०१. पिप्रहवा बौद्ध पात्र अभिलेख
यह अभिलेख उत्तर प्रदेश के बस्ती मण्डल के उत्तरी पूर्वी सीमा पर नेपाल राज्य से प्रायः आधा मील दक्षिण दिशा में अवस्थित पिप्रहवा नामक स्थान से उपलब्ध हुआ है। __ इस अभिलेख की भाषा प्राकृत है। इसकी लिपि मौर्यकालीन ब्राह्मी है। यह एक मृत्पात्र की गर्दन पर अंकित है। कतिपय विद्वान् इसे पद्य मानते हैं। टॉमस ने इसे पद्य में आर्या छन्द ढूढ़ने का प्रयास किया है, परन्तु फ्लीट ने इसे उपगीति अथवा उद्गीति छन्द में निबद्ध माना है। सुकिति भतिनं स-भगिनिकनं-स-पुतः दलनः इयं सलिल निधने बुधस भगतवे सकि (यानं) (११ + ) (भगवान् बुद्ध के शरीर का यह पात्र सुकीर्ति के भाइयों ने अपनी बहन, पुत्र, स्त्री एवं प्रियजन के साथ प्रतिष्ठापित किया।) भगवान् बुद्ध के अवशेषों की स्थापना का उल्लेख ही इस लघु अभिलेख का उद्देश्य प्रतीत होता है। इसका समय डॉ. सरकार ने तीसरी शताब्दी ई. पू. माना है। इस अभिलेख का महत्त्व कतिपय कारणों से है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि भारतवर्ष में उपलब्ध १. अष्टा. ६.३.८१ पर वार्तिक-देवानां प्रिय इति च मूर्खे। अन्यत्र देवप्रियः। अभिलेखीय साहित्य ३४१ ऐतिहासिक कालीन अभिलेखों में यह प्राचीनतम है। इस लेख में दीर्घस्वरों के अभाव से इसे कुछ विद्वान् प्राङ्मौर्य-युगीन मानते हैं। डॉ. सरकार के अनुसार यह विशेषता प्रायः सभी प्राचीन अभिलेखों में मिलती है। १८६७-६८ में डब्ल्यू.सी. पेपो ने इस स्तूप की खुदाई की थी और पुनः १६७२ में के.एम. श्रीवास्तव ने खुदाई की।
- सम्राट अशोक के अभिलेखों के अतिरिक्त पालि अभिलेख प्रचुर मात्रा में हमें उपलब्ध हैं। ये पुराने भी हैं और इनकी परम्परा अर्वाचीन काल तक अविच्छिन्न है। तृतीय एवं द्वितीय शताब्दी ई.पू. से लेकर अट्ठारहवीं शताब्दी पर्यन्त पालि-अभिलेख उपलब्ध हैं। यह ठीक है कि ये साहित्यिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से उतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, पुनरपि पालि-साहित्य के विकास के दृष्टिकोण से कम महत्त्व के नहीं है। स्थानाभाव के कारण हम यहाँ निम्नलिखित सात मुख्य अभिलेखों का ही संक्षेपतः उल्लेख करना उचित समझते हैं १. सांची के अभिलेखः-सांची के स्तूप तीसरी-दूसरी शताब्दी ई.पू. के माने जाते हैं। इस स्तूप की पाषाण वेष्टनियों पर अनेक बौद्ध कथायें चित्ररूप में अंकित हैं। ये जातक-कथा से बहुत मिलते-जुलते हैं। इन वेष्टनियों पर जो अभिलेख प्राप्त हैं, वे भारतीय पुरातत्त्व के अनमोल रत्न हैं। साथ ही ये पालि त्रिपिटक की प्राचीनता और प्रामाणिकता को सिद्ध करने के लिए ठोस प्रमाण-स्वरूप हैं। २. सारनाथ के कनिष्क-कालीन अभिलेख-सारनाथ संग्रहालय में बोधिसत्व की एक लम्बी मूर्ति सुरक्षित है। इस पर तीन अभिलेख उत्कीर्ण हैं। ये महाराज कनिष्क के शासन-काल के तृतीय वर्ष में उत्कीर्ण हुए थे। इनका विषय भगवान् बुद्ध का धम्म-चक्क-प्रवत्तन है। वाराणसी में बुद्ध के चार आर्य-सत्यों का उपदेश दिया गया था। वे ही यहाँ पर शब्दरूप में वर्णित हैं-चत्तारि मानि भिक्खवे अरिय सच्चानि। इससे प्रमाणित होता है कि ईसवी सन् के आरंभ में पालि भाषा में वर्णित बुद्ध के वचन ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमाण स्वरूप माने जाने लगे। ३. मौगन (बरमा) के स्वर्णपत्र-लेख-द्वय, ४. मब्जा (प्रोमबरमा) का पंचम-षष्ठ शताब्दी स्वर्ण-पत्र-लेख, ५. मब्जा के बोबोगी पैगोडा में उपलब्ध भग्न पाषाण-लेख, ६. पगान (बरपा) का १४४२ ई. का अभिलेख और १. संदर्भ-व्यूलर, जे. आर.