२६ अन्य काव्य

लोकोक्तिमुक्तावली

लोकोक्तिमुक्तावली कवि श्रीदक्षिणामूर्ति का नीतिपरक काव्य है, जिसमें कुल ६४ पद्य विभिन्न छंदों में संगृहीत हैं। संपूर्ण काव्य को पद्धतियों में विभाजित किया गया है, ये पद्धतियां विषयानुसार हैं, जैसे-विद्वत्प्रशंसापद्धति, दुष्टत्यागपद्धति, द्वैतनिन्दापद्धति, विषादपद्धति और ज्ञातप्रशंसापद्धति। कवि दक्षिणामूर्ति का अद्वैतवेदात के प्रति अभिनिवेश स्पष्ट है, जिसे उन्होंने एक स्थान पर इक्षु (अनेक) तथा गुडखंड (एक) के दृष्टात से समझाया निकल कर क्ति कि मिशन निकाल कि शिकिग विप्रा मुमुक्षा यदि, वो न कार्यस्तर्कादिशास्त्रेषु वृथैव यत्नः। डा वेदान्त एवामृतसिद्धये-लमिक्षोरनेका गुडखण्ड एकः।। (५२) लोकोक्तिमुक्तावली के कर्ता दक्षिणामूर्ति के विषय में विवरण प्राप्त नहीं है।

श्रीकृष्णभट्टकृत पद्यमुक्तावली

श्रीमत् कविकलानिधि देवर्षि श्रीकृष्णभट्टकृत इस स्फुट पद्यों के संकलन में ३६६ श्लोक हैं, जिनमें धुवागीतियों का भी कहीं-कहीं प्रयोग हुआ है तथा प्राकृत आर्याओं का भी। पद्यमुक्तावली में विषयों की विविधता है, कुछ प्रशस्तिकाव्य तथा स्तोत्रकाव्य हैं, अनेक पद्य ऋतुवर्णन के तथा देशवर्णन के भी हैं। रसों में शृंगार रस का परिपाक प्रचुर हुआ है। 25 श्रीकृष्णभट्ट की रचना अत्यंत प्रौढ और अलंकारों की कमनीय छटा से युक्त है। उनकी कल्पनाओं की उड़ान भी आकर्षित करती है। संध्या वर्णन में कवि कहता है -सूर्य की किरणों के सिंदूरी राग में रंगे बादल आकाश में छाये हुए हैं, वे कामदेव रूपी राजा के शिविर जैसा रच रहे हैं मग फल, किरन कि कि RAMIN सिन्दूरारुणरागरञ्जितघनश्रेणीमनोहारिणि DPP OF " श्रीमन्मन्मथभूमिपालशिबिरस्तोमानकारक्षमे।ा का मजाक गिराछ म कि पश्य व्योम्नि विभान्ति सम्प्रति तिरोभूते प्रतीच्या दिशो कि भानौ व्यायतवल्गुभूरितनिकातौल्येन सान्थ्यांश्च ।। -१८ कवि श्रीकृष्णभट्ट के परिचय के लिये संस्कृतमहाकाव्यविषयक अध्याय द्रष्टव्य है।

शृङ्गारकलिकात्रिशती

इस काव्य के प्रणेता श्री सामराजदीक्षित के पुत्र श्री कामराज दीक्षित हैं। इस त्रिशती का समायोजन अकारादिक्रम के पद्य देकर किया गया है। पूरी त्रिशती आर्या छंद में है। सरसता और शृंगार के परंपरागत वर्णनों के साथ इसमें कहीं-कहीं हास्य का अच्छा पुट देते हुए ग्रामीण जीवन का भी चित्रण किया गया है। यथा- EPISPERकाव्य-खण्डा ऋक्षं जनभयवशतो विज्ञाय सकम्बलं जारम्। के तक छान परिषस्वजे कृशाङ्गी रुदतीमथ जहास हलिकजनः।। (३७) नायिकापति को आया देखकर जार ने कंबल ओढ़ लिया, जिसके कारण डरपोक पति ने उसे भालू समझ बैठा, और रोती हुई अपनी ही पत्नी से डर के मारे लिपट गया। यह देखकर हलवाहे हंसने लगे। कामराज ने अपने समय के जीवन के कुछ संवेदनामय क्षणों को कहीं-कहीं इस कलिका में गूंथा है। मंदिर में कृष्ण का कीर्तन चल रहा है, भक्तजन हरिदास जी की वंदना कर रहे हैं, कोई महिला उनके चरणों में ऐसी गिरी है, कि हिलने का नाम ही नहीं ले रही - 5110) शामिशिली की गाभा कीर्तनसमये शौरेवन्दत्सु जनेषु हरिदासम। जिसका कामिति न चलति पदात् पदमपि पतिता तत्पादयोरार्या ।। ६०

षड़ऋतवर्णनकाव्यम

यह काव्य कामराज दीक्षित के पुत्र व्रजराज दीक्षित का लिखा हुआ है। काव्य के आरंभ में ही व्रजराज ने अपने पितामह श्री सामराज दीक्षित को अपने गुरु बताते हुए उनकी वंदना की है, तथा अपने पिता श्री कामराज दीक्षित के अनुग्रह से अपनी काव्यप्रवृत्ति संभावित बतायी है। माता गाला छ कि मिनिट 1101) इस काव्य में ऋतुसंहार का क्रम न अपनाकर वसन्तवर्णन से आरंभ किया गया है। वसन्तवर्णन में ६, ग्रीष्म में ५, वर्षा वर्णन में ५, हेमन्त वर्णन में १०, तथा शिशिर वर्णन में ७ पद्य हैं। प्रत्येक ऋतु के वर्णन में मदनमहीपति की लीलाएं ही केन्द्र में हैं, और सारा काव्य शृंगाररस का आलंबनवर्णन ही प्रतीत होता है। कवि का अप्रस्तुतविधान कहीं-कहीं नवीन और सटीक बन पड़ा है। शिशिर वर्णन में नरगिस के फूल की चर्चा करते हुए उसने कहा है - जमिनमानाकामना गाना अचपलचरमृङ्गाक्रान्तमध्यस्थभागं नरगसनवपुष्पं भाति सम्मोहनाय। किमु नवरजताढ्यस्थलिकास्थैणनाभी घुसृणजगुटिकेयं स्थापिता मन्मथाये। लि कामणि की जा नरगिस के फूल पर भौंरा स्थिर बैठा है, तो ऐसा लगता है जैसे चांदी के नये थाल में कस्तुरी परोस कर कामदेव के आगे रख दी गयी हो। भारत THE परवर्ती गीतिकाव्य ४८५

सीतास्वयंवरकाव्यम्

सीतास्वयंवरकाव्य के कर्ता हरिकृष्णभट्ट ने अपना परिचय नहीं दिया है। राम के प्रति भक्तिभाव से अभिभूत होकर उन्होंने १२७ पद्यों में यह रमणीय काव्य रचा है। काव्य के अंत में राम के प्रति प्रणत होकर वे कहते हैं - र नि पोतायिते रामगुणैरुदारैर्भूयात् कृतार्था मम भारतीयम् । तर त्वनाम रामाखिलकामधाम निष्कामनिःश्रेयसदं वदन्ति ।। १२२ के कार का तकाजीक मा सन्तु तेषां यमयातनास्ता या इन्द्रवज्रादपि दुःसहाः स्युः। आदि । किन र नयद्रवीभूतमभूतपूर्वमुदाहृताविष्कृतशान्ति पुंसाम् ।। १२३ 15

काव्य-खण्ड त्रयोदश अध्याय