०६ वेतालपञ्चविंशतिका

वेतालपञ्चविंशतिका के अन्तर्गत राजा त्रिविक्रमसेन जिसे परवर्ती साहित्यकारों ने विक्रमादित्य से समीकृत किया है, के बौद्धिक उत्कर्ष से दीप्त पच्चीस कहानियाँ निबद्ध की गई हैं। इन कहानियों का आख्याता एक शवशरीर में अधिष्ठित वेताल है, जो विविध जटिल प्रश्नों से पूर्ण कहानियाँ राजा को सुनाता है और उनका समुचित उत्तर पाते ही पुनः अपने पुराने आश्रय-वृक्ष पर जा लटकता है। इन कथाओं का सर्वप्रथम वर्णन क्षेमेन्द्र रचित बृहत्कथा-मञ्जरी में तथा तत्पश्चात् सोमदेव-प्रणीत कथा सरित्-सागर में प्राप्त होता है। ये वेताल-कथाएँ असन्दिग्ध रूप से भारत के चिरन्तन कथा-साहित्य की लोकप्रिय प्रकृति का निदर्शन प्रस्तुत करती हैं। __वेतालपञ्चविंशतिका के नाम से सम्प्रति प्रचलित ग्रन्थों के कई संस्करण प्राप्त होते हैं, जिनमें शिवदास-रचित संस्करण के अन्तर्गत गद्य और पद्य का समिश्रण देखा जाता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इस ग्रन्थ का मूलरूप पद्यबद्ध ही रहा होगा। एक अज्ञातकर्तृक संस्करण केवल गद्यात्मक रूप में उपलब्ध होता है, जिसकी रचना क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामञ्जरी में वर्णित वेताल-कथाओं के आधार पर की गई है। जम्भलदत्तरचित इसके एक परवर्ती संस्करण में पद्यबद्ध नीतिपरक अंश उपलब्ध नहीं होते हैं। आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रस्तुत वेताल-कथाओं का आधार वल्लभदास-रचित एक संक्षिप्त ग्रन्थ है जिसका रूपान्तर मंगोल-भाषा में भी उपलब्ध होता है। वेतालपञ्चविंशतिका के आमुख और उपसंहार की संरचना इस प्रकार है : राजा त्रिविक्रमसेन को एक भिक्ष प्रतिदिन एक फल दिया करता था जिसे वे कोषाध्यक्ष को दे देते थे। यह क्रम दस वर्षों तक चलता रहा। एक दिन राजा को यह बात संयोगवश ज्ञात हो गयी कि प्रत्येक फल में एक-एक रत्न निहित रहा करता है। कोषाध्यक्ष से पता लगाने पर बात सच निकली। राजा का हृदय उस भिक्षु की इस असाधारण राजभक्ति को देखकर उसकी ओर आकृष्ट हो गया। एक दिन राजा के द्वारा इस मूल्यवान् भेंट का कारण पूछे जाने पर वह भिक्षु राजा को एकान्त में ले गया और कहने लगा कि मुझे एक मन्त्र की साधना करनी है जिसमें किसी वीर पुरुष की सहायता अपेक्षित है। मैं आपसे उक्त कार्य में सहायता की प्रार्थना करता हूँ। आगामी कृष्णचतुर्दशी को महाश्मशान में वटवृक्ष के नीचे मैं आपकी प्रतीक्षा करूँगा। यह सुनकर राजा ने कहा कि ठीक है, मैं आऊँगा। मनोरञ्जक कथाएँ २५३ और, जब कृष्णचतुर्दशी की रात आई तब राजा त्रिविक्रमसेन अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण कर उस भिक्षु की साधना में सहायता करने के लिए हाथ में तलवार लेकर अपनी राजधानी से, अलक्षित रूप में, महाश्मशान की ओर निकल पड़े। वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि चारों ओर भयङ्कर सघन अन्धकार छाया हुआ है। अनेक चिताएँ वहाँ जल रही थीं, जिनकी काँपती ज्वालाएँ बहुत ही भयानक