बौद्ध-वाङ्मय में कथासाहित्य का विकास
संस्कृत भाषा में निबद्ध प्राचीन भारतीय वाङ्मय के अन्तर्गत विद्यमान कथाशैली का प्रभाव समानान्तर रेखा में विकसित होने वाले बौद्धों एवं जैनों की रचनाओं पर भी पड़ा। उन्होंने भी अपने-अपने सिद्धान्तों के अनुसार उपदेश प्रदान करने के अभिप्राय से मनोरञ्जक कथाशैली का सोत्साह अवलम्बन किया जिसके फलस्वरूप संस्कृत में निबद्ध महायान बौद्ध वाङ्मय के जातक और अवदान ग्रन्थों में तथा प्राकृत एवं संस्कृत में निबद्ध जैन वाङ्मय के ग्रन्थों में उपदेशप्रद कथाओं का एक विशाल साहित्य उपलब्ध होता है। बौद्ध संस्कृत-साहित्य के अन्तर्गत धर्मोपदेशमूलक कथाओं के विन्यास की दृष्टि से जातकमाला, दिव्यावदान, अवदानशतक तथा अवदानकल्पलता उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। इनमें आर्यशूरविरचित जातकमाला अपने भाषासौष्ठव एवं कथाशिल्प के सौन्दर्य के कारण, बुद्धभक्ति से अनुरञ्जित संस्कृतज्ञ-मण्डली में चिरकाल से समादृत रही है। माया जातकमाला की कथाएँ भगवान् बुद्ध के पूर्वजन्म की घटनाओं से सम्बन्ध रखती हैं। उन्होंने अपने अनेक पूर्वजन्मों में बोधिसत्त्व के रूप में दान, शील, धैर्य, वीर्य, ध्यान तथा प्रज्ञा की पारमिता का परिपूर्णता का-निरन्तर अभ्यास किया था, जिसके फलस्वरूप महाराज शुद्धोदन से मायादेवी में सिद्धार्थ के रूप में जन्म ग्रहण करने पर उन्हें सम्बोधि की प्राप्ति संभव हो सकी। पारिमिताओं की अभ्यासावस्था का ही नाम बोधिसत्त्वता है तथा उनकी सिद्धावस्था का नाम बुद्धावस्था है-बुद्धत्व है। इस प्रकार जातकमाला के अन्तर्गत बोधिसत्त्व के जीवन की लोकोत्तर घटनाएँ वर्णित की गयी हैं। भगवान् बुद्ध के आदर्शभूत चरित्र के स्थान पर बोधिसत्त्व के चरित्रगत आदर्श को जातकों में सुप्रतिष्ठित किये जाने के पीछे प्रबल यौक्तिकता का आधार विद्यमान है। भगवान् बुद्ध का आदर्श व्यक्तिगत निर्वाण के अभिलाषी भिक्षु का आदर्श था। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने राज्यसुख का परित्याग किया, स्तनन्धय पुत्र से आश्लिष्ट अपनी अनुपम रूपवती पत्नी का परित्याग किया, स्वजन-समाज का परित्याग किया और वासना की ज्वाला में अनवरत जलते हुए इस सांसारिक जीवन से अभिनिष्क्रान्त होकर वे अनागरिक हो गये। भगवान् बुद्ध के इस सर्वस्वत्यागी भिक्षुरूप के प्रति माया में लिप्त साधारण जनसमुदाय को एक ऐसा लोकातिक्रान्त आदर्श दिखलायी पड़ा जिसका अनुकरण उनके लिये असम्भव था। उसे तो एक ऐसा उद्धारकर्ता आदर्श पुरुष चाहिए था जिसके जीवन में स्त्री, पुत्र, परिवार तथा विभव के लिए स्थान हो। विश्वमैत्री और अपार करुणा से सम्भृत बोधिसत्त्व के रूप में जनसमुदाय ने इसी उद्धारकर्ता पुरुष का साक्षात्कार किया बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव १६७ AL जो एक भी सांसारिक जीव के दुःखमग्न रहने की स्थिति में स्वयं निर्वाण की कामना नहीं करता है और अशेष प्राणियों के दुःखप्रहाण के लिए कृच्छ्रसाध्य साधना में संलग्न रहता है। इस प्रकार, बोधिसत्त्व के आदर्श ने जनसमुदाय के हृदय को असाधारण रूप से सम्मोहित कर लिया। यही कारण है कि महायान सम्प्रदाय के बौद्ध आचार्यों ने पारमिताओं की साधना में निरत बौधिसत्त्वों की उज्ज्वल चरित्रगाथा को जातक कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इड इन जातक कथाओं में सर्वत्र ही सदाचार का उद्द्योतन किया गया है। समाज में विद्यमान विभिन्न कोटि के मनुष्यों की मानसिकता के अनुरोध से इन जातक-कथाओं का प्रणयन किया गया है। अतएव हम देखते हैं कि इनके अन्तर्गत प्राणिकथा, लोककथा एवं नीतिकथा के तत्त्वों का सम्मिश्रण हो गया है। जातकमाला में बोधिसत्त्व की अनुपम दानशीलता, स्वार्थत्याग तथा आत्माहुति की एक से एक उत्तम कोटि की कथाओं का उपन्यास किया गया है। भगवान् बुद्ध ने अपने पूर्वजन्मों में मानव, देवता एवं पशुपक्षियों की विविध योनियों में बोधिसत्त्व का आदर्श लेकर अवतार लिया है और सर्वत्र ही अपने आदर्शोज्ज्वल चारित्रिक उत्कर्ष का परिचय प्रदान किया है। हम इस प्रसङ्ग में कतिपय जातकों की कथावस्तु का संक्षिप्त उल्लेख अप्रासकि नहीं होगा। व्याघ्री जातक में हम देखते हैं कि अवदात ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर अशेष विद्यास्थान एवं कलाओं में पारङ्गम वैदुष्य से विख्यात बोधिसत्त्व द्वारा एक क्षुधातुर व्याघ्री की क्षुधा को शान्त करने के लिए निर्जीव मांसपिण्ड के समान अपने शरीर का समर्पण कर दिया गया है। शिबिजातक में नेत्र की याचना करने के लिये आये एक अन्ध याचक को राजपदासीन बोधिसत्त्व अपने नेत्रों का दान कर देते हैं और अम्लानभाव से अन्धता का वरण कर लेते हैं। शश जातक में वर्णित हुआ है कि किस प्रकार शशयोनि में जन्म-ग्रहण करने पर भी बोधिसत्त्व ने एक सार्थ-परिभ्रष्ट एवं बुभुक्षित पथिक की क्षुधा के निवारणार्थ प्रज्वलित अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे दी, जिससे वह पथिक उसके अग्निपक्व मांस को खाकर अपनी बुभुक्षा शान्त कर सके। विश्वन्तरजातक में हम देख पाते हैं कि शिबिराज सञ्जय के पुत्र के रूप में विश्वन्तर के नाम से सुप्रसिद्ध बोधिसत्त्व अपना सर्वोत्तम गजराज, रथ, पत्नी एवं पुत्रद्वय का दान कर देते हैं। सुपारग जातक में बोधिसत्त्व को हम एक वृद्ध नौसारथि के रूप में देखते हैं जो अपनी जरातुर दशा में भी सांयात्रिकों का अनुरोध मान कर उनके कल्याण के लिए नौकारूढ हो गये और सामुद्रिक विपत्तियों से बचाकर उन्हें सकुशल वापस ले आये। कुल्माषपिण्डी जातक में स्वल्पमात्रा में भी किये गये कुल्माषदान का महत्त्व वर्णित हुआ है। इस दान की महिमा.से बोधिसत्त्व को हम परजन्म में कोसल-नरेश के रूप में देख पाते हैं। १६८ गद्य-खण्ड श्रेष्ठिजातक के अन्तर्गत हम बोधिसत्त्व को समृद्ध श्रेष्ठिकुल में उत्पन्न देख पाते हैं; जिन्होंने सत्कर्म के शाश्वत प्रतिपक्षी मार द्वारा उद्भावित प्रचण्ड वहिज्वाला का, अपने पुण्यप्रभाव से स्वतः विकसित कमलों पर पैर रखते हुए, अतिक्रमण कर श्रद्धेय प्रत्येक बुद्ध को पिण्डपात प्रदान किया। उन्मादयन्ती जातक में हमें शिबिराज के रूप में बोधिसत्त्व का दर्शन होता है जो अपने पौरमुख्य की अनुपम सुन्दरी कन्या उन्मादयन्ती के रूप-लावण्य पर पहले तो आसक्त हो जाते हैं, परन्तु पीछे चलकर अपने असाधारण धैर्य, जन्म जन्मान्तर के धर्माभ्यास तथा प्रबुद्ध प्रसङ्ख्यान के बलपर दुर्निवार कामराग पर प्रशंसनीय रूप से विजय प्राप्त कर लेते हैं। कुम्भजातक में हम बोधिसत्त्व को देवराज इन्द्र के पद पर आसीन देखते हैं जो लोकोपकार की सहज भावना से परिप्रेरित होकर एक बार मर्त्यलोक में परिभ्रमण करते हुए सर्वमित्रनामक राजा को कुसंगति में पड़कर मद्यपान में प्रसक्त देखते है; और, तब राजसभा में अपनी मित्रमण्डली और सभासदों के साथ बैठे हुए उस राजा के समक्ष एक दिव्य तपस्वी का रूप धारण कर मद्यपूर्ण घट के साथ उपस्थित हो मद्य के दोषों के सविस्तर वर्णन द्वारा उन्हें मद्यप्रसङ्ग से विरत कर देते हैं। एक वार हिमालय के एक जंगल में बटेर-पक्षी के शावक के रूप में बोधिसत्त्व