दिल्ली-वर्णन से आरम्भ करके स्वतन्त्रता के आगम, जवाहर लाल नेहरू की नीति, चीन के साथ युद्ध, लालबहादुर शास्त्री का प्रधान-मन्त्रित्व, पाक के साथ युद्ध, शास्त्री जी का निधन, इन्दिरागांधी द्वारा सत्ता की प्राप्ति, उनका उत्कर्ष, बाङ्लादेश की मुक्ति, आपातकाल की घोषणा, जनतादल का उद्भव, निर्वाचन, जनप्रतिनिधि के रूप में कवि द्वारा नेताओं का उद्बोधन आदि विषय मुख्यतया वर्णित हैं। कवि के कथनानुसार, षष्ठ लोकसभा के निर्वाचनों में आपातकाल के कारण उसके मन में एक अभूतपूर्व प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप यह महाकाव्य रचित हुआ है। इस महाकाव्य के सम्बन्ध में निश्चितरूप से कहा जा सकता है कि यह परम्परा से अलग हट कर सम्पूर्ण आधुनिक भाव-भूमि पर रचित हुआ है, जिसमें राष्ट्र-भावना को प्रतिष्ठित किया गया है। कवि के अनुसार ही यहां “जन” शब्द जनता-दल का वाचक नहीं है, बल्कि भारतीय जन को समग्रता से संकेतित करता है। पन्द्रहवें सर्ग में कवि उसका (भारत की जनता का) प्रतिनिधि होकर सभी दलों के नेताओं को सचेत करता है और अनाचार के प्रति राजनीति के कलुष को कारण मानता हुआ उनपर रोष प्रकट करता है। यथार्थपरकता को पूरी रचना में प्रश्रय मिला है, इसके कारण कवित्व का पक्ष कहीं-कहीं पराभूत सा अवश्य लगता है, इतना होने पर भी कवि की भाषा में एक शालीन प्रवाहमयता है और कहीं-कहीं तो मनोमुग्धकारी कवित्व का स्पर्श भी है। समाज में व्याप्त विसंगतियों को भी कवि ने बेबाकी के साथ प्रस्तुत किया है। एक ओर जहां कवि ने दूसरे सर्ग में दुतविलम्बित छन्द में यमक का प्रयोग करते हुए स्वातन्त्र्योत्सव का वर्णन किया है, दूसरी ओर वहीं उसने देश के विभाजन के बाद के हिंसोपद्रवों को भी यथार्थ भूमि पर अभिव्यक्ति दी है। तृतीय सर्ग में वियोगिनी छन्द में चीन के साथ युद्ध को लेकर नेहरू जी की मनःस्थिति, उनके स्वर्गवास के पश्चात् जन-विलाप आदि को काव्यमय अभिव्यक्ति मिली है। लालबहादुर शास्त्री का आकालिक निधन होने पर ‘यमक का प्रयोग करते हुए कवि लिखता है महाकाव्य विना न ते नाशुशभे स्वदेशः, विना न तेनाशु शुभे स्वदेशः। विना नतेना शुशुभे स्वदेशः, विना न तेनाशुशुभे स्वदेशः १४/६५ कहीं-कहीं कवि ने सार्वकालिक तथा सार्वभौमिक सत्य को प्राचीन ऋषि कवियों की शैली में अभिव्यक्ति दी है शौर्य परम्परा श्रेष्ठा तथा कर्तव्यनिष्ठता। बलिदानबलं यत्र तत्र नास्ति पराजयः।। ६/४१ ग्यारहवें सर्ग में, वसन्त का वर्णन कवित्वमय बन पड़ा है। इसी में कवि ने कृषक की पत्नी द्वारा धोती में बंधा भोजन और तक लाकर देना और पति के साथ उसका विनोद सुन्दर रूप में प्रस्तुत हुआ है। भारतीय जन की अभूतपूर्व विजय को लेकर कवि कहता है क्रान्तिर्विना शोणितबिन्दुपातमशिक्षितानां जनतन्त्रबोधः । अभूतपूर्वो विजयो जनस्य लोकस्य जातोऽद्भुतविस्मयाय ।। १३/३७ (बिना रक्तपात के क्रान्ति, अशिक्षित जन का जनतन्त्र-बोध, जनता की अभूतपूर्व विजय-यह लोगों के अद्भुत विस्मय का कारण बना।) इस रचना को आधुनिक संस्कृत काव्य के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग माना जा सकता है। इस प्रकार इस महाकाव्य में यदि कोई नायक है तो वह है भारतीय जन, जिसकी विजयगाथा इसमें वर्णित है। कवि, अन्त में कामना करता है राष्ट्रस्य जीयाज्जन एक आत्मा प्रभुत्वसत्ता च जनस्य जीयातू। अन्यायमुज्जासयितुं च जीयात् क्रान्तिस्फुलिङ्गप्रतिभाविवेकः ।। १५/५८ (राष्ट्र की एक आत्मा जीवित रहे, जनता के प्रभुत्व की सत्ता कायम रहे, और क्रान्ति के स्फुलिग की प्रतिभा का विवेक अन्याय को उखाड़ फेकने के लिए विद्यमान रहे।) बारह सौ में लिखित चीरहरण महाकाव्य में कविवर शास्त्री ने महाभारत की प्रसिद्ध कथा, द्रौपदी के चीर-हरण को एक नये ढंग से प्रस्तुत किया है। युधिष्ठिर को कुरुराज घृतराष्ट्र की ओर से जुआ खेलने का निमन्त्रण राजधानी हस्तिनापुर से प्राप्त होता है। द्यूतक्रीडा के लिए जाने को लेकर द्रौपदी तथा भाइयों के बीच विचार-विमर्श होता है। भीम आदि अपना विचार यात्रा न करने के लिए देते हैं और द्रौपदी भी उनके पूछने पर वैसा ही विचार देती है, किन्तु सब को साथ लेकर युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ से प्रस्थान करते हैं। इन्द्रप्रस्थ नगरी से प्रस्थान के समय राज-परिवार को देखने के लिए पुरवासी स्त्रियों का कौतूहल और परस्परालाप, मार्ग में ग्राम-शोभा, ग्रामीणों द्वारा राजा का स्वागत, यमुनावर्णन आदि वर्णनों के पश्चात् सप्तम सर्ग में चूत का प्रसंग और चूत में द्रौपदी तक को हार जाना, दुर्योधन द्वारा द्रौपदी को सभा में लाने के लिए दूत को भेजना, द्रौपदी के न आने आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास पर दुःशासन को भेजना, द्रौपदी-दुशासन संवाद, उसे बलपूर्वक सभा में लाना, द्रौपदी द्वारा भर्त्सना, दुर्योधन का चीर-हरण के लिए आदेश, द्रौपदी का मूर्छित होना, कृष्ण का सभा में प्रवेश, दुर्योधन के साथ संवाद और समस्या का समाधान करना आदि कथानक के रूप में प्रस्तुत है। इस कथानक में सर्वाधिक मुख्य घटना, प्राचीन कथा के अनुसार कौरवों की सभा में दुःशासन द्वारा द्रौपदी का चीरहरण और श्रीकृष्ण द्वारा अपनी दिव्य शक्ति से वस्त्रों का अम्बार उत्पन्न करते जाना और द्रौपदी को नग्न होने से बचा लेने का दृश्य, है, किन्तु कवि ने इस प्रसंग को अपने ढंग से मोड़ दिया है। दुर्योधन के द्वारा चीरहरण के लिए कनखियों से दिए संकेत पर जब दुःशासन के चलते ही द्रौपदी व्याकुल होकर मूर्छित हो जाती है इसी समय श्री कृष्ण का सभा में प्रवेश होता है और बात ही बदल जाती है। दुःशासन कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। तब दुर्योधन स्थिति की गम्भीरता को भाप कर श्रीकृष्ण को मन्त्रणा के लिए पार्श्व के कक्ष में ले जाता है। वह कहता है-द्रौपदी ने जो मेरा अपमान किया था, उसका फल उसे मिल गया। वह तो मुक्त है, किन्तु पाण्डवों को मेरा दास बनना होगा। तब श्रीकृष्ण उससे कहते हैं - द्रौपदी पतियों को छोड़कर कहां जायेगी। अतः इन्हें भी छोड़ो और यदि तुमने पाण्डवों को दास बनाकर अपने साथ रखा तो ये द्रोहवश तुम्हारी सेना में विद्रोह करा देंगे और तुम मारे जाओगे। तब दुर्योधन यह शर्त रखता है कि पाण्डव बारह वर्ष तक वनवास में रहें और एक वर्ष तक अज्ञातवास आदि। अन्ततः दुर्योधन ने इसे अपनी ही पराजय स्वीकार किया। कविवर शास्त्री ने इस रचना के दूसरे, तीसरे और चौथे सर्गों में नागरिकों के राजपरिवार-दर्शन को लेकर कौतूहल के साथ भावालापों, ग्रामश्रीविलास, ग्रामीणों द्वारा राजा का स्वागत, सैनिकों का वन-विहार, जल-विहार आदि प्रसंगों को जोड़कर प्रस्तुत कथानक को प्राचीन महाकाव्यों के संस्कारवश वर्णनों से बोझिल बना दिया है, ऐसा रचनाकार पर आरोप लगाया जा सकता है। यह आरोप अंशतः सही हो सकता है, किन्तु कवि ने इन प्रसंगों में एक और सूक्ष्म मनोभावों की जानकारी तो व्यक्त ही करा दी है साथ ही शासक राजा को अपने प्रजागण के बीच लाकर परस्पर निकट करके उनकी दूरी समाप्त की है। यह कवि का आधुनिक भाव-बोध बहुत प्रभावित करता है। युधिष्ठिर सोचते हैं मामन्नदातेति जनाः समस्ताः सम्बोधयन्त्यत्र न वेद्मि तत्त्वम् ।। विचार्य पश्यन् खलु निश्चिनोमि ममापि नित्यं कृषकोऽन्नदाता।। १३/११ (सभी लोग मुझे “अन्नदाता’ कहकर संबोधित करते हैं, इसमें तथ्य नहीं समझता हूँ, विचारपूर्वक देखते हुए निश्चय करता हूँ कि सदा कृषक लोग मेरे भी अन्नदाता हैं।) महाकाव्य का वह प्रसंग जहाँ प्रतिकामी नाम का दूत द्रौपदी के पास दुर्योधन की आज्ञा से कौरव-सभा में उसे ले जाने के लिए आता है और उसे राजाज्ञा सुनाता है तब द्रौपदी की जो प्रतिक्रिया होती है, अर्थात् आठवें सर्ग के ३१वें पद्य के बाद से, वह कवि के कवित्व और भारतीय नारी की अस्मिता को आधुनिक भावभूमि पर अधिक उजागर महाकाव्य GE करती है। कवि ने द्रौपदी की आन्तरिक प्रतिक्रिया, जो उसके बाह्य व्यक्तित्व से झलक रही थी, को बड़े सन्तुलित शब्दों में व्यक्त किया हैं। सा नेत्रयोर्भिन्नमनःशलाका कपोलयोः फुल्लजपानुरागा। चलदुकूलं पुनरादधाना गतागतान्युच्चलिता चकार ।।८/४० (नेत्रों में पिसी हुई मैनसिल और कपोलों पर फूले हुए जपापुष्प के समान वह द्रौपदी, खिसकते उत्तरीय को फिर से सँभालती हुई व्यग्र होकर आगे-पीछे टहलने लगी।) दुःशासन द्वारा बलपूर्वक सभा में लाई गई द्रौपदी ने गुरुजनों तथा धृतराष्ट्र के सभासदों से जो दो-टूक बात कही है वह पूरी पीडित मानवता का प्रतिनिधित्व करने वाली बन गयी है तृषितमानवताऽत्र विषीदति ध्रुवमशोषि दयामृतमानसम्। न लभते हि नयः शरणं क्वचित् तुदति राजनयस्तमनागसम् ।। ११/५१ (मानवता प्यासी दुःख पा रही है। दया रूपी अमृत का मानसरोवर पूरी तरह सूख चुका है। न्याय को कहीं शरण नहीं मिल रही। राजनीति उस निरपराध का मर्मवध कर रही वह उस स्थिति को श्लेष की भाषा में व्यक्त कर ही है जो द्रौपदी रूपी प्रजा पर कुशासन के करो (टैक्सों या हाथों ) से हो रही है अतिकठोरकरैर्हरति प्रजावसनमेव दुरन्तकुशासनम् । पदसमृद्धिकृते उपदाहरा विदधते कलहं बत सांसदाः।। ११/६० (दुरन्त कुशासन अत्यन्त कठोर करों-टैक्सों और हाथों, से मानी प्रजा का वस्त्र ही हर लेता है और सांसद लोग पद-समृद्धि के लिए रिश्वत लेते हैं और झगड़ते हैं) इतना होने पर भी, कवि के इस महाकाव्य का नायक कौन है यह बात विचारणीय है। युधिष्ठिर चूत में द्रौपदी को हर कर बिलकुल मूक हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कुछ समय के लिए काव्य के फलक पर अवतीर्ण होते हैं। मेरे विचार में इस प्रबन्धकाव्य का प्रमुख पात्र द्रौपदी है। वह आद्योपान्त चर्चा का विषय बनी रहती है। प्रथम सर्ग में, भीम अन्त में युधिष्ठिर से कहते हैं कि मना करने पर भी यदि आप द्यूतक्रीडा की उत्कट इच्छा से जा रहे हैं तो प्रतिज्ञा करें कि कृष्णा (द्रौपदी) का कोई अनिष्ट नहीं होगा। निश्चय ही दुर्योधन का द्रौपदी द्वारा किया हुआ अपमान ही उसे बदला लेने को प्रेरित कर रहा था। उसकी कामना फलीभूत होते-होते रह गयी और उसे अपनी पराजय स्वीकार करनी पड़ी-“तस्थौ पराजयमिव प्रतिमन्यमानः। (१२/६६) कविवर शास्त्री ने निश्चित रूप से अपनी दोनों महाकाव्यकृतियों द्वारा, आधुनिक ७० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में कथ्य, भाव और भाषा तीनों दृष्टियों से नये आयामों का उद्घाटन किया हैं। इनके अनेक प्रयोगों में व्याकरण और छन्द की दृष्टि से पुनर्विचार : करने की बात, वस्तुतः सामान्य रूप से आधुनिक संस्कृत के अनेक रचनाकारों के सम्बन्ध में कहीं जा सकती है,कविवर शास्त्री उसके अपवाद नहीं हैं।

पी. के. नारायण पिल्लई (केरल, १९१०)

तिरुवल में जनमे पिल्लई मलयालम और संस्कृत, दोनों साहित्य में अपनी रचनात्मक प्रतिभा के कारण प्रशंसित हैं। संग्रहाध्यक्ष, विश्वविद्यालय में आचार्य, संस्कृत कालेज के प्राचार्य, हिन्दी प्रचार सभा के अध्यक्ष तथा किसी संस्था के मानद निदेशक आदि के रूप में भी उन्होंने अपने को प्रतिष्ठित किया। उन्हें, उनकी रचना पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का कालिदास पुरस्कार और साहित्य अकादमी (नई दिल्ली) का पुरस्कार प्राप्त हुए है। स्वामी विवेकानन्द के जीवन पर आधारित उनका संस्कृत महाकाव्य ‘विश्वभानुः (जयविहार, त्रिवेन्द्रम) १६८० में प्रकाशित हुआ। द स्वामी विवेकानन्द (१८६३-१६०२) का जीवन एक युग- प्रवर्तक महापुरुष का जीवन था, किन्तु इक्कीस सर्गों के “विश्वभानुः” महाकाव्य का कवि उन्हें दिव्य आत्मा के रूप में अवतार मानता है। पूर्वाश्रम के नरेन्द्र के जीवन के साथ घटित घटनाओं की चर्चा त्र्यम्बक भण्डारकर द्वारा लिखित श्रीस्वामिविवेकानन्दचरित महाकाव्य पर विचार के प्रकरण में आ चकी है। स्वामी विवेकानन्द का जीवन मानव-सेवा के अर्पित था. उसे कवि ने इन शब्दों में अभिव्यक्ति दी है परात्मनः प्रस्फुरिते जगत्यलं विलोकयन् मानवदिव्यतां सदा। सतां हितं यद् वितनोति सेवनं तदेव मुक्तिप्रदमात्मनो मतम् ।। ८/१८ (परमात्मा से प्रस्फुरित इस जगत् में सदा मानव की दिव्यता को देखते हुए जो सज्जनों का हित तथा उनकी सेवा है वही मेरे मत में मुक्ति-प्रद है।) शिवमयमिति चिन्तयन् समस्तं निखिलजनानपि सोदरांश्च मत्वा । प्रतिफललवनिःस्पृहः सदाऽहं गुरुकृपया कलयामि लोकसेवाम् ।। ६/८ (समग्र संसार को शिवमय समझते हुए तथा सभी लोगों को अपना सहोदर मानकर प्रतिफल के लेश की स्पृहा से रहित मैं सदा गुरु-कृपा से लोक-सेवा करूँगा।) इस रचना में अनावश्यक वर्णनों को प्रश्रय नहीं मिला है। साथ ही घटनाओं के निर्देशों के कारण कवित्व का पक्ष अभिभूत नहीं हुआ है। महाकाव्य के नाम से ही कवि ने स्वामी जी को विश्व के सूर्य के रूप में प्रतिष्ठित किया है। कवि में शब्द-योजना को लेकर चमत्कार उत्पन्न करने की क्षमता इस पद्य से समझी जा सकती है भ्रमरूपमरीचिकाहरी परिखीभूतपरायंनिर्झरी। मुनिमानससोदरी परिस्फुरतात् काशिपुरी पुरीश्वरी।। २/२३ महाकाव्य (अम-रूपी मरीचिका को दूर करने वाली, चारों ओर की अमूल्य परिखा बने श्रेष्ठ निर्झरों वाली, मुनिजनों के मानस की सहोदरी, पुरियों की स्वामिनी काशी-पुरी शोभायमान हो।)

राजेन्द्र मिश्र (उ.प्र. १९४२)

स्वातन्त्र्योत्तरकाल में, संस्कृत साहित्य में जो अनेक प्रतिभाएं प्रतिष्ठित हुई उनमें, अनेक विधाओं में लिखने वाले “अभिराज” राजेन्द्र मिश्र का नाम विशेष उल्लेखनीय है। कवि मिश्र का जन्म जौनपुर के द्रोणीपुर ग्राम में हुआ और उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। वहीं सस्कृत विभाग में अध्यापन में लग गये और इन दिनों हिमाचल वि.वि., शिमला में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। इनके कथासंग्रह “इक्षुगन्धा” पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और जानकीजीवन महाकाव्य पर के. के. बिरला फाउण्डेशन का ‘वाचस्पति-पुरस्कार” प्राप्त हुआ है। उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी ने भी इनकी कई कृतियों को विशिष्ट पुरस्कार से पुरस्कृत किया है। इक्कीस सर्गों का इनका जानकीजीवन महाकाव्य १६८८ में वैजयन्त प्रकाशन बाघम्बरी मार्ग, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। इनके दूसरे महाकाव्य ‘वामनावतार” के सद्यः प्रकाशित होने की सम्भावना है। वैसे जानकीजीवन का पूर्वार्थ कवि ने १६८३ में ही प्रकाशित किया था। कवि ने अपनी इस रचना को मां वैदेही की ही अन्तःप्रेरणा से प्रणीत माना है और साथ ही, वह अपने निसर्गज काव्य-दुम का मूल कालिदास की कविता को, शरीर श्रीहर्ष की वाणी को, पत्र जयदेव के वचन को, पुष्प बिल्हणकी सदुक्ति को और फल पण्डितराज की काव्यगरिमा को मानते हैं। हालांकि राम द्वारा सीता को निर्वासित किये जाने की घटना पर कवि की आस्था नहीं है, फिर भी वह निष्पाप वैदेही को लाञ्छित करने वाले लोक (समाज) को अपराधी मानता है और उसकी दृष्टि में उसी (लोक) को दण्डित होना चाहिए। यही मानसिकता प्रस्तुत रचना के प्रणयन के पीछे रही है ऐसा कवि के “आत्मकथ्य” से प्रतीत होता है। विदेह जनपद में अवर्षण के कारण उत्पन्न प्रजाजन की पीड़ा से व्याकुल राजा जनक गुरु शतानन्द के आश्रम में जाते हैं और उनके निर्देशानुसार वृष्टि के लिए सुवर्ण के हल को स्वयं जैसे ही खींचते हैं, एक प्रकाश-पुञ्ज के रूप में कन्या पृथ्वी के गर्भ से प्रकट होती है, वही सीता कहलाती है। फिर वर्षा भी प्रभूत मात्रा में होती है। बाद के सर्गों में कवि ने सीता की शिशु केलियों, स्मराकुर, राघवानुराग, पूर्वराग, स्वयंवर, श्वशुरालयगमन और वध्वाचार के वर्णनों में लग जाता है। पञ्चदश सर्ग में सीता की अग्नि परीक्षा के पूर्व के सर्ग निश्चय ही कवि के कवित्व के नाना पक्षों को, जिनमें भावपक्ष और कलापक्ष को सम्मिलित किया जा सकता है बड़ी सफलता से उजागर करते हैं। कवि की दृष्टि में गुरु शतानन्द के निर्देश पर प्रजावर्ग के हित के लिए स्वर्ण हल से पृथ्वी का स्वयं कर्षण करने वाले जनक अपने पूर्वजों-शिवि आदि की प्रतिष्ठा को पार कर जाते हैं आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास शिविर्दधीचो न च रन्तिदेवः पृथुनुंगो वा नहुषाम्बरीषौ। न केऽपि जग्मुर्जनकप्रतिष्ठा प्रजानुरागप्रसरावदाताम् ।। १/३६ जनक स्वर्ण-हल से कर्षण आरम्भ करते हैं। अकस्मात् हल रुक जाता है, फिर वे ज्यों ही जोर लगा कर उसे खींचते हैं त्यों ही एक प्रकाशधारा प्रकट होती है। कवि की कविता जैसे इस प्रकरण में अनजान सी बह पड़ती है कलेव चान्द्री स्फुटचारुशोभा ज्वलधुताशप्रतियातनेव। लतेव मालेव धरासुतेव प्रमोहविधं विदधे जनं सा।। ६/४४ (“चन्द्रकला के समान सुस्पष्ट आकर्षक छविवाली वह कन्या धधकती हुई आग की मूर्ति के समान थी। लतासरीखी, माला सरीखी तथा पृथ्वी की कन्या प्रतीत होने वाली उसने लोगों को प्रगाढ़ मोह से बींध दिया।”) यहां कहीं ऐसा तो नहीं कि “धधकती हुई आग की मूर्ति के समान उस कन्या” सीता को निर्दिष्ट करते हुए कवि की लेखनी से आगे घटित होने वाली अग्नि-परीक्षा की घटना का पूर्व संकेत हो गया है ? अचिरोपारूढयोवना सीता के वर्णन का यह पद्य उल्लेखनीय है प्रपातनिर्बन्धरयो न साम्प्रतं व्यलोकि सीताचरणेषु केनचित्। न वा सखीभिर्व्यवहारसारणी तटकषाऽदर्शि तदेकलम्बना ।। ३/२२ (“अब सीता के पद-विन्यासों में कोई व्यक्ति प्रपात सरीखा अमन्द वेग नहीं देख पाता और न ही सखियाँ सीता की व्यवहार पद्धति को अमर्यादित देख पाती थीं, जिनका एकमात्र वह अवलम्बन थी।”) __विश्वामित्र द्वारा राम को मांगने के प्रसंग में दशरथ के शब्दों में उनकी स्थिति का वर्णन भी आकलनीय है प्राणैर्विना दशरथीभवितुं न शक्ती दृष्टि विना दृगुभयं ननु मोघजन्म। ,किं वा करोमि तदहं वितथं न भाषे राम विना क्षणमपि श्वसितुं न शक्यम्। ४/२५ (“प्राणभूत राम के बिना दशरथ बन कर जीवित रहना भी सम्भव नहीं, दृष्टिभूत राम के बिना दोनों नेत्रों का अस्तित्व ही व्यर्थ है। मैं क्या करूँ आप से असत्य नहीं कहता, राम के अभाव में एक पल भी जीवित रहना मेरे लिए सम्भव नहीं है।”) षष्ठ सर्ग में, राम द्वारा गृहीत सीता का वर्णन कालिदास के कुमारसम्भव की पार्वती की स्थिति को याद दिलाता है न च ससार पुरो न च पृष्ठतो न खलु दक्षिणतो न च वामतः। उपरि नैव ददर्श न वाऽप्यधो हूयचलमूर्तिरिवाजनि जानकी ।। ६/५७ महाकाव्य (“न वह आगे बढ़ पायी और न पीछे ! न दाहिने खिसक सकी न बायें ! न उसने ऊपर की ओर देखा अथवा न ही नीचे की ओर ! सीता एकदम स्थिर मूर्ति बन गयी।”) नवम सर्ग में बरातियों के आगमन से अयोध्या में उल्लास का प्रसंग है। लोकाचार से वधुओं का गृहप्रवेश होता है। यहां अनुष्टुप् का प्रयोग लचर प्रतीत होता है। स्वभावतः कथानक के संघटन में राम का व्यक्तित्व सीता की अपेक्षा कम उभारा गया है। अधिकतर मार्मिक प्रसंग छोड़ दिये गये हैं। के पन्द्रहवें सर्ग में रावण पर विजय के पश्चात् अशोकवाटिका से सीता को राम के निकट उनके निर्देश से लाया जाता है। वह शिबिका पर सवार होकर आती हैं और विभीषण से अनुगत होकर कुछ दूर पैदल चल कर राम के समक्ष प्रस्तुत होती हैं। वह अपने मन में एक ही साथ अनेक भावावेगों से आन्दोलित हो रही हैं। इसी स्थिति में अचानक राम के मुख से परुष अक्षर निकल पड़ते हैं। “सीते, तुम रावण के संस्पर्श से मलिन हो तथा उसकी कामुक दृष्टि से देखी गयी हो, बहुत काल तक उसके भवन में रह चुकी हो, इन कारणों से मुझमें तुम्हें स्वीकार करने का साहस नहीं है।” राम का यह सीता के प्रति वक्तव्य कुछ अस्वाभाविक सा लगता है। यदि उन्हें ऐसा ही करना था तो सीता को सभा के बीच ही क्यों बुलाया? अपना यह सन्देश देकर अपने दूत को भेज देते ! यहां जानकी-जीवन के एक आलोचक डॉ. महाराज दीन पाण्डेय के कुछ विचार इस प्रकार हैं “ऐसा नहीं कि राम को स्वयं विश्वास हो कि सीता पवित्र है, केवल लोक के विश्वास को लेकर चिन्तित हों बल्कि वे स्वयं अविश्वस्त हैं और उससे अधिक लोक से दोचार होने के आतंक से आतंकित ! वाह जानकीजीवन के राम का शौर्य और औदात्य ! राम को इस स्थिति तक लाने के बाद तो सीता से जो भाषण कराया गया है, राम को भर्त्सत कराया गया है, वह बहुत विस्मयास्पद नहीं लगता, जब वह कहती है- श्रीमान् मैंने भी आज यह बात जान ली कि न आप मेरे पति हैं और न मैं आपकी पत्नी….. तो लगता है कोई आधुनिका अपने अपराधी पति का पानी उतार लेने पर उतारू है। आगे भी दो एक उदाहरणों द्वारा डॉ. पाण्डेय ने अपने “आकलन” से यह निष्कर्ष निकाला है (“प्रस्तुत) महाकाव्य में रावण-वध के आगे की कथा में परिवर्तन रोचक बन पड़ा है, परन्तु इतिहास का वर्तमान की अपेक्षाओं के अनुरूप बहुत अनुकूलन नहीं हो पाया है।” (“बीसवीं शताब्दी के संस्कृत महाकाव्यों में राष्ट्रीय चेतना”) __डॉ. पाण्डेय के इस निष्कर्ष से अपनी सहमति अथवा असहमति पर किसी टिप्पणी से बचते हुए मैं इतना कहना चाहूंगा कि कविवर मिश्र की यह रचना अनेक स्थलों पर बहुत मार्मिक बन पड़ी है और एक नारी की पीड़ा को उभारने में उन्हें पूर्ण सफलता मिली है। यह रचना आज के आधुनिक संस्कृत महाकाव्यों की भीड़ में अपने नाना वैशिष्ट्यों के कारण प्रतिभासम्पन्न इस कवि के यश को प्रतिष्ठापित करने में सम है। कवि की भाषा प्रसंग से अनुरूप स्वतः ढलती गयी है। चतुर्दश में ‘अरावणमरामं वा जगद्ब्रक्ष्मथ वानराः’ (६ १०१।४६) आदि कवि वाल्मीकि की इस भाव-भूमि का अनुहरण करती हुई रावण के७४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास साथ युद्ध से पूर्व राम की यह प्रतिज्ञा राम के व्यक्तित्व को बहुत ही स्फुट करती है हरामि भवनत्रयप्रथितशोकशकुं रणे निहत्य दनुजाधम बहुतियावधिप्रेक्षितम्। भविष्यति बसुन्धरा नियतमद्य नीरावणा दशास्यनिधनेऽथवा मयि हते तु नीराघवा।। १४/७४ (“एक लम्बी अवधि के अनन्तर प्रत्यक्षीकृत इस अधम राक्षस को आज रणभूमि में मार कर मैं त्रिभुवन के महान् शोकशंकु को शान्त कर दूंगा। आज रावण के मारे जाने पर निश्चय ही वसुन्धरा या तो रावण-विहीन हो जायेगी या फिर मेरे ही दिवंगत होने पर राघव-विहीन।”)

