पञ्चतन्त्र के आधार पर निर्मित उपदेशात्मक कथाग्रन्थ के रूप में हितोपदेश की लोकप्रियता और व्यापकता सर्वविदित है। इसके रचयिता राजा धवलचन्द्र के आश्रित नारायण नामक विद्वान् थे। हितोपदेश में उपलब्ध शिवस्तुतिपरक श्लोकों की बहुलता के आधार पर इन्हें शैव माना जाता है। इन्होंने अपनी कृति का स्रोत पञ्चतन्त्र तथा एक अन्य अनिर्दिष्ट नामक ग्रन्थ को बतलाया है। पञ्चतन्त्र के मूल कलेवर की अपेक्षा हितोपदेश के कलेवर में पर्याप्त परिवर्तन किया गया है। इसकी कथाओं को चार भागों में विभक्त किया गया है और प्रत्येक भाग के नवीन नामकरण किये गये हैं। इनके नाम हैं-(१) मित्रलाभ, (२) सुहृद्भेद (३) विग्रह और (४) सन्धि। इनके अन्तर्गत सत्तरह नवीन कथाओं का सन्निवेश किया गया है, जिनमें सात पशुपात्रप्रधान, पाँच कूटनीतिमूलक, तीन लोककथाश्रित तथा दो उपदेशात्मक कथाएँ हैं। इन नवीन कथाओं के स्रोत स्पष्ट नहीं हैं। अपने ग्रन्थ में नीतिपरक कथ्यों के अतिरिक्त स्रोत के रूप में लेखक द्वारा कामन्दकीय नीतिसार का उपयोग किया गया प्रतीत होता है। ग्रन्थकार ने अपने इस कथाग्रन्थ की रचना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा है कि गुरुमुख से इसके श्रवण से संस्कृत वाग्व्यवहार में निपुणता तथा सौष्ठव के साथ नीतिविद्या का ज्ञान प्राप्त होता है। तदनुसार उन्होंने यहाँ जो शैली अपनायी है वह असाधारण रूप से सरल और प्रवाहपूर्ण है। उनके पद्य आकर्षक हैं और उनमें हृदय पर अमिट प्रभाव डालने की अमित शक्ति है। बाल्यावस्था में अभ्यस्त इनके श्लोक आजीवन एक सच्चे साथी एवं मार्गदर्शक के रूप में इसके अध्येता के मानस में सहायतार्थ प्रस्तुत रहते हैं और यह २३२ गद्य-खण्ड इस ग्रन्थ की उपादेयता का सर्वोत्कृष्ट प्रमाण है। इस कथाग्रन्थ में निबद्ध कथाओं का नाम-निर्देश नीचे किया जाता है
प्रथम भाग-मित्र लाभ
१. प्रस्तावना २. लघुपतनक नामक कौए की कथा ३. वृद्धव्याघ्र एवं लोभी पथिक की कथा। ४. चित्राङ्गनामक मृग तथा सुबुद्धि नामक कौए की कथा ५. दीर्घकर्ण नामक विडाल की कथा ६. चूडाकर्ण नामक परिव्राजक की कथा ७. चन्दनदास नामक वणिक् की कथा ५. भैरव नामक व्याघ की कथा ६. वीरसेन नामक राजा की कथा १०. कर्पूरतिलक नामक हाथी की कथा
द्वितीय भाग-सुहृद्भेद
१. वर्द्धमान नामक वणिक्, सञ्जीवक नामक वृषभ तथा दमनक एवं करटक नामक श्रृगालों की कथा २. कीलोत्पाटी वानर की कथा। ३. कर्पूरपटक नामक रजक की कथा ४. दुर्दान्त नामक सिंह तथा दधिकर्ण नामक विडाल की कथा ५. घण्टाकर्ण नामक राक्षस का प्रवादमूलक आतङ्क तथा एक कुट्टनी द्वारा उसके आतंक से नागरिकों की मुक्ति। ६. कन्दर्पकेतु नामक संन्यासी, एक वणिक्, ग्वाला और उसकी व्यभिचारिणी स्त्री की कथा-उसमें अनुरक्त एक दण्डनायक तथा उसके पुत्र की कथा ७. काकदम्पती और कृष्णसर्प की कथा ८. दुर्दान्त नामक सिंह तथा एक सियार की कथा ६. टिटहरी के जोड़े तथा समुद्र की कथा