जन्म-ग्रहण करते हैं। अपने पूर्व-संस्कार के प्रभाव से अविलुप्त धर्मबोध के कारण पक्षिशावक के रूप में रहते हुए भी मांसाहार का सर्वथा परित्याग कर शुष्क तृणपर्ण के सहारे ही वे जीवन-यापन करते हैं। एक वार उस जंगल में भयङ्कर दावानल फैल जाता है जिससे आतङ्कित होकर सभी पक्षी वहाँ से उड़ जाते हैं और एकमात्र वही बटेर-शावक न उड़ सकने के कारण वहाँ रह जाता है। अपने प्राणों को सङ्कट में पाकर सत्यपूत वाणी के द्वारा वह अग्नि की स्तुति करता है जिससे दावानल तत्क्षण शान्त हो जाता है। आर्यशूर ने सत्य की अप्रमेय महिमा को इस जातक में प्रदर्शित किया है। महाबोधिजातक के अन्तर्गत बोधिसत्त्व को हम एक विद्वान् परिव्राजक के रूप में देख पाते हैं, जो एक विमतिग्रस्त राजा के समक्ष अहेतुवाद, ईश्वरवाद और अच्छेदवाद का निराकरण कर सम्यग्-दर्शन का सदुपदेश प्रदान करते हैं। इस प्रकार जातकमाला में गुम्फित सभी जातकों में बोधिसत्त्व के अवदात चरित्र का मनोहर वर्णन प्राप्त होता है। आर्यशूर द्वारा इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में निबद्ध श्लोक ग्रन्थरचना के उद्देश्य को स्पष्ट करते है : श्रीमन्ति, सद्गुणपरिग्रहमङ्गलानि कीर्त्यास्पदान्यनवगीतमनोहराणि।। पूर्वप्रजन्मसु मुनेश्चरितामृतानि भक्त्या स्वकाव्यकुसुमाञ्जलिनार्चयिष्ये।। श्लाध्यैरमीभिरभिलक्षितचिह्वभूतै रादेशितो भवति यत् सुगतत्वमार्गः। १६६ . बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव स्यादेव रूक्षमनसामपि च प्रसादो धाः कथाश्च रमणीयतरत्वमीयुः।। लोकार्थमित्यभिसमीक्ष्य करिष्यतेऽयं श्रुत्यार्थयुक्त्यविगुणेन तथा प्रयत्नः। लोकोत्तमस्य चरितातिशयप्रदेशैः स्वं प्रातिभं गमयितुं श्रुतिवल्लभत्वम् ।। मुनिप्रवर तथागत के चरितको जो सौन्दर्य से समलङ्कृत, सद्गुणों के परिग्रह से मङ्गलमय, यशस्कर, प्रशंसनीय, मनोहर तथा विस्मयावह कृत्यों से परिपूर्ण हैं, मैं अपनी काव्यमय पुष्पाञ्जलि से भक्तिपूर्वक समर्चित करूँगा। _ इन प्रशंसनीय तथा परिचित विशेषताओं से युक्त चरितों से सुगत द्वारा प्रोक्त मार्ग का उपदेश प्राप्त होता है। इन चरितों के आख्यान से शुष्क हृदयवाले लोगों के मन में भी प्रसन्नता का निश्चित रूप से सञ्चार होगा और धर्मचर्चा से सुन्दर ये कथाएँ और भी सुन्दर हो उठेगी। “श्रद्धेय श्रमण-परम्परा की अनुश्रुतियों में प्रदर्शित युक्तियों से युक्त मार्ग का अनुसरण कर लोकोत्तम भगवान् बद्ध के चरित्रोत्कर्ष का आख्यान जनकल्याण की भावना से मैं करूँगा जिससे इसके साथ ही मेरी प्रतिभा से प्रसूत ये कथाएँ लोगों को सुनने में प्रिय प्रतीत हों।” _आर्यशूर की शैली अलङ्कृत संस्कृत काव्यशैली का चिरन्तन उदाहरण प्रस्तुत करती है और इसमें वे सारी विशेषताएँ विद्यमान हैं जिसे अलङ्कृत शैली के लिए आवश्यक माना जाता है, फिर भी इनकी यह उल्लेखनीय विशेषता है कि इन्होंने दुरूहता से कुण्ठित भाषा के व्यवहार से अपने को सर्वत्र ही बहुत दूर रक्खा है। धर्मप्रचार की भावना से प्रतिबद्ध होने के कारण इनके गद्यबन्ध एवं श्लोक-सन्दर्भ दोनों ही प्रसाद गुण से ओत-प्रोत हैं। इनकी इस कृति पर भदन्त कवि अश्वघोष का पुष्कल प्रभाव परिलक्षित होता है। स्वाभाविकता, सरलता और धर्म-प्रवणता के फल-स्वरूप इनके काव्यशिल्प में सर्वत्र ही एक स्निग्ध-सौम्य आभा की मनोहरता विद्यमान है। प्रसिद्ध चीनी यात्री इत्सिंग के कथनानुसार उसके पर्यटन-काल में बौद्ध उपासकों द्वारा जातकमाला का अध्ययन अत्यन्त ही आदर और आवेश के साथ किया जाता था जो इसकी लोकप्रियता को उद्घोषित करता है। इनके एक ग्रन्थ का ४३४ ई. में चीनी भाषा में अनुवाद किया गया था जिसके आधार पर इनके ग्रन्थलेखन का काल तीसरी अथवा चौथी सदी प्रमाणित होता है। आर्यशूर की भाषा एवं शैली से परिचित होने के लिए कतिपय अधोविन्यस्त सन्दर्भ अवलोकनीय है: २०० किन गद्य-खण्ड ततश्चकम्पे सधराधरा धरा व्यतीत्य वेलां प्रससार सागरः। प्रसक्तगम्भीरमनोज्ञनिस्वनाः प्रसस्वनुर्दुन्दुभयो दिवौकसाम्।। (शिबिजातकम्-३८) यत्संप्रयोगा विरहावसानाः समुच्छ्रयाः पातविरूपनिष्ठाः। विद्युल्लताभङ्गुरलोलमायुस्तेनैव कार्यो दृढम प्रमादः।। (शशजातकम्-७) मुहुर्मुहुः काञ्चनपिञ्जराभिर्भाभिर्दिगन्ताननुरञ्जयन्ती। पयोदतूर्यस्वनलब्धहर्षा विद्युल्लता नृत्तमिवाचचार।। (मत्स्यजातकम्-१३) ब्रूयादसत्यमपि सत्यमिव प्रतीतः कुर्यादकार्यमपि कार्यमिव प्रहृष्टः। यस्या गुणेन सदसत्सदसच्च विद्या च्छापस्य मूर्त्तिरिव सा निहितेह कुम्भे।। (कुम्भजातकम्-२३) अलङ्क्रिया शक्तिसमन्वितानां तपोधनानां बलसम्पदगया। व्यापाददावानलवारिधारा प्रेत्येह च शान्तिरनर्थशान्तिः।। (क्षान्तिजातकम्- २७) धर्मश्च रक्षति नरं न धनं बलं वा धर्मः सुखाय महते न विभूतिसिद्धिः। धर्मात्मनश्च मुदमेव करोति मृत्यु न त्यस्ति दुर्गतिभयं निरतस्य धर्मे।। (अयोगृहजातकम्- ४७) - उसके बाद पर्वतों के साथ ही धरती काँप उठी, तीरभूमि का अतिक्रमण कर सागर फैल चला और गम्भीर तथा मनोहर ध्वनि से युक्त देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं। (शिबिजातक-३८) प्रियजनों के मिलन का अन्त विरह से होता है, सारे सांसारिक अभ्युदयों का अन्त पतन में होता है और जीवन बिजली की चमक के समान अस्थिर है। अतः धर्म के विषय में प्रमाद नहीं करना चाहिये। (शशजातक-७) सोने के समान पीतवर्ण कान्ति से दिगन्तों को अनुरञ्जित करती हुई बिजली बादल के तूर्यनिनाद रूपी गर्जना से प्रसन्न होकर ही मानो नाच उठी। (मत्स्यजातक-१३) जिसके प्रभाव से असत्य भी सत्य के समान प्रतीत होता है, जिसके सेवन से लोग प्रसन्नतापूर्वक अकर्त्तव्य कृत्य को भी कर्त्तव्य कृत्य मानकर कर बैठते हैं तथा जिसके आवेश में सत्य को असत्य एवं असत्य को सत्य समझ बैठते हैं वही पाप का मूर्तिस्वरूप पदार्थ भरा है। (कुम्भजातक-२३) बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव २०१ क्षमा बलवानों का भूषण है, तपस्वियों का श्रेष्ठ बल है, द्रोह चिन्तनरूपी दावानल के प्रशम के लिए निर्मल वारिधारा है और इस लोक तथा परलोक में अनर्थों की शान्ति का कारण है। (क्षान्तिजातक-२७) मनुष्य की रक्षा धर्म करता है, धन अथवा बल नहीं। महान् सुख की प्राप्ति धर्म से होती है, पार्थिव विभूतियों की सिद्धि में नहीं। मृत्यु धर्मात्मा व्यक्ति को हर्ष ही प्रदान करती है। धर्म-परायण व्यक्ति को दुर्गति का भय नहीं व्यापता है। भास्कर्य एवं चित्रकला के क्षेत्रों में जातक-कथाओं का अवदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। न केवल भारत की ही, अपितु बृहत्तर भारत की कला-चेतना को भी जातक-साहित्य ने अभिनव छन्द एवं भगिमा प्रदान की है। भरहुत एवं साँची के स्तूपों और उनकी पाषाण-वेष्टनी पर कतिपय जातकों की कथाएँ उत्कीर्ण पायी जाती हैं। इस प्रसङ्ग में नागषड्दन्त जातक तथा रुरु जातक की कथाओं के आधार पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ विशेष महत्त्व की हैं। अजन्ता की चित्रवीथी में सुप्रसिद्ध विश्वन्तर जातक का मनोहर आलेख्य प्राप्त होता है। चीन, बर्मा, जावा एवं स्याम देशों में जातक-साहित्य से उत्प्रेरित विविध मूर्तिव्यूह का उत्कीर्णन इस साहित्य