माधव श्रीहरि अणे (महाराष्ट्र, १८८०-१९६८)

पुणे के एक संस्कारशील परिवार में जन्मे लोकनायक बापूजी अणे भारतीय स्वातन्त्र्य के एक सेनानी तथा विद्वान् के रूप में प्रतिष्ठित थे। वे पुणे के तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ के कुलपति रहे। बिहार राज्य के राज्यपाल के रूप में भी उन्होंने स्वतन्त्र राष्ट्र की सेवा की। उन्हें भारत के राष्ट्रपति ने १६६८ में पद्मविभूषण अलङ्करण से विभूषित किया था। उनका कवि रूप उनके महाकाव्य, “श्रीतिलकयशोऽर्णवः” के प्रकाशन से लोक-विदित हुआ। व श्रीतिलकयशोऽर्णवः तीन खण्डों में क्रमशः १६६८, १६७०, १६७१ में, ८५ तरङ्गों में प्रकाशित हुआ। इस विशालकाय रचना में, अन्त की तीन तरङ्गों को कवि के १६६८ में दिवगंत हो जाने से, इसके सम्पादक मण्डल ने उनकी टिप्पणियों के आधार पर कवि की शैली का ही अनुगमन करते हुए लिखकर पूर्ण किया। अपने समय के महान् राष्ट्रनेता और “गीतारहस्य” के प्रसिद्ध लेखक कर्मयोगी लोकमान्य बाल गङ्गाधर तिलक (१८५६-१८२०) के जीवन की घटनाओं पर आधृत यह ग्रन्थ एक ऐतिहासिक महत् काव्य तो है ही, अपने आप में अपने रचनाकार की अत्यन्त प्रदीप्त प्रतिभा से निर्मित होकर आकलनीय बन गया है। रचनाकार को लोकमान्य तिलक के शिष्य के रूप में साथ काम करने का भी सौभाग्य मिला था, इस कारण इस रचना की प्रामाणिकता भी निःसन्दिग्ध हो गई है। लोकमान्य के जीवन की लघु घटनाओं की बूंदों से बने इस “अर्णव” में अनुष्टुप छन्द का ही बाहुल्येन प्रयोग हुआ है। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण की सरल शैली में स्वातन्त्र्य-महाभारत के एक प्रखर योद्धा के जीवन का काव्यमय इतिहास सहदय समाज द्वारा बहुत प्रशंसित हुआ। कवि ने प्रस्तुत वृत्तान्त के साथ यथास्थान अनेक पौराणिक प्रसङ्गों की उतपेक्षा की है, उपमाओं का प्रयोग किया है। आरम्भ में शब्दचित्र के रूप में “लोकमान्य” की प्रस्तुति कविने इस प्रकार की है रक्तोष्णीषं शिरसि रुचिरं चन्दनाङ्कञ्च माले हस्ते यष्टिं तुहिनधवलामगरक्षां शरीरे। महाकाव्य स्कन्थाजानूपरि विलसितं चोत्तरीयं दधानं बालं भव्यं तिलककुलजं लोकमान्यं नमामि॥ ६/E0 (मैं भव्य लोकमान्य तिलक" कुल में उत्पन्न बाल (गङ्गाधर) को नमन करता हूं, जो सिर पर सुन्दर लाल पगड़ी धारण किये हुए हैं, जिनका ललाट चन्दन-चर्चित है, जिनके हाथ में हिमोज्ज्वल यष्टिका है, शरीर में अंगरखा है और जिन्होंने कंधे से लेकर जानु-भाग तक लटकते उत्तरीय को धारण कर रखा है।)

  • इस रचना में प्राचीन महाकाव्य-लक्षणों का सर्वात्मना अनुगमन नहीं हुआ है, इस आधारपर इसे “महाकाव्य” की कोटि में न रखना ठीक नहीं, क्योंकि कवि की दृष्टि निश्चित रूप से एक महत् काव्य के निर्माण में प्रवृत्त लक्षित होती है और युग के परिवर्तन के अनुरूप उसने सम्पूर्ण रूप से महाकाव्य के प्राचीन लक्षणों पर अनुगमन करना स्वीकार नहीं किया। तरंग के अन्त में उसके द्वारा छन्दों में परिवर्तन किया जाना भी उसकी और से एक ‘महाकाव्य" के रूप में इसे प्रस्तुत करना लक्ष्य प्रतीत होता है। बापूजी अणे के मन में अपने चरित नायक के प्रति कितनी श्रद्धा थी इसे यह पद्य प्रकट करता है धैर्येण मूथर इवाम्बुधिवद् गभीरो यस्तेजसाऽर्क इव शीतकरः शशीव। ज्ञानेन गीष्यतिरिवोत्तमकर्मयोगी तं भारतस्य हृदयं तिलकं नमामि ।। (मैं उन तिलक’ को नमन करता हूं, जो धैर्य से पर्वत के समान, समुद्र जैसे गम्भीर, तेज से सूर्य के सदृश, चन्द्र जैसे शीतल प्रकाश बाले, ज्ञान में बृहस्पति के समान हैं और उत्तम कर्मयोगी हैं।) “स्वाराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” इस मन्त्र के दाता तिलक की प्रस्तुत “यशोगाथा” में नाना घटनाओं का उल्लेख है। उदाहरणार्थ, जब (तिलक) ने केसरी पत्र का सम्पादन-कार्य अपने हाथ में लिया तो उनके मन में जन-सेवा का भाव था, क्योंकि लोक-ऋण से उसी प्रकार मुक्ति पाई जा सकती थी। कवि लिखते हैं अहं सर्वैरपकृतः सज्जनैर्देशबान्धवैः। सर्वपक्षः सर्ववर्णः सर्वधर्मानुयायिभिः।। ऋणापकरणं शक्यं नाघमणेन वै पृथक् । प्रशस्यते सङ्घटिता जनसेवा विवेकिभिः ।। २६/४५,४६ (सभी पक्षों, वर्णों, धर्मों के अनुयायी सज्जनों, देश के बन्धु-जनों ने मेरा उपकार किया है, अलग से अधमर्ण मैं ऋण को चुकता नहीं कर सकता, विवेकी लोग संघटित जन-सेवा की प्रशंसा करते हैं।) कवि के अनुसार उन्होंने कार्यसूत्र को अपने हाथ में लेकर लोगों को सही मार्ग का उपदेश किया और निराशा के अन्धकार से ग्रस्त चित्रों को स्वदेश आदि के प्रति भक्ति के दव से भर दिया। फलतः, आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास नवाशावसन्तो जनेष्वाविरासीत् प्रफुल्ला रसालाः पिका गीतहृष्टाः।। समुत्साहवायुर्ववौ गन्धवाहः प्रजासु स्वकर्तव्यनिष्ठोदयोऽभूत् ।। २६/५५ । (नई आशा का वसन्त प्रकट हुआ, आम्र मञ्जरित हो गये, कोकिल गीत गाकर प्रसन्न हुए, उत्साह का गन्धवा ही पवन बहने लगा और जनता में अपने कर्तव्य की निष्ठा का उदय हुआ।) - एक प्रसंग में, “टाइम्स’ नाम के एक पत्र ने तिलक के साथ कुछ गलत व्यवहार किया, अन्ततः उसके प्रतिनिधि ने न्यायालय में “क्षमापत्र” लिखकर पढ़ा और तिलक ने उसे क्षमा कर दी। कवि इस पर लिखते हैं न शत्रुरपि हन्तव्यः शरणं यः समागतः। युद्धनीतिर्भारतीया तिलकेनावलम्बिता।। २७/३० (शत्रु भी जो शराणागत जो जाय, मारने योग्य नहीं है, इस भारतीय नीति का ‘तिलक’ ने सहारा लिया) कवि ने किसी-किसी प्रकरण को उसके महत्त्व के अनुसार विस्तृत करके वर्णित किया है, जैसे ३३वीं तरंग में बङ्गभङ्ग-प्रसङ्ग आदि को। कहीं-कहीं कवि की लेखनी से उत्तम सूक्तिमय पद्य-रल का निर्माण हो गया है न प्रार्थना न विज्ञप्तिभैक्ष्यं नैव च नैव च। पराक्रमेण सिध्यन्ति स्वातन्त्र्यस्य मनोरथाः।। ३३/१५४ (स्वातन्त्र्य के मनोरथ पराक्रम से सिद्ध होते हैं, उसके लिए न प्रार्थना, न ही विज्ञापन आवश्यक है, भिक्षा का आचरण तो बिल्कुल नहीं।) सामान्यवस्तुलाभोऽपि न तु त्यागं विना भवेत्। न विनात्मार्पणं कश्चित् स्वातन्त्र्यमधिगच्छति ११ ३३/२२६ (सामान्य वस्तु का लाभ भी बिना त्याग के नहीं होता, कोई भी आत्मबलिदान के बिना स्वातन्त्र्य प्राप्त नहीं करता) मण्डालय के जिस कारागार में ६ वर्षों तक तिलक को बंद रहना पड़ा, वहीं उन्होंने ‘गीतारहस्य’ का लेखन किया। इस प्रसङ्ग को कवि ने कवित्वपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है (३८/४७)। यद्यपि स्वाराज्य का सुफल तिलक के जीवनकाल में भारत की जनता को प्राप्त नहीं हुआ, तथापि उसे प्राप्त होने में तिलक के योगदान का बहुत बड़ा स्थान है। कवि ने ऐसे महापुरुष का चरित प्रस्तुत करके आधुनिक संस्कृत साहित्य का महनीय संवर्धन किया है। उन्हीं के शब्दों में तिलकचरितं परमगहनं देशसंसारबिम्बममृतमधुरं तरुणहृदयस्पर्शि सद्भावपूर्णम्। विमलमतुलं मनुजहृदयाकाशदीप्तिप्रदं यद् भुवनविरलप्रथितयशसां तुष्टयेऽभ्यासयोग्यम्।। ३०/३३५ महाकाव्य ចទ្រ (तिलक का चरित परम गहन है, उसमें देश और संसार दोनों का बिम्ब है, वह अमृत जैसा मधुर है, तरुण जनों के हृदय को स्पर्श करने वाला है, सदभाव से भरा है, विमल तथा अतुलनीय है, मनुष्य के हृदयाकाश को दीप्ति प्रदान करने वाला है और यत्र-तत्र फैले यश वाले लोगों के अभ्यास योग्य है।) __

गणेश गङ्गाराम पेंढारकर (महाराष्ट्र)

इनका “संस्कारसङ्गरम्” नाम का नौ सर्गों में लिखित महाकाव्य श्री र.ब. जोशी चिटणीस प्राज्ञ पाठशाला, मण्डल बाई (जि. सतारा) से पE७७ में प्रकाशित हुआ। ‘संस्कारसङ्गरम्। संस्कृत महाकाव्यों की परम्परागत कथावस्तु से अलग कल्पित पात्र पर आधारित होने के कारण एक ओर कवि की, नये आयाम में लेखन की दृष्टि को उजागर करता ही है, दूसरी ओर कथ्य के अनुरूप कवित्वप्रदर्शन से विरत परिस्फुट शब्दयोजना वाली भाषाशैली के कारण भी ध्यान आकृष्ट करता है। इसका मूल कारण है रचनाकार आधुनिक जीवन-पद्धति के अधिक निकट है और उसकी जीवन-दृष्टि भी मूलतः भारतीय होते हुए भी कुछ निजी हैं। लेखक के अनुसार यहां सनातन पवित्र संस्कार से प्रभावित, निरपराध एक तरुणी एवं आधुनिक पाश्चात्य संस्कार के प्रभाव वाले एक तरुण, जो परस्पर विरोधी संस्कारों से निर्मित आवर्तमय चक्कर के कारण जर्जर हो चुके हैं, का करुण तथा विपन्न संसारचित्र वर्णित है। इसमें संवादों, नाट्यगुणों से समन्वित प्रसङ्ग तथा अशिथिल कथासूत्र का घाट आद्योपान्त सफल रूप से नियोजित हुए हैं। कवि की भाषा सर्वथा उपयुक्त एवं हृदयग्राहिणी है। इसका एक निदर्शन प्रस्तुत है V किमप्यविदितं पुरा वपुषि मानसे माधवी ह्यकारणमिवान्वभूदू विविधचित्रसंवेदनम्। क्वचित्सपुलका क्वचित्सचकिता सलज्जोन्मनाः क्वचित्प्रमुदिता क्वचिच्च विमना अनीशात्मनः।।१/२० (माधवी ने अपने शरीर तथा मन में पहले से अनुभूत तथा अकारण विविध विचित्र संवेदन अनुभव करने लगी। वह कभी रोमांचित कभी आश्चर्ययुक्त, कभी प्रभुदित, कभी मन का अपने आप पर अधिकाररहित हो जाती।) करुण एवं शान्त रसों की सम्मिश्रित अनुभूति उत्पन्न करने वाली यह रचना आधुनिक संस्कृत साहित्य के महाकाव्यों में बिल्कुल एक अलग अपना स्थान बना सकने में समर्थ है और इस दृष्टि से इसके निर्माता कवि पेंढारकर सर्वतोभावेन अभिनन्दनीय है। किन्तु इसके महाकाव्यत्व को लेकर उठने वाले विवाद की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

नारायण शुक्ल (उत्तर-प्रदेश १९०८)

देवरिया जिले में खोण्डा ग्राम के निवासी कवि शुक्ल ने अपने ही जिले के एक संस्कृत महाविद्यालय में अध्ययन किया और श्रीनाथ संस्कृत महाविद्यालय, हाटा, (देवरिया) के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। कवि शुक्ल आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ने ‘ऊर्मिलीयमहाकाव्य’ का निर्माण किया जो उनके ही द्वारा १६७३ में प्रकाशित हुआ। महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की दृष्टि में वाल्मीकि द्वारा रामायण की उपेक्षिता नारी ऊर्मिला को प्रस्तुत रचना में प्रतिष्ठित करने का कवि का प्रयास है। ऐसा ही प्रयास हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि स्व. मैथिली शरण गुप्त ने भी अपने ‘साकेत’ महाकाव्य में किया है। कवि शुक्ल ने कृष्णायनम् नाम से भी एक महाकाव्य की रचना की है, ऐसा उल्लेख है। कवि शुक्ल द्वारा १७ सर्गों में प्रणीत ‘ऊर्मिलीय महाकाव्य’ में, रामायण और पुराण के विभिन्न स्रोतों से प्राप्त ऊर्मिला के कथानक को अपनी प्रतिभा से आबद्ध करने का प्रयास किया गया है। जनक की रानी सुनयना से ऊर्मिला का जन्म होता है। सीता के विवाह के प्रसंग में उसका विवाह लक्ष्मण के साथ होता है। कवि ने वें वें सगों को लक्ष्मण और ऊर्मिला के संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है और अपने कवित्व का स्पर्श देने का भी उसका विशेष प्रयास लक्षित होता है, किन्तु उसकी भाषा में सम्प्रेषणीयता का कुछ अभाव सा प्रतीत होता है।

रमेशचन्द्र शुक्ल (राजस्थान १९०९-१९९५)

अनेक विधाओं में अपनी रचना-प्रवृत्ति से आधुनिक संस्कृत साहित्य को जिन्होंने सम्पन्न करने का प्रयास किया उनमें कविवर शुक्ल अन्यतम हैं। धौलपुर में जनमे कवि शुक्ल ने अनेक स्थानों में अध्यापन किया। इनके द्वारा १४ सर्गों में रचित महाकाव्य ‘सुगमरामायण’ देववाणी परिषद् दिल्ली-५६ से १६७८ में प्रकाशित हुआ। कविवर शुक्ल का दूसरा ग्यारह सर्गों में निबद्ध महाकाव्य ‘श्रीकृष्णचरित’ देववाणी परिषद्, दिल्ली से ही १६७E में प्रकाशित हुआ। जैसा कि नामकरण से स्पष्ट है, राम की कथा को सुगम भाषा में प्रस्तुत करने का इस कवि का प्रयास है। कवि ने रामायण के सभी आदर्श चरित्रों को प्राचीन परम्परा का अनुसरण करते हुए प्रस्तुत किया है। भाषा में एक निश्चित ही प्रवाहमयता और अपेक्षित प्रसाद गुण है। कवि स्त्री शूर्पणखा का नासिका और कान के कर्तन द्वारा विरूपीरकण समुचित नहीं मान कर लक्षण से स्वीकार कराता है। राम उससे कहते हैं निशम्य तस्या वचनं कठोरमुवाच रामः प्रतिभासि में त्वम्। विना च नासाश्नवणे स्वतन्त्रे प्रयाहि न त्वां तरसा दिदृशुः ।।११६/६२ कवि ने यत्र-तत्र सुन्दर वर्णनों को भी उपनिबद्ध करके कवित्व का अच्छा स्पर्श दिया है। रामराज्य के वर्णन के प्रसङ्ग में कवि की राष्ट्रिय भावना समुचित रूप से व्यञ्जित

वसन्त त्र्यम्बक शेवडे (महाराष्ट्र १९१७)

सतारा के निवासी कवि शेवडे का जन्म मुम्बई में उनके मातामह के घर में हुआ। पिता श्रीत्र्यम्बक लक्ष्मण शेवड़े पहले अमरावती में, फिर बाद में नागपुर में वकील थे। बाद में महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) और फिर न्यायमूर्ति (हाईकोर्ट जज) हुए। कवि को संस्कृत का संस्कार मातामह-कुल में प्राप्त हुआ। आपने प्राचीन पद्धति से अनेक गुरुजनों से विविध शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त की। आप महाकाव्य काशीवास करते हुए अपना अधिकतर समय शास्त्रचिन्तन और काव्य-निर्माण में व्यतीत कर रहे हैं। आपका लघु काव्य ‘रघुनाथशिरोमणिचरितम्’ “सरस्वतीसुषमा” (बाराणसी) में प्रकाशित हुआ। आपके अब तक तीन महाकाव्य प्रकाश में आये विन्ध्यवासिनीचरित (चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी १६८२) शुम्भवध और श्रीदेवदेवेश्वर महाकाव्य (श्री देवेश्वर संस्थान पर्वती व कोयरुड पुणे, महाराष्ट्र संस्थान के प्रयास से १६६३ में प्रकाशित)। कविवर शेवडे को उनके प्रथम महाकाव्य पर साहित्य अकादमी (नई दिल्ली) का पुरस्कार प्राप्त हुआ। सहज उपासक प्रवृत्ति के इस कवि ने अपनी रचनाओं को पार्वती और परमेश्वर की आज्ञा तथा उनके प्रसाद का फल माना है। वैदर्भी रीति उन्हें कालिदास और बिल्हण की परम्परा से प्राप्त हुई कविकुलगुरुमादौ शिश्रिये कालिदासं तदनु च कविमल्लं बिल्हणं या प्रपेदे। स्मरहरचरणाब्जे चञ्चरीकं वसन्तं श्रयति कविमिदानीं सैव वैदर्भरीतिः।। (जिस वैदर्भी रीति ने पहली बार कविकुलगुरु कालिदास की सेवा की, तत्पश्चात् कवि-मल्ल बिल्हण को प्राप्त हुई और अब वही काम-हर शिव के चरणों में रह रहे (वसन्त) वसन्त (शेवडे) के पास रहती है।)। सोलह सर्गों में रचित विन्ध्यवासिनीचरित महाकाव्य का मूल कथानक कहीं सुसंगत रूप से उपलब्ध नहीं है। विन्ध्याचल के निकट मुनि नारद आते हैं और उसे इन्द्र के विरुद्ध कलह के लिए प्रेरित करके चले जाते हैं। पर्वतों के साथ इन्द्र का वैर प्रसिद्ध है। विन्ध्याचल सभी पर्वतों को आमन्त्रित करता है और इन्द्र से बदला लेने के लिए सबकी सहमति प्राप्त करता है। विन्ध्याचल भगवती दुर्गा और अपने गुरु अगस्त्य का स्मरण करके बढ़ने का उपक्रम करता है। उधर इन्द्र की प्रार्थना पर विष्णु विन्ध्याचल को मनाने में अपनी अक्षमता व्यक्त करते हैं और उन्हें अगस्त्य की शरण में जाने का निर्देश देते हैं। देवताओं के साथ इन्द्र प्रयाग होते हुए काशी आते हैं। इन्द्र की प्रार्थना अगस्त्य स्वीकार कर लेते हैं और विन्ध्याचल के पास जा कर उसे पूर्ववत् स्थिर रहने का आदेश देते हैं। विन्ध्याचल उनसे प्रार्थना करता है कि विन्ध्य के किसी स्थान पर भगवती दुर्गा को निवास करने के लिए प्रेरित करें। अगस्त्य कैलास जाकर भगवती को राजी करते हैं। विन्ध्याचल का एक क्षेत्र ‘शक्तिपीठ” बन जाता है। उत्तरार्ध में, विन्ध्यवासिनी की कृपा से वसुदेव को भगवान् कृष्ण पुत्ररूप में प्राप्त होते हैं। कंस के सत्ता में आने पर वसुदेव और देवकी को कारावास होता है। वसुदेव के अनुरोध से गर्ग मुनि विन्ध्याचल जाकर सहस्रचण्डी यज्ञ करते हैं। प्रसन्न होकर दुर्गा नन्द के यहां अवतीर्ण होना स्वीकार करती हैं। और विष्णु को वसुदेव-पुत्र के रूप में अवतीर्ण होने के लिए प्रेरित करती हैं। कारावास में कृष्ण का जन्म, वर्षा में वसुदेव द्वारा उन्हें गोकुल पहुंचाया जाना, यशोदा के पास कृष्ण को छोड़कर योगमाया को लेकर मथुरा आना, कंस द्वारा योगमाया को मारने का उपक्रम, योगमाया का उसके हाथ से निकल कर कंस को मारे आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास जाने की आकाशवाणी, कृष्ण द्वारा कुवलयापीड हाथी, चाण्डूर आदि मल्लों के वध के पश्चात् कंस का संहार आदि वर्णित हैं और अन्तिम सर्ग में कृष्ण और बलराम के उपनयन के का समारोह, नवरात्र में वसुदेव आदि की विन्ध्याचल यात्रा, नवरात्र महोत्सव आदि वर्णित हैं। दूसरा महाकाव्य शुम्भवध भी सोलह सर्गों का है, जिसमें भगवती दुर्गा द्वारा शुम्भ नामक दैत्य का वध वर्णित है। साथ ही, अंगरूप में धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज, निशुम्भ आदि के वध के वृत्तान्त भी वर्णित हैं। इसका कथानक देवी-भागवत और मार्कण्डेयपुराण से लिया गया है। कवि का तीसरा महाकाव्य (१६ सर्गों का) मराठों के इतिहास पर आधारित है तथा १६५० से १७५० तक का इतिहास इसका मूल विषय है। रघुवंश की परम्परा में यहां भोसलेवंश के राजाओं का पराक्रम वर्णित हुआ है। क्षत्रपति शिवाजी महाराज उनके ज्येष्ठ पुत्र सम्भाजी, द्वितीय पुत्र राजा राम तथा सम्माजी के पुत्र शाहू जी महाराज के चरित्र इसमें चित्रित हैं। उनके प्रधान मन्त्री बालाजी बाजी राव पेशवा पूना में पर्वत पर एक मन्दिर बना कर उसमें शाहूजी महाराज द्वारा दी गयी श्रीदेवदेवेश्वर की मूर्ति की स्थापना करते हैं। स्वात्माराम प्रकृति के उपासक कवि शेचडे की काव्य-साधना भी इनकी उपासना की कोटि में परिगणनीय है। इन्होंने वर्णनों को अधिक प्रश्रय दिया है, घटनाओं को कम । उनकी भाषा में एक संश्लिष्टता के साथ सम्प्रेषणीयता है। अलंकारों को अनुस्यूत करने और अपनी बात के प्रस्तुतीकरण की शैली परम्परागत है, तथापि उनकी वैदर्भी चित्त को प्रभावित करती है। वर्णनों में वस्तु की स्वाभाविकता का अतिक्रमण प्रायः नहीं करते, फिर भी उनके अनुसार विन्ध्यपर्वत की किरात कान्तायें नाना रत्नों को अल्प मूल्यों में वणिग्जनों को दे डालती हैं (८/१४)। of कवि में पाण्डित्य के साथ भारतीय सांस्कृतिक चेतना का गहरा रंग भी उद्भासित है। ऐसा प्रभाव उसकी रचना में आद्योपान्त परिलक्षित होता है। विन्ध्यवासिनी विजय महाकाव्य के पूर्वार्ध (१-१० सर्ग) की पूरी संरचना इन्द्र के मद को चूर करने के लिए हुई और भगवती को बिन्ध्य क्षेत्र में प्रतिष्ठित करके देवताओं के पर्वत सुमेरु की तुलना में विन्थ्य को अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध करने में, की गयी किन्तु यह रचना अन्ततः कृष्ण द्वारा आततायी कंस के संहार के कारण लोक-कल्याण की भूमि पर प्रस्तुत हुई। इसमें कवि का कवित्व आद्योपान्त उच्छलित है। एक और कवि विन्थ्य वर्णन के प्रसंग में समाज के सबसे छोटे वर्ग, किरातों, पुलिन्दों, शालिगोपियों पर दृष्टिपात करता है तो दूसरी ओर वाराणसी-वर्णन में वैदिक विद्वानों के वेदपाठ की चर्चा करता है। प्रयाग के प्रसंग में संगम का वर्णन करना कवि को सम्भवतः इसलिए अभिप्रेत नहीं रहा कि कालिदास से उसका वर्णन अतिशयित नहीं हो सकता था। कवि के अगस्त्य जब जगज्जननी गौरी तक पहुंचते हैं तब उनकी वाणी और मुखर हो जाती है महाकाव्य विद्यां पुरा त्रिपुरभैरवि तावकीनामाराध्य पञ्चदशवर्णमयीं मुकुन्दः। दैत्यानुपप्लवकरानिव विप्रलब्धु, त्रैलोक्यमोहनमपद्यत रूपधेयम् ।।८/३१ (हे त्रिपुरभैरवी, पुराकाल में तुम्हारी विद्या की आराधना करके मुकुन्द ने उत्पात मचाने वाले दैत्यों को मानों वञ्चित करने के लिए त्रैलोक्य को मोहित करने वाला रूप प्राप्त किया।) कविवर शेवडे महाकाव्य में प्रयुक्त होने वाले प्राचीन अनेक छन्दों का प्रयोग किया है किन्तु अनुष्टुप् में लेखन उन्हें अभीष्ट नहीं। शुम्भवध में अपेक्षाकृत वीररस को अधिक प्रश्रय मिला है। क्रुद्ध शुम्भ देवी के पास अपना दूत भेजकर यह कहलाता है गर्बोधताऽसि हननान्महिषासुरस्य मायाभ्रमेण पशुभावमुपाश्रितस्य। नाहं महेशि महिषः कपटानभिज्ञः शुम्भोऽस्मि नीतिनिपुणो रणपण्डितश्च ।। ७/४३ (हे भावानी, माया के अम से पशुभाव को प्राप्त महिषासुर के वध से तू घमंड से भर गयी है। मैं कपट का अनभिज्ञ महिष नहीं हूं, बल्कि नीति में निपुण और रण का पण्डित समग्ररूप से कविवर शेवडे का रचनाकार अपनी परम्परागत सीमा के बावजूद मन को आकृष्ट करता है और आज के अनेक रचनाकारों को अपनी कलात्मक चेतना के कारण बहुत पीछे छोड़ता हुआ प्रतीत होता है।

रामावतार मिश्र (बिहार १८९९-१९८४)

कवि मिश्र गया जिले के टेकारी के पास बेनीपुर ग्राम के निवासी थे। किन्तु इनका जन्म निकटवर्ती ग्राम मखपा में इनके नाना के यहां हुआ। आप जब दो वर्ष के थे तभी आपके पिता का देहान्त हो गया। गया के पं. रमाप्रसाद मिश्र “रमेश” की शरण में रहकर १६२३ में आपने साहित्योपाध्याय की परीक्षा उत्तीर्ण की। आपने व्याकरण, आयुर्वेद तथा ज्योतिष का भी अध्ययन किया। अपने गुरु के प्रति इनके मनमें अपार आदर का भाव था। अपने काव्यों के प्रकाशन के उपाय से विरत कवि मिश्र ने अनेक खण्डकाव्यों के साथ दो महाकाव्यों की रचना की। संयोगवश इनकी अप्रकाशित रचनाएं सेण्टजेवियर्स कालेज में अंग्रेजी विभाग के प्राध्यापक गुणग्राही डॉ. शिवशङ्कर पण्डित के हाथ लगी और उनका सम्पादन करके हिन्दी में अनुवाद के साथ डॉ. पण्डित ने प्रकाशित किया। कवि के दो महाकाव्य हैं-‘श्रीदेवीचरितम्’ (१६८२) और ‘श्रीरुक्मिणीमङ्गलम्’ (१EEE)। पहला तो १६३५ से १६३६ के बीच ही लिखा जा चुका था, किन्तु दूसरे के ६ सर्गों की रचना १६३६ में हो चुकी थी, लेकिन कवि ने प्रथम महाकाव्य के प्रकाशन के पश्चात् बाद में १६८२-८३ पूरा किया। दोनों रचनाओं का प्रकाशन रुक्मिणी प्रकाशन, इन्द्रपुरी रांची- ८३४००५ (बिहार) से हुआ। कवि को श्रीदेवीचरित पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी (लखनऊ) का कालिदास पुरस्कार (१९८३) में प्राप्त हुआ। सम्पादक डॉ. पण्डित के अनुसार, कवि ने रचनाओं के मुखपृष्ठ पर अपने आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास गुरु की असीम कृपा को अपनी रचनाओं का मूल कारण निर्देश करने वाले अपने इस पद्य को आग्रहपूर्वक मुद्रित करने का निर्देश किया था “कृष्णांघ्रिपाथोजमधुव्रतस्य सदागमाभ्यासपरायणस्य। धृतावतारस्य नु कालिदासकवे रमेशस्य कृपाश्रयेण।।” (श्री कृष्ण के चरण कमलों के भ्रमर, सदा आगम शास्त्र के अभ्यास में संलग्न, कवि कालिदास के अवतार रूप गुरु रमेश की कृपा के आश्रित) श्रीदेवीचरित (9E सर्ग) प्रसिद्ध पौराणिक कथानक पर आधृत है, जिसमें आदि शक्ति जगज्जननी द्वारा महिषासुर आदि नाना असुरों के संहार की कथा है। विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति, विष्णु के कान की मैल से मधु और कैटभ की उत्पत्ति, उनके डर से ब्रह्मा द्वारा स्तुति से आरम्भ करके विभिन्न असुरों के वध की रोचक प्रसंग वर्णित हैं। इस विजय के पश्चात् सब ओर सुख शान्ति का वातावरण हो जाता है। इसी प्रकार दूसरे महाकाव्य श्रीरुक्मिणीमङ्गल (१२ सर्ग) का कथानक श्रीमद्भागवत में प्राप्त रुक्मिणी विवाह की घटना पर आधारित है। आरम्भ में, नारद श्रीकृष्ण के यहां आकर रुक्मिणी का वर्णन करते हैं, श्रीकृष्ण के पास ब्राह्मण द्वारा रुक्मिणी का संदेश प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण सेना के कुण्डिनपुर जाते हैं और रुक्मिणी का हरण करते हैं आदि पुराण प्रसिद्ध कथा है। यद्यपि कवि ने दोनों रचनाओं में इतिवृत्तात्मक शैली में कथा को मन्दगति से गतिशील किया है तथा कवित्व के प्रदर्शन से पराङ्मुख है तथापि उसका कवित्व आद्योपान्त जलचादर के दीप की भांति उसके द्वारा प्रयुक्त शब्द-अर्थों के आवरण में झलकता हुआ प्रतीत होता है। प्रथम महाकाव्य के प्रथम सर्ग में कविने मधुकैटभ के आतंक से भयाक्रान्त ब्रह्मा के मुख से योगनिद्रा की स्तुति करायी है। वहां उसकी आदि शक्ति के प्रति निष्ठा के साथ उसके कवित्व का पाक भी लक्षित होता है। कवि की भाषा भी आद्योपान्त प्रसादगुणमयी एवं भावसम्प्रेषण में क्षम है। जैसे सौम्याकृतीनां त्वमतीव सौम्या त्वत्तः पर सौम्यतरा न लोके। सौम्यत्वमेवास्ति तवाश्रितं यत् कथ न तादृग्भवसि त्वमेव ।। श्री दे. च. १/५८ (सौम्य आकृति वाली स्त्रियों में तुम सबसे बढ़कर सुन्दर हो, संसार में तुमसे अधिक सुन्दर कोई भी नहीं है, जब सौन्दर्य तुम्हारे ही अधीन है, तो तुम वैसी क्यों न हो) दूसरे सर्ग में विष्णु के साथ असुरों-मधु और कैटभ का युद्ध सहज भाव से वर्णित हुआ है। कवि का ज्योतिष ज्ञान तृतीय सर्ग में प्रकट हुआ है, जहां महिषासुर स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने के लिए युद्ध-यात्रा करता है। कहीं-कहीं कवि ने आज के जीवन में प्रचलित लोकोक्तियों को अनुस्यूत करके भी अपने कवित्व में रमणीयता लाने को प्रयास किया है। जैसे दशम सर्ग में रक्तबीजवध के प्रसङ्ग में कवि ने लिखा है महाकाव्य अहो यदेतत्सकलाङ्गनिःसृतक्षतोद्भवा व्यापृणुयुर्धरामिमाम्। तदा त्रिवेदो भवितुं चतुःश्रुतिर्गतो द्विवेदस्तु भवन् समागतः।। १०/४४ अर्थात् यदि इसके सम्पूर्ण अंग से निःसृत रक्त से सारी पृथ्वी व्याप्त हो जाये तो कहा यह जायेगा-त्रिवेदी गये चतुर्वेदी बनने, किन्तु मात्र द्विवेदी बनकर ही लौटे।" श्रीदेवीचरित के अट्ठारहवें सर्ग में एक दैत्य द्वारा विभिन्न देहाती खेलों तथा शारीरिक व्यायामों का जीता-जागता वर्णन हुआ है। प्राचीन शैली के रचनाकार कविवर मिश्र ने अपने जीवनकाल में देश में प्रवर्तमान वैदेशिक साम्राज्य के आतड़क को अनुभूत किया था, सम्भव है उससे ही मुक्ति पाने के लिए देवी आदिशक्ति के चरित का गान किया है।

रसिकबिहारी जोशी (१९२७)

कविवर जोशी के पिता पं. रामप्रताप शास्त्री एक प्रतिष्ठित विद्वान् और वैष्णव कवि थे। कवि जोशी पर उनका वैष्णव संस्कार पर्याप्त रूप में पड़ा है, जो उनकी करुणाकटाक्षलहरी द्वारा अभिव्यक्त हुआ है। जोशीजी ने वाराणसी में अध्ययन किया और जोधपुर तथा दिल्ली विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभागों में अध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित रहे। श्रीकृष्णभक्तिप्रवण रचनाओं के निर्माण में निपुण कवि जोशी का आठ सर्गों में लिखित ‘मोहभङ्गम्’ नाम का महाकाव्य १६७८ में जोधपुर विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ। इस महाकाव्य का विष्णुपुराण में प्राप्त मुनि सौभरि के आख्यान को कवि ने मूल आधार बनाया है। कवि के अनुसार, उसको उस आख्यान में जीवन दर्शन के ‘युनिवर्सल’ सत्य का अनुभव हुआ और वह उसके आधार पर महाकाव्य लिखने के लिए प्रेरित हुआ। सौभरि महान् विचारक, वेदों के ज्ञाता एवं तपोनिष्ठ मुनि थे। उनका आश्रम यज्ञानुष्ठानों, तप-नियमों तथा विद्याओं का केन्द्र था। एक दिन यमुना के जल में साधना के अवसर पर उन्होंने एक श्रेष्ठ मत्स्य को अनेक मछलियों के साथ काम-क्रीडा में आसक्त देखा और उनके मन में भी विवाहित जीवन की आकांक्षा जगी। मुनि सम्राट् मान्धता के पास पहुंचे और उनकी पचास कन्याओं में से एक के साथ विवाह की आकांक्षा व्यक्त की। मान्धाता तो उस अस्सी वर्ष के वृद्ध मुनि का न निषेध कर सके और न स्वीकार ही किया। किसी प्रकार उन्होंने सुझाया कि यदि कन्याओं में से कोई उन्हें पति के रूप में चुन लेती है तो उन्हें (सम्राट् को) कोई आपत्ति न होगी। मुनि ने राजा के अन्तःपुर में प्रवेश करते हुए, अपनी अद्भुत कायव्यूह की शक्ति से नवयुवक राजकुमार का रूप धारण कर लिया। फलतः उनके सौन्दर्य पर गुग्ध होकर सम्राट् की सभी कन्याओं ने एक ही साथ उनसे विवाह कर लिया। दिव्यशक्ति के बल पर राजभवनरूप में परिणत आश्रम में मुनि उन्हें ले आये। उनका गृहस्थ जीवन आरम्भ हुआ। समयानुसार प्रत्येक पत्नी से उनके तीन-तीन पुत्र हुए और पौत्रों का भी क्रम चला। परन्तु सौभरि ने अपनी आकाक्षाओं को पूरी होते हुए नहीं अनुभव किया। अन्त में उन्होंने गृहस्थ जीवन का परित्याग कर दिया। आरम्भ में तो उनकीआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास पत्नियों ने आपत्ति की, किन्तु सौभरि के द्वारा तत्त्व-ज्ञान का उपदेश पा कर वे भी सब कुछ छोड़कर वानप्रस्थ जीवन बिताने लगी। कवि ने भारतीय आदर्श एवं दर्शन को इस कथानक के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भाग्य के चक्र के अनुसार जीवन परिवर्तित होता रहता है, जैसा कि पूर्व कर्मानुसार सौभरि मार्ग से हट कर पुनः सही मार्ग पर आ जाते हैं। इस कथ्य को कवि ने आधुनिक जीवन के लिए भी प्रसंगिक माना है। कवि के अनुसार, जीवन एक मात्र सर्वोत्तम पाठशाला है, स्वानुभव एक मात्र सर्वोत्तम गुरु है तथा भाग्य एकमात्र सर्वश्रेष्ठ विधान है, यही इस महाकाव्य का सन्देश है। कवि कालिदास के मार्ग पर चलकर “क्वाहं मन्दमतिः क्व काव्यरचनाशास्त्रम्बुधिदुस्तरः” द्वारा अपना विनय प्रकाशित करते हुए मूल कथा का आरम्भ करता है और अधिकतर संस्कृत के बड़े छन्दों, स्रग्धरा, शार्दूलविक्रीडित आदि का आश्रयण करता है। कवि की प्रतिभा कहीं स्त्रोत्र में, कहीं मान्धाता के प्रासाद के वर्णन में और अधिकतर यड्लुइन्त धातु-रूपों के प्रयोग में आकलनीय है। स्थान-स्थान पर कवि ने यङ्लुङ्न्त धातुओं के प्रयोग में अपनी विशेषकाव्य निर्माण क्षमता दिखायी है। उदाहरणार्थ यह पद्य आकलनीय है वन्देऽहं मन्त्रमूर्ति प्रणतहृदयगो यस्तमो दन्दहीता च्छूद्धां मे तन्तनीताद् रसिकहृदयगो देदवीतात् स्वधाम्ना। ते कृष्णं तोष्टवीमो मधुरगुणमयीं मालिकां जानथीमः पूजार्थं नन्नमीमो हृदयनिधिहितं माधवं पोपुषीमः । ४२३ (मन्त्रमूर्ति उस कृष्ण की मैं वन्दना करता हूं, जो प्रणत जनों के हृदय में रहता है, जो मेरे तम को नष्ट करता है, मेरी श्रद्धा को बढ़ाता है, रसिक के हृदय में बैठा जो अपने प्रकाश से प्रकाशित है उसकी हम स्तुति करते हैं, मधुर गुणों वाली माला को उस के लिए गृथते हैं, उसे प्रणाम करते हैं, हृदय में निहित उस माधव को पुष्ट करते हैं। शान्त रस प्रधान इस महाकाव्य में प्रसङ्गानुसार शृङ्गार आदि रसों को भी अभिव्यक्ति मिली है। एक अप्रख्यात प्राचीन पात्र और कथावस्तु को लेकर कवि ने महाकाव्य के क्षेत्र में एक नये आयाम का उद्घाटन किया है। सौभरि के मन में जो नाना अतद्वन्द्व उत्पन्न होते हैं उनके चित्रण से कवि की यह रचना आकलनीय कोटि की बन पड़ी है।

सुबोधचन्द्र पन्त (उत्तर प्रदेश, १९३४)

कवि पन्त ने आरम्भ में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी और बाद में प्रयाग के गङ्गानाथ केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ तथा राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान (नयी दिल्ली) के कार्यालयों में अधिकारी के रूप में सेवा की। २२ सर्गों में लिखित इनका ‘झांसीश्वरीचरित’ महाकाव्य गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, प्रयाग से १६७E में प्रकाशित हुआ। ‘झांसीश्वरीचरितम्’ के रचनाकार श्रीपन्त एक सहज महाकाव्य कविहदय हैं। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८३५-५८) का नाम अमर है। कवि पन्त ने उन्हें देवी दुर्गा के अवतार के रूप में चित्रित किया है दुर्गव नारीजन इत्यवोचल्लोकस्य नेत्रे उदमीमिलच्च। यद् विस्मितोऽभूद् बत विस्मयोऽपि चक्ने समस्तं तददृष्टपूर्वम् ।। १/२७ (यह कन्या दुर्गा जैसी है, ऐसा नारियों ने कहा। उस बालिका ने लोगों के नेत्र खोल दिये, यहां तक कि विस्मय भी विस्मित हुआ, सब कुछ अदृष्टपूर्व घटित हुआ)। इस महनीय ऐतिहासिक चरित्र पर लिखित इस महाकाव्य में कवि ने वर्णनों को महत्व न देकर कथा प्रवाह को आद्योपान्त गतिशील रखा है और विषय, प्रसंग के अनुकूल भाषा का प्रयोग एवं छन्दोयोजना को प्रश्रय दिया है। इस कारण यह पठनीय कृति बन पड़ी है। सम्पूर्ण रचना अपने विषय के अनुरूप कवि की उदात्त भावना एवं स्वदेशप्रेम से उल्लसित है। हिन्दी आदि समकालीन साहित्य में भी झांसी की रानी पर अनेक गीत एवं उपन्यास आदि लिखे गये, किन्तु प्रस्तुत संस्कृत रचना का एक अलग ही महत्त्व है। निश्चय ही कवि ने जानबूझ कर अलंकार संयोजन आदि में प्रयास नहीं किया है, फिर भी यत्र-तत्र उत्प्रेक्षा की झड़ी सी लगा दी है। इसके अन्य पात्रों के चरित्र चित्रण में भी कवि को सफलता मिली है। अन्त में वह संग्राम में शहीद हुई उस वीराङ्गना को सम्बोधित करके कहता है देहं सारं रुधिरममितं सेचनं सम्प्रदाय यं हे देवि प्रयतनशतैर्वर्धयामासिथ त्वम्। अत्युच्छ्रायः स्मृति सततं मुक्तिवृक्षः स एव स्वीयैरौः सुजनहृदयं का कथा पुष्करस्य ।। २२/२१ यह रचना उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा पुरस्कृत की गई।

विद्याधर शास्त्री (राजस्थान, १९०१)

अनेक छोटी बड़ी वैविध्यपूर्ण संस्कृत रचनाओं के निर्माण से संस्कृत क्षेत्र में प्रतिष्ठित कविवर शास्त्री का एक विशेष स्थान है। राजस्थान साहित्य अकादमी ने इनकी कुछ रचनाओं का संग्रह “विद्याधरग्रन्थावली (१८७७) के नाम से प्रकाशित किया है। शास्त्री जी एक और अपनी महनीय परम्परा से जुड़े हैं तो दूसरी और नये युग के विचारों को बेहिचक आत्मसात् करते हुए प्रतीत होते हैं। “नवोत्साहो नवों भावो नवा दृष्टिर्नवा कृतिः” की भावना से निर्माण में प्रवृत्त कविवर शास्त्री आधुनिक संस्कृत कवियों में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं। इनका ‘हरनामामृतम्’ (संस्कृतजीवनम् नाम की काच्यावली का एक अंग) महाकाव्य १६ सर्गों में विभक्त है तथा पितामह पं. हरनाम दत्त के जीवन-चरित पर आधारित है। एक व्यक्ति के जीवन-चरित पर लिखित होने पर भी इस रचना को कवि ने एक बड़ा सांस्कृतिक आयाम दिया है। कवि की भाषा सहज प्रवाहमय एवं प्रसादगुणयुक्त है। कवित्व के प्रदर्शन की ओर से कवि आद्योपान्त निरपेक्ष प्रतीत होता है। कवि के मन में ‘नवीन’ के प्रति कुछ अतिरिक्त आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास युग-बोध का स्पर्श था, जो उसे लेखन के लिए प्रवृत्त करता था प्रतिक्षणं यत्र मतिर्नवीना गतिर्नवीनैव च यत्र नित्यम्। कथं न तस्मिन् नवमस्तु काव्यं युगे युगे नव्यविमर्शशीले ।। १/१३ (जिस युग में प्रतिक्षण मति नवीन है और गति तो नवीन ही है, फिर नये के विमर्श में परायण उस प्रत्येक युग में काव्य क्यों न नया हो) कवि यह स्पष्ट कर देता है कि अपने कुल की प्रशस्ति उसे अभीष्ट नहीं है, प्रत्युत उसके माध्यम से सत्य के प्रकाश का यह निमित्त मात्र है (१/३५)। अपने मरुदेश (राजस्थान) के प्रति कवि के मन की अपार आस्था व्यक्त हुई है। वह एक ओर उसके सौन्दर्य का वर्णन करता है तो दूसरी ओर उसमें दुर्भिक्षजन्य दुःस्थिति का भी चित्रण करता है सशीतलो गन्धवहः समीरः स तित्तिराणां मधुरो विरायः। तन्नर्तनं बर्हविभूषणानां समुत्प्लुतिः सा च कुरङ्गमाणाम् ।। ७/२७ (वह शीतल गन्धवह पवन, वह तीतरों की मधुर आवाज, मोरों का वह नर्तन तथा हिरणों का वह फुदकना। विदलस्य तरोरधस्तले रवितापे न भृशम्प्रतापिताः। बिहगा विकला हि निश्चलाः कठिनं हा कथमुच्छ्वसन्ति ते।। ६/५ (पत्ते से रहित पेड़ के नीचे, सूर्य के ताप से अत्यन्त तापित, विकल पक्षी निश्चल पड़े, हाय कठिनाई से उच्छ्वास ले रहे हैं।) कवि का विश्वमानवीयम् (महाकाव्य) नौ सर्गों में विभक्त है। कवि ने इसे महाकाव्य या खकाव्य की विधा में नहीं रखा है। कथा नेयं न वा काव्यं ममेयं काऽपि हृज्झरी ।।/५० (यह न कोई कथा है और न ही कोई मेरा यह काव्य है, प्रत्युत यह मेरे हृदय का झरना है। इस काव्य में चन्द्रमा पर मानव के पदार्पण और वैज्ञानिक परीक्षण से प्रभावित कवि ने एक प्रकार से सचेत किया है। न हि कदापि महीतलवासिनामहितमाचरितं शशिना क्वचित् । यदधुना मनुजैः कृतघातकैरयमपि क्रियतां क्षतविक्षतः।। ६/१७ (कभी चन्द्रमा ने कहीं पृथ्वीतल के निवासियों का कोई अहित नहीं किया है जो कि कृतज्ञतारहित मनुष्यों द्वारा वह क्षत-विक्षत किया जाय।) अन्त में कवि मानवीय विभूति के प्रति अपनी प्रगाढ आस्था व्यक्त करता है और एक निर्णय देता है महाकाव्य तन्मानवाभ्युदय एवं सदैव कार्यः कार्या न चात्मगतयः क्वचनापि मन्दाः। उच्चैर्हि मानवमनोबलमत्र नित्यं साध्यस्य सिद्धिमखिलां नियतामुपैति।। (अतः, मानव का अभ्युदय ही यहां सदा करना चाहिए, कहीं पर भी अपनी गति मन्द नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऊंचा मानव-मन का बल साध्य की अखित तथा नियत सिद्धि को प्राप्त कर लेता है)। भले ही यह कवि की दृष्टि में महाकाव्य आदि किसी विथा में रखा जाने वाला काव्य न हो तथापि मानव मात्र के प्रति उदात्त दृष्टि देने वाले इस महत् काव्य को महाकाव्य कहने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

