कल जैन स्तोत्रकाव्य-परम्परा का उद्भव महावीर के काल में ही माना जाता है। अनुश्रुति के अनुसार इन्द्रभूति रूपधारी इन्द्र ने महावीर के सम्मुख पहुँच कर ‘जयतिहुवण’ नामक स्तोत्र का पाठ किया था। ऐतिहासिक दृष्टि से इस परम्परा का आरम्भिक प्रामाणिक स्तोत्र आचार्य कुन्दकुन्द (प्रथम शती) का ‘तित्थयरशुद्धि’ है। विक्रम सं. ५६८ के लगभग भद्रबाहु ने ‘उवसग्गहर’ स्तोत्र पाँच पद्यों में लिखा। विक्रम की द्वितीय शती के आसपास से लेकर संस्कृत में भी इस परम्परा में स्तोत्रकाव्य-रचना निरन्तर होती रही है।’
आचार्य समन्तभद्र
आचार्य समन्तभद्र विक्रम की द्वितीय शताब्दी के अन्त में विद्यमान तार्किक, धर्मशास्त्री एवं कवि विद्वान् थे। वे अप्रतिम विद्या के धनी थे और उनमें कवित्व एवं वाग्मित्वादि शक्तियाँ विकास की चरमावस्था को प्राप्त हो गई थीं। आचार्य समन्तभद्र का जन्म दक्षिण भारत में एक क्षत्रिय राजकुल में हुआ था। उनके पिता फणिमण्डलान्तर्गत उरगपुर के राजा थे। उनका जन्म नाम शान्तिवर्मा था। समन्तभद्र का निवास स्थान काञ्चीपुरी तथा समय विक्रम की दूसरी-तीसरी शताब्दी माना गया है। ये निम्रन्थ दिगम्बर साधु थे। अपनी धर्मप्रचार यात्राओं में लोगों को निरुत्तर कर देते थे। आचार्य समन्तभद्र के असाधारण व्यक्तित्व के विषय में पंचायती मंदिर दिल्ली के एक जीर्ण-शीर्ण गुच्छक में स्वयंभूस्तोत्र के अन्त में पाये जाने वाले पद्य में दश विशेषणों का उल्लेख किया गया है ‘आचार्योऽहं कविरहमहं वादिराट् पण्डितोऽहं फोरमकी दैवज्ञोऽहं भिषगहमहं मांत्रिकस्तोत्रिकोऽहम् । गीत लिया । नि गतिशत मा राजन्नस्यां जलधिवलया मेखलायामिलाया- तिन करना है निति का माज्ञासिद्धिः किमति बहुना सिद्धसारस्वतोऽहम् ।। राणा अनेक शिलालेखों तथा बाद के आचार्यों की कृतियों में समन्तभद्र के उल्लेख मिलते हैं। जैन परम्परा में उन्हें ‘आद्यस्तुतिकार’ कहा गया है। आचार्य समन्तभद्र के चार स्तोत्र मिलते हैं –
१. देवागमस्तोत्र
देवागमस्तोत्र अथवा आत्ममीमांसा में ११४ पद्य हैं। ग्रन्थकार ने वीर जिनकी परीक्षा कर उन्हें सर्वज्ञ और आप्त बतलाया है तथा युक्तिशास्त्रविरोधी वाक् हेतु के द्वारा आप्त की परीक्षा की गई है। दो कारिकाओं का अवलोकन कीजिए १. वही, पृ. ५६-६० २. स्तुतिविद्या प्रस्तावना, पृ. २५ स त्वमेवाऽसि निर्दोषो युक्तिशास्त्रविरोधिवाक्। शर ताला निमम अविरोधि यदिष्टं ते प्रसिद्धेन न बध्यते।। मित्वन्मतामृतबाह्यानां सर्वथैकान्तवादिनाम्। क्षिा मार: मारती आप्ताभिमानदग्धानां स्वेष्टं दृष्टेन बाध्यते ।। ६-७||
२. स्वयंभूस्तोत्र
इस स्तोत्र में १४३ पद्यों में २४ तीर्थंकरों की स्तुति की गई है। इस - ग्रंथ का नाम ‘चतुविंशतिजिनस्तुति’ भी है। कविपय पद्यों का रसास्वादन कीजिए - तिम आदी नामजिन नामि, सभव सुविाध तथा free शिशिधर्मनाथ महादेव, शान्ति शान्तिकर सदा।। यातायात
