१६ पण्डितराज जगन्नाथ के काव्य

संस्कृत साहित्य के मूर्धन्य कवि एवं प्रौढ़ काव्यशास्त्री, दार्शनिक, वैयाकरण, आलोचक, अपनी रसमाधुरी से पाठकों को उपकृत करने वाले, मुगलसाम्राज्य की वैभवश्री के भोक्ता, विद्वद्वरेण्य, प्रकाण्ड पण्डित स्वनामधन्य पण्डितराज जगन्नाथ कालिदास की काव्य-परम्परा तथा भामह की काव्यशास्त्र-परम्परा में अन्तिम प्रखर आलोकसम्पन्न ज्योतिस्तम्भ थे। पण्डितराज ने अपनी सर्वशास्त्रार्थविवेचनी, सर्वतोमुखी विलक्षण प्रतिभा से प्रभूत साहित्य सर्जना कर संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया। यह समृद्धि अपने शाश्वत तथ्यों, निष्पक्ष विवेचनाओं, मौलिक उद्भावनाओं, उन्मुक्त कल्पनाओं, स्वस्थ चिन्तनों और निर्भय चर्चाओं के कारण आज भी उतनी ही भास्वर है, जितनी पहले थी। अपने जीवन की कृतकृत्यता से सन्तुष्ट पण्डितराज की गर्वोक्ति द्रष्टव्य है - कार मानक का कामशास्त्राण्याकलितानि नित्यविधयः सर्वेऽपि सम्भाविता दिल्लीवल्लभपाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः। सम्प्रत्युज्झितवासनं मधुपुरीमध्ये हरिः सेव्यते - सर्व पण्डितराजराजितिलकेनाकारि लोकाधिकम् ।। भा.वि. ४५ - 105 पण्डितराज जगन्नाथ तैलंग ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम पेरुभट्ट था, माता का नाम महालक्ष्मी था, जैसा कि ‘प्राणाभरणम्’ नामक रचना में उल्लेख है - पिक विमागाणार तैलंगान्वयमंगलालयमहालक्ष्मी-दयालालितः श्रीमत्पेरमभट्ट-सूनुरनिशं विद्वल्ललाटन्तपः।न्य काव्य-खण्ड की जगनाथ के पिता अनेक शास्त्र-पारंगत थे। जगन्नाथ के प्रथम गुरु उनके पिता थे, जिनके विषय में रसगङ्गाधर के इस प्रस्तावनाश्लोक में इसका स्पष्ट संकेत है - (श्रीमद्ज्ञानेन्द्रभिक्षोरधिगतसकलब्रह्मविद्याप्रपंचः FIAT DE FONTE काणादीराक्षणादीरपि गहनगिरो यो महेन्द्रादवेदीत्। देवादेवाध्यगीष्ट स्मरहरनगरे शासनं जैमनीयम् ह क शेषांकप्राप्तशेषामलभणितिरभूत् सर्वविद्याधरो यः।। (रस.१२) इन्हीं के सान्निध्य में जगन्नाथ ने संस्कृत में लेखन, कवन, चिन्तन और विवेचन में अप्रतिम प्रावीण्य प्राप्त किया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने काशी निवासी शेषवंश के वीरेश्वर से तथा अन्य पण्डितों से ज्ञान की प्रौढता प्राप्त की थी। साथ ही अपने परिश्रम से व्रजभाषा, फारसी, अरबी और अन्य भाषाओं का ज्ञान भी अर्जित किया था। यह संगीतज्ञ भी बताए जाते हैं। शाहजहाँ के दरबार में स्वरचित पद्यों की संगीतमय प्रस्तुति करते थे। पादशाहनामा में इन्हें कलावन्त कहा गया है। इनकी कला से अभिभूत होकर इन्हें महाकविराय की उपाधि दी गई थी, जिसका उल्लेख एम.आर. शास्त्री ने अपने एक लेख में किया है। मुगल बादशाह शाहजहाँ ने इनके वैदुष्य से प्रभावित होकर अपने पुत्र द्वाराशिकोह को संस्कृत पढ़ाने हेतु बुलाया और उन्होंने ही इन्हें ‘पण्डितराज’ की उपाधि से अलंकत किया था। कहा जाता है कि किसी नरेश (नाम अज्ञात) ने इन्हें अपने आश्रय में बुलाने का प्रस्ताव किया था, पर उसे इन शब्दों के साथ अस्वीकार कर दिया था - ताज वजीर म दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा मनोरथं पूरयितुं समर्थः। कति FRIE REअन्यैर्नृपालैः परिदीयमानं शाकाय वा स्याल्लवणाय वा स्यात् ।। सम्भव है यह उक्ति कभी दिल्लीनरेश की चाटुकारिता में ही लिखी गई हो। यहाँ जगदीश्वर पद का सम्बन्ध कुछ विद्वान उदयपुर के जगतसिंह से बताते हैं, पर यह सामान्यतः परमेश्वरवाची प्रतीत होता है। किंवदन्तियों में आमेरनरेश मिर्जा राजा जयसिंह का उल्लेख आता है, पर इन्होंने अपनी रचनाओं में कहीं उनका उल्लेख नहीं किया है। पण्डितराज बड़े स्वाभिमानी व्यक्ति थे। अपनी विद्वता और रचनाधर्मिता पर उन्हें बड़ा गर्व था। उनकी गर्वोक्तियाँ रचनाओं में यत्र-तत्र सर्वत्र दृष्टिगत होती है। उनका कथन था ‘कवयति पण्डितराजे कवयन्त्यन्ये ऽपि विद्वांसः’। ता पण्डितराज की सारस्वत साधना विलक्षण थी। अपने वाणीविलास पर उनको गर्व था। ‘प्राणाभरण’ में उन्होंने लिखा परवर्ती संस्कृत महाकाव्य विद्वांसो वसुधातले परवचःश्लाघास वाचयमाः । भूपालाः कमला-विलास-मदिरोन्मीलन्मदाघूर्णिताः। आस्ये धास्यति कस्य लास्यमधुना धन्यस्य कामालस स्वर्वामाघरमाधुरीमधरयन् वाचां विलासो मम।।

