०१ पञ्चतन्त्र

संस्कृत कथा-साहित्य के अन्तर्गत उपदेशप्रद नीतिकथा के रूप में पशु पात्र-प्रधान कथा-ग्रन्थ पञ्चतन्त्र का नाम विश्वविदित है। इसके विकास के बीज वैदिक वाङ्मय, महाभारत तथा बौद्ध-जैन साहित्य में उपलब्ध होते हैं। वैदिक संहिता के अन्तर्गत देवशुनी सरमा को देवदूती के रूप में प्राणियों के पास भेजा जाना तथा वर्षाकालीन वारिपात से प्रमुदित मेढ़कों के निनाद का अतिरात्र-याग में ऋत्विजों के मुख से उच्चरित वेदघोष के साथ साम्य-प्रदर्शन पशुओं और छोटे प्राणियों के ऊपर मानवोचित क्रियाकलाप का आरोप सूचित करता है। छान्दोग्य उपनिषद् में श्वानों की एक कथा का उल्लेख है जिसमें वे भोजन-संग्रह के लिए तारस्वर में विराव करने वाले एक श्वान का नेतापद के लिए अन्वेषण करते हैं। जानश्रुति पौत्रायण के आख्यान में वर्णित हंस-युगल-संवाद तथा सत्यकाम को हंस, वृषभ एवं एक अन्य जलचर पक्षी द्वारा प्रदत्त ब्रह्मोपदेश भी इसी तथ्य की ओर इङ्गित करते हैं। महाभारत में उपलब्ध गृध्र-गोमायु-संवाद, कपोत-व्याघ्र-संवाद, मार्जार-मूषिक-संवाद, व्याघ्र-गोमायु-संवाद प्रभृति में प्रस्तुत पशुपात्र प्रधान कथाएँ आगामी काल में विरचित किये जाने वाले इसी पञ्चतन्त्र की आधारभूमि प्रस्तुत करती हैं। इस सन्दर्भ में ए. बी. कीथ का यह कथन महत्त्वपूर्ण है- “महाभारत में हमें वह बीजभूत आधार प्राप्त है जो पञ्चतन्त्र के विकास की हेतुभूत सामग्री की ओर दृढतापूर्वक सङ्केत करता है।" बौद्ध और जैन साहित्य में प्राक्तन कर्म एवं पुनर्जन्म के अन्योन्याश्रित सिद्धान्त के अनुसार पशुयोनि से मानवयोनि में तथा उसके विपरीत योनि में जीवात्मा के जन्मग्रहण करने के विश्वास के मूल में भी पशु और मानव का सम्बन्ध स्पष्ट भाव से विद्यमान दीख पड़ता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पञ्चतन्त्र के पाठकों का इसकी कथाओं के साथ स्थापित होने वाली मानसिक अन्तरङ्गता के पीछे दीर्घकालीत साहित्यिक, धार्मिक और लौकिक मान्यताएँ कार्यशील रही हैं। पञ्चतन्त्र के कथामुख के सन्दर्भ से विदित होता है कि इसके रचयिता विष्णुशर्मा नामक एक नैष्ठिक कर्मकाण्डी ब्राह्मण थे। बृहस्पति, शुक्राचार्य, मनु, पराशर एवं व्यास द्वारा प्रोक्त धर्म, अर्थ एवं काम जैसे पुरुषार्थ-त्रितय के आधारभूत सिद्धान्तों को उन्होंने आत्मसात् कर लिया था। वे व्यावहारिक नीतिशास्त्र के क्षेत्र में अपने समय में अद्वितीय विद्वान् के रूप में सर्वविदित एवं सर्वसमादृत थे। अपने शिष्यों को मनोरज्जन के साथ सफलतापूर्वक शास्त्रज्ञान प्रदान करने की कला में असाधारण रूप से निपुण आचार्य होने का इन्हें विशद सुयश प्राप्त था। समकालीन छात्र-मण्डली इनके ज्ञान-सङ्क्रान्ति कौशल पर मुग्ध थी। ये उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ २१६ विद्या विक्रयी अध्यापक नहीं थे। ये तो एक परम निर्लोभ, निष्काम, वीतराग तथा जितेन्द्रिय विद्वान थे, जिनके जीवन का एकमात्र ध्येय जिज्ञासु शिष्यों को आजीवन शास्त्रमन्थन से प्राप्त नवनीत का उदारतापूर्वक वितरण करना ही था। दाक्षिणात्य जनपद की राजधानी महिलारोप्य नगर में विराजमान महाराज अमरशक्ति के अनुरोध पर बहुशक्ति, उग्रशक्ति तथा अनन्तशक्ति नामक परम दुर्बुधि, शास्त्रविमुख एवं विवेकहीन उनके तीन पुत्रों को नीतिशास्त्र में निष्णात बना देने का कार्यभार जब उन्होंने ग्रहण किया तब उनके वयस के अस्सी वर्ष पूरे हो चुके थे। राजसभा में अर्थ-लिप्सा और इन्द्रियासक्ति से शून्य उस निर्भीक विद्वान् की ऐसी प्रतिज्ञा सुन कर कि छः महीने की अवधि में ही वे उन तीनों को नीतिशास्त्र का अद्वितीय वेत्ता बना देंगे, सभी विस्मय से अवाक् हो गए। पण्डित विष्णुशर्मा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार छ: महीने के अन्तर्गत ही उन तीनों राजकुमारों को स्वरचित पञ्चतन्त्र नामक ग्रन्थ पढ़ाकर नीतिशास्त्र में असाधारण रूप से पारङ्गत बना दिया। और, उसके बाद से यह ग्रन्थरत्न बालकों को प्रबुद्ध बनाने के उद्देश्य से सर्वत्र ही समादृत हुआ। इस प्रसंग में कथामुख में विन्यस्त अधस्तन श्लोक में पञ्चतन्त्र के प्रणेता का असामान्य आत्मविश्वास प्रतिध्वनित हुआ है : अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं श्रृणोति च। न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन।। __ “जो व्यक्ति नित्य ही इस नीतिशास्त्र को पढ़ता और सुनता है वह देवराज इन्द्र से भी कभी पराभव नहीं प्राप्त कर सकता है।" - पञ्चतन्त्र में पाँच तन्त्र (परिच्छेद) उपलब्ध होते हैं जिनके नाम हैं- (१) मित्रभेद, (२) मित्र-सम्प्राप्ति, (३) काकोलूकीय, (४) लब्धप्रणाश तथा (५) अपरीक्षितकारक। कथा का प्रारम्भ राजा अमरशक्ति द्वारा बहुशक्ति, उग्रशक्ति एवं अनन्तशक्ति नामक अपने मूर्ख पुत्रों को नीतिनिपुण बनाने के उद्देश्य से पण्डित विष्णुशर्मा के शिक्षकत्व में समर्पित कर दिये जाने के वृत्तान्त से होता है। पण्डित विष्णुशर्मा ने उन शास्त्र-विमुख वयस्क राजकुमारों को इस ग्रन्थ में निहित कथाओं के द्वारा मनोरञ्जक शैली में नीतितत्त्व का उपदेश प्रदान कर छ: महीनों के भीतर ही निपुण नीतिवेत्ता बना दिया। १. इसके मित्रभेद नामक प्रथम तन्त्र में पिंगलक नामक सिंह एवं सञ्जीवक नामक वृषभ के बीच जो परस्पर मित्रभाव से रहते थे, एक चतुर श्रृगाल द्वारा फूट डाले जाने की मुख्य कथा प्रस्तुत की गयी है। राजनीति से सम्बद्ध विवादों के साथ ही यहाँ पशुपक्षियों की विविध मनोरञ्जक कथाएँ प्राप्त होती हैं जिनका शीर्षक-निर्देश निम्नस्थ है: OM २२० गद्य-खण्ड १. पिङ्गलक-सञ्जीवक-दमनक-कथा २. कीलोत्पाटी वानर की कथा ३. श्रृगाल और दुन्दुभि की कथा ४. दन्तिल और गोरम्भ की कथा की कथा ३५. आषाढ़भूति-प्रभूति की कथा ६. विष्णुरूपधारी तन्तुवाय एवं राजकुमारी की कथा ७. वायस-दम्पति और कृष्णसर्प की कथा ८. बक एवं कर्कट की कथा ६. सिंह-शशक-कथा १०. मन्दविसर्पिणी तथा अग्निमुख की कथा ११. नीलवर्ण श्रृगाल की कथा १२. सिंह, ऊँट, श्रृगाल और कौए की कथा १३. टिट्टिभ-दम्पती और समुद्र की कथा १४. कम्बुग्रीव-नामक कच्छप की कथा। १५. तीन मछलियों की कथा १६. गौरेया और हाथी की कथा १७. वज्रदंष्ट्र सिंह प्रभति की कथा १८. सूचीमुख नामक पक्षी और वानरों की कथा गाए जा १६. गोरैया और वानर की कथा २०. धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा २१. कृष्णसर्प एवं नकुल की कथा २२. राजा और उसके सेवक वानर की कथा मित्रसम्प्राति-नामक द्वितीय तन्त्र में चित्रग्रीव नामक कपोत, हिरण्यक नामक मूषिक, लघुपतनक नामक काक, चित्राङ्ग नामक हरिण तथा मन्थरक-नामक कच्छप की कथा मुख्य रूप से कही गयी है जिसमें मित्र-सङ्ग्रह के प्रभाव का आकर्षक रूप में वर्णन किया गया है। इसके अन्तर्गत निम्नाङ्कित कथाएँ हैं - १. चित्रग्रीव नामक कपोतराज की कथा २. ताम्रचूड नामक परिव्राजक तथा मूषिक की कथा ३. शाण्डिली द्वारा तिलविक्रय की कथा ४. शबर शूकर और श्रृंगाल की कथा उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ ५. सागरदत्त-नामक व्यापारी के पुत्र की कथा के ६. सोमिलक जुलाहे की कथा ७. बल का अनुसरण करने वाले श्रृगाल की कथा काकोलूकीय नामक तृतीय तन्त्र में काक और उलूक के जन्मजात वैरभाव के दृष्टान्त से युद्ध और सन्धि के सिद्धान्तों का स्पष्टीकरण किया गया है। इस तन्त्र में अधोनिर्दिष्ट कथाएँ प्राप्त होती हैं : १. काक और उलूक की कलह-कथा २. बाघ की खाल ओढ़कर चरने वाले गधे की कथा ३. चतुर खरगोश और हाथी की कथा। ४. दधिकर्ण नामक न्यायकर्ता मार्जार की कथा ५. गौरैया और खरगोश की कथा ६. तपस्वी द्वारा एक चुहिया को युवती का रूप प्रदान करने की कथा। ७. चोर का स्वागत करने वाले वृद्ध वणिक् की कथा। ८. भेकवाहन सर्प की कथा। ६. मित्रशर्मा नामक ब्राह्मण और तीन धूत्तों की कथा १०. कृष्णसर्प और चींटियों की कथा ११. ब्राह्मण और सर्प की कथा १२. स्वर्ण हंस और स्वर्णविहंग की कथा १३. कपोत और व्याघ की कथा १४. ब्राह्मण, चोर और पिशाच की कथा १५. एक राजपुत्र के पेट में रहने वाले सर्प की कथा १६. वीरधर रथकार की स्त्री एवं उसके उपपति की कथा। १७. सिन्धुक नामक पक्षी और व्याघ की कथा । १८. सिंह, श्रृगाल और गुफा की कथा [ की कथा १६. घृतान्ध ब्राह्मण की कथा। ४. लब्धप्रणाश नामक चतुर्थ तन्त्र में रक्तमुख नामक वानर तथा करालमुख नामक मगर की प्रमुख कथा के द्वारा उपलब्ध वस्तु के विनष्ट हो जाने की स्थितियों पर प्रकाश डाला गया है। इस तन्त्र में अधोनिर्दिष्ट कथाएँ प्राप्त होती हैं: १. वानर तथा मगर की मैत्री कथा २. गङ्गदत्त नामक भेकराज और कृष्णसर्प की कथा २२२ गद्य-खण्ड

