०१ रागकाव्यपरम्परा

रागकाव्य नामक विधा की गणना उपरूपक के भेदों में नाट्यशास्त्र की परम्परा में की गयी है। इसके लिये संक्षेप में ‘काव्य’ संज्ञा का प्रयोग भी होता आया है। रागकाव्य का सर्वप्रथम लक्षण करने वाले आचार्य कोहल हैं। कोहल का नाट्यशास्त्रविषयक ग्रन्थ प्राप्त नहीं होता। इनके लक्षण आचार्य अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती में उद्धृत किये हैं और उपरूपक, जिन्हें प्राचीन परम्परा में नृत्तप्रबन्ध कहा गया है, के विवेचन के प्रसंग में कोहलकृत काव्य या रागकाव्य का लक्षण अभिनवगुप्त के उद्धरणानुसार इस प्रकार है लयान्तरप्रयोगेण रागैश्चापि विवेचितम् । नानारसं सुनिर्वाह्यकथं काव्यमिति स्मृतम् ।। (अभिनवभारती, भाग-१, पृ. १८२, बड़ौदा सं., १६५६ ई.) इस लक्षण के अनुसार काव्य या रागकाव्य की विशेषताएं ये हैं - विभिन्न लयों का प्रयोग, विभिन्न रागों का प्रयोग, विभिन्न रसों का प्रयोग तथा कथा की सुनिर्वाह्यता। अभिनवगुप्त के अनुसार रागकाव्य के प्राचीन उदाहरण राघवविजय तथा मारीचवध हैं - ‘राघवविजय-मारीचवधादिकं रागकाव्यम्’ - (वही, पृ. १८१)। अभिनव के अनुसार एक रागकाव्यप्रबन्ध को एक ही राग से भी गाया जा सकता है। राघवविजय ठक्कराग से गाया जाता था तथा मारीचवध ककुभग्राम राग से (वही, पृ. १८२)। गेयता ही अभिनव के मत में रागकाव्य का प्रमुख लक्षण है - और इस दृष्टि से इसे ‘गीत’ भी कहा जा सकता है- ‘गीयते इति गीतं काव्यम्’- (वही, पृ. १५०)। पर सभी गीत रागकाव्य या काव्य नहीं कहे जा सकते, क्योंकि अभिनवगुप्त ने यह अतिसामान्य लक्षण भरत के इस कथन की व्याख्या में दिया है - ‘गीतप्रयोगमाश्रित्य नृत्तमेतत् प्रवर्त्यताम्’ (नाट्यशास्त्र, ४।२६८)। अतएव नृत्त के साथ गाये जाने वाले गीत ही काव्य या रागकाव्य माने जाने चाहिये। १. कोहल का ‘काव्य’ का लक्षण अभिनव ने निम्नलिखित उपोद्घात के साथ उद्धृत किया है - ‘एष एव तु प्रकारः कलाविधिना निबध्यमानो राघवविजयमारीचवधाविक रागकाव्यमुभावयति। यथोक्तं (कोहलेन) - अभिनवभारती, भाग-१, पृ. १८१। इससे स्पष्ट है कि कोहल तथा अभिनव की दृष्टि से रागकाव्य का एक संक्षिप्त प्रचलित नाम काव्य भी है, जिसे कविता-सामान्य के अर्थ में प्रयुक्त ‘काव्य’ से भिन्न तथा रागकाव्य का ही पर्याय माना जाना चाहिये। २. वही, पृ. १८१ रागकाव्यपरम्परा ४E७