काल

पण्डितराज के समय के विषय में डा. एस.के.के. और डा. आर्येन्द्र शर्मा ने विस्तार से विचार किया है। तदनुसार इनका सम्बन्ध जहाँगीर वि.सं. १६६२-१६८४ (ई. १६०५-१६२७), जगत्सिंह वि.सं. १६८५-१७१६ (ई. १६२८-१६५६) शाहजहाँ वि.सं.१६८५-१७१५ (ई. १६२८-१६८५) और प्राणनारायण वि.सं. १६६०-१७२३ (ई. १६३३-१६६६) से रहा। अर्थात् वह प्रारम्भ से कुछ समय जहाँगीर के आश्रय में रहे। तत्पश्चात् उदयपुर चले गये। ‘जगदाभरण’ में उदयपुर नरेश जगत्सिंह का वर्णन है - हालाश्रीराणाकलिकर्णनन्दन जगत्सिंहप्रभोवर्णनम्। श्रीमत्पण्डितरायसत्कविजगत्राथो व्यतानीदिदम् ।। इस प्रकार पण्डितराज का स्थितिकाल १६०५ से १६८० के लगभग माना जा सकता है। इनके ग्रन्थों का रचनाकाल १६२० से १६६० माना गया है, क्योंकि “चित्रमीमांसाखण्डन’ की एक हस्तलिखित प्रति १६५२-५३ की उपलब्ध हुई है। गौ पाल

