२८ रामभद्र दीक्षित

रामभद्र दीक्षित तंजोर के विद्याप्रेमी नरेश शाहजी प्रथम वि.सं. १७४१-१७६८ (१६८४ ई.-१७११ ई.) के सभापण्डित थे। आप नीलकण्ठ दीक्षित के सुशिष्य थे। अतः इनका समय १७वीं शती का उत्तरार्ध रहा है। इनके ५ स्तोत्र उपलब्ध होते हैं - oft १. रामचापस्तव, २. रामबाणस्तव, ३. विश्वगर्भस्तव, ४. वर्णमालास्तोत्र, ५. रामाष्टपास। ४२३

रामचापस्तव

इस स्तोत्र में १११ श्लोकों में शार्दूलविक्रीडित छन्द में राम के धनुष का प्रौढ एवं प्रभावपूर्ण वर्णन किया गया है।

रामबाणस्तव

इस स्तोत्र में राम के बाण की महिमा १०८ पद्यों में गौडी रीति में वीररसमयी वाणी में निबद्ध की गई है।

विश्वगर्भस्तव या जानकीजानिस्तोत्र

इस स्तोत्र में १२५ पद्य हैं। प्रत्येक पद्य के अन्तिम पाद में ‘तस्मै प्राञ्जलिरस्मि दाशरथये श्री जानकी जानये’ समस्यापूर्ति की गई है। भक्तिभाव से पूर्ण इस स्तोत्र में जानकीनाथ के पदारविन्दो में जाने की कामना की गई है ताकि संसार-सागर को सरलता से पार किया जा सके।

वर्णमालास्तोत्र

यह स्तोत्र भगवान् राम की स्तुतिपरक है। स्तुति वर्ण-क्रमानुसार की गई है। इसकी भाषा सरल एवं सरस तथा भाव रसोपेत है। यह उदाहरण द्रष्टव्य है रम्योज्ज्वलस्तव पुरा रघुवीर देहः कामप्रदो यदभवत्कमलालयाय। जनगणजिमक चित्रं किमत्र चरणाम्बुजरेणुरेव कामं ददौ न मुनये किमु गौतमाय।।

रामाष्टप्रास

रामाष्टप्रास ११६ पद्यों का स्तोत्र है। इसकी रचना शार्दूलविक्रीडित छन्द में की गई है। इसमें भगवान् राम की स्तुति है जो अनुप्रास बहुल है - PP STET दानीयरचितः श्रियामपि रिपोरानीय येनानजः लामा कि FT पानीयकश्मेव योऽस्त्रशिखिनाऽवानीदपोढस्मयम् । IFE FIRD आनीते विभवं च यस्य स वसन्मौनी वटदोस्तले ठाउमाका यामीनं शरणं मनोविहरण-स्थानीकृतं सीतया।। (राम ने शत्रु रावण के अनुज को लक्ष्मी का दानीय (दान योग्य) बना दिया, जिन्होंने समुद्र को अपने अस्त्र की अग्नि से गर्वरहित कर दिया, वट वृक्ष के नीचे रहने वाले मौनी शंकर जिनके माहात्म्य को जानते हैं; सीता को मनोविहार के स्थान रूप उन श्रीराम के शरण में मैं जाता हूँ। यहाँ ‘नी’ अक्षर का अनुप्रास प्रति चरणात्मक ही नहीं अपितु यति के बाद भी है, परिणाम स्वरूप यह पद्य अष्टपास (आठ अनुप्रासों वाला) है। उमा एक अन्य उदाहरण में ‘का’ अक्षर का चमत्कार देखिए - १. काव्यमाला द्वादश गुचाक में प्रकाशित। २. वही ३. काव्यमाला, चतुर्दश गुच्छक में प्रकाशित ।४२४ काव्य-खण्ड -राकानाथ निभाननं वसुमती-लोकाभिरामाकृति प्रकाशमा पाकारतिपुरःसरामरसदः शोकापनोदक्षमम्। सजाय र मार कर कोकानन्दन-वंशज-व्रतपरी, पाकावकृष्टोदयं भावाच्या केकावन्नवपिञ्छनीलवपुषं, लोकामहे चेतसि।। गा रिसाए । सम्पूर्ण रूप में रामभद्र दीक्षित का स्तोत्र साहित्य सर्वप्रकार सुन्दर एवं रसस्निग्ध है। रामभद्रके सभी स्तोत्र राम के प्रति अनन्य निष्ठा और उनके गुणों पर अनुरक्ति से स्फूर्त हैं। इनके स्तोत्रों का प्रगाढबन्ध और गौडी तथा पाञ्चाली रीतियों का विन्यास काव्यनैपुण्य का परिचायक है। ओजस्विता के साथ शब्दालङ्कारों और अर्थालड्कारों का निरन्तर विन्यास और उसके साथ भावध्वनि के गाम्भीर्य का भी उत्कृष्ट निर्वाह देखते ही बनता है। रामचापस्तव में धनुष पर शरसन्धान करते हुए राम का यह स्वभावोक्तिमयचित्र उदाहर्तव्य कर्षदक्षिणपाणिलग्नसशरज्यावल्लिचक्रीकृतं गृह्णद्वामकराङ्गुलीयकमणिच्छायोल्लसल्लतकम्। मानामावापतकम् संरब्धस्य निषेदुषो रघुपतेरालीढभङ्ग्या रणे यावद्राक्षससैनिकाक्षिविषयं क्षेमाय चापं भजे।। (७) (मैं कल्याण के लिए राम के उस धनुष का भजन करता हूँ, जिसकी ज्यावल्ली (डोरी) को राम अपने दाहिने हाथ से खींचते हैं, तो वह मुड़ कर चक्राकार हो जाता है, और बांये हाथ से उसे लस्तक (मध्यभाग) पर पकड़ते हैं, तो उसकी मणियों की कान्ति से वह दमक उठता है। संरम्भपूर्वक आलीढ मुद्रा में बैठ कर जब राम उस पर सन्धान करते हैं, तो भागते हुए राक्षस उस धनुष को ताकते जाते हैं।) मा राम की लीलाओं, शौर्य और औदार्य का वर्णन भी कवि उनके आयुधों की स्तुति करते हुए प्रस्तुत करता चलता है। रूपक और अतिश्योक्ति जैसे अलंकार रामभद्र की लेखनी से अहमहमिकया फूटते चले जाते हैं, पर अलंकारविन्यास ने उनके काव्य के भावगाम्भीर्य का व्याघात नहीं किया है। रामबाणस्तवः का यह उदाहरण देखिये - NPR DIEFF PETE भक्तानामिष्टदाने सुरतरुरुदधेः शोषणे वाडवाग्निः । क्रव्यादव्याजखेलत्प्रबलतमतमः खण्डने चण्डभानुः। पुष्णातु क्षेममेकाधिकदलितमहासालषट्कः पृषत्कः श्रीरामस्कन्धपीठाधितशरघिवल्मीकशायी फणीन्द्रः।। (४). (भक्तों को इष्ट प्रदान करने में कल्पवृक्ष, सागर को सौखने में वाडवाग्नि, राक्षसों रूपी अंधकार को मिटाने में सूर्य, एक ही बार से छह सालों के वृक्ष गिरा देने वाला, श्रीराम के कंधे पर तरकस में सोता हुआ महाभुजंग बाण कल्याण करे।) स्तोत्रकाव्य ४२५ दुरूह शब्दों का प्रयोग भी कवि ने कौशल से किया है। रामभद्र की पदावली विपुल है, भाषा के वैविध्य और वैलक्षण्य की दृष्टि से काव्यकौशल भी समृद्ध है।