संस्कृत-वाङ्मय में उपलब्ध आख्यायिकाओं में ‘हर्षचरित’ प्राचीनतम ग्रन्थ है। बहु-आयामी प्रतिभा सम्पन्न बाण ने “गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति” इस युगीन स्थापना को अङ्गीकृत कर इस गद्य-काव्य की संरचना की। प्रस्तुत आख्यायिका आठ उच्छ्वासों में विभक्त है। प्रथम उच्छ्वास का प्रारम्भ श्लोकों से होता है। इनकी संख्या २१ [इक्कीस] है तथा इनमें क्रमशः भगवान् शम्भु तथा उमा की वन्दना के अनन्तर व्यास, वासवदत्ता, भट्टारहरिचद्र, सातवाहन, प्रवरसेन, भास, कालिदास, बृहत्कथा, आढ्यराज प्रभृति भारतीय वाङ्मय में समादृत बाण के पूर्ववर्ती कवियों तथा ग्रन्थों की संस्तुति वर्णित है। यह महाकवि बाण की अद्वितीय देन है, जिसका बाण के पूर्ववर्ती कवियों के द्वारा निर्मित ग्रन्थों में सर्वथा अभाव था। संस्कृत-साहित्य की ऐतिहासिक क्रम-व्यवस्था में इस उल्लेख का बड़ा महत्त्व है। इन उपर्युक्त श्लोकों में बाण ने अपने प्रस्तुत ग्रन्थ की रचना-शैली तथा उसके प्रतिपाद्य विषय का भी निर्देश कर दिया। इसके साथ ही साथ उन कवियों तथा ग्रन्थों के प्रति अपनी कृतज्ञता का ज्ञापन भी कर दिया, जिनकी प्रेरणा से प्रेरित होकर इस महान् साहित्यिक कार्य को उन्होंने अपने हाथों में लिया था। यह निर्देश सर्वथा युक्तिसंगत प्रतीत होता है कि यह परम्परा अत्यन्त आधुनिक विश्व के उच्च स्थानीय कतिपय साहित्यों में दृष्टिगत होती है जिसका बीजारोपण बाण ने उस प्राचीन काल में कर दिया। हर्षचरित का प्रारम्भ पौराणिक शैली के अनुसार होता है। ब्रह्मलोक में इन्द्रादिक देवताओं से घिरे हुए भगवान् ब्रह्मा कमल के आसन पर बैठे हैं और मुनियों की विद्या-गोष्ठियाँ चल रही हैं। विद्या-विवाद उत्पन्न होता है और सरस्वती के उपहास से क्रुद्ध दुर्वासा, सरस्वती को स्वर्गलोक से मर्त्यलोक में अवतरित होने का शाप दे देते हैं। मन्दाकिनी का अनुगमन करती हुई सरस्वती, सावित्री के साथ शोणनदी के तट पर पहुँचती हैं और वहीं च्यवन-ऋषि के पुत्र दधीच के साथ सरस्वती का प्रणय-आकर्षण हो जाता है। सरस्वती सारस्वत नामक पुत्र को जन्म देती हैं, जिसका पालन-पोषण दधीच की भार्गववंशीय भातृजाया अक्षमाला के पुत्र वत्स के साथ सम्पन्न होता है। वत्स से ही एक वंश-परम्परा चली, जिसमें कालान्तर में बाण का जन्म हुआ। प्रथम-उच्छ्वास में वात्स्यायन-वंश के पूर्वजों, बाण का जन्म, उनके माता-पिता की असामयिक मृत्यु, तत्पश्चात् स्वतन्त्र बाण का अपनी समवयस्यक मित्रमंडली के साथ देशान्तर-परिभ्रमण एवं स्वग्राम-प्रत्यावर्त्तन वर्णित है। यहाँ सरस्वती, सावित्री, प्रदोष, मन्दाकिनी, युवक दधीच तथा इनकी परिचारिका मालती एवं बाण के ४४ मित्रों की सूची का वर्णन विस्तृत रूप से किया गया है। गद्य-काव्य ३७ द्वितीय उच्छ्वास का प्रारम्भ बाण के बान्धव-जनों के गृहों के वर्णन से होता है। तदनन्तर भीषणतम निदाघकाल तथा दावाग्नि का वर्णन है। इसी ग्रीष्म ऋतु में जब बाण अपने ग्राम में हैं, तभी सम्राट हर्ष के भाई कृष्ण का लेखहारक मेखलक उनके पास हर्ष के समीप आने का निमन्त्रण लेकर आता है। बाण अपने प्रीतिकूट नामक ग्राम से निकलकर तीन पड़ावों के बाद अजिरवती नदी के तट पर स्थित मणितार ग्राम में हर्ष के सकन्धवार में पहुँच जाते हैं। वहाँ महाप्रतीहार दौवारिक के साहाय्य से बाण राजकीय मदुरा, गजशाला एवं राजकीय प्रमुख हाथी दर्पशात को देखते हैं जिसका वर्णन बाण ने विस्तृत रूप से किया है। दरबार में प्रवेश पा सम्राट हर्ष से उनका साक्षात्कार होता है तथा थोड़े ही दिनों में सम्राट् के अत्यन्त प्रसन्न होने पर बाण राजकीय प्रसाद-जनित सम्मान, प्रेम एवं प्रतिष्ठा की पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं। तृतीय उच्छ्वास शरद्-ऋतु के वर्णन से प्रारम्भ होता है। उसी समय बाण हर्ष से सम्मानित होकर घर लौट आते हैं। अपने चचेरे भाइयों के अनुरोध से बाण हर्ष का चरित-वर्णन प्रारम्भ करते हैं, जिसमें सर्वप्रथम श्रीकण्ठ-जनपद, उसकी राजधानी स्थाण्वीश्वर तथा वर्धन-वंश के प्रवर्तक पुष्पभूति की कथा वर्णित है। परमशिवभक्त पुष्पभूति की भेंट तान्त्रिक साधक-विद्याधरत्व की सिद्धि में संलग्न भैरवाचार्य से होती है। भैरवाचार्य को अभीष्ट की प्राप्ति हो जाती है और राजा भगवती लक्ष्मी के दर्शन-वरदान से एक महान् वंश का कर्ता बन जाता है। चतुर्थ उच्छ्वास में पुष्पभूति से प्रवर्तित वर्धन-राजवंश में कालक्रमानुसार उत्पन्न राजाधिराज प्रभाकरवर्धन के वैभव-प्रभाव का वर्णन है। इन्होंने ही स्थाण्वीश्वर के छोटे राज्य को बृहद्रूप प्रदान कर महाराजाधिराज की पदवी धारण की थी। इनकी राजमहिषी का नाम यशोवती था। प्रभाकरवर्धन भगवान् आदित्य के उपासक थे, जिनकी कृपा से राज्यवर्धन तथा हर्षवर्धन उनके दो पुत्ररत्न होते हैं। युवावस्था में पहुंचने पर मालवराजकुमार कुमारगुप्त और माधवगुप्त दोनों राजकुमारों के सहयोगी अनुचर नियुक्त किए जाते हैं। इन दो पुत्रों के अतिरिक्त रानी यशोवती, राज्यश्री पुत्री को जन्म देती हैं जिसका विवाह समयानुसार मौखरि-नरेश अवन्तिवर्मा के ज्येष्ठपुत्र ग्रहवर्मा के साथ सम्पन्न होता है। बाण ने इस उच्छ्वास में राजकुमारों के जन्मोत्सव तथा राज्यश्री के विवाह-समारोह का बड़ा विशद तथा आकर्षक वर्णन प्रस्तुत किया है। इनमें तत्कालीन सामाजिक रीतियों-प्रथाओं के वर्णन हैं, जिनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विशेष महत्त्व है। पंचम उच्छ्वास दुःख और शोक वर्णन से भरा हुआ है। इसी. से इसका नामकरण महाराजमरणवर्णन है। राज्यवर्धन कवचधारण की अवस्था में पहुँचते हैं और महाराज प्रभाकरवर्धन उन्हें आक्रामक हूणों से युद्ध करने के लिए अनुरक्त महासामन्तों की देख-रेख में सैन्यबल के साथ उत्तरापथ की ओर भेज देते हैं। हर्ष जिनकी अवस्था उस समय १४-१५ वर्ष की है अपने अग्रज का अनुसरण करते हैं और हिमालय की उपत्यका में कतिपय पड़ावों तक पहुँच कर आखेट में लग जाते हैं। गद्य-खण्ड __इसी बीच महाराज मरणान्तक विषम ज्वर से आक्रान्त हो जाते हैं तथा हर्षवर्धन, लेखहारक कुरंगक से पिता की रुग्णावस्था का सम्वाद पा राजधानी लौट आते हैं। महाराज का ज्वर उत्तरोत्तर भीषणरूप धारण करने लगता है और रानी यशोवती सरस्वती के तट पर प्रियजनों तथा आत्मज हर्ष की उपस्थिति में सती हो जाती हैं। प्रभाकरवर्धन की मृत्यु से राजधानी स्थाण्वीश्वर दुःसह विषाद में डूब जाती है। अशौच के दिनों के बीतने पर बड़ी प्रतीक्षा के उपरान्त राज्यवर्धन उत्तरापथ से लौटते हैं। राज्यश्री का परिचायक सम्वादक मालवराज द्वारा ग्रहवर्मा के मारे जाने तथा भर्तृदारिका राज्यश्री के कान्यकुब्ज के कारागार में बन्द कर दिए जाने के समाचार का निवेदन करता है। राज्यवर्धन मालवनरेश से युद्ध हेतु निकल पड़ता है। कतिपय दिनों के उपरान्त दूत कुन्तक राजधानी में आकर निवेदन करता है कि मालवसैन्य तो पराजित हो गई, पर गौड़ाधिपति ने कपटपूर्ण छद्म से राज्यवर्धन को मार डाला। यह सुनते ही हर्षवर्धन की, प्रतिशोध की क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठती है और वे सेनापति सिंहनाद के परामर्श से पृथ्वी को गौड़ाधिपति से रहित करने की उग्र प्रतिज्ञा कर लेते हैं। महासन्धिविग्रहाधिप अवन्ति को आज्ञा प्रदान कर हर्ष विजय-प्रयाण की तैयारी में लग जाते हैं। सप्तम उच्छ्वास का प्रारम्भ हर्ष के सैन्यबल के दिग्विजय-प्रयाण की तैयारी के विस्तृत वर्णन से होता है। ठीक उसी समय प्राग्ज्योतिषेश्वर भास्करवर्मा का दूत हंसवेग भेंट तथा मैत्री का सन्देश लेकर पहुंचते हैं। सेना विन्ध्यप्रदेश में प्रवेश करती है। मालवराज जीत लिया जाता है। उसकी सेना तथा कोषागार दोनों हर्ष के अधीन हो जाते हैं। अष्टम उच्छ्वास में शबर युवक निर्धात के साहाय्य से हर्ष अपनी बहन राज्यश्री को खोजते हुए बौद्ध-भिक्षुक दिवाकरमित्र के आश्रम में पहुँचते हैं। वहाँ पता चलता है कि एक विपन्न नारी अग्नि में प्रवेश करने के लिए उद्यत है। हर्ष अपनी बहन को बचा लेता है। दिवाकरमित्र के उपदेश से राज्यश्री अपने शेष जीवन को अपने भाई हर्ष के साथ व्यतीत करने के लिए तैयार हो जाती है। हर्ष अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर राज्यश्री के साथ गेरुआ वस्त्र धारण कर लेंगे, ऐसी सूचना मिलती है। यहीं हर्षचरित का प्रतिपाद्य समाप्त हो जाता है। हर्षचरित इतिहास प्रख्यात वर्धन