अज्ञातकर्तक पञ्चस्तवी स्तोत्र साहित्य की महत्त्वपूर्ण रचना है। काव्यमाला सम्पादक के अनुसार इसका प्रणेता कोई प्राचीन कवि है। पञ्चस्तवी में पाँच स्तव हैं - १. लघुस्तव २. चर्चास्तव ३. घटस्तव ४. अम्बास्तव ५. सकलजननीस्तव। 15 इनमें प्रथम स्तव में २१, द्वितीय स्तव में ३०, तृतीय स्तव में २१, चतुर्थ स्तव में ३२ और पञ्चम स्तव में ३८ श्लोक हैं। इस प्रकार पञ्चस्तवी में कुल १४२ श्लोक हैं।
काल
इन स्तवों के रचयिता कवि का नाम यद्यपि अज्ञात है; तथापि इसके तृतीय ‘घटस्तव’ के एक श्लोक लक्ष्मीवशीकरणचूर्णसहोदराणि त्वत्पादपङ्कजरजांसि चिरं जयन्ति। यानि प्रमाणमिलितानि नृणां ललाटे - लुम्पन्ति दैवलिखितानि दुरक्षराणि।। १८ ॥ को भोजराज ने सरस्वतीकण्ठाभरण के पञ्चम परिच्छेद में उद्धृत किया है। इसी स्तव का श्लोक - लिवानल मा SAS कि कि IFTTH का वितरित की म को जिआनन्दमन्थरपुरन्दरमुक्तमाल्य नगर मज मौली हठेन निहितं महिषासुरस्य। शिकायमानी आहार जा # कर पादाम्बुज भवतु में विजयाय मञ्जु-मामा मामा लाकात मजीरशिजितमनोहरमम्बिकायाः ।।१।। ललिता की मिट । अप्पय दीक्षित के कुवलयानन्द के संसृष्टि-प्रकरण में तथा इसी श्लोक का उत्तरार्ध नकाशा पादाम्बुजं भवतु मे विजयाय मजु JI मजीरशिञ्जितमनोहरमम्बिकायाः। क्ला A काव्यप्रकाश के दशम उल्लास में उद्धृत है अतः स्पष्ट है कि इस पञ्चस्तवी की रचना भोजराज (११वीं शती का पूर्वार्ध) तथा मम्मट (११वीं शती का उत्तरार्थ) से पूर्व लगभग स्वी या १०वीं शती में हुई होगी।। पञ्चस्तवी के सभी स्तोत्रों में आराध्या देवी की विभिन्न रूपों में स्तुति है। अध्यात्म, तन्त्र, भक्ति और सौन्दर्य-चेतना का एकत्र समावेश कवि की काव्यात्मक उन्नति का परिचायक है। प्रसादगुण और अर्थालङ्कारों का प्रयोग द्रष्टव्य है। देवी से भवताप को दूर करने की प्रार्थना करते हुए कवि कहता है - रिला । गाजिया १. काव्यमाला, गुच्छक-३, पृ. ६ पर पाद टिप्पणी। (ख) काव्यमाला गुच्छक ३ में प्रकाशित। क ४२८ काव्य-खण्ड डाधान हतुं त्वमेव भवसि त्वदधीनमीशेन डिमां की संसारतापमखिलं दयया पशूनाम्। FepaF
- वैकर्तवी किरणसंहतिरेव शक्ता र मा TITTE धर्म निजं शमयितुं निजयैव दृष्टया।। अम्बास्तव-२४
उत्पलराज : स्तोत्रावली