पी. सी. देवस्य (केरल, १९०९)

इस कवि ने ‘क्रिस्तुभागवतम्’ नाम से ईसा मसीह के जीवन पर ३३ सर्गों में महाकाव्य की रचना की है, जो जयभारतम्, त्रिवेन्द्रम, केरल से १६७७ में प्रकाशित हुआ है। कवि की यह रचना “साहित्य आकादेमी” दिल्ली द्वारा पुरस्कृत है। कवि को महान् ईसामसीह के बलिदान ने काव्य रचना की और कुछ उसी प्रकार प्रेरित किया जिस प्रकार कौञ्चवध की घटना ने महर्षि वाल्मीकि को रामायण लिखने के लिए प्रेरित किया था द्रुमस्थितक्रौञ्चनिषूदनव्यथा व्यधात्पुरा व्याधमुनि महाकविम्। अजात्मजस्यात्मबलेरनुस्मृतिः सुचेतसं कं न कविं करिष्यति ।। १/२ (बहुत पहले वृक्ष पर स्थित क्रौञ्च पक्षी के वध से उत्पन्न व्यथा ने व्याधमुनि वाल्मीकि को महाकवि बना दिया तो कन्या-पुत्र येशु के आत्मबलिदान की अनुस्मृति किस सुचेतस् व्यक्ति को कवि नहीं बनाएगी)। कवि का यह सहज विनय ही है जिससे कवि ने कवि के पद की उपलब्धि के लिए मानवता के महान उपकारक ईसा मसीह के सुचरित को आधार बनाया है और साथ ही, आधुनिक संस्कृत साहित्य को एक नया तथा प्रतिष्ठित आयाम दिया है। भारतीय साहित्यकार सत्य का सदा से अनुसन्धाता रहा है। वह सत्य चाहे धर्म के स्रोत से उपलब्ध हो अथवा विभिन्न देशों के नाना दार्शनिक विचारकों के माध्यम से, उसके प्रति यहां एक सहज आकर्षण रहा है। भारत ने एक और अपनी महनीय सत्यानुभूति के बल पर अपने को ‘जगद्गुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित करने की गरिमा पायी तो दूसरी ओर, अन्य स्त्रोतों से प्राप्त होने वाले सत्य की ओर से किञ्चिन्मात्र भी मुंह नहीं मोड़ा, उसका हृदय से स्वागत किया। यह रचनाकार उसी भारतीय उदात्त भावभूमि पर प्रतिष्ठित है। ‘क्रिस्तुभागवतम्’ एक ‘महाकाव्य’ की पूर्ण भूमि पर आधारित रचना है, क्योंकि इसमें अभिव्यक्त जीवन अपने घनत्व, प्रतीकत्व एवं विराट रूप, इन तीनों गुणों से समुच्छलित है। कवि में कथानक को सुसम्बद्ध करके वैदर्भी से सम्पोषित भाषा में प्रस्तुत करने की भी एक अलग क्षमता है। यथास्थान प्रभु येशु के अमृतमय उपदेशों का नियोजन भी ग्रन्थ को आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास आकलनीय बना देता है। जैसे १८ वें सर्ग में २,३,६,७,८,६ तथा २३ वें श्लोक में कवि ने “क्रूश” पर चढ़े येशु के उसी वचन को अनूदित किया है। कुशमारोपितो येशर्ययाचे तात मर्षय। तेषां दोषान् न जानन्ति यत्ते कुर्वन्त्यविद्यया ।। ३१/३० (सूली पर चढ़ाये गये येशु ने प्रार्थना की-हे प्रभो, इन्हें क्षमा प्रदान करना, क्योंकि अविद्या के कारण ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। उनके स्वार्गारोण को इन शब्दों में कवि प्रस्तुत करता है अनुज्झितनराकृतिः सपदि येशुदेवः स्वयं स्वशिष्यनिकटात पृथग् भवति चोर्ध्वनेत्राम्बुजः। प्रसारितकरः समुत्पतति नाकलोकोन्मुखो वलाहकपटः क्षणादपहरत्युमुं दृक्पथात् ।। ३३/३१ (जिन्होंने अपने मनुष्याकार को नहीं छोड़ा ऐसे ऊपर उठे नेत्रकमलों वाले येशुदेव शीघ्र स्वयं अपने शिष्य के समीप से हट जाते हैं और स्वर्गलोक की ओर हाथ फैलाये उठ जाते हैं, मेघ का वस्त्र पहने कोई उन्हें दृष्टि-पथ से क्षणभर में अपहरण कर लेता है।)

कालिकाप्रसाद शुक्ल (उत्तर-प्रदेश, १९२१)

कुशीनगर के निकट मठिया ग्राम में उत्पन्न कवि शुक्ल सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में व्याकरण विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए। उनका १३ सर्गों मे रचित ‘राधाचरित’ महाकाव्य (१९८५) कवि के रचनाशिल्प की प्रौढि की परिचायक कृति है। कवि को इसके निर्माण के कारण साहित्य-अकादमी (दिल्ली) का पुरस्कार भी मिल चुका है। कवि की दृष्टि ‘राधा’ के प्रति प्राचीन वैष्णव परम्परानुगत होने के कारण अतिशय भक्तिपरक हो गयी है। आज की आधुनिक साहित्य-चेतना की अभिव्यक्ति ढूढ़ने वाले को इस रचना से कुछ निराशा अवश्य हो सकती है। किन्तु पञ्चमसर्ग में आये शिशिर ऋतु के वर्णन के पद्य कवि के प्रति किञ्चित् अतिरिक्त आकर्षण उत्पन्न करते हैं। - शिशिरशिशिरवातबाणविद्धा अपि हलिनः शतपर्णसर्ववस्त्राः। निखिलनिशि पलालजालतल्पा असुमिव सस्यमवन्ति वहिनसाध्याः।। ५/५७ (शिशिर काल की ठंडी हवा के बाण से विधे छितवन के पत्ते पहने, पुआल के तल्प पर सारी रात सोने वाले, एक मात्र अग्नि के साधन वाले किसान प्राणों की भांति सस्य-सम्पदा की रक्षा करते हैं।) स्व. शुक्ल जी ने भगवान् आदित्य पर एक स्तोत्र काव्य की भी रचना ‘भास्करभावभानवः’ नाम से की है जो उनके प्रौढ कवित्व को उजागर करती है। यद्यपि कवि मूलतः वैयाकरण महाकाव्य है तथापि उसका हृदय भक्तिभाव से उल्लसित है, जिसकी अनुभूति उसके प्रत्येक पद से होती है। कवि की ‘राधा’ के विषय में यह आर्या अत्यन्त मोहक है धन्यं वृन्दाविपिनं कदम्बलवलीनिकुञ्जनिचितान्तम् । यस्मिस्तमालमाले नृत्यति बाधाहरा राधा।। ६/१ (कदम्ब की लताओं के निकुन्ज से व्याप्त वृन्दावन धन्य है, तमाल से घिरे जिसमें बाधा दूर करने वाली राधा नृत्य करती है।) एक आलोचक का कहना है ….“कवि अपने चरित्रों को दिवकालानवच्छिन्न गोलोक से ज्यों-त्यों मध्यकाल तक ले आ पाया है। रचना आज की होकर नहीं सम्प्रेषित होती, कवि ने कोशिश ही नहीं की है। अन्यथा भाषा और शिल्प की समर्थता उसका यथेच्छ साथ देती लगती है।”

जग्गू बकुलभूषण (जग्गू अलवार अयंगार) (कर्णाटक १९०२-१९९३)

संस्कृत में कई दशकों से लेखन में प्रवृत्त श्री बकुलभूषण का १५ सर्गों का ‘अद्भुतदूतम्’ महाकाव्य १६६८ में प्रकाशित हुआ। इसके साथ रत्नप्रभा नाम की संस्कृत व्याख्या भी प्रकाशित है। कवि ने महाभारत के उद्योग पर्व की मूल कथा, जिसमें श्री कृष्ण पाण्डवों के दूत बन कर कौरवों की सभा में जाते हैं, को आधार बनाया है। बकुलभूषण ने साहित्य की अनेक विधाओं गद्यकाव्य, चम्पू, नाटक, गीत तथा स्त्रोत्र में रचना की। किन्तु इनकी सर्वतोभावेन अभिनंद्य रचना अद्भुतदूतम् है। कवि ने श्रीकृष्ण को एक मानव रूप में चित्रित न करके “अवतार” के रूप में चित्रित किया है और यह बात सम्पूर्ण रचना में ही अभिव्यक्त होती है। कवि की दृढ मान्यता है कि स्वयं पाण्डवदूत उन भगवान् (श्रीकृष्ण) ने अपने को इस कैकर्य में लगाते हुए, उसकी सरस एवं सफल रचना को भगवच्चरणकमलमधुस्पन्दसन्दोह से समाप्लावित (करके) यथार्थ रूप से इसे बनाया है-दिखें, ग्रन्थकुर्तुविज्ञापनम्)। कवि ने आद्योपान्त पठनीय इस रचना को सब ओर से एक व्यवस्थित रूप दिया है। वह ‘महाकाव्य” लेखन की परम्परागत मान्यता का अनुसरण भी करता है। श्रीकृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर कौरवों की सभा में जाते हैं, किन्तु उनका “रोल” एक राजदूत का नहीं, प्रत्युत एक भयंकर युद्ध को रोकने के लिए एक प्रकार का, दैवी चेतना की ओर से प्रयास है। श्रीकृष्ण अपने अग्रज बलराम के साथ आकर पाण्डवों से मिलते हैं। विराट् नगर में तेरहवें वर्ष के अज्ञातवास की पूर्ति के लिए द्रोपदी के साथ पाण्डव निवास कर रहे थे। अभिमन्यु का विवाह हो चुका था। पाण्डवों के मन में युद्ध की भावना भड़क रही थी। वे उपप्लव्य नाम के स्थान पर आ गये थे। वहीं श्रीकृष्ण और बलराम पहुंचते हैं। धर्मराज उनके बाल्यकाल के कृत्यों की चर्चा करते हुए उनका स्वागत करते हैं और प्रजावर्ग में क्षोभ की सम्भावना की कामना करते हैं। युद्ध की विभीषिका या परिणति की चर्चा करते हैं। दोनों की सन्धि में ही वे कल्याण समझते हैं और बड़ी विनम्रता के साथ ६० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास दौत्य के लिए प्रार्थना करते हैं। श्रीबलराम, भीम और अर्जुन धर्मराज युधिष्ठर के प्रस्ताव का समर्थन करते हैं। किन्तु द्रोपदी की मनःस्थिति भिन्न है। अब श्रीकृष्ण उसे सान्त्वना देते। हैं। अन्त में वह भी यह कहती है निजावतारं सफलीकुरुष्व विनाश्य पापान परिपाल्य साधून्। (पापियों को नष्ट कर तथा साधुजनों की रक्षा करके अपने अवतार को सफल करो) तत्पश्चात् कवि ने श्रीकृष्ण की हस्तिनापुर की यात्रा का वर्णन किया है। मार्ग में श्रीकृष्ण समाज के सामान्यजनों से मिलते हुए जाते हैं। उनके गोप वृद्धों से मिलन के प्रसंग को कवि ने लिखा हैयङ्गवीननवनीतपयोमधूनि प्रीत्याऽर्पितानि परिभुज्य स गौपवृद्धैः। बाल्ये व्रजे विरचितं निजचौर्यमुक्त्वा तेभ्यो जगाद सुलभान्यधुनेति कृष्णः।। ४/३८ (बूढे ग्वालों द्वारा अर्पित मक्खन, दूध और शहद को ग्रहण कर श्रीकृष्ण ने उनसे अपने बाल्यकाल में ब्रज में अपने चौर्यकर्म की बात बतायी और पूछा कि अब उन्हें वे पदार्थ सुलभ है।) हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र ने अपने सभासदों को बुलाकर श्रीकृष्ण के स्वागत के आयोजन के लिए तैयारी करने का आदेश दिया। तब कर्ण की प्रेरणा से दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की खिल्ली उड़ायी, किन्तु श्रीविदुर उसका प्रत्याख्यान करते हैं। कवि में वर्णन-प्रतिभा के साथ उक्ति-प्रत्युक्ति के घटन की भी अद्भुत क्षमता लक्षित होती है। अनुकूल छन्दोयोजना के साथ शब्द-चयन में भी बहुत सहजता और गुम्फनवैचित्र्य प्रतीत होता है। सम्पूर्ण महाकाव्य में श्रीकृष्ण का साक्षातू नारायणस्वरूप लक्षित कराने की ओर कवि का विशेष आग्रह है। साथ ही उनका शान्तिदूत का स्वरूप आज युद्ध की विभीषका से ग्रस्त विश्च में देशों-महादेशों के बीच दूतों को भेजकर चलने वाले शान्ति-प्रयास का भी संकेत इस महाकाव्य को एक आधुनिक पृष्ठभूमि प्रदान करता है। यह रचना जहां एक ओर भारतीय परम्परा के अनुगमन का सन्देश देती है तो वहाँ दूसरी ओर युद्धों के निवारणार्थ होने वाले शान्ति के प्रयासों के औचित्य का भी समर्थन करती है। जब बहुत धन व्यय करके सम्पादित स्वागत-समारोह के अवसर पर दुर्योधन श्रीकृष्ण को भोजन के लिए आमन्त्रित करता है तब श्रीकृष्ण “ननु भक्तिरसैकपूर्ण-कुम्भस्मरणेनैव घरेश तृप्तिमीयाम् (भक्ति रस से भरे कुम्भ का स्मरण करके ही मैं तृप्त हो चुका हूँ।) कहकर अस्वीकार कर देते हैं और सात्यकि के साथ श्रीविदुर के यहां चले आते हैं। पुनः धृतराष्ट्र की प्रेरणा से दुर्योधन श्रीकृष्ण को सभा में उपस्थित होने के लिए आग्रह करके लाता है। सभा में श्रीकृष्ण इस पद्य से अपनी बात आरम्भ करते हैं यस्य चित्ते स्थिरो धर्मः शान्तिश्च वसति स्थिरा। महाकाव्य संग्रहीष्यति मे वाचं साधु नान्यः कथञ्चन ।। १३/२ (जिसके चित्त में धर्म है और स्थिर होकर शान्ति निवास करती है वह मेरी बात ठीक से मानेगा, किसी प्रकार दूसरा नहीं।) श्रीकृष्ण की बातें दुर्योधन को अच्छी नहीं लगीं। वह सभा से कुपित होकर निकल जाता है। उसके पीछे दुःशासन और शकुनि भी चले जाते हैं। कर्ण की मन्त्रणा से पुनः वह आ जाता है। यहां कवि ने दुर्योधन पर कुपित सात्यकि (युयुधान) को कृष्ण द्वारा इन शब्दों में रोके जाने की बात कही सम्भ्रम एष तवाद्य किमर्थं फेरुवधाय हरेः किमु यत्नः। (यह तुम्हारी हड़बड़ाहट किस लिये हैं? क्या सिंह का स्यार के वध के लिए यत्न होता है?) यह वचन माघकवि के शिशुपालवध के १६ वें सर्ग के इस पद्य को सहज ही स्मृतिपथ पर ला देता है प्रतिवाचमदत्त केशवः शपमानाय न चेदिभूभुजे। अनुहुङ्कुरुते घनघ्वनिं न हि गोमायुरुतानि केसरी।। (अपशब्द कह रहे चेदिराज शिशुपाल को श्रीकृष्ण ने उत्तर नहीं दिया, क्योंकि सिंह मेघ के गर्जन का उत्तर अनुगर्जन द्वारा देता है, न कि स्थार की बोलियों का।) अन्तिम सर्ग में अपने दौत्यकर्म की विफलता के पश्चात् प्रस्थान करते हुए श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाते हुए कहा व्यालवर्गोपगूढं हि चन्दनदु सुगन्थ्यपि। जनैर्न सेव्यते भीत्या तदूरीकुरु दुर्जनम्।। (सर्प समूह से आलिङ्गित सुगन्धी भी चन्दन वृक्ष को लोग डर के मारे नहीं सेवते हैं इस लिए दुर्जन को दूर हटाओ।) किन्तु कर्ण ने सब कुछ समझ कर भी अपना हठ न छोड़ा। उसने अपने पक्ष में तर्क भी दिये। अन्त में वह कहता है यद् भव्यं तद्भवत्येव नात्र कार्या विचारणा। संकल्पं तेऽन्यथा कर्तुं शक्नुयात् क इहाच्युत।। (जो भवितव्य है वह होकर ही रहेगा, इस विषय में विचार न किया जाय। हे अच्युत, कौन है जो आपके संकल्प के झुठला सके।) श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के पास आ जाते हैं। यदि मैं अतिशयोक्ति नहीं करता हूँ, श्रीबकुलभूषण की इस रचना को प्राचीन महाकवियों की कालजयी रचनाओं के साथ यदि तुलना में रखा जाय तो इसका पक्ष किसी प्रकार हल्का नहीं होगा। इस महान् रचनाकार की गद्य कथा ‘जयन्तिका’ साहित्यअकादेमी (नई दिल्ली) द्वारा पुरस्कृत हुई। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास

प्रभुदत्त शास्त्री (राजस्थान, १८९२-१९७२)

अलवर जनपद के ततारपुर ग्राम में उत्पन्न शास्त्री जी ने दिल्ली में अध्यापन किया और वर्तमान शताब्दी के सातवें दशक में, ‘गणपतिसम्भव महाकाव्य’ (१९६८) की रचना की। दस सों में रचित इस महाकाव्य में उन्होंने आद्योपान्त केवल शार्दूलविक्रीडित छन्द का उपयोग किया है, किन्तु सर्गान्त में छन्द बदल दिये हैं। कालिदास की रचना “कुमारसम्भव” जो भगवान् शिव के छोटे पुत्र कुमार (कार्तिकेय) पर आधारित है जबकि प्रस्तुत रचना “गणपतिसम्भव” शिव के बड़े पुत्र गणपति पर। कवि के अनुसार, कुमार कार्तिकेय की प्रसिद्धि तो कम लोगों तक है, किन्तु गणपति को आबालवृद्ध, सभी लोग यहां तक कि हल चलाने वाला कृषक का बालक भी जानता है, ऐसे प्रसिद्ध गणपति के पौराणिक आख्यान को आधार बनाकर रचित यह महाकाव्य कविवर शास्त्री जी का अनूठा प्रयास हैं, क्योंकि इसके कथानक की संरचना में उन्होंने अपनी कल्पना-शक्ति का पूरा अपयोग करके परिवर्थन और परिवर्तन किये हैं। कथानक से सभी पात्र अपने आपमें दिव्य होते हुए भी यहां प्रतीक रूप में चित्रित हैं, जैसे गणेश, राष्ट्र की रक्षा के लिए शिर कट जाने पर भी जीवित रहने वाले आदर्श नायक हैं, पार्वती भारतमाता हैं तथा शिव राष्ट्र आदि के कठोर परीक्षक । सम्पूर्ण रचना में भारत की आध्यत्मिकता, योग तथा राष्ट्रीय भक्ति-धारा उन्मीलित हैं। जाली प्रथम सर्ग में हिमालय का वर्णन है जो कवि की अपनी अनुरूप कल्पनाशक्ति एवं राष्ट्रभक्ति का परिचायक है। सम्पूर्ण हिमालय को एक विष्णु के पाञ्जजन्य शंख के रूप में कवि ने वर्णित किया गया है, जो मोहक एवं चमत्कारी है जृम्भारम्भिमृगेन्द्रदन्तकिरणैर्बाभाति दान्तुर्यवान् अङ्गुष्ठाङ्गुलिचिह्नवानिव च वा तत्पादजैलाञ्छनैः। भब् भब् भब् ध्वनिभिगुहानिलभवैस्तच्छब्दकारीव यो विष्णोरेष स पाञ्जन्यपदवान् शङ्खः सितोऽदीश्वरः।। १/१४ (यह उज्ज्वल हिमालय विष्णु के पाञ्चजन्य जैसा लगता है, क्योंकि उस हिमालय जैसे शंख में जंभा आरम्भ करने वाले सिंह के दांतों की किरणों से निचाई-ऊचाई आ गयी है, उस हिमालय के प्रान्त-देश के लाञ्छनों से वह (शंख) अंगूठे तथा उगलियों के चिहनों वाला है तथा गुहाओं के पवन की भव-भव ध्वनियों से शब्द कर रहा है।) हिमालय का ऐसा प्रशस्त वर्णन सम्भवतः कालिदास के बाद दूसरा कहा जा सकता है। इसी प्रकार हिमालय के राष्ट्रध्वज (तिरंगे झंडे) के रूप में चित्रण भी सुन्दर है। (१/३६)। द्वितीय सर्ग में शिव-पार्वती का विवाह वर्णित है। कवि वर्णनों में आधुनिक सामग्री का ही नहीं उपयोग करता, बल्कि आधुनिक लोकोक्तियों का भी। सामयिक परिस्थिति को प्रायः सूचित करके उसने अपनी कवित्व प्रतिभा का परिचय दिया है। इस महाकाव्य के सम्बन्ध में डा. रहसबिहारी द्विवेदी का यह कथन बहुत ठीक है-‘गणपतिसम्भवस्य पात्राणामुद्घोषे भारतराष्ट्रस्य जयघोषः श्रूयते, तेषां शक्ती भारतीययोगस्य महाकाव्य योगो दृश्यते, तेषां गाने भारतस्य राष्ट्रगीतमनुगीयते, तेषां स्वरूपे भारतीयाया जनताया आदर्शरूपमवलोक्यते, तेषां कार्येषु देवानामलौकिकता विद्यते, तेषामवलोकने आहिमालयात कन्याकुमारी यावत, भारतस्य वीरभोग्या वसुन्धरा दृग्गोचरीभवति, तेषामाचरणे धर्मशास्त्रस्य शासनं प्रतिफलितमिव दृश्यते। (अर्वाचीनसंस्कृतमहाकाव्यानुशीलनम्, पृ. २,३) (गणपतिसम्भव के पात्रों के उद्घोष में भारत-राष्ट्र का उद्घोष सुन पड़ रहा है, उनकी शक्ति में भारतीय योग का योग दिखता है, उनके गान में भारत का राष्ट्रगीत अनुगीत होता है, उनके स्वरूप में भारतीय जनता का स्वरूप लक्षित होता है, उनके कार्यों में देवताओं की अलौकिकता है, उनके अवलोकन में हिमालय से कन्याकुमारी तक भारत की वीरभोग्या वसुन्धरा दृष्टिगोचर होती है, उनके आचरण में धर्मशास्त्र का शासन प्रतिफलित जैसा दिखता है।) माता की आज्ञा से उसकी रक्षा में द्वार पर बैठा बालक गणपति शिव से जिस भाषा में व्यवहार करता है वह मातभूमि की रक्षा में तत्पर प्रत्येक भारतीय बालक की वाणी बन कर प्रस्फुटित हुआ है। वह अन्त में यहां तक कह देता है सुच्छेदो मम मस्तकस्तु भवता तीक्ष्णत्रिशूलिंस्त्वया दुश्छेदं मयका तु मातृवचनाख्यं मातृभूवद्धनम् ।। ४/२१ (हे तीक्ष्ण त्रिशूल वाले, आप मेरा मस्तक आसानी के काट सकते हैं, किन्तु मेरे मातृवचन रूप मातृभूमि के धन को नहीं नष्ट कर सकते।) जिस प्रकार श्रीमद्भागवत” में श्रीकृष्णभक्ति का स्वाद पद-पद में अनुभूत होता है (स्वादु स्वादु पदे पदे) ठीक उसी प्रकार ‘गणपतिसम्भव’ महाकाव्य में राष्ट्रभक्ति या स्वदेश प्रेम व्यजित हुआ है। इस अंश में यह रचना निःसन्देह आधुनिक संस्कृत साहित्य में विशेष स्थान की अधिकारिणी बन पड़ी है। जो बात विशेष रूप से पढ़ने वालों को इसमें व्याकुल करती है वह है, काव्यभाषा की विसंष्ठुलता और यत्र-तत्र छन्द के दोष। साथ ही सम्पूर्ण महाकाव्य में एक ही शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग भी खटकता है। इसमें एक छन्द का प्रयोग करके कवि ने महाकाव्य के परम्परागत लक्षण की उपेक्षा की है, किन्तु इसे दोष के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

