०२ संस्कृत कथा-साहित्य ( वैदिक कथा )

सप्तसिन्धु के सुरम्य भू-भाग के अन्तर्गत पुण्यसलिला सरस्वती के पावन पुलिन पर अग्नि की स्तुति में महर्षियों के तपःपूत मानस-मुकुर में जब अनाहार्य-मनोहर छान्दसी नेपथ्य सज्जा में आर्यवाणी का यथापर्व आविर्भाव हुआ था, तभी से उसके साथ यज्ञसंस्था से सम्बद्ध आदिकथा प्रारम्भ होती है। प्रथमोन्मेष-मनोहर कल्पना के संस्पर्श से क्रमशः विकसित वैदिक साहित्य में उपलब्ध कथाओं का मुख्य उद्देश्य यद्यपि यज्ञानुष्ठान से सम्बद्ध विविध विधियों के प्रति यजमान के हृदय में प्ररोचना का उद्भावन करना ही था, तथापि कथा के प्रथम पदविन्यास के परिज्ञान के लिए उनका अध्ययन नितान्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। विश्व के सर्वप्रथम पवित्र ग्रन्थ के रूप में लब्धप्रतिष्ठ ऋग्वेद-संहिता के अन्तर्गत देव-स्तुतिपरक सूक्त-समुच्चय में ऐसे सूक्त भी उपलब्ध होते हैं, जो संवाद-सूक्त अथवा आख्यान-सूक्त के नाम से सुप्रसिद्ध हैं। अति-चिरन्तन काल में आर्य संस्कृति के अन्तर्गत बहुप्रचलित आख्यानों का इन्हें अवशेष माना जाता है। कथा के इतिहास की दृष्टि से इन सूक्तों का महत्त्व भारतीय तथा विदेशी विद्वानों ने निर्विवाद रूप से स्वीकृत किया है। डॉ. ओल्डेनबर्ग के अनुसार ऋग्वेदकालीन आख्यानों का स्वरूप गद्य एवं पद्य से संवलित था, जिनके पद्यभाग तो अपनी रोचकता के कारण अस्तित्वशील रह गये, किन्तु उनके गद्यभाग नीरसता के कारण कालक्रम से विलुप्त हो गये। उक्त मत से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि ऋग्वेद-युग में कथाशिल्प का विकास हो चुका था। वैदिक ऋषियों ने अपने युग में प्रचलित लोक-कथाओं में से उन आख्यानों का सङ्कलन किया है जिनकी उन्हें यज्ञसंस्था के अन्तर्गत देव-स्तुति के उपयुक्त वातावरण एवं पृष्ठभूमि के निर्माण के लिए आवश्यकता थी। इस प्रसङ्ग में शुनःशेप का आख्यान, त्रित आप्त्य की प्रार्थना, कक्षीवान् की स्तुति एवं वसिष्ठ-प्रोक्त ऋचाओं का उल्लेख किया जाता है, जिनके अन्तर्गत प्राचीन लोककथात्मक अंशों का अनुरणन सुनायी देता है। वस्तुतः, वैदिक आख्यान-सक्तों में चिरन्तन भारत की सामाजिक, धार्मिक एवं काव्यात्मक चेतना भी अपनी विविध भगिमाओं में अभिव्यक्त हुई है। इस प्रकार, इन आख्यानों में वैदिक भारत की सभ्यता, संस्कृति एवं जीवन-दर्शन के परिचय की सुदुर्लभ सामग्री सन्निहित है, इस कथन में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। ऋग्वेद-संहिता के अन्तर्गत सूक्त-सन्निविष्ट आख्यानों की सङ्ख्या उन्तीस है जो निम्नाङ्कित हैं: संस्कृत कथा-साहित्य १७३ १. सरमा एवं पणि का आख्यान (१०/१०८) २. शुनःशेप का आख्यान (१/२४) ३. कक्षीवान् स्वनय का आख्यान (१/१२५) ४. दीर्घतमा का आख्यान (१/१४७) ५. लोपामुद्रा और अगस्त्य का आख्यान (१/१७६) ६. गृत्समद का आख्यान (२/१२) ७. वसिष्ठ और विश्वामित्र का आख्यान (३/५३) ८. सोम के अवतरण का आख्यान (३/४३) ६. वामदेव का आख्यान (४/१८) त्र्यरुण का आख्यान ११. अग्नि के जन्म का आख्यान (५/११) १२. श्यावाश्व का आख्यान (५/५२) १३. सप्तवध्रि का आख्यान १४. बुबु एवं भारद्वाज का आख्यान १५. ऋजिश्वा और अतियाज का आख्यान १६. सरस्वती का आख्यान (६/६१) १७. विष्णु के तीन पादविक्षेपों का आख्यान (६/६६) १८. बृहस्पति के जन्म का आख्यान (६/७१) १६. राजा सुदास का आख्यान (७/१८) २०. नहुष का आख्यान (७/६५) २१. आसङ्ग का आख्यान २२. अपाला का आख्यान २३. कुत्स का आख्यान (१०/३८). पिक २४. राजा असमाति और चार ऋत्विजों का आख्यान (१०/५७) २५. नाभानेदिष्ट का आख्यान का (१०/६१) २६. वृषाकपि का आख्यान (१०/८६) २७. उर्वशी एवं पुरुखा का आख्यान (१०/६५) २८. देवापि और शन्तनु का आख्यान २६. नचिकेता और यम का आख्यान व (१०/१३५) __ कथा के स्वरूप-विकास को समझने के लिए उक्त आख्यानों में से कतिपय महत्त्वपूर्ण आख्यानों का विवरण, प्रसङ्ग के अनुरोध से, यहाँ उपस्थित किया जाता है। यद्यपि ऋग्वेद गद्य-खण्ड १७४ के इन आख्यानों में दैवततत्त्व का सर्वाभिभावी स्वर व्याप्त है तथापि लोक प्रचलित कथाओं की दूरवर्ती प्रतिध्वनि भी इनमें सुनी जा सकती है।

(१) सरमा और पणि का आख्यान

ऋग्वेद के प्रसङ्गाधीन सूक्त के अन्तर्गत निहित कथा इस प्रकार है :- पणि के नाम से सप्रसिद्ध वर्गविशेष के असुरों ने देवराज इन्द्र की गौओं का अपहरण कर रसा नामक नदी के पार अवस्थित वैत्य वासस्थान में उन्हें ला रक्खा था। अपनी गौओं का पता लगाने के लिए इन्द्र ने देवशुनी सरमा को पणियों के पास भेजा। उनके पास पहुँच कर सरमा ने उनसे अपना परिचय दिया और गौओं को लौटा देने की बात कही। इस सन्दर्भ में सरमा ने इन्द्र के सर्वाभिभावी पराक्रमोत्कर्ष का वर्णन किया है और पणियों से कहा है कि गौओं को न लौटाने पर इन्द्र अपने सहचरों के साथ आक्रमण करेंगे और बलपूर्वक अपनी गायें ले जायंगे। इस पर पणियों ने सरमा को यह कहकर प्रलोभन दिया कि वह उनके साथ बहन और भाई के सम्बन्ध का पालन करे और लौट कर इन्द्र के पास न जाय। परन्तु, सरमा उनके जाल में न फँसी और वहाँ से लौट कर सारी बातों से इन्द्र को अवगत करा दिया। फिर क्या था, देवराज इन्द्र ने पणियों को युद्ध में पराजित कर अपनी गायों को लौटा लिया। इस कथा के अन्तर्गत देवशुनी सरमा के क्रियाकलाप में प्राणिकथा के तत्त्वों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यहाँ इन्द्र द्वारा दूतकर्म के लिये नियुक्त देवशुनी सरमा के चरित्र में विश्वासपरायणता, आदर्श स्वामिभक्ति तथा अविचल दृढता जैसे श्रेष्ठ-दूतोचित गुणों की अभिव्यक्ति हुई है जिससे इस कथा को नीतिकथा की कोटिं में रक्खा जाता है। सायण के अनुसार इस सूक्त की सरमा देवशुनी है यद्यपि प्रसङ्गाधीन सूक्त के अध्ययन से यह स्पष्ट नहीं होता है। बृहद्देवता के रचयिता महर्षि शौनक के अनुसार सरमा इन्द्र की दूती है, देवशुनी नहीं है। परन्तु निरुक्तकार यास्क की दृष्टि में सरमा इन्द्र द्वारा प्रेषित देवशुनी ही है। इसके अतिरिक्त कात्यायन ने अपनी सर्वानुक्रमणी में सरमा को देवशुनी के नाम से ही परिचित कराया है। नीतिमञ्जरीकार द्या द्विवेद की दृष्टि में भी सरमा देवशुनी ही है। आफेख्ट के अनुसार यह एक प्रतीक-कथा है। सरमा वात्या की देवी का प्रतीक है, पणि मेघ के प्रतीक हैं, गायें जल की प्रतीक हैं। इस प्रकार मेघ के गर्भ में अवरुद्ध जल को विमुक्त कराने के लिए धुलोक के देवता इन्द्र ने अपनी दूती-वात्या-को भेजा जिसने विद्युत् और वज्र के प्रयोग से मेघपटल का विदारण कर जल-धारा को प्रवाहित कर दिया। अस्तु, प्रस्तुत सूक्त के आधार पर पशुधन का विरोधियों द्वारा अपहरण, उसके अन्वेषण के लिए शुनी-सम्प्रेषण, साम, दाम एवं दण्ड जैसे उपायों का सरमा द्वारा प्रयोग, पणियों द्वारा भेद-नीति का अवलम्बन और अन्त में इन्द्र द्वारा किये गये सङ्ग्राम के संस्कृत कथा-साहित्य १७५ फलस्वरुप पशुधन की विमुक्ति जैसी राजनैतिक धारणाओं की भी पुराकालिक अभिव्यक्ति होती है और ये सारे तत्त्व सरमा-पणि-संवाद में निहित कथा में अनुविद्ध हो गये हैं।

