‘कोटिविरहम्’ नारायणीयम् और स्वाहासुधाकरचम्पू जैसे प्रख्यात प्रबन्धों के रचयिता केरल के कवि नारायणभट्ट का खण्डकाव्य है। यह १०७ श्लोकों में प्रणय, राग, विरह-वैधुर्य तथा पुनर्मिलन की भावसंकुल कथा है। इसका नायक संगीतकेतु नामक ब्राह्मण है। नायिका के विषय में कवि ने कहा है - परवर्ती गीतिकाव्य कहा कि गण सङ्केतभूमिः सुकुमारतायाः सङ्गीतसाहित्यसरोमराली। शृङ्गारलक्ष्मीरिव सम्भृताङ्गी शृङगारलीलेति बभूव बाला ।। (३) संभवतः संगीतकेतु और शृङ्गारलीला के प्रणय, मिलन, मान और कोप की कथा में कवि नायक-नायिका के नाम के आधार पर प्रतीकात्मक विधान भी रचना चाहता है। इस प्रतीकात्मकता तथा विषयवस्तु की अँगारिकता के अनुरूप ही इस काव्य में अत्यंत सरल, सहज और ललित-मसूण पदावली का आयंत प्रयोग किया गया है। प्रेम के कौतुक, आह्लाद, तन्मयता और रागात्कता तथा अनन्यता का चित्र कवि ने अनुभूतिप्रवण होकर अंकित किया है। भवभूति की भांति वह मिलन के क्षेत्र में स्नेह की पराकाष्ठा दिखाना चाहता है कि जिलागि भामाशाह गतिलगानीमा मासिक स इति सेति च ती परिबोधितौ सवयसा शनकैः श्रवणान्तिके। अतनुतां परिरम्भणमञ्चलैनयनयोर्नवविभ्रमचञ्चलैः।। (१४) इस काव्य में कथानक तो क्षीण ही है। नायक-नायिका को एक दूसरे को देखना, दोनों में अनुराग, फिर मिलन और नायिका द्वारा स्वप्न में नायक को परस्त्रीपरिरंभलिप्त देख कर मान, तब दोनों में विरह और फिर पुनर्मिलन - इतनी कथा में घटनात्मकता के स्थान पर कवि ने मनोदशाओं के चित्रण पर ही अधिक ध्यान केंद्रित रखा है। काव्यमालासंपादक की सूचना के अनुसार केरल की पंडित-परंपरा में इस काव्य का नाम ‘कोडिअ-विरहम्’ माना जाता है। मलयालम् में ‘कोडिअ’ शब्द का अर्थ नवीन है। निश्चय ही इस काव्य में नवीनता का आकर्षण है।