शैव स्तोत्र-परम्परा में उत्पलराज और उनकी स्तोत्रावली का महत्त्व विशेष है। । उत्पलदेव सुप्रसिद्ध आचार्य सोमानन्द के पुत्र तथा शिष्य थे और आचार्य अभिनवगुप्त के गुरु थे। अभिनव ने उनकी ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका और ईश्वरप्रत्यभिज्ञावृत्ति पर विमर्शिनी लिखी है। ‘स्तोत्रावली’ उत्पलदेव की स्तोत्र साहित्य को अमूल्य देन है। आचार्य अभिनव गुप्त के शिष्य मधुराज योगी ने अपने शास्त्रपरामर्श नामक ग्रन्थ में स्तोत्रावली के सम्बन्ध में लिखा है सन्त्येव सूक्तिसरितः परितः सहस्राः र गीत स्तोत्रावली सुरसरित्सदृशी न काचित्। माया या कर्णतीर्थमतिशय्य पुनाति पुंसः 5 मि। म श्रीकण्ठनाथनगरीमुपकण्ठयन्ती।। (शास्त्रपरामर्श, पद्य-८)२ पति (यद्यपि सूक्तियों की अनेक सरिताएं चारों ओर सहस्रशः बह रही हैं, पर स्तोत्रावली रूपी गंगा के समान अन्य कोई नहीं है, जो मनुष्य के कान रूपी तीर्थ को पवित्र कर उसे श्रीकण्ठनाथ (शिव) की नगरी के निकट पहुँचा देती है।)या कर उत्पलदेव के आचार्यत्व तथा कवित्व दोनों का प्रकर्ष भक्ति की धारा में इस काव्य में समेकित है। स्तोत्रावली का निम्नलिखित पद्य आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में उद्धृत -किया है कि कार जी के शशि तामा कण्ठकोणविनिविष्टमीश ते कालकूटमपि मे महामृतम् । अप्युपात्तममृतं भवद्वपुर्भेदवृत्ति यदि मे न रोचते।। - छिह ईश, आपके कण्ठ के कोने में विनिविष्ट कालकूट में मेरे लिये महान अमृत है, । पर आपके देह से भेदवृत्ति वाला अमृत या चन्द्रमा भी हो, तो वह मुझे अच्छा नहीं लगता।) १.कि डॉ. डे के अनुसार इसका रचनाकाल ६८२ वि.सं. (९२५ ई.) के लगभग है। (हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर : डे तथा दासगुप्त, पृ. ३८१) २. डा. के.सी. पाण्डेय द्वारा ‘अभिनवगुप्त ए हिस्टारिकल एण्ड फिलासाफिकल स्टडी’ में पृ. ७६५ पर उद्धृत गरी
रत्नाकर : वक्रोक्तिपञ्चाशिका
स्तोत्रकाव्य ISIT(स्तोत्रावली में शिवविषयक २१ स्तोत्र हैं) शैवस्तोत्रों की परम्परा में ही हरविजय-महाकाव्य के कर्ता रत्नाकर की वक्रोक्तिपञ्चाशिका का उल्लेख किया जा सकता है। रलाकर भी आनन्दवर्धन, उत्पलदेव, अभिनव आदि की भाँति कश्मीर के कवि हैं। पर इनके स्तोत्र का अन्तः स्वर ऊपर चर्चित स्तोत्रों से किंचित् भिन्न है, तथा उसमें श्रृङ्गार और हास्य का पुट है। वक्रोक्तिपञ्चाशिका के सभी पचास पद्य वक्रोक्ति नामक शब्दालंकार का रोचक और कलापूर्ण उदाहरण है। शिव और पार्वती के बीच की हंसी-ठिठोली को कवि ने शब्दक्रीडा के द्वारा प्रस्तुत किया है। इस काव्य पर वल्लभदेव की पञ्जिका टीका मिलती है। ये वल्लभदेव आनन्दवर्धन के टीकाकार ऊपर उल्लिखित कैय्यट के पूर्वज हैं तथा मल्लिनाथादि टीकाकारों के बहुत पहले के हैं। BEDIT वक्रोक्तिपञ्चाशिका हमारे स्तोत्रसाहित्य का एक अन्य पक्ष उजागर करती है, जिसमें देवता के प्रति समर्पण और दास्य के स्थान पर सख्यभाव, नालाप और उस पर मानवीय भावनाओं