महाकवि विद्यापति-विरचित ‘पुरुष-परीक्षा’ उपदेशात्मक संस्कृत कथा-साहित्य का एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसकी भूयसी विशेषता यह है कि इसमें मानवेतर पशु-पक्षी जैसे पात्रों के स्थान पर वर्तमान कलियुग में उत्पन्न पुरातन एवं समसामयिक आदर्श चरित्रों को प्रस्तुत किया गया है। कथा-विन्यास के क्रम में ग्रन्थकार ने उदाहरण-प्रत्युदाहरण की युग्म-शैली का अवलम्बन कर अपने पात्रों के चरित्रगत श्वेत-श्याम पक्षों के उन्मीलन के द्वारा सद्गुणों की उपादेयता तथा अवगुणों की हेयता को रेखाङ्कित किया है। ग्रन्थ का नाम-‘पुरुष-परीक्षा’ है जो यादृच्छिक न होकर पूर्ण रूप से सार्थक है। ग्रन्थकार की मान्यता है कि पुरुष वही है जिसके व्यक्तित्व में वीरता, सुबुिद्धि, विद्या तथा पुरुषार्थ-चतुष्टय का समन्वय प्राप्त होता है। इससे रहित व्यक्ति केवल आकार-प्रकार से पुरुष की भाँति दीख पड़ता है-पुरुषाभास है, बिना पूँछ और सींग का पशु ही है। इस ग्रन्थ के अध्ययन से यथार्थ पुरुष के परीक्षण की दृष्टि प्राप्त होती है और इसी में इसके नामकरण की सार्थकता है। ग्रन्थ के मङ्गलाचरण के क्रम में आदिशक्ति की वन्दना के अनन्तर ग्रन्थकार ने कथा-प्रबन्ध का उपक्षेप करते हुए कहा है कि एकबार जब चन्द्रातपा नगरी के राजा पारावार ने अपनी सर्वगुणसम्पन्न पुत्री के अनुरूप वर की अर्हता के विषय में मुनिवर सुबुद्धि से प्रश्न किया तब उन्होंने कहा कि वीरता, सुबुद्धि, सद्विद्या तथा पुरुषार्थ से युक्त उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ २३५ पुरुष ही वास्तविक पुरुष है। अतः ऐसे पुरुष को ही कन्या-प्रदान किया जाय। इसी सन्दर्भ में ऐसे आदर्श पुरुषों के पचिययार्थ मुनिवर सुबुद्धि द्वारा आख्यात कथाओं का उपन्यास इस ग्रन्थ में किया गया है। इस ग्रन्थ की रचना का समय ईसा की चौदहवीं सदी है जिसके अन्तर्गत तुलुष्कों के निरन्तर आक्रमण के कारण तत्कालीन मिथिला का राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जनजीवन विशृङ्खल हो उठा था। ऐसे विप्लवसङ्कुल विषम काल में बर्बर विधर्मी आक्रान्ताओं के निष्ठुर उत्पीड़न एवं अत्याचार से भीत-सन्त्रस्त जनता के मानस में महाकवि विद्यापति ने अपने इस पुरुषार्थोपदेश से दीप्त कथाग्रन्थ के द्वारा नवजागरण के दिगन्त प्रसारी शङ्खनाद का उद्घोष किया है। विद्यापति का स्पष्ट अभिमत है कि शास्त्रविद्या की अपेक्षा शस्त्रविद्या श्रेष्ठतर है, वयोंकि शस्त्रबल से रक्षित राष्ट्र में ही शास्त्रविद्या का विकास सम्भव हो पाता है प्रस्तुत कथाग्रन्थ में चार परिच्छेद हैं जिनमें प्रथम परिच्छेद के अन्तर्गत उदाहरण -कथा की कोटि में दानवीर विक्रमादित्य, युद्धवीर कर्णाट-राजकुमार मल्लदेव, दयावीर रणथम्भौर-नरेश हम्मीरदेव तथा सत्यवीर चौहान वंशी चाचिकदेव की कथाएँ निबद्ध की गयी हैं और प्रत्युदाहरण-कथा की कोटि में चोर, भीरु, कृपण तथा आलसी की कथाएँ प्रस्तुत की गयी हैं। द्वितीय परिच्छेद के अन्तर्गत उदाहरण-कथा की कोटि में प्रतिभासम्पन्न विशाख, मेधावी कोकपण्डित तथा कर्णाट नरेश हरिसिंहदेव के सुबुद्धि-सम्पन्न मन्त्री गणेश्वर की कथाओं का आख्यान किया गया है। इनके प्रत्युदाहरण के रूप में कुबुद्धि-कथा के अन्तर्गत वञ्चक एवं पिशुन की कथाएँ तथा अबुद्धि-कथा के अन्तर्गत जन्मबर्बर एवं सङ्गबर्बर की कथाएँ प्रस्तुत की गयीं हैं। तृतीय परिच्छेद