३७ बौद्ध स्तोत्रकाव्य

स्तोत्रकाव्य की वैदिक परम्परा के पश्चात् बौद्ध स्तोत्रों की परम्परा सर्वप्राचीन कही जा सकती है। यद्यपि हीनयान में बुद्ध की पूजा, भक्ति तथा स्तुति की परम्परा न थी, पर महायान के विकास से पूजा, भक्ति और स्तुति को बौद्ध धर्म में भी अपनाया गया और बौद्ध भिक्षु स्तुतियों या स्तोत्रकाव्यों का प्रयोग और प्रणयन करने लगे। की इन माम मानक . स्तोत्रकाव्य कामगण्डीस्तोत्रगाथा’ को डा. कीथ ने अश्वघोषरचित माना है।’ छन्दो-नैपुण्य की दृष्टि से यह रचना अत्यन्त प्रभावशाली है। कीथ के उल्लेख के अनुसार इस रचना को उपयोग काष्ठ की एक लम्बी पट्टी को मुद्गर से पीटते हुए बौद्ध महायान परम्परा में जो सन्देश भक्तों तक पहुँचाया जाता था, उसका उसमें निर्वचन है। यह रचना गेय है।

मातृचेट

बौद्ध स्तोत्रकारों में मातृचेट का नाम सर्वाधिक आदर के साथ लिया जाता है। तारानाथ के अनुसार वे एक ऐश्वर्यशाली ब्राह्मण के पुत्र थे, जिनका मूल नाम संघगुह्य था। इनका समय महाराज चन्द्र का राज्यकाल बताया गया है। चन्द्र राजा बिन्दुसार का भतीजा तथा उत्तराधिकारी था। मातृचेट का जन्मनाम काल था, अपत्यभक्ति के कारण इन्हें मातृचेट तथा पितृचेट इन दोनों नामों से पुकारा जाने लगा। ये विवरण तारानाथ के अनुसार है, जब कि आधुनिक विद्वानों में से कुछ का मत है कि दुर्गा अथवा काली के प्रति मातृभक्ति के कारण इनका नाम मातृचेट पड़ा होगा। बौद्ध तन्त्र में भी मातृचेट का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। जए FRESH कमा समाज का हिामा कि जर तारानाथ के अनुसार मातृचेट के रचे हुए बौद्ध स्तोत्र उस काल में इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि घर-घर में इनका गायन होता था तथा गली-गली में लोकगायक इन्हें गाते फिरते थे। कनिष्क ने मातृचेट को अपनी राजसभा में आमन्त्रित किया था, पर वार्धक्य के कारण मातृचेट राजा का अनुरोध न मान सके, तथा कनिष्कलेख नाम से एक लघुकाव्य कनिष्क को उन्होंने लिख कर भेजा, जिसके प्रभाव से राजा बौद्ध हो गया। इस घटना की सत्यता ऐतिहासिक दृष्टि से निर्विवादतया प्रमाणित है और इसी से मातृचेट का काल निर्धारण भी किया जा सकता है। HEET की कि ताजाक निक रचनाएं - मातृचेट की निम्नलिखित रचनाओं का उल्लेख मिलता है- वर्णनार्ह-वर्णन, सम्यक्बुद्धलक्षणस्तोत्र, त्रिरत्नमङ्गलस्तोत्र, एकोत्तरीस्तोत्र, सुगतपञ्चत्रिरत्नस्तोत्र, मिश्रकस्तोत्र, चतुर्विपर्ययकथा, कलियुगपरिकथा, आर्यतारादेवीस्तोत्र, मतिचित्रगीति, चतुःशतक, अध्यर्धशतक आदि। कतिपणी नामाजिक कारनामामा किरद अनुप्ताचार कमी किमानानक नागार्जन यात कामानणा गि

नागार्जुन

शून्यवाद के प्रमुख प्रतिष्ठापक थे। उन्होंने चार स्तोत्रों की रचना की। इस १. संस्कृत साहित्य का इतिहास : ए.बी.कीय, हिन्दी अनु.-मंगलदेव शास्त्री, पृ. ६EF २. वही। ३. बौद्धसंस्कृतकाव्यसमीक्षा : डा. रामायणप्रसाद द्विवेदी, पृ. २३७-३८ ४. वही, पृ. २३८-३६ ५. वही, पृ. २३६-४० ६. वही, पृ. २४० ४४८ काव्य-खण्ड कृति का नाम -‘चतुःस्तव’ है। इसके दो स्तोत्र संस्कृत में उपलब्ध हैं।- (१) निरौपम्यस्तवः तथा (२) अचिन्त्यस्तवः । यद्यपि सामान्यजन शून्य को अभावात्मक मानते हैं तथापि नागार्जुन के स्तोत्र में आस्तिकता के दर्शन होते हैं न शिविकिलिका सिंगांक नामयो नाशचिः काये क्षत्तष्णा सम्भवो न चार त्वया लोकानुवृत्त्वं दर्शिता लौकिकी क्रिया।।। नित्यो ध्रुवः शिवः कायस्तव धर्ममयो जिनः। मक पालक विनयजनहेतोश्च दर्शिता निर्वृतिस्त्वया ।।। गातार अन्य बौद्ध स्तोत्रों में वैदिक काव्य तथा वैदिक परम्पराओं के समावेश के कारण ‘परमार्थसगीति’, तथा धार्मिक कृत्यों के प्रतिपादन के कारण ‘सप्तबुद्धस्तोत्र’ भी महत्त्वपूर्ण माने गये हैं। अमृतानन्द की ‘नेपालीयदेवताकल्याणपञ्चविंशतिका’ स्रग्धरा छन्द में रची गयी है। इसमें स्वयम्भू, बोधिसत्त्व तथा वैदिक परम्परा के देवताओं के साथ-साथ नेपाल के विभिन्न तीर्थस्थलों, चैत्यों आदि की भी स्तुति है। जिन कागार गार Appeण्डाका कि बौद्ध परम्परा में तारा देवी का तान्त्रिक तथा धार्मिक दृष्टि से आराधन प्रचलित रहा है। सर्वज्ञमित्र के स्तोत्र के अतिरिक्त ‘आर्यतारानामस्तोत्रशतकस्तोत्र’ में तारा देवी के १०८ निामों के कथन के साथ उनकी स्तुति की गयी है। ‘एकविंशतिस्तोत्र’ में भी देवी तारा की ही स्तुति है। चन्द्रगोमिन् के नाम से भी ‘तारासाधकशतक’ नामक स्तुतिकाव्य का उल्लेख मिलता है। मितिमानता का पता लगा कि पाजिक विकास पत्ता वि रामचन्द्रकविभारती बंगाल के ब्राह्मण थे, जिन्होंने वि.सं. १३०२ (१२४५ ई.) में लंका जाकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इन्होंने ‘भक्तिशतक’ नामक स्तोत्र की रचना की थी। यद्यपि इस काव्य में बुद्ध की स्तुति है, पर वैदिकस्तोत्र-परम्परा का प्रभाव तथा पौराणिक आख्यानों का भरपूर उपयोग यहाँ देखा जा सकता है। नि निजाम