का आरोप करके कवि अपने चित्तकषाय को उसके माध्यम से धोता चलता है। रत्नाकर की विनोदवृत्ति, भाषा पर असाधारण अधिकार तथा माधुर्य और श्रृङ्गार के साथ भक्ति की अभिव्यक्ति ने इस काव्य को अमतपर्व बना दिया है। शिव और पार्वती के बीच की झड़प में कभी पार्वती अपने प्रत्युत्तरों से शिव को चुप कर देती हैं, तो कभी शिव उन्हें हतप्रभ कर देते हैं। एक उदाहरण देखिये स्किानी किती त्वं हालाहलभृत् करोषि मनसो मूछा ममालिङ्गितो अधिक हालां नैव बिभर्मि नैव च हलं मुग्धे कथं हालिकः। कमान का काम कि निकि फिल्म त सत्यं हालिकतैव ते समुचिता सक्तस्य गोवाहने ISISIST वक्रोक्त्यति जितो हिमाद्रिसुतया स्मेरो हरः पातु वः।। (२) पार्वती कहती हैं-हे शिव, आप हालाहल धारण करने वाले हैं, क्योंकि आपके आलिंगन से मुझे मूर्छा आने लगती है। शिव उत्तर में कहते हैं- मैं न तो हाला (मदिरा) धारण करता हूँ, न हल। फिर मैं हालिक (मदिराविक्रेता) कैसे हो गया? पार्वती हालिक का अर्थ किसान लेते हुए आक्षेप करती हैं कि तुम गो (वृषभ) के वाहन वाले हो, इसलिये तुम्हें तो हालिक ही मानना चाहिये। इस प्रकार अपनी वक्रोक्ति के द्वारा पार्वती से जीत लिये जाने पर लजाये हुए शिव आपकी रक्षा करें। Pा निकाल सभी पद्यों में केवल अन्तिम पंक्ति में भी शिव या पार्वती के प्रति प्रशस्तिभाव आता है। भावध्वनि तथा चित्रकाव्य दोनों काव्यकोटियों का अच्छा समन्वय रत्नाकर ने इस स्तोत्र में किया है। 14 की शिकार का जिकई और है नाशिक. ०१ Pार १. रलाकर के परिचय के लिये इस ग्रन्थ का महाकाव्यविषयक अध्याय हरया
मुकुन्दमुक्तावलि
अज्ञातकर्तक मुकुन्दमुक्तावलि लाटानुप्रास तथा वृत्त्यनुप्रास के प्रतिपंक्ति प्रतिपद्य आद्यन्त सरस सार्थक निर्वाह के कारण ३० पद्यों में बड़ी आकर्षक रचना है। प्रसाद-प्रांजल शैली में यह श्रीकृष्ण की स्तुति है। कतिपय उदाहरण द्रष्टव्य हैं- लाल लाला नवजलधरवर्णं चम्पकामासिक किस तक उतीमागी स्तिक । माया विकसितनलिनास्यं विस्फुरन्मन्दहास्यम्। ही शिवाज विशाला 5 hrel ति कनकाचदुकूल चारुबहावयूला की मला कि कमपि निखिलसारं नौमि गोपीकुमारम्।। न मुखजितशरदिन्दुः कलिलावण्यासन्धुः का र भी न करविनिहितकन्दुबेल्लवीप्राणबन्धुः। यि प्रEि वपुरुपसृतरेणुः कक्षनिःक्षिप्तवणु- काटिपणा की ही 1 शिरवचनवशगधेनुः पातु मा नन्दसूनुः ।। (१, २) एशिय माहिर PL कहीं-कहीं यमक के प्रति आग्रह के कारण काव्य में दुरूहता आ गयी है। यथा - कहानी कि मि छ ही पिक निइन्द्रनिवारं व्रजपतिवारं निधूतवारं कृतघनवारम्। कि रक्षितगोत्रं प्रीणितगोत्रं त्वां घृतगोत्र नौमि सगोत्रम्।। (११) –
