संस्कृत कथा-साहित्य के अन्तर्गत मनोरञ्जक कथा की कोटि में गुणाढ्य-विरचित सम्प्रति-नामशेष बृहत्कथा की ख्याति सुमेरुशिखर के समान देदीप्यामान है। पुरातन भारतीय कथा की विस्मयावह कल्पनाओं के इन्द्रधनुषी कान्ति-वैभव से विभासित यह ग्रन्थ पैशाची प्राकृत में निबद्ध किया गया था। भारतीय कथा-साहित्य के क्षेत्र में इसकी अनुपम गुणवत्ता के प्रति जागरूक डॉ. कीथ ने इसकी अनुपलब्धि को भारतीय कथा-साहित्य की एक अपूरणीय एवं गम्भीर क्षति कहा है। उनके अनुसार यह अद्भुतार्थ कथाग्रन्थ अपने गुणोत्कर्ष के कारण महाभारत एवं रामायण की समशीर्षिका का अधिकारी था। संस्कृत के महाकवियों द्वारा प्रस्तुत बृहत्कथा के सोल्लास नाम-सङ्कीर्तन एवं प्रशस्तिपूर्ण उद्गारों में इसकी असाधारण मनोहारिता की सुस्पष्ट अभिव्यक्ति प्राप्त होती है। बाणभट्ट के अनुसार बृहत्कथा के अन्तर्गत लोकमानस में विस्मय के उद्भावक तत्त्वों का आधिक्य था तथा इसकी ख्याति काममूलक कथाओं की बहुलता के कारण सर्वत्र लब्ध-प्रसर थी। उद्योतन सूरि के अनुसार गुणाढ्य को ब्रह्मा कहा गया है जिनके मुख में बृहत्कथा के रूप में साक्षात् सरस्वती निवास किया करती थीं। इन्होंने बृहत्कथा को अशेष कलाओं का आवास कहा है। आचार्य दण्डी ने इसे भूतभाषा (पैशाची) में निबद्ध कथाग्रन्थ कहा है जिसकी विषयवस्तु में अद्भुत रस की प्रधानता थी। धनपाल के अनुसार बृहत्कथा रूपी-सागरसे एक-एक बिन्दु-प्रमाण जल लेकर विरचित अन्यान्य कथाएँ उसकी सरस-मनोहर रचना के समक्ष मलिन एवं जीर्ण-शीर्ण वस्त्रखण्डों से निर्मित कन्था की भाँति ही थी।’ __अद्वितीय कथाकार के रूप में गुणाढ्य का कीर्ति-सौरभ सागरमेखलावेष्टित भारतभूमि की सीमा का अतिक्रमण कर द्वीपान्तर में भी प्रसृत्वर हो उठा था। इसके साक्ष्य में ईसा की बारहवीं सदी के अन्तर्गत कम्बोडिया (कम्बुज देश) में उपलब्ध महाराज यशोवर्मा के एक ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण संस्कृत-लेख का उल्लेख अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जिसमें गुणाढ्य को ‘प्राकृतप्रिय’ कहा गया है। गुणाढ्य का जीवन-वृत्त कल्पना से अनुरञ्जित किम्वदन्ती के रूप में हमें प्राप्त होता है जिसका वर्णन कथासरित्सागर, बृहत्कथामञ्जरी एवं हरचरित-चिन्तामणि में किया गया है। तदनुसार, गुगाढ्य ईसा की दूसरी सदी के सुप्रसिद्ध सातवाहन-नदेश हाल के १. सत्यं बृहत्कथाम्भोधेर्बिन्दुमादायसंस्कृताः। तेनेतरकथाकन्थाः प्रतिभान्ति तदग्रतः ।। (कथासरितसागर भूमिका पृ. ६) मनोरञ्जक कथाएँ २३६ सभापण्डित थे। एक बार उनकी संस्कृत-विदुषी रानी ने जलविहार के क्रम में क्लान्त होकर कहा-“मोदकैः परिताडय।" सन्धिज्ञान से रहित राजा ने इस पर लड्डुओं को मंगवा कर रानी को उनसे मारना प्रारम्भ कर दिया। राजा के संस्कतविषयक अज्ञान पर रानी ने उपहासपूर्वक कहा “तुम कितने बड़े मूर्ख हो कि मोदक शब्द का मा+उदक यह सन्धिविच्छेद तक करना नहीं जानते। भला जलकेलि के प्रकरण में कथित ‘मोदकैः’ का अर्थ ‘लड्डुओं’ से तुमने कैसे समझ लिया ?” इस घटना से राजा को अपने संस्कृत के अज्ञान पर बड़ा खेद हुआ। उन्होंने अपने सभास्थित विद्वानों से अनुरोध किया कि उनमें से कोई उन्हें संस्कृत-व्याकरण सिखला दे। इस पर गुणाढ्य ने छह वर्षों में व्याकरण की शिक्षा प्रदान करने की बात कही, परन्तु शर्ववर्मा नामक एक अन्य विद्वान् ने दो ही वर्षों में व्याकरण की शिक्षा सम्पन्न कर देने का वादा दिया। इस पर गुणाढ्य ने घोषणा की कि यदि ऐसा हुआ तो वह संस्कृत-भाषा का सदा के लिए परित्याग कर देगा। राजा को अल्पकाल में व्याकरण का ज्ञान प्रदान करने के लिए शर्ववर्मा ने ‘कातन्त्र व्याकरण’ की रचना की और उसकी सहायता से उसने राजा को दो ही वर्षों में व्याकरण में निपुण बना दिया। मामा का इसे देखकर गुणाढ्य ने अपनी पूर्व-घोषणा के अनुसार संस्कृत भाषा का परित्याग कर दिया और वैराग्यवश वानप्रस्थ की जीवनचर्या अपना ली। घनघोर जंगल के बीच एक आरण्यक के रूप में वास करते हुए उसने पैशाची भाषा के माध्यम से सात लाख श्लोकों में निबद्ध बृहत्कथा (बड्ढकहा) की रचना की और उसे अपने शिष्य के द्वारा अपने पूर्व-संरक्षक राजा सातवाहन के सम्मुख अनुमोदनार्थ प्रस्तुत किया, परन्तु पैशाची भाषा में रचित होने के कारण उसने उसे तिरस्कृत कर दिया। इस वृत्तान्त से गुणाढ्य को अत्यन्त दुःख हुआ और वह हताश होकर अपनी कथाकृति के एक-एक