  • ३. कराल केसर नामक सिंह और धूसरक नामक श्रृगाल की कथा। ४. युधिष्ठिर नामक कुम्हार तथा राजा की कथा ५. सिंहशावक और श्रृगालशावक की कथा। ६. ब्राह्मणी और लंगड़े की कथा ७. महाराज नन्द और उसके मन्त्री वररुचि की कथा ८. गधे और धोबी की कथा। ६. कृषक-पत्नी, ठग ओर श्रृगाली की कथा १०. घंटे और ऊँट की कथा। ११. सियार और सिंह की कथा। १२. कुत्ते की कथा ५. अपरीक्षितकारक-नामक पाँचवें तन्त्र में बिना अच्छी तरह सोच-समझकर काम करने से उत्पन्न विषम परिणामों को विविध कथाओं के द्वारा स्पष्ट किया गया है। इसके अन्तर्गत निम्नस्थ कथाएँ प्राप्त होती हैं १. मणिभद्र नामक श्रेष्ठी तथा नापित की कथा का २. ब्राह्मणी और नेवले की कथा। माधव ३. सिद्धिच्युत चक्रधर की कथा ४. सिंहकारक तीन शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों की कथा ५. अलौकिक पण्डितों की कथा ६. शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि मत्स्यों की कथा। ७. सङ्गीतज्ञ गधे ओर सियार की कथा। ८. मन्थर नामक जुलाहे की कथा ६. सोमशा के पिता की कथा १०. चन्द्रनृपति और वानर-दल की कथा। ११. विकराल नामक वानर और राक्षस की कथा १२. त्रिस्तनी राजकुमारी को कथा। १३. चण्डकर्म राक्षस द्वारा पकड़े गये ब्राह्मण की कथा १४. भारुण्ड-नामक पक्षी की कथा।

पञ्चतन्त्र की विभिन्न वाचनाएँ

पञ्चतन्त्र के काल-विशेष में प्रचलित विभिन्न भारतीय वाचनाओं एवं भारत के बाहर विभिन्न लेखकों द्वारा इसकी अनुवादात्मक वाचनाओं के प्रसार से इस कथाग्रन्थ की व्यापक २२३ उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ लोकप्रियता सिद्ध होती है। ऐसी अनुश्रुति है कि इस ग्रन्थ की मूल वाचना गुणाढ्य की बृहत्कथा के साथ ही सदा के लिए विलुप्त हो चुकी है। आज इसकी जो भी वाचनाएँ उपलब्ध होती हैं, वे न्यूनाधिक रूप में उसी मूल वाचना पर आधृत कही जाती हैं। पञ्चतन्त्र के कृती शोधकर्ता एवं समीक्षक डा. एजर्टन के अनुसार इसकी निम्नवर्णित आठ भारतीय बाचनाएँ उपलब्ध होती हैं। १. तन्त्राख्यायिका-इसे पञ्चतन्त्र की काश्मीरी वाचना कही जाती है। शारदा लिपि में लिखित इस की पाण्डुलिपियाँ डा. जे. हर्टेल को काश्मीर में प्राप्त हुई थीं, जिनके आधार पर उन्होंने इसका एक सुसम्पादित संस्करण प्रकाशित किया था। उनके अनुसार यह संस्करण मूल पञ्चतन्त्र के विशुद्ध पाठ का प्रतिनिधित्व करता है। परन्तु डा. एजर्टन इससे सहमत नहीं हैं। उनके कथनानुसार, तन्त्राख्यायिका मूल पञ्चतन्त्र का प्रतिनिधि न होकर उसकी अधिक से अधिक कथाओं को प्रस्तुत करती है और इस दृष्टि से अन्यान्य भारतीय वाचनाओं की तुलना में इसके अन्तर्गत मौलिकता के तत्त्व अधिकांशतः सुरक्षित हैं। २. दक्षिण भारतीय पञ्चतन्त्र-तमिलभाषाओं में रचित पञ्चतन्त्र की इस वाचना के सम्बन्ध में एजर्टन का अभिमत है कि इसमें मूल पञ्चतन्त्र के तीन चौथाई गद्य तथा दो तिहाई पद्य सुरक्षित हैं। पञ्चतन्त्र के आमुख में दक्षिणापथ में विद्यमान महिलारोप्य नगर के उल्लेख के आधार पर आधुनिक शोधप्रवण विद्वानों के अनुसार उक्त नगर को पञ्चतन्त्र की मूल वाचना का स्थान माना जाता है। तन्त्रोपाख्यान के इस तमिल संस्करण में तमिल-जनपद में प्रचलित कथाएँ भी संगृहीत की गयी हैं। ३. नेपाली पञ्चतन्त्र-पञ्चतन्त्र की इस नेपाली वाचना के अन्तर्गत गद्य और पद्य दोनों का ही अस्तित्व प्राचीनकाल में विद्यमान था। परवर्ती काल में किसी सम्पादक ने पद्यभाग को मूलग्रन्थ से पृथक् कर दिया जो अभी भी स्वतन्त्र रूप में उपलब्ध होता है, किन्तु इसका गद्यभाग नष्ट हो गया है। इस वाचना में उपलब्ध श्लोक समूह दक्षिण भारतीय पञ्चतन्त्र की वाचना में विद्यमान श्लोक-समूह से सर्वथा मिलते हैं। इतना होने पर भी विद्वानों ने इस नेपाली वाचना का स्रोत दक्षिण भारतीय पञ्चतन्त्र से भिन्न माना है। ४. पञ्चतन्त्र का हितोपदेशात्मक संस्करण-ईसा की नवीं सदी के आसपास नारायण भट्ट नामक विद्वान् ने पञ्चतन्त्र के आधार