- TRP आदिनाथं तथा देवं, सुपाचं विमलं जिनम् । मानव कतार नमो बताता मल्लिनाथं गुणोपेतं, धनषा पंचविंशतिम् ।। रक मायाक
३. जिनशतकालङ्कार
इस स्तोत्र में स्तुतियाँ हैं अतः इसे ‘स्तुतिविद्या’ के नाम से भी जाना जाता है। कवि कहता है कि तीर्थंकर के द्वारा प्रणीत धर्मतीर्थ का अवगाहन भक्तों को ठीक उसी प्रकार शीतल तथा तापरहित बना देता है जिस प्रकार गंगाजल में स्नान गर्मी से तप्त हुए हाथियों को - येन प्रणीतं पृथु धर्मतीर्थ ज्येष्ठं जनाः प्राप्य जयन्ति दुःखम् । गाङ्ग इदं चन्दनपङ्कशीतं गज प्रवेका इव धर्मतप्ताः।। मुनि के वचन-किरणों की यह स्तुति प्रसन्न पदों से युक्त है - न शीतलं चन्दनचन्द्ररश्मयो न गाङ्गमम्मो न च हारयष्टयः। यथा मुनेस्तेऽनघवाक्यरश्मयः शमाम्बुगर्भाः शिशिरा विपश्चिताम् ।। निम्न श्लोक दार्शनिक पक्ष का रुचिकर वर्णन प्रस्तुत करता है - एकान्त दृष्टि-प्रतिषेधसिद्धि-न्यायेषुभिर्मोहरिपुर्निरस्य। की नीललोहिया असि स्म कैवल्यविभूतिसम्राट् ततस्त्वमर्हन् असि में स्तवार्हः ।। ‘स्तुतिविद्या’ के ४५ पद्यों में मुरजबन्ध चित्रालङ्कार है।
युक्त्यनुशासन
प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम यद्यपि युक्त्यनुशासन है तथापि इसमें ६४ पद्यों में स्पष्टतः वीरजिन स्तवन की प्रतिज्ञा और उसकी परिसमाप्ति का उल्लेख है। इस कारण इसका नाम वीरजिनस्तोत्र है। ग्रन्थनिर्माण के उद्देश्य को अभिव्यक्त करते हुए आचार्य कहते हैं - हे भगवन! यह स्तोत्र आपके प्रति रागभाव से नहीं रचा १. सम्पादकः प्रो. उदयचन्द्र जैन ! स्वयम्भूस्तोत्र-तत्त्वप्रदीपिका में चतुविंशतिजिनस्तोत्र नाम से भी प्रसिद्ध स्वयम्भूस्तोत्र तथा उसकी टीका दिगम्बर जैन संस्थान नरिया वाराणसी से प्रकाशित है। काव्य-खण्ड गया है, क्योंकि आपने भव-बन्धन का छेदन कर दिया है और अन्यों के प्रति द्वेष भाव से नहीं रचा गया है, क्योंकि हम तो दुर्गुणों की कथा के अभ्यास को खलता समझते हैं, वैसा अभ्यास न होने से वह खलता भी हम में नहीं है, तब पुनः इस रचना का ध्येय क्या है? ध्येय यही है कि लोग आपके प्रति भक्तिभाव धारण करें।
सिद्धसेन दिवाकर
सिद्धसेन दिवाकर का समय ३७३ से ४१४ ई. माना गया है। देवनन्दी ने तत्त्वार्थवृत्ति में सातवें अध्याय के १३वे सूत्र की टीका में तीसरी द्वात्रिंशतिका के १६वें पद्य के प्रथम चरण में यह स्पष्ट किया गया है कि सिद्धसेन देवनन्दी से भी पूर्ववर्ती यानी ५वीं शताब्दी के विद्वान् प्रतीत होते हैं। डॉ. आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्याय ने न्यायावतार के सम्पादन के प्राक्कथन में लिखा है- ‘यह बहुत संभव है कि ये सिद्धसेन गुप्तकाल के विद्वान् हों। चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य का समय ही सिद्धसेन दिवाकर का होना सम्भव है। सिद्धसेन की गणना दार्शनिक आचार्यों में की जाती है। वे अपने समय के विशिष्ट विद्वान्, वादी और कवि थे तथा तर्कशास्त्र में अत्यन्त निपुण थे। दिगम्बर एवं श्वेताम्बर दोनों ही सम्प्रदायों में उनकी मान्यता थी। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। सिद्धसेन के विषय में जिनसेन लिखते करीत गार वार कि शिकामा हुए कॉगिर जी का जगत्प्रसिद्धबोधस्य वृषभस्येव निस्तुषाः। यार । बोधयन्ति सतां बुद्धि सिद्धसेनस्य सूक्तयः। - कनिष्ट प्रवादिकरियूथानां केसरी-नय केसरः। सिद्धसेनकविर्जीयाद्विकल्पनखरांकुरः।। - ।। गान्दीकी की
द्वात्रिंशिका
यह स्तोत्र ३२-३२ पद्यों की ३२ रचनाओं वाला ‘द्वात्रिंशद्-द्वात्रिंशिका’ कहलाता है। वर्तमान में केवल २१ ही रचनायें उपलब्ध हैं। ये स्तोत्र साहित्यिक सौन्दर्य के साथ-साथ आध्यात्मिक गांभीर्य से भी मण्डित है। कवि ने अलंकारों के सम्बल पर भावों को विशाल अभिव्यक्ति दी है। इनकी भाषा सरस, सरल और परिमार्जित है। कवि एक स्थान पर कहता है कि तीर्थंकरो के सामने बागी प्रवादी उसी प्रकार उपस्थित नहीं हो पाते जिस प्रकार समृद्ध पक्षों से युक्त मयूर, गरुड़ के पास उपस्थित नहीं हो पाता - मटपला आप साच्छखाण्डना राजा जित है बाणा यथा न गच्छन्ति गतं गरुत्मतः। सुनिश्चितज्ञेयविनिश्चयास्तथा का नाम काम का न ते गतं यातुमलं प्रवादिनः।। म साँगुन । को ४३७ या TEEF
पूज्यपाद देवनन्दि
पूज्यपाद देवनन्दि का समय ४५०-५०० ई. माना जाता है। भारतीय जैन परम्परा में पूज्यपाद को लब्धप्रतिष्ठ ग्रन्थकार माना गया है। आपकी अमर कृतियों का दोनों ही सम्प्रदायों में समान आदर है। आप परम तपस्वी, साहित्य जगत् के देदीप्यमान सूर्य तथा परम बुद्धिमान् थे। आपके अन्य नाम जिनेन्द्रबुद्धि तथा पूज्यपाद थे - (op- यो देवनन्दि प्रथिमाभिधानो र आज भी बुड्या महत्या स जिनेन्द्रबुद्धिः । श्रीपूज्यपादोऽजनि देवताभि कहीं यत्पूजितं पादयुगं यदीयम्।। विशाल - (श्रवणबेलगोल शिलालेख नं. ४०) का आपका जन्म कर्नाटक में एक ब्राह्मण कुल में हुआ था। आपके पिता श्रीमाधव भट्ट एवं माता श्रीमती श्रीदेवी थीं। आपका जन्मस्थान कोले गाँव था। कि
सिद्धिप्रियस्तोत्र
सिद्धिप्रियस्तोत्र में देवनन्दि ने यमक के चमत्कार को पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया है। २६ पद्यों के इस स्तोत्र में प्रत्येक पद्य में दो-दो पादान्त यमकों का विन्यास निरन्तर किया गया है। यमकजन्य दुरूहता के कारण भक्तिभाव की अभिव्यक्ति निर्बाध ओर सहज रूप से नहीं हो सकी है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है शाकमा श्रुत्वा वचांसि तव सम्भव कोमलानि मी