वंशीय सम्राट् परमेश्वर हर्षवर्धन के जीवन-वृत्त पर आधृत साहित्यिक अलंकृत शैली में निबद्ध वर्णनप्रधान गद्यात्मक प्रबन्ध-काव्य है। इस गद्य-काव्य की उल्लेखनीय विशेषता है कि यह संस्कृत साहित्य का सर्वप्रथम ग्रन्थ है, जिसमें ग्रन्थकर्ता बाण ने अपने पूर्ववर्ती कवियों तथा ग्रन्थों का प्रशस्तिपरक निर्देश किया है। परम्परा से आगत सरणी का विरोध करते हुए बाण ने अपनी दोनों गद्यात्मक कृतियों में अपना तथा अपने वंश का भी परिचय दिया है। बाण का यह श्लाघनीय प्रयास था जिसका अनुकरण अनेक संस्कृत साहित्य के कवियों ने अपनी रचनाओं में किया है। गद्य-काव्य । बाण में काव्यगत प्रतिमा अद्वितीय थी। अतः उन्होंने एक क्रान्तिजनक कदम उठाया। बाण के पूर्व संस्कृत वाङ्मय में काव्य के अन्तर्गत छन्दोबद्ध (पद्यात्मक) रचना की गणना होती है। संस्कृत में ही नहीं अपितु विश्व-साहित्य में आज भी पद्यात्मक शैली में निबद्ध रचना ही काव्य में परिगणित होती है और उसके रचयिता कवि संज्ञा से अभिहित किए जाते हैं। बाण के सम्मुख यह युगीन समस्या थी कि काव्यगत रस,ध्वनि, गुण-अलंकार प्रभृति के यथास्थान सन्निवेश से यदि छन्दोबद्ध रचना को काव्य की संज्ञा प्रदान की जा सकती है, तो उन्हीं काव्यगत रसादि को गद्य-संरचना में स्थान प्रदान किया जाय तो क्या गद्य की गणना काव्य के अन्तर्गत नहीं की जा सकती है। बाण ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से अपनी दोनों गद्यात्मक कृतियों में ऐसे नैपुण्य से काव्य-गुणों को स्थान प्रदान किया कि संस्कृत वाङ्मय के आलंकारिकों ने यह उद्घोषणापूर्वक स्वीकार कर लिया कि गद्य ही काव्य की कसौटी है- “गद्यं कवीनां निकष वदन्ति” पद्य नहीं। बाण के उपरान्त संस्कृत साहित्य में गद्यात्मक कृतियों तथा उनके निर्माता काव्य तथा कवि के रूप में गिने जाने लगे। यह ‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ की ही विशिष्टता है जिनके माध्यम से बाण ने संस्कृत-साहित्य में अभूतपूर्व परिवर्तन लाया। बाण ने ‘हर्षचरित’ को ऐसी अलंकृत शैली में लिपिबद्ध किया कि यह उनकी संरचना अपनी ‘काव्यविधा’ का निदर्शन बन गई। इस काव्यात्मक आख्यायिका को आधार मानकर आलंकारिकों ने अपने लक्षणग्रन्थों में आख्यायिका के लक्षणों को निरूपित किया यह निर्विवाद सत्य है। ‘हर्षचरित का प्रधान प्रतिपाद्य रस, ‘वीर’ है तथा करुण रस अंगीरस का अंग है जिसकी अभिव्यञ्जना बड़े सौन्दर्य के साथ सती वेश में यशोवती के वर्णन तथा उसके अन्तिम विलाप एवं राज्यवर्धन के शोक-वर्णन में हुआ है। श्रीहर्ष का दिग्विजय-प्रयाण-वर्णन वीररस के कवि की ज्वलन्त स्वानुभूति की अभिव्यक्ति है। प्रथम उच्छ्वास का सरस्वती, मन्दाकिनी, युवक दधीच, द्वितीय उच्छ्वास का निदाध तथा प्रचण्ड भीषण दावाग्नि एवं राजकीय गजशाला में हर्ष के मुख्य हाथी दर्पशात, तृतीय उच्छ्वास का शरद्-वर्णन, चतुर्थ का राज्यश्री का विवाहोत्सव, सप्तम का सायंकाल वनग्राम-वर्णन अपने उल्लेखनीय वैशिष्ट्य के लिए प्रसिद्ध हैं। अपनी काव्यात्मक गरिमा के अतिरिक्त ‘हर्षचरित’ का ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण से कम महत्त्व नहीं है। ‘हर्षचरित’ से अवगत होता है कि पुष्पभूति, हर्ष के सुदूर के पूर्वज थे। पुष्पभूति और हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन के बीच इस वंश के अनेक राजाओं ने शासन किया, जिसका उल्लेख हर्ष के मधुबन तथा वाँसखेरा के ताम्रपत्रों में हुआ है पर ‘हर्षचरित’ के अनुसार पुष्पभूति के अनन्तर प्रभाकरवर्धन का वर्णन मिलता है। तत्कालीन बौद्धचीनी यात्री ह्वेनसाँग ने प्रभाकरवर्धन से अपना यात्रा-विवरण-वर्णन प्रारम्भ किया है और उसने लिखा है कि राज्यवर्धन, हर्ष का अग्रज था। बाण ने उल्लेख किया है कि हर्ष के पूर्वजों की राजधानी स्थाण्वीश्वर (वर्तमान थानेश्वर) में थी, जब कि हेनसाँग का कथन है कि हर्ष की राजधानी ४० गद्य-खण्ड कान्यकुब्ज थी। यद्यपि विद्वान् चीनी यात्री के विवरण से अवगत होता है कि हर्ष वैश्य जाति के थे, तथापि बाण ने ऐसा कुछ भी संकेत नहीं दिया है कि हर्ष का परिवार क्षत्रिय नहीं था। हर्षचरित में उल्लिखित है कि हर्ष की बहन राज्यश्री का विवाह प्राचीन क्षत्रिय-कुल मौखरि के अवतंस ग्रहवर्मा से हुआ था। यद्यपि बाण ने नहीं लिखा है कि हर्ष की माता किस कुल की थी, तथापि हर्षचरित में निर्देश है कि यशोवती के पिता वीरपुरुष थे और उसके माता-पिता उसके सती होने के समय जीवित थे।’ हर्षचरित के अनुसार प्रभाकरवर्धन ने सफलतापूर्वक हूणों, सिन्धु, गुजरात, गान्धार, लाट (वर्तमान भड़ौच) और मालवनरेशों के विरुद्ध युद्ध किया था। हर्ष के अभिलेखों से भी अवगत होता है कि प्रभाकरवर्धन महाराज तथा महाराजाधिराज की उपाधि से विभूषित हैं। __सिंहासनारोहण के समय राज्यवर्धन अत्यन्त युवक थे और उनकी अवस्था लगभग १६ अथवा २० वर्ष की थी। हर्षचरित से पता चलता है कि राजकुमार राज्यर्धन तथा हर्ष के समवयस्क साथी दोनों गुप्त-कुमारों में ज्येष्ठ कुमारगुप्त लगभग १८ वर्ष का था। अतः राज्यवर्धन भी लगभग उसी अवस्था का था। हूणों को परास्त कर जब राज्यवर्धन लौटते हैं, तब उनके कपोलों पर कुछ बाल निकले हैं। हर्ष अपने अग्रज से चार वर्ष छोटा था और राज्यश्री अपने ज्येष्ठ भ्राता से लगभग छः वर्ष छोटी थी। अतः हर्ष और राज्यश्री क्रमशः १६ और १४ वर्ष के थे जब उनके पिता दिवंगत हुए। इसका समर्थन हर्षचरित के कतिपय उद्धरणों से होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभाकरवर्धन की मृत्यु ६०५ ई. में हुई। अतः हर्ष का जन्म ५६० ई. तथा उनका राज्यारोहण ६०६ ई. में हुआ था। श्री सी.वी. वैद्य ने भी ज्योतिष शास्त्रीय तथ्यों के आधार पर हर्ष का जन्मकाल ४ जून ५६० ई. निर्धारित किया है। हर्ष के ऐतिहासिक इतिवृत्त में कतिपय विवादास्पद स्थल हैं-जैसे राज्यश्री के पति ग्रहवर्मा का घातक कौन था ? राज्यवर्धन का वध करने वाला कौन गौडाधिपति था ? इन प्रश्नों का समाधान करने का डॉ. होर्नले, फ्लीट आदि ने प्रयास किया है, तथापि हर्षचरित में निर्णायक कुछ तथ्य विद्यमान हैं। बाण ने उल्लेख किया है कि अग्रज के निधन के उपरान्त मन्त्री भण्डी ने सचिवों से हर्ष को राजा के रूप में चयन करने का अनुरोध किया है और सभी ने उसके परामर्श को स्वीकार कर लिया, लेकिन हेनसाँग ने हर्ष के सिंहासनारोहण को रहस्यात्मक वातावरण से आवृत्त कर रखा है। राज्याभिषेक के अनन्तर हर्ष लगभग ६ वर्षों तक दिग्विजय-यात्रा करता है तथा हिमालय से लेकर नर्मदा तक एवं बंगाल की खाड़ी से लेकर सिन्धप्रदेश तक १. द्रष्टव्य ‘वीरजा वीरजाया’, अम्ब तात न पश्यतं पापां परलोकप्रस्थितां माम्’ २. द्रष्टव्यः ‘यदि बाल इति नितरां तर्हि न परित्याज्योऽस्मि पृष्ठ ४२ ‘बाल एवाखण्डभूमिमारूढ़:-१" पृष्ठ ५६ ‘इयं नः स्वसा बाला न बहुदुःखकरवेदिता च’ पृष्ठ ८५ ३. V.A. Smith: Early History of India पृष्ठ ३१२ गद्य-काव्य समस्त उत्तरी भारत में एकछत्र राज्य स्थापित कर लेता है। हर्षचरित के तृतीय उच्छ्वास में उल्लेख है कि पुरुषोत्तम हर्ष ने सिन्धुराज का उन्मूलन कर जिनकी राज्यलक्ष्मी को आत्मसात् कर लिया है तथा दुर्गम तुषार शैलभूमि से कर ग्रहण किया। ऐसा संकेत उपलब्ध होता है कि अपने बाल्यकाल के साथी ज्येष्ठ मालवराजकुमार कुमारगुप्त को हर्ष ने सिंहासन पर बैठाया था। कनिष्ठ मालवराजपुत्र माधवगुप्त हर्ष का अत्यन्त प्रियपात्र था। मालव परिवार के अतिरिक्त हर्ष का प्रगाढ़ सम्बन्ध तथा मित्रता मौखरि राजवंश से थी जहाँ राज्यश्री का विवाह हुआ था। मौखरिनरेशों की राजधानी कान्यकुब्ज थी। बाण ने ‘कादम्बरी’ के प्रारम्भिक श्लोकों में उल्लेख किया है कि मौखरि बड़ा प्राचीन तथा प्रतिष्ठित राजपरिवार था। इसके वंशज भगवान् शिव के भक्त थे’ हर्षचरित से पता चलता है कि कुमार उपनाम भास्करवर्मा प्राग्ज्योतिष (आधुनिक असम) के राजा थे और उन्होंने हर्ष के दिग्विजय-प्रयाण के अवसर पर भेंट तथा मैत्री का संदेश भेजा था। हेनसाँग ने भी इसका समर्थन किया है और यह भी लिखा है कि कन्नौज के प्रति गंगा के दक्षिण तट पर प्रस्थान करते हुए हर्ष का कुमारराज ने अनुगमन किया था। __ हर्षचरित के द्वारा ज्ञात इस उपर्युक्त हर्ष के जीवनवृत्त का तत्कालीन अभिलेखों, तामपत्रों, सिक्कों एवं अन्य ऐतिहासिक साधनों से उपलब्ध इतिवृत्त से अनमेल तथा विसंगति नहीं है। इसके अतिरिक्त