रचनाएँ

पण्डितराज जगनाथ की निम्नलिखित रचनाएँ विदित हैं - (१) गङ्गालहरी, (२) अमृतलहरी, (३) करुणालहरी या विष्णुलहरी, (४) लक्ष्मीलहरी तथा (५) सुधालहरी- ये पाँच लहरियाँ स्तोत्र हैं। (६) भामिनीविलास- यह पण्डितराज के स्फुट पद्यों का उन्हीं के द्वारा किया गया संकलन है। इसमें प्रास्ताविकविलास, शृङ्गारविलास, करुणविलास तथा शान्तविलास- ये चार खण्ड हैं। फका (७) आसफविलास- पण्डितराज ने इसे आख्यायिका कहा है। इसमें आरम्भ में पाँच पद्य हैं, तथा प्रशस्तिपरक बहुत थोड़ा सा गद्य है। (८) रसगङ्गाधर- यह काव्यशास्त्र का अत्यन्त प्रौढ और मौलिक ग्रन्थ है। जितु । (E) चित्रमीमांसाखण्डन-यह शास्त्रीय ग्रन्थ श्री अप्पयदीक्षित की चित्रमीमांसा की कठोर समीक्षा है। सामान्य निकाय शिट के आमालमा (१०) मनोरमाकुचमर्दन- यह व्याकरणशास्त्र में सिद्धान्तकौमुदी की मनोरमा टीका का खण्डन है। ५.६६ (११) काव्यप्रकाशटीका-यह अप्रकाशित है। मिथिला में इसकी हस्तलिखित प्रति होने का उल्लेख मिलता है।’ (१२) शब्दकौस्तुभकाणोत्तेजन (१३) प्राणाभरण तथा (१४) जगदाभरण।

१. सुधालहरी

यह रचना प्रथमतः ‘काव्यमाला’ में १८६३ और १९२६ में प्रकाशित हुई थी। यह मात्र स्तुतिप्रार्थनापरक नहीं है। इसके ३० सन्धरा छन्दों में सूर्य का जीवनरक्षक ऊर्जा-स्रोत के रूप में वर्णन हुआ है। इसके अतिरिक्त सूर्य की कालगणना का आधार, ब्रह्माण्डीय ग्रहों और उपग्रहों के लिए कान्तिदाता, विविध रोगों का नाशक, प्रकृति का उदयास्तकालीन प्रकाश तथा अन्य नाना दृश्यों का चित्रक तथा शक्तिमत्ता का उद्भावक कहा है। सुधास्वादीयसी माधुरी, रसावर्जिका, भावानुप्राणिता, कल्पनाश्रिता तथा प्रौढपाण्डित्यसमन्विता कविता क्या आकर्षित नहीं करती ? प्रथम पद्य द्रष्टव्य है - पर उल्लासः फुल्लपकड़ेहपटलपतन्मत्तपुष्पन्धयानां निस्तारः शोकदावानलविकलहृदां कोकसीमन्तिनीनाम्। उत्पातस्तामसानामुपहतमहसां चक्षुषां पक्षपातः । नाम प संघातः कोऽपि धाम्नामयमुदयगिरिप्रान्ततः प्रादुरासीत् ।। सु.हो.’ वक्ष उदय होता सूर्य प्रकृति में अपनी छटा बिखेरता है, जगत् को रंगीन बना देता है और सभी को कर्म के लिए प्रेरित करता है। अस्त होते सूर्य का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका आकलन नवोढाओं, प्रौढ भावुक युवतियों तथा विरहिणियों के सन्दर्भ में द्रष्टव्य है - प्रत्यग्रौढा प्रगल्भा युवतिपरिषदः प्रोषितप्राणनाथा को यस्मिन्नस्ताद्रिमौलेरुपरि मणिमयच्छत्रलीला दधाने। सत्रासं सप्रसादं परिणतकरुणं लोचनान्युत्क्षिपन्ति स्थेमानं स प्रियाणां घटयतु भगवान् पद्मिनीवल्लभो नः।। १४ ।। आप विस्तुतः यह रचना अत्यन्त मनोहर और रमणीय है। चित्रमयता कल्पना-प्रवणता तथा प्रातिभ उत्कृष्टता सर्वत्र दृष्टिगत होती है। भाषा प्राञ्जल और स्वारस्यपूर्ण है, जिसमें औज, प्रसाद, माधुर्यादि गुण प्रतिपद दृष्टिगत होते हैं। उपमा, उल्लेख और प्रान्तिमान् आदि अलकार चमत्कार उत्पन्न करते हैं। वर्णानुप्रास अत्याकर्षक है। प्रस्तुत पद्य में भावोत्कृष्टता के साथ-साथ जकार की आवृत्ति पाठक को चमत्कृत कर देती है - जाना कि न मालिक कि-शिमतमानकी गापामार का मालिक () १. पण्डितराजकाव्यसङ्ग्रह : सं. आर्येन्दु शर्मा, भूमिका, पृ. ७। पति परवर्ती संस्कृत महाकाव्य वा जीवातुर्जाड्यजालाधिकजनितरुजां तप्तजाम्बूनदाभं ली में जङ्घालं जाङ्घिकानां जलधिजठरतो जृम्भमाणं जगत्याम्। जीवाधानं जनानां जनकमयरुचो जीवजैवातकादे-के TEEM गाना यॊतिर्जाज्वल्यमानं जलजहितकतो जायतां नो जयाय। PES UPER

