श्रीकृष्णकवि स्वाहासुधाकरचम्पू के कर्ता नारायण के पुत्र थे, ऐसा उनकी स्वयं की सूचना से अनुमान होता है। नारायण केरल के प्रख्यात संत और भागवतवत् पूज्य नारायणीयम् नामक ग्रंथ के प्रणेता हैं। ‘ताराशशाङ्कम्’ की पुष्पिका (पत्र सं.-२०६) में ‘कृष्णेन भागवत इत्यभिशब्दितस्य, नारायणस्य तनयेन समीरितेयम्’-इस कथन से काव्यमालासंपादक ने कदाचित् इन्हीं नारायण के पुत्र श्रीकृष्णकवि हैं-यह अनुमान किया हामक निजादा हा सिताराशशाङ्कम्’ की रचना भी नारायण के स्वाहासुधाकर चम्पू से प्रभावित होकर की गयी लगती है। इसमें तारा और शशाङ्क (चन्द्रमा) की भावोच्छ्वसित प्रणयगाथा प्रस्तुत की गयी है। यह रचना खंडकाव्य तथा गीतिकाव्य दोनों के सीमाक्षेत्रों का स्पर्श करती है। सर्गों में विभाजन किये बिना कथोपन्यास किया गया है तथा छन्दःप्रयोग के विषय में कवि ने पूरी छूट ली है। अनुष्टुप् से लेकर शार्दूलविक्रीडित और शिखरिणी आदि छंदों का यथावसर, यथारसभाव प्रयोग उसने किया है, एक छंद के तत्काल पश्चात् नया छंद ले लिया काव्य-खण्ड गया है, किसी भी छंद की प्रायः तुरंत पुनरावृत्ति नहीं की गयी है। प्रणय की सुकुमारता और अनन्यता, सौंदर्यबोध, कल्पनाओं की समृद्धि तथा भाषा की मसृणता के कारण यह रचना प्रशस्य है। चंद्रमा के शिवमस्तक पर आसीन होने को लेकर कवि की कल्पना है विनिता का अयं सखायं मम चिन्त्यकायं चकार घोरेक्षणवीक्षणेन। इतीव रोषेण शिरः पुरारेराक्रम्य यो भातितरां कलात्मा।। (इस शिव ने मेरे मित्र कामदेव को देहहीन बना डाला, - यह सोच कर मानो रोष के कारण यह कलानिधि चंद्रमा शिव के माथे पर जा चढ़ा) लाकी मारामा तारा और शशांक का अभिलाष, अनुराग, पूर्वराग और मिलन-वर्णन कवि ने तन्मय होकर किया है तामा महाकर नगी क्वचिद् रम्ये हर्ये क्वचिदपि नदीकूलपुलिने र बालक मानकर कि क्वचिन्मजी कुब्जे क्वचिदुपवने मन्दपवने। समितिका क्वचिल्लीलारीले सरसतरसालेऽपि स तयाली माता त सिमा । समं सीमन्तिन्या व्यहरदसमश्रीरहरहः।। (७५) कनार कराई तथापि विप्रलंभ शृंगार के चित्रण में यह काव्य अधिक प्रभावित करता है। चंद्रमा तारा से बिछुड़ कर बाबला होकर उसे खोजता फिरता है, उसके विलाप-प्रलाप में विक्रमोर्वशीयम् के चतुर्थ अंक और गीतगोविन्द के भावसांद्र विरहप्रलपित की छाया है। इस प्रसंग के अनेक पद्यों में बिल्हण की चोरपञ्चाशिका के समान ‘अद्यापि’ की आवृत्ति की गयी है। स्मृतियों के शब्दचित्रों में नायक मिलन के मधुर क्षणों को पुनः जीता है - किम अद्याप्युल्लसतीव सा मम पुरः पाञ्चालिकेव स्थिता .. निता लामामार याद्वारे केलिनिकेतनस्य कटिविन्यस्तैकहस्ताम्बुजा। F - अन्येनाददती करेण करतः सख्याः शनैर्वीटिका है न पश्यन्ती मम मार्गमेव विलसन्नीलोत्पलाभेक्षणा।। ६१ यहां सखी के हाथ से पान का बीड़ा लेते समय नायक के पथ पर ही दृष्टि गड़ाये खड़ी नायिका की छवि सजीव होकर साकार हो गयी है। अंत में शशांक को उसकी तारा मिल जाती है, और निर्वहणसंधि के साथ होने वाले चमत्कार के रूप में अचानक दोनों को अपने पुत्र बुध की प्राप्ति भी होती है। पति की जानकारी के बिना पत्नी का पुत्रप्रसव और बाद में दोनों को अपने पुत्र से समागम - यह इतिवृत्तविधान भी विक्रमोर्वशीयम् से प्रभावित प्रतीत होता है। मिका कला गाए साना पीना कि कई ना माजी जिस चणि वाया परवर्ती गीतिकाव्य