पर ‘हितोपदेश’ नामक लोकप्रिय कथाग्रन्थ का प्रणयन किया, जिसका एक मात्र उद्देश्य पञ्चतन्त्र की अपेक्षा अधिक संक्षिप्त और सरल रूप में रोचकता के साथ सुकुमारमति बालकों को संस्कृत भाषा तथा नीति की शिक्षा प्रदान करना था। पञ्चतन्त्र में विद्यमान पाँच भागों के स्थान पर इसमें केवल चार भागों की ही योजना की गयी है जिनके नामका भी सरलीकरण कर दिया गया है। इस भागचतुष्टय के नाम हैं मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और सन्धि। डा. कीथ के अनुसार, इसकी रचना किसी अन्य स्रोत के आधार पर लेखक ने की है। २२४ गद्य-खण्ड डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार इसका आधार दक्षिण भार पञ्चतन्त्र माना जाता है। ५. बृहत्कथामञ्जरी के अन्तर्गत पञ्चतन्त्र की कथा-क्षेमेन्द्र-प्रणीत बृहत्कथामञ्जरी के अन्तर्गत शक्तियशस् नामक लम्बक के भीतर पञ्चतन्त्र के कथाचक्र का अतिसंक्षिप्त रूप प्राप्त होता है। कथा-साहित्य के प्रसिद्ध समीक्षक फ्रेञ्च विद्वान् लाकोत की मान्यता है कि पञ्चतन्त्र की अतिशय प्रसिद्धि के कारण परवर्ती कालखण्ड में इसका सारांश बृहत्कथा के कलेवर में अनुप्रविष्ट कर दिया गया है। क्षेमेन्द्र द्वारा आख्यात पञ्चतन्त्र की पद्यात्मक कथा में मात्र पञ्चतन्त्र में अनुपलब्ध पाँच ऐसी कथाएँ प्राप्त होती हैं जो केवल तन्त्राख्यायिका में ही उपलब्ध हैं। इससे यह सहज ही अनुमेय है कि क्षेमेन्द्र द्वारा काश्मीर में रचित तन्त्राख्यायिका से वे कथाएँ ली गयी होंगी। ६. कथा-सरित्सागर के अन्तर्गत विन्यस्त पञ्चतन्त्र की कथा-सोमदेव-रचित कथासरित्सागर के शक्तियशस् की कथाओं से सम्बन्ध लम्बक में भी पञ्चतन्त्र का पद्यात्मक संक्षिप्त संस्करण प्राप्त होता है। परन्तु इन दोनों ही पद्यात्मक संस्करणों में मूल पञ्चतन्त्र की रोचकता तथा जीवन्त भाषा-शैली का सर्वथा अभाव है। ७. पश्चिम भारतीय पञ्चतन्त्र-पश्चिम भारतीय पञ्चतन्त्र की परम्परा का प्रतिनिधित्व निर्णयसागर प्रेस, मुम्बई तथा बम्बई संस्कृत सीरिज, बम्बई द्वारा प्रकाशित पञ्चतन्त्र के संस्करण करते हैं। विद्वानों के अनुसार पञ्चतन्त्र की यह वाचना अपरिवर्द्धित मूल पञ्चतन्त्र का स्वरूप उपस्थित करती है। आज से एक हजार साल पहले इस वाचन का प्रस्तुतीकरण सम्पन्न हो चुका था ऐसा विद्वानों का अभिमत है। ८. पञ्चाख्यान-पूर्णभद्र नामक एक जैन मुनि ने ईसा की बारहवीं सदी के अन्त में पञ्चाख्यान-नामक पञ्चतन्त्र की वाचना प्रस्तुत की थी। पञ्चतन्त्र की जितनी भी वाचनाएँ उपलब्ध होती हैं। उन सभी में केवल एक यही वाचना ऐसी है जिसका रचनाकाल असन्दिग्ध है। इसके अन्तर्गत अन्य वाचनाओं की तुलना में इक्कीस नई कथाओं का समावेश किया गया प्राप्त होता है जो इस वाचना की विशेषता है। यह पञ्चतन्त्र ‘सरल पञ्चतन्त्र’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसके आधार पर परवर्ती काल में १६५६-६० ई. के आस-पास जैन लेखक मेघविजय द्वारा रचित ‘एञ्चाख्यानोद्धार’ एक अन्य नीतिकथा-मूलक ग्रन्थ भी उपलब्ध होता है। ६. डॉ. एजर्टन द्वारा प्रस्तुत पञ्चतन्त्र का संस्करण-पञ्चतन्त्र-कथा के उद्भव और विकास के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान डा. एजर्टन ने इसकी सभी वाचनाओं का सूक्ष्मेक्षिकापूर्वक तुलनात्मक अध्ययन किया और उससे प्राप्त तथ्यों के आलोक में उन्होंने पञ्चतन्त्र का एक ‘पुनर्निमित संस्करण’ प्रस्तुत किया। पञ्चतन्त्र के अपने इस संस्करण के सम्बन्ध में डॉ. एजर्टन का कथन है- “जब हम इसकी अन्य वाचनाओं के साथ तुलना करते हैं तब उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ २२५ यह तथ्य पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाता है कि यह न केवल साहित्यिक सौन्दर्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ कृति है अपितु यह एक सबसे सुन्दर, परिष्कृत एवं निपुणतम रचना है।" डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार “यह पञ्चतन्त्र निश्चय ही महान् साहित्यकार की विलक्षण कलापूर्ण रचना है जिसमें लेखक की प्रतिभा द्वारा कहानियाँ और संवाद अत्यन्त ही सजीव हो उठे हैं।” डा. अग्रवाल की मान्यता है कि यह