ए. एस., १८६८, पृ. ३८७ प्र. ब्लॉख, वहीं १८६६, पृ. ४२ अ.। फ्लीट, वही, १६८५, पृ.६७६, अ, टॉमस, वही, १६०६, पृ. ४५२ अ. १६०७, पृ.१०५ अ, लूडर्स, स्टडीज, इन इण्डियन एपिग्राफी. २, पृ. १४० अ. ३४२ गद्य-खण्ड ७. रमण्य देश (पेगू-बरमा के नृप धम्मचेति का सन् १४७६ ई. का विख्यात कल्याणी अभिलेख) अशोकीय अभिलेखों का महत्त्वः-अशोकीय अभिलेख भारतवर्ष के प्राचीनतम तथा अतिशय महत्त्वपूर्ण लेख माने जाते हैं। इसकी महत्ता निम्नलिखित दृष्टियों से है-सम्राट् अशोक के अभिलेखों से सम्राटू के व्यक्तिगत जीवन एवं परिवार से सम्बद्ध प्रामाणिक सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। इससे ज्ञात होता है कि उनके कतिपय भाई-बहन थे और कम-से कम दो रानियाँ थीं। उसने राज्यारोहण के आठवें वर्ष में कलिंग पर चढ़ाई की और उसे जीत लिया। युद्ध की विभीषिका से संतप्त होकर वह बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। उसके साम्राज्य की सीमा उत्तर में कालसीन एवं नेपाल की तराई, दक्षिण में ब्रह्म-गिरि-सिद्धपुर आदि स्थान; पूर्व में कलिंग, पश्चिम में जूनागढ़ एवं उत्तर-पश्चिम में कनधार तक फैली हुई थी। अशोक के अभिलेखों से उसके प्रशासन पर भी प्रकाश पड़ता है। वह सार्वभौम सम्राट् था। उसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। राजकुमारगण ‘वायसराय’ के रूप में नियुक्त होते थे।
- प्रशासन एवं न्याय व्यवस्था के क्षेत्र में उन्होंने कुछ अभिनव प्रयोग किये। महामात्र, धर्म-महामात्र, राजक’ स्त्र्यध्यक्ष महामात्र,’ ब्रजभूमिक, अन्तः महामात्र, युक्त, प्रादेशिक का पर्याप्त परिचय अशोक के ‘अभिलेख’ में उपलब्ध होता है। कर-व्यवस्था से सम्बद्ध अत्यल्प चर्चा मिलती है। परन्तु रूम्मिनदेई स्तम्भलेख में ‘बलि’ नामक कर में छूट देने का उल्लेख अवश्य ही मिलता है। वह अपनी प्रजा को अपनी सन्तान ही समझता था। प्रजा के कल्याणार्थ कतिपय योजनाएँ उसने चलाई। मनुष्यों एवं पशुओं की चिकित्सा की व्यवस्था भी की गयी। सड़कों के किनारे सघन वृक्ष लगाए गए, जलाशयों का निर्माण किया गया, आम्रकुंज लगाए गये, आधे-आधे कोस पर कूप निर्मित किए गये। ये सभी कार्य धर्मार्थ ही सम्पन्न हुए। जन साधारण में उसने धर्म के जिस रूप का प्रचार और प्रसार किया था, उसे स्वीकार करने में जन-साधारण को कोई हिचक नहीं थी। धर्म-प्रचारार्थ पूरे साम्राज्य की शक्ति उसने लगा १. द्रष्टव्य, षष्ठ शि. ले. एवं अन्य कतिपय लेख २. द्रष्टव्य, चतुर्थ स्त. ले. ३. द्रष्टव्य, सप्त स्त. ले. ४. द्रष्टव्य, द्वादश शि.ले. ५. द्रष्ट. त्रयोदश शि. ले. ६. द्र. तृतीय शि.