में सविद्य-कथा के उदाहरण के रूप में धारा-नगरी-निवासी शस्त्रविद्य सिंहल नामक क्षत्रिय धनुर्धर, शास्त्रविद्य ज्यौतिषी वराहमिहिर, वैद्य हरिश्चन्द्र एवं मीमांसक शबरस्वामी की कथाएँ प्राप्त होती हैं। इसी परिच्छेद में वेदविद्य कथा के साथ लोकविद्य कथा और उभयविद्य कथा का निबन्धन किया गया है। इनके प्रधान पात्र क्रमशः वेदशर्मा, शकटार एवं चाणक्य हैं। तत्पश्चात् उपविद्य-कथा के अन्तर्गत उदाहरण-कथाकोटि में चित्रविद्य मूलदेव, गीतविद्य कलानिधि, नृत्यविद्य गन्धर्वनामक नट, इन्द्रजालविद्य पक्षधर, पूजितविद्य एक अज्ञात नामक कवि तथा हासविद्य तस्कर की कथाएँ प्राप्त होती हैं। इनके अतिरिक्त प्रत्युदाहरण-कथा-कोटि में अवसन्न-विद्य वाग्विलास-नामक कवि, विद्याविहीन रविधर-नामक ब्राह्मण तथा खण्डितविद्य कुशशर्मा-नामक दम्भी ब्राह्मण की कथाएँ प्रस्तुत की गयी हैं। चतुर्थ परिच्छेद के अन्तर्गत धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष जैसे पुरुषार्थ-चतुष्टय से सम्बद्ध कथाओं का उपन्यास किया गया है। इनमें धर्म से सम्बद्ध कथाओं में तत्त्वज्ञानी बोधि नामक कायस्थ, तमोगुणी धार्मिक श्रीकण्ठ नामक ब्राह्मण तथा पापकर्म के लिए पश्चात्तापपूर्वक पुण्यार्जनपरायण राजकुमार२३६ गद्य-खण्ड रत्नाङ्गद की कथाएँ निबद्ध की गयीं हैं। अर्थमूलक कथाओं में न्यायपूर्वक उपार्जित धन का दान एवं भोग में व्यय करने वाले महाराज देव-नामक महेच्छ धनिक की कथा, भविष्य में प्राप्त होने वाले धन की प्रत्याशा में संचित धन का व्यय करने वाले प्रचुरवसु-नामक मूढ धनिक की कथा, कुलक्रमागत वृत्ति को छोड़कर एक साथ बहुत से उद्यमों द्वारा बहुत सा धन एकत्र कर लेने की दुष्पूर तृष्णा से ग्रस्त एक माली की कथा तथा शूरता के बल से उपार्जित सम्पदा का रक्षणावेक्षण करते हुए वीरपराक्रम-नामक राजा की कथा जिसने दूरदर्शिता के साथ लक्ष्मी से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसके पुत्रों में राज्य के लिए कभी कलह न होने पावे, निबद्ध की गयी हैं। काम-कथा के अन्तर्गत अनुकूल नायक राजा शूद्रक की कथा, दक्षिण नायक गौडनरेश लक्ष्मणसेन की कथा, विदग्धनायक महाराज विक्रमादित्य की कथा, धूर्त नायक शशी की कथा तथा विद्या एवं बुद्धि से सम्पन्न होने पर भी अपनी प्रेयसी पटरानी शुभदेवी के वशीभूत रहने के कारण अपने राज्य एवं प्राणों को गँवा देने वाले महाराज जयचन्द्र की कथा प्राप्त होती है। मोक्ष-कथा के अन्तर्गत निर्बन्धपरायण मुमुक्षु, विवेकशर्मा की कथा, निःस्पृहमुमुक्षु कृष्ण-चैतन्य की कथा तथा लब्धसिद्धि मुमुक्षु, योगिवर्य भर्तृहरि की कथा प्रस्तुत की गयी हैं और इसी कथा के साथ ग्रन्थ समाप्त हो जाता है। इस कथाग्रन्थ में विन्यस्त कथाओं के उपर्युक्त नामनिर्देश से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत भाषा के माध्यम से उदीयमान पीढ़ी को लोकनीति, दण्डनीति एवं चतुर्वर्ग के उपदेशों के द्वारा समसामयिक सन्दर्भ में नवचेतना प्रदान करना ग्रन्थकार का मूलभूत उद्देश्य था। यही कारण है कि इसकी भाषा असाधारण रूप से सरल एवं हृदयग्राही है। यहाँ गद्यमय सन्दर्भ में कथा का प्रवाह अबाध गति से अग्रसर होता जाता है जिसके अन्तर्गत स्थान-स्थान पर मनोहर श्लोकों का विन्यास किया गया है। विद्यापति-वाङ्मय के सुधी समीक्षकों के अनुसार इनकी सूक्तियाँ संस्कृत सूक्ति-साहित्य के अनमोल रत्न हैं।