शाकशि . नो तप्यति प्रवरसम्भव कोऽमलानि। AIEEER देव प्रमुक्तसुमनोभवनाशनानि नाण शिलाशान स्वार्थस्य संसृतिमनोभवनाशनानि ।। (३) मूला प्रथम दो पंक्तियों में दुरूहता कम है। इनमें कहा गया है - हे सम्भव (जिन) तथा प्रवरसम्भव आपके अमल तथा कोमल वचन सुनकर कौन तृप्त नहीं होगा ? तृतीय तथा चतुर्थ पंक्तियों का आशय है - हे देव, हे प्रमुक्तसुमनोभव (मुक्त मन के स्वामी), आपके ये वचन स्वार्थ के अशन (प्रेरक) तथा संसार में मनोभव (काम) के नाशक हैं। जति
स्तोत्र-रचना
आपने सिद्ध-भक्ति, श्रुत-भक्ति, चरित्र-भक्ति तथा योग-भक्तिविषयक विशद स्तोत्रों की रचना की है जो ‘नित्यपाठसंग्रह’ के नाम से कारंजा से १६५६ में प्रकाशित हुए थे। ये स्तोत्र भक्ति, नीति, प्रार्थना तथा आध्यात्मिकता के अनुपम उदाहरण माने गए हैं। समाधिशतक का एक पद्य अवलोकनीय है - १. काव्यमाला सप्तम गुच्छक, पृ. ३०-३५ काव्य-खण्ड श्रुतेन लिङ्गेन यथात्मशक्ति समाहितान्तः करणेन सम्यक्। समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणां विविक्तमात्मानमथाभिधास्ये।।। मिपूज्यपाद की शैली सुन्दर एवं सरस है। विषय के प्रतिपादन की शैली सुन्दर एवं मनोहारी है। भाषा में पर्याप्त प्रौढ़ता एवं पण्डित्य झलकता है - माया यद्ग्राह्यं न गृह्णाति गृहीतं नापि मुञ्चति। 1 AE REP जानाति सर्वथा सर्व तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ।। (समाधितंत्र-१३०)
पात्रकेसरी
पात्रकेसरी ईसा की छठी शताब्दी के उत्तरार्ध और ७वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के विद्वान्, माने गए हैं। ये एक ब्राह्मण विद्वान् थे तथा अहिच्छत्र के निवासी थे। आप वेद-वेदान्त आदि के परम पण्डित थे। उनके पाँच सौ शिष्य थे जो अवनिपाल राजा के राज्यकार्य में सहायता करते थे। उन्हें अपने ब्राह्मणत्व का बड़ा अभिमान था। वे प्रातः और सायंकाल संन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म करते थे और राज्यकार्य को जाते समय कुतुहलवश वहाँ के पार्श्वनाथ दिगम्बर मन्दिर में उनकी प्रशान्त मुद्रा का दर्शन करके जीया करते थे – ना विप्रवंशाग्रणी सूरिः पवित्र पात्रकेसरी। पिल स जीयाज्जिन-पादाब्जसेवनैकमधुव्रतः।। पात्रकेसरी दर्शनशास्त्र के प्रौढ़ विद्वान् थे। आपकी दो कृतियों का नाम मिलता है १. त्रिलक्षणकदर्थन तथा २. जिनेन्द्रगुणसंस्तुति।
जिनेन्द्रगुणसंस्तुति
इस ग्रन्थ का अन्य नाम ‘पात्रकेसरीस्तोत्र’ है। इसमें कुल ५० पद्य है। यह स्तुतिग्रन्थ होते हुए भी एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इसमें वेद का पुरुषकृत होना, जीव का पुनर्जन्म, सर्वज्ञ का अस्तित्व, जीव का कर्तृत्व, क्षणिकवाद-निरसन, ईश्वर का निरसन, मुक्ति का स्वरूप तथा मुनि का सम्पूर्ण अपरिग्रहव्रत-इन दश प्रमुख विषयों का विवेचन दार्शनिक दृष्टि से किया गया है।