के देशान्तर प्रसारी प्रभाव को अकुण्ठ भाव से प्रमाणित करता है। जातक-कथाओं का पात्र-चित्रण अतीव व्यापक है। इसके अन्तर्गत राजा, दरिद्र, चाण्डाल, विद्वान्, श्रेष्ठी, सांयात्रिक, चोर प्रभृति विविधकोटिक मानव; बन्दर, हरिण, हाथी, खरगोश एवं व्याघ्री प्रभूति वन्य पशुसमूह तथा विविध विहङ्गमों के कूजन से मुखर लताकुञ्ज, पादपश्रेणी एवं सघन वनप्रदेश से सङ्कुल पृथिवी के चराचर व्यापी जीवनचक्र का आवर्तन-विवर्त्तन उपलब्ध होता है। निम्न से निम्न पशुयोनि में भी जन्म लेकर भी जीव अपने सदाचरण के द्वारा बुद्धत्व के सुदुर्लभ पद की प्राप्ति कर सकता है-जैसा सदुपदेश जातक कथाओं में वारम्वार रेखाङ्कित किया गया है। इस प्रकार, हम देखते हैं कि इन कथाओं ने संस्कृत कथा साहित्य, बुद्ध-भक्तिभावना एवं प्राचीन भारतीय कला-चेतना को समान रूप से समृद्धि प्रदान की है। यहाँ कतिपय प्रमुख जातकों का नामनिर्देश किया जाता है : जातक के नाम प्रतिपाद्यपी १. व्याघ्री जातक आत्मोत्सर्ग २. शिबिजातक नेत्रदान कुल्माषपिण्डीजातक भिक्षादान श्रेष्ठिजातक भिक्षादान ५. शशजातक आत्मोत्सर्ग له » ૨૦૨ गद्य-खण्ड ६. अगस्त्यजातक ७. मैत्रीबलजातक विश्वन्तरजातक यज्ञजातक १०. शक्रजातक ११. ब्राह्मणजातक १२. उन्मादयन्तीजातक १३. सुपारगजातक १४. मत्स्यजातक १५. कुम्भजातक १६. हंसजातक १७. महाबोधिजातक १८. महाकपिजातक १६. शरभजातक २०. क्षान्तिजातक २१. ब्रह्मजातक २२. हस्तिजातक २३. सुतसोमजातक २४. अयोगृहजातक २५. महिषजातक २६. शतपत्रजातक आहारप्रदान आत्मोत्सर्ग दान के कारण प्रजाकोप का वरण आशय-शुद्धि भूतदया सदाचार-पालन काम पर विजय सत्यवचन की महिमा शील-विशुद्धि मद्यपान की हेयता सद्वृत्त की महिमा बौद्ध धर्म विरोधी वादों का खण्डन परोपकार के लिए प्राणोत्सर्ग अपकारी के प्रति भी उपकार की कर्त्तव्यता क्षान्ति-पारमिता परलोक की विश्वसनीयता परोपकार के लिए देहोत्सर्ग प्राणिहिंसा से विरति जगत् की अनित्यता क्षमाशीलता क्षमाशीलता
अवदान-कथा
अवदान शब्द से ‘लोकविश्रुत महनीय कृत्य’ का अर्थ गृहीत होता है। भगवान् बुद्ध के पुरातन एवं वर्तमान जीवन से सम्बद्ध कथाएँ बौद्ध साहित्य में अवदान-कथाओं के नाम से विख्यात हैं। इन कथाओं में समसामयिक आदर्श चरित्रों का भी वर्णन प्राप्त होता है। धर्मोपदेश के उद्देश्य से प्रणीत अवदान-साहित्य के माध्यम से कर्मफल के भोग की अनिवार्यता, नैतिक नियमों के पालन की आवश्यकता, चातुर्वर्ण्य-धारणा की हेयता, सांसारिक विभूतियों की नश्वरता तथा बुद्धभक्ति की श्रेष्ठता को वारम्वार प्रकाश में लाया गया है। पञ्चशील का परिपालन तथा कुशल कर्मपथ का अनुसरण मनुष्य की ऐहिक तथा पारलौकिक अभ्युन्नति को सुनिश्चित करता है। शुभ कर्मों का फल शुभ एवं अशुभ कर्मों बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव २०३ का फल अशुभ होता है। अतः, शुभ कर्म यत्न-पूर्वक संसेव्य हैं तथा अशुभ कर्म यत्न-पूर्व त्याज्य हैं-यही अवदान-कथाओं में निहित उपदेशों का सारसंक्षेप है। अवदान-साहित्य के प्रमुख ग्रन्थों में अवदानशतक तथा दिव्यावदान उल्लेखनीय हैं। इनमें अवदानशतक प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है। इसकी शब्दावली में यत्र-तत्र संस्कृत के विकृत शब्दों का भी प्रयोग देखा जाता है जो पालि और प्राकृत भाषा के प्रभाव को सूचित करता है। अतिशयोक्ति और पुनरुक्ति अवदान-ग्रन्थों की सामान्य विशेषताएँ हैं। अवदान निर्माताओं का उपदेश-तत्त्व पर विशेष आग्रह रहने के कारण भाषा का शिल्पगत सौष्ठव यहाँ उपेक्षित हो गया है।
- उपर्युक्त दोनों अवदान-ग्रन्थों में काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से दिव्यावदान अधिक आकर्षक है। इसमें अड़तीस प्रकरण हैं जिनके अन्तर्गत बुद्ध के प्रातिहार्य-प्रदर्शन, दान की महत्ता, अशोक एवं उपगुप्त का जीवन-चरित, कुणाल का नेत्रोत्पाटन, आनन्द पर आसक्त चण्डालकन्या की बुद्ध-द्वारा धर्मदीक्षा, सूर्य के समान तेजस्वी ब्राह्मण पुष्करसारी का मातङ्गराज शार्दूल कर्णद्वारा शास्त्रार्थ में पराजय, दुर्गम बदर-द्वीप जाकर सर्वदारिद्र्यभञ्जन रत्न लानेवाले महान् साहसी सार्थवाह सुप्रिय नामक बोधिसत्त्व का अलौकिक सत्त्वोत्कर्ष, चन्द्रप्रभ एवं मैत्रकन्यक बोधिसत्त्वों के चरित जैसे विषयों से सम्बद्ध अवदान विशेष रूप से रोचक हैं। इन अवदानों की मूलभूत सामग्री के वैविध्य तथा इनके रचनाकार भदन्तों के प्रज्ञामूलक तारतम्य के कारण भाषाशैली की दृष्टि से इनमें एकरूपता उपलब्ध नहीं होती है। इस अवदान ग्रन्थ के गाथाभाग तथा गद्यसन्दर्भ के अन्तर्गत बहलांश में सरल संस्कत भाषा का प्रयोग किया गया है परन्तु स्थान-स्थान पर सुदीर्घ सामासिक गद्यबन्ध तथा अलङ्कारविन्यास से मनोहर विपुलाक्षर छन्दों में निबद्ध श्लोक सन्दर्भ भदन्तों के असाधारण रूप से पाण्डित्यपूर्ण रचनाकौशल का साक्ष्य उपस्थित करते हैं। दिव्यावदान का प्रथम संस्करण ई.वी. कौबेल तथा आर.ए. नील द्वारा सम्पादित होकर केम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस से १८८६ ई. में प्रकाशित किया गया था। तत्पश्चात् इसका द्वितीय संस्करण डॉ. पी.एल. वैद्य के सम्पादकत्व में मिथिला विद्यापीठ, दरभंगा से १६५८ ई. में प्रकाशित किया गया। बुद्ध के धर्मोपदेश-स्वरूप होने के कारण बौद्ध जगत् में यह ग्रन्थ अत्यन्त ही श्रद्धेय माना जाता है। शुंगवंश के राजाओं के साथ पुष्यमित्र के नामोल्लेख तथा दीनार शब्द के प्रयोग के आधार पर इस ग्रन्थ में सङ्कलित अवदानों की रचना २०० ई. से लेकर ३५० ई. तक की कालावधि के मध्य की गई मानी जाती है। इस ग्रन्थ के शार्दूलकर्णावदान का एक चीनी अनुवाद २६५ ई. में किया गया था जिससे इस अवदान का विदेश में भी समादृत होना सिद्ध होता है। २०४ गद्य-खण्ड अवदान-ग्रन्थ की परम्परा में बुद्धभक्ति से अनुप्राणित क्षेमेन्द्र द्वारा प्रणीत अवदानकल्पलता नामक संस्कृत-पद्यबद्ध ग्रन्थ, शैली और विषय की दृष्टि से, अन्यून महत्त्व रखता है। इसके अन्तर्गत भगवान् बुद्ध के पूर्वजन्म एवं वर्तमान जन्म से सम्बद्ध एक सौ सात अवदान उपलब्ध होते हैं। इस ग्रन्थ में क्षेमेन्द्र के शास्त्रज्ञान एवं कवित्व का सर्वत्र ही सुस्पष्ट प्रतिबिम्ब दिखलायी पड़ता है। लोकचरित्र के उदात्तीकरण की दृष्टि से एक बौद्धेतर संस्कृत कवि की यह रचना उसकी गुणग्राहिता तथा विचारगत असङ्कीर्णता का निदर्शन प्रस्तुत करती है। एक कथा के अन्तर्गत कथान्तर के संयोजन का कौशल अवदान-साहित्य में भी अपनाया गया उपलब्ध होता है। इसी अवदान की मूलकथा में अनुप्रविष्ट है मातङ्गराज त्रिशकु की कथा जो अपने पुत्र शार्दूलकर्ण का विवाह पुष्करसारी नामक ब्राह्मण की कन्या से करना चाहता है। इस कथा के उपन्यास से यही प्रतिपादित किया गया है कि जातिमूलक श्रेष्ठत्व की धारणा मिथ्यादृष्टि-प्रसूत है। वस्तुतः गुणोत्कर्षमूलक क्षेष्ठता में ही यथार्थश्रेष्ठता प्रतिष्ठित होती है। त्रिशङ्कु मातङ्गराज की विविधशास्त्र-विषयक अगाध विद्वत्ता से हार मान कर पुष्करसारी ब्राह्मण अपनी कन्या का विवाह उसके पुत्र से कर देने के लिए अन्ततोगत्वा सहमत हो जाता है। अवदान के अन्त में कथा के पात्रों के