(२) शुनःशेप का आख्यान

अजीगत-पुत्र शुनःशेप के प्रार्थनापरक मन्त्रों के आधार पर उसकी कथा का सार इस प्रकार है : वेधस् के पुत्र महाराज हरिश्चन्द्र की एक सौ पत्नियाँ थीं। परन्तु, जब उनसे एक भी पुत्र का लाभ उन्हें नहीं हुआ, तब उन्होंने पुत्र की प्राप्ति के लिए वरुण से प्रार्थना की और प्रतिज्ञा की कि पुत्र होने पर वे उसे बलि के रूप में वरुण को समर्पित कर देंगे। वरुण ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें यथासमय पुत्रलाभ हुआ। तत्पश्चात्, जब वरुण ने पूर्व-प्रतिश्रुति के अनुसार उनके पुत्र जिसका नाम रोहित रक्खा गया था, की बलि माँगी तब ममता के वशीभूत होकर वे एक न एक बहाना बनाकर कालक्षेप करते रहे। राजकुमार रोहित अब किशोर वयस को प्राप्त कर चुका था। एक दिन उसे महाराज हरिश्चन्द्र ने वरुण देवता के साथ की गयी अपनी संविदा की बात कह दी, जिसे सुन कर रोहित ने राजधानी का परित्याग कर दिया और आरण्यक जीवन अपना लिया। यथासमय बलि न पाकर वरुण देवता कुपित हो गये जिसके फलस्वरूप हरिश्चन्द्र को जलोदर रोग हो गया। पिता के रोगाक्रान्त होने की वार्ता से अवगत होकर रोहित राजधानी लौट चला, परन्तु इन्द्र ने उसे अरण्यचारी होकर ही रहने के लिए प्रेरित किया। सात वर्षों तक निरन्तर अरण्य में विचरण करते हुए एक दिन वह अजीग” नामक ऋषि से मिला जिसके तीन पुत्र थे शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलाङ्गेल। राजकुमार रोहित ने अपने प्राणसङ्कट की कथा उनसे कही और अपने बदले में बलि देने के लिए सौ गायें प्रदान कर उक्त ऋषि से खरीदे गये उसके मध्यम पुत्र के साथ राजधानी लौटा और अपने पिता से सारी बातें कहीं। उन्होंने इसकी सूचना वरुण को दी और वे रोहित के बदले शुनःशेप की बलि को स्वीकार करने पर राजी हो गए। यज्ञ प्रारम्भ हुआ। शुनःशेप को बलि के रूप में यज्ञभूमि ले जाया गया। इस यज्ञ में महर्षि विश्वामित्र होता बने, महर्षि जमदग्नि ने अध्वर्य का कार्यभार सम्भाला, महर्षि अगस्त्य उद्गाता के रूप में सामगान कर रहे थे तथा महर्षि वसिष्ठ ब्रह्मा के पद पर आसीन थे। जब बलि को यूपकाष्ठ में बाँधने का अवसर आया तब इसके लिये वहाँ कोई भी उद्यत नहीं हुआ। लोभ के वशीभूत होकर शुनःशेप के पिता अजीगर्त ने अतिरिक्त एक सौ गायों के बदले अपने पुत्र को यूपकाष्ठ में आबद्ध कर दिया। जब बलि के विशसन का समय आया तब अजीगत ने ही पुनः सौ गायें लेकर इस कार्य के लिए अपनी स्वीकृति दे दी। जब वह अपने विक्रीत पुत्र शुनःशेप के विशसन के लिए उद्यत हुआ तब उसने१७६ गद्य-खण्ड दीनभाव से नाना देवताओं की प्रार्थना प्रारम्भ की। अन्ततोगत्वा जब वह उषा देवी की स्तुति कर रहा था तब उसके बन्धन टूट गये और वह यूपकाष्ठ से छूट गया। महाराज हरिश्चन्द्र का रोग जाता रहा। महर्षि विश्वामित्र ने अपने पौरोहित्य में शुनःशेप के द्वारा यज्ञानुष्ठान सम्पन्न कराया। अब, अजीगर्त ने शुनः-शेप को पुत्र के रूप में पुनः अपनाना चाहा, परन्तु उसने पिता के प्रस्ताव को ठुकरा कर महर्षि विश्वामित्र के दत्तक पुत्र के रूप में ही रहने का निश्चय किया। देवताओं की कृपा से ही शुनःशेप को इस सङ्कट से त्राण मिला था; अतः, वह इस घटना के बाद देवरात के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस आख्यान के स्थापत्य में पुरातन लोककथा की संरचना का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। मनुष्य-विक्रय, लोभ का दुर्निवार आकर्षण, देवस्तुति की महीयसी शक्ति तथा शुनःशेप के प्रति विश्वामित्र का असीम वात्सल्य-भाव इस कथा में सुस्पष्ट हुआ है।

(३) श्यावाश्व का आख्यान

प्रस्तुत आख्यान में प्राचीन प्रेमकथा के तत्त्वों को सरलता से हृदयङ्गम किया जा सकता है। कथा इस प्रकार है : रथवीति दार्म्य-नामक एक प्रसिद्ध राजर्षि थे। उन्होंने एक बार यज्ञ करना निश्चित किया। अपने अभीष्ट यज्ञ में ऋत्विक् कर्म के सम्पादन के अनुरोध के साथ वे महर्षि अत्रि के सम्मुख उपस्थित हुए और उन्हें अपना परिचय देते हुए अपने आगमन का प्रयोजन निवेदित किया। राजर्षि के अनुरोध पर अर्चनाना अपने पुत्र श्यावाश्व के साथ यज्ञ-सम्पादन के लिए राजर्षि रथवीति के यज्ञस्थल पर पहुंचे और उनका यज्ञ सम्पन्न कराया। यज्ञ-सम्पादन के क्रम में अर्चनाना ने वहाँ सर्वाङ्गसुन्दरी राजकन्या को देखा। उसे देखकर उनके मन में हुआ कि यह मेरी पुत्रवधू बन पाती तो बड़ा ही अच्छा होता। इधर श्यावाश्व का मन भी राजकन्या पर आसक्त हो चुका था। श्यावाश्व ने राजर्षि रथवीति से जब अपने अभिप्राय का निवेदन किया, तब उन्होंने इस विषय पर अपनी महारानी से कहा कि मैं साङ्गोपाङ्गवेदों में निष्णात श्यावाश्व को अपनी कन्या प्रदान करना चाहता हूँ। इस विषय पर तम्हारा क्या अभिमत है? अपने पति की बात सनकर महारानी ने कहा कि मैं राजर्षि-कुल में उत्पन्न हुई हूँ। जो व्यक्ति ऋषि-पद को प्राप्त नहीं हुआ है उसे हमारा जामाता नहीं होना चाहिए। किसी मन्त्रद्रष्टा को ही मैं कन्या देना चाहती हूँ जिससे मेरी कन्या वेदमाता का पद प्राप्त कर सके। मन्त्रद्रष्टा को वेद का पिता माना जाता है यह तो सुप्रसिद्ध ही है। अपनी महारानी से विचार-विमर्श के अनन्तर राजर्षि रथवीति ने यह कह कर इस सम्बन्ध को अस्वीकृत कर दिया कि जो मन्त्रद्रष्टा नहीं है वह हमारा जामाता नहीं हो सकता है। संस्कृत कथा-साहित्य १७७ इस प्रकार राजर्षि के द्वारा प्रत्याख्यात होकर पिता-पुत्र वहाँ से लौट चले, परन्तु श्यावाश्व का मन राजकन्या में ही लगा रहा। मार्ग में लौटते हुए पिता-पुत्र शशीयसी, तरन्त और राजा पुरुमील्ह से मिले जिन्होंने पिता-पुत्र को प्रभूत दान दिया। उनसे दान प्राप्त कर वे दोनों अपने आश्रम में लौट आये। मन्त्रद्रष्टा न होने के कारण राजकन्या के लाभ से वञ्चित श्यावाश्व के मन में शान्ति नहीं थी। वह ऋषिपद प्राप्त करने की लालसा से वन जाकर ध्यान-मग्न हो गया। वहाँ उसके समक्ष मरुद्गण प्रकट हुए। उन्हें देखकर श्यावाश्व ने उनकी स्तुति में मन्त्रों की रचना की। उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर मरुद्गणों ने अपने वक्षस्थल से स्वर्णाभरण उतार कर श्यावाश्व को प्रदान किया। इस घटना की सूचना देने के लिए श्यावाश्व ने रात्रि को दूती के रूप में नियुक्त कर राजर्षि रथवीति के पास भेजा। श्यावाश्व के ऋषिपद-लाभ की वार्ता जान कर वे अपनी कन्या को लेकर अर्चनाना के समक्ष उपस्थित हुए और उनसे नमस्कारपूर्वक कहा कि आपने ऋषि के पिता होने का भी गौरव प्राप्त किया है। अतः, आप मेरी पुत्री को अपनी पुत्र-वधू के रूप में स्वीकार कीजिए। ऐसा कह कर राजर्षि ने पाद्य, अर्घ्य और मधुयर्क के द्वारा उनकी अर्चना की और दक्षिणा में एक सौ शुक्लवर्ण अश्व प्रदान किये। इस प्रकार श्यावाश्व ऋषिपद-प्राप्ति के अनन्तर राजकन्या से परिणय कर पाने में सफल हुआ। इस वैदिक आख्यान से यह स्पष्ट होता है कि कन्यादान में कन्या की माता के अभिमत को निर्णायक माना जाता था तथा एक राजकन्या का सुयोग्य मन्त्रद्रष्टा ऋषिकुमार के साथ विवाह होने में कोई बाधा नहीं थी। नवयौवन-जनित आकर्षण का जो प्रेमकथा का आधारभूत तत्त्व है, यहाँ स्पष्ट अनुरञ्जन प्राप्त होता है। इससे आध्यात्मिक गुणसम्पदा की सर्वोत्कृष्ट रूप में राजपरिवार द्वारा स्वीकृति की बात का भी परिचय मिलता है। यह आख्यान ऋग्वेद में अपूर्ण एवं अव्यवस्थित रूप में प्राप्त है, जिसे शौनक ने बृहदेवता में व्यवस्थित एवं पूर्ण रुप प्रदान किया है।