वज्रनन्दि
मल्लिषेण-प्रशस्ति में वजनन्दि के ‘नवस्तोत्र’ नामक ग्रन्थ का उल्लेख किया गया है, जिसमें सारे अर्हत्प्रवचन को अन्तर्मुक्त किया गया है और जिसकी रचना-शैली परम सुन्दर सतीशतिकालिका नगमा स्तोत्रकाव्य की नवस्तोत्रं तत्र प्रसरति कवीन्द्राः कथमपि प्रमाणं वजादी रचयत परनिदिनि मुनौ। नवस्तोत्रं येन व्यरचि सकलार्हतप्रवचन- प्रपंचान्तर्भाव प्रवणवर सन्दर्भ सुभगम्।। ४३६ धाय निमाविक 3 राह मिति र न त 555
आचार्य मानतुंग
प्रो. विण्टरनित्स ने मानतुंग का समय ईसा की तीसरी शताब्दी माना है, किन्तु मुनि चतुरविजय ने इनका समय विक्रम की सातवीं सदी बतलाया है। मानतुंग काशीनिवासी थे। इनके पिता का नाम धनदेव था। पहले दिगम्बर मुनि से दीक्षा लेकर ये चारुकीर्ति महाकीर्ति कहलाये परन्तु बाद में जितसिंह नामक श्वेताम्बराचार्य से दीक्षित होकर श्वेताम्बर साधु हो गए।
भक्तामरस्तोत्र
का यह स्तोत्र वसन्ततिलका छन्द में निबद्ध है। इस स्तोत्र का आदि पद ‘भक्तामर’ होने, से इसका यह नाम रूढ हो गया है। इस स्तोत्र में कुल ४८ पद्य हैं। प्रत्येक पद्य में काव्यत्व रहने के कारण ये ४८ पद्य काव्य कहलाते हैं, किन्तु श्वेताम्बर सम्प्रदाय में ४४ पद्य ही माने जाते हैं। दिगम्बर सम्प्रदाय में भक्तामरस्तोत्र के पठन-पाठन का प्रचुर प्रचार है। इस स्तवन में आदि ब्रह्मा आदिनाथ की स्तुति रहने से इसे आदिनाथस्तोत्र भी कहा जाता है। इस स्तोत्र का मंगलश्लोक इस प्रकार है - जरी तिलि हो सक कर समता भक्तामर प्रणत मौलिमणि प्रमाणा- मालिकों को पूरा का ही कि मुद्योतकं दलितपापतमो वितानम्। ती से निकलना सम्यक प्रणम्य जिनपादयगं युगादा-लस का वालम्बन भवजले पततां जनानाम् ।। कवि अपनी नम्रता दिखाते हुए कहता है कि हे प्रभो! अल्पज्ञ और बहुश्रुत विद्वानों द्वारा हसी का पात्र होने पर ही तुम्हारी भक्ति ही मुझे मुखर बनाती है। वसंत में कोकिल स्वयं नहीं बोलना चाहती प्रत्युत आम्रमंजरी ही उसे बलात् कूजने का आमन्त्रण देती है - अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम त्वद् भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम्। । यत्कोकिलः किल मधी मधुरं विरौति तच्चान-चारु-कलिकानिकरैकहेतु।। १. काव्यमाला सप्तम गुच्छक पृ. ५-६ ४४० काव्य-खण्ड कवि अपने आराध्यदेव की जितेन्द्रियता का चित्रण करते हुए कहता है कि प्रलयकाल की वायु से बड़े-बड़े पर्वत चलायमान हो जाते हैं पर सुमेरु पर्वत तनिक भी चलायमान नहीं होता, इसी प्रकार देवांगनाओं के सुन्दर रूप-लावण्य को देखकर ऋषि-मुनि देव-दनुजादि के चित्त चंचल हो जाते हैं पर आपका चित्त रंचमात्र भी युक्त नहीं होता। अतः आप इन्द्रियविजयी होने के कारण महावीर हैं - चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभि कमालीनीतं मनागपि मनो न विकारमार्गम्। काग FEssi जाति कल्पान्तकालमरुता चलिताचलेन कि रिती म काल का कोरियम कोकिल्ला कि मन्दरादिशिखरं चलितं कदाचित् ?rfp HEET] तीज • मानतुंग का यह स्तोत्र भाषा-सौन्दर्य, भक्तिभाव तथा पूजा-वन्दना का सुन्दर प्रस्तुतीकरण है। अतः जैनस्तोत्र साहित्य में इसकी पृथक् पहचान बन गई है। इस स्तोत्र की रचना इतनी जनप्रिय रही है कि इसके प्रत्येक पद्य के आद्य या अन्तिम चरण को लेकर समस्या पूर्त्यात्मक स्तोत्र रचे जाते रहे हैं। इस स्तोत्र की महत्ता के सम्बन्ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं और अनेक पद्यानुवाद हिन्दी में रचे गए हैं। संस्कृत में भी पद्यानुवाद तथा अनेक टीकायें रची गई है। यह प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण स्तोत्र है। 6ि - FREE
कुमुदचन्द्र
श्वेताम्बर सम्प्रदाय में सिद्धसेन दिवाकर का अपर नाम कुमुदचन्द्र माना जाता है, परन्तु कुछ विद्वानों की दृष्टि में इस स्तोत्र का वर्णन श्वेताम्बर सम्प्रदाय के सर्वथानुकूल नहीं है, अतः कुमुदचन्द्र सिद्धसेन दिवाकर से कोई भिन्न कवि है। इस स्तोत्र के टीकाकार का कथन है कि कुमुदचन्द्र का ही दीक्षावसर पर गुरुप्रदत्त नाम सिद्धसेन दिवाकर है। इस कृति पर भक्तामरस्तोत्र का नितान्त प्रभाव होने से यह ७वीं शती की रचना है, द्वितीय की नहीं। सय
कल्याणमन्दिरस्तोत्र
यह स्तोत्र सिद्धसेन दिवाकर के नाम से श्वेताम्बर ग्रंथों में संकलित है तथापि यह कुमुदचन्द्र की रचना है। इस स्तोत्र में कुल ४४ पद्य हैं जो वसन्ततिलका छन्द में निबद्ध हैं। मंगलश्लोक का रसास्वादन कीजिए… का मामी ang bhagyee II कल्याणमन्दिरमुदारमवद्य भेदि की सीविकार भीताभयप्रदमनिन्दितमङ्घ्रिपद्मम् । त र १. काव्यमाला सप्तम गुच्छक पृ.90-99 स्तोत्रकाव्य | MP F संसार-सागरनिमज्जदशेषजन्तु– कि 11ो पोतायमानममिनम्य जिनेश्वरस्य।। जिशिका आमी यहाँ जीव को संसार-सागर से तैरने का मार्ग बताया गया है। कवि का कथन है कि हे जिन! आपका अलौकिक महिमामय परिचय की बात तो परे, आपका नाम ही जगत की रक्षा करता है। गर्मी के दिनों में कमलमय सरोवर का सरस वायु भी तीन आतप से आक्रान्त राहगीरों की गर्मी परे कर देता है, जलाशय की तो बात ही क्या - लौका IPआस्तामचिन्त्य-महिमा जिन संस्तवस्ते शाही 11 ४६ || निक कानामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति । शिलमान तीव्रातपोपहतपान्थ-जनान् निदाघे प्रीणाति पद्मसरसः सरसोऽनिलोऽपि।। की इस स्तोत्र के अन्तिम पद्य में मोक्ष की बात कही गई है - शाम जाति में काम कि सिर की Sat का कमान निभान्छ । ती कलजन-नयन-कुमुदचन्द्र प्रभास्वराः स्वर्ग-सम्पदो भक्त्वा कि ला ते विगलितमलनिचया अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते ।। इस श्लोक का साहित्यिक स्तर पर्याप्त उच्च है तथा इसमें भक्तमन के सच्चे उद्गारों को प्रकट किया गया है। जैन तथा अजैन संसार में इसका बहुत महत्त्व रहा है। यह स्तोत्र तांत्रिक एवं चमत्कारी भी माना जाता है। CRPP की माली हानिकाली नितिन का नाम