  • किसी प्रसिद्ध प्राचीन (पौराणिक आख्यान का इस प्रकार राष्ट्रिय सन्दर्भो से जोड़कर नये रूप में प्रस्तुतीकरण इस रचना का सर्वतोभावेन आकलनीय पक्ष है। सबसे बड़ी बात यह है कि कवि ने किसी देवता विशेष (गणेश) के चरित्र को मात्र देवत्व की पृष्ठभूमि से ऊपर उठा कर सम्पूर्णतया राष्ट्रनायक के पद पर प्रतिष्ठित करके मानवीय भूमिका दी है और इस प्रकार उन्हें प्रत्येक भारतीय के लिए आत्मीय बना दिया है।

रामचन्द्र मिश्र (बिहार १९११)

सीतामढ़ी जिले के पकड़ी ग्राम में उत्पन्न कवि मिश्रआधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ने साहित्य के क्षेत्र में अध्यापन तथा लेखन, दोनों में प्रतिष्ठा अर्जित की। उनके द्वारा परिणत वयःकाल में निर्मित दस सों का ‘वैदेहीचरित’ महाकाव्य कामेश्वरसिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा (बिहार) से १६८५ में प्रकाशित हुआ। कवि ने इसे अपने साहित्यिक जीवन का “चरमपरिणामभूत काव्य ग्रन्थ" कहा है। कवि मिश्र ने सामान्य कथा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया है। उनका पक्षपात वैदेही के चरित को प्रस्तुत करने में है, अतः उनसे सम्बद्ध ही राम-कथा प्रसङ्ग को लेते हैं। राम का चरित उनके सामने कुछ गुणीभूत होकर रह जाता है। स्वयं कवि ने कहा भी है कि राम वृक्ष हैं और सीता लता, किन्तु सर्वत्र उसने लता पर ही दृष्टि डाली है। इसके पीछे कवि का मिथिला और मैथिली (वैदेही) के प्रति विशेष अनुराग उसकी जन्मभूमि में उत्पन्न होने के कारण भी कहा जा सकता है। इस रचना के वर्णनों में सन्तुलन है और कवि का कवित्व पक्ष पर विशेष ध्यान लक्षित होता है। सीता के शैशव के पश्चात् यौवन प्राप्त होने पर कवि ने उनके सौन्दर्य का वर्णन परम्परानुगत ढंग से अवश्य किया है किन्तु उसने परवर्ती काल के कवियों की भांति कहीं अतिरेक नहीं किया है। कहीं-कहीं उसकी भाषा अनुप्रास की छटा बिखेरती प्रतीत होती है, जैसे सीता के वर्णन-प्रसंग में अनञ्जनं खञ्जनदत्तलज्जं जगज्जयाय भृकुटीततज्यम्। तद्यौवनं किञ्चिदिवोज्जिहानं दृगञ्चलं चञ्चलयाञ्चकार ।। २/४६ (कुछ उठते हुए के यौवन ने अञ्जन से रहित, खंजन पक्षी को लज्जित करने वाले भृकुटि तक खिंचे हुए, उसके दृगञ्चल को चञ्चल बना दिया।) यत्र-तत्र उपमा और रूपक आदि अंलकारों का सन्निवेश भी बहुत हृद्य हो गया है उद्यानभूमाविव भर्तृगेहे नवेव वल्ली जलदागमेन। सिक्तेव सस्नेहमवेक्ष्यमाणा मम्लौ न सीता निजवल्लभेन।। ५/१० (उद्यानभूमि सरीखे पति-गृह में, बरसात में नयी लता की भांति सिक्त सी सीता अपने पति द्वारा देखी जा रही होकर म्लान नहीं हुई। सीता कोई सामान्य नारी नहीं हैं। वह स्वयं राम के समक्ष अग्नि में प्रवेश करके अपनी पवित्रता की परीक्षा देती हैं। दूसरी बार पति द्वारा वनवास दी जाने पर भी मन में कातर नहीं होती वीरात्मजा वीरवरस्य जाया वीरस्नुषा स्वेन हुदा च वीरा। वीरे सुते भाविनि बद्धभावा सा कातरत्वं न मनस्ययासीत्।। ८/४३ (वीर-कन्या, वीरश्रेष्ठ की पत्नी, वीर की पुत्र-वधू तथा स्वयं हृदय से वीर, और उत्पन्न होने वाले वीर पुत्र की भावना वाली वह सीता कातर नहीं हुई) महाकाव्य ६५ विदेह की उस मिथिला नगरी का वर्णन है जहां वैदेही सीता पृथ्वी के गर्भ से प्रकट हुई। अनावृष्टि के कारण प्रजा-वर्ग के कष्ट से दुःखी जनक ने हल से कर्षण करके यज्ञानुष्ठान करने की योजना बनायी। इसी अवसर पर एक बालिका हिरण्य-पात्र में रखी हुई मिलती है। वह जनक के राजभवन में पलती है और उसका विख्यात नाम सीता या वैदेही होता है। वह जब बड़ी होती है तब उसका स्वयंवर होता है और शिवके धनुष के चढ़ाने वाले को वह अर्पित की जायेगी, ऐसी प्रतिज्ञा राजा जनक करते हैं। फलतः विश्वामित्र के साथ उत्सव देखने आये दशरथ-पुत्र राम धनुष को भंग करते हैं और सीता उनके साथ ब्याही जाती है। अयोध्या में वह वधू के रूप में आती हैं। जब दशरथ ने राम को युवराज बनाना चाहा तो कैकेयी ने उसका विरोध किया, फलतः राम का वनवास होता है और सीता तथा लक्ष्मण उनके साथ आते हैं। सीता का रावण द्वारा अपहरण होता है। सुग्रीव की सेना की सहायता से राम समुद्र पार कर लंका जाते हैं और रावण का वध करके सीता के पास अशोक वाटिका में जाते हैं और सीता को रावण के मारे जाने की सूचना देते हैं। जब वह राम के चरणों में लोटने लगती हैं तब उसे राम उठा लेते हैं और जब उनका चिबुक पकड़ने के लिए उद्यत होते हैं तब वह उनसे अलग हट कर कहती हैं कि यद्यपि वह उनके (राम के) अङ्ग संस्पर्श से पवित्र हो चुकी है तथापि लङ्का में निवास के कारण कलङ्कित है अतः वह वहिन में प्रवेश करके अपनी परीक्षा दें, यह उनकी प्रार्थना है। तब वह प्रचलित अग्नि में प्रवेश करके और भी निर्मल कान्ति होकर निकल आती हैं। राम सपरिजन पुष्पक पर आरूढ़ होकर अयोध्या आ जाते हैं। राम का राज्याभिषेक होता हैं। राम का राज्य प्रवर्तित होता है। राजा जनक आते हैं। उनके आगमन से एक भिन्न पारिवारिक वातावरण बनता है। वे मिथिला चले जाते हैं। लोकापवाद के भय से राम गर्भिणी सीता को जंगल में छोड़ आने का आदेश लक्ष्मण को देते हैं। वाल्मीकि के आश्रम में सीता के दो पुत्र लव और कुश उत्पन्न होते हैं। अश्वमेध यज्ञ के प्रसंग में वाल्मीकि के दोनो शिष्य राम को रामायण गाकर सुनाते हैं। राम पुनः सीता से मिलने के लिए आश्रम में आते हैं। इसके पूर्व ही वह माता पृथ्वी से अपने को ले लेने के लिए प्रार्थना करती हैं और पृथ्वी उन्हें ले जाती हैं। स्वयंवर प्रसंग के अर्पित तृतीय सर्ग न केवल छन्दोयोजना की दृष्टि से है, बल्कि अन्त्यानुप्रास के साथ, धनुर्भङ्ग के प्रसङ्ग में सीता की शंकाकुल अन्तःस्थिति को संक्षेप में सुन्दर अभिव्यक्ति देने के कारण भी सफल कहा जा सकता है पुष्पैरिव रचिताङ्गी मध्ये वेदिवलग्ना सीता स्वसखीनिवहपरीता चिन्तामग्ना। किमयं कोमलसकलावयवो धनुर्ग्रहीता विजयश्रीः कथमिवास्य भविता करमुपनीता।। ३१ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (मानौं, पुष्पों से रचित अंगों वाली, कृश मध्यभाग वाली सीता अपनी सखियों से घिरी इस बात के लिए चिन्ताकुल हैं कि कोमल अंगों वाले यह क्या धनुष को उठा लेंगे? (कैसे विजयश्री इनके हाथ लगेगी?) कवि इस पद्य से रचना की समाप्ति करता है व्यथाकथा मूर्तिमती पतिप्राणा शुचिव्रता। घरया जनिता सीता तस्यामेव व्यलीयत ।। १०/४४ (मूर्तिमती व्यथा-कथा, पति रूप प्राण वाली, पवित्र व्रत वाली सीता पृथ्वी द्वारा उत्पन्न की गयी और उसी में विलीन हो गयी।) सामान्यतः परम्परागत भूमि पर प्रतिष्ठित होने पर भी यह रचना मन में आकर्षण उत्पन्न करती है।

निगमबोध तीर्थ (हरियाणा, १९३६)

भिवानी जिले के लुहारी जाटू ग्राम में उत्पन्न पूर्वाश्रम के आचार्य राधाकृष्ण ने भिवानी, अमृतसर और चण्डीगढ़ में अध्ययन किया। उनका विशेष अध्ययन उज्जैन और कुरुक्षेत्र में सम्पन्न हुआ। भिवानी के ब्रह्मचर्याश्रम और होशियारपुर के “संस्थान में आपने अध्यापन भी किया। अब संन्यास जीवन में प्रवृत्त हैं। आपने ‘हरियाणावैभवम्’ की रचना की। आपके द्वारा रचित १३ सर्गों का श्रीशङ्कराचार्य चरित महाकाव्य परिमल पब्लिकेशन १७/२८, शक्तिनगर, दिल्ली-७ से १६८८ में प्रकाशित हुआ। कहने की आवश्यकता नहीं कि विषय वस्तु के अनुसार यहाँ शान्त रस अभी है। कवि शङ्कराचार्य को शिव का अवतार मानता है और अपनी काव्य रचना में प्रवृत्ति को विडम्बना’ मानता है क्वासौ जगद्गुरुरहो यतिचक्रवर्ती विश्वं हि यद्रचनया चकितं बभूव । क्वाहं विवेकविकलो रचनाप्रवृत्तस्तस्मादिदं ननु ममास्ति विडम्बनेव ।। १/८ (विस्मयकारी, संन्यासियों के सम्राट जगद्गुरु कहां? क्योंकि जिनकी रचना से संसार चकित हो गया! ज्ञान से रहित, किन्तु रचना में प्रवृत्त मैं कहां? यह मेरी विडम्बना ही है। पूरी रचना में इतिवृत्तात्मकता को अधिक प्रश्रय मिला है, फिर भी कवि की भाषा में स्वाभाविकता है और अलङ्कारों के सन्निवेश के प्रति किसी प्रकार का आग्रह लक्षित नहीं होता। महाकाव्य के नायक का लक्ष्य जगत् के हित का साधन था, कवि लिखता है मुक्त्वा ममत्वं समतां विधार्य विस्मृत्य लोकं परलोकहेतोः। ततः प्रशान्तः समदर्शनोऽसौ चचाल गेहाज्जगतो हिताय।। ४/१ (तब अत्यन्त शान्त, समदर्शी ने ममता को छोड़ समता धारण करके अन्य लोगों के लिए अपने इस लोक के सुखों को भूल कर जगत् के कल्याण के लिए चल पड़े।) कवि ने प्रत्येक सर्ग का नाम कथावस्तु के आधार पर दिया है जैसे, १. शकरोत्पत्तिक २. विद्यावाप्तिक, ३. प्रवज्यानुमतिक, ४. प्रव्रज्यावाप्तिक, ५. विश्वनाथदर्शन, ६. भाष्यनिर्माण, ७. जननींदेहत्याग, ८. श्रीमण्डनमिश्रपराजय, ६. श्रीमण्डनमिश्रदीक्षा, १०. तीर्थाटन, ११. पद्मपादटीकोद्धार, १२. मठस्थापन, १३. स्वाधामगमन। कवि ने महाकाव्य शङ्कराचार्य की हिमालाय-यात्रा की चर्चा करते हुए लिखा है विहृत्य पाथोधिमहोर्मिसधैः प्रक्षालिते भारतभूमिपादे। नद्यम्बिकास्निग्धपयो निषेव्य पश्यंश्च रम्याणि तपोवनानि ।। तपोनिकायान् हिमवत्प्रदेशान् हैमैः किरीटैः परिशोभिशृङ्गान्। मुक्ताचयैर्वक्षसि निर्झराणां पयःकर्णः शोभितमानयासीत् ।। १३/३४ (सागर की बड़ी-बड़ी लहरों के समूहों द्वारा पखारे हुए भारत भूमि के चरणों वाले प्रदेश में विहार करके नदी रूपी माताओं के प्यार भरे दूध जैसे जलों का सेवन करके, रमणीय तपोवनों का दर्शन करते हुए वह हिम के मुकुटों से शोभित शिखरों वाले, वक्षःस्थल पर जल-कणों के मोतियों से अधिक शोभित हिमालय के प्रदेशों में गये) इस प्रकार कवि की दृष्टि में सम्पूर्ण भारतीय राष्ट्र और भारतीय जनता के प्रति परम आत्मीयता का भाव प्रस्तुत रचना के माध्यम से बहुत स्पष्ट प्रतीत होता है, जो उसकी नवीन काव्यभूमि का परिचायक है।

हरिहर पाण्डेय (उ.प्र.)

आजमगढ़ जिले के कुकुढ़ीपुर ग्राम के कवि पाण्डेय की रचना ‘उमोद्वाह’ महाकाव्य निर्मल प्रकाशन बी २७/३१ बी, भिनगा हाउस, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी-५ द्वारा १६८५ में प्रकाशित हुई। इसमें १६ सर्ग हैं। कवि ने आद्योपान्त एक ही छन्द, उपजाति में पूरी रचना उपनिबद्ध की है। शिव-पार्वती के विवाह के प्रसङ्ग को कवि ने एक नया और आधुनिक आयाम दिया है, जिसमें उसकी नूतन दार्शनिक दृष्टि उपनिबद्ध है। कवि के प्रस्तुतीकरण की विशेषता है उसकी यथार्थपरक दृष्टि, जो परम्परा के अनुगत न होकर आधुनिक जीवन को एक आयाम देती हुई प्रतीत होती है। लगता है कवि के उमा और महेश्वर ने यहां एक भिन्न रूप ही ग्रहणकर लिया है। उसने प्रथम सर्ग में हिमालय पर्वत को शिव का रूप दिया है और उसकी प्राकृतिक रम्यता का वर्णन किया है। हिमालय, कवि के अनुसार एक राजा है, जिनके यहां उमा का जन्म होता है। परम्परानुसार अङ्ग सौन्दर्य आदि वर्णन से विरत कवि ने उमा को तप में प्रवृत्त कर दिया है और वह शिवार्चन के लिए न तो फूलों की कलियां ही तोड़ती और न बिल्व के पत्ते ही। और नारायण की पूजा के लिए तुलसी के दल भी नहीं तोड़ती (३/३८)। कवि के एक आलोचक पं. विश्वनाथ भट्टाचार्य का कथन है-“हिमालय का शिवरूप में वर्णन कर भारत के इतिहास में हिमालय क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका का वर्णन किया है। उमानारदसंवाद और शिवनारदसंवाद जैसे प्रसंग पूर्णतः परम्परानुरागी होकर भी नाना प्रकार की मूढ़धारणाओं और निरर्थक रूढ़ियों का साहसपूर्ण तिरस्कार प्रस्तुत करते हैं। शिव को वस्तुतः महादेव सिद्ध करते हुए महाकवि ने उन्हीं के द्वारा सत्य और औचित्य का बोध कराया है।” कवि की भाषा प्राञ्जल है। आरम्भ के तीन सर्गों में पद्यों के द्वितीय और चतुर्थ चरणों को तुकान्त करने का प्रयास भी स्तुत्य हुआ है, किन्तु प्राचीन महाकाव्य के लक्षण के अनुसार सर्गान्त के पद्य को भिन्न छन्द में नहीं लिखा गया है। कवि की दृष्टि EE आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास राष्ट्रियतापरक प्रतीत होती है। जैसा कि वह हिमालय के राज्य वर्णन में लिखता है नायव्ययं राष्ट्रधनस्य चक्रे कोऽप्यम्बुविद्युद्धरणीवनादेः। नैवात्मनो व्यर्थकृतौ च नाशं चकार कालप्रतिभावनादेः।। २/२१ (जनता जल, बिजली, भूमि वन आदि राष्ट्रीय सम्पत्तियों का अपव्यय नहीं करती थी और उत्पादनहीन निरर्थक कार्यों में अपने धन, समय तथा प्रतिभा का नाश नहीं करती थी।) विचार पक्ष के प्राधान्य के कारण भाषा पर अप्रतिम अधिकार होने पर भी कवि का कवित्व पक्ष दब सा गया है, फिर भी रचना पठनीय है।

द्विजेन्द्र लाल शर्मा पुरकायस्थ (राजस्थान)

जयपुर के निवासी, दर्शनशास्त्र के अध्यापक, कवि पुरकायस्थ ने शुक्राचार्य, कच और देवयानी के प्रसिद्ध पौराणिक कथानक पर आश्रित १२ सर्गों का महाकाव्य ‘महीमहम्’ की रचना की, जिसे १६८४ में स्वयं प्रकाशित किया। कवि की अन्य संस्कृत रचनाओं में एक “अलकामिलनम्” भी है। महीमह महाकाव्य में कवि ने अपनी कल्पना को भी अनुस्यूत करके उसे एक सुन्दर कृति का रूप देने का प्रयास किया है। किसी समय स्वर्ग से मुनि अङ्गिरस् भूतल पर स्थित भृगु के निवास पर आते हैं। भृगु उनका यथोचित स्वागत करते हैं। भृगु का पुत्र आकर उन्हें प्रणिपात निवेदन करता है। अपने पुत्र के समान आयु वाले भार्गव को अङ्गिरस ने अध्यापन के लिए अपने साथ रखने की बात की । भृगु ने प्रसन्नता से अनुमति प्रदान की। स्वर्ग में गुरु के आश्रम में भार्गव बृहस्पति के मित्र होकर अध्ययन करने लगे। जब अङ्गिरस् ने अध्ययन में भार्गव को अपने पुत्र से अधिक सफल अनुभव किया तब उनके मन में असूया का भाव उत्पन्न हुआ। फलतः उनके व्यवहार में अन्तर आ गया। भार्गव (शुक्र) को अन्य कार्यों में व्याप्त करके अपने पुत्र बृहस्पति को एकान्त में पढ़ाने लगे। अन्त में शुक्र गुरु का छल समझ गया। वह उन्हें छोड़कर अन्य गुरु की खोज में निकल गया। ब्रह्माजी के निर्देशानुसार, उसने तप करके विद्या के दाता शिव को प्रसन्न किया। शिव ने उसे सञ्जीवनी विद्या का मन्त्र दे दिया। उस विद्या के प्रभाव से शुक्र के स्पर्श से ऊपर भूमि भी जलाई होकर उर्बर हो जाती। इसी बीच दैत्यों के अधिपति ने उनका (दैत्यों का) गुरु बनने के लिए दूत द्वारा बुला भेजा, किन्तु “अवसर पर हम आयेंगे” यह कहकर उसे उन्होंने लौटा दिया। इसी बीच सुरेन्द्र की पुत्री जयन्ती और शुक्र के मध्य प्रणय-सम्बन्ध स्थापित हो जाता है और वे दोनों गान्धर्व विवाह कर लेते हैं। उन्हें पुत्री होती है, जिसका नाम देवयानी रखते हैं। देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध छिड़ जाता है। अपने शिष्यों की सहायता के लिए शुक्र भूलोक जाने के लिए तत्पर हो जाते हैं, किन्तु जयन्ती स्वर्ग लोक से जाना नहीं चाहती। कन्या देवयानी को लेकर शुक्र देवलोक में आ जाते हैं। आगे का कथानक प्रसिद्ध कथा के अनुसार चलता है। कवि ने संस्कृत में इस अनूठी कथा को सरल और सरस रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सरलता और सरसता, ये दोनों ही गुण आरम्भ से ही अनुभूत होने लगते महाकाव्य EE हैं, जैसे शुक्र और जयन्ती के प्रणय-प्रसङ्ग में कवि लिखता है विजित्यात्मसौख्यं नवप्रेमभोगान स्वकर्तव्यभातिः प्रसादर्धिया च। नरे यत्र तिष्ठेदनन्यात्मसत्ता भुवस्तत्र नाकादपि स्यात्प्रतिष्ठा ।। २/८८ (अपने सौख्य तथा नये प्रेम-भोगों पर विजय प्राप्त करके जिस मनुष्य में अनन्य आत्मसत्ता वाली, अपने कर्तव्य की प्रतीति रहती है वहां पृथ्वी को स्वर्ग से भी अधिक प्रतिष्ठा होती है।) कवि पुरकायस्थ ने अपनी रचना की भूमिका में अपनी दार्शनिक दृष्टि को कथानक के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जैसा कि वे लिखते हैं ‘इस पुस्तक में तीन पृथक् क्षेत्र वर्णित हैं, देवताओं का देश, असुरों का देश और मनुष्यों का देश। प्रथम और द्वितीय एक-पक्षीय, अपरिवर्तनीय तथा अपनी चारित्रिक मानसिकता और व्यवहार के सर्वथा वशीभूत हैं- अविकृत हैं, अतः अच्छे हैं, अनिष्ट हैं, अतः इनमें सुधार सम्भव नहीं। मनुष्यों का देश दोनों अतियों के बीच सन्तुलित होकर अवस्थित है, आदर्श निवास है, और मानव-जीवन को, यहां तक कि देवताओं की दृष्टि में भी चरम-परम बनाता है। मेरा विश्वास है कि माता भूमि अपनी असंख्य, अविनाशी ऊर्जाओं से अपने बच्चों को निरन्तर पूर्णतर तथा सुष्ठुतर यथार्थ की ओर अग्रसर कर रही हैं।” (अंग्रेजी से अनूदित) कवित्व और चिन्तन दोनों के समान सम्मिश्रण से यह रचना एक आधुनिक संस्कृत साहित्य की आकलनीय कृति मानी जा सकती है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि कवि की भाषा विषयवस्तु को प्रस्तुत करने में कुछ लचर सी प्रतीत होती है।

पद्म शास्त्री (उत्तर प्रदेश १९३५ ई.)