(४) उर्वशी एवं पुरुरवा का आख्यान

उर्वशी एवं पुरूरवा के आख्यान में एक चिरन्तन प्रेमकथा अभिव्यक्त हुई है जो सुखान्त न होकर दुःखान्त है। दिव्य नायिका उर्वशी अपने मर्त्य प्रेमी पुरूरवा के साथ कतिपय अनुबन्धों के आधार पर एक परिमित अवधि तक सङ्गम-सुख का उपभोग करती है और तत्पश्चात् निष्ठुरता के साथ विलाप-विह्वल दशा में उसे छोड़ कर स्वर्गलोक चली जाती है। यह सुप्रसिद्ध आख्यान उर्वशी और पुरूरवा के उत्तर-प्रत्युत्तर की शैली में निबद्ध होने के कारण यास्क के अनुसार संवाद-सूक्त की कोटि में रखना पसन्द करते हैं; परन्तु, शौनक इसे इतिहास की कोटि में रखना पसन्द करते हैं। इस वैदिक प्रेमाख्यान की परम्परा ऋग्वेद से प्रारम्भ होकर शतपथब्राह्मण, बृहद्देवता, महाभारत, हरिवंशपुराण, विष्णुपुराण, १७८ गद्य-खण्ड वायुपुराण, ब्रह्मपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, विक्रमोर्वशीय एवं कथासरित्सागर तक सुविस्तृत संस्कृत वाङ्मय के क्षेत्र में निरन्तर नव-नव स्वरविन्यास के साथ प्रतिध्वनित होती रही है। काल के सुदीर्घ अन्तराल में परिवर्तनशील सामाजिक एवं सांस्कृतिक रुचियों के अनुरोध से इस प्रेमकथा के पुनराख्यान के क्रम में इसके अन्तर्गत परिवर्द्धन एवं परिवर्तन होता रहा है जो पूर्वोक्त ग्रन्थों के अध्ययन से सुस्पष्ट होता है। इस आख्यान का सारांश परवर्ती भाष्य में प्रस्तुत इसकी भूमिका के साथ ऋग्वेदीय संवाद की शैली में इस प्रकार प्राप्त होता है: देवराज इन्द्र के आदेश से गन्धर्वो द्वारा किए गये प्रपञ्च के फलस्वरूप जब पुरूरवा के साथ उर्वशी द्वारा किये गये अनुबन्ध भग्न हो गये, तब पूर्वप्रतिश्रुति के अनुसार विवश होकर उर्वशी को पुरूरवा का साहचर्य छोड़ना पड़ा और वह स्वर्गलोक के लिए चल पड़ी। उर्वशी के विरह से खिन्न पुरूरवा पागल की भाँति उसका पीछा करता हुआ उसे लौटा लाने के उद्देश्य से विकसित कमलवन से मनोहर एक विशाल सरोवर के समीप उससे जा मिला। और अनुनय-विनय करता हुआ उससे कहने लगा-“हे निष्ठुर प्रिये ! तनिक रुक तो जाओ। पास आकर बैठो भला! हम लोग आपस में जी खोल कर मन की कुछ बातें करें-“वचांसि मिश्रा कृणवाव है नु।" इसके उत्तर में उर्वशी ने उससे कहा कि क्या करूंगी मैं तुम्हारी इन बातों से-“किमेता वाचा कणवा तवाहम् ?” सष्टि की प्रथम उषा के समान मैं तो अब तुम्हारे लिए अतीत की प्रेमिका हो चुकी हूँ जिसे पकड़ पाना अब तुम्हारे लिए असंभव है। अब इस जीवन में मुझे रोककर तुम रख न पाओगे। मैं तो उन्मुक्त पवन की भाँति स्वच्छन्द गति से जा रही हूँ जिसे पकड़ पाना अब तुम्हारे लिए सम्भव नहीं है-“दुरापना वात इवाहमस्मि।" अतएव मैं कहती हूँ कि तुम अब मेरा अनुगमन करना छोड़ दो और घर लौट जाओ। मैं दिव्याङ्गना होकर भी चार वर्षों तक प्रति रात्रि तुम्हारी अङ्कशायिनी बनी रही। इस अवधि में प्रतिदिन बिन्दुमात्र आज्य भक्षण कर मैं सन्तृप्त रहा करती थी; और उसी तप्ति के साथ अब मैं स्वर्गलोक जा रही हूँ। मी _ इतना कहकर उर्वशी आकाशमार्ग से स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करने लगी और उसकी ओर मुँह उठाकर खड़ा-खड़ा पुरूरवा दोनों बाँहें उठाकर उससे अनुरोध भरे स्वर में पुनः कहने लगा-“सुन्दरि ! तुम तो स्वर्ग की ओर चल पड़ी पर तुम्हारा प्रेमी मैं यहीं पड़ा रह गया। तुम्हारे अनुपमरूप की आभा से सारा अन्तरिक्ष अनुरञ्जित हो उठा है। मैं तुम से एकबार फिर निवेदन करता हूँ कि तुम मेरी बात मान लो और लौट आओ। मेरा हृदय सन्तप्त हो रहा है-‘निवर्तस्व हृदयं तप्यते मे। मैं अपने द्वारा उपार्जित सारी पुण्यराशि तुम्हें अर्पित कर दूंगा। तुम लौट आओ।" परन्तु पुरुरवा के आवेश भरे प्यार के अनुरोध को ठुकराकर उसकी निष्ठुर प्रेयसी उसे छोड़कर चली ही गयी और विरह-कातर पुरूरवा का हृदय हाहाकार करता रह गया। संस्कृत कथा-साहित्य १७६ ऋग्वेद के प्रेमाख्यान-परक अट्ठारह मन्त्रों के इस सूक्त में प्रसिद्ध कथाविद् एन.एम. पैञ्जर के अनुसार “प्रायः सबसे प्राचीन भारोपीय प्रेमकथा का रूप उपलब्ध होता है।” वस्तुतः, इस के अन्तर्गत निष्ठुर प्रेमिका के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित प्रेमाविष्ट हृदय का मर्मस्पर्शी उद्गार काल के सुदीर्घ व्यवधान को पार कर आज भी विदग्ध-हृदय को निरन्तर अभिभूत करता आ रहा है। प्रस्तुत सूक्त के कपितय महत्त्वपूर्ण अस्फुट बिन्दुओं का विशद स्पष्टीकरण बृहद्देवता, शतपथ-ब्राह्मण तथा विष्णुपुराण में प्राप्त होता है। बृहद्देवता के अनुसार एक संविदा के अन्तर्गत अप्सरा उर्वशी राजर्षि पुरूखा के साथ रहती हुई सहचरी के धर्म का पालन कर रही थी। पुरूरवा को उपलब्ध उर्वशी के इस साहचर्य-सुख को देखकर इन्द्र के मन में पुरूरवा के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हुई, क्योंकि उर्वशी पर वह अपना एकाधिकार समझता था। ईर्ष्यालु इन्द्र ने अपने वज्र-आयुध से कहा कि तुम यदि मेरा प्रिय कार्य करना चाहते हो तो इन दोनों के बीच विद्यमान इस प्रेम-बन्धन को तोड़ डालो। तदनुसार वज्र ने अपनी अलौकिक शक्ति से उन दोनों के प्रीति-बन्ध को तोड डाला। उर्वशी से विरहित होकर पुरूरवा अब उन्मत्त की भाँति इधर-उधर भटकने लगा। इसी क्रम में उसने एक सरोवर में पाँच सुन्दरी सखियों के मध्य में सुन्दरी उर्वशी को देखा। उसे देखकर उसने उससे कहा कि लौट आओ। इस पर उसने दुःख के साथ कहा कि इस मर्त्यलोक में अब तुम मुझे नहीं पा सकते। मेरा और तुम्हारा पुनर्मिलन स्वर्गलोक में होगा। शतपथ-ब्राह्मण के पञ्चम अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में उपन्यस्त विवरण के आधार पर इस संवाद के कतिपय अस्फुट बिन्दुओं का और भी स्पष्टीकरण प्राप्त होता है। तदनुसार उर्वशी के तीन अनुबन्ध इस प्रकार थेः-वह केवल आज्य-प्राशन करेगी, प्रतिदिन तीन बार पुरुरवा को कामसौख्य प्रदान करेगी तथा पलंग के बाहर उसे कभी भी विवस्त्र अवस्था में नहीं देखेगी। उर्वशी ने अपने साथ दो मेमने लाये थे जिन्हें वह अपने पलंग से बाँधकर रक्खा करती थी। उर्वशी के प्रत्यानयन के लिए व्याकुल गन्धर्वो को जब यह ज्ञात हुआ कि पुरूरवा के साहचर्य के फलस्वरूप वह गर्भवती हो गयी है, तब इससे वे अत्यन्त ही उद्विग्न हुए और एक रात उन्होंने उसके मेमने का अपहरण कर लिया। इस पर उर्वशी ने खीझ कर कहा कि मेरे प्रिय मेमने का अपहरण हो रहा है और लगता है कि यहाँ कोई पुरुष नहीं है जो मेरे मेमनों को छुड़ा लावे। इस पर विवस्त्र अवस्था में ही पलंग से कूद कर वह गन्धवों के पीछे दौड़ पड़ा। इतने में गन्धों ने आकाश में बिजली चमका दी जिसके प्रकाश में उर्वशी ने पुरूरवा को निर्वसन रूप में देख लिया। फिर क्या था ? अनुबन्ध के भग्न हो जाने के कारण उर्वशी पुरूरवा के भवन से सद्यः तिरोहित हो गयी और वह स्वर्ग की ओर चल पड़ी। उर्वशी के विरह में इतस्ततः उसका अन्वेषण करते हुए पुरूरवा को कुरुक्षेत्र के अन्तर्गत अन्यतःप्लक्षा-नामक सरोवर में हंसिनी के रूप में जलविहार करती हुई उर्वशी मिली। वहाँ उसकी सखियाँ भी हंसिनियों के रूप में उसके साथ थीं। उर्वशी ने पुरूरवा को गद्य-खण्ड १८० देखते ही पहचान लिया और उसके समक्ष अप्सरा के रूप में प्रकट हो गयी। पुरूरवा ने भी उसे पहचान लिया और उससे अपने साथ चलने के लिए वह कातर भाव से अनुरोध करने लगा। परन्तु उर्वशी अब लौटने वाली नहीं थी। अन्त में उसने पुरूरवा से कहा कि इस वर्ष की समाप्ति के अवसरपर तुम आना। तब मैं तुम्हारे पुत्र को जन्म दे चुकी र|गी। उसके कथनानुसार वर्षान्त की रात्रि में जब वह वहाँ आया तब उसे वहाँ एक अद्भुत सुवर्णनिर्मित मन्दिर दृष्टिगोचर हुआ। उसने उससे कहा कि प्रातःकाल गन्धर्वगण यहाँ आकर तुम्हें अभीष्ट वर-प्रदान करेंगे। तुम उनसे यही वरदान माँगोगे कि मैं भी गन्धर्वकोटि में उपनत हो जाऊँ। दूसरे दिन पुरूरवा द्वारा उर्वशी के कथनानुसार वर माँगने पर गन्धर्वो ने उसे एक पवित्र भाजन में दिव्य अग्नि प्रदान किया और कहा कि इसमें हवन करने पर तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध हो जाएगा। तत्पश्चात्, उस दिव्य अग्निसम्भृत पात्र को लेकर वह उर्वशी में उत्पन्न अपने पुत्र के साथ वहाँ से लौट चला परन्तु उसने उस अग्निपात्र को रास्ते में ही रख दिया। दूसरे दिन जब वह वहाँ आया तो उसने उस अग्निपात्र के स्थान पर अश्वत्थ एवं शमी के वृक्ष देखे। गन्धों के आदेशानुसार उसने उनसे अग्निमन्थन-काष्ठ (अरणियों) का निर्माण किया और उनसे उत्पादित अग्नि में हवन की विधि से गन्धर्वकोटि में उपनत हो गया। शतपथ-ब्राह्मण में प्रस्तुत इस आख्यान का पर्यवसान यज्ञसंस्था के लिये आवश्यक अग्नि के उत्पादक अरणियों के महत्त्वोद्भावन में होता है और ऋग्वेद-संहितोक्त आख्यान में विद्यमान एक विरहार्त प्रेमी के आतुर प्रणयनिवेदन का स्वर तिरोहित हो जाता है। इस आख्यान के सम्बन्ध में विष्णुपुराण से यह अतिरिक्त सूचना प्राप्त होती है कि मित्रावरुण द्वारा अभिशप्त होने के कारण ही उर्वशी को मर्त्यलोक में रहना पड़ा जहाँ वह पुरूरवा के सम्पर्क में आयी। वस्तुतः, यह वैदिक आख्यान दिनानुदिन लोकप्रिय होता गया और परवर्ती काल में महाकवि कालिदास के हाथों सज-संवर कर एक विलक्षण नाट्यकृति के रूप में प्रकट हुआ। परन्तु, यहाँ उसके नायक का निराशावादी स्वर नहीं सुनायी देता है जो ऋग्वेद-संहिता के आख्यान की प्रभावोत्पादकता का रहस्य है।

