सामान्यतः स्तोत्र, स्तुति तथा स्तव में ये तीनों पर्याय माने जाते हैं। पर जैन-परम्परा में इन्हें किंचित् भिन्न विधाएं मानकर इनमें परस्पर विवेक किया गया है। मलयगिरि ने व्यवहारभाष्य में स्तुति और स्तव का अन्तर बताते हुए कहा है कि एक से तीन श्लोकों की स्तुति और चार या उससे अधिक श्लोक होने पर स्तव है। स्तोत्र इन दोनों के ही लिए सामान्य शब्द हैं। मतान्तर से एक से सात श्लोकों की स्तुति तथा आठ या इससे अधिक श्लोकों का स्तव माना गया है। एक अन्य परम्परा स्तव तथा स्तोत्र में भी भाषा की दृष्टि से भेद करती है। स्तव गम्भीर अर्थ वाला तथा संस्कृत भाषा में ही निबद्ध होता है, जबकि स्तोत्र की रचना विभिन्न छन्दों में प्राकृत भाषा में होती है। “वस्तुतः इस प्रकार का भेद जैन स्तोत्र-काव्यों में व्यवहार में सर्वत्र अनुपालित नहीं १. बिबरण तथा उक्त लक्षणों के मूल उद्धरणों के लिये संस्कृत काव्य के विकास में जैन कवियों का योगदान पुस्तक पृ. ५५-५६ द्रष्टव्य ।काव्य-खण्ड ४३४ Fro