२७ नीलकण्ठ दीक्षित के स्तोत्र

श्रीमदप्पय दीक्षित के वंशज महाकवि नीलकण्ठ दीक्षित का कर्तृत्व अत्यन्त विपुल तथा महनीय है। महाकाव्यों, नाटक तथा चम्पू और अनेक शास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त उनके लघुकाव्य और स्तोत्र संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर है। जिस कार को 17 नीलकण्ठ ने शान्तिविलास, आनन्दसागरस्तव, शिवोत्कर्षमञ्जरी, चण्डीरहस्यम्, रामायणसारसङ्ग्रहरघुवीरस्तवः, गुरुतत्त्वमालिका आदि स्तोत्रों की रचना की। इनमें स्तोत्रकाव्य की विभिन्न विशेषताओं का भव्य स्वरूप देखा जा सकता है। सिक १. संस्कृत साहित्य का इतिहास- वा. गैरोला (१७८५ ई.), पृ. ७७८ काव्य-खण्ड

(१) शान्तिविलास-

में निर्वेद का स्वर प्रधान है। कदाचित् यह कवि ने वृद्धावस्था में लिखा था। लोष्टक कवि के दीनाक्रन्दनस्तोत्र के पश्चात् संसार की निस्सारता, कवि के दैन्य, राग तथा अहं के विगलन तथा मोहभंग की ऐसी मार्मिक अभिव्यक्ति कम ही दिखायी देती है। इस काव्य के ५१ मन्दाक्रान्ता छन्दों में प्रत्येक कवि के जीवन में अब किये गये सारे उद्यम की व्यर्थता और अनुताप के बोध के साथ ईश्वर के प्रति भावाकुल समर्पण की अभिव्यक्ति है। कवि संसार और परिवार से टूटते हुए अपने सम्बन्धों का अनुभव करता है। जागतिक सम्बन्धों में अभिव्याप्त स्वार्थ का भयावह स्वरूप वह प्रत्यक्ष देखता है। नीलकण्ठ ने यहाँ ईश्वरभक्ति के साथ-साथ वेदान्त-निरूपित जगत् की परमार्थतया निस्सारता को कविदृष्टि से उन्मीलित किया है। अपने स्वयं के घर के विषय में अब उसे बोध होता है - आयान्त्यग्रे ननु तनुभवा उत्तमर्णा इवेमे 2 शय्यालग्नाः फणभृत इवाभान्ति दारा इदानीम्। नित किन कारागेहप्रतिममधुना मन्दिरं दृश्यते मे हिमाली तत्र स्थातुं प्रसजति मनो न क्षणं न क्षणार्धम् ।। २१ (मेरे बेटे कर्ज वसूलने वालों की तरह आज मेरे आगे खड़े हैं। पत्नियाँ सेज से लिपटी नागिनों सी दिखती हैं। मेरा अपना घर कारागार जैसा मुझे लग रहा है, जिसमें एक क्षण भी रुकने का मन नहीं होता।) अन्त में कवि शिव से अपना सच्चा स्वरूप पाने की प्रार्थना करता है - ‘मह्यं शम्भो दिशमसृणितं मामकानन्दमेव । (४६)

(२) आनन्दसागरस्तव-

में कवि नीलकण्ठ ने आनन्दलहरी और सौन्दर्यलहरी के काव्य प्रकर्ष को छू लिया है। इस काव्य में पाण्ड्यकन्या के रूप में भवानी की गद्गद भाव से स्तुति की गयी है। अपने लिये शिशु तथा आराध्या देवी के लिये मातृत्व की व्यंजना गहरी अनुभूति के साथ की गयी है। माना ISH समर्पण का स्वर इस काव्य में सर्वातिशायी है। कवि अपने समस्त अज्ञान, विशाल ज्ञानराशि, पाण्डित्य, पुण्य-अपुण्य सभी को माता के चरणों में अर्पित कर देना चाहता है। वह माता भवानी को उलाहना भी देता है कि जब मेरे पूर्वज अप्पय दीक्षित ने पहले ही अपने आप को, अपने सारे कुल को तुम्हें समर्पित कर दिया है, तो तुम मुझ कुलदास की उपेक्षा करने वाली कौन होती हो, और मैं अपनी कुलदेवी की अनुपासना करने वाला भी कौन होता हूँ (४३)। इस भूमि पर पहुँच कर कवि को संसार के लोग मूर्ख प्रतीत होने लगते हैं - ४२१ स्तोत्रकाव्य करयामा आदाय मूर्धनि वृथैव भरं महान्तं नारी ति ठाम Roop मूर्खा निमज्जथ कथं भवसागरेऽस्मिन् । मागला नाही निकाल विन्यस्य भारमखिलं पदयोर्जनन्या मा काम काज विस्रब्धमुत्तरत पल्वलतुल्यमेनम् ।। ४५ पीक किया जा _(हे मूखों, अपने माथे पर महान् भार को ढोते हुए इस भवसागर में डूबे क्यों जा रहे हो? अपना सारा भार जननी के चरणों पर रख दो, फिर इसे निश्चित होकर पोखर की तरह पार कर लोगे)। नीलकण्ठ शैवागम के निष्णात विद्वान थे। पर भक्तिभाव में बहते हुए वे अपने सारे ज्ञान और विज्ञान को भी विसर्जित करना चाहते हैं - एतज्जडाजडविवेचनमेतदेव -RREP क्षित्त्यादितत्त्वपरिशोधनकौशलं च। This ज्ञानं च शैवमिदमागमकोटिलभ्यं RPhgine मादि मातर्यदध्रियुगले निहितो मयात्मा।। (४८) का