पृष्ठ को पढ़कर उसे अग्नि में समर्पित करने लगा। कहते हैं उस कथा से आकृष्ट होकर वन के सारे पशुपक्षी खाना-पीना छोड़कर उसके चतुर्दिक एकत्र हो उसके कथामृत के पान में निमग्न हो गये थे। तत्पश्चात् जब राजा को यह वृत्तान्त विदित हुआ तबतक तो छः लाख श्लोक अग्निदेव को समर्पित किये जा चुके थे। अन्ततोगत्वा अपने शिष्यों के अनुरोध पर गुणाढ्य ने नरवाहनदत्त के चरित से सम्बद्ध अन्तिम लक्षश्लोकात्मक अंश नहीं जलाया। यह मूल बृहत्कथा ईसा की बारहवीं सदी तक विद्यमान थी। दक्षिण भारत के गुम्मा रेड्डीपुर नामक स्थान से प्राप्त एक ताम्रपत्राङ्कित अभिलेख के साक्ष्य से ज्ञात होता है कि दुर्विनीत नामक राजा ने मूल बृहत्कथा का संस्कृत रूपान्तर प्रस्तुत किया था जो अब उपलब्ध नहीं है। 12 बृहत्कथा की मूलकथा के वस्तुविन्यास के सम्बन्ध में समीक्षकों ने निम्नांकित क्रम की सम्भाव्यता व्यक्त की है : । २४० गद्य-खण्ड (क) कथापीठ जिसमें महाराज उदयन और उनकी रानियों की कथाओं का निबन्धन किया गया होगा। (ख) कथामुख जिसमें कथा का आख्यान करनेवाले नरवाहनदत्त और मदनमंजुका की प्रेमकथा निबद्ध की गयी होगी। (ग) · मुख्य कथावस्तु जिसमें विद्याधर-विशेषद्वारा अपहृत मदनमंजुका के अन्वेषण में निर्गत नरवाहनदत्त ने देश-देशान्तर का परिभ्रमण किया होगा तथा अपने पराक्रम के फलस्वरूप हर बार एक-एक कन्या से विवाह किया होगा। (घ) उपसंहार जिसमें मदनमंजुका से नरवाहनदत्त के पुनर्मिलन के साथ ही उसके द्वारा विद्याधर पद के लाभ का वर्णन किया गया होगा। पुराण-प्रथित गोदावरी नदी के सुरम्य तटवर्ती प्रतिष्ठानपुर के निवासी गुणाढ्य ने बृहत्कथा की रचना जिस सातवाहन-नरेश हाल के राज्यकाल में की थी, वह काल, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार, सार्थवाहों और सांयात्रिकों की इतिहास-विश्रुत सक्रियता का काल था। उस समय के स्थलमार्ग सार्थवाहों के शकट-चक्रों के कूजन से अहर्निश मुखर रहा करते थे तथा सागर का दिगन्त प्रसारी वक्ष वाणिज्य के उद्देश्य से निर्गत उत्साही सांयात्रिकों की पोत-परम्परा से व्याप्त रहा करता था। बृहत्तर भारत की इन यात्राओं के क्रम में सार्थवाहों एवं सांयात्रिकों द्वारा स्वानुभूत विविध-विषयावगाही साहसिक एवं रोमांचक घटनाचक्रों को गुणाढ्य ने अपनी नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा के संस्पर्श से एक विलक्षण कथाग्रन्थ में परिणत कर दिया। __परवर्ती काल में मूल बृहत्कथा के आधार पर उसकी चार वाचनाएँ प्राप्त होती हैं जिनमें तीन संस्कृत में और एक महाराष्ट्री प्राकृत में निबद्ध उपलब्ध होती है। यहाँ प्रसङ्ग के अनुरोध से इनके संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत हैं :
(क) बृहत्कथाश्लोकसङ्ग्रह
भारतीय लोकमानस पर बृहत्कथा के प्रभावोत्कर्ष को ध्यान में रखते हुए बुधस्वामी ने ‘बृहत्कथाश्लोकसंग्रह नामक ग्रन्थ की रचना ईसा की पाँचवीं सदी के आस-पास सम्पन्न की। इसमें कुल अट्ठाइस सर्ग हैं परन्तु यह एक अपूर्ण ग्रन्थ है। कथासरित्सागर में नरवाहनदत्त के अट्ठाइस विवाहों के वर्णन हैं जिनमें से यहाँ केवल छः विवाहों की ही कथा प्राप्त होती है। गुप्तकालीन सभ्यता और संस्कृत के प्रभाव का अनुरञ्जन इस ग्रन्थ में स्पष्टतः देखा जा सकता है। उल्लास, साहस एवं ओजस्विता से आविष्ट जीवन की पराक्रमपूर्ण सक्रियता का इसकी कथाओं में नितान्त जीवन्त शैली में वर्णन किया गया है जिसके अन्तस्तल में प्रेम की मन्दाकिनी निरन्तर प्रवाहशील दृष्टिगोचर होती है। यहाँ १. कथासरित्सागर (प्रथम खण्ड) भूमिका पृ. १ मनोरञ्जक कथाएँ २४१ भाग्यचक्र के आकस्मिक आवर्तन-विवर्त्तन से आनेवाली विषम परिस्थितियों में भी साहस एवं उत्साह से समुच्छल पात्रों के चरित्र-चित्रण की रेखाएँ असाधारण वर्ण-विच्छित्ति से देदीप्यमान उपलब्ध होती हैं। यह ग्रन्थ मूल बृहत्कथा की नेपाली वाचना के नाम से प्रसिद्ध है। इसका प्रथम प्रकाशन फ्रेञ्च-अनुवाद के साथ फ्रेञ्च विद्वान् श्रीलाकोत ने १६०८ में पेरिस से किया था। कथा-साहित्य के समीक्षकों की सम्मति में बृहत्कथाश्लोकसंग्रह मूल बृहत्कथा में विन्यस्त कथाओं का अधिक विश्वसनीयता के साथ प्रतिनिधित्व करता है। __ इस कथाकाव्य के प्रारम्भ में उज्जयिनी नगरी के प्रशस्ति-वर्णन के अनन्तर वहाँ के महाराज महासेन प्रद्योत के निधन का उल्लेख किया गया है। तत्पश्चात् उसका पुत्र गोपाल सिंहासनारूढ होता है, परन्तु पितृघाती होने के दुर्यश से खिन्न होकर वह सिंहासन का परित्याग कर देता है और उसका अनुज पालक राज्यासन पर बैठता है। कुछ दिनों के बाद उसके भी राज्यपरित्याग के अनन्तर अवन्तिवर्द्धन को हम राजसिंहासन पर आसीन होकर मातङ्गकन्या सुरसमञ्जरी के साथ विहार-परायण देख पाते हैं। तत्पश्चात्, नीलगिरिपर्वत पर काश्यप-प्रभृति ऋषिओं के द्वारा पूछे जाने पर नरवाहनदत्त अपना आश्चर्यजनक आख्यान सविस्तर कह सुनाता है। इसके अन्तर्गत नरवाहनदत्त द्वारा विद्याधरेश्वर का पद पाकर असामान्य रूप-लावण्य से समलङ्कृत विविध कन्याओं के साथ विवाह-सौख्य की प्राप्ति का विशद वर्णन प्राप्त होता है। आशा और उल्लासपूर्ण जीवन के प्रति अविचल आस्था, विस्मयावह साहसिक कृत्यों का प्राचुर्य, विविध प्रेम-प्रसङ्गों से मधुर एवं सुरभित पात्र-चरित्र तथा अनाहार्य-मनोहर वाग्विन्यास जैसी उल्लेखनीय विशेषताएँ इस श्लोकसंग्रह को असाधारण रूप से संस्कृत कथा-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करती हैं।
(ख) वसुदेव हिण्डी
सङ्घदास गणि द्वारा विरचित वसुदेव हिण्डी नामक प्राकृत गद्यकाव्य मूल बृहत्कथा पर आधृत होने के कारण उसकी जैन वाचना (प्राकृत वाचना) के नाम से प्रसिद्ध है। इसके वस्तु-विन्यास और शिल्पविधान पर जैन धर्म की आभा व्याप्त है। मूल कथाग्रन्थ की अपेक्षा इसमें निम्नांकित परिवर्तन प्राप्त होते है : १. यह जैन धर्मधारणा से अनुरंजित कथाग्रन्थ है। २. इसके नायक श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव हैं, ३. इसकी कथा लम्भों में विभक्त है, ४. इसमें वसुदेव के उन्सीस विवाहों का वर्णन किया गया है, ५. कथोत्पत्ति, धम्मिल हिण्डी, पीठिका, मुख-प्रतिमुख और शरीर के नाम से छः भाग हैं। इसका एक अन्तिम उपसंहार भी था, जो अब उपलब्ध नहीं होता है। २४२ गद्य-खण्ड ६. मदनमंचुका की प्रणयकथा को श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ संलग्न किया गया है। ७. मदनमंचुका के स्थान पर यहाँ गणिकादारिका सुहिरण्या और राजकुमारी सोमश्री को प्रतिष्ठित किया गया है। ग्रन्थनाम ‘वसुदेव हिण्डी’ शब्द में प्रयुक्त हिण्डी पद का अर्थ होता है हिण्डनव्यापार का कर्ता जो अपनी प्रकृति के अनुसार सांसारिक वस्तुओं का सूक्ष्मेक्षिकापूर्वक निरीक्षण करता हुआ सतत यात्रापरायण रहा करता है। प्रस्तुत ग्रन्थ की कथावस्तु की रूपरेखा पर ध्यान देने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। जैन अनुश्रुति के अनुसार श्रीकृष्ण की पुरानी कथा में परिवर्तन करते हुए ग्रन्थकार संघदासगणि ने यहाँ उसके वर्णन के क्रम में कहा है कि एक बार वसुदेव का अपने अग्रज से वैमनस्य हो गया और वे गृहत्यागी होकर यायावर हो गये। इस क्रम में नाना-देश-देशान्तर में पराक्रम-प्रदर्शन करते हुए उन्होंने उन्तीस कन्याओं से विवाह किया जिनमें अन्तिम कन्या रोहिणी थी। अपने सुदीर्ध परिभ्रमण के बाद जब वे घर लौटे तब सौभाग्यवश उन्हें अग्रज का स्नेह प्राप्त हुआ और वे अपने परिवार के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे। एक समय प्रद्युम्न के उपहासगर्भ वचन से आवेश में आकर उन्होंने अपने उन्तीस विवाहों की रोमांचक कथाओं का सविस्तर आख्यान कर डाला। यही इस कथाग्रन्थ का शरीर स्थानीय मुख्य भाग है। या __ इस कथाग्रन्थ का एक दूसरा खण्ड धर्मदासगणिद्वारा निबद्ध किया गया है जो मध्यम खण्ड के नाम से सुविदित है। इसकी रचना मूल ग्रन्थ की रचना के दो शतक पश्चात् की गयी है और यह अभी तक प्रकाशित नहीं हो पाया है। धर्मदासगणि के अनुसार वसुदेव ने एक सौ विवाह किये थे जिनमें से संघदासगणि ने विस्तरभय से केवल उनके उन्तीस विवाहों का ही वर्णन किया था। अतः उनके अवशिष्ट इकहत्तर विवाहों की कथाएँ यहाँ निवद्ध की गयीं हैं। ये कथाएँ मूल ग्रन्थ की समाप्ति के बाद प्रारम्भ न होकर उसकी अट्ठारहवीं कथा के बाद प्रारम्भ होती हैं जिससे धर्मदासगणि की यह रचना मूल ग्रन्थ के मध्य में अनुप्रविष्ट होने के कारण मध्यम खण्ड कहलाती है। ‘मज्झिम खण्ड’ के नाम से परिचित इस की पाण्डुलिपि लालभाई दलपतभाई प्राच्यविद्या शोधसंस्थान, अहमदाबाद में सुरक्षित है। सुप्रसिद्ध जर्मन विद्वान् आल्सडोर्फ के अनुसार “वसुदेव हिण्डी गुणाढ्य की बृहत्कथा का प्राकृत-पर्याय है।" ईसा की तीसरी सदी के काल-खण्ड में संयुक्त लेखकत्व के अधीन महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में रचित यह कथाग्रन्थ विश्वकथा-साहित्य में उल्लेखनीय स्थान रखता है। रोमाञ्चकारी साहसिक क्रियाकलाप, रहस्यमय वातावरण, उदात्त भूमि पर प्रतिष्ठित प्रेम की पावनता, रणाङ्गण की भीषणता, कूटनीति की कुटिल वीथियों तथा यौवनजनित कामराग के उन्मादपूर्ण आवेश के वैविध्यपूर्ण चित्रणों से मनोहर यह ग्रन्थ जैन-धर्म की आधारभूत भावनाओं से अधिवासित है, अनुप्राणित है। मनोरञ्जक कथाएँ २४३
