०८ सिंहासनद्वात्रिंशिका

“सिंहासनद्वात्रिंशिका’ के अन्तर्गत भारतीय जनमानस में चिरकाल से प्रतिष्ठित पुण्यश्लोक विक्रमादित्य के यशस्कर, अद्भुत एवं पराक्रमोत्कर्ष से समुज्ज्वल अतिमानुषीय कृत्यों के वर्णन से सम्बद्ध बत्तीस कथाएँ निबद्ध की गयी हैं। इस कथाग्रन्थ के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में हुए हैं जो अत्यन्त ही लोकप्रिय हैं। ऐसी किम्वदन्ती है कि विक्रमादित्य को देवराज इन्द्र ने एक दिव्य सिंहासन उपहार में प्रदान किया था, जिसमें दिव्य आत्माओं से अधिष्ठित बत्तीस पुतलियाँ लगी थीं। अपने सुदीर्घ जीवन के अन्तिम दिन में शालिवाहन द्वारा पराजित होने के बाद सिंहासन पर अन्तिम बार बैठकर पुतलियों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मेरे देहावसान के पाँच सौ वर्षों के बाद भोज नामक नृपति पृथ्वी के गर्भ से इस सिंहासन को प्राप्त करेगा और इस पर बैठने के लिए उद्यत होगा। तुम सभी उससे मेरे महनीय कृत्यों का वर्णन करोगी और उसके बाद मुक्त होकर स्वर्ग में अपना स्थान-ग्रहण करोगी। इतना कह कर वे सिंहासन से उतर पड़े और उसे भूगर्भ में छिपा दिया। ईसा की ग्यारहवीं शताब्दी में धाराधिपति भोजराज एक दिन जब अपने अमात्य नीतिवाक्य के साथ मृगया के क्रम में जंगल में घूम रहे थे तब एक टीले के नीचे भूगर्भ में गड़े हुए उक्त सिंहासन का पता लगने पर उन्होंने उसे निकलवाया और बड़े ही धूमधाम के साथ उसका पूजन सम्पन्न किया। शान्ति-स्वस्त्ययन, वेदपाठ एवं प्रभूत ब्राह्मण भोजन जैसी माङ्गलिक विधियों के पश्चात् सिंहासन पर चढने के लिए जब उन्होंने पैर बढ़ाया तभी पहली सीढ़ी पर खड़ी पुतली ने उन्हें रोकते हुए विक्रमादित्य के जन्म और उनकी दैवी सिद्धियों से सम्बद्ध उपाख्यान कह सुनाया और उनसे पूछा कि क्या आप समझते हैं कि उनका कोई भी गुण शतांश में भी आप में विद्यमान है जिससे आप इस सिंहासन पर बैठ कर शासन कर सकें? राजा भोज अपने अमात्य नीतिवाक्य के साथ इस २५८ गद्य-खण्ड कहानी को सुनकर आश्चर्यचकित हो गये। इतने में दिन बीत गया और वे हतप्रभ होकर लौट गये। __ इसी प्रकार एक-एक कर सभी पुतलियाँ लोकगाथा में लोकातीत चरितों के भास्वर प्रभामण्डल से विराजमान विक्रमादित्य के विरुद-वर्णन के द्वारा धाराधिपति भोजराज को निरन्तर विस्मयाभिभूत करती रहीं। अन्त में, उन्होंने कहा कि राजन! हम सबों ने अपने कर्तव्य का पालन किया और अब आप एक वर्ष तक इस सिंहासन पर बैठ कर शासन कर सकते हैं। इतना कहने के बाद वे सभी पुतलियाँ बन्धनमुक्त होकर स्वर्ग चली गयीं। __इस कथाग्रन्थ के कई संस्करण उपलब्ध होते हैं जिनमें क्षेमकर-रचित जैन संस्करण उल्लेखनीय है। इसमें प्रत्येक कथा के प्रारम्भ तथा उपसंहार में श्लोकों का सन्निवेश किया गया है, जिनके अन्तर्गत कथाओं की विषय-वस्तु का उल्लेख किया गया है। इसका एक दक्षिण भारतीय संस्करण भी प्राप्त होता है जिसके गद्यभाग में सूक्तिमूलक एवं वर्णनपरक श्लोक उपलब्ध होते हैं। तथाकथित रूप से वररुचि-प्रणीत इसका बंगाली संस्करण पूर्वोक्त जैन संस्करण के आधार पर ही रचित हुआ है। इसकी भाषा में साहित्यिक सौन्दर्य के उन्मीलन के स्थान पर कथा को सरल आख्यान-प्रकार पर ही लेखक का आग्रह लक्षित होता है। विक्रमादित्य के अद्भुत कृत्यों के वर्णन से सम्बद्ध अन्यान्य कृतियों में अनन्तप्रणीत वीरचरित महाकाव्य तथा शिवदास-प्रणीत शालिवाहनकथा उल्लेखनीय हैं।