२. अमृतलहरी

पण्डितराज का यमुनापरक स्तोत्रकाव्य अमृतलहरी है। कहीं-कहीं इसे यमुनालहरी भी कहा गया है। इसमें कुल दश शार्दूलविक्रीडित पद्य हैं। इसके अतिरिक्त अन्तिम पद्य परिचयात्मक अनुष्टप है। प्रथमतः यह काव्यमाला में १८६३ और १६२६ में प्रकाशित हुई थी। यहाँ यमुना के जल को अमृततुल्य मानकर उक्त नामकरण किया गया है। यद्यपि यमुना गङ्गा के समान पवित्र और मान्य नहीं है, तथापि वैष्णव सम्प्रदाय और विशेषतः वल्लभ सम्प्रदाय में यमुना का महत्त्व सर्वातिशायी है। पण्डितराज वल्लभाचार्य के परनाती थे, अतः शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग का प्रभाव स्वाभाविक था। इसमें श्रीमद्भागवत की परम्परा में यमुना के वंशवर्णन का भी संकेत है। परम्परया यमुना और श्रीकृष्ण जैसे पर्याय बन गए हैं। यहाँ भी वल्लभाचार्य के यमुनाष्टक के ‘श्रीकृष्णतुर्यप्रियाम्’ पद (पद्य ३) की भाँति यमुना को ‘श्रीकृष्णनित्यप्रिये’ के रूप में सम्बोधित किया गया है संज्ञाकान्तसुते कृतान्तभगिनि श्रीकृष्णनित्यप्रिये पापोन्मूलिनि पुण्यधात्रि यमुने कालिन्दि तुभ्यं नमः। एवं स्नानविधौ पठन्ति खलु ये नित्यं गृहीतव्रता । स्नानामन्त्रितसंख्यजन्मजनितं पापं क्षणादुज्झति।। १०।। रचना के प्रारम्भ में यमुना के नीला-जल और उसके गुणों का प्रभावी चित्रण किया गया है। वह विष्णुस्वरूपा है और भक्तों की आराध्या है। श्लोकों में प्रयुक्त शैली, पद-शय्या, शब्दगुम्फन और वाक्यसंग्रन्थन उनके व्यक्तित्व को उजागर करते हैं। पद्यों में सानुप्रासिक छटा स्तुत्य है। एक पद्य उदाहार्य है- ४ निजि शि कालिन्दीति कदापि कौतुकवशात् त्वनामवर्णानिमान् र काय कवि विमा व्यस्तानालपतां नृणां यदि करे खेलन्ति संसिद्धयः। तातिर जाँट पीय लिमिट गिअन्तन्तिकुलान्तकारिणि तव क्षिप्तामृते वारिणि । अति विकार कि निहालोर स्नातानां पुनरन्वहं स महिमा केनाधुना वर्ण्यते।।