अल्मोड़ा जनपद में उत्पन्न पद्म शास्त्री ने रूस में बोल्शेविक क्रान्ति के जन्मदाता महान् क्रान्तिकारी ब्लादिमीर लेनिन (१८७०-१६२४) के जीवन पर आधारित ‘लेनिनामृतम्’ की रचना १५ सर्गों में की है। कवि का यह महाकाव्य विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, साधुआश्रम होशियारपुर (प.) से प्रकाशित हुआ। एक विदेशी एवं क्रान्तिकारी महान् व्यक्ति को आधार बना कर संस्कृत में लिखा गया यह महाकाव्य अपने आप में भारतीय परम्परा में लिखे गये अन्य महाकाव्यों से अलग ही अपने स्वरूप में उद्भासित है। साम्यवादी विचार धारा की, इस युग की “एकमात्र प्रतिनिधि कृति” के रूप में अपनी रचना के माध्यम से कवि ने युगपुरुष लेनिन के प्रति श्रद्धाञ्जलि" अर्पित की है और इस प्रकार श्रीहर्ष (नैषधकार) की इस उक्ति को एक प्रकार से चरितार्थ किया है “वाग्जन्मवैफल्यमसयशल्यं गुणाधिके वस्तुनि मौनिता चेत्”। जहां संस्कृत के आधुनिक महाकाव्यों में भी उनके नायकों को अवतार की प्रतिष्ठा देने तथा लोकोत्तर बनाने की प्रवृत्ति सामान्य है, वहीं कवि पद्मशास्त्री ने अपने महाकाव्य के नायक को सम्पूर्णतया “मनुष्य” कहा है १०० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास जीवेषु वै श्रेष्ठतरो हि मर्त्यः शास्ता स तेषां विधिवच्च भोक्ता। इदं मतं भूतविदामिदानीं मांत् (स) नान्यो भुवनेऽस्ति कश्चित् ।। ३/२४ (जीवों में सबसे श्रेष्ठ मनुष्य है, वह उनका शासक तथा भोक्ता है। अब भौतिक वादियों का यह मत है कि संसार में मनुष्य से बढ़ कर कोई नहीं है।) कवि साम्यवादी दर्शन के निर्देश के साथ रूस का भौगोलिक वर्णन, लेनिन का जन्म, छात्रजीवन, कारावास, बोल्शेविकवाद का जन्म, जनता द्वारा ज़ार के शासन का विरोध, बोल्शेविक दल की विजय, अन्तर्दलीय संघर्ष, जारतन्त्र का पतन आदि का वर्णन करते हुए लेनिन के राजतंत्र पर एकाधिपत्य और महाप्रयाण का वर्णन करता है और अन्त में रूस-भारत मैत्री की चर्चा करके महाकाव्य की समाप्ति करता है। । कवि ने विश्व के अनेक राष्ट्रों को अपनी विचारधारा से प्रभावित करने वाले महान् क्रान्तिकारी श्रीलेनिन को अपने महाकाव्य का विषय बनाकर एक ओर आधुनिक संस्कृत कवि की व्यापक दृष्टि को संकेतित तो किया ही है, साथ ही महाकाव्य को कोरी कल्पनाओं का विलास बनने से बिल्कुल बचाया है और एक शुद्ध मानवीय आधार दिया है। उसने कहा है कि उसका ‘लेलिनामृत’ सीमारहित भीषण तरंगों से दुर्गम लेनिन-रूपी समुद्र के यत्किञ्चित् मंथन से प्राप्त हुआ है(१/११)। अपने महाकाव्य के आधारभूत सिद्धान्त साम्यवाद को वह भारत के लिए नया नहीं मानता, क्योंकि सभी जीवों में समता की मान्यता भारत के धार्मिक क्षेत्र में बहुत पहले से प्रतिष्ठित है। (१/१३) वह साम्यवाद के प्रतिष्ठापकों, काल मार्क्स, एंगल्स का उल्लेख करता है। प्राकृतिक वर्णन के प्रसङ्ग में कवि ने रूस के पर्वतों, नदियों, सरोवरों मिट्टी तथा खनिज सम्पत्ति की चर्चा की है। लेनिन के जन्म के प्रसङ्ग का वर्णन कालिदास के रघु-जन्म के प्रसंग के वर्णन से कुछ प्रभावित है। कवि ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मारिया के गर्भ में स्थित वह मनोज्ञ जीव निश्चित ही देवता नहीं था, अपितु देवगुणों से युक्त था। क्या वह दुःखार्णव से दीनों का उद्धार करने के लिए इस धरती पर नहीं उतरा था ? इस प्रश्न के रूप में अपनी बात प्रस्तुत करके कवि ने अपने वक्तव्य को अधिक दृढ़ बना दिया है, जो काव्य की भाषा के अनुरूप है और काव्य की स्तरीयता के समीप भी। कवि ने साम्यवाद के सिद्धान्त के अनुरूप मानव-जीवन में श्रम को अपने महाकाव्य में सर्वाधिक प्रतिष्ठा दी है। कवि ने अपने नायक को “महामनुष्य” कहा है। वह लेनिन के जन्म के समय परम्परा से हट कर कहता है-न तो देवताओं ने कीर्तिशब्दों को दुन्दुभियों द्वारा फैलाया और न लोगों ने ही जन्म दिन पर प्रसन्नता के कारण घर पर महोत्सव मनाया। इस समय उसके घर पर न कोई डिण्डिमघोष हुआ और न लोगों में कोई विशेष उत्सुकता दिखाई दी। सामान्य रूप से लोगों ने सुना कि मारिया ने पुत्र को जन्म दिया है। (३/५६-५७) इस प्रकार कवि ने “अतिवाद” से बचकर अपने काव्य को यथार्थ की भूमि पर रखने का जो प्रयास किया है वह सर्वथा स्तुत्य है। कवि के नायक का कहना है कि उसकी मृत्यु से यदि महाकाव्य रूस में क्रान्ति का स्फुरण हो तो वह हजार बार मरेगा, क्योंकि देहधारी निश्चय ही जला दिया जाता है। (४/२०) यदि मन्मृत्युना ससे क्रान्तेः स्फुरणमुद्भवेत्। सहस्रधा मरिष्येऽहं ध्रुवं देही विदयते।। ‘ध्रुवं देही विदयते" की उक्ति जितनी भारतीय परिवेश में सार्थक है उतनी रूस के परिवेश मे सार्थक नहीं है, क्योंकि वहां शवों को दफनाया जाता है, जलाया नहीं जाता। वह प्रसंग, जिसमें कवि ने लेनिन द्वारा अपनी बहन को पत्र लिखकर कहना कि यदि किसी प्रकार मुझे पुलिस पकड़ भी ले तो तुम ऐसा प्रयत्न करना जिससे माता मुझे देखने को न आ सकें। कारागार में पड़ा देखकर शोकविह्वल तथा अश्रुमुखी माता को मेरे राष्ट्रभक्त और प्रिय माता तथा अपने ज्येष्ठ पुत्र अलेक्जेण्डा का स्मरण हो जायेगा (५/२७,२८), बड़ा मार्मिक बन गया है। राष्ट्रभक्ति की मूल भित्ति पर शुद्ध मानवीय हितभाधना से प्रेरित चरित्र को कवि ने अपने महाकाव्य का विषय बना कर अत्याचारों के प्रति संघर्ष का समर्थन करके भारत के उन शताधिक राष्ट्रभक्तों के प्रति अपनी अपार निष्ठा व्यक्त की है जिनके बलिदान का ही सुफल भारत का स्वातन्त्र्य है। कवि कहता है शोणितेनैव शश्वत् स्वराष्ट्रध्वजं रञ्जयन्तः प्रजापादपं सर्वतः। दुःखदावानलेनैव तप्ता भृशं सार्वभौमं प्रशस्तं शरीरं सताम् ।। ६/२० (जो स्वराष्ट्र के ध्वज रूप प्रजावृक्ष को सदा सब ओर से सींचते हुए तथा दुःख के दावानल से तप्त रहते हैं उन सज्जनों का शरीर सार्वभौम और प्रशस्त होता है।) इस प्रकार आलोच्य महाकाव्य आद्योपान्त घटनाओं के कारण संकुल है और शुद्ध राष्ट्र प्रेम, मानव-प्रेम तथा दलितोद्धार के प्रति नवबोध को जागरित करने वाली अनूठी रचना बन पड़ा है। अन्त में कवि रूस-भारत मैत्री की बात बोल्गा (रूस की एक नदी) से गङ्गा के मिलन के रूप में कही है, प्रसरतु जनभूत्यै वोल्गया सार्धमेषा निजविमलजलाढ्या जाह्नवी जीवलोके ।। १५/७४ (जीवलोक में जनता के वैभव के लिए वोल्गा के साथ ही अपने निर्मल जलों से सम्पन्न गंगा प्रवाहित रहे)। यह बात सही है कि कवि ने ‘लेनिनाभूत’ द्वारा एक भिन्न दृष्टि का परिचय दिया है, और भारतीय महाकाव्य की परम्परागत पद्धति के ढाँचे में सहज भाव से बैठा कर उसे ग्राह्य बनाया है। आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास जहां तक कविता की दृष्टि से देखा जाय तो यह रचना, महाकाव्य के प्राचीन लक्षणों के बहुत कुछ अनुरूप होने पर भी, भाषा एवं संप्रेषण की दृष्टि से कुछ सामान्य हो गयी है। कहीं-कहीं तो छन्दोयोजना में लक्षित होने वाली त्रुटि विशेष खटक जाती है। कविता में सादगी होने पर भी वह प्रवाहमय नहीं बन पायी है। एक ओर विदेशी शब्दों के संयोजन की भरमार, दूसरे विदेशी विचार-धारा को संस्कृत का रूप देने का प्रयास कुछ सहज नहीं हो पाया है। और जो बात विशेष रूप से ध्यान में आती है, वह है, कवि का साम्यवादी विचार-धारा से प्रतिबद्ध होकर लिखना, जैसे वह उसका एक प्रचारक हो गया है।

हरिनारायण दीक्षित

उत्तर प्रदेश १६३६ जालौन के पड़कुला ग्राम में जन्मे कवि दीक्षित का व्याकरण और साहित्य का अध्ययन वाराणसी के संस्कृत विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुआ। वर्तमान में वे कुमायूँ विश्वविद्यालय, नैनीताल में संस्कृत के आचार्य एवं अध्यक्ष के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इन्होंने अनेक विधाओं में लेखन किया है। इनकी रचनाओं में श्रीमदप्पय-दीक्षितचरितम् (गद्यकाव्य), मेनकाविश्वामित्रम् (दृश्य काव्य) श्रीहनुमद्तम् (सन्देशकाव्य), गोपालबन्धुः (कथाकाव्य) के साथ बीस सर्गों वाला महाकाव्य ‘भीष्मचरित’ है, जो साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कृत हो चुका है। या भीष्मचरित महाभारत के एक महनीय पात्र गङ्गापुत्र देवव्रत भीष्म के जीवन तथा व्यक्तित्व पर आधारित है, जो ईस्टर्न बुक लिंकर्स १८२५ न्यू चन्द्रावल, जवाहरनगर दिल्ली-७ से १६६१ ई. में प्रकाशित हुआ। भीष्म के जन्म से लेकर उनके महाप्रयाण तक की नाना द्वन्द्वों से भरी जीवनी को कवि ने महाभारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अनुगमन करते हुए लिखा है। मूल महाभारत के कथानक में कोई विशेष परिवर्तन लक्षित नहीं होता। हस्तिनापुर के राजा शान्तनु पत्नी के वियोगजन्य कष्ट को सहन करते हुए भी पुत्र का समुचित लालन-पालन करते हैं। अपने पुत्र देवव्रत को शिक्षित करने वाले गुरुजनों को इन शब्दों में निर्देश देते हैं वसुसमोऽसुसमो मम दीपको निजविबोधघृतेन सुपूर्यताम् । सुविरचय्य तथा कृतिवर्तिकां शुचिविवेकशिखी विनियोज्यताम् ।। २/३० (वसुदेवता जैसे और प्राण जैसे मेरे इस कुलदीपक को आप लोग अपने सदुपदेश रूप घृत से भर दीजिए, और कर्तव्यपरापयणता रूपी बत्ती डालकर विवेक की पवित्र अग्नि से इसे प्रकाशित कर दीजिए।) देवव्रत पिता की प्रेरणा से धनुर्विद्या जामदग्न्य परशुराम से प्राप्त करता है। अपने योग्य पुत्र को शान्तनु युवराज का पद देते हैं। यमुना के तट पर भ्रमण करते हुए विधुर शान्तनु सौरभ बिखेरती एक सत्यवती नामक रमणी को देखकर उस पर मोहित हो जाते हैं। वह भी उन पर आकृष्ट होती है। राजा ने पत्नी के रूप में उसे वरण करने की छत की तब उसने कहा कि उसके पिता की स्वीकृति वह प्राप्त करें। राजा ने उसके वार (मत्स्याजीव) पिता से बात की तो उसने शर्त रखी कि उसकी पुत्री से उत्पन्न पुत्र के महाकाव्य ទី២ युवराज बनाने का वचन देना होगा, किन्तु यह बात राजा को मान्य न हुई। धीरे-धीरे दाशकन्या के लिए शान्तनु की व्याकुलता उजागर हुई तब देवव्रत ने गुप्तचर के माध्यम से वस्तुस्थिति की जानकारी प्राप्त कर ली। देवन्त्रत अपने युवराज पद के अधिकार को छोड़कर दाशकन्या के साथ पिता का विवाह कराने में सफल होते हैं और भीषण प्रतिज्ञा करते हैं, कवि के शब्दों में सदोरिता इह जीवने वसन् व्रतं चरिष्यामि विखानसो भवन् । १६/६२ (इस जीवन में मैं सदा ऊर्ध्वरेता रहकर ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करूंगा) “युवराज का पद तो छोड़ ही दूंगा तथा अपना विवाह भी नहीं करूंगा, जिससे कि मेरा पुत्र दाशकन्या से उत्पन्न होने वाले पुत्र से अपने अधिकार की कामना न करे।” इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उनका नाम ‘भीष्म हुआ। आगे की कथा महाभारत की प्रसिद्ध कथा के अनुसार है। अन्त में भीष्म युद्ध में आहत होकर शरशय्या पर लेट जाते हैं और सूर्य के उत्तरायण होने पर अपनी इच्छा से भगवान् श्रीकृष्ण के समक्ष महाप्रयाण करते हैं। at कवि दीक्षित ने प्रसिद्ध पुरावृत्त को प्रसादगुण से सम्पन्न भाषा में बड़ी सफलता पूर्वक अपने कवित्व का सुन्दर आवरण दिया है। परम्परागत महाकाव्य लक्षण का निर्वाह करते हुए वर्णनों तथा घटनाओं को सन्तुलित रूप देने के साथ मुख्य पात्र भीष्म के व्यक्तित्व का चित्र मनोरम ढंग से प्रस्तुत किया है। पात्रों के अन्तर्द्वन्द्व को प्रस्तुत करने में भी कवि को पर्याप्त सफलता मिली है। शान्तनु के समक्ष दाश ने अपनी कन्या को विवाह में देने के लिए जब अपना पण रखा तब उन्हें वह मान्य नहीं हुआ। वह सोचने लगते हैं क्षणविनाशिशरीरसुखाप्तये मनुजधर्मवधं न करोम्यहम्। मम मते नृपधर्मचितानलः प्रियतमाविरहानलतो महान्।। ७/५८ अर्थात् क्षण भर में नष्ट हो जाने वाले शरीर के सुख के लिए मैं मनुष्य-धर्म का नाश नहीं करूंगा। मेरे विचार में प्रिया की विरहाग्नि से बढ़ कर राज-धर्म की चिताकी अग्नि है, अर्थात् उसमें ही जलना ठीक है। और, जब देवव्रत को अपने पिता की आन्तरिक स्थिति की जानकारी होती है तब वे कितनी उदात्तता से सोचते हैं- ‘इस संसार में पुत्र को अपने शारीरिक सुख की अपेक्षा अपने जन्मदाता माता-पिता के सुख की अधिक रक्षा करनी चाहिए। इसलिए मुझे चाहिए कि मैं अपने पिता को आनन्द से रहने का अवसर दूं। मुझे राज्य के लाभ का लोभ करना धर्मसंगत नहीं है, क्योंकि राज्य तो धर्मपालन के लिए होता हैं, लेकिन धर्म राज्य पाने के लिए नहीं होता" (८/३६)। भीष्म ने जब आजीवन ब्रह्मचर्य धारण करने की भीषण प्रतिज्ञा की तब उसका प्रकृति पर होने वाला प्रभाव कवि इन शब्दों में प्रस्तुत करता है धरा चकम्पे गगनं व दिद्युते दिशो बभूवुः सकलाश्च नीरवाः।। ८/६६१०४ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास (पृथ्वी कांप उठी, आकाश द्योतित हो उठा, और सभी दिशाएं निःशब्द हो गई) के पिता शान्तनु भी मन की आन्दोलित स्थिति में ही सत्यवती के साथ विवाह स्वीकार करते हैं। (८/५-७) भीष्म का जीवन एक सम्पूर्णतया समर्पण का जीवन है, अपने वंश के लिए, अपने राष्ट्र के लिए, किन्तु जब वे अपनी आंखों के सामने द्रौपदी को अपमानित होने से नहीं बचा सके थे यह उनके जीवन का बहुत बड़ा खटका रहा, जो मरणपर्यन्त उन्हें सालता रहा। वह अपने मारे जाने का रहस्य स्वयं बताते हैं और पाण्डवपक्ष के प्रति उनका मन स्नेहाई बना रहता है। कौरवों का अन्न जो खाया था, उसका तो बदला उन्होंने मर कर देने का निर्णय लिया-विनिष्कयोऽन्नस्य दृढप्रभूतो धर्मोऽथ मृत्वा परिरक्षणीयः । १४/३। भीष्म और अर्जुन के बीच युद्ध के प्रसङ्ग की स्थिति का वर्णन करते हुए कवि लिखता है क्षणे व्रजन्ती दिशि कौरवाणां क्षणं च यान्ती दिशि पाण्डवानाम्। आकृष्यमाणोभयसैनिकैः सा दोलेव भाति स्म रणे जयश्रीः ।। १४/४२ (क्षण में कौरवों की ओर, और क्षण में पाण्डवों की ओर खिंचे जा रहे दोनों ओर के सैनिकों के कारण युद्ध में जयश्री दोला जैसी लग रही थी। इस रचना में जो बात खटकने वाली लगी वह है कवि द्वारा शान्तनु और सत्यवती का कामशास्त्रानुगत श्लथ शृङ्गारमय वर्णन। यदि यह प्रसङ्ग व्यञ्जना में थोड़े में लिखा गया होता तो ठीक होता। कुछ प्रसङ्ग तो केवल वस्तुनिर्देशमात्र होकर रह गये हैं, जैसे अस्त्रों के ज्ञान की प्राप्ति का प्रसङ्ग (पञ्चम सर्ग) आदि। अनुष्टुप छन्द का सुन्दर निर्वाह नहीं लगता तथा आर्या का प्रयोग त्रुटिपूर्ण हो गया है। वैसे कई स्थानों पर छन्दोभा कष्ट दे जाता है जैसे स्वैरं चरन्तो हरिणाश्च क्वापि ४/३६, दधार स्वीयं तिलकं त्वरावती ६/३१, तदैव धावन् स विहाय स्यन्दनम् ६/५२, प्रोक्तं चोच्चैर्निजतममिमं पितृदेवो भवेति ८/३८ कहीं कहीं कवि पाणिनीय नियमों की अनदेखी भी कर जाता है। कवि ने कहीं-कहीं आधुनिक शब्दों का प्रयोग किया है, जैसे मानसून का नगाधिराजोन्मुखमानसूनवत् ६/४, दूरदर्शन १३/४१-कवि ने प्रवर्तमान भाषा-विवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद पर भी टिप्पणी की है। जैसे शान्तनु के राज्य के वर्णन के प्रसङ्ग में १/२८ और अन्त में, मोक्षधर्म-वर्णन के प्रसंग में १६/२१। अलङ्कारों में रूपक के निबन्धन में कवि विशेष सफल हुआ है। फिर भी भीष्मचरित से सम्बन्ध में कहना होगा कि यह एक अच्छी रचना है।

द्विजेन्द्रनाथ शास्त्री

१८९२-१९६३, उत्तर प्रदेश में जन्मे कवि ने घटनाप्रधान स्वराज्यविजयमहाकाव्य की रचना की। इसमें २० सर्ग हैं तथा प्रत्येक सर्ग की कथावस्तु अलग होने के कारण संघटित नहीं है। अनेक चरित्रों का निबन्धन करके कवि ने भारत महाकाव्य ច។ के मुक्ति-आन्दोलन को शब्दों में रूपायित करने का प्रयास किया है। नवें सर्ग में गान्धी जी का उदय होता है उदियाय ततो गान्धी सूचिभेद्यतमोऽम्बरे। पूर्णः स पार्वणश्चन्द्रो निस्तन्द्रोऽमन्दतेजसा।। ६/३० यद्यपि अनेक चरित्रों के वर्णित होने के कारण कवि पात्रचरित्र की प्रभावोत्पादकता में सफल नहीं हुआ है, तथापि भावानुकूल भाषा तथा छन्द आदि के संयोजन के कारण उसकी यह रचना आकलनीय हो गयी है। राष्ट्रियता की भावना से सम्पूर्ण रचना ओत-प्रोत है, इसमें सन्देह नहीं। कवि की दृष्टि में उत्तम काव्य कुछ इस प्रकार का होता है रसोज्ज्वला भावगुणादिगर्भा सालङ्कृती रीतिमती प्रगल्भा। सा काप्युदारा कृतिनामुदेति मन्ये ऽतिपुण्येन हि काव्यधारा।। १/४८

हरिप्रसाद द्विवेदी शास्त्री (उत्तर प्रदेश १८९२)

अलीगढ़ के बाण ग्राम में उत्पन्न कवि की शिक्षा कासगंज (एटा) में हुई और अजमेर में अध्यापन किया। इन्होंने ११ सगाँ में ‘गोस्वामितुलसीदासचरितं महाकाव्य का निर्माण किया। कवि ने सूकरक्षेत्र या सोरों को गोस्वामी जी का जन्मस्थान माना है। कवि का यह पद्य उद्धरणीय है त्रिधाराणां यस्मिन् पृथगगभुवां सङ्गमवरः स्वरूपाद् भिन्नानां दिशति लहरीणां कलकलैः। गुणैर्जात्या रूपैरिह जगति भिन्नैरपि जनै मिथः सङ्गन्तव्यं सुमतिसुखसिद्ध्यै सहृदयैः ।। ६/३६ (पर्वत से निकली तथा स्वरूप से भिन्न तीन धाराओं का श्रेष्ठ संगम अपनी लहरों की कल-कल से यह उपदेश देता है कि गुण, जाति तथा रूप से भिन्न भी सहृदय लोगों को सुमति तथा सुख की सिद्धि के लिए परस्पर मिल-जुल कर चलना चाहिए।)

नारायण शास्त्री

इनकी रचना “श्रीशैलजगद्गुरुचरित” महाकाव्य है जो १E सर्गों में निबद्ध है तथा १८५३ में बंगलोर से प्रकाशित है। इसमें श्रीशैल के जगद्गुरुओं का जीवन वृत्त वर्णित है। इसमें पण्डिताराध्यसे आरम्भ करके चन्न बसबदेशिक तक के गुरु वर्णित हैं। श्री चन्नबसवदेशिक का सभी धर्मों के प्रति आदर का भाव इस पद्य में आकलनीय है सर्व शिवात्मकमतः सकलोऽपि धर्मः शेषं पदं गमयतीति विशालचेताः। माहेश्वरो यतिवरः समदर्शिचित्तः सर्वान् स्वधर्मनिरतान् बहु मन्यते स्म ।। १६/२३ १०६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास जा (सब कुछ शिवमय है, अतः सभी धर्म शैव पद तक पहुंचाते हैं, इस प्रकार समदर्शी चित्त वाले माहेश्वर यति श्रेष्ठ सबको स्वधर्मनिरत मान कर आदर देते थे।)

छज्जुराम शास्त्री (१९०५, हरियाणा)

कुरुक्षेत्र के निकट शेखपुरा लावला ग्राम में जन्मे तथा संस्कृत के अध्यापक कवि शास्त्री ने दो पौराणिक महाकाव्यों की रचना की ‘परशुरामदिग्विजय’ तथा ‘शिवकथामृतम्’। दोनों को ही पुराणों में व्याकीर्ण सम्बद्ध कथाओं को एकत्र करके कवि ने ‘सर्गबद्ध" रूप में प्रस्तुत किया है। प्रथम रचना १२ सर्गों में निबद्ध है तो दूसरी में १५ सर्ग हैं। कवि ने अनुष्टुप् छन्द को अधिक प्रश्रय दिया है। कवित्व की दृष्टि से दोनों रचनाएं शिथिल प्रतीत होती हैं। दोनों में ही पौराणिक शिल्प की पुनरावृत्ति मात्र होकर रह गयी है। इनके माध्यम से कवि कोई अपने अध्येताओं को सन्देश भी देता प्रतीत नहीं होता।

भवानीदत्त शर्मा (बिहार)

आरा के निकट, गगा के दक्षिण तट पर उत्पन्न कवि शर्मा ने नौ सर्गों के महाकाव्य ‘सौमित्रिसुन्दरीचरित’ की रचना की। ऊर्मिला के जीवन पर आधारित यह संस्कृत का दूसरा महाकाव्य है । नारायणशुक्ल के ‘ऊर्मिलीयम्’ की चर्चा हम कर चुके हैं। प्रस्तुत रचना में कवि की आद्योपान्त मार्मिकता स्फुरित होती है। समयोचित संवादों में एक सहज प्रवाह एवं रसाईता है जो मन को अभिभूत कर देती है। सौमित्रि लक्ष्मण प्रिया ऊर्मिला से कहते हैं दासः प्रियो मे भविता प्रभोश्चेद् दासी प्रियां विद्धि धरात्मजायाः। विभज्य चावां द्रुतमेव सेवाव्रताधनुष्ठानपरौ भवेव।। ४/१३ (मेरे प्रिय आप प्रभु राम के दास होंगे तो घरात्मजा सीता की मुझे दासी समझें, अपने-अपने कार्य का विभाजन करके हम दोनों सेवाव्रतादि के अनुष्ठान में तत्पर हो जायें।) पञ्चम सर्ग में लक्ष्मण के राम के अनुगत होकर वन जाने पर ‘मन्दाक्रान्ता’ में निबद्ध ऊर्मिला का करुण-विलाप अत्यन्त मार्मिक है। अष्टम सर्ग में कवि ने मात्रिक संगीत-प्रधान गीतों की रचना की है, जो सम्पूर्ण रचना को एक अतिरिक्त वैशिष्ट्य से उजागर करते प्रतीत होते हैं। काव्य की समाप्ति राम एवं सीता के साथ लक्ष्मण के वनवास से अयोध्या लौट आने पर हुई है, जहां कवि ने एक ही श्लोक में उस मिलनक्षणजन्य सुख को बांधने का प्रयास किया है क्षणेन साऽपश्यदुपस्थितं स्वं कान्तं गृहद्वारि विभान्तमच्छम्। विवेद नानन्दनिमीलिताक्षी कदा तदुत्सङ्गमियं जगाम ।। ६/८४ यत्र-तत्र कवि द्वारा छन्दों की योजना में की गयी त्रुटियां अवश्य ही मन को खिन्न कर जाती हैं।

