०२ रुक्मिणीकल्याण

दक्षिण भारतीय पौराणिक परिवेश में इस काव्य की पर्याप्त प्रतिष्ठा है। रुक्मिणीकल्याण महाकाव्य महाकवि विद्याचक्रवर्ती ने रचा था। होयसाल राजवंश के आश्रित एक ही वंश में विद्याचक्रवर्ती नामक तीन कवि भिन्न-भिन्न युग में हुए। इनमें से तृतीय विद्याचक्रवर्ती का महाराज बल्लाल तृतीय (१२६१-१३२ ई.) आश्रयदाता था। रुक्मिणीकल्याण इसी तृतीय विद्याचक्रवर्ती की रचना है। इसमें १६ सर्ग हैं जिनमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह वर्णित है। इसके प्रथम सर्ग में होयसाल राजाओं की वंशावली मिलती है। साथ ही कवि ने अपनी वंशावली का भी संक्षिप्त परिचय दिया है। यह ललित तथा वैदर्भी रीति से सम्पन्न मनोहर काव्य है।