पञ्चतन्त्र, भाषा, पदसङ्घटना, शैली, अभिधान भङ्गिमा, वाक्य-योजना तथा कथाओं के सौष्ठवपूर्ण गठन जैसी विशेषताओं के कारण गुप्तकाल की एक अत्यन्त विलक्षण कृति है। पञ्चतन्त्र की कथाओं का विश्वपरिभ्रमण-संस्कृत कथा-साहित्य के अन्तर्गत विशेषतः पञ्चतन्त्र-मूलक कथाओं के अनुसन्धान-क्षेत्र में लब्धकीर्त्ति पाश्चात्त्य विद्वान् डॉ. बेनफी तथा डॉ. हर्टेल ने विश्वकथा-साहित्य की पृष्ठभूमि में पञ्चतन्त्र के विभिन्न अनूदित संस्करणों तथा उनके देशान्तर प्रसारी प्रभावों का गहन अध्ययन एवं समीक्षण किया है। इन दोनों विद्वानों ने इस क्रम में विदेशी भाषाओं में पञ्चतन्त्र के अनुवादों का भी सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है। इस सन्दर्भ में डॉ. एजर्टन द्वारा किये गये अनुसन्धान तो पञ्चतन्त्र की देशान्तर-यात्रा के प्रत्येक जिज्ञासु अध्येता के लिए परम उपादेय-सामग्री के शोधपूर्ण, प्रस्तुतीकरण के कारण, अनुपेक्षणीय महत्त्व रखते हैं। इस प्रसङ्ग में इन विद्वानों द्वारा प्रदत्त सूचनाओं का सार निम्नस्थ हैं: १. पञ्चतन्त्र का पहलवी (प्राचीन फारसी) भाषा में अनुवाद-ईरान के सम्राट् खुसरो नौशेरवाँ के शासनकाल में ५५० ई. के आसपास उनके प्रमुख राजवैद्य बुरजुए ने एक भारतीय विद्वान् बुजूर जमेहर के सहयोग से पञ्चतन्त्र का सर्वप्रथम रूपान्तर पहलवी भाषा में सम्पन्न किया था। उसने पञ्चतन्त्र को ऐसा अमृत कहा है, जिसके सेवन से मृत व्यक्ति जीवित हो उठता है। अर्थात् मूर्ख मनुष्य भी विद्वान् हो जाता है। आज, यह अनुवाद उपलब्ध नहीं होता है। २. पञ्चतन्त्र का पहलवी अनुवाद पर आघृत सीरियाई अनुवाद-अधुना लुप्त पहलवी अनुवाद के आधार पर ५७० ई. के आसपास बुद नामक एक विद्धान् ने-‘कलिलग ओर दमनग’ नाम से सीरियाई भाषा में पञ्चतन्त्र का अनुवाद प्रस्तुत किया। उन्नीसवीं सदी के मध्यान्तर में संयोगवश उपलब्ध इस अनुवाद का जर्मन-भाषा में रूपान्तर प्रस्तुत किया गया। यह अनुवाद मूल-पञ्चतन्त्र की कथाओं का विश्वसनीय रूप से प्रतिनिधित्व करता है। ३. पञ्चतन्त्र का पहलवी अनुवाद पर आधृत अरबी अनुवाद-ईसा की आठवीं सदी की अवधि में खलीफा अल् मन्सूर के आदेश से पूर्वोक्त पहलवी अनुवाद पर आघृत पञ्चतन्त्र का एक अरबी भाषा में रूपान्तर प्रस्तुत कराया गया। इस अनुवादक विद्वान् का नाम अब्दुल्ला-इब्न-उल्-मुकप्फा था और इसने उक्त अनुवाद का नाम ‘कलीलः व दिमनः’ रक्खा था। पञ्चतन्त्र की एक कथा के पात्र करटक एवं दमनक के नामगत ध्वनिसाम्य को इस अरबी शीर्षक में स्पष्ट ही देखा जा सकता है।૨૨૬ गद्य-खण्ड AN __४. पञ्चतन्त्र का अरबी अनुवाद पर आघृत यूनानी अनुवाद-ईसा की ग्यारहवीं सदी की अवधि में पूर्वोक्त अरबी अनुवाद के आधार पर साइमिआन नामक विद्वान् ने पञ्चतन्त्र के अरबी अनुवाद का यूरोप की प्रमुख भाषा यूनानी (ग्रीक) में सर्वप्रथम अनुवाद प्रस्तत किया। इस अनवाद का सर्वाधिक महत्त्व इस बात को लेकर है कि इसके आधार पर लैटिन, जर्मन, इटैलियन, स्पेनिश, फ्रेञ्च प्रभृति अन्यान्य यूरोपीय भाषाओं में इसके अनुवाद का मार्ग प्रशस्त हो गया और उन-उन भाषाओं में किये गये अनुवादों के माध्यम से पञ्चतन्त्र की कथाओं ने विश्वव्याप्त कीर्ति उपार्जित की। म ५. पञ्चतन्त्र का जावा द्वीप की भाषा में रूपान्तरण-जावा द्वीप की भाषा में सम्प्रति अनिर्देश्य स्रोत से विकसित पञ्चतन्त्र का एक स्थानीय रूपान्तर प्राप्त होता है। यह रूपान्तर ‘तन्त्री कामन्दक’ के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे इसमें उपलब्ध कथाओं के आधार पर पञ्चतन्त्र-जातीय साहित्य का प्रतिनिधि माना जाता है। जावा-द्वीप के साहित्य के प्रख्यात शोधकर्ता प्रो. हुइकास तथा वेंकटसुब्बिया ने ‘तन्त्रीकामन्दक’ के मध्य विन्यस्त संस्कृत श्लोकों के जावाभाषीय रूपान्तर के मूल का संस्कृत की कृतियों में अनुसन्धान किया है। _ ‘तन्त्री कामन्दक’ कथाग्रन्थ की नायिका का नाम तन्त्री है। उसे तन्त्र की विदुषी माना गया है। ग्रन्थ की समाप्ति पर विन्यस्त पुष्पिका में “इति चण्डपिङ्गलतन्त्रि-रचित तन्त्रवाक्य समाप्त" जैसा उल्लेख प्राप्त होता है। यहाँ कामन्दक शब्द के प्रयोग से यह स्पष्टतः सूचित होता है कि जावा द्वीप