(ग) बृहत्कथामञ्जरी
काश्मीर-नरेश अनन्त के प्रतिष्ठित आस्थान-विद्वान् क्षेमेन्द्र-द्वारा गुणाढ्य की बृहत्कथा के आधार पर ईसा की ग्यारहवीं सदी की मध्यावधि में बृहत्कथामञ्जरी नामक पद्यबद्ध कथाग्रन्थ की रचना की गयी। इसे बृहत्कथा की ‘काश्मीरी वाचना’ कहा जाता है। इसकी कथावस्तु अट्ठारह लम्बकों (अध्यायों) में विभक्त है। मूलकथा के संक्षेपीकरण के प्रयास में मूलांश का परित्याग तथा कथाक्रम के पौर्वापर्य में परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न अस्पष्टता और निर्जीवता की क्षतिपूर्ति क्षेमेन्द्र ने अपनी आलङ्कारिक भाषा के द्वारा की है। यहाँ मूलकथा के साथ पच्चीस वेतालों की भी कथाओं का संयोजन किया गया है, जो स्वाभाविक न होकर बलात् आरोपित प्रतीत होता है। फिर भी उनके आख्यान-शिल्प में वास्तविकता के साथ काव्यकला की दीप्ति दृष्टिगोचर होती है। रामायण और महाभारत के विपुलायतन कथासंभार को रामायण-मञ्जरी एवं महाभारतमञ्री के रूप में प्रस्तुत करने के अनन्तर क्षेमेन्द्र ने गुणाढ्य की बृहत्कथा में निबद्ध कथाओं को बृहत्कथामञ्जरी के अभिनव नेपथ्य में प्रस्तुत कर भारतीय परम्परा में ‘मञ्जरीकार’ के रूप में प्रसिद्धि अर्जित की है। बृहत्कथामञ्जरी के अन्तर्गत विद्यमान विभिन्न लम्बकों के नाम तथा उनमें विन्यस्त प्रमुख कथाशीर्षक अधोलिखित हैं : १. प्रथम लम्बक-कथापीठ (गुणाढ्य का परिचय) २. द्वितीय लम्बक-कथामुख (उदयन-कथा) ३. तृतीय लम्बक-लावाणक (वासवदत्ता का अग्निकाण्ड में निधन) ४. चतुर्थ लम्बक-नरवाहन-जन्म (उदयन को नरवाहन नामक पुत्ररत्न की प्राप्ति जो भविष्य में विद्याधरों का चक्रवर्तित्व प्राप्त करेगा) ५. पञ्चम लम्बक-चतुर्दारिका (शक्तिवेग नामक विद्याधर द्वारा आत्मवृत्तकथन के क्रम में चार कन्याओं की प्राप्ति का वर्णन) ६. षण्ठ लम्बक-सूर्यप्रभ (सूर्यप्रभ द्वारा एक सामान्य राजा के पद से ऊपर उठकर __सम्राट् पद की प्राप्ति के उपाख्यान का वर्णन) ७. सप्तम लम्बक-मदनमञ्चुका (नरवाहनदत्त का मदनमञ्चुका के साथ विवाह की कथा) ८. अष्टम लम्बक-वेला (मानसवेग नामक विद्याधर द्वारा मदनमञ्चुका का अपहरण) ६. नवम लम्बक-शशाङ्कवती (मदनमञ्चुका के वियोग से उदास नरवाहनदत्त के सान्त्वनार्थ एक मुनि द्वारा शशांकवती के उपाख्यान का कथन) १०. दशम लम्बक-विषमशील (टेण्टाकराल, खण्ड कापालिक, यक्षिणींसमागम, कन्याचतुष्टय प्राप्ति तथा मूलदेव प्रभृति की कथाएँ) ११. एकादश लम्बक-मदिरावती (नरवाहन के प्रति द्विजपुत्र द्वारा मदिरावती की प्राप्ति के उपाख्यान का कथन) २४४ गद्य-खण्ड १२. द्वादश लम्बक-पद्मावती (गोमुख द्वारा नरवाहन के प्रति विद्याधरेश्वर मुक्ताफलकेतु और पद्मावती की कथा का आख्यान) १३. त्रयोदश लम्बक-पञ्च (नरवाहन द्वारा पाँच विद्याधर-कन्याओं के साथ विवाह) १४. चतुर्दश लम्बक-रत्नप्रभा (नरवाहन द्वारा रत्नप्रभा के साथ विवाह, कर्पूरद्वीप की यात्रा और वायुयान द्वारा प्रत्यावर्त्तन) १५. पञ्चदश लम्बक-अलङ्कारवती (नरवाहन द्वारा अलङ्कारवती से विवाह, श्वेतद्वीप की यात्रा तथा यहाँ भगवान् श्रीनारायण का दर्शन एवं स्तवन) १६. षोडश लम्बक-शक्तियशः (नरवाहन द्वारा शक्तियशस् नामक कन्याकी प्राप्ति) १७. सप्तदश लम्बक-महाभिषेक (नरवाहन द्वारा मन्दरदेव का पराजय, पाँच कुमारियों के साथ विवाह तथा उसका महाभिषेक) १८. अष्टादश लम्बक-सुरतमञ्जरी (अवन्तिवर्धन का सुरतमञ्जरी से विवाह) इस प्रकार, भगवान् शङ्कर द्वारा अट्ठारह लम्बकों में वर्णित जिस कथा को पुष्पदन्तनामक गण के मुख से सुनकर काणभूति ने गुणाढ्य के समक्ष प्रस्तुत किया था उसका संस्कृत पद्यबद्ध आख्यान गुणाढ्य-रचित बृहत्कथा के आधार पर क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामञ्जरी में प्राप्त होता है। क्षेमेन्द्र के भाषाशिल्प एवं वर्णन कौशल से परिचित होने के लिए निम्नाकित कतिपय उद्धरण अवलोकनीय हैं : अस्ति विद्याधरवधूविलासहसितद्युतिः। जाह्नवीनिर्झरोष्णीषः शर्वाणीजनको गिरिः।। यस्याश्मकूटसङ्घट्टविशीर्णपतनोत्थिताः। मुहूर्त्त तारकायन्ते व्योम्नि गङ्गाम्बुराशयः।। • फेनहासविलासिन्यः फुल्लत्कुवलयेक्षणाः। विभान्ति कटके यस्य तरङ्गिण्यो महीभृतः।। (१.२.६-११) “विद्याधर-गण की वधुओं के विलासपूर्ण हास के समान समुज्ज्वल तथा गङ्गा के निर्झर रूपी उष्णीष से विभूषित हिमालय पर्वत को जगज्जननी पार्वती के पिता होने का गौरव प्राप्त है। जिसके शिला-समूह के ऊपर वेग से टकराकर बिखरी हुई गङ्गा के प्रवाह से उछल कर ऊपर की ओर उड़े सलिल-सीकर पलभर के लिए आकाश में नक्षत्र-पुञ्ज की भाँति दीख पड़ते हैं। फेन रूपी नयनोंवाली नदियाँ जिस पर्वत के मध्यभाग में शोभायमान हुआ करती हैं।” मनोरञ्जक कथाएँ २४५ अत्रान्तरे जलनिधिं प्रविष्टे वासरेश्वरे। बभूव रागिणी सन्ध्या नलिनीवनशालिनी।। तिमिरैरञ्जनश्यामैः श्यामावदनकुन्तलैः। चक्रवाकीवियोगाग्निधूमाभैरुत्थितं ततः।। नीलाम्बुजैरिवोत्सृष्टं भ्रमरैरिव मूर्छितम्। नीकण्ठरिवोद्गीणं चचार सुचिरं तमः।। अथादृश्यत चण्डीशजटामण्डलमण्डनम्। श्यामाकर्पूरतिलको रोहिणीरमणःशशी।। (६.२.८२८-८३२) इसी समय सूर्य के पश्चिम-पयोधि में प्रविष्ट हो जाने पर मुद्रित कमलिनी-वनों से शोभित सन्ध्या रागरञ्जित हो गयी। उसके बाद काजल के समान श्यामवर्ण, रात्रि रूपी सुन्दरी के मुख पर लोटने वाले कुन्तल-स्वरूप तथा चकवी के वियोगानल से उत्थित धूमराशि की भाँति अन्धकार उदित हुआ। नीलोत्पल, भ्रमर तथा मयूरवृन्द से ही मानो निर्गत अन्धकार चारों ओर फैल चला। इसके बाद भगवान् शंकर के जटामण्डल का आभूषण स्वरूप तथा रात्रि-वनिता के भाल का कर्पूरतिलक चन्द्रमा दीख पड़ा। और, इसके बाद, तड़-तड़-तड़ाक् की कठोर ध्वनि के साथ पोत के सारे बन्धन टूट गये, पोत भी टूट गया और उसके साथ ही सारे सांयात्रिकों के हृदय भी टूट गये।" क्षेमेन्द्र की स्वाभाविक आसक्ति है अलङ्कृत वाक्याविन्यास में और वे वर्ण्यविषय को पल्लवित करने में अपनी रुचि का अनुगमन करते हैं। प्रस्तुत उद्धरण उनकी वाचिक भगिमा, नेपथ्यसज्जा तथा सम्प्रेषण-शिल्प के प्रशंसनीय निदर्शन हैं।
(घ) कथासरित्सागर
कश्मीर के निवासी सोमदेव द्वारा बृहत्कथा पर आधृत कथासरित्सागर नामक पद्यबद्ध संस्कृत कथाग्रन्थ की रचना १०६३ ई. से लेकर १०८१ ई. की मध्यावधि में की गयी। इसे बृहत्कथा की द्वितीय ‘काश्मीरी वाचना’ कहा जाता है। इसकी रचना ग्रन्थकार ने कश्मीर-नरेश अनन्त की रानी सूर्यमती के मनोरञ्जन के उद्देश्य से किया था। यह बृहत्कथा की अन्तिम वाचना है। सम्पूर्ण ग्रन्थ १८ लम्बकों में विभक्त है जिनके अन्तर्गत १२४ त के समग्र श्लोकों की सङ्ख्या २१,३८८ है। सोमदेव ने कथा के प्रारम्भ में प्रस्तुत ग्रन्थ की वस्तु-योजना के सम्बन्ध में विनम्रतापूर्वक सूचित किया है-“यह ग्रन्थ मूलग्रन्थ के सर्वथा अनुरूप है और इसमें लेशमात्र भी व्यतिक्रम नहीं है। मूलग्रन्थ में वर्णित कथाओं को यहाँ संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। मूल भाषा पैशाची के स्थान पर संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। अपने सामर्थ्य के अनुसार औचित्य एवं अन्वय-कथाओं के पारस्परिक सम्बन्ध-की मैंने रक्षा की है। यहाँ काव्य-सौष्ठव के उतने ही अंश की योजना की गयी है, जितने से कथारस के आस्वाद में२४६ गद्य-खण्ड अवरोध न उत्पन्न हो जाय। इस ग्रन्थ की रचना मैंने विदग्धता की ख्याति प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं की है, प्रत्युत मूल ग्रन्थ की अनेकानेक कथाओं के समूह को स्मृति में संजोकर रखने के लिए की है।" यथामूलं तथैवैतन्न मनागप्यतिक्रमः। ग्रन्थविस्तरसंक्षेपमात्रं भाषा च भिद्यते।। औचित्यान्वयरक्षा च यथाशक्ति विधीयते। कथारसाविघातेन काव्यांशस्य च योजना।।। वैदग्ध्यख्यातिलोभाय मम नैवायमुद्यमः। किन्तु नानाकथाजालस्मृतिसौकर्यसिद्धये।। (१.१.१०-१२) ग्रन्थकार ने इसके अनन्तर कथावस्तु के विभाजन का क्रम एवं कथ्य का परिचय इस प्रकार दिया है : प्रथम लम्बक कथापीठ द्वितीय लम्बक - कथामुख तृतीय लम्बक सम्बक
- लावाणकर चतुर्थ लम्बक नरवाहनदत्त की गाथा पञ्चम लम्बक चतुर्दारिका षष्ठ लम्बक मदनमञ्चुका सप्तम लम्बक रत्नप्रभा अष्टम लम्बक सूर्यप्रभा नवम लम्बक अलङ्कारवती दशम लम्बक शक्तियशाः एकादश लम्बक
