११ हरिचरित

चतुर्भुज पन्द्रहवीं शती के कवि थे। जन्म लेते ही चतुर्भुज की जिह्वा पर उनके पिता ने स्वर्णशलाका से कुछ संस्कृत में लिख दिया था, जिससे उन्हें काव्यरचना की स्वाभाविक शक्ति प्राप्त हो गयी। विद्वान् पिता के संरक्षण में इस कवि की प्रतिभा विकसित हुई। चतुर्भुज ने वि.सं. १५५० (१४६३ ई.) में ‘हरिचरित’ काव्य की रचना की। १३ सर्गों के इस महाकाव्य में श्रीकृष्ण का चरित वर्णित है। इस काव्य की रचना गौड़ प्रदेश की रामकेलि बस्ती में हुई थी। सुलुव नरसिंह ने वि.सं. १५१३ से १५४५ (१४५६ से १४८८ ई.) तक विजयनगर पर राज्य किया। वह अपने युग का महान् विजेता था और अनेक कवियों का साथी और स्वयं भी महाकवि था। इन साथी कवियों के आग्रह पर इसने २४ सर्गों में ‘रामाभ्युदय’ महाकाव्य रचा। इसके पाँचवें सर्ग की पुष्पिका के अनुसार इसका रचयिता शोणाद्रिनाथ था। वत्सगोत्र के शिवसूर्य ने पन्द्रहवीं सदी के मध्य भाग में महाभारत की कथा को विषय बनाकर पाण्डवाभ्युदय महाकाव्य की रचना की। इसमें आठ सर्गों में महाभारत की कथा वर्णित है। १. इसके आठ सर्गों का केरल ग्रन्थमाला से और ४ सर्गों का पालघाट से प्रकाशन हुआ है। यह बारहवें सर्ग के आधे भाग तक प्राप्त होता है। २. यह त्रावनकोर के हस्तलिखित ग्रन्थागार में है। मा काव्य-खण्ड मी शिवसूर्य की बुआ अभिरामकामाक्षी ने ‘अभिनव रामाभ्युदय’ महाकाव्य रचा। २४ सगों के इस महाकाव्य में रामकथा वर्णित है। चरित्रसुन्दर ने १५वीं सदी के मध्यकाल में महीपाल की कलिपत कहानी १४ सगों में निबद्ध की है। इस काव्य का नाम ‘महीपालचरित’ है। किसी अज्ञात रचयिता का पन्द्रहवीं सदी में विरचित ‘कुशाभ्युदय’ की रचना केरल के राजा रामवर्मा के आश्रय में हुई थी। यह राजा स्वयं भी काव्यकला में दक्ष था। इस काव्य में कुश का चरित आठ सर्गों में वर्णित है। इसकी शैली सरस है- जांजान नियोगतो निर्मलकीर्तिराशेर्यदुप्रवीरस्य गुणालयस्य। का प्रवक्ष्यते पापविनाशहेतोश्चेताभिरामं चरितं कुशस्य ।। नितिमोर अपमानावनातारणतमान