धनञ्जय
महाकवि धनंजय का समय ४०० ई. निर्धारित किया गया है। ये वासुदेव तथा श्रीदेवी के पुत्र थे तथा इनके गुरु का नाम दशरथ था। ये गृहस्थ कवि थे। इनकी कविता वैशिष्ट्य शालिनी है। इनका द्विसन्धान काव्य संस्कृत साहित्य में उपलब्ध द्विसन्धान काव्यों में प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण काव्य है। कवि की दूसरी कृति धनंजयनाममाला नामक छोटा-सा दो सौ पद्यों का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण शब्दकोष है। Pाब गटSABHA
विषापहारस्तोत्र
यह ३६ इन्द्रवजा वृत्तों में निबद्ध स्तोत्र है जिसमें आदि ब्रह्मा ऋषभदेव का स्तवन किया गया है। निग्नलिखित पद्य में ऋषभदेव की गम्भीरता समुद्र के समान, उन्नत प्रकृति मेरु के समान और विशालता आकाश-पृथ्वी के समान बतलाकर उनकी लोकोत्तर महिमा का चित्रण किया है - १, काव्यमाला गुच्छक सप्तम पृ. २२-२६ काव्य-खण्ड अगाधताब्धेः स यतः पयोधिमेरोश्च तुंगाः प्रकृतिः स यत्र। द्यावापृथिव्योः पृथुता तथैव व्यापत्वदीया भुवनान्तराणि।। में कवि ने भगवान् की उदात्त प्रकृति का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है-मोह रूपी विष को भगवान् ऋषभ ही उतार सकते हैं। इसलिये कवि का कथन है कि लोग व्यर्थ ही संसार में विषापहारक ओषधों, मणियों, रसायनों को खोजते फिरते हैं, वे सब तो भगवान् के ही पर्यायमात्र हैं का एक II कि निजाम 35 कि मिलाफ कामा 51 देवेन्द्रमनिय विशिलामामात ] . विषापहारं मणिमोषधानि मन्त्रं समुदिश्य रसायनं च। भ्राम्यन्त्यहो न त्वमिति स्मरन्ति पर्यायनामानि तवैव तानि।। १४।। शिकनिककारिताशी
धनपाल
धनपाल का समय १०वीं शती माना गया है। ये उज्जयिनी के काश्यपगोत्रीय सर्वदेव नामक विप्न के पुत्र थे। ये दो भाई थे। बड़े भाई शोभन ने पहले तथा इन्होंने बाद में जैन धर्म की दीक्षा ली। मुञ्जमहीपति ने इन्हें ‘सरस्वती’ की उपाधि से अलंकृत किया। इनकी रचनाओं में तिलकमंजरी, प्राकृतलक्ष्मी नाममाला व ऋषभपंचाशिका इनकी प्रमुख रचनायें हैं। इनमें ऋषभपञ्चाशिका’ स्तोत्रकाव्य हैं, जो प्राकृत गाथाओं में है। कति माधि 15 सामाजिककिश की जनरल
देवेन्द्रमुनि
आचार्य देवेन्द्र धनपाल के समकालीन थे। इन्होंने ‘त्रिकालचतुर्विंशतिजिनस्तवन’ लिखा है।
त्रिकालचतुर्विंशतिजिनस्तवन
