जल्हण कवि बारहवीं शताब्दी में कश्मीर में हुए। महाकवि मंख ने अपने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य में अंतिम सर्ग में इनका सराहना के भाव से स्मरण किया है। इन्होंने सोमपालविलास नामक महाकाव्य भी लिखा था, जो ऐतिहासिक महाकाव्य है। राजा सोमपाल का उल्लेख कल्हण ने राजतरङ्गिणी में किया है। कनालीला मुग्धोपदेश में कुल ६६ पद्य हैं, जो सभी शार्दूलविक्रीडित में निबद्ध हैं। उपदेशकाव्यों की परंपरा में रचित इस काव्य का क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित है - संपूर्ण काव्य में गणिकाओं की प्रवंचना से भोले-भाले लोगों को सावधान करने के लिए वेश्याओं की कुटिलता और १. इस प्रकार की अन्य अनुकृत रचनाओं की सूची के लिये ई- हिस्ट्री आफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर, कृष्णमाचारियर, पृ. ३४७काव्य-खण्ड दिखावे का भर्त्सना के भाव से वर्णन किया गया है। वेश्यावृत्ति के विरुद्ध इतना तीखा आक्रोश संभवतः काव्यसाहित्य में अन्यत्र नहीं मिलेगा। कवि ने भावनात्मक स्तर पर उद्वेलित होकर वेश्यावृत्ति की जघन्यता का दिग्दर्शन कराया है तथा गणिकाओं के सौंदर्य में निहित बीभत्सता का भयावह चित्रण उसने किया है। वेश्या को गृध्री, सरघा (मधुमक्खी), व्याघ्री, भुजंगी, मछली तथा चुहिया बताते हुए वह कहता है - गृधी निर्भरमामिषेषु सरघा घोरा मधूनां भरे व्याघ्री तीक्ष्णनखक्षतेषु भुजगी दंशप्रकारेषु च। उत्तानेषु विवर्तनेषु शफरी वित्तच्छले मूषिका वेश्या कामुकवञ्चनाय भुवने रूपैरनेकैः स्थिता।। (२६)