विष्णु भक्तिकल्पलता’ भक्ति, दर्शन, वैष्णव आचार-विचार तथा स्तोत्र-इन सबका उत्कृष्ट समवाय है। इसके रचयिता पुरुषोत्तम कवि हैं। ग्रन्थ की पुष्पिका से विदित होता है कि पुरुषोत्तम की माता का नाम मानी तथा पिता का नाम विष्णु था। पर इनका देशकाल अज्ञात है। कुछ विद्वानों ने त्रिकाण्डशेष के निर्माता पुरुषोत्तम से इन्हें अभिन्न माना है। इस मत को स्वीकार करने पर इनका समय बारहवीं शती ठहरता है। कलिंग राजा पुरुषोत्तम देव ने त्रिकाण्डशेष, हारावली तथा एकाक्षरकोश की रचना की थी। ये इतिहासप्रसिद्ध हैं। राजेन्द्रलाल मित्र ने कवि पुरुषोत्तम का समय दसवीं या ग्यारहवीं शताब्दी स्वीकार किया है। इस काव्य पर महीधर ने १६४५ विक्रमाब्द (१५६८ ई.) में टीका लिखी थी। विष्णुभक्तिकल्पलता ते आठ स्तबक हैं तथा विविध छन्दों का प्रयोग किया गया है। शब्दालंकारों के प्रचुर प्रयोग के द्वारा कवि पुरुषोत्तम ने इसमें आकर्षण भर दिया है। कवि ने कहीं भक्ति का उपदेश दिया है, कहीं लक्ष्मी को सम्बोधित किया है, कहीं ईश्वर की लीलाओं का वर्णन किया है, तो कहीं दार्शनिक विचारों का। पर काव्यात्मकता इस प्रबन्ध में आद्यन्त बनी रही है, अपने आप को सम्बोधित भी कवि करता है। यथा - भवपवनवयस्यानल्पसङ्कल्पलीला नि विलसितकृततापप्रौढिमानं निरीक्ष्य। त्यज हृदय विषादं मा गमः कातरत्वं व तव नवजलदश्री रक्षिता रामचन्द्रः।। (१२)- कि जिस (संसार रूपी अग्नि की असंख्या संकल्प रूपी ज्यावालाएं हैं। हे हृदय, इनके प्रसार से होने वाले ताप से तू खिन्न मत हो। नवीन मेघ के समान श्याम श्रीराम तेरी रक्षा करेंगे।) यद्यपि प्रसाद गुण का कवि ने निर्वाह किया है, पर यमक अलंकार के सन्निवेश का चमत्कार भी अनेक स्थलों पर उसने अच्छा निर्मित किया है। उदाहरणार्थ - परवर्ती गीतिकाव्य भा रतीशितुरिवास्तु विग्रहे भारती भवतु वाक्पतेरिव। 1 भारतीह सकलोऽपि तद्गुणो यस्य भक्तिरचला न माधवे।। शिलकालिक विकट कि पनामाचा निगिटालिक की जानती (२ १३) हा भले ही विग्रह (दह) में रतीश (काम) के सदृश भा (कान्ति) हो, बृहस्पति के समान भारती (वाणी) हो, पर ये सारे गुण भार बन जाते हैं, यदि माधव में अचल भक्ति न हो। लाका विधि का