महाकवि क्षेमेन्द्र का जीवन-परिचय महाकाव्यविषयक अध्याय में दिया जा चुका है। इनके चतुर्वर्गसङ्ग्रह तथा चारुचर्या नीतिपरक मुक्तक के अंतर्गत रखे जा सकते हैं। चतुर्वर्गसङ्ग्रह में चार परिच्छेद हैं, जिनमें क्रमशः पुरुषार्थचतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) का निरूपण है। धर्मविषयक प्रथम परिच्छेद में २७, अर्थविषयक द्वितीय परिच्छेद में २५, कामविषयक तृतीय में तथा मोक्षविषयक चतुर्थ परिच्छेद में कुल पद्य हैं। चारों परिच्छेदों में विभिन्न छन्दों का प्रयोग हुआ है। इस काव्य में क्षेमेन्द्र ने सरल और प्रांजल शैली में चारों पुरुषार्थों के मानव-जीवन में महत्त्व का प्रतिपादन किया है। मूल उद्देश्य उपदेशपरक होते हुए भी कथ्य को सरस तथा आकर्षक बनाये रखने में कवि सफल हुआ है। __प्रथम परिच्छेद में धर्म के विभिन्न अंगों-सत्य, अहिंसा, पवित्रता, दान, शान्ति, वैराग्य आदि के स्वरूप को अनाविल रूप में प्रस्तुत करते हुए महाकवि ने मनुष्य के व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने का प्रशस्त पथ दिखाया है - तप्तैस्तीव्रव्रतैः किं विकसति करुणास्यन्दिनी यद्यहिंसा किं दूरैस्तीर्थसारैर्यदि शमविमलं मानसं सत्यपूतम् । यत्नादन्योपकारैः प्रसरति यदि धीर्दानपुण्यैः किमन्यैः किं मोक्षोपाययोगैर्यदि शुचिमनसामच्युते भक्तिरस्ति ।। (१।२७) 12(यदि मनुष्य के मन में करुणा का प्रवाह बहाने वाला अहिंसा का भाव है, तो उसे तीव्र व्रत करने की क्या आवश्यकता? यदि मन शम से निर्मल तथा सत्य से पूत है, तो दूर-दूर के तीर्थ करने की क्या आवश्यकता? यदि बुद्धि परोपकार में प्रवृत्त होती है, तो दानपुण्य के दिखावे से क्या? यदि पवित्र मन वाले भक्त की विष्णु में भक्ति है, तो मोक्ष के उपायों की भी क्या आवश्यकता?) वस्तुतः चतुर्वर्गसङ्ग्रह में क्षेमेन्द्र समाज के सामने एक शिक्षक के रूप में उभरते हैं। कबीर की भांति खरी-खरी कहने की उनमें क्षमता भरपूर है। अपने समय की सच्चाइयों ४५५ परवर्ती गीतिकाव्य को बेबाक ढंग से प्रकट करते हैं। चतुर्वर्गसङ्ग्रह के द्वितीय परिच्छेद में अर्थ के माहात्म्य का विवरण इसी दृष्टि से दिया गया है - माने जमकर नकार विन तावद् धर्मकथा मनोभवरुचिर्मोक्षस्पृहा जायतेने का पारा तावत् तृप्तुिसुखोदयेन न जनः क्षुत्क्षामकुक्षिः क्षणम्। ति की प्राप्ते भोजनचिन्तनस्य समये वित्तं निमित्तं विना परि सिगरमा वि धर्म कस्य धियः स्मरं स्मरति कः केनेक्ष्यते मोक्षभूः? (२०२४). (जब व्यक्ति भरपेट भोजन कर के तृप्त हो चुकता है, तभी धर्म की चर्चा हो सकती है, तभी कामाप्रसंग में रुचि हो सकती है, और तभी मोक्ष के लिये स्पृहा जागृत होती है। यदि भोजन की चिंता लगी हो, और भोजन का साधन वित्त गांठ में न हो, तो फिर किसकी बुद्धि धर्म में प्रवृत्त होगी, कौन स्मर (कामदेव) का स्मरण करेगा और कौन मुक्तिमार्ग की ओर ताकेगा?) __चतुर्वर्गसङ्ग्रह के तृतीय परिच्छेद में भर्तृहरि के शृङ्गारशतक की भांति लालित्य तथा -रागात्मकता है। स्त्री के लुभावने सौन्दर्य, विरह-व्यथा तथा मिलन के रोमांच और आनन्द का वर्णन कवि ने उसी प्रकार समर्थ और अभिप्रायगर्मित पदावली में किया है, जिस प्रकार पहले के परिच्छेदों में धर्म और अर्थ की अनिवार्यता का। तथापि तृतीय परिच्छेद में सौन्दर्यबोध तथा उपमाओं की छटा रमणीय है। उदाहरण के लिये - कुवलयमयी लोलापागे तरङ्गमयी भ्रुवोः गायब मिय शशिशतमयी वक्त्रे गात्रे मृणाललतामयी। मलयजमयी स्पर्श तन्वी तुषारमयी स्मिते दिशति विषम स्मृत्या तापं किमग्निमयीव सा? (३७) (जिस प्रिया की चंचल चितवन नीलकमल सी है, भौहें तरंगों सी, मुख सौ चन्द्रमाओं के जैसा और देह मृणाललता सा है और जिसका स्पर्श चन्दनलता की तरह तथा मुस्कान हिमकणों जैसी शीतल है, वहीं प्रिया विरह में अग्नि जैसी क्यों हो जाती है, और उसकी स्मृति क्यों विषम ताप उत्पन्न करने लगती है?)