पूर्वजन्म का परिचय भगवान् बुद्ध द्वारा इस प्रकार दिया गया है: “स्याद् भिक्षवो युष्माकं काङ्क्षा वा विमतिर्वा विचिकित्सा वा-अन्यः स तेन कालेन तेन समयेन त्रिशङ्कुर्नाम मातङ्गराजोऽभूत्। नैवं द्रष्टव्यम् । अहमेव स तेन कालेन तेन समयेन त्रिशकुर्नाम मातङ्गराजोऽभूवम्। स्यादेवं च भिक्षवो युष्माकम्-अन्यः स तेन कालेन तेन समयेन शार्दूलकर्णो नाम मातङ्गराजकुमारोऽभूत्। नैवं द्रष्टव्यम् । एष स आनन्दो भिक्षुः स तेन कालेन तेन समयेन शार्दूलकर्णो नाम मातङ्गराजकुमारोऽभूत्। स्यादेवं युष्माकम्-अन्यः स तेन कालेन तेन समयेन पुष्कर-सारी नाम ब्राह्मणोऽभूत् । नैवं द्रष्टव्यम्। एष शारद्वतीपुत्रो भिक्षुः स तेन कालेन तेन समयेन पुष्करसारी नाम ब्राह्मणोऽभूत्। नान्या सा तेन कालेन तेन समयेन पुष्करसारिणो ब्राह्मणस्य प्रकृति म माणविका दुहिताभूत्। नैवं द्रष्टव्यम्। एषा सा प्रकृतिर्भिक्षुणी तेन कालेन तेन समयेन पुष्करसारिणो ब्राह्मणस्य प्रकृति म माणविका दुहिताभूत्। सा एतर्हि तेनैव स्नेहेन तेनैव प्रेम्णा आनन्दं भिडुं गच्छन्तमनुगच्छति तिष्ठन्तमनुतिष्ठिति। यद्यदेव कुलं पिण्डाय प्रविशति तत्र तत्रैव द्वारे तूष्णीम्भूता अस्थात्।।" अथ खलु भगवानेतस्मिन्निदीने एतस्मिन् प्रकरणे तस्यां वेलायामिमां गाथामभाषत २०५ बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव “पूर्वकेण निवासेन प्रत्युत्पन्नेन तेन च। एतेन जायते प्रेम चन्द्रस्य कुमुदे यथा।।” “हे भिक्षुओ ! तुम लोगों को ऐसा सन्देह हो सकता है कि वह त्रिशङ्कु नामक चाण्डालों का राजा कोई अन्य व्यक्ति होगा। ऐसा नहीं जानना चाहिए। मैं ही उस समय त्रिशकुनामक चाण्डालों का राजा था। हे भिक्षुओ ! तुम लोगों को ऐसा सन्देह हो सकता है कि कोई अन्य व्यक्ति ही चाण्डालों के राजा त्रिशकु का पुत्र शार्दूलकर्ण था। ऐसा नहीं समझना चाहिए। वह यही आनन्द-नामक भिक्षु उस समय चाण्डालों के राजा त्रिशकु का पुत्र शार्दूलकर्ण था। तुम लोगों को ऐसा सन्देह हो सकता है कि उस समय का वह पुष्करसारी नामक ब्राह्मण कोई अन्य व्यक्ति होगा। ऐसा नहीं समझना चाहिए। वह यही शारद्वती का पुत्र भिक्षु उस समय पुष्करसारी नामक ब्राह्मण था। और पुष्करसारी नामक ब्राह्मण की प्रकृतिनामक पुत्री को कोई अन्य कन्या नहीं समझना चाहिए। यही है वह प्रकृतिनामक भिक्षुणी जो उस समय उसी पूर्वजन्मप्ररूढ स्नेह और प्रेम के वशीभूत होकर जाते हुए आनन्द के पीछे-पीछे जाती थी और उसके खड़े रहने पर खड़ी रहती थी। आनन्द जिस-जिस गृहस्थ कुल में भिक्षा के लिए प्रवेश करता था, उसी-उसी स्थान पर द्वारदेश में वह चपचाप खडी रहती थी। इसके बाद भगवान बद्ध ने उसकी आदिकथा से सम्बद्ध इस प्रकरण में उस समय यह गाथा कही-“प्राक्तन वासनाके प्रत्युत्पन्न हो जाने के कारण ही इस जन्म में कुमुद के प्रति चन्द्रमा के समान प्रेम उत्पन्न हो जाता है।” अवदान-साहित्य के अन्तर्गत कथाओं के माध्यम से धर्ममार्ग के अवलम्बन के लिए प्रोत्साहन का स्वर पाठकों को सर्वत्र ही सुनायी देता है। ज्योतिष्कावदान के उपसंहार में भगवान् बुद्ध-द्वारा कथित कर्म के प्रकार तथा उनके फल सभी धर्मों की मान्यताओं को समान रूप से सम्पुष्ट करते हैं : “इति हि भिक्षव एकान्तकृष्णानां कर्मणामेकान्तकृष्णो विपाकः, एकान्तशुक्लाना मेकान्तशुक्लः, व्यतिमिश्राणां व्यतिमिश्रः। तस्मात्तर्हि भिक्षव एकान्तकृष्णानि कर्माण्यपास्य व्यतिमिश्राणि च, एकान्तशुक्लेष्वेव कर्मस्वाभोगः करणीयः । इत्येवं वो भिक्षवः शिक्षितव्यम् ।।” “इस प्रकार, हे भिक्षुओ, सर्वथा बुरे कर्मों के सर्वथा बुरे फल, सर्वथा अच्छे कर्मों के सर्वथा अच्छे फल तथा मिले-जुले कर्मो के मिले-जुले फल होते हैं। इसलिए तब, हे भिक्षुओ, सर्वथा बुरे एवं मिले-जुले कर्मों को छोड़ कर सर्वथा अच्छे कर्मों में मन लगाना चाहिए। इस प्रकार, हे भिक्षुओ, शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।” भारत तथा भारत से बाहर भगवान् बुद्ध के उपदेशों के व्यापकरूप से प्रचार-प्रसार में इन कथाओं का प्रभूत योगदान रहा है। प्राचीन भारतीय वाङ्मय में विकसित धर्म एवं नीतिमूलक कक्षाओं के अध्ययन की दृष्टि से जातक एवं अवदान-ग्रन्थों का अनुपेक्षणीय महत्त्व है। नाशिक२०६ गद्य-खण्ड
जैन-वाङ्मय में कथा-साहित्य
निवृत्तिपरक धार्मिक उपदेशों को मनोरम शैली में समाज के अन्तर्गत प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से जैन आचार्यों ने भी अपने वाङ्मय में कथाविधा का अवलम्बन किया है। जैन आचार्यों की रचनाएँ प्राकृत भाषा में निबद्ध हैं। यह साहित्येतिहास का सर्वमान्य तथ्य है कि प्राकृत-साहित्य सहस्राधिक वर्षों तक संस्कृत साहित्य के साथ-साथ विकसित होता रहा और इसने भारतीय जन-जीवन के धर्म, संस्कृति और समाजसंस्था को निरन्तर प्रभावित किया है। संस्कृत साहित्य पर इसका मुखर प्रभाव ध्वनिकाव्य के उदाहरणपरक प्राकृत के पद्यों में दर्शनीय है जिन्हें संस्कृत के प्रायः सभी प्रमुख ध्वनिवादी आचार्यों ने अपने-अपने निबन्धों में सादर उपन्यस्त किया है। इस प्रकार संस्कृत और प्राकृत का समानान्तर विकास तथा पारस्परिक प्रभाव सरलता से देखा जा सकता है। परवर्ती काल में जैन आचार्यों ने संस्कृत और अपभ्रंश में अपनी विविध रचनाएँ प्रस्तुत की जो कथ्य एवं वर्णनशिल्प की दृष्टि से आकर्षक तथा वैविध्यपूर्ण होने के कारण साहित्य की अक्षय निधि बन गयीं हैं। जैन कथा-साहित्य के बीज अर्धमागधी में निबद्ध आगम साहित्य में उपलब्ध होते हैं जिनका विकास नियुक्ति, भाष्य, चूर्णि और टीकाग्रन्थों में कालक्रम से सम्पन्न हुआ। दशवैकालिक सूत्र में प्रस्तुत वर्गीकरण के अनुसार इन कथाओं के तीन भेद प्राप्त होते हैं (१) अकथा, (२) सत्कथा और (३) विकथा। जिन कथाओं से मिथ्यात्व-भावना के उद्दीपनपूर्ण वर्णनों के कारण मोहमय मिथ्यादृष्टि उत्पन्न होती है ऐसी कथाओं को अकथा कहा गया है। जिन कथाओं में ज्ञान के साधनभूत तप, संयम, दान एवं शील जैसे सदगुणों की प्रशस्ति निबद्ध की जाती है उन्हें ‘सत्कथा’ कहा जाता है। इसके विपरीत जिन कथाओं में प्रमाद, कषाय, रागद्वेष, स्त्री, विभव एवं लोकविकृतियों के वर्णन किये जाते हैं उन्हें ‘विकथा’ कहा जाता है। कथाओं की इन तीनों कोटियों में अकथा और विकथा हेय कोटि की कथाएँ हैं तथा सत्कथा उपादेय कोटि की कथा है। आगमोक्त कथाएँ अतिसंक्षिप्त हैं। अतः उनमें कथाशिल्प का विकास नहीं हो पाया है। परन्तु उनका आकर्षण एक से एक सुन्दर दृष्टान्तों और उपमाओं के प्रयोग से आज भी म्लान नहीं हो पाया है। इन कथाओं में सांसारिक उपलब्धियों की व्यर्थता का प्रतिपादन कर वैराग्य की प्रशस्ति का गान किया गया है। सार्थवाह धन्य और उसकी पुत्र-वधुओं की कथा, जिनपालित और जिनरक्षित की कथा, सरोवरस्थ मेढक और समुद्रस्थ मेढक की कथा तथा एक सन्तरण-कुशल वीतरागी भिक्षु द्वारा अगाध-जल एवं पक-सङ्कुल सरोवर से श्वेतकमल के आहरण की कथा प्राकृत कथा-साहित्य के प्राचीन उदाहरण हैं जिनमें शील, संयम एवं विवेक की शिक्षा निहित है। आगमोक्त कथाओं में लोक-कल्याण के साथ आध्यात्मिक उन्नति के ऊपर ही अधिकाधिक ध्यान दिया गया है, जिसके फलस्वरूप कथा बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव २०७ के शिल्प-सौन्दर्य का स्वर धर्मोद्घोष के प्रभाव से परिस्फुट नहीं हो पाया है। फिर भी, प्राकृत कथा-साहित्य के आदिकाल के अध्ययन की दृष्टि से यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस सन्दर्भ में भगवतीसूत्र, विपाकसूत्र, उवासगदसाओ, व्यवहारभाष्य, बृहत्कल्पभाष्य, सूत्रकृतांग, णायाधम्मकहाओ, उत्तराध्ययनसूत्र, आचारांगसूत्र जैसे ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं। _आगमेतर कथा-साहित्य वस्तु-विन्यास और अभिव्यञ्जना की दृष्टि से नितान्त मनोहर तथा वैविध्यपूर्ण है। इनमें श्रेय और प्रेय का विलक्षण समन्वय प्राप्त होता है। भाव की भव्यता, वाग्विन्यास की प्रासादिकता, कल्पना की कमनीयता, सङ्घटना की चतुरस्रता तथा हृदय-संवाद की सत्वरता जैसे काव्योचित गुणों से सम्भत होने के कारण इन कथाओं में प्राकृत-काव्यश्री का सौन्दर्य अपनी विविध दीप्तिमय भगिमाओं के साथ छन्दायित हो उठा है। यहाँ प्रसङ्गवश कतिपय प्रसिद्ध प्राकृत कथाग्रन्थों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है: (क) तरङ्गवती (तरङ्गलोला)-यह सुप्रसिद्ध कथाग्रन्थ आज अपने मूलरूप में उपलब्ध नहीं होता है। प्रेमकथा-मूलक इस ग्रन्थ की रचना पादलिप्त सूरि नामक जैन आचार्य ने की थी जो कुषाण-सम्राट् कनिष्क के प्रान्तपाल मुरुण्ड के भक्तिपात्र थे। इस प्रकार, इस कथाकृति का काल दूसरी सदी ई. सिद्ध होता है। इसकी रचना के एक सौ वर्ष के अनन्तर नेमिचन्द्र गणि नामक एक जैन साधु ने अपने शिष्य के उपयोगार्थ मूलकथा को संक्षिप्त रूप में निबद्ध किया। इसका अपर नाम तरंगलोला भी प्रसिद्ध है। __तरंगवती की कथा के चार भाग हैं। प्रथम भाग में एक जैन साध्वी के रूप में इसकी नायिका तरंगवती राजगृह आती है। द्वितीय भाग में अपनी आत्मकथा के आख्यान के क्रम में वह कहती है कि किस प्रकार हंस-मिथुन को देखकर उसे जन्मान्तरीण प्रेम का स्मरण हो आया। तृतीय भाग में अपने प्रेमपात्र का अन्वेषण कर वह उससे विवाह कर लेती है। चतुर्थ भाग में एक जैन मुनि के उपदेश से तरंगवती अपने पति के साथ-मुनिव्रत धारण कर लेती है। इसकी संक्षिप्त कथा निम्नस्थ है : _एक बार चन्दनलाला के नेतृत्व में जैन साध्वी-समाज राजगृह आया। उन्हीं में से एक थी सुव्रता नाम की साध्वी। भिक्षाचरण के क्रम में सुव्रता धनपाल सेठ की पत्नी शोभा के यहाँ गयी और वहाँ उसके अनुरोध पर उसने अहिंसा और शील के पालन का उपदेश दिया। सुव्रता के स्वरमाधुर्य तथा रूपलावण्य से प्रभावित होकर जब सेठ की पत्नी ने उससे वैराग्य के अवलम्बन का कारण पूछा तब उसने अपनी कथा प्रारम्भ की। वत्स-जनपद में एक नगरी है कौशाम्बी। वहाँ उदयन वासवदत्ता नामक रानी के साथ राज्य करता था। इसी नगरी में ऋषभदत्त नामक नगरसेठ को यमुना की प्रार्थना के फलस्वरूप एक कन्यारत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम-यमुना के तरङ्ग के समान चञ्चल होने के कारण-तरंगवती (तरंगलोला) रक्खा गया। उसने गीत, नृत्य एवं वाद्य के साथ ही शास्त्रों में भी निपुणता प्राप्त की। एक दिन शरद् ऋतु में उपवन-विहार के प्रसङ्ग में २०८ गद्य-खण्ड उसने हंस-मिथुन को देखा और उसे देखते ही उसके हृदय में सहसा पूर्वजन्म की स्मृति उदित हुई जो इस प्रकार है अङ्ग-जनपद में एक प्रसिद्ध नगरी है-चम्पा। यहाँ गङ्गा नदी के पावन पुलिन पर चक्रवाक-दम्पती वास करता था। एक दिन एक आखेटक ने एक जंगली हाथी पर बाण चलाया जिससे संयोगवश चक्रवाक विद्ध होकर मर गया। यह देखकर चक्रवाकी शोकाकुल हो गयी। अपने इस प्रमाद से आखेटक भी बहुत अनुतप्त हुआ। उसने चक्रवाक को चिताग्नि में समर्पित कर दिया। उसी चिताग्नि में अपने पति के साथ चक्रवाकी भी जल मरी। मैं वही चक्रवाकी इस जन्म में तरङ्गवती के नाम से प्रसिद्ध हुई हूँ। पूर्वजन्म की इस घटना के स्मरण से मेरे मन में प्रिय-मिलन की तीव्र उत्कण्ठा जग पड़ी। पूर्वजन्म का मेरा प्रियतम चक्रवाक इस जन्म में श्रेष्ठी धनदेव के पुत्र पद्मदेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मैं उसके वियोग-दुःख की ज्वाला में प्रतिपल जलने लगी। । __तत्पश्चात् प्रियतम की प्राप्ति के लिए मैंने तपश्चर्या की और उसके बाद उसके अन्वेषण के उद्देश्य से मैंने एक चित्रपट प्रस्तुत किया जिस पर मैंने अपने पूर्वजन्म के प्रेम-प्रसङ्ग का आलेखन किया था। एक दिन उस नगर में शरत्पूर्णिमा का महोत्सब मनाया जा रहा था। मैने अपनी सखी सारसिका को जनाकीर्ण चतुष्पथ पर उक्त चित्रपट को हाथ में लेकर खड़ी रहने के लिए कहा, जिससे वहाँ से आने-जानेवाले लोगों की दृष्टि उसपर पड़ सके। बहुत देर के बाद वहाँ से जा रहे पद्मदेव की दृष्टि सारसिका के हाथ में स्थित उस चित्रपट पर पड़ी और उसके मन में भी उसे देखते ही पूर्वजन्म के प्रेम-प्रसङ्ग की स्मृति उभर आयी। अब वह भी मुझे प्राप्त करने के लिए विकल रहने लगा। पुत्र की विकलता के कारण को जानकर धनदेव ने अपने पुत्र के लिए मेरे पिता से मेरी याचना की, परन्तु मेरे पिता को एक साधारण सेठ के साथ अपनी कन्या का विवाह अनुचित प्रतीत हुआ और उन्होंने इस सम्बन्ध को स्वीकृति नहीं दी। इस विषम स्थिति में मैंने निश्चय किया कि मैं अपने पूर्वजन्म के प्रियतम पद्मदेव के साथ यहाँ से कहीं अन्यत्र, चुपचाप, चली जाऊँगी तभी हम दोनों को शान्ति मिल सकेगी। __ तदनुसार, मैं अपने प्रियतम पद्मदेव के साथ, एक रात, अपना घर छोड़ कर वहाँ से चल पड़ी। हमलोग जिस रास्ते से जा रहे थे, वह एक घनघोर जंगल की ओर जाता था जिसके बीच दस्युदल का वासस्थान था। हम दोनों जब जंगल होकर जा रहे थे तब सामने से कुछ दस्यु आते दिखाई पड़े। वे भगवती कात्यायनी को बलि देने के लिए उपयुक्त मनुष्य की खोज में निकले थे। उन्होंने मेरे पति को बलि देने के लिए पकड़ लिया और उन्हें बाँध कर वे चल पड़े। इस नयी विपत्ति से किंकर्त्तव्यविमूढ होकर मैं कातर भाव से रोती-रोती उनके पीछे चली। कुछ दूर जाने पर मेरे करुण क्रन्दन से एक दस्यु का हृदय द्रवित हो गया और उसने मेरे पति को बन्धनमुक्त कर हमें उस घनघोर जंगल से सुरक्षित बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव २०६ बाहर कर दिया। वहाँ से हम लोग जाते-जाते एक नगर में पहुँचे। उधर, मेरे इस गृहत्याग से चिन्तित होकर मेरे माता-पिता ने चारों ओर मेरी खोज में अपने अनुचरों को भेज रक्खा था। कुल्माषनामक उनका एक अनुचर मेरी खोज में उसी नगर में आया जहाँ हम दोनों रहते थे। वह हम दोनों को कौशाम्बी ले गया। वहाँ पहुँचने पर मेरे माता-पिता ने प्रसन्नतापूर्वक मेरा विवाह पद्मदेव के साथ कर दिया। हम लोग वहाँ सानन्द जीवन-यापन करने लगे। _ एक दिन वसन्त ऋतु में हम दोनों उपवन-विहार के उद्देश्य से नगर के मनोस्म उद्यान में पहुंचे। वहाँ हमें एक मुनि का दर्शन हुआ। वार्तालाप के क्रम में उस मुनि ने अपने पूर्वजन्म की कथा कह सुनायी। उसे सुनकर हमें वैराग्य हो गया और हम दोनों मुनिमत में दीक्षित हो गये। मैं हूँ वही तरंगवती। उसके इस कथन के साथ ही कथा समाप्त हो जाती है। . __इस कथा का आख्यान उत्तम पुरुष में किया गया है। पूर्वजन्म के सम्बन्ध के स्मरण