पाण्डुरंग शास्त्री डैग्वेकर (महाराष्ट्र)

पूना के निवासी कवि डेग्वेकर ने महाभारत से गृहीत मूल कथानक पर आधारित तथा १० सों में निबद्ध ‘श्रीकुरुक्षेत्र’ महाकाव्य (१६५६) की रचना की है। पूरी रचना में राष्ट्रिय चेतना को प्रश्रय मिला है। कुरुराज के मुख से भारत की सुरक्षा का यह उपदेश इन शब्दों में प्रस्तुत हुआ है अवेक्षणीया जननीनिभा सा संरक्षणीया विविधैः प्रकारैः। अकारि चेदाक्रमणं परैर्वा प्राणव्ययेनापि निवारणीयम् ।। १२/१३ (भारत-भूमि को अपनी माता के रूप में देखना चाहिए, हर प्रकार से उसका रक्षण करना चाहिए। यदि शत्रुओं ने उस पर आक्रमण किया तो प्राणों को अर्पित करके भी उस आक्रमण को विफल कर देना चाहिए।

काशीनाथ पाण्डेय “चन्द्रमौलि” (राजस्थान)

बीकानेर के निवासी कवि “चन्द्रमौलि” ने संस्कृत में अनेक विधाओं में काव्य प्रणयन किया है। इनके द्वारा लिखित २१ सों का ‘श्रीमज्जवाहरयशोविजय’ महाकाव्य १९८५ में अखिलभारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ समताभवन, रामपुरियामार्ग, बीकानेर द्वारा प्रकाशित कराया गया है। इसमें श्रीमज्जवाहराचार्यजी के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को विषय बनाया गया है। विषय के अनुसार धार्मिक उपदेशों को कवि ने कवित्वमय अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है। कवि ने अपने चरित-नायक के “जवाहर" नाम की व्युत्पत्ति का निर्देश करते हुए उसकी ओचिती इन शब्दों में सूचित की है विधातुमार्तान् सुखिताननारतं विनेतुमिष्टाननभीष्टपद्धतेः। जवेन तत्त्वाहरणादिकारणात् जवाहरेति प्रियनाम चर्चितम् ।। (दुःखी प्राणियों को निरन्तर सुख की ओर प्रेरित करने से, अप्रशस्त पथ पर गतिशील मानवों को सन्मार्ग पर गति की प्रेरणा देने से तथा शीघ्रग्राही प्रज्ञा से उस बालक का नाम ‘जवाहर" यह रखा गया)।

रघुनन्दन शर्मा (उत्तर प्रदेश)

इन्होंने जैन तेरापन्थ सम्प्रदाय के संघाधिनायक आचार्य श्री तुलसी के जीवन-दर्शन पर आधारित ‘श्रीतुलसीमहाकाव्यम्’ की रचना १६६२ में प्रस्तुत की, जिसमें २५ सर्ग हैं। कवि वैसे तो आयुर्वेदाचार्य थे, किन्तु उनमें सहज कवित्व का आभास प्रस्तत रचना के माध्यम से मिलता है। गंभीर भावों को वे सरल शब्दावली में प्रस्तुत करने में भी निपुण प्रतीत होते हैं। आचार्य श्रीकालूगणी के स्वर्गवास के समय शोकाकुल गङ्गापुर का चित्रण कवि इन शब्दों में करता है गङ्गापुरं गहनशोकसमुद्रमग्नं कस्यापि कुत्रचन काऽप्यभवन्न पृच्छा। माता स्वपुत्रमनुजं निजमैव बन्धुः पत्नी च विस्मृतवती स्वपतिं तदानीम् ।। सीमन्तिनी प्रथममेव तथाजयित्वा नाक्षिद्वितीयमलमजयितुं बभूव। क्षौराईकर्मणि करादपि नापितस्य क्षित्यां क्षुरं निपतितं निशितं . त्वरेव ।। 905 आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास ग्रासार्पणाय मुख्मध्यमधि प्रविष्टा हन्ताङ्गुली बहिरुपेतुमभूदन । ग्रासोऽप्यधो न पतितो गलतो बुभुक्षोः कोलाहले सति दिवोगमनस्य कालोः।।

स्वयम्प्रकाश शर्मा (१९१७-१९८३)

पंजाब के होशियापुर के निकटवर्ती एक गांव में जन्मे कवि शर्मा ने ‘श्रीभक्तसिंहचरित’ महाकाव्य का प्रणयन किया, जिसमें ७ सर्ग हैं। कवि अपने चरितनायक के पुण्य चरित को लिखने वाली अपनी लेखनी को धन्य मानता है धन्याः सुपुण्या निजदेशमुक्त्यै प्राणान् स्वकान् ये तृणवत् त्यजन्ति। विलिख्य पुण्यं चरितं हि तेषां पुण्यत्वमीयादपि लेखनी मे।। १/३ (धन्य पुण्यवान् जो लोग अपने देश की मुक्ति के लिए अपने प्राणों का तृण की भांति त्याग कर देते हैं उनके पुण्य चरित को लिखकर मेरी लेखनी भी पुण्य-भाव को प्राप्त करेगी। कवि ने राष्ट्रभक्ति से लबालब भरे चरितनायक भगत सिंह के जीवन को तथा उनके स्वमातृभूमि-प्रेम को बहुत सहजता से अभिव्यक्ति दी है। भगत सिंह की इस प्रतिज्ञा को कवि ने इन शब्दों में प्रस्तुत किया है चेज्जन्म दद्यात्पुनरेव देवस्तवत्र भूयाद् मुवि मारतेऽस्मिन् । सेवाञ्च कुर्या निजमातृभूमेर्दत्वाऽपि मस्तं बहुभक्तियोगात् ।। ७/४७ (फिर यदि विधाता भारत-भूमि पर जन्म दे तो अपनी मातृभूमि की सेवा अतिशय भक्तियोग से अपना मस्तक चढ़ाकर करूं।) कठोपनिषद् में वर्णित प्रसिद्ध नचिकेता की कथा के माध्यम से कवि ने मृत्यु के रहस्य को यमराज के मुख से खुलवाने के उद्देश्य से नौ सर्गों में ‘अमृतमन्थनम्’ (महाकाव्य) की रचना की है। यौगिक सिद्धि के बल से नचिकेता के द्वारा यमलोक की यात्रा का वर्णन करते हुए कवि ने ग्रह-गणों के मार्ग का वर्णन किया है। इसके लिए उसने ‘सूर्यसिद्धान्त’ के अनुसार ग्रहों की स्थिति का निर्देश किया है। अपने काव्य को एक सुदृढ़ वैज्ञानिक भित्ति पर प्रतिष्ठित करते हुए कवि शर्मा ने सरल संस्कृत में अपने कथ्य को प्रस्तुत करने का सराहनीय प्रयास किया है। इस रचना से पूर्व कवि ने केनोपनिषत् की कथा पर आश्रित ‘इन्द्रयक्षीयम्’ काव्य लिखा था। नचिकेता अपने आपमें सम्पूर्ण भारतीय जनता की जिज्ञासु-प्रवृत्ति एवं सत्यानुसन्धान की दृढ़ मानसिकता का जीता-जागता प्रतीक है। और ऐसे ही पात्र को कवि ने बड़ी जागरूकता के साथ काव्य का विषय बनाया है। कवि के दो पद्य यहां उद्धरणीय हैं- नवम सर्ग में अपने उद्देश्य में सफल नचिकेता से यमराज कहते हैं महाकाय १०६ धन्योऽसि यद्भारतभूमिभागादत्रागतस्त्वं सुविलय शीघ्रम्। नवग्रहान् विस्तृतविग्रहांस्तान् यमालये प्राणधृतैरगम्ये।। ३७ अहो मुने साहसमीदृशं ते केनापि दृष्टं न च संश्रुतं प्राक् । स्वलक्ष्यसिद्धौ दृढनिश्चयः को भवादृशोऽन्यो भवितुं समर्थः ।। ३८

श्यामवर्ण द्विवेदी

१९१६-१९७५ ई. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद में जन्मे कवि द्विवेदी ने ‘विशालभारत’ महाकाव्य का निर्माण किया, जिसका प्रथम भाग जवाहरदिगविजयम् है। कवि की भाषा समर्थ एवं कवित्व से पूर्ण प्रतीत होती है। वह तिरंगे राष्ट्रध्वज को लेकर लिखता है राष्ट्रध्वजं तं गगने त्रिवर्णमुद्वीक्ष्य वायुस्फुरदुज्ज्वलान्तम् । गौराः प्रतीयुः क्रकचं चलन्तं प्रकम्पिताङ्गा हृदरुर्विदारम् ।। ११४/१५ (तीन वर्णों वाले, पवन से फहराते अग्र-भाग वाले, हृदय के व्रण को विदीर्ण करने वाले उस राष्ट्रध्वज को गोरे अंग्रेजों ने चलता हुआ आरा समझा।)

रघुनाथप्रसाद चतुर्वेदी

(१९११-१९८८ ई.) मथुरा से १६६७ में प्रकाशित कवि द्वारा निर्मित ‘जवाहरज्योतिर्महाकाव्य’ २१ सर्गों में विभक्त है। स्व. जवाहरलाल नेहरू के जन्म से लेकर देवावसान पर्यन्त कथावस्तु पर आधारित इस रचना में घटनाओं की चर्चा अधिक हो गयी है, जिससे कवित्व पक्ष शिथिल हो गया है। आद्योपान्त मात्र अनुष्टुप्छन्द का प्रयोग हुआ है।

पी. उमामहेश्वर शास्त्री (आन्ध्र-प्रदेश)

इनका ‘कंससंहारमहाकाव्य’ १६६८ में प्रकाशित हुआ। १८ सर्गों के इस महाकाव्य में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का वर्णन है, उनमें कंस का वध प्रमुख है। नगर, समुद्र आदि के वर्णनो से संवर्धित यह एक प्राचीन परम्परा की रचना है।

के. एन. एझतचन (केरल १९२२-१९८२)

इनका २१ सर्गों का ‘केरलोदय’ (१९७७) एक ऐतिहासिक महाकाव्य है, जिसमें केरल का इतिहास वर्णित है। रचनाकार केरल के इतिहास, संस्कृति तथा साहित्य का अधिकारी विद्वान है। फिर भी यह रचना मात्र इतिहास नहीं है। इसमें प्राचीन परम्परा के अनुगमन के साथ आधुनिकता का भी समावेश है। प्राचीनता और नवीनता के समाहार से यह एक विशिष्ट कृति बन गयी है। विचार या वर्णनों के प्रस्तुतीकरण में मौलिकता है, जैसे सन्ध्याघ्ररेणुचन्द्रार्कनेमिद्वयविचालितम् । पुरो यात्रां करोति स्म प्रवञ्चशकटं पुनः ।। १४/१४० भ्रमन्ती कुम्भकाराय धावन्ती पटकारिणे। प्लवमानाब्धिनाशाय चचाल नरजीविका ।। १४१ ធ ទី ២ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास उलूकचटकस्तोत्रा काका धावितवृश्चिका। प्रकृति मसीमासु शशास निजकाननम् ।। १४४ -

रामकुबेर मालवीय (उत्तर-प्रदेश)

इनका जन्म प्रयाग के निकट कड़ा में हुआ। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और तत्पश्चात् वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय में साहित्य विभाग के अध्यक्ष के पद पर अध्यापन किया। इनके द्वारा रचित ‘श्रीमालवीयचरितम्’ में महामना मदनमोहन मालवीय जी का जीवन-चरित १५ सगों में वर्णित है। इस रचना का प्रकाशन का.हि.वि.वि, की पत्रिका “प्रज्ञा” में क्रमशः हुआ है। मालवीय जी के प्रति अतिशय श्रद्धालु कवि ने उनके शरीर-सौष्ठव एवं वेशभूषा के वर्णन में अधिक प्रवृत्ति दिखायी है। कवि ने वर्णनों को प्रभावशली बनाने के लिए अलंकारों की विशेष सहायता ली है और रचना में भाषा का माधुर्य आद्योपान्त बना हुआ है। मालवीय जी के उत्तरीय का वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है मालवीयोत्तरीयस्योभयप्रान्तच्छलेन किम्। विवेको विनयश्चैवोभयपार्वे सदा स्थिरौ।। भुजद्वयमपर्याप्तं भिक्षाग्रहणकर्मणे। इति विचार्य किञ्चान्यद् भुजद्वयमिदं कृतम् ।। ११३८/४० वाराणसी का वर्णन इन शब्दों में हुआ है गङ्गातरङ्ङ्गानिलसङ्गपूता वाराणसी पुण्यभृतामुपास्या। मुक्तिश्रियो मञ्जुलवैजयन्ती सौभाग्यसिन्धुर्नु वसुन्धरायाः।।

सुधाकर शुक्ल (उत्तर प्रदेश १९१३-१९८५)

इटावा के क्योटरा ग्राम में उत्पन्न कवि शुक्ल मध्य प्रदेश के शासकीय उ.म. विद्यालय, बसई के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए और दतिया में अपना ‘कविकुलाय’ बनवाया। इन्होंने तीन महाकाव्यों की रचना की-स्वामिचरितचिन्तामणिः (१६ सर्ग) गान्धीसौगन्धिकम् (२० सर्ग) तथा भारतीस्वयम्वरम् (१२ सर्ग)।

साधुशरण मिश्र (बिहार)

चम्पारण के नरकटियागंज स्थित श्रीजानकीसंस्कृत विद्यालय के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त मिश्न जी ने १E सर्गों में निबद्ध ‘गान्धिचरित’ महाकाव्य (१E६२) की रचना की। इनके पिता पं. जयराम मिश्र हथुआराज्य के शासक श्रीकृष्ण प्रताप शाही के प्रधान पण्डित के पद पर प्रतिष्ठित रह चुके थे। कवि ने महात्मा गांधी को राम और कृष्ण की भांति एक ‘अवतार’ माना है और कहा है कि जैसे पुराकाल में राम जब स्वधाम जाने को उद्यत हुए तब लक्ष्मण लीला-निर्मित माया से निमित्त बन गये और यादवेन्द्र कृष्ण के स्व-लोकगमन का कारण व्याथ बना। उसी प्रकार महात्मा गान्धी ने जब अपने लोक को प्रस्थान करना चाहा तो गोडसे नाथूराम निमित्त बन गया (१८-१३२-३४)। महाकाव्य ១១ ។ कवि ने प्रसादगुण से व्याप्त अपने काव्य में चरितनायक गांधीजी के व्यक्तित्व का समुचित वर्णन किया है। कवि ने गाँधीजी के सर्वधर्मसमभाव को इन शब्दों में अभिहित किया है हिन्दुर्यथास्ते यवनोऽपि तद्वत् खीष्टानुयायी च जनोऽपरोऽपि । तुल्योऽस्य पृष्टौ न मिदालवोऽपि समप्रवृत्ते विषमा न बुद्धिः ।। १६/३०

श्रीकृष्ण प्रसाद शर्मा घिमिरे (नेपाल)

टंगाल गहिरीधारा, काठमाण्डू में कवि घिमिरे का जन्म १८१८ में हुआ। इन्होंने चार महाकाव्यों का प्रणयन किया-श्रीकृष्ण-चरितामृतम्, वृत्रवधम्, ययातिचरितम् तथा नाचिकेसम् । कवि घिमिरे के कारण संस्कृत कविता का क्षेत्र भारत की सीमा से पार पहुंचा। श्रीमद्भागवत के कथानक पर आश्रित १८ सों में निबद्ध ‘श्रीकृष्णचरितामृत’ एक विशाल महाकाव्य है। इसी प्रकार नाचिकेतस कठोपनिषद् के यम-नचिकेता संवाद को आधार बनाकर २८ सर्गों में निबद्ध है। इसे एक आध्यात्मिक रचना कहा जा सकता है। इसमें जीवात्मैक्य के दर्शन को यमदेवता के मुख से इन शब्दों में प्रस्तुत किया गया है आब्रमकीटगतविग्रहहृद्गुहायां जानीहि तात विलसत्यतुलोऽयमात्मा। सूक्ष्मातिसूक्ष्म इह चाप्यणुरूप एकोऽ णुक्योऽपि सूक्ष्मतम ईश्वर एव साक्षात् ।। ११/१५ (ब्रह्म से लेकर कीट पर्यन्त के शरीर में स्थित हृदय-गुहा में, जिसकी कोई तुलना नहीं, ऐसा यह आत्मा विद्यमान है। यह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, अणुरूप से सूक्ष्मतम अणु साक्षात् ईश्वर है, हे तात ऐसा तुम जानो।) __

मुतुकुलम् श्रीधर

इन्होंने ‘नवभारतम्’ (१८७८) नाम का १८ सर्गों का ऐतिहासिक महाकाव्य लिखा है जो स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू के जीवन पर आधारित है। पं. नेहरू के जीवन के माध्यम से कवि ने भारतीय स्वातनत्र्य संग्राम का इतिहास प्रस्तुत किया है। साथ ही उसने कवित्व की कल्पनामय भूमि में विविध प्राकृतिक वर्णनों, सांस्कृतिक भौगोलिक स्थानों के चित्रणों से अपनी रचना को संवर्धित किया है। कुमारसम्भव और रघुवंश का उस पर प्रभाव लक्षित होता है, किन्तु उसने उस कारण अपने कवित्व-स्पर्श को अभिभूत नहीं होने दिया है। इन्दिरा का वर्णन करते हुए कवि लिखता है अयेन्दिराख्या प्रियदर्शिनी सा कुले च गेहे मणिदीपभासा। दिने दिने पोषमियाय बाला शरत्सुधांशोरिव रश्मिमाला।। श्रीमती कमला नेहरू की मृत्यु का प्रसंग ११२ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास तनिमानमुपेयुषां पुरः स्तिमितेन्दीवरलोचनामिमाम्। चलितालकवीचिसुन्दरां कलितावेगवती नदीमिव।। अपसारितसूक्ष्मगण्डकस्थलपमश्रियमीषदस्फुटाम्। अवलोक्य जवाहरः प्रियां विषसादैव महाधृतिः परम्।।

के. बालराम पन्निकर

इनके द्वारा रचित ‘श्रीनारायणविजय’ नाम का २१ सर्गों का महाकाव्य है, जो केरल के प्रसिद्ध समाजसुधारक एवं सन्त श्रीनारायण गुरु के जीवन तथा शिक्षा पर आधारित है। यह १६७१ ई. में त्रिवेन्द्रम से प्रकाशित है। श्रीनारायण गुरु १६वीं शती के अन्त तथा बीसवीं के पूर्वार्ध में हुए थे। इसमें कवि ने काव्यशास्त्रियों द्वारा प्रस्तुत महाकाव्य के लक्षणों का परा अनगमन नहीं किया है. धर्मों की एकता तथा मानव में बन्धुत्व के विश्वजनीन भावों को उद्घाटित किया है। पन्द्रहवें सर्ग में सहोदर संघ की स्थापना, महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भेंट १६वें तथा १८वें में महात्मा गान्धी के साथ वार्तालाप वर्णित है। कवि की भाषा की सरलता तथा शैली की मधुरता आद्योपान्त आकलनीय है। रवीन्द्रनाथ के साथ वार्तालाप भी बहुत मनोरञ्जक बन पड़ा है।

शान्तिभिक्षु शास्त्री (उत्तर प्रदेश)

क्रिस्तुभागवत की भांति कवि शास्त्री का १०० सर्गों का बुद्धविजय काव्य साहित्य अकादमी (दिल्ली) द्वारा पुरस्कृत एक आकलनीय रचना है। इसके महाकाव्य होने के कुछ संशय अवश्य उठाये जा सकते हैं, किन्तु इसे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण एवं क्रिस्तुभागवत की परम्परा में रचित अपने आप में एक महत् काव्य कहा जा सकता है। आद्योपान्त रचना (सर्ग के अन्त वाले पद्यों को छोड़कर) अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है। कवि ने सम्पूर्ण बौद्ध जीवन-दर्शन को सरल एवं सरस शब्दावली में काव्य के रूप में प्रस्तुत करने का अभिनन्दनीय प्रयास किया है। उसने पाठकवर्ग को यह कह कर अपनी रचना के आकलन के लिए प्रेरित किया है 5 इदं हि काव्यं सरसं गुणान्वितं शुभप्रभावं सुगताश्रयोन्नतम् । समर्थशब्दार्थपरायणं नवं महानुभावाः प्रपठन्तु सादरम्।। (पुष्पिका) ५६ वें सर्ग में कवि आज के हिंसा ग्रस्त लोगों से इन शब्दों में क्षुद्र भावनाओं से ऊपर उठने का निर्देश करता है हिंसा करुणया हेया मैत्र्या व्यापादभावना। हिंसाव्यापादमुक्तस्य चित्तं पुण्ये प्रसीदति ।।४६ एकनीडामिमां भूमिं भावयन् विचरेत् सुधीः। न च देशविशेषे स्यात् सादरोऽनादरः क्वचित् ।। ४७ कवि ने अपनी इस काव्यरचना को पञ्चसाहस्त्री कहा है।

ओगेटि परीक्षित् शर्मा (१९३० आन्ध्र-प्रदेश)

इनका ‘परीधि - नाटकचक्रम्’ नाम से २७ नाटकों का संग्रह प्रकाश में आ चुका है। इन्होंने दो महाकाव्यों यशोधरामहाकाव्य तथा श्रीमत्प्रतापराणायन की रचना की है। दूसरी रचना साहित्य अकादमी (दिल्ली) द्वारा पुरस्कृत हो चुकी है। प्रथम गौतम सिद्धार्थ के गृहत्याग (अभिनिष्क्रमण) की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है। निश्चय ही कवि पर हिन्दी के कवि श्रीमैथिलीशरण गुप्त की रचना यशोधरा की प्रसिद्ध पंक्ति का प्रभाव है “आंचल में है दूध और आंखों में पानी।” कवि शर्मा लिखते हैं किमेतदाश्वर्यमहो धरित्र्यां स्त्रीणां मनोवृत्तिरगम्य एव। पयोधरक्षीणभृताः सुजीवाः क्षणेन नेत्राञ्चलसाश्रुपाताः ।। (१०/११) इनका ८० सर्गों का श्रीमत्प्रतापराणायन महाकाव्य इनकी महीयसी प्रतिभा का एक ‘विस्फोट’ कहा जा सकता है। राष्ट्रिय भक्ति-भावना से ओतप्रोत इस विशाल रचना में अनेक स्थलों पर कवि की मार्मिकता उजागर हुई है, जैसे हल्दिघाटकाण्ड में चतुर्थ सर्ग में राणा प्रताप द्वारा सेना के सञ्चालन का प्रसङ्ग, चेतक के लिए राणाप्रताप का विलाप आदि। इस ‘विलाप’ में कवि ने समुचित वियोगिनी छन्द का आश्रय लिया है। युद्ध के वर्णन भी कवि ने अनुरूप शैली में प्रस्तुत किये हैं। यह आधुनिक संस्कृत साहित्य के महाकाव्य के इतिहास में एक संयोग की बात है कि कवि वर्णेकर द्वारा रचित शिवाजी विषयक महाकाव्य श्रीशिवराज्योदयम् और कविवर शर्मा द्वारा रचित श्रीमत्यतापराणायनम्, दोनों ही अपने आपमें एक समर्थ एवं आकलनीय रचनाएं हैं। खेद है कि कवि शर्मा के महाकाव्य में अनेक स्थलों पर व्याकरण एवं छन्दोयोजना की दृष्टि से प्रयोग चिन्त्य हो गये हैं।

के. एस. नागराजन् (कर्णाटक)

१६ सर्गों में रचित इनके श्रीसीतास्वयंवरम् (महाकाव्य) के पश्चात् दूसरी महाकाव्य रचना ‘श्रीलवलीपरिणयम् १६७५ में प्रकाशित हुई। स्कन्दमहापुराण की शङ्करसंहिता के देवकाण्ड में प्राप्त लवली और सुब्रह्मण्य के विवाह की पौराणिक कथा ही इस रचना का आधार है। भारवि के किरातार्जुनीय की भांति यह भी ‘लक्ष्म्य क’ है। नाना छन्दों के व्यवस्थित प्रयोग एवं प्रसादगुणमयी पदावली से समलङ्कृत यह रचना अत्यन्त सरस बन पड़ी है। सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय) कवि के कुल देवता हैं, अपनी इस रचना के व्याज सेवि ने एक ओर तो उनके प्रति श्रद्धा निवेदित की है, दूसरी और पौराणिक प्राचीन कथा-वस्तु में आधुनिक विषयों को नूतन रीति से प्रस्तुत किया है। कहीं-कहीं कालिदास आदि की रचनाओं की छाया लक्षित हो जाती है तो कहीं-कहीं प्रसंगतः इस प्रकार उपदेश कवि अपने पात्रों के माध्यम से कर जाता है कोपो हि पापकरणे मनुजं नियुङ्क्ते । लोके स एव सकलापदनर्थमूलः।आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास तस्मान्नरो न तु कदापि भवेद् वशेऽस्या कारक है कोपस्य सर्वविषमस्थितिकारकस्य ।। (क्रोध मनुष्य को पाप करने में प्रवृत्त करता है, संसार में वही सकल आपदाओं का मूल है, इसलिए मनुष्य कभी-कभी विषम स्थितियों को उत्पन्न करने वाले क्रोध के वश में न हो)।