दिख रहीं थीं। सर्वत्र असंख्य नरकंकाल, खोपड़ियाँ तथा हड्डियाँ फैली हुई थीं। आनन्द से उन्मत्त होकर शोर मचाते हुए भूत-वेतालों से वह स्थान परिपूर्ण था। रह-रह कर सियारों के क्रन्दन का समवेत नाद सुनाई पड़ता था, जिससे भय के मारे रोंगटे खड़े हो जाते थे। परन्तु राजा त्रिविक्रमसेन निर्भय हो कर वहाँ भिक्षु को ढूंढ रहे थे। कुछ दूर जाने पर एक वटवृक्ष के नीचे उन्होंने उस भिक्षु को देखा जो मण्डल के निर्माण में लगा था। उसके पास जाकर राजा ने कहा “भिक्षक ! देखो, मैं आ गया। बोलो, अब मैं तुम्हारा कौन सा कार्य करूँ ?” उसने कहा “राजन् ! आप यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर चले जाइये। वहाँ बहुत दूर जाने पर शिंशपा का एक वृक्ष दीख पडेगा जिसकी डाल से एक मृतक का शरीर लटक रहा है। आप उसे यहाँ लाइये और मेरा कार्य पूरा कीजिए।” सत्यप्रतिज्ञ उस राजाने “ठीक है ऐसा ही होगा” यह कहकर चिता से एक जलती हुई लुकाठी उठा ली और उसके अस्फुट प्रकाश के सहारे चलते हुए भिक्षु द्वारा निर्दिष्ट शिंशपा वृक्ष के समीप आये। वहाँ, डाल से लटक रहे ‘शव-शरीर’ को पेड़ पर चढ़ कर राजा ने गिरा दिया। गिरने के साथ ही मानो आघात की व्यथा से वह चीत्कार कर उठा। वृक्ष से उतर कर राजा ने ज्यों ही उसके अंगों को सहलाना प्रारम्भ किया त्यों ही उस शव ने अट्टहास किया और राजा के देखते ही देखते वहाँ से लुप्त हो कर पुनः उसी वृक्ष पर वह जा लटका। यह देखकर राजा ने समझ लिया कि वह शवशरीर वेताल से अधिष्ठित है। उन्होंने पुनः साहसपूर्वक वृक्ष पर चढ़कर सावधानी से शव को उतारा और अपने कन्धे पर रक्खा। तत्पश्चात् उसे लेकर चुपचाप वे भिक्षु के पास चल पड़े। रास्ते में उस शव में अवस्थित वेताल ने राजा के मनोविनोदार्थ एक उलझन भरी कहानी उनसे कह सुनायी और अन्त में उसने कहा कि तू यदि इसका समाधान जानता है तो जल्दी कह दे अन्यथा तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे। बुद्धिमान् राजा से उसका समाधान पाकर वेताल नियमानुसार मैं पुनः उसी स्थान पर लौट चला। इसके बाद वेताल से अधिष्ठित वह शव आकाश-मार्ग से फिर वहीं जाकर वृक्ष की डाल से जा लटकता और खङ्गहस्त राजा पुनः उसके. लाने के प्रयास में लग जाते। यह सिलसिला तेईस बार तक चला। अन्त में चौबीसवें बार वेताल ने जैसी उलझनभरी कहानी राजा से कह सुनायी कि उसका समाधान राजा से करते न बना। उस कहानी में कहा गया था कि कोई विपदा की मारी माँ-बेटी विन्ध्याटवी के एक सरोवर के समीपवर्ती वृक्ष की छाया में विश्राम कर रहीं थीं। रास्ते में उनके पदचिह्न अङ्कित थे जिनमें माँ के पद-चिह्न छोटे थे और बेटी के बड़े। २५४ गद्य-खण्ड आखेट के क्रम में उस रास्ते से आते हुए पिता-पुत्र ने इन पद-चिह्नों को देखकर आपस में यह निश्चय किया कि यदि इन पद-चिह्नों वाली स्त्रियाँ मिल जायें तो उनमें से बड़े पदचिह्नवाली स्त्री से पिता तथा छोटे पदचिह्न वाली स्त्री से पुत्र विवाह कर लेगा। बाद में उनका साक्षात्कार होने