भैरवस्तव तथा देहस्थदेवताचक्रस्तोत्र
कश्मीर शैव-परम्परा में ही आचार्य अभिनवगुप्त के दो स्तोत्र उल्लेखनीय हैं - भैरवस्तव तथा देहस्थदेवताचक्रस्तोत्र। अभिनवगुप्त शैवदर्शन के महान् आचार्य तथा अलंकारशास्त्र और नाट्यशास्त्र के सुप्रसिद्ध व्याख्याकार हैं। इनका जन्मकाल डा. के.सी. पाण्डेय के अनुसार वि.सं. १००० (६५० ई.) के लगभग है। इनके दोनों स्तोत्रों में तन्त्र-साधना की प्रतिच्छवि है। दोनों में ही अत्यन्त प्रवाहमयी प्रांजल भाषा का प्रयोग है। भैरव-स्तोत्र में भैरव के रूप में शिव की स्तुति है और भक्तिभाव के साथ-साथ अद्वैततत्त्व का भी सुन्दर रूप में प्रतिपादन है। उदाहरणार्थ-सा गिर जा सिलिनीट फिलिशि वन्मयमेतदशेषमिदानीं भाति मम त्वदनुग्रहशक्त्या। कि शिली का त्वं च महेश सदैव ममात्मा स्वात्मभवं मम तेन समस्तम्।। से त्वय्यात्मनि विश्वगते त्वयि नाथे तेन न संसृतिभीतिकथास्ति। का गोडा सत्स्वपि दुर्धरदुःखविमोहनासविधायिषु कर्मगणेषु ।। २, ३ वा देहस्थदेवताचक्रस्तोत्र में आनन्दभैरवी, कौमारी, शाम्भवी, वाराही, वैष्णवी, इन्द्राणी आदि देवताओं तथा शक्तियों की स्तुति है। भैरवस्तव में १० तथा देहस्थदेवताचक्र में १५ पद्य हैं। अभिनवगुप्त : ए हिस्टारिकल एण्ड फिलासफिकल स्टडी, पृ. ८ दोनों स्तोत्र इस पुस्तक के परिशिष्ट में प्रकाशित हैं। स्तोत्रकाव्य ४३१
नारायणपण्डिताचार्य : शिवस्तुति
शैवस्तोत्रों में नारायणपण्डिताचार्य की शिवस्तुति’ उल्लेखनीय है। नारायण पण्डिताचार्य का देश-काल अनिर्धारित है। शिवस्तुति पृथ्वी छन्द में निबद्ध अत्यन्त ओजस्वी और अलंकृत शैली से युक्त रमणीय काव्य है। भावगाम्भीर्य के साथ-साथ अनुप्रास, यमक, श्लेष और अर्थालंकारों की सुपरिकल्पित योजना इसमें नारायण ने की है। शिव के त्रिपुरध्वंसी रूप का वर्णन करते हुए कवि कहता है - वार केला किं पिक परत्रिपुररन्धनं विविधदैत्यविध्वंसनं एला कि झिम्पराक्रमपरम्परा अपि परा न ते विस्मयः। … अमषेबलहर्षितक्षुभितवृत्तनेत्रीज्ज्वल In t o: ज्वलज्ज्वलनहेलया शलभितं हि लोकत्रयम् ।। ७ 14.15
श्रीवत्सांक मिश्र : वरदराजस्तव
काञ्ची में वरदराज का मन्दिर अत्यन्त प्राचीन तथा प्रख्यात है। यहाँ विष्णु वरदराज के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इन वरदराज के विषय में अनेक स्तोत्रकाव्य संस्कृत में लिखे गये हैं। जिनमें श्रीवत्साक मिश्र का ‘वरदराजस्तव’ सर्वाधिक प्राचीन है। श्रीवत्साङ्क मिश्र का समय वि.