में प्राचीन काल से ही कामन्दकीय नीतिशास्त्र सुप्रचलित था। ऐसी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि उक्त ग्रन्थ की रचना ईसा की बारहवीं सदी के परिपार्श्व में की गयी होगी। इस कथा में वर्णित राजा का नाम ऐश्वर्यपाल है जिसकी राजधानी जम्बूद्वीप में अवस्थित सुप्रसिद्ध पाटलिपुत्र नगर बतलाया गया है। नीतिबन्धैश्वर्य-नामक इसका एक मन्त्री था और तन्त्री-नामक इसकी एक कन्या थी। सुप्रसिद्ध आरब्य उपन्यास सहस्ररजनी चरित्र के नायक की भाँति इस कथा के नायक ऐश्वर्यपाल को भी काम-परितृप्ति के लिए प्रत्येक रात्रि में एक-एक अक्षत यौवना कन्या की आवश्यकता होती थी। मन्त्रिपुत्री तन्त्री ने अत्यन्त कौशल के साथ विविध रोचक एवं कौतूहलपूर्ण कथाओं के आख्यान के द्वारा राजा को सम्मोहित कर रखने में असाधारण निपुणता प्रदर्शित की है। मुख्य कथा के अन्तर्गत आनुषङ्गिक कथाओं के गुम्फन की भारतीय कथा-शैली का प्रयोग यहाँ भी किया गया है।

  • तन्त्री के द्वारा कही गयी कथाओं में नन्दक नामक भारवाही वृषभ की कथा, चण्डपिङ्गलनामक सिंह एवं नन्दक नामक वृषभ की मैत्री कथा, दुन्दुभि के शब्द को सुनकर भयभीत श्रृंगाल की कथा, कौशाम्बी नगरी के राजा गजद्रुम की कथा, कच्छप एवं राजहंसयुगल की कथा, राजा सेवन्तर एवं सागर के वक्ष पर नाचने वाले वानररूपधारी उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ २२७ विद्याधर की कथा, हाथी द्वारा पक्षियों के अण्डों को विनष्ट करने तथा मक्खी, कौआ, मेढ़क आदि के द्वारा उसकी विनाश-योजना की कथा, धावन-प्रतियोगिता में कच्छप द्वारा गरुड के पराजय की कथा, सुम्नपद एवं प्रियम्वदा नामक विहग-दम्पती के अण्डों के समुद्र द्वारा अपहरण तथा प्रत्यावर्तन की कथा उल्लेखनीय कथाओं के रूप में परिगणित की जाती हैं। इस कथाग्रन्थ के उपसंहार में श्रृगाल की कूटनीति के फलस्वरूप सिंह और वृषभ के युद्ध का वर्णन प्राप्त होता है जिसके फलस्वरूप दोनों ही मारे जाते हैं। सिंह मरकर विष्णुलोक में स्थान प्राप्त करता है तथा वृषभ मरने के बाद शिवलोक का अधिकारी होता है। और; श्रृगाल, अपने पापकृत्य के फलस्वरूप मरकर सैकत सागर ताम्ब गोहमुख एवं यमनी लोक नामक नरक में जा गिरता है। म उपर्युक्त रूपरेखा के आलोक में देखने पर पञ्चतन्त्र एवं तन्त्री कामन्दक की कथाओं में समता की प्रतिध्वनि प्राप्त होने पर भी समीक्षकों का अभिमत है कि इसमें धर्मशिक्षा के प्रति कोई आग्रह नहीं है। पञ्चतन्त्र के इन पूर्व संसूचित भारतीय एवं भारतीयेतर भाषाओं में अनूदित समग्र संस्करणों का वर्णन डॉ. जे. हर्टेल द्वारा जर्मन-भाषा में प्रकाशित पञ्चतन्त्र-परक शोधपूर्ण ग्रन्थ से विशद रूप में प्राप्त किया जा सकता है। तदनुसार पचास से अधिक भाषाओं में इसके दो सौ से अधिक संस्करण आज तक हो चुके हैं जिनमें तीन-चौथाई संस्करण भारतीयेतर भाषाओं में हुए हैं। इस प्रकार इसकी विपुल संस्करण-सम्पदा के साक्ष्य से भारत के साथ ही भारत के बहिःस्थ समस्त सभ्य देशों में पञ्चतन्त्र की कथाओं के विजयाभियान की गौरव-गाथा से हम परिचित होते हैं। शोध-प्रवण विद्वानों के सत्प्रयास से आज यह तथ्य भलीभाँति प्रमाणित हो चुका है कि संसार के समस्त नीतिकथामूलक साहित्य के उद्गम का मूल स्रोत भारत में रचित पञ्चतनत्र ही है। और, वास्तव में यह ग्रन्थरत्न विश्व साहित्य को भारत का अनुपम अवदान है। पञ्चतन्त्र के कथामुख से ज्ञात होता है कि इसकी रचना मन्दमति एवं कुपथगामी राजपुत्रों को कथानक की रोचक शैली में नीति की शिक्षा प्रदान करने के लिए की गई है। परन्तु यह ग्रन्थ केवल शिष्य-शिक्षण के सीमित उद्देश्य की ही पूर्ति नहीं करता, अपितु जीवन के ज्वलन्त एवं व्यापक प्रश्नों का समाधान भी प्रस्तुत करता है। इतना ही नहीं यह लोकनीति, धर्म-कर्म, आचार-विचार एवं राजनीति के उन नियमों का श्वेत-श्याम उदाहरणों के साथ परिचय भी प्रस्तुत करता है, जिनके ज्ञान एवं व्यवहार से मानव-जीवनका धरातल नैतिकता से समुज्ज्वल हो उठता है। __नैतिकता से परिपूर्ण जीवन की विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए अंग्रेजी में पञ्चतन्त्र के अद्वितीय अनुवादक के रूप में सुप्रसिद्ध पाश्चात्त्य