(५) कक्षीवान् और स्वनय का आख्यान

इस आख्यान के अन्तर्गत ऋषि कक्षीवान् द्वारा प्रस्तुत राजा स्वनय की दान-स्तुति का वर्णन प्राप्त होता है। इस आख्यान में निहित कथा सायणभाष्य के आलोक में इस प्रकार है : प्राचीन काल में कलिङ्ग नामक एक राजा थे। अतिशय वार्धक्य के कारण जब उन्होंने पुत्रोत्पादन में अपने को असमर्थ पाया तब अपनी पत्नी में, नियोग-विधि से पुत्रोत्पादन का निर्णय किया। इस कार्य के लिए दीर्घतमा-नामक ऋषिकी उन्होंने प्रार्थना की। १८१ संस्कृत कथा-साहित्य यथा विहित कृत्य के सम्पादन के लिए जब वे आये तो वृद्ध ऋषि के पास जाने में लज्जाबोध से ग्रस्त रानी ने अपनी अशिक् नाम की एक दासी को अपने बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से अलङ्कृत कर उनके पास भेज दिया, परन्तु ऋषि की दिव्य दृष्टि से यह बात छिपी न रह सकी। उन्होंने मन्त्रपूत जल से उसको अभिषिक्त कर ऋषिपुत्री के रूप में प्रतिष्ठित किया और तत्पश्चात् उसके साथ सङ्गम किया जिसके फलस्वरूप कक्षीवान् नामक ऋषि का जन्म हुआ। इस प्रकार, ये महर्षि दीर्घतमा के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हुए। गुरुकुल में ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक चिरकाल तक रहकर वेदाभ्यास सम्पन्न करने के बाद गुरु की आज्ञा से कक्षीवान् घर की ओर चल पड़े। मार्ग में रात्रि हो जाने के कारण एक स्थान पर वे विश्राम करने लगे। प्रातःकाल होने पर राजा स्वनय अपने अनुचरों के साथ घूमते-फिरते वहाँ आ पहुँचे। उनके इस अप्रत्याशित आगमन से कक्षीवान् ससम्भ्रम उठ बैठे। राजा स्वनय ने उनका हाथ पकड़ कर अपने आसन पर बैठाया और उनके रोचिष्णु सौन्दर्य को देखकर मन ही मन उन्हें अपने जामाता के रूप में वरण करने की इच्छा से पूछा की भगवन् ! आप किस के पुत्र हैं और आप का क्या नाम है ? इस पर कक्षीवान् ने अपने माता-पिता का नामोल्लेख करते हुए उन्हें अपना वृत्तान्त कह सुनाया। सब कुछ सुनने के बाद उन्हें आदर के योग्य मान कर राजा स्वनय मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें घर लाकर मधुपर्क, वस्त्र एवं माल्यप्रभृति से उनका सम्मान किया और उन्हें अनेकों रथ, दस कन्याएँ, एक सौ स्वर्णमुद्राएँ, एक सौ बैल तथा एक हजार साठ गायें प्रदान कीं। उन्होंने सब कुछ स्वीकार कर अपने पिता दीर्घतमा के पास उपस्थित हो दान में प्राप्त सारा सम्भार उन्हें दिखलाया। राजा स्वनय द्वारा प्रदत्त हर महादान को देखकर प्रसन्नचित्त दीर्धतमा महर्षि ने उसकी प्रशंसा करते हुए उसकी शुभकामना की और अपने पुत्र को सोमयाग करने का आदेश देकर कहा कि राजा स्वनय दिनानुदिन अभ्युदय को प्राप्त करें ऐसी कामना करो। उन्होंने इस प्रसङ्ग में दान की स्तुति करते हुए कहा कि दान देनेवाला महापुरुष इस लोक में सभी प्रकार की समृद्धि प्राप्त करता है तथा परलोक में स्वर्गसौख्य प्राप्त करता है। गोदान और स्वर्णदान करनेवाला इस लोक में माल्य, चन्दनानुलेपन एवं मणिमुक्ता प्रभृति रत्नसम्भार के सौख्य को पाकर आनन्दित होता है, दीर्घायुष्य प्राप्त करता है तथा दानजनित दुरितक्षय के फलस्वरूप आत्मज्ञान के द्वारा सुदुर्लभ मोक्ष का लाभ करता है। _ प्रस्तुत दानस्तुति से यह स्पष्ट होता है कि वैदिक अभिजात समाज में ऋषियों का बहुत ही समादर था, राजागण उन्हें दान में गो, हिरण्य, अश्व एवं रथ प्रभृति के साथ अपनी कन्याएँ भी प्रदान कर दिया करते थे तथा ऋषिगण इस प्रकार दान में प्राप्त द्रव्यराशि का दाता के यशोगान के साथ यज्ञयाग के अनुष्ठान में सदुपयोग किया करते थे। यह उस समय की शिष्ट-समाज में प्रचलित रीति थी जिसके वर्णन के द्वारा ऐसे सूक्तों में प्राचीन लोक-समादृत परम्परा को अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है। १८२ गद्य-खण्ड - उपर्युक्त सूक्तों के अतिरिक्त स्वाभाविक प्राणिवृत्त-वर्णन एवं विषादपूर्ण आत्मवृत्त-वर्णन के निदर्शन के रूप में मण्डूक-सूक्त एवं अक्षसूक्त उल्लेखनीय स्थान रखते हैं। इनमें से मण्डूक-सूक्त के अन्तर्गत वृष्टि के देवता पर्जन्य एवं वृष्टिनिर्भर कृषक-समुदाय के मध्यवर्ती सम्बन्ध के संसूचक मण्डूकों का आलम्बन के रूप में वर्णन किया गया है और अक्षसूक्त के अन्तर्गत अक्षक्रीड़ा में पराजित एक द्यूत प्रसक्त कितव के पश्चात्ताप-पूर्ण आत्मवृत्त का वर्णन प्राप्त होता है।

कितव-कथा

कवष ऐलूष द्वारा साक्षात्कृत अक्षसूक्त के अन्तर्गत एक दुर्भाग्य-पराहत अक्षदेवी की दैन्य एवं पश्चात्ताप से सम्भृत आत्मकथा का वर्णन प्राप्त होता है जो अक्षक्रीडा के दुर्निवार आकर्षण के कारण अपना सर्वस्व गॅवाकर सतत ऋणग्रस्त रहने के फलस्वरूप सर्वत्र अनादर का पात्र बना फिरता है। सूक्त का मुख्य प्रयोजन अक्ष एवं अक्षदेवी की निन्दा तथा कृषिकर्म की उपादेयता को रेखाकित करना है। वर्णन की स्वाभाविकता एवं सजीवता से परिचित होने के लिए प्रस्तुत सूक्त का निम्न विन्यस्त सार-सङ्कलन पठनीय है। हवा में सर्वदा हिलती रहनेवाली विभीतक वृक्ष की ऊँची डाल की लकड़ी से निर्मित ये अक्ष मुझे सोमरस के समान मादक प्रतीत होते हैं। मेरी पत्नी का स्वभाव बड़ा ही अच्छा था। उसने कभी भी मेरे ऊपर क्रोध नहीं किया। वह मेरे साथियों के प्रति भी सौजन्यपूर्ण व्यवहार किया करती थी। परन्तु, इस अक्षक्रीडा के प्रति अपनी अत्यधिक आसक्ति के कारण मैंने ऐसे अनुकूल स्वभाववाली पत्नी का भी परित्याग कर डाला। अब, घर जाने पर मेरी सास मुझ से द्वेष करती है; और, मेरी पत्नी मेरे समीप नहीं आती है। ऐसा कोई भी मनुष्य मुझे नहीं मिलता है जो मांगने पर धन देकर मुझे सुखी करे। मैं जब अपने भाग्य पर सोचता हूँ तो मैं अपने को एक जरा-जर्जर अश्व के समान अकार्यक पाता हूँ। विजेता कितव-समाज अक्षक्रीड़ा में पराजित हुए कितव की पत्नी को धर्षित करते हैं तथा उसके पिता, माता एवं भाई भी उन विजेता कितवों से कहते हैं कि ऋणशोधन के लिए इसे ले जाओ बाँधकर। हम इसे नहीं पहचानते। द्यूतक्रीड़ा में हार जाने के विषाद से बिना कुछ कहे ही घर से चले जाने के कारण कितव की पत्नी पति के वियोग में निरन्तर सन्तप्त रहा करती है तथा उसकी माता भी इस चिन्ता से कि वह कहाँ इधर-उधर भटकता होगा, सदैव उद्विग्न रहा करती है। द्यूत में हारे हुए धन को चोरी करके चुकाने की इच्छा से रात में वह किसी घर के समीप जाता है। अन्य व्यक्तियों की सुखी पत्नी तथा उनके सुव्यवस्थित घरों को देखकर उसे अपनी चिन्तातुर पत्नी तथा अव्यवस्थित घर का ध्यान हो आता है जिसे सोच-सोचकर वह अतिशय सन्तप्त रहा करता है। अन्त में मन्त्रद्रष्टा कवष ऐलूष को सविता देवता की कृपा संस्कृत कथा-साहित्य १८३ से सुबुद्धि प्राप्त होती है कि उसे अक्षक्रीडा छोड़कर कृषिकर्म, पशुपालन तथा अपनी पत्नी का पालन-पोषण करते हुए परिमित धन से ही संतुष्ट रहना चाहिए। द्यूतव्यसन के दुर्निवार आकर्षण के वशीभूत होकर द्यूतप्रसक्त कितव जब पराजित हो जाता था तब अपने स्वजनों से भी तिरस्कृत होकर वह मारा-मारा फिरता था। दैन्य, निराशा, विषाद एवं पश्चात्ताप से व्यथित एक पराजित कितव की मर्मवेधिनी पीड़ा इस सूक्त में मुखर हो उठी है। इस सूक्त का पर्यवसान द्यूतव्यसन की हेयता तथा कृषि एवं पशुपालन पर आश्रित सन्तोषपूर्ण गृहस्थ-जीवन को अपनाने के उपदेश के साथ होता है। एक पराजित चिरन्तन किंतव की यह आत्मकथा क्रूर यथार्थता के दंश से आविद्ध लौकिक अनुभूतियों की भित्ति पर प्रतिष्ठित है जिसमें नीति के शाश्वत तत्त्व निहित हैं। अक्षसूक्त में उपलब्ध कितव की इस आत्मकथा में तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित हो उठा है।

काक्षीवती घोषा की कथा

देवमाहात्म्य के उद्भावन से सम्बद्ध काक्षीवती घोषा द्वारा साक्षात्कृत ऋग्वेद के दो सूक्तों में उसकी सुप्रसिद्ध कथा प्राप्त होती है, जिसका उल्लेख शौनक ने भी बृहदेवता में किया है। कथा इस प्रकार है: महर्षि कक्षीवान् की घोषा नामक एक पुत्री थी। वह पापरोग से ग्रस्त हो जाने के कारण विरूप हो गयी थी और इसी अवस्था में साठ वर्ष तक पिता के ही घर में पड़ी रही। उसे अपनी इस दुर्भाग्यपूर्ण दशा पर बड़ी चिन्ता हुई कि वह पति और पुत्र के बिना व्यर्थ ही वृद्धावस्था को प्राप्त हो गयी। अतः उसे रूप और सौभाग्य की कामना से अश्विनीकुमार-युगल की स्तुति के योग्य मन्त्रों के दर्शन की लालसा उत्पन्न हई। इस प्रकार ध्यानमग्न अवस्था में उसने ऋग्वेद के दशम मण्डल के उनचालीसवें और चालीसवें सूक्त का दर्शन प्राप्त किया। अश्विनीकुमार-युगल के चिरन्तन माहात्म्य का उल्लेख करती हुई घोषा ने उन सूक्तों के द्वारा जब उनकी स्तुति की तो वे प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने उसे नैरुज्य, तारुण्य एवं सौन्दर्य प्रदान किया। इन स्ववैद्यों के अनुग्रह से घोषा को पति की भी प्राप्ति हुई और कालक्रम से उसे एक पुत्र का भी लाभ हुआ जो सुहस्त्य के नाम से मन्त्रद्रष्टा ऋषि के रूप में प्रसिद्ध हुआ। महर्षि कक्षीवान् की पुत्री घोषा द्वारा प्रस्तुत यह कथा अश्विनीकुमारों की चिकित्साकुशलता का परिचय प्रदान करती है तथा वेद-पुराण-प्रोक्त कथा-परम्परा में स्ववैद्य के रूप में उनकी प्रसिद्धि का अन्यतम प्रमापक है। उपर्युक्त सन्दर्भ के अन्तर्गत प्रस्तुत कतिपय ऋग्वेदीय सूक्तों के सार-सङ्ग्रह से उनमें निहित कथातत्त्व का स्वरूप समझा जा सकता है। इन कथाओं का वस्तुतत्त्व वैदिक धर्मधारणा के अवगुण्ठन में निगूढ़ भाव से परिस्पन्दित होता है तथा इनमें लोकजीवन की १८४ गद्य-खण्ड अनुभूतियाँ एवं नैतिकता की अवधारणाएँ अपने चिरन्तन परिवेश में अभिव्यक्त हुई हैं। इन आख्यानों की भाषाशैली एवं अर्थनिवेदन की भगिमाओं में एक अनाहार्य-मनोहर काव्यश्री की दिव्य आभा सर्वत्र ही उद्भासित हो उठी है। प्रसङ्गविशेष के अनुरोध से प्रसाद एवं ओजस्विता से सम्भृत तथा स्वभावोक्ति से परिपेशल ऋग्वेद का वाचिक शिल्पविधान चिरंन्तन महर्षियों की वाक्साधना को स्पष्ट रूप से रेखाङ्कित करता है।