ले. ७. द्र. वही. ८. द्र. वही. अभिलेखीय साहित्य ३४३ दी। धर्म-प्रचार के निमित्त उसने सभी उपायों का अवलम्बन किया। बौद्ध-संघों के वर्तमान मतभेद के दूरीकरणार्थ प्रयत्न किया। उसने एक समागम का आयोजन किया जिसके फलस्वरूप सभी लोभी एवं श्रद्धाविहीन भिक्षुओं को संघ से बहिष्कृत करवा दिया। पुनः तीसरी संगीति का आयोजन किया गया। सम्राट् ने कतिपय बौद्ध ग्रन्थों के प्रचार के लिए अथक प्रयास भी किया। साथ ही उसने भगवान् बुद्ध के देहावशेषों पर स्तूप भी निर्मित करवाए। बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ भारत के विभिन्न प्रदेशों के अतिरिक्त विदेशों में भी भारतीय धर्म-प्रचारक भेजे गये। अशोक के ऐसे भी अभिलेख हैं जिनमें मिश्र एवं पश्चिम एशिया के यूनानी राज्य एवं उनके शासकों का उल्लेख मिलता है। अशोक के अभिलेख के अतिरिक्त और दूसरे भारतीय अभिलेख में इस वैशिष्ट्य का सर्वथा अभाव दृष्टिगोचर होता है। लिप्यात्मक, भाषात्मक एवं साहित्यिक महत्त्व-सम्राट अशोक के अभिलेखों से तत्कालीन लिपि, भाषा एवं साहित्य पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। अशोक-कालीन पश्चिमोत्तर प्रदेशीय अभिलेखों में यूनानी, एरेमाइक और खरोष्ठी लिपियों का प्रयोग किया गया है। शाहबाज़गढ़ी एवं मानसेरा अभिलेख खरोष्ठी लिपि में अंकित प्राचीनतम लेख माने जाते हैं। अवशिष्ट सम्पूर्ण भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रयुक्त हुई। सम्राट अशोक के अभिलेखों का साहित्यिक महत्त्व भी कम नहीं है। इन अभिलेखों से अशोक के काल में बौद्धत्रिपिटक की विकासावस्था पर प्रकाश पड़ता है।’ अभिलेखीय भाषा पर पालित्रिपिटक की भाषा और वाक्य-विन्यास आदि का गम्भीर प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। तत्कालीन अभिलेख बौद्ध धर्मेतर साहित्य के अध्ययनार्थ महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते हैं। अवध्य पशुओं की सूची बौधायन एवं वासिष्ठ-धर्मसूत्र से मिलती-जुलती है। अशोक की ‘देवानं प्रिय’: उपाधि तो ब्राह्मण-साहित्य की ही देन है। अशोक के अभिलेखों की शैली गद्य के इतिहास के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। ये सरल, सुबोध एवं पूर्णतः स्वाभाविक हैं। ये सर्वविध अलङ्करणों से मुक्त हैं एवं जीवन के गाम्भीर्यपूर्ण पक्षों और अनुभवों पर अधिश्रित होने के फलस्वरूप उसी महिमा से मण्डित है जिसे हम उपनिषदों के उपदेश में पाते हैं। ये सम्राट अशोक की निष्कपटता एवं उत्साह १. प्रा.भा. अ. सं. पृ. ६१ पिटक शब्द उसके लेखों में पूर्णतः अज्ञात है। इससे लगता है कि अशोक के समय तक ‘पिटक’ और उसके अन्तर्गत ‘निकाय’-साहित्य अपने वर्तमान रूप में अस्तित्व में नहीं आये थे। २. द्रष्टव्य, बरुआ, अशोक एण्ड हिज़ इन्स्क्रिप्शन्स्-२ पृ. ३४० अ. ३. १. उदाहरणार्थ उसके द्वारा प्रयुक्त ‘परिस्रवे’, ‘अपरिस्रवे’ १०वाँ शि. ले तथा “असिनवे" (२ स्त. ले.) शब्द बौद्ध न होकर जैन-साहित्य से लिए गये लगते हैं। (प्रा.भा. अ. सं., पृ. १३८ से उद्धृत) ४. स्त. ले. ५ ३४४ गद्य-खण्ड को व्यक्त करते हैं। यह कल्पना युक्ति-संगत प्रतीत होती है कि सम्राट् ने स्वयं ही इसका प्रारूप बनाया होगा। इसका कारण यह है कि इसमें राजसभासद एवं लिपिक की अभ्यास-जनित चाटुकारिता का कोई संकेत नहीं मिलता। कतिपय विद्वानों की धारणा है कि अशोक के अभिलेखों और डेरियस महान् (Darius, the Great) के प्रसिद्ध प्रस्तरलेख की शैली में अत्यधिक साम्य परिलक्षित होता है। शिलालेखों का भाषा-वैज्ञानिक महत्त्व-प्राच्य बोली गंगा-यमुना के मैदान के स्तम्भों और कालसी तथा उड़ीसा के शिलोत्कीर्ण धर्मादेशों में केवल अल्प रूपान्तरों के साथ पायी जाती है। यहाँ ‘र’ के स्थान में ‘ल’ पाया जाता है। अकारान्त पुल्लिङ्ग और नपुंसक संज्ञाओं की प्रथमा विभक्ति के एक वचन के रूप मागधी के समान ए-कारान्त होते हैं। यहाँ ‘स’ मिलता, ‘श’ नहीं (साथ ही कालसी के शिलालेख में ‘ष’ भी दिखाई पड़ता है।) लूडर्स की धारणा है कि यह अशोक की राजसभा की भाषा थी और इसका प्रभाव पश्चिमोत्तर प्रदेश के अन्य शिलालेख की बोली पर भी परिलक्षित होता है। गिरनार के अभिलेख की बोली में प्रथमा एकवचन में ओ-कारान्त रूप और नप. में अं वाले रूप मिलते हैं। साथ ही ‘र’ और ‘स’ ध्वनियाँ भी पायी जाती हैं (प्रिये, जने की जगह प्रियो, जनों और मूल की जगह मूलं)। इसकी विशेषताएँ पालि जैसी हैं। ऐसी कल्पना की जाती है कि यह उज्जैन की भाषा के अधिक निकट है। भारत के दक्षिण भाग के अभिलेख प्राच्य धर्मादेशों की अपेक्षा प्रतीच्य से अधिक साम्य रखते हैं, परन्तु इनकी कुछ निजी विशेषताएँ भी हैं। पश्चिमोत्तर धर्मादेश प्राच्य एवं प्रतीच्य दोनों से भिन्न है। मानसेहरा में शाहबाजगढ़ी की तुलना में मागधीत्व (magadhism) अधिक है। दोनों में ही र, श, स पाए जाते हैं। शाहबाजगढ़ी में अकारान्त (पु.) प्रथमा एकवचन में ओ, नपुंसक लिंग में अं की बहुलता है, जबकि मानसेहरा में इन स्थानों में र-ही पाया जाता है। दोनों में ही र के साथ अनेक वर्णों का संयोग प्रायः वर्ण-विपयर्य (Metathesis) के रूप में मिलते हैं। पियदसि की जगह प्रियद्रसि, भूतप्रुव = गिर-भूतपूर्व = धौलि हूतपुलवा, शाह-त्रयो = गिरः त्री, शाह. ग्रुगो, मान. म्रिगे = गिर. मगो = प्राच्य मिगे। अन्तिम उदाहरण प्रातीच्य एवं प्राच्य अभिलेखों की एक भिन्नता का उदाहरण है। शाहबाजगढ़ी में ‘क्ष’ मिलता है, जैसे क्षमितविय, लेकिन गिरनार में छमितवे, और प्राच्य में खमितवे मिलते हैं। प्राच्य और पश्चिमोत्तर दोनों में प्रिय के ‘प्र’ जैसे संयुक्ताक्षर पहले संस्कृतत्व (Sanskriticism) समझे जाते थे। परन्तु ये प्राचीन ध्वनिविज्ञान के अवशेष हैं और ये आज भी पश्चिमी प्रदेश की आधुनिक बोलियों में वर्तमान है-जैसे हँदा त्रे (तीन) और सिन्धी द्रण। अभिलेखीय साहित्य ३४५ पश्चिमोत्तर अभिलेखों के रूपों की तुलना अन्य धर्मादेशों के साथ करते समय यह नहीं भूलनाः चाहिए कि खरोष्ठी में ह्रस्व और दीर्घ स्वर में कोई भिन्नता प्रतीत नहीं होती। साथ ही अशोक के अभिलेखों की न खरोष्ठी और न ब्राह्मी में ही द्वित्त्व प्राप्त व्यंजन मिलते हैं। इस प्रकार चकवाके मिलता है, न कि चक्कवाके, चक्खुदानें नहीं मिलता है, बल्कि चखुदाने। बैराट-बाभ्रा अभिलेख में पाये जाने वाले लाघुल (पालि राहुल) और अधिगिच्य (पालिअधिकृत्य) रूप दूसरे अभिलेखों में नहीं मिलते। ये बोद्ध धर्म-ग्रन्थों की एक प्राचीनतर भाषा की ओर संकेत करते हैं। प्रियदसि, सर्व, प्रासादे और अभिप्रेत रूपों, को, जिन्हें हुलत्श ने इस अभिलेख में खोज निकाला है, उस बोली के लिए जिसमें सर्वत्र र का ल आदेश हो जाता है, विलक्षण प्रतीत होता है। यहाँ निश्चित रूप से स्वीकार करना चाहिए कि ये सभी संयुक्त ‘र’ लघुरेखिका (Small dash) के अवबोध पर आश्रित है और यह कहीं भी सुस्पष्ट नहीं है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अशोकीय अभिलेख तो तत्कालीन भारत का स्पष्ट भाषायी ज्ञानचित्र हमारी आँखों के सामने प्रस्तुत करते हैं।