३. लक्ष्मीलहरी

धन, शक्ति और सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी का स्तवन इकतालीस शिखरिणी छन्दों में किया गया है। यहाँ परम्परया लक्ष्मी के स्वरूप और उनके आयुधादि का चित्रण काव्यमयी ५६८ मनाम काव्य-खण्डमाका शैली में किया गया है। लक्ष्मी के वेदोक्त, पुराणोक्त, तन्त्रोक्त तथा इतर कविप्रोक्त स्तुतियों का संसूचनात्मक उल्लेख लहरी को गाम्भीर्य और गरिमा प्रदान करता है। संस्कृत में अभीष्ट देवता के आनखशिख वर्णन की परम्परा रही है। पण्डितराज ने दोनों शैलियों को अपनाया है। विष्णुस्तुतिपरक करुणालहरी में जहाँ आशिखनख चित्रण है, वहाँ इस लहरी में आनखशिख यह चित्रण षष्ठ पद्य में चरणों से प्रारम्भ होकर अड़तीसवें पद्य में जुड़ा या चोटी के वर्णन तक जाता है। कटि की तनुता का अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण दार्शनिक पृष्ठ भूमि में १७वें पद्य में, जगन्मिथ्यात्व का और १८वें पद्य में बौद्धों के शून्यवाद का आश्रय लेकर किया गया है। शून्यवाद की बौद्ध सिद्धान्तसरणि कटि में समा गई अर्थात् कटि है ही नहीं। पूर्ण श्लोक इस प्रकार है निया की अनल्पैर्वादीन्द्रैरगणितमहायुक्तिनिवहै- वाशिम जिक की मां का निरस्ता विस्तारं क्वचिदकलयन्ती तनुमपि । FIEDS किया तो शलाका असत्ख्यातिव्याख्याधिकचतुरिमाख्यातमहिमा- कि शाला पाणी कि नाविलग्ने लग्नेयं सुगतमतसिद्धान्तसरणिः॥१॥ इस लहरी के प्रारम्भिक पाँच पद्यों में लक्ष्मी के करुणा-कटाक्ष की कामना की गई है और अन्तिम तीन पधों में स्तोत्र का उपसंहार किया गया है। अन्तिम पद्य अवलोकनीय रमे पद्म लक्ष्मि प्रणतजनकल्पद्रुमलते सुधाम्मोधेःपुत्रि त्रिदशनिकरोपास्तचरणे । परे नित्यं मातर्गुणमयि परब्रह्ममहिले जगनाथस्याकर्णय मुदुलवर्णावलिमिमाम्।। ४१ सम्पूर्ण लहरी में पण्डितराज की रसभाववती और कल्पनामयी वैदग्धी प्रशस्य तथा का निकला सान्ति सामान नीचा नातालताका कपूर कि नियमित