यजुर्वेद में प्राप्त कथाएँ

यजुर्वेद की प्रकृति ऋग्वेद की प्रकृति से भिन्न है। ऋग्वेद के मन्त्रों का मुख्य विषय अग्नि, इन्द्र, मरुत् पर्जन्य, रुद्र, वरुण, पूषा, मित्र, सविता एवं उषा प्रभृति देवताओं की स्तुतियाँ हैं, जिनका होता नामक ऋत्विक् के द्वारा यज्ञ में शंसन हुआ करता था। परन्तु यजुर्वेद का साक्षात् सम्बन्ध यज्ञ-सम्पादन से है जिस सन्दर्भ में अध्वर्यु-नामक ऋत्विक् के द्वारा कर्मविशेष में मन्त्रों का विनियोग किया जाता है। अतएव यजुर्वेद की अपर आख्या आध्वर्यव वेद भी है। गद्यात्मक ब्राह्मण भाग के क्रमशः सद्भाव तथा अभाव के आधार पर कृष्ण तथा शुक्ल के भेद से यजुर्वेद की दो वाचनाएँ प्राप्त होती हैं। वैदिक वाङ्मय में सर्वप्रथम यजुर्वेद में ही गद्य का आविर्भाव हुआ है। इसके अन्तर्गत यज्ञविधान के प्रतिपादन के सन्दर्भ में कतिपय रोचक आख्यान भी उपलब्ध होते हैं, जिन्हें प्राचीन कथा-साहित्य के स्वरूप-विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे आख्यानों में तैत्तिरीय संहिता में देवासुर-सङ्घर्ष का आख्यान तथा मैत्रायणीसंहिता में रात्रि की उत्पत्ति एवं इन्द्र द्वारा पर्वतों के पक्षच्छेदन के सुप्रसिद्ध आख्यान वर्णित हुए हैं। इनके परिचय के लिए सक्षेप में इनके सारांश नीचे प्रस्तुत किये जाते है:

१. देवासुर-सङ्घर्ष का आख्यान

एक बार राक्षसों और असुरों में संघर्ष छिड़ा। इस संघर्ष में मनुष्य तथा पितर देवताओं के संघ में थे तथा असुर और पिशाच राक्षसों के साथ थे। राक्षस बड़े ही क्रूरकर्मा थे। स्वभावतः रक्तपिपासु होने के कारण वे मनुष्य के शरीर का रक्त खींच कर पी जाते थे, जिसके फलस्वरूप दूसरे दिन सूर्योदय होते-होते उसकी मृत्यु हो जाती थी। देवताओं को राक्षसों के इस दारुण कृत्य का जब पता चला तब उन्होंने भेदनीति का अवलम्बन किया। उन्होंने राक्षसों को यह स्वीकार कर अपने संघ में मिला लिया कि असुरों को लूटने से प्राप्त धन में उन्हें आधा अंश दिया जायगा। अब राक्षसों और असुरों में फूट पड़ जाने के कारण असुरों का बल क्षीण हो गया जिससे देवताओं ने सरलता से उनपर विजय प्राप्त किया। इस विजय के पश्चात् राक्षसों के प्रति सहज वैरभाव के कारण देवताओं द्वारा उन्हें भगा दिये जाने पर जब वे विरोध-मुखर हुए तब देवताओं ने अग्नि की सहायता से उन्हें पराजित कर पूर्ण विजयश्री प्राप्त की। संस्कृत कथा-साहित्य १८५

२. रात्रि की उत्पत्ति का आख्यान

अपने भाई यम की मृत्यु हो जाने पर उसकी बहन यमी बहुत उदास रहने लगी। देवताओं द्वारा वारम्वार सान्त्वना देने पर भी वह एक ही रट लगाया करती थी कि आज ही तो यम का निधन हुआ है। यह देखकर देवताओं ने रात्रिरहित दिवसकाल को खण्डित कर उसके दूसरे भाग से रात्रि की सृष्टि की। इस प्रकार अनेक रात्रियों से व्यवहित हुए अनेक दिनों के व्यतीत हो जाने पर कालकृत व्यवधान के फलस्वरूप यमी धीरे-धीरे प्रकृतिस्थ हो पायी।

३. पर्वतपक्षच्छेदन-आख्यान

पर्वत प्रजापति के ज्येष्ठ पुत्र हैं। पूर्वकाल में उनके पंख हुआ करते थे। वे अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहते, उड़कर जाते और धरती पर वेग के साथ उतर पड़ते जिसके फलस्वरूप पृथिवी निरन्तर व्यथित होती रहती थी। पृथिवी को इस व्यथा से मुक्त करने के लिए इन्द्र ने उनके पंखों को काट डाला और पृथिवी को पर्वतों से कीलित कर स्थिर कर दिया। पर्वतों के वे कटे हुए पंख मेघ बन गये और यही कारण है कि आज भी वे पर्वतों से, पावस में, जा लगते हैं जहाँ पहले उनका स्थान था। उपर्युक्त कथाओं में से देवासुर-संघर्ष की कथा में कूटनीतिपूर्ण विचारधारा की स्पष्ट रूपरेखा प्राप्त होती है। रात्रि की उत्पत्ति के आख्यान में मनोवैज्ञानिक तथ्य की अभिव्यक्ति हुई है तथा इन्द्र द्वारा पर्वतों के पक्षच्छेदन के आख्यान में पुराकालीन भूगर्भ के आवर्तन-विवर्त्तन से बहुधा होने वाले भूकम्पों की परवर्ती भौगोलिक स्थिति का कल्पनामूलक वर्णन किया गया है जब पृथ्वी को भूकम्प की वारंवारता से त्राण मिल चुका था। कथा की स्वाभाविक रुचि गद्यात्मक भाषाशैली को अपनाने की होती है। अतः यजुर्वेद के अन्तर्गत विद्यमान गद्य-सन्दर्भ में कथाओं का स्वरूप स्पष्टता की ओर अग्रसर होता उपलब्ध होता है। इन कथाओं पर धर्मभावना का आवरण पड़ा हुआ है और यज्ञसंस्था से सम्बद्ध विविध अनुष्ठानों के सन्दर्भ में इनका आख्यान किया गया है। इतना होने पर भी इन कथाओं में लौकिक ज्ञानधारा का प्रवाह कहीं स्पष्ट तो कहीं निगूढ-भाव से प्रवाहशील दिखाई देता है।

ब्राह्मण-ग्रन्थों में उपलब्ध कथाएँ

संहिता-साहित्य के परवर्ती काल में यज्ञ-याग को सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने के लिए अनियताक्षर पदरचनात्मक गद्यशैली में ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना की गयी। यज्ञविशेष के अन्तर्गत अनुष्ठित होने वाले विविध कर्मों एवं उनसे सम्बद्ध मन्त्रों का व्याख्यान इनका मुख्य विषय है। ब्राह्मण-ग्रन्थों के दो भाग है:-विधि एवं अर्थवाद। विधिवाक्य द्वारा कर्त्तव्यत्वेन निर्दिष्ट कर्मविशेष के स्तुतिपूर्वक समर्थन के लिए अर्थवाद का उपन्यास किया गया है। ये अर्थवादात्मक सन्दर्भ विधिवाक्यों के साथ एकवाक्यतापन्न होकर ही प्रामाण्यलाभ'१८६ गद्य-खण्ड करते हैं। अर्थवाद के अन्तर्गत स्थान-स्थान पर विविध दृष्टान्त एवं आख्यायिकाएँ उपलब्ध होती हैं, जिन के द्वारा यज्ञविद्यान ग्रन्थों की नीरस पृष्ठभूमि में इस प्रकार के दृष्टान्त एवं आख्यान मरुप्रदेश में अवस्थित शीतल उद्यान के समान हैं जहाँ इनके अध्येताओं को मनोविनोद की सामग्री प्राप्त होती है। ब्राह्मणों के रचनाकाल के अन्तर्गत विकसित वैदिक संस्कृति का अध्ययन करने पर इन आख्यानों की हृद्यता तथा कल्पनामूलक समृद्धि सुस्पष्ट हो जाती है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में प्राप्त कतिपय महत्त्वपूर्ण आख्यानों की विषय-सूची अधोविन्यस्त है : १. मन और वाणी में कलह का आख्यान २. स्वर्भानु द्वारा सूर्य पर आक्रमण तथा अग्नि द्वारा उसका विनाश। ३. देवताओं के समीप से यज्ञ द्वारा अश्वरूप धारण कर पलायन तथा मुट्ठी भर कुशग्रास का प्रलोभन देकर उसका प्रत्यानयन। ४. असुरों तथा देवताओं के बीच हुए अनेकानेक संग्राम। ५. पुरूरवा और उर्वशी का आख्यान। ६. जलप्लावन का चिरन्तन आख्यान। ७. पुरुष से चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति का आख्यान। ८. शुनःशेप का आख्यान। ६. कमलनाल चुराने वाले चोरों का आख्यान। १०. कवष ऐलूष का आख्यान। ११. सौपर्ण आख्यान। ल १२. यज्ञिय पशु से सम्बद्ध आख्यान। १३. विश्वन्तर एवं ब्राह्मणों का आख्यान। ब्राह्मण-ग्रन्थों में अर्थवाद के अन्तर्गत विन्यस्त आख्यानों की प्रकृति से परिचित होने के लिए यहाँ कतिपय आख्यानों का सारसङ्कलन प्रस्तुत किया जाता है :

१. कवष ऐलूष का आख्यान

एक समय पुण्यसलिला सरस्वती नदी के पुलिन पर भृगु एवं अङ्गिरा आदि महर्षियों ने यज्ञ प्रारम्भ किया। उन्हीं में से एक का पुत्र था कवष जिसे यह कहकर ऋत्विजों ने यज्ञ-भूमि से बाहर कर दिया कि यह एक दासी का पुत्र है तथा इसका शील-स्वभाव द्विजोचित नहीं है। उसे शिष्टमण्डली में रहने के अयोग्य घोषित कर याज्ञिकों ने सरस्वती नदी से दूरवर्ती मरुभूमि में निर्वासित कर दिया जिससे जल के अभाव में उसकी प्राणरक्षा न हो सके। इस प्रकार याज्ञिकों द्वारा मरुकान्तार में निर्वासित कवष का कण्ठ जब प्यास से सूखने लगा तब उसने अपोनत्रिय सूक्त से जल के देवता की स्तुति की जिसके संस्कृत कथा-साहित्य १८७ फलस्वरूप नदीरूप में सरस्वती ने आकर उसकी पिपासा शान्त की। इस घटना को देखकर ऋषियों ने जब जाना कि साक्षात् सरस्वती देवी ने इसे अनुगृहीत किया है तब उसे भी बुलाकर ऋषियों ने यज्ञ में स्थान दिया और उसके द्वारा दृष्ट मन्त्र को अपनाकर याज्ञिकों ने भी अन्न तथा जल की समृद्धि प्राप्त की। यह आख्यान अपोननिय विधि की कर्त्तव्यता के उपदेश के सन्दर्भ में निबद्ध किया गया है। यहाँ हम देखते हैं कि जन्म एवं आचरण से हीन होने के कारण पहले तो कवष को तिरस्कृत एवं निर्वासित कर दिया जाता है, किन्तु वही जब मन्त्रद्रष्टा का स्पृहणीय पद प्राप्त कर लेता है तब उसे शिष्ट समाज सोत्साह समादृत करता है। इससे जन्म की अपेक्षा ज्ञान की श्रेष्ठता पर प्रकाश पड़ता है। और इस प्रकार यह आख्यान तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक चिन्तनधारा को स्पष्ट करता है।