पर पूर्व नियमानुसार पिता ने बेटी से तथा पुत्र ने उसकी माता से विवाह कर लिया। कालक्रम से उन दोनों के सन्ताने हुईं। इतना कह कर वेताल ने प्रश्न किया कि राजन्! यदि तू जानता है तो बतला कि उन माँ-बेटियों को अपने-अपने पतियों से जो आपस में पिता-पुत्र थे- जो सन्ताने हुईं उनका आपस में कौन सा सम्बन्ध हुआ? यदि जानते हुए भी तूने नहीं बतलाया तो तेरा मस्तक शतधा खण्डित हो जायगा। राजा ने इस प्रश्न के समाधान के क्रम में बहुत सोच-विचार किया, परन्तु जब उसे कुछ भी कहते न बना तब वह हारकर निरुत्तर हो गया और चुपचाप शव को लेकर चलता रहा। राजा के मौन पर वेताल को मन ही मन हँसी आई और वह समझ गया कि राजा इस महाप्रश्न का उत्तर नहीं जानता है। राजा को, फिरभी, अनुद्विग्न भाव से चुपचाप चलता हुआ पाकर उसके धैर्य और साहस पर वेताल मुग्ध हो गया। उसने स्थिर किया कि इस महापराक्रमी राजा को इसके साहस और परोपकारिता का पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए। परन्तु वह भिक्षु तो बड़ा ही दुष्ट है और मेरे साथ चालाकी का खेल खेल रहा है। अतः, उस भिक्षु को उपायपूर्वक वञ्चित कर उसे प्राप्त होनेवाली सारी अलौकिक सिद्धियाँ इस राजा के लिए सुलभ कर दूंगा। __ ऐसा सोचकर वेताल ने राजा से कहा कि राजन् इस भयङ्ग अंधेरी रात में महाश्मशान में बारम्बार आने-जाने के कष्ट को झेलते हुए भी तुम अपने निश्चय पर अटल रहे। तुम्हारे इस आश्चर्यजनक धैर्य को देखकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ। अब तुम इस शव को उस भिक्षु के पास ले जाओ। मैं इसके शरीर से बाहर हो जाता हूँ। और, तुम्हारे कल्याण के लिए जो मैं कहता हूँ उसे ध्यान-पूर्वक सुनो और तदनुसार कार्य करो। तुम जिस दुष्ट भिक्षु के लिए यह शव-शरीर ले आये हो वह आज की रात इस शरीर में मेरा आह्वान करके पूजन करेगा और तत्पश्चात् वह दुष्ट तुम्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करने के लिए कहेगा ताकि तुम्हारी ही बलि चढ़ा सके। अतः, तुम उससे कहना कि पहले तुम • साष्टाङ्ग प्रणाम करके दिखलाओं तब मैं उसी रीति से प्रणाम करूँगा। तत्पश्चात्, धरती पर पड़कर जब वह साष्टाङ्ग प्रणाम की मुद्रा में आ जाय तब तुरन्त ही तुम तलवार से उसका सिर काट लेना। इस प्रकार विद्याधर-पद-मलक जिस ऐश्वर्य की वह सिद्धि चाहता है वह तुम्हें प्राप्त हो जायगी। यदि तुम, ऐसा न करोगे तो वही तुम्हारी बलि चढ़ा देगा। जाओ. तम्हें सिद्धि प्राप्त हो। ऐसा कहकर वेताल शब से निकल गया और राजा ने शव को उस भिक्षु के पास लाकर रख दिया जो श्मशान में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। __राजा ने देखा कि श्मशान की भूमि को उसने शोणित से लीप रक्खा था। अस्थिचूर्ण से विविध मण्डलों की रचना की गई थी। सभी दिशाओं में शोणित से परिपूर्ण घट स्थापित मनोरञ्जक कथाएँ २५५ किये गये थे। मनुष्य की चरबी से भरे दीपक जल रहे थे और पास ही प्रज्वलित वह्निकुण्ड में आहुतियाँ प्रदान की जा चुकी थीं। राजा