तृतीय भाग-विग्रह
१. हिरण्यगर्भ नामक राजहंस, चित्रवर्ण नामक मयूर तथा दीर्घमुख नामक बगुले की कथा। २३३ उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ २३३ २. पक्षी और बन्दरों की कथा । ३. बाघ का खोल ओढ़कर खेत चरने वाले धोबी के गदहे की कथा। ४. हाथियों का झुण्ड एवं बूढे खरगोश की कथा ५. हंस, कौआ और एक पथिक की कथा ६. कौआ, पथिक और एक ग्वाले की कथा ७. एक बढ़ई, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और उसके जार की कथा। ८. नील में रंगे हुए एक सियार की कथा - ६. वीरवर नामक राजपुत्र एवं उसके द्वारा अपने पुत्र के बलिदान की कथा। १०. चूडामणि नामक क्षत्रिय, नापित तथा भिक्षुक की कथा
चतुर्थ भाग-सन्धि
१. हंस और मयूर के मेल की कथा २. संकट एवं विकट नामक हंस तथा उनके मित्र कम्बुग्रीव नामक कच्छप की कथा ३. अनागत-विधाता, प्रत्युत्पन्नमति तथा यद्भविष्य नामक मत्स्यों की कथा। ४. समुद्रदत्त नामक वणिक्, रत्नप्रभा नामकी उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और उनके सेवक की कहानी ५. बगुले, साँप एवं नेवले की कथा ६. महातपा नामक मुनि तथा चूहे की कथा ७. वृद्धबक, कर्कट एवं मत्स्यों की कथा ८. देवशर्मा नामक ब्राह्मण और कुम्हार की कथा ६. सुन्द एवं उपसुन्द नामक दो दानवों की कथा १०. एक ब्राह्मण एवं तीन धूत्तों की कथा। ११. मदोत्कट नामक सिंह और उसके तीन सेवकों कौआ, बाघ एवं सियार की कथा १२. मन्दविष नामक सर्प एवं मेढकों की कथा १३. माधव नामक ब्राह्मण और उसके द्वारा पालित नेवले की कथा।
हितोपदेश के कुछ पद्यरत्न
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।१०१।। बुद्धिमान् व्यक्तियों का समय काव्य एवं शास्त्र की विनोदपूर्ण गोष्ठियों में बीतता है , परन्तु मूखों का समय जुआ, परनिन्दा, मद्यपान प्रभृति व्यसनों से, अतिनिद्रा से अथवा कलह से बीतता है। २३४ भरनाक गद्य-खण्ड समितिः । प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा। पिता का आत्मौपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ।।१०१२।। जिस प्रकार अपने प्राण अभीष्ट होते हैं उसी प्रकार अन्यान्य प्राणियों को भी अपने प्राण अभीष्ट होते हैं। सज्जन लोग अपने ही समान प्राणियों पर दया करते हैं। मणिर्जुठति पादेषु काचः शिरसि धार्यते। यथैवास्ते तथैवास्तां काचः काचो मणिर्मणिः।।२०६८।। मणि पैरों पर लोटता है और काच का टुकड़ा मस्तक पर रक्खा जाता है। जो जहाँ है वहीं रहे परन्तु काच काच ही है और मणि मणि ही है। लुब्धमर्थेन गृहणीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्ख छन्दानुरोधेन तत्त्वार्थेन च पण्डितम्।। ४.१०३।। लोभी को धन से वश में करना चाहिए, घमण्डी को हाथ जोड़कर वश में लाना चाहिए। मूर्ख को उसकी इच्छा का अनुपालन कर वश में लाना चाहिए और पण्डित को सत्यभाषण के द्वारा वश में कर लेना चाहिए।