यद्यपि हर्षचरित के वर्णनों में काव्यात्मक सौन्दर्य है, तथापि यथार्थ की अवहेलना नहीं हुई है। राजकीय जीवन-व्यवहार और तत्कालीन धार्मिक स्थितियों का चित्रण बड़ा वास्तविक तथा सत्य पर आधारित है। विशेष रूप से सांस्कृतिक वर्णन के लिए हर्षचरित का महत्त्व अद्वितीय है। प्रामाणिक स्रोतों से पता चलता है कि हर्ष के समय ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन-ये तीन धर्म भारत में प्रचलित थे। इन तीनों में जैन धर्म के दिगम्बर सम्प्रदाय का प्रचलन उत्तरी भारत में नहीं था। नग्न जैन भिक्षु का दर्शन बड़ा अशुभ समझा जाता था। शेष दोनों ब्राह्मण तथा बौद्ध धर्म अपने पूर्ण वैभव के साथ प्रचलित थे। धार्मिक कट्टरता का युग न था अपितु दोनों में पारस्परिक सहिष्णुता थी। एक ब्राह्मण धर्मावलम्बी, बौद्ध धर्म को घृणा की दृष्टि से नहीं देखता था। इसके विपरीत बाणभट्ट प्रसंगानुसार बौद्ध धर्म की प्रत्येक वस्तु का स्पष्टता तथा सहिष्णुता के साथ वर्णन करते हैं। जनता बिना किसी भय के एक धर्म का परित्याग कर दूसरे को अंगीकार कर लेती थी। प्रारम्भ में दिवाकरमित्र यजुर्वेदीय मैत्रायणीय शाखा के छात्र थे और युवावस्था में ही बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए। उनके बौद्ध धर्म के प्रति पक्षपात के होते हुए भी शैव, भागवत, जैन, पौराणिक, मीमांसक प्रभृति विविध धर्मावलम्बी तथा सम्प्रदायवादी उनका अनुगमन १. द्रष्टव्यः-“नमामि भर्वोश्चरणाम्बुजद्वयं सशेखरैौखरिभिः कृतार्चनम्” २. द्रष्टव्यः-“अभिमुखमाजगाम शिखिपिच्छलाञ्छनो नग्नाटकः” हर्ष. पृ. २० ३. द्रष्टव्यः हर्षचरित द्वितीय उच्छ्वास पृष्ठ ७८ ४२ गद्य-खण्ड करते थे। और सभी समन्वित होकर परस्पर विरोधी सिद्धान्तों के भ्रामिक चक्कर में पड़े हुए भी सत्य के अन्वेषण में तत्पर थे। यद्यपि बाण स्वयं एक कट्टर ब्राह्मण लेखक हैं, तथापि राज्यवर्धन के बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षण की टीका-टिप्पणी नहीं करते। राज्यश्री की सहेलियाँ विपत्ति में भगवान् बुद्ध की रक्षाहेतु स्तुति करती हैं। हर्ष कहते हैं कि अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर मैं अपनी बहन राज्यश्री के साथ बौद्ध कषाय वस्त्र को धारण करूँगा। अपने एक अभिलेख में हर्ष अपने अग्रज राज्यवर्धन को परमसौगत अर्थात् एक उच्चकोटि के बौद्ध धार्मिक कहतें हैं तथा अपने पिता से भी अधिक उनके प्रति आदरभाव व्यक्त करते हैं। अभिलेखों तथा हर्षचरित दोनों से अवगत होता है कि राजकीय परिवार में किसी देवता-विशेष की आराधना अथवा धर्मविशेष के प्रति मानने का बन्धन नहीं था। हर्ष के तीन पूर्वज सूर्य के परमभक्त थे। बाण ने उल्लेख किया है कि वर्धनवंश के सुदूर पूर्वज पुष्पभूति भगवान् शिव के उपासक थे।’ बाण ने ‘हर्षचरित’ में वर्णन किया है कि प्रभाकरवर्धन प्रतिदिन रक्तपुष्पों से भगवान् सूर्य की पूजा करते थे। हर्ष अपने को शिव का परम उपासक-परममाहेश्वर कहता है। सोनपत की हर्ष की मुहर में नान्दी की आकृति अंकित है। बाण सूचित करते हैं कि अपने दिग्विजय-प्रयाण के पूर्व हर्ष शिव की आराधना करते हैं। इस उपर्युक्त विवरण से स्पष्टतः प्रकट हो जाता है कि हर्ष-कालीन युग में ब्राह्मण तथा बौद्ध धर्म में और विविध देवताओं के उपासकों के बीच कोई मानसिक कटुता का भाव नहीं था, प्रत्युत उदार स्वतन्त्र मानसिकता थी। प्रभाकरवर्धन ने कई विशाल यज्ञों का सम्पादन किया था। हर्षचरित के द्वितीय उच्छ्वास के प्रारम्भ में बाण ने अपने ग्रामीण बन्धुजनों के गृहों के वर्णन-प्रसंग में तत्कालीन सामाजिक विद्यमान अनेक सूचनाएँ दी हैं। हर्ष से सम्मानित होकर अपने ग्राम प्रीतिकूट में लौटने पर बाण अपने निकटतम कौटम्बिक जनों से पूछते हैं-“यज्ञों के सम्पादन, वेदों का अभ्यास प्रतिदिन अविच्छिन्न गति से चल रहा है न ? याज्ञिक विद्या तथा कर्मों के प्रति वही पूर्वभाव तो है न ? सादर व्याकरण-शास्त्रीय व्याख्यान जम तो रहे हैं न? न्याय-शास्त्र पर विचार-गोष्ठी भी उसी पराने रूप में चल रही हैं न ? मीमांसाशास्त्र में रस तो उसी रूप से मिलता है न ? सुधा-वर्षी काव्यालाप तो चल रहा है न ?” आज ही के समान बाण के समय में भी पौराणिक कथा-वाचन चलता था। उनका मित्र सुदृष्टि वायु-पुराण का वाचन नित्य उनके यहाँ दरवाजे पर करता था। पिता की मृत्यु के उपरान्त पौराणिक, हर्ष को आश्वासन प्रदान कर रहे हैं। ‘कादम्बरी’ से है १. द्रष्टव्यः-“तस्य ….सहजैव ….अन्यदेवताविमुखी…… भगवति….भवे भूयसी भक्तिरभूत् ।” हर्ष. -तृतीय उच्छ्वास गद्य-काव्य ४३ पता चलता है कि महाभारत आज की तरह प्रिय ऐतिहासिक ग्रन्थ था विशेषरूप से नारी-समाज में। हर्षचरित भी महाभारत की लोकप्रियता की चर्चा करता है।’ मरण-शय्या पर पड़े प्रभाकरवर्धन के आरोग्यलाभ हेतु सम्पादित धर्म-प्रधान विधियाँ यद्यपि जादू-टोना के रूप में प्रतीत होती हैं, तथापि उनसे तत्कालीन प्रचलित हिन्दू धार्मिक विश्वासों तथा रीति-रिवाजों का पता चलता है। बाण जब हर्ष के यहाँ प्रथम बार प्रस्थान करते हैं, उस समय उनके द्वारा सम्पादित प्रास्थानिक मांगलिक कृत्यों से ज्ञात होता है कि उस समय समाज में किसी महत्त्वपूर्ण अवसर पर किन-किन धार्मिक आचारों-व्यवहारों का प्रचलन था। युवावस्था में बाण के साथियों की विस्तृत विलक्षण सूची से पता चलता है कि एक कट्टर ब्राह्मण धर्मावलम्बी बिना जाति-पाँति के संकीर्ण वैचारिक भय के विविध जाति, धर्म, व्यवसाय एवं सम्प्रदाय के समवयस्कों से मिल-जुलकर अपना समय व्यतीत कर सकता था। बाण ने उल्लेख किया है कि उनके दो घनिष्ठ सम्पर्क में रहने वाले भ्राता पारशव थे अर्थात् उनकी माताएँ शूद्रा थी तथा पिता ब्राह्मण। हर्ष के जन्म तथा राज्यश्री के विवाहोत्सव का विस्तृत वर्णन तत्कालीन तत्सम्बन्धी आचार-व्यवहारों को पूरा प्रकाशित करते हैं। हेनसाँग ने हर्षकालीन धार्मिक अवस्था का वर्णन विस्तारपूर्वक किया है। के बौद्ध-यात्री ने उल्लेख किया है कि अपने जीवन के अन्तिम चरण में हर्ष एक परम निष्ठावान् बौद्ध बन गए थे और प्रति पांचवे वर्ष एक बार सभा का आयोजन कर अपने राजकीय कोष का दान देकर उसे रिक्त कर देते थे। इस संक्षिप्त उपर्युक्त मूल्यांकन से स्पष्ट हो जाता है कि हर्षचरित का महत्त्व ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।
कादम्बरी
‘कादम्बरी’ महाकवि बाण की द्वितीय प्रौढ़ गद्यात्मक रचना है। ‘हर्षचरित’ कवि की प्रथम कृति है, जिसकी परिपक्वता की परिणिति ‘कादम्बरी’ में हुई है। ‘कादम्बरी’-पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध-दो खण्डों में उपलब्ध है। ‘हर्षचरित’ इसी पृथ्वी-तल के यथातथ्य पर आघृत आख्यायिका है, तो ‘कादम्बरी’ दिव्य-लोक को भूतल पर अवतरित करने वाली कवि कल्पना-प्रसूत एक कथा-ग्रन्थ है। इसकी कथा प्राकृत कवि गुणाढ्यकृत ‘बृहत्कथा’ से ली गई है जो पैशाची भाषा में लिपिबद्ध थी, पर आज अनुपलब्ध है। कल्पना के आधिक्य के कारण पाश्चात्त्य संस्कृत-साहित्य के समीक्षकों ने इसे उपन्यास की संज्ञा प्रदान की है। ‘कादम्बरी’ का कथांश ‘बृहत्कथा’ के संस्कृत रूपान्तर सोमदेव के ‘कथासरित्सागर’ (५६, २२-१७८) तथा क्षेमेद्रकृत ‘बृहत्कथामंजरी’ (१६, १८३) में मिलता है। अतः विद्वानों १. द्रष्टव्यः “महाभारतभावितात्मनः” तृतीय उच्छ्वास। __ “कस्य न द्वितीय महाभारते भवेदस्य चरिते कुतूहलम्”। वही २. द्रष्टव्यः-M. winterniz’s ‘History of Indian Literature Vol Ill page ४०५-४०६ ४४ गद्य-खण्ड की मान्यता है कि बाण गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ से परिचित थे। उसी से ‘कादम्बरी’ की कथा संग्रहीत है। कवि ने अपनी प्रतिभा तथा कल्पना से उसे एक सर्वथा नवीन और मौलिक रूप प्रदान कर दिया है। ‘कादम्बरी’ की रचना में बाण के दो प्रयोजन थे। प्रथम महाभारत की तरह मानवीय जीवन का सर्वाङ्गीण चित्रण प्रस्तुत करना तथा द्वितीय इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति के सन्देश को पाठकों तक पहुँचाना। इन दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए बाण ने इस ग्रन्थ के मूल कथानक के प्रमुख पात्रों के जीवन-वृत्त में उनके पूर्व तीन जन्मों के कथांश को अनुस्यूत किया है, जिसमें भारतीय संस्कृति की मूलभूत आधारस्वरूप जन्मान्तरवाद की स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। कथा का प्रारम्भ विदिशा नगरी के राजा शूद्रक के प्रभाव तथा वैभव के वर्णन से होता है। राजा के सभाकक्ष में एक चाण्डालकन्या पंजरबद्ध विस्मयकारी शुक को लेकर उपस्थित होती है। शुक का नाम वैशम्पायन है जो मानवीय वाणी में अपना जीवनवृत्त प्रारम्भ से महर्षि जाबालि के आश्रम में पहुँचने तक सभासदों को सुनाकर उनका मनोरंजन करता है। तदनन्तर शुक के पूर्वजन्म के वृत्तान्त की अवतारणा ऋषि जाबालि करते हैं, जिसमें उज्जयिनी के राजा तारापीड़ तथा उनकी रानी विलासवती की कथा वर्णित है। म राजकुमार चन्द्रापीड़ तथा मन्त्री शुकनास के पुत्र वैशम्पायन में प्रगाढ़ मित्रता होती है। दोनों एक बार हिमालय की उपत्यका में दिग्विजय हेतु प्रस्थान करते हैं। मित्र से बिछुड़ कर किन्नर-मिथुन का पीछा करते हुए चन्द्रापीड़ ‘अच्छोद’ नामक रमणीक सरोवर के समीप पहुँचता है जहाँ तपस्विनी गन्धर्वकन्या महाश्वेता से उसकी भेंट होती है। महाश्वेता की सहायता से चन्द्रापीड़ का कौमार्यव्रत धारण करने वाली कादम्बरी से मिलन होता है और प्रथम साक्षात्कार में दापीड़ और कादम्बरी परस्पर अनुरक्त हो जाते हैं। पिता का पत्र पाते ही चन्द्रापीड़ राजधानी लौट आता है, पर मित्र वैशम्पायन को न पाकर पुनः महाश्वेता के पास आ जाता है और यहीं से ‘कादम्बरी’ के उत्तरार्द्ध की कथा प्रारम्भ होती है। प्रणय-याचना से प्रकुपित महाश्वेता के द्वारा मित्र के शुक में रूपानन्तरित हो जाने का समाचार सुनकर चन्द्रापीड़ प्राण त्याग देता है तथा कादम्बरी भी वहाँ पहुँचकर चन्द्रापीड़ के शव के समीप भावी मिलन की आकांक्षा से शवशरीर की सेवा में लग जाती है। जाबालि-कथा की समाप्ति हो जाती है। तत्पश्चात् शुक, राजा शूद्रक से निवेदन करता है कि “मैं ऋषि के आश्रम में महाश्वेता से मिलने के लिए उड़ चला तथा बीच में चाण्डाल के हाथ लग गया जिसने मुझे अपनी कन्या को समर्पित कर दिया”, तब चाण्डाल-कन्या कहती है कि “मैं ही पुण्डरीक की माता लक्ष्मी हूँ। पुण्डरीक ही दूसरे जन्म में वैशम्पायन तथा इस जन्म का शुक है और आप (शूद्रक) चन्द्रापीड़ हैं।" इतना सुनते हुए राजा शूद्रक की कादम्बरी के प्रणय की स्मृति जाग्रत हो उठती है। उसके प्राण निकल जाते हैं और इधर चन्द्रापीड़ पुनर्जीवित हो जाता है। लक्ष्मी तिरोहित हो जाती है। शुक की आत्मा गद्य-काव्य पुण्डरीक के मृत शरीर में प्रविष्ट हो जाती है जो चन्द्रलोक में सुरक्षित है। पुण्डरीक और महाश्वेता का तथा चन्द्रापीड़ और कादम्बरी का मिलन होता है और प्रणयी-युगल विवाहित होकर सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगते हैं। इस प्रकार महाकवि ने ‘कादम्बरी’ की इस कथा के माध्यम से यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया है कि प्रेमी-युग्मों का वैवाहिक सम्बन्ध एक जन्म का नहीं होता, प्रत्युत कई जन्मों के सम्बन्ध से सम्बद्ध होता है। यही जन्मान्तरवाद का सिद्धान्त है, जिसकी आधार-शिला पर भारतीय संस्कृति के प्रासाद की भित्ति खड़ी की गई है। ‘कादम्बरी’ के दोनों प्रणयी- युगल के प्रणय- चित्रण के द्वारा बाण ने यह सांस्कृतिक संदेश प्रचारित तथा प्रसारित किया है कि वासनाजन्य प्रेम को स्थायी विशुद्ध रूप प्रदान करने के लिए पश्चात्ताप दिव्यानल है, जिसमें महाश्वेता तथा कादम्बरी तप्त होकर अपने प्रणयी जनों-पुण्डरीक तथा चन्द्रापीड़ को प्राप्तकर वैवाहिक बन्धन में बधतीं हैं। __ ‘कादम्बरी’ में वर्णनात्मक पद्यात्मक शैली में उत्तरोत्तर वर्धनशील कथानकों की क्रमबद्ध श्रृङ्खलाओं को मूलकथा में अनुस्यूत किया गया है। मूल-कथा स्वतः विशेषरूप से आकर्षक नहीं है। ‘कादम्बरी’ की शैली ‘हर्षचरित’ के समान है। अन्तर मात्र इतना ही है कि जहाँ ‘हर्षचरित’ में कहीं-कहीं करुण-रस का प्राधान्य है, तो ‘कादम्बरी’ का प्रमुख अंगी रस शान्त अनुप्राणित श्रृगार है। ‘कादम्बरी’ भी विस्तृत वर्णन, सुदूरस्थ उपमानों के आनयन, दीर्घ समासों एवं विस्तृत वाक्यों से भरी हुई है। पाश्चात्त्य संस्कृत विद्वान् बेवर का कथन है कि ‘कादम्बरी’ की कथावस्तु अतिशयोक्तिपूर्ण बड़े-बड़े शब्दों के प्रयोग से आगे बढ़ती है जिसमें पाठक का धैर्य छूट जाता है। ‘कादम्बरी’ का गद्य भारतीय कान्तार (अरण्यानी) है जिसमें पाठक को बिना प्रयास आगे बढ़ने का मार्ग मिलना कठिन है तथा जहाँ हिंसक जन्तुओं के सदृश अप्रचलित समस्तपद अध्येता को भयभीत करते रहते हैं।" इस विज्ञ समीक्षक की उक्ति के विषय में इतना ही निवेदन पर्याप्त है कि यद्यपि ‘कादम्बरी’ दीर्घ समस्त (समासयुक्त) विशाल वाक्यों से परिपूर्ण है, तथापि वे वाक्य लघु साधारण वाक्यों में परिवर्तित किए जा सकते हैं। पाश्चात्त्य संस्कृत पाठकों के लिए यह उपर्युक्त कथन ठीक हो सकता है, पर भारतीय संस्कृत के विद्वानों को तो ‘कादम्बरी’ एक विलक्षण अपूर्व काव्यात्मक ग्रन्थ प्रतीत होता है। __ ‘कादम्बरी’ की कथा-सृष्टि के समय बाण के सम्मुख गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ उपजीव्य थी। यह विविध वर्णनों के लिये जगत्त्रय को व्याप्त करने वाली भारती-कथा के लिए निदर्शनस्वरूप थी और बाण के उद्देश्य-मानवीय जीवन के सर्वाङ्गीण चित्रणों में सहायक कथा। ‘कादम्बरी’ असंख्य वर्णनों का संग्रह है। चाहे नदी का वर्णन हो अथवा सरोवर का, नगर अथवा अरण्य अथवा अरण्यानी का, राजदरबार अथवा ऋषि के आश्रम का। बाण ने वृक्ष, पशु (इन्द्रायुध अश्व) प्रभृति सभी वर्णनों में बड़ी दूरदर्शिता से काम लियागद्य-खण्ड है। बाण के वर्णन की सर्वोपरि विशेषता उनकी सूक्ष्म-निरीक्षण शक्ति है। ‘हर्षचरित’ से प्रारम्भ होकर कवि की वर्णन-प्रतिभा ने -‘कादम्बरी’ में पूर्णता को प्राप्त कर लिया है। महाकवि कालिदास को छोड़कर इस क्षेत्र में संस्कृत साहित्य का कोई कवि बाण की तुलना में नहीं आ सकता। अन्तर केवल इतना ही कि जहाँ कालिदास थोड़े चुने हुए शब्दों द्वारा चित्र-अंकन में पटु हैं, वहीं विस्तृत वर्णन के पक्षधर बाण किसी वर्णन को भव्य रूप प्रदान कर बड़ा बना देते हैं। ‘कादम्बरी’ की दूसरी विशेषता इसके चरित्रों का चित्रण है। ‘हर्षचरित’ के समान ‘कादम्बरी’ के सभी पात्र सजीव तथा अपने वर्ग के प्रतिनिधि हैं। बाण अपने पात्रों का चरित्र-चित्रण तीन स्तर से करते हैं। प्रथमतः कवि अपने शब्दों की तूलिका से व्यक्ति-विशेष का रेखाचित्र प्रस्तुत करते हैं। दूसरे स्तर पर उतर कर बाण उस रेखाचित्र में अलंकारों का विविध रंग भरते हैं, जहाँ चित्र-विशेष का प्रधान साहित्यिक रूप सम्मुख होता है। अन्तिम तृतीय स्तर पर पहुँच कर कवि बाणभट्ट आवश्यक विविध रंगों से मनोरम बने हुए उस रेखाचित्र को उत्कृष्ट कोटि के सौन्दर्य तथा भाव-विधायक अलंकार, गुण, ध्वनि, रस आदि की परियोजना रूपी कुंकुमादि के प्रयोग से अतिशय आकर्षक बनाने का प्रयास करता हैं। ‘हर्षचरित’ तथा ‘कादम्बरी’ दोनों के वर्णन और चरित्र-चित्रण में बाण ने उपर्युक्त इस पूर्व-नियोजित क्रमबद्धता से काम लिया है। प्रथम स्तर पर कवि श्लेष अलंकार की आधार-शिला पर प्रतिष्ठित उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकारों के माध्यम से रेखाचित्र प्रस्तुत करता है जिससे प्रथमतः उस वस्तु-व्यक्ति विशेष का चित्र पाठक के समक्ष उपस्थित हो जाता है। अलंकारों के प्रयोग में अप्रस्तुत अथवा उपमान का आनयन बाण, सुबन्धु की तरह दूर से नहीं करते। बाण के उपमान, उपमेय से सम्बद्ध होते हैं। यहाँ तक उपमेय तथा उपमान में लिङ्ग, वचन, विभक्ति एवं साधर्म्य की समता इतनी सटीक, कुछ स्थानों को छोड़कर, सर्वत्र परिलक्षित होती है कि “उपमा कालिदासस्य" की स्मृति हठात् जाग्रत हो जाती है। दूसरी विशेषता यह है कि प्रथम स्तर पर जहाँ कवि प्रस्तुत वर्णन का रूप खड़ा करता है, तो द्वितीय स्तर से स्वभावगत प्रकृति (स्वभाव) का तथा तृतीय स्तर से उस चित्रण-विशेष अथवा पात्र-विशेष के प्रति बाण की जैसी धारणा रहती हैं उस भावना से कवि पाठक को अनुभावित करने का सफल प्रयास करता है। सौम्य युवक चन्द्रापीड़, उदार महाराज तारापीड़, परमप्रवीण राजनीतिशास्त्रदक्ष महामन्त्री शुकनास, सुकुमार रानी विलासवती, छाया के समान अनुगमन करने वाली परिचारिका पत्रलेखा, अध्यात्म के देदीप्यमान निदर्शन जाबालि-ऋषि, विरहविधुर कलभाषिणी स्निग्धहृदया महाश्वेता, सरस हृदया कमनीय कलेवरवाली कादम्बरी इत्यादि शताधिक चरित्र-चित्रण इतने सजीव हैं कि पाठक का ध्यान