सं. १०६६ (१०३६ ई.) के लगभग है। ये रामानुजाचार्य की परम्परा के महत्त्वपूर्ण कवि तथा आचार्य हैं। एक पारम्परिक पद्य में में तो इनके सुभाषितों को वेदत्रयी रूपी नायिका का मंगलसूत्र बताया गया है - श्रीवत्सचिनमिश्रेभ्यो नम उक्ति विधीमहे । गाजिया यदुक्तयस्त्रयीकण्ठे यान्ति मङ्गलसत्रतामा 1045 TSUBAS रात शिकत वरदराजस्तव में १०२ पद्यों में श्रीवरदराज का षाड्गुण्यविग्रह विस्तार से निरूपित है। वर्णनकला, विविध छन्दों के प्रयोग, कल्पना की उर्वरता तथा पदावली की भावगम्भीरता के कारण यह रचना अच्छी बन पड़ी है। कवि ने दैन्य और निरहंकार-भाव की भूमि पर अवस्थित होकर अपने गुण साहित्य पर प्रकाश डालते हुए वरदराज से शरणागति और अभय माँगा है - यदि त्वभक्तोऽप्यगुणोऽपि निष्क्रियो निरुद्यमो निष्कृतदुष्कृतो न च। लभेय पादौ वरद स्फुटास्ततः क्षमादयाद्यास्तव मङ्गला गुणाः।। अशेषदेशाखिलकालयोगिनीष्वहं त्ववस्थास्वखिलास्वनन्यधीः। अशेषदास्येकरतिस्तदाचरन् करीश वर्तेय सदा त्वदन्तिके।। * काव्यमाला गुसक, ६ पृ. १०६-११४ वाज २. विवरण के लिये द. शोधनमा-पत्रिका (अक्टूबर-मार्च १७८१-८२) में पृ. २०१-२०७ पर प्रकाशित डा. ओमप्रकाश पाण्डेय का लेख वरदराजस्तोत्रत्रयी : एक समीक्षा। ३. उक्त लेख में उद्धृत ४३२ काव्य-खण्ड E वरदराजस्तव वस्तुतः श्रीवत्साड्क के ‘पञ्चस्तवः’ का एक भाग है। भाजपा जी ग्यारहवीं शती में वेदान्त के महान् आचार्य रामानुज ने ‘शरणागतिगद्य’ ‘वैकुण्ठगद्य’ तथा ‘श्रीरङ्गगद्य’ नाम से तीन स्तोत्रात्मक काव्य रचे हैं। इनके शिष्य-श्रीवत्स के पञ्चस्तव में श्रीस्तव, अमितानुषस्तव, वरदराजस्तव, सुन्दरबाहुस्तव तथा वैकुण्ठस्तव- ये पाँच स्तोत्र हैं। श्रीवत्साड्क के पुत्र पराशर भट्ट ने ‘श्रीरङ्गराजस्तव’ ‘श्रीगुणरत्नकोश’ आदि कई स्तोत्र लिखे हैं।
कल्हण : अर्द्धनारीश्वरस्तोत्र
श्रीमदुत्पलदेव, अभिनवगुप्तपाद आदि महनीय कवियों के द्वारा संवर्धित कश्मीर की शैवस्तोत्रपरम्परा में राजतरङ्गिणीकार महाकवि कल्हण ने अर्द्धनारीश्वरस्तोत्र की रचना की। इस में विभिन्न छन्दों में १८ पद्य हैं। शिव के प्रति भक्तिभाव के साथ-साथ श्रृङ्गार और हास्य की भी छटा इस स्तोत्र में है। अर्द्धनारीश्वर रूप में (पार्वती वाले देहाध का) बायाँ हाथ दाहिने नयन में भी काजल आंजने के लिये बढ़ता है, जबकि दाहिना हाथ जिसमें सर्पवलय है, बायें हाथ में भी सर्प का अंगद पहनाने का प्रयास करता है। उमा-परमेश्वर इस प्रकार अनभ्यास के कारण उत्पन्न विसंगत स्थिति मुस्कुरा कर देखते रह जाते हैं - * मा वि दातुं वाञ्छति दक्षिणेऽपि नयने वामः करः कज्जलं Bाल कि भौजङ्ग च भुजेऽङ्गदं घटयितुं वामेऽपि वामेतरः। वट शिज इत्थं स्वं स्वमशिक्षितं भगवतोरथं वपुः पश्यतोः तिर किन मिल साधारस्मितलाञ्छितं दिशतु वो वक्त्रं मनोवाञ्छितम् ।। (७)
