‘चैतन्यचरितामृतम्’ महाकवि कर्णपूर की किशोरावस्था की कृति कही गयी है। इसका रचनाकाल स्वयं कवि के उल्लेख (२०४६) के अनुसार शक संवत् १४६४ अर्थात् १५४२ ई. है। यह महाकाव्य बीस सर्गों में पूरा हुआ है तथा इसमें कुल १६११ श्लोक हैं। पूर्ववर्ती कवि मुरारिगुप्त तथा श्रीमद्भागवत और पुराणों से कवि ने कुछ पद्य बीच-बीच में उद्धृत किये हैं। चैतन्य महाप्रभु के ४७ वर्षों के जीवन की घटनाओं को कवि ने यहाँ विशद रूप से चित्रित किया है। पहले से दसवें सर्ग तक चैतन्य के जन्म से लेकर संन्यासग्रहण तक का वृत्त है, और शेष दस सों में उनकी विविध अलौकिक लीलाएँ तथा निर्वाण-प्राप्ति तक का वृत्तान्त वर्णित है। इतिहासकार की अपेक्षा कवि पर उसका भक्तरूप प्रभावी है। इस महाकाव्य की दो टीकाएँ प्राप्त होती हैं- वृन्दावनचन्द्र तर्कालङ्कार की विष्णुप्रिया और नित्यानन्दाधिकारी की गौरभक्तिविनोदिनी (अपूर्ण)। को अल्पावस्था में लिखी गयी रचना होने पर भी कर्णपूर के इस महाकाव्य में भावना और अभिव्यक्ति पर कवि का अधिकार तथा शैली का चमत्कार अनुभूत होता है। यहाँ तक कि चित्रकाव्यों- मुरजबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध, एकाक्षरपाद आदि की रचना में भी उसने अपना कौशल प्रकट किया है तथा अर्थालङ्कारों के सन्निवेश के प्रति भी वह सजग हैं। उत्प्रेक्षावैचित्र्य के साथ अन्धकार का वर्णन करते हुए कर्णपूर कहते हैं कि अन्धकार आशा रूपी सुन्दरियों के द्वारा पीसा जाता हुआ कस्तूरी का चूर्ण है, जिसे वे केलिवन में विहार करती मुग्धवधुओं के मुख पर लगा रही हैं म ति सम्मदादिव परस्परमाशायोषितो मृगमदोत्करचूर्णैः। तर मन्मथोन्मथितमुग्धवधूनां रञ्जयन्ति पुरकेलिवनान्तम् ।। (१०।११)