हठात् अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं। वस्तुतः कल्पना और वर्णन की संघटना से, भाषा और भाव के पारस्परिक सम्मिश्रण से, अलंकारों एवं रसों के मधुर समन्वय से ‘कादम्बरी’ बाण की ‘अतिद्वयी’ संरचना ही नहीं है, प्रत्युत समस्त संस्कृत साहित्य का देदीप्यमान समुज्ज्वल हीरक है। गद्य-काव्य ४७ यद्यपि ‘हर्षचरित’ से न्यून, तथापि सामयिक जन-जीवन के आचार-व्यवहार के वर्णन में ‘कादम्बरी’ का सांस्कृतिक महत्त्व उल्लेखनीय है। विशेष रूप से धर्म के विषय में शैव सम्प्रदायों के आचरण ‘कादम्बरी’ में यथाप्रसङ्ग प्रकाशित हुए हैं। उदाहरणार्थ सन्तानहीन रानी विलासवती सभी धार्मिक कृत्यों का सम्पादन करती हैं और उसे पुत्र की प्राप्ति होती है। इसका वर्णन बड़े विस्तारपूर्वक किया गया है। रानी उपवास करती हैं। श्वेत वस्त्र धारण कर दुर्गा के मन्दिर में तृणों की शय्या पर सोती हैं और अर्चना करती हैं। गो-शाला में स्नान करती हैं तथा प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को ब्राह्मणों को दान देती हैं। माँ के मन्दिर में जाती हैं तथा वृक्षों आदि का पूजन करती हैं। दूसरे स्थान पर मस्तक पर भस्म धारण करने वाले रुद्राक्षमाला सहित जटाजूटयुक्त शैव योगियों का वर्णन मिलता है, जो अपने-अपने सम्प्रदायानुसार बाघाम्बर तथा वल्कल धारण किए हुए हैं।’ एक स्थान पर बाण ने विधवाओं के जलाने की परम्परा (सती-प्रथा) की भर्त्सना की है। इस संदर्भ में बाण की दोनों कृतियों-‘हर्षचरित’ तथा ‘कादम्बरी’ की तुलनात्मक समीक्षा प्रासङ्गिक प्रतीत होती है। दोनों ग्रन्थ अलंकृत शैली में विस्तृत रूप से निबद्ध हैं। दोनों में गुण-दोष समान हैं। साहित्यिक संरचना की दृष्टि से हर्षचरित, कादम्बरी की तुलना में न्यून है। ऐसा प्रतीत होता है कि हर्षचरित में बाण ने श्लोकों की योजना श्रमसहित की है। हर्षचरित में बाण ने बहुत से अप्रचलित शब्दों का प्रयोग किया है जो केवल कोशमात्र में सुलभ हैं। कादम्बरी में बाण ने जिस सूक्ष्मता के साथ मानवीय भावनाओं का विश्लेषण किया है वह हर्षचरित में दृष्टिगत नहीं होता है। ‘कादम्बरी’ में चरित्र-चित्रण बड़ी परिपक्वतापूर्वक किया गया है। भाषा का प्रवाह, भावों का प्रभाव, विचारों की अभिव्यक्ति एवं रसों की अभिव्यञ्जना में कादम्बरी, हर्षचरित से आगे बढ़ जाती है। चन्द्रापीड़ के लिए शुकनास के उपदेशात्मक तथा पुण्डरीक के प्रति कपिजल के सौहार्दपूर्ण भावों की अभिव्यक्ति करने वाले सदृश वाक्य हर्षचरित में नहीं दीख पड़ते। पर जहाँ तक ऐतिहासिक तथा तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति का प्रश्न है हर्षचरित का महत्त्व कादम्बरी से सर्वथा अधिक है। सामयिक प्राचीन भारतीय समाज, धार्मिक आचार-व्यवहार, सामरिक सैन्य-व्यवस्था, ग्राम, नगरों तथा स्कन्धवारों का यथातथ्य जीवन, आयुर्वेदिक ओषधि-प्रगति एवं विविध प्रचलित व्यवसायों तथा उद्योगों का परिचय देने के लिए हर्षचरित में प्रचुर पर्याप्त सामग्रियाँ हैं। कादम्बरी में वैसा नहीं है। दोनों ग्रन्थों में एक उल्लेखनीय समता यह है कि कादम्बरी तथा हर्षचरित दोनों बाणभट्ट की अपरिसमाप्त (अपूर्ण) कृतियाँ हैं। यह तो विदित है कि मृत्यु से विवश होकर बाण ने ‘कादम्बरी’ को अपूर्ण ही छोड़ दिया, जिसको उनके पुत्र पुलिनभट्ट अथवा पुलिन्दभट्ट ने पूर्ण किया और वह कादम्बरी का उत्तरार्द्ध है। १. द्रष्टव्यः-‘कादम्बरी’ पृष्ठ ५४, २०८ ४८ गद्य-खण्ड हर्षचरित की परिसमाप्ति आकस्मिक प्रतीत होती है। बाण ने हर्ष के जीवन का चित्रण एकांगी किया है। सम्भवतः बाण अपने आश्रयदाता के सम्पूर्ण जीवन-वृत्त का विवरण नहीं प्रस्तुत कर सकते थे : “कः खलु पुरुषायुषशतेन शक्नुयादविकलमस्य चरितं वर्णयितुं। एकदेशे तु यदि कुतूहलं वः, सज्जा वयम्…"-तृतीय उच्छ्वास सम्भवतः बाण पूर्णरूप से आश्वस्त थे तथा उन्होंने ऐसा अनुभव किया हो कि राज्यश्री की उपलब्धि के अनन्तर उनके आश्रयदाता के चारित्रिक वृत्तान्त से सभी परिचित हैं अतः उसे लिपिबद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। बाण ने हर्षचरित की रचना एक साहित्यिक ग्रन्थ के रूप में की है, हर्ष के शासन की ऐतिहासिक कृति के रूप नहीं। उनकी काव्य-प्रतिभा उच्चतम शिखर पर पहुँच गई, तो उन्होंने उसे अपूर्ण अवस्था में ही छोड़ दिया हो? जो भी कारण हो। हर्षचरित की अपूर्णता प्राचीन भारतीय इतिहास के जिज्ञासुओं को खटकती है। ‘कादम्बरी’ की कथावस्तु कल्पित हैं, किन्तु कल्पित होने का तात्पर्य यही है कि वह ऐतिहासिक नहीं हैं। कादम्बरी का उपजीव्य गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ है जिसके संस्कृत-रूपान्तर सोमदेवविरचित ‘कथासरित्सागर’ के मकरन्दकोपाख्यान के अन्तर्गत राजा सुमनस् की कथा से कादम्बरी की कथावस्तु का अत्यधिक साम्य है। यद्यपि बाण ने राजा सुमनस् की कथा को आधार बनाया है, तथापि पर्याप्त मौलिक परिवर्तन किए हैं। बाण ने पात्रों की संख्या बढ़ा दी है। पात्रों का नाम परिवर्तित कर बाण ने उनके चरित्र-चित्रण में अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। गम्भीर व्यक्तित्वपूर्ण सर्वशास्त्रपारंगत शुकनास की सर्वथा नूतन परिकल्पना कवि की निजी सृष्टि है। प्रसङ्गानुसार प्रकृति के रमणीय चित्रों को उपन्यस्त कर, राजकीय वैभव के परिचायक उपकरणों को प्रदर्शित कर और मन्त्री शुकनास के उपदेश के माध्यम से मानवीय जीवन के शाश्वत सत्यों का उद्घाटन कर बाण ने ‘कादम्बरी’ में अपनी प्रभुप्रदत्त कवित्व-प्रतिभा का यथेष्ठ प्रदर्शन किया है। ‘कादम्बरी’ वस्तुतः संस्कृत साहित्य में गद्य-काव्य की कसौटी है जिसका सांस्कृतिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, कलात्मक, दार्शनिक एवं भौगोलिक आदि अनेक दृष्टियों से अद्वितीय महत्त्व है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने ‘कादम्बरी’ की पृष्ठभूमि को क्षीर-समुद्र कहा है और कादम्बरी की तुलना अमृत-कलश से की है जिसे महाकवि बाण ने अपनी ध्यानशक्ति के सुमेरु से मन्थन कर विश्व के विज्ञ साहित्य-प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत किया है। किन्तु “कादम्बरी रसभरेण समस्त एव मत्तो न किञ्चिदपि चेतयते जनोऽयम्” के अनुसार बाण ने अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक-साधना के श्रम से असामान्य, असाधारण अनुपलब्ध प्रेम के रूप में रसतत्त्व को उपस्थित किया है और यही इसका वास्तविक पक्ष है। गद्य-काव्य ४६ बाण ने अपनी कादम्बरी में प्रेम-तत्त्व का विश्लेषण लौकिक तथा आध्यात्मिक उभयविधि से किया है। कवि की मान्यता है कि प्रेम भौतिक सम्बन्ध का नामान्तर मात्र नहीं है, प्रत्युत यह ‘जन्मान्तरसौहृद’ है जो विविध जन्मों में समुद्भूत अलौकिक-आध्यात्मिक सम्बन्ध का परिचायक है। महाश्वेता तथा पुण्डरीक और कादम्बरी तथा चन्द्रापीड़ का प्रणय-कथानक एक ही जन्म में विद्यमान नहीं है, बल्कि तीन जन्मों से सम्बद्ध हैं। कर्मवश उनकी विविध योनियों के परिवर्तन से प्रेम का माधुर्य और स्वरूप अक्षुण्ण है। ‘कादम्बरी’ की कथा इसी महान् शाश्वत तथ्य की सत्यता को प्रमाणित करती है। राजा शूद्रक की राजधानी विदिशा नगरी कलाओं और शास्त्रों की केन्द्रस्थली थी जहाँ राजकीय व्यवस्था के अनुसार विद्या-गोष्ठियों का आयोजन होता रहता था, जिनसे साहित्य, संगीत-कलाओं का विकास निरन्तर होता रहता था। महाराज तारापीड़ की राजधानी उज्जयिनी तो महानगरी थी जो तत्कालीन सांस्कृतिक चेतना की साकार प्रतिमूर्ति थी। रत्नों और मणियों से भरी नगरी ईसा की सातवीं शती के व्यापार की केन्द्रस्थली थी। व्यापारी पद्मपति थे और जिनके गगनचुम्बी प्रासादों में जो सिन्दूरमणि की भूमियों, मोतियों के प्रालम्बों, सूर्यकान्त की शिलाओं और इन्द्रनीलमणि के वातायनों से सुसज्जित थे, तत्कालीन स्थापत्य तथा चित्रकला का उत्कृष्ट रूप उपलब्ध होता है। उस नगरी के नागरिक साक्षात कल्पवृक्ष थे, जो दानशीलता, वीरता, विनय, सत्यभाषण एवं अनेक कलाओं के प्रेमी तथा गुणग्राहक थे। डॉ. अग्रवाल का कथन है कि “कादम्बरी के पात्र गन्धर्वलोक और मनुष्यलोक की जीवन-विभूति और मानस-सम्पत्ति, एक दूसरे की सम्प्रीति और कुशल-क्षेम के लिए समर्पित थे”।’ राजा तारापीड़ का साम्राज्य पूर्व में उदयाचल, दक्षिण में सेतुबन्ध पश्चिम में मन्दराचल और उत्तर में गन्धमादन से आवृत था, जो बृहद् गुप्तसाम्राज्य की स्थिति का सूचक था। चन्द्रापीड़ की दिगविजय-यात्रा गुप्तनरेश समुद्रगुप्त पर विशेष रूप से घटित होती है। इसी प्रकार के अन्य भौगोलिक तथ्य ‘कादम्बरी’ में विद्यमान हैं, जो इसकी उस दृष्टि के महत्त्व के प्रकाशक हैं।