२. मन और वाणी में कलह का आख्यान

एक समय मन और वाणी में अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर कलह उत्पन्न हो गया। मन का कथन था कि वह वाणी से श्रेष्ठ है क्योंकि वाणी मन द्वारा चिन्तित अर्थ को ही प्रकट करती है। वाणी का कथन था कि तुम्हारे द्वारा चिन्तित अर्थ का प्रकाशन तो मैं ही करती हूँ। अतः, मैं ही तुम से श्रेष्ठ हूँ। इस कलह के समाधान के लिए दोनों ब्रह्मा के समक्ष उपस्थित हुए। दोनों की बातें सुनकर ब्रह्मा ने मन की श्रेष्ठता उद्घोषित की और वाणी को मन की दासी कहा। इस पर वाणी ने रुष्ट होकर कहा कि अब से यज्ञ में तुम्हारे नाम से समर्पित किये जानेवाले हविर्द्रव्य के बोधक वाक्य के रूप में मैं प्रकट नहीं होऊंगी, मौन रह जाऊंगी। प्रजापतिदैवत हवनकर्म का अनुष्ठान मौनभाव से ही करना चाहिए इस विधि के औचित्य की व्याख्या के सन्दर्भ में इस आख्यान को निबद्ध किया गया है। या यहाँ हम देखते हैं अमूर्त मन और वाणी पर मानवरूप का अध्यारोप किया गया है जिसके मूल में वैदिक कल्पना का विलास परिस्पन्दित होता है। अमूर्त पात्रों के मूर्त्तन का यह चिरन्तन उदाहरण है। प्रकाशन-क्रिया के कर्मभूत अर्थलक्षण पदार्थ तो वस्तुतः मन के ही अधीन हैं, अतः मन की श्रेष्ठतामें मनस्तत्त्व का निगूढ सिद्धान्त भी निहित है।

३. जलप्लावन का आख्यान

एक समय प्रातःकाल स्नान की वेला में मनु के हाथ में जल के साथ एक क्षुद्रकाय मत्स्य भी आ गया। उसने उनसे कहा कि यदि तुम मेरी रक्षा कर सको तो मैं तुम्हारा उपकार करूँगा। मनु के द्वारा पूछे जाने पर कि वह उनका कैसा उपकार कर सकेगा उस मत्स्य ने कहा कि एक नौका का निर्माण करो और उसे जलप्लावित कर मुझे उसमें छोड़ १८८ गद्य-खण्ड दो कि ताकि मैं उसमें रहते हुए बड़ा आकार धारण कर सकूँ। तत्पश्चात्, मुझे तुम समुद्र में छोड़ देना। आने वाले दिनों में एक महान् जलप्लावन होने वाला है जिसमें सारी धरती डूब जायेगी। उस समय मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। मनु ने वैसा ही किया जैसा कि उस मत्स्य ने कहा था। समय आनेपर जलप्लावन की घड़ी आ गयी। पृथ्वी को जलमग्न पाकर मनु ने नोका का आश्रय लिया। इतने में वह मत्स्य भी वहाँ आ पहुँचा और उसने मनु को हिमालय के उत्तुंग शिखर पर पहुंचा दिया। वहाँ पहुँच कर उन्होंने यज्ञ का अनुष्ठान किया जिससे उन्हें स्त्री का लाभ हुआ; और इस प्रकार, मानवी प्रजा-सृष्टि की परम्परा गतिशील हो उठी। प्राचीन जलप्लावन से सम्बद्ध यह आख्यान मत्स्योपाख्यान के नाम से भी प्रसिद्ध है तथा इससे मिलती-जुलती कथाएँ जेंद अवेस्ता, बाइबल एवं ग्रीक धर्मकथा के अन्तर्गत भी उपलब्ध होती हैं। समीक्षकों ने ऐसी सम्भावना व्यक्त की है कि जलप्लावन की ये कथाएँ परस्पर निरपेक्ष भाव से विकसित हुई होंगी। तथापि, शतपथ-ब्राह्मण में निबद्ध जलप्लावन की कथा विश्वसाहित्य में सर्वाधिक चिरन्तन मानी जाती है। इस कथा में नीतिकथा की विशेषताएँ उपलब्ध होती हैं। उपर्युक्त कथासार के अवलोकन से ब्राह्मण-साहित्य में निबद्ध कथाओं की एक सामान्य रूपरेखा का परिचय प्राप्त हो सकता है। ऋग्वेदोक्त शुनःशेप-आख्यान तथा पुरूरवा-उर्वशी आख्यान क्रमशः ऐतरेय ब्राह्मण एवं शतपथ-ब्राह्मण के अन्तर्गत विश्लेषणात्मक गद्यशैली में सविस्तर भाव से पुनराख्यात हुए है। शुनःशेप आख्यान हरिश्चन्द्रोपाख्यान के नाम से भी प्रसिद्ध है। ऐतरेय ब्राह्मण के अन्तर्गत गद्य एवं गाथा की सम्मिश्र-शैली में पूर्ण नाटकीयता के साथ निबद्ध होने के कारण यह एक विलक्षण आकर्षण-कौशल रखता है। नरबलि की आदिम बर्बरतापूर्ण प्रथा की ओर से वैदिक आर्यों के मानस में उभरती हुई अरुचि एवं मानवतावादी भावना के विकास के स्वर इस आख्यान की नवीन प्रस्तुति में स्पष्ट ही सुने जा सकते हैं। यज्ञसंस्था से सम्बद्ध दैवतवाद की व्याख्या में अनुस्यूत इन आख्यानों के परिशीलन से ऐसी कल्पना को बल मिलता है कि इनके मूलरूप बहुत अंशों में लौकिक रहे होंगे जो परवर्ती काल में कर्मकाण्ड से आविष्ट होकर धूमिल पड़ गये। वस्तुतः लौकिक कथाओं की विराट् सामग्री के एक परिमित अंश का ही ये आख्यान प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्राह्मण काल की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि प्रतिपाद्य की ग्राह्यता को प्रमाणित करने के उद्देश्य से विधिभाग के साथ रोचक आख्यानों के विनियोजन में निहित है। निरन्तर अग्रसर होती हुई कथा-परम्परा का दूरवर्ती नूपुरसिंजन इन आख्यानों में प्रतिध्वनित होता है। संस्कृत कथा-साहित्य १८६

उपनिषद्-वाङ्मय में निबद्ध कथाएँ

उपनिषद् वैदिक साहित्य का अन्तिम भाग है। अतः वेदान्त के नाम से यह सुविश्रुत है। उपनिषद्-वाङ्मय वैदिक परम्परा की रहस्यवादी आध्यात्मिक चिन्तन-धारा का प्रतिनिधित्व करता है। उपनिषदों में ब्रह्मतत्त्व के स्पष्टीकरण के सन्दर्भ में विविध आख्यानों का समावेश किया गया है। यहाँ कतिपय आख्यानों का नामोल्लेख किया जाता है : १. नचिकेता और यम का आख्यान २. सत्यकाम जाबाल का आख्यान ३. आरुणि और श्वेतकेतु का आख्यान ४. सनत्कुमार एवं नारद का आख्यान ५. इन्द्र एवं विरोचन का आख्यान ६. याज्ञवल्क्य एवं मैत्रेयी का आख्यान ७. प्रवाहण जैबलि एवं आरुणेय श्वेतकेतु का आख्यान ८. प्रतर्दन एवं इन्द्र का आख्यान ६. देवासुरसंग्राम का आख्यान १०. जानश्रुति पौत्रायण का आख्यान ११. रैक्व का आख्यान १२. श्वानों का आख्यान १३. उमा हैमवती का आख्यान उपर्युक्त आख्यानों में से कठोपनिषद् में वर्णित नचिकेता और यम का आख्यान, छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित सत्यकाम जाबाल का आख्यान एवं जानश्रुति पौत्रायण का आख्यान तथा बृहदारण्यक उपनिषद् में वर्णित याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी आख्यान बहुत ही प्रसिद्ध हैं। यहाँ परिचय के लिए इनका सार-सङ्कलन प्रस्तुत है।