रघुनाथ शर्मा (उत्तर प्रदेश)

बीसवीं शती के आरम्भ में जन्मे बलिया जिले छाता ग्राम के विख्यात मनीषी विद्वान पण्डित शर्मा जी ने अपनी कारयित्री प्रतिभा का परिचय संस्कृत में अनेक स्तोत्रों तथा ८ साँवाले ‘पार्वतीपरिणय’ (महाकाव्य) के निर्माण से दिया है। भर्तृहरि के वाक्यपदीय पर प्रसिद्ध “अम्बाक:” व्याख्या के रचयिता इन मनीषी ने अपने पार्वतीपरिणय महाकाव्य को कालिदास के “कुमारसम्भव” का छायाग्राही कहा है। आठ सौं की इस रचना में कवि ने यत्र-तत्र कुमारसम्भव के प्रसङ्गों को उसी रूप में ले लिया है तथा कहीं-कहीं अन्य कवियों के पद्य-रत्नों को भी उद्धृत कर लिया है। फिर भी, प्रथम सर्ग में जहां उन्होंने पार्वती के जन्म-प्रसङ्ग में ब्रह्मा, वरुण, यम आदि देवताओं के मुख से देवी की स्तुतियां प्रस्तुत की हैं, तथा गणेश की गीतियां प्रस्तुत की हैं वहां उनकी वाणी के गाम्भीर्य एवं सौष्ठव के गुण एक साथ लक्षित किये जा सकते हैं। कहीं-कहीं तो कवि ने कालिदास के अनेक पद्यों को अपने अनुसार मोड़ कर और भी चमत्कारी बना दिया है। इस महाकाव्य का प्रकाशन साहित्य अकादमी (दिल्ली) की पत्रिका ‘संस्कृत प्रतिभा के पञ्चदश उन्मेष (१९८५) में हुआ है। इनके द्वारा निर्मित पद्यों का आकलन करते हुए ऐसा सहज भाव से प्रतीत होने लगता है कि मनीषिवर शर्माजी पर वाग्देवी की अहेतुकी कृपा थी। इनके पिता पं. काशीनाथ शास्त्री भी अपने समय के विशिष्ट विद्वान् थे।

वनमालिदास शास्त्री

कविवर शास्त्री जी ने दो महाकाव्य लिखे हैं-‘हरिप्रेष्ठ-महाकाव्य और ‘श्रीकृष्णानन्दमहाकाव्य’। श्रीवनमालिप्रार्थनाशतकम् इनके द्वारा रचित स्तोत्र-काव्य है। अतिशय स्फीत शैली में काव्यरचना में निपुण शास्त्री जी के अट्ठारह सर्गों वाले महाकव्य का प्रकाशन श्रीकृष्णनन्द स्वर्गाश्रम, वृन्दावन (मथुरा) से हुआ है। इसमें कवि ने अपने सहाध्यायी श्रीहरिप्रेष्ठ महाशय के चरित्र को विषय बनाया है। श्रीहरिप्रेष्ठ महाशय ने पच्चीस वर्ष की अवस्था में ही शिक्षक का पद, नवोढा पत्नी, वृद्धा माता और छोटे भाई को त्याग दिया और श्रीकृष्ण की भक्ति तथा तपश्चरण में लग गये। कवि ने परम्परागत महाकाव्य के लक्षणों का अनुगमन किया है और यथास्थान उपदेशात्मक बातें नियोजित की हैं।

मधुकर शास्त्री

(राजस्थान, १६३१) जयपुर के निकटवर्ती एक ग्राम में उत्पन्न कविशास्त्री ने जयपुर और वाराणसी में अध्ययन किया। तीर्थंकर महावीर स्वामी पर आधारित इनका श्रीमहावीरसौरभम् १६ सर्गों का महाकाव्य है। कवि की यह उक्ति आज के राष्ट्रिय परिप्रेक्ष्य में कितनी सार्थक है ११५ महाकाव्य इन्द्रभूते व्यक्तिसेवा न मे जात्वपि रोचते। जनार्चेव जिनार्चाऽस्ति जनतेव जनार्दनः।। ११/१७ कवि प्राचीन कथाभूमि में भी युगधर्म को अंकुरित करने में सफल हुआ है। इस रचना में संस्कृतेतर छन्दों का भी प्रयोग है। इनकी रचना गान्धिगाथा के पूर्वभाग में गान्धीजी का जीवनदर्शन है और उत्तर भाग में गांधीवाणी है। ला ला

रामरूप पाठक

(बिहार, १८६१-१६७३) सहसराम में जन्मे इस कवि ने आरम्भ में अध्ययन अपने नगर में ही किया। बाद में, काशी में एक संन्यासी स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती के अन्तेवासी होकर काव्यसाहित्य का अध्ययन किया। सरस्वती के उपासक गुरु ने इनके कवि-हदय को पहचाना और संस्कृत निर्माण के लिए प्रेरित किया। वृद्धावस्था में ये काशी जाकर रहने लगे। काशी की काव्यगोष्ठियों में इनके सहज कवित्व की प्रतिष्ठा तथा इनके सरल स्वभाव के प्रति साहित्यिक समाज का आकर्षण बढ़ने लगा। ये वाराणसी की प्रख्यात “कविभारती” के प्रथम अध्यक्ष बने। इनके द्वारा लिखित ‘चित्रकाव्यकौतुकम्’ पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। इन्होंने ‘श्रीरामचरितम्’ नाम से एक महाकाव्य की रचना की थी, जिसकी एक मात्र प्रति को वाराणसी में कोई व्यक्ति इनसे मांग कर ले गया और फिर नहीं लौटाया। वृद्ध कवि को यह याद नहीं रहा कि उन्होंने किसे अपनी अत्यन्त प्रिय रचना दे दी। इसका कष्ट उन्हें आजीवन बना रहा। इस महाकाव्य के प्रथम तथा अंशतः दूसरा सर्ग चित्रकाव्यकौतुकम् के साथ ही प्रकाशित हुए। प्रथम पद्य है रम्ये रसाद्रिनवभूमितवैक्रमाब्दे मासाश्विने सितदले सुविहाय निद्राम्। वाणी यदा मम मनःसदने ननर्त श्रीरामचन्द्रचरितं सहसा प्रवृत्तम् ।। (विक्रम संवत् १६७६ के आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में जब वाग्देवता सरस्वती ने निद्रा छोड़कर मेरे मानस के सदन में नृत्य किया तब श्रीरामचन्द्रचरित का निर्माण सहसा आरम्भ हो गया) इनके कुछ अन्य लघु-काव्य, समस्यापूर्तियां इसी ग्रन्थ में प्रकाशित हैं, जिनमें भक्तिभाव से आई कवि के मन को पद-पद पर लक्षित किया जा सकता है।

जगन्नाथ मिश्र (बिहार)

मधुवनी के बलिया ग्राम में उत्पन्न कवि मिश्र ने रामभक्त वनका या शबरी के चरित पर आधारित नौ सर्गों के ‘भारतीशबरीमहाकाव्यम्’ की रचना की। कवि की दृष्टि में शबरी की कथा काल्पनिक जैसी है। कवि त्रिवेणी में विलुप्त सरस्वती की भांति शबरी को भारती के रूप में, साथ ही प्रातःकाल गृहसम्मार्जन में लगी प्रत्येक भारतीय नारी को शबरी के रूप में देखता है। भक्तिभावना से परिलसित शबरी के वृत्तान्त पर इस कवि ने महाकाव्य की रचना करके एक नये आयाम की ओर संकेत किया है। जहां उदात्त चरित वाले पात्रों को ‘महाकाव्य" का विषय बनाने की प्रवृत्ति चली आ रही है, वहां कवि ने बिल्कुल उससे अलग हट कर एक हीन कही जाने वाली जाति की नारी को महाकाव्य का विषय बनाकर अपनी आधुनिक तथा उदार दृष्टि का परिचय दिया है। कवि ११६ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास के मन में अपने राष्ट्र भारत के प्रति आस्था है। कवि शबरी के प्रति अपना भाव इन शब्दों में प्रकट करता है यस्या न माता न पिता न बन्धुर्नासीत् समाजेऽपि पदेन मान्या। तस्या महादैन्यपयोधिवीची रामोऽभवत् पोत इव प्रणेता ।। १/७१ (जिसके माता-पिता, भाई-बन्धु न थे और न जो समाज में ही मान्य थी, उस शबरी के राम महादैन्य के समुद्र की लहरों में पोत की भांति उबारने वाले हुए।) छन्द एवं व्याकरण की शिथिलता के बावजूद रचना में कहीं-कहीं कवि की मोहक कल्पना स्फुरित हो जाती है। पत्र

श्रीनिवास रथ

(उड़ीसा १९३३) उज्जैन के विक्रमविश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के आचार्य कवि रथ आधुनिक संस्कृत साहित्य के एक समर्थ एवं प्रयोगधर्मा जागरूक गीतकार हैं। “तदेव गगनं सैव धरा” के प्रसिद्ध गायक एवं अपनी “काव्ययात्रा” में परम्परा की उपलिब्धयों को आधुनिकता से जोड़ने के प्रयास में प्रवृत्त कवि रथ ने आचार्य पं. बलदेव उपाध्याय के जीवन पर आधारित “बलदेवचरितम्” महाकाव्य की रचना की योजना बनायी है, जिसके कुछ सर्ग “दूर्वा” में प्रकाशित हो चुके हैं। ‘महाकाव्य की पारम्परिक विधा में “कुछ नया रचने का प्रयास’ स्वरूप इस रचना के पीछे जो कवि रथ की दृष्टि है वह कवि के अनुसार है “भारतीय स्वतन्त्रता के लिए केवल राजनीतिज्ञों ने ही संघर्ष नहीं किया है, परन्तु वे लोग जिन्होंने भारतीय चिन्तन-धारा, सांस्कृतिक मूल्य और भारतीय कला-रूपों के उत्थान के लिए बिना किसी विज्ञापन के सारा जीवन अर्पित कर दिया, वे लोग भी स्वतन्त्रता आन्दोलन के कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण योद्धा और शिल्पी हैं।” इनका चतुर्थ सर्ग का काशी-वर्णन आकनीय बन पड़ा है।

दिगम्बर महापात्र (उड़ीसा १६२८)

मानससन्देशम्, व्यस्तरागम् आदि काव्यों के रचयिता कवि महापात्र ने ११ सर्गों में ‘सुरेन्द्रचरितमहाकाव्य (१९८७) नाम से एक ऐतिहासिक महाकाव्य की रचना की है। महाकाव्य के नायक सुरेन्द्र भारतीय स्वातन्त्र्य-समाम के एक उत्कलीय क्रान्तिकारी योद्धा थे, जिन्होंने अपने को राष्ट्र के मुक्ति आन्दोलन में समर्पित कर दिया था। रचना इतिवृत्तात्मक होने पर भी कवि की सहज प्रतिमा की द्योतक एवं प्रसादगुणमयी है।

श्रीजीव न्यायतीर्थ (पं. बंगाल १८९२)

१६८५ ई. में प्रकाशित एवं अट्ठारह सा में निर्मित ‘पाण्डवविक्रमम्’ महाकाव्य के रचयिता श्रीजीवन्यायतीर्थ भाटपारा, २४ परगना के वयोवृद्ध प्रसिद्ध कवि थे। इस महाकाव्य की कथा महाभारत के दो पर्वो, वन तथा विराट की घटनाओं पर आधारित है। पाण्डवों ने अपने वनवास के अन्तिम चरण में द्वैतवन में अज्ञातवास किया था। उनके हस्तिनापुर लौटने तक की कथा इसमें वर्णित है। महाकाव्य के प्राचीन लक्षणों पर आधारित इस रचना में कवि ने पूर्ववर्ती महाकवियों की पद्धति के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित की है। इसमें वीर रस प्रधान रूप से प्रतिष्ठित है तथा इसके नायक महाकाव्य ११७ युधिष्ठिर हैं। धर्म की विजय और अधर्म की पराजय इसकी मूल कथा है। अट्ठारहवें सर्ग में कवि ने साहित्यदर्पण के दश परिच्छेद के निर्दिष्ट अलङ्कारों को कम से नियोजित करते हुए श्लोकों की रचना की है। महाभारत के दृष्टान्त को ध्यान में रखकर कवि ने इसमें श्रीदुर्गा तथा गो-देवता की स्तुतियां भी उपनिबन्द्र की हैं। कवि के अनुसार जनकल्याण की भावना ही उसकी प्रयोजिका है। कुछ छन्द ऐसे भी यहां प्रयुक्त हैं जिन्हें सामान्य संस्कृत के कवि महाकाव्यों में प्रयोग में नहीं लाते, जैसे कलहंस, मज्जुभाषिणी, भुजङ्गप्रयात मृगेन्द्रमुख, आर्या आदि। कवि ने प्रत्येक सर्ग के अन्त में अपने पिता श्री पञ्चानन तर्करल का बड़ी श्रद्धा के साथ स्मरण किया है। श्री पञ्चानन तर्करन ने विष्णुविक्रम और पार्थाश्वमेध महाकाव्यों की रचना की थी। कवि का भाषा पर असामान्य अधिकार है। प्राचीन महाकवियों की पद्धति पर काव्यलेखन में यह सफल कहा जा सकता है। यत्र-तत्र चमत्कार-प्रदर्शन की प्रवृत्ति भी कवि में लक्षित होती है।

विष्णुदत्त शर्मा (मेरठ, उत्तर प्रदेश १९३७)

मेरठ में जन्मे कवि शर्मा कई विषयों में आचार्य हैं तथा मेरठ के एक स्नातकोत्तर विद्यालय में अध्यापन कर रहे हैं। ‘श्रीगुरुनानकदेवचरित’ कवि शर्मा का १७ सर्गों का महाकाव्य है, जिसमें सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक देव जी के जीवन की घटनाओं के साथ उनके उपदेश एवं जीवन-दर्शन को उपनिबद्ध किया गया है। यह विश्वनाथ प्रकाशन, मेरठ से १६८२ में प्रकाशित हुआ है। आरम्भ में भारत राष्ट्र की महत्ता इन शब्दों में कवि ने व्यक्त की है यस्य स्थितिभूमितलेऽखिलेऽपि प्रधानभूता च पुरातनी च। म अङ्गीकृता सर्वजनैः सदैव जयत्यसौ भारतवर्षदेशः। १/१० जोरम (उस भारत देश की जय हो जिसकी स्थिति अखिल भूतल में श्रेष्ठ तथा पुरातन है, ऐसा सभी लोगों ने स्वीकार किया है।) गुरु नानक के श्रीमुख से कहलाये गये थे शब्द प्रवर्तमान भारतीय जीवन में व्याप्त क्षुद्र भेदभावमूलक संकीर्ण विचारों के निराकरण के लिए प्रेरित करते हैं और साथ ही कवि की सरल एवं संयत भाषा के प्रयोग में निपुणता की सूचना देते हैं सर्वोऽपि युष्मासु समानसारः कश्चित् परस्मान्न लघुर्गुरुर्वा । देहस्य सर्वेऽवयवाः समानाः समा समेषामुयोगिताऽस्ति।। न जन्मना कोऽपि पुरस्क्रियार्हस्तिरस्क्रिया)ऽस्त्यथवा मनुष्यः । कर्मैव पूज्यं न च चर्म पुंसां कर्मैव हेतुर्न हि जन्ममुक्तेः।। तस्माद् विहायाखिलजातिभेदान् सर्वे समत्वेऽपि निबद्धचित्ताः। अन्योन्यसौभ्रात्ररसेन सिक्ता हरि भजन्तो विलसन्तु लोके ।। १६/४,५,१२ (तुम लोगों में सभी समान है, न कोई बड़ा है न कोई छोटा। शरीर के सभी अंग ११८ आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास समान हैं, सबकी बराबर उपयोगिता है। कोई भी जन्म से पुरस्कार के योग्य नहीं और न तिरस्कार का पात्र है। कर्म ही मनुष्य का पूज्य है, चर्म नहीं, क्योंकि जन्ममुक्ति का हेतु कर्म ही है। अतः सभी जातिगत भेदों को भुलाकर सभी समत्व के प्रति निबद्धचित्त हों, परस्पर भाईचारे के रस से भीन कर संसार में भगवान का भजन करें।)

पशुपति झा (१९२७ ई-)

नेपाल में जनकपुर के निकटवर्ती सादा ग्राम में उत्पन्न कवि ने १५ सों में ‘नेपालसाम्राज्योदय’ महाकाव्य की रचना की है। इनकी एक और रचना ‘वातावानम्’ भी प्रकाशित है। उक्त महाकाव्य में नेपाल राज्य का इतिहास आरम्भ से वीरेन्द्रविक्रम शाहदेव के काल तक उपनिबद्ध हुआ है। अपने देश के प्रति कवि के मन की सहज आस्था तो है ही, भारत के सम्बन्ध में भी वह आस्थावान् है। जैसा कि वह कहता है यत्प्राङ्गणे भव्यमनेकतीर्थगङ्गार्कजानिर्मलतोयपूतम्। स्वरर्गलोद्घाटनमस्ति नूनं तद्भारतं वेत्ति न को जगत्याम् ।। २/१

राजकिशोर मणि त्रिपाठी

(२४ सित. १६२७ उ.प्र.) गोरखपुर के जमुई पण्डित ग्राम के निवासी कविवर त्रिपाठी ने पाणिनीय व्याकरण और दर्शन का गम्भीर अध्ययन किया और गोरखपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक रहे। इनका १६ सर्गों का राघवेन्द्रचरितम् (महाकाव्य) १६६२ में संस्कृत सेवा संस्थान, खुर्रमपुर, पोस्ट गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त इनकी कृतियों में अभिनवा स्तुतिः (१६८०), मूषकवैदुष्यम् (१६८४) तथा मुक्तकम् (१६६६) प्रकाशित हैं। रामायण की मूल कथावस्तु पर आधारित राघवेन्द्रचरित एक प्रौढ़ रचना है। त्रिपाठीजी ने इसमें एक ओर वाल्मीकि, व्यास और कालिदास की परम्परा को सुरक्षित रखने का प्रयास किया है तो दूसरी ओर उनकी अभिनव कल्पना को उसमें प्रस्फुटित होने का अवसर मिला है। सरयू और सारवार्य प्रदेश के प्रति कवि का गहरा लगाव प्रथम सर्ग में व्यक्त हुआ है। रघुनाथ की कीर्ति का गान रूप इस रचना के निर्माण में वे इस कारण प्रवृत्त हुए कि कहीं उनका भी जन्म निरर्थक न हो जाय, न कि कवित्व के दर्प के कारण निरर्थकं जन्म ममापि न स्यादतः प्रवृत्तो न कवित्वदात्। १/१६ सम्पूर्ण रचना में जहां कवि ने इतिवृत्त के निर्वाह को प्रश्रय दिया है वहीं वह उसे एक उत्तम काव्य के रूप में प्रतिष्ठित करने का भी प्रयास किया है। यहां सरयू, घाघरा, नारायणी नदियों का मानवीकरण भी हुआ है। कवि वहां कुछ अधिक भावुक हो उठा लगता है। जहां चतुर्थ सर्ग में उसने बालक राम के सौंदर्य पर मुग्ध एक पुरन्ध्री के मुख से राम । की माता (कौसल्या) के प्रति यह कहलवाया है अर्जितमोदं प्रशमिततपनं जृम्भितहासं धवलितककुभम्। निर्जितकाम जलधरवपुषं कुञ्चितकेशं कुसुमितवदनम् ।। २५ महाकाव्य ११६ अद्भुतबालो विलसतु सुचिरं समनि तेऽयं विहरतु निभृतम्। मिसाला जीवितकालं वितरतु गिरिशो रक्षतु चैनं प्रतिपलमनलः।।२६|| PE __तब पुत्र के स्नेह से आतुर कौशल्या अपने पुत्र की बड़ाई सुनकर ‘नजर’ के लगने के भाव को न जानती हुई डर जाती हैं और राम के चन्द्रमुख पर काजल लगा देती हैं। राम के मिथिलागमन के प्रकरण में भी कवि की भावुकता आकलनीय है। एकादश सर्ग में सीता के विरह से व्याकुल राम द्वारा पवन को दूत बनाकर सन्देश देने की कल्पना वाल्मीकीय रामायण में इन शब्दों से संकेतित है, जब राम कहते हैं - वाहि वात ! यतः कान्ता तां स्पृष्ट्वा मामपि स्पृश। ६/५/६ वा कालिदास के ‘मेघदूत’ से प्रभावित कविवर त्रिपाठी ने ‘पवन-दूत’ के रूप में एक सन्देश-काव्य को ही ‘मन्दाक्रान्ता’ छन्द में निबद्ध कर दिया है । एक पद्य उदाहरणार्थ - श्वासोच्छ्वासैविरहजनितेलापयन्ती मुखेन्दु शोकाश्रूणां सततपतनादागण्डं वहन्तीम्। से स्नेहाभावाद् विततचिकुरां पाण्डुरां सौम्यमूर्ति जानीयात्तां परिणतधियं जानकी वल्लभां मे।। ११/१६६ (विरह से पैदा होने वाले श्वासोच्छास से मुखचन्द्र को मलिन करती हुई, शोकजनित आंसुओं के निरन्तर गिरते रहने से गीले कपोलों को धारण करती हुई तैलादि के अभाव में बिखरे केशवाली जो पीली सौम्यमूर्ति है, मेरे ध्यान में रची हुई उसे मेरी प्रियतमा जानकी समझना।) __ इस रचना के कारण ‘पण्डितराज’ कविवर त्रिपाठी जी आधुनिक संस्कृत के रचनाकारों में सुप्रतिष्ठित हैं।

इन्द्रदेव द्विवेदी “इन्द्र”

का जन्म बिहार के भोजपुर के एक गांव लहठान में १६४० में हुआ। आपने काशी में अध्ययन के पश्चात् अध्यापन भी किया। केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, लखनऊ में प्रवाचक पद पर सेवारत थे। इनकी रचना ‘सूक्तिमन्दाकिनी’ उ. प्र. संस्कृत अकादमी, लखनऊ से पुरस्कृत हुई है। इनके द्वारा रचित २१ सों का महाकाव्य ‘सुदामचरित’ १६६२ में भारती साहित्य परिषद् गोमतीनगर लखनऊ से प्रकाशित हुआ है। प्राचीन सदामचरित पर आधारित इस रचना में कवि ने सुदामा द्वारा श्रीकृष्ण के हृदय का परिवर्तन महात्मा गान्धी के सिद्धान्त के अनुसार निबद्ध करके कथावस्तु को एक नया मोड़ दिया है। हिंसा से हिंसा को बढ़ावा ही मिलता है अतः वह समस्या का समाधान नहीं है। तृतीय सर्ग में कवि ने वर्षावर्णन के प्रसङ्ग में विभिन्न छन्दों की ही वर्षा कर दी है।

बलभद्र शास्त्री

का १४ सर्गों का ‘दूताञ्जनेय’ महाकाव्य वाग्देवता प्रकाशन, १४ अशोक नगर, बरेली (उ.प्र.) से १६६३ में प्रकाश में आया। इसमें श्रीहनुमान् द्वारा श्रीराम १२० आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास के दौत्यकर्म का मुख्यतः वर्णन है। यह विचारणीय है कि उक्त रचना एक दूतकाव्य कोटि की है अथवा महाकाव्य की कोटि की!

शिवकुमार शास्त्री

का जन्म बिहार के वर्तमान कैमूर जिले के मुख्य नगर भभुआ में उन्नीसवीं शती के नवें दशक में हुआ था तथा देहावसान १६५० में। इन्होंने भारतीय स्वातन्त्र्य-संग्राम से प्रभावित होकर १६ सर्गों में ‘श्रीवीरकुमारसिंहचरित’ महाकाव्य लिखा, जो गायत्री-प्रकाशन, बुद्धकालौनी, पटना (बिहार) से १EE५ में प्रकाशित हुआ है। भोजपुर क्षेत्र में बाबू “कुंअर सिंह” नाम से सुख्यात इस स्वातन्त्र्य-वीर ने १६५७ में अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध तलवार उठायी थी। सम्भवतः इस स्वातन्त्र्य सेनानी पर रचित संस्कृत की यह प्रथम रचना है। उल्लेख्य है कि चन्द्रशेखर मिश्र ने भोजपुरी भाषा में “कुंअर सिंह” नाम से एक महाकाव्य (१९६६) की रचना की है।

त्रिपुरारिशरण पाण्डेय

(जन्म १६२८) झकरासी नायन राज्य, राय बरेली (उत्तर प्रदेश) में उत्पन्न कवि पाण्डेय द्वारा चौदह सर्गों में रचित ‘रामामरचरितामृत महाकाव्य’ १६६५ में समीक्षा प्रकाशन, गांधी नगर, बस्ती (उ. प्र.) द्वारा प्रकाशित किया गया है। विष्णु के अंशावतार भगवान परशुराम के चरित पर आधारित इस महाकाव्य के रचनाकार की दृष्टि आज के युग में उत्पन्न सांस्कृतिक संकट के कारण क्षरित हो रहे मानव मूल्यों पर पड़ी है। निगम काला द्वितीय अध्याय