- इस परिच्छेद में कुछ पों में क्षेमेन्द्र ने गाहासतसई तथा सुभाषितों के शृङ्गारी कवियों की भांति दाम्पत्य तथा प्रणयजीवन के मधुर क्षणों का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है। उदाहरण के लिये प्रोषितभर्तृका नायिका के चिरकाल के पश्चात् अपने पति से मिलन का यह वर्णन - समायाते पत्यौ बहुतरदिनप्राप्यपदवीं समुल्लङ्याविघ्नागमनचतुरं चारुनयना। रिताका कान काव्य-खण्ड स्वयं हर्षोद्वाष्पा हरति तुरगस्यादरवती रजः स्कन्थालीनं निजवसनकोणावहननैः।। (३।१८) (बहुत दिनों के बाद घुड़सवार पति घर वापस आता है। उसे देखते ही चारुनयना गृहिणी की आंखों में हर्ष के आंसू भर आये हैं। वह बड़े आदर के साथ अपने आंचल से उस घोड़े के गले से धूल झाड़ रही है, जो उसके पति को घर तक ले कर आया है।) चतुर्थपरिच्छेद में निर्वेद का भाव प्रधान है। सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता और विषयों की निस्सारता का प्रतिपादन कवि ने सारवती पदावली के द्वारा किया है। संक्षेप में चतुर्वर्गसङ्ग्रह क्षेमेन्द्र के द्वारा भर्तृहरि की शृङ्गार, वैराग्य तथा नीति के शतकों की परम्परा का उत्कृष्ट पल्लवन है, तथा यह एक यथार्थवादी रचनाकार के रूप में क्षेमेन्द्र की उनकी उज्ज्वल छवि को प्रस्तुत करता है।
चारुचर्या
चारुचर्या क्षेमेन्द्र का १०१ अनुष्टुप् पद्यों में रचित काव्य है, जिसमें मनुष्य के उत्तम आचरण की अनुशंसा की गयी है। क्षेमेन्द्र के अन्य काव्यों की ही भांति इस काव्य की भी समग्र परिकल्पना में एक मौलिकता है। प्रत्येक छन्द के पूर्वार्ध में सद्व्यवहार का उपदेश है और उत्तरार्ध में उसकी पुष्टि में कोई उत्तम प्राचीन दृष्टान्त । इसकी विशेष शैली के कारण क्षेमेन्द्र का प्रत्येक पद्य यहां सीधे हृदय में उतरता चला जाता है। क्षेमेन्द्र की शैली इतनी सरल और सहज है कि उनकी बात एक अत्यन्त सामान्य पाठक को भी उसी प्रकार हृदयंगम हो सकती है, जिस प्रकार प्रबुद्ध व्यक्ति को। छोटी-छोटी बातों पर उन्होंने बड़े दृष्टान्तों के द्वारा हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं - पुण्यपूतशरीरः स्यात् सततं स्नाननिर्मलः । तत्याज वृत्रहा स्नानात् पापं वृत्रवधार्जितम् ।। ३ न त्यजेद् धर्ममर्यादामपि क्लेशदशां श्रितः। हरिश्चन्द्रो हि धर्मार्थी सेहे चाण्डालदासताम् ।। १३ परप्राणपरित्राणपरः कारुण्यवान् भवेत् । मांसं कपोतरक्षायै स्वं श्येनाय ददौ शिविः।। २३ कशाला
दर्पदलन
दर्पदलन भी क्षेमेन्द्र का उपदेशप्रधान काव्य है। इसका विभाजन विचारों में किया गया है। इसमें कुल सात विचार हैं, जिनमें कुल, धन, विद्या, रूप, शौर्य, दान और तप को मनुष्य के अहंकार के कारण के रूप में सोदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह बताया गया कि मनुष्य इनसे होने वाले दर्प से अपने को कैसे बचाये। इसके साथ ही दर्ष को उत्पन्न करने वाले कुल, धन, विद्या आदि का मिथ्या स्वरूप उद्घाटित करते हुए क्षेमेन्द्र ने वास्तविक कुल, रूप या