३६ उपसंहार

विश्व की किसी भी भाषा में स्तोत्र साहित्य इतना समृद्ध नहीं है, जितना संस्कृत में। वस्तुतः भावप्रवणता तथा अनुभूति की गहनता जितनी स्तोत्रों की विधा में संस्कृत कवियों ने प्रकट की, उतनी अन्य किसी विधा में नहीं। इसके साथ ही स्तोत्रसाहित्य में भारतीय जीवनदर्शन, आचार-विचार और चिन्तन को भी अभिव्यक्ति मिली। सभी धार्मिक सम्प्रदायों के स्तोत्र संस्कृत में मिलते हैं, तथा धार्मिक सहिष्णुता और विभिन्न देवों की पूजा, उपासना में अन्तर्निहित एक अद्वैत तत्त्व का भी बोध स्तोत्रकाव्य कराते हैं। कुछ स्तोत्रकाव्यों में देवता के प्रति समर्पण और विनय की पराकाष्ठा है, तो कुछ में कवियों ने अपने उपास्य को उपालम्भ भी चुभते हुए दिये हैं। स्तोत्रकाव्य ईश्वर-तत्त्व के मनुष्य जीवन में नैकट्य तथा उसकी उपस्थिति का जीवन्त अनुभव हमें देते हैं। निजामा जिम का