(३) शिवोत्कर्षमञ्जरी-

में शार्दूलविक्रीडित छन्द हैं। प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ पाद में ५१ श्लोकों तक ‘स स्वामी मम दैवतं तदितरो नाम्नापि नाम्नायते’ की आवृत्ति है। अन्तिम पद्य में शिव की अष्टमूर्तियों में ही अपने पूर्वज अप्पय दीक्षित की भी गणना करता हुआ कवि कहता है - भूमिभ्राम्यति बुद्ध एव मरुतः प्रत्यग्भ्रमोऽत्यद्भुतो भ्राम्यन्त्येव सहाश्रयेण यदि वा ज्योतींषि सर्वाण्यपि। आवर्तोऽयमपां भ्रमः परिचिता मूर्तिहरस्याष्टमी या सास्त्यप्पयदीक्षितो जयति सा मूर्तिनिरस्तभ्रमा।।

(४) नीलकण्ठदीक्षितकृत चण्डीरहस्यम् -

देवीस्तोत्रों में उल्लेख्य रचना है। इसमें ३४ पद्य हैं। देवी के विभिन्न नामों और रूपों का निरूपण करते हुए इसमें कवि ने अन्य समस्त देवों को उसका वशंवद बताया है - यच्छक्तिलेशसकृदर्पणपात्रभावमात्रादपि द्रुहिणशौरिमहेश्वराणाम्। प्राप्तो यदि श्रुतिशतैः परमात्मभावस्तामम्ब देवि भवतीं किमिति स्तुवन्तु।। नन्दात्मजेति ननु वर्षसि हेमराशिं शाकम्भरीति शमयस्युदरोपसर्गान्। योगीश्वरीति परिहृत्य भयानि भक्तान् मातेव पाययसि कामदुधौ स्तनौ ते। शाणा वाणा । १,३० ४२२ काव्य-खण्ड

(५) रामायणसारसङ्ग्रह-रघुवीरस्तवः

नीलकण्ठ की भक्तिभावना, कवित्वप्रतिभा और सांस्कृतिक अवबोध का सुन्दर निदर्शन रामायणसारसङ्ग्रह-रघुवीरस्तवः में मिलता है। इसमें कुल ३३ पद्यों में गागर में सागर भर दिया गया है। प्रत्येक पद्य में कवि ने भक्तिभाव में डूब कर भगवान राम की स्तुति भी की है, और उसी के साथ-साथ रामचरित का क्रमशः यस पूरा निरूपण भी कर दिया है। सारा स्तोत्र राम को ही सम्बोधित है। इतिवृत्त का जगति समास शैली में सांगोपांग निर्वाह तथा स्तुति और समर्पण के भाव का उसी के साथ समवेत प्रकटीकरण इस काव्य का दुर्लभ गुण है। उदाहरण के लिये दो पद्य प्रस्तुत यज्ञं ररक्षिथ मुनेर्यदि कौशिकस्य जारि किशाही दिला यज्ञात्मनस्तव तु तां विदुरात्मरक्षाम्।। कीर्तिं यदीच्छसि कृतार्थय मामनाथं काकुत्स्थ वीर करुणामसृणैरपाङ्गः।। (२) इस पद्य में विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के प्रसंग का उल्लेख भी है, और राम को उलाहना भी है कि आप यज्ञस्वरूप हैं, यज्ञ रक्षा करके तो आपने आत्मरक्षा ही की। यदि कीर्ति चाहते हैं, तो मुझ अनाथ को अपनी करुणामसृण दृष्टि से निहारिये। इसी प्रकार हनुमान् और विभीषण पर राम की अनुकम्पा का उल्लेख करके कवि अपने ऊपर भी उनकी अनुकम्पा की भीख माँगता है - दाता बभूविथ कपीन्द्रविभीषणाभ्यां - स्वं स्वं पदं स्वमनुमत्ययतस्ततोऽहम् । मह्यं मदीयमपि तात्त्विकमेव रूपं किञ्चित् प्रदशर्य भज कीर्तिमिति स्तुवे त्वाम् ।। (२६)

(६) गुरुस्तवमालिका

नीलकण्ठ का एक अन्य स्तोत्र ‘गुरुस्तवमालिका’ है, जिसमें कवि ने शार्दूलविक्रीडित छन्द में अत्यन्त श्रद्धाभाव से अपने गुरु श्री गीर्वाणेन्द्र यति की स्तुति की है। प्रत्येक पद्य के अन्तिम पाद में ‘गीर्वाणेन्द्र’ नामाङ्कित है।