श्रीसामराज : त्रिपुरसुन्दरीमानसपूजनस्तोत्र
‘सुदामचरितम्’ नाटक तथा अन्य काव्यों के प्रणेता श्रीसामराज दीक्षित का निवास स्थान मथुरा तथा समय सत्रहवीं शताब्दी विक्रम का पूर्वार्ध या सोलहवीं शताब्दी ई. का उत्तरार्ध है। इनका ‘त्रिपुरसुन्दरीमानसपूजनस्तोत्र’ एक उत्तम काव्य रचना है। इसकी शैली अत्यन्त अलंकृत, प्रवाहपूर्ण और भक्तिरस से आप्लुत है। इस काव्य में ७० पद्य हैं। आरम्भ में मालिनी छन्द का प्रयोग ३८वे पद्य तक है, तत्पश्चात् विविध छन्दों का प्रयोग है। सौन्दर्य तथा अप्रस्तुत विधान की छटा रमणीय है। यथा - विविध का कीय कलाकार अमतजलधिमध्योल्लासिरत्नान्तरीप-ha’ शिशट काट प्रसृमरकिरणाली कल्पितोद्यानशोभे। गाने FREE FE सुरतरुनकुरम्बस्पृष्टवातायनान्त-दापनि श्चलदलिपटलीभिः क्लृप्तधूपाधिकृत्ये।। जय कि मणिमयभवनेऽन्तः प्रौढमाणिक्यशाला नामिहिर मधिवसतिविशाला कापि ते रलवेदी। कोलमिडि तदुपरि कृतवासं दत्तबालार्कहासं दिशतु शुभमनन्ते देवि सिंहासनं ते जमा कालाका १. महाकवि कल्हण के परिचय के लिये इस ग्रन्थ में ऐतिहासिक महाकाव्य शीर्षक अध्याय देखिये। कस्तोत्रकाव्य (अमृतसागर के मध्य उल्लसित रत्नद्वीप में फैलती किरणों के बीच बसे उद्यान में पारिजात के झुरमुट द्वारा जिसका वातायन छुआ गया है, तथा चंचल भौंरे धूप कर रहे हैं, ऐसे मणिमय भवन में, विशाल माणिक्यशाला में बड़ी रत्नवेदी पर प्रभात के सूर्य का उपहास करने वाला तुम्हारा सिंहासन है। हे देवि, वह सिंहासन शुभदायक हो। अनेक छन्दों में अन्त्यानुप्रास का आग्रह होने से दुरूहता भी आ गयी है। कहीं-कहीं अनुप्रास और यमक का चमत्कारपूर्ण निर्वाह सामराज ने किया है। यथा - माला IFFERIFFEf त्वत्पदपद्मे चित्तं त्रिपुरे मे रमतां FDPSp निकलकर तत्रैव प्रतिवेलं मौलिमें नमताम्। यातायातक्लेशः सद्यः संशमतां निमम सरगी याचे भूयो भूयो भवता में भवताम् ।। (५०) भाग गाना [চনীড়
रूपगोस्वामी : गन्धर्वप्रार्थनाष्टक तथा मुकुन्दमुक्तावली
गौडीय माधुर्य भक्तिसम्प्रदाय के आचार्य रूपगोस्वामी की स्तोत्र रचनाएँ गन्धर्वप्रार्थनाष्टक तथा मुकुन्दमुक्तावली उल्लेखाई हैं। अन्य स्तोत्रों में महाप्रभु वल्लभाचार्य का ‘मधुराष्टक’ अपनी सरलता और माधुर्य भक्ति की सरस अभिव्यक्ति के कारण भक्तजनों में बड़ा लोकप्रिय है। इसके प्रत्येक श्लोक के अन्त में ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं’ की आवृत्ति है। इसी प्रकार विट्ठलेश्वर की चतुः श्लोकी और रामानन्दस्वामी का ‘शिवरामाष्टकस्तोत्र’ भी साम्प्रदायिक परम्परा में लोकप्रिय