२३ अन्योक्तिशतक तथा अन्योक्तिपरक अन्य रचनाएँ

अन्योक्तिशतक के रचनाकार दर्शनविजयगणि मुगल बादशाह जहांगीर के समकालिक हैं। इसकी अन्योक्तियों में पहले के कवियों की अन्योक्ति-परंपरा का अनुकरण है। अन्योक्ति की विशेषता यह है कि इसके माध्यम या प्रतीक तो प्रायः परंपराप्राप्त ही रहते हैं, पर उनके संदर्भ और अभिप्राय बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए कवि ने चिरपरिचित भ्रमर के बहाने से अपनी व्यथा और अपने समय की विडंबना व्यक्त की है - सकलगुणनिधानं मां विहाय द्विरेफाः कामात परिमलपरिहीनं हन्त चुम्बन्ति धूर्तम्।। STEP इति मनसि विषादं मां कथाश्चम्पकोच्च- Ep रिह मधुपसमाजे को विवेकावकाशः।। (४४) ताजागी कि हे चंपक, सकलगुणों के निधान मुझे त्यागकर भ्रमर सुगंधरहित अन्य पुष्पों को चूम रहे हैं - यह सोचकर मन में विषाद मत कर। इस मधुपसमाज में भला विवेक का अवकाश १. संस्कृतसाहित्य में अन्योक्ति, पृ. २६८ पनि निम्माजका में मिला निकाला -कतिक प्रण pिs परवर्ती गीतिकाव्य ४७E कहां? - यहां मधुप शब्द का बड़ा सटीक प्रयोग करते हुए कवि ने अपने समय के मधु के नशे में गाफिल रहने वाले अविवेकी लोगों पर व्यंग्य किया है। एकपतिजामाज माम अन्योक्तिमुक्तावली : इस काव्य की रचना हंसविजयगणि ने १६७८ ई. में की। यह अन्योक्ति-काव्यों में सबसे विशालकाय है, जिसमें ६४० अन्योक्तियां हैं। ना मिल्छ अन्यापदेश : इस काव्य के कर्ता श्री गीर्वाणेंद्र दीक्षित हैं, जिनका समय सत्रहवीं शताब्दी या अठारहवीं का प्रथम चरण संभावित है। इसमें ५७ विषयों पर ११२ अन्योक्तियां संकलित हैं। अन्योक्तिकाव्यपरंपरा में श्री गीर्वाणेन्द्र ने नये विषयों का समावेश किया है, जैसे लशुन, मत्कुणा (खटमल), छाग, कदली, धीवर, मर्कट (वानर) आदि। ति अन्योक्तिमाला : इस काव्य के कर्ता अच्चान दीक्षित हैं। इनका समय अठारहवीं शताब्दी अनुमानित है। इसमें दो आश्वासों में क्रमशः ८० और १०३ अन्योक्तियां संकलित 1510 कायार खिाआज्ञा । जिरी न कविकौमुदी : कविकौमुदी के कवि लक्ष्मीनसिंह हैं। इनका समय भी अठारहवीं शताब्दी है। कवि कौमुदी में ४४ विषयों पर १४० अन्योक्तियां हैं। पांचालिका, भल्लूक, पिशाच, कंकजम्बूकसंवाद, बकजम्बूकसंवाद शिवनयानाग्नि आदि सर्वथा अछूते विषय लक्ष्मीनृसिंह ने अन्योक्ति के क्षेत्र में उठाये हैं। जिसती को किया मा उपर्युक्त अन्योक्तिपरक रचनाओं के अतिरिक्त निम्नलिखित अप्रकाशित रचनाओं का उल्लेख डा. राजेंद्र मिश्र ने किया है-अन्योपदेशकाव्य कविरत्न चक्रवर्तीप्रणीत (अनुमानित समय १४वीं शताब्दी), अन्यापदेशशतक (राममद्राम्बाकृत, (समय-सत्रहवीं शताब्दी), अन्योक्तिकण्ठाभरण चन्द्रचूडकृत (समय-अठारहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध) तथा अन्यापदेशशतक (घनश्यामकृत, समय -वही)। माना

  • अन्यापदेशशतक के पूर्तिकर्ता घनश्याम तंजौर के दरबार में १७२८ ई. से १७३५ ई. तक मंत्री रहे, उनकी शाकुन्तल और उत्तररामचरित की दो टीकाएं तथा नवग्रहचरितम् रूपक प्रसिद्ध है। इनकी विदुषी पत्नियों सुन्दरी तथा कमला ने विद्धशालभंजिका नाटिका की टीका की है, जिसमें टीकाकत्रियों ने सूचना दी है कि उनके पति घनश्याम ने अन्यापदेशसहस्र की भी पूर्ति की थी। पर यह रचना अप्राप्य है। पा इसके अतिरिक्त रघुनाथतीर्थकृत अन्योक्तिशतक, गदाधरभट्टप्रणीत अन्योक्तिरत्न करण्डिका, नारायणदासकृत अन्यापदेशशतक और श्रीनिवासरचित अन्यापदेशशतक आदि इस प्रकार की कई रचनाएं या तो खंडितरूप में प्राप्त हैं, या उनके उल्लेख मात्र मिलते हैं। (विवरण के लिए द्र.-संस्कृतसाहित्य में अन्योक्ति, पृ. २८०-२६२)
