काव्यमाला सीरीज के संपादक के अनुसार उत्प्रेक्षावल्लभ का वास्तविक नाम शिवभक्तदास या गोकुल है तथा उनका समय वि.सं. १६५३ (१५६४ ई.) के आसपास है। । डा. रामजी उपाध्याय ने इस कवि का समय चौदहवीं शताब्दी माना है। २ काव्यमाला के संपादक ने संभवतः सुन्दरीशतक की पाण्डुलिपि के काल को कवि का काल समझ लिया
भिक्षाटनकाव्य
शैली तथा काव्यबन्ध और संरचना की दृष्टि से उत्प्रेक्षावल्लभ का यह काव्य और भी अनोखा है। इस काव्य में चालीस पद्धतियां हैं, प्रत्येक पद्धति में बारह से सत्ताईस तक पद्य हैं। आयंत वसन्ततिलका वृत्त का प्रयोग कवि ने किया है। भिक्षाटन के नायक शिव हैं, जिनके निराले चरित का रोचक सरस चित्रण कल्पना के रंगों में रंग कर कवि ने प्रस्तुत किया है। शिव भिक्षा मांगते-मांगते इंद्रलोक जा पहुंचते हैं, अप्सराएं उन्हें देखकर मदनशरजर्जर हो उठती हैं। शिव को भिक्षा देने को उनमें से कोई तैयार नहीं, क्योंकि भिक्षादान के लिए वे स्वयं तो बड़े उत्तम पात्र हैं, पर भिक्षापात्र कपाल तो अपवित्र है, उसमें भिक्षा कैसे डालें? - ba विजन शाक की पात्रोत्तमस्त्वमसि नायक पाणिलग्नं पात्रं तथापि न पवित्रमिदं कपालम्। यावत्र तत त्यजसि नैव ददामि ताव – B. दित्येव कापि गिरिशाय ददौ न भिक्षाम्।। (१०।२०) कवि ने विस्तार से सुरसुंदरियों का शृंगार, परस्पर नालाप, शिव को देखकर मदनोद्दीप्त चेष्टाओं और हंसी-ठिठोली का तन्मय हो कर वर्णन किया है। शृंगार की उद्दाम धारा में भक्तिभावना अंतःसलिला होकर प्रच्छन्न रूप से तरलित है। कवि की दृष्टि में STRA १. काव्यमाला-नवम गुच्छक पृ. १०० ली जात ना का ३३ २. संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, भा. १, पृ. ५०PIES मानव ४६८ काव्य-खण्ड योगियों के विमल ज्ञाननयनों से भी अगम्य भगवान् शिव ललनाओं के लोचनों से अवलोकनीय हो गये हा जित कसार गगनाला शाप मान कि नेत्रर्मषीमलिनितैर्ददशस्तमेव - वाल्हा रिकवरी आरम रघूयागतं शिवमयत्नत एव नार्यः। कहीं जुट मिला ज्ञानात्मकेन विमलेन विलोकनेन जी शिर यद्वीक्षणाय यतयो हृदये यतन्ते।। (६) लगा उत्प्रेक्षावल्लभ ने सुरांगनाओं को शिव की उसी भाव से उपासना करते हुए चित्रित किया है, जिस भाव से भागवत-परंपरा में गोपियों को कृष्ण की भक्ति में निरत बताया जाता है। भिक्षा प्राप्त कर जाते हुए शिव को देख कर वियोग के भय से वे स्त्रियां आर्त होती हैं, शिव से नाना प्रकार के प्रश्न करती हैं। (पद्धति १४, १५)। फिर वे शिव के पीछे पीछे चलने लगती हैं। बीसवी पद्धति में शिव स्वर्गपुरी को छोड़ किसी नगर में जा पहुंचते हैं, वहाँ पौरांगनाओं में उन्हें देखकर वही विकार उत्पन्न होते हैं। फिर तो कवि को उपालंभ, उद्यान-प्रवेश और शिशिरोपचार आदि के वर्णन का अवसर मिल जाता है (पद्धति २१-३०)। उसके पश्चात् स्मरलेख और दूती भेजने का क्रम आता है। अंत में वे सब ललनाएं सौभाग्यवती गौरी की प्रशस्ति करती हैं और कवि भी गौरी-स्तुति के द्वारा अपनी निरंकुशता का मार्जन करता हुआ प्रतीत होता है। भिक्षाटनकाव्य अपने कलेवर की दृष्टि से अनूठा ही है, इसमें महाकाव्य के भी तत्त्व विद्यमान है, और स्तोत्रकाव्य का भाव अत्यंत प्रच्छन्न रूप से आद्यंत बना हुआ है। सारे काव्य की विशेषता यही कही जा सकती है कि यद्यपि सर्वत्र नायक शिव छाये हुए हैं, पर वे स्वयं काव्य में वर्णित संपूर्ण कार्यव्यापार से अलिप्त रहते हैं, शिव की चेष्टा या प्रतिक्रिया का वर्णन कवि ने किया भी नहीं है, शिव के लिये क्रियाएं, प्रतिक्रियाएं और चेष्टाएं अवश्य सारे काव्य में निरतर चलती रहती हैं।