- वेला द्वादश लम्बक शशाङ्कवती त्रयोदश लम्बक मदिरावती चतुर्दश लम्बक पञ्चदश लम्बक महाभिषेक षोडश लम्बक सुरतमञ्जरी सप्तदश लम्बक पद्मावती अष्टादश लम्बक विषमशीला २४७ मनोरञ्जक कथाएँ आद्यमत्र कथापीठं कथामुखमतः परम्। अब ततो लावानको नाम तृतीयो लम्बको भवेत्।। नरवाहनदत्तस्य जननञ्च ततः परम्। स्याच्चतुर्दारिकाख्यश्च ततो मदनमञ्चुका॥ ततो रत्नप्रभानाम लम्बकः सप्तमो भवेत्। सूर्यप्रभाभिधानश्च लम्बकः स्यादथाष्टमः।। अलङ्कारवतीत्यपि चाथ ततःशक्तियशा भवेत्। वेलालम्बकसञ्जश्च भवेदेकादशस्ततः। शशाङ्कवत्यपि तथा ततःस्यान्मदिरावती।। महाभिषेकानुगतस्ततः स्यात्पञ्चलम्बकः। ततः सुरतमञ्जर्यप्यथ पद्मावती भवेत् ।। ततो विषमशीलाख्यो लम्बकोऽष्टादशो भवेत्।।? । इस प्रकार ग्रन्थ के स्वरूपगत, शैलीगत एवं वस्तुगत विशेषताओं के विश्लेषण के अनन्तर सोमदेव ने इसका प्रारम्भ करते हुए कहा है-एक समय भगवान् शङ्कर ने पार्वती के अनुरोध पर उन्हें सात विद्याधर-चक्रततियो की अश्रुतपूर्व कथाएँ कह सुनायीं। संयोगवश उस कथा के गुप्त रूप से वहाँ उपस्थित पुष्पदन्त नामक गण ने सुन लिया और अपनी पत्नी जया को घर जाकर कह सुनाया। उसने भी उसे अपनी सखियों से कहा और इस प्रकार वह कथा घूम-फिर कर जब पार्वती जी के कानों में आयी तब उन्होंने पुष्पदन्त को मर्त्यलोक में जन्म लेने का शाप दिया और जब उसके भाई माल्यवान् ने पुष्पदन्त की ओर से उनसे क्षमा याचना की तो उसे भी पार्वती जी ने रोषवश वही शाप दे दिया। पुष्पदन्त की पत्नी जया पार्वतीजी की सेविका थी। अपने पति को शापग्रस्त जान कर वह बहुत ही दुःखी रहने लगी। अपनी सेविका को इस प्रकार दुःखी पाकर पार्वती जी ने दयावश शाप के अवसान का उल्लेख करते हुए कहा- “जन्मान्तर की स्मृति से सम्पन्न पुष्पदन्त जब विन्ध्याचल पर अवस्थित काणभूति नामक पिशाच को ये कथाएँ सुना चुकेगा, तब उसके शाप की समाप्ति होगी। तत्पश्चात् माल्यवान् जब इन कथाओं को लोक में प्रचारित कर चुकेगा तब उसके भी शाप का अन्त हो जायगा।" शाप के प्रभाव से कौशाम्बी में कात्यायन-वररुचि के नाम से विख्यात होकर पुष्पदन्त ने जन्मग्रहण किया। वह अपने समय का एक प्रख्यात वैयाकरण था और नन्द-वंश के अन्तिम सम्राट योगानन्द का अमात्य था। अपने जीवन के शेष भाग में वानप्रस्थ ग्रहण कर जब वह विन्ध्याचल में भगवती विन्ध्यवासिनी के दर्शन हेतु जा रहा था, तब उसे वहाँ काणभूति मिला। जन्मान्तर की स्मृति के जागरित हो जाने पर उसने उसे वे सात बृहत्कथाएँ कह सुनायी और शापमुक्त हो स्वर्गगामी हुआ। २४८ गद्य-खण्ड __इधर, उसके भाई माल्यवान् ने भी प्रतिष्ठानपुर में गुणाढ्य के नाम से जन्म-ग्रहण किया और वहाँ के नरेश सातवाहन के अमात्यपद पर आसीन हुआ। उसके दो शिष्य थे जिनके नाम क्रमशः गुणदेव और नन्दिदेव थे। उनके साथ गुणाढ्य काणभूति के पास आकर उससे पिशाच-भाषा में रचित सात बृहत्कथाएँ उपलब्ध कीं। गुणाढ्य ने उन्हे सात लाख श्लोकों में अपने शोणितसे लेखबद्ध किया और अपने शिष्यों के द्वारा उन्हें राजा सातवाहन के समीप इस आशय से भिजवाया कि राजा उनका आदर करेगा, परन्तु पैशाची भाषा में निबद्ध होने के कारण उसने उन्हें तिरस्कृत कर दिया। इस घटना से गुणाढ्य ने हताश होकर बृहत्कथा के छह लाख श्लोकों से युक्त छह भागों को अग्निसात् कर दिया। जब राजा सातवाहन को इसकी सूचना मिली तब गुणाढ्य के पास जाकर उससे प्रार्थनापूर्वक अवशिष्ट कथाभाग को उसने प्राप्त किया और गुणदेव और नन्दिदेव से उसका अध्ययन कर कथोत्पत्ति-वर्णन-परक कथामुख का भाग स्वयं निबद्ध किया। वस्तुतः, कथासरित्सागर की रचना कर सोमदेव ने संस्कृत साहित्य के आकाश में एक ऐसे भास्वर प्रकाशस्तम्भ की स्थापना की है, जिसकी रश्मियाँ शताब्दियों के आवर्त्तन-विवर्तन से उठेलित काव्य के तरङ्गों पर समान रूप से प्रकाश-पुञ्ज को बिखेरती आ रही है। सोमदेव की विलक्षण प्रतिभा कथासरित्सागर की प्रत्येक कथा में असाधारण रूप से प्रतिबिम्बित दीख पड़ती है। भारत के अतीत की छायातप से शबलित संस्कृति अपनी चारुता, विलक्षणता, साहसिकता तथा समग्रता के साथ इस महनीय ग्रन्थ में गुम्फित कथाओं में आश्चर्यजनक रूप से रूपायित हो उठी है। यद्यपि यह ग्रन्थ कथाप्रधान है, तथापि इसमें काव्योचित सौन्दर्य के अनल्प स्थल प्राप्त होते हैं। अद्भुत तत्त्व इस रचना का प्राण है और प्रसाद-गुण तो इसके प्रत्येक श्लोक में व्याप्त है। ग्रन्थकार के भाषा-शिल्प का सौन्दर्य एक से एक सुन्दर उत्प्रेक्षा की योजना से भास्वर हो उठा है। इस प्रसङ्ग में निम्न उद्धरण द्रष्टव्य है : तस्य दक्षिणतो गत्वा तरुषण्डं व्यलोकयम्। सधूमभिव तापिच्छैः साङ्गारमिव किंशकैः॥ यता सज्वालमिव चोत्फुल्ललोहिताशोकवल्लिभिः। वाहरने हरनेत्रानलप्लुष्टं देहं रतिपतेरिव।। (१३/१/६०-६१) “उसके दक्षिण की ओर जाकर मैंने वृक्षों का समूह देखा। वह श्यामल तापिच्छ-पल्लवों से मानो धूमाच्छन्न था, विकसित किंशुक-कुसुमों से मानो प्रज्वलित अङ्गारों से दीप्त था, उत्फुल्ल रक्ताशोक की लताओं से मानो ज्वालामय हो रहा था। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो शिव के तृतीय नेत्र की ज्वाला से दग्ध कामदेव का शरीर हो।” मनोरञ्जक कथाएँ २४६ एक विरहविधुर युवा की विषम मनोदशा के वर्णन के क्रम में रूपक अलङ्कार का निम्नाङ्कित उद्धरण में किया गया विन्यास द्रष्टव्य है : चन्द्रोऽग्निर्विषमाहारो गीतानि श्रुतिसूचयः। उद्यानं बन्धनं पौष्पी माला दिग्धा शरावली।। ज्वलिताङ्गारवर्षञ्च चन्दनाद्युपलेनम् (१३.१.७५-७६) __ मेरे लिए चन्द्रमा अग्नि है, आहार विष है, गीत कानों को बेधने वाली सूई है, उद्यान बन्धन है, फूलों की माला विष से लिप्त बाणों का समूह है और चन्दन-प्रभृति शीतल उपकरणों का लेप प्रज्वलित अगारों की वृष्टि है।" कथानायक नरवाहनदत्त की विरह विषम अवस्था के वर्णन से सम्बद्ध निम्नाङ्कित सन्दर्भ सोमदेव के सरस उक्ति शिल्प का अन्यतम उदाहरण प्रस्तुत करता है : बिभेद तस्य मृदुरप्याततद्भिः शिलीमुखैः। स्मर-चाप-लतेवात्र हृदयं चूतमञ्जरी।। ततोऽलिकुलझाङ्कारमुखरैस्तैः स काननैः। निष्कास्यमान इव तं प्रदेशं शनकै हौ।। (१३.१.६-६) “कामदेव के लचीले धनुष के समान टूट पड़ते भौंरों से युक्त आम्रमञ्जरी ने भी उसके हृदय को विदीर्ण कर डाला। और, इसके बाद, भ्रमर-समूह के झङ्कार से मुखर उस वन-प्रदेश के द्वारा मानो निर्वासित कर दिये जाने के कारण ही उसने चुपचाप धीरे धीरे उस सुरम्य प्रदेश को छोड़ दिया।" इस संसार में लक्ष्मीपात्र मूखों का अभाव नहीं है और न उन्हें अपने वञ्चना-पाश में आबद्ध कर जीविकोपार्जन करनेवाले ठगों का ही अभाव है। वञ्चकजन सदा से ही अपने चातुर्य से ऐसे व्यक्तियों को प्रताडित कर अपनी जीविका का उपार्जन करते आये हैं। सोमदेव की दृष्टि इस चिरन्तन सांसारिक रीति पर भी पड़ी थी और उन्होंने ऐसे वञ्चकों के वञ्चनाकौशल का यथास्थान वर्णन किया है। इस प्रसङ्ग में एक धनी व्यक्ति की मूर्खता का हास्योद्भावक प्रसङ्ग निम्नाङ्कित उद्धरण में दर्शनीय है : तदृष्टवाप्यविमर्शः सन् वैद्यं केशार्थमौषधम्। तं ययाचे स जडधीस्ततो वैद्योऽब्रवीत्स तम्।। खल्वाटः स्वयमन्यस्य जनयेयं कथं कचान्। इति ते मूर्ख! निर्लोम दर्शितं स्वशिरो मया।। तथापि त्वं न वेत्स्येव धिगित्युक्त्वा ययौ भिषक्। एवं देव! सदा धूर्ताः क्रीडन्ति जडबुद्धिभिः।। (१०.५.१८०-१८७) २५० गद्य-खण्ड __ “इस पर भी उस मूर्ख धनी व्यक्ति ने उससे बाल जमाने के लिए दवा मांगी। इसलिए तो मैंने पगड़ी उतार कर अपना गंजा सिर तुझे दिखलाया। पर, तू ऐसा मूर्ख है कि इतने से भी समझ नहीं हो पाया। धिक्कार है तुझे। ऐसा कहकर वह ठग वैद्य वहाँ से चला गया। राजन्! इसी प्रकार धूर्त व्यक्ति जडबुद्धिवालों के साथ खेला करते हैं।” __सोमदेव की कथाशैली में प्रवाह है, रोचकता है और सब से अधिक मात्रा में विद्यमान है कौतूहलतत्त्व जो पाठकों को बरबस एक कथा के सुरम्य द्वीप से अन्य कथा के सुरम्य द्वीप की ओर खींच ले चलता है। पाश्चात्त्य विद्वान् सी.एच. टॉनी द्वारा अंग्रेजी में प्रशंसनीय रूप से अनूदित कथासरित्सागर की प्रस्तावना में भारतीय कथा-साहित्य के मर्मज्ञ मनीषी पैन्जर ने जो उद्गार व्यक्त किये हैं वे इस प्रसङ्ग में नितान्त महत्त्पूर्ण होने के कारण यहाँ उद्धृत किये जाते है: “जब हम इस ग्रन्थ को देखते हैं, तब इसमें आई हुई हर प्रकार की कथाओं को देखकर मन आश्चर्य से भर जाता है। ईसवी-सन् से सैकड़ों वर्ष पहले की जीवजन्तु-कथाएँ इसमें हैं। धुलोक और पृथिवी के निर्माण सम्बन्धी ऋग्वेदकालीन कथाएँ भी यहाँ हैं। उसी प्रकार रक्तपान करनेवाले वेतालों की कहानियाँ, सुन्दर काव्यमयी प्रेम-कहानियाँ और देवता, मनुष्य एवं असुरों के युद्धों की कहानियाँ भी इसी सङ्ग्रह में हैं। यह न भूलना चाहिए कि भारतवर्ष कथा-साहित्य की सच्ची भूमि है, जो इस विषय में ईरान और अरब से बढ़-चढ़कर है। भारत के इतिहास की कथा भी तो उसी प्रकार की एक कहानी है। इसका अतिशयोक्तिपूर्ण रूप इन आख्यानों से कम रोचक नहीं हैं"। “इन कहानियों का सङ्ग्रह करनेवाला लेखक