अन्य स्तोत्र काव्यों में आदि-शंकराचार्य के गुरु श्री गौडपादाचार्य का स्तुतिकाव्य ‘सुभगोदयस्तुति’ उल्लेखनीय है। यह शिखरिणी छन्द में है तथा इसमें ५२ श्लोक हैं। का कालिदास के नाम से ‘श्यामलादण्डकम्’ नामक देवी-स्तोत्र मिलता है, पर विक्रमादित्य के समकालीन कवि कालिदास को इसका रचयिता नहीं माना जा सकता। दण्डक छन्द में मिलने वाले स्तोत्रों में इसे सर्वप्रथम कहा जा सकता है। ‘श्यामलादण्डकम’ लोकप्रिय स्तोत्रों में से है। पाँच दण्डक वृत्तों के अतिरिक्त इसमें आरम्भ में एक इन्द्रवजा तथा एक अनुष्टुप और अन्त में एक अनुष्टुप है। इस काव्य में मातंगी देवी की स्तुति है, तथा दण्डक का जो प्रभेद कवि ने प्रयुक्त किया है, उसे मत्तमातंगलीलाकर कहा जाता है। आरम्भ में इन्द्रवजा में अनुप्रास की छटा रमणीय है - माणिक्यवीणामुपलालयन्ती मदालसा मञ्जुलवाग्विलासाम्। माहेन्द्रनीलोत्पलपद्मकान्तिं मातङ्गकन्यां मनसा स्मरामि ।। कि दण्डक छन्द में भी कवि ने अनुप्रास की यह झंकार बनाये रखी है। तथापि प्रसाद गुण की व्याप्ति रचना में अक्षत है। अन्तिम दण्डक का अन्तिम पाद देखें - काम सर्वपीठात्मिके सर्वमन्त्रात्मिके सर्वतन्त्रात्मिके सर्वयन्तात्मिके। सर्वशक्त्यात्मिके सर्वपीठात्मिके सर्वतत्त्वात्मिके सर्वयोगात्मिके … सर्वनादात्मिके सर्वशब्दात्मिके सर्वविश्वात्मिके सर्वदीक्षात्मिके. मुम्हा सर्ववत्मिके सर्वगे पाहि मां पाहि मां पाहि मां देवि तुभ्यं नमो कृतः भाकी किम देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमः। १५११ को न १. सं.सा. इतिहास पृ. ३५५ धारा ।। (काव्यमाला गुच्छक -१, पृ. ११) स्तोत्रकाव्य ४२७