४. करुणालहरी

सम्पूर्ण लहरी में विष्णुस्तुतिपरक पचपन पद्य हैं, जो वंशस्थ, सुन्दरी या वियोगिनी और पुष्पिताग्रा आदि छन्दों में निबद्ध हैं। विष्णुपरक स्तोत्र-लेखन-परम्परा वैदिक सूक्त से प्रारम्भ होकर पुराण तथा आधुनिक काल तक बराबर प्रचलित है, जिसमें उनके कार्यों और जगत्कर्तृत्व रूप का चित्रण विविध सम्प्रदायों ने अपनी शैली में किया है। पण्डितराज ने उन्हें मयूरपिच्छधारी द्विभुज कृष्ण मानकर उनका आशिखनख वर्णन किया है। इसमें अजामिलमुक्ति और गजेन्द्रमोक्ष आदि प्रसंगों का स्मरण तथा पतितोद्धारपरायण भगवान् विष्णु के प्रति समर्पणभाव द्रष्टव्य है। प्रार्थना इसका मुख्य विषय है और जैसा कि नाम से स्पष्ट है। सम्पूर्ण परवर्ती संस्कृत महाकाव्य ५६६ लहरी में श्रीमद्भागवत और वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग का प्रभाव परिलक्षित होता है। अनुप्रासादि शब्दालंकारों तथा अर्थालंकारों का समुचित प्रयोग है। शैली अत्यन्त मनोहारिणी और काव्यात्मक गुणों से ओतप्रोत है।

५. पीयूषलहरी

यही सर्वाधिक लोकप्रिय गङ्गालहरी है, जो गृहस्थों और धार्मिकों की नित्यपाठ-वस्तु है। इसके बावन पद्यों में से ४८ पद्य शिखरिणी में और शेष पृथ्वी, शार्दूलविक्रीडित स्रग्धरा और उपजाति में हैं। इसमें पतितपावनी और पापनाशिनी गङ्गा का पौराणिक परम्परा में चित्रण है और मोक्ष-प्राप्ति की कामना की गई है। मयूर कवि ने कुष्ठरोग निवारणार्थ मयूरशतक लिखा था, उसी प्रकार कुछ विद्वान् इस स्तोत्र का सम्बन्ध लवंगी-प्रसंग से जोड़ते हैं। पण्डितराज के काशी आने पर पण्डितों और ज्ञाति-बान्धवों द्वारा जाति-बहिष्कृत होने पर भी उन्होंने कोई परवाह न की और अपने पाण्डित्य के बल पर धाक जमाए रखी, तथापि अपने उद्धार हेतु अथवा औचित्य किं वा पवित्रता सिद्ध करने हेतु इस स्तोत्र की रचना की। उपरिनिर्दिष्ट किंवदन्ती के अनुसार गङ्गातट पर बैठकर रचे प्रत्येक श्लोक पर गगा एक सोपान ऊपर आ जाती थी और अन्तिम पद्य की समाप्ति पर गङ्गा स्वयं मकराधिरूढ होकर प्रत्यक्ष आई और दम्पती को अपनी गोद में लेकर अन्तर्धान हो गई। इस प्रसंग को अधिकांशतः कपोल-कल्पित माना जाता है, क्योंकि रसगङ्गाधर में गङ्गालहरी के पद्य उद्धृत हैं।

  • इस रचना में काव्यात्मक सौन्दर्य उत्तम कोटि का है। पद्यों में पदशय्या रमणीय है और संगीतात्मकता स्मरणीय है। भाषा के प्रयोग ने उनकी शैली को स्वारस्यपूर्ण बना दिया है। गङ्गाजल की प्रशस्ति में लिखा गया प्रथम पद्य द्रष्टव्य है - समृद्धं सौभाग्यं सकलवसुधायाः किमपि तनू महैश्वर्य लीला-जनित-जगतः खण्डपरशोः। श्रुतीनां सर्वस्वं सुकृतमथ मूर्त सुमनसा सुधा-सौन्दर्य ते सलिलमशिवं नः शनयतु।। प्रत्येक पद्य कवि की काव्य-कला पर अधिकार द्योतित करता है। गङ्गा नदी के आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही उसके दृश्यात्मक सौन्दर्य को विस्मृत नहीं किया गया है, ४८वें पद्य में गङ्गा का मानवीकृत रूप प्रस्तुत किया गया है। उसे मकराधिष्ठित बताया गया है, जिसके चारों हाथों में अमृतमय कलश, चन्द्रखण्ड से सुशोभित तथा अभय और आशीर्वाद प्रदान करने वाली मुद्रा से युक्त चित्रित किया गया प्रयाणा काव्य-खाण्ड । * कि कार न्द्रश्वेतां शशिशकल शोभालमुकुटा पसरा विपी पनि मानव गतिरैः कुम्भाभोजे वर-भयनिरासौ च दधतीम्। तारा शोक सुधाधाराकाराभरणबसनां शुभ्रमकर- 8 लाज नीति स्थितां त्वां ये ध्यायन्त्युदयति न तेषां परिभवः।। इस लहरी के अन्त में परम्परया फलश्रुति भी दी गई है - इमा पीयूषलहरी जगन्नाथेन निर्मिताम्। प्रा। गाजा यः पठेत्तस्य सर्वत्र जायन्ते सुखसम्पदः।। R E ITE