सोमदेव विलक्षण प्रतिभाशाली पुरुष था। कवियों में उसकी प्रतिभा कालिदास से दूसरे स्थान पर आती है। स्पष्ट, रोचक और मन को खींच लेनेवाले ढंग से कहानी कहने की उसमें वैसी ही अद्भुत शक्ति थी, जैसी कहानियों के विषयों की व्यापकता और विभिन्नता है। मानवी प्रकृति का परिचय, भाषा-शैली की सरलता, वर्णन का सौन्दर्य और शक्ति एवं चातुर्य-भरी उक्तियाँ, इन सबकी रचना अत्यन्त प्रभावपूर्ण है।” “कथासरित्सागर के रूप में कल्पना ने एक ऐसे महान् कथासागर की सृष्टि की है कि उसमें अद्भुत कन्याओं और उनके साहसी प्रेमियों, राजाओं और नगरों, राजतन्त्र एवं षड्यन्त्र, जादू और टोने, छल और कपट, हत्या और युद्ध, रक्तपायी वेताल, पिशाच, यक्ष और प्रेत, पशु-पक्षियों की सच्ची और गढ़ी हुई कहानियाँ एवं भिखमंगे, साधु, पियक्कड़, जुआरी, वेश्या, विट और कुट्टनी इन सभी की कहानियाँ एकत्र हो गई हैं। ऐसा यह कथासरित्सागर भारतीय कल्पना-जगत् का दर्पण है, जिसे सोमदेव भविष्य की पीढियों के लिए छोड़ गए हैं।" मनोरञ्जक कथाएँ - इसी सन्दर्भ में कथासरित्सागर के संरचना-शिल्प से सम्बद्ध ए.बी. कीथ महाश्य के भी निम्नोद्धृत समीक्षामूलक मन्तव्य ध्यातव्य हैं : “प्रयत्न करने पर भी सोमदेव एक सुसंघटित ग्रन्थ की रचना करने में सफल नहीं हुए, परन्तु कथासरित्-सागर के उत्कर्ष का आधार उसके वस्तुकी संघटना पर नहीं है। उसका आधार इस दृढ वस्तुस्थिति पर है कि सोमदेव ने सरल और अकृत्रिम रहते हुए आकर्षक और सुन्दर रूप से ऐसी कथाओं की बड़ी भारी सङ्ख्या को प्रस्तुत किया है जो नितरां विभिन्न रूपों में-मनोविनोदकारी अथवा भयानक, अथवा प्रेम प्रसङ्ग से सम्बद्ध, अथवा जल और स्थल के अद्भुत दृश्यों के प्रति हममें अनुराग उत्पन्न करने के लिए आकर्षक, अथवा बाल्यकाल की परिचित कहानियों का सादृश्य उपस्थित करने वाले रूपों में-हमारे लिए अतीव रुचिकर है। क्षेमेन्द्र की बृहत्-कथामञ्जरी में कहीं अत्यधिक सक्षेप और कहीं अस्पष्टता के कारण कथाओं का सारा आकर्षण और रोचकता ही नष्ट हो जाती है। ठीक इसके विपरीत पञ्चतन्त्र के लेखक की तरह सोमदेव प्रतिभा के धनी हैं। वे पाठक के मन को क्लान्त किये बिना सावधानी से अभीष्ट अर्थ का प्रकाशन कर सकते हैं जिससे उनके द्वारा वर्णित कथाओं का रुचिकर रूप कभी भी क्षीण नहीं हो पाता है।” सोमदेव ने कथासरित्सागर के ७५वें तरङ्ग से लेकर ६६ तरङ्ग तक पच्चीस वेतालों की कथाएँ निबद्ध की हैं जो वेतालपञ्चविंशतिका के नाम से प्रख्यात हैं। क्षेमेन्द्र की बहत्कथामञ्जरी में भी शशाङकवती नामक लम्बक के द्वितीय गच्छ के अन्तर्गत पच्चीस वेतालों की कथाएँ प्राप्त होती हैं। इन कथाओं के मूल स्रोत के सम्बन्ध के विषय में हर्टल और एजर्टन का अभिमत है कि गुणाढ्य रचित बृहत्कथा में वेतालपञ्चविंशतिका नहीं थी। नरवाहनदत्त की कथा के साथ उसका कोई सम्बन्ध स्थापित न किये जा सकने के कारण विद्वानों का अनुमान है कि समसामयिक लोकप्रियता और कौतुहलक्षमता के कारण क्षेमेन्द्र और सोमदेव दोनों को ही उसका अपने-अपने ग्रन्थों में समावेश करने का आवेश रहा हो। इन वेताल कथाओं के अतिरिक्त पञ्चतन्त्र की भी बहुत सी कहानियाँ यहाँ उपलब्ध होती हैं। इनका क्रम वही है जो पञ्चतन्त्र की कहानियों का है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार इनमें से आधी कहानियाँ ४५० ई. से पूर्वकाल में रचित एक ऐसे सङ्ग्रह में विद्यमान थीं, जिसका उपयोग आर्यसेनसङ्घ नामक एक भिक्षु ने अपने ग्रन्थ में किया था। उक्त ग्रन्थ का चीनी अनुवाद उसके शिष्य गुणवृद्धि ने ४६२ ई. में किया था। प्राचीन भारतीय जनमानस पर गुणाढ्यरचित बृहत्कथा में गुम्फित कथाओं का अमिट प्रभाव छाया हुआ था। प्रत्येक ग्राम और प्रत्येक नगर में कथाकोविद वृद्धों को घेरकर बैठ जाया करती थी उत्सुकता से परिपूर्ण कथारसिक श्रोताओं की मण्डली, जिसमें इन कथाओं का आख्यान किया जाता था। कालिदास, बाण, सुबन्धु, दण्डी, उद्योतन सूरि, धनिक एवं गोवर्धन प्रभृति सरस्वती के असाधारण कृपापात्रों ने जिस कथाग्रन्थ की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा २५२ की थी, वह कथाग्रन्थ आज काल की वेगवती अगाध-धारा के गर्भ में विलीन हो चुका है। उस महनीय कथाकाव्य की मनोरम प्रतिध्वनि सोमदेव के कथासरित्सागर में आज भी सुनी जा सकती है और यही है प्रमुख कारण जो इस ग्रन्थ को हमारे लिए अनुपेक्षणीय महत्त्व का ग्रन्थ प्रमाणित करता है।