‘इस स्तवन में १३ पद्यों में अतीत, वर्तमान तथा भावी जिनों की स्तुति की गई है। तीनों का एक-एक पद्य अवलोकनीय है - केवलज्ञानिनं निर्वाणिनं सागरमेव च। ही जात मिली महायशोऽभिधं वन्दे भक्त्या विमलनायकम् ।। ति का सर ऋषभञ्चार्जितं चैव सम्भवं चाभिनन्दनम्। सुमतिं पद्मप्रभाख्यं सुपार्श्व नौम्यहं जिनम् ।। तिक जल की पद्मनाथं सूरदेवं सुपावं च स्वयं प्रभम्। एक सह कीकार किल्ला मा सर्वानुभूतिमभितो वन्दे देवश्रुतास्वयम् ।। शीलीने की नामसार ककनीक किन्छ कान चिक निकाय कामानि म चाया त १. काव्यमाला सप्तम गुच्छक पृ. १२४-१३१ -P FEE | जामाता स्तोत्रकाव्य
वादिराजकृत एकीभावस्तोत्र
पार्श्वनाथचरित महाकाव्य के कर्ता वादिराज जैन आचार्यों तथा कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ’ इनका एकीभावस्तोत्र २५ मन्दाकान्ता छन्दों में भावपूर्ण और मनोहर कृति है। इसमें जिन या महावीर स्वामी को ही परम आराध्य मानकर कवि उनका चित्त में ध्यान करता है - म तिमीला फाटाना CHIETI DHS ज्योतीरूपं दुरितनिवहध्वान्तविध्वंसहेतुं त्वामेवाहुर्जिनवर चिरं तत्त्वविद्याभियुक्ताः। चेतोवासे भवसि त्वं मम स्फारमुद्भासमान करत ति स्तस्मिन्नंहः कथमिव तमो वस्तुतो वस्तुमीष्टे ।। २ कि (हे जिनवर, तत्त्वविद्या में प्रवीण बुद्धिमानों ने आपको ही ज्योतिः स्वरूप तथा पापों के अंधेरै को ध्वस्त करने वाला हेतु बताया है। आप मेरे चित्तरूपी आवास में सुस्पष्ट उद्भासित हैं, तो वहाँ तमोगुण का अंधकार फिर कैसे रह सकता है ?)
अमितगति
अमितगति (द्वितीय) माथुर संघ के विद्वान् नेमिषेण के प्रशिष्य और माधवसेन के शिष्य थे। ये ग्यारहवीं शताब्दी के अच्छे विद्वान और कवि थे। आपकी कविता सरल और वस्तुतत्त्व की विवेचक है। अमितगति की निम्न कृतियाँ उपलब्ध हैं- सुभाषितरत्नसन्दोह, धर्मपरीक्षा, उपासकाचारपंचसंग्रह, आराधना, तत्त्वभावना और भावनाद्वात्रिंशतिका ।
भावनाद्वात्रिंशतिका
यह एक ३२ पद्यों का स्तोत्र है जिसमें सुन्दर कवित्वपूर्ण एवं कोमल भाव है। इसका अन्य नाम श्री परमात्म-द्वात्रिंशिका है। प्रथम पद्य का अवलोकन कीजिए - सत्त्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्।। माध्यस्थ्यभावं विपरीत-वृतौ सदा ममात्मा विदधातु देव!।। एक अन्य प्रलोक देखिए- पालाम छ नि कामानता कि विधा। || HIPPIPPETES १. वादिराज के परिचय हेतु जैनमहाकाव्य तथा चरितकाव्य शीर्षक अध्याय में ‘पार्श्वनाथचरित’ उपशीर्षक द्रष्टव्य। २. काव्यमाला सप्तम गुच्छक पृ. १७-२२काव्य-खण्ड विभासते यत्र मरीचिमालिन्यविद्यमाने भुवनावभासि।। शिल सास में शि स्वात्मस्थितं बोधमय-प्रकाशं तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ।।दार अन्तिम श्लोक में परमात्मा को मक्तिनिकेत कहा गया है - चिम IFES यैः परमात्माऽमितगतिवन्धः सर्वविविक्तो भृशमनवद्यः । शश्वदधीतो मनसि लभन्त मुक्तिनिकैतं विभववरं ते।। HIPPINTERE