विद्वान् राइडर ने कहा है कि “नीतिप्रधान जीवन वह है जिसमें मनुष्य की समस्त शक्तियों और सम्भावनाओं का पूर्ण विकास हो, अर्थात् एक ऐसे जीवन की प्राप्ति जिसमें आत्मरक्षा, धन-समृद्धि, सङ्कल्पमय २२८ गद्य-खण्ड कर्म, मित्रता एवं उत्तम विद्या, इन पाँचों का इस प्रकार समन्वय किया जाय कि उसमें आनन्द की उत्पत्ति हो। यह जीवन का महनीय आदर्श है जिसे पञ्चतन्त्र की चातुर्य और बुद्धिमता से परिपूर्ण पशु-पक्षियों की कथाओं के माध्यम से अत्यन्त कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।" पञ्चतन्त्र का भाषा-शिल्प-संस्कृत की आख्यान-शैली में पद्यगर्भित गद्यसन्दर्भ का दर्शन ब्राह्मण-साहित्य के युग से ही प्रारम्भ हो जाता है। इस शैली के अन्तर्गत कथा का सामान्य आख्यान गद्य के माध्यम से किया जाता है, परन्तु जब किसी सूक्ति अथवा महत्त्वपूर्ण तथ्य का कथन अभीष्ट होता है तब उसे पद्य के माध्यम से प्रकट किया जाता है। पञ्चतन्त्र में भी हम इसी शैली का प्रयोग देख पाते हैं। गद्यमय कथाप्रवाह के अन्तर्गत, स्थान-स्थान पर, उपदेशात्मक, नीतिनिर्देशपरक, धर्मशास्त्रीय सिद्धान्त के प्रतिपादक, भाग्य की प्रभविष्णुता के प्रख्यापक, भविष्य की अनुल्लंघनीयता के उद्घोषक एवं आगामी कथा के उपक्षेपक पद्यों का यहाँ सुन्दर सन्निवेश प्राप्त होता है जो शैली की एकरसता को दूर करने के साथ ही अपनी शाश्वत गुणवत्ता के कारण हमारे मन में सदा के लिए बस जाते हैं। _जटिल समासों के विकट बन्ध से विहीन सरल एवं प्रवाहपूर्ण गद्य-सन्दर्भ के अन्तर्गत हृदय को अपनी रुचिर भंगिमा से आकृष्ट कर लेने वाले पद्यमय सुभाषितों का विन्यास इस ग्रन्थ के भाषाशिल्प को एक अभूतपूर्व सौष्ठव प्रदान करता है। परोक्ष-पद्धति के द्वारा संस्कृत-शिक्षण के क्षेत्र में तो इस ग्रन्थ की उपयोगिता निर्विवाद रूप से स्वीकृत है। शिक्षा-प्रदान करने के उद्देश्य से रचित ग्रन्थ में आडम्बरपूर्ण बन्ध-विन्यास तथा कृत्रिम अलङ्कार-योजना की कोई उपयोगिता नहीं है, इस तथ्य के प्रति इस ग्रन्थ के रचयिता पूर्णरूप से सचेतन हैं। अतः, इसकी भाषा, शब्दावली, वाक्य-रचना, छन्दों की प्रयुक्ति, अलङ्कारों के चयन, वाग्भङ्गिमा तथा कथाशिल्प के सरलता, स्वाभाविकता तथा प्रसङ्गौचित्य से संवलित होने के कारण संस्कृत के उपदेशात्मक कथाग्रन्थों में इसे अद्वितीय स्थान प्राप्त है। पञ्चतंत्र की भाषा और शैली के परिचय के लिए काकोलूकीय नामक तृतीय तन्त्र की शशक-कपिञ्जल-कथा द्रष्टव्य है जिसमें एक खरगोश और गौरैया अपने वासस्थान के लिए आपस में लड़ पड़ते हैं और अपने कलह के निराकरण हेतु एक वनबिलाव के पास जाते हैं, जो नदी के तट पर सूर्योपस्थान करता हुआ अहिंसा और धर्म के सम्बन्ध में विलक्षण व्याख्यान दे रहा होता है। वह उन दोनों को फुसला कर अपने पास ला बैठाता है और दबोच कर खा जाता है। क्षुद्र, ढोंगी और धूर्त न्यायकर्ता से किस प्रकार सरल बुद्धि वाले विवाद कर्ताओं का सर्वनाश होता है इसे हम इस कहानी में स्पष्ट ही देख पाते हैं। २२६ उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ पञ्चतन्त्र के कतिपय पद्यरत्न-पञ्चतन्त्र के अन्तर्गत विविध कथाओं से सम्बद्ध पद्यों में नीति के सारतत्त्व के प्रतिपादन के साथ ही जीवन के ज्वलन्त यथार्थ को भी रेखाङ्कित किया गया है। संस्कृत साहित्य की अनमोल निधि में ये पद्य रत्नों की भाँति अक्षय आभा से मण्डित हैं। इनकी ज्योति दैनन्दिन समस्याओं से सङ्कुल मानव की जीवनचर्या में आशा और उत्साह के सञ्चार के साथ नीति के आलोक का प्रसार करती है, जिससे मानवता के सुसंस्कृत, समुन्नत एवं सफल जीवन की ऊर्जस्वल प्रेरणा प्राप्त होती है। उपर्युक्त तथ्य के निदर्शन के रूप में यहाँ प्रस्तुत ग्रन्थ से कतिपय पद्य उद्धृत किये जाते हैं: गतवयसामपि पुंसां येषाम भवन्ति ते तरुणाः। अर्थेन तु ये हीनास्ते वृद्धा यौवनेऽपि स्युः।। धन-सम्पन्न व्यक्ति वृद्ध होने पर भी तरुण हुआ करते हैं परन्तु जो धनहीन हैं वे युवावस्था में भी वृद्ध ही हैं। न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः। न्नरः। एतदेव हि पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद् भूरिरक्षणम् ।। स्वल्प