से उत्पन्न काममूलक प्रेम को नायिका ने तपस्या के द्वारा विशोधित कर उदात्त भावभूमि पर प्रतिष्ठित किया है। यह कथा नायिका के द्वारा आरब्ध प्रेम और उसके द्वारा उसकी सिद्धि के लिए किये गये प्रयत्नों का स्पष्टीकरण करती है। परिस्थिति विशेष की पृष्ठभूमि में श्रृङ्गार, रौद्र, भयानक, करुण एवं प्रशम की, अनेक आरोह-अवरोहों के साथ, यहाँ अभिव्यञ्जना की गयी है। देशी शब्दों और लोकोक्तियों के प्रयोग से वर्णन-शैली स्वाभाविकता से ओत-प्रोत है। कथा-साहित्य के विकास की दृष्टि से ईसा की दूसरी सदी में निबद्ध इस प्रेमकथा को अतीव महत्त्वपूर्ण माना जाता है। (ख) वसुदेव हिण्डी-वसुदेव हिण्डी नामक प्राकृत कथाग्रन्थ को न केवल भारतीय कथा-साहित्य का अपितु विश्वकथा साहित्य का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है। इसके दो भाग हैं जिनमें प्रथम खण्ड की रचना का श्रेय संघदास गणि को तथा द्वितीय खण्ड की रचना का श्रेय धर्मदास गणि को दिया जाता है। इसके प्रथम भाग में उनतीस लम्भकों तथा द्वितीय भाग में इकहत्तर लम्भकों का विन्यास किया गया है। सब मिला कर एक सौ लम्भकों से युक्त इस महान् कथाग्रन्थ का सम्प्रति केवल पूर्वभाग ही उपलब्ध होता है और वह भी सम्पूर्ण नहीं है। इसकी रचना का काल ईसा की चौथी सदी के आसपास कहा जाता है। यह महाराष्ट्री प्राकृत की एक उत्कृष्ट कृति मानी जाती है, जिसके अन्तर्गत स्थान-स्थान पर संस्कृत श्लोक भी अनुस्यूत प्राप्त होते हैं। इस कथा-ग्रन्थ में वसुदेव के भ्रमण-वृत्तान्त का विशद वर्णन प्राप्त होता है। इसके वस्तुविन्यास को छः भागों में विभक्त किया गया है जिनके नाम कथोत्पत्ति, पीठिका, मुख, प्रतिमुख, शरीर और उपसंहार हैं। कथोत्पत्ति और पीठिका के मध्य धम्मिल-हिण्ड नामक एक अन्य कथाप्रकरण भी अनुप्रविष्ट किया गया उपलब्ध होता है। कथोत्पत्ति के अन्तर्गत जम्बूस्वामी, कुबेरदत्त, महेश्वरदत्त, प्रसन्नचन्द्र आदि के आख्यान निबद्ध किये गये हैं। है २१० अवमा गद्य-खण्ड धम्मिल हिण्डी नामक प्रकरण के अन्तर्गत धम्मिलनामक एक सार्थवाह के पुत्र की कथा का आख्यान प्राप्त होता है जिसने नाना जनपदों में भ्रमण करते हुए बत्तीस विवाह किये। इसमें शीलमती, विमलसेना, ग्रामीण शाकटिक, वसुदत्त, रिपुदमन एवं नरपति प्रभृति के आख्यान नितान्त रोचक हैं। सांयात्रिकों के साथ जलयान पर यवनदेश की यात्रा करनेवाले । सार्थवाहपुत्र धनवसु की कथा में साहस, कौतूहल तथा विस्मय के संयोग से एक अपूर्व आकर्षण उत्पन्न हो गया है। पीठिका-भाग में प्रद्युम्न का पुनर्जन्म, अपहरण, पाणिग्रहण तथा गृहप्रत्यागमन प्रभूति वर्णित हैं। मुखभाग में शंब और भानु की कथा एवं शुक-सारिका-संवाद निबद्ध किए गए हैं। प्रतिमुख-भाग में अन्धक-वृष्णि के पूर्वजन्मों की कथाओं के साथ प्रद्युम्न और वसुदेव वार्तालाप वर्णित हुआ है जिसमें वसुदेव ने पर्यटन से होनेवाले लाभों का उल्लेख किया है। तत्पश्चात् उन्होंने अपने पर्यटन-वृत्तान्त का आख्यान प्रारम्भ किया। उन्होंने इस क्रम में कहा है कि किस प्रकार वे सौ वर्षों तक परिभ्रमण करते रहे और एक सौ कन्याओं से विवाह किया। शरीर-प्रकरण के अन्तर्गत वसुदेव के नौ पूर्वजन्मों का वर्णन, सुमित्राख्यान, विष्णुकुमारचरित, चारुदत्तकथा, गन्धर्वदत्त का आख्यान, अमितगति विद्याधर की कथा, ऋषभ-निर्वाण-प्रसंग, राम-चरित, सीताजन्मोपाख्यान, कंसजन्मोपाख्यान प्रभृति प्रसंगों का समावेश प्राप्त होता है। यह विलक्षण कथाकृति शैली की सरलता, विषय की सरसता तथा चित्रण की मनोहारिता के कारण प्राकृत साहित्य की अनुपम निधि है। इसके वर्ण्यफलक पर चीनस्थान, सुवर्णभूमि, यवनद्वीप तथा सिंहल प्रभृति देशान्तरों के भूभाग समाविष्ट हैं। इसके पात्रों के चयन में अभिजात-वर्ग के साथ ही चोर, उचक्के, लुच्चे, धूर्त, ठग, दुश्चरित्र, विट, वारांगना तथा लम्पटों पर भी कवि ने दृष्टिपात किया है जिसके फलस्वरूप इस कथाकृति के अध्ययन से आस्वादवैविध्य का सुख प्राप्त किया जा सकता है। परवर्ती काल में इस ग्रन्थ के आधार पर बहुत से प्राकृत, संस्कृत तथा अपभ्रंश के काव्यों की रचना की गयी है। इस प्रकार, यह महनीय ग्रन्थ विविध कथाकाव्यों का आकरस्वरूप माना जाता है। समसामयिक सभ्यता, संस्कृति, बुद्धिविलास एवं अध्यात्मचिन्तन से अवगत होने के लिए इस ग्रन्थ का अध्ययन परम उपयोगी है। __(ग) समराइच्चकहा (समरादित्यकथा)-प्रस्तुत कथाकाव्य हरिभद्र सूरि की रचना है जो श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय के प्रख्यात आचार्य थे। ये राजस्थान प्रान्त में अवस्थित चित्तौड़ के निवासी ब्राह्मण थे तथा संस्कृत और प्राकृत के उद्भट विद्वान् थे। आचार्य जिनदत्त से जैन धर्म की दीक्षा लेकर इन्होंने अपना सारा जीवन विविध ग्रन्थों की रचना के द्वारा जैनमत के अभ्युत्थान में लगा दिया। इनके व्यक्तित्व में धर्मशास्त्र, पुराणेतिहास, न्याय एवं योगदर्शन तथा काव्यकला जैसे विविध विषयों का अगाध वैदुष्य समाहित था। इनकी कृतियों में तर्क और काव्य की परस्पर-विरोधी प्रकृतियों का समुचित प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है। राजशेखर बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव २११ सूरि के अनुसार इन्हें १४४० प्रकरणों का रचयिता कहा जाता है। इनका समय ईसा की आठवीं सदी है। समरादित्य-कथा का मूलाधार प्रतिशोध की बलवती भावना है जो इसके नायक उज्जैन के राजकुमार समरादित्य और उसके विरोधी अग्निशर्मा के बीच नौ जन्मों तक चलती है। नौ जन्मों तक व्याप्त इसी प्रतिशोध भावना का चित्रण यहाँ नौ परिच्छेदों के अन्तर्गत निबद्ध किया गया है। प्रथम जन्म में समरादित्य राजकुमार गुणसेन के नाम से विख्यात था। अग्निशर्मा वहीं के राजपुरोहित का पुत्र था जो कुरूप था। एक समय राजकुमार ने उसकी कुरूपता का जब उपहास किया तो उसने विरक्त होकर संन्यास का अवलम्बन कर लिया। गुणसेन के राजपदासीन होने पर संन्यासी अग्निशर्मा राजसभा में तीन बार आया परन्तु राजकार्य में व्यासक्त रहने के कारण उसने उसका समुचित सत्कार नहीं किया। राजा द्वारा अनादृत अग्निशर्मा ने इस व्रत के साथ वहीं प्राणत्याग कर दिया कि वह आगामी नौ जन्मों तक राजा गुणसेन से इस अपमान का प्रतिशोध लेगा। इस भूमिका के अनन्तर प्रत्येक भव के वैरशोधन की कथा एक-एक कर नौ परिच्छेदों तक चलती है। अन्ततोगत्वा अग्निशर्मा समरादित्य का वध कर देता है। वह तो देहपात के अनन्तर स्वर्ग चला जात है परन्तु घातक नरक जाता है। __ यही है इसकी मूलकथा जिसमें लगभग एक सौ से अधिक अन्यान्य कथाएँ अनुस्यूत हैं। इन सारी कथाओं के पारस्परिक संश्लेषण में विद्यमान शिल्पसौष्ठवने हरिभद्र सूरि को प्राकृत कथासाहित्य के युगप्रवर्तक कथाकार की अनुपम ख्याति प्रदान की है। इस कथाकृति में त- “लीन समाज, संस्कृति तथा आचार-विचार के वर्णन के साथ ही प्रणयोन्माद, सृष्टिसौन्दर्य एवं धार्मिक सम्प्रदाय के समुज्ज्वल चित्रण उपलब्ध होते हैं। कथाकार ने इसे धर्मकथा का नाम प्रदान किया है जो संयम और शील के बलपर नश्वर सांसारिक सुखभोग की व्यर्थता के प्रतिपादन के कारण यथार्थता की सम्पुष्टि करता है। तुलनात्मक समीक्षा के आधार पर इसे बाणभट्ट की कादम्बरी का समकोटिक कथाकाव्य माना जाता है। शुभ और अशुभ कर्मों के फलाफल से अनुविद्ध पुनर्जन्मपरम्पराओं के चमत्कारमय वर्णनों वाली यह कथाकृति गद्यात्मक एवं पद्यात्मक सन्दर्भो की प्रौढता, प्राञ्जलता और ओजस्विता के कारण प्राकृत साहित्य की एक असामान्य दीप्तिसम्पन्न रचना मानी जाती है। (घ) धूर्ताख्यान (धुत्ताक्खान)-समरादित्य कथा जैसी गम्भीर कथाकृति के रचयिता हरिभद्र सूरि की इस द्वितीय रचना में हास्य और व्यंग्य की समुच्छल अभिव्यक्ति हुई है। मूलश्री, पुण्डरीक, एलाषाढ एवं शश तथा एक परम धूर्त स्त्री खण्डपाना के द्वारा पर्यायशः सुनाये गये गल्पों की प्रामाणिकता को रामायण, महाभारत तथा पुराणों में वर्णित कथाओं के आधार पर इस कृति में सिद्ध किया गया है। इसके अन्तर्गत पचास के आसपास २१२
