श्रीमदप्पयदीक्षित के वंशज महाकवि नीलकण्ठ दीक्षित ने महाकाव्यों, स्तोत्रकाव्यों तथा शास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त अनेक स्फुट काव्यों का भी प्रणयन किया है। इनमें १. कविपरिचय के लिये महाकाव्यविषयक अध्याय द्रष्टव्य। मामला गो फिनतीजी परवर्ती गीतिकाव्य १४७५ कलिविडम्बनम्, सभारञ्जनशतक, अन्यापदेशशतक तथा वैराग्यशतक (2) उल्लेखनीय हैं। पनि ‘कलिविडम्बनम्’ में १०२ अनुष्टुप् छन्दों में समाज और व्यक्ति की हासोन्मुख प्रवृत्तियों पर यथार्थवादी दृष्टि से तीखी टिप्पणियां हैं। नीलकण्ठ ने इस काव्य में अपने को आधुनिक अर्थ में व्यंग्यचेतना का एक समर्थ कवि सिद्ध किया है। क्षेमेन्द्र के पश्चात् अपने समय की सच्चाइयों से निर्भय होकर इस प्रकार साक्षात्कार कराने वाला दूसरा कवि यह ही है। गुरुओं के विषय में नीलकण्ठ कहते हैं - मागमए pyj काय झार जिला का वाच्यतां समयोऽतीतः , स्पष्टमग्रे भविष्यति। इति पाठयता ग्रन्थे काठिन्य कुत्र विद्यते।। SEE गुरु अपने किसी शिष्य को पोथी पकड़ाकर कहता है - पढ़ते जाओ, समय कम है, पाठ समझने में जो कठिनाई है, वह तो पढ़ते-पढ़ते आगे स्पष्ट होती जायेगी। इस प्रकार पढ़ाने वाले के लिये तो सचमुच कोई भी ग्रंथ कठिन नहीं है। | सभारजनशतक में १०५ अनुष्टुप् छन्दों में जीवन और जगत् के विषय में चिंतन-प्रधान मार्मिक विचार हैं, धर्म का सार बताया गया है, तथा समाज और राष्ट्र के अभ्युदय के लिये संदेश है। नीतिकाव्य की परंपरा में यह एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। थोड़े से शब्दों में अत्यंत सहजता के साथ विचार को अनायास व्यक्त कर देने की नीलकंठ को । सिद्धि है। विचार को दृष्टान्त के द्वारा हृदयंगम भी वे बनाते हैं। यथा -मजाक के सर्वत्र लाल्यते शूरो भीरुः सर्वत्र हन्यते। पच्यन्ते केवला मेषा पूज्यन्ते युद्धदुर्मदाः।। (४८) किम (शूरवीर का सब जगह लालन होता है, भीरु का सब जगह हनन । केवल भेड़ें पकाई जाती हैं, जब कि युद्ध में दुर्दमनीय लोग पूजे जाते हैं।) तमिलन । उसला- एकाति कवि ने सौंदर्य का सापेक्ष लक्षण करते हुए कहा है - भार्यायाः सुन्दरः स्निग्धो वेश्यायाः सुन्दरो धनी। श्रीदेव्याः सुन्दरः शूरो भारत्याः सुन्दरः सुधीः।। (५०) (पत्नी के लिये प्रेम करने वाला पति सुंदर है, वेश्या के लिये धनी व्यक्ति सुन्दर है। लक्ष्मी के लिये शूरवीर सुंदर है और सरस्वती के लिए सुधी व्यक्ति।) गा। वस्तुतः सभारञ्जनशतक सुभाषितों का छोटा, पर बहुमूल्य खजाना है। भाषा की सारप्राणता तथ विनोदगर्भ या विडंबनामयी शैली के प्रयोग में नीलकण्ठ ने विलक्षण सिद्धि प्राप्त की है। कलिविडम्बनशतक तो इस दृष्टि से उन्हें आज के व्यंग्यकारों की चेतना के बहुत निकट ला देता है। उन्होंने मनुष्य के दुर्गुणों, समाज के अधःपतन और अपने समय की विसंगतियों का उद्घाटन करते हुए किसी को भी नहीं छोड़ा, समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रति सो काव्य-खण्ड चारित्र्य खोल कर रख दिया है। उनकी व्यंग्यदृष्टि में आक्रोश कम, विनोद का पुट अधिक है। क्षेमेन्द्र की तुलना में व्यंग्यकार नीलकण्ठ की विशेषता यह है कि नीलकण्ठ ने भारतीय पारिवारिक जीवन को भी अपनी लेखनी का विषय बनाया है। परिवार के विषय में उनकी अनेक टिप्पणियां रोचक हैं। उदाहरण के लिये- का कमानाम तनीशाल जामातरो भागिनेया मातुला दारबान्धवाः। अज्ञाता एव गृहिणो भक्षयन्त्याखुवद् गृहे।। (४२) (दामाद, भांजे, मामा तथा पत्नी के मायके के लोग-ये गृहस्थ के घर में चूहे की भांति इस तरह खाने में लगे रहते हैं कि उसे पता भी नहीं चल पाता।) प्रतम का मजाल जामातुर्वक्रता तावद् यावच्छयालस्य जालता। प्रबुध्यमाने सारल्यं प्रबुद्धेऽस्मिन् पलायनम् ।। (४४) दामाद तभी तक टेढ़ा रह सकता है, जब तक उसका साला बच्चा है। साला सयाना होने लगे, तो दामाद सीधा हो जाता है, और उसके सयाना होने पर तो ससुराल से भाग निकलना ही उसे पड़ता है।) शा म रुका नीलकण्ठ के नाम से ‘लघुकाव्यानि’ में प्रकाशित वैराग्यशतक का कर्तृत्व विवादास्पद है, काव्यमाला सम्पादकों ने यही पूरा का पूरा शतक श्री अप्पयदीक्षित को उसका प्रणेता बताकर प्रकाशित किया है। वैराग्यशतक में निर्वेद के भाव के साथ व्यंग्य की धार और भी प्रखर है। अन्यापदेशशतक में भ्रमर और सागर जैसे प्रचलित विषयों के अतिरिक्त धतूर (धतूरा), वृश्चिक (बिच्छू) आकद को भी अन्योक्ति का माध्यम बनाया गया है। वणिक् को लेकर नीलकण्ठ ने अपनी अभ्यस्त व्यंग्यप्रवण शैली में कहा है - से आसीनः सुखमापणे यदि वणिक्छ्रद्धालुभिः प्रार्थितः 11 किञ्चिच्छंसति पञ्चकं दशकमित्येतन तस्याभुतम् । foy) आपातालविघूर्णिताम्मसि चलत्यौत्पातिके मारुते मज्जन्त्यामपि नावि मुञ्चति न यस्तामेव मूल्यस्थितिम् ।। (बाजार में आराम से बैठा बनिया यदि मोल भाव में पांच को दस बताये, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं। पर वह नौका से सामान लेकर आ रहा हो, सागर में तूफान आ जाये, नाव डूबने लगे, तब भी मोल-भाव करने में उस समय भी वह अपनी वही चौकसी बनाये तरखता है। जो भी सहारा लिन लिगाए परवर्ती गीतिकाव्य