समीक्षा
महाकवि बाणभट्ट का कथन है कि उनके समय में उत्तरभाग में श्लेषप्रधान शैली का प्रचलन था, तो पश्चिम के काव्य निर्माताओं ने अर्थगौरवपूर्ण चमत्कार को प्रश्रय दिया था, दाक्षिणात्यों ने कल्पना समन्वित उत्प्रेक्षालंकार को काव्य का निर्णायक गुण उद्घोषित किया था और प्राच्य गौड़ीय विद्वानों ने अक्षराडम्बर को काव्यनिर्मितिहेतु श्रेष्ठ स्वीकार किया था। २. टा १. द्रष्टव्य, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल, ‘कादम्बरी एक सांस्कृतिक अध्ययन’ द्रष्टव्यः-“श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम्। उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ।।" हर्षचरित प्रारम्भिक ७वाँ श्लोक ५० गद्य-खण्ड काव्यरचना के लिए स्वभावोक्तिप्रधान शैली गर्हित बन गई थी। धीरे-धीरे साहित्य-जगत् में जनरुचि स्वभावोक्ति से हटकर वक्रोक्ति की ओर उन्मुख हो रही थी। बाण का दृष्टिकोण समन्वयात्मक था। अतः अपनी पूर्ववर्ती तथा सामयिक प्रचलित काव्य शैलियों का विश्लेषण कर बाण ने निदर्शन के रूप में एक नवीन रचना-पद्धति और सुविचारित उत्कृष्ट काव्यशैली की अवतारणा करते हुए उल्लेख किया है कि अर्थ (विषय) की नवीनता, स्वभावोक्ति की नागरिकता, श्लेष की सरलता तथा स्पष्टता, रस की स्फुटता एवं अक्षरों की विकट बन्धता-इन पाँच समस्त गुणों का सन्निवेश एक स्थान पर दुष्कर है: “नवोऽर्थो जातिरग्राम्या, श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः। विकटाक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम्।।” इसी उपर्युक्त कथन का समर्थन करते हुए महाकवि ने अपनी ‘कादम्बरी’ में भी उल्लेख किया है कि दीपक और उपमा आदि अलंकारों ये युक्त, नवीन पदार्थों से सम्पन्न, निरन्तर श्लेष से पूर्ण एवं सुजाति (स्वभावोक्ति) से सुसज्जित कथा (काव्यरचना) किस सहृदय को आकृष्ट नहीं करती:-“हरन्ति कं नोज्ज्वलदीपकोपमैर्नवैः पदार्थैरुपपादिताः कथाः " ।। इसी प्रकार बाण ने काव्य-समीक्षा हेतु ये पाँच मापक-दण्ड निर्धारित कर दिए हैं। अतः इन्हीं के परिप्रेक्ष्य में उनके काव्यगत गुण-दोष की समीक्षा सर्वथा समीचीन है। १. नवोऽर्थो-अर्थ की नवीनता से बाण का अभिप्राय काव्य के विषय की नूतनता से है। म.म. डॉ. पी.वी. काणे ने उल्लेख किया है कि ‘नवोऽर्थः’ का तात्पर्य उस विषय-वस्तु से है जिसकी चर्चा अन्य पूर्ववर्ती कवियों ने नहीं की है। अथवा जो उल्लेखनीय विषय हो अथवा अर्थ। यह कवि की प्रतिमा का परिचायक है जिसे आलंकारिकों ने “प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता" की मान्यता प्रदान की है। हर्षचरित का प्रारम्भ पूर्ववर्ती कवियों की यशः प्रशस्ति से होता है, जिनको बाण ने उपजीव्य बनाकर अपनी कृतज्ञता का ज्ञापन किया है। हर्षचरित के प्रथम तीन उच्छ्वासों तथा कादम्बरी के पूर्वार्द्ध के प्रारम्भिक श्लोकों में बाण के कुल, पूर्वजों, उनके निवास स्थान एवं उनकी आत्म-कथा के लिए सर्वथा नवीन विषय है, क्योंकि बाण के पूर्व इस वाङ्मय में किसी कवि ने अपने ग्रन्थ में अपना तथा अपने वंश का उल्लेख तक नहीं किया है। बाण एक क्रान्तिकारी कवि थे जिन्होंने सामयिक आगत साहित्यिक परम्परा का विरोध कर एक सर्वथा नूतन विषय को काव्य की चर्चा का विषय बनाया। अपने तत्कालीन ‘सकलप्रणयिमनोरथसिद्धिश्रीपर्वतवर्धनवंशीय नरेश हर्षवर्धन और उनके वंश, पूर्वजों, उनके पारिवारिक जनों की चर्चा को अपनी आख्यायिका ‘हर्षचरित’ के पंचम उच्छ्वास से अष्टम पर्यन्त प्रतिपाद्य बनाकर एक सर्वथा नवीन विषय १. “सन्ति श्वान इवासंख्या जातिभाजो गृहे-गृहे।” वही प्वाँ २. द्रष्टव्यः-म.म. पी.वी. काणे द्वारा सम्पादित हर्षचरित पृष्ठ १४ गद्य-काव्य का समावेश काव्य में किया है, क्योंकि बाण के किसी पूर्ववर्ती ने अपने सामयिक लौकिक राजा को अपने काव्य का विषय नहीं बनाया था। ‘हरलीलेव’ बृहत्कथा की तरह अपनी कथा ‘कादम्बरी’ को विस्मयकारिणी बनाकर बाण ने भारती-कथा के सदृश जगत्-त्रय के विषयों को समाविष्ट करने का सफल प्रयास किया। जन्मान्तरवाद की मान्यता को अपनी कथा के कथानक की आधारशिला बनाकर चन्द्रलोक (स्वर्गलोक), गन्धर्वलोक तथा मानवलोक के विषयों को स्थान देकर सर्वव्यापिनी बना दिया। कवि मानव-जीवन का चित्रण समग्र रूप से नहीं कर सकता, पर उसके मार्मिक स्थलों के वर्णन से उसे सम्पूर्णता प्रदान कर सकता है। इस अर्थ में ‘कादम्बरी’ मानव-जीवन का सर्वाङ्गीण चित्रण है, यह निर्विवाद हैं __स्वभावोक्ति की नागरिकता…….आचार्य दण्डी ने अपने ‘काव्यादर्श’ में स्वभावोक्ति के ग्राम्य तथा अग्राम्य दो विभेद प्रदर्शित कर “अग्राम्योऽर्थो रसावहः” ऐसा उल्लेख किया है।’ जाति छन्द-विशेष के प्रति संकेत नहीं है। यहाँ अग्राम्या जाति से वर्ण्य-वस्तु की स्वभावोक्ति अर्थात् यथार्थ वर्णन से तात्पर्य है, जिसमें कवि के अभीष्ट रस की अभिव्यञ्जना हो। ‘हर्षचरित’ के प्रारम्भिक तीन उच्छ्वासों में बाण ने अपनी आत्म-कथा के वर्णन-प्रसङ्ग में जिस निर्भीकता के साथ अपने वैयक्तिक गुण-दोषों की चर्चा की है उसमें वर्णन की स्वाभाविकता स्पष्ट परिलक्षित होती है। इस वर्णन का एक उल्लेखनीय वैशिष्ट्य यह है कि अपनी कुमारावस्था के भ्रमणशील समवयस्कों की चर्चा जो प्रथम उच्छ्वास के अन्त में बाण ने की है, उससे संस्कृत साहित्य का एक अन्य पक्ष उजागर होता है। बाण के पूर्व संस्कृत साहित्य देव-वाङ्मय समझा जाता था जिसमें देवभाषा संस्कृत के माध्यम से लोकोत्तर पुरुषों की चर्चा होती थी। संस्कृत साहित्य अभिजात्य वर्ग से सम्बद्ध था। बाण ने सर्वप्रथम समाज के निम्नवर्गीय व्यक्तियों तथा उनके व्यवसायों का उल्लेख कर एक सब प्रकार से नवीन परम्परा की अवतारणा की, जिसका सूत्रपात नाटककार शूद्रक ने अपने प्रकरण ग्रन्थ ‘मृच्छकटिक’ में किया था। कुमारी भगवती सरस्वती, अष्टादश वर्षीय युवक दधीच, परम शिवभक्त वर्धनवंश के प्रवर्तक राजा पुष्पभूति, वेताल-साधना की सिद्धि में प्रवृत्त भैरवाचार्य, राजाधिराज प्रभाकरवर्धन, उनकी पतिव्रता सम्राज्ञी यशोवती, आज्ञाकारी वीर राजकुमार राज्यवर्धन, चक्रवर्ती सम्राट् हर्षवर्धन एवं बौद्धभिक्षुक दिवाकरमित्र प्रभृति ‘हर्षचरित’ के तथा ‘कादम्बरी’ के प्रजापालक महाराज शूद्रक, युवराज चन्द्रापीड़, सौम्य तापस हारीत, ज्ञानवृद्ध ऋषि जाबालि, वदान्य नरपति तारापीड़, लोकशास्त्रनिपुण अमात्य शुकनास, शुभ्रवसना विरहविदग्धा स्निग्धहृदया तपस्विनी महाश्वेता, सरसहृदया कमनीय-कलेवरा कादम्बरी इत्यादि शताधिक वर्णनों में अपनी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति से बाण ने ऐसा स्वाभाविक १. द्रष्टव्यः काव्यादर्श १. ६३-६४ गद्य-खण्ड वर्णन प्रस्तुत किया है कि प्रत्येक वर्णन की सजीव साकार मञ्जुल मूर्ति पाठक के सम्मुख उपस्थित हो जाती है तथा कवि जिस भावना की जागृति पात्र-विशेष के प्रति उत्पन्न करना चाहता है पाठक उससे सर्वथा भावित हो जाता है। यद्यपि उन स्थलों पर बाण का वर्णन विस्तृत हो गया है, तथापि सफल तथा सटीक वर्णन हुआ है। मानवों का ही नहीं, प्रत्युत पशुओं-हर्षवर्धन के प्रमुख युद्धहस्ती दर्पशात तथा चन्द्रापीड़ के अश्व इन्द्रायुध एवं प्रकृति के विविध रूपों के वर्णनों में भी बाण ने उनकी यथावस्तु का स्वाभाविक वर्णन किया है। प्रकृति-वर्णन-बाण ने जिस प्रकार मानव की अन्तः प्रकृति के वर्णन में स्वाभाविकता तथा अपनी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति की निपुणता का परिचय दिया है, उसी प्रकार वे बाह्य-प्रकृति के भी सफल चित्रकार हैं। अपनी दोनों कृतियों हर्षचरित और कादम्बरी में बाण ने अनेकशः प्रातः तथा सायं-कालीन प्रकृति के विविध रूपों का बड़ा स्वाभाविक, रमणीक, सटीक एवं विविधतापूर्ण वर्णन प्रस्तुत किया है। बाण का प्रकृति-वर्णन अधिकांशतः आलम्बन रूप में हुआ है, परन्तु कवि की दृष्टि सदा उचित वातावरण की सृष्टि पर टिकी रहती है। अतः वाण ने सर्वत्र प्रासङ्गिक इतिवृत्त के सहायक तथा पृष्ठभूमि के रूप में प्रकृति को देखने का प्रयास किया है। हर्षचरित में दुर्वासा के शाप से दण्डित सरस्वती अपनी सखी सावित्री के साथ ब्रह्मलोक से भूतल