- गद्य-खण्ड पौराणिक कथाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। कौतूहल के उद्भावक अत्युक्तिपूर्ण वाग्विन्यास का स्वैर-विलास इस हास्य-प्रधान आख्यान का प्राणतत्त्व है। इस सन्दर्भ में मूलश्री द्वारा कथित एक गल्प उल्लेखनीय है। वह कहता है कि एक समय अपने मस्तक पर गङ्गा को धारण करने के लिए छत्र और कमण्डलु लेकर वह शिवपुरी की ओर चला। मार्ग में जब एक मतवाले हाथी ने उसका पीछा किया तब वह डर कर झटपट कमण्डलु में घुस पड़ा। परन्तु वह हाथी भी उसके पीछे कमण्डलु में घुस गया। अब उस कमण्डलु के भीतर छ: महीने तक मूलश्री उस हाथी के डर से भागता फिरा और हाथी उसे खदेड़ता रहा। अन्त में मूलश्री उस कमण्डलु की टोंटी से बाहर निकल भागा। हाथी भी उसका पीछा करते-करते उसी टोंटी के रास्ते निकलने लगा परन्तु पूँछ के फँस जाने के कारण वह वहीं अटक कर रह गया। __ इस कृति में कथाकार की प्रतिभा पुराणोक्त कथाओं की विसङ्गति, युक्तिहीनता तथा निस्सारता के सत्यापन में उग्रीव हो उठी है जिससे जैन धर्म के प्रति उसकी अनन्य प्रतिबद्धता सूचित होती है। हरिभद्रसूरि द्वारा रचित लगभग एक सौ लघुकथाएँ भी उनके अन्यान्य ग्रन्थों में प्राप्त होती हैं जिन्हें मुनिचन्द्र नामक एक जैन टीकाकार ने विस्तृत रूप प्रदान किया है। यहाँ उनकी कतिपय लघुकथाओं का शीर्षक निर्देश किया जाता है : १. इन्द्रदत्त-कथा २. धूर्तराज-कथा ३. शीलपरीक्षण-कथा ४. विषयासक्ति-कथा ५. शीलवती-कथा ६. रामकथा ७. वज्रस्वामि-कथा ८. गौतमस्वामि-कथा ६. आर्य महागिरि-कथा १०. भीमकुमार-कथा ११. श्रावकपुत्र-कथा १२. पाखण्डि-कथा १३. कुरुचन्द्र-कथा १४. शङ्खनृपति-कथा कथाकार १५. ऋद्धिसुन्दरी-कथा १६. रतिसुन्दरी-कथा १७. गुणसुन्दरी-कथा १८. चण्डकौशिक-कथा माम १६. गालव-कथा २०. मेघकुमार-कथा माया २१. हिङ्गुशिव-कथा २२. अश्रुतपूर्व-कथा २३. ग्रामीण शाकटिक-कथा २४. अभयकुमार-कथा २५. मृगावती-कौशल-कथा २६. श्रमणोपासक-कथा २७. सुलसा-कथा २८. सोमा-कथा निकाल २६. वरदत्त-कथा समाज ३०. कलि-कथा
- ३१. कुन्तलदेवी-कथा का शव ३२. ब्रह्मदत्त-कथा : पिन ३३. प्रभाकर-चित्रकर-कथा ३४. कामासक्ति-कथा । बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव २१३ ३५. सत्सङ्गति-कथा ३६. भक्ति-परीक्षण-कथा ३७. सुबन्धुद्रोह-कथा का नाम ३८. दृढसङ्कल्प-कथाम ३६. मित्रचतुष्टय-कथा ४०. मूलदेव-कथा वाली ४१. वणिक्-कथा काका -४२. आर्य सुहस्ति-कथा (ङ) कुवलयमाला-कथा-ईसा की आठवीं सदी में उत्पन्न उयोतन सूरि द्वारा रचित कुवलयमाला कथा के अन्तर्गत क्रोध, मान, माया, लोभ और मोह प्रभृति चित्त की असद्वृत्तियों के परिमार्जन के उद्देश्य से विविध कथाओं की योजना की गयी है। दक्षिणापथ की विजया नगरी के राजा विजयसेन की पुत्री कुवलयमाला इस कथाकाव्य की नायिका है तथा अयोध्यानरेश दृढवर्मा का पुत्र कुवलयचन्द्र इसका नायक है। इस कथा में मुनिराज आचार्य धर्मानन्द द्वारा सांसारिक दुःखों के वर्णन के क्रम में चण्डसोम, मानभट, मायादित्य, लोभदेव तथा मोहदत्त नामक पात्रों के अनेक पूर्ववर्ती जन्मों से सम्बद्ध कथाओं का आख्यान किया गया है। ये पात्र, वस्तुतः, संसार में व्याप्त लोभ-मोह प्रभृति चित्तमल के प्रतीक के रूप में कथा के अन्तर्गत निबद्ध किये गये हैं। प्रसादपूर्ण भाषा में विषय-वैविध्य से युक्त रोचक शैली में प्रस्तुत यह कथाकृति अपनी उपदेशात्मकता के कारण जैन कथा-साहित्य में उल्लेखनीय स्थान रखता है। हूण-नरेश तोरमाण द्वारा भारत में किये गये अत्याचारों का यहाँ वर्णन प्राप्त होता है जिससे राजनैतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से इसकी गणना समसामयिक इतिहास की स्रोतसामग्री के रूप में की जाती है। जन्म-जन्मान्तर की वासना के आधार पर स्वप्न-सन्दर्शन से उत्पन्न प्रणयाङ्कुर के वर्णन की मनोवैज्ञानिक कथा-शैली का इस कथा में अवलम्बन किया गया है जो कथागत-सम्विधानकों के विकास की दष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इनकी रचना-शैली पर हरिभद्र सूरि का पुष्कल प्रभाव प्ररिलक्षित होता है। (च) कुमारपाल-प्रतिबोध-पाटन-नगर के सुप्रसिद्ध चालुक्य-नरेश मुञ्जराज के वंशोद्भव कुमारपाल नृपति को कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र द्वारा प्रदत्त जैनधर्म की श्रेष्ठता का उपदेश इस कथाकृति में उपलब्ध होता है। इसकी रचना आचार्य हेमचन्द्र के शिष्य सोमप्रभ सूरि ने राजा कुमारपाल के देहावसान के ग्यारह वर्षों के अनन्तर सम्पन्न कीं। तदनुसार, इसका निर्माणकाल ईसा की बारहवीं सदी स्थिर होता है। जैनधर्म के प्रति कुमारपाल की निष्ठा को उद्दीप्त करने के हेतु यहाँ अट्ठावन कथाएँ निबद्ध की गयी हैं जिनके अन्तर्गत पञ्च महाव्रत, गुरुमाहात्म्य, कर्त्तव्य-पालन तथा गृहस्थों द्वारा अनुष्ठेय इक्कीस प्रकार के व्रतों से सम्बद्ध उपदेश प्राप्त होते हैं। इन के स्पष्टीकरण के उद्देश्य से गुम्फित दृष्टान्त कथाओं में नलचरित, प्रद्योत-कथा, अशोक-कथा, द्वारका-दहन-कथा वरुण-कथा, लक्ष्मी-कथा, शीलवती-कथा तथा रुक्मिणीकथा प्रभृति पौराणिक, ऐतिहासिक एवं लोकाख्यानमूलक कथाओं का समावेश किया गया है। ये कथाएँ द्यूतक्रीडा, मद्यपान, परस्त्रीप्रसक्ति, वेश्याभिगमन प्रभृति दुराचरणों की हेयता तथा पूज्यपूजन, शीलव्रतपालन एवं २१४