वस्तु की रक्षा के लिए बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह अधिक मूल्यवान् वस्तु का नाश न करे। पाण्डित्य यही है कि वह स्वल्प महत्त्व के वस्तु का अधिक मूल्यवान् वस्तु की रक्षा के लिए सहर्ष त्याग कर दे। उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते, हयाश्च नागाश्च वहन्ति नोदिताः। अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः, परेगितज्ञानफला हि बुद्धयः।। शब्द के द्वारा प्रकट किये गये अर्थ को पशु भी समझ लेते हैं। घोड़े और हाथी भी अपने स्वामी के द्वारा प्रेरित होकर उन्हें उनके गन्तव्य स्थान की ओर ले चलते हैं किन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति शब्द से कथित न किये गये अर्थ को भी तर्कशक्ति से जान लेता है। बुद्धि का फल यही है कि दूसरों के मनोगत भावों को केवल इशारे से ही समझ ले। सुवर्णपुष्पितां पृथ्वी विचिन्वन्ति त्रयो जनाः। शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ।। स्वर्णमय पुष्पों से मण्डित इस पृथ्वी से समृद्धि की प्राप्ति शूर, विद्वान् और सेवावृत्ति में अभिज्ञ ये तीन व्यक्ति ही कर सकते हैं। भये वा यदि वा हर्षे सम्प्राप्ते यो विमर्शयेत्। कृत्यं न कुरुते वेगान्न स सन्तापमाप्नुयात्।। २३० गद्य-खण्ड भय अथवा हर्ष का अवसर उपस्थित होने पर भी जो व्यक्ति स्थिर होकर विचार करता है और मनोवेग के वशीभूत होकर कोई कार्य नहीं कर बैठता है वह कभी भी पश्चात्ताप से सन्तप्त नहीं होता है। अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च। पुरुषविशेष प्राप्ता भवन्त्ययोग्याश्च योग्याश्च ।। अश्व, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, पुरुष और नारी जैसे पुरुष के पास रहते हैं तदनुसार ही योग्य अथवा अयोग्य हो जाते हैं। एक हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता। बुद्धिबुद्धिमतः सृष्टा हन्ति राष्ट्र सनाथकम् ।। किसी धनुर्धर द्वारा छोड़ा गया बाण किसी एक शत्रु को भी मार सकता है अथवा नहीं भी मार सकता है किन्तु एक दण्डनीति में निष्णात व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त बुद्धि राजा सहित समस्त शत्रुराष्ट्र को नष्ट कर देती हैं। त्याज्यं न धैर्य विधुरेऽपि काले धैर्यात् कदाचित् स्थितिमाप्नुयात् सः। यथा समुद्रेऽपि हि पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति तर्तुमेव।। विषम परिस्थिति में भी धैर्य का त्याग नहीं करना चाहिए। कभी ऐसा भी हो सकता है कि धैर्य के अवलम्बन के फलस्वरूप स्थिति सुदृढ़ हो जाय और सफलता मिल जाय। इसका दृष्टान्त वह समुद्री बनियाँ है जो सागर के मध्य में पोतभङ्ग हो जाने पर भी उसे तैर कर पार कर लेना चाहता ही है। उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीर्दैवेन देयमिति का पुरुषा वदन्ति। दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या, यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः।। सिंह के समान पराक्रम-पूर्वक उद्योगशील श्रेष्ठ पुरुष के पास लक्ष्मी स्वयं चली आती हैं परन्तु कायर पुरुष लक्ष्मी को भाग्य के द्वारा देय मानते हैं। भाग्यवाद को तिलाञ्जलि देकर अपनी पूरी शक्ति से पुरुषार्थ का प्रदर्शन करो। यत्न करने पर भी अभीष्ट सिद्ध न हो तो इसमें पुरुष का कौन सा दोष है। बहूनामप्यसाराणां समवायो हि दुर्जयः। तृणैरावेष्ट्यते रज्जुर्येन नागोऽपि बद्ध्यते॥ २३१ उपदेशात्मक एवं नीतिमूलक कथा-ग्रन्थ बहुत से असार वस्तुओं का भी समूह बड़ा बलवान् और अजेय होता है। तृणों से रस्सी बनायी जाती है जिससे मतवाला हाथी भी बांधा जाता है। अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः। स्वार्थमभ्युद्धरेत् प्राज्ञः स्वार्थभ्रंशो हि मूर्खता। अपमान का वरण कर तथा आत्मसम्मान को पीठ पीछे रखकर बुद्धिमान व्यक्ति को अपने स्वार्थ का साधन करना चाहिए क्योंकि स्वार्थ की हानि सबसे बड़ी मूर्खता है। आदौ चित्ते ततः काये सतां सम्पद्यते जरा। असतां तु पुनः काये नैव चित्ते कदाचन।। सज्जनों को पहले चित्त में और तब शरीर में बुढ़ापा आती है परन्तु दुर्जनों को केवल शरीर में ही आती है मन में कभी नहीं आती।’