पर सन्ध्या समय उतरने लगती हैं। तब कवि “अत्रान्तरे सरस्वत्यतरणवार्त्तामिव कथयितुं मध्यमं लोकमवततारांशुमाली।" शिल्प-सज्जा और कलात्मकता के दृष्टिकोण से प्रथम उच्छ्वास का यह सन्ध्या-वर्णन कवि के कवित्व का श्रेष्ठ उदाहरण है। ‘कादम्बरी’ में ऋषि जाबालि के आश्रम में सन्ध्या का वर्णन पवित्रता तथा श्रद्धा-समन्वित रमणीयता का सञ्चार करता है : “इस समय तक दिन ढल चुका था। स्नानोपरान्त मुनियों ने अर्घ में लाल चन्दनराग सूर्य को अर्पित किया था। उसी को मानो आकाशसंचारी सूर्य ने अपने अंगों में लपेट लिया है। दिन क्षीण हो रहा है। मानो तपस्वियों ने सूर्योपासना में सूर्यमण्डल पर दृष्टिपात कर उसकी किरणों का पान कर लिया है और प्रकाश को भी पी लिया है” इत्यादि। “अनेन च समयेन परिणतो दिवसः। स्नानोपस्थितेन मुनिजनेनार्घनिधिमुपपादयता यः क्षितितले दत्तस्तमम्बरतलतः साक्षादिव रक्तचन्दनांगरागं रविरुदवहत्। ऊर्ध्वमुखैरर्कबिम्ब विनिहितदृष्टिभिरूष्मपैस्तपोधनैरिव परिपीयस्तेजः प्रसरो विरलातपो दिवसस्तनिमान मभजत्।” “एकदा तु नातिदूरोदिते नवनलिनदलसम्पुटमिव किञ्चिदुन्मुक्तपाटलिम्नि भगवति मरीचिमालिनि । जिस प्रकार यह प्रातः कालीन वर्णन प्रभातकाल की रमणीयता, शीतलता एवं सुगन्ध को एक ही साथ पाठक के समक्ष उपस्थित कर देता है, उसी प्रकार (८Gh गद्य-काव्य ३ “दिवसावसाने लोहिततारका तपोवनधेनुरिव कपिला परिवर्त्तमाना सन्ध्या………….” कपिला धेनु के साथ यह सन्ध्या की लालिमा की उपमा सायंकालीन शान्ति तथा रम्यता का उद्बोधन तथा जागरण करने में सक्षम है। ‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ दोनों कृतियाँ सूर्योदय तथा सूर्यास्त के वर्णनों से भरी पड़ी हैं। उल्लेखनीय विशेषता है कि कहीं भी शब्द, अर्थ एवं भाव की पुनरुक्ति नहीं है। बाण को प्रकृति के मञ्जुल रमणीय तथा भयावह रोमांचकारी भीषण-दोनों रूपों के वर्णन में समान रूप से सफलता मिली है। ऐसा अन्यत्र संस्कृत साहित्य में दृष्टिगत नहीं होता। कतिपय कवि प्रकृति के रमणीय रूप को प्रस्तुत करने में कुशल हैं जैसे कालिदास प्रभृति, तो कुछ प्रकृति के भयानक भीषण रूप का वर्णन कर अपने को कृतकार्य अनुभव करते हैं। जैसे भवभूति ‘उत्तररामचरित’ में। ‘हर्षचरित’ के द्वितीय उच्छ्वास के प्रारम्भ में भीषण निदाघकाल, तत्कालीन उन्मत्त मातरिश्वा एवं दारुण दावाग्नि का वर्णन तथा ‘कादम्बरी’ में विन्ध्याटवी के उद्दाम भयंकर दृश्यों का चित्रण ज्वलन्त दृष्टान्त हैं, जिनसे बाण की प्रकृति के मधुरेतर रूप से भी साहचर्य तथा सूक्ष्म निरीक्षण-शक्ति का बोध होता है। ऋतुओं का वर्णन बाण ने स्वाभाविक तथा मार्मिक रूप से किया है। प्रभात, सन्ध्या, अन्धकार, चन्द्रोदय आदि प्रकृति के नाना दृश्यों का वर्णन भी यथार्थतापूर्वक दोनों कृतियों में हुआ है। ‘कादम्बरी’ में अच्छोदसरोवर का वर्णन बाण के प्रकृति के रमणीय वर्णनों में सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। यह सरोवर भारतवर्ष के उत्तरापथ की पावनभूमि में कैलास तथा हेमकूट पर्वतों के मध्य किरातों की सुवर्णपुर नामक नगरी के समीप है। यह अनन्त, अनादि एवं कालातीत है। यह इतना सुखदायक है कि मानो यह त्रिभुवन का मूर्तिमान् पुण्य है। प्रतिबिम्ब ग्रहण की क्षमता के कारण यह अपनी स्वच्छता वशात् मानों वरुण का दर्पण है। इतना पवित्र, निर्मल तथा शुभ्र जलपूर्ण है कि मानों किसी ने मुनियों के मन, सज्जनों के सद्गुणों एवं मोतियों की शुभ्रता से इसकी निर्मिति की है। “त्रिभुवनपुण्यराशिमिव सरोरूपेणावस्थितम्। आदर्शभवनमिव प्रचेतसः। स्वच्छतया मुनिमनोवृत्तिभिरिव, सज्जनगुणैरिव हरिणलोचनप्रभाभिरिव मुक्ताफलांशुभिरिव निर्मितम् ।” श्लेषोऽक्लिष्टः अर्थात् श्लेष से तात्पर्य यहाँ श्लेषालंकार की उस परियोजना से है जो श्रमसाध्य न हो।’ श्लेष से बाण का विशेष मोह है। उनकी दोनों रचनाओं में व्यक्ति या दृश्य के विशद वर्णन में उत्प्रेक्षा, उपमा, अपह्नुति, अर्थापत्ति, अर्थान्तरन्यास, विरोधाभास, परिसंख्या प्रभृति अलंकार, श्लेष का आधार लेकर यथास्थान उपन्यस्त हैं। बाण की आख्यायिका तथा कथा दोनों उत्प्रेक्षा और मालोपमाओं से व्याप्त हैं। कवि तब तक एक उत्प्रेक्षा या उपमा के अनन्तर उनकी मालाएँ प्रस्तुत करते जाते हैं, जब तक उनके समस्त उपमान का भण्डार शेष नहीं हो जाता है। निम्नलिखित रसनोपमा का उदाहरण द्रष्टव्य है १. द्रष्टव्यः-“अव्यवहितार्थप्रत्ययं क्लिष्टम्” काव्यालङ्कारसूत्र २.१.२१ गध-खण्ड ५४ “क्रमेण च कृतं मे वपुषि वसन्त इव मधुमासेन, मधुमास इव नवपल्लवेन, नवपल्लव इव कुसुमेन, कुसुम इव मधुकरेण, मधुकर इव मदेन नवयौवनेन पदम्।” __किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्यविशेष के वर्णन में बाण ने तीन स्तर निर्धारित किए हैं। प्रथम स्तर से कवि प्रतिपाद्य वस्तु का रेखाचित्र स्वभावोक्ति (जाति) के द्वारा खींचता है। द्वितीय स्तर पर उतर कर बाण उन रेखाओं द्वारा प्रस्तुत चित्र में उपमा या उत्प्रेक्षाओं के माध्यम से रंग भरते हैं। तृतीय स्तर पर पहुँच कर कवि कोरी चटक-मटक बाह्य चाकचिक्य से आकृष्ट होने वाले पाठकों के लिए कहीं-कहीं शाब्दी-क्रीड़ा के सुनहरे पाउडर रंग से युक्त चित्र पर चिपका देता है। इसी तृतीय अन्तिम स्तर पर आने पर महाकवि बाण अपने प्रिय विरोधाभास तथा परिसंख्या के पाण्डित्य का प्रदर्शन करते हैं। इन उपर्युक्त अलंकारों की योजना विदग्धों को बड़ी रोचक तथा नितान्त हृदयावर्जक प्रतीत होती है। विन्ध्याटवी के वर्णन में विरोधाभास की छटा दर्शनीय है : “क्वचिदुन्मत्तेव वायुवेगकृततालशब्दा, क्वचिद् विधवेवोन्मुक्ततालपत्रा, क्वचित्समरभूमिरिव शरशतनिचिता, क्वचिदमरपतितनुरिव नेत्रसहस्रसंकुला…. क्रूरसत्त्वाऽपि मुनिजनसेविता पुष्पवत्यपि पवित्रा।” ऋषि जाबालि के आश्रम के सौन्दर्य-वर्णन-प्रसङ्ग में निम्नलिखित परिसंख्या विद्वज्जनों में प्रसिद्ध है : “यत्र च महाभारते शकुनिवधः, पुराणे वायुप्रलपितम्, वयःपरिणामे द्विजपतनम्, उपवनचन्दनेषु जाड्यम्, अग्नीनां भूतिमत्त्वम्, एणकानां गीतव्यसनम्, शिखण्डिनां नृत्यपक्षपातः, भुजङ्गमानां भोगः, कपीनां श्रीफलाभिलाषः मूलानामधोगतिः।” इन अर्थालंकारों की योजना में बाण की उल्लेखनीय विशेषता है कि कवि सदा अपने वर्ण्यवस्तु पर ध्यान केन्द्रित रखता है। अतः ऐसे उपमानों का चयन करता है जो अभीष्ट वातावरण का सृजन कर अपेक्षित भावों को स्पष्ट करते हैं। इससे पाठक का ध्यान विषयान्तर की ओर नहीं जाता है। विरोधाभास तथा परिसंख्या की योजना से भी कवि वर्ण्य वस्तु की अन्तः प्रकृति को ही उजागर करता है। __स्फुटो रसः अर्थात् रस की स्फुटताः-मानव के सर्वाङ्गीण वर्णन-हेतु बाण ने मार्मिक स्थलों का चित्रण कर काव्य के समस्त रसों की सफल अभिव्यज्जना की है, इसमें दो राय नहीं है। हर्षचरित का प्रधान रस वीररस है और अन्य श्रृंगार, करुण, अद्भुत, बीभत्स इत्यादि रसों की अभिव्यक्ति अंग के रूप में हुई है। हर्षचरित के सप्तम उच्छ्वास के प्रारम्भ में चरितनायक हर्षवर्धन की दिग्विजय-यात्रा की सज्जा तथा प्रथम अवसर पर वीररस की तथा सरस्वती और दधीच के प्रणय-वर्णन-प्रसङ्ग में (प्रथम उच्छ्वास में) श्रृङ्गार रस के संयोग तथा वियोग-उभय पक्ष की अभिव्यक्ति बड़ी सफलता से हुई है। कादम्बरी का अंगी रस श्रृङ्गार ही हैं, जिसका चित्रण अच्छोद सरोवर के पश्चिमाभिमुख गद्य-काव्य कैलास पर्वत की उपत्यका में विद्यमान भगवान् शंकर के मन्दिर में ध्यानासन पर आसीन, अपने प्रिय पुण्डरीक के वियोग में विदग्ध प्रणयविधुरा महाश्वेता के वर्णन में श्रृङ्गार रस के कारुणिक वियोग पक्ष का तथा कन्या अन्तःपुर के श्रीमण्डप में बैठी हुई कादम्बरी के श्रृङगाररससिक्त नखशिख-वर्णन में संयोग पक्ष का श्रृङ्गारमय, काव्यमय, सौन्दर्यमय, कुतूहलमय एवं आश्चर्यमय चित्रण विद्यमान हैं। बाण के श्रृङ्गार-वर्णन की विशेषता है कि यह अत्यन्त मर्यादित तथा शिष्ट है। जन्मान्तरवाद की आधाशिला पर प्रतिष्ठित महाश्वेता-पुण्डरीक तथा कादम्बरी-चन्द्रापीड़ इन दोनों युग्मों का प्रणयचित्रण महाकवि भवभूति के “अद्वैतं सुखदुःरवयोनुगतं सर्वास्ववस्थासु यत्” के दाम्पत्य-प्रेम की ओर आकृष्ट कर लेता है। भारतीय संस्कृति की बद्धमूल मान्यता है कि लौकिक प्रेम को तपस्या और पश्चात्ताप के माध्यम से विशुद्ध, पवित्र एवं स्थायी रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। इस संदेश का बाण ने अपनी अमर कृति ‘कादम्बरी’ के द्वारा प्रचार-प्रसार करने का एक श्लाघनीय प्रयास किया है, क्योंकि महाश्वेता तपस्या द्वारा तथा कादम्बरी पश्चात्ताप की प्रताड़ना से अपने पृथक्-पृथक् तीन जन्मों के प्रणय को दिव्य तथा स्थायित्व प्रदान करती हैं। ‘कादम्बरी’ में अंगी श्रृगार रस के अंग के रूप में वीर, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक, बीभत्स एवं अद्भुत समग्र रसों की सुयोजना यथाप्रसङ्ग उपलब्ध होती है। बाण की रस-योजना की संस्तुति करते हुए त्रिलोचन कवि ने कहा है कि बाण की रसमयी कविता के सम्मुख इतर कवियों की रचना चपलता मात्र है : “हृदि लग्नेन बाणेन यन्मदोऽपि पदक्रमः। भवेत् कविकुरङ्गाणां चापलं तत्र कारणम् ।।" ‘विदग्धमुखमण्डन’ के रचयिता धर्मदास ने उल्लेख किया है कि सुन्दर वर्ण, स्वर, पद, रस और भाव से संसार के मन को हरने वाली युवती बाण की वाणी ही है। “रुचिरस्वरवर्णपदा रसभाववती जगन्मनो हरति। सा किं तरुणी? नहि, नहि, वाणी बाणस्य मधुरशीलस्य ।।” विकटाक्षरबन्ध अर्थात् अक्षरों या वर्णों के बन्ध की उदारता-जिसकी अवस्थिति में शब्द मानो नृत्य करने लगते हैं।’ म.म. डॉ. पी. वी. काणे का कथन है कि विकटत्व का अभिप्राय शब्द-ध्वनि भाव की प्रतिध्वनिरूप होना चाहिए। प्रो. कावेल तथा थामस का कहना है कि विकटत्व का अभीष्ट भाषा के भावप्रधान शाब्दिक वैभव से युक्त होने से है। १. द्रष्टव्यः-“विकटत्वमुदारता-वृत्ति -बन्धस्य किं विकटत्वं यदसौ उदारता। यस्मिन्सति नृत्यन्तीव पदानीतिजनस्य वर्णभावना भवति तत् विकटत्वं लीलायमानत्वमित्यर्थः” वामन-काव्यालंकारसूत्रवृत्ति- III १.२२.गद्य-खण्ड शब्दों का चयन विषय के अनुरूप हो यही विकटाक्षरबन्ध से तात्पर्य है। बाण ने इसे संकेतित किया है। उपर्युक्त गुण ‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ दोनों में विद्यमान है। हर्षचरित में निदाघ तथा तत्कालीन उन्मत्त मातरिश्वा के भीषणवर्णन में कटु तथा कर्ण कर्कश शब्दों का चयन हुआ है। ‘कादम्बरी’ के विन्ध्याटवी के भयंकर दृश्यों को उपस्थित करने हेतु कवि कर्णकटु उत्कट पदों का प्रयोग करता है। इसी प्रकार किसी कामिनी के रूप-लावण्य-वर्णन में कवि की शब्दावलि नितान्त ललित तथा मधुर हो जाती है। इन वर्णनों में एक ही बात खटकने लगती है कि इन स्थलों पर बाण ने प्रायः लम्बे-लम्बे समासों तथा वाक्यों का प्रचुरता से प्रयोग किया है। कहीं-कहीं तो अर्थ व गति में जटिलता आ गई है। इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है जिसकी ओर पाश्चात्त्य जर्मन संस्कृत समीक्षक बेवर ने संकेत किया है। बेवर की उक्ति कटु प्रतीत होती है, क्योंकि यद्यपि दीर्घ समास तथा अपेक्षाकृत वाक्यों की विशालता, उस पर श्लेषप्रधान अलंकारों की योजना साधारण पाठकों के लिए भारस्वरूप तथा जटिल बन गई है। तथापि विकटाक्षर बन्ध और अलंकृत शैली के युग में आविर्भूत बाण के लिए उससे अछता रहना सर्वथा असम्भव था। काव्य-तत्त्व के मर्मज्ञों तथा अनेकानेक भारतीय आलोचकों तथा कवियों ने बाण की शैली की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। वस्तुतः बाण का वास्तविक मूल्यांकन उनके परवर्ती भारतीय समीक्षकों से ही ज्ञात होता है। गोवर्धनाचार्य का कथन है कि अत्यन्त प्रगल्भ बनने के लिए भगवती सरस्वती ही बाण के रूप में अवतरित हो गई है : “जाता शिखण्डिनी प्राग् यथा शिखण्डी तथाऽवगच्छामि। प्रागल्भ्यमधिकमाप्तुं वाणी बाणो बभूवेति।।” बाण ने सर्वत्र समासबहुला तथा विस्तृत वाक्यों वाली शैली का ही प्रयोग मात्र नहीं किया है। अपनी दोनो रचनाओं में भावप्रधान, मार्मिक एवं गम्भीर वर्णनों में भावों को १. द्रष्टव्यः-“केवलोऽपि स्फुरन् बाणः करोति विमदान् कवीन्, किं पुनः क्लृप्तसन्धानपुलिन्ध्रकृतसन्निधिः।’ कादम्बरीसहोदर्या सुधया वैबुधे हृदि, हर्षाख्यायिकाऽख्यायि बाणोऽब्धिरिव लब्धवान् ।। धनपाल-तिलकमंजरी श्लोक २६.२७ बाणस्य हर्षचरिते निशितामुदीक्ष्य, शक्तिं न केऽत्र कवितास्त्रमदं त्यजन्ति। मान्द्यं न कस्य च कवेरिह कालिदासवाचां रसेन रसितस्य भवत्यधृष्यम् ।। बागीश्वरं हन्त भजेऽभिनन्दमर्थेश्वरं वाक्पतिराजमीडे। रसेश्वरं स्तौमि च कालिदासं बाणं तु सर्वेश्वरमानतोऽस्मि।। बाणः कवीनामिह चक्रवर्ती चकास्ति यस्योज्ज्वलवर्णशोभा। एकातपत्रं भुवि पुष्पभूतिवंशाश्रयं हर्याचरित्तमेव।।” सोढल-उदयसुन्दरीकथा गद्य-काव्य ५७ द्रुतगतिशील बनाने वाले लघु से लघुतम वाक्यों तथा समासरहित पदों का प्रयोग भी बाण ने किया है। शुकनास के द्वारा चन्द्रापीड़ को उपदेश देने के समय, कपिजल द्वारा ब्रहचारी पुण्डरीक के कामव्यथासंतप्त होने पर गर्हणा के अवसर पर एवं इसी प्रकार अनेक भावप्रधान स्थलों के चित्रण के समय लघु कलेवरात्मक प्रासादिक वाक्यों की शोभा दर्शनीय तथा हृदयावर्जक है। कहने का तात्पर्य कि बाण की लेखनी स्वच्छन्दविचरणशील है जो विषयानुसार अपनी शैली में परिवर्तन से पाठकों को चमत्कृत भी करती रहती है। श्रीचन्द्रदेव ने उल्लेख किया है कि बाण गम्भीर-धीर-कविता रूपी विन्ध्याटवी में सर्वत्र विचरण करने वाले तथा कवि रूपी हाथियों के कुम्भस्थल को विदीर्ण करने वाले पंचानन अर्थात् सिंह हैं : “श्लेषे केचन शब्दगुम्फविषये केचिद् रसे चापरेऽ, लङ्कारे कतिचित्सदर्थविषये चान्ये कथावर्णने। आः सर्वत्र गभीर-धीर-कविता-विन्ध्याटवीचातुरी संचारी कविकुम्भिकुम्भभिदुरो बाणस्तु पंचाननः।।" बाण किसी शैली-विशेष के क्रीतदास नहीं हैं। इन्होंने अल्पसमासयुक्तशैली, दीर्घसमासबहुला एवं समासरहित शैली-इन तीनों शैलियों का प्रयोग विषयानुसार किया है, जिन्हें आलंकारिक साहित्यदर्पणकार ने चूर्णक, उत्कलिका एवं आविद्ध इन तीन अभिधानों से अभिहित किया है। __ वस्तुतः विकटाक्षरबन्धयुक्त गौड़ी रीति और मधुर तथा सरस पदावली से युक्त वैदर्भी रीति समन्वित रूप पाञ्चाली रीति ही बाण की शैली है, जिसमें शब्द और अर्थ दोनों का गुम्फन समभाव से हुआ है अर्थात् जिसमें अर्थ के अनुसार शब्दों की योजना प्रस्तुत की गई हैं। आलंकारिक राजशेखर के मतानुसार महाकवि बाण की शैली पाञ्चाली रीति का भव्य निदर्शन है: “शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चालीरीतिरिष्यते। - शिलाभट्टारिका-वाचि बाणोक्तिषु च सा यदि।।” बाण की दूसरी उल्लेखनीय विशेषता यह है कि बाण शब्द-सम्पदा के धनी कवि हैं और शब्दों के ऊपर-उनका प्रभुत्व अखण्ड है। शब्द या भाव का प्रयोग एक बार कर देने के उपरान्त बाण उसकी पुनरुक्ति नहीं करते । किसी उपमान के सभी पर्यायवाची रूपों १. द्रष्टव्यः-“चूर्णकमल्पसमासं दीर्घसमासमुत्कलिकाप्रायम् । समासरहितमाविद्धं वृत्तभागान्वितं वृत्तगान्धि ।।” ५८ गद्य-खण्ड का प्रयोग प्रायः एक ही साथ कर देते हैं। हर्षचरित तथा कादम्बरी दोनों कृतियों के सम्मिलित सार्वभौमिक रूप को देखकर यह स्वीकार करने में संकोचानुभूति नहीं होती कि ये दोनों ग्रन्थ विश्वकोशात्मक हैं जिसमें प्रायः सभी शब्दों का प्रयोग हो गया है। संस्कृत वाङ्मय में महाकवि माघ “नवसर्गगते माघे नव शब्दो न विद्यते” के लिए ख्यातिप्राप्त हैं। इस दृष्टिकोण से मूल्यांकन करने पर बाण की दोनों रचनाएँ कथमपि न्यून नहीं हैं, प्रत्युत जहाँ माघकाव्य में शब्द यत्र-तत्र विकीर्ण हैं, तो इसके विपरीत बाण की कृतियों में एक ही स्थान पर शब्दविशेष के पर्यायवाची शब्द सुलभ हो जाते हैं। महाकवि कालिदास के उपमान, अपने उपमेय की लिङ्, विभक्ति, वचन एवं साधर्म्य में जिस प्रकार समग्ररूप से अनुवर्त्तन करते हैं, उसी प्रकार बाण के उपमान सर्वथा सटीक उतरते हैं। अतः यह कहना पड़ता है कि बाण ने ‘उपमा कालिदास्य’ को सर्वथा अपने सम्मुख रखा है। अतः वास्तव में क्या शब्दों के प्रयोग के क्षेत्र में अथवा अर्थगौरवपूर्ण भावों की अभिव्यक्ति के क्षेत्र में अथवा अलंकारों की सुयोजना की सज्जा में बाण ने काव्य के किसी कोने को बिना स्पर्श तथा अपनी विशिष्टता की छाप से अछूता नहीं छोड़ा। अतः सहृदय हृदय समीक्षकों को “बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्” इस उक्ति को उच्चस्वर से उद्घोषित ही करना पड़ा। राजशेखर की निम्नलिखित उक्ति कितनी सटीक तथा सार्थक है कि हर्षचरित और कादम्बरी के साथ बाण की वाणी पुरुषरूप में पृथ्वीतल पर स्वच्छन्द विचरण करती है : “सहर्षचरिता शश्वद् धृतकादम्बरीरूपा। बाणस्य वाण्यनार्येव स्वच्छन्दा चरति क्षितौ।।”