भामिनिविलास

यह रचना कवि की अन्तःस्फूर्त भावनाओं का एवं उद्भूत मनोद्गारों का चारु चयन है। इसका प्राशन निर्णयसागर प्रेस से १६३५ में हुआ था। तद्नुसार इसके प्रथम अन्योक्ति या पास्ताविकविलास तथा श्रृङ्गारविलास में १००-१०० पद्य, तृतीय करुणविलास में १E और चतुर्थ शान्तविलास में ३३ पद्य हैं। इसके नामकरण में यादृच्छिकता प्रतीत होती है, क्योंकि चारों विलासों में भामिनी शब्द की सत्ता नहीं है और न ही भामिनी के शब्दार्थ ‘कोपना स्त्री’ को द्वितीय और तृतीय विलासों के कतिपय पद्यों को छोड़कर सर्वत्र संगत किया जा सकता है। संभव है कवि ने ‘भामिनीविलास’ की सर्जना अपनी पत्नी भामिनी के नाम पर किया हो। यह भी ध्येय है कि प्रथम विलास की तथाकथित अन्योक्तियाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार स्वरूपिणी हैं। इनमें व्यावहारिक सत्य को उद्भावित किया गया है। द्वितीय विलास में श्रृगार के सम्भोग और विप्रलम्भ का मार्मिक चित्र खींचा गया है। विप्रलम्भ का एक हृदयावर्जक चित्रण अवलोकनीय है - दयितस्य गुणाननुस्मरन्ती शयने । सन्त्रात या पिलाता गातार अधुना किल हन्त सा कृशांगी गिरमङ्गीकुरुते न भाषिताऽपि ।। करुण वि. १८ इस मुक्तक काव्य के अनेक श्लोक सुभाषित के रूप में प्रसिद्ध हैं। स्वयं कवि ने अपने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों विशेषतः ‘रसगङ्गाधर’ में रस-अलङ्कार-रीति-गुण के उदाहरण के रूप में इसके अनेक पद्य उद्धृत किये हैं। समस्त रचना सरस और भावपूर्ण पद्यों से ओतप्रोत है। अपनी कवि-प्रतिभा से आश्वस्त कवि स्वयं लिखता है - दुर्वृत्ता जारजन्मानो हरिष्यन्तीति शंकया। मदीयपद्यरत्नानां मंजूषेयं कृतिर्मम ।। परवर्ती संस्कृत महाकाव्य ५७१ (दुर्बल जारज कहीं मेरा काव्य चुरा न ले- इसलिये अपने स्फुट पद्यों का मैंने यह संकलन कर लिया है।) रचना में काव्यसौन्दर्य पदे पदे अवलोकनीय है। ललित शैली में माधुर्यगुण की छटा देखिये - तीरे तरुण्या वदनं सहासं नीरे सरोजञ्च मिलद्विकासम्। आलोक्य धावत्युभयत्र मुग्धा मरन्दलुब्धालिकिशोरमाला ।। (तरुणी का वदन तीर पर और विकसित कमल नीर पर देखकर भोले भौंरों की कनार कभी इधर मँडराती है कभी उधर) रमणीयता का प्रतिपादक और प्रसाद गुण का पोषक यह पद्य उदाहार्य है -: अयि दलदरविन्द स्यन्दमानं मरन्दं बस की कि अकया त्यज किमपि लिहन्तो मञ्जु गुञ्जन्तु भृगाः। मिनार दिशि दिशि निरेपक्षस्तावकीनं विवृण्वन् माया कि परिमलमयमन्यो बान्धवो गन्धवाहः ।।