१. नाचिकेतोपाख्यान

एक वार वाजश्रवा के पुत्र महर्षि उद्दालक ने विश्वजित् नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया। इस यज्ञ की दक्षिणा के रूप में यजमान अपना सर्वस्व-प्रदान कर देता है। दक्षिणा-दान के क्रम में उनके पुत्र नचिकेता ने देखा कि उसके पिता बूढ़ी कृशकाय गायें तो दान कर रहे हैं किन्तु अच्छी-अच्छी दुधारू गायें रक्खे हुए हैं। नचिकेता को अपने पिता के इस मोहग्रस्त व्यवहार से बड़ा ही खेद हुआ और वह उनका मोहभङ्ग करने के अभिप्राय से उनसे पूछा कि पिताजी ! आप मुझे किसको दान करेंगे। पहले तो उसके पिता ने कोई उत्तर नहीं दिया परन्तु जब उसने वारम्वार यही प्रश्न किया तो उन्होंने झुंझलाकर उससे कहा कि जा, तुझे मैंने यमराज को प्रदान किया। यह जानते हुए भी कि पिता ने क्रोध के वशीभूत होकर ऐसा कहा है, नचिकेता एक आज्ञाकारी पुत्र होने के कारण पिता २. १६० गद्य-खण्ड के वचन को सत्य प्रमाणित करने के लिए यमराज के भवन पर पहुँच कर उनकी अनुपस्थिति में वहीं द्वारदेश पर भूखे-प्यासे तीन रातों तक पड़ा रहा। प्रवास से लौट कर आये यमराज को जब परिजनों के द्वारा यह समाचार मिला तो वे नचिकेता के पास आये और उन्होंने सत्कारपूर्वक उससे कहा कि तुम नमस्कार-योग्य अतिथि होकर भी मेरे द्वार पर तीन रात्रि तक बिना अन्न-जल ग्रहण किये पड़े रहे, अतः एक-एक रात्रि के लिए एक-एक कर मुझ से तीन वर माँग लो। इस पर नचिकेता ने सर्वप्रथम पितृपरितोष-रूप प्रथम वर तथा स्वर्गप्राप्ति-साधनभूत अग्निविद्या-परिज्ञान रूप द्वितीय वर यमराज से माँगे जिन्हें उन्होंने उसे सहर्ष प्रदान किया। तत्पश्चात, जब नचिकेता ने आत्मतत्त्व-बोध रूप तृतीय वर माँगा तब पहले तो यमराज ने उसे भौतिक सुखों का प्रलोभन दिया परन्तु उसकी वैराग्यभावना तथा आत्मतत्त्व-बोध के प्रति उसकी अनन्य आसक्ति को देखते हुए उन्होंने उसे परम रहस्य-तत्त्व प्रणव का उपदेश प्रदान किया। आत्मतत्त्व के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए यमराज ने नचिकेता के समक्ष शरीर और आत्मा के अन्तर को समझाने के क्रम में रथ का रूपक प्रस्तुत किया है। यह आत्मा रथ का स्वामी है, शरीर रथ है, बुद्धि इसका सारथि है, मन लगाम है, इन्द्रिय घोड़े हैं, रूप, रस, स्पर्श, गन्धप्रभृति इन्द्रिय रूपी घोडों के मार्ग हैं, और शरीर, इन्द्रिय तथा मन से युक्त आत्माको विवेकशील पुरुषों ने संसारी की संज्ञा प्रदान की है। आत्मज्ञानरूपी सारथि से युक्त तथा मनरूपी लगाम पर नियन्त्रण रखने वाला भाग्यशाली व्यक्ति इस दुस्तर संसार-मार्ग को पारकर सर्वव्यापक परमात्मा के शाश्वत पद की प्राप्ति करता है। यह आत्मा अजन्मा, अजर-अमर है, शाश्वत है, चिरन्तन है तथा शरीर के विनष्ट होने पर भी विनष्ट नहीं होता है। देवता, पितर एवं मनुष्य-प्रभृति के विविध शरीरों में अवस्थित यह आत्मा स्वयं शरीररहित है। इसकी सर्वव्यापकता को जानने वाला पुरुष सर्वथा वीतशोक हो जाता है। स्वाध्याय, मेधाशक्ति अथवा शास्त्रों के श्रवण से इस आत्मतत्त्व की उपलब्धि नहीं हो सकती है। यह तो केवल आत्माकी कृपा पर ही निर्भर है। जिस पुरुष को यह आत्मोपलब्धि के योग्य समझता है उसके समक्ष यह अपने को अनावृत कर देता है। अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र एवं विद्युत् का प्रकाश भी उस आत्मलोक को प्रकाशित नहीं कर पाता है। उसी के प्रकाश से ये सूर्य प्रभृति प्रकाशित होते हैं। बुद्धि में विद्यमान अज्ञानमूलक विविध ग्रन्थियाँ जब विशीर्ण हो जाती हैं तब सारी एषणाओं से रहित होकर मरणधर्मा पुरुष अमर हो जाता है। यही सारे वेदान्तों के उपरश का सारतत्त्व है। इस प्रकार यमराज के द्वारा उपदिष्ट अध्यात्मविद्या तथा योगविधि का ज्ञान प्राप्त कर नचिकेता ने ब्रह्मभाव की उपलब्धि की जिससे उसका जन्म सफल एवं धन्य हो गया। _कठोपनिषद् के इस सुविश्रुत आख्यान में साधन-चतुष्टय-सम्पन्न नचिकेता के चरित्र का ज्योतिर्मय विकास उपलब्ध होता है। उपनिषत्साहित्य में वर्णित समस्त चरित्रों में संस्कृत कथा-साहित्य १६१ नचिकेता का चरित्र असाधारण रूप से आकर्षक हो उठा है। असिधारा के समान दुर्गम मोक्षपथ पर अपनी अनन्य निष्ठा का सम्बल लेकर निरन्तर अग्रसर होते हुए एक निःस्पृह एवं वीतकाम यात्री के रूप में नचिकेता चिरस्मरणीय हो उठा है जिसने आत्मोपलब्धि का दुर्लभ लक्ष्य पा लिया। इस कथा से लक्ष्यप्राप्ति में निश्चय की दृढता का महत्त्व स्पष्ट होता है।

२. सत्यकाम जाबाल का आख्यान

समृद्धिशाली परिवारों में परिचारिका के कार्य से जीविकानिर्वाह करनेवाली एक स्त्री थी जिसका नाम था जबाला। उसे यौवन वयस में एक पुत्र हुआ जिसका नाम सत्यकाम था। यथासमय शिक्षा प्राप्त करने के लिए जब वह गुरुकुल गया तो महर्षि गौतम ने उसका गोत्र पूछा। वह अपनी माँ से अपना गोत्र जानना चाहा। इस पर उसकी माँ ने कहा मेरा नाम जबाला है और तुम्हारा नाम सत्यकाम है। अतः, तुम गुरु से कहना कि मैं सत्काम जाबाल हूँ। जाओ। गुरु के पास आकर सत्यकाम ने अपनी माँ के कथनानुसार अपने को सत्यकाम जाबाल बतलाया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि माँ को पिता का नाम स्मरण नहीं है। मैं जबाला का पुत्र हूँ, अतः मेरा गोत्रनाम जाबाल है। महर्षि गौतम ने सारी बातें समझते हुए भी कहा कि वत्स ! ब्राह्मण ही ऐसा सत्यवादी हो सकता है। जाओ ! समिधा ले आओ। मैं तुम्हें उपनीत करूँगा। उपनयनसंस्कार के अनन्तर गुरु ने सत्यकाम को चार सौ कृशकाय गायें दी और कहा कि इन्हें लेकर जाओ। गोचारण करते-करते जब इनकी संख्या एक हजार हो जाय तब उनके साथ गुरुकुल वापस आ जाना। जंगल में गोचारण करते हुए जब कालक्रम से उसके पास गायों की संख्या एक हजार हो गयी तब एक दिन उस गोयूथ में विद्यमान वृषभ ने सत्यकाम से कहा कि वत्स ! अब हमारी संख्या एक हजार हो गयी है। अतः अब हमें गुरुकुल वापस ले चलो। मैं तुम्हें ब्रह्मबोध के एक चरण की शिक्षा प्रदान करता हूँ। सत्यकाम उनके साथ गुरुकुल चल पड़ा। मार्ग में अध्ववेद से क्लान्त होकर जब-जब वह विश्राम किया करता था तब तब क्रमशः तीन स्थानों पर अग्नि, हंस और एक अन्य जलचर पक्षी ने उसे ब्रह्मबोध के अवशिष्ट तीन चरणों का उपदेश दिया। इस प्रकार, पूर्ण ब्रह्मज्ञान की दीप्ति से विभास्वर होकर सत्यकाम जब एक हजार गायों के साथ गुरुकुल वापस आया तो गुरु ने उससे पूछा कि वत्स ! तुम ब्रह्मज्ञान से दीप्त दिखलायी देते हो। कहो! किसने तुम्हें ब्रह्म का उपदेश प्रदान किया है ? इस पर सत्यकाम ने सारा वृत्तान्त कहकर उनसे निवेदन किया कि गुरुमुख से अधिगत विद्या ही फलवती होती है। अतः आप मुझे ब्रह्मविद्या का उपदेश दीजिए। सत्यकाम के विनयपूर्ण अनुरोध से महर्षि गौतम ने उसे पुनः साङ्गोपाङ्ग ब्रह्मविद्या का उपदेश प्रदान किया। _ इस आख्यान में तत्कालीन सामाजिक स्थिति के परिपार्श्व में दासीवृत्ति के द्वारा जीवन-यापन करने वाली जबाला की आत्मवृत्त-विषयक स्पष्टोक्ति, ऋजु-स्वभाव एवं १६२ गद्य-खण्ड निश्छलता का परिचय प्राप्त होता है। माता के कथानानुसार निस्संकोच एवं अकुण्ठ भाव से अपने मातृमूलक गोत्र का उल्लेख करने वाले सत्यकाम के चरित्र में सत्यवादिता को हम आश्चर्यजनक रूप में प्रतिष्ठित पाते हैं। गो-सहस्र के साथ गुरुकुल लौटने के क्रम में सत्यकाम को वृषभ, अग्नि, हंस एवं एक जलचर पक्षी के द्वारा रहस्यभूत ब्रह्मज्ञान की देशना के वृत्तान्त में प्राणि-पात्रप्रधान कथाबन्ध का परवर्ती स्वरूप उन्मेषोन्मुख उपलब्ध होता है, जो अनिर्धान्त भाव से इस तथ्य की ओर इंगित करता है कि तत्कालीन लोकमानस में पशु-पक्षी एवं अचेतन प्राकृतिक तत्त्व द्वारा मनुष्य की वाणी का व्यवहार किया जाना सन्देहातीत रूप में स्वीकृत हो चुका था। परन्तु, परवर्ती तर्कचेतना-वशम्वद भाष्यकारों ने इस आख्यान में चर्चित पात्रों पर देवतात्व का अध्यारोप कर दिया है। तदनुसार, वृषभ प्रभृति क्रमशः वायु, आदित्य एवं प्राणशक्ति के प्रतिरूप के रूप में व्याख्यात हुए हैं।

(३) जानश्रुति पौत्रायण का आख्यान

जानश्रुति एक शूद्रकुलोत्पन्न राजा था जिसकी ख्याति प्रचुर अन्नदान के फलस्वरूप असाधारण दाता नृपति के रूप में फैल चुकी थी। एक समय रात्रिकाल में आकाशचारी हंसों में से एक ने कहा कि हे भल्लाक्ष! देखो तो सही. पौत्रायण की ख्याति का प्रकाश धुलोक की भाँति सर्वत्र प्रसृत्वर हो उठा है। कहीं उसका स्पर्श पाकर तुम भस्म न हो जाना। इस पर दूसरे हंस ने कहा कि ऐसे सम्मानगर्भित वचन का अधिकारी तो एकमात्र रैक्व ही है जिसके सदाचरण के अन्तर्गत समग्र संसार का सदाचरण समाहित है। अतएव, मेरी दृष्टि में तो वही महाप्रज्ञ एकमात्र प्रशंसनीय है। हंस युगल के इस संवाद को सुनकर राजा जानश्रुति को बड़ा ही कौतूहल हुआ और वह रैक्व के दर्शन-हेतु प्रस्थान करने के पूर्व सारथि से उसका पता लगाने को कहा। पर्याप्त अन्वेषण के बाद सारथि ने रैक्व को एक जंगल के निभृत-प्रदेश में गाड़ी के नीचे अपना शरीर खुजलाते हुए देखा और राजा को उसकी सूचना दी। तत्पश्चातु, प्रचुर उपहार लेकर राजा जानश्रुति रैक्व के पास गये और उनसे दिव्य उपदेश प्रदान करने की प्रार्थना की। पहली बार तो रैक्व ने उनकी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी परन्तु दूसरी बार उपहार-सामग्री के साथ उनके आने पर रैक्व ने ब्रह्मज्ञान का उपदेश देकर उनको कृतार्थ किया।

  • इस आख्यान में उपलब्ध हंस-युगल का संवाद प्राचीन लोककथा के प्रचलन का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इस आख्यान से यह भी विदित होता है कि एक शूद्र राजा भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहा करता था तथा गोयूथ, धन, ग्राम एवं कन्याओं को दक्षिणा में देकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता था। ज्ञान के अधिकारी होने में जातिजनित बाधा नहीं थी। साथ ही, एक मूलकथा के अन्तर्गत कथान्तर के सन्निवेश की शैली का भी प्राचीनतम रूप यहाँ देखा जा सकता है। इसकी मूलकथा तो हंस-युगल-संवाद है जिसके अन्तर्गत रैक्व की एक दूसरी कथा का गुम्फन किया गया है। मञ्जूषागत-मञ्जूषान्तरन्याय के आधार पर रचित कथा के रूप में इस कथा का स्थान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। संस्कृत कथा-साहित्य १६३