अष्टमहास्थान चैत्य

अष्टमहास्थानचैत्य बौद्ध धर्म की परम्परा से प्रभावित होकर लिखा गया मात्र पाँच पद्यों का एक वर्णनात्मक लघुकाव्य है, जिसके रचयिता कान्यकुब्जनरेश सुप्रसिद्ध नाटककार सम्राट हर्षदेव हैं। श्रीहर्ष यह काव्य लिखकर चीनी यात्री हुएनसांग को दिया था- ऐसा “उल्लेख मिलता है। इस काव्य में बौद्धमतावलम्बियों के आठ तीर्थस्थानों या चैत्यों का वर्णन और स्तवन किया गया है। १. इंडियन काव्य लिटरेचर : ए.के. जार्डर, खण्ड-४, पृ. ६५ स्तोत्रकाव्य ४४ ये चैत्य भगवान् बुद्ध के जीवनचरित से संबद्ध रहे हैं। ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि सम्राट हर्ष बौद्ध धर्म के प्रभाव में आने के पश्चात् इन आठ चैत्यालयों की तीर्थयात्रा के लिये गये हों, और उनके दर्शन करने के पश्चात् उन्होंने श्रद्धाभाव से यह काव्य लिखा हो। इस काव्य का तीसरा पद्य बृहत्तर भारत के स्वरूप को हमारे सामने रखता है, जिसमें कश्मीर, चीन, लंका, लाट, उड्र, सिन्धु, नेपाल, पौण्ड्र, कामरूप, कलशवरपुर, कांची और सौराष्ट्र का एक साथ उल्लेख है। अंतिम पद्य में इन सभी पावन स्थलों की वंदना है।

जातकस्तव

जातकस्तव भी बौद्ध परम्परा में रचा हुआ लघुकाव्य है, जिसके कर्ता सुप्रसिद्ध बौद्ध पंडित ज्ञानयशस् हैं। ज्ञानयशस् की तिथि अज्ञात है। इनकी केवल यही एक रचना प्राप्त हुई है, जिसमें शार्दूलविक्रीडित छन्दों में बीस पद्य हैं। प्रत्येक पद्य में किसी न किसी जातक कथा का उल्लेख करते हुए इसके नायक बोधिसत्त्व की प्रशंसा की गयी है।

सम्राट् हर्ष

सम्राट हर्ष ने २४ श्लोकान्तक सुप्रभातस्तोत्र लिखा है। आचार्य बलदेव उपाध्याय का मत है कि कुछ बौद्धस्तोत्र हर्षवर्धन रचित भी हैं, जो सम्भव है उनके अन्तिम वर्षों में लिखे गये हों। हर्ष का दूसरा स्तोत्र ‘अष्टामहाश्रीचैत्यस्तोत्र है।

सर्वज्ञमित्र

सर्वज्ञमित्र ने आर्यतारास्तोत्र (स्रग्धरास्तोत्र) की रचना की है जिसमें महायान-सम्प्रदाय में मातृदेवी और रसादेवी के रूप में नितान्त लोकप्रिय तारा देवी की स्तुति में निबद्ध एक रमणीय स्तोत्र है। इसकी रचना के विषय में एक आख्यान प्रसिद्ध है कि सर्वज्ञमित्र ने किसी ब्राह्मण की कन्या के विवाहार्थ धनसंग्रह करने के लिए अपने को किसी राजा के हाथ बेच डाला। वह राजा अनेक लोगों के साथ इनकी भी बलि देने लगा। तब इस स्तोत्र की रचना कर तारादेवी की दया से सर्वज्ञ ने सब जीवधारियों की रक्षा की। इस आख्यान से यह प्रमाणित होता है कि इस स्तोत्र में न केवल भक्तिभावना ही है प्रत्युत तान्त्रिक चमत्कार भी है। सर्वज्ञमित्र का समय आठवीं शती वि. का उत्तरार्ध (आठवीं श.ई. का पूर्वार्ध) है। कल्हण ने राजतरङ्गिणी में इनका उल्लेख किया है। १. वही, पृ. १४४ २. बौद्धसंस्कृतकाव्यसमीक्षा, पृ. २८७

४५० काव्य-रहाण्ड द्वादश अध्याय