के साहस और दृढप्रतिज्ञता की प्रशंसा करते हुए उस भिक्षु ने शव को स्नान कराया, चन्दन से अनुलिप्त किया, माला पहनायी और मंण्डल के भीतर रख दिया। तत्पश्चात् उसने अपने शरीर में भस्मलेपन किया, केशनिर्मित यज्ञोपवीत पहना और प्रेतवस्त्र धारण किया। फिर, ध्यानस्थ होकर मन्त्रबल से उसने शवशरीर में वेताल का आवाहन किया और विविध उपचारों से उसकी पूजा में वह संलग्न हो गया। पूजा समाप्त करने के बाद उस भिक्षु ने पास में ही खड़े राजा से कहा कि यहाँ मन्त्रों के अधीश्वर देवगण विराजमान हैं। तुम भूमि पर अधोमुख होकर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करो जिससे वे प्रसन्न होकर तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान करेंगे। उसकी इन बातों को सुनकर राजा को वेताल के कथन का स्मरण हो आया और तदनुसार उन्होंने उस भिक्षु से साष्टाङ्ग-प्रणाम की मुद्रा दिखलाने का अनुरोध यह कहकर किया कि वे साष्टाङ्ग प्रणाम की विधि नहीं जानते। उसके बाद ज्यों ही साष्टाङ्ग प्रणाम की मुद्रा में वह भिक्षु धरतीपर पड़ा त्यों ही राजा ने तलवार से उसका मस्तक काट डाला। उसके इस कृत्य पर श्मशानवासी भूत-प्रेतों ने राजा की प्रशंसा की और शवशरीर में अधिष्ठित वेताल ने सन्तष्ट होकर राजा से वर माँगने को कहा। इस पर राजा ने उससे कहा कि आपकी प्रसन्नता से मेरे सारे मनोरथ पूरे हो गये; फिर भी, आपके अमोघ वचन का आदर करने के लिए मैं यही वरदान माँगता हूँ कि ये पच्चीसों कथाएँ संसार में सुप्रसिद्ध और समादृत हों। राजा की इस प्रार्थना पर वेताल ने कहा कि ये पच्चीसों कथाएँ संसार में ‘वेतालपञ्चविंशतिका’ के नाम से सुविश्रुत होंगी तथा इनका पठन और श्रवण मङ्गल-जनक होने के साथ ही भूत-प्रेतादि-जनित बाधाओं का भी निवारक होगा। यह कहकर वह वेताल शवशरीर को छोड कर योगमाया की महिमा से अभीष्ट लोक चला गया। _ तदनन्तर, राजा के ऊपर प्रसन्न होकर भगवान् शङ्कर वहाँ अवतीर्ण हुए और राजा को अपराजित नामक दिव्य खड्ग प्रदान करते हुए वरदान दिया कि इसकी महिमा से तुम सभी द्वीपों को जीतकर विद्याधरों का स्वामित्व प्राप्त करोगे और चिरकाल तक दिव्य ऐश्वर्यसुख का भोग कर अन्त में मेरा सायुज्य प्राप्त करोगे। इतना कह कर वे अन्तर्धान हो गये। म अब तक रात समाप्तप्राय हो चुकी थी और प्रातःकाल का प्रकाश फैलने लगा था। रात्रिकालीन सारे कृत्यों को समाप्त पाकर राजा अपनी राजधानी प्रतिष्ठानपुर लौट आये और इस उपलक्ष्य में पुरवासियों ने नगर में महोत्सव का आयोजन किया। 27 इस कथासङ्ग्रह की उपर्युक्त रूपरेखा के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि इन कथाओं में उस समय की प्रचलित मान्यताएँ, विश्वास, धर्मधारणा तथा लोकरुचि का विशद _प्रतिबिम्बन हुआ हैं। तान्त्रिक साधना एवं श्रृङ्गारिकता से अनुरञ्जित सभी कहानियाँ२५६ गद्य-खण्ड विस्मय एवं कौतूहल से ओतप्रोत हैं, जिनकी परिणति वेताल के जटिल प्रश्नों तथा राजा द्वारा प्रदत्त उनके समुचित उत्तरों से होता है।