(४) यावल्क्य और मैत्रेयी का आख्यान

महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं मैत्रेयी और कात्यायनी। इन दोनों में मैत्रेयी तो ब्रह्मवादिनी थीं और कात्यायनी स्त्रीसुलभ सांसारिक बुद्धि रखती थीं। प्रव्रज्या ग्रहण कर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के हेतु कृतनिश्चय होकर महर्षि यागवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा कि आओ, मैं तुम दोनों के बीच अपनी सम्पत्ति का बँटवारा कर दूँ। इस पर मैत्रेयी ने उनसे पूछा कि धन-धान्य से परिपूर्ण इस सारी पृथिवी की मैं यदि स्वामिनी हो जाऊँ तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी अथवा नहीं। इसके उत्तर में महर्षि ने दृढता के साथ स्पष्ट शब्दों में कहा कि नहीं-नहीं। धन से अमरत्व ॥ है। धन की बदौलत तो केवल सुख-सुविधा से परिपूर्ण धनी लोगों के समान जीवन बिताया जा सकता है। महर्षि का उत्तर सुनकर मैत्रेयी ने कहा कि तब उस धन को लेकर मैं क्या करूँगी जिससे मैं अमरत्व की प्राप्ति नहीं कर पाऊँगी? है स्वामी! आप जिस आत्मतत्त्व को जानते हैं उसी का उपदेश मुझे प्रदान कीजिए। इस पर महर्षि याज्ञवल्क्य ने उससे कहा कि तू सदा ही मेरी बड़ी प्यारी रही है। आज मेरे प्रिय विषय के सम्बन्ध में प्रश्न कर तू और भी अधिक प्रिय हो गयी है। आओ, मैं तुम्हें मोक्षमार्गस्वरूप आत्मतत्त्व का उपदेश दूंगा। ध्यान से सुनो। पति की कामना के लिए पत्नी को पति प्यारा नहीं होता है परन्तु अपनी कामना के लिए पति प्यारा होता है। पत्नी की कामना के लिए पत्नी पति को प्यारी नहीं होती है किन्तु अपनी कामना के लिए पत्नी प्यारी होती है। इसी प्रकार पुत्र, पशु, धन, लोक, देवता प्रभृति भी अपनी कामना-पूर्ति के साधन होने के कारण प्रिय होते हैं। अतः हे मैत्रेयि! यह परम प्रिय आत्मतत्त्व श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन के योग्य है। इस आत्मतत्त्व के श्रवण, मनन, निदिध्यासन एवं ज्ञान से यह सारा विश्व विदित हो जाता है। ब्रह्म, क्षत्र, लोक, वेद एवं प्राणिसमुदाय अपना आत्मस्वरूप ही है। इस आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार गीली लकड़ी को आग में डालने पर उससे धुआं निकलता है उसी प्रकार इस आत्मा से ही निकले हुए हैं सारे वेद, इतिहास, पुराण, विद्याएँ, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, भाष्य, इहलोक और परलोक। सारी सृष्टि इसी आत्मा का निश्वास है। जिस प्रकार सैन्धव लवण के पानी में घुल जाने पर उसमें लवण रस सर्वात्मना, घनीभूत हो जाता है उसी प्रकार इस आत्मा में प्रज्ञान घनीभूत है। यह आत्मा अविनाशी और अनुच्छित्तिधर्मा है। हे मैत्रेयि! जहाँ द्वैत-भावना रहती है वहाँ एक दूसरे को देखता है, कहता है और सुनता है, परन्तु जहाँ द्वैत-भावना के अभाव में किस साधन से किस को देखे, किससे बात करे और किसे सुने। जो स्वयं ज्ञाता है उसे भला किस साधन से कोई जान सकता है। हे मैत्रेयि, यही अमृत-तत्त्व का उपदेश है। और, इतना कहकर, महर्षि याज्ञवल्क्य गृहत्यागी हो गये। __ बृहदारण्यक उपनिषद् के इस दम्पति-सम्वादरूप आख्यान में ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी के प्रश्न के उत्तर के अन्तर्गत महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रस्तुत अध्यात्मविषयक विवरण समस्त १६४ गद्य-खण्ड ALV उपनिषत्-साहित्य का एक देदीप्यमान रत्न है। यहाँ विविध उपमाओं की सहायता से आत्मतत्त्व का शरीरव्यतिरिक्त रूप में परिचय प्रस्तुत किया गया है। 5 वैदिक वाङ्मय में विद्यमान कतिपय आख्यानों के ऊपर स्थालीपुलाकन्याय से पूर्ववर्ती सन्दर्भ में दृष्टिपात करनेपर, उनके क्रमिक विकास का परिचय निम्नलिखित रूप में प्राप्त होता है। तदनुसार, १. शुनःशेप आख्यान, कक्षीवान् स्वनय का आख्यान, अपाला की स्तुति, वसिष्ठ द्वारा प्रयुक्त श्वप्रस्वापन सूक्त प्रभृति ऐसे उदाहरण हैं जिनमें छान्दस युग के परिवेश में चिरप्रचलित लोककथाओं के निदर्शन प्राप्त होते हैं। २. पुरूरवा-उर्वशी संवाद, इन्द्र-इन्द्राणी संवाद, वसिष्ठ-लोपामुद्रा संवाद, भावयव्य-रोमशा संवाद, श्यावाश्व के आख्यान में कामतत्त्व एवं प्रेमभावना के चिरन्तन बीज उपलब्ध होते हैं। परवर्ती संस्कृत साहित्य के अन्तर्गत इन्हीं के आधार पर श्रृङ्गार प्रधान कथाओं का पल्लवन हुआ है। ३. आरण्यक परिवेश में वैदिक चेतना के विकसित होने के कारण आर्यों ने प्राणिजगत् का सूक्ष्म निरीक्षण किया था। यही कारण है कि मन्त्रों में दृष्टान्त एवं उपमा की वाग्भङ्गिमा के अन्तर्गत उपमान के रूप में पशुपक्षियों का प्रयोग उपलब्ध होता है। साहित्य के क्षेत्र में मानवेतर प्राणियों के प्रवेश की परम्परा का सूत्रपात यहीं से हुआ है। ४. कतिपय मन्त्रों में प्राणियों का प्रयोग साक्षात् न होकर प्रतीक के रूप में किया गया उपलब्ध होता है। “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया”- इत्यादि चिरपरिचित ऋग्वेदस्थ मन्त्र में वृक्ष एवं दो पक्षियों का उपादान प्रतीक के रूप में हुआ है। यहाँ वृक्ष संसार के लिए, स्वादिष्ट फल सांसारिक भोगों के लिए, उसे खानेवाले पक्षी का जीवात्मा के लिए तथा निराहार रहकर भी दिव्य कान्तिसम्पन्न पक्षी का परमात्मा के लिए प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार ऋग्वेद के मण्डूक सूक्त में मण्डूक का वर्णन वर्षा के प्रतीक के रूप में किया गया है। इस मन्त्र के विनियोग-वाक्य से यह स्पष्ट होता है कि इसका उद्घोष अनावृष्टि के निवारण के लिए किया जाता था। वर्षाऋतु की प्रथम वृष्टिधारा से आप्लावित जलाशयों में टर्र-टर्र की अविराम रट लगानेवाले हर्षोन्मत्त मेढ़कों का जैसा स्वाभाविक एवं जीवन्त वर्णन यहाँ प्राप्त होता है वह ऋग्वेद-संहिता की प्रकृति को देखते हुए सर्वथा विलक्षण एवं कौतूहलजनक है। इस सूक्त के पर्यालोचन से इसके अन्तर्गत विद्यमान प्राणिकथा, लोककथा तथा नीतिकथा के तत्त्वों का सन्धान पाया जाता है।" ५. ब्राह्मण-ग्रन्थों में गद्य का सर्वप्रथम प्रयोग प्राप्त होता है जो कथा के स्वरूप-विकास की दृष्टि से अतीव महत्त्वपूर्ण है। ब्राह्मण-ग्रन्थों के अर्थवाद भाग के अन्तर्गत १६५ संस्कृत कथा-साहित्य विविध आख्यान उपलब्ध होते हैं जिनका वर्गीकरण डॉ. कर्णिक ने निम्नांकित चार वर्गों में किया है : (क) प्रतीकात्मक आख्यान, (ख) ऐतिहासिक एवं लोकप्रिय आख्यान, (ग) दार्शनिक पुरातन कथाएँ, (घ) नीतिमूलक कथाएँ र परवर्ती संस्कृत कथा-साहित्य के अन्तर्गत विकसित नीतिपरक कथाओं का मूलाधार इन्हीं आख्यानों में प्रतिष्ठित है। इस दृष्टि से दार्शनिक पुरातन कथाएँ तथा नीतिमूलक कथाएँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इनके अध्ययन से वेदकालीन चिन्तन धारा में राजनैतिक एवं लौकिक उपादानों के निरन्तर विकासोन्मुख प्ररोह का परिचय प्राप्त होता है। ६. पशुपात्र-प्रधान कथाओं के विकास की दृष्टि से ब्राह्मण-ग्रन्थों का अनल्प महत्त्व है। मानवेतर प्राणियों द्वारा मानवी भाषा के प्रयोग में लाये जाने की कल्पना का साक्षात्कार ब्राह्मण-ग्रन्थों में विशद भाव से होता है। इस कल्पना का परवर्ती रूप छान्दोग्य उपनिषद् के अन्तर्गत उपलब्ध जानश्रुति पौत्रायण के आख्यान में प्रस्तुत हंसयुगलसंवाद तथा शौव उद्गीथ के गान से सम्बद्ध आख्यान में देखा जा सकता है। ७. परवर्ती लौकिक संस्कृत साहित्य के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले गद्य-पद्य मिश्रित चम्पूकाव्य की शैली का आदि रूप ब्राह्मण-ग्रन्थों में उपलब्ध होता है। इस दृष्टि से ऐतरेय ब्राह्मण के हरिश्चन्द्रोपाख्यान का असाधारण महत्त्व है जहाँ इस गद्य-पद्य-मिश्रित शैली का मनोहर निदर्शन प्राप्त होता है। ८. एक कथा के अन्तर्गत अन्य अवान्तर कथा की योजना का विकास ब्राह्मण-ग्रन्थों के आधार पर लौकिक संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में लब्ध-प्रसर हुआ है। उसे मञ्जूषागत मञ्जूषान्तरन्याय से गुम्फित कथाशैली कहा जा सकता है। को इस प्रकार, वैदिक वाङ्मय में निरन्तर वर्धिष्णु आख्यान-साहित्य के अन्तर्गत विभिन्न स्रोतों से विभिन्न प्रकार के उपादानों का विपुल सम्भार समाहित होता रहा, जिसके सुदृढ आधार-बन्ध पर ही लौकिक संस्कृत साहित्य के परिसर में एक से एक मनोहर कथाओं के भव्य स्थापत्य की प्रतिष्ठा परवर्ती काल में सम्भव हो सकी है। सूत, मागध, कुशीलव एवं ऋषियों द्वारा इन चिरन्तन वैदिक आख्यानों का कालक्रम से सङ्कलन, परिवर्द्धन एवं प्रवचन होता रहा था। प्राचीन साहित्य के इस अमूल्य रिक्थ को संजोकर रखनेवाले, ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार, आख्यानविद् कहलाया करते थे। धीरे-धीरे ये आख्यान इतिहास-पुराण की कोटि में अनुप्रविष्ट होकर वैदिक यज्ञों एवं संस्कारों के अवसर पर नियमित रूप से आख्यानविदों द्वारा कीर्तित होते रहे। जिनका आधार लेकर परवर्ती काल में विपुलायतन पौराणिक साहित्य का उद्भव और विकास सम्पन्न हुआ।