०९ संस्कृत गद्य-काव्य की विशेषताएँ

संस्कृत गद्य-काव्यों के कथानक का मूल प्रायः लोक-कथाओं से लिया गया है। लोक-कथाओं की भाँति कथा में उपकथा का सन्निवेश करने का प्रचलन भी गद्य-काव्यों में दीख पड़ता है। किन्तु गद्य-काव्यों की व्यञ्जना-प्रणाली लोक-कथाओं से सर्वथा भिन्न है। इनकी शैली बहुत कुछ पद्य-काव्यों से प्रभावित हुई है। शिष्ट तथा सम्भ्रान्त वर्ग के लिए लिखे जाने के कारण इन गद्य-काव्यों में उत्कृष्ट एवं अलंकृत भाषा का प्रयोग हुआ ही है, साथ ही वर्णन-शैली का भी अत्यधिक परिष्कार हुआ है। दीर्घकाय समास, अनुप्रास, श्लेष, यमक, विरोधाभास, परिसंख्या इत्यादि अलंकारों तथा सूक्ष्म पौराणिक संकेतों का प्रचुरता से प्रयोग किया गया है। प्रकृति का विस्तृत चित्रण तथा नायक-नायिका की शारीरिक और मानसिक दशाओं का अतिरंजित वर्णन भी हुआ है। शृंगाररस ही इन गद्य-काव्यों का प्रधान रस है। लोक-कथाओं के सरल और प्रवाहयुक्त आख्यानों पर कल्पना और पाण्डित्य का गहरा रंग चढ़ाया गया है। कथा-भाग गौण हो गया है और अलंकृत वर्णन-शैली ही प्रधान हो गई है। गद्य-काव्यों के व्यापक प्रभाव के कारण संस्कृत में व्यावहारिक गद्य-शैली का विकास बहुत कम दीख पड़ता है। संस्कृत के गद्य-काव्य इस धारणा के पोषक हैं कि कविता में छन्द अनिवार्य तत्त्व नहीं हैं; छन्दोबद्धता उसका केवल एक बाह्य परिच्छद है। गद्य और पद्य दोनों में समान रूप से कविता की संरचना हो सकती है। यही कारण है कि संस्कृत गद्य-काव्य सहृदयों के हृदय में वास्तविक काव्यानन्द का संचार करते हैं। यदि भाषा-सौष्ठव, वर्णन-नैपुण्य, कल्पना-वैचित्र्य, रसास्वाद, पदलालित्य, श्लेष-चातुर्य और अलंकार-वैभव इन समस्त काव्यात्मक गुणों का एकत्र अवलोकन करना है, तो संस्कृत के गद्य-काव्यों का अनुशीलन अपेक्षित है। ऐसी अलंकृत, उदात्त एवं परिष्कृत गद्य-शैली का विकास स्यात् ही किसी अन्य भाषा के साहित्य में हुआ है।