७. जगदाभरणम्

यह एक लघुकाव्य है, जो उदयपुर के राजा कर्णसिंह के पुत्र राजा जगत्सिंह (१६२८-१६५६) की प्रशस्ति में लिखा गया है। यह पाण्डुलिपि में प्रदत्त पुष्पिका से ज्ञात होता है। पर कुछ अन्य पाण्डुलिपियों के पाठ के अनुसार यह दाराशिकोह की प्रशस्ति में लिखा गया काव्य है। यह मत वैभिन्न्य अद्यावधि विद्यमान है। अन्तिम श्लोक इस प्रकार HESE ARDE तैलङ्गान्वयमङ्गलालयमहालक्ष्मीदयालालितः। श्रीमत्पेरमभट्टसूरितनयो विद्वललाटन्तपः ।। निय श्रीराणा कलिकर्णनन्दन जगत्सिंहप्रभोवर्णनं सक्षम नाम श्रीमत्पण्डितरायसत्कविजगन्नाथो व्यतानीदिदम्।। जिला तालीम साताठ कि काका गला शक्यमर मिलाकर विवाणका छि ८. प्राणाभरणम् - किए। म नात निहिण काका गीत कामरूप (आसाम) वासी प्राणनारायण की प्रशस्ति में लिखी यह रचना काव्यमाला में प्रकाशित हुई थी। इसके अधिकांश पद्य ‘जगदाभरमण’ के पद्यों से मिजते-जुलते हैं। नाम का ही अन्तर है। दाराशिकोह, राजा जगत्सिंह और प्राणनारायण के नामों का पद्यविशेष में यथावसर प्रयोग किया गया प्रतीत होता है। यथा - माहात्म्यस्य परोऽवधिर्निजगृहं गम्भीरतायाः पिता () रत्नानामहमैक एव भुक्ते को वाऽपरो मादृशः। ५७२ काव्य-खण्ड इत्येवं परिचिन्त्य मा स्म सहसा गर्वान्धकारं गमो दुग्धाब्धे भवतां समो विजयते श्रीप्राणनारायणः ।। इसी श्लोक की चतुर्थ पंक्ति जगदाभरणम् में इस प्रकार है - “दुग्धाब्धे भवता समो विजयते श्रीकर्णजन्मार्णवः’। कहीं-कहीं पाठ दाराशिकोह परक है - दुग्धाब्धे भवता समो विजयते दिल्लीधरावल्लभः’ अतः इस रचना को कुछ विद्वान् दाराशिकोह की प्रशंसा में रचित बताते हैं - इसी प्रकार की स्थिति कुछ अन्य पद्यों की भी है। यथा - जानीमो भवता न हन्त विदितः श्रीकामरूपेश्वरः । श्री प्राणनारायणः दिल्लीधरावल्लभः।। १५ जी नुतो निखिलभूसुरैर्जयति कामरूपेश्वरः/विजयते मिनार जगत्केसरी जयति कोऽपि भूमीपतिः ।। २३ और अन्तिम पद्य का द्वितीय और तृतीय चरण इस प्रकार है - सन्तुष्टाकमताधिपस्य कवितामाकर्ण्य श्रीमत्पण्डितराजपण्डितजगन्नाथो व्यधासीदिदम् ।। ५३ । नया इस प्रकार पण्डितराज की काव्यरचनाओं का अनुशीलन करने से स्पष्ट होता है कि उन पर स्वभावगत और परिवेशगत प्रभाव दोनों हावी थे।