विद्या के स्वरूप की भी इस काव्य में चर्चा की है। प्रत्येक चिार के अन्तर्गत कवि ने अत्यंत रोचक कथाएं उदाहरण के लिये प्रस्तुत की हैं। इन कथाओं में लोककथा का रस है, समाज की सच्ची प्रतिमा है और व्यंग्य की प्रखरता भी है। परवर्ती गीतिकाव्य क्षेमेन्द्र शैली के निपुण आचार्य हैं। विषय के अनुरूप भाषा को वे कहीं चुभती हुई बना देते हैं, कहीं सुकुमार पदावली के द्वारा मन को गुदगुदा देते हैं, तो कहीं शास्त्रनिष्ट गंभीर वाक्यरचना के द्वारा चिन्तनप्रवाह को अनावृत कर देते हैं। लोकोक्तियों की बानगी तथा अनुप्रासों की झंकार ने उनकी रचना को अतिरिक्त आकर्षण से भर दिया है। उदाहरण के लिये - अपि कुजरकर्णादपि पिप्पलपल्लवात्। अपि विद्युविलसिताद् विलोल ललनामनः।। १।६३ धाव (स्त्री का मन हाथी के कान से भी, पीपल के पत्ते से भी तथा बिजली की कौंध से भी अधिक चंचल हुआ करता है।) दर्पदलन के द्वितीय विचार (धनविचार) में नन्द नामक कंजूस सेठ की कथा अर्थपिशाचों पर तीखा व्यंग्य है। नन्द अगले जन्म में कोढ़ी बनता है तथा अपने ही पुत्र के द्वारा भिक्षा मांगते हुए दुत्कारा और पीटा जाता है। समस्त सातों विचार सुरुचिपूर्ण कथाओं के प्रस्तुतीकरण, बीच-बीच में शास्त्रचर्चा और सदुपदेश तथा कहीं पर प्रसाद-मधुरोक्ति तो कहीं गुरुतर तो कहीं लाघवान्वित वचोविन्यासवैदग्धी के कारण दर्पदलन संस्कृत काव्यों के बीच एक अनोखी कृति है।
सेव्यसेवकोपदेश
सेव्यसेवकोपदेश में कुल ६१ पद्य हैं। क्षेमेन्द्र ने इसमें स्वामी तथा भृत्य की दुःस्थिति का यथातथ्य विवरण दिया है। भृत्य की सेवाभावना तथा स्वामी के द्वारा पदे-पदे उसे दुत्कारे जाने की विडम्बनाओं को उन्होंने मार्मिक रूप में चित्रित किया है। सेवक के जीवन से क्षेमेन्द्र को सहानुभूति है - भूमिशायी निराहारः शीतवातातपक्षतः। मुनिव्रतोऽपि नरकक्लेशमश्नाति सेवकः।। -२० भूमि पर सोता है, निराहार रहता है, सर्दी, गर्मी, हवा झेलता है - इस प्रकार सेवक मुनियों की भांति व्रत का पालन करता है पर भोगता है नरक का दुःख। इस काव्य में क्षेमेन्द्र ने वस्तुतः सेवावृत्ति को ही धिक्कारते हुए मनुष्य की स्वतन्त्रता को महिमामण्डित किया है। वे पुनः भर्तृहरि के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहते हैं - भागीरथीतीरवनान्तरेषु फलावनप्रेषु महाद्रुमेषु। क्षुत्तापतृष्णाशमनेषु सत्सु किं दैन्यसेवाव्यसनावमानैः।। -३१ । सेवक को भी क्षेमेन्द्र का अन्त में यही उपदेश है - ह म काव्य-खण्ड राज्ञामज्ञतया कृतं यदनिशं दैन्यं तदुत्सृज्यतां कि शाह सन्तोषाम्भसि मृज्यतामपि रजः पादप्रणामार्जितम्। सन्तोषः परमः पुराणपुरुषः संविन्मयः सेव्यतां का का यस्मृत्या न भवन्ति ते सुमनसां भूयो भवग्रन्थयः।। -५८ (राजाओं के आगे अज्ञता के कारण जो हाथ पसारे, वह छोड़ दो। धनियों के पांव पकड़ने से लगी धूल को सन्तोष के जल से धो डालो। सन्तोष चैतन्यमय पुराणपुरुष है, इसका सेवन करो, जिससे फिर इस भवसागर की ग्रन्थियां तुम्हें न सताये।) BHAR