  • ईकचरgी काक टाकि १. संस्कृत साहित्य में अन्योक्ति, पृ. १७३ २. वही, पृ. २७४ ३. वहीं, पृ. २७६ ४. वही, पृ. २७७ स ४६० काव्य-खण्ड इनके अतिरिक्त निम्नलिखित अन्योक्तिसंग्रहों का उल्लेख स्टर्नवाख ने किया है - श्रीनिवासाचारियरकृत अन्योपदेशमाला (१२७ पद्य), सोमनाथ कृत अन्योक्तिमुक्तावली (प्रायः। मालिनी छन्द में १०२ पद्य), भट्टवीरेश्वरकृत अन्योक्तिशतक (शार्दूलविक्रीडित तथा स्रग्धरा छन्दों में) अन्योक्त्यष्टकसंग्रह (१७ अष्टकों में १२३ अन्योक्तियों का संग्रह),, वंशीधरमिश्रकृत अन्योक्तिस्तवक (१०४ पद्य, समय - १६७४ ई.), अन्योक्तितरङ्गिणी तथा अबशिष्टान्योक्ति। अंतिम दो संकलनों में पहले में अन्योक्तियों के दो शतक हैं, तथा दूसरा अन्योक्तियों (५८८) का विशाल संग्रह है, जिसे पंडितराज जगन्नाथकृत कहा गया है। ताकि शतककाव्यों के ही समान अष्टककाव्य या नवरत्न आदि काव्य भी अनेक मिलते हैं। पञ्चरत्न, षड्रल, सप्तरत्न, अष्टरत्न तथा नवरत्न क्रमशः पांच से नौ श्लोकों वाले लघुकाव्य हैं, जिनमें नीतिपरक सुभाषित हैं। इनमें से कुछ सुभाषित भर्तृहरि के शतकों में भी मिलते हैं। अष्टककाव्यों में पूर्वचातकाष्टक तथा उत्तरचातकाष्टक में चातक तथा मेघ को लेकर अन्योक्तियां हैं। प्रथम संकलन में चातक का दैन्य तो दूसरे में उसकी मनस्विता का चित्रण है। इसी प्रकार अमराष्टक में भ्रमरविषयक अन्योक्तियां हैं, जबकि वानर्यष्टक तथा वानराष्टक में विविध विषयों पर सुभाषित संकलित हैं। गणरत्न नामक तेरह पद्यों का संकलन भवभूति के नाम से प्रकाशित किया गया है, जिसका पहला पद्य (सानन्दं नधिनहस्ता.०-) मालतीमाधव प्रकरण का नान्दीश्लोक है। शेष पद्य नीतिपरक हैं, और इनका भवभूतिकृत होना संन्दिग्ध है। सम्भवतः परवर्ती किसी लेखक ने प्रचलित सुन्दर सुभाषित भवभूति के नाम से इस संकलन में लिख डाले होंगे। इनमें से इस प्रकार के पद्य तो कतिपय शताब्दियों से रसिक जनों में प्रचलित रहे हैं - या राका शशिशोभना गतघना सा यामिनी यामिनी यासार) या सौन्दर्यगुणान्विता पतिरता सा कामिनी कामिनी। रास्नायी। या सौन्दर्यगुणान्विता पतिरता सा कामना या गोविन्दरसप्रमोदमथुरा सा माधुरी माधुरी या लोकद्वयसाधनी तनुभृतां सा चातुरी चातुरी।। (१०) नीतिप्रदीप नामक काव्य महाकवि वेतालभट्ट के नाम से प्रकाशित किया गया है। इसके भी अनेक पद्य सहृदयसमाज में अतिशय लोकप्रिय रहे हैं।’ उदाहरण के लिए यह अन्योक्ति देखिये - खान की रि येनाकारि मृणालपत्रमशनं क्रीडा करिण्या सह एक ( स्वच्छन्दं भ्रमणं च कन्दरगणे पीतं पयो निर्झरम्। हालस सोऽयं वन्यकरी नरेषु पतितः पुष्णाति देहं तृणै र्यदैवेन ललाटपत्रलिखितं तत् गोझितुं कः क्षमः? ।। (३) १. ये सभी काव्यसंग्रह डा. जान हेबरलिन द्वारा संकलित काव्यसंग्रह में संग्रहीत हैं, जो कलकत्ता से १६०४ सं, (१८४७ ई.) में प्रकाशित हुआ। परवर्ती गीतिकाव्य के