- गद्य-खण्ड तपश्चरण की कर्त्तव्यता का उपदेश सरस-मनोहर शैली में प्रदान करती हैं। इसमें प्राकृत और अपभ्रंश के अतिरिक्त संस्कृत का भी प्रयोग किया गया है। (छ) श्रीश्रीपालकथा (सिरिसिरिवालकहा)-ईसा की चौदहवीं सदी के उत्तरार्ध में उत्पन्न रत्नशेखर सूरि द्वारा रचित श्रीश्रीपालकथा में सिद्धचक्रपूजन का माहात्म्य वर्णित हुआ है। इसकी कथावस्तु का सार इस प्रकार है: उज्जयिनी नगरी में पृथ्वीपाल नामक राजा राज्य करता था। उसकी दो रानियाँ थीं सौभाग्यसुन्दरी और रूपसुन्दरी। सौभाग्यसुन्दरी की पुत्री का नाम सुरसुन्दरी तथा रूपसुन्दरी की पुत्री का नाम मदनसुन्दरी था। सुरसुन्दरी ने मिथ्यादृष्टि नामक आचार्य से गीत, वाद्य, नृत्य आदि कलाओं के साथ व्याकरण, काव्य, नाटक, प्रभृति विषयों की भी शिक्ष प्राप्त की। मदनसुन्दरी ने सम्यग्दृष्टि नामक आचार्य से तत्त्व, पदार्थ एवं कर्मविपाकसहित व्याकरण, दर्शन, काव्यप्रभृति की शिक्षा प्राप्त की। सुरसुन्दरी लौकिक ज्ञान में निष्णात थी और मदनसुन्दरनी जैन दर्शनानुयायी कर्मसिद्धान्त की विदुषी थी। राजा पृथ्वीपाल लौकिक ज्ञान का पक्षपाती था अतः वह सुरसुन्दरी को बहुत मानता था। उसने उसका विवाह राजकुमार अरिदमन के साथ कर दिया जो शंखपुरी के राजा दमितारि का पुत्र था। जैन धर्म से विरक्त रहने के कारण राजा पृथ्वीपाल ने मदनसुन्दरी का विवाह कुष्ठरोगाक्रान्त सात सौ हतभाग्य मनुष्यों के बीच राजत्व करनेवाले उम्बर राजा से कर दिया। मा विवाह के अनन्तर मदनसुन्दरी अपने पति के साथ भगवान् ऋषभदेव के दर्शनार्थ चैत्यप्रासाद गयी। वहाँ मुनिचन्द्र नामक जैन यति ने उसे सिद्धचक्रार्चन का उपदेश प्रदान किया। तदनुसार मदनसुन्दरी ने विधानपूर्वक सिद्धचक्रार्चन सम्पन्न किया। तत्पश्चात्, गन्धोदक के अभ्युक्षण से उसके पति का कुष्ठरोग जाता रहा और सुवर्ण के समान उसके शरीर का वर्ण निखर उठा। साथ ही, सात सौ अन्य कष्ठग्रस्त लोगों ने भी पापरोग से मुक्ति पायी। चक्रार्चन की समाप्ति के बाद अपने पति के साथ मदनसुन्दरी ज्यों ही चैत्यप्रासाद से निकली त्यों ही उसकी दृष्टि एक वृद्धा पर पड़ी। वह श्रीपाल की माता थी जो एक मुनिराज से पुत्र के नैरुज्यलाभ की वार्ता सुनकर उसे देखने आयी थी। श्रीपाल ने उसे देखते ही उसकी चरणवन्दना की और पूछा कि तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी थीं। इस पर उसकी माँ ने सारा वृत्तान्त बताया। श्रीपाल के सास-ससुर भी इस वार्ता से अवगत होकर वहाँ आये और उसका परिचय पूछा जिस पर वह वृद्धा इस प्रकार कहने लगी अङ्ग-जनपद में चम्पा नाम की नगरी है। वहाँ सिंहरण-नामक एक बड़ा पराक्रमी सजा राज्य करता था। उसकी पत्नी थी कमलप्रभा जिससे श्रीपाल का जन्म हुआ। श्रीपाल दो ही वर्ष का था जब उसके पिता दिवङ्गत हो गये। राजमन्त्री मतिसागर ने श्रीपाल को राजपद पर अभिषिक्त किया और स्वयं उसकी ओर से कुशलतापूर्वक राज्य-पालन करने लगा। इसी बीच श्रीपाल के पितृव्य अजितसेन ने राज्य पर अपना अधिकार स्थापित करने २१५ बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव के लिए श्रीपाल एवं उसके मन्त्री मतिसागर को मार डालने की योजना बनाने लगा। मन्त्री जब उसके इस षड्यन्त्र से अवगत हुआ तब उसने श्रीपाल की माता से कहा कि वह पुत्र की प्राणरक्षा के लिये वहाँ से कहीं अन्यत्र जाकर कालयापन करे। उसके कथनानुसार, आधी रात बीतने पर पुत्र को साथ लेकर रानी कमलप्रभा वहाँ से निकल कर एक जंगल में सात सौ कुष्ठग्रस्त लोगों की बस्ती में पहुँची और अपने पुत्र के साथ वहाँ रहने लगी। उन लोगों ने रानी को अपनी बहन तथा उसके पुत्र को अपना राजा बना लिया। कुष्ठग्रस्त लोगों के साथ रहने के कारण श्रीपाल को उम्बर नामक कुष्ठ हो गया जिससे वह उन लोगों के बीच उम्बर राजा के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इसी के साथ मदनसुन्दरी का पाणिग्रहण सम्पन्न हुआ था। कुछ दिनों के बाद माँ और पत्नी की अनुमति लेकर श्रीपाल विदेश भ्रमण के उद्देश्य से निकल पड़ा। इसी क्रम में एक सिद्ध पुरुष ने उसे जलतारिणी और परशस्त्रनिवारणी नामक विद्याएँ सिखलाई। जब वह इन अलौकिक शक्तियों को प्राप्त कर आगे चला तब उसने देखा कि कौशाम्बी के धवल नामक सांयात्रिक का पोत फँसा हुआ था जिससे वह अत्यन्त उद्विग्न था। श्रीपाल ने जलतारिणी विद्या की महिमा से उसके पोत को मुक्त किया और धवल के साथ समुद्र-यात्रा पर चल पड़ा। मार्ग में उसने मदनसेना नामक कन्या से विवाह कर दोनों पत्नियों के साथ रत्नद्वीप पहुँचा जहाँ चक्रेश्वरी देवी के आदेश से उसने विद्याधरी मदनमञ्जषा का पाणिग्रहण किया। धवल ने उसकी पत्नियों को अधिकत करने के लिए उसे समुद्र में ढकेल दिया जहाँ से किसी प्रकार तैरकर वह कोकण पहुँचा। वहाँ उसने राजकुमारी मदनमञ्जरी का पाणिग्रहण किया। कुछ दिनों के बाद चक्रेश्वरी देवी की महिमा से उसकी पूर्व-पत्नियाँ सतीत्वरक्षापूर्वक उससे आ मिलीं। वहाँ पर भी धवल ने उसे मारने के अनेक उपाय किये परन्तु वह स्वयं नष्ट हो गया। श्रीपाल अपनी सभी पत्नियों के साथ सांसारिक आनन्द में लीन रहने लगा। इस कथा के विकास में प्रासङ्गिक उपाख्यानों का कुशलता के साथ गुम्फन किया गया है। भाग्य-निर्दिष्ट विविध उत्थान-पतन के चित्रण से कथा में कौतूहल और विस्मय का वातावरण उत्पन्न हो गया है। स्वार्थी, शठ एवं दुर्जन पात्रों द्वारा प्रवर्तित सारे कुत्सित प्रयत्नों की विफलता के साथ अन्त में सत्य की विजय होती है। यह कथा सिद्धचक्रपजन से प्राप्त देवी महिमा के प्रभाव से महनीय हो उठी है। __ उपर्युक्त सन्दर्भो में प्राकृत कथाओं के शिल्पविधान से अवगत होने के लिए कतिपय प्रसिद्ध कथाओं का विवरण प्रस्तुत किया गया है। संस्कृत कथाओं के अध्ययन की पूर्णता प्राकृत कथाओं के अध्ययन के बिना सम्भव नहीं है। अतः जिज्ञासु अध्येताओं के लिए समानान्तर रूप में विकसित प्राकृत कथाओं का अध्ययन परम आवश्यक माना जाता है।२१६ गद्य-खण्ड यहाँ जैन आचार्यों द्वारा संस्कृत में निबद्ध कथाग्रन्थों की एक संक्षिप्त विवरणी दी जा रही है : १. जिनेश्वरसूरि निर्वाणलीलावतीकथा २. वही कथाकोषप्रकरण ३. जिनचन्द्र संवेगरङ्गशाला ४. महेश्वर सूरि णाणपंचमीकहा ५. देवभद्र-गुणचन्द्रसूरि - कहारयणकोष ६. महेन्द्रसूरि नर्मदासुन्दरीकथा ७. विजयसिंह भुवनसुन्दरीकथा ८. अज्ञातकर्तृक मलयसुन्दरीकथा ६. धनेश्वर सुरसुन्दरी-चरित्र १०. नेमिचन्द्रसूरि आख्यानमणिकोश ११. सुमतिसूरि जिनदत्ताख्यान १२. जिनहर्षगणि रयणसेहर निव कहा १३. वीरदेव गणि महिवाल कहा १४. सोमचन्द्र कथामहोदधि १५. धर्मदास गणि उपदेशमाला १६. जयसिंह सूरि धर्मोपदेशमालाविवरण १७. हरिषेणाचार्य ……… बृहत्कथाकोष १८. हैम विजयगणि ……. कथा-रत्नाकर ही पूर्ववर्ती कथाग्रन्थों के अतिरिक्त आचार्य मेरुतुङ्ग द्वारा रचित प्रबन्ध-चिन्तामणि तथा प्रबन्धकोष नामक दो कथा-सङ्कलन महत्त्वपूर्ण हैं। इनके अन्तर्गत विक्रमादित्य, मूलराज, मुञ्जदेव, भोज, सिद्धराज, जयसिंह, कुमारपाल, वीरधवल, वस्तुपाल, तेजःपाल, लक्ष्मणसेन, जयचन्द्र प्रभृति ऐतिहासिक दृष्टि से प्रख्यात चरित्रों से सम्बद्ध कथाएँ उपलब्ध होती हैं। अन्यान्य कथाग्रन्थों में सिद्धर्षि नामक जैनकवि-रचित उपमितिभवप्रपञ्चकथा तथा जयशेखर सूरि-प्रणीत प्रबन्धचिन्तामणि सुविख्यात है। इनमें से प्रथम ग्रन्थ आठ प्रस्तावों में विभक्त एक विस्तृत रचना है जिसमें सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् चरित्र जैसे जैन धर्म के त्रिरत्न की महिमा का आख्यान किया गया है। द्वितीय ग्रन्थ के अन्तर्गत रूपकात्मक शैली में परमात्म तत्त्व के साक्षात्कार का उपाय वर्णित हुआ है। बौद्ध एवं जैन वाङ्मय का कथा-वैभव २१७ कथा-साहित्य की श्रीवृद्धि में जैन आचार्यों का अविस्मरणीय अवदान है। जैन कथाकोष वाङ्मय के अन्तर्गत धर्मकथा, नीतिकथा उपदेशकथा, ऐतिहासिक कथा जैसी कथा की विविध विधाओं के पुष्कल उदाहरण प्राप्त होते हैं। मोह के दुर्दमनीय प्रभाव से उत्पीड़ित मानवता के हृदय में अप्रतिम विजेता के रूप में विवेक का आविर्भाव ही जैन-धर्मानुगामिनी कथाओं का चरम लक्ष्य है और इसकी उपलब्धि के लिए जैन